सोमवार, 4 जनवरी 2010

अब सब कुछ होगा बस एक िक्लक पर


अब सब कुछ होगा बस एक िक्लक पर

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। विजन 2020 को साकार करने की दिशा में भारत सरकार काफी हद तक गंभीर दिखाई दे रही है। देश के हर जिले को ई डिस्ट्रिक्ट बनाने के लिए संचार मंत्रालन द्वारा आरंभ की गई ई डिस्ट्रिक्ट योजना को देश के 35 जिलों से बढाकर ज्यादा करने की पहल की जा रही है। इस योजना के लागू होने से आम नागरिकों को अनेक सुविधाएं कम्पयूटर की बस एक िक्लक पर ही मुहैया हो सकेंगी।

संचार मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय का यह प्रयास है कि 2010 के अंत तक देश के सभी जिलों को ई डिस्ट्रिक्ट योजना से जोड दिया जाए। जिलों के इससे जुडने से 33 सरकारी सेवाओं का लाभ नागरिकों द्वारा तत्काल ही उठाया जा सकेगा। वर्तमान में यह योजना देश के 14 राज्यों में चल रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार यूपी के 6, मध्य प्रदेश और तमिलनाडू के पांच पांच, महाराष्ट्र और बिहार के तीन तीन, असम, पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल के दो दो एवं मिजोरम, उडीसा, उत्तराखण्ड, झारखण्ड एवं हरियाणा के एक एक जिलों को ई डिस्ट्रिक्ट योजना से जोडा गया है।


सूत्रों ने बताया कि ई डिस्ट्रिक्ट योजना के लागू होने के उपरांत जाति, आय, मूलनिवासी प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लोगों को यत्र तत्र भटकना नहीं पडेगा। इसमें आवेदन देने के महज 48 से 72 घंटों के अंदर ही उन्हें प्रमाणपत्र मिल जाएंगे। वर्तमान में इन प्रमाणपत्रों को बनवाने के लिए लोगों को लम्बी एवं उलझाउ प्रक्रिया का सामना करना पडता है, जिससे उनके समय और धन दोनों ही की बबाZदी होती है। इसके अलावा अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के माध्यम से बच्चों के लिए कम्पयूटर आधारिक शिक्षा और बिजली के बिल के भुगतान की सुविधा भी इसमें उपलब्ध होगी।

उधर इस योजना को लागू करने में आने वाली कानूनी पेचीदगियों और व्यवहारिक कठिनाईयों के समाधान के लिए मंत्रालय ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति मैदानी इलाकों में जाकर इसमें आने वाली तकलीफों का अध्ययन करने के बाद इसके समाधान का रास्ता सुझाएगी। इस समिति के प्रतिवेदन के आधार पर ही मंत्रालय अपने कानून में संशोधन के विधेयक का मसौदा तैयार करेगा। अनेक जिलों में कनेक्टिविटी की समस्या इसके मार्ग की सबसे बडी बाधा बनकर उभर रही है।

कहां थे कांग्रेस के युवराज!




ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)


कहां थे कांग्रेस के युवराज!

इस देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी होने का गौरव प्राप्त कांग्रेस अपनी स्थापना की 125वीं वर्षगांठ धूम धाम से मना रही है। 28 दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना के समय इटली मूल की निवासी एवं नेहरू गांधी परिवार की बहू कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने पार्टी के निजी कें्रद्रीय कार्यालय की नींव रखी। आश्चर्य की बात है कि 125 सालों के कांग्रेस के इतिहास में आजादी के बाद आधी सदी से अधिक समय तक कांग्रेस ने देश पर राज किया और अपने लिए एक अदद केंद्रीय कार्यालय तक नहीं बनवा सकी। यह अलहदा बात है कि प्रदेश यहां तक कि जिलों में कांग्रेस के भव्य कार्यालय खडे हो चुके हैं। बहरहाल कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय के शिलान्यास के मौके पर कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष ने अतीत (मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जीवन दर्शन) को समझाया। जब बारी आई भविष्य की तो सबकी निगाहें कांग्रेस के भविष्य (राहुल गांधी) को खोज रहीं थीं। कार्यक्रम में उपस्थित लोग असमंजस में थे कि आखिर कांग्रेस के युवराज गए तो गए कहां। हो सकता है युवराज साल भर की भागदौड के बाद विदेशी धरा पर नया साल मनाने की गरज से बाहर गए हों। रही बात कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय की नींव रखने की तो उसके लिए उनके परिवार का एक सदस्य यानी कांग्रेस की राजमाता जो वहां मौजूद थीं।


फिर ब्राम्हण बनिया पार्टी बन गई भाजपा!

जब से भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ है तब से इसे ब्राम्हण और बनियों की पार्टी ही कहा जाता रहा है। भाजपा पर लगे इस दाग को कुछ ही दिन पहले बमुश्किल धोया गया था, एक बार फिर भाजपा ब्राम्हणों की पार्टी बनकर उभर रही है। भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज के अलावा अब राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेतली भी ब्राम्हण ही हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा में अब ब्राम्हणों का एक छत्र राज्य कायम हो गया है। वैसे भी राजनैतिक बिसात पर जातीयता को बहुत ही अधिक संवेदनशील माना गया है, और भाजपा ने अपने कोटे के तीन शीर्ष पदों पर ब्राम्हणों को विराजमान कर सभी को चौंका दिया है। भाजपा और संघ का एक धडा इसे स्वीकार करने में अपने आप को असहज पा रहा है। भाजपाईयों का कहना है कि जैसे तैसे तो भाजपा के दामन से ब्राम्हण बनियों की पार्टी होने का दाग छूटा था, पर पार्टी के नीतिनिर्धारकों ने एक बार फिर पार्टी पर ब्राम्हण बनियों की पार्टी होने की छाप लगा ही दी।

और बज गए बगावत के बिगुल





मध्य प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस में बगावत का स्वरनाद सुनाई देने लगा है। बाहुबली क्षत्रपों द्वारा अपने चहेतों को टिकिट देने और अनेक प्रभावशाली नेताओं द्वारा भीतराघात करने संबंधी शिकायतों से प्रदेश कांग्रेस कमेटी भोपाल और एआईसीसी दिल्ली गूंज उठी है। इनमें सबसे अधिक बगावत की बू भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के महाकौशल क्षेत्र से आ रही है। जहां उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा के जिला मुख्यालय, सिवनी बालाघाट यहां तक कि संभागीय मुख्यालय जबलपुर में भी कांग्रेस का निराशजनक प्रदर्शन रहा है। दूसरे नंबर पर चंबल के क्षत्रप युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ असंतोष के स्वर फूटने लगे हैं। विन्धय में कांग्रेस के चाणक्य माने जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह के पुत्र अजय िंसंह तथा सूबे के पूर्व विधानसभाध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी को भी भारी गुस्से का सामना करना पड रहा है। चौ तरफा एक ही शिकायत गूंज रही है कि टिकिट वितरण में भाई भतीजावाद हावी रहा तो दूसरी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेताओं ने परोक्ष तौर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय न कर भीतराघात भी किया है।

. . . तो गिल्त हो गई कांग्रेस से

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस 125वीं सालगिरह मना रही है। पार्टी के तरकश में न जाने कितने तीर आज भी पडे हुए हैं, जिन्हें अगर वह चाहे तो चलाकर देश की युवा पीढी को आजादी के दीवानों की अद्भुत कारगुजारियों से आवगत करा सकती है। पार्टी आने वाले दिनों में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढी अर्थात राहुल गांधी के हाथों में सौंपने को आमदा है। आज राहुल गांधी भी शायद आजादी के इतिहास से बहुत अच्छी तरह वाकिफ नहीं होंगे, कि आजादी चाहने वालों ने आखिर किस दीवानगी के साथ ब्रितानियों को खदेडा था। कांग्रेस के पास यह सौभाग्य है कि आजादी के जुनून का नेतृत्व कांग्रेस ने ही किया था। पार्टी अगर चाहती तो उन शहीदों के बारे में बताकर आम जनता की भावनाएं जोड लेते। कांग्रेस चाहती तो उसके पास केंद्र में सरकार है, और गणतंत्र के 50 साल पूरे होने पर केंद्र सरकार के माध्यम से कोई अभियान ही चलवा देती। वस्तुत: एसा हुआ नहीं। हो सकता है कांग्रेस के भविष्य के निजाम राहुल गांधी की नजरों में आजादी के परवानों के बलिदान की कोई कीमत ही न हो।


मध्य प्रदेश पर गिर सकती है ममता की गाज

आजादी के बाद से अब तक पक्षपात का शिकार विकास की बाट जोहता मध्य प्रदेश आने वाले दिनों में रेल्वे के एक कार्यालय से महरूम हो सकता है। प्रदर्शन और निर्माण कार्यों में लापरवाही के आधार पर पिश्मच मध्य रेल्वे जबलपुर जोन, उत्तर मध्य रेल्वे इलाहाबाद, पूर्वी रेल्वे जोन हाजीपुर को समाप्त करने पर रेल्वे गंभीरता से विचार कर रहा है। ममता के करीबी सूत्रों का कहना है कि चूंकि महाकौशल के संभागीय मुख्यालय जबलपुर में एक असेZ से भाजपा का कब्जा है अत: कांग्रेसी क्षत्रप यहां से रेल्वे जोन समाप्त करने पर दबाव डाल रहे हैं। इन परिस्थितियों में जबलपुर के रेल्वे जोन को बिलासपुर, इलाहाबाद को उत्तर रेल्वे दिल्ली तथा हाजीपुर को पूर्वी रेल्वे जोन कोलकता में मर्ज किया जा सकता है। सूत्र यह भी बताते हैं कि जबलपुर से गोंदिया का अमान परिवर्तन का काम संतोषजनक नहीं होने के चलते भी जबलपुर पर गाज गिरने की संभावनाएं हैं।

चाल, चरित्र, चेहरा नहीं पोशाक बदली भाजपा ने!

भाजपा ने अपनी चाल, चरित्र और चेहरा भले ही बदला हो या न बदला हो पर भाजपा ने अपनी पोशाक अवश्य ही बदल ली है। कल तक भाजपा में धोती धारण करने वाले नेताओं की भरमार थी। अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह आदि धोती कुर्ते में बडे ही सभ्रांत और कुलीन दिखते थे। इसके बाद अरूण जेतली ने कुर्ता पायजामा और शर्ट पेंट के साथ जैकेट का चलन आरंभ किया। नरेंद्र मोदी ने आधे बांह का कुर्ता चलन में लाया। अब आरामदेह फुलपेंट, फैशनेबल पश्चिमी सभ्यता का प्रतीक सूट, जैकेट आदि के रंग में रंग चुका है भाजपा का मुख्यालय 11 अशोक रोड। भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी भी धोती कुर्ता या कुर्ता पायजामा को ज्यादा तरजीह नहीं देते हैं। वे सफारी सूट या पश्चिमी सूट, कोट पेंट या शर्ट पेंट में ही नजर आ रहे हैं। कल तक भाजपा के कार्यकर्ता 11 अशोक रोड में कुर्ता पायजामा पहनकर सभ्रांत दिखने का प्रयास करते थे, तो अब शर्ट पेंट या कोट में आकर अपने आप को वर्तमान अध्यक्ष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला जताने का प्रयास कर रहे हैं।

सर चढकर बोला हुड्डा का जादू
हरियाणा में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का जादू लोगों के सिर चढकर बोल रहा है। विधायक दिन रात उठते बैठते हुड्डा के नाम की माला एसे ही नहीं जप रहे हैं। हाल ही में बिजली निगम के कार्यालय में एक विधायक जी के साथ घटा वाक्या उनके लिए अविस्मरणीय बन गया। हुआ यूं कि एक विधायक जी किसी अफसर से मिलने बिजली निगम के दफ्तर पहुंचे। वहां जैसे ही वे मुख्य द्वार पर पहुंचे तो दरवाजा अपने आप खुल गया। भोंचक्क विधायक जी के समर्थक ने चुटकी ली और कहा कि हुड्डा जी ने कहा है कि जैसे ही विधायक जी आएं दरवाजा अपने आप ही खुल जाना चाहिए। फिर क्या था विधायक जी अपने समर्थकों पर रोब गांठते हुए अंदर चल दिए। अब विधायक जी को कौन समझाए कि राज्य में कुछ कार्यालयों में सेंसर युक्त दरवाजे लगाए गए हैं, जिनके सामने अगर कोई आ जाता है तो वे अपने ही आप खुल जाते हैं। पर अंतत: हुई तो हुड्डा जी की ही जय जयकार।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे
इस बार दिल्ली सरकार के मंत्रियों का जायका जरा बिगडा हुआ रहा। कारण था कि नया साल मनाने के लिए उन्हें छुट्टी नहीं मिल सकी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साफ साफ हिदायत दी थी कि कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियां की जाएं। जिस किसी को भी जश्न मनाना हो वह शहर में ही रहकर नए साल का जश्न मनाए। देरी से चल रही परियोजनाओं का काम समय पर पूरा हो इसलिए शीला दीक्षित ने अपने मंत्रियों को पाबंद कर रखा है कि वे खेल की तैयारियों पर विशेष नजर रखें। मन मसोसकर सभी मंत्री दिल्ली में ही रहने पर मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर यह तुगलकी फरमान सुनाकर सूबे की निजाम शीाला दीक्षित नया साल मनाने राजस्थान के सवाई माधोपुर रवाना हो गईं। अपने परिवार के लोगों के साथ शीला राजस्थान में नए साल का स्वागत करने के उपरांत 2 जनवरी का वापस दिल्ली आ जाएंगी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी कार्यकर्ता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि पुरानी कहवात है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे। शीला जी को चाहिए था कि इस बार मंत्रियों को निर्देश देने के साथ ही साथ वे भी नए साल का स्वागत देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में ही करतीं तो बेहतर होता।

कहां लापता हैं रघुबीर!
मायानगरी के एक अभिनेता की इन दिनों खोज चल रही है। जाने माने अभिनेता और स्टेज के कलाकार रघुबीर यादव पिछले दो माहों से लापता हैं। हलांकि इनकी गुम इंसान रिपोर्ट (आदमी के गुम हो जाने पर पुलिस में लिखाई जाने वाली रपट) दर्ज नहीं कराई गई है, पर मुंबई की एक कोर्ट के रिकार्ड में वे लापता हैं। डरना मना है, फिराक, दिल्ली 6, लगान आदि फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा दिखा चुके रघुबीर के खिलाफ मुंबई की एक अदालत ने वारंट जारी किया है। दरअसल रघुबीर यादव की पित्न पूिर्णमा ने मुंबई के बांद्रा की परिवार अदालत में परिवाद दाखिल कर रघुबीर यादव से भरण पोषण की मांग की है। बार बार समन जारी होने पर उपस्थित न होने पर अदालत ने 19 सितम्बर को रघुबीर के खिलाफ वारंट जारी किया है। रघुबीर अभी भी कहीं फरारी ही काट रहे हैं।

सुषमा बन सकतीं हैं भाजपा की पीएम इन वेटिंग
एक के बाद एक सफल सियासी सफर तय करने वाली घरेलू लुक वाली भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज भाजपा के लिए नई पीएम इन वेटिंग बन सकतीं हैं। भाजपा में अगली पंक्ति में वैसे भी महिलाओं की कोई ज्यादा लंबी कतार नहीं है। फिर कांग्रेस की श्रीमति सोनिया गांधी और बहुजन समाज पार्टी की सुश्री मायावती के सामने भाजपा को एक न एक महिला नेत्री का चेहरा सामने लाना ही होगा। इस दृष्टिकोण से सुषमा स्वराज का चेहरा सबसे मुफीद ही लगता है। इशारों ही इशारों में भाजपा की मुखर नेत्री ने बीते दिनों हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में संवाददातों से चर्चा के दौरान खुद को पीएम इन वेटिंग की दौड से अलग बता दिया, किन्तु उनकी सधी चाल और भविष्य की रणनीति को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुषमा के नाम पर आने वाले दिनों में राजग के पीएम इन वेटिंग के लिए आम सहमति बना ली जाए। जिस तरह से पार्टी लाईन पर वे चल रहीं हैं उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि संघ की ओर से भी उन्हें इशारा मिल चुका है। गौरतलब होगा कि पार्टी महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर सुषमा को ही वक्तव्य देने के लिए खडा कर रही है।

अब बस भी कीजिए थुरूर साहेब
लगता है कि केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर का दिल है कि सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर के बिना मानता ही नहीं है। हर बात को वे इसके माध्यम से अपने प्रशंसकों से शेयर करते हैं। वीजा नियमों को कठोर बनाने के मामले में थुरूर ने अपने विभाग के मंत्री एम.एस.कृष्णा के खिलाफ ही चले गए। बाद में जब कृष्णा ने थुरूर की खिचाई की तब भी थुरूर का गुरूर कम नहीं हुआ। टि्वटर से अगाध प्रेम करने वाले शशि थुरूर ने फिर टि्वटर पर इस मामले में टिप्पणी कर डाली और कहा कि यात्रा पर होने के कारण वे इस मसले पर मचे बेवजह की हायतौबा क्यों। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह सहित समस्त कांग्रेसियों को अब तो सार्वजनिक तौर पर कह ही देना चाहिए -``अब बस भी कीजिए थुरूर साहेब।``

मंदिर मिस्जद भेद कराते . . .
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पिता एवं मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की अमर कथा ``मधुशाला`` के अनुसार मिस्जद मंदिर आपस में भेद कराते हैं पर मधुशाला आपस में प्रेम कराना सिखाती है। दिल्लीवासी हरिवंश राय बच्चन की इस मधुशाला से बेहद ज्यादा प्रभावित नजर आ रहे हैं। सन 2009 में समूचा विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा था, जाहिर है हिन्दुस्तान भी इसकी चपेट में था। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर मंदी का असर कोई खास नहीं दिखा। दिल्ली सरकार को आबकरी से होने वाले राजस्व में लगभग चार फीसदी इजाफा हुआ है। यही नहीं हुजूर बीते साल के आखिरी महीने अर्थात दिसबर में ही दिल्ली वासी लाख दो लाख नहीं वरन पूरे एक सौ साठ करोड रूपए की शराब गटक चुके हैं, जो अपने आप में एक रिकार्ड ही है। पिछले साल दिसंबर में दिल्लीवासियों ने 128 करोड रूपए की शराब पी थी। है न मजे की बात मंदिर मिस्जद भेद कराते . . . ।

माता रानी में श्रृद्धालुओं ने बनाया रिकार्ड
उत्तर भारत में त्रिकुटा की पहाडियों पर विराजीं माता वेष्णों देवी के भक्तों ने 2009 में एक रिकार्ड बना दिया है। इस साल कुल 82 लाख पांच हजार श्रृद्धालुओं ने माता रानी के भक्तिभाव से दर्शन किए। अर्थात साल भर रोजाना लगभग साढे बाईस हजार श्रृद्धालुओं ने माता रानी के दरबार में हाजिरी दी। नए साल की पूर्व संध्या पर उमडे भक्तों के हुजूम के आगे माता वेष्णो देवी श्राईन बोर्ड के सारे प्रबंध धरे के धरे रह गए। यद्यपि श्राईन बोर्ड को उम्मीद थी कि इस बार भक्तों की संख्या का आंकडा करोड के पार हो जाएगा, पर एसा हुआ नहीं। साल के आखिरी दिन बेस केम्प कटडा में लगभग पचास हजार श्रृद्धालु अपनी बारी का इंतजार करते रहे। गौरतलब होगा कि माता रानी के दरबार भवन में एक समय में तीस हजार लोग ही दर्शन कर सकते हैं।

सक्रिय राजनीति से बलात हटाए जा सकते हैं तिवारी
आंध्र प्रदेश के राजभवन और वहां के राज्यपाल रहे नारायण दत्त तिवारी पर सेक्स स्केंडल के छींटे पडने के बाद अब कांग्रेस का नेत्त्व उन्हें बलात इस बात के लिए तैयार करने पर जुटा हुआ है कि तिवारी सक्रिय राजनीति से स्वेच्छिक सेवानिवृति ले लें। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों ने बताया कि आलकमान चाहतीं हैं कि उत्तराखण्ड में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले वहां सब कुछ साफ सुथरा कर लिया जाए, इसलिए आलाकमान ने सूबे के नेताओं को मशविरा दिया है कि वे तिवारी को इसके लिए तैयार करें। सूत्रों ने बताया कि तिवारी से कांग्रेस की राजमाता इसलिए भी खफा हैं क्योंकि उनका सेक्स स्केंडल तब बाजार में आया जबकि कांग्रेस पार्टी अपने गौरवशाली इतिहास के 125 साल पूरे करने का जश्न मनाने की तैयारी कर रही थी। आलाकमान चाहतीं हैं कि तिवारी देहरादून के बजाए अपने पेत्रक गांव कुमाउं जाकर ही राम नाम जपें।

पुच्छल तारा
चेन्नई से डॉ.टी.विश्वनाथन के मेल के अनुसार सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट के फायदे हैं तो नुकसान भी। एक ओर जहां आप इसके माध्यम से लोगों से जुडे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर शशि थुरूर जैसे भारत के विदेश राज्यमंत्री इसके माध्यम से ही सरकार चलाने का जतन करने लगते हैं। विश्वनाथन ने चीन का जिकर करते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने दो शादियां कीं और दोनों अलग अलग शहरों में एक दूसरे से अनजान रहतीं थीं। दोनों महिलाएं फेसबुक के माध्यम से एक दूसरे की मित्र बनीं और जब उन्होंने एक दूसरे के प्रोफाईल पर शादी के फोटो देखे तो उनके होश उड गए। दोनों के पति एक ही थे। बस फिर क्या था दोनों ने पुलिस को शिकायत की और मियां जी जेल के अंदर।

रविवार, 3 जनवरी 2010

बीते जमाने की बात हुई रेल सुरक्षा जीवन रक्षा

बीते जमाने की बात हुई रेल सुरक्षा जीवन रक्षा

(लिमटी खरे)

भारत का रेल तंत्र विश्व में सबसे बडे रेल तंत्रों में स्थान पाता है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों द्वारा अपनी सहूलियत के लिए बिछाई गई रेल की पांतों को अब भी हम उपयोग में ला रहे हैं। तकनीक के नाम पर हमारे पास बाबा आदम के जमाने के ही संसाधन हैं जिनके भरोसे भारतीय रेल द्वारा यात्रियों की सुरक्षा के इंतजामात चाक चौबंद रखे जाते हैं।


सदी के महात्वपूर्ण दशक 2020 के आगमन के साथ ही रेल मंत्री ममता बनर्जी के रेल सुरक्षा एवं संरक्षा के दावों की हवा अपने आप निकल गई है। उत्तर प्रदेश में हुई तीन रेल दुघZटनाओं ने साफ कर दिया है कि आजादी के साठ सालों बाद भी हिन्दुस्तान का यह परिवहन सिस्टम कराह ही रहा है।

भले ही रेल अधिकारी इन रेल दुघZटनाओं का ठीकरा कोहरे के सर पर फोडने का जतन कर रहे हों, पर वास्तविकता सभी जानते हैं। कोहरा कोई पहली मर्तबा हवा में नहीं तैरा है। साल दर साल दिसंबर से जनवरी तक कुहासे का कुहराम चरम पर होता है। अगर पहली बार कोहरा आया होता तो रेल अधिकारियों की दलीलें मान भी ली जातीं।

सौ टके का प्रश्न तो यह है कि जब इलाहाबाद रेल मण्डल के दोनों रेल्वे ट्रेक पर ऑटोमेटिक ब्लाक सिस्टम लगे हैं तब इन स्वचलित यंत्रों के होने के बाद हादसे के घटने की असली वजह आखिर क्या है। जाहिर सी बात है कि या तो इस सिस्टम ने काम नहीं किया या फिर रेल चालकोें ने इनकी अनदेखी की। प्रत्यक्षदशीZ तो यह भी कह रहे हैं कि जहां दुघZटना हुई वहां लगभग आधे से एक किलोमीटर की दृश्य क्षमता (विजिबिलटी) थी।

जब भी कोई रेल मंत्री नया बनता है वह बजट में अपने संसदीय क्षेत्र और प्रदेश के लिए रेलगाडियों की बौछार कर देता है। अधिकारी उस ट्रेक पर यातायात का दबाव देखे बिना ही इसका प्रस्ताव करने देते हैं। देखा जाए तो बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के रेलमंत्रियों ने अपने अपने सूबों के लिए रेलगाडियों की तादाद में गजब इजाफा किया है। देश के अनेक हिस्से रेल गाडियों के लिए आज भी तरस ही रहे हैं।


भारतीय रेल आज भी बाबा आदम के जमाने के सुरक्षा संसाधनों की पटरी पर दौडने पर मजबूर है। उत्तर प्रदेश के आगरा के बाद उत्तर भारत में प्रवेश के साथ ही शीत ऋतु में भारतीय रेल की गति द्रुत से मंथर हो जाती है। आम दिनों में मथुरा के उपरांत रेल रेंगती ही नजर आती है, क्योंकि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली को आने वाली कमोबेश अस्सी फीसदी रेलगाडियों के लिए मथुरा एक गेट वे का काम करता है। दक्षिण और पश्चिम भारत सहित अन्य सूबों से आने वाली रेल गाडियों की संख्या इस लाईन पर सर्वाधिक ही होती है।

उत्तर भारत में आज भी घने कोहरे में भारतीय रेल पटाखों के सहारे ही चलती है। दरअसल रेलकर्मी कोहरे के समय में सिग्नल आने की कुछ दूरी पहले रेल की पांत पर पटाखा बांध देते हैं। यह पटाखा इंजन के जितने भार से ही फटता है। इसकी तेज आवाज से रेल चालक को पता चल जाता है कि सिग्नल आने वाला है, इस तरह वह सिग्नल आने तक सतर्कता के साथ रेल को चलाता है।

आईआईटी कानपुर के साथ रेल मंत्रालय ने मिलकर एंटी कोलीजन डिवाईस बनाने का काम आरंभ किया था, जिसमें रेल दुघZटना के पहले ही रेल के पहियों को जाम कर दुघZटना के आघात को कम किया जा सकता था। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस डिवाईस के लिए सालों बाद आज भी परीक्षण जारी हैं।


सन 2008 और 2009 में देखा जाए तो 17 रेलगाडियां सीधी आपस में ही भिड गईं, 85 रेल हादसे पटरी पर से उतरने के तो 69 हादसे रेल्वे की क्रासिंग के कारण हुए। इतना ही नहीं आगजनी के चलते 3 हादसों में भारतीय रेल द बनिZंग ट्रेन बनी। 2008, 09 में कुल 180 रेल दुघZटनाओं में 315 लोग असमय ही काल के गाल में समा गए। रेल्वे के संधारण का आलम यह है कि आज भी रेल्वे संरक्षा से जुडे लगभग नब्बे हजार पद भर्ती के इंतजार में रिक्त हैं। देश में साढे सोलह हजार रेल्वे फाटक आज भी बिना चौकीदार के ही चल रहे हैं।

भारतीय रेल में दुघZटनाएं न हो इसके लिए बीते हादसों से सबक लेने की महती जरूरत है। 01 अक्टूंबर 2001 को पंजाब के खन्ना में हुए रेल हादसे के बाद 2006 तक के लिए सत्तरह हजार करोड रूपए का रेल संरक्षा फंड बनाया गया था। इस फंड से भारतीय रेल के सभी पुराने यंत्रों और सिस्टम को बदलने का प्रावधान किया गया था। विडम्बना ही कही जाएगी कि यह फंड तो खत्म हो गया किन्तु भारतीय रेल का सिस्टम नहीं सुधर सका।

स्वयंभू प्रबंधन गुरू और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के लिए यह हादसा तो जैसे सुर्खियों में वापस आने का साधन हो गया है। हादसे के बाद पानी पी पी कर लालू ने ममता को कोसा। वैसे लालू का यह कहना सही है कि अगर घने कोहरे को ही दोष दिया जा रहा है तो विजिबिलटी के अभाव में रेल के परिचालन की अनुमति आखिर कैसे दी गई।

नए साल पर रेल यात्रियों को तोहफे के तौर पर रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इस तरह की भीषण दुघZटनाएं ही दी हैं। रेलमंत्री अगर चाहतीं और भारतीय रेल की व्यवस्था में वांछित सुधार कर दिए जाते तो संभवत: इन हादसों को रोका जा सकता था। ममता अपनी कर्मभूमि बंगाल में हैं और 05 जनवरी को वे अपना जन्मदिन जोर शोर से मनाना चाह रहीं थीं। इस रेल हादसे के बाद उनके जन्मदिन के जश्न में रंग में भंग पड गया है।

रेलमंत्री ममता बनर्जी भारतीय रेल के लिए विजन 2020 का खाका तैयार कर रहीं हैं पर उसका आधार इतना अस्पष्ट है कि यह बनने के पहले ही धराशायी हो जाएगा। ``मुस्कान के साथ`` यात्रा का दावा करने वाली भारतीय रेल के अधिकारी इस बात को बेहतर तरीके से जानते हैं कि चाहे जो भी रेल मंत्री आए, साथ में बुलट ट्रेन के ख्वाब दिखाए पर भारत की रेलों की पांते अभी तेज गति और ज्यादा बोझ सहने के लिए कतई तैयार नहीं है। ``रेल सुरक्षा, जीवन रक्षा`` अब गुजरे जमाने की बात होती ही प्रतीत हो रही है।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

नये साल की खुशी में डूबने से पहले

नये साल की खुशी में डूबने से पहले

एडविन

साल 2010 की पहली भोर हमारे जीवनों में शामिल हो चुकी है और हमारे चेहरे की उमंग ये बताने के लिए काफी है कि हमारे मन में किस कदर खुशी से लवरेज़ हैं। लेकिन नववर्ष की खुशी में डूबने से पहले हमारे लिए इन महत्वपूर्ण बातों पर गौर करना भी बेहद जरूरी है। मसलन बीते साल की मंहगाई ने जिस बेरहमी से गरीबों की थाली से रोटी छीनीए वो अपने आप में तकलीफ देने वाला है। साल के शुरूआत में दाल जहां 40 रूपए किलो मिल रही थी वहीं अब इसकी कीमत 110 रूपए से भी ऊपर पहुंच चुकी है। इसके अलावा ट्रेनए बसए पानीए बिजली के साथ ही दूसरी चीजों पर बढ़े दामों ने आम आदमी का जीना दुश्वार कर दिया। वहीं गरीबी कम होने का झूठा खेल खेलने वाली सरकार का काला चिठ्ठा एक सरकारी रिपोर्ट ने खोल कर रख दी। इस रिपोर्ट के तहत देश का हर तीसरा आदमी दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस रहा है लेकिन सरकार सिर्फ आंकड़े गिनाने में ही जुटी हुई है। वहीं सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि देश के आधे से अधिक हिस्से पर नक्सलियों का कब्जा है। खुद ग़ृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा है कि देश के 20 राज्यों के 223 जिलों पर नक्सलियों अपनी पकड़ काफी मज़बूत कर चुके हैं। राजनीति में भी मधु कोड़ा ने चार हज़ार करोड़ रूपए का घोटाला करके हड़कंप मचा दिया तो आन्ध्रप्रदेश के राज्यपाल एनडी तिवारी के सेक्स स्कैंडल ने भारतीय सियासत को शर्मसार कर दिया। इसके अलावा जनता की हिफाजत करने वाली पुलिस के एक अधिकारी एसपीएस राठौर ने रूचिका को अपने पद के रसूख के चलते खुदकुशी के लिए मजबूर करके पुलिस की वर्दी पर एक और बदनुमा दाग़ लगा दिया है। बहरहाल ये सब ऐसे सवाल हैं जो मुल्क़ की आने वाली रणनीति तय करेंगे। इसलिए अगर हम इस नये साल के जश्न में पूरे देश के लोगों के साथ शामिल हों तो ये इन दागदार और बदनाम जमात के लोगों को सिस्टम से बाहर खदेड़ने के लिए काफी अहम और महत्वपूर्ण कदम होगा।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नए दशक का आगाज


नए दशक का आगाज

आग का दरिया है, तैर कर जाना है. . ..

(लिमटी खरे)

2009 की बिदाई के साथ ही अब नए दशक के स्वागत की तैयारियां आरंभ हो गईं हैं। देश अब विजन 2020 को देख रहा है। आने वाले दस साल भारत के लिए चुनौतियों से भरे होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। देखा जाए तो दस से कहीं ज्यादा बडी चुनौति के रूप में सामने आ रहा है 2020।

वैसे भी मनुष्य योनी में टीन एज (थर्टीनी 13 साल से उन्नीस साल नाईंटीन) की उम्र काफी महत्वपूर्ण होती है। इस आयु में शारीरिक बदलाव के साथ ही साथ मानसिक तौर पर भी बदलाव की बयार बहती है। बीस साल की आयु को पाने के साथ ही मनुष्य में शनै: शनै: परिपक्वता का बोध होने लगता है। दस से बीस साल की उम्र किसी भी व्यक्ति के जीवन की दशा और दिशा तय कर देती है, और कमोबेश यही बात देश पर भी लागू होती है।


इंदिरा, राजीव गांधी के इक्कीसवीं सदी के सपनों का भारत देश आजादी के बाद लगातार ही लहरों में हिचकोले खाता रहा है। इक्कसवीं सदी के पहले दशक में देश की जनता बुरी तरह हलाकान रही। मंहगाई चरम पर थी तो आंतरिक सुरक्षा की चूलें हिल रहीं थीं। देश में गेंहूं दाल सब्जियों के भाव आसमान पर थे, अर्थशास्त्र के ज्ञाता प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह भी हाथ बांधे चुपचाप देखते रहे।

मधु कोडा जैसे मुख्यमंत्री पर चार हजार करोड रूपए के घोटाले के आरोप लगे तो बूटा सिंह के पुत्र रिश्वत लेते दिखे। देश की रक्षा की सौगंध उठाने वाली सेना के शीर्ष अधिकारी भी भ्रष्टाचार के मकडजाल में उलझे दिखे। उमरदराज राजनेता नारायण दत्त तिवारी अपनी पोती की उम्र की कन्याओं के साथ रासलीला करते दिखाई दिए। नए राज्यों के सृजन के लिए कांग्रेस ने तेलंगाना की बिसात बिछाई पर इस होम में कांग्रेस के ही हाथ जल गए। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी एसपीएस राठौर पर रूचिका को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा घटना के उन्नीस साल बाद चलाने का निर्णय लिया जाना भारतीय व्यवस्थाओं की जडों में लगी दीमक की ओर ही इशारा करती है।

2009 में भारत देश की महिलाओं ने बुलंदियों को छुआ है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक तरफ जहां देश की पहली महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सत्तर की उम्र में भी लडाकू विमान सुखोई की यात्रा करने का साहस दिखाया तो मीरा कुमार जैसी सभ्रांत और कुलीन महिला को लोकसभा का प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव मिला। इतना ही नहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सुषमा स्वराज ने भी बाजी मारी।

आने वाले दशक में हिन्दुस्तान के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है। सबसे बडी चुनौति के रूप में देश की बढती आबादी ही दिखाई दे रही है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में देश के वाकई में भविष्यदृष्टा कहे जाने वाली शिख्सयत स्व.संजय गांधी ने नसबंदी को कडाई के साथ लागू किया था। अगर संजय गांधी एसा नहीं करते तो आज देश की आबादी की कल्पनामात्र से ही रूह कांप उठती है।

इसके अलावा पानी और अधारभूत संरचनाओं के मामले में भारत देश की स्थिति बहुत ही खराब है। भ्रष्टाचार के केंसर से देश बुरी तरह कराह रहा है। देश की साठ फीसदी से अधिक जनता किसी न किसी नशे की गिरफ्त में अपना जीवन तबाह किए हुए है। देश में आज भी जातिभेद और लिंगभेद की मजबूत दीवारें खडीं हैं।

समूची दुनिया में भारत जैसा लोकतंत्र शायद ही कहीं हो। भारत को आज भी अपने विधायक या सांसद को वापस बुलाने का और मतपत्र में नकारात्मक वोटिंग अर्थात इनमें से कोई नहीं का विकल्प नहीं दिया गया है। भारत में पुलिस की दखल से आजादी दिलाना सबसे बडा काम होगा साथ ही सालों साल चलते अदालत के फैसलों को निश्चित समयावधि में निपटाना भी चुनौति से कम नहीं है।

सरकार और जंगल माफिया की मिलीभगत से हरे भरे हिन्दुस्तान में जंगलों की तादाद काफी कम ही रह गई है। विजन 2020 में देश को एक बार फिर हरा भरा बनाना होगा। आधारभूत संरचना में भारत की सडकों, रेल मार्ग, अंदरगामी रेल और सडक मार्ग (टनल), पुल पुलिया और फ्लाई ओवर का निर्माण भी बडे पैमाने पर किया जाना बाकी है। भारत में बुलेट रेल गाडी की दरकार काफी अरसे से महसूस की जा रही है। विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत में रेल की पांतें तेज गति से रेल चलाने के लिए नाकाफी ही कही जा सकतीं हैं। भोपाल से दिल्ली के बीच का कुछ हिस्सा भर 150 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार सह सकता है शेष में 130 से ज्यादा गति नहीं बढाई जा सकती है।

देश में विज्ञान और प्रोद्योगिकी को बढावा देने, आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना, काश्मीर समस्या का हल, भ्रष्टाचार का खात्मा, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं मुहैया करवाना, बिजली का उत्पादन बढाना आदि समस्याओं जूझना होगा भारत देश को। विजन 2020 के लिए अभी से ही रोडमेप तैयार करना होगा वरना 2020 आते समय नहीं लगेगा और भारत देश एक बार फिर विकास के मार्ग खोजने के लिए दर दर भटकने पर मजबूर हो जाएगा।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

कब होगा कम थुरूर का गुरूर


कब होगा कम थुरूर का गुरूर

थुरूर के बडबोलेपन को क्यों सह रही है कांग्रेस

भारत सरकार के बजाए सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट है थुरूर की प्राथमिकता

(लिमटी खरे)

नौकरशाह से जनसेवक बने शशि थुरूर पहली मर्तबा केंद्र में मंत्री बने हैं। मंत्री बनने के बाद भी उनके चाल चलन आचार विचार में कोई परिवर्तन परिलक्षित नही हो रहा है। पहले की ही तरह वे सोशल नेटवकिंZग वेव साईट पर ही अपनी टिप्पणी देने का क्रम जारी रखे हुए हैं।


हालात देखकर लगने लगा है मानो भारत सरकार का विदेश राज्यमंत्री का कार्यालय कागजों पर नहीं वरन् इंटरनेट की एक विशेष सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर ही चल रहा हो। लगता है कि शशि थुरूर के विभाग के कार्यालय में अगर किसी को किसी नस्ती (फाईल) को थुरूर से ओके करवाना हो तो उसे भी इस नेटविर्कंग वेव साईट पर ही डालकर उनका अनुमोदन लेना होगा। माना कि इक्कीसवीं सदी में भारत का नया चेहरा इंटरनेट की टेक्नालाजी से लवरेज होगा, किन्तु थुरूर मामले में भारत सरकार की चुप्पी ने साफ जता दिया है कि प्रधानमंत्री भी चाहते हैं कि भारत सरकार के मंत्री टि्वटर, ऑरकुट, फेसबुक या दूसरी सोशल नेटवििर्कंग वेवसाईट के माध्यम से अपना कामकाज निष्पादित करें।

मंत्री पद संभालने के बाद ही शशि थुरूर ने मंत्री जैसे बर्ताव के बजाए वालीवुड की सेलीब्रिटीज की तरह ही इंटरनेट पर अपने प्रशंसकों से सवाल जवाब का कभी न रूकने वाला सिलसिला आरंभ कर दिया। पहले कांग्रेस अध्यक्ष के हवाई जहाज में इकानामी क्लास में यात्रा करने के उपरांत इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) फिर काम के बोझ का हवाला देकर अपनी व्यस्तताएं उजागर करने पर उन्हें कांग्रेस की राजमाता और प्रधानमंत्री ने तगडी नसीहत दी थी। बावजूद इसके थुरूर का इंटरनेट का गुरूर कम होता नहीं दिखता।

अबकी बार थुरूर ने सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट पर भारत सरकार के ही वीजा संबंधी नियम कायदों के निर्णय के खिलाफत में अपने स्वर मुखर कर दिए हैं। अमूमन सरकार द्वारा जो निर्णय लिए जाते हैं उससे मंत्रीमण्डल के हर सदस्य को इत्तेफाक रखना ही होता है। सरकार के निर्णय के खिलाफ किसी भी मंत्री का सार्वजनिक बयान क्षम्य श्रेणी में कतई नहीं आता है।


जब हेडली और राणा जैसे सरगना देश में बेखौफ आ जा रहे हों तब वीजा नियमों का कडाई से पालन सुनिश्चित किया जाना भारत सरकार की पहली प्राथमिकता ही बनती है। विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर इन नियम कायदों में पता नहीं क्यों शिथिलता की हिमायत करते नजर आ रहे हैं। थुरूर का यह कथन भी बचकाना ही कहा जाएगा जिसमें उन्होंने कहा है कि 26 / 11 को अंजाम देने वाले आतंकियों के पास वीजा नहीं था, फिर भी हमला नहीं रोका जा सका।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने थुरूर के बचपने पर मोहर लगाते हुए कह ही दिया कि थुरूर धीरे धीरे राजनीतिक संस्कृति को समझ जाएंगे। थुरूर के बडबोलेपन पर परोक्ष तौर पर कटाक्ष करते हुए चतुर्वेदी कहते हैं कि पुरानी आदतों के बदलने में समय लगता ही है। वैसे थुरूर की दूसरी गल्ती पर प्रधानमंत्री उनसे नाखुश ही प्रतीत हो रहे हैं। पहली मर्तबा थुरूर के बडबोलेपन के बारे में प्रधानमंत्री ने स्वयं आगे आकर प्रकरण को शांत करवा दिया था, पर अब लगता है कि थुरूर को दूसरी गिल्त भारी पड सकती है।


राजनयिक से जनसेवक बने शशि थुरूर के अंदाजे बयां को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि थुरूर के पास राजनैतिक सोच समझ का जबर्दस्त अभाव है। वे इतना भी नहीं जानते हैं कि किस बात को किस मंच पर उठाया जाना चाहिए। सोशल नेटविर्कंग वेव साईट के दीवाने थुरूर हर किसी बात को ट्वीटर पर ही शेयर करते हैं। इससे एक तो वे विवादों में रहते हैं दूसरे टि्वटर की बिना मोल पब्लिसिटी भारत सरकार के माध्यम से ही हो रही है।

शशि थुरूर के टि्वटर के गुरूर ने विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा को भी कडे तेवर अपनाने पर मजबूर ही कर दिया। अंतत: कृष्णा को कहना ही पडा कि मैं हूं विभाग का बास और शशि थुरूर को करना होगा उनका अनुसरण। उनके अनुसार विदेश मंत्री नीतियां तय करते हैं और हर एक को उस नीति पर चलना ही होता है। अगर किसी को इसमें कोई खोट दिखे तो उसे सरकार के अंदर ही उठाया जाना चाहिए। कृष्णा का सीधा इशारा थुरूर के इंटरनेट प्रेम की ओर ही था।


वीजा नियमों के बारे में विदेश मंत्री शशि थुरूर की हायतौबा गलत नही मानी जा सकती है। दरअसल कोई भी विदेशी अगर भारत यात्रा पर आकर अगर 180 दिनों से ज्यादा का वक्त गुजारता है, तो उसे दुबारा भारत आने के लिए साठ दिनों का अंतराल जरूरी होता है। इसके बाद ही उसे वीजा मुहैया हो सकता है।

शशि थुरूर की पित्न कनाडा मूल की नागरिक हैं और दुनिया के चौधरी अमेरिका के न्यूयार्क शहर में कार्यरत हैं। नए नियमों के अनुसार अगर उन्हें भारत आना होगा तो उन्हें दो माह का समय इंतेजार में बिताना होगा। थुरूर की वीजा मामले में हायतौबा वाकई इस मसले पर उनकी चिंता को जाहिर करती है या वे अपनी पित्न को लुभाने का जतन कर रहे हैं, यह तो वे ही जाने पर थुरूर साहेब को पता होना चाहिए कि भारत गणराज्य का गृह मंत्रालय विशेष और वाजिब मामलों में इन नियमों को शिथिल भी कर देता है।

बहरहाल वीजा मामले में थुरूर को सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट पर भारी समर्थन मिला है, जिससे वे गदगद हैं और उन्होंने अपने शुभचिंतकों को धन्यवाद भी दिया है। अगर सत्तर के जमाने में थुरूर को मंत्री बना दिया जाता तो कव्वाली में मिली तालियों के बाद कव्वाल की तरह वे भी कह उठते -``पार्टी आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है।``

भारत ने वीजा के नियम कायदों में कडाई बरतने की मंशा बनाई। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने इस पर स्पष्टीकरण मांग लिया। पहली मर्तबा कठोर हुई भारत सरकार ने साफ लहजे में अपना जवाब दे दिया। फिर बीच में ही बोल उठे थुरूर। थुरूर की इस तरह की बचकानी हरकतों से दुनिया भर में भारत सरकार की एकजुटता में ही कमी का गलत संदेश गया है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि अब इस तरह के प्रयोग बंद कर बडबोले शशि थुरूर को सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट के लिए पूरा समय निकालने के लिए मुक्त करें, क्योंकि थुरूर की प्रथमिकता भारत सरकार के बजाए इंटरनेट जो ठहरी।



बुधवार, 30 दिसंबर 2009

कब तक कराहती रहेगी देश की निरीह जनता

कब तक कराहती रहेगी देश की निरीह जनता

``रोजनामचा`` के बदल गए हैं मायने

(लिमटी खरे)


देश को आजाद हुए छ: दशक से अधिक का समय बीत चुका है। आम आदमी को मिलने वाली सुविधाएं आज भी नगण्य ही हैं। मंहगाई ने देश के आखिरी आदमी की कमर तोड रखी है, वहीं दूसरी ओर धनपति और अधिक संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं। बाहुबली, अपराधी और धनाड्य वर्ग शासक की भूमिका में आ गया है। पिस रही है तो केवल निरीह रियाया। आज देश में पुलिस पर यह संगीन आरोप आम हो गया है कि उसे गरीबों की चीत्कार सुनने की रत्ती भर भी फुर्सत नहीं है। यह है आजादी के दीवाने सच्चे भारतीयों के समनों के भारत की वर्तमान तस्वीर।

यह बात आईने के मानिंद साफ है कि आजादी के उपरांत भारत गणराज्य की पुलिस को जिस तरह की कार्यप्रणाली को अंगीकार करना चाहिए था, वह उसने किया नहीं। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब देश में आपात काल (ईमरजेंसी) लगाई गई थी, तब से अब तक यह बात उभरकर सामने आई है कि भारत देश में प्रजातंत्र नहीं वरन पुलिस के बल पर हिटलरशाही चल रही है।


अमूमन पुलिस थाने में जाकर शिकायत करने पर पुलिस उसे तफ्तीश में ले लेती है। पुलिस जिन मामलों को अदालत की देहरी तक ले जाने की मंशा रखती है, उन्हें छोडकर अन्य मामलात में पुलिस भी प्रथम सूचना प्रतिवेदन (एफआईआर) दर्ज करना मुनासिब नहीं समझती है। जिलों में भी पुलिस कप्तान जब क्राईम मीटिंग लेते हैं तो इन्हीं एफआईआर की संख्या के हिसाब से ही कोतवाली या थानों में अपराधों के घटित होने की संख्या का अनुमान लगाया जाता है।

वर्तमान में फस्र्ट इंफरमेशन रिपोर्ट दर्ज करना या न करना पुलिस के विवेक पर ही माना जाता है। नई व्यवस्था में पुलिस के विवेक पर इसे नहीं छोडा जाएगा। अगर पुलिस ने अपने विवेक का इस्तेमाल भी किया तो उसे इसका पर्याप्त कारण देना होगा कि उसने एफआईआर दर्ज नहीं की तो क्यों और यह काम पुलिस के लिए काफी कठिन होगा।


प्रभावशाली व्यक्ति इन शिकायतों को ठण्डे बस्ते के हवाले करने या ठिकाने लगाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडते हैं। यही कारण है कि रूचिका गिरहोत्रा के मामले में एक पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी एसपीएस राठौर के खिलाफ शिकायत को एफआईआर में बदलने में एक दो माह नहीं वरन् पूरे नौ साल लग जाते हैं। पुलिस तो फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं करती अगर उच्च न्यायालय ने स्वयं संज्ञान न लिया होता तो।

इन परिस्थितियों में देश के अनूठे गृह मंत्री पलनिअप्पन चिदम्बरम की पहल का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए जिसमें उन्होंने हर संगीन अपराध में शिकायत को ही एफआईआर मानने की मंशा जताई है। निश्चित तौर पर इसके लिए सीआरपीसी में आवश्यक संशोधन किया जाना होगा। यक्ष प्रश्न तब भी वहीं खडा होगा कि क्या चिदम्बरम की मंशा को देश की पुलिस ईमानदारी से अमली जामा पहना सकेगी।

देश में जहां अनेक सूबों में थानों से लेकर जिलों की बोली लगाई जाती हो वहां चिदम्बरम की मंशा लागू हो सके इसमें संदेह ही नजर आता है, और अगर धोखे से पुलिस ईमानदारी से अपना काम भी करना चाहे तो हमारे देश के ``जनसेवक`` उन्हें यह करने नहीं देंगे।

वैसे गृहमंत्री चिदम्बरम की सोच को देश की पुलिस अंगीकार करे इसमें संशय ही लगता है। इसका कारण इसके लागू करने में होने वाली व्यवहारिक कठिनाईयां हैं। एक तो देश में पुलिस के पास पर्याप्त पुलिस बल का अभाव है दूसरे इसे अगर लागू किया जाता है तो देश के पुलिस थानों में अपराधों की तादाद में रिकार्ड उछाल आने की आशंका है। फिर इन केसों के निष्पादन के लिए अदालतों की संख्या वैसे भी कम है। वर्तमान में देश में तीन करोड से ज्यादा मुकदमे पहले सही लंबित हैं।


देखा जाए तो पुलिस का दायित्व आम जनता की जान माल की हिफाजत के साथ समाज में भयमुक्त वातावरण निर्मित करना है। एसा नहीं कि देश की पुलिस ही भ्रष्ट, नाकारा, बेईमान है, दरअसल पुलिस के चंद मुलाजिमों के कारण देश में खाकी बदनाम हो रही है। पुलिस की साख गिराने के लिए एक अदद सिपाही (कांस्टेबल) से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरान भी जिम्मेदार हैं।

पुलिस के रोजनामचा के मायने दिनों दिन बदल गए हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कल तक दिन भर की घटनाओं को अपने आप में समाहित करने वाले रोजनामचा में अब तो प्रभावशाली लोगों और पुलिस की मर्जी के प्रकरणों की सूची बनकर रह गया है यह रोजनामचा। कोई गरीब अगर किसी संगीन अपराध की एफआईआर दर्ज कराना भी चाहे तो पुलिस के अनगिनत सवालों के सामने वह टूट जाता है। फिर पुलिस के कारिंदे उसे डरा धमका कर वापस जाने पर मजबूर कर देते हैं। इसके बाद भी अगर वह जिद पर अडा रहा तो पुलिस उसे ही उल्टे मामले में फंसाने से नहीं चूकती है। एसे एक नहीं अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं जिनमें पुलिस ने फरियादी को ही आरोपी बना दिया हो।


गृह मंत्री पी.चिदम्बरम काफी धीर गंभीर और नब्ज पर हाथ रखकर चलने वाले नेताओं में से हैं। इस बार उन्होंने अगर कोई बात सोची है तो इसके दूरगामी परिणाम निश्चित तौर पर राहत देने वाले होंगे। सरकार का आपराधिक दण्ड संहिता में संशोधन का प्रस्ताव स्वागत योग्य है, जिसमें दरोगा से यह स्पष्टीकरण मांगा जा सके कि उसने एफआईआर दर्ज नहीं की तो इसके पीछे क्या कारण थे।

सरकार को चाहिए कि इस तरह के जनता से सीधे जुडे मसले को लागू करने के पूर्व इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रभावों के बारे में भली भांति विचार कर ले। यह सच है कि आज देश में दो तिहाई से ज्यादा लोग किसी न किसी तरह से न्याय के लिए भटकने पर मजबूर हैं।

भारत सरकार का गृह मंत्रालय अगर एक परिपत्र जारी कर दे और रातों रात देश की व्यवस्था सुधर जाए एसा प्रतीत नहीं होता है। सिर्फ आदेश जारी करने की रस्मअदायगी से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसके आदेश की तामीली किस तरह हो रही है, वरना हुक्मरानों के फरमानों को देश के सरकारी मुलाजिम किस कदर हवा में उडाते आए हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है।

अगर इसे लागू कर दिया जाता है तो आवश्यक्ता होगी इसकी समय समय पर समीक्षा की। इसके अलावा इससे जुडे हर पहलू जैसे न्यायालय, अभियोजन आदि के मामलों में भी ध्यान देना आवश्यक होगा। कुल मिलाकर सरकार को इस मसले से जुडे हर पहलू को चाक चौबंद बनाने के लिए त्वरित कार्यवाही की दरकार होगी।

आजादी मिलने के साठ सालों बाद भी देश की रियाया ब्रितानी हुकूमत से बुरी जिंदगी गुजर बसर करने पर मजबूर है। राजनेताओं ने पुलिस को अपने हाथों की लौंडी बनाकर रखा है, जिसका उपयोग वह अपने विरोधियों के शमन के लिए ज्यादा कर रहे हैं। देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की दरकार काफी समय से महसूस भी की जा रही थी।

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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

मीडिया से मीडिया में भेद करना छोडना होगा

मीडिया से मीडिया में भेद करना छोडना होगा

एक दूसरे को नीचा दिखाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला

आधुनिक युग में बदलेगा ही मीडिया का स्वरूप

(लिमटी खरे)


इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक पत्रकार का एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र (प्रिंट मीडिया) में 28 दिसंबर को एक आलेख ``अपने अंदर के हस्तिनापुर को माराना होगा`` पढकर बडा ही आश्चर्य हुआ। उक्त ईमीडिया के उक्त पत्रकार ने अपनी बात की शुरूआत यहीं से की है, ``जिन्हें टेलीवीजन पर नाज नहीं है वो आजकल कहां हैं। ये सवाल मेरे दिल में पिछले एक हफ्ते से घूम रहा है। मन उन टिप्पणीकारों को खोज रहा है जाक अकसर टीवी को अपने कालम में कोसते रहते हैं। इसके बाद उक्त पत्रकार ने टीवी द्वारा रूचिका केस को मुकाम तक पहुचाने के लिए जवाबदेह ठहराया है।

देश में पहले प्रिंट मीडिया का एकाधिकार था, यह बात किसी से छिपी नही है। समय के साथ जब टीवी ने हिन्दुस्तान में कदम रखा तब देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपनी आमद दर्ज करवाई। एशियाड के दौरान 1982 में हिन्दुस्तान में कलर टीवी आया। इसके बाद एक के बाद एक मनोरंजन चेनल्स फिर समाचार चेनल्स ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। नब्बे के दशक के आरंभ में ही समाचार चेनल्स काफी हद तक लोकप्रिय हो चुके थे।

इसके बाद प्रगति के सौपान तय करते हुए मीडिया तीसरी स्टेज अर्थात ``वेव मीडिया`` की ओर बढ गया है। आज न्यूज वेव पोर्टल्स की तादाद में एकाएक इजाफा साफ दिखाई पड रहा है। आज इंटनेट पर न्यूज बेस्ड वेव पोर्टल्स की बाढ सी आई हुई है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों ने भी वेब मीडिया को अपने रथ के पहियों के समान जोड लिया है।


उन्नीस साल पहले जब रूचिका और एसपीएस राठौर का केस हुआ था तब देश में प्रिंट मीडिया का बोलबाला था, किन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज न कराई हो एसा नहीं था। उन्नीस साल तक घिसटने के बाद इस मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीख चीख कर राठौर के खिलाफ सबूत दर सबूत पेश कर रूचिका के परिजनों को न्याय दिलवाने की सराहनीय पहल की है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।

आज निश्चित तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की चीत्कार के कारण ही सरकारों को न केवल कटघरे में खडा किया गया है, वरन इस मामले में न्याय होने की उम्मीद जागी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया आज जो कुछ भी दिखा रहा है वह आज कल में गढा हुआ नहीं है। यह सब कम से कम नौ साल पुराने तथ्य ही हैं जिन्हें अब नए स्वरूप में पेश किया जा रहा है।

हमारा कहना महज इतना ही है कि अगर उक्त पत्रकार को टीवी पत्रकारिता पर इतना ही नाज है तो उन्हें अपने इस आलेख को बजाए प्रिंट मीडिया के किसी इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही स्थान दे देना चाहिए था। प्रिंट के टिप्पणीकार अगर टीवी को कोसते होंगे तो निस्संदेह उसमें कहीं न कहीं कोई खामी होगी तभी टीवी के बारे में कुछ तल्ख टिप्पणियां स्थान पाती होंगी, वरना पत्रकार को क्या पडी है कि वह अपनी बिरादरी (छोटे भाई इलेक्ट्रानिक मीडिया) के बारे में ही उल्टा सीधा लिखे।


उक्त लेखक को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भी पहले प्रिंट मीडिया में ही कार्यरत रहे होंगे। इसके साथ ही साथ जब इलेक्ट्रानिक मीडिया अस्तित्व में नहीं था तब प्रिंट के माध्यम से ही आंदोलन खडे हो जाते थे। प्रिंट भी जब शैशवकाल में था तब आजादी के मतवाले हिन्दुस्तानियों ने हाथ से अखबार लिख लिख कर न केवल जन जागृति पैदा की वरन् उन ब्रितानियों के दांत भी खट्टे किए जिनके बारे में यह कहा जाता था कि उनके राज में सूरज डूबता ही नहीं है।

आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का जादू लोगों के सर चढकर बोल रहा है, इस बात में कोई संदेह नहीं। कल प्रिंट का जमाना था, आज इलेक्ट्रानिक का और आने वाले समय में हो सकता है दोनो को पीछे छोडते हुए वेब मीडिया कोसों दूर निकल जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

वैसे भी प्रिंट मीडिया में अगर नजरों से कोई खबर छूट जाए तो बाद में उसकी सहेजी हुई प्रति से ढूंढकर पढी जा सकती है। वेब मीडिया में भी इस तरह की व्यवस्थाएं सहज सुलभ हैं किन्तु जहां तक रही इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात अगर आपसे कोई खबर छूट गई और वह तीन चार बार चल चुकी है तो उसे देखने के लिए कोई सहज सुलभ व्यवस्था नहीं है। इस लिहाज से आने वाले समय में प्रिंट और वेब मीडिया का महत्व बढने की ही उम्मीद है। यह अलहदा बात है कि इन दोनों मीडिया से ज्यादा ग्लेमर आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का इसलिए है क्योंकि इसमें दृश्य एवं श्रृव्य (आडियो विज्जुअल) दोनों ही बातें एक साथ मिल जाती हैं।


रूचिका जैसे एक नहीं अनेक मामले हैं जिनमें इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संज्ञान लेकर सरकारों को कदम उठाने पर मजबूर किया है। आगे भी इसका यह सफर जारी रहना चाहिए। वैसे भी मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। चूंकि प्रिंट पहले था अत: वह घर के बुजुर्ग और मार्गदर्शक की भूमिका में है। इसके बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया आया सो वह जवान है जिसके कांधों पर बहुत भार है रही बात वेब मीडिया की सो वह अभी शैशव काल में है, और आने वाले दिनों में मीडिया का भविष्य बनेगा। कुल मिलाकर आधुनिक युग में मीडिया का स्वरूप बदलेगा ही किन्तु इस बदलते स्वरूप में अगर घर के अंदर ही एक दूसरे पर लानत मलानत भेजने का काम आरंभ कर दिया गया तो मीडिया के पैर जमीन के बजाए छत से लगने में समय नहीं लगेगा।

बोरवेल में गिरे बच्चे, निठारी कांड, रूचिका या आरूषी प्रकरण के साथ और न जाने कितने एसे मामले हैं जिन पर से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ही पर्दा उठाया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अगर यह किया है तो यह किसी पर कोई अहसान नहीं किया है। उसने मीडिया के एक अंग होने का महज फर्ज ही अदा किया है। देश की बिगडैल व्यवस्थाओं पर चोट कर उन्हें सुधारने के मार्ग प्रशस्त करना ही मीडिया का प्रथम दायित्व है।

प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया में एक दूसरे को ही नीचा दिखाने का जतन आरंभ हो जाएगा तो घर की इस फूट का फायदा कोई उठाए या न उठाए राजनेता अवश्य ही उठा लेंगें। हमारा सुझाव है कि मीडिया चाहे जैसा भी हो अब तक एक जुट रहा है, इसे एकजुट ही रहने दिया जाए, भागों में न बांटा जाए। वैसे भी आज मीडिया के ग्लेमर में फंसकर न जाने कितने युवक युवतियों ने मीडिया की ओर रूख कर लिया है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज अनेक मीडिया पर्सन्स ने प्रजातंत्र के इस चौथे स्तंभ को ढहाने के लिए निहित स्वार्थों को प्राथमिकता देकर मीडिया के विरोधियों से हाथ मिला लिए हैं। कल तक मीडिया के मालिक संपादक स्वयं पत्रकार ही हुआ करते थे, किन्तु आज मीडिया की कमान कार्पोरेट सेक्टर के धनाड्यों के हाथों में आ गई है, जो अपने हिसाब से देश को हांकने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। विडम्बना ही कही जाएगी कि हमारे देश के बुद्धिजीवि पत्रकार भी अपने आप को इन्ही के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं।

जिलों में कवरेज और नान कवरेज के साथ ही साथ प्रिंट और इलेक्ट्रानिक के बीच में वर्गभेद देखना आम बात हो गई है। जिलों के साथ ही साथ प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रेस कांफ्रेंस आदि में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए अलग अलग व्यवस्थाएं बनवा दी गईं हैं।

हमारा कहना महज इतना ही है कि प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया तीनों ही भारतीय मीडिया घराने के ही अंग हैं, इन तीनों के बीच में फर्क करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। हो सकता है कल तक कोई बुलंदियों पर रहा हो आज कोई हो और आने वाले समय में और कोई सरमौर बन सकता है। आपस में ही भेद करके हम प्रजातंत्र के इस चौथे स्तंभ को मजबूत करने के बजाए उस बट वृक्ष के आसपास की मिट्टी ही खोदकर उसकी जडें कमजोर करेंगे।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

कांग्रेस में सफाई की दरकार


कांग्रेस में सफाई की दरकार

खानदानी परचून की दुकान बन गई है कांग्रेस

(लिमटी खरे)


सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस संभवत: अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के बाद सोनिया गांधी ने भी दस साल तक निष्कंटक कांग्रेस पर राज कर लिया है। अब सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां गुपचुप और खुले दोनों ही तौर पर जारी हैं। खानदानी परचून की दुकान की तरह ही अब कांग्रेस की बागडोर राहुल गांधी के हाथ में कभी भी सौंपी जा सकती है।


इटली मूल की भारतीय बहू श्रीमति सोनिया गांधी जिन्हें हिन्दी बोलने में काफी तकलीफ होती थी, आज भी साफ सुथरी हिन्दी नहीं बोल पातीं हैं। वैसे भी सत्ता की उचाईयों पर बैठे लोग हिन्दी भाषा को कम समझते और कम ही इसका प्रयोग करते हैं। कहने को हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा जरूर है पर हिन्दी का उपयोग जमीनी लोग ही ज्यादा किया करते हैं।


कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष और ताकतवर केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) की किचिन केबनेट ही पिछले दस सालों में कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के रथ के सारथी रहे हैं। इन नेताओं के निहित स्वार्थों के चलते कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ दिनों दिन नीचे ही आता गया है।


अगर कांग्रेस को बचाना है तो अपने आप को महिमा मण्डित करने में माहिर पदाधिकारियों को अब अंतिम पंक्ति में ढकेलने की महती आवश्यक्ता है। इसके साथ ही साथ मणिशंकर अय्यर, माखनलाल फौतेदार, कुंवर अर्जुन सिंह, गिरिजा व्यास, सत्यवृत चतुर्वेदी आदि के जहर बुझे तीरों को रोकने के लिए मजबूत ढाल की जरूरत है। उधर सोनिया गांधी की राजनैतिक सचिव रह चुकीं सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को सीढी बनाकर उद्योगपति राजनेता कमल नाथ, आस्कर फर्नाडिस जैसे दिग्गज दस जनपथ के मजबूत दरवाजों में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं।

पिछले एक साल में देश में विभिन्न प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों, उपचुनावों पर गौर फरमाना बहुत आवश्यक है। इस आलोच्य अवधि में कांग्रेस ने महज दिल्ली और आंध्र प्रदेश में ही पूर्ण बहुमत प्राप्त किया है। इसमें से आंध्र प्रदेश एक बार फिर तेलंगाना और नारायण दत्त तिवारी के सेक्स स्केंडल में उलझकर रह गया है।


कांग्रेस ने मजबूरी में अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर महाराष्ट्र और जम्मू काश्मीर मे अपनी सरकार बनाई है। राजस्थान, हरियाणा और असम में कांग्रेस ने तलवार की धार पर सरकार का गठन किया है। उडीसा में तीसरी बार कांग्रेस ने मुंह की खाई है। उधर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में कांग्रेस लगातार दूसरी बार सत्ता से दूर ही रही है। कर्नाटक में कांग्रेस का शर्मनाक प्रदर्शन भी विचारणीय कहा जा सकता है।

हाल ही में संपन्न हुए झारखण्ड के चुनावों में 81 में से महज 14 सीटें अपनी झोली में डालकर कांग्रेस ने अपनी भद्द ही पिटवाई है। कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित होने वाले युवराज राहुल गांधी का करिश्मा उत्तर प्रदेश में भी कोई खास असर नहीं दिखा सका।

कांग्रेस के रणनीतिकारों में अनुभवहीन लोगों की फौज के चलते कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी को कई बार अप्रिय स्थिति का सामना करना पडा है। हाल ही में रणनीतिकारों ने तेलंगाना राज्य की नींव रखने का दुस्साहसिक कदम बिना सोचे समझे ही उठा दिया। परिणाम स्वरूप आंध्र प्रदेश बुरी तरह सुलग उठा है। इतना ही नहीं देश में अब नए 21 राज्यों के गठन की मांग जोर पकडने लगी है।

कांग्रेस आज भी विभिन्न खेमों में बंटी हुई हैं। एक दूसरे की टांग खिचाई के चलते कांग्रेस के नेता अपनी विपक्षी दलों के बजाए अपनों से ही सावधान रहने में अपनी पूरी उर्जा नष्ट कर देते हैं। कांग्रेस के अलग अलग खेमों के सूबेदार चूंकि सरकार में मलाईदार पदों पर रह चुके हैं अत: मीडिया के बीच अपने विपक्षी धडे के बारे में ``छुर्रा`` छोडने में उन्हें मास्टरी हासिल है।

वन एवं पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण महकमे की जवाबदारी संभालने वाले जयराम रमेश ने सरकार को कई दफा मुश्किल में डाला है। जयराम रमेश ने वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में हाल ही में एक बयान देकर कहा था कि वे मध्य प्रदेश के पेंच और कान्हा के बीच के कारीडोर में से सडक नहीं गुजरने देंगे, जिसका काफी विरोध हुआ था। दरअसल शेरशाह सूरी के जमाने की सडक को जो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच ``जीवन रेखा`` मानी जाती है, को अगर बंद कर दिया गया तो उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच सडक संपर्क में कई गुना अधिक किलोमीटर जुड जाएंगे।

इतना ही नहीं जयराम रमेश पर राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवणी से साठगांठ, भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा भाजपा के घोषणा पत्र के बनवाने के आरोपों के साथ ही साथ सबसे बडा आरोप यह लगा था कि उन्होंने कहा था कि विदेशी मूल की श्रीमति सोनिया गांधी के रहते कांग्रेस पचास साल सत्ता में नहीं आ सकती जैसे संगीन आरोप भी लगे थे, बावजूद इसके कांग्रेस द्वारा उन्हें महत्वपूर्ण मंत्री पद दिया हुआ है।


कांग्रेस सुप्रीमो की कोटरी में जहां अहमद पटेल, विसेंट जार्ज, श्रीमति शीला दीक्षित, डॉ.अर्जुन सेनगुप्ता, गुलाम नवी आजाद, आदि हैं वहीं कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री के अघोषित राजनैतिक गुरू राजा दिग्विजय सिंह के अलावा उनकी किचिन केबनेट में कनिष्का सिंह, विश्वजीत सिंह, सांसद मीनाक्षी नटराजन, सांसद जितेंद्र सिंह, मंत्री जतिन प्रसाद, सचिन पायलट, डॉ.सी.पी.जोशी, पवन जैन, आर.पी.एन.सिंह का शुमार है। कांग्रेस अध्यक्ष के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की ब्रांच के तौर पर मुकुल वासनिक, विलासराव देशमुख, पवन बंसल, वीरप्पा माईली, मुरली देवडा, तुषार अहमद अलग ताल ठोक रहे हैं।

कुछ दिनों पूर्व लगा था कि कांग्रेस द्वारा सही कदम उठाया जा रहा है। दरअसल प्रधानमंत्री डॉ.मन मोहन सिंह द्वारा अपनी सरकार के मंत्रियों से उन सभी की परफारर्मेंस रिपोर्ट 30 सितंबर तक मांगी थी। प्रधानमंत्री के इस कदम को उनके ही सहयोगियों ने हवा में उडा दिया। जिस मंत्रीमण्डल में प्रधानमंत्री की बात को ही हवा में उडाया जा रहा हो, उसमें उच्चश्रंखलता की हदों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।


कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के लिए अब गहन मंथन का समय आ गया है। कांग्रेस में चापलूसों ने नेतृत्व को इस कदर घेर रखा है कि आलाकमान दूर की जमीनी हरकतें देखने में अपने आप को अक्षम ही पा रहा है। आदि अनादि काल से होता आया है कि रियाया के दुख दर्द को देखने के लिए निजामों ने भेष बदलकर अपने सूबे के जमीनी हालातों का जायजा लिया है।

राहुल गांधी भारत दर्शन पर अवश्य हैं किन्तु उनकी सलाहकार मण्डली ने भी उनकी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। भाजपा के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के काम की प्रशंसा इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वे राहुल गांधी के काम से दिली तौर पर खुश हैं। भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी जानते हैं कि राहुल गांधी के दलित प्रेम के प्रहसन पर जल्द ही पर्दा गिर जाएगा, इसलिए वे राहुल गांधी का हौसला बढाकर इस स्वांग को जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं।

अब सोचना सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी को ही है कि इन दस सालों में उनके नेतृत्व में कांग्रेस कहां पहुंची है और कांग्रेस के चाटुकार, रणनीतिकार और मंत्री कहां। वे जब अपना राजपाट अपने पुत्र राहुल गांधी को सौंपेंगी तो उसमें कितने प्रदेशों की रियासतें और कितने आलंबरदार, झंडाबरदार राहुल गांधी के नेतृत्व में सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के झंडे को उठाने को तत्पर होंगे।

घर में ही विद्रोह का समाना करना पडा युवराज को!

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

घर में ही विद्रोह का समाना करना पडा युवराज को!

कांग्रेस में राहुल गांधी एक एसा नाम है जिस पर समूचे देश के कांग्रेसी अपनी सियासत की रोटियां सेंक रहे हैं, मगर राहुल गांधी की अपने संसदीय क्षेत्र में क्या इज्जत है यह बात कुछ दिनों पहले ही सामने आई है। उत्तर प्रदेश के विधानपरिषद के चुनावों में उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी के सुल्तानपुर क्षेत्र से पार्टी उम्मीदवार का नाम तय करने में कांंग्रेस महासचिव राहुल गांधी को पसीना आ गया। अनुशासन का पाठ सिखाने और युवाओं को अपने साथ लेने के लिए मिशन 2012 पर निकले राहुल गांधी के सामने उनके संसदीय क्षेत्र में ही अनुशासन तार तार हो गया। पार्टी ने जैसे ही जगदीश सिंह का नाम सामने किया वैसे ही असंतोष का लावा बह गया। नाराज कांग्रेसियों ने जगन्नाथ यादव को अपना प्रत्याशी घोषित कर गाजे बाजे के साथ उनका पर्चा दाखिल करवा दिया। राहुल गांधी अमेठी दौरे पर गए और सभी गुटों के साथ सर जोडकर बैठे। नतीजा सिफर रहा। इस विधानपरिषद के कुल वोटर 2860 हैं और अमेठी संसदीय क्षेत्र में 1034 मतदाता हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पशोपेश में हैं कि वे इस विवाद को कैसे शांत करें, नहीं तो अगर यह चिंगारी अमेठी से निकलकर देश में फैली तो उनकी सब जगह आसानी से स्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।

हाईटेक हो रहा है संघ

समय की मांग को देखते हुए अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी आधुनिक जमाने से कदम से कदम मिलाने आरंभ कर दिए हैं। कम्पयूटर इंटरनेट के तेज जमाने में बाबा आदम के तौर तरीकों को अपनाने वाले संघ के आला नेताओं को मशविरा दिया गया है कि वे समय के साथ नहीं चले तो पिछड जाएंगे। फिर क्या था संघ ने भी अपना चोला बदलने की तैयारी कर ली है। संध की शाखाओं में कम हाजिरी से आजिज संघ के आला नेताओं ने साप्ताहिक मिलन समारोह चलाया पर कामयाब नहीं रहा। संघ ने अब इसका इलाज खोज लिया है। संघ अब इंटरनेट पर शाखाएं लगाने की कार्ययोजना पर काम कर रहा है। प्रयोग के तोर पर इसको आरंभ कर दिया गया है। सूत्रों का कहना है जल्द ही समय निर्धारित कर संघ के प्रचारक नेट पर उपलब्ध होंगे। स्वयंसेवकों को शारीरिक तौर पर भले ही न हिला सकें पर संघ के प्रचारक उन्हें बौद्धिक तौर पर तो हिला ही देंगे। संघ ने इंफरमेशन टेक्नालाजी से जुडे लोगों पर केंद्रित कार्ययोजना को अंजाम देने का मानस बना लिया है।

मंत्री के बंगले में पेडों की अवैध कटाई

यूं तो जंगल विभाग की शह पर लकडी माफिया ने देश के जंगलों का सफाया कर दिया है, किन्तु जब बात देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में पेडों की कटाई की हो तो वन विभाग के कान खडे होना स्वाभाविक ही है, और खासकर जब मामला केंदीय मंत्री से जुडा हो तब तो विभागीय अधिकारियों की चुप्पी देखते ही बनती है। दरअसल केंद्रीय श्रम और रोजगार राज्यमंत्री हरीश रावत को तीन मूर्ति रोड स्थित 9 नंबर की कोठी आवंटित की गई है। इस कोठी में मंत्री महोदय अभी शिफ्ट नहीं हुए हैं। इसकी साफ सफाई और रंग रोगन का काम अभी जारी है। दरअसल मंत्री की कोठी के बाजू में रहने वाले एक जज की नजर मंत्री की कोठी पर गलत तरीके से कांटे छांटे गए पेडों पर पडी। उन्होने वनाधिकारियों को तलब कर मामला बताया। चूंकि जज साहेब ने वनाधिकारियों को बुलाया था, सो जांच आना पाई से की गई। पाया गया कि पेडों की छटाई गलत तरीके से की गई है। फिर क्या था, आनन फानन सीपीडब्लूडी के हॉर्टिकल्चर विभाग के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया।

गडकरी भी वसुंधरा के आगे बौने
भाजपा के नए निजाम के सामने भी राजस्थान में तलवार पजा रहीं वसुंधरा राजे ने अपने तवर नहीं बदले हैं। नेतृत्व पशोपेश में है कि आखिर वसुंधरा प्रकरण से निजात कैसे पाई जाए। केंद्रीय नेतृत्व को सीधी टक्कर दे रहीं वसुंधरा के आगे झुककर केंद्रीय नेतृत्व ने राजस्थान भाजपा के चुनाव फिलहाल टाल दिए हैं। यद्यपि आधिकारिक तौर पर चुनावों को टालने का कारण पंचायत के प्रदेश में होने वाले चुनाव बताए जा रहे हैं किन्तु अंदरखाने से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रहीं हैं, उनके अनुसार भाजपा के अंदर अंदरूनी मतभेद के चलते चुनाव टाले गए हैं। 24 दिसंबर को हाने वाले चुनावों को आम सहमति की मुहर के साथ टाल दिया गया है। वसुंधरा दिल्ली यात्रा पर आईं और आला नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने प्रदेश में संगठनात्मक चुनाव में हो रही धांधलियों का कच्चा चिट्ठा रखा। पूछे जाने पर हौले से मुस्कुराकर वे इशारे ही इशारे में यह बोल गईं कि वे तो महज नए अध्यक्ष को हैलो बोलने आईं हैं। भाजपाई हल्कों में खबर है कि वे भाजपा के नए निजाम को हैलो बोलने नहीं अपनी ताकत दिखाकर हिलाने आईं थीं।


अब अहमद पटेल की बारी

कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के विश्वस्त अहमद पटेल को कई बार शिकस्त दे चुके कांग्रेस के ताकतवर महासचिव और राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू राजा दिग्विजय सिंह और कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के बीच इन दिनों उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर कुछ तनातनी चल रही है। दरअसल दिग्गी राजा चाहते हैं कि यूपी में रीता बहुगुणा को हटाकर विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी को काबिज करवा दिया जाए। यूपी में कांग्रेस की साख सुधरने से तिवारी के मन में मुख्यमंत्री बनने की चाहत जागना स्वाभाविक ही है। उधर राजमाता को तिवारी की छवि और उनके मुलायम तथा मायावती से रिश्तों के बारे में भी आवगत करवा दिया गया है। कुछ दिन पहले राहुल गांधी के हेलीकाप्टर प्रकरण में रीता बहुगुणा का बडबोलापन राजा को नागवार गुजरा था, तब से राजा इसी जुगत में हैं कि रीता को कैसे भी करके हटाया जाए। रीता भी शायद राजा की मंशा जान चुकी हैं, सो उन्होंने भी अब अपना मुंह सिल लिया है। अब बाजी अहमद पटेल के हाथ में हैं। कहते हैं कि अहमद अब दिग्गी और यूपी के बारे में जैसी भी चाभी भरेंगे सोनिया वैसा ही कदम उठाएंगी।

कमल नाथ ने मारी बाजी
कमल नाथ के पास चाहे वस्त्र मंत्रालय रहा हो या वन एवं पर्यावरण अथवा वाणिज्य एवं उद्योग हर बार उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली के चलते विभाग को चर्चित बनाया है। वन एवं पर्यावरण रहते हुए पृथ्वी सम्मेलन में भारत की जोरदार उपस्थिति के चलते वे चर्चाओं में रहे तो वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहते हुए विदेशों के लगातार दौरे ने उन्हें चर्चा में रखा। अब भूतल परिवहन मंत्री बनने के बाद स्विर्णम चतुभुZज के उत्तर दक्षिण गलियारे को अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाडा से होकर गुजारने के मामले में वे सुर्खियों में हैं। अपनी कार्यप्रणाली के कारण चर्चाओं में रहने वाले भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने अंतत: एक मामले में बाजी मार ही ली। उन्होंने हाल ही में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को परास्त करते हुए निविदा नियमों को बहुत सरल बनवाने में सफलता हासिल कर ली है। योजना आयोग के एक सदस्य और पूर्व कैबनेट सचिव बी.के.चतुर्वेदी ने नियमों के सरलीकरण के मामले में कमल नाथ के पक्ष में रिपोर्ट दे दी है।

चोर पर पडे मोर
पुरानी कहावत चोर पर पडे मोर रूपहले पर्दे के थ्री खान्स में से एक आमिर खान के साथ चरितार्थ हो ही गई। अपनी नई फिल्म थ्री ईडियट्स के प्रमोशन के लिए वे तरह तरह के स्वांग कर देश भर में घूम रहे थे। लंबे समय से फिल्मी दुनिया में पहचाना चेहरा रहे खान को गुमान भी न होगा कि भारत देश में एसा कोई है जो उन्हें ही पहचानने से इंकार कर देगा। देश भर में घूमने के बाद जब आमिर महाबलीपुरम पहुचे तो वहां एक टूरिस्ट गाईड से उनकी मुलाकात हुई। काफी गुफ्तगू के बाद आमिर ने उस गाईड को बताया कि वे आमिर खान हैं, फिल्मी जगत के माने हुए अभिनेता। छूटते ही गाईड ने आमिर से ही पूछ लिया कि यह आमिर खान कौन है। आमिर भी कहां हार मानने वाले थे, उन्होने अपनी किरकरी होती देख उससे पूछा कि क्या वे शाहरूख खान को जानते हैं, उसने नकारात्मक ही सर हिलाया। हारकर आमिर ने आखिरी प्रश्न दागा कि वह हिन्दी फिल्म देखता है कि नहीं। उसने बडी ही शालीनता से जवाब दिया कि उसने शालीमार देखी थी और फििल्मस्तान में वह सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को ही जानता है। फिर क्या था आमिर अपना सा मुंह लिए लौट गए।

फिर हाई अलर्ट में राजधानी
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली साल में दस महीने हाई अलर्ट पर ही रहा करती है। जब चाहे तब केंद्रीय गृह विभाग दिल्ली में हाई अलर्ट जारी कर देता है। 15 अगस्त, 26 जनवरी, नया साल, ईद, बकरीद, दीपावली, दशहरा, क्रिसमस आदि न जाने कितने पर्व हैं जबकि दिल्ली में आतंकी वारदात होने की आशंका बनी ही रहती है। दरअसल इन त्योहारों के दौरान बाजारों में भीडभाड चरम पर ही रहा करती है, इसलिए वारदात की आशंका ज्यादा ही हुआ करती है। हर बार हाई अलर्ट पर पुलिस द्वारा सडकों पर महज रस्मअदायगी के लिए चेकिंग की जाती है, पर इस बार नजारा कुछ और ही नजर आ रहा है। इस बार शराब पीकर गाडी चलाने वालों के खिलाफ पुलिस ने कुछ ज्यादा ही सख्ती अपना रखी है। साल के आखिरी पखवाडे में जगह जगह मयखाने बनाने वालों की शामत आ गई है। इस बार पुलिस किसी की कोई दलील सुनती नहीं दिखाई दे रही है। क्रिसमस और न्यू ईयर पार्टीज पर भी पुलिस की चौकस निगाहें हैं।

गडकरी का राहुल पे्रम
लगता है भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी आरंभ से ही कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के फैन हो गए हैं। भाजपाध्यक्ष का कार्यभार संभालने के बाद अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि वे राहुल गांधी के काम से संतुष्ट हैं। राहुल गांधी के दलित प्रेम पर गडकरी ने राहुल की उन्मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि राहुल गांधी अच्छा काम कर रहे हैं। भाजपा का एक धडा गडकरी के इस कथन से खफा नजर आ रहा है, क्योंकि गडकरी ने प्रत्यक्ष तौर पर अपने विरोधी के उन क्रिया कलापों की तारीफ कर दी जिसे भाजपा अब तक ढोंग बता रही थी। भाजपा के नेताओं का कहना है कि जहां तक राहुल गांधी को शुभकामना देने की बात है तो वह तो औपचारिकतावश समझ में आता है किन्तु किसी दूसरे के काम की सराहना करने का क्या मतलब निकाला जाए। गौरतलब होगा कि मध्य प्रदेश के टीकमगढ जिले में एक महिला की बच्ची के विवाह के लिए राहुल गांधी ने 20 हजार रूपए देने का आश्वासन दिया था, राहुल तो भूल गए किन्तु सूबे के भाजपाई निजाम शिवराज सिंह चौहान ने उसे बीस हजार की मदद पहुचाकर राहुल के पांखंड के मुंह पर करारा तमाचा मारा था।

पूर्व गृहमंत्री के दामाद को बचा रही है पुलिस!
मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री के दामाद को ढूंढने में मध्य प्रदेश पुलिस पूरी तरह सुस्त ही नजर आ रही है। गृहमंत्री के दामाद अतुल सिंह के खिलाफ राजधानी भोपाल के कमला नगर में प्रकरण पंजीबद्ध है। बताते हैं कि कोतवाली थाने में पदस्थ आरक्षक मुकेश पाठक जब अपने घर लौट रहा था तभी उसकी मोटर साईकिल अतुल सिंह की कार से टकरा गई। इससे नाराज होकर अतुल सिंह ने अपने साथियों सोनू सिंह और विजय कुमार श्रीवास्तव के साथ मिलकर मुकेश का अपहरण कर लिया। इसके बाद टीटी नगर थाना प्रभारी उमेश तिवारी ने आरक्षक को माता मंदिर के पास मुक्त करवाया, जहां विजय तो पुलिस की पकड में आ गया, बाकी फरार हो गए। इसका प्रकरण कमला नेहरू नगर थाने में पंजीबद्ध है। पुलिस ने अब तक पुलिस के ही आरक्षक के अपहरणकर्ताओं को नहीं पकडा है, जिससे सियासी हल्कों में यह बात तैर गई है कि कांग्रेस के शासन काल में पूर्व गृह मंत्री के दामाद होने के बावजूद भी भाजपा के शासनकाल में उसे पकडा नहीं जा सका है।
शहीदों के परिजनों को बेघर करने की तैयारी
मुंबई में अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के उपरांत शहीदों के परिजनों के साथ सरकार कैसा रवैया अपना रही है, इस बात को नेशनल मीडिया ने बखूबी उठा दिया है, किन्तु सूबों में छोटी छोटी घटनाओं में शहीद हुए कर्मचारियों के परिजनों को क्या भोगना पडता है इस बात से सरकार और मीडिया दोनों ही इत्तेफाक नहीं रखते हैं। महाराश्ट्र सूबे के ही गढचिरोली में नक्सलवादियों के साथ लोहा लेते हुए शहीद हुए पुलिस कर्मियों के परिजनों को सरकारी आवास से बेघर करने का मामला प्रकाश में आया है। चंद्रपुर में हुए विदर्भ साहित्य सत्कार सम्मेलन में जब शहीद उपनिरीक्षक चंद्रशेखर की बेवा हेमलता को बोलने बुलाया गया तो उसका गुस्सा फट पडा। हेमलता का आरोप था कि मुंबई में तो शहीद पुलिस कर्मियों के परिजनों को सरकार सर आंखों पर बिठाती है पर गढचिरोली में अब तक शहीद हुए 152 पुलिस कर्मियों के परिवारों की ओर सरकार ने नजर उठाकर भी नहीं देखा है। सच ही है गढचिरोली में अगर सरकार इन शहीदों के परिजनों के लिए कुछ कर भी दे तो भला प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर की खबर थोडे बनेगी और पब्लिसिटी के भूखे नेता फिर भूखे ही रह जाएंगे।

अबूझ पहेली बना करकरे का जैकेट
मुंबई में हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले में शहीद एटीएस चीफ हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट की गुत्थी सुलझती नहीं दिखती। जेजे अस्पताल के वार्ड ब्वाय के बयान ने मामले को और अधिक उलझा दिया है कि उसने जैकेट कूडे में फेंक दी थी। यहां पुलिसिया कार्यवाही पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। एक ओर जहां पुलिस किसी भी घायल या शव के आसपास के हर साक्ष्य को सहेजकर रखती है, वहीं दूसरी ओर उसे कूडे में फेंकने से अनेक प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही हैंं। मजे की बात तो यह है कि करकरे के बुलेट प्रूफ जैकेट से संबंधित फाईल तो मिल गई है पर उससे जरूरी कागज गायब हैं। क्या जैकेट बुलेट प्रूफ नहीं थी, क्या करकरे के खिलाफ यह किसी के इशारे पर यह कोई सुनियोजित षणयंत्र था, जैसे प्रश्नों के उत्तर उनके परिजनों और देशवासियों को कब मिलेंगे, मिलेंगे भी या नहीं यह नहीं कहा जा सकता है।

अब राजमाता के नाम पर फरेब
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नाम से रकम एंठने का एक मामला प्रकाश में आने से कांग्रेसी हल्कों में सनसनी मचना स्वाभाविक ही है। दिल्ली में एक व्यक्ति ने राज्यसभा में मनोनयन के नाम पर दस करोड रूपए की राशि बतौर रिश्वत लेने का मामला पुलिस में पंजीबद्ध करवाया है। अब तक सियासी दलों पर लोकसभा और विधानसभाओं में पैसे देकर टिकिट मिलने के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। यह पहला मौका है जबकि किसी ने राज्यसभा में मनोनयन के नाम पर रिश्वत मांगने और देने की बात कही हो। इस मामले में किसी मध्यस्थ ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और उनके राजनैतिक सचिव अहमद पटेल के नाम पर उक्त राशि वसूली है। वैसे कहा जाता है कि राज्यसभा यानी पिछले दरवाजे से संसद में प्रवेश करने के लिए लोगों की अंटी में माल होना बहुत जरूरी है। हालत देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि अब योग्यता के बजाए पैसा ही पैमाना बन चुका है।


पुच्छल तारा

इस बार पुच्छल तारा कुछ अलग ही है। हमारे ब्लाग पर जब हमने महामहिम के सुखोई में यात्रा करने और महिलाओं को एयर फोर्स में फाईटर पायलट न बनने के निर्देशोें के सबंध में टिप्पणी की तो मुंबई की मनीषा नारायण ने उस पर टिप्पणी की। जब हमने मनीषा का ब्लाग देखा तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। मनीषा किन्नर है। इस देश में हमें पहली बार किसी किन्नर का ब्लाग पढने को मिला। मनीषा का ब्लाग पढकर सुखद आश्चर्य हुआ कि मनीषा को लेखन का शौक है। वह अपने बारे में लिखतीं हैं ``मैं ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य हूं, और स्त्री पुरूष दायरे से मुक्त, मेरे भीतर गुण दोनों के हैं, लेकिन अवगुण एक के भी नहीं, मुझे बस प्यार चाहिए और आपको देना भी है प्यार . . . . ।`` मनीषा ने अपने ब्लाग का नाम हिज(डा) हाईनेस मनीषा रखा हुआ है। मनीषा के ब्लाग में राहुल गांधी की कारसेवा करने वाली तस्वीर को भी बेहद करीने से चित्रित किया है, जिसमें महिला चप्पल पहने लोहे के तसले में मिट्टी फेंक रही है तो युवराज राहुल गांधी श्वेत धवल मंहगे जूते पहनकर साफ सुथरी प्लास्टिक के तसले में।