गुरुवार, 10 जून 2010

गैस कांड पर जिम्‍मेदारी से भागती कांग्रेस


गैस कांड पर कांग्रेस को तोडना होगा मौन!

अब बढेगी अर्जुन सिंह की पूछ परख

उपेक्षा से आहत अर्जुन उठा सकते हैं गांडीव

उघडती जा रही हैं षणयंत्रों की परतें

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

(लिमटी खरे)

छब्बीस साल पहले जब देश के हृदय प्रदेश में दुनिया की सबसे बडी औद्योगिक त्रासदी हुई थी, उस वक्त कांग्रेस के बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह इस सूबे के निजाम हुआ करते थे। यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को रातों रात भोपाल से भगा देने के षणयंत्र पर से धीरे धीरे पर्दा उठता जा रहा है। उस दौरान का प्रशासनिक अमला अब अपनी बंद जुबान खोल रहा है। तथ्यों के सामने आने से सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का रक्तचाप एकाएक बढ गया है। कांग्रेस की धुरी पिछले कुछ सालों से नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू सोनिया गांधी के इर्दगिर्द घूम रही है। सोनिया के राजनैतिक प्रबंधक और सलाहकारों ने कुंवर अर्जुन सिंह का पत्ता कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के केंद्र 10, जनपथ से कटवा दिया है। कुंवर अर्जुन सिंह भले ही अपनी पीडा को उजागर न करें पर उनकी खामोशी बताती है कि वे अपने आप को किस कदर उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

कांग्रेस के प्रबंधकों को सपने में भी भान न होगा कि भोपाल गैस कांड के फैसले के बाद उठे बवंडर में कांग्रेस का आशियाना बुरी तरह हिल जाएगा। चाणक्य की चालें चलने में माहिर कुंवर अर्जुन सिंह उस वक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, जब यह कांड हुआ। किसके कहने पर वारेन एंडरसन को गिरफ्तार कर, यूनियन कार्बाईड के गेस्ट हाउस में रखा गया था, जिसमें फोन की सुविधा उपलब्ध थी, और किसके कहने पर एंडरसन को सरकारी विमान मुहैया करवाकर देश से भाग जाने का मौका दिया गया। एक निजी समाचार चेनल को दिए गए साक्षात्कार में भोपाल के तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह कहते हैं कि तत्कालीन मुख्य सचिव के आदेश की तामीली में उन्होंने यूनियन कार्बाईड के एक कर्मचारी को इसके लिए तैयार किया कि वह एंडरसन की जमानत ले लें। यह है आजादी के बाद 37 साल बाद की भारत गणराज्य की तस्वीर। अगर आम आदमी को पुलिस गिरफ्तार करे तो उसके जमानतदार की चप्पलें घिस जाती हैं जमानत लेने में। यहां तो जिले का मालिक कहा जाने वाला जिला कलेक्टर खुद ही जमानत के लिए उपजाउ माहौल मुहैया करवा रहा है।

आजादी के उपरांत 1977 का कुछ समय, चंद्रशेखर, देवगोडा, अटल बिहारी बाजपेयी आदि की सरकारों का कार्यकाल अगर छोड दिया जाए तो आधी सदी से ज्यादा समय तक देश पर सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने ही हुकूमत की है। अब आम जनता अंदाजा लगा सकती है कि सुशासन देने का वादा करने वाली, कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ का दावा करने वाली कांग्रेस का दामन खुद कितना दागदार है। माना जाता है कि अस्सी के दशक तक राजनीति में नैतिकता का स्थान था, किन्तु यह मिथक एक झटके में तब टूट गया जब पंद्रह हजार से अधिक लोगों को लीलने वाली कंपनी के प्रमुख को सरकारी सुरक्षा में देश से भागने के मार्ग प्रशस्त किए गए। इन सबके बाद भी कांग्रेस की चुप्पी निस्संदेह राष्ट्रीय शर्म की बात है। विदेशों में पली बढीं सोनिया एन्टोनिया माईनो (सोनिया गांधी का असली नाम) भारत की संस्कृति से आज भी पूरी तरह वाकिफ नहीं हो सकीं हैं।

इतनी बडी त्रासदी के बाद अब अगर भारतीय प्रशासिनक सेवा का कोई अधिकारी जो उस वक्त जिला दण्डाधिकारी जैसे जिम्मेदार पद पर रहा हो, आज कोई बात कह रहा है तो कम से कम सोनिया को चाहिए था कि वे इस मामले में दो शब्द तो बोलतीं। एक और जहां ग्लोबल मीडिया में भोपाल गैस कांड का फैसला और भारत की सरकार को लताड दी जा रही हो वहां भारत की सबसे ताकतवर महिला मानी जाने वाली श्रीमति सोनिया गांधी मंुह सिले बैठीं हो तो क्या कहा जाएगा। सोनिया महिला हैं, मां हैं, वे उन माताओं के दर्द को समझ सकतीं हैं, जिन्होंने इस कांड में अपने गुदडी के लाल खोए होंगे। वैसे भोपाल गैस कांड के पूरे प्रकरण और फैसले ने देश की जांच एजेंसी सीबीआई की भूमिका पर एसा सवालिया निशान लगा दिया है, जो शायद ही कभी मिट सके।

इतना ही नहीं सीबीआई के एक पूर्व अधिकारी ने तो साफ तोर पर कह दिया है कि विदेश मंत्रालय के साफ निर्देशों के चलते उन्होंने इस मामले के मुख्य अभियुक्त एंडरसन के प्रत्यार्पण के मामले को आगे नहीं बढाया था। भारत के नीति निर्धारकों की कूटनीतिक चालें समझ से परे हैं। केंद्र सरकार राग अलाप रही है कि यह मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दुनिया के चौधरी अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री राबर्ट ब्लेक ने साफ शब्दों में कह दिया है कि अमेरिका के लिए ‘‘दिस चेप्टर इस ओवर।‘‘ अब यूनियन कार्बाईड या फिर भोपाल गैस कांड के बारे में अमेरिका कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है।

पता नहीं क्यों भारत सरकार यह समझने को तैयार क्यों नहीं है कि यही सही वक्त है, जब अमेरिका पर खासा दबाव बनाया जा सकता है। राबर्ट ब्लेक का प्रलाप व्यर्थ नहीं है। अमेरिका चाहता है कि परमाणु उर्जा से संबंधित ‘न्यूक्लियर लाईबिलिटी बिल‘ भारत की संसद में पास हो जाए। अगर भोपाल गैस त्रासदी को हवा दी गई तो निश्चित तौर पर यह मामला लटक जाएगा, तब अमेरिका के भारत की सरजमीं पर न्यूक्लियर उर्जा से संबंधित मशीने, उपकरण और माल भेजना आसान नहीं होगा। भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका की सरकार यह मानती है कि इंसान वही है जिसकी रगों में अमेरिकी रक्त का संचार हो रहा है, इसी तर्ज पर भारत को दुनिया विशेषकर अमेरिका को यह जतलाना होगा कि भारत गणराज्य की सरकार की नजर में भारतीय पहले हैं, बाकी दुनिया के लोग बाद में। इतनी बडी त्रासदी जिसमें पंद्रह हजार से ज्यादा जाने गईं हों और लाखों प्रभावित हुए हों, इस तरह की आपराधिक भूल को अक्षम्य ही माना जाएगा। छब्बीस बरसों मेें अर्जुन सिंह के बाद भाजपा के सुंदर लाल पटवा सहित कांग्रेस के अनेक मुख्यमंत्री काबिज रहे हैं मध्य प्रदेश में, किन्तु सभी हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। मतलब साफ है कि यूनियन कार्बाईड द्वारा इन जनसेवकों के निहित स्वार्थों को पूरा किया गया होगा, वरना क्या वजह थी कि ये चुपचाप बैठे रहे।

भोपाल गैस कांड का फैसला आने के बाद समूचे देश में इसकी तल्ख प्रतिक्रिया हुई है। लोगों ने अब तक की सरकारों और विशेषकर कांग्रेस को दिल से कोसा है। हडबडी में सरकार जागी है। भारत गणराज्य की सरकार ने मंत्रियों के समूह का गठन कर डाला है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश की सरकार अब उंची अदालत में जाने की बात कह रही है। बहुत पुरानी कहावत है, ‘‘अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत।‘‘ कम ही लोग शायद ही इस बात को जानते हों कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में भोपाल गैस कांड से जुडे मसलों के लिए मंत्री समूह का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष तत्कालीन मानव संसाधन और विकास मंत्री अर्जुन सिंह ही थे। अर्जुन सिंह चतुर सुजान हैं, सो वे जानबूझकर इस मामले को उपेक्षित करते रहे ताकि वक्त आने पर इसे भुनाया जा सके।

तत्कालीन डीएम मोती सिंह, सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह आदि के खुलासे से साफ हो गया है कि देश की जांच एजेंसी और सरकारें राजनेताओं के हाथों की लौंडी बनकर नाच रही हैं। विपक्ष भी इस मामले में तल्ख तेवर नहीं अपना रहा है, जो आश्चर्यजनकी ही माना जाएगा। बहरहाल अब गेंद एक बार फिल मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पाले में आ गई है। आने वाले दिनों में कंुवर अर्जुन सिंह की पूछ परख बढ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुंवर अर्जुन सिंह मंण्े हुए राजनेता हैं, उनके हाथ में अनायास ही एक एसा तीर लग गया है जिससे अनेक निशाने साधे जा सकते हैं, राज्य सभा का कार्यकाल भी उनका काफी कम बचा है। चूंकि हादसे के वक्त केंद्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, अतः कांग्रेस इस मामले में अपनी जवाबदारी से नहीं बच सकती है। अर्जुन सिंह अगर मौन रहते हैं तो कांग्रेस इस जिल्लत से खुद को निकाल लेगी,। विपक्ष की बोथली धार से कुछ होता नहीं दिखता, किन्तु अगर कुंवर साहेब ने मुंह खोला तो कांग्रेस के लिए देश को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।

वाह री किस्‍मत

इसे कहते हे किस्मत कंधे पर अपने पालतू कुत्ते को उठाकर ले जा रही महिला शायद ये भूल गई की वो अपनी ही बेटी को ऊँगली पकड़ कर घसीट रही हे , इसे आप कुत्ते की किस्मत को अच्छी कहे या बच्ची की किस्मत को ख़राब  पर किस्मत तो किस्मत हे भाई

हमें यह फोटो भेजा है मंदसौर मध्‍य प्रदेश दिलीप गुप्‍ता ने, भई वाह

न्‍याय को भटकते पीडित

दुर्घटना बीमा दावा अदायगी तुरंत

120 दिन में मिलेगा दुर्घटना दावा

दिल्ली पुलिस की अभिनव पहल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 10 जून। दुर्घटना बीमा के क्लेम हेतु अब दिल्ली मंे किसी को दर दर भटकने की आवश्यक्ता नहीं होगी। अप्रेल माह से दिल्ली पुलिस ने सूबे के हर एक पुलिस स्टेशन में दुर्घटन सेल की स्थापना कर दी है, जो इस बात को सुनिश्चित करेगा कि दुर्घटना दावा घटना के महज चार माह यानी 120 दिन अथवा अधिकतम छः माह के भीतर निपट जाए। दिल्ली उच्च न्यायालय के डंडे के बाद हरकत में आई दिल्ली पुलिस ने यह कदम उठाते हुए पायलट प्रोजेक्ट की संज्ञा भी दी है। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) द्वारा इसके लिए अत्याधुनिक तंत्र भी तैयार किया जा हा है।

दिल्ली यातायात पुलिस के आंकडों पर अगर गौर फरमाया जाए तो दिल्ली में हर रोज डेढ दर्जन दुर्घटनाएं घटती हैं, और औसतन पांच लोग रोजाना असमय ही इसमें दम तोड देते हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्रों का कहना है कि भले ही कोर्ट की फटकार के उपरांत यह सेल अस्तित्व में आया हो पर इसका मुख्य उद्देश्य पीडितों को समय पर न्याय दिलवाना है। सूत्रों का कहना है कि दुर्घटना से जुडे हर तथ्य मसलन, एफआईआर, कानूनी चिकित्सकीय रिपोर्ट (एमएलसी) आदि को ऑन लाईन ही अद्यतन (अपडेट) किया जाएगा।

इस सेल के मुख्य काम की फेहरिस्त में यह भी शुमार किया गया है कि प्रकरण के आते ही सबसे पहले संबंधित बीमा एजेंसी को अपने पास बुलाया जाए। इंश्योरेंस कंपनी सारे आंकडे वेब साईट से लेकर आवश्यक कागजात तत्काल मुहैया करवाएंगी। दिल्ली के डेढ सौ से अधिक पुलिस अधिकारी युद्ध स्तर पर इन प्रकरणों का निपटारा करके उसे बीमा कंपनी को अंतिम कार्यवाही हेतु सौंप देंगे। एमएसीटी की वेब साईट पर इन सारी जानकारियों को अपलोड कर दिया जाएगा।

एमएसीटी का काम पीडित पक्षकार को क्षतिपूर्ति तय होने तक का सारा डाटा तैयार करना होगा। इसके अलावा बीमा कंपनियों के लिए बीमा दावा के चेक जारी करने के लिए समय सीमा भी निर्धारित करने को कहा गया है। एमएसीटी के कर्मचारियों को ताकीद किया गया है कि वे पीडित के प्रति सहानुभूति पूर्वक पेश आकर जल्द से जल्द पक्षकार को धनादेश (चेक) सौंपना सुनिश्चित करे।

गौरतलब है कि 2005 में दुर्घटनाओं की तादाद 9009, वर्ष 2006 में 8838, वर्ष 2007 में 8270, वर्ष 2008 में 8108 और वर्ष 2009 में इसकी संख्या 6752 थी। इन दुर्घटनाआंे में वर्ष 2005 में 1953, वर्ष 2006 में 1910, वर्ष 2007 में 2099, वर्ष 2008 में 1927 और पिछले साल इसकी संख्या 2165 थी। 2007 और 2008 में ट्रक दुर्घटनाआं की तादाद 236/250, ब्लू लाईन किलर बस से 138/102, कमर्शियल व्हीकल्स से 445/436, कार से 226/176 तो हिट एण्ड रन के 719/743 प्रकरण दर्ज किए गए जिनमें मौत हुईं थीं। इस तरह पिछले पांच सालों में कुल 40 हजार 977 दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 10 हजार 54 थी।

पीने पिलाने की उमर में भेद क्यों?

दिल्ली के आबकारी कानून लागू होने में हो सकती है देर

केंद्र और राज्य के बीच उम्र को लेकर रस्साकशी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 10 जून। आने वाले समय मंे देश की राजनैतिक राजधानी में 25 साल से कम के युवा मद्य का सेवन नहीं कर पाएंगे। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर आए दिन अघोषित मयखाने पाए जाने पर पीने वालों पर जुर्माना 200 रूपए से बढाकर पांच हजार रूपए कर दिया गया है। केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार का यह कानून नागवार गुजरता प्रतीत हो रहा है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को लिखे एक पत्र में अपनी कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं।

गौरतलब होगा कि वर्तमान में दिल्ली में पंजाब एक्साईज एक्ट 1914 लागू है। दिल्ली सरकार का नया आबकारी कानून केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए मंत्रालयों की सीढियां चढ उतर रहा है। दिल्ली सरकार के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि इस कानून के प्राप्त होने के साथ ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले मंे राज्य के वित्त मंत्री डॉ.अशोक कुमार वालिया को पत्र लिखकर कुछ मामलात में सफाई मांगी है।

सूत्रों ने आगे बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र में कहा गया है कि दिल्ली के नए आबकारी कानून में कहा गया है कि दिल्ली मंे नया कानून लागू होने के बाद शराब का सेवन करने वालों की उमर पच्चीस साल होना चाहिए पर शराब परोसने वाले महज 21 साल के हो सकते हैं, इसका आशय क्या है। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार के इस पत्र का जवाब डॉ.वालिया ने केंद्र को भेज दिया है, जिसमें साफ कहा गया है कि माननीय न्यायालय के उस आदेश के परिपालन में एसा प्रावधान किया गया है, जिसमें कहा गया है कि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को रोजगार मुहैया कराने सरकार आगे आए।

इस नए कानून के बारे में कहा जा रहा है कि दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर मद्यपान करते पकडे जाने पर अब तक की सजा का प्रावधान दो सौ रूपए से बढाकर पांच हजार रूपए कर दिया गया है। इसके साथ ही साथ अवैध शराब रखने वालों के खिलाफ भी कडी कार्यवाही का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं अगर इस तरह की शराब पीने से किसी की मौत हो जाती है तो दोषी पाए गए व्यक्ति को मृत्युदण्ड और दस लाख रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। यद्यपि अधिकारी मानते हैं कि इस नए कानून के अमल में आने के उपरांत दिल्ली में अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह रूक जाएगा, किन्तु अवैध शराब बेचने में होने वाले मुनाफे के चलते यह लाबी इतनी ताकतवर हो चुकी है कि नया आबकारी कानून अमली जामा पहन पाए इसमें संशय ही लग रहा है।

बुधवार, 9 जून 2010

कब तक छला जाएगा मोबाईल उपभोक्‍ता

क्यों हो रहा है नंबर पोर्टेबिलिटी में विलंब

कब तक करें उपभोक्ता इंतेजार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 09 जून। पुराने सेवा प्रदाता द्वारा प्रदत्त मोबाईल नंबर को मनचाहे सेवा प्रदाता के साथ संबद्ध कराने वाली मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी सुविधा (एमएनपी) आरंभ होने में अभी और इंतजार करना होगा। दरअसल मोबाईल सेवा प्रदाता सरकरी उपक्रम बीएसएनएल और एमटीएनएल क अलावा कुछ निजी सेवा प्रदाता कंपनियां इसके लिए आवश्यक तैयारियां नहीं कर पाई हैं। इन कंपनियों को आवश्यक अत्याधुनिक तकनीकि उपकरणों की संस्थापना में विलंब हो रहा है, यही कारण है कि सरकार भी इस मामले में मौन साधे बैठी है।

दूरसंचार महकमे के आला सूत्रों का कहना है कि भारत संचार निगम लिमिटेड, महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड सहित लगभग तीन अन्य निजी सेवा प्रदाता इस योजना को आरंभ करने में आवश्यक एमएनपी गेटवे संस्थापित नहीं कर सकीं हैं। तकनीकि जानकारों का मानना है कि एमएनपी सेवा की कल्पना एमएनपी गेटवे के बिना संभव नहीं है। कुछ कंपनियां इस तकनीक की खरीदी के लिए आदेश तो प्रसारित कर चुकी हैं, अब उन्हें इतजार इसकी आपूर्ति का है।

उधर दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) के सूत्रों का कहना है कि एमएनपी सेवा में बार बार हो रहे विलंब से ट्राई नाखुश ही है। सूत्रों की मानें तो इस योजना को अमली जामा पहनाने में बारंबार हो रहे विलंब से खफा ट्राई जल्द ही सरकार को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी से आवगत कराने वाली है। गौरतलब होगा कि बार बार तिथियों की घोषणा करने वाले दूरसंचार विभाग द्वारा हाल ही में 30 जून से इस सेवा को लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, किन्तु जमीनी तैयारियों को देखकर लगने लगा है कि यह भी संभव नही है कि 30 जून से इसे अस्तित्व में लाया जा सके। इसके पूर्व दूरसंचार विभाग ने इसे 31 दिसंबर 2009 तक लागू करने की बात कही थी, फिर बाद में समय सीमा 31 मार्च तक बढा दी गई थी।

दूरसंचार विभाग में चल रही चर्चाओं के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को विभाग की ओर से इस सेवा के परीक्षण के लिए 15 मई तक का लक्ष्य रखा था, जिसमें सेवा प्रदाता कंपनियां परीक्षण करने में पूरी तरह असफल ही रहीं हैं। खुद भारत संचार निगम और महानगर टेलीफोन निगम द्वारा भी इसका परीक्षण पुख्ता तौर पर नहीं किया जाना भी कहा जा रहा है। बार बार उपभोक्ताओं को सपने दिखाने के उपरांत तिथियां आगे बढाने से उपभोक्ताओं में भी निराशा पनपना स्वाभाविक ही है।

यहां उल्लेखनीय होगा कि मोबाईल के क्षेत्र में सबसे बडे नेटवर्क वाले सरकारी उपक्रम बीएसएनएल और एमटीएनएल के उपभोक्ताओं की आज देश में खासी है, किन्तु इसके नेटवर्क प्राब्लम, काल ड्राप, लाईन कंजेशन आदि के चलते उपभोक्ता इससे बुरी तरह त्रस्त हो चुके हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर संभाग में विशेषकर सिवनी में तो आलम यह है कि अगर बीएसएनएल उपभोक्ता अपने सामने बैठे दूसरे उपभोक्ता का नंबर मिलाए तो वह आउट ऑफ कररेज एरिया या व्यस्त बता देता है।

दिल्‍ली में सीरियल नल चोरों का आतंक

. . . और काट दिया सांसद जी का नल कनेक्शन

सांसद आवास बन रहे चोरों की पहली पसंद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 09 जून। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में अतिसुरक्षित समझे जाने वो संसद सदस्यों के आवास इन दिनांे चोरों के निशाने पर हैं। चोर बडी ही दिलेरी से देश के जनसेवकों के घरों में जाकर चोरी की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, और राष्ट्रमण्डल खेलों की तैयारियों में जुटी दिल्ली पुलिस अमन चैन की बंसी बजा रही है। कभी कोई चोर किसी संसद सदस्य के घर पर जाकर सिगरेट फूंकते हुए चोरी करता है, तो कोई बाथरूम से सामान चुरा लेता है। पिछले दिनों घटी घटनाओं में एक बात साफ तौर पर उभर कर आई है कि इन चोरों में कोई न कोई प्लंबर अवश्य है, तभी वह नल, टोटिंया, पाईप आदि ही चुरा रहा है।

हाल ही में लोकसभा के सांसद अनन्त कुमार हेगडे के फिरोजशाह रोड पर आवंटित सरकारी आवास नंबर 13 का नल कनेक्शन ही काट दिया गया। मजे की बात तो यह है कि यह कनेक्शन बिना किसी नोटिस के काटा गया है। इस आवास का पानी का मीटर ही गायब है। बताते है कि इसके पूर्व 19 मई को उनके आवास के बाथरूम से बेशकीमति नल की टोंटिया किसी ने उडा दी थीं।

गौरतलब है कि पूर्व में नार्थ एवेन्यू स्थित सांसद आवासों में अनेक मर्तबा नल की टोटिंया गायब होने की शिकायतें मिलीं हैं। इस सीरियल टोंटी चोर ने संसद सदस्यों के घरों की टोंटी अनेक मर्तबा चुराईं हैं। नार्थ एवेन्यू में 55 नंबर कोठी में रहने वाले बरूच के संसद सदस्य मनसुख भाई सहित अनेक संसद सदस्यों के आवास में हुई चोरी में एक ही बात सामने आई कि चोरों ने बेशकीमति नल की टोंटिंया चुराने में ही दिलचस्पी दिखाई थी।

पिछले साल 5 सितंबर को फिरोजशाह रोड स्थित संसद सदस्य के आवास से टोंटी, शावर और वाश बेसिन गायब हुआ, तो 06 दिसंबर को साउथ एवेन्यू स्थित दो संसद सदस्यों के घरों में रसोई और गुसलखाने से 16 टोंटियां गायब हुईं। 24 नवंबर को लेडी इरविन कालेज के गेस्ट हाउस से नल की टोंटियां चोरी चली गईं थी।

इतना ही नहीं नलों के सीरियल चोरों ने दिल्ली मुन्सिपिल कार्पोरेशन की नाक में भी खासा दम कर रखा है। एमसीडी ने राष्ट्रमण्डल खेलों के मद्देनजर शौचालयों और मूत्रालयों में अत्याधुनिक सिस्टम वाली सीट लगाईं थीं। दिल्ली के भीखाजी कामा और आईएसबीटी बस अड्डे के यूरिनल में लगी लगभग नौ लाख रूपए मूल्य की यूरिनल सीट चोरों ने उडा दी जिससे ये बेकार हो गए हैं। कामन वेल्थ गेम्स को देखते हुए दिल्ली में लगभग एक हजार यूरिनल लगाने की योजना बनाई गई थी। इसके पहले निगम बोध घाट पर बायोटॉयलेट के पाईप चोरों ने उडा दिए थे।

हुकूमत पिलाती जहर

कौन जीतेगा ठाकरे या पवार


मंगलवार, 8 जून 2010

इंसाफ की रस्मअदायगी

कौन सी त्रासदी बडी, गैस हादसा या फैसला!

बडे गुनाह की बारीक सजा

पच्चीस साल बाद भी नहीं मिल सका न्याय

बेशर्म डाव केमिकल फिर परास रही है पैर भारत में

(लिमटी खरे)

सन 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दर्मयानी रात में देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ गैस हादसा हिन्दुस्तान ही नहीं वरन दुनिया का सबसे बडा औद्योगिक हादसा था। यूनियन कार्बाईड के डॉव केमिकल के कारखाने से निकली जानलेवा गैस ने पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जद में लिया और बीस हजार से ज्यादा काल कलवित हो गए थे। आश्चर्य इस बात का है कि इसके दोषी आज भी सलाखों के बाहर हैं। हिन्दुस्तान में पीडित न्याय की गुहार लगाते हुए बच्चे से जवान, जवान से प्रोढ, प्रोढ से बुजुर्ग और न जाने कितने बुजुर्ग तो दुनिया छोड चुके हैं। 26 साल का समय कम नहीं होता है। 26 साल में बच्चा समझदार होकर जवानी की दहलीज पर काफी आगे निकल चुका होता है। दुनिया की इतनी बडी औद्योगिक त्रासदी जो कि मानव निर्मित ही थी, के दोषियों की पहचान होने के बाद भी इसमें न्याय के लिए अगर भारत जैसे देश में इतना समय लग जाए तो यह निश्चित तौर पर हमें शर्मसार करने के लिए पर्याप्त ही माना जा सकता है।

इस त्रासदी के उपरांत आज भी प्रभावित इलाके में भूजल बुरी तरह प्रदूषित है, इससे प्रभावित लोगों की आने वाली पीढियां बिना किसी जुर्म की सजा शारीरिक और मानसिक तौर पर भुगत रहीं हैं। विडम्बना तो यह है कि हजारों को असमय ही मौत की नींद सुलाने वाले दोषियों को 25 साल बाद महज दो दो साल की सजा मिली और तो और उन्हें जमानत भी तत्काल ही मिल गई। हमारे विचार से तो इस मुकदमे की सजा इतनी होनी चाहिए थी, कि यह दुनिया भर में इस तरह के मामलों के लिए एक नजीर पेश करती, वस्तुतः एसा हुआ नहीं। देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी लाचार होकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है। फैसले में हुई देरी को वे दुर्भाग्यपूर्ण करार दे रहे हैं। दरअसल मोईली से ही यह प्रतिप्रश्न किए जाने की आवश्यक्ता है कि उन्होंने या उनके पहले रहे कानून मंत्रियों ने इस मामले में पीडितों को न्याय दिलवाने में क्या भूमिका निभाई है।

विश्व के इस सबसे बडे औद्योगिक हादसे का फैसला इस तरह का आया मानो किसी आम सडक या रेल दुर्घटना का फैसला सुनाया जा रहा हो। इस मामले में प्रमुख दोषी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन सर्वेसर्वा वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द भी न लिखा जाना निश्चित तौर पर आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। यह सब तब हुआ जब इस घटना के घटने के महज तीन दिन बाद ही मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया हो। सीबीआई पर लोगों का विश्वास आज भी कायम है। इस जांच एजेंसी के बारे में लोगों का मानना है कि यह भले ही सरकार के दबाव में काम करे पर इसमें पारदर्शिता कुछ हद तक तो होती है। इस फैसले के बाद से लोगों का भरोसा सीबीआई से उठना स्वाभाविक ही है। इस पूरे मामले ने भारत के ‘‘तंत्र‘‘ को ही बेनकाब कर दिया है। क्या कार्यपलिका, क्या न्यायपालिक और क्या विधायिका। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रजातंत्र के ये तीनों स्तंभ सिर्फ और सिर्फ बलशाली, बाहुबली, धनबली विशेष तबके की ‘‘लौंडी‘‘ बनकर रह गए हैं।

सीबीआई ने तीन साल तक लंबी छानबीन की और आरोप पत्र दायर किया था। इसके बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए थे। उच्च न्यायालय ने इनकी अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए और वहां से उन्होंने आरोप पत्र को अपने मुताबिक कमजोर करवाने में सफलता हासिल की। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सीबीआई इतनी कमजोर हो गई थी, कि उसने इस मामले की गंभीरता को न्यायालय के सामने नहीं रखा, या रखा भी तो पूरे मन से नहीं रख पाई। कारण चाहे जो भी रहे हों पर पीडितों के हाथ तो कुछ नहीं लगा।

आखिर क्या वजह थी कि एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद उसे गेस्ट हाउस में रखा गया। इसके बाद जब उसे जमानत मिली तो उसे विशेष विमान से भारत से भागने दिया गया। जब उसे 01 फरवरी 1992 को भगोडा घोषित कर दिया गया था, तब उसके प्रत्यापर्ण के लिए भारत सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए! 2004 में अमेरिका ने उसके प्रत्यापर्ण की अपील ठुकरा दी गई तो भारत सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। क्या दुनिया के चौधरी अमेरिका का इतना खौफ है कि भारत में हुए इस भयानक दिल दहला देने वाले हादसे के बाद भी सरकार उसे सजा दिलवाने भारत न ला सकी। इतना ही नहीं जब उसने अपना केस खुद नहीं लडा तब उसे इतने कम भोगमान पर छोड दिया गया। सरकार वैसे भी पहले ही लगभग दस गुना कम मुआवजा स्वीकार कर अपनी मंशा को स्पष्ट कर चुकी है। क्या कारण थे कि भारत सरकार ने इस कंपनी को चुपचाप बिक जाने दिया। इस दर्मयान भारत गणराज्य के वजीरे आजम और प्रजीडेंट न जाने कितनी मर्तबा अमेरिका की यात्रा पर गए होंगे पर किसी ने भी अमेरिका की सरकार के सामने इस मामले को उठाने की हिमाकत नहीं की। अगर भारत के नीति निर्धारक चाहते तो अमेरिका की सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर सकते थे कि वह यूनियन कार्बाईड से यह बात पूछे कि यह हादसा हुआ कैसे!

भोपाल गैस त्रासदी और लंबे समय बाद आया उसका यह फैसला निश्चित तौर पर खतरे की घंटी से कम नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों विशेषकर अमेरिका के जूते साफ करने को आमदा लोग अगर देश में विदेशी निर्भरता वाले परमाणु उर्जा संयंत्र लगाने की अनुमति देते हैं, और ईश्वर न करे कि अगर कोई हादसा हो जाए तो भारत सरकार और उसकी जांच एजेंसी किस भूमिका में होगी इस बात का परिचाक है यह पूरा प्रकरण। स्थिति परिस्थिति को देखते हुए हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार और उसकी एजेंसियों की नजर में भारत की जनता की जान की कीमत कीडे मकोडों जैसी ही है। अगर यह हादसा अमेरिका में घटा होता तो डाव केमिकल और यूनियन कार्बाईड का नामोनिशान मिटने के साथ ही साथ अनेक बीमा कंपनियों के दिवाले निकल चुके होते। यही हादसा अगर दिल्ली में हुआ होता तो इसकी सूरत कुछ और होती। सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली में उपहार सिनेमा में हुए हादसे के पीडितों को 15 से बीस लाख रूपए का मुआवजा मिल सकता है तो भोपाल गैस कांड के पीडितों को महज 25 - 25 हजार रूपए में क्यों टरका दिया गया।

55 अरब डालर की हो चुकी है डाव केमिकल। भोपाल जैसे हृदय विदारक हादसे को अंजाम देने के बाद भी यह कंपनी भारत का मोह नहीं छोड पा रही है। भारत सरकार है कि इस कंपनी को देश में दूसरे हादसे के लिए उपजाउ माहौल भी मुहैया करवा रही है। इस कंपनी ने वियतनाम युद्ध में एक जहरीली गैस बनाकर कहर बरपाया था। अब इस कंपनी के निशाने पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात सूबे हैं। इस कंपनी के प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अहसानों से दबे ही हैं केंद्र और सूबों के मंत्री, तभी तो ये डाव केमिकल की तारीफ में कशीदे गढने से नहीं चूकते। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं ही भोपाल में कंपनी के बंद पडे संयंत्र में जहरीले कचरे को छूकर कंपनी को सीधे तौर पर मदद करने का कुत्सित प्रयास किया था। इस कंपनी का महाराष्ट्र में मुंबई गोवा राजमार्ग पर एक संयंत्र आरंभ हो चुका है, जिसमें कीटनाशक बनता है। इसके अलावा गुजरात के दहेज में अगले साल यही कंपनी रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देगी।

बहरहाल इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं है, जो भी होगा हम पाएंगे ही। इसलिए भारत सरकार को अब चेतना चाहिए। उपरी अदालतों में जाकर इसकी कमियां खोजकर नए सिरे से पहल करना आवश्यक है। इस मामले में सरकार को आगे आना होगा। इस मामले में सरकरों की मंशा आईने की तरह साफ है, जनता जनार्दन की कीमत उनकी नजरों में चुनावों के दौरान वोट से ज्यादा कतई नहीं है। स्वयं सेवी संगठनों द्वारा लंबे समय से लडाई लडी जा रही है, कुछ संगठनों पर निहित स्वार्थ सिद्धि के आरोप भी मढे जाते रहे हैं। मीडिया पहली बार खुलकर इस मामले में सामने आया है, जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करना होगा। सालों बाद पहली बार लगा कि प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ भी जीवित है। अगर माननीय उपरी न्यायालय स्वयं ही संज्ञान लेकर समय सीमा में इस मामले को निपटाने का प्रयास करे तो निश्चित तौर पर यह एक बेहतरीन नजीर बनकर सामने आ सकता है।

कहां गया कांग्रेस का चाणक्‍य

हाशिए पर कांग्रेस का चाणक्य!

गुमनामी के अंधेरे में जिंदगी बसर करने मजबूर हैं कुंवर साहेब

अर्जुन सिंह की सेवाओं को दरकिनार किया कांग्रेस ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 08 जून। बीसवीं सदी के अंतिम के लगभग तीन दशकों तक कांग्रेस की नैया के खिवैया माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने दूध में से मक्खी की तरह निकाल फंेका है। आज आलम यह है कि कुंवर अर्जुन सिंह के निवास पर कोई उनका हाल जानने जाने की जहमत भी नहीं उठाता है। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को घेरकर रखने वाली कोटरी ने उनके कान भर भर कर कुंवर अर्जुन सिंह की सालों की मेहनत और नेहरू गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा को धूल धुसारित ही कर दिया है।

गौरतलब है कि अस्सी के दशक में देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह को विषम परिस्थितियों में अलगाववाद और आतंकवाद से झुलस रहे पंजाब प्रांत में शांति बहाली के लिए वहां का महामहिम राज्यपाल बनाकर भेजा था। अपनी तेज बुद्धि और चाणक्य नीति पर चलकर उन्होंने पंजाब में अमन चैन कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद तिवारी कांग्रेस का गठन उनके लिए परेशानी का सबब बना पर तिवारी कांग्रेस का गठन उन्होंने नरसिंहराव की खिलाफत के चलते किया था। कुंवर अर्जुन सिंह को कांग्रेस की सरकार में सदा ही तवज्जो मिलती रही है, और वे हमेशा सरकार के बनने पर कद्दावर मंत्रालय पर काबिज भी रहे हैं।

विडम्बना यह है कि उमरदराज हो चुके कुंवर अर्जुन सिंह अर्जुन सिंह को इस बार जब मन मोहन सिंह दुबारा सत्ता में आए तब मंत्रालय से विहीन कर दिया गया। उनकी पुत्री को लोकसभा का टिकिट तक नहीं दिया गया। पिछले कुछ सालों से कुंवर अर्जुन सिंह के विरोधी उन्हें हाशिए पर लाने में लगे हुए थे, कहा जा रहा है कि कान की कच्ची हो चुकीं सोनिया गांधी ने भी अर्जुन विरोधियों की बातों में आकर उन्हें राजनैतिक बियावान से गुमनामी के अंधेरे में ढकेल दिया है।

कभी कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता समझे जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह आज गुमनामी के अंधेरे में ही जीवन जी रहे हैं। कल मीडिया से घिरे रहने वाले कुंवर अर्जुन सिंह के दरबार में अब उनसे उपकृत होने वाले पत्रकार भी जाने से कतराने लगे हैं। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सोनिया के प्रबंधकों ने उनके कान भरकर नेहरू गांधी परिवार के ट्रस्ट से भी बाहर का रास्ता दिखवा दिया है। अर्जुन सिंह और परिवार के एक अन्य विश्वस्त माखन लाल फौतेदार के स्थान पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और मुकुल वासनिक को स्थान दे दिया गया है।

खतो खिताब की राजनीति के जनक माने जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी इस उपेक्षा के बाद भी अपना मुंह सिलकर ही रखा है, जिससे राजनैतिक विश्लेषक हैरानी में हैं। एक समय था जबकि कुंवर अर्जुन सिंह द्वारा लिखे गए पत्र संबंधित तक बाद में पहुंचा करते थे, मीडिया की सुर्खियां पहले ही बन जाया करते थे, पर इस बार कुंवर अर्जुन सिंह ने खामोशी अख्तिायर कर रखी है जो उनके स्वभाव से मेल नहीं खा रही है।

पिछले दिनों मध्य प्रदेश में अपने मित्र के पास बैतूल के ‘बालाजीपुरम‘ की यात्रा के उपरांत राजधानी भोपाल में भी मीडिया से मुखातिब कुंवर अर्जुन सिंह ने यह कहकर सभी को चौंका दिया था कि राजनीति में उन्हें आराम की फुर्सत नहीं मिली सो अब वे अर्जित अवकाश (अर्न लीव) भोग रहे हैं। सालों साल कांग्रेस में रहकर नेहरू गांधी परिवार की ढाल बने रहे कुंवर अर्जुन सिंह के साथ उमर के इस पडाव में कांग्रेस के नेतृत्व के इस सुलूक की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है।

आईपीएल झुलसा न दे पवार को



सोमवार, 7 जून 2010

ममता जुटीं सोनिया को खुश करने में

कपूरथला में बनेंगे ‘‘मेड इन रायबरेली‘‘ कोच

बिना निविदा आमंत्रण, हो गया भूमिपूजन!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 07 जून। स्थानीय निकयों के चुनावों में आशातीत सफलता पाने के बाद अब त्रणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने यूपीए अध्यक्ष और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को प्रसन्न करने की कवायद आरंभ कर दी है। ममता बनर्जी चाहती हैं कि कोलकता की रायटर्स बिल्डिंग पर वाम मोर्चे के लाल झंडे के स्थान पर उनकी पार्टी की ध्वजा फहराई जाए, यह काम सोनिया गांधी के साथ तालमेल बनाए बिना ममता को संभव नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि पंजाब के कपूरथला में बनने वाले रेल्वे के कोच पर अब ‘‘मेड इन रायबरेली‘‘ की सील लगी दिखाई देने वाली है।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी को अपने पसंदीदा रेल्वे महकमे की जवाबदारी मिले के बाद भी उन्होंने सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में प्रस्तावित रेल कोच फेक्टरी का काम आरंभ नहीं करवाया था। उधर रेल्वे के सूत्रों का दावा है कि यह काम ममता दीदी के इशारों पर ही मंथर गति से चलाया जा रहा था।
जमीनी हकीकत पर अगर नजरें इनायत की जाएं तो रायबरेली में रेल कोच कारखाने का निर्माण अगले साल तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। मजे की बात तो यह है कि 2011 में अस्तित्व में आने वाले इस कारखाने के लिए अभी तक जमीन तक मुहेया नहीं हो सकी है। कारखाने के निर्माण में हो रहे हीला हवाला के चलते सोनिया गांधी खासी खफा बताई जा रहीं हैं। आलम यह है कि पूर्व रेल मंत्री और स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव के राजद के यूपी सूबे के अध्यक्ष अशेक सिंह इस मामले मंे काम न आरंभ करने की दशा में अमरण अनशन की धमकी तक दे चुके हैं।

उधर पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों में आशा से अधिक सफलता पाने के बाद अब ममता बनर्जी की निगाहें प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जाकर टिक गईं हैं। ममता के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे इस बात को भली भांति जानतीं हैं कि यह काम बिना कांग्रेस के सहयोग के परवान चढने वाला नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस बात की घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी का समर्थन सरकर को पांच साल तक अनवरत जारी रहेगा।

इसी बीच कांग्रेस के चतुर सुजान प्रबंधकों की फौज में से एक ने ममता बनर्जी को यह संदेश पहंुचा दिया है कि रेल कोच कारखाने में हो रही देरी से आलाकमान की भवें तन रहीं हैं, कहीं एसा न हो कि इसका प्रतिकूल प्रभाव आने वाले विधानसभा चुनावों में त्रणमूल और कांग्रेस के गठबंधन पर पडे। इस खबर ने ममता की पेशानी पर चिंता की गहरी लकीरें उकेर दीं हैं। उन्होंने अपने ट्रबल शूटर प्रबंधकों को इसके मार्ग प्रशस्त करने के लिए ताकीद किया।

सूत्रों की मानें तो प्रबंधकों ने शार्ट कट रास्ता अख्तिायार करने का मशविरा ममता बनर्जी को दे दिया है। इस तरीके में सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी। बताया जाता है कि पंजाब के कपूरथला रेल कोच कारखाने में बनने वाले रेल कोच को अधनिर्मित हालातों में रायबरेली लाया जाएगा, जहां इन्हें सजाया जाएगा। सजाने के उपरांत इन कोच को कपूरथला में निर्मित के स्थान पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में निर्मित बताया जाएगा। शेष भारत की जनता को इस बात का पता नहीं चल पाएगा कि यह काम कपूरथला में किया गया है या फिर रायबरेली में। चर्चा है कि सोनिया गांधी भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गईं हैं। प्रबंधकों को डर इस बात का सता रहा है कि अगर किसी ने ‘‘सूचना के अधिकार‘‘ में इस बात की जानकारी निकालकर सार्वजनिक कर दी तो कांग्रेस अध्यक्ष को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।

रेल विभाग के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि रेल फर्निशिंग कारखाने की आधारशिला भी रख दी गई है। आनन फानन में रेल के सहयोगी प्रतिष्ठान राइट्स के पास इसका काम था, रेल विभाग ने इस काम को राइट्स के हाथों से लेकर अब इरकान को दे दिया है। इरकान ने लगभग 57, 36 और 30 करोड रूपयों की निविदा भी आमंत्रित कर दी है, जिन्हें दिल्ली में बुधवार 9 जून को खोला जाएगा। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बिना निविदा आमंत्रित किए ही इस कारखाने का भूमि पूजन भी करवा दिया गया है।

थुरूर के बाद अब पंवार की चला चली की बेला

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

आईपीएल की आग में झुलस न जाएं पवार
लगता है इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का जिन्न अनेक मंत्रियों, राजनेताओं और जनसेवकों को लील कर ही दम लेगा। आईपीएल के चेयरमेन रहे ललित मोदी और कंेद्रीय विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थुरूर के बीच हुई तकरार के बाद दोनों ही को अपना अपना पद गंवाना पडा था। आईपीएल की आग अभी बुझती नहीं दिख रही है। आज भी उसकी राख गर्म है, जाहिर है राख के नीचे शोले सुलग ही रहे हैं। कुछ दिनों की खामोशी के बाद अब केंद्रीय कृषि मंत्री और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शरद पंवार के इर्द गिर्द विवादों की सुई घूमना आरंभ हो गया है। मीडिया की सुर्खियां बनी एक खबर में कहा गया है कि पुणे टीम में पंवार के परिजनों की 16 फीसदी हिस्सेदारी है। पवार पर लगे आरोपों पर भाजपा ने तल्ख तेवर अपनाने के बजाए रस्म अदायगी कर उनका त्यागपत्र मांग लिया है। राजनीति के मंझे खिलाडी पंवार के लिए इस तरह के पंगों से बाहर निकलना कोई टेडी खीर नहीं है। अलबत्ता अगर भाजपा इसे मुद्दा बना लेती है तो फिर पंवार के लिए भाजपा का चक्रव्यूह तोडना थोडा मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी मंहगाई पर पवार की अनर्गल बयानबाजी से कांग्रेस उनसे खफा ही चल रही है, इन परिस्थितियों में कांग्रेस अगर एक तीर से कई निशाने साध ले तो किसी को अश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मामा ओबामा को पसंद आई चपाती
जब दुनिया के चौधरी अमेरिका के पहले नागरिक की शपथ ली थी बराक ओबामा ने तभी लोगों की जुबान पर चढ गया था, ‘‘किसका मामा है ओबामा‘‘। अब दुनिया के इस चौधरी को ललक है तो भारतीय चपाती खाने की। हाल ही में भारत अमरिका सामरिक संवाद के स्वागत समारोह में ओबामा ने चपाती के प्रति अपनी जिज्ञासा को उजागर किया। विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा से चर्चा के दौरान ओबामा ने कहा कि उन्हें बताया गया है कि उनकी केबनेट की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को दिल्ली का एक होटल बहुत ही रास आया है, विशेषकर वहां की चपाती। उस होटल में ‘‘हिलेरी प्लेटर‘‘ नाम का मेन्यू भी है। ओबामा ने चुटकी लेते हुए कहा कि उनका इरादा दिल्ली में किसी होटल में ‘‘ओबामा प्लेटर‘‘ बनाने का है। ओबामा बोले कि उनकी केबनेट के एक तिहाई सदस्य हिन्दुस्तान की यात्रा का आनंद ले चुके हैं। इसी बीच भारत के विदेश मंत्री को मुगालता न हो सो चट से ओबामा ने कहा कि हमारी केबनेट के सदस्य अगर भारत यात्रा पर गए थे, तो जाहिर सी बात है कि वे चपाती का लुत्फ उठाने अकेले तो गए नहीं होंगे।
पचौरी को जबर्दस्त झटका दिया दिग्गी राजा ने
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी भले ही कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के करीबी हों, पर उसी सूबे में दस साल लगातार तलवार की धार पर शासन करने वाले शक्तिशाली महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के आगे आज भी वे बौने ही हैं। 2008 अप्रेल में चौबीस साल तक राज्य सभा के रास्ते संसदीय सौंध में बिताने के बाद सेवानिवृत हुए सुरेश पचौरी को उम्मीद थी कि वे हाल ही में होने वाले राज्य सभा चुनावों में मध्य प्रदेश के रास्ते एक बार फिर केंद्र की राजनीति में पहुंच सकेंगे, पर उनकी आशाओं पर राजा दिग्विजय सिंह ने तुषारापात ही कर दिया। राज्य सभा प्रत्याशी के लिए नाम करने के अंतिम दौर में पचौरी के सरपरस्त रहे कमल नाथ और राजा दिग्विजय सिंह की राय जब मांगी गई तो दोनों ही ने पचौरी का साथ देने से किनारा कर लिया। अंततः पचौरी खेमे की माने जानी वालीं प्रदेश की पूर्व मंत्री विजय लक्ष्मी साधो के नाम पर आम सहमति बन गई। साधो को टिकिट दिलाने में पचौरी अवश्य ही कामयाब हो जाएं पर अब केंद्र और राज्य की राजनीति में उनकी सांसे उखडने ही लगी हैं। जुलाई में प्रदेश में अध्यक्ष का चुनाव होना है, तब शायद ही पचौरी ताकतवर रह पाएं।
कांग्रेस के लिए ममता हो गईं अपरिहार्य
पिछले पांच सालों में संप्रग सरकार के प्रमुख घटक कांग्रेस के लिए लालू प्रसाद यादव जरूरत बनकर उभरे थे, इस बार वे राजनैतिक परिदृश्य से अचानक ही गायब हो गए हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, यह सतत प्रक्रिया है। इस बार लालू प्रसाद यादव का वेक्यूम भरने का जिम्मा उठाया है पश्चिम बंगाल की त्रणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने। ममता ने स्थानीय निकाय चुनावों में बाजी मारकर साफ कर दिया है कि उनकी बेसाखी के बिना कांग्रेस पश्चिम बंगाल में वेतरणी पार नहीं कर सकती है। कल तक वाम मोर्चे का गढ रहा बंगाल अब ममता के कब्जे में ही दिखाई दे रहा है। ममता के बढते कद से सबसे अधिक परेशान कांग्रेस के तथाकथित थिंक टेंक प्रणव मुखर्जी हैं। प्रणव दा अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को सफाई देने की स्थिति में भी नहीं बचे हैं कि आने वाले समय में होने वाले विधानसभा चुनाव के इस सेमी फायनल में कांग्रेस बाहर क्यों और कैसे हो गई है। सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी के मुंह लगे एक ताकतवर महासचिव ने प्रणव की इस असफलता के अस्त्र से प्रणव मुखर्जी की जडों में मट्ठा डालना भी आरंभ कर दिया है। देखना यह है कि प्रणव दा अब 10 जनपथ से अपनी नजदीकियां बरकरार रख पाते हैं या फिर पार्श्व में ढकेल दिए जाते हैं।
चिदम्बरम जी अब छग और एमपी हो गया लाल
नक्सलवादियों पर काबू पाने की केंद्रीय गृह मंत्री की सारी तैयारियों को धता बताकर नक्सलवादियों ने छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में आतंक बरपाकर साफ कर दिया है कि उन्हें न तो राज्यों की सरकार और न ही केंद्र के कदमों से कोई लेना देना नहीं है। भारत गणराज्य में समूचे देश के अनेक सूबों में नक्सलवादी अपनी समानांतर सरकार चला रहे हैं और केंद्र सरकार नीरो की तरह चैन की ही बंसी बजा रही है। पिछले दिनों छत्तीसगढ के जगदलपुर और मध्य प्रदेश के बालाघाट में नक्सलियों ने जो तांडव किया है वह किसी से छिपा नहीं है। बालाघाट जिले में सर्च का काम सीआरपीएफ के जिम्मे है। यहां रीवा की बटालियन की एक कंपनी तैनात है। मजे की बात तो यह है कि कंपनी के सभी 138 जवानों के जिम्मे बालाघाट में पुलिस और प्रशासन की बंग्ला डियूटी संभालने का काम ही है। कल तक जिस काम को नगर सेना (होम गार्ड) या जिला पुलिस बल के जिम्मे होता था आज वह काम विशेष सशस्त्र बल के जवानों के कांधों पर है। सच ही है राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में बालाघाट और जगदलपुर जैसी घटनाएं घटना आम बात है।
लालू मुलायम पर कांग्रेस की नजर
तलवार की धार पर चलने वाली कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की कुर्सी के पाये अब कमजोर होते दिख रहे हैं। एक के बाद एक सहयोगी दलों के मंत्रियों के दागदार और कांग्रेस के मंत्रियों के जवाबदारी से मुंह मोडने के चलते कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक आईं हैं। कहा जा रहा है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में ए.राजा को अगर दोषी माना जाएगा तो उनका त्यागपत्र अवश्यंभावी है। इसके अलावा अगर शरद पवार को आईपीएल का जिन्न खा जाएगा तब कांग्रेस अल्पमत में सरकार नहीं चला पाएगी। वैसे भी ममता की बयानबाजी, आझागिरी के अडियल रवैए से कांग्रेस नेतृत्व परेशान है। कांग्रेस के प्रबंधक इसका तोड ढूंढने की जुगत में लगे हैं। कांग्रेस को सबसे साफ्ट टारगेट के तौर पर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ही दिखाई पड रहे हैं। सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल को मुलायम सिंह से बातचीत के लिए लगाया गया है। मुलायम सत्ता में हिस्सेदारी के साथ ही समर्थन देने की शर्त रख रहे हैं। इसके अलावा रालोद के अजीत सिंह का मन टटोलने के लिए मोती लाल वोरा को पाबंद किया गया है। देखना यह है कि एक साल पूरा होने के उपरांत अब संप्रग का नया चेहरा क्या होगा।
अब शुद्ध पेयजल के लिए भी आयोग
भारत गणराज्य के नागरिकों को ब्रितानी गुलामी से मुक्ति के बासठ सालों बाद भी बुनियादी चीजें मिलें न मिलें पर राजनेताओं के लिए लाल बत्ती और उनके वेतन भत्ते, विलासिता की चीजों के मार्ग अवश्य ही प्रशस्त हो जाते हैं। देश में हर मामले में न जाने कितने आयोगों का गठन किया जा चुका है। अपने मूल उद्देश्य और काम को समयावधि में शायद ही किसी आयोग ने पूरा किया हो, हर बार इसका कार्यकाल बढाया ही गया है। जब पता है कि काम निर्धारित तय अवधि में पूरा नहीं किया जा सकता है, तो फिर बेहतर होगा कि इसकी समयावधि तय ही न की जाए। हाल ही में केंद्र सरकार ने प्रदूषण मुक्त साफ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए एक आयोग बनाने पर विचार करने की बात कही है। राज्य सभा में बीते दिनों शहरी ग्रामीण विकास मंत्री सी.पी.जोशी ने देश में आर्सेनिक, फ्लोराईड और अन्य हानिकारक लवणों से युक्त पेयजल के बारे में पूछे सवाल के जवाब में कहा कि इस हेतु सरकार एक उच्च स्तरीय वैज्ञानिक सलाहकार आयोग के गठन पर गंभीरता से विचार कर रही है। अघोषित परंपरा के मुताबिक इस आयोग में भी किसी राजनेता को बिठाकर उपकृत ही किया जाएगा।
ई रिजर्वेशन अब 23 घंटे
रेल यात्रियों की सुविधा में ममता बनर्जी ने इजाफा करते हुए अब ई रिजर्वेशन चोबीस में से 23 घंटे के लिए खोल दिया है। रेल्वे के सूत्र बताते हैं कि इसके साथ ही साथ 139 नंबर पर पीएनआर की मौजूदा स्थिति जानने के लिए अब रात में परेशान नहीं होना पडेगा। रेल्वे की आईआरसीटीसी की वेव साईट को मेनटनेंस के लिए रात साढे ग्यारह से रात साढे बारह तक के लिए ही बंद किया जाएगा। शेष समय यह वेव साईट बाकायदा काम ही करती रहेगी। तत्काल का आरक्षण इसके माध्यम से 48 घंटे के पूर्व नहीं करवाया जा सकेगा। रेल मंत्री को यह बात शायद ही पता हो कि तत्काल का आरक्षण जैसे ही खुलता है रेल्वे की उक्त वेव साईट बहुत ही धीमी हो जाती है, इसका कारण महानगरों में बैठे आईआरसीटीसी के एजेंट हैं, जो ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में रेल्वे अधिकारियों की मिली भगत से वेव साईट को धीमा कर देते हैं। तत्काल रिजर्ववेशन के लिए यह वेव साईट सुबह आठ से रात ग्यारह बजे तक ही काम करेगी।
सबसे मंहगा कैदी है स्कूल ड्राप आउट
पाकिस्तान में कभी पढाई को बीच में ही छोड देने वाला मोहम्मद अजमल आमिर कसाब आज की तारीख में भारत का सबसे मंहगा कैदी बन गया है। 26 नवंबर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए सबसे बडे आतंकी हमले के इकलौते जिन्दा पकडे गए दोषी कसाब पर भारत सरकार ने नवंबर 2009 तक एक साल में ही तीस करोड रूपए से अधिक खर्च किए हैं। 1987 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ओकारा जिले के फरीदकोट गांव में पैदा हुए कसाब के पिता गांव में ही खाने पीने की दुकान लगाया करते थे। पांच भाई बहनों में तीसरे नंबर के कसाब ने आर्थिक तंगी के चलते 2000 में स्कूल जाना बंद कर दिया था, एवं 2005 तक वह दरगाह में छोटा मोटा काम कर गुजारा चलाता था। स्पेशल कोर्ट से सजा पाने के बाद कसाब अब उंची अदालत में अपील करने की इच्छा रख रहा है। वैसे भी कसाब को जिंदा रखने के ओचित्य पर देश में अघोषित बहस चल रही है। कुछ का मानना है कि एसे दुर्दांत अपराधी को सरेराह फांसी पर लटका देना चाहिए, तो कुछ कूटनीतिक कारणों से कसाब को जिन्दा रखने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
गोबर का गडबडझाला!
‘‘तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है, सब गुड गोबर कर दिया‘‘ इस तरह के महावरों का प्रयोग आपने बचपन से अब तक कई मर्तबा किया होगा पर क्या आपने कभी सोचा है कि यही गोबर इतना कीमती हो जाएगा कि इसे आयात करना पडे! जी हां यह सच है, देश की सरकार वर्ष 2005 से गोबर को विदेशों से खरीदकर भारत ला रही है। देश में घटते पशुधन के चलते खाद में कमी आ रही है, यह बात सच है। आधुनिकीकरण, शहरीकरण और औद्योगीकरण के चलते पशुओं की तादाद में रिकार्ड कमी दर्ज की गई है। विदेशों से वेस्ट मेटेरियल आयात करने के मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय बहुत जुदा ही नजर आ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि गोबर की खाद और पशुमूत्र की कमी देश में है। विदेशों से इसका आयात हो रहा है, पर समस्या यह है कि मंहगी कीमत और ढुलाई दरों को अगर सहन भी कर लिया जाए तो विदेशांे से आने वाले बेक्टीरिया और वायरस को कैसे रोका जाए। अगर इसमें एंटी बायोटिक्स या अन्य रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है तो इसे जैविक खाद की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। लगभग 15 साल पहले गुजरात में एक जहाज भरकर गोबर लाया गया था, बताते हैं कि गायों को बहुत अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक देने से गोबर जहरीला हो गया था, तब भारत में इसे निशुल्क भेजने का लालच दिया गया था, क्योंकि इस जहरीले गोबर को अगर समुद्र में डाला जाता तो पानी बहुत ही जहरीला हो जाता। विदेशों की गंदगी और जहर हम भारतीय किस कदर अंगीकार करते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। जय हो, हमारे जनसेवक पांच सालों से सो रहे हैं, और सरकार है कि मनमानी पर उतारू है।
कांग्रेस का अल्पसंख्यकों से मोहभंग!
कल तक अल्पसंख्यकों की बिसात पर राजनैतिक मुहरे चलने वाली कांग्रेस का अब लगता है कि कांग्रेस से मोहभंग हो गया है। मध्य प्रदेश से राज्य सभा के लिए एक सीट पर नाम तय करने पर कांग्रेस ने सूबे के अस्सी लाख मुसलमानों को किनारे ही किया है। राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में अबू आजमी को राज्यसभा से सूबे से पहंुचाया गया था। इस बार मुस्लिमों को उम्मीद थी कि उनके वर्ग को कांग्रेस तवज्जो देकर प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करेगी, वस्तुतः एसा होता नजर ही नहीं आ रहा है। वैसे भी मुस्लिमों को कांग्रेस का वोट बेंक ही माना जाता रहा है। 2009 में 12 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं थीं, इसमें भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र का वर्चस्व रहा है। अल्पसंख्यक मुसलमानों का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पिछले दो दशकों में कोई भी लोकसभा नहीं पहंुच सका है, अबू आजमी को अगर छोड दिया जाए क्योंकि वे प्रदेश से बाहर के थे, तो कांग्रेस ने सुरेश पचौरी को चार बार के अलावा अर्जुन सिंह, एवं माबल रिबेलो को भी राज्य सभा से भेजा। हो सकता है कांग्रेस को लगता हो कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार दूसरी बार बनी है, और भाजपा की रीति नीति के चलते मुसलमान उसके करीब नहीं जा सकते, इससे वे मजबूरी में कांग्रेस का ही साथ देने पर मजबूर होंगे।
पुच्छल तारा
हमारी यादें किस कदर हमें उलझा देतीं है कि जब हम हंसना चाहें तो रोते हैं और जब रोना चाहें तो हंसने पर मजबूर हो जाते हैं। मुंबई से तृप्ती वर्मा ईमेल भेजती हैं कि हमारी याददाश्त बहुत ही कन्फयूजिंग रोल प्ले करती हैं। हमारी पुरानी यादें हमं हंसने पर मजबूर कर देतीं हैं जब हम याद करते हैं कि हम अपने मित्र सखा ही पहली प्रथमिकता होते थे और उनके साथ एक साथ मिलकर रोया करते थे, और अब जब सभी अपने अपने कामों में व्यस्त हैं किसी के पास किसी से मिलने का समय नहीं है, सभी की प्राथमिकताएं अब बदल गईं हैं, तब हम रोते हैं उस बात को याद करके जब हम सभी एक साथ मिलकर ठहाके लगाया करते थे, दरअसल आज वे क्षण हमें नहीं मिल पाते हैं।

गुरूजी गुरूजी न रहे



शुक्रवार, 4 जून 2010

कब तक जहर पिएगा आवाम

. . . मतलब तब तक जहर पिए रियाया

शीतल पेय मामले में कोर्ट सख्त तो सरकार नरम!

(लिमटी खरे)

देश में कीटनाशक की अत्याधिक मात्रा से युक्त शीतल पेयजल की बिक्री के मामले में देश के सबसे बडे न्यायालय की ताजा टिप्पणी से साफ हो जाता है कि अपने स्वार्थों की बलिवेदी पर सरकार और देश के जनसेवकों द्वारा आवाम के स्वास्थ्य को किस कदर चढाया जा रहा है। देश में शीतल पेय के नाम पर कीटनाशक जैसा धीमा जहर पिलाने वाली बडी व्यापारिक कंपनियों की सरेराह की जाने वाली धोखाधडी और गडबडी होने पर उनके खिलाफ कार्यवाही करने के मसले पर सरकार का रवैया कितना टालमटोल भरा होता है।

गौरतलब है कि तकरीबन छः साल पूर्व एक याचिका के माध्यम से शीतल पेय को बाजार में आने से पूर्व उसकी गुणवत्ता जांच और कडे नियम कायदों को तय करने की मांग की गई थी। इसके पहले विज्ञान और पर्यावारण केंद्र (सीएसई) ने अपने प्रतिवेदन में इस बात का खुलासा किया था, कि हिन्दुस्तान में बिकने वाले शीतल पेयजल के कुछ ब्रांड में कीटनाशक की मात्रा निर्धारित से काफी अधिक है। संसद की स्थाई समिति भी 2004 में इस बात के लिए सरकार को ताकीद कर चुकी है कि देश में बिकने वाले शीतल पेयजल में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय निर्धारित मानकों से 42 फीसदी अधिक है।

इतना ही नहीं अगस्त 2006 में सीएसई ने पुनः इसी बात को रेखांकित किया था कि शीतल पेय में कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित से कई गुना अधिक है। देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने भी इस बात को स्वीकार किया है, बावजूद इसके सत्ता के मद में चूर सरकार में बैठे नुमाईंदों ने ठंडे पेय में कीटनाशकों की मात्रा, उसकी गुणवत्ता जांच आदि जैसे संवेदनशील मसले पर नियम कायदे तय करना जरूरी नहीं समझा है। सरकार के हाथ इस मामले में परोक्ष तौर पर बंधे होने से साफ जाहिर हो जाता है कि धीमा जहर पिलाने वाली इन व्यापारिक कंपनियों ने सरकार को अपना जरखरीद गुलाम बना रखा है।

जब जब अदालत द्वारा कडा रूख अख्तिायार कर सरकार को फटकारा जाता है, सरकार द्वारा ‘‘बस कुछ दिन और‘‘ का ब्रम्हास्त्र चलाकर अदालत को भी गुमराह कर दिया जाता है। हाल ही में भी वही हुआ। जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शीतल पेयों में मौजूद तत्वों का खुलासा करने के लिए अधिसूचना जारी करने में देरी को लेकर केंद्र को आडे हाथों लेते हुए उसकी खिंचाई की तो सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आती दिखाई दी। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण इस मामले में लल्लो चप्पो करता दिखाई दिया।

प्राधिकरण ने दलील दी कि नए नियम जारी करने में कम से कम तीन महीने का वक्त और लगेगा। पिछले अनेक वर्षों में सरकार के ढुलमुल रवैए को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यह अवधि भी सरकार को कम पडे। गौरतलब है कि मार्च 2007 में एन.के.गांगुली की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने जब मानक निर्धारित करने की सिफारिश की थी, तब सरकार ने अप्रेल 2009 तक इसे लागू करने का लक्ष्य रखा था। इसके ठीक एक साल एक माह बाद भी सरकार तीन माह का और समय चाह रही है।

सीएसई ने समूचे हिन्दुस्तान में जाकर विभिन्न स्थानों से शीतल पेय के निर्माताओं के उत्पाद ‘‘कोका कोला‘‘ और ‘‘पेप्सी‘‘ घराने के ग्यारह ब्रांड के सत्तावन नमूने एकत्र किए थे। इनकी जांच करने पर सीएसई ने पाया कि इनमें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खतरनाक तत्वों की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित की गई तय सीमा से लगभग पच्चीस गुना अधिक है। इस तरह के हानिकारक तत्व मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ ही साथ अनेग गंभीर संक्रामक बीमारियों के जनक भी हो सकते हैं। इस मामले में गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी सीएसई के सुर में सुर मिलाते हुए मानक निर्धारित करने पर बल दिया था।

शीतल पेय निर्माता कंपनियों की जुर्रत तो देखिए कि आज तक इन कंपनियों ने अपने पेय को बनाने में उपयोग में आने वाली वस्तुओं और रसायन को न केवल उजाकर किया वरन् धडल्ले से सरकारी कार्यक्रमों में अपने शीतल पेय को बेच भी रही हैं। इन व्यापारिक कंपनियों के ‘‘भारी बोझ‘‘ से दबी देश की सरकार और जनसेवकों के मुंह भी इस मसले पर सिले हुए ही हैं। यही कारण है कि शीतल पेय निर्माता कंपनियां मनमानी पर उतारूं हैं और सरकार इनके खिलाफ सख्ती का मानस तक नहीं बना पा रही है। सरकार के घुटने टेकने का अनुपम उदहारण था राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का कार्यकाल। उस समय राजग सरकार ने इन कंपनियों को ‘‘क्लीन चिट‘‘ तक दे दी गई थी, यह किस प्रलोभन के तहत दी गई थी, इस बात को तो राजग सरकार ही बेहतर जानती होगी पर रियाया के साथ राजग ने यह सबसे बडा अन्याय ही किया था कि धीमे जहर निर्माता कंपनी को निर्दोष होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया था।

‘‘सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का‘‘, कहावत को चरितार्थ करते हुए सरकार ने जांच का सरेआम माखौड उडाया है। शीतल पेय निर्माण में कीटनाशक या मानव स्वास्थ्य के लिए हानीकारक तथ्य मोजूद हैं अथवा नहंी इस बारे में सरकार क्या चाहती है और कितनी ईमानदारी से चाहती है उसकी मंशा और भी साफ तब हो जाती है जब गुणवत्ता तय करने के लिए गठित विशेषज्ञ समिति में कोला और अन्य कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को शामिल कर लिया जाता है। मतलब साफ है कि आरोपी को ही अपने बारे में फैसला देने का अधिकार दे दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय इस पर बुरी तरह खफा नजर आया। सरकार को फटकारते हुए कोर्ट ने कहा कि गुणवत्ता की जांच के लिए वैज्ञानिक समिति के पेनल में कोला कंपनियों के अधिकारियों को क्यों रखा गया है। साथ ही अधिसूचना जारी करने में लेट लतीफी करने वाले ढुलमुल सरकारी रवैए पर इस बार माननीय न्यायालय ने सख्त रवैया अपनाकर सरकार से प्रश्न करते हुए कहा कि ‘‘क्या तब तक लोगों को जहर ही पीना होगा!‘‘ सरकार लोगों को जहर पिलाने पर आमदा है और सत्ता तथा विपक्ष में बैठे विशाल जनादेश प्राप्त जनता के नुमाईंदे चुपचाप सब कुछ देख सुन रहे हैं, अब देश की जनता को ईश्वर पर ही भरोसा रखना चाहिए कि वही अवतार लेगा और जनता के दुख दर्द दूर करेगा, क्योंकि मोटी चमडी वाले जनसेवक तो अपने निहित स्वार्थों के आगे कुछ भी सुनने समझने को तैयार नहीं दिखते।

लो सरकार ही जहर पिला रही है




गुरुवार, 3 जून 2010

पहला नागरिक हो तो एसा!

पहला नागरिक हो तो एसा!
सालों बाद पानी किल्लत बिना गुजरी गरमी

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक तक सुबह और शाम दो समय नल के आदी थे, शहरवासी। इसके बाद पानी की किल्लत दिनों दिन बढती गई। एसा नहीं कि सिवनी में पानी के स्त्रोत नहीं हैं। पानी के पर्याप्त स्त्रोत होने के बाद भी जनसेवकों की अदूरदर्शिता का खामियाजा भगवान शिव की नगरी में रहने वालों को भोगना पडा। एशिया के सबसे बडे मिट्टी के बांध होने का गौरव पाने वाली संजय सरोवर परियोजना के होते हुए भी सिवनी शहरवासियों के कंठ सूखे ही रह जाते हैं। अपने आंचल में बबरिया, दलसागर, बुधवारी और मठ जैसे विशाल जलसंग्रह क्षमता वाले तालाब के अलावा रेल्वे स्टेशन से सटे हुए दो छोटे तालाब सहेजने के बाद भी अगर सिवनी में नागरिकों को निस्तार के लिए भी पर्याप्त पानी न मिल सके तो इसे जनसेवकों की अक्षम्य और बडी चूक की ही श्रेणी में रखा जाएगा।

नब्बे के दशक तक सिवनी शहर को पानी प्रदाय के लिए इकलौती पानी की टंकी टिग्गा मोहल्ला में हुआ करती थी, जिसे बबरिया और लखनवाडा के तट से पानी लाकर भरा जाता रहा है। कालांतर में पानी की टंकियों की संख्या बढी और भीमगढ बांध से सुआखेडा से सिवनी तक लंबी पाईपलाईन बिछा दी गई। इसे सिवनी शहर की आबादी को 2025 तक का आंककर दोनों समय पानी देने की गरज से बनाया गया था। कांग्रेस के शासनकाल में स्थापित इस परियोजना की गुणवत्ता पर उसी वक्त प्रश्न चिन्ह लग गया था। परीक्षण के दौरान ही कलेक्टोरेट के सर्किट हाउस वाले गेट के पास पाईप लाईन पानी का दवाब नहीं सह पाई और उसने आसमान की ओर मुंह कर दिया था। आज यह नल जल योजना माह में आधे दिन ही लोगों का साथ दे पाती है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, किसी भी जनसेवक ने इस घटिया, स्तरहीन नल जल योजना के बारे में कभी भी कोई प्रश्न विधानसभा में उठाने की जहमत नहीं उठाई। यह नल जल योजना तत्कालीन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री ठाकुर हरवंश सिंह के स्वर्णिम कार्यकाल का एक बदनुमा दाग है सिवनी के माथे पर। इस योजना के बारे में न तो कोई जनहित याचिका ही दायर करने का साहस जुटा पाया न ही मध्य प्रदेश की सबसे बडी पंचायत अर्थात विधानसभा में ही इसको चेलेंज किया जा सका है। यह क्यों नहीं किया जा सका, यह बात भी आईने के मानिंद साफ ही है, कि कौन किसके एहसानों तले बुरी तरह दबा हुआ है, किसने किस कारण अपना मंुह बंद कर रखा है! कौन जान बूझकर ही अपने नयनों पर काली पट्टी बांधे हुए हैं। ये सारे जतन बेमानी है, नेता सोच रहे हैं कि शतुरमुर्ग के मानिंद वे रेत में अपनी गर्दन गाडकर सोच रहे होंगे कि उन्हें कोई देख नहीं रहा है, पर सच्चाई इससे इतर ही है। जनता नेताओं की नूरा कुश्ती समझ चुकी है। समय समय पर किसी महाबली विशेष के विरोध का दिखावा भी अपना उल्लू सीधा करने की एक रणनीति का ही हिस्सा है।

जब से नगर पालिका परिषद में चुनी हुई परिषद विराजी है तब से याद नहीं पडता कि किसी गरमी के मौसम में पानी की किल्लत के बिना गुजारा हुआ हो। पिछले पांच सालों के कार्यकाल में तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त हुए हैं। सत्ता के मद में चूर परिषद ने लोगों को तीन तीन चार चार दिन तक पानी नहीं दिया, और मजे से अपने अपने घरों में फायर बिग्रंेड बुलाकर काम चलाया। भगवान शिव की नगरी सिवनी की सीधी साधी भोली भाली ने सब कुछ देखा सुना और सहा। नागरिकों को लगने लगा था कि ग्रीष्मकाल आरंभ होने के पहले ही फरवरी से अगस्त तक के सात माह पानी की किल्लत से आम जनता को गुजरना ही होगा। वस्तुतः हर साल एसा होता भी रहा है।

पानी की मारामारी के मामले में इस साल की गरमी का मौसम अपेक्षाकृत कम परेशानी भरा रहा है। अनेक मौकों पर हमने खुद भी देखा है कि नगर पालिका के युवा एवं उत्साही अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी द्वारा खुद ही गांधी भवन के पीछे पानी के स्त्रोत पर खडे होकर टेंकर्स में पानी भरवाया गया। इतना ही नहीं टेंकर पर खुद ही सवार होकर गली मोहल्लों में पानी की सप्लाई भी करवाई गई। देखा जाए तो सिवनी के इतिहास में यह पहला मौका होगा जबकि पालिका के किसी अध्यक्ष द्वारा जनता के इस पानी के दुख को समझा हो। इस साल शहर में पानी की किल्लत की खबरें बहुत ही कम प्रकाश में आई हैं। यह राजेश त्रिवेदी का भाग्य ही माना जाएगा कि इस साल गरमी के मौसम में सुआखेडा जलावर्धन योजना के पाईप लाईन भी ज्यादा नहीं फटे। नगर पालिका में कोई नया चमत्कार नहीं हुआ है। उतने ही टेंकर, फायर बिग्रेड, फायर फायटर हैं, उतनी ही तादाद में वे बिगडे पडे हैं, चालू हालत में उतने ही बल्कि कुछ कम ही टेक्टर्स और टेंकर्स हैं। वही कर्मचारी हैं, फिर इस बार पानी की किलकिल क्यों नहीं हुई।

जाहिर सी बात है कि आज से पहले प्रबंधन का अभाव हुआ करता था। अगर कुशल प्रबंधन में काम किया जाए तो संसाधन महत्वपूर्ण नहीं रह जाते फिर संसाधन भले ही कम क्यों न हों, लक्ष्य की प्राप्ति कठिन जरूर होती है, पर मुश्किल नहीं। राजेश त्रिवेदी ने इस बार गरमी में लोगों को पानी के लिए तरसने से बचाकर एक अनुकरणीय उदहारण कायम किया है, जिसकी हर शहर वासी को मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए। पूर्व में एक बार हमने अपने आलेख में अनुज राजेश के द्वारा किए जा रहे मोक्षधाम के जीर्णाेद्धार के बारे में लिखकर उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी, तब राजेश नगर पालिकाध्यक्ष के पद पर काबिज नहीं थे। आज राजेश सिवनी शहर के पहले नागरिक हैं। शहर की कमान उनके हाथ में है।

राजेश की दूरंदेशी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अध्यक्ष बनने के उपरांत राजेश ने हमसे पहली बात यही पूछी थी, कि सिवनी शहर को किस दिशा में आगे बढाया जा चुका है। शहर आज वाकई में अंदर ही अंदर भर चुका है। चारों दिशाओं में नाकों के बाहर जाने से लोग कतरा रहे हैं। सिवनी की नगर पालिका प्रदेश की पहली नगर पलिका है, जहां ड्रेस कोड लागू किया गया है। आम आदमी आज पालिका कार्यालय जाता है तो उसे वे ही कर्मचारी मान सम्मान देकर उसका काम कर रहे हैं। कम उमर में राजेश द्वारा जिस तरह अनुभवी कदमतालों के जरिए शहर को सलीके से लाने और करीने से सजाने का प्रयास किया है, वह प्रशंसनीय है। सिवनी शहर वासियों को चाहिए कि छोटी मोटी भ्रांतियों और अफवाहों पर कान न देकर राजेश त्रिवेदी के नगर पालिकाध्यक्ष रहते हुए अपने शहर को संवार लें।

निहित स्‍वार्थ में उलझते



निहित स्वार्थ को परे रखें जनसेवक 
 
वर्ष 2011 के लिए जनगणना के लिए भारत सरकार की सेनाएं (कर्मचारियों की फौज) सज गई हैं। हर घर जाकर भारत की वर्तमान जनसंख्या के बारे में आंकडे जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्ति्रया के पहले चरण में जनगणना में लगे अधिकारी लोगों के पास पहुंचने आरंभ हो गए हैं। बावजूद इसके संसद में बैठे जनसेवकों का एक बहुत बडा धड़ा आज भी इस बात पर आमदा ही नजर आ रहा है कि जनगणना को जातिगत आधार पर कराया जाए। आखिर जातिगत आधार पर जनगणना का औचित्य क्या है, इस बात पर कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, बस मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग की कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं सारे जनसेवक। जाति के अधार पर जनगणना के मासले पर केंद्रीय कैबिनेट भी किसी नतीजे पर नहीं पहंुच सकी है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय रहते इस मामले में विचार-विमर्श नहीं किया गया। आखिर क्या वजह है कि जनसेवकों के तर्क-कुर्तक पर केंद्र सरकार ठोस तर्क से लेस होकर सामने आने से घबरा रही है। जनगणना का काम आरंभ हो चुका है, फिर उसे करने या न करने में सरकार का संशय समझ से परे ही है। अगर देखा जाए तो भारत जैसा देश दुनिया में बिरला ही होगा, जहां हर वर्ग, धर्म, सम्भाव के लोगों को अपनी मनमर्जी के काम करने की पूरी आजादी है। इन परिस्थितियों में भारत में जनगणना को जाति, वर्ग, संप्रदाय से पूरी तरह मुक्त ही रखा जाना चाहिए था। एक तरफ तो भारत सरकार यह बात जोर-शोर से कहती है कि हम सिर्फ भारतीय हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना में जाति, वर्ग, संप्रदाय की बात कहना बेमानी ही होगा। भारत में जाति आधारित जनगणना का आगाज 1881 में हुआ था, जिसे 1931 में समाप्त कर दिया गया था। 1931 से 2001 तक किसी को भी जाति आधारित जनगणना नहीं किए जाने से कोई आपत्ति नहीं हुई। भारत गणराज्य के संविधान निर्माताओं ने भी जाति आधारित जनगणना को समर्थन नहीं दिया। देखा जाए तो जब बच्चा स्कूल में पढ़ता है, तब उसे यह पता नहीं होता है कि वह जिसके बाजू में बैठकर अध्ययन कर रहा है वह किस जाति का है। स्कूल में रोजाना आधी छुट्टी के वक्त जिसके साथ बैठकर वह अपना टिफिन शेयर करता है, वह किस जाति का है, उसे इससे कोई लेना देना नहीं होता है। बाद में जब वह पढ़-लिखकर नौकरी के लिए जाता है, तब जरूर उसे पता चलता है कि फलां नौकरी उसके उसी बाल सखा को मिल गई, क्योंकि वह पिछड़ा था, और वह इसलिए वंचित रह गया, क्योंकि वह अगड़ी जाति के घर में जन्म लेकर दुनिया में आया है। इस तरह के भेदभाव को जन्म देने वाली व्यवस्था को तत्काल से रोकने की जरूरत है। 
 
रोजनामचा ब्लॉब में लिमटी खरे