शुक्रवार, 22 जून 2012

सोनिया ने जलील करवाया मुलायम को: स्वामी


सोनिया ने जलील करवाया मुलायम को: स्वामी

(दीपांकर श्रीवास्तव)

लखनऊ (साई)। जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने गुरुवार को कहा कि समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह का अपमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इशारे पर किया गया है। राजधानी लखनऊ में स्वामी ने कहा, ‘कांग्रेसी नेता राशिद अल्वी ने मुलायम के खिलाफ जो बयान दिया था, वह सोनिया गांधी के इशारे पर दिया गया था। सोनिया जानबूझकर मुलायम का अपमान कराना चाहती थीं।
उन्होंने कहा कि मुलायम ने ही सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोका था। यही वजह है कि वह बदले की राजनीति कर रही हैं। स्वामी ने कहा, ‘सोनिया एक ऐसी महिला हैं जो हमेशा यह चाहती हैं कि लोग उनके सामने झुके रहें। इसलिए जानबूझकर वह ऐसे बयान दिलवाती हैं।
स्वामी ने कहा, कि राशिद अल्वी के बयान को लेकर मैने मुलायम से फोन पर बात की है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि वह अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, कि उन्होंने मुलायम से यह भी अपील की कि वह कांग्रेस का साथ छोड़कर राष्ट्रपति चुनाव में संगमा की उम्मीदवारी का समर्थन करें।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने बुधवार को मुरादाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान मुलायम के बारे में बयान दिया था। बयान में उन्होंने कहा था कि मुलायम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सबसे बड़े एजेंट हैं। वैसे दिल्ली पहुंचने के बाद अल्वी ने अपना बयान वापस ले लिया।

मंत्रालय की आग पर रहस्य बरकारा


मंत्रालय की आग पर रहस्य बरकारा

(दीपक अग्रवाल)

मुंबई (साई)। दक्षिण मुंबई में स्थित महाराष्ट्र सरकार के मुख्यालय-मंत्रालय की चार मंजिलों में कल भीषण आग लगने से दो लोगों की मृत्यु हो गई और सोलह जख्मी हो गए। पुलिस नियंत्रण कक्ष के अनुसार मंत्रालय की छठी मंजिल से दो व्यक्तियों के पूरी तरह जले हुए शव बरामद किए गए। इन दोनों मृतकों की पहचान उमेश कोटेकर और महेश घुगले के रूप में हुई है। दोनों बारामती के हैं।
कहा जा रहा है कि आग पर काबू पा लिया गया है, लेकिन अग्निशमन अधिकारियों ने बताया कि अभी यह कार्रवाई दो दिन और चलेगी। इस बीच मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इस घटना की जांच अपराध शाखा से कराने के आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा कि हम सीधे यूं ही किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। सच्चाई का पता करने के लिए अपराध शाखा को जांच के आदेश दे दिये गये हैं।
उन्होंने कहा कि मंत्रालय में आज कामकाज होगा। राज्य के मंत्री वैकल्पिक कार्यालयों में काम करेंगे। हालांकि आगंतुकों को प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। हमारी संवाददाता के अनुसार आग पर काबू पाने के लिए २१ दमकल गाड़ियों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। राहत सहायता के लिए नौसेना के हेलिकॉप्टरों और आतंकवाद विरोधी इकाई-फोर्स-वन की भी मदद ली गई।
पुलिस के मुताबिक इमारत की छठी मंजिल पर दो लोगों के जले हुए शव बरामद हुए तथा मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान के केबिन के बाहर तैनात दो सुरक्षाकर्मी अभी भी लापता हैं। सभी जख्मियों की हालत स्थिर बताई जा रही है, सिवाय एक के जिसकी हालत नाजुक बनी हुई है। अग्निशमन दल के अधिकारियों के मुताबिक आग को पूरी तरह काबू में लाया गया है पर कूलिंग ऑपरेशन में और दो दिन लग सकते हैं। इस भीषण आग में इमारत की सातवीं मंजिल पर बने हुए कम्युनिकेशन सेंटर जिसके जरिये राज्य के सभी जिला मुख्यालयों से संपर्क साधा जाता है, उसे भी भारी नुकसान पहुंचा है।
गुरुवार को दोपहर बाद मुंबई के मंत्रालय बिल्डिंग में लगी आग के कारणों के बारे में अभी यही जानकारी दी जा रही है कि आग शार्ट सर्किट की वजह से लगी है लेकिन क्या मंत्रालय भवन में यह आग सचमुच शार्ट सर्किट से लगी है या फिर इसे जानबूझकर लगाई गई है? सवाल इसलिए क्योंकि अगर यह आग अपने आप लगी थी तो इसे तय मानकों पर समय रहते पूरा करने में प्रशासन नाकाम क्यों रहा? आखिर क्या कारण है कि आग लगने के बाद भी मंत्रालय का सेफ्टी अलार्म नहीं बजा और बिना अलार्म के ही करीब पांच हजार लोगों को तो बाहर निकाल लिया गया?
महाराष्ट्र सरकार के सचिवालय मंत्रालय के चौथे मंजिल पर लगी आग पर अब ऐसी ही आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं। सरकारी तौर पर यह बताया जा रहा है आग शार्ट सर्किट होने की वजह से लगी। मुंबई में भले ही इन दिनों बारिश नहीं हो रही है लेकिन बुधवार को पिछले एक साल का सबसे कम तापमान रिकार्ड किया गया था। गुरूवार को भी कमोबेश तापमान 31 डिग्री सेल्सियस के आस पास बना रहा था। अगर मुंबई में गर्मी नियंत्रित है, मंत्रालय की अति सुरक्षित बिल्डिंग है तो फिर शार्ट सर्किट होने का सवाल ही कहां उठता है? अगर हम मान भी लें कि शार्ट सर्किट हुआ तो फिर तीन मिनट के अंदर फायर अलार्म क्यों नहीं बजा?
आग लगने के बाद भी आग पर तत्काल काबू पाने के प्रयास नहीं किये गये। मानों आग को बढ़ने देने की कोई सोची समझी साजिश को अंजाम दिया जा रहा था। प्रशासन की ओर से तत्काल आग पर काबू पाने की कोशिश न करने के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पानी की व्यवस्था नहीं थी जबकि जानकार बताते हैं कि मंत्रालय में इतनी पक्की व्यवस्था रहती है कि छोटे मोटे हादसों पर तत्काल अपने स्तर पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन मंत्रालय में लगी आग को मानों बढ़ने दिया गया जो देर शाम तक जल रही थी।
इस आग में चौथा, पांचवां और छठा, और सातवीं मंजिल आग के हवाले हो गई। इन सभी मंजिलों पर महत्वपूर्ण मंत्रालयतों के दफ्तर हैं और संबंधित मंत्री और बड़े अधिकारी इन्हीं मंत्रालयों में बैठते हैं। चौथी मंजिल पर शहरी विकास विभाग है। इसी विभाग के पास आदर्श की फाइलें भी थीं। और मुंबई के समृद्ध रियल एस्टेट से जुड़ी सभी नोटिंग लगी महत्वपूर्ण फाइलें भी इसी विभाग में थी। अब आग में सबकुछ स्वाहा हो गया। आश्चर्य तो तब और बढ़ जाता है जब सातवीं मंजिल पर बना आपदा नियंत्रण का दफ्तर भी इस आग के हवाले हो जाता है और अपने आपको बचा नहीं पाता है।
इस बाबत पूछे जाने पर शिवसेना के मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल का कहना है कि तीन साल पहले डीबी रियलिटी को मंत्रालय की मरम्मत और देखरेख का काम देने का प्रस्ताव लेकर कांग्रेसी सरकार सामने आई थी। उस वक्त छगन भुजबल के विरोध के कारण डीबी रियलिटी को मंत्रालय सौंपने से मना कर दिया गया था। लेकिन अब पुननिर्माण के नाम पर हो सकता है डीबी रियलिटी को यह काम सौंप दिया जाए।वे सवाल करते हैं कि आग लगी हो या फिर लगाई गई हो लेकिन ऐसा लगता है कि इसे जानबूझकर बढ़ने दिया गया जो किसी साजिश की ओर संकेत करता है।

राम रोटी और राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति


राम रोटी और राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति

(संजय तिवारी)

जो रोज बदले वही राजनीति। कम से कम राष्ट्रपति चुनाव में इस बार सच सामने आ रहा है। विकेन्द्रित लोकतंत्र के अतिकेन्द्रित स्वार्थी दलों के दो समूहों, यूपीए और एनडीए के छापामार दल अपनी अपनी गोटियां बिछाकर दांव चल रहे हैं। अगर यूपीए से दूर जाकर ममता बनर्जी अपना उम्मीदवार खोज लाती हैं तो यूपीए के उम्मीदवार को एनडीए के दो क्षेत्रीय क्षत्रप समर्थन का ऐलान कर देते हैं। खुद राम की पार्टी भी ज्यादा देर तक दोराहे पर खड़ी नहीं रह सकती थी इसलिए कलाम के मना कर देने के बाद संगमा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया तो एनडीए अध्यक्ष शरद यादव ने अपने जनता दल की ओर से भरे मन से ही सही प्रणव मुखर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन देने की तैयारी बता दी।
भरे मन से इसलिए क्योंकि कल तक एनडीए की बैठकों में शरद यादव अटल बिहारी वाजपेयी बने हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि या तो भाजपा प्रणव के नाम पर मान जाएगी नहीं तो फिर नीतिश कुमार तो एनडीए उम्मीदवार को अपना समर्थन दे देंगे। दोनों बातें नहीं हुई। भाजपा प्रणव मुखर्जी के नाम पर तैयार इसलिए नहीं हुई क्योंकि उसे एनडीए में एक और संभावित आगंतुक आता हुआ दिखाई दे रहा है। वह तमिलनाडु से जयललिता हैं। जयललिता और नवीन पटनायक से मिलने के बाद ही पूर्णाे संगमा ने राष्ट्रपति उम्मीदावरी की दावेदारी की थी। ये दोनों ही पहले एनडीए में शामिल रह चुके हैं इसलिए भाजपा के लिए राष्ट्रपति चुनाव के जरिए आम चुनाव की राजनीति ठीक करने का यह एक बेहतर मौका था। उसने वह करने की कोशिश भी की।
लेकिन फिर क्या कारण था कि नीतिश कुमार नाराज हो गये? नीतीश कुमार के ऊपर कांग्रेस के काफी ऋण हैं। खासकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के। नीतीश कुमार की दूसरी बंपर जीत और कांग्रेस की सुपर बंपर हार के पीछे ईवीएम की गड़बड़ियों का आरोप तो लालू कब का लगा चुके हैं। उस वक्त जब बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब कांग्रेस लालू को सबक सिखाने के अभियान पर थी। लालू ने सबक सीख भी लिया और आफ द रिकार्ड भले ही मैडम सोनिया गांधी को कोसते हों आन द रिकार्ड वे सोनिया की तारीफ करते नहीं थकते हैं। शायद यही कारण है कि प्रणव मुखर्जी की उम्मीदवारी का ऐलान होने के बाद प्रधानमंत्री ने एनडीए के एक घटक दल के मुख्यमंत्री से सीधे बात की वह नीतिश कुमार थे। दोनों में क्या बात हुई यह तो वे ही दोनों जानें लेकिन प्रधानमंत्री के इस फोन के बाद कम से कम जदयू का प्रणव के साथ जाना तय हो गया था। वैसे भी सेकुलरिज्म की साफ राजनीति करनेवाले समाजवादी नीतिश के लिए भाजपा का भगवा रंग बोझ बन गया है। कम से कम आगामी लोकसभा चुनाव वे बिहार में अकेले अपने दम पर लड़ना चाहते हैं इसलिए अभी से किनाराकशी उनके लिए वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए फायदे का सौदा है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में अकेले मैदान में उतरकर भाजपा ने जदयू को औकात बता दी थी, अब मौका मिलने पर जदयू भाजपा को भला क्यों छोड़ देती?
लेकिन नीतीश के इस फायदे के सौदे से शरद यादव के लिए और बड़ा संकट पैदा हो जाता है। शरद यादव न केवल नीतीश की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं बल्कि एनडीए के अटल बिहारी भी हैं। नीतीश से उनका रिश्ता कभी मधुर नहीं रहा है। अब तो और भी नहीं जब दिल्ली और बिहार दोनों जगह एक ही बैनर तले एक ही राजनीतिक दल दो दो अलग अलग धड़ों में काम करता है। बिहार की जमीनी हकीकत से शरद को ज्यादा फायदा नुकसान नहीं है। उनको फायदा और नुकसान दिल्ली दरबार के अंकगणित से है। शायद इसीलिए अपने छोटी सी प्रेस कांफ्रेस में लंबे समय तक एनडीए का एका बनाये रखने की वकालत करने के बाद पी ए संगमा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। शरद की मजबूरियां साफ दिखती हैं। एनडीए का एका इसलिए क्योंकि इससे उनका दिल्ली का कद तय होता है लेकिन बिहार का आका इसलिए क्योंकि बिहार से उनको वह जमीन मिलती है जिस पर खड़े होकर वे दिल्ली दरबार में दस्तक देते हैं। इसलिए तारीफ भले ही उन्होंने एनडीए की की लेकिन समर्थन प्रणव बाबू को ही देने का ऐलान किया। आका की अकड़ का सवाल था।
इस सबके बीच जयललिता और मोदी की जुगलजोड़ी ने भी कमाल किया। अगर भाजपा ने संगमा को कमजोर तर्कों के साथ समर्थन देने का ऐलान किया है तो इसके पीछे की सच्चाई यह है कि संगमा को समर्थन देकर भाजपा मोदी की बात मान रही है और मोदी जयललिता की बात मान रहे हैं। भाजपा भी जानती है कि संगमा हारने के लिए मैदान में उतर रहे हैं। सुषमा स्वराज ने जिस तरह से प्रेस कांफ्रेस में लोकतंत्र में चुनाव की दुहाई दी वह उनकी हताशा भी बताती है और कमजोरी भी दिखाती है। लेकिन मानों पूरी पार्टी मोदी के आगे नतमस्तक है। क्योंकि इस बीच आडवाणी और अम्मा की भी मुलाकात हो चुकी है इसलिए संगमा को समर्थन देकर अम्मा को खुश करने का मौका बीजेपी अपने हाथ से भला क्योंकर जाने देगी?
संगमा और बीजेपी के इस संगम में जयललिता और नवीन पटनायक तो सध गये लेकिन गफलत में शिवसेना दूर हो गई। गफलत इस लिहाज से कि शिवसेना को लगता था कि हर बार बीजेपी उनसे अपनी बात मनवाती है लेकिन इस बार हो सकता है वह शिवसेना की सलाह मान ले। इसलिए बाल ठाकरे ने सामना में खुली सलाह दी कि प्रणव के बारे में सोचना चाहिए। भाजपा सोच भी लेती अगर जया अम्मा आड़े नहीं आती। जब तक स्थिति स्पष्ट होती शिवसेना के समर्थन का डंका बजाया जा चुका था। अब मुश्किल है कि बीजेपी की अपील के बीद शिवेसना पुनर्विचार करे। अगर वह करती है तो कम से कम एनडीए को थोड़ी राहत जरूर मिल जाएगी। लेकिन बीजेपी और शिवसेना का रिश्ता भी नीतिश और शरद वाला ही है। बीजेपी को लगता है वह राष्ट्रीय दल है और असली वाला हिन्दुत्व उसी के पास है। उसका मातृ संगठन भी उसी महाराष्ट्र से आता है जहां से शिवेसना आती है। इसलिए वह शिवसेना को छोटा भाई कहने के बाद भी कसाई जैसा ही व्यवहार करती है। यह बात शिवसेना को अक्सर चुभती है लेकिन राज्य में फिलहाल शिवसेना के पास ऐसा दूसरा कोई विकल्प नहीं है कि भाजपा का संग साथ छोड़कर कहीं और आशियाना लगा लिया जाए। प्रणव बाबू के फोन से बालासाहेब आह्लादित तो हुए लेकिन इस आह्लाद में भूल गये कि अगले दिन राजनीति ने करवट ली तब क्या करेंगे?
एनडीए की तरह यूपीए भी अपने अपने हिसाब से गणित जोड़ रही है। वाममोर्चा ने संकेत दिया है कि वह प्रणव मुखर्जी को समर्थन दे सकता है। अगर वाममोर्चा प्रणव बाबू के पास जाता है तो तय है कि ममता बनर्जी भी संगमा के साथ खड़ी हो जाएंगी। हालांकि इसके बाद भी संगमा के जीतने का कोई चांस नहीं बनता है लेकिन उनकी उम्मीदवारी से इतना जरूर हो गया है कि राम और रोटी की राजनीति करनेवाले करीब करीब सभी राजनीतिक दल नये सिरे से समीकरण बनाने में जुट गये हैं। जो लोग कह रहे थे कि यह प्रधानमंत्री का नहीं राष्ट्रपति का चुनाव है, एक बार फिर सोच लें कि क्या वे सही कह रहे थे?
(लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक हैं)

कृषक हितैषी योजनाओं का लाभ उठाकर प्रगति करे किसान - टेकाम


कृषक हितैषी योजनाओं का लाभ उठाकर प्रगति करे किसान - टेकाम 

घंसौर क्षेत्र में एक ग्रिड गोदाम का लोकार्पण व दो का शिलान्यास किया गया 

(एम.एम.त्रिवेदी)

सिवनी (साई)। मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया श्री शिवराज सिंह चौहान कृषक हितैषी मुख्यमंत्री होने के साथ ही पूरे विश्व में किसानों को बेहतर सुविधायें देकर कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने की दिशा में निरन्तर कार्य कर रहे है पूरे विश्व में मध्य प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहा किसानों को कृषि ऋण ० प्रतिशत पर संवेदनशील मुख्यमंत्री देने की घोषणा कर चुके है यहा यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के शासनकाल में इसी प्रदेश में किसानों को १४ प्रतिशत ब्याज देकर ऋण लेना पड़ता था. शिवराज सिंह चोहान ने मुख्यमंत्री बनते ही कृषि ऋण ७ प्रतिशत फिर ५ प्रतिशत,फिर ३ प्रतिशत और १ प्रतिशत करने के पश्चात अब ० प्रतिशत तक किसानों को कृषि ऋण उपलब्ध कराने की ऐतिहासिक घोषणा की है इसके साथ ही कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिये अनेक कृषक हितैषी योजनायें संचालित कर किसानों के चेहरे पर खुशियां ला दी है इस प्रकार के उदग़ार जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष श्री अशोक टेकाम द्वारा आदिवासी क्षेत्र घंसौर के ग्राम सारसडोल एवं पद़्दीकोना में ग्रिड गोदामों का भूमि पूजन एवं ग्राम भिलाई में ग्रिड गोदाम का लोकार्पण एवं आयोजित किसान सम्मेलन को सम्बोधित करते हुये व्यक्त किये है. अशोक टेकाम कार्यक्रम के मुख्यअतिथि थे जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता आदिजाति सेवा सहकारी समिति के स्थानीय अध्यक्षों द्वारा की गयी.कार्यक्रम में जिला पंचायत सदस्य श्री रविन्द्र परते विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे. इस अवसर पर क्षेत्रीय कृषक, कृषक प्रतिनिधी ग्रामों के सरपंच,पंचगण एवं अनेक क्षेत्रीय नेता उपस्थित रहे है. कार्यक्रम में घंसौर मंडल की अध्यक्ष श्रीमती विजय लक्ष्मी नागोत्रा, धनौरा जनपद के सदस्य श्री नवल श्रीवास्तव, विधायक प्रतिनिधी सुभाष पटेल, भाजपा नेता सुभाष यादव , रामलाल यादव एवं केदारपुर मंडल के अध्यक्ष एवं सहकारी भारती के जिला अध्यक्ष अजय डागोरिया, बरघाट मंडल के अध्यक्ष श्रीमती किरण वाहने, विधायक प्रतिनिधी राजा पटेल, प्रेम लाल बलरे, संजय सिसोदिया सहित अनेक नेता एवं जिला सहकारी बैंक के प्रबंधक , आदिमजाति सेवा सहकारी समितियों के अध्यक्ष एवं संचालकगण उपस्थित रहे. कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुये जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष ने कहा कि आज किसानों के लिये प्रसन्नता की बात है कि मध्य प्रदेश सरकार उनकी उपज समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिये दृढ संकल्पित है इस वर्ष १९ लाख क्विटंल से अधिक समर्थन मूल्य पर रिकार्ड खरीदी जिले में की गयी है और इसका भंडारण भी व्यवस्थित रूप से कर लिया गया है. किसानों को खाद-बीज की समस्या न हो इस बात को ध्यान में रखते हुये कृषि कार्य प्रारंभ होने के पूर्व ही अग्रिम रूप से खाद वितरण का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है और जिले भर में खाद भण्डारण के लियें सहकारी समितियों के माध्यम से व्यवस्था की गयी है. उपभोक्ता सामग्री के भण्डारण के लिये एवं सहकारी समितियों को लाभ की श्रेणी में लाने के लिये जिला सहकारी बैंक सिवनी द्वारा हर जगह गोदाम निर्माण के लिये प्रयास किये जा रहे है. आदिवासी बाहुल्य वाले घंसौर क्षेत्र के सारसडोल, पद्दीकोना में ग्रिड गोदाम निर्माण का शिलान्यास और भिलाई में ग्रिड गोदाम का लोकार्पण का कार्य आज किया जा रहा है. गरीब आदिवासियों तक सहकारी समितियों के माध्यम से पंहुचायें जाने वाला लाभ समय पर उन्हें प्राप्त हो इसके लिये सरकार ने विशेष चिन्ता की है. श्री टेकाम ने कहा कि कृषि कार्य के लिये सरकार बिना ब्याज का किसानों को ऋण प्रदान कर रही है ऐसी स्थिती में किसानों को चाहियें कि अपने पुराने ऋणों को जिन पर १४ प्रतिशत ब्याज लग रहा है उन्हें तत्काल पटायें और सरकार की बिना ब्याज वाली ऋण योजना का लाभ प्राप्त करे. इसके साथ ही किसानों को कृषि ऋण , कृषि उपकरणों के लिये भी प्रदान किये जाते है उन पर सरकार का विशेष अनुदान होता है कृषक हर शासकीय कल्याणकारी योजना का लाभ लेकर कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाते हुये मध्य प्रदेश को खुशहाल मध्य प्रदेश बनाने की दिशा में पूरी लगने से जुट जायें . मध्य प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री उनके साथ है. स्वर्णिम मध्यप्रदेश का निर्माण कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने से ही संभव है जहां सरकार किसानों के हित में निरन्तर प्रयास कर रही है किसानों को भी दो कदम आगे चलकर सरकार के कंधे से कंधा मिलाकर चलने की आवश्यकता है. श्री टेकाम ने इस अवसर पर क्षेत्रीय जनों की समस्याए भी सुनी और सहकारिता से संबंधित समस्याओं को मौके पर निराकरण करते हुये कहा कि क्षेत्र की सहकारी समितियों को घाटे से उबारने के लिये हर संभव प्रयास किये गये है आगामी समय में आई.ए.पी योजना से १ हजार मैट्रिक टन के गोदामों को निर्माण किया जायेगा. उन्होंने ग्राम झिगंरयी में सहित दो लैम्स समिति नयी स्थापित करने की मांग को भी शीघ्र पूर्ण करने की बात कही है साथ ही उन्होंने सहकारी समितियों के कर्मचारियों को निर्देशित करते हुये कहा कि किसानों को सुविधाजनक ढग़ से खाद बीज की उपलब्धता कराते हुये उपभोक्ताओं को उपभोक्ता सामग्री भी ईमानदारी से वितरित की जायें उन्होंने कहा कि जनता की किसी भी शिकायत पर कर्मचारियों के विरूघ्द कडी कार्यवाही की जायेगी. कार्यक्रम का संचालन संजय सिसोदिया द्वारा किया गया . जिला पंचायत सदस्य रविन्द्र परते एवं स्थानीय अध्यक्षों द्वारा भी कार्यक्रम को सम्बोधित किया गया. ग्रिड गोदाम एवं सहकारी समितियों के बेहतर प्रबंधन पर जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष अशोक टेकाम की प्रशंसा की गयी.

नेहरू गांधी परिवार के सपनों पर पानी फेरती कांग्रेस!

नेहरू गांधी परिवार के सपनों पर पानी फेरती कांग्रेस!

सांप छछूंदर की स्थिति हो गई कांग्रेस की!

पत्ते खुलने के बाद कांग्रेस में उहापोह बरकरार

नेहरू गांधी परिवार का लगाव रहा है लखनादौन से

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। मध्य प्रदेश में एक के बाद एक मोर्चों पर पराजय झेलने के बाद महाकौशल अंचल के लखनादौन नगर पंचायत के चुनावों में कांग्रेस की स्थिति बहुत ही दयनीय स्तर पर पहुंच चुकी है। अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी द्वारा नाम वापस लिए जाने के बाद अब कांग्रेस इस स्थिति में नहीं रह गई है कि वह किसी को खुलकर समर्थन दे।
वहीं दूसरी ओर केंद्र में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटक दल राकांपा ने अल्पसंख्यक प्रत्याशी नूर बी को समर्थन देकर कांग्रेस को मजबूर कर दिया है कि वह निर्दलीय सुधा राय से ध्यान हटाए। गौरतलब है कि लखनादौन का नेहरू गांधी परिवार से खासा रिश्ता रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी भी लखनादौन आ चुके हैं।
लखनादौन की जनता ने सदा ही कांग्रेस का साथ दिया है। राम लहर में भी आदिवासी बाहुल्य लखनादौन विधानसभा की जनता ने यहां कांग्रेस का परचम लहराया था। यह वही विधानसभा है जहां जनता पार्टी की लहर के बाद भी पंडित गार्गीशंकर मिश्र को 24 हजार मतों की बढ़त मिली थी। यह वही विधानसभा है जहां आजादी के बाद पचास सालों से ज्यादा आदिवासियों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है।
पिछले लगभग एक दशक से जिले में कांग्रेस की सत्ता के परितर्वन के कारण अब प्रवर्तकों की रीति नीति के चलते आदिवासियों का कांग्रेस से मोहभंग होता दिखने लगा है। नेहरू गांधी परिवार ने सदा ही लखनादौन के साथ न्याय किया है। कहा जा रहा है कि वर्तमान में कांग्रेस के निजाम नेहरू गांधी परिवार के सपनों पर ही पानी फेर रही है।
एक ओर कांग्रेस द्वारा आदिवासियों को एक बार फिर मुख्यधारा में लाने का जतन किया जा रहा है वहीं कांग्रेस के नुमाईंदों द्वारा आदिवासी बाहुल्य विकासखण्ड के मुख्यालय में होने वाले नगर पंचायत चुनावों में घिनौनी राजनीति कर कांग्रेस का गला घोंटने का प्रयास किया जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार लखनादौन नगर पंचायत के अध्यक्ष पद के लिए नाम वापस लेने के अंतिम दिन जब जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बी फार्म लेकर रिटर्निंग आफीसर के पास पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वे जिसका फार्म लाए हैं वह तो रणछोडदास होकर मैदान से पलायन कर गईं हैं।
क्षेत्र में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार लखनादौन नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय निर्दलीय थे और समाचार पत्रों में उनके हवाले से ही विज्ञप्ति का प्रकाशन हुआ था कि उन्होंने लखनादौन की नब्ज टटोली और फिर उनकी माता जी श्रीमति सुधा राय मैदान में उतरीं। उसी समय से श्रीमति सुधा राय की जीत के दावे जोर शोर से किए जाने लगे थे। इसी समय आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं कि कांग्रेस और भाजपा भी पिछली बार की तरह इस बार भी मौन साध लेंगीं।
भाजपा द्वारा तो अपने प्रत्याशी को दम खम के साथ मैदान में उतारा गया है किन्तु कांग्रेस के प्रत्याशी ने नाम वापस लेकर उन आशंकाओं को पंख लगा दिए जिसमें कांग्रेस का उंट सुधा राय के पक्ष में बैठने की बात कही जा रही थी। इसके उपरांत जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया से मीडिया ने प्रश्न किए तो उन्होंने भी सुधा राय के पक्ष में ही कांग्रेस के समर्थन की ना केवल घोषणा जल्द ही करने की बात कही गई वरन् सुधा राय को कांग्रेस का डमी प्रत्याशी भी बताया गया था।
नाम वापसी के चार दिनों के बाद भी ना तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी और ना ही जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा किसी को अपना समर्थन देने की घोषणा की गई है। मजे की बात तो यह है कि कांग्रेस को घुटनों पर खड़ा कर देने वाली कांग्रेस की उस प्रत्याशी जिसने अंतिम दिन अपना नाम वापस लिया है के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का कांग्रेस साहस भी नहीं जुटा पा रही है।
इसी बीच नाम वापसी के तीन दिन बाद केंद्र की कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के घटक दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी द्वारा निर्दलीय अल्पसंख्यक नूर बी को अपना समर्थन देने की घोषणा कर कांग्रेस को आईना दिखा दिया है। राकांपा की जिला इकाई द्वारा नूर बी को अपना पूरा समर्थन दिया जा चुका है।
इन परिस्थितियों में कांग्रेस की स्थिति सांप छछूंदर की सी हो गई है। कांग्रेस अगर शांत बैठती है तो उसकी बुरी तरह भद्द पिटना स्वाभाविक ही है। वहीं दूसरी ओर अगर कांग्रेस द्वारा श्रीमति सुधा राय को समर्थन दिया जाता है तो कांग्रेस के अंदर बगावत तय मानी जा रही है। इसका कारण यह है कि सुधा राय के पुत्र दिनेश राय ने लखनादौन नगर पंचायत के अध्यक्ष रहते हुए सिवनी विधानसभा से 2008 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। कहा जाता है कि दिनेश राय के कारण ही कांग्रेस के प्रत्याशी प्रसन्न चंद मालू की जमानत जप्त हुई थी। सिवनी में कांग्रेस के इतिहास में जमानत जप्त होने का यह पहला ही मामला था।
इसके साथ ही साथ यह चर्चा भी चल पड़ी है कि अगर कांग्रेस द्वारा नूर बी को समर्थन नहीं दिया जाता है तो माना जाएगा कि कांग्रेस में अल्प संख्यकों का कोई स्थान नहीं है। जिला कांग्रेस कमेटी में अल्प संख्यकों को वैसे भी खास तवज्जो नहीं देने के आरोप जब तब लगते आए हैं। इन परिस्थितियों में संदेश कांग्रेस के पक्ष में कतई नहीं जाएगा, साथ ही साथ प्रदेश में अल्पसंख्यकों का कांग्रेस से मोहभंग होने की संभावनाएं भी बलवती ही हैं।
वहीं यह भी कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यकों को प्रसन्न करने की गरज से अगर कांग्रेस ने दिखावे के लिए ही सही नूर बी को समर्थन दिया और उनकी स्थिति सम्मानजनक नहीं रहती है और परिणाम सुधा राय के पक्ष में आते हैं तब भी अल्पसंख्यक इसे कांग्रेस का उनके साथ धोखा ही मानेंगे।
सारे समीकरणों के हिसाब से बनी परिस्थितियां इस ओर इशारा कर रही हैं कि कांग्रेस की मजबूरी अब नूर बी को समर्थन देकर उन्हें विजयश्री का वरण कराने की बन चुकी हैं। वहीं लखनादौन की वर्तमान हालात तो स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। मतदाता अभी खामोश है, वह कांग्रेस और भाजपा की निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ हो रही नूरा कुश्ती और सौदेबाजी को चुपचाप देख रहा है।
इस चुनाव से मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का भविष्य भी तय हो सकता है। 2003 के उपरांत लगातार दो बार सत्ता से बाहर रहने वाली कांग्रेस उपचुनावों में भी भाजपा के हाथों बुरी तरह परास्त हो चुकी है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूटता ही दिख रहा है। प्रदेश स्तर पर नेताओं की आपसी खींचतान के कारण कांग्रेस रसातल में समाती जा रही है, फिर भी राहुल गांधी को उम्मीद है कि कांग्रेस कुछ करिश्मा कर दिखाएगी, जो दिवास्वप्न ही साबित होता दिख रहा है।