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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

लोकतंत्र यहां पर जिंदा है? पर हम शर्मिंदा हैं


लोकतंत्र यहां पर जिंदा है? पर हम शर्मिंदा हैं

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य की स्थापना जिन उद्देश्यों के मद्देनजर की गई थी, भारत गणराज्य में प्रजातंत्र को जिस रूप में परिभाषित किया गया था वह आज के समय में प्रासंगिक नहीं रह गया है। आज भारत गणराज्य की स्थिति देखकर लग रहा है, मानो प्रजातंत्र का अर्थ हिटलरशाही हो गया है। आज का युवा जिसे आजादी कैसे मिली, आजादी के उपरांत भारत ने किस तरह अपने आप को संभाला और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा पता नहीं है, उसे अचानक इस बात का भान होने लगता है कि जब वह अपने हक की बात करता है तो निर्लज्ज शासक उसे लाठियों से पीट देते हैं। दिल्ली के इंडिया गेट की जो तस्वीरें सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स से सार्वजनिक हुई हैं उनसे साफ होता है कि देश की पुलिस को ब्रितानी गोरों की पुलिस समझकर देश की बेटियां झांसी की रानीके मानिंद लोहा ले रही थीं। आज समूची दुनिया के सामने भारत सरकार और खाकी वर्दी की जो छवि प्रस्तुत हुई है उससे समूचा भारत गणराज्य कह रहा है -लोकतंत्र यहां पर जिंदा है, पर हम शर्मिंदा हैं।

अस्सी की उम्र में पहुंचने वाले लोगों को इस बात का भान होगा कि गुलाम भारत में किस तरह जीवन यापन किया जाता था। घर के बुजुर्ग बताते हैं कि घोड़ों और साईकल पर सवार होकर गोरे ब्रितानी आते और लगान वसूला करते थे। उस समय अगर किसी के द्वारा शिकायत की जाती कि पानी नहीं मिल पा रहा है तब ब्रितानी चिल्ला कर कहते -‘‘पानी की जवाबडारी हमारी नहीं है, पानी का इटजाम खुद करो।इसी तरह अब सुरक्षा की बात जब आ रही है तो कमोबेश उसी तर्ज पर देश की हुकूमतें परोक्ष तौर पर कह रहीं हैं कि सुरक्षा की व्यवस्था खुद करो। महिलाएं अपनी अस्मत की रक्षा खुद करें बस सरकार का काम भाषणों में महिलाओं की सुरक्षा, बेटी बचाओ, महिलाओं को बराबरी का दर्जा जैसी बातों को शामिल करना रह गया है।
कितने आश्चर्य की बात है कि देश में बलात्कार जैसे संगीन अपराध में न्याय पाने के लिए हजारों युवाओं के द्वारा विजय चौक और इंडिया गेट जाकर गगनभेदी नारे लगाए जाते हैं। पर संसद, नार्थ और साउथ ब्लाक की पत्थरों की दीवारों एवं रायसीना हिल्स स्थित महामहिम राष्ट्रपति के लोहे के दरवाजों से टकराकर वह लौट जाती है। दिल्ली का विजय चौक इतिहास में बड़े बड़े आंदोलनों का साक्षी रहा है, वहीं अब देश के नौनिहालों को लाठियों से इस कदर पीटा जाता है मानो कपड़े धोए जा रहे हों। हाड गलाने वाली ठण्ड में निरीह, निर्लज्ज, नपुंसक सरकार द्वारा ना केवल लाठियां भांजी जाती हैं, वरन् उन पर ठण्डे पानी की बौछार फेंकी जाती है। षणयंत्र पूर्वक उनके आंदोलन को कुचल दिया जाता है।
देश की बेटियां जिस तरह से पुलिस का मुकाबला कर रहीं हैं, उनके उस जज्बे पर समूचा देश उन्हें तहे दिल से सलाम कर रहा है। जैसे ही सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स यानी सोशल मीडिया के माध्यम से इंडिया गेट, विजय चौक के पुलिस बर्बरता के दृश्य सार्वजनिक हुए वैसे ही देश में एक तरह से सरकार और विपक्ष में बैठे जनता के नुमाईंदों के प्रति नाराजगी का संचार होना आरंभ हुआ। विपक्ष में बैठे एक दो नेताओं ने भी बस अपनी बात कहकर रस्म अदायगी कर ली। देश की बेटियों ने झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की भूमिका में अपने आप को लाया तो निर्ल्लज नपुंसक पुलिस ने गोरे ब्रितानियों के अत्याचारों को भी शर्मसार कर दिया।
देश के युवा के मन में आक्रोश है। यह घुटन इस बात की है कि बलात्कार के मामले में सरकार का स्टेंड इतना लचीला और गैर जिम्मेदाराना कैसे है? युवा आश्चर्यचकित है कि एक महिला के साथ आवाज बुलंद करने में देश की पहली महामहिम महिला राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, जयललिता, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मायावती, उमा भारती, पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आदि को शर्म आ रही है। ये सभी अपने अपने मुंह में दही जमाकर बैठ गए हैं।
नौ दिन तक आंदोलन चलता है। हजारों युवाओं का हुजूम इंडिया गेट और विजय चौक पर आवाज देता है। हम इन युवाओं के हुजूम को सलाम करना चाहेंगे क्योंकि यह स्वप्रेरणा से किया गया आंदोलन था जिसमें राजनैतिक नेतृत्व कहीं से कहीं तक शामिल नहीं हो सका। समूचे देश ने सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स के माध्यम से देखा कि किस तरह से युवाओं ने अपने ही अधिकारों के लिए अपने ही देश की पुलिस से किस तरह जंग लड़ी। अनेक लोगों ने तो पुलिस को गोरे ब्रितानियों और युवाओं को देश भक्तों की संज्ञा दे डाली।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे घृषित और निंदनीय पहलू यह था कि यह सब होने के बाद भी राससीना हिल्स पर ही महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, देश की पहली महामहिम महिला राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, जयललिता, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मायावती, उमा भारती, पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आदि चैन की नींद सोते रहे।
राजनीति शास्त्र में लोकतंत्र या प्रजातंत्र में जनता द्वारा, जनता का, जनता के लिए शासनका ही उल्लेख मिलता है। लोकतंत्र या प्रजातंत्र तब तक ही सफल या कारगर रह सकता है जब तक इसमें जनता की मुहर लगी हो। वैसे तो लोकतंत्र में काफी समय से राजनेताओं द्वारा सेंध लगाई जा रही थी, किन्तु 2004 के उपरांत सत्ता में आई कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के शासनकाल में कांग्रेस के आलंबरदारों ने सत्ता को अपने घर की निजी परचून की दुकान समझ लिया है। मनमोहन सिंह ने गठबंधन धर्म को राष्ट्र धर्म के उपर समझकर गठबंधन के सहयोगियों और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को देश को लूटने का खुला लाईसेंस दे दिया।
सत्ता की चाभी परोक्ष तौर पर नौकरशाहों के हाथों में सौंप दी गई। इसका सीधा परिणाम 16 दिसंबर की रात गैंग रेप का शिकार होने के बाद केंद्रीय गृह सचिव का दिल्ली पुलिस की पीठ ठोंकना है। देश में नैतिकता अब बची ही नहीं है। सुशील कुमार शिंदे देश के गृह मंत्री की कुर्सी पर विद्यमान हैं। वे कहते हैं जनता की याददाश्त कमजोर होती है जनता सब कुछ भूल जाएगी। इसके बाद जब वे एक पत्रकार वार्ता करते हैं तब उनके बाजू में गृह सचिव आर.के.सिंह भी दिखाई देते हैं जो दिल्ली पुलिस की पीठ बलात्कार के बाद थपथपाते हैं। शिंदे भूल जाते हैं कि जिस आसनी पर वे बैठे हैं उस कुर्सी पर कभी लौह पुरूष वल्लभ भाई पटेल विराजमान थे।
महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, देश के मंत्री, सूबों के मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी आदि आखिर कैसे समझ सकते हैं देश की जनता की पीड़ा, देश का मिजाज। अगर उन्हें यह सब कुछ समझना है तो उन्हें निकलना ही होगा जेड़ प्लस सुरक्षा घेरे के बाहर, नेता शायद भूल जाते हैं कि जेड प्लस सुरक्षा घेरा भी उन्हें जनता के पैसों से ही मिल रहा है जिससे वे अपने आप को महफूज पा रहे हैं। यही कारण है कि आए दिन देश में बलात्कार की घटनाओं से आम आदमी सिहरा हुआ है और देश के जेड़ प्लस सुरक्षा धारियों की बेटियां पूरी तरह महफूज हैं। भरे हुए दिल से बस यही कहना चाहूंगा कि -

चले गए गोरे ब्रितानी, लगा हो गया लोकतंत्र जिंदा।
ना मचेगी लूट खसोट, ना मार सकेगा भ्रष्घ्टाचार का पर परिंदा।।
चहुं ओर मच गई लूट खसोट काम कर गया सरकारी कारिंदा।।
गैरों की कोन कहे, अपने ने ही जमकर लूटा हो गए हम शर्मिंदा।।।

- लिमटी खरे

रविवार, 23 दिसंबर 2012

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

(लिमटी खरे)

16 दिसंबर की रात एक मासूब बाला के साथ गेंग रेप हो जाता है, केंद्र और दिल्ली सरकार खामोश रहती है, केंद्रीय गृह सचिव द्वारा दिल्ली पुलिस को आउट स्टेंडिंग परफार्मेंस के लिए पीठ ठोंकी जाती है। जब गुस्सा सड़कों पर फूटता है तबभी ना तो मनमोहन सिंह, ना ही सोनिया और ना ही शीला दीक्षित का दिल पसीजता है। सर्द कंपकपाती हाड गलाने वाली सर्दी में प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पानी की बौछारें और लाठियां भांजी जाती हैं। छात्राओं के साथ इस तरह बर्ताव किया जाता है मानो वे भेड़ बकरियां हों। आम जनता के दिलो दिमाग में यह प्रश्न घुमड़ना स्वाभाविक ही है कि आखिर देश में प्रजातंत्र नाम की कोई चीज बची है अथवा देश में हिटलरशाही लागू हो चुकी है। शर्म तो उस वक्त आती है जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी अपनी ढीली पोली चाल से इस मामले में दबी आवाज में विरोध करती नजर आती हैं। एक तरफ स्कूल में गोलीबारी पर दुनिया का चौधरी बराक ओबामा रो पड़ता है, पर वहीं दूसरी ओर पत्थरदिल भारत गणराज्य के शासकों को शर्म तो दूर इस तरह इंडिया गेट पर पुलिस की हैवानगी पर रंज भी नहीं होता है।

16 दिसंबर की रात जो हुआ वह रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है पर उन्हीं लोगों की रीढ़ में जो रीढ़ वाले और संवेदनशील हैं। एक सप्ताह बाद भी इंडिया गेट, विजय चौक आदि पर पुलिस का जो बर्बर चेहरा सामने आ रहा है उससे पूरा देश दहल गया है। लोगों का गुस्सा चरम पर है। इंडिया गेट पर हुजूम को देखकर लगने लगा है कि जनता अब उकता चुकी है। जनता ने पहले बाबा रामदेव और अण्णा हजारे पर भी भरोसा जताया किन्तु बाद में जनता को समझ में आया कि आंदोलन कर ये सभी सत्ता के ताले की चाभी की ही तलाश कर रहे थे। इस बार युवा खुद सड़कों पर है। उसका नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है। ना ही कोई नेता ही इनके बीच जाने का प्रयास कर पा रहा है। अरविंद केजरीवाल जरूर धरने पर बैठे हैं पर युवा उनको भी भाव नहीं दे रहे हैं।
16 दिसंबर को यह घटना घटी वहीं 15 दिसंबर को दुनिया के चौधरी माने जाने वाले अमरीका में न्यूटाउन इलाके में एक स्कूल में फायरिंग के दौरान डेढ़ दर्जन बच्चों के मारे जाने की खबर ने अमरीका को दहला दिया था। अमरीका प्रथम नागरिक बराक ओबामा इससे बुरी तरह व्यथित नजर आया। ओबामा ने इसे नेशनल शेम करार दिया और आंखों में आंसू भर गए उनकी। उन्होंने 18 दिसंबर तक नेशनल फ्लेग को झुका देने का आदेश भी दिया।
वहीं दूसरी ओर देश सुलग रहा है। जनता विशेषकर युवा सड़कों पर है। हाड कपा देने और खून जमा देने वाली सर्दी में इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा ना केवल बुरी तरह लाठियां भांजी जा रहीं हैं वरन् उन पर कड़कड़ाती ठंड में ठंडे पानी की बौछारें की जा रही हैं। मीडिया से भी शासक नाराज हैं। मीडिया कर्मियों पर भी पुलिस का कहर टूटता है। पुलिस की इस दमनकारी हरकत से क्या माना जाए? क्या हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं?
आज आम जनता ही फैसला करे, जब विजय चौक और इंडिया गेट पर बलात्कारियों के लिए कठोर सजा के प्रावधान के लिए भीड़ गगनभेदी नारे लगा रही है तब उनकी आवाज संसद के गोलकार खंबों और प्रधानमंत्री कार्यालय के साउथ ब्लाक अन्य मंत्रालयों के नार्थ ब्लाक एवं रायसीना हिल्स स्थित महामहिम राष्ट्रपति के आवास के लोहे के दरवाजों से टकराकर लौट रही है। जनता तो इसकी टकराहट के बाद की प्रतिध्वनी सुन रही है पर सत्तानशी लोगों के कानों में जमे मैल को यह भेद नहीं पा रही है।
सरकार की बेशर्मी की हद देखिए, बलात्कार पीडिता के शरीर को लगभग चालीस मिनिट तक उसके मित्र के सामने ही नोंचा खसोटा जाता है, उसके बाद उसे फेंक दिया जाता है और जब पुलिस को इसकी सूचना मिलती है तब पुलिस पांच मिनिट बाद वहां पहुंचती है तब केंद्रीय गृह सचिव आर.के.सिंह द्वारा दिल्ली की निकम्मी पुलिस की पींठ ठोंकी जाकर कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस ने आउट स्टेंडिग परफार्मेंस दिखाया है। वहीं जले पर नमक छिड़कते हैं दिल्ली पुलिस के आयुक्त! उनका कहना है कि बलात्कार के केस अब ज्यादा इसलिए होने लगे हैं क्योंकि महिलाएं ज्यादा पढ़ लिख गईं हैं! आखिर कमिश्नर के कहने का तात्पर्य क्या है?
केंद्र सरकार का दोयम दर्जे का चेहरा देखना है तो देखिए, एक तरफ स्त्रियों को बराबरी का हक देने की वकालत की जाती है, पर जब महिलाओं के साथ अन्याय होता है और उनके हक के लिए युवा सामने आते हैं तो बालकों को छोड़िए, बालाओं को भी पुलिस द्वारा इस कदर पीटा जाता है मानो वे केटल क्लासके हों। आखिर इन युवाओं का दोष क्या है? ये सिर्फ बलात्कार जैसे अपराध को संज्ञेय और जघन्य अपराध की श्रेणी में लाने की ही मांग तो कर रहे हैं।
मीडिया पर भी सरकार का नजला टूटा है। मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू की तर्ज पर जब सरकार की गलत नीतियों पर सरकार के खिलाफ मीडिया द्वारा माहौल बनाया जाता है तो सरकारें नाराज हो जाती हैं। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र में सभी को बोलने की आजादी है। कांग्रेस के बेपरवाह, सत्ता के मद में डूबे नुमाईंदों की आंख खोलने के लिए एक उदहारण का जिकर यहां लाजिमी होगा। पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने ही उनके दमाद और गांधी उपनाम देने वाले फिरोज गांधी ने तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी.कृष्णामचारी पर एक उद्योगपति के माध्यम से सार्वजनिक तौर पर डाका डालकर धन संग्रह का आरोप मढ़ दिया था। कहने का तात्पर्य महज इतना है कि क्या केंद्रीय गृह सचिव ने दिल्ली पुलिस आयुक्त की पीठ ठोंकने के साथ ही साथ उनसे यह पूछने की जहमत उठाई है कि आखिर सफेद रंग वाली इस तरह की बस किस परमिट पर चल रही हैं जो दस से बीस पच्चीस रूपए लेेकर सवारियां बिठा रही हैं?
अण्णा हजारे, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल अपने पीछे जुटती भीड़ को देखकर फूल कर कुप्पा अवश्य होते होंगे, पर उन्हें भी इस बात को समझना चाहिए कि देश में भीड़तंत्र है ना कि भेड़ तंत्र। भेड़ों के बारे में बता दें कि भेड़ समूह में आगे चलने वाली भेड़ का ही अनुसरण समूह की सारी भेड़ें करती हैं। अगर लोगों को लग रहा है कि भेड़ के मानिंद लोगों को कदमताल करवा लेंगे तो वे अपना भ्रम तोड़ लें। जो भीड़ अण्णा, बाबा या केजरीवाल के साथ थी वस्तुतः वह व्यवस्था से दुखी लोगों की भीड़ थी।
पिछले तीन दिनों से विजय चौक और इंडिया गेट पर देश की बेटियों द्वारा पुलिस के साथ हुज्जत, पुलिस की लाठी के सामने ना झुकना, कड़कड़ाती ठण्ड में ठण्डे पानी की मार सहन करते हुए देखकर हमें निश्चित तौर पर देश की बेटियों पर गर्व हो रहा है। हमारा सीना निश्चित तौर पर फूलकर दुगना हो गया है। अब लगने लगा है कि देश की बेटियां किसी के रहमो करम पर नहीं हैं। बेटियां अपने हक के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार दिख रही हैं।
सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स पूरे शबाब पर हैं। लोग सरकार के खिलाफ अपने गुस्से का जमकर इजहार कर रहे हैं। स्थिति देखकर वाकई लगने लगा है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है। इस देश में जहां लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाएं पैदा हुईं हों वहां महिलाओं को अपने हक के लिए सड़कों पर डंडे खाने पड़ रहे हैं। सरकार बेटी बचाओ का संदेश देती है पर जब बेटी पर बन आती है और वह अपने हक के लिए आगे आती है तो वही सरकार उसके साथ दमनकारी तरीका अपनाती है। एक महिला के साथ आवाज बुलंद करने में देश की पहली महामहिम महिला राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, जयललिता, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मायावती, उमा भारती, पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आदि को शर्म आ रही है। अगर वाकई एसा है तो शर्म है इनके महिला होने पर। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है और मनमोहन सिंह किसी की कठपुतली बनकर हिटलर की भूमिका में आ चुके हैं। (साई फीचर्स)

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

(लिमटी खरे)

16 दिसंबर की रात एक मासूब बाला के साथ गेंग रेप हो जाता है, केंद्र और दिल्ली सरकार खामोश रहती है, केंद्रीय गृह सचिव द्वारा दिल्ली पुलिस को आउट स्टेंडिंग परफार्मेंस के लिए पीठ ठोंकी जाती है। जब गुस्सा सड़कों पर फूटता है तबभी ना तो मनमोहन सिंह, ना ही सोनिया और ना ही शीला दीक्षित का दिल पसीजता है। सर्द कंपकपाती हाड गलाने वाली सर्दी में प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पानी की बौछारें और लाठियां भांजी जाती हैं। छात्राओं के साथ इस तरह बर्ताव किया जाता है मानो वे भेड़ बकरियां हों। आम जनता के दिलो दिमाग में यह प्रश्न घुमड़ना स्वाभाविक ही है कि आखिर देश में प्रजातंत्र नाम की कोई चीज बची है अथवा देश में हिटलरशाही लागू हो चुकी है। शर्म तो उस वक्त आती है जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी अपनी ढीली पोली चाल से इस मामले में दबी आवाज में विरोध करती नजर आती हैं। एक तरफ स्कूल में गोलीबारी पर दुनिया का चौधरी बराक ओबामा रो पड़ता है, पर वहीं दूसरी ओर पत्थरदिल भारत गणराज्य के शासकों को शर्म तो दूर इस तरह इंडिया गेट पर पुलिस की हैवानगी पर रंज भी नहीं होता है।

16 दिसंबर की रात जो हुआ वह रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है पर उन्हीं लोगों की रीढ़ में जो रीढ़ वाले और संवेदनशील हैं। एक सप्ताह बाद भी इंडिया गेट, विजय चौक आदि पर पुलिस का जो बर्बर चेहरा सामने आ रहा है उससे पूरा देश दहल गया है। लोगों का गुस्सा चरम पर है। इंडिया गेट पर हुजूम को देखकर लगने लगा है कि जनता अब उकता चुकी है। जनता ने पहले बाबा रामदेव और अण्णा हजारे पर भी भरोसा जताया किन्तु बाद में जनता को समझ में आया कि आंदोलन कर ये सभी सत्ता के ताले की चाभी की ही तलाश कर रहे थे। इस बार युवा खुद सड़कों पर है। उसका नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है। ना ही कोई नेता ही इनके बीच जाने का प्रयास कर पा रहा है। अरविंद केजरीवाल जरूर धरने पर बैठे हैं पर युवा उनको भी भाव नहीं दे रहे हैं।
16 दिसंबर को यह घटना घटी वहीं 15 दिसंबर को दुनिया के चौधरी माने जाने वाले अमरीका में न्यूटाउन इलाके में एक स्कूल में फायरिंग के दौरान डेढ़ दर्जन बच्चों के मारे जाने की खबर ने अमरीका को दहला दिया था। अमरीका प्रथम नागरिक बराक ओबामा इससे बुरी तरह व्यथित नजर आया। ओबामा ने इसे नेशनल शेम करार दिया और आंखों में आंसू भर गए उनकी। उन्होंने 18 दिसंबर तक नेशनल फ्लेग को झुका देने का आदेश भी दिया।
वहीं दूसरी ओर देश सुलग रहा है। जनता विशेषकर युवा सड़कों पर है। हाड कपा देने और खून जमा देने वाली सर्दी में इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा ना केवल बुरी तरह लाठियां भांजी जा रहीं हैं वरन् उन पर कड़कड़ाती ठंड में ठंडे पानी की बौछारें की जा रही हैं। मीडिया से भी शासक नाराज हैं। मीडिया कर्मियों पर भी पुलिस का कहर टूटता है। पुलिस की इस दमनकारी हरकत से क्या माना जाए? क्या हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं?
आज आम जनता ही फैसला करे, जब विजय चौक और इंडिया गेट पर बलात्कारियों के लिए कठोर सजा के प्रावधान के लिए भीड़ गगनभेदी नारे लगा रही है तब उनकी आवाज संसद के गोलकार खंबों और प्रधानमंत्री कार्यालय के साउथ ब्लाक अन्य मंत्रालयों के नार्थ ब्लाक एवं रायसीना हिल्स स्थित महामहिम राष्ट्रपति के आवास के लोहे के दरवाजों से टकराकर लौट रही है। जनता तो इसकी टकराहट के बाद की प्रतिध्वनी सुन रही है पर सत्तानशी लोगों के कानों में जमे मैल को यह भेद नहीं पा रही है।
सरकार की बेशर्मी की हद देखिए, बलात्कार पीडिता के शरीर को लगभग चालीस मिनिट तक उसके मित्र के सामने ही नोंचा खसोटा जाता है, उसके बाद उसे फेंक दिया जाता है और जब पुलिस को इसकी सूचना मिलती है तब पुलिस पांच मिनिट बाद वहां पहुंचती है तब केंद्रीय गृह सचिव आर.के.सिंह द्वारा दिल्ली की निकम्मी पुलिस की पींठ ठोंकी जाकर कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस ने आउट स्टेंडिग परफार्मेंस दिखाया है। वहीं जले पर नमक छिड़कते हैं दिल्ली पुलिस के आयुक्त! उनका कहना है कि बलात्कार के केस अब ज्यादा इसलिए होने लगे हैं क्योंकि महिलाएं ज्यादा पढ़ लिख गईं हैं! आखिर कमिश्नर के कहने का तात्पर्य क्या है?
केंद्र सरकार का दोयम दर्जे का चेहरा देखना है तो देखिए, एक तरफ स्त्रियों को बराबरी का हक देने की वकालत की जाती है, पर जब महिलाओं के साथ अन्याय होता है और उनके हक के लिए युवा सामने आते हैं तो बालकों को छोड़िए, बालाओं को भी पुलिस द्वारा इस कदर पीटा जाता है मानो वे केटल क्लासके हों। आखिर इन युवाओं का दोष क्या है? ये सिर्फ बलात्कार जैसे अपराध को संज्ञेय और जघन्य अपराध की श्रेणी में लाने की ही मांग तो कर रहे हैं।
मीडिया पर भी सरकार का नजला टूटा है। मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू की तर्ज पर जब सरकार की गलत नीतियों पर सरकार के खिलाफ मीडिया द्वारा माहौल बनाया जाता है तो सरकारें नाराज हो जाती हैं। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र में सभी को बोलने की आजादी है। कांग्रेस के बेपरवाह, सत्ता के मद में डूबे नुमाईंदों की आंख खोलने के लिए एक उदहारण का जिकर यहां लाजिमी होगा। पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने ही उनके दमाद और गांधी उपनाम देने वाले फिरोज गांधी ने तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी.कृष्णामचारी पर एक उद्योगपति के माध्यम से सार्वजनिक तौर पर डाका डालकर धन संग्रह का आरोप मढ़ दिया था। कहने का तात्पर्य महज इतना है कि क्या केंद्रीय गृह सचिव ने दिल्ली पुलिस आयुक्त की पीठ ठोंकने के साथ ही साथ उनसे यह पूछने की जहमत उठाई है कि आखिर सफेद रंग वाली इस तरह की बस किस परमिट पर चल रही हैं जो दस से बीस पच्चीस रूपए लेेकर सवारियां बिठा रही हैं?
अण्णा हजारे, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल अपने पीछे जुटती भीड़ को देखकर फूल कर कुप्पा अवश्य होते होंगे, पर उन्हें भी इस बात को समझना चाहिए कि देश में भीड़तंत्र है ना कि भेड़ तंत्र। भेड़ों के बारे में बता दें कि भेड़ समूह में आगे चलने वाली भेड़ का ही अनुसरण समूह की सारी भेड़ें करती हैं। अगर लोगों को लग रहा है कि भेड़ के मानिंद लोगों को कदमताल करवा लेंगे तो वे अपना भ्रम तोड़ लें। जो भीड़ अण्णा, बाबा या केजरीवाल के साथ थी वस्तुतः वह व्यवस्था से दुखी लोगों की भीड़ थी।
पिछले तीन दिनों से विजय चौक और इंडिया गेट पर देश की बेटियों द्वारा पुलिस के साथ हुज्जत, पुलिस की लाठी के सामने ना झुकना, कड़कड़ाती ठण्ड में ठण्डे पानी की मार सहन करते हुए देखकर हमें निश्चित तौर पर देश की बेटियों पर गर्व हो रहा है। हमारा सीना निश्चित तौर पर फूलकर दुगना हो गया है। अब लगने लगा है कि देश की बेटियां किसी के रहमो करम पर नहीं हैं। बेटियां अपने हक के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार दिख रही हैं।
सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स पूरे शबाब पर हैं। लोग सरकार के खिलाफ अपने गुस्से का जमकर इजहार कर रहे हैं। स्थिति देखकर वाकई लगने लगा है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है। इस देश में जहां लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाएं पैदा हुईं हों वहां महिलाओं को अपने हक के लिए सड़कों पर डंडे खाने पड़ रहे हैं। सरकार बेटी बचाओ का संदेश देती है पर जब बेटी पर बन आती है और वह अपने हक के लिए आगे आती है तो वही सरकार उसके साथ दमनकारी तरीका अपनाती है। एक महिला के साथ आवाज बुलंद करने में देश की पहली महामहिम महिला राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, जयललिता, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मायावती, उमा भारती, पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आदि को शर्म आ रही है। अगर वाकई एसा है तो शर्म है इनके महिला होने पर। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है और मनमोहन सिंह किसी की कठपुतली बनकर हिटलर की भूमिका में आ चुके हैं। (साई फीचर्स)

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

. . . तो शर्म है इनके भी महिला होने पर

(लिमटी खरे)

16 दिसंबर की रात एक मासूब बाला के साथ गेंग रेप हो जाता है, केंद्र और दिल्ली सरकार खामोश रहती है, केंद्रीय गृह सचिव द्वारा दिल्ली पुलिस को आउट स्टेंडिंग परफार्मेंस के लिए पीठ ठोंकी जाती है। जब गुस्सा सड़कों पर फूटता है तबभी ना तो मनमोहन सिंह, ना ही सोनिया और ना ही शीला दीक्षित का दिल पसीजता है। सर्द कंपकपाती हाड गलाने वाली सर्दी में प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पानी की बौछारें और लाठियां भांजी जाती हैं। छात्राओं के साथ इस तरह बर्ताव किया जाता है मानो वे भेड़ बकरियां हों। आम जनता के दिलो दिमाग में यह प्रश्न घुमड़ना स्वाभाविक ही है कि आखिर देश में प्रजातंत्र नाम की कोई चीज बची है अथवा देश में हिटलरशाही लागू हो चुकी है। शर्म तो उस वक्त आती है जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी अपनी ढीली पोली चाल से इस मामले में दबी आवाज में विरोध करती नजर आती हैं। एक तरफ स्कूल में गोलीबारी पर दुनिया का चौधरी बराक ओबामा रो पड़ता है, पर वहीं दूसरी ओर पत्थरदिल भारत गणराज्य के शासकों को शर्म तो दूर इस तरह इंडिया गेट पर पुलिस की हैवानगी पर रंज भी नहीं होता है।

16 दिसंबर की रात जो हुआ वह रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है पर उन्हीं लोगों की रीढ़ में जो रीढ़ वाले और संवेदनशील हैं। एक सप्ताह बाद भी इंडिया गेट, विजय चौक आदि पर पुलिस का जो बर्बर चेहरा सामने आ रहा है उससे पूरा देश दहल गया है। लोगों का गुस्सा चरम पर है। इंडिया गेट पर हुजूम को देखकर लगने लगा है कि जनता अब उकता चुकी है। जनता ने पहले बाबा रामदेव और अण्णा हजारे पर भी भरोसा जताया किन्तु बाद में जनता को समझ में आया कि आंदोलन कर ये सभी सत्ता के ताले की चाभी की ही तलाश कर रहे थे। इस बार युवा खुद सड़कों पर है। उसका नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है। ना ही कोई नेता ही इनके बीच जाने का प्रयास कर पा रहा है। अरविंद केजरीवाल जरूर धरने पर बैठे हैं पर युवा उनको भी भाव नहीं दे रहे हैं।
16 दिसंबर को यह घटना घटी वहीं 15 दिसंबर को दुनिया के चौधरी माने जाने वाले अमरीका में न्यूटाउन इलाके में एक स्कूल में फायरिंग के दौरान डेढ़ दर्जन बच्चों के मारे जाने की खबर ने अमरीका को दहला दिया था। अमरीका प्रथम नागरिक बराक ओबामा इससे बुरी तरह व्यथित नजर आया। ओबामा ने इसे नेशनल शेम करार दिया और आंखों में आंसू भर गए उनकी। उन्होंने 18 दिसंबर तक नेशनल फ्लेग को झुका देने का आदेश भी दिया।
वहीं दूसरी ओर देश सुलग रहा है। जनता विशेषकर युवा सड़कों पर है। हाड कपा देने और खून जमा देने वाली सर्दी में इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा ना केवल बुरी तरह लाठियां भांजी जा रहीं हैं वरन् उन पर कड़कड़ाती ठंड में ठंडे पानी की बौछारें की जा रही हैं। मीडिया से भी शासक नाराज हैं। मीडिया कर्मियों पर भी पुलिस का कहर टूटता है। पुलिस की इस दमनकारी हरकत से क्या माना जाए? क्या हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं?
आज आम जनता ही फैसला करे, जब विजय चौक और इंडिया गेट पर बलात्कारियों के लिए कठोर सजा के प्रावधान के लिए भीड़ गगनभेदी नारे लगा रही है तब उनकी आवाज संसद के गोलकार खंबों और प्रधानमंत्री कार्यालय के साउथ ब्लाक अन्य मंत्रालयों के नार्थ ब्लाक एवं रायसीना हिल्स स्थित महामहिम राष्ट्रपति के आवास के लोहे के दरवाजों से टकराकर लौट रही है। जनता तो इसकी टकराहट के बाद की प्रतिध्वनी सुन रही है पर सत्तानशी लोगों के कानों में जमे मैल को यह भेद नहीं पा रही है।
सरकार की बेशर्मी की हद देखिए, बलात्कार पीडिता के शरीर को लगभग चालीस मिनिट तक उसके मित्र के सामने ही नोंचा खसोटा जाता है, उसके बाद उसे फेंक दिया जाता है और जब पुलिस को इसकी सूचना मिलती है तब पुलिस पांच मिनिट बाद वहां पहुंचती है तब केंद्रीय गृह सचिव आर.के.सिंह द्वारा दिल्ली की निकम्मी पुलिस की पींठ ठोंकी जाकर कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस ने आउट स्टेंडिग परफार्मेंस दिखाया है। वहीं जले पर नमक छिड़कते हैं दिल्ली पुलिस के आयुक्त! उनका कहना है कि बलात्कार के केस अब ज्यादा इसलिए होने लगे हैं क्योंकि महिलाएं ज्यादा पढ़ लिख गईं हैं! आखिर कमिश्नर के कहने का तात्पर्य क्या है?
केंद्र सरकार का दोयम दर्जे का चेहरा देखना है तो देखिए, एक तरफ स्त्रियों को बराबरी का हक देने की वकालत की जाती है, पर जब महिलाओं के साथ अन्याय होता है और उनके हक के लिए युवा सामने आते हैं तो बालकों को छोड़िए, बालाओं को भी पुलिस द्वारा इस कदर पीटा जाता है मानो वे केटल क्लासके हों। आखिर इन युवाओं का दोष क्या है? ये सिर्फ बलात्कार जैसे अपराध को संज्ञेय और जघन्य अपराध की श्रेणी में लाने की ही मांग तो कर रहे हैं।
मीडिया पर भी सरकार का नजला टूटा है। मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू की तर्ज पर जब सरकार की गलत नीतियों पर सरकार के खिलाफ मीडिया द्वारा माहौल बनाया जाता है तो सरकारें नाराज हो जाती हैं। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र में सभी को बोलने की आजादी है। कांग्रेस के बेपरवाह, सत्ता के मद में डूबे नुमाईंदों की आंख खोलने के लिए एक उदहारण का जिकर यहां लाजिमी होगा। पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने ही उनके दमाद और गांधी उपनाम देने वाले फिरोज गांधी ने तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी.कृष्णामचारी पर एक उद्योगपति के माध्यम से सार्वजनिक तौर पर डाका डालकर धन संग्रह का आरोप मढ़ दिया था। कहने का तात्पर्य महज इतना है कि क्या केंद्रीय गृह सचिव ने दिल्ली पुलिस आयुक्त की पीठ ठोंकने के साथ ही साथ उनसे यह पूछने की जहमत उठाई है कि आखिर सफेद रंग वाली इस तरह की बस किस परमिट पर चल रही हैं जो दस से बीस पच्चीस रूपए लेेकर सवारियां बिठा रही हैं?
अण्णा हजारे, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल अपने पीछे जुटती भीड़ को देखकर फूल कर कुप्पा अवश्य होते होंगे, पर उन्हें भी इस बात को समझना चाहिए कि देश में भीड़तंत्र है ना कि भेड़ तंत्र। भेड़ों के बारे में बता दें कि भेड़ समूह में आगे चलने वाली भेड़ का ही अनुसरण समूह की सारी भेड़ें करती हैं। अगर लोगों को लग रहा है कि भेड़ के मानिंद लोगों को कदमताल करवा लेंगे तो वे अपना भ्रम तोड़ लें। जो भीड़ अण्णा, बाबा या केजरीवाल के साथ थी वस्तुतः वह व्यवस्था से दुखी लोगों की भीड़ थी।
पिछले तीन दिनों से विजय चौक और इंडिया गेट पर देश की बेटियों द्वारा पुलिस के साथ हुज्जत, पुलिस की लाठी के सामने ना झुकना, कड़कड़ाती ठण्ड में ठण्डे पानी की मार सहन करते हुए देखकर हमें निश्चित तौर पर देश की बेटियों पर गर्व हो रहा है। हमारा सीना निश्चित तौर पर फूलकर दुगना हो गया है। अब लगने लगा है कि देश की बेटियां किसी के रहमो करम पर नहीं हैं। बेटियां अपने हक के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार दिख रही हैं।
सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स पूरे शबाब पर हैं। लोग सरकार के खिलाफ अपने गुस्से का जमकर इजहार कर रहे हैं। स्थिति देखकर वाकई लगने लगा है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है। इस देश में जहां लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाएं पैदा हुईं हों वहां महिलाओं को अपने हक के लिए सड़कों पर डंडे खाने पड़ रहे हैं। सरकार बेटी बचाओ का संदेश देती है पर जब बेटी पर बन आती है और वह अपने हक के लिए आगे आती है तो वही सरकार उसके साथ दमनकारी तरीका अपनाती है। एक महिला के साथ आवाज बुलंद करने में देश की पहली महामहिम महिला राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, जयललिता, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मायावती, उमा भारती, पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आदि को शर्म आ रही है। अगर वाकई एसा है तो शर्म है इनके महिला होने पर। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मानवता शर्मसार हो चुकी है और मनमोहन सिंह किसी की कठपुतली बनकर हिटलर की भूमिका में आ चुके हैं। (साई फीचर्स)

शनिवार, 12 मई 2012

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे


हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

(लिमटी खरे)

प्रख्यात व्यंगकार शरद जोशी की एक नायाब कृति है, ‘‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे‘‘। इसमें उन्होंने देश की उस वक्त की हालात पर करारे व्यंग्य किए थे। काश शरद जोशी आज जिंदा होते तो वे कांग्रेस और भाजपा की जुगलबंदी के लिए अपने नए व्यंग्य संकलन के लिए अवश्य ही टाईटलखोज रहे होते। आज देश का हृदय प्रदेश पूरी तरह भ्रष्ट प्रदेश में तब्दील हो चुका है। शिवराज सिंह के नेतृत्व में सरकारी तंत्र में लोकतंत्र के लुटेरे काबिज हो गए हैं। एक तरफ कांग्रेस नीत संप्रग सरकार द्वारा केंद्र में नित भ्रष्टाचार के आयाम स्थापित किए जा रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश में भाजपा के राज में जनसेवक और नौकरशाह मिलकर प्रदेश को नोंच नोंच कर खा रहे हैं। केंद्र में विपक्षी दल भाजपा द्वारा विरोध और शोरशराबा कर रस्म अदायगी की जा रही है तो एमपी में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस जनता को दिखाने के लिए अपने कर्तव्य के पालन का दिखावा कर रही है। इन दोनों के बीच मीडिया भी ‘‘अपना पेट पालने‘‘ की जुगत में अपने पथ से भ्रष्ट हुए बिना नहीं है।



चाल चरित्र और चेहरे के लिए जानी पहचानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी के राज में हृदय प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पार्टी अध्यक्ष प्रभात झा की नाक के नीचे भ्रष्ट अफसरों को एक के बाद एक पकड़कर अरबों खरबों की संपत्ति जप्त की जा रही है। मध्य प्रदेश में लगभग नौ सालों से भाजपा के राज में अफसरों ने जमकर मलाई काटी है। खबरें तो यहां तक हैं कि अब तो राजस्व और पुलिस के जिला स्तर से लेकर उच्च पद भी बिकने लगे हैं।
अंबिकापुर से सहायक शल्य चिकित्सक के बतौर नौकरी आरंभ करने वाले डॉ.अमरनाथ मित्तल के घर से ही एक अरब रूपए की संपत्ति मिली है। उनकी पत्नि ने मौके पर लोकायुक्त पुलिस को चिल्लाकर कहा कि जाकर उस मंत्री के घर छापा मारो जो हमसे एक करोड़ रूपए रिश्वत मांगता है! मिसिस मित्तल का कहना काफी हद तक सही है। शासन की शह के बिना बड़े और छोटे नौकरशाहों की क्या बिसात कि वे एक रूपए का भ्रष्टाचार कर सकें!
पूर्व में 2003 तक राजा दिग्विजय सिंह के शासनकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। आज के समय के भ्रष्टाचार को देखते हुए लगता है कि राजा के समय भ्रष्टाचार का शैशव काल रहा होगा। आज तो मध्य प्रदेश का हर नौकरशाह और सरकारी कर्मचारी करोड़ों से कम उगल ही नहीं रहा है।
एमपी में शिव राजमें भ्रष्टों का जिस तरह प्रभातहो रहा है उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोकायुक्त पुलिस और पुलिस के आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो द्वारा तीन सालों में मारे गए छापों में एक हजार करोड़ रूपए से ज्यादा की संपत्ति को उजागर किया है।
बावजूद इसके बेशर्मी का लबादा ओढ़ने वाले सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान और भाजपाध्यक्ष प्रभात झा यह सफाई देते फिर रहे हैं कि सरकार अपना काम कर छापे डालकर भ्रष्टों को पकड़ रही है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सालों साल तक भ्रष्टाचार की छूट देने के बाद जब चुनाव सर पर आने वाले हैं तब इन कारिंदों की धरपकड़ विलंब से क्यों की जा रही है?
आखिर क्या कारण है कि सालों साल बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश की सीमाओं पर स्थित परिवहन, सेल टेक्स, मण्डी आदि की जांच चौकियों को आधुनिक नहीं बनाया जा रहा है? उत्तर साफ है कि अगर इन्हें आधुनिक बना दिया गया तो यहां से गुजरने वाले हर वाहन का तौल होगा, राज्य सचिवालय वल्लभ भवन और विभागीय मुख्यालयों में बैठे आला अधिकारी इसे लाईव देख सकेंगे। तब या तो भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव होगा या फिर उपर के अधिकारियों के रेट बढ़ जाएंगे।
लोकायुक्त ने प्रदेश में तीस माह में दो सौ तीस भ्रष्ट अफसरों पर शिकंजा कसकर सौ करोड़ रूपए से ज्यादा की संपत्ति जप्त की है। इसके साथ ही साथ आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने 67 मुलाजिमों को धर दबोचा और 348 करोड़ रूपए जब्त किए। यह सरकारी आंकड़ा है जिसका बखान सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने इंदौर के विधायक सुदर्शन गुप्ता के प्रश्न के जवाब में सीना चौड़ा कर किया।
माना जा रहा है कि दिसंबर 2003 के बाद सत्ता पर काबिज हुई भाजपा द्वारा अफसरों को प्रदेश को चारागाह बनाकर लूटने की इजाजत देने के बाद अब डर का माहौल जान बूझकर बनाया जा रहा है, ताकि 2013 के विधानसभा चुनावों के पहले इन सरकारी कारिंदों से मनमाना चुनावी चंदा या पार्टी फंड वसूल किया जा सके। वर्ष 2008 में एक आदिवासी बाहुल्य जिले में पदस्थ जिला कलेक्टर ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर कहा कि उन्होंने एक जनसेवक को दो करोड़ रूपए रूपए देकर यह पदस्थापना हासिल की है। अब दो साल में उन्हें कम से कम दस करोड़ रूपए कमाने हैं ताकि आगे की पोस्टिंग भी मलाईदार ले सकें।
इतिहास अगर देखा जाए तो कुंवर अर्जुन सिंह के शासनकाल में अस्सी के दशक में प्रदेश में भ्रष्टाचार की पदचाप सुनाई दी थी। इसके बाद लोकतंत्र के लुटेरे कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह की दूसरी पारी अर्थात 1998 के बाद तेजी से सक्रिय हुए। 98 के उपरांत राजा दिग्विजय सिंह ने सारा का सारा राजकाज अपने चंद हाथों (आईएएस और निजी कर्मचारियों) के माध्यम से संचालित करना आरंभ किया।
राजा दिग्विजय सिंह के शासनकाल में विधायक और सांसदों के हर काम के लिए राजा दिग्विजय सिंह द्वारा सदैव हामी भर दी जाती थी, किन्तु उनके कामों को उनके चंद हाथ अमली जामा नहीं पहनाते थे। राजा के बारे में कहा जाने लगा था कि मना किसी को करना नहीं, काम किसी का करना नहीं। ठीक उसी तर्ज पर शिवराज सिंह सरकार भी पांच लोगों द्वारा ही चलाई जा रही बताई जाती है।
शिव के राज में शिख से नख तक (टॉप टू बॉटम) एक सी ही स्थित है। एक तरफ स्वास्थ्य संचालक सौ करोड़ का आसामी है तो इंदौर का परिवहन विभाग का बाबू रमण पचहत्तर करोड़ रूपए की संपत्ति का मालिक निकला। उज्जेन में परिवहन विभाग के निरीक्षक सेवाराम खाड़ेगर के पास दस करोड़ की संपत्ति मिली। उज्जैन नगर निगम का चपरासी नरेंद्र देशमुख की संपत्ति पंद्रह करोड़ रूपए की खबर ने प्रदेश के लोगों को (कांग्रेस के नेताओं को छोड़कर) हिलाकर रख दिया। मंदसौर के उपयंत्री शीतल प्रसाद के पास बारह करोड़ की बेनामी संपत्ति मिली। अपना एमपी गजब है यहां भ्रष्टों के लिए उपजाउ माहौल है। इसी तरह हदरा के उप पंजीयक एम.एल.पटेल के पास से तीन करोड़ रूपए की संपत्ति मिली। लोकतंत्र के लुटेरों में भारतीय प्रशासनिक सेवा की जोशी दंपत्ति (अरविंद जोशी टीनू जोशी) ने तो धमाल मचाया था।
परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। इस संबंद्ध में एक वाक्या याद आ रहा है। एक प्रोग्राम में परिवहन विभाग में प्रतिनियुक्ति पर गए उप निरीक्षक ने अपने मित्रों के बीच प्रतिनियुक्ति से वापसी की मंशा व्यक्त की गई। मित्र पुलिसियों ने पूछा तो उन्होंने जवाब दिया यार बोर हो गए बेरियर पर अकेले रहते रहते। इस पर एक मित्र पुलिस वाले ने चुटकी ली -‘‘बोर हो गए या बोरों (बोरों से भरकर रूपए) हो गए।
यहां उल्लेखनीय होगा कि डॉ. मित्तल से पहले स्वास्थ्य विभाग के एक आयुक्त और दो संचालकों पर आयकर का छापा पड़ चुका है। छापे में आयकर विभाग को काफी मात्रा में बेहिसाब संपत्ति मिली थी। तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक योगीराज शर्मा के घर आयकर विभाग ने 20 सितम्बर 2007 को छापा मारा था। इस छापे में शर्मा के आवास से मिले सवा करोड़ के करीब नगद को गिनने के लिए मशीने लगानी पड़ी थीं। नोट गद्दों के नीचे मिले थे। आयकर विभाग ने शर्मा की एप्रेजल में लगभग 12 करोड़ की अघोषित आय का पता लगाया था। योगीराज इस समय निलंबित हैं।
इसके उपरांत आयकर विभाग ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राजेश राजोरा जो उस वक्त स्वास्थ्य आयुक्त के पद पर पदस्थ थे सहित अनेक लोगों के घरों पर छापा मारा था। उस समय अवतार सिंह खुराना, मधु सिंह खुराना और श्याम सिंह राजौरा के नाम गौरा सेवनिया गौड़, बरखेड़ी, बजायत, बिसनखेड़ी और कलखेड़ा में 35 एकड़ जमीन तथा भूमि संबंधी 38 कागजात मिले थे। ये जमीन 19 जनवरी 2006 से 31 मार्च 2008 के बीच खरीदी गईं। आयकर विभाग ने 5 करोड़ के करीब राजौरा पर कर का निर्धारण किया था। राजौरा 24 फरवरी 2010 से निलंबित चल रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग काली कमाई का अड्डा बना हुआ है। तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक अशोक शर्मा के आवास पर 30 मई 2008 को छापा मारा गया था। इस छापे में मोबाइल वैन की खरीदी से जुड़े दस्तावेज आयकर विभाग के हाथ लगे थे। इसमें आरती गोस्वामी, अवधेश दीक्षित, प्रमोद नंदवाल के साथ एएन मित्तल का भी नाम सामने आया था। मित्तल पर गुरुवार को लोकायुक्त ने छापा मारा। अशोक शर्मा वर्तमान में स्वास्थ्य संचालक हैं। निलंबन के बाद उनकी बहाली हो गई।
स्वास्थ्य विभाग एमपी में भ्रष्टों के लिए चारागाह बन चुका है। इसका कारण केंद्र पोषित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) है। इसमें आने वाली केंद्रीय इमदाद को अफसर दोनों हाथों से उसी तरह लूट रहे हैं जिस तरह दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में राजीव गांधी शिक्षा मिशन (अब सर्वशिक्षा अभियान) के पैसों को लूटा गया था।
शिव के राज में जिन अफसरों की विवेचना लंबित है उनमें राजेश राजौरा, एमएम उपाध्याय, एके सिंह, अरविंद जोशी, टीनू जोशी, एमके सिंह, एसएस अली, एमके अग्रवाल, यूके सामल (रिटायर), रामकिंकर गुप्ता (रिटायर), एवी सिंह (रिटायर), अंजू सिंह बघेल, एलके द्विवेदी, आरपी मंडल प्रमुख हैं। इसके अलावा राजकुमार माथुर, पिरकीपण्डला नरहरि के खिलफ तो जांच ही लंबित है।
राज्य सरकार की अनुमति के उपरांत पी. राघवन, एमएम मूर्ति, शशि कर्णावत, वीएन पयासी के चालान पेश कर दिए गए हैं तो एस.बी.सिंह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति ही लंबित पडी हुई है।
मध्य प्रदेश में जिन आला अफसरान के खिलाफ मामले पंजीबद्ध हैं उनमें एमके वार्ष्णेय, निकुंज श्रीवास्तव, बीएम शर्मा, मनीष श्रीवास्तव, अरूण पांडेय, एमएस भिलाला, शशि कर्णावत, सभाजीत यादव, राजेश राजौरा, अंजू सिंह बघेल, राजकुमार पाठक, केपी राही, निशांत बरबड़े, सुखवीर सिंह, सलीना सिंह, अजातशत्रु श्रीवास्तव, आकाश त्रिपाठी, अरविंद जोशी, एमके सिंह, नवनीत कोठारी, अरुण कुमार भट्ट, पंकज राग, बीएन सिंह, विवेक अग्रवाल, सीबी सिंह, राघव चंद्रा, राघवेन्द्र सिंह, रश्मि, एमएम उपाध्याय, मनोहर अगनानी, मनोज झालानी, राकेश राजौरिया, आरएस जुलानिया, अवनि वैश्य, एसके मिश्रा और जीपी सिंहल (रिटायर) के नाम शामिल हैं।
देश और मध्य प्रदेश के हालात देखकर लगने लगा है मानो सरकारों ने चाहे वे किसी भी दलों की हों, का शासन जंगल राज में तब्दील हो गया है। मध्य प्रदेश में शिव के राज में तो सारी वर्जनाएं ही टूटती दिख रही हैं। कांग्रेस अपना मुंह सिले बैठी है। इतने में तो विधानसभा में श्वेत पत्र लाने की बात कभी की हो जानी चाहिए थी। वस्तुतः एसा हुआ नहीं! इसका कारण संभवतः यही हो सकता है कि केंद्र में हम तो प्रदेश में तुम जनता के पैसों से होली खेलो, जनता का क्या है? जनता की याददाश्त तो कम समय के लिए ही होती है, कुछ दिनो में वह भूल ही जाएगी।

कुछ मामलों का लेखा जोखा इस प्रकार है:-

प्रकरण क्रमांक          अधिकारियों का नाम          पदनाम
जा. प्र. 356/98                     एमके वार्ष्णेय, आईएएस        तत्कालीन आयुक्त नगर निगम
जा. प्र. 381/09                     निकुंज श्रीवास्तव, आईएएस     तत्कालीन कलेक्टर छिंदवाड़ा
जा. प्र. 238/09                     बीएम शर्मा, आईएएस          तत्कालीन सीईओ जिला पंचायत छिंदवाड़ा
जा. प्र. 337/07                     मनीष श्रीवास्तव, आईएएस तत्कालीन कलेक्टर शिवपुरी,
जा. प्र.208/05                        अरुण पाण्डेय, आईएएस   तत्कालीन पूर्व कलेक्टर, रायसेन
जा. प्र.270/04                        एमएस भिलाला              तत्कालीन सीईओ जिला पंचायत बैतूल
जा. प्र. 372/07                     शशि कर्णावत, आईएएस   सीईओ जिला पंचायत छतरपुर
जा. प्र.535/10                        सभाजीत यादव, आईएएस तत्कालीन अपर कलेक्टर रीवा
जा. प्र.567/10                        राजेश राजौरा, आईएएस   तत्कालीन आयुक्त लोक शिक्षण
जा. प्र.103/10                        अंजू सिंह बघेल, आईएएस तत्कालीन कलेक्टर कटनी
जा. प्र.84/10              राजकुमार पाठक, आईएएस तत्कालीन कलेक्टर
जा. प्र.231/10                        कामता प्रसाद राही, आईएएस    तत्कालीन कलेक्टर डिण्डौरी
जा. प्र. 235/10                     निशांत बरबड़े, आईएएस   तत्कालीन सीईओ जिला पंचायत रीवा
जा. प्र. 232/10                     सुखबीर सिंह, आईएएस         तत्कालीन कलेक्टर सीधी
जा. प्र.107/09                        सलीना सिंह, आईएएस         तत्कालीन सचिव, अनु. जाति कल्याण विभाग भोपाल
जा. प्र.199/10                        अजातशत्रु, आईएएस      तत्कालीन. कलेक्टर उज्जैन
जा. प्र.223/10                        आकाश त्रिपाठी, आईएएस  तत्कालीन कलेक्टर ग्वालियर
जा. प्र.106/11                        मुक्तेश वार्ष्णेय, आईएएस  तत्कालीन आयुक्त भू-अभिलेख कार्यालय ग्वालियर
जा. प्र.132/09                        अरविंद जोशी, आईएएस   तत्कालीन प्रमुख सचिव मप्र शासन जल संसाधन विभाग
जा. प्र.25/06              एमके सिंह, आईएएस          तत्कालीन समन्वयक राज्य शिक्षा केंद्र भोपाल
जा. प्र.446/10                        नवनीत कोठारी, आईएएस कलेक्टर बालाघाट
जा. प्र.294/11                        अरुण कुमार भट्ट       तत्कालीन आबकारी आयुक्त ग्वालियर
जा. प्र.410/11                        पंकज राग, आईएएस           प्रबंध संचालक पर्यटन विकास निगम
जा. प्र.351/11                        बीएन सिंह             तत्कालीन एमडी, राज्य पशुधन कुक्कुट विकास निगम
जा. प्र.390/09                        राजेश राजौरा आईएएस        तत्कालीन कलेक्टर, बालाघाट
जा. प्र.426/10                        सीबी सिंह, आईएएस           तत्कालीन आयुक्त नगर पालिका निगम इंदौर
जा. प्र.560/10                        राघव चंद्रा, आईएएस           तत्कालीन प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन एवं विकास
जा. प्र.84/11              राकेश श्रीवास्तव आईएएस तत्कालीन कलेक्टर इंदौर
जा. प्र.373/11                        रश्मि पंवार, आईएएस          तत्कालीन एमपी एकेवीएन
जा. प्र.477/11                        एमएम उपाध्याय  आईएएस    तत्कालीन प्रमुख सचिव स्वास्थ्य
जा. प्र.497/10                        आरएस जुलानिया आईएएस     तत्कालीन प्रमुख सचिव जल संसाधन विभाग,
जा. प्र.514/10                        व्हीके सेनी,                            तत्कालीन संचालक
जा. प्र.232/11                        अवनि वैश्य, आईएएस         तत्कालीन प्रमुख सचिव, मप्र शासन 21.04.11
जा. प्र.435/11                        जीपी सिंघल,                         तत्कालीन आयुक्त/प्रमुख सचिव, वित्त कोष एवं लेखा

(साई फीचर्स)