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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

. . . मतलब महाकौशल का विकास नहीं चाहते क्षत्रप!


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 20 (समापन किस्त)

. . . मतलब महाकौशल का विकास नहीं चाहते क्षत्रप!

अब सारा दारोमदार, कांग्रेस भाजपा के क्षत्रपों पर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। देश के सच्चे हृदय प्रदेश महाकौशल प्रांत में सशक्त राजनैतिक नेतृत्व होने के बाद भी संयुक्त और प्रथक मध्य प्रदेश में भी इस क्षेत्र के विकास के मार्ग न खुल पाना निश्चित तौर पर राजनैतिक नेतृत्व को नपुंसक रेखांकित करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। केंद्र में मंत्री कमल नाथ, भाजपा के क्षत्रप प्रहलाद पटेल, फग्गन ंिसह कुलस्ते जैसे दिग्गजों के बाद भी महाकौशल अगर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है तो निश्चित तौर पर इसका यही मतलब निकाला जा सकता है कि ये क्षत्रप इस क्षेत्र से जनादेश लेकर केंद्र में राजनीति तो करना चाहते हैं पर जब अपनी कर्मभूमि के विकास की बात आती है तो ये मौन साध लेते हैं।
इसी तरह मध्य प्रदेश में राजनैतिक बिसात पर अपनी माहिर चालें चलने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर के साथ ही साथ अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल के पूर्व अध्यक्ष और मध्य प्रदेश बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर नीखरा, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल, फग्गन ंिसह कुलस्ते के अलावा मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी के साथ ही साथ जनता दल यूनाईटेड के संयोजक शरद यादव, हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह, पूर्व मंत्री सत्येंद्र पाठक, दीपक सक्सेना, प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष विश्वनाथ दुबे, प्रवक्ता कल्याणी पांडे, श्रीमति नेहा सिंह, रेखा बिसेन, पुष्पा बिसेन, दयाल सिंह तुमराची गौरी शंकर बिसेन, अजय बिश्नोई, देवी सिंह सैयाम, नाना माहोड़ेत्र डॉ.ढाल सिंह बिसेन, चौधरी चंद्रभान सिंह, महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश दिवाकर, प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष अनुसुईया उईके, विनोद गोटिया, राकेश सिंह और न जाने कितने नेताओं ने महाकौशल का पानी पीकर यहीं की माटी को अपनी कर्मभूमि बनया है।
अब तक महाकौशल अगर पिछड़ा रहा है तो इसके लिए निश्चित तौर पर सभी दलों के नेता ही जवाबदार माने जा सकते हैं, क्योंकि इनकी राजनैतिक इच्छा शक्ति महाकौशल क्षेत्र के विकास के प्रति कभी दिखाई ही नहीं पड़ी। केंद्र में सदा प्रतिनिधित्व पाने वाला महाकौशल औद्योगिक तौर पर भी आत्मनिर्भर नहीं है। आज आलम यह है कि भारतीय रेल की नजरों में भी इसे उपेक्षित ही रखा हुआ है। उच्च न्यायायल के होने के कारण बिलासुपर से नई दिल्ली के लिए राजधानी एक्सप्रेस रेलगाड़ी की सुविधा है किन्तु उच्च न्यायालय होने के बाद भी राजधानी एक्सप्रेस आज भी जबलपुर के लिए सपना है। मध्य प्रदेश से रेल मंत्री के पद पर स्व.माधवराव सिंधिया विराजे और उन्होंने ग्वालियर को चमन बना दिया। कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज तक मध्य प्रदेश की झोली में एक भी राजधानी एक्सप्रेस नहीं आ पाई है। कद्दावर नेता कमल नाथ ने अपने संसदीय क्षेत्र में बड़ी रेल लाईन का जाल बिछाना आरंभ कर दिया है। उनसे ही उम्मीद की जा सकती है कि वे नई दिल्ली से बरास्ता भोपाल होकर छिंदवाड़ा जाने के लिए एक राजधानी एक्सप्रेस को चलाने की दिशा में प्रयास कर लें ताकि मध्य प्रदेश के माथे से कम से कम राजधानी एक्सप्रेस न होने का कलंक तो धोया जा सके। रही बात विमान सुविधा की तो विमान सुविधाओं के मामले में अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्य प्रदेश काफी हद तक पिछड़ा हुआ है।

(समाप्त)

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

महाकौशल के विधायकों पर बनाना होगा जनता को दबाव!


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 18

महाकौशल के विधायकों पर बनाना होगा जनता को दबाव!

विधानसभा में पारित करवाना होगा संकल्प



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाकौशल प्रांत के नागरिक अगर चाहते हैं कि वे प्रथक छोटे प्रांत के निवासी बनकर विकास के मार्ग प्रशस्त करें तो इसके लिए यह आवश्यक होगा कि नागरिक मिलकर अपने अपने विधायकों पर इस बात का दबाव बनाएं कि प्रथक महाकौशल के लिए विधानसभा में संकल्प पाति करवाया जाए। महज धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन से प्रथक महाकौशल की राह नहीं निकाली जा सकती है।
आजादी के उपरांत महाकौशल का एक बड़ा हिस्सा सेंट्रल प्रिवेंसेस एण्ड बरार (सीपी एण्ड बरार) का हिस्सा रहा है। उमर दराज हो चुकी पीढ़ी आज भी सरकारी बसों को सीपीटीएस की बसें ही कहा करते हैं। गौरतलब है कि उस वक्त यात्री बसों का संचालन सेंट्रल प्रोवेन्सेस ट्रांसपोर्ट सर्विस द्वारा किया जाता था। 01 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश की स्थापना के बाद मध्य प्रदेश में राज्य परिवहन का गठन किया गया था।
महाकौशल प्रांत के गठन के लिए गोंडवाना गणतंत्र पार्टी सहित अनेक संगठन अपने अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। इसके लिए वे धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन आदि का सहारा ले रहे हैं। प्रथक महाकौशल का सपना तभी साकार हो सकता है जब इसके लिए महाकौशल प्रांत में आने वाले जिलों के विधायकों पर इस बात का दबाव बनाया जाए कि वे विधानसभा में इस बात को पुरजोर तरीके से उठाकर एक प्रस्ताव केंद्र सरकार को भिजवाएं।
इसके लिए महाकौशल प्रांत के समस्त राजनैतिक दलों के लिए यह जरूरी है कि वे दलगत भावना से उपर उठकर प्रथक महाकौशल प्रांत के लिए अपने अपने दलों के विधायकों को इसके लिए राजी करें कि प्रथक महाकौशल की बात मध्य प्रदेश विधानसभा में उठाई जाए, एवं ध्वनिमत से इसे पारित करवाकर इसका एक प्रस्ताव केंद्र सरकार को भिजवाया जाए।
वर्तमान में यह बात इसलिए भी आसान प्रतीत हो रही है क्योंकि मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी जबलपुर तो उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर सिवनी जिले के विधायक हैं, जो महाकौशल प्रांत का अभिन्न अंग माने जा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा के इन दोनों ही कद्दावर नेताओं के लिए यह बहुत दुष्कर काम नहीं है कि मध्य प्रदेश विधानसभा से प्रथक महाकौशल की बात को केंद्र सरकार तक पहुंचाया जाए।
जब यह प्रस्ताव केंद्र को जाएगा, तब आरंभ होगी महाकौशल के सांसदों की भूमिका। महाकौशल के क्षत्रपों की केंद्रीय राजनीति में गहरी दखल जगजाहिर है। महाकौशल के उर्जावान सांसदों में कमल नाथ, राकेश सिंह, उदय प्रताप सिंह, गणेश सिंह आदि के कद को कमतर नहीं आंका जा सकता है। इसके साथ ही साथ पूर्व सांसद प्रहलाद सिंह पटेल, फग्गन सिंह कुलस्ते, रामेश्वर नीखरा भी इसी माटी को कर्मभूमि बनाए हुए हैं। इन सभी के संयुक्त प्रयासों से महाकौशल प्रांत का सपना साकार हो सकता है। इसके लिए इन सभी के समर्थकों को अपने अपने नेताओं को इस पुनीत कार्य के लिए राजी करना अत्यावश्यक ही प्रतीत हो रहा है।

(क्रमशः जारी)

रविवार, 25 दिसंबर 2011

महाकौशल के केंद्र में होगा जबलपुर


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 17

महाकौशल के केद्र में होगा जबलपुर

नए राज्य के सारे कारक मौजूद हैं महाकौशल में



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। प्रथक महाकौशल प्रांत के प्रस्तावित भौगोलिक क्षेत्र को अगर देखा जाए तो जबलपुर इस प्रांत का केंद्र ही साबित हो रहा है। नवीन सूबे या राज्य के लिए जिन कारकों की आवश्यक्ता होती है वे सभी जबलपुर प्रांत में मौजूद हैं। राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में प्रथक महाकौशल प्रांत का सपना अब तक साकार नहीं हो सका है।
देखा जाए तो जब भी सत्ताधारी दल की ओर से कहा जाता हो कि भूगोल व आवागमन प्राथमिकता नहीं होगी, भाषा प्राथमिकता होगी, तब वह दल कमजोर हो जाता है। इसके साथ ही साथ राज्य बनने की ताकत के अनेक कारक हैं। महाकौशल प्रांत में भी ये लागू होते हैं। भारत के भौगोलिक मध्य में होना, तीन अभयारण (कान्हा, पेंच, बांधवगढ) पौध-भिन्नता, जैव-विविधता, भाषाई- विविधता, संस्कृतिक-विविधता, सतपुडा -विंध्याचल व नर्मदा, उच्च न्यायालय, पर हानि पहुंचाने वाले कारक इनमें प्रमुख हैं।
महाकौशल का केंद्र जबलपुर है, जिसके चारों ओर राज्य व राज्य बनने की मांग है। जबलपुर से रायपुर-छत्तीसगढ की राजधानी। जबलपुर से भोपाल-मध्यप्रदेश की राजधानी। जबलपुर से नागपुर-विदर्भ की संभावित राजधानी है। जबलपुर से इलाहाबाद-पूर्वांचल की संभावित राजधानी है। जबलपुर से झांसी-बुंदेलखंड की संभावित राजधानी। सभी की दूरी लगभग 3॰॰ किलोमीटर है, 10 प्रतिशत ज्यादा या कम।
इन परिस्थितियों में जबलपुर केंद्र बिंदु के रूप में ताकतवर है, पर बंटवारा हो जाने पर सबसे कमजोर भी, क्योंकि सबके पास भाषा एवं क्षेत्र की ताकत है, जो महाकौशल के पास नहीं है। सागर यदि राज्य के अंदर रहे और महाकौशल का हिस्सा बने, तब विदिशा जिलेवासी मध्यभारत में रहना चाहेंगे, न कि महाकौशल में और यदि राज्य पुनर्गठन में वह बुंदेलखंड में जाता है, तब भी विदिशा जिलेवासी सहमत नहीं होंगे।
इस परिस्थिति में लोकसभा सीट दो राज्यों में हो नहीं सकती। ऐसी स्थिति में विषमता, दुविधा, असहमति एवं असंतुष्टि बनी रहेगी। इसी प्रकार खजुराहो, जो उत्तरप्रदेश की सीमा से जबलपुर जिले की सीमा तक है, तो कटनी जिलेवासियों के साथ भी दुविधा रहेगी। वे कहां जाएंगे? लोकसभा का क्षेत्र बंट नहीं सकता।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

भाषा, संस्कृति के आधार पर भी बन सकता है प्रथक महाकौशल


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 16

भाषा, संस्कृति के आधार पर भी बन सकता है प्रथक महाकौशल

महाकौशल की उपेक्षा का दंश झेल रहे यहां के निवासी



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। देश की आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन में भाषा को आधार बनाया गया था। अब पुनः सत्ताधारी दल का ध्यान भी बनने वाले नए व छोटे राज्यों के निर्माण में भाषा को प्राथमिकता देने का है। तब मध्यप्रदेश जैसे देश के हृदय स्थल में रहने वाले विभिन्न भाषा-भाषी, धर्मावलंबी, क्षेत्रवासियों को क्या अपना समर्थन दिखाने के लिए जातिवादी, भाषावादी या क्षेत्रीयतावादी प्रवृत्ति को प्रबल बनाना पडेगा? यह प्रश्न उत्तेजनावर्धक नहीं, आत्मचिंतनकारी है। शायद महाकौशल के निवासी आज इसी मनोदशा से गुजर रहे हैं।
पहले राज्य पुनर्गठन आयोग से ही महाकौशल की रट लगाने वाले आज भी महाकौशल की उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं, पर महाकौशल की स्थापना का स्वप्न देखने वालों ने राज्य बनाने की ताकत तथा लक्ष्य को सही दृष्टि से नहीं पहचाना। राज्य बनाने की ताकत भाषा में है, पर आप अनेक भाषा-भाषी हैं। राज्य बनाने की ताकत जातिगत घनत्व व उसके भूगोल में है, पर आप न जातिवादी हैं, न जाति विशेष द्वारा राज्य करने वाले क्षेत्र के भूगोल वाले। यहां तो गोंडवाना राज्य था, जो आज जनजाति है। राज्य लेने के लिए इन दोनों की भावनात्मक शक्ति से नेता पैदा होते हैं, जो आफ पास नहीं है।
इस क्षेत्र में शिक्षाविद, साहित्यकार, डॉक्टर, वैद्य, पत्रकार, धर्माचार्य सभी हैं, जो समाज को दिशा देने वाले कारक हैं। जल, जंगल, जमीन, खनिज, मेहनतकश लोग हैं, पर प्रशासन में आधिपत्य रखने वाले व नेताओं का दिमाग कहे जाने वाले प्रशासनिक अधिकारी, आईपीएस, आईएएस नहीं हैं।
मूल जातिवादी, भाषावादी नहीं होता, तब हमें भूलों को सुधारकर आत्मावलोकन की शक्ति से वर्तमान की सच्चाई का ईमानदारी से आकलन करना चाहिए। मध्यप्रदेश में राज्य के भीतर राज्य बन सकता है। तब वह विभिन्न भाषा-भाषी, जाति-समूह, संस्कृति का एक ऐसा राज्य होगा, जिसमें बुंदेलखंडी, महाकौशलवादी, गोंडवानावादी, बघेलखंडी संस्कृतियों का समावेश होगा।
मगर, जैसे पुनः राज्य पुनर्गठन आयोग बना और वह भाषा के आधार पर बना, तो फिर सर्वाधिक नुकसान किसका होगा? यह चिंतन का प्रमुख विषय है और महाकौशल एवं गोंडवाना संस्कृति के लिए चिंता का विषय भी। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री का बुंदेलखंड का प्रस्ताव मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को हमसे दूर कर देगा। इनकी प्राथमिकता बुंदेलखंड के साथ जाने की होगी, न कि हमारे साथ रहने की। पूर्वांचल के निर्माण की घोषणा बघेलखंड-वासियों की विंध्याचल प्रदेश की मांग से मेल खाती दिखती है, तब अंतरराज्यीय राज्य पुनर्गठन में हम कहां होंगे? तब हम कटे-फटे, निःसहाय, अलग-थलग दिखाई पडेंगे। जो लोग राज्य की लडाई की वकालत करते हैं, वे किस आधार पर राज्य की कल्पना करते हैं, उन्हें स्पष्ट करना होगा। बगैर तत्वों-तथ्यों के राज्य की लडाई केवल मृग-मारीचिका ही होगी।

(क्रमशः जारी)

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

गोंगापा ने दिखाई राजनैतिक इच्छा शक्ति


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 14

गोंगापा ने दिखाई राजनैतिक इच्छा शक्ति

24 जिले, 108 विधानसभा और 13 लोकसभा को मिलाकर बनाया जाए गोंडवाना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। आजादी के उपरांत जिस तरह भाषावार, धर्मिक, संस्कृति के आधार पर गोंडवाना राज्य का गठन न किया जाकर राजनेताओं ने इस क्षेत्र के साथ अन्याय किया है। जबलपुर के इर्दगिर्द के क्षेत्र को राजनैतिक दलों द्वारा जानबूझकर उपेक्षित छोड़ा गया है, जो निंदनीय है। उक्ताशय की बात गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की सिवनी जिला इकाई के मीडिया प्रभारी विवेक डेहरिया द्वारा कही गई है।
श्री डेहरिया ने आगे कहा कि सरकारों द्वारा जानते बूझते महाकौशल अंचल जो वास्तव में गोंड शासकों का गढ़ रहा है के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा है। मध्य प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा भी गोंडवाना विकास प्राधिकरण के बजाए महाकौशल विकास प्राधिकरण का गठन कर एक बार फिर इस आंदोलन को कुचलने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। गौरतलब है कि विन्ध्य प्रदेश में विन्ध्य विकास प्राधिकरण और बुंदेलखण्ड में बुंदेलखण्ड विकास प्राधिकरण अस्तित्व में हैं।
गोंगपा के मीडिया प्रभारी विवेक डेहरिया ने आगे कहा कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक और नेशनल प्रेजीडेंट दादा हीरा सिंह मरकाम के नेतृत्व में अनेकों धरने और प्रदर्शन के माध्यम से ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं किन्तु फिर भी राजनेताओं की तंद्रा नहीं टूटी है।
श्री डेहरिया ने मांग की है कि गोंडवाना संस्कृति, गोंडी भाषा, गोंडी धर्म और गोंडवाना शासनकाल के गौरवशाली इतिहास को देखते हुए गोंडवाना के नाम से प्रथक राज्य की स्थापना की जाए। इस राज्य को जबलपुर केंद्र और राजधानी बनाकर इसमें 24 जिलों, 103 विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही साथ 13 लोकसभा क्षेत्रों को इसमें शमिल किया जाए।
प्रथक महाकौशल राज्य के लिए जबलपुर अंचल और गोंडवाना शासनकाल का गौरवशाली इतिहास ही पर्याप्त आधार माना जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में अनेक बार महामहिम राष्ट्रपति के नाम से गोंडवाना गणतंत्र पार्टी द्वारा ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं, पर इस क्षेत्र के जनादेश प्राप्त नुमाईंदों ने इस तरह की मांग के आंदोलनों को सदा ही कुचलने का कुत्सित प्रयास ही किया है।
गौरतलब है कि राजा दलपत शाह, वीरांगना रानी दुगार्वती, शंकर शाह, रघुनाथ शाह जैसे गोंड शासक न केवल न्यायप्रीय शासक रहे हैं, वरन् इन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महती भूमिका निभाकर गौंड समुदाय का सर सदा के लिए उंचा ही उठाया है। अपने इन वीर शासकों और योद्धाओं को सच्ची श्रृद्धांजली के बतौर क्षेत्र के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्रथक राज्य के लिए अपने अपने क्षेत्र के सांसद विधायक को जगाए।

(क्रमशः जारी)

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

महाकौशल प्रांत को प्रथक गौंडवाना राज्य का नाम देने की मांग


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 13

महाकौशल प्रांत को प्रथक गौंडवाना राज्य का नाम देने की मांग

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने उठाया प्रथक राज्य का मसला



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। महाकौशल प्रांत को मध्य प्रदेश से काटकर अलग करने की मांग अब तेज होने लगी है। राजनैतिक और सामाजिक संगठन भी इसमें अपनी जिम्मेदार भूमिका निभा रहे हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम ने प्रथक महाकौशल प्रांत के 16 जिलों के अलावा आठ अन्य जिलों को इसमें शामिल कर इसका नाम गोंडवाना राज्य करने की मांग की है।

हीरा सिंह मरकाम ने कहा कि जब मध्य प्रदेश की स्थापना हुई थी, उस समय 1956 में भाषावार राज्यों का गठन किया था। उस वक्त गौंडी भाषी बाहुल्य गोंडवाना क्षेत्र को प्रथक राज्य नहीं बनाया गया था। इसके कारण उसकी भाषा, धर्म, संस्कृति, आस्था, विश्वास के साथ ही साथ उसकी एतिहासिक धरोहरों की समुचित सुरक्षा नही हो सकी। उन्होंने कहा कि इस जाति के उद्धार के लिए वे कृत संकल्पित हैं।

श्री मरकाम ने कहा कि गौंडवाना राज्य के गठन से गौंडी भाषा बोलने वाले लोगों का स्वाभिमान जागृत होगा। इतना ही नहीं वे अपना विकास अपने सामाजिक सिद्धांत और दर्शन के मानिंद करने में सक्षम हो पाएंगे। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि गोंडवाना क्षेत्र का यह दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि आजादी के छः दशकों के उपरांत भी गोंडवाना राज्य के लोगों को मुख्य धारा में नहीं लाया जा सका है।

उन्होंने कहा कि संविधान की समानता के आधार पर एवं छोटे राज्य, संभाग, जिले बहुत ही तीव्र गति से आर्थिक, प्रशासनिक रूप से उन्नति के मार्ग प्रशस्त करते हैं, इसी अवधारणा के तहत छोटे राज्यों का निर्माण बहुत जरूरी है। इसी के मद्देनजर गोंडवाना क्षेत्र को मध्य प्रदेश से अलग कर इसे प्रथक गौंडवाना राज्य बनाया जाए ताकि गौंडी भाषा बोलने वालों को उनका वाजिब हक मिल सके।

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेशनल प्रेजीडेंट हीरा सिंह मरकाम ने आगे कहा कि गोंडवाना राज्य का निर्माण आज की महती आवश्यक्ता है। इसके अतिरिक्त देश में किसान और मजदूर, वास्तविक तौर पर नौकरशाह, नेता और पूंजीपतियों के कारण पूरी तरह शोषित हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि गौंडी भाषा बाहुल्य गोंडवाना क्षेत्र जिसमें महाकौशल के सोलह जिले शामिल हैं को प्रथक राज्य बनाया जाए।

(क्रमशः जारी)

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

नए प्रांत बनने से हो सकता है सतपुड़ा संभाग का अभ्युदय


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 11

नए प्रांत बनने से हो सकता है सतपुड़ा संभाग का अभ्युदय

राजनैतिक बिसात की सीढ़ियां चढ़ उतर रहा है संभागीय मुख्यालय



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अपने अंदर आकूत प्राकृतिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संपदाएं सहेजने वाले महाकौशल प्रांत का अगर गठन कर दिया जाता है तो सालों से लटक रहे सतपुड़ा संभाग के गठन के मार्ग प्रशस्त होने से कोई रोक नहीं सकता है। वर्तमान में इसके संभागीय मुख्यालय को कहां रखा जाए इसे लेकर मामला अटका हुआ बताया जा रहा है।

मौटे तौर पर महाकौशल प्रांत की जो परिकल्पना लोगों के दिमाग में है उसमें वर्तमान में जबलपुर, रीवा, शहडोल और प्रस्तावित सतपुड़ा संभाग शामिल है। सतपुड़ा संभाग में सिवनी बालाघाट और छिंदवाड़ा जिलों को शामिल किया जाना प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के बाद भी महाकौशल का सतपुड़ा संभाग अस्तित्व में नही आ पा रहा है।

वस्तुतः देखा जाए तो इन तीन जिलों को मिलाकर प्रस्तावित सतपुड़ा संभाग में झगड़ा संभागीय मुख्यालय का है। भौगोलिक दृष्टि से इन तीनों जिलों का केंद्र सिवनी है, इस लिहाज से संभागीय मुख्यालय के लिए सिवनी एकदम मुफीद है, पर कमजोर और षणयंत्रकारी राजनैतिक नेतृत्व सिवनी के संभागीय मुख्यालय बनने में आड़े आ रहा है।

मध्य प्रदेश काडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहते हैं कि सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय छिंदवाड़ा बने किन्तु केंद्रीय मंत्री कमल नाथ अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में दो पावर सेंटर (कलेक्टर और कमिश्नर) नहीं चाहते हैं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सूबे के निजाम होने के बाद भी सतपुड़ा संभाग का संभागीय मुख्यालय अब तक तय नहीं कर पाए हैं।

उक्त अधिकारी ने आगे कहा कि 2003 दिसंबर में जब प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उमा भारती बैठीं और उस समय उनके सबसे विश्वस्त प्रहलाद पटेल को कमल नाथ ने 2004 लोकसभा चुनावों में शिकस्त दी तब उमा भारती, कमल नाथ से जमकर खफा हो गईं थीं। यही कारण था कि कमल नाथ की इच्छा के खिलाफ उमा भारती ने छिंदवाड़ा में पुलिस उप महानिरीक्षक के कार्यालय की स्थापना कर दी थी।

भाजपाई गलियारों में यह बात चटखारे लेकर हो रही है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान स्थानीय शासन मंत्री बाबूलाल गौर द्वारा कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के क्षेत्र से ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, एवं मुख्यमंत्री चाहकर भी सतपुड़ा संभाग का संभागीय मुख्यालय छिंदवाड़ा में नहीं बना पा रहे हैं। अब तो यही संभवनाएं दिखाई पड़ रही हैं कि अगर महाकौशल प्रांत बना तभी सतपुड़ा संभाग के अस्तित्व में आने के मार्ग प्रशस्त हो सकेंगे।

(क्रमशः जारी)

महाकौशल के सपने को पलीता लगाते बिसेन!


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 10

महाकौशल के सपने को पलीता लगाते बिसेन!

बालाघाट को छत्तीसगढ़ में शामिल करने कर दी मांग!



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अपने अंदर अकूत प्राकृतिक संपदाओं को समेटने वाले महाकौशल प्रांत के सपने को खण्डित करने के कुत्सित प्रयास आरंभ हो गए हैं। बालाघाट कोटे से मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने महाकौशल अंचल के अभिन्न अंग नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले को वर्तमान के मध्य प्रदेश से प्रथक कर इसे छत्तीगढ़ में शामिल करने की मांग कर डाली है। इसके लिए वे बाकायदा प्रयास में भी लग गए हैं।

मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन ने छत्तीगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित सहकारिता की राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में यह कहकर ठहरे हुए पानी में कंकर मारकर हलचल पैदा कर दी कि मध्य प्रदेश के बालाघाट और छत्तीसगढ़ की संस्कृति एक समान है अतः इसे मध्य प्रदेश से प्रथक कर छत्तीगढ़ का हिस्सा बना देना चाहिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीगढ़ के निजाम डॉ.रमन सिंह ने भी आग में घी डालते हुए कह दिया कि अगर बालाघाट के लोग राज्य परिवर्तन चाहते हैं तो उनका स्वागत है। केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत ने भी बिसेन की मांग का स्वागत कर दिया है।

सियासी गलियारों में इस मामले को विभिन्न दृष्टिकोण से देखा जाने लगा है। लोगोें का मानना है कि एमपी के सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन का यह वक्तव्य वस्तुतः मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ बगावत का बिगुल है। माना जा रहा है कि अपनी कार्यप्रणाली के कारण सदा से ही चर्चा में रहने वाले गौरी शंकर बिसेन को मंत्रीमण्डल विस्तार में लाल बत्ती से महरूम रखने की जुगत लगाई जा रही है।

मुख्यमंत्री के करीबी सूत्रों का कहना है कि सीएम शिवराज सिंह चौहान पर संगठन का दवाब है कि उन्हें जल्द ही पदमुक्त किया जाए। कभी पटवारी को उठक बैठक लगावाकर कभी आदिवासियों को जातिसूचक शब्द कहकर तो कभी पंडितों का अपमान करने वाले बिसेन मंत्री बनने के बाद से ही चर्चाओं में हैं। बिसेन के इस नए तीर से शिवराज विरोधी अब सक्रिय हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि शिवराज की कैबनेट के एक कबीना मंत्री द्वारा इस तरह का वक्तव्य दिए जाने का सीधा अर्थ यही लगाया जाएगा कि शिव के गण ही उनके बजाए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की रीति नीति से ज्यादा इत्तेफाक रख रहे हैं।

माना जा रहा है कि अगर प्रथक महाकौशल प्रांत का गठन होता है तो उसमें भाजपा के पहली पंक्ति के नेताओं में पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते ही प्रमुख होंगे। सदा से प्रहलाद पटेल का विरोध करने वाले बिसेन द्वारा इस नए राग के पीछे यह भी माना जा रहा है कि किसी भी स्थिति में महाकौशल प्रांत का गठन न हो सके और अगर हो भी तो बिसेन के प्रभाव वाले बालाघाट जिले को महाकौशल में शामिल न किया सके, ताकि वे भी स्वच्छंद होकर अपनी राजनैतिक बिसात बिछा सकें।

(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

नेताओं से परिपूर्ण है महाकौशल


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 9

नेताओं से परिपूर्ण है महाकौशल

कद्दावर नेताओं की फौज भी नहीं बनवा पा रही महाकौशल प्रांत



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आजादी के वक्त सेंट्रल प्रोवेन्सेस एण्ड बरार का हिस्सा रहा हो या आजादी के सालों बाद संयुक्त मध्य प्रदेश रहा हो अथवा छत्तीसगढ़ से टूटकर बचे मध्य प्रदेश का हिस्सा रहा हो सदा ही उपेक्षा का दंश झेला है महाकौशल प्रांत ने। इस प्रांत में शामिल जिलों की सरहदों के साथ केंद्र और राज्य सरकार ने हमेशा से ही उपेक्षात्मक रवैया अपनाया जाता रहा है।

इस प्रांत ने पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र जैसी राजनैतिक सूझबूझ वाली हस्ती को दिया जो प्रदेश के भाल पर महाकौशल का प्रतीक पुरूष साबित हुआ। महाकौशल ने प्रदेश को स्व.द्वारका प्रसाद मिश्र जैसा सबल, सुलझा और शक्तिशाली मुख्यमंत्री दिया। इसके अलावा केंद्र में गार्गीशंकर मिश्र जैसे कद्दावर मंत्री दिए, जिनकी कर्मभूमि छिंदवाड़ा और सिवनी रही। राजनैतिक तौर पर बलात ही हाशिए में ढकेल दी गई प्रदेश और देश की तेज तर्रार मंत्री सुश्री विमला वर्मा की कर्मभूमि सिवनी ही रही है। सुश्री वर्मा के बनाए लोगों ने ही उन्हें पार्श्व में ढकेला, वरना आज वे किसी प्रांत की महामहिम राज्यपाल या देश की महामहिम राष्ट्रपति बनने की काबिलियत रखती हैं।

केंद्रीय परिदृश्य में अगर देखा जाए तो कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय महासचिव और अनेक विभागों के मंत्री रहे कमल नाथ का केंद्रीय राजनीति में अपना अलग ही महत्व है। इसके अलावा प्रदेश में राजनैतिक धुरी बन चुके हरवंश सिंह ठाकुर की जन्म भूमि छिंदवाड़ा तो कर्मभूमि सिवनी है। वे आज मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष पद पर विराज मान हैं। हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह भी सिवनी जिले से ही हैं।

इसके अतिरिक्त दो दशकों तक स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष रहे रामेश्वर नीखरा, पूर्व मंत्री सत्येंद्र पाठक, दीपक सक्सेना, प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष विश्वनाथ दुबे, प्रवक्ता कल्याणी पांडे, रेखा बिसेन, पुष्पा बिसेन, दयाल सिंह तुमराची और न जाने कितने जनसेवक हैं जो प्रदेश और केंद्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं।

भाजपा भी महाकौशल प्रांत में जबर्दस्त तरीके से सक्षम ही प्रतीत होती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल वर्तमान में केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। वे भाजपा के असंगठित मोर्चे के अध्यक्ष हैं। फग्गन सिंह कुलस्ते भी केंद्रीय राजनीति में हैं और वे भी भाजपा के एक अनुसूचित जनजाति मोर्चे के नेशनल प्रेजीडेंट हैं।

मंत्रियों में गौरी शंकर बिसेन, अजय बिश्नोई, देवी सिंह सैयाम, नाना माहोड़े तो पूर्व मंत्रियों में डॉ.ढाल सिंह बिसेन, चौधरी चंद्रभान सिंह आदि का शुमार है। महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश दिवाकर भी दो बार विधायक रहे हैं। मध्य प्रदेश महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष श्रीमति नीता पटेरिया सिवनी से विधायक भी हैं।

प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष अनुसुईया उईके, विनोद गोटिया, राकेश सिंह और न जाने कितनी विभूतियां भाजपा की झोली में हैं। इतना ही नहीं एनडीए के सबसे ताकतवर स्तंभ शरद यादव की राजनीति भी महाकौशल की संभावित राजधानी जबलपुर से ही आरंभ हुई। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि राजनैतिक रूप से इतना समृद्ध होने के बाद भी किसी जनसेवक ने अपनी इस धरा के विकास के मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रथक महाकौशल प्रांत की बात वजनदारी से क्यों नहीं रखी?

(क्रमशः जारी)

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

तपस्वियों की जन्मभूमि है महाकौशल प्रांत


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 8

तपस्वियों की जन्मभूमि है महाकौशल प्रांत

महर्षि, ओशो, शंकराचार्य जैसी विभूतियों को जन्मा है महाकौशल ने



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत गणराज्य का हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश वैसे तो कभी का आत्मनिर्भर हो चुका होता, किन्तु राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में आज भी यह हर मोर्चे पर जूझ ही रहा है। हृदय प्रदेश में महाकौशल प्रांत भी है जिसे प्रथक करने का आंदोलन अब जोर पकड़ने लगा है। महाकौशल प्रांत में न जाने कितने तपस्वी हुए हैं जिनके तप अनुभव आदि से देश विदेश में शांति और संपन्नता ने द्वार खटखटाए हैं।

महाकौशल प्रांत के गर्भ से अनेक एसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है जिन्होंने देश विदेश में अध्यात्म, तप, त्याग और बलिदान का मार्ग दिखाते हुए लोगों में सकारात्मक उर्जा का संचार किया है। इन विभूतियों में सनातन पंथी हिन्दु धर्म के द्विपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का नाम सबसे उपर आता है। शंकराचार्य ही महाराज पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से देश को दिशा देने का काम कर रहे हैं। समय समय पर उनके बातए मार्ग पर चलकर लोक पुण्य अर्जित करते हैं।

माना जाता है कि परमपूज्य शंकराचार्य जी की पादुका पूजन मात्र से ही वेतरणी को पार किया जा सकता है। सिवनी जिले का यह सौभाग्य ही माना जाएगा कि जगतगुरू का अवतरण सिवनी जिला बना। जिस तरह भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी मथुरा वृंदावन बना उसी तरह जगतगुरू की बाल क्रीड़ाओं का साक्षी सिवनी जिला बना। मानवता और धर्म का सार बताने वाले दिव्य महापुरूष के द्वारा निर्मित और पूजित पूजन स्थलों में आज भी धर्मध्वाजा शान से लहराती दिख जाती है।

देश विदेश में अपने बौद्धिक कौशल का लोहा मनवाकर विश्व को शांति के मार्ग पर चलने का पथ दिखाने वाले आध्यात्मिक गुरू महर्षि महेश योगी (महेश श्रीवास्तव) भी इसी महाकौशल की माटी में अवतरित हुए हैं। वे महाकौशल की प्रस्तावित राजधानी जबलपुर की विभूति हैं। महर्षि महेश योगी ने अपने आध्यात्मिक कौशल के बल पर न केवल भारत वरन समूचे विश्व में भारत का डंका बजाया है। आज उनके द्वारा स्थापित महार्षि विद्या मंदिर देश के कमोबेश हर जिले में विद्यार्थियों के विद्यार्जन का जरिया बने हुए हैं, जिनमें करोड़ों विद्यार्थी लाभान्वित हुए बिना नहीं हैं। प्रायमरी से लेकर स्नातकोत्तर तक हर स्तर का शिक्षण महर्षि के विद्यालयों में संभव है।

यह महज संयोग नहीं है कि इस तरह की महान विभूतियों का अवतरण महाकौशल प्रांत में हुआ, यह इस धरा का सौभाग्य ही माना जाएगा कि देश विदेश में प्रथक तरीके से आध्यात्म का पाठ पढ़ाने वाले चर्चित आचार्य रजनीश भी नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में ही अवतरित हुए। ओशो ने समूचे विश्व में अपनी आध्यात्मिक चेतना का लोहा मनवाया। महाराष्ट्र के पूना शहर को अपनी कर्मस्थली के तौर पर चुनकर उन्होंने देश में भी आध्यात्मिक चेतना का जो संचार किया वह अनवरत जारी है।

इसके साथ ही साथ दिल्ली को कर्मस्थली बनाने वाले स्वामी प्रज्ञानंद अपने आध्यात्मिक संदेशों से देश विदेश में कीर्ति फैला रहे हैं वे भी जबलपुर जिले से हैं। राजस्थान के जयपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले स्वामी प्रज्ञनानंद जी भी सिवनी जिले के केवलारी तहसील के साठई गांव में अवतरित हुए हैं। जगतगुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज से दीक्षित स्वामी प्रज्ञनानंद जी के शिष्य देश भर फैले हुए हैं। उनके मधुर कंठ से निकलने वाली भागवत कथा का आनंद लेते हुए श्रृद्धालु इतने भाव विभोर हो उठते हैं कि कथा के पंडाल में ही भक्तिमय नृत्य आरंभ हो जाता है।

इन समस्त विभूतियों के बारे में जिकर करने का ओचित्य महज इतना ही है कि महाकौशल की माटी को कर्मभूमि बनाने वाले जनसेवकों को इस माटी के महत्व के बारे में बताया जा सके। महाकौशल की माटी से चुनाव जीतकर राजनीतिक पायदान चढ़ने वाले नेताओं को यह बताया जा सके कि वे किस पावन धरा को अपनी कर्मभूमि बनाए हुए हैं। अब वक्त आ गया है जब इन जनसेवकों को अपनी माटी का कर्ज उतारकर प्रथक महाकौशल के आंदोलन में जान फूॅकना होगा।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 10 दिसंबर 2011


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 7

राकेश सिंह ने परोक्ष तौर पर किया महाकौशल प्रांत का इशारा

तारामण्डल और विज्ञान केंद्र की उठाई मांग



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भविष्य में यदि महाकौशल प्रांत का सपना आकार लेता है तो निश्चित तौर पर उसकी राजधानी हृदय प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को ही बनाया जाएगा। यहां से वर्तमान में भाजपा के संसद सदस्य राकेश सिंह ने लोकसभा में जबलपुर के विकास के आयामों को गढ़ने की तो कोशिश की गई है किन्तु महाकौशल को प्रथक प्रांत बनाने के लिए वे अब भी मौन ही धारण किए हुए हैं। अगर महाकौशल प्रांत अस्तित्व में आता है तो राकेश सिंह इस प्रांत की राजधानी के संसद सदस्य होने का गौरव पा सकते हैं।

संसद में जबलपुर के सांसद राकेश सिंह ने मांग रखी कि जबलपुर वर्तमान युग में युवा पीढ़ी को विज्ञान की दृष्टि से जागरूक एवं सक्षम बनाने के लिये जबलपुर में विज्ञान केन्द्र (साइंस सेंटर) एवं इसके साथ ही तारामंडल (प्लेनेटेरियम) स्थापित किया जाये। लोकसभा में उन्होंने कहा कि जबलपुर प्राचीन काल से ही शिक्षा के बड़े केन्द्र के रूप में विख्यात रहा है, यहां पर विज्ञान केन्द्र और तारामंडल की स्थापना से विद्यार्थियों के साथ ही युवा वर्ग को काफी लाभ होगा।

श्री सिंह ने कहा कि जबलपुर पूर्वी मध्यप्रदेश का प्रमुख केन्द्र है। यहां पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, पशु चिकित्सा विश्व विद्यालय एवं आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के साथ ही साथ ट्रिपल आईटी जैसे शैक्षणिक संस्थान हैं। वन विभाग का उष्ण कटिबंधीय अनुसंधान संस्थान एवं राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान निदेशालय जैसे शोध संस्थान हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन की पांच बड़ी इकाइयां जीसीएफ, जीआईएफ, व्हीएफजे, 506 आर्मी वर्कशॉप के साथ-साथ सेना का सप्लाई डिपो, एमईएस, सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर, आर्मी आयुध कोर (कॉलेज ऑफ मेटेरियल मैनेजमेंट), जे एंड के तथा जीआरसी के ट्रेनिंग सेंटर भी स्थित है।

इसके साथ ही यह एक बड़े पर्यटन केन्द्र के रूप में उभर रहा है। इसके अलावा यह संभागीय मुख्यालय भी है। बावजूद इसके बच्चों और युवा पीढ़ी को बौद्धिक व व्यावहारिक रूप से विज्ञान के प्रति जागरूक बनाने के लिये कोई विश्व स्तरीय संस्थान नहीं है। जिसकी वर्तमान समय में महती आवश्यकता है। सांसद श्री सिंह ने कहा कि नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम द्वारा देश के विभिन्न भागों में साइंस सेंटरों की स्थापना का कार्य किया जाता है। इस केन्द्र की स्थापना के लिये जबलपुर एक उपयुक्त स्थान है और इस केन्द्र के साथ यदि तारामंडल भी स्थापित होगा तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जायेगी।
सांसद राकेश सिंह निश्चित तौर पर साधुवाद के पात्र माने जा सकते हैं कि उन्होंने महाकौशल के मुख्यालय जबलपुर को और अधिक समृद्ध करने के प्रयास किए हैं। महाकौशल के समस्त राजनैतिक दलों के अन्य क्षत्रपों, सांसद और विधायकों से अब उम्मीद बेमानी ही होगी। महाकौशल से केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, के.डी.देशमुख, बसोरी सिंह मसराम, उदय प्रताप सिंह, गोविंद प्रसाद मिश्रा, राकेश सिंह, जितेंद्र सिंह बुंदेला, श्रीमति राजेश नंदनी सिंह, देवराज सिंह पटेल सांसद हैं, पर किसी ने इस बारे में आवाज नहीं उठाई है, इसलिए सांसद राकेश सिंह से ही अपेक्षा है कि वे प्रथक महाकौशल प्रांत का आंदोलन छेड़ें और महाकौशल के निवासियों को उनका वाजिब हक दिलवाएं।

(क्रमशः जारी)