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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

गैस त्रासदी मामले में सीएम ने लिखा पीएम को पत्र


गैस त्रासदी मामले में सीएम ने लिखा पीएम को पत्र

मृतकों के लिए मांगा दस लाख का मुआवजा



(अंशुल गुप्ता)

भोपाल। मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने गैस त्रासदी के 10 हजार 47 मामलों में मृतक श्रेणी के तहत 10-10 लाख रुपए मुआवजा देने की मांग की है। मंत्री समूह और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इन मामलों को अनुग्रह राशि दिए जाने के मापदंड में शामिल नहीं माना था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस संबंध में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को पत्र लिखा है।

मुख्यमंत्री ने अपने इस पत्र में अपने 24 जून 2010 के पत्र का हवाला देकर गैस पीड़ितों के प्रतिनिधियों के साथ प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है। पत्र में मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को बताया है कि गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम की अध्यक्षता में बने मंत्री समूहों की बैठकों में मप्र सरकार ने गैस त्रासदी के मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपए और गैस पीड़ितों को पांच लाख रुपए मुआवजा देने की मांग की थी।

केंद्र सरकार ने भोपाल गैस लीक डिजास्टर एक्ट के तहत मुआवजा बांटने के लिए न्यायिक अधिकरण गठित किया था। मंत्री समूह ने 5 लाख 14 हजार 376 गैस पीड़ितों के प्रकरणों में से कुल 48 हजार 694 मामलों में विभिन्न श्रेणियों में अतिरिक्त अनुग्रह राशि बढ़ाकर और पूर्व में दी गई मुआवजा राशि को घटाकर देने की सिफारिश की थी। मुख्यमंत्री ने लिखा कि वास्तव में 10 हजार 47 प्रकरण मृतक श्रेणी में हैं लेकिन मंत्री समूह और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इन मामलों में इनके परिवारों को अनुग्रह राशि देने के मापदंड में शामिल ही नहीं किया। मुख्यमंत्री ने आपत्ति व्यक्ति करते कहा है कि मृत्यु श्रेणी में दावों के वर्गीकरण में मृत व्यक्ति को स्थाई एवं आंशिक निशक्तता की श्रेणी में माना गया इस वर्गीकरण को सीएम ने न्यायसंगत नहीं माना है।

इसके अलावा पांच लाख 21 हजार 332 आंशिक गैस पीड़ितों को मुआवजा देने की अनुशंसा ही नहीं की गई। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि इन बिंदुओं पर पुनरू विचार कर गैस पीड़ितों के साथ न्याय किया जाए। ज्ञात हो कि तीन दिसंबर को गैसकांड की बरसी पर भोपाल में रेल रोको आंदोलन के हिंसक होने के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज किया था। इस घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री को यह पत्र गैस पीड़ितों की नाराजी दूर करने की कोशिश माना जा रहा है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

शिवराज ने फिर छला लोगों को


शिवराज ने फिर छला लोगों को

पीएम से मिलवाने ले जाएंगे गैस पीडितों को शिवराज

सिवनी की तरह छले जाएंगे भोपालवासी


(अंशुल गुप्ता)

भोपाल। पिछली सदी की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड की 27 वीं बरसी पर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मजलूमों पर तबियत से लाठियां भांजी गईं। प्रदर्शनकारियों और प्रशासन कि बीच हुई झड़प में कलेक्टर, एसपी सहित लगभग डेढ़ सौ लोग घायल हुए। इस पूरे मामलें में डेढ़ दर्जन से अधिक वाहनों को फूंक दिया गया। बार बार केंद्र और राज्य सरकार के आश्वासनों का लालीपाप खाने वाले गैस पीडितों ने इस बार उग्र प्रदर्शन कर जता दिया है कि अब वे और छले जाने को तैयार नहीं हैं।

प्रदर्शनकारियों के पास विलंब से पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने चिर परिचित अंदाज में गैस पीडितों को आश्वासन दिया और मामले को शांत करवा दिया। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वे गैस पीडित संघ के पदाधिकारियों को वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह से मिलवाकर उन्हें न्याय दिलाने का प्रयास करेंगे। मुख्यमंत्री के वायदे के बाद गैस पीडित संघ ने अपना आंदोलन वापस तो ले लिया किन्तु मौके पर गैस पीडित संगठनों में सीएम सिंह के आश्वासन को लेकर तरह तरह की चर्चाएं व्याप्त थीं।

लोगों का कहना था कि इसके पहले अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में पर्यवरण के कथित पेंच के फंसने और इसका एलाईंमेंट बदलने के राजनैतिक षणयंत्र पर जब सिवनी जिले के नागरिकों ने उग्र प्रदर्शन किया था तब शिवराज सिंह ने कहा था कि भले ही सूरज पश्चिम से निकलना प्रारंभ हो जाए वे इस मार्ग का एलाईंमेंट बदलने नहीं देंगे।

उनकी इस हुंकार के बाद भी मध्य प्रदेश सरकार का शांत बैठना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। शिवराज सिंह चौहान ने आंदोलनकारियों से वायदा किया था कि वे उन्हें लेकर केंद्र सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों से मिलवाने ले जाएंगे। विडम्बना ही कही जाएगी कि श्री सिंह की यह दहाड़ भी सतपुड़ा की वादियों में ही गुम हो गई है। आज लगभग डेढ़ बरस बीतने के बाद भी शिवराज ने अपना वायदा नहीं निभाया है। लोगों का कहना है कि सिवनी की तर्ज पर अब भोपाल के गैसपीडित भी छले जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

इस रात की सुबह नहीं. . .


इस रात की सुबह नहीं. . .


(लिमटी खरे)

सत्ताईस साल गुजर जाने के बाद भी न तो भारतीय जनता पार्टी और न ही कांग्रेस ने भोपाल गैस कांड को गंभीरता से लिया है। इंसाफ की रस्मअदायगी में सियासी पार्टियों ने अपने अपने हित तबियत से साधे हैं। 1984 में दो और तीन दिसंबर की दरम्यानी रात में देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में लाशों के ढेर बिछ गए थे। उस वक्त देश और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार काबिज थी। भोपाल गैस कांड में अब तक न जाने कितने राज सामने आ चुके हैं। 84 में अमरिका मूल की डाव केमिकल्स के आगे देश के नीति निर्धारकों ने घुटने टेक दिए थे। सैम अंकल को बेच दिया था हिन्दुस्तान का जमीर। यूनियन कार्बाईड से निकली जहरीली गैस ने पांच लाख से ज्यादा लोगों पर असर दिखाया। बीस हजार से ज्यादा जानें गईं पर सरकारें नीरो के मानिंद चैन की बंसी ही बजाती रहीं। इसके बाद भी परमाणु करार करने को भारत सरकार बेकरार ही दिख रही है।


सन 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दर्मयानी रात में देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ गैस हादसा हिन्दुस्तान ही नहीं वरन दुनिया का सबसे बडा औद्योगिक हादसा था। यूनियन कार्बाईड के डॉव केमिकल के कारखाने से निकली जानलेवा गैस ने पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जद में लिया और बीस हजार से ज्यादा काल कलवित हो गए थे। आश्चर्य इस बात का है कि इसके दोषी आज भी सलाखों के बाहर हैं। हिन्दुस्तान में पीडित न्याय की गुहार लगाते हुए बच्चे से जवान, जवान से प्रोढ, प्रोढ से बुजुर्ग और न जाने कितने बुजुर्ग तो दुनिया छोड चुके हैं। 26 साल का समय कम नहीं होता है। 26 साल में बच्चा समझदार होकर जवानी की दहलीज पर काफी आगे निकल चुका होता है। दुनिया की इतनी बडी औद्योगिक त्रासदी जो कि मानव निर्मित ही थी, के दोषियों की पहचान होने के बाद भी इसमें न्याय के लिए अगर भारत जैसे देश में इतना समय लग जाए तो यह निश्चित तौर पर हमें शर्मसार करने के लिए पर्याप्त ही माना जा सकता है।

इस त्रासदी के उपरांत आज भी प्रभावित इलाके में भूजल बुरी तरह प्रदूषित है, इससे प्रभावित लोगों की आने वाली पीढियां बिना किसी जुर्म की सजा शारीरिक और मानसिक तौर पर भुगत रहीं हैं। विडम्बना तो यह है कि हजारों को असमय ही मौत की नींद सुलाने वाले दोषियों को 25 साल बाद महज दो दो साल की सजा मिली और तो और उन्हें जमानत भी तत्काल ही मिल गई। हमारे विचार से तो इस मुकदमे की सजा इतनी होनी चाहिए थी, कि यह दुनिया भर में इस तरह के मामलों के लिए एक नजीर पेश करती, वस्तुतः एसा हुआ नहीं। देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी लाचार होकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है। फैसले में हुई देरी को वे दुर्भाग्यपूर्ण करार दे रहे हैं। दरअसल मोईली से ही यह प्रतिप्रश्न किए जाने की आवश्यक्ता है कि उन्होंने या उनके पहले रहे कानून मंत्रियों ने इस मामले में पीडितों को न्याय दिलवाने में क्या भूमिका निभाई है।

विश्व के इस सबसे बडे औद्योगिक हादसे का फैसला इस तरह का आया मानो किसी आम सडक या रेल दुर्घटना का फैसला सुनाया जा रहा हो। इस मामले में प्रमुख दोषी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन सर्वेसर्वा वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द भी न लिखा जाना निश्चित तौर पर आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। यह सब तब हुआ जब इस घटना के घटने के महज तीन दिन बाद ही मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया हो। सीबीआई पर लोगों का विश्वास आज भी कायम है। इस जांच एजेंसी के बारे में लोगों का मानना है कि यह भले ही सरकार के दबाव में काम करे पर इसमें पारदर्शिता कुछ हद तक तो होती है। इस फैसले के बाद से लोगों का भरोसा सीबीआई से उठना स्वाभाविक ही है। इस पूरे मामले ने भारत के ‘‘तंत्र‘‘ को ही बेनकाब कर दिया है। क्या कार्यपलिका, क्या न्यायपालिक और क्या विधायिका। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रजातंत्र के ये तीनों स्तंभ सिर्फ और सिर्फ बलशाली, बाहुबली, धनबली विशेष तबके की ‘‘लौंडी‘‘ बनकर रह गए हैं।

सीबीआई ने तीन साल तक लंबी छानबीन की और आरोप पत्र दायर किया था। इसके बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए थे। उच्च न्यायालय ने इनकी अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए और वहां से उन्होंने आरोप पत्र को अपने मुताबिक कमजोर करवाने में सफलता हासिल की। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सीबीआई इतनी कमजोर हो गई थी, कि उसने इस मामले की गंभीरता को न्यायालय के सामने नहीं रखा, या रखा भी तो पूरे मन से नहीं रख पाई। कारण चाहे जो भी रहे हों पर पीडितों के हाथ तो कुछ नहीं लगा।

आखिर क्या वजह थी कि एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद उसे गेस्ट हाउस में रखा गया। इसके बाद जब उसे जमानत मिली तो उसे विशेष विमान से भारत से भागने दिया गया। जब उसे 01 फरवरी 1992 को भगोडा घोषित कर दिया गया था, तब उसके प्रत्यापर्ण के लिए भारत सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए! 2004 में अमेरिका ने उसके प्रत्यापर्ण की अपील ठुकरा दी गई तो भारत सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। क्या दुनिया के चौधरी अमेरिका का इतना खौफ है कि भारत में हुए इस भयानक दिल दहला देने वाले हादसे के बाद भी सरकार उसे सजा दिलवाने भारत न ला सकी। इतना ही नहीं जब उसने अपना केस खुद नहीं लडा तब उसे इतने कम भोगमान पर छोड दिया गया। सरकार वैसे भी पहले ही लगभग दस गुना कम मुआवजा स्वीकार कर अपनी मंशा को स्पष्ट कर चुकी है। क्या कारण थे कि भारत सरकार ने इस कंपनी को चुपचाप बिक जाने दिया। इस दर्मयान भारत गणराज्य के वजीरे आजम और प्रजीडेंट न जाने कितनी मर्तबा अमेरिका की यात्रा पर गए होंगे पर किसी ने भी अमेरिका की सरकार के सामने इस मामले को उठाने की हिमाकत नहीं की। अगर भारत के नीति निर्धारक चाहते तो अमेरिका की सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर सकते थे कि वह यूनियन कार्बाईड से यह बात पूछे कि यह हादसा हुआ कैसे!

भोपाल गैस त्रासदी और लंबे समय बाद आया उसका यह फैसला निश्चित तौर पर खतरे की घंटी से कम नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों विशेषकर अमेरिका के जूते साफ करने को आमदा लोग अगर देश में विदेशी निर्भरता वाले परमाणु उर्जा संयंत्र लगाने की अनुमति देते हैं, और ईश्वर न करे कि अगर कोई हादसा हो जाए तो भारत सरकार और उसकी जांच एजेंसी किस भूमिका में होगी इस बात का परिचाक है यह पूरा प्रकरण। स्थिति परिस्थिति को देखते हुए हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार और उसकी एजेंसियों की नजर में भारत की जनता की जान की कीमत कीडे मकोडों जैसी ही है। अगर यह हादसा अमेरिका में घटा होता तो डाव केमिकल और यूनियन कार्बाईड का नामोनिशान मिटने के साथ ही साथ अनेक बीमा कंपनियों के दिवाले निकल चुके होते। यही हादसा अगर दिल्ली में हुआ होता तो इसकी सूरत कुछ और होती। सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली में उपहार सिनेमा में हुए हादसे के पीडितों को 15 से बीस लाख रूपए का मुआवजा मिल सकता है तो भोपाल गैस कांड के पीडितों को महज 25 - 25 हजार रूपए में क्यों टरका दिया गया।

55 अरब डालर की हो चुकी है डाव केमिकल। भोपाल जैसे हृदय विदारक हादसे को अंजाम देने के बाद भी यह कंपनी भारत का मोह नहीं छोड पा रही है। भारत सरकार है कि इस कंपनी को देश में दूसरे हादसे के लिए उपजाउ माहौल भी मुहैया करवा रही है। इस कंपनी ने वियतनाम युद्ध में एक जहरीली गैस बनाकर कहर बरपाया था। अब इस कंपनी के निशाने पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात सूबे हैं। इस कंपनी के प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अहसानों से दबे ही हैं केंद्र और सूबों के मंत्री, तभी तो ये डाव केमिकल की तारीफ में कशीदे गढने से नहीं चूकते। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं ही भोपाल में कंपनी के बंद पडे संयंत्र में जहरीले कचरे को छूकर कंपनी को सीधे तौर पर मदद करने का कुत्सित प्रयास किया था। इस कंपनी का महाराष्ट्र में मुंबई गोवा राजमार्ग पर एक संयंत्र आरंभ हो चुका है, जिसमें कीटनाशक बनता है। इसके अलावा गुजरात के दहेज में अगले साल यही कंपनी रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देगी।

1984 में देश के हृदय प्रदेश में हुई अब तक की सबसे बडी और भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के फैसले के 26 साल बाद इससे संबंधित नित नए खुलासे इस तरह हो रहे हैं मानो बालाजी फिल्मस का कोई टीवी सीरियल हो। हालात देखकर लगने लगा है जिस तरह टीवी सीरियल में एक के बाद एक एपीसोड बढते ही जाते हैं, वैसे ही इस मामले में भेद खुलते ही जाएंगे। 84 की त्रासदी के बाद जहां एक ओर भोपाल शहर ने लाशें उगलीं वहीं अब इसके फैसले के उपरांत राज उगलते ही जा रहे हैं। एक के बाद एक सनसनीखेज खुलासे, कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह को शक के दायरे में ला दिया गया है, प्रधानमंत्री मीडिया के सामने आने पर मजबूर हो गए हैं, नहीं डिगा तो कांग्रेस की राजमाता और स्व.राजीव गांधी की अर्धांग्नी सोनिया गांधी का सिहांसन। आज सोनिया गांधी ने साबित कर दिया है कि वे देश के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री पद से बडी अहमियत रखती हैं। कांग्रेस पर लगे आरोपों के मामले में प्रधानमंत्री गोल मोल जवाब दे रहे हैं। कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में है। सोनिया गांधी जबडे कसकर बांधे हुए हैं। उन्हें डर है कि अपने प्रबंधकों के मशवरों के चलते राजनैतिक बियावान में हाशिए में ढकेल दिए गए कुंवर अर्जुन सिंह उनके वक्तव्यों को किस दिशा में ले जाएं कहा नहीं जा सकता है। हालात देखकर लगता है कि अगर कुंवर अर्जुन सिंह ने मुंह खोला तो कांग्रेस की वो गत बन सकती है कि आने वाले दो तीन दशकों तक कांग्रेस का नामलेवा कोई भी नहीं बचेगा। कल तक सूने पडे कंुवर अर्जुन सिंह की सरकारी आवास में लाल बत्ती और सायरन की आवाजें इस बात का घोतक है कि भोपाल गैस कांड के फैसले से उनकी पूछ परख एकदम से बढ चुकी है।

तत्कालीन जिलाधिकारी मोती सिंह ने खुलासा किया कि उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव के दबाव में यूनियन कार्बाईड के प्रमुख वारेन एंडरसन को छोडा था। यह अकाट््य सत्य है कि देश को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही ‘‘हांक‘‘ (जिस तरह बेलगाडी को गाडीवान हांकता है) रहे हैं। क्या जिला दण्डाधिकारी ने तब ‘‘उपरी दबाव‘‘ को लिखा पढी में लिया था, अगर नहीं तो एंडरसन को भोपाल से भगाने का आपराधिक कृत्य मोती ंिसंह ने किया। मोती सिंह पर आपराधिक मामला दायर किया जाए फिर देखिए मजे। बरास्ता मोती सिंह एक के बाद एक सभी दोषी नग्नावस्था में सडको ंपर दिखाई देंगे।

जिस तरह बालाजी फिल्मस की प्रमुख एकता कपूर अपने सीरियल के अगले एपीसोड के लिए पटकथा आगे बढाती हैं, उसी तर्ज पर ‘‘भोपाल गैस कांड‘‘ सीरियल में बयानों की बोछारें हो रहीं हैं। छब्बीस साल का समय कम नहीं होता। अमूमन छब्बीस साल में एक युवा दो बच्चों का बाप बन चुका होता है, पर इन उमरदराज लोगों का साहस देखिए इस मामलें में छब्बीस साल तक मौन साधे रखा। आखिर क्या वजह थी कि छब्बीस सालों तक ये सारे राजदार अपने अंदर अपराध बोध को पालते रहे! राजधानी भोपाल के हनुमान गंज क्षेत्र में आता है यूनियन कार्बाईड। अब उस थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह की आत्मा जागी है। उन्होंने छब्बीस साल बाद बताने की जहमत उठाई है कि ‘‘उपरी दबाव‘‘ के चलते उन्होनंे धाराएं बदलीं थी। रात में उन्हें यूनियन कार्बाईड के प्रंबंधन के खिलाफ धारा ‘304के तहत मामला पंजीबद्ध किया था, पर सुबह लाशों के ढेर देखने के बाद उन्होंने प्रबंधन के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करना चाहा, किन्तु एक बार फिर ‘‘उपरी दबाव‘‘ का जिन्न सामने आया और उनके हाथ बंध गए।

सूत्रों के हवालों से जो खबरें मीडिया में आ रही हैं, उसके अनुसार तत्कालीन विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा पर भी शक की सुई आकर टिक जाती है। कहा जा रहा है कि रसगोत्रा ने एंडरसन को गैस कांड के उपरांत भोपाल यात्रा के दरम्यान पुलिस सुरक्षा और रिहाई तक सुनिश्चित की थी। अमेरिकी दूतावास के तत्कालीन उप प्रमुख गार्डन स्ट्रीब के खुलासे से भारत गणराज्य का प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय दोनों ही शक के घेरे में आ गया है। मामले के पंेच कुछ समझ में आने लगे हैं। रसगोत्रा ने एंडरसन को मदद का वादा किया। संभवतः इसकी जानकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को नहीं थी, इसीलिए एंडरसन को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके उपरांत वही ‘‘उपरी दबाव‘‘ के चलते रसगोत्रा को गार्डन ने उनका वादा याद दिलाया।

पूर्व अमेरिकी राजनयिक गार्डन स्ट्रीब का कहना है कि वारेन एंडरसन के मामले में भारत सरकार ने अमेरिका की इस शर्त का मान लिया था कि एंडरसन को भोपाल ले जाया जाए, किन्तु उसे सुरक्षित वापस पहुंचाया जाए। इसके बाद रसगोत्रा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को समझाया फिर दूरभाष खडके होंगे और एंडरसन ने राजकीय अतिथि का अघोषित दर्जा पाकर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को अपना सारथी बनाया। सरकारी वाहन में कंडक्टर की जगह तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह बैठे थे। मध्य प्रदेश सरकार का उडन खटोला उनके स्वागत में स्टेट हेंगर पर उनका इंतजार कर रहा था। केप्टन अली ने उनके आते ही उनका अभिवादन किया और उन्हें ससम्मान दिल्ली पहुंचाया दिया। एक टीवी चेनल के द्वारा जारी फुटेज में साफ दिखाई पड रहा है कि हजारों लोगों का हत्यारा वारेन एंडरसन यह कह रहा है, अमेरिका का कानून है, वह घर जाने के लिए स्वतंत्र है।

जनसेवक अपनी जवाबदारी भूल चुके हैं, यह बात पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अब किस पर भरोसा किया जाए। क्या माननीय न्यायालय स्वयं ही इस मामले में संज्ञान लेकर इन सभी से यह पूछ सकता है कि छब्बीस सालों तक सभी गोपनीय राजों को अपने सीने में दफन करने वालों की तंद्रा अब क्यों टूटी और अगर उन्होंने किसी के दबाव में अपने कर्तव्यों से मुंह मोडा था तो क्यों न उनसे छब्बीस साल का वेतन भत्ते और सारे सत्व जो उन्होंने इन छब्बीस सालों में लिए हैं, वे उनसे वापस ले लिए जाएं। वह पैसा आखिर जनता के गाढे पसीने की कमाई का ही था, अगर वे सेवानिवृत हो चुके हैं तो इन सभी की पेंशन तत्काल प्रभाव से रोक देना चाहिए। कोई भी सरकारी नुमाईंदा क्या दबाव में नौकरी करता है। सत्तर के दशक के पहले तो लोग भ्रष्टाचार करने से घबराते थे, इसे सामाजिक बुराई की संज्ञा दी जाती थी। क्या हो गया है कांग्रेस को आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस का चेहरा क्या इतना भयानक है कि सच्चाई सामने आते ही लोग इससे घ्रणा करने लगेंगे। क्या पंद्रह हजार से ज्यादा लाशों के एवज में कंाग्रेस ने दुनिया के चौधरी अमेरिका से निजी तोर पर ‘‘मुआवजा‘‘ लेकर देश को अंग्रेजों के हाथों बेच दिया था चोरासी में। कांग्रेस को इसका जवाब देना होगा। मरहूम राजीव गांधी की बेवा कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को अपना मौन तोडना ही होगा, वरना उनकी चुप्पी राजीव गांधी के उपर लगने वाले आरोपों की मौन स्वीकारोक्ति ही समझी जाएगी। एक बात और समझ से परे ही है कि इतने बडे नरसंहार के बाद सालों साल घिसटने वाले मृतकों के परिवार और पीडितों की व्यथा देखने के बाद भी एक ‘‘मा‘‘ सोनिया गांधी का दिल क्यों नहीं पसीज पा रहा है। क्या कारण है कि इतनी बडी त्रासदी के एक के बाद एक घुमावदार पेंच सामने आने के बाद भी वे चुपचाप ही बैठी हैं!

बहरहाल इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं है, जो भी होगा हम पाएंगे ही। इसलिए भारत सरकार को अब चेतना चाहिए। उपरी अदालतों में जाकर इसकी कमियां खोजकर नए सिरे से पहल करना आवश्यक है। इस मामले में सरकार को आगे आना होगा। इस मामले में सरकरों की मंशा आईने की तरह साफ है, जनता जनार्दन की कीमत उनकी नजरों में चुनावों के दौरान वोट से ज्यादा कतई नहीं है। स्वयं सेवी संगठनों द्वारा लंबे समय से लडाई लडी जा रही है, कुछ संगठनों पर निहित स्वार्थ सिद्धि के आरोप भी मढे जाते रहे हैं। मीडिया पहली बार खुलकर इस मामले में सामने आया है, जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करना होगा। सालों बाद पहली बार लगा कि प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ भी जीवित है। अगर माननीय उपरी न्यायालय स्वयं ही संज्ञान लेकर समय सीमा में इस मामले को निपटाने का प्रयास करे तो निश्चित तौर पर यह एक बेहतरीन नजीर बनकर सामने आ सकता है।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

चुका नहीं है कांग्रेस की राजनीति का चाणक्य

भोपाल गैस कांड में अर्जुन सिंह आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?

राजीव को कथित क्लीन चिट, ठीकरा स्व.नरसिंहराव पर

(लिमटी खरे)

बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्या का अघोषित तमगा मिल चुका है पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को। कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों के चलने के बाद जब घाव रिसने लगते हैं, तब लोगों को पता चल पाता है कि कुंवर साहब ने घाव कहां दिया है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी में कुंवर अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी के मानिंद निकालकर फंेक दिया गया है। कुंवर अर्जुन सिंह की खामोशी से कांग्रेस के आला नेता परेशान दिख रहे थे। राज्य सभा में जब अर्जुन सिंह ने अपना बयान दिया तब लोगों को लगा भई वाह कुंवर साहेब ने तो राजीव गांधी को सिरे से बरी कर पूरा का पूरा ठीकरा तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव पर फोड दिया है। हर कांग्रेसी चैन की सांस ले रहा था कि अब कोई जाकर स्व. नरसिंहराव से पूछने तो रहा कि उनके कार्यालय ने गैस कांड के वक्त मध्य प्रदेश के निजाम रहे कुंवर अर्जुन सिंह को फोन पर भोपाल गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन को छोड़ने का फरमान दिया था या नहीं।

देखा जाए तो कुंवर अर्जुन सिंह ने इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को बरी नहीं किया है, वरन् राजीव गांधी की भूमिकाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं? बकौल कुंवर अर्जुन सिंह उन्होंने 03 दिसंबर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को घटना की पूरी जानकरी दे दी थी। इसके उपरांत यूनियन कार्बाईड के वारेन एण्डरसन की 07 दिसंबर की गिरफ्तारी और रिहाई के बारे में भी मध्य प्रदेश के हरदा में चुनावी कार्यक्रम में सविस्तार बता दिया था। कुंवर अर्जुन सिंह ने साफ कहा कि उन्होंने एण्डरसन की गिरफ्तारी के आदेश दिए और हरदा के लिए रवाना हो गए, जहां राजीव गांधी से उनकी इस संबंध में पूर्ण चर्चा हुई। इस मामले में वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री ने यह कहकर मामला और संगीन कर दिया है कि गृह मंत्रालय के पास एसा कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है, जिससे साबित हो सके कि उस वक्त गृह मंत्रालय इस बात के लिए इच्छुक था कि एंडरसन की रिहाई की जाए।

अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई से कांग्रेस जनों को प्रसन्न कर एक एसा दस्तावेज उजगर कर दिया है जिसमें कांग्रेसियों को यह मुगालता होने लगा है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी को इस मामले से पूरी तरह बरी कर दिया है। वस्तुतः एसा है नहीं। जानकारों का साफ मानना है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने जहर बुझे तीर के माध्यम से यह बात जनता के बीच छोड़ दी है कि जब संवेदनशील प्रधानमंत्री राजीव गांधी मध्य प्रदेश में होते हुए भी सारी हकीकत से ‘‘बेखबर‘‘ नहीं ‘‘बाखबर‘‘ तब उन्होंने कोई कदम उठाने के कुंवर अर्जुन सिंह को यह क्यों कहा कि अगली सभा की ओर कूच किया जाए? इसके पीछे राजीव गांधी की संवेदनहीनता ही सामने आ रही है, जो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए एक मुश्किल पैदा कर सकती है, बशर्ते विपक्ष कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों को संभाल कर उठाए और उसे वापस कांग्रेस के खेमे में फंेके।

कल तक भोपाल गैस कांड के सच को अपनी आत्मकथा के माध्यम से उजागर करने की घोषणा करने वाले कुंवर अर्जुन सिंह का हृदय अचानक ही परिवर्तित हुआ और उन्होंने बजाए किताब के माध्यम से इस मसले में सदन में बयान देना ही उचित समझा। कुंवर अर्जुन सिंह का कहना है कि पूरी बात सुनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बारे में तो एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन अगली चुनावी सभा में जाने का आदेश दे दिया। राजीव गांधी के बारे में जो और जितना भी लोग जानते हैं उनके गले यह बात नहीं उतर सकती कि स्व.राजीव गांधी इतने संवेदनहीन थे कि इस तरह की घटना के बाद वे चुप्पी साधे रहते। स्व. राजीव गांधी जैसा जिन्दादिल और संवेदनशील नेता सच जानने के उपरांत कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य ही व्यक्त करता। हो सकता है कि उस समय राजीव गांधी को कुंवर अर्जुन सिंह द्वारा घटना का मार्मिक पक्ष पेश ही न किया हो या यह भी संभव है कि कुंवर अर्जुन सिंह अभी गलत बयानी कर रहे हों।

कुंवर अर्जुन सिंह बार बार एक ही बात फरमा रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा उस समय बार बार फोन करके वारेन एण्डसरन को भगाने की बात कही जा रही थी। अगर यह सच है तो क्या यह कुंवर अर्जुन सिंह की मुख्यमंत्री के तौर पर जवाबदेही नहीं थी कि उन्हें सीधे तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव से चर्चा करना था। 26 साल बाद गड़े मुर्दे उखाड़ने का फायदा ही क्या? इतिहास में संभवतः पहली बार कुंवर अर्जुन सिंह अपने बिछाए जाल में खुद ही फंसते नजर आ रहे हैं। इस मामले में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री के बारे में बयानबाजी कर अपना बदला अवश्य ही निकाल रहे हों पर यह तीर उन्हें भी घायल करता ही प्रतीत हो रहा है।

जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि आखिर कुंवर अर्जुन सिंह जैसा राजनीतिज्ञ इतना बड़ा बोझ लेकर 26 साल तक शांत कैसे बैठा रहा? आखिर क्या वजह थी कि इतने सालों में कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी जुबान खोलने की जहमत नहीं उठाई। विधायक और सांसद रहते हुए क्या कुंवर अर्जुन सिंह को कभी नहीं लगा कि वे एक जनसेवक हैं, और वे यह बात छुपाकर जनता के साथ ही धोखा कर रहे हैं।

अब कुंवर अर्जुन सिंह 26 सालों बाद फरमा रहे हैं कि उस समय वारेन एण्डरसन को राजकीय विमान उपलब्ध कराना बेतुका था। राजनैतिक समझबूझ वाला व्यक्ति यह बात अच्छी तरह समझता है कि किसी भी सूबे में तभी सरकारी विमान किसी को मुहैया करवाया जा सकता है, जबकि मुख्यमंत्री या विमानन मंत्री इसकी अनुमति दें। इन दोनों विशेषकर मुख्यमंत्री की इजाजत के बिना सरकारी उड़न खटोला एक इंच भी सरक नहीं सकता है। सवाल यह उठता है कि आखिर इतना सब अन्याय होते देखने के बाद कुंवर अर्जुन सिंह के हृदय परिवर्तन में 26 साल का लंबा समय कैसे लग गया? इसके पहले उनका जमीर क्यों नहीं जागा?

बहरहाल इस पूरे मामले में छब्बीस साल बाद तथ्यों को सामने लाना एक तरह से अप्रासंगिक ही प्रतीत हो रहा है। ढाई दशक पहले निकले सांप की धुंधली या मिट चुकी लकीर को पीटने का आखिर फायदा क्या है? आज साफ सफाई आरोप प्रत्यारोप से ज्यादा आवश्यक यह है कि गैस त्रासदी के पीडितों को मुकम्मल इंसाफ मिले। इस मसले में सरकार के साथ ही साथ देश की न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन की महती आवश्यक्ता है। जनता को खुद ही यह प्रश्न पूछना चाहिए कि छब्बीस साल पहले घटी अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से भला भारत गणराज्य ने क्या सबक सीखा?

भारत गणराज्य की नीति विहीन सरकार की कार्यप्रणाली की एक बानगी है, देश के बड़े और छोटे बांध। इन बांधों के साथ आपदा प्रबंध कितना पुख्ता है, इस बारे मंे सरकरें पूरी तरह मौन हैं। आपदा प्रबंध के मसले पर स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी न होना आश्चर्यजनक ही है, साथ ही साथ आपदा प्रबंध के मामले में स्थानीय लोगों को शामिल न किया जाना भी आश्चर्यजनक इसलिए माना जाएगा, क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले स्थानीय लोग ही होते हैं।

अभी कुछ माह पहले ही पायलट ट्रेनिंग संस्थान के ससेना विमान के मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के पास बरगी में डूबने की खबर मिली थी। जिला प्रशासन जबलपुर और सिवनी ने रानी अवंती सागर परियोजना में गोताखोरों की मदद से उक्त विमान और गायब पायलट रितुराज को खोजने का नाकाम अभियान चलाया। इसके बाद जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए तब रितुराज के परिजनों ने अपने स्तर पर बांध के अथाह पानी में अपने लाड़ले को खोज ही निकाल। इस तरह की घटनाएं आपदा प्रबंध की पोल खोलने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि यूनियन काबाईड को संचालित करने वाली डाउ केमिकल आज भी शान से भारत में अपना व्यवसाय संचालित कर रही है। यह सब कुछ भारत के लचर प्रशासनिक तंत्र के कारण ही संभव हुआ है। हमारी नजर में इस सबके लिए एसी व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक होगा जिससे दुर्घटना के लिए जवाबदार लोगों को तत्काल कटघरे मंे खडा किया जा सके।

भारत सरकार को चाहिए कि हाल ही में ब्रिटिश पेट्रोलियम के कुएं में हुए तेल रिसाव से सबक ले। दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम पुरूष बराक ओबामा ने इस त्रासदी को पर्यावरण का भीषणतम नुकासन बताकर न केवल ब्रिटिश पेट्रोलियम को जवाबदार ठहराया वरन् आना पाई से मुआवजा देने पर विवश भी किया है। विडम्बना है कि भारत में घटने वाली दुर्घटनाओं में संबंधित जवाबदार लोगों को जनसेवक, नौकरशाह और प्रशासनिक तंत्र हाथों हाथ लेकर उन्हें हीरो बनाने में जुट जाता है, जिसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है, इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

राठोर दोषी फिर पुरी और सिंह कैसे बरी

राम से अंग्रेजी आती है श्याम से नहीं!

राठौर की पेंशन रूकी पर पुरी और सिंह अब भी बरी!

क्यों मेहरबान है केंद्र पुरी और मोती सिंह पर

(लिमटी खरे)

जब स्कूल में पढा करते थे तब छटवीं कक्षा से अंग्रेजी का ककहरा सीखने को मिलता था। नवमी कक्षा में जाकर ग्रामर का पूरा ज्ञान मिलने लगा। तब अंग्रेजी की प्रकांड विद्वान स्व.प्रभाकर मुकुंद ढबले सर ने अंग्रेजी सिखाई। उस वक्त राम बाजार जाता है को तो अंग्रेजी में अनुवादित कर लिया करते थे, पर जब राम के स्थान पर श्याम का नाम लिया जाता तो विद्यार्थी बगलें झांकने लगते। उस वक्त ढबले सर उपहास उडाते हुए कहते कि राम से अंग्रेजी आती है, श्याम से नहीं।

यही आलम भोपाल गैस कांड और अन्य मामलों में दोषियों के समझ में आ रहे हैं। रूचिका मामले में दोषी आरोपी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर की पेंशन स्थायी तौर पर रोकने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। यह स्वागत योग्य कदम है। इससे अन्य अधिकारियों को अनैतिक काम न करने की सीख मिल सकेगी। अगर सजा का प्रावधान कठोर होगा तो अधिकारी नियमों का माखौल उडाने के पहले सौ मर्तबा सोचने पर मजबूर होंगे।

सवाल यह उठता है कि दो अलग अलग मामलों में केंद्र सरकार का रूख प्रथक प्रथक क्यों है। राठौर ने तो रूचिका के साथ बदसलूकी की और वह साबित हुआ। भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश में छब्बीस साल पहले हुई दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के आरोपी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एण्डरसन को राजकीय सम्मान के साथ बिदा करने वाले एण्डरसन के तत्कालीन बाडीगार्ड, उनके वाहन के सारथी और भोपाल के तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और भोपाल के ही तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के खिलाफ भारत सरकार कठोर कदम उठाने में देरी क्यों कर रही है यह बात समझ से ही परे है।

समाचार चेनल्स में उस दौरान के दिखाए गए फुटेज से स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह सरकारी लाल बत्ती लगी कार में वारेन एण्डरसन शान से पीछे की सीट पर अधिकारी की तरह बैठा है और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी उसकी कार को हांक रहे हैं। कंडक्टर की सीट पर डीएम मोती सिंह विराजमान हैं। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि जब एण्डरसन को सरकारी विमान से रवाना किया गया तब दोनों ही अधिकारियों ने उसे सेल्यूट भी किया था।

जहां तक राठोर का सवाल है तो भारतीय पुलिस सेवा के उस अधिकारी ने एक बाला के साथ अपने पद का रौब गांठने का प्रयास किया था, जिससे आजिज आकर रूचिका गहरोत्रा को अपनी इहलीला समाप्त करने पर मजबूर होना पडा था। रूचिका के परिजनों ने कई दिन तक राठौर की यातना को झेला। इस सबके बाद भी हरियाणा की निर्लज्ज कांग्रेस सरकार ने रूचिका के कातिल राठौर को सरमाथे पर बिठाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। रूचिका को भी सालों बाद न्याय मिल सका। केंद्र और प्रदेश की कांग्रेस सरकारों को न जाने इन अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से क्या मोह होता है, कि वे इनके खिलाफ कठोर कदम उठाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती हैं, यही कारण है कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के हौसले बुलंदी पर हैं, और वे मनमानी पर पूरी तरह उतारू हैं।

अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की अकूत दौलत के बारे में अगर बारीकी से जांच पडताल की जाए तो देश का आखिरी आदमी तक दांतों तले उंगली दबा लेगा। सांसद, विधायकों की भांति ही इनको सारी सुविधाओं के बावजूद भी भारी भरकम वेतन दिया जाना आश्चर्य जनक ही कहा जाएगा। इन सारे माननीयों के वेतन भत्तों को देखकर कोन कह सकता है कि भारत देश आज गरीब है। यह अलहदा बात है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है, जिसे दो वक्त की रोटी भी ठीक तरीके से नसीब नहीं होती है, और ये माननीय हर घंटे मलाई चट करने पर आमदा हैं।

राठौर अखिल भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं, तो स्वराज पुरी भी उसी सेवा के सेवानिवृत और मोती सिंह अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं। जब एसपीएस राठोर की पेंशन रोकी जा सकती है तो स्वराज पुरी और मोती सिंह में क्या सुरखाब के पर जडे हुए हैं। मीडिया के माध्यम से पुरी और सिंह दोनों ही को भोपाल गैस कांड के सरगना को सुरक्षित भगाने का अपराध साबित हो चुका है, फिर केंद्र सरकार किस बात का इंतजार कर रही है?

केंद्र सरकार को चाहिए कि रूचिका की आत्महत्या के दिन से एसपीएस राठोर को दी गई सारी सुविधाएं, वेतन भत्ते, यात्रा देयकों आदि की वसूली मय ब्याज के की जाए, तभी दूसरे अधिकारियों को सबक मिल सकेगा। ठीक इसी तरह स्वराज पुरी और मोती सिंह को भी दिसंबर 1984 के उपरांत दी गई सुविधाएं, वेतन भत्ते, यात्रा देयक, पेंशन आदि की वसूल मय ब्याज के की जानी चाहिए। इन सभी की संपत्ति को कुर्क कर कार्यवाही की जाए तो यह एक नजीर होगी, कि आला अधिकारी आने वाले समय में मनमानी न कर पाएंगे। अगर एसा नहीं होता है तो स्व.पी.एम.ढबले सर की बात को ही दुहराना होगा कि राम (राठोर) से अंग्रेजी आती है श्याम (पुरी और मोती सिंह) से नहीं. . . .।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्रधानमंत्री जी क्‍या आप भी गैस पीडितों को भूल गए

क्या आप भी ओबामा से डर गए मनमोहन जी!
भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का नहीं खुल पाया अमेरिका के सामने मुंह!

सामरिक विषयों के साथ भोपाल गैस कांड पर चर्चा उचित नहीं समझी मनमोहन ने

आखिर क्यों डरते हैं भारत के नीति निर्धारक अमेरिका से

(लिमटी खरे)

दुनिया का चौधरी माना जाता है अमेरिका को। सारे विश्व के कायदे कानून से परे हटकर अनेकों बार मनमानी की है अमेरिका ने, पर समूची दुनिया उसके डंडे के डर के आगे नतमस्तक रही है। बीसवीं शताब्दी में अमेरिका को टक्कर देता रहा है सोवियत रूस, किन्तु कालांतर में सोवियत रूस भी आपसी लडाई में बुरी तरह टूट गया है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में चीन एक महाशक्ति बनकर उभरा है। आज अमेरिका और चीन दोनों ही एक दूसरे के सामने हैं। अमेरिका को नंबर वन बरकरार रखने और चीन को पहली पायदान तक पहुंचने के लिए अगर किसी की दरकार है तो वह है भारत गणराज्य के सहयोग की।

छब्बीस साल पहले भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश में हुई गैस त्रासदी दुनिया की भीषणतम औद्योगिक क्रांति थी। इसमें बीस हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, और लाखों लोग आज भी इसका दंश भुगत रहे हैं। भारत गणराज्य की कांग्रेस और भाजपा की नपुंसक सरकारों द्वारा छब्बीस साल तक अपने ही वतन के लोगों को इस आग में जलने दिया। देश के गद्दारों ने इस भीषणतम त्रासदी के गुनाहगारों को देश से बाहर भिजवाने के मार्ग प्रशस्त किए। गुनाहगारों को देश से बाहर भेजा गया तो इस तरह मानों वे किसी दूसरे देश के राजनयिक हों या राष्ट्र के अतिथि! यह सब देख सुनकर घोर आश्चर्य होता है कि देश के गद्दारों को किस तरह कांग्रेस ने अपने दामन में आज भी स्थान दिया हुआ है।

अपने निहित स्वार्थों को परवान चढाकर मारे गए लोगों और पीडितों और उनके परिजनों को मुआवजा न दिलवाकर सत्ता के इन दलालों ने अपनी जेबें भर लीं। सालों साल अपने सीने में राज दफन करने वालों ने किस कदर 26 साल तक अपने सीने में यह बोझ दबाए रखा, फिर भी वे सीना तानकर चलते रहे। आज उन सारे के सारे जनसेवकों की नैतिकता एक बार अचानक जागी है, कोई किसी को दोषी बता रहा है, तो कोई राज की बातें अपनी आत्मकथा में लिखने की बात कहकर अपने आला नेताओं को भयाक्रांत करने का प्रयास कर रहा है। कुल मिलाकर देश के सियासी रंगमंच पर सारे किरदार स्वांग रचकर खडे हो गए हैं और एक बार फिर छब्बीस साल के अंतराल के उपरांत ये सभी भारत गणराज्य की जनता को मामा (बेवकूफ) बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश में शिवराज के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार इस प्रकरण को दोबारा नए सिरे से आरंभ करने की दलील दे रही है। भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह बात भूल जाते हैं कि उनको प्रदेश पर राज करते चार साल से अधिक का समय हो चुका है। इसके पहले वे सालों साल संसद सदस्य रहे हैं, तब उन्होंने भोपाल गैस पीडितों के हक के लिए क्या किया, इस बात को आवाम ए हिन्द जानना चाहता है। इसके साथ ही साथ उनके पहले भारतीय जनता पार्टी के सुंदर लाल पटवा, उमाश्री भारती और बाबू लाल गौर भी मध्य प्रदेश पर काबिज रह चुके हैं। शिवराज जी आपके साथ ही साथ भारती, गौर और पटवा की भूमिका पर भी आपको प्रकाश डालना होगा। विडम्बना यही है कि ये सब आपकी पार्टी के हैं या रहे हैं तो आपकी जुबान इस मामले में सिली ही रहेगी। भाजपा के तेवर भोपाल गैस मामले में जितने तीखे होना चाहिए था, उतने तीखे दिख नहीं रहे हैं। भाजपा भी बचाव की मुद्रा हमें ही ज्यादा दिखाई दे रही है।

उधर कांग्रेस इस मामले आक्रमक के बजाए रक्षात्मक मुद्रा में प्रतीत हो रही है। कांग्रेस के दामन पर इस मसले में छीटे ज्यादा उछलने की आशंका है। तत्कालीन प्रधानमंत्री और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के पति स्व.राजीव गांधी पर भी इस मामले की कालिख उडकर जाती हुई प्रतीत हो रही है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह से पूछने का साहस कोई भी नेता नहीं जुटा पा रहा है कि आखिर कौन सी एसी विषम परिस्थितियां उपज गईं थीं कि उन्होंने इस कांड के प्रमुख दोषी और यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन भारत प्रमख वारेन एण्डरसन को व्हीव्हीआईपी ट्रीटमेंट देकर, तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह की अभिरक्षा में भोपाल से भागने दिया।

कांग्रेस का डर स्वाभाविक है कि अगर इस मामले में सोनिया गांधी अपना मुंह खोलती हैं तो उनके पति की मिट््टी खराब करने में कुंवर अर्जुन सिंह को देर नहीं लगेगी, किन्तु इस मामले में भाजपा का स्टेंड समझ से परे है। भारतीय जनता पार्टी आखिर कुंवर अर्जुन सिंह से पूछने में हिचक क्यों रही है। क्या भाजपा के अंदर भोपाल गैस कांड से प्रभावितों के प्रति हमदर्दी समाप्त हो चुकी है? क्या भाजपा की संवदेनाएं मर चुकी हैं? अगर नहीं तो भाजपा दिल्ली में जाकर कुंवर अर्जुन सिंह के निवास के सामने धरना देने से कतरा क्यों रही है। केंद्र में तो कांग्रेस की सरकार है, यह मामला पालिटिकल माईलेज के लिए भाजपा को सूट हो सकता है, पर भाजपा फिर भी मौन ही साधे हुए है, जो वास्तव में आश्चर्यजनक ही लगता है। इतना ही नहीं भोपाल गैस पीडितों की सहायता के लिए आगे आए गैर सरकारी संगठन भी खबरों में बने रहने के लिए एकता का प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या यह उनका दायित्व नहीं बनता है कि वे भी इस मामले में दिल्ली जाकर जंतर मंतर पर कुंवर अर्जुन सिंह और तत्कालीन केंद्र सरकार की भूमिका पर शोर शराबा करे?

छब्बीस साल बाद फैसला आने के बाद सबसे निरीह, दीन हीन हालत में कोई दिख रहा है तो वह है भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस की ही नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी। देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन ने तो भोपाल गैस कांड के बारे में अपना मुंह खोला है, पर राहुल और सोनिया ने अपने जबडों को भींचकर रखा है। केंद्र सरकार ने मंत्री समूह का गठन कर दिया है, पर आज भी गैस पीडितों के सीनों पर सांप ही लोट रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें चाहे जितने आयोग का गठन कर प्रयोग कर ले पर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि नतीजा सिफर ही होगा, क्योंकि जब तक किसी भी चीज को टाईम फ्रेम (समय सीमा) में न बांधा जाए तब तक कुछ भी हल नहीं निकाला जा सकता है।

भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह अमेरिका यात्रा पर गए। वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति से मिले, सामरिक विषयों पर चर्चा भी हुई, पर ओबामा का मन मोहने वाले डॉ.मनमोहन सिंह यह भूल गए कि उन्हें ओबामा से बीस हजार लोगों के कातिल और लाखों को स्थाई तौर पर अपंग बनाने वाले यूनियन कार्बाईड और वारेन एंडरसन के बारे में भी चर्चा करना है। एंडरसन के प्रत्यापर्ण के बारे में अगर मनमोहन सिंह चर्चा करते तो कुछ न कुछ बात आगे बढती। वैसे भी भारत अमेरिका के बीच प्रत्यार्पण संधि लागू है, जिसके तहत एण्डरसन को भारत लाया जा सकता था।

एक बात आज तक किसी को समझ में नहीं आई है कि आखिर एसा क्या है कि भारत गणराज्य के नीति निर्धारक दुनिया के चौधरी अमेरिका से खौफजदा रहते हैं। बुश जब हिन्दुस्तान आते हैं तो हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित करने के पहले अमेरिकी श्वान बापू की समाधि का निरीक्षण करते हैं। कहा जाता है कि ब्रितानियों का सूरज कभी नहीं डूबता था, बावजूद इसके आधी धोती पहनकर बापू ने इन ब्रितानियों को भारत से खदेडा। आज समूचे विश्व में बापू को शांति और अहिंसा का दूत माना जाता है, फिर क्या अमेरिकी श्वान का उनकी समाधिस्थल पर जाना बापू के अपमान की श्रेणी में नहीं आता है। इतना ही नहीं जब बुश के साथ डॉ.मनमोहन सिंह फोटो खिचावाते हैं तो हमारे वजीरे आजम सावधान मुद्रा में तो बुश हंसते हुए मनमोहन के कांधे पर हाथ रखे होते हैं। फोटो देखकर लगता है मानो शेर के साथ किसी बिल्ली को खडा कर दिया गया हो, जो थर थर कांप रही हो।

इस बात का जवाब तो डॉ. मनमोहन सिंह से आवाम ए हिन्द चाहता है कि आखिर क्या वजह थी कि दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम नागरिक बराक ओबामा के सामने आपने भोपाल गैस कांड के मसले पर अपना मुंह क्यों नहीं खोला? भाजपा न पूछे न पूछे, भाजपा कांग्रेस के किस अहसान तले दबी है यह तो वह ही जाने, पर कांग्रेस के सच्चे सिपाहियों को चाहिए कि वे देश की खातिर अपनी राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, अपने युवराज राहुल गांधी और प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिह से यह सवाल अवश्य करे कि आखिर कौन सी एसी वजह है कि सभी ने भोपाल गैस कांड के मामले में अपनी जुबानें बंद कर रखीं हैं।

शुक्रवार, 25 जून 2010

सांप के भागने के बाद लकीर तक नहीं पीटी जनसेवकों ने!

सुस्सुप्तावस्था के 26 साल

वोट बैंक की खातिर अब घडियाली आंसू बहा रहे हैं नेता

एंडरसन को लाने के बजाए देश के दोषियों को डाला जाए जेल में

आखिर क्यों खामोश हैं कांग्रेस की राजमाता

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक तक माध्यमिक शिक्षा के अध्ययन के दरम्यान प्राणी विज्ञान विषय मंे मेंढक के बारे में सविस्तार पढाया जाता था। मेंढक बारिश में पूरी तरह सक्रिय हो जाते हैं फिर उसके बाद शनैः शनैः वे निष्क्रीय होने लगते हैं। साल में कुछ माह एसे होते हैं, जिनमें मेंढक न कुछ खाते हैं न पीते हैं, बस पडे रहते हैं, यह कहलाती है ‘‘सुस्सुप्तावस्था‘‘। आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य की सरकारें रीढ विहीन विपक्ष दोनों ही दुनिया की अब तक की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी ‘भोपाल गैस कांड‘ के छब्बीस साल बीतने तक सुस्सुप्तावस्था में रहे। इसका फैसला आने के बाद फिर इन दोनों ही बिरादरी के मेंढकों ने अपना मुंह खोला और बारिश की फुहार होते ही टर्राना आरंभ कर दिया है।

कितने आश्चर्य की बात है कि बीस हजार लोगों को असमय ही मौत के मुंह में ढकेलने और लाखों को स्थाई या आंशिक अपंग और बीमार बनाने के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को भारत सरकार के नुमाईंदे, अखिल भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश काडर के अधिकारी तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिह और जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी दोनों ही सरकारी वाहन में उस हत्यारे के चालक परिचालक बनकर उसे राजकीय अतिथि के मानिंद विमानतल तक छोडने गए। सभी ने इस तरह के फुटेज निजी समाचार चेनल्स में देखे हैं।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी छोटी मोटी बात को तानकर चद्दर बनाने वाले राजनेताओं ने छब्बीस साल तक इस मामले में मौन साधे रखा था। किसी ने इसमें हताहत हुए या जान गंवा चुके लोगों की सुध नहीं ली। न्यायालय ने चाहे जो सजा दी है, किन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह तो इस मामले में जनता के कटघरे में दोषी सिद्ध हो चुके हैं। मामला आईने के मानिंद साफ है कि कांग्रेस के सर्वेसर्वा रहे नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढी के पायोनियर स्व.राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र और कांग्रेस की ही कुंवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने हत्यारे वारेन एंडरसन को सुरक्षित भारत से बाहर जाने के मार्ग प्रशस्त किए थे।

1984 के गैस हादसे के उपरांत के घटनाक्रम से साफ हो जाता है कि कार्पोरेट जगत में यह संदेश साफ तौर पर चला गया कि जहरीले कीटनाशकों का करोबार करने वाली अंतर्राष्ट्रीय फर्म चाहें तो अपनी लापरवाही के बाद हजारों हत्याएं और लाखों को मजबूर बनने के बाद भी पैसे के दम पर साफ बचकर निकल सकते हैं। भारत गणराज्य की नपुंसक तत्कालीन कांग्रेस सरकार और मध्य प्रदेश की सरकार ने अपनी रियाया के प्रति जवाबदेही दर्शाने के बजाए आरोपी गोरी चमडी वालों की जवाबदेही को ढांकने का ही प्रयास किया, जो निंदनीय है। 1992 में विश्व विकास प्रतिवेदन मेें अमेरिका के लारेंस समर्स ने प्रस्तवा दिया था कि प्रदूषणकारी उद्योगों को तीसरी दुनिया अर्थात गरीब या अविकसित देशों की ओर भेज वहां की अर्थव्यवस्था को सुद्रढ किया जाए। दरअसल यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाए अपने देशों को प्रदूषण से मुक्त करने का कुत्सित प्रयास था, जिसे हिन्दुस्तान के तानाशाह शासक नहीं समझ सके।

आज मीडिया सहित सभी लोग इस बात पर अडिग हैं कि नब्बे के पेटे में जी रहे वारेन एंडरसन को भारत लाया जाए। भारत को अमेरिका के साथ की गई प्रत्यार्पण संधि के तहत अब तक यह कदम उठा लेना चाहिए था, किन्तु ‘‘समरथ को कहां दोष गोसाईं।‘‘ अमेरिका दुनिया का चौधरी है, भारत उससे दबता है, डरता है, दहशत खाता है, यह बात सत्य है। यही कारण है कि अमेरिका के सामने वह उंची आवाज में बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। एंडरसन को भारत नहीं लाया गया और भविष्य में भी उसके आने की संभावनाएं बहुत बलवती नहीं प्रतीत होती हैं, फिर सवाल यह उठता है कि एंडरसन को भारत से भगाने के लिए दोषियों के मामले में केंद्र सरकार मौन क्यों साधे हुए है। क्या वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह सहित कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का यह दायित्व नहीं बनता है कि वे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह से जोर डालकर इस बात को पूछें कि आखिर कौन था जिसने हजारों लाखों लोगों की हत्या और बीमार होने के दोषी एंडरसन को भारत से भगाया! जाहिर सी बात है दोनों ही कुंवर अर्जुन सिंह से यह बात पूछने का साहस नहीं कर पाएंगे, क्योंकि अगर कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी गाडी का स्टेयरिंग तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के पति स्व.राजीव गांधी की ओर कर दिया तब क्या होगा। बस इतनी सी बात से खौफजदा होकर कांग्रेस चुपचाप बैठी अपनी भद्द पिटवा रही है।

भोपाल गैस कांड के उपरांत सरकारी मशीनरी द्वारा उठाए गए हर कदम को ‘‘विचित्र किन्तु सत्य‘‘ की श्रेणी में रखा जा सकता है। 1996 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूरे मामले को कमजोर कर दिया, आरोपों की लीपापोती कर दी गई और सीबीआई चुपचाप सब कुछ देखती सुनती रही। कांग्रेस का जमीर तो देखिए कितना गिर गया, उसने सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्याधीश जस्टिस ए.एम.अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल का प्रमुख बना दिया। इतना ही नहीं भाजपा ने कुछ घंटों के लिए एंडरसन के सारथी और बाडी गार्ड बने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को राज्यमंत्री का दर्जा दिया। जब बात उछली तो उन्हें हटा दिया गया। बाद में स्वराज पुरी को कांग्रेस ने एंडरसन को भगाने का पारितोषक दे दिया। मनरेगा में पुरी की नियुक्ति एमीनंेट सिटीजन के तौर पर कर दी गई। आखिर यह सब कुछ कर कांग्रेस और भाजपा क्या संदेश देना चाहती हैं, यह बात समझ से परे ही है। विदेश यात्रा से लौटने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि इस हासदे के लिए व्यवस्था नहीं व्यक्ति दोषी है! जिसका जो मन आ रहा है दे रहा है वक्तव्य जमा कर। विज्ञप्तिवीर, और बयानवीर नेताओं की सेनाएं सज चुकी हैं, चारों तरफ से बयान और विज्ञप्तियों के तीरों की बौछारें हो रहीं हैं। देश की जनता विशेषकर गैस से प्रभावित लोगों के परिवार अवसाद में जा रहे हैं, पर किसी को इस बात की कोई परवाह नहीं है।

देखा जाए तो भोपाल गैस पीडितों के लिए सरकार के अब तक के प्रयास नाकाफी ही हैं। राजधानी भोपाल का कमला नेहरू चिकित्सालय बनने के बाद कितने दिनों तक शोभा की सुपारी बना रहा। हमीदिया अस्पताल के छोटे से मिक वार्ड में ठसाठस भरे कराहते मरीजों ने न जाने कितने दिनों तक हिटलर के गेस चेम्बर की यातना भोगी है। वस्तुतः देखा जाए तो यूनियन कार्बाईड के संयत्र का विषेला कचरा अभी तक हटाया नहीं गया है। इतना ही नहीं आसपास के रहवासियों को आज भी पीने का साफ पानी मुहैया नहीं है। छब्बीस सालों में भी अगर कांग्रेस और भाजपा ने सत्ता की मलाई खाने के बाद भी गैस पीडितों के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए हैं तो उन्हें सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार कतई नहीं है। हमारे कहने से क्या होता है, आज मोटी चमडी वाले जनसेवकों को तो यह भी पता नहीं है कि नैतिकता किस चिडिया का नाम है।

गुरुवार, 24 जून 2010

क्या हो गया नेहरू गांधी की कांग्रेस को!

वर्तमान कालिख पोत रहा है कांग्रेस के स्वर्णिम इतिहास पर

हजारों के कातिल एंडरसन के बाडीगार्ड को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस

मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन बनाया स्वराज पुरी को

(लिमटी खरे)

‘‘भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका किसने निभाई? भारत गणराज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सत्तर के दशक तक ईमानदारी तक किसने प्रयास किया? देश को विकास के पथ पर कौन ले जाने प्रयासरत रहा है? भारत पर जान न्योछावर करने वाले  सच्चे वीर सपूत किस दल से संबद्ध थे?‘‘ इन सारे जवाबों का एक ही उत्तर आता है और वह है ‘‘कांग्रेस‘‘। वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा इससे उलटा ही दिख रहा है। अस्सी के दशक के उपरांत की कांग्रेस ने सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का मौखटा अवश्य ही लगाया हुआ है, पर वह काम अपने मूल आदर्श और उद्देश्यों से हटकर ही कर रही है। सच ही कहा है ‘‘जब नास मनुस का छाता है, तब विवेक मर जाता है।‘‘ कांग्रेस के साथ भी कुछ इसी तरह का हो रहा है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेस का विवेक, आत्म सम्मान और स्वाभिमान या तो मर चुका है, या फिर उसने विदेशियों के हाथों गिरवी रख दिया है।

भोपाल गैस कांड के घटने के बाद छब्बीस साल तक वही कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है, अनर्गल उल जलूल हरकतों पर उतारू हो गई है। कांग्रेस के कदम देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में अब प्रजातंत्र नहीं बचा है, देश में हिटलर शाही हावी हो चुकी है। कांग्रेस को जो मन में आ रहा है, वैसे फैसले ले रही है, बिना रीढ का विपक्ष भी आंखों पर पट्टी बांधकर चुपचाप देशवासियों के साथ अन्याय हो सह रहा है। वामदल हों या भाजपा या और किसी दल के सियासी नुमाईंदे सभी मलाई खाने को ही अपना प्रमुख धर्म मानकर काम करने में जुटे हुए हैं, आवाम के दुख दर्द से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं रहा है। रियाया मरती है तो मरती रहे, हम तो नोट छाप रहे हैं, जिसको जो सोचना है, सोचता रहे हम तो शतुर्मुग के मानिंद अपना सर रेत में गडाकर यह सोच रहे हैं कि हमें कोई देख नहीं रहा है।

2 और 3 दिसंबर 1984 में देश के हृदय प्रदेश में घटे भोपाल गैस हादसे में बीस हजार से अधिक लोग असमय ही काल कलवित हो गए थे, पांच लाख से ज्यादा प्रभावित या तो अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं या फिर घिसट घिसट कर जीवन यापन करने पर मजबूर हैं, पर जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। लेना देना हो भी तो क्यों, उनका अपना कोई सगा इसमें थोडे ही प्रभावित हुआ है। देश की जनता की जान की कीमत इन सभी जनसेवकों के लिए कीडे मकोडों से ज्यादा थोडे ही है। मोटी चमडी वाले जनसेवकों ने तो भोपाल हादसे में मारे गए लोगों के शवों पर सियासी रोटियां सेकने से भी गुरेज नहीं किया। छब्बीस साल तक गैस पीडित अपना दुखडा लेकर सरकारांे के सामने गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई है। अब जब फैसला आ गया है तब सारे दलों के लोगों का जमीर जागा है, वह भी जनता को लुभाने और दिखाने के लिए, अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए।

भोपाल गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन को भारत लाकर उसकी सुरक्षित वापसी में प्रत्यक्षतः प्रमुख भूमिका वाले भोपाल के तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को प्रदेश में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्ति के बाद मध्य प्रदेश में नर्मदा घटी विकास प्राधिकरण में शिकायत निवारण अथारिटी में पदस्थ कर राज्य मंत्री का दर्जा देकर उपकृत किया, अब किस मुंह से भाजपा गैस पीडितों के लिए लडने का दावा कर रही है यह बात समझ से ही परे है। 14 जून को मीडिया ने जब पूर्व मुख्यमंत्री सुंदर लाल पटवा से यह सवाल किया तब भाजपा का जमीर जगा और 15 जून को स्वराज पुरी को उनके पद से हटा दिया गया।

सेवानिवृत वरिष्ठ नौकरशाहों पर पता नहीं क्यों जनसेवक और सरकारें मेहरबान रहा करती हैं। हो सकता है कि सेवाकाल में जनसेवकों के अनैतिक कामों को अंजाम देने के बदले में उन्हें सरकारों द्वारा इस तरह का पारितोषक दिया जाता हो। मध्यप प्रदेश की भाजपा सरकार ने स्वराज पुरी को उनके पद से प्रथक किया तो ‘‘तेरी साडी मेरी साडी से सफेद कैसे‘‘ की तर्ज पर केद्र में सत्तारूढ कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एंडरसन के ‘‘बाडी गार्ड‘‘ रहे स्वराज पुरी को हाथों हाथ ले लिया है। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की पसंद बने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने स्वराज पुरी को महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में एमिनेंट सिटीजन बना दिया गया है। स्वराज पुरी की नियुक्ति दो वर्षों के लिए की गई है।

खबर है कि पुरी सहित पांच दर्जन से अधिक लोगों की नियुक्ति इस पद पर की गई है। इनका काम मनरेगा की जमीनी हालातों का जायजा लेकर केंद्र को रिपोर्ट सौंपना है। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री जोशी ने सभी सूबों के ग्रामीण विकास मंत्रियों को पत्र लिखकर न केवल इनकी नियुक्ति की सूचना दी है, वरन् पुरी सहित अन्य सिटीजन्स को उनके भ्रमण के दौरान आवश्यक सहयोग और सुविधाएं भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। चूंकि पुरी पर मध्य प्रदेश में दबाव है, अतः उन्हें छत्तीसगढ के राजनांदगांव का प्रभार सौंपा गया है।

आवाम ए हिन्द (भारत गणराज्य की जनता) की स्मृति से अभी यह विस्मृत नहीं हुआ है कि चंद दिनों पहले ही समाचार चेनल्स ने गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी के प्रहसन और उसके बाद एंडरसन के ‘‘बाडीगार्ड‘‘ और ‘‘सारथी‘‘ बनकर सरकारी वाहन में तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के साथ विमानतल तक पहुंचाने और राजकीय अतिथि के मानिंद उसे भगाने के फुटेज दिखाए गए थे। जनता के मन मस्तिष्क में कांग्रेस और भाजपा के प्रति यह सब देख सुनकर भावनाएं किस तरह की होंगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

कांग्रेस का इतिहास अस्सी के दशक तक स्वर्णिम माना जा सकता है। अस्सी के दशक के उपरांत जब स्व.राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा आम जनता के लिए भेजे गए एक रूपए में से चंद पैसे ही जनता के हित में खर्च हो पाते हैं। जब भारत गणराज्य जैसे शक्तिशाली देश का वजीरेआजम ही इस तरह की बात को स्वीकार करे वह भी सार्वजनिक तौर पर तो क्या कहा जा सकता है। इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार की जडों में खाद और पानी तबियत से डाला गया है। एक समय था जब सरकारी कार्यालयों में दप्तियां चस्पा होती थीं, जिन पर लिखा होता था, ‘‘घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, घूस लेने और देने वाले दोनों ही पाप के भागी हैं।‘‘ कालांतर में इस तरह के जुमले इतिहास की बात हो चुके हैं। नैतिकता आज दम तोड चुकी है, हावी हैं तो निहित स्वार्थ।

रीढ विहीन विपक्ष भी अपनी बोथली धार लिए सत्तापक्ष से युद्ध का स्वांग रच रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीन दशकों से चल रही ‘‘नूरा कुश्ती‘‘ से जनता उब चुकी है। अब विपक्ष की कथित हुंकार सुनकर जनता को उबकाई आने लगी है। बीस हजार लोगों के कातिल वारेन एंडरसन के बाडीगार्ड को भाजपा ने अपनी दहलीज से भगाया तो उसी स्वराज पुरी को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस, और पुरी को नियुक्त कर दिया मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन, वह भी दो साल के लिए। आज जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि नेहरू गांधी के सिद्धांतो पर चलने वाली कांग्रेस को अचानक क्या हो गया है?

बुधवार, 23 जून 2010

भोपाल गैस कांड के तंदूर पर रोटियां सेंकने से बाज आंए राजनेता

समझ से परे है सरकार का अहमदी प्रेम

दोषी अफसरान को भाल का तिलक क्यों बनाती रहीं सरकारें

जीएमओ में कमल नाथ का क्या काम

अर्जुन की अध्यक्षता वाले जीएमओ की सिफारिश का क्या हुआ!

क्या जनता के ध्यान भटकाव के लिए गठित होते हैं जीएमओ

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सत्तर के दशक के उपरांत देश में नैतिकता को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया गया है। मानवीय मूल्यों पर निहित स्वार्थ पूरी तरह हावी हो गए हैं। कहने को भारत गणराज्य का प्रजातंत्र समूचे विश्व में अनूठा है, पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। आज सत्ताधारी दल के साथ ही साथ विपक्ष ने अपने आदर्श, नैतिकता, जनसेवा पर अपने खुद के बनाए गए स्वार्थांे को हावी कर लिया है। ‘‘हमें क्या लेना देना, हमारे साथ कौन सा बुरा हुआ, हम क्यों किसी के पचडे में फंसें, जनता कौन सा खाने को देती है, कल वो हमारे खिलाफ खडा हो गया तो, हमें राजनीति करनी है भईया, हम उनके मामले मंे नहीं बोलेंगे तो कल वे हमारे मामले में मुंह नहीं खोलेंगे, आदि जैसी सोच के चलते भारत में राजनैतिक स्तर रसातल से भी नीचे चला गया है।

छब्बीस साल पहले देश के हृदय प्रदेश भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के बाद उसके लिए जिम्मेदार रहे अफसरान को न केवल उस वक्त केंद्र और सूबें में सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस ने मलाईदार ओहदों पर रखा, वरन जब विपक्ष में बैठी भाजपा को मौका मिला उसने भी भोपाल गैस त्रासदी के इन बदनुमा दागों को अपने भाल का तिलक बनाने से गुरेज नहीं किया। देश की सबसे बडी अदालत में जब जस्टिस ए.एस.अहमदी ने धाराओं को बदला तब केंद्र सरकार शांत रही। फिर उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों को सेवानिवृत्ति के बाद मोटी पेंशन देने के बाद भी उनके पुनर्वास के लिए उन्हें किसी निगम मण्डल, आयोग, ट्रस्ट का सदस्य या अध्यक्ष बनाने की अपनी प्रवृत्ति के चलते इनकी लाख गलतियां माफी योग्य हो जाती हैं।

इसी तर्ज पर जस्टिस अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया गया। क्या सरकार ने एक बारगी भी यह नहीं सोचा कि इन धाराओं को बदलकर जस्टिस अहमदी ने भोपाल में मारे गए बीस हजार से अधिक लोगों और पांच लाख से अधिक पीडित या उनके परिवारों के साथ अन्याय किया है। सच ही है राजनीति को अगर एक लाईन में परिभाषित किया जाए तो ‘‘जिस नीति से राज हासिल हो वही राजनीति है।‘‘ कांग्रेस या भाजपा को इस बात से क्या लेना देना था और है कि किन परिस्थितियों में धाराओं को बदला गया।

भोपाल में न्यायालय में मोहन प्रकाश तिवारी ने जो फैसला दिया उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि उन्होंने अपने विवेक से सही फैसला दिया है। जब प्रकरण को ही कमजोर कर प्रस्तुत किया गया तो भारतीय कानून के अनुसार उसके लिए जितनी सजा का प्रावधान होगा वही तो फैसला दिया जाएगा। चूंकि देश की सबसे बडी अदालत ने पहली बार आरोप तय किए थे, तो उससे निचली अदालत उसे किस आधार पर बदल सकती है। भारतीय काननू में यह अधिकार उपरी अदालतों को है कि वे अपने नीचे की अदालतों के फैसलों की समीक्षा कर नई व्यवस्था दें।

जब फैसला आ चुका है, देश व्यापी बहस आरंभ हो चुकी है, तब फिर पूर्व न्यायाधिपति को भोपाल मेमोरियल का अध्यक्ष बनाए रखने का ओचित्य समझ से परे है। सरकार को चाहिए था कि तत्काल प्रभाव से उन्हें इस पद से हटा देेते। मामला आईने की तरह साफ है। सबको सब कुछ समझ में आ रहा है कि दोषी कौन है, पर ‘‘हमें क्या करना है‘‘ वाली सोच के चलते जनता गुमराह होती जा रही है।

प्रधानमंत्री को भी लगा कि मामला कुछ संगीन और संवेदनशील होता जा रहा है। देश भर में इसके खिलाफ माहौल बनता जा रहा है तो उन्होंने भी मंत्री समूह के गठन की औपचारिकता निभा दी। इस मंत्री समूह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को भी रखा गया है। कमल नाथ अस्सी से लगातार संसद सदस्य हैं, चोरासी में भी वे संसद सदस्य थे। राजीव और संजय गांधी के उपरांत प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ का यह पहला टेन्योर था सांसद के रूप में। वे मध्य प्रदेश के छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र से चुगे गए थे। इसके बाद वे नरसिंहराव सरकार में वन एवं पर्यवरण तथा वस्त्र मंत्री रहे हैं। इसके बाद वाणिज्य उद्योग और अब भूतल परिवहन मंत्री हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि बतौर सांसद मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी कमल नाथ ने आज तक भोपाल गैस कांड के लिए क्या किया है!

इसका उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही आएगा। जब तीस सालों में उन्होंने अपने निर्वाचन वाले सूबे में भोपाल गैस कांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुछ नहीं कहा और किया तो अब मंत्री समूह में रहकर वे क्या कर लेंगे। वरिष्ठ पत्रकार ‘‘आलोक तोमर‘‘ अपनी वेव साईट में लिखते हैं कि कमल नाथ भोपाल के गुनाहगार कैसे हैं! वे लिखते हैं कि कमल नाथ के खिलाफ एक बात उछाली जा रही है कि वाशिंगटन में 28 जून 2007 को कमल नाथ की एक पत्र वार्ता को उछाला जा रहा है कि जिसमें उन्होने कहा था कि डाओ केमिकल ने यूनियन कार्बाईड को खरीद लिया है, हादसे के वक्त डाओ केमिकल अस्तित्व में नहीं थी। वरिष्ठ राजनेता और तीस साल की सांसदी कर चुके कमल नाथ को डाओ केमिकल का पक्ष लेने के बजाए भोपाल गैस कांड के मृतकों के परिजनों और पीडितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था, जो उन्होंने किसी भी दृष्टि से नहीं दिखाया। भोपाल कांड के मृतकों की कीमत पर डाओ केमिकल को देश में फिर से आमद देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह भोपाल गैस कांड के मृतकों और पीडितों को एक गाली से कम नहीं है। आज आरोप प्रत्यारोप के कभी न थमने वाले दौर आरंभ हो चुके हैं। भोपाल गैस कांड के फैसले से सियासी तंदूर फिर गरम होकर लाल हो चुका है। सभी जनसेवक अब अपने अपने हिसाब से इसमें अपने विरोधियों के खिलाफ तंदूरी रोटी सेंकना आरंभ कर चुके हैं। एक दूसरे के कपडे उतारने वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि मृतकों के परिजनों और पीडितों को उनके वर्चस्व की लडाई से कोई लेना देना चहीं है, वे तो बस न्याय चाह रहे हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गैस राहत मंत्री बाबू लाल गौर का जमीर भी अचानक जागा है। उन्होंने भी इस तंदूर में अपनी दो चार रोटियां चिपका दी हैं। गौर का कहना है कि 1991 में जब वे गैस राहत मंत्री थे तब उन्होने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव को पत्र भी लिखा था। बकौल गौर भोपाल के गैस प्रभावित 36 वार्ड के पांच लाख 58 हजार 245 गैस प्रभावितों में से महज 42 हजार 208 पीडितों को ही मुआवजा देने की बात कही थी उस समय के मंत्री समूह ने। गौर के इस प्रस्ताव पर कि शेष बीस वार्ड के पांच लाख 16 हजार 37 पीडितों को मुआवजा देने पर उस समय गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष कुंवर अर्जुन सिंह सहमत थे। बाबू लाल गौर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, पर वे इस बात को बताने से क्यों कतरा रहे हैं कि उन्होंने विधायक रहते इस मामले को कितनी मर्तबा विधानसभा के पटल पर उठाया। वे भोपाल शहर से ही विधायक चुने जाते आए हैं, वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने विधानसभा क्षेत्र के भोपाल शहर के गैस पीडितों के लिए क्या प्रयास किए। बाबू लाल गौर को इन बातों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री डॉ मन मोहन सिंह क्या सारे राजनेता इस बात को जानते हैं कि पब्लिक मेमोरी (जनता की याददाश्त) बहुत ही कमजोर होती है। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर या संसद पर हमला हो या फिर देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले की बात। हर मामले में जैसे ही घटना घटती है, वैसे ही चौक चौराहों, पान की दुकानों पर बहस गरम हो जाती है, फिर समय के साथ ही ये चर्चाएं दम तोड देती हैं। भोपाल गैस कांड में भी कुछ यही हो रहा है। मामला अभी गर्म है सो कुछ न कुछ तो करना ही है। मंत्री समूह का गठन कर जनता को भटकाना ही उचित लगा सरकार को। क्या भाजपा के अंदर इतना माद्दा है कि वह कंेद्र सरकार से प्रश्न करे कि गैस कांड के वक्त मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में 1991 गठित मंत्री समूह की सिफारिशें क्या थीं, और क्या उन्हें लागू किया गया, अगर नहीं तो अब एक बार फिर से मंत्री समूह के गठन का ओचित्य क्या है! क्या इसका गठन मामले को शांत करने और जनता का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाने के लिए है। मीडिया अगर ठान ले और इस मामले को सीरियल के तौर पर चलाते रहे तो देश प्रदेश की सरकारों के साथ ही जनसेवकों को घुटने टेकने पर मजबूर होना पडेगा, यही गैस कांड के मृतकों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजली होगी और न्याय की आस में पथरा चुकी पीडितों की आखों में रोशनी की किरण का सूत्रपात हो सकेगा।

दोषी अर्जुन या कांग्रेस



सोमवार, 21 जून 2010

अर्जुन के पेंतरे से घबराई कांग्रेस

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
अंततः अर्जुन ने चला ही दिया ब्रम्हास्त्र
भोपाल गैस कांड के वक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिह जो कि पिछले दो सालों से निर्वासित जीवन जी रहे थे, ने अपना मौन चिरपरिचित अंदाज में तोड ही दिया है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस के माने हुए चाणक्य ने भोपाल गैस कांड से जुडे अनछुए पहलुओं के बारे में एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में साफ कह दिया है कि वे उस मसले में जो भी बात कहेंगे वह उनकी ‘‘आत्मकथा‘‘ का हिस्सा बनेगी। साक्षात्कार में कुंवर साहेब ने साफ शब्दों में कहा है कि एंडरसन अगर भारत लोटा था तो वह राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के इस भरोसे पर लौटा था कि उसे भोपाल से वापस अमेरिका भेज दिया जाएगा। अर्जुन के इस ब्रम्हास्त्र से कांग्रेस अब रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि भोपाल गैस कांड के वक्त देश में नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढी के सदस्य राजीव गांधी देश के वजीरे आजम थे, और आज उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी कांग्रेस की राजमाता की भूमिका में हैं, एवं कांग्रेस की नजरों में पांचवी पीढी के राहुल गांधी देश की बागडोर संभालने को आतुर दिख रहे हैं। कांग्रेस के प्रबंधकों की राय के चलते सोनिया ने कुंवर अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया है। भोपाल गैस कांड के फैसले के उपरांत उनके सरकारी आवास में लाल बत्ती और हूटर्स की आवाजें फिर गूंजने लगीं हैं। अर्जुन सिंह ने अभी सिर्फ इशारा किया है, अगर उन्होंने साफ तौर पर कुछ कह दिया तो आने वाले दो तीन दशकों तक कांग्रेस इस बदनुमा दाग को शायद ही धो पाए।
राशि पीडितों के लिए थी आपके लिए नहीं नितीश जी
बिहार का दर्द माना जाता है कोसी नदी को। हर साल कोसी नदी की बाढ से बिहार वासी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की इमदाद इसमें पूरी नहीं पडती है। देश भर के हर सूबे से लोग कोसी नदी के प्रभावितों के लिए मदद भेजते हैं। इसी तारतम्य में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्य की ओर से पांच करोड रूपए की राशि की सहायता पहुंचाई थी, जिसे बिहार के निजाम नितीश कुमार ने वापस लौटा दिया है। पिछले दिनों नितीश कुमार और नरेंद्र मोदी के फोटो युक्त विज्ञापनों से नितीश कुमार खासे खफा हैं, क्योंकि मोदी ने भाजपा की कार्यकारिणी में भी इस इमदाद का जिकर कर दिया था। नितीश के पैसा वापस करते ही सियासत की बासी फिर उबाल मारने लगी है। कांग्रेस का कहना है कि यह गुजरात की जनता का अपमान है, तो भाजपा इसे सीधे सीधे स्वाभिमान पर ठेस का मामला मान रही है। आपसी अहं और सियासी लाभ हानी का गणित अपने आप में अलग मामला हो सकता है पर नितीश कुमार को कम से कम इस मामले को मानवीय नजरिए से देखना चाहिए था। कारण चाहे जो भी हो पर यह राशि मोदी ने नितीश कुमार को व्यक्तिगत खर्च के लिए नहीं वरन कोसी प्रभावितों के लिए दी थी, और अपने अहं को निश्चित तौर पर नितीश को प्रथक ही रखना चाहिए था।
युवराज का अधेडावस्था में प्रवेश
कांग्रेस के युवराज ने चालीस बसंत देख लिए हैं, वे अब अधेडावस्था में कदम रख चुके हैं, फिर भी युवा और उर्जावान का तगमा उनके साथ है। नोकरी पेशा में जरूर साठ साल में सेवा निवृति का नियम हो या लोग बचकानी या बेहूदगी की बात पर ‘‘सठिया गए हैं‘‘ अर्थात साठ पूरे कर चुके हैं का मुहावरा कहें पर राजनीति में युवा की आयु 45 से 65 मानी जाती है। अरे देश जो चला रहे हैं राजनेता तो उनके हिसाब से अगर 45 से 65 की आयु युवा की है तो मानना ही पडेगा। इस हिसाब से कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी अभी बच्चे हैं, पांच साल के उपरांत वे युवा होंगे। विदेशों में पले बढे देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने और आजादी की लडाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अपना चालीसवां जन्म दिन हिन्दुस्तान में किसी दलित की झोपडी में मनाने के बजाए हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने वाले ब्रिटेन के लंदन शहर में मनाना उचित समझा। हो सकता है कि दलित और गरीब प्रेम के प्रहसन से राहुल गांधी उकता चुके हों और वे खुली हवा में विदेश में जाकर चेन की सांस लेने की इच्छा रख रहे हों।
घट सकती है बिटियों की तादाद
देश में एक बार फिर स्त्री पुरूष के अनुपात में और अधिक गिरावट होने की आशंका जताई जा रही है। चालू जनगणना में प्रति हजार पुरूषों पर महिलाओं की तादाद में और कमी आ सकती है। 2001 में शून्य से छः वर्ष तक की आयु वर्ग में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की तादाद 927 ही रह गई थी। वैसे यह अनुपात 931 का है पर शून्य से छ साल में पांच की कमी आई थी, जो चिन्ता का विषय थी। आने वाले समय में इसी आयु वर्ग में जनसंख्या में अनुपातिक कमी दर्ज होने की आशंका निर्मूल नहीं कही जा सकती है। 2004 में यह बालिकाओं की संख्या 892, तो 2005 से 2007 के मध्य यह संख्या बढकर नौ सौ पार हो गई थी, इसके बाद 2006 से 2008 के मध्य यह 904 तक ही पहुंची थी। इस जनगणना में उम्मीद जताई जा रही है कि शून्य से छः साल के बीच प्रति हजार बालकों में बालिकाओं की संख्या 915 के उपर शायद ही पहुंच सके। अगर एसा है तो बालिका बचाओ के सरकारी नारे पर व्यय होने वाली करोडों अरबों रूपए की राशि कौन डकार गया इस बात के लिए एक आयोग का गठन करना ही होगा।
पेंच के निर्माण को तुडवाओ जयराम जी
लगता है केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को सिर्फ और सिर्फ भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से ही कोई शिकवा शिकायत है, तभी तो एसा लगता है कि चाहे कुछ हो जाए पर वे एनएचएआई के मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले हिस्से को पेंच नेशनल पार्क के आसपास से गुजरने नहीं देंगे। यह कारण है कि इसका निर्माण आज भी बंद पडा हुआ है, महज बीस किलोमीटर की सडक ही नहीं बनी है। इस सडक का रखरखाव भी कोई नहीं कर रहा है सो इसकी चमडी उधड चुकी है। सडका का निर्माण करने वाली कंपनी ने मध्य प्रदेश की सीमा पर खवासा के पास पांच सौ मीटर के हिस्से को बनाने से हाथ खडे कर लिए हैं। जयराम रमेश को सडक बनने से पर्यावरण का नुकसान तो दिख रहा है, किन्तु पेंच नेशनल पार्क में धडाधड बन रहे रिसोर्ट काटेज और निर्माण कार्य नहीं दिख रहे हैं, जिससे पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। पेंच नेशनल पार्क से लगी आदिवासियों की बेशकीमति जमीन कोडियों के दाम धन्नासेठ खरीदकर इन पर आलीशान होटल बनवा रहे हैं। अरे रमेश जी, कम से कम इन निर्माण को तुडवाओ और वन्य जीवों के साथ ही साथ पर्यावरण का नुकसान होने से बचाएं।
देशी नहीं अंग्रेजी कहो जनाब!
देशी और अंग्रेजी शराब में बहुत अंतर होता है। नशा दोनों का एक जैसा हो सकता है, पर सूरत सीरत अलग अलग ही होती है, स्वाद और सुगंध या दुर्गंध अलग होती है। आने वाले समय में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में देशी शराब पीने वालों को अंग्रेजी का जायका मिलेगा। यह शुद्ध होने के साथ ही साथ मदिरा सेवन करने वालों के शरीर के लिए तुलनात्मक कम हानिकारक होगी। अब तक दिल्ली में बिकने वाली देशी शराब को रेक्टीफाईड एल्कोहल से बनाया जाता है, पर अब इसके निर्माण में एक्सट्रा न्यूट्रल एल्कोहल का प्रयोग किया जाएगा। देशी शराब में अल्कोहल की तादाद 28.5 तो अंग्रेजी में 42.8 होती है, देशी शराब को जिससे बनाया जाता है, वह शरीर के लिए काफी घातक हो जाता है। वैसे भी दिल्ली में बेवडों ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर रखे हैं। अवैध और जहरीली शराब के मामले में भी दिल्ली ने पताके गाड रखे हैं। जहरीली शराब पीकर मरने वालों की तादाद सबसे अधिक दिल्ली में ही है। एसे में अगर सरकार बेवडों का ध्यान रखे तो कम से मयकशों को तो शीला दीक्षित सरकार को सलाम बजाना ही चाहिए।
रहें अतिरिक्त करारोपण के लिए तैयार
आने वाले समय में मंहगाई से टूट चुकी आम आदमी की कमर और बुरी तरह टूटने की आशंका है। मानव संसाधन और विकास मंत्रालय एक एसी योजना बनाने जा रहा है जिसमें देश भर के पचास लाख से अधिक स्कूली शिक्षकों को कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। सूत्रों की मानें तो मानव संसाधन विकास मंत्री ने एक एसा खाका तैयार किया है, जिसमें शिक्षकों का बीमा, चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाएगी। इसके साथ ही साथ उन्हें सस्ती दरों पर निवास के लिए मकान भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के एक चहेते ने अपने बिल्डर मित्र के कहने पर सिब्बल ने मकान उपलब्ध कराने पर सहमति जता दी है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पचास लाख से अधिक मकानों के निर्माण के लिए केंद्रीय स्तर पर ही टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाएगी। बीमा, मकान और चिकित्सा सुविधा में होने वाले व्यय का भोगमान अंततोगत्वा अतिरिक्त करारोपण कर आम जनता की जेब से ही वसूला जाएगा, सो कमर टूटा आम आदमी रहे आगे और टूटने को तैयार।
बनारस के रईस भिखारी!
भीख वही मांगता है जिसके पास कुछ नहीं होता है। न खाने को हो न पहनने को और न ही ओढने को तभी कहा जाता है किसी को भिखारी। देश की धार्मिक नगरी बनारस में भिखारी के मायने कुछ और ही समझ में आ रहे हैं। बनारस के गंगा तट पर फिल्मी भजनों को गाकर भीख मांगने वाले भिखारियों की असलियत जानकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इन भिखारियों के पास मोबाईल, पेन कार्ड, बैंक खाते, बीमा पालिसी, मकान, दुकान, गाडी क्या क्या नहीं है इनके स्वामित्व में। बनारस में भिखारियों की संख्या पच्चीस हजार से अधिक है जिनमें से पांच हजार से अधिक भिखारी गंगा के घाट और मंदिरों में बैठकर श्रृद्धालुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड करते हैं। एक भिखारिन की तीन बच्चियां कान्वेंट में पढती हैं, तो कई के नाम पर बचत खातों में हजारों रूपए हैं। पांच बरस पहले संकटमोचन हनुमान मंदिर के पास मरे एक भिखारी के बिस्तर से पुलिस ने लगभग दो लाख रूपए की रकम भी बरामद की थी। सच ही है भीख मांगना भी आजकल मुनाफे का व्यवसाय बन गया है।
कांग्रेसी संस्कृति से दूर रहें भाजपाई
भाजपा के निजाम नितिन गडकरी का कहना है कि कांग्रेस की पांव छूने और माला पहनाने की संस्कृति से भाजपा को दूर ही रहना चाहिए। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के सम्मेलन में नितिन गडकरी ने यह गर्जना की। दरअसल कार्यकर्ता नेताओं से करीबी बनाने के चक्कर में उनके पैर पडने और माला पहनाने को आतुर रहते हैं। नेताओं की गणेश परिक्रमा के कारण नेताओं के कद पार्टी से बडे होने लगे हैं। यही कारण है कि व्यापक जनाधार वाली पार्टियों के बजाए अब उनका स्थान छोटे दलों अथवा निर्दलियों ने ले लिया है। कांग्रेस में गणेश परिक्रमा जबर्दस्त हावी हो चुकी है। अब तो एक ही जिले में अनेक नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण कार्यकर्ता गुटों में बंटे नजर आते हैं, यही कारण है कि पार्टियांे का ग्राफ नीचे की ओर जाता जा रहा है। नितिन गडकरी ने बहुत ही सही नस को पकडा है, मगर समस्या इस बात की है कि गडकरी के इस मशविरे को मानेगा कौन। पैर पडवाने और माला पहनने के आदी हो चुके नेताओं क्या गडकरी की नसीहत रास आएगी!
सपनि बंद होने से पूर्व विधायक परेशान
देश के हृदय प्रदेश में मध्य प्रदेश राज्य सडक परिवहन निगम (सपनि) के बंद होने से पूर्व विधायक और मीडिया बिरादरी बुरी तरह हलाकान परेशान हैं। दरअसल पूर्व विधायकों और मीडिया के अधिमान्य पत्रकारों को सपनि में निशुल्क यात्रा करने का अधिकार पत्र प्राप्त है। पूर्व में विधायक, पूर्व विधायक और पत्रकार यात्री बस में निशुल्क यात्रा के लिए अधिकृत हुआ करते थे। मध्य प्रदेश से सटे महाराष्ट्र सूबे में पूर्व विधायकों को यह सुविधा मुहैया है। मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक इस सुविधा को बहाल करने के लिए लामबंद भी हुए थे, पर नतीजा सिफर ही था। पिछले साल पूर्व विधायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस संबंध में पत्र भी लिखा था। पूर्व विधायक तो होश में आ गए पर अधिमान्य पत्रकारों ने इस बारे में अभी मानस तैयार ही नहीं किया है कि क्या कदम उठाए जाएं। लगता है भारतीय रेल में पचास फीसदी में यात्रा कर ही मीडिया बिरादरी संतोष कर रही है।
थाने में जप्त कार का कटा चालान!
क्या यह संभव है कि कोई कार थाने में जप्त कर ली गई हो और जप्त अवधि में ही उसका चालान दूसरे थाना क्षेत्र में काट दिया गया हो। जी हां दिल्ली के रोहणी निवासी जी.बी.सिंह के साथ कुछ इसी तरह का वाक्या हुआ। 27 दिसंबर 2003 को किसी मामले में शकरपुर थाने के स्टाफ ने उनकी कार को जप्त कर लिया था, और कोर्ट के आदेश पर 5 मार्च 2004 को उसे सुपर्दनामे पर सौंपा था। दिल्ली यातायात पुलिस की मुस्तैदी देखिए 13 फरवरी 2004 को उसकी कार में बिना सीट बेल्ट बांधकर चलाने के जुर्म में चालान काट दिया गया। अरे भले मानस जिस कार को थाने में जप्त कर दिया गया हो, वह सडक पर कैसे दौड सकती है, और कौन उसमें बिना सीट बेल्ट बांधे जा सकता है। हो सकता है शकरपुर थाने वाले ही जप्तशुदा कार में बिना सीट बेल्ट बांधे सफर कर रहे हों। बहरहाल, कडकडडूमा कोर्ट ने याचिका कर्ता की अपील पर आदेश दिया कि 1653 रूपए का मुआवजा सिंह को दिया जाए। दिल्ली पुलिस अदालत के इस आदेश को भी धता बताने से नहीं चूक रही है।
कानून के दायरे से बाहर हैं जनसेवकों के बंग्ले
नियम कायदे कानून बनाना नौकरशाह और राजनेताओं अर्थात जनसेवकों का काम है, पर उसका पालन करने में उन्हें पूरी छूट मिलती है। राजस्थान में इसकी जीती जागती मिसाल देखने को मिल रही है। राजस्थान में जितने भी बंग्ले मंत्री या अफसरान के हैं उनमें इसकी तस्वीर साफ दिखाई पड जाती है कि नियम कायदों की कितनी परवाह है उन्हें। राजस्थान में भवन मालिकों के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके लिए भवन मालिकों को बाकायदा नोटिस भी जारी किए गए हैं। मजे की बात तो यह है कि गुलाबी शहर जयपुर में पांच सौ वर्ग मीटर से अधिक साईज वाले नेता मंत्री अफसरान के बंग्लों में न तो वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम ही लगा है और न ही बिजली और पानी की बचत का कोई प्रयास किया जाता है। भरी गरमी में जब जनता पानी पानी चिल्ला रही थी, तब इन जनसेवकों के बंग्लों के बाग बगीचे पानी से तर हुआ करते थे। बताते हैं कि राजस्थान के मुख्यमंत्री के आवास को छोडकर किसी भी सरकारी आवास में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगा हुआ है।
पुच्छल तारा
दिल्ली सरकार चोरी और सीना जोरी के लिए बहुत ही बदनाम हो चुकी है। कोई भी काम दिल्ली में अगर हो रहा हो तो वह समय सीमा में तो पूरा हो ही नहीं सकता है। इस साल के अंत में होने वाले कामन वेल्थ गेम्स को ही ले लें। पूरी दिल्ली का सीना खुदा पडा है। जहां तहां हवा में उडती धूल नागरिकों का स्वास्थ्य बिगाड रही है। इस खेल के लिए अभी तैयारी अधूरी ही है। इसी पर केंद्रित एक मजेदार ईमल भेजा है रोहणी दिल्ली निवासी अभिषेक दुबे ने। वे लिखते हैं अखबार में एक खबर छपी कि कामन वेल्थ गेम्स की टिकिटों की बिक्री शुरू। इसे पढकर उनके एक मित्र ने चुटकी ली - ‘‘सडकें, स्टेडियम, पानी की निकासी की योजना, साफ पेयजल आदि तैयार नहीं, फिर भी टिकिटें बेच लेंगे। मानते हैं सरकार को, इसी को कहते हैं असली दिलेरी