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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

सीबीएसई स्कूलों ने अधर में छोड़ा विद्यार्थियों को


सीबीएसई स्कूलों ने अधर में छोड़ा विद्यार्थियों को

भगवान भरोसे परीक्षा दे रहे परीक्षार्थी

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से एफीलेशन की भागमभाग में विद्यार्थियों और पालकों को तरह तरह के प्रलोभन देने वाले गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं द्वारा दसवीं बोर्ड परीक्षा में अपने संस्थान के विद्यार्थियों को भगवान भरोसे ही छोड़ दिया जा रहा है। दसवीं की बोर्ड परीक्षा में निजी शालाओं के परीक्षार्थियों को परीक्षा केंद्र में यत्र तत्र भटकते देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि सीबीएसई से संबद्ध सिवनी में केंद्रीय विद्यालय, महर्षि विद्या मंदिर, सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी, अरूणांचल पब्लिक स्कूल के विद्यार्थी इस साल दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं। इन सभी का परीक्षा केंद्र केंद्रीय विद्यालय सिवनी को बनाया गया है। अब जबकि महज एक परचा ही शेष बचा है तब भी सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्रचार्य सैबी मैरी एवं प्रबंधक फादर जे.पी. के अलावा किसी भी शाला के प्रबंधक, प्राचार्य अथवा शिक्षकों ने अपने विद्यार्थियों को केंद्रीय विद्यालय में जाकर उनकी बैठक व्यवस्था आदि देखने की जहमत नहीं उठाई है।
संभवतः यही कारण है कि सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध गैर सरकारी विद्यालयों के छात्र छात्राएं भगवान भरोसे ही परीक्षा देने पर विवश हैं। आलम यह रहता है कि अपना रोल नंबर देखने के लिए छात्र छात्राएं काफी मशक्कत करते दिखते हैं। वहीं दूसरी ओर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्राचार्य, प्रबंधक और अन्य शिक्षकों द्वारा न केवल अपने संस्थान के विद्यार्थियों वरन् शेष शालाओं के बच्चों की भी मदद की जा रही है।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी शाला ने नान कमर्शियल होने का शपथ पत्र दिया है : खुशाल सिंह

सिवनी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड की मान्यता के संबंध में मध्य प्रदेश के

सिवनी जिले के सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के पिछले साल के निरीक्षण

में अनेकानेक कमियां पाई गईं थीं, जिसके चलते शाला का आवेदन निरस्त कर

दिया गया था। शाला ने अब अंडरटेकिंग दी है कि उसके द्वारा कमियां पूरी कर

दी गईं हैं, जिसके चलते एक बार फिर से निरीक्षण दल का गठन किया गया है,

जो मौके पर जाकर वास्तविकता का पता लगाकर अपना प्रतिवेदन केंद्रीय शिक्षा

बोर्ड को सौंपेगा, उसी आधार पर तय हो सकेगा कि इस शाला को सीबीएसई का

एफीलेशन दिया जा सकता है अथवा नहीं, उक्ताशय की बात केंद्रीय शिक्षा

बोर्ड के नई दिल्ली में प्रीत विहार स्थित एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव

खुशाल सिंह ने दैनिक यशोन्नति के साथ दूरभाष पर चर्चा के दौरान कही।

श्री सिंह ने कहा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का प्रकरण उनकी

जानकारी में है, इस शाला के बारे में उन्हें काफी मात्रा में पत्र और फोन

भी प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछली बार के निरीक्षण

के दौरान मिले प्रतिवेदन के उपरांत शाला के आवेदन को निरस्त करने संबंधी

पत्र क्रमांक सीबीएसई-एफी-एसएल-१७०१-१०११-२०१० दिनांक १२ मई २०१० श्री

सिंह के हस्ताक्षरों से ही जारी हुआ था। उन्होंने कहा कि पिछले साल

निरीक्षण के दौरान मिली विसंगतियों के बारे में शाला प्रबंधन द्वारा

अंडरटेकिंग देने के बाद ही दुबारा आईसी कमेटी का गठन किया गया है।

उपरोक्त संदर्भित पत्र में नया आवेदन देने की बात पर श्री सिंह ने चुप्पी

साध ली कि नए आवेदन के बजाए पुराने आवेदन पर अंडरटेकिंग देने पर निरीक्षण

दल का गठन किस आधार पर कर दिया गया।

इसके अलावा सीबीएसई की एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव ने कहा कि शाला

प्रबंधन ने यह कम्पलायंस भी दिया है कि उन्होंने कमियों को पूरा कर दिया

गया है। इसी कम्पलायंस के आधार पर सीबीएसई बोर्ड द्वारा कमेटी का गठन कर

दिया गया है। अब यह कमेटी मौके पर जाकर देखेगी कि पिछली बार जो कमियां

पाई गईं थीं, वे वास्तव में दुरूस्त कर दी गई हैं अथवा नहीं। गौरतलब होगा

कि पिछली बार निरीक्षण दल द्वारा दिए गए प्रतिवेदन में छ: कंडिकाओं वाला

निरस्तीकरण पत्र शाला प्रबंधन को सौंपा गया था, जिसमें साफ तौर पर कमियां

पाए जाने का उल्लेख किया गया था, इसके अलावा शाला नए भवन में स्थानांतरित

हो चुकी है, इस नए भवन में विद्यार्थियों की सुविधाओं के अनुरूप माहौल है

अथवा नहीं, पठन पाठन का स्तर कैसा है, आदि बातों का निरीक्षण भी निरीक्षण

दल द्वारा किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि शाला प्रबंधन द्वारा किसी भी प्रकार की केपीटेशन फीस

नहीं ली जा सकती है, जिसमें बिल्डिंग फंड आदि का समावेश है। दूरभाष पर

चर्चा करते हुए श्री सिंह ने कहा कि इसके साथ ही शाला प्रबंधन से सीबीएसई

ने नान कमर्शियल होने का शपथ पत्र भी लिया है। गौरतलब होगा कि

कुकुरमुत्ते के मानिंद खुल चुकी शालाओं में शिक्षा को व्यवसाय बना दिया

गया है।

श्री सिंह ने आगे कहा कि अगर किसी पालक या नागरिक को किसी भी तरह की

आपत्ति है तो वे अपनी आपत्ति को सचिव, सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकन्ड्री

एजूकेशन, शिक्षा केंद्र, 2, कम्युनिटी सेंटर, प्रीत विहार, विकास मार्ग,

नई दिल्ली ११००९२ के पते पर लिखित तौर पर अथवा दूरभाष क्रमांक ०११ -

२२५०९२५६ अथवा २२५०९२५९ पर सचिव या उनसे चर्चा कर दे सकता है। बताया जाता

है कि निरीक्षण दल में शामिल एक सदस्य प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय,

खमरिया, जबलपुर भी हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बहुत ही ज्यादा

नियमपसंद हैं। सूत्रों का कहना है कि अगर किसी को किसी भी प्रकार की शंका

कुशंका हो तो वे प्राचार्य से ०७६१ - २६०१७०३ पर सूचना दे सकते हैं। इन

सूचनाओं पर कार्यवाही करना अथवा नहीं करना प्राचार्य के विवेक पर ही

निर्भर करता है। वैसे निरीक्षण दल में शामिल दोनों ही मेम्बर पिछली बार

भी निरीक्षण में शामिल थे।

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सीबीएसई का निरीक्षण दल नवंबर में आ सकता है सेंट फ्रांसिस

सिवनी। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंड्री एजुकेशन (सीबीएसई) के एफीलेशन की कतार में खडे शहर के उत्कृष्ठ शिक्षा के लिए जाने पहचाने जाने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल सिवनी के निरीक्षण के लिए सीबीएसई का निरीक्षण दल नवंबर माह में सिवनी आकर शाला भवन और अन्य सुविधाओं व्यवस्थाओं का मुआयना करने नवंबर माह में सिवनी आ सकता है। गौरतलब होगा कि पिछले साल इस शाला का सीबीएसई का आवेदन निरस्त कर दिया गया था। सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इस साल सीबीएसई द्वारा अब तक जनरेटेड निरीक्षण दल (इंस्पेक्षन कमेटी) के सदस्यों के बारे में सूचना शाला को प्रेषित कर दी गई है। सूत्रों ने कहा है कि इस साल सिवनी जिले से महज एक ही शाला को इस फेहरिस्त में शामिल किया गया है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि आधे अधूरे भवन और अन्य सुविधाओं के अभाव के चलते इस साल भी इस बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली शाला का आवेदन अक्षम प्रबंधन के चलते कहीं निरस्त न कर दिया जाए।

सीबीएसई के सूत्रों ने आगे बताया कि वर्ष २०१० - २०११ के लिए प्राप्त आवेदनों में सिवनी जिले से महज सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के लिए ही आई सी मेम्बरान निर्धारित कर दिए हैं। इसकी विधिवत सूचना भी शाला प्रबंधन को प्रेषित कर दी गई है। उधर शाला के सूत्रों का कहना है कि शाला प्रबंधन को इस बारे में पहले ही जानकारी मिल गई थी, जिसके चलते शाला प्रबंधन ने अपनी व्यवस्थाएं प्रदर्शन के लिए चाक चौबंद करना आरंभ कर दिया था। शाला के सूत्रों का आगे कहना है कि इसके लिए बाकायदा एक एक विद्यार्थी का रिकार्ड रखने के लिए अपने टीचर्स को पाबंद कर दिया गया है।

सूत्रों ने आगे बताया कि शैक्षणिक सत्र २०१० - २०११ के लिए जितने आवेदन प्राप्त हुए थे उनमें से सिवनी जिले के सिर्फ सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के लिए ही निरीक्षण दल का गठन अब तक किया गया है। यह गठन २९ सितम्बर २०१० को किया गया है। इसे सेकन्डरी लेवल तक के लिए प्र्रोवीजनल एफीलेशन के लिए किया गया है। सूत्रों की मानें तो निरीक्षण दल अगले माह सिवनी आकर शाला का निरीक्षण कर अपना प्रतिवेदन सीबीएसई बोर्ड को सौंप सकता है। सूत्रों ने आगे कहा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के लिए इस साल के एफीलेशन के लिए जो पंजीयन नंबर प्रदान किया गया है, वह एसएल - ०१७०१ - १०११ है। इस आवेदन में स्कूल का पता स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के बाजू में बारापत्थर ही दर्शाया गया है। बताया जाता है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का शैक्षणिक सत्र इस साल से आनन फानन में लूघरवाडा के आगे वाले नए आधे अधूरे भवन में आरंभ करवा दिया गया था।

सीबीएसई के सूत्रों ने दैनिक यशोन्नति को बताया कि इस निरीक्षण दल में जबलपुर के केंद्रीय विद्यालय केएमएम के प्राचार्य और बालाघाट के जवाहर नवोदय विद्यालय के प्राचार्य का शुमार किया गया है। उक्त दोनों ही अधिकारी अगले माह नवंबर में सिवनी आकर शाला का निरीक्षण कर अपना प्रतिवेदन सीबीएसई बोर्ड को सौंप सकते हैं।

सूत्रों ने आगे कहा कि शैक्षणिक सत्र वर्ष २०११ - २०१२ के लिए भी सीबीएसई बोर्ड को आवेदन मिलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया है। सिवनी जिले से मिले आवेदनों में सीबीएसई बोर्ड को जिनके आवेदन पूरी तरह निर्धारित प्रारूप में मिले हैं, उनमें उदय पब्लिक स्कूल, लूघरवाडा सिवनी, मिशन इंग्लिश सीनियर सेकन्डरी स्कूल, मिशन कंपाउंड, सिवनी और सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल, लूघरवाडा, जबलपुर रोड, सिवनी के आवेदन शामिल हैं। इनमें से उदय पब्लिक स्कूल सिवनी को पंजीयन क्रमांक एस एल - ०००७४ - १११२, मिशन इंग्लिश सीनियर सेकन्डरी स्कूल को एसएल - ००३५५ - १११२ एवं सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को एसएल - ०११९१ - १११२ प्रदान किया गया है।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सीबीएसई मान्यता मिली नहीं, ख्वाब हैं इंजीनियरिंग कालेज के!

सिवनी 03 दिसंबर। भगवान शिव की नगरी में संचालित होने वाले शिक्षण संस्थाओं में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की मान्यता को लेकर भ्रम की स्थिति बनी ही हुई है। किसे सीबीएसई बोर्ड ने अपनी मान्यता दी है, किसे नहीं यह बात आज भी साफ नहीं हो सकी है, और न ही मध्य प्रदेश सरकार के शिक्षा महकमे के जिला स्तर पर सर्वोच्च कमांडिंग आफीसर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा ही इस बारे में स्थिति स्पष्ट करना ही श्रेष्यस्कर समझा है।

जिला शिक्षा अधिकारी के मौन रवैए से नवमी, से लेकर बारहवीं के विद्यार्थियों के पालकों में मानस पटल पर छाए संशय के बादल छटने के बजाए घुमड़ने आरंभ हो गए हैं। जैसे जैसे नवमी कक्षा में सीबीएसई के एनरोलमेंट की तारीख पास आती जा रही है, वैसे वैसे विद्यार्थियों के पालकों के हृदय की धड़कने तेज होना आरंभ हो गई हैं।

पालकों के मन में यह बात अब भी घूम रही है, कि उनके आखों के तारे आखिर सीबीएसई बोर्ड के अधीन शिक्षा दीक्षा ग्रहण कर परीक्षा देंगे अथवा उन्हें मध्य प्रदेश बोर्ड के तहत परीक्षा देने पर मजबूर किया जाएगा? गौरतलब है कि दसवीं बोर्ड कक्षा के लिए नामांकन एक साल पूर्व अर्थात नवमीं कक्षा में ही करवा दिया जाता है। बोर्ड के पास चूंकि विद्यार्थियों की तादाद बहुत ज्यादा होती है अतः बोर्ड द्वारा एक साल की अवधि में इन्हें व्यवस्थित करने की गरज से ही नवमीं में इनका एनरोलमेंट किया जाता है।

नगर में संचालित होने वाली अनेक शालाओं द्वारा अपने यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों को आश्वस्त कराया गया था कि उनके आंखों के तारों को सीबीएसई बोर्ड के तहत ही परीक्षा दिलवाई जाएगी। इस हेतु सीबीएसई मान्यता की कार्यवाही उनकी शाला और सीबीएसई बोर्ड के बीच जारी है। बताया जाता है कि वर्ष 2010 - 2011 के शैक्षणिक सत्र लिए सीबीएसई बोर्ड की मान्यता संबंधी सिवनी की शालाओं के आवेदन में से अनेक शालाओं के आवेदन वांछित अर्हताएं पूरी न किए जाने पर निरस्त कर दिए गए हैं।

सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों का कहना है कि इन शालाओं द्वारा एक बार फिर से शैक्षणिक सत्र 2011 - 2012 हेतु सीबीएसई बोर्ड की मान्यता के संबंध में आवेदन दिया गया है। इन शालाओं द्वारा अपने अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए मुस्तैद रहने को कहा गया है कि कभी भी सीबीएसई बोर्ड का निरीक्षण दल आ सकता है, जिसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर रखी जाएं।

सूत्रों का आगे कहना है कि अभी तक किसी भी शाला के लिए इंस्पेक्शन कमेटी (आईसी मेम्बर) का गठन नहीं किया गया है, अतः जल्द ही निरीक्षण का प्रश्न ही नहीं उठता है। सूत्रों ने कहा कि जैसे ही आईसी मेम्बरान तय कर दिए जाएंगे वैसे ही इंटरनेट पर सीबीएसई की वेब साईट पर यह प्रदर्शित कर दिया जाएगा कि किस शाला का निरीक्षण किस केंद्रीय, जवाहर नवोदय या निजी शाला के प्राचार्य द्वारा किया जा रहा है। तब उस शाला में अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों या अन्य संबंधितों द्वारा आई सी मेम्बरान के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है।

बहरहाल, जिले में निजी तौर पर चल रही एक शाला जिसे अभी सीबीएसई बोर्ड की मान्यता नहीं मिली सकी है, के द्वारा सिवनी में इंजीनियरिंग कालेज खोलने की कवायद करने की सुगबुगाहट भी मिल रही है। गौरतलब है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में प्रदेश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुल इंजीनियरिंग कालेज की सफलता के परचम को देखकर लोग इसके दीवाने होते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में उक्त शाला के संचालकों द्वारा सीबीएसई बोर्ड की मान्यता को दरकिनार कर अब सिवनी में ही इंजीनियरिंग कालेेज खोलने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। जो शाला प्रबंधन सीबीएसई बोर्ड की मान्यता लेने में अक्षम रहा हो, वह अगर इंजीनियरिंग कालेज की नींव रखता है, तो उसकी नींव कितनी खोखली होगी इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

रविवार, 15 अगस्त 2010

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई -- 15

‘‘गुटखा‘‘ खाने का नौश फरमातीं हैं सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की एक ‘टीचर‘

स्कूलों के इर्दगिर्द तम्बाखू उत्पाद नहीं बिक सकते

कक्षा में गुटखा खाकर खिडकी से थूका करतीं हैं उक्त शिक्षिका

बच्चों पर पड रहा है प्रतिकूल प्रभाव

सिवनी। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता पाने में असफल रही जिला मुख्यालय में संचालित होने वाली स्तरीय शिक्षा प्रदान करने में अग्रणी शिक्षण संस्था सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की एक शिक्षिका पाउच वाला गुटखा खाने का शौक रखती हैं। बताया जाता है कि उक्त शिक्षिका के बारे में यह बात बहुत ही जोर शोर से प्रचारित की गई थी कि वे बेहद ही अनुभवी हैं और उनके पास एक कम बीस साल का पढाने का अनुभव भी है।

गौरतलब होगा कि शासन ने बच्चों को तम्बाखू के उत्पादों से दूर रखने के लिए न जाने कितने एहतियातन कदम उठाए हैं। इनमें अठ्ठारह साल से कम आयु के लोगों को तम्बाखू के उत्पादों को न बेचे जाने की बात सार्वजनिक तौर पर हर पान की दुकान में चस्पा करने के निर्देश दिए गए हैं, इतना ही नहीं शैक्षणिक संस्थाओं के इर्द गिर्द भी तम्बाखू युक्त सामग्री के बेचे जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के प्री प्रयमरी के बच्चों के बीच चल रही चर्चाओं को अगर सच माना जाए तो शाला ने नेम फेम और पालकों तथा बच्चों को लुभाने की गरज से शाला में एक एसे टीचर को भर्ती किया है, जो ‘‘गुटखा‘‘ वह भी पाउच वाला खाने का नौश फरमाती हैं। बच्चांे के बीच चल रही चर्चा को अगर सच माना जाए तो उक्त टीचर द्वारा अध्यापन कार्य के दौरान ही पाउच फाडकर गुटखा को खाया जाता है और अध्ययापन के दौरान ही इसकी पीक बीच बीच में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के लूघरवाडा के आगे स्थित निर्माणाधीन भवन की खिडकी से बाहर थूकी जाती है।

एक पालक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि किसी बालिग द्वारा गुटखा या तम्बाखू का सेवन उसका नितांत निजी मामला हो सकता है किन्तु अगर कोई टीचर यह काम बच्चों के बीच करे तो इसका बच्चों पर प्रतिकूल असर पडे बिना नहीं रह सकता है।

गौरतलब होगा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल जिला मुख्यालय में संचालित होने वाले उत्कृष्ठ शिक्षण संस्थानों में अग्रणी माना जाता है, और इस तरह के स्तरीय विद्यालय में अगर इस तरह की हरकत लंबे समय से जारी है तथा इस बात का पता अगर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन को न हो तो यह बात गले नहीं उतरती है। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन से अपेक्षा व्यक्त की जाती है कि विद्यालय की गरिमा को ध्यान में रख इस मामले में तत्काल उचित कार्यवाही सुनिश्चित करे।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई (13)

जमीन, प्लेग्राउंड, लाईब्रेरी, अप्रशिक्षित स्टाफ के चलते हुआ सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन रद्द

चालू शैक्षणिक सत्र के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को नहीं मिली सीबीएसई मान्यता

सिवनी। ‘‘जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले और स्तरीय शिक्षण प्रदान करने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल स्कूल को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया है। इसका कारण यहां सीबीएसई के नार्मस के मुताबिक पर्याप्त भूखण्ड, खेल का मैदान, पुस्तकालय में किताबों की कमी और अप्रशिक्षित स्टाफ आदि को आधार बनाया गया है।‘‘ उक्ताशय की जानकारी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के मध्य प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

सूत्रों ने बताया कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकन्डरी एजूकेशन शिक्षा केंद्र, 2, कन्यूनिटी सेंटर, प्रीत विहार विकास मार्ग नई दिल्ली 110092 की एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से 12 मई 2005 को जारी पत्र क्रमांक सीबीएसई / एएफएफ / एस एल / 1701 - 1011 / 2010 में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के प्रबंधक को उक्ताशय की बात से आवगत करा दिया गया है।

सूत्रों ने बताया कि पत्र में लिखा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन के आन लाईन आवेदन नंबर एस.एल. - 1701 - 1011 के संदर्भ में एक और दो फरवरी 2010 को शाला के हुए निरीक्षण के उपरांत निरीक्षण प्रतिवेदन और बोर्ड को सौंपे गए प्रपत्रों के अध्ययन के उपरांत उक्त निर्णय लिया गया है।

पत्र की कंडिका एक में कहा गया है कि शाला द्वारा जिस भवन में स्कूूल का संचालन किया जा रहा है वह बोर्ड के द्वारा निर्धारित नार्मस डेढ से दो एकड से कम है। जिसमें शाला भवन का निर्माण और शेष भाग में खेल का मैदान होना आवश्यक है। शाला द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उसके द्वारा दिए गए प्रपत्रों में इंफ्रास्टकचर, कक्षाएं, दो स्थानों के बीच की दूरी,, हर साईट का क्षेत्रफल आदि क्या है?

सीबीएसई अजमेर कार्यालय के सूत्रों ने आगे बताया कि इस पत्र की कंडिका दो में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में अध्ययापन कराने वाले कई शिक्षक अप्रशिक्षित हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन को ताकीद किया गया है कि वह बोर्ड के नार्मस के मुताबिक क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों को नियुक्त करे।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को एफीलेशन विभाग के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से जारी उक्त पत्र की कंडिका तीन कहती है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला का पुस्तकालय काफी छोटा है, अतः शाला प्रबंधन को चाहिए कि अपने पुस्तकालय को कक्षाआं के मुताबिक और किताबें शामिल कर और अधिक समृद्ध बनाया जाए। इसी पत्र की चौथी कंडिका में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन द्वारा शाला ने नाम पर जमीन या भवन के कागज नहीं संलग्न किए गए हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन सेल डीड की कापी संलग्न की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जमीन को सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला संचालित करने वाली सोसायटी या शाला के नाम पर रजिस्टर्ड किया गया है।

सूत्रों का कहना है कि इस पत्र की कंडिका पांच में महत्वपूर्ण बात कही गई है, जिसके चलते ही इस नए शैक्षणिक सत्र में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के शाला प्रबंधन ने आनन फानन में जबलपुर रोड पर निर्माणाधीन शाला भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया है। इस कंडिका में कहा गया है कि शाला का नया भवन अभी निर्माणाधीन है, और शाला को उसमें अभी स्थानांतरित किया जाना बाकी है। शाला प्रबंधन ने भले ही 21 जून से आरंभ हुए शैक्षणिक सत्र में निर्माणाधीन भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया हो किन्तु उसकी मान्यता का आवेदन तो निरस्त ही कर दिया गया है।

इस पत्र की अंतिम और छटवी कंडिका में कहा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला को अभी भी पर्याप्त संख्या में क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती आवश्यक है जो बोर्ड के नार्मस के हिसाब से 1: 1.5 का अनुपात हर स्तर पर बनाए रख सके। अंत में सहायक सचिव खुशाल सिंह आदेशित करते हैं कि उक्त सारी कमियों के चलते शाल प्रबंधन के केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता के आवेदन को जिसमें शाला प्रबंधन ने 2010 - 2011 के लिए मान्यता चाही गई थी को निरस्त किया जाता है।

सीबीएसई के सहायक सचिव ने आगे कहा है कि इन कमियों को दूर कर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को चाहिए कि वह मान्यता हेतु नया मान्यता आवेदन बाकायदा निर्धारित फीस के प्रस्तुत करे ताकि उस पर विचार किया जा सके। खुशाल सिंह ने सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को साफ तौर पर कहा है कि शाला सीबीएसई पेटर्न पर नवमीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं में कक्षाएं आरंभ कतई न करे अन्यथा किसी भी तरह के विवाद के लिए सीबीएसई बोर्ड की कोई जवाबदारी नहीं होगी।

(क्रमशः जारी)

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई (12)

सीबीएसई बोर्ड ने निरस्त किया सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन!

जबलपुर और बालाघाट के प्राचार्य ने किया था स्कूल का निरीक्षण

सीबीएसई पेटर्न पर क्लासिस आरंभ नहीं कर सकती है शाला

सिवनी। इसाई मिशनरी द्वारा जिला मुख्यालय सिवनी में चलाए जा रहे स्तरीय शिक्षा देने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन केंद्रीय शिक्षा बोर्ड द्वारा निरस्त कर दिया गया है। उक्ताशय की जानकारी राजस्थान के अजमेर स्थित सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय के सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है। सूत्रों का कहना है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन अगर कक्षा नवमी में इस साल विद्यार्थियों को प्रवेश देता है तो वह सीबीएसई बोर्ड की कक्षा दसवीं में परीक्षा नहीं दे सकते हैं। इस साल कक्षा नवमी में अध्ययनरत विद्यार्थी अगले साल मध्य प्रदेश बोर्ड में ही परीक्षा देने के लिए बाध्य होंगे।

सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रांे ने बताया कि बारापत्थर सिवनी में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर की सिवनी शाखा के बाजू में संचालित होने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल द्वारा दिए गए प्रोवीजनल एफीलेशन अप टू सीनियर सेकन्डरी लेवल के आवेदन पर सीबीएसई बोर्ड द्वारा 30 जून 2009 को इस शाला का पंजीयन किया गया था। इसका डाटा बोर्ड को 12 अगस्त 2009 को प्राप्त हुआ था, जिसमें शाला ने वर्तमान शिक्षा सत्र अर्थात 2010 - 2011 के लिए सीबीएसई से एफीलेशन मांगा था। इस हेतु शाला को पंजीयन नंबर एस एल - 01701 - 1011 प्रदान किया गया था।

सूत्रों ने आगे कहा कि इस आवेदन में शाला प्रशासन ने शाला प्रमुख के तौर पर सेबी मेरी के नाम का उल्लेख किया गया था। इस शाला द्वारा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के नार्मस को पूरा किया जा रहा है अथवा नहीं इसके परीक्षण और निरीक्षण के लिए इंस्पेक्शन कमेटी का गठन किया गया था। इस आई सी में जबलपुर के सीएमएम स्थित केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य और बालाघाट के नवोदय विद्यालय के प्राचार्य को शामिल किया गया था।

सीबीएसई बोर्ड के उच्च पदस्थ सूत्रों ने दावा किया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल द्वारा नवमीं और दसवीं कक्षा के लिए अस्थाई मान्यता के आवेदन के परीक्षण, निरीक्षण समिति के निरीक्षण परीक्षण के उपरांत के प्रतिवेदन पर गौर करने के उपरांत केंद्रीय शिक्षा बोर्ड द्वारा सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की सीबीएसई से मान्यता संबंधी आवेदन को तीन मई 2010 को निरस्त कर दिया गया है।

सूत्रों ने यह भी कहा कि जब सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन निरस्त कर दिया गया है तब इन परिस्थितियों में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन किसी भी कीमत पर शैक्षणिक सत्र 2010 - 2011 के लिए नवमीं, दसवीं, ग्यारहवीं या बारहवीं की कक्षाएं सीबीएसई बोर्ड के एफीलेशन देने के बिना सीबीएसई पेटर्न पर आरंभ नहीं कर सकती हैं। बोर्ड के सूत्र साफ तौर पर कह रहे हैं कि अगर शाला प्रबंधन बोर्ड पेटर्न पर कक्षाएं आरंभ करता है तो किसी भी तरह के विवाद के लिए सीबीएसई बोर्ड जवाबदार नहीं होगा।

यहां उल्लेखनीय होगा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल द्वारा सीबीएसई पेटर्न पर द्वितीय शनिवार का अवकाश और अन्य बातों को अपनी कार्यप्रणाली में ले आया गया है। आरोपित है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल द्वारा अपने विद्यार्थियों या उनके पालकों को इस बारे में गुमराह ही किया जा रहा है कि वह नवमीं कक्षा में विद्यार्थियों को जो प्रवेश दे रहा है, वह दसवीं कक्षा में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा में बैठने के पात्र होंगे अथवा मध्य प्रदेश शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में। यहां गौरतलब होगा कि सीबीएसई बोर्ड में कक्षा दसवीं की परीक्षा के लिए विद्यार्थी का एनरोलमंेट एक वर्ष पूर्व अर्थात कक्षा नवमीं में ही हो जाता है।

कहा जा रहा है कि सीबीएसई के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रलोभन के चलते ही सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस साल के शैक्षणिक सत्र के आरंभ होने के पूर्व ही आनन फानन में अपना शाला भवन कचहरी चौक से जबलपुर रोड स्थिति निर्माणाधीन भवन में स्थानांतरित कर दिया था, जहां सुविधाओं के अभाव में विद्यार्थी परेशानी में पढाई करने पर मजबूर हैं।

सीबीएसई की मान्यता निरस्त होने के कारण यह स्कूल मध्य प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग के अधीन स्वयंमेव ही आ गया है। क्योंकि शाला प्रबंधन किसी और बोर्ड से एफीलेशन संभवतः नहीं ले सकता है। इन परिस्थितियों में जिला प्रशासन की ओर से नियुक्त् िऑफीसर इन चार्ज डिप्टी कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी की चुप्पी संदेहास्पद ही मानी जा रही है।

(क्रमशः जारी)

बुधवार, 11 अगस्त 2010

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई (11)

इक्कीसवीं सदी में भी बिना पंखे, कंप्यूटर के संचालित हो रहा है सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल
 
सिवनी। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का प्रलोभन दिखाकर पालक और विद्यार्थियों को जमकर लूटा जा रहा है, और प्रशासन की तंद्रा है कि टूटने का नाम नहीं ले रही है। सिवनी में संचालित होने वाली सीबीएसई की कतार में लगी शालाएं भले ही सीबीएसई से संबद्ध न हो पाई हों पर उसके नाम पर विद्यार्थियों को लुभाने में लगी हुई हैं। राज्य शासन की ओर से सिवनी में बिठाए गए जिला शिक्षा अधिकारी अगर सिवनी की शालाओं का औचक निरीक्षण कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करें तो इन शालाओं की अनियमितताओं के प्रकाश में आने में समय नहीं लगेगा।
 
सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के बच्चों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सीबीएसई के भय के चलते इस शाला ने आनन फानन में शाला का वर्ष 2010 - 2011 का शैक्षणिक सत्र शहर से लगभग सात किलोमीटर दूर जबलपुर रोड पर स्थानांतरित कर दिया है। शाला नए भवन में स्थानांतरित हुए लगभग एक माह से अधिक समय बीत चुका है, पर शाला प्रशासन ने अपने विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं भी मुहैया नहीं करवाई गई हैं।

सतही तौर पर अगर गौर फरमाया जाए तो इस शाला में खेल के मैदान के दक्षिणी दिशा के नाले पर बाउंड्री वाल का काम अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है। गौरतलब है कि बारिश के मौसम में नाले में पानी का बहाव बहुत ही ज्यादा होता है। खुले मैदान में अगर छोटी कक्षा के बच्चे खेलते खेलते नाले तक जा पहुंचे तो किसी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही साथ बारिश में नाले से आने वाले कीट पतंगों और विषेले जीव जंतुओं को भी रोका नहीं जा सकता है। इस अनजाने खतरे से न केवल विद्यालय प्रशासन वरन् जिला प्रशासन भी अनिभिज्ञ है।
 
बार बार ध्यानाकर्षण के उपरांत विद्यालय प्रशासन द्वारा एक सिक्यूरिटी गार्ड की तैनाती अवश्य ही करवा दी गई है, पर इन सारे मामलात में जिला प्रशासन की भूमिका समझ से परे ही है। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के बच्चों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार बारिश के मौसम में उमस ने बच्चों को बेचेन कर रखा है, इसका कारण बडे कमरों में पंखों का अभाव ही है। कहा जा रहा है कि बिजली और अन्य खर्च को बचाने के चक्कर में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रशासन द्वारा अपने कक्षों में पर्याप्त मात्रा में पंखों को नहीं लगवाया गया है।

यहां एक बात और भी गौरतलब है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल सिवनी द्वारा सीबीएसई के डंडे के डर से जिला मुख्यालय में कचहरी चौक के पास संचालित होने वाली शाला को आनन फानन शहर के बाहर निर्माणाधीन भवन में स्थानांतरित अवश्य कर दिया है, पर विद्यार्थियों के नए सत्र जो कि 20 जून से आरंभ हुआ था के एक माह बीतने के बाद भी संगणक (कम्पयूटर्स) को शोभा की सुपारी बनाकर पुराने कचहरी चौक के पास वाले भवन में ही संस्थापित किया हुआ है। जिसके परिणाम स्वरूप पहले यूनिट टेस्ट के आरंभ होने के साथ ही विद्यालय के बच्चे इक्कसवीं सदी में कम्पयूटर की प्रायोगिक शिक्षा से पूरी तरह महरूम ही हैं।

एक तरफ तो सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन द्वारा अपनी शाला को माध्यमिक शिक्षा मण्डल अर्थात मध्य प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्थान पर केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से संबद्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर शाला में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करवाई जाना आश्चर्य जनक ही माना जा रहा है।

इस सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात तो यह है कि शाला में इस तरह की अनियमितताएं होने पर भी जिला शिक्षा अधिकारी के साथ ही साथ जिला प्रशासन द्वारा मुकर्रर प्रभारी अधिकारी अर्थात ओआईसी डिप्टी कलेक्टर द्वारा के कानों में भी इस मामले में जूं नहीं रेंग पा रही है। विद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार शाला प्रशासन से इन अधिकारियों की स्वार्थपूर्ति होने के चलते ही संभवतः शासन के मुलाजिमों ने शाला प्रशासन को अभिभावकों की जेबें काटने का लाईसेंस प्रदान किया हुआ है।
 
(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

0 सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (9)

सीधी से आए प्राचार्य द्वय ने किया था अरूणाचल का फिजीकल वेरीफिकेशन

सिवनी। जिला मुख्यालय में संचालित होने वाले अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को सीबीएसई बोर्ड द्वारा दी गई सीनियर सेकन्डरी की सशर्त अनुमति के मसले में शाला केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई के मापदण्डों को पूरा करती है, अथवा नहीं यह निरीक्षण करने इंचार्ज कमेटी के सदस्य के तौर पर सीधी के दो शालाओं के प्राचार्य को दायित्व सौंपा गया था। इन प्राचार्य द्वारा शाला का निरीक्षण कर अपना प्रतिवेदन सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर को सौंप दिया है।

सीबीएसई बोर्ड उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि एस एस - 00490 - 0910 क्रमांक के पंजीयन नंबर वाले अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को कक्षा दसवीं तक के लिए सीबीएसई बोर्ड से मिश्रित अस्थाई मान्यता देने की कार्यवाही में कागजी घोडे दौडाने के उपरांत फिर शाला के रिकार्ड, भवन, स्टाफ, विद्यार्थी एवं सुविधाओं के वास्तविक निरीक्षण के लिए सीबीएसई बोर्ड द्वारा दो सदस्यीय टीम का गठन किया गया था।

सूत्रों ने स्पष्ट तौर पर बताया कि इस निरीक्षण दल के प्रथम सदस्य के तौर पर सीधी के जयंत प्रोजेक्ट के केंद्रीय कारखाने में संचालित केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्राचार्य और सीधी के ही जिंगुर्धा प्रोजेक्ट के डी.ए.वी.पब्लिक स्कूल के प्राचार्य को पाबंद किया गया था। बताया जाता है कि दोनों प्राचार्य से युक्त इस जांच दल ने कब आकर अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) का स्थल निरीक्षण, फिजीकल वेरीफिकेशन किया और क्या पाया यह बात न तो विद्यार्थियों को ही पता है और न ही उनके पालकों को।

अगर सीर दीवान सिवनी में संचालित अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) के किसी विद्यार्थी को विद्यालय प्रशासन के कृत्यों से असंतोष होता तो अपना असंतोष या विरोध इस निरीक्षण जांच दल के समक्ष दर्ज करा सकते थे, किन्तु कहा जाता है कि विद्यालय प्रशासन ने विद्यार्थियों और उनके पालकों को एसा कोई मौका दिया ही नहीं गया।

सूत्रों ने आगे कहा कि इसी तारतम्य में सीर दीवान सिवनी में संचालित अरूणाचल पब्लिक स्कूल के प्रबंधक को सीबीएसई बोर्ड द्वारा पत्र क्रमांक सीबीएसई / एफी / एसएस - 00490 - 0910 (1030442) / 2009 दिनांक सात जुलाई 2007 को जारी किया गया था। इस पत्र में उक्त शाला के लिए फ्रेश कंपोजिट प्रोवीजनल एफीलेशन अर्थात नवीन मिश्रित अस्थाई मान्यता को सीनियर सेकन्डरी स्तर तक स्टेट बोर्ड से स्विच ओवर विषय से जारी किया गया था।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि उक्त शाला के आवेदन दिनांक 26 मई 2008 के तारतम्य में उन्हें निर्देशित किया गया है कि वे शाला को यह जानकारी दें कि शाला को 01 अप्रेल 2009 से 31 मार्च 2012 तक की तीन साल की अवधि के लिए सशर्त प्रोवीजनल एफीलेशन दिया गया है। इस पत्र में 29 शर्तों के साथ यह अस्थाई मिश्रित मान्यता प्रदाय की गई है। जिसमें भूखण्ड का रकबा, कक्षा, स्टाफ, विद्यार्थियों की संख्या, क्लास रूम का साईज, खेल का मैदान, प्रयोगशालाओं की संख्या, पुस्तकालय में किताबों का साईज और संख्या, कम्पयूटर लेब, सदा चालू रहने वाला ब्राडबेण्ड इंटरनेट कनेक्शन आदि का कडाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।

सूत्रांे ने आगे बातया कि कंडिका 28 में साफ तौर पर संलग्न एनेक्सचर ए का उल्लेख करते हुए इन शर्तों को भी मानना शाला की बाध्यता बताया गया है। एनेक्सचर ए में 11 शर्तों का पृथक से उल्लेख किया गया है। इन अतिरिक्त शर्तों का पालन भी 07 जुलाई 2009 से तीन माह अर्थात 07 अक्टूबर 2009 तक हो जाना चाहिए था।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी पत्र में उल्लेख किया गया है कि बिना अस्थाई अनुमति के अगर शाला द्वारा नवमी और दसवीं में विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता है तो आने वाले किसी भी परिणाम के लिए शाला प्रबंधन स्वतः ही जिम्मेदार होगा।

सूत्रों ने बताया कि कंडिका 3 में सीबीएसई बोर्ड की अस्थाई मान्यता मिलने के उपरांत शाला प्रबंधन अपने प्रांगण में सीबीएसई बोर्ड के अलावा किसी अन्य बोर्ड के विद्यार्थीयों को तैयार नहीं करेगा। इसकी कंडिका 4 काफी हद तक महत्वपूर्ण मानी जा सकती है जिसमें बोर्ड ने साफ तौर पर हिदायत दी है कि बोर्ड इस बात की अनुमति कतई नहीं देता है जिसमें प्रापर्टी अथवा स्कूल का सौदा एक सोसायटी से दूसरी सोसायटी या प्रबंधन को किसी तरह के अनुबंध या सेल डीड के आधार पर किया जाए। न ही उस प्रांगड मंे शाला का संचालन ही बंद किया जा सकता है। यदि इस तरह का कोई मामला प्रकाश मंे आता है तो बोर्ड अपनी मान्यता तत्काल प्रभाव से निरस्त कर सकता है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी पत्र की कंडिका 5 कहती है कि जिस राज्य में यह स्कूल स्थापित है उस राज्य के समान कर्मचारियों के वेतन और भत्ते सुनिश्चित करना और समय समय पर उन्हें रिवाईज करना शाला प्रबंधन की जिम्मेवारी है। कंडिका छः में भी कमोबेश यही बात कही गई है कि कर्मचारियों की सेवा शर्तें राज्य शासन के नियम कायदों के हिसाब से कडाई से पालन की जाएं। कर्मचारियों शिक्षकों का नियुक्ति पत्र स्थाईकरण पत्र राज्य शासन के नार्मस के हिसाब से होना आवश्यक है।

सूत्रों का कहना है कि इसकी कंडिका 7 कहती है कि कम से कम पांच या छः लोग जिसमें कम से कम दो लोग जो केंद्रीय विद्यालय या जवाहर नवोदय विद्यालय के प्राचार्य स्तर के अधिकारी हों को शाला प्रबंध समिति में रखना अत्यावश्यक है। कंडिका आठ में कहा गया है कि शाला को शिक्षकों का 1ः1.5 का अनुपात पहली से पांचवी, अर्थात प्रायमरी, छटवी से दसवीं अर्थात सेकण्डरी और ग्यारहवीं बारहवीं अर्थात सीनियर सेकण्डरी के लिए पालन करना अत्यावश्यक है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी पत्र में कंडिका 9 कहती है कि शाल प्रबंधन को कार्यस्थल पर महिलाओं का सेक्ुसअल हरासमेंट रोकने के लिए एक समिति का गठन करना आवश्यक है, जो माननीय सर्वोच्च न्यायायल की क्रिमनल रिट पिटीशन विशाख और अन्य बनाम राजस्थान राज्य, नंबर 666 - 70, / 1992 एवं अन्य दिनांक 13 अगस्त 1997 के द्वारा बताए गए नार्मस के हिसाब से हो।

सूत्रों के अनुसार कंडिका 10 में 1500 रूपए प्रतिवर्ष के हिसाब से तीन साल के लिए सीबीएसई को साढे चार हजार रूपए मात्र ही जमा कराना होगा। इसके अलावा शाला को अपने रिजर्व फंड को बनाने के लिए भी गाईड लाईन दी गई है, जिसमें शाला के प्रंबधक और सीबीएसई बोर्ड के संयुक्त नाम से खाता खोलकर जमा कराना आवश्यक होगा।

इसके अनुसार पांच सौ बच्चों तक साठ हजार रूपए, पांच सौ एक से साढे सात तो विद्यार्थियों तक अस्सी हजार रूपए, सात सौ इक्यावन से एक हजार बच्चों तक एक लाख रूपए तक एवं एक हजार से अधिक बच्चों के लिए सौ रूपए प्रति छात्र यह फंड जमा कराना होगा। इस जमा राशि पर मिलने वाला ब्याज किसी भी सूरत में शाला प्रबंधन द्वारा निकाला नहीं जा सकता है।

(क्रमशः जारी)

सोमवार, 9 अगस्त 2010

1 जून 2008 को दिया था अरूणाचल स्कूल ने एफीलेशन का आवेदन


सिवनी। जिला मुख्यालय सीर दीवान में बरघाट नाके के समीप संचालित होने वाले अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) ने केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई से एफीलेशन के लिए 01 जून 2008 को पंजीकरण हेतु आवेदन दिया था, जिसे सीबीएसई बोर्ड ने 06 अगस्त 2008 को स्वीकार किया था। इसके उपरांत इसके लिए आंकडे 04 जुलाई 2009 को जनरेट किए गए थे। इसका पंजीकरण नंबर एसएस - 00490 - 0910 प्रदान किया गया था। उक्ताशय की जानकारी सीबीएसई बोर्ड उच्च पदस्थ सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

गौरतलब होगा कि टाईनी टाट्स स्कूल पूर्व में बारापत्थर में पूर्व विधायक नरेश दिवाकर के आवास के बाजू में संचालित होता था, जिसे कालांतर में डॉ.सलिल त्रिवेदी के आवास के सामने होमगार्ड कार्यालय मार्ग पर स्थानांतरित कर दिया गया था। बताया जाता है कि शाला प्रबंधन ने नब्बे के दशक के आरंभ में अपने यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों से पांच सौ रूपए सालाना केपीटेशन फीस वसूलकर बरघाट नाके के समीप जमीन खरीदी गई, एवं इसमें शाला का निर्माण करवाया गया।

बरघाट नाके के समीप चलने वाला टाईनी टाट्स स्कूल एकाएक इतिहास की बात हो गया, और इसका स्थान अरूणाचल पब्लिक स्कूल ने ले लिया। यह सब पलक झपकते कैसे और क्यों हो गया, यह आज भी शोध का विषय ही बना हुआ है। कल तक जो विद्यार्थी टाईनी टाट्स स्कूल के छात्र थे, उनसे अगर पूछा जाए कि वे किस स्कूल के छात्र हैं तो उनकी जुबान पर आज भी टाईनी टाट्स का नाम ही रटा हुआ है। उक्त शाला भवन के लिए खरीदी गई जमीन किस नाम से खरीदी गई है और शाला भवन किसके स्वामित्व में है, किस अनुबंध के आधार पर टाईनी टाट्स स्कूल के बजाए रातों रात इसका नाम अरूणाचल पब्लिक स्कूल कर दिया गया यह गुत्थी या तो जिला एवं पुलिस प्रशासन ही सुलझा सकता है या फिर स्वयं टाईनी टाट्स शाला प्रबंधन।

बहरहाल सूत्रों ने आगे कहा कि इसी तारतम्य में सीर दीवान सिवनी में संचालित अरूणाचल पब्लिक स्कूल के प्रबंधक को सीबीएसई बोर्ड द्वारा पत्र क्रमांक सीबीएसई / एफी / एसएस - 00490 - 0910 (1030442) / 2009 दिनांक सात जुलाई 2007 को जारी किया गया था। इस पत्र में उक्त शाला के लिए फ्रेश कंपोजिट प्रोवीजनल एफीलेशन अर्थात नवीन मिश्रित अस्थाई मान्यता को सीनियर सेकन्डरी स्तर तक स्टेट बोर्ड से स्विच ओवर विषय से जारी किया गया था।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि उक्त शाला के आवेदन दिनांक 26 मई 2008 के तारतम्य में उन्हें निर्देशित किया गया है कि वे शाला को यह जानकारी दें कि शाला को 01 अप्रेल 2009 से 31 मार्च 2012 तक की तीन साल की अवधि के लिए सशर्त प्रोवीजनल एफीलेशन दिया गया है।

सीबीएसई के सूत्रों ने आगे कहा कि इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि शाला को अंग्रेजी और हिन्दी वेकल्पिक एवं कोर तथा संस्कृत के साथ ही साथ वेकल्पिक विषयों के तौर पर ज्योगरफी, इकोनोमिक्स, मेथामेटिक्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलाजी, फिजीकल एजूकेशन, बिजनिस स्टेडीज, एकाउंटेंसी, इंफरमेटिक्स प्रेक्टिस, कंप्यूटर साईंस को शामिल किया गया है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को सीबीएसई द्वारा दी गई मान्यताओं की शर्तों में उल्लेखित है कि शाला को मिडिल क्लास में एनसीईआरटी द्वारा निर्धारित किताबों को शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही साथ अन्य विषयों की किताबें सीबीएसई बोर्ड द्वारा निर्धारित और समय समय पर परिवर्तित होंगी। तीसरी शर्त के रूप में यह उल्लेख किया गया है कि शाला अपने विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या शिक्षकों के निर्धारित अनुपात में ही रखेगी। यह बोर्ड के बाय लाज के हिसाब से ही होगी एवं उससे अधिक विद्यार्थियों को दाखिला नहीं दिलवाएगा।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की चौथी शर्त के तौर पर यह बाध्यता रखी गई है कि शाला किसी अन्य शाला जो बोर्ड से एफीलेटेड न हो में विद्यार्थियों को स्पासंर नहीं करेगा। पांचवी शर्त के तौर पर कहा गया है कि शाला पर्याप्त मात्रा में क्वालिफाईड और शिक्षित स्टाफ को नियमित आधार पर एफीलेशन बायलाज के हिसाब से रखेगा। अगली शर्त में कहा गया है कि शाला अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तें, वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं कम से कम उस राज्य में कार्यरत करस्पांडेंट श्रेणी के सरकारी स्कूल के स्टाफ से देगा, जहां वह स्थापित होगा, इस तरह की एक अंडरटेकिंग तत्काल प्रभाव से सीबीएसई को भेजना अनिवार्य है।

सूत्रों का आगे कहना है कि राज्य सरकार के हिसाब से कर्मचारियों की सेवा शर्तें निर्धारित की जाएं यह इसकी सातवीं शर्त है। ग्यारहवीं कंडिका मंे साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि शाला बोर्ड के निर्धारित नार्मस के हिसाब से प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाएगा। इसकी महत्वपूर्ण कंडिका 13 में कहा गया है कि शाला कम से कम दस कम्पयूटर वाली कम्पयूटर लेब या विद्यार्थियों की 1: 20 के अनुपात में कंप्यूटर लेब उलब्ध कराएगा। अगर किसी शाला में 1000 छात्र हैं तो वहां कम से कम 50 कम्पयूटर वाली कम्पयूटर लेब का होना आवश्यक है। यह कंडिका कम्पयूटर छात्रों की संख्या के हिसाब से ही होगी। इसमें साफ तौर पर उल्लेखित किया गया है कि कम्पयूटर में निर्धारित साफ्टवेयर विद ब्राडबेण्ड कनेक्शन वह भी ‘‘इंटरनेट आलवेज आन‘‘ की स्थिति में होना आवश्यक है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका नंबर 14 में कहा गया है कि शाला विशेष ध्यान देने वाले बच्चों या अक्षम डिसेबल्ड बच्चों को डिसेबलटी एक्ट 1995 के तहत प्रमोट करेगी। इसकी कंडिका 15 में कहा गया है कि शाला अपने रिकार्ड को बोर्ड या राज्य शासन के शिक्षा विभाग और उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि के लिए खुला रखेगा, जब चाहे तब ये इस रिकार्ड का अवलोकन कर सकते हैं। गौरतलब होगा कि जिला शिक्षा अधिकारी सिवनी द्वारा पूर्व में यशोन्नति से चर्चा के दौरान कहा गया था, कि मामला सीबीएसई बोर्ड का है, इस मामले में वे क्या कर सकते हैं।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका 16 कहती है कि शाला में विद्यार्थियों से वसूल की जाने वाली ट्यूशन और अन्य फीस भी वहां उपलब्ध सुविधाओं के अनुरूप होनी चाहिए। कंडिका 17 में उल्लेख किया गया है कि शाला में प्रवेश के दौरान धार्मिक, जाति आधार या जन्म स्थान का कोई बंधन नहीं होना चाहिए। शाला इस आधार पर किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं कर सकती है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका 18 कहती है कि किसी भी तरह की अनरिकर्जनाईज्ड क्लास शाला के प्रांगड में संचालित नहीं हो सकती है, और न ही शाला के नाम से ही संचालित हो सकती है। कंडिका 19 के अनुसार शाला इन नियमों का पालन सख्ती से करे कि विद्यार्थियों के लिए सुरक्षा उपकरण एवं व्यवस्थाएं पर्याप्त हों, शाला में अग्निशमन यंत्र, पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय एवं ट्रांसपोर्टेशन की पर्याप्त व्यवस्था हो। इस एफीलेशन के लिए सालाना फीस पंद्रह सौ रूपए प्रतिवर्ष के हिसाब से तीन साल के लिए चार हजार पांच सौ रूपए ही होगी।

सूत्रों का कहना है कि कंडिका 27 में कहा गया है कि शाला का प्रांगण का क्षेत्रफल 8260 स्कव्यर मीटर, बिल्ट अप एरिया 5648.36 स्केयर मीटर, खेल के मैदान का क्षेत्रफल 2968 स्केयर मीटर, कुल कक्षाएं 19, प्रयोगशालाओं में बायोलाजी, फिजिक्स, रसायनशास्त्र, गणि, कम्यूटर साईंस की एक एक उपलब्ध होना आवश्यक है। इसके अलावा शाला के पुस्कालय मंे 20 गुणा 22 साईज की कुल तीन हजार एक सौ छियत्तर किताबें होना आवश्यक है। इसकी कंडिका 29 कहती है कि स्पेशल कंडीशन्स को तीन माह के अंदर ही पूरा करना अनिवार्य है।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (7)

सीबीएसई की वेव साईट बताती है कि एकलव्य, नवोदय, सेंट्रल और महर्षि  ही हैं सीबीएसई एफीलेटेड स्कूल

सिवनी। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई के प्रलोभन के चलते पालक और विद्यार्थियों पर बन आई है. जिला मुख्यालय में प्रशासन की नाक के नीचे निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं द्वारा अपने आप को सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध या संबद्धता की कतार में होने का दावा कर विद्यार्थियों को जबर्दस्त तरीके से आकर्षित करने का कुत्सित प्रयास जारी है. शहर में चल रही शालाओं कथित तौर पर ली जाने वाली द्वारा केपीटेशन फीस के माध्यम से अपनी विशाल अटटालिकाएं खडी कर ली गईं हैं. इक्कीसवीं सदी में संचार क्रांति के चलते सीबीएसई बोर्ड की वेव साईट पर सब कुछ दिखता है की तर्ज पर पालक या विद्यार्थी चाहें तो सब कुछ अपनी आंख से देख भालकर संतोष कर सकते हैं, यह सब अगर किसी को नहीं दिख रहा है, तो वह है जिला प्रशासन को.
 
सीबीएसई की आधिकारिक वेव साईट द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/ पर जब होम पेज खुलता है तब उसके उपरांत इस वेव साईट पर पब्लिक पर क्लिक करने पर जो विण्डो खुलती है, उसमें उपर एड्रेस बार द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/श्चह्वड्ढद्यद्बष्१.द्धह्लद्वमें दिखने लगेगा. इस विण्डो को खोलने पर जब बाईं और आने वाले केरेक्टर्स में देखा जाए तो दूसरे नंबर पर  ष्ठश्वक्क्रक्रञ्जरूश्वहृञ्जस्/हृढ्ढञ्जस्
(ढ्ढठ्ठद्घशह्म्द्वड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र श्चस्रड्डह्लद्गह्य) दिखाई पडेगा. इसे क्लिक करने पर जो विंडो खुलेगी उसमें एकेडेमिक एडमीशन आदि दिखाई देने लगेगा. इसमें तीसरे नंबर पर एफीलेशन को क्लिक करते ही नई विण्डो खुल जाएगी.
 
इस नई विण्डो में उपर अलग अलग तरह से सर्च के आप्शन आ जाते हैं. इस विण्डो में तीसरे नंबर पर स्टेट वाईज को क्लिक कर सिलेक्ट ए स्टेट में मध्य प्रदेश और एंटर ए की वर्ड में सिवनी भरा जाकर सर्च की जाए तो जो परिणाम सामने आते हैं वे कुछ इस प्रकार हैं. सिवनी के नाम से कुल छरू शालाएं ही सीबीएसई से संबद्ध बताई गई हैं. जिनमें से केंद्रीय विद्यालय सिवनी मालवा अर्थात होशंगाबाद जिले और दूसरा जवाहर नवोदय वारासिवनी अर्थात बालाघाट जिले का है.
 
इसके अलावा इस सूची में पहली पायदान पर एकलव्य माडल रसीडेंशियल स्कूल घंसौर जिला सिवनी है, जिसके प्राचार्य के स्थान पर लोकमन गेंडाम का नाम अंकित है, इसका एफीलेशन नंबर १०२०००६ दर्शाया गया है. १९९२ से संचालित होने वाली इस शाला को प्रोवीजनल एफीलेशन १ अप्रेल २००६ से ३१ मार्च २०११ तक की अवधि के लिए प्रदान किया जाना दर्शाया गया है.
 
इसके उपरांत दूसरी पायदान पर जवाहर नवोदय विद्यालय कान्हीवाडा, जिला सिवनी का नाम दर्ज है. १९८७ से संचालित इस शाला के प्राचार्य के नाम के आगे वी एस सिंह और आर एस राव का नाम दर्ज है. इस शाला को १ अप्रेल २०१० से ३१ मार्च २०१० तक के लिए प्रोवीजनल एफीलेशन प्रदाय किया गया है जिसका नंबर १०४०००६ दर्ज है. इस मान से देखा जाए तो इस साल नए शैक्षणिक सत्र में जवाहर नवोदय विद्यालय की सीबीएसई मान्यता समाप्त हो चुकी है.
 
तीसरेी पायदान पर बालाघाट के वारासिवनी और चौथे नंबर पर होशंगाबाद के सिवनी मालवा का उल्लेख है. पांचवे नंबर पर एक बार फिर सिवनी जिले का उल्लेख किया गया है. पांचवी पायदान पर स्थान पाया है केंद्रीय विद्यालय सिवनी ने. जिले में १९९२ से संचालित इस शाला के विवरण में लिखा गया है कि यह विद्यालय पुराने जेल भवन में संचालित हो रहा है, और इसे प्रोवीजनल एफीलेशन एक अप्रेल २००१ से ३१ मार्च २०११ तक के लिए प्रदान की गई है. इसके प्राचार्य के स्थान पर आर ए मिश्रा का नाम अंकित है, इसका प्रोवीजनल एफलेशन नंबर १०००००५६ दर्शाया गया है.
 
अंतिम अर्थात छटवें नंबर पर बारी आती है महर्षि स्कूल की. महर्षी विद्यालय के विवरण में उल्लेख किया गया है कि यह शाला १९९२ से चल रही है, इसकी प्राचार्य श्रीमति आर तिकाडे हैं, तथा इसे एक अप्रेल २००७ से ३१ मार्च २०१२ तक के लिए प्रोवीजनल मान्यता प्रदान की गई है. इसका एफीलेशन नंबर १०३००७७ है. इसके बाद सूची समाप्त हो जाती है.

सुधि पाठक स्वयं ही अंदाजा लगा सकते हैं कि संचार क्रांति के इस युग में अब और क्या प्रमाण दिया जाए. जब सीबीएसई की वेव साईट खुद चिल्ला चिल्ला कर हकीकत बयां कर रही है, तब जिला मुख्यालय में सांसद, विधायक, कांग्रेस भाजपा और प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह का गोरखधंधा हो रहा हो तब सिवनी के विद्यार्थियों का भगावन ही मालिक माना जा सकता है.
(क्रमशः जारी)

सोमवार, 26 जुलाई 2010

सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (5)

पालक खुद सोच समझकर शाला में प्रवेश दिलाएं, किसी शाला के लिए हमारी कोई जवाबदेही नहीं: पटले

सिवनी। किस शाला में प्रवेश दिलाना है कौन सी शाला बच्चों के लिए अच्छा और स्वच्छ वातावरण देने में सक्षम है, कौन सी शाला सीबीएसई या मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मण्डल बोर्ड की मान्यता लिए है या लेने वाली है, या इसका प्रलोभन दे रही है?, इस बारे में हम क्या कर सकते हैं, यह सोचना पालकों का अपने विवेक का काम है. उक्ताशय के गैरजिम्मेदाराना कथन नवागत जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले ने मीडिया से चर्चा के दौरान कहे.
 
गौरतलब है कि पिछले दो तीन सालों से सिवनी जिले में कुकरमुत्ते की तरह चलने वाले निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मण्डल के स्थान पर केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का प्रलोभन सरेआम दिया जा रहा है. चूंकि सीबीएसई बोर्ड की पढाई एमपी बोर्ड से लाख दर्जे उच्च स्तर की होती है, एवं इनके प्रोडक्टस को आगे आने वाले समय में उच्च शिक्षा में काफी हद तक लाभ मिल सकता है. इसी के चलते पालकों का आकर्षण सीबीएसई स्कूलों की तरफ होना स्वाभाविक ही है. नगर में संचालित होने वाली शालाओं में मुख्यत सेंट फ्रांसिस स्कूल, अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाटस), मार्डन नर्सरी, मिशन इंगलिश स्कूल आदि का प्रबंधन चाह रहा है कि उन्हें सीबीएसई की मान्यता मिल जाए.
 
इन शालाओं में से टाईनी टाटस स्कूल ने अपने विद्यार्थियों से केपीटेशन फीस (बिल्डिंग फंड, एवं अन्य मदों में ली जाने वाली राशि) के बलबूते बरघाट नाके पर अपना शाला भवन तैयार कर लिया, इसी तरह सेंट फ्रांसिस स्कूल ने जबलपुर रोड पर अपना शाला भवन बनाना आरंभ किया है. शहर में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार इन शालाओं में प्रवेश लेने के उपरांत जब पालकों को वास्तविकता का पता चला तो उनके पास पछताने के अलावा कुछ और नहीं बचा.
 
इस संबंध में जब जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले से संपर्क साधा गया तो उन्होंने मोबाईल पर चर्चा के दौरान कहा कि नई नीति के अनुसार कोई भी शाला नवमी कक्षा में तब तक प्रवेश नहीं आरंभ करवा सकती है, जब तक कि उसे मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड या केंद्रीय शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता न दी जाए. जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले ने आगे यह भी कहा कि किस शाल में प्रवेश दिलाना है किसमें नहीं यह फैसला नितांत तौर पर विद्यार्थी के पालक का ही होता है, किन्तु जब उनसे यह पूछा गया कि अगर सीबीएसई का दिखावा करने वाली शालाओं के पास सीबीएसई की मान्यता न हो तब पालकों को इस छल से बचाने की जवाबदेही किस पर आती है? इस प्रश्र के जवाब में जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले ने कहा कि इस मामले में  जिला शिक्षा अधिकारी भला क्या कर सकता? समूचा मामला पालक और शिक्षण संस्थाओं के संचालकों के बीच का है, इसमें हस्ताक्षेप करने वाला  जिला शिक्षा अधिकारी कौन होता है?
 
जहां तक रही शाला के द्वारा विद्यार्थियों को आवागमन के साधन, स्वच्छ हवादार वातावरण, खेल का अच्छा मैदान, भौतिक रसायन, रसायन शास्त्र, प्राणी विज्ञान की प्रयोगशालाओं, कम्पयूटर लेब, शौचालय, पुस्तकालय आदि की बात, तो इस मामले में  जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले का कहना है कि व्यक्ति को चुना जाएगा, फिर उसे लिखित में निरीक्षण करने का निर्देश जारी किया जाएगा, उसके उपरांत वह व्यक्ति जाकर इन शालाओं का निरीक्षण करने की तिथि निर्धारित करेगा, जब उसे समय मिलेगा तब वह जाकर उसका निरीक्षण कर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा. जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले के अनुसार कागजी कार्यवाही में समय लगता है, सो समय का इंतजार करने के अलावा और क्या किया जा सकता है.
 
मीडिया द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले से जब यह जानना चाहा कि जब तक सीबीएसई बोर्ड द्वारा मान्यता नहीं दी जाती है, तब तक के समय अर्थात ट्रांजिट टाईम में शाला किसके नियंत्रण में रहेगी? इस प्रश्र के जवाब में  जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले अपनी बात पर ही अडिग रहे कि नए नियमों के हिसाब से जब तक सीबीएसई बोर्ड की मान्यता नहीं मिल जाती है, तब तक वह शाला नवमीं या ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश नहीं दे सकती है.
 
शहर में सीबीएसई के लिए कतारबद्ध खडी शालाओं के प्रबंधन के सूत्रों का कहना है कि उन सिवनी में अभी तक किसी भी शाला को सीबीएसई से मान्यता नहीं मिली है. इस मामले में सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में किसी भी शाला को सीबीएसई ने अब तक मान्यता नहीं दी है. शाला प्रबंधन नवमी में विद्यार्थियों को अगर प्रवेश देने की प्रक्रिया कर रहा है, तो यह वह शाला अपनी जवाबदारी पर कर रही है. अगर मान्यता शैक्षणिक सत्र २०१० - २०११ में नहीं दी जाती है तो फिर इन बच्चों को सीबीएसई में एनरोल ही नहीं किया जाएगा. गौरतलब है कि सीबीएसई में नामांकन कक्षा नवमी में ही किया जाता है. बाद में बच्चे को कक्षा दसवीं में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा देने की पात्रता होगी. अगर मान्यता का काम अधर में रोक दिया जाता है तो अगले साल दसवीं में प्रवेश पाने वाले बच्चों का भविष्य अंधकार में भी लटक सकता है.
(क्रमशः जारी)

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (4)

स्कूलों  के  मामले  में  आखिर  प्रशासन  क्यों  है  मूकदर्शक?

सिवनी। जिला मुख्यालय सिवनी में सेंट्रल बोर्ड ऑफ स्कूल एजूकेशन (सीबीएसई बोर्ड) का झुनझुना बजाकर निजी तौर पर संचालित होने वाले विद्यालयों द्वारा विद्यार्थियों के पालकों को जमकर लूटा जा रहा है और सांसद, विधायक सहित जिला प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है. स्थानीय विधायक श्रीमति नीता पटेरिया से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में यह कहा कि यह निजी तौर पर संचालित होने वाली शाला है, इसमें जनप्रतिनिधि भला क्या कर सकता है?
 
गौरतलब है कि इस साल के शैक्षणिक सत्र के आरंभ होते ही जिला मुख्यालय में सीबीएसई बोर्ड के एफीलेशन के बारे में तरह तरह के पर्चे पंपलेट बांटकर बच्चों के पालकों को आकर्षित करने का प्रयास किया गया है. जो जिसे खींच सका उसने अपनी ताकत इसमें झोंक दी. बाद में बच्चों ने शालाओं में प्रवेश लिया तो अपने आप को ठगा सा महसूस किया. आधे अधूरे शाला भवन, आवागमन के साधनों का अभाव, जबर्दस्त शिक्षण शुल्क, केपीटेशन फीस, दुकान विशेष या विद्यालय से ही गणवेश या कापी किताबों का क्रय किया जाना आदि के चलते पालकों की तो बन आई है.
 
सीबीएसई के लालच में निजी शाला के संचालकों द्वारा अहर्ताएं पूरी किए बिना ही विद्यार्थियों को लालच दिया जाकर उनके पालकों की जेब तराशी की जा रही है. सीबीएसई के निरीक्षणकर्ता अधिकारी भी न जाने क्या देखकर इन शालाओं को मान्यता देने की अनुशंसा भी कर देते हैं. व्याप्त चर्चाओं के अनुसार जबर्दस्त चढावे के बोझ के तले ये अधिकारी दबे होते हैं.
 
यहां उल्लेखनीय होगा कि जब तक ये शालाएं सीबीएसई बोर्ड से मान्यता नहीं ले लेती तब तक ये मध्य प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा मण्डल के अधीन ही काम करती हैं. मध्य प्रदेश सरकार का एक मुलाजिम जिसे हर जिले में जिला शिक्षा अधिकारी कहा जाता है, उसके शासकीय दायित्वों में इन शालाओं का निरीक्षण और मशिम के अनुकूल अर्हातांएं होना सुनिश्चित कराना आता है. विडम्बना ही कही जाएगी कि जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा सालों से इन शालाओं का निरीक्षण नहीं किया गया है. बताया जाता है कि बच्चों को सीबीएसई के भुलावे में रखने गरज से सीबीएसई की तर्ज पर इन शालाओं ने सीबीएसई की मान्यता न मिलने के बावजूद भी सेकंड सटर्डे अर्थात द्वितीय शनिवार का अवकाश मनमर्जी से घोषित कर दिया गया है. अब तक महज केंद्रीय विद्यालय में ही द्वितीय शनिवार को अवकाश घोषित होता है.
 
इस संबंध में जब परिसीमन के उपरांत समाप्त हुई सिवनी लोकसभा की अंतिम सांसद और जिला मुख्यालय सिवनी को अपने आप में समेटने वाली सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया से इस प्रतिनिधि ने चर्चा की तो उन्होंने छूटते ही कहा कि चूंकि ये सारे मामले निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं के हैं, अतरू इस बारे में वे कुछ भी नहीं कर सकतीं हैं, जब उनसे यह पूछा गया कि अंत्तोगत्वा परेशानी तो उनकी विधानसभा क्षेत्र में आने वाले उनके वोटर्स पालकों के बच्चों को ही हो रही हो, वह चाहे निजी शाला में अध्ययन करे या फिर सरकारी शाला में, तो वे चुप्पी साध गईं. इस प्रतिनिधि से चर्चा के दौरान श्रीमति पटेरिया ने कहा कि यह मामला जिला प्रशासन को ही देखना चाहिए, अगर प्रशासन इस मामले में चुप है, इसका तातपर्य है सब कुछ ठीक ठाक ही है. वस्तुतरू सीबीएसई की मान्यता की अपेक्षा में जो शालाएं वर्तमान में माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल के तहत संचालित हो रही हैं, उनकी स्थिति बद से बदतर ही है. जिला प्रशासन द्वारा शिक्षा विभाग की कमान एक उप जिलाध्यक्ष को आफीसर इंचार्ज बनाकर दी है, पर लगता है वे भी आला अधिकारियों के इशारों की प्रतीक्षा ही कर रहे हैं. हालत देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि शिक्षा के मामले में इस जिले का कोई धनी धोरी ही नहीं बचा है.

इस संबंध में जब जिला शिक्षा अधिकारी श्री पटले से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि उक्त शालाएं सीबीएसई से संबद्ध हैं और सीबीएसई के अधिकारी ही इसका निरीक्षण करते हैं, जब उनसे यह कहा गया कि जब तक सीबीएसई से संबद्धता नहीं हो जाती तब तक तो ये शालाएं प्रदेश शासन के अंतर्गत काम कर रहीं हैं, राज्य शासन के मुलाजिम चाहें तो इनकी मुश्कें कस सकते हैं, इस प्रश्र पर श्री पटले ने भी मौन साध लिया.

केंद्र शासन द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम २००९ लागू किया है, वहीं मध्य प्रदेश में जनशिक्षा अधिनियम २००१ लागू है, जिसके तहत राज्यों की सरकारों को यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल न जाने वाले बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में करवाया जाए. (देखिए खबर पेज तीन पर). स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष २००९ में कराए गए सर्वे में मध्य प्रदेश के लाखों बच्चे स्कूल जाने से वंचित ही पाए गए थे. सिवनी जिले में कितने बच्चे स्कूल जाने से वंचित हैं, इसकी जानकारी जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में उपलब्ध ही नहीं हो सकी है. सांसद, विधायक सहित जिला प्रशासन से पुनरू जनहित में अपेक्षा है कि देश के भविष्य बनने वाले नौनिहालों के हित में कम से कम कुछ सार्थक पहल अवश्य ही करें.
(क्रमशः जारी)