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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012


फेरबदल से क्या अलीबाबा . . . . 5

घपले, घोटाले में आकंठ डूबी है कांग्रेस!

(लिमटी खरे)

‘‘कांग्रेस का इतिहास अति गौरवशाली कहा जा सकता है। भारत गणराज्य की स्थापना में कांग्रेस के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। इसमें महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की भूमिका को भी कतई नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। आजादी के उपरांत कांग्रेस के लिए नेहरू गांधी परिवार का तात्पर्य माईनस महात्मा गांधी हो गया है। अर्थात जवाहर लाल नेहरू और फिरोज गांधी (कांग्रेस जिन्हें पूरी तरह भुला चुकी है) के वंशज ही हैं। युवा स्वप्नदृष्टा राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी के भारत की कल्पना की थी। इक्कीसवीं सदी के भारत में कांग्रेस की बागड़ोर उनकी इटालियन पत्नि सोनिया गांधी के हाथ में है। सरकार की कामन भी 2004 के उपरांत अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हीं के पास है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में कांग्रेस को अपने ही लोगों के कारण जो लानत मलानत झेलनी पड़ी उससे वर्तमान कांग्रेसी तो शर्मसार नहीं दिखते पर कांग्रेस का उजला अतीत जरूर कांतिहीन होता जा रहा है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की दूसरी पारी में महज बीस महीनों में ही भ्रष्टाचार के आधा सैकड़ा मामले सामने आए हैं जिसमें दस लाख करोड़ रूपयों से ज्यादा का खेल खेला गया है। सरकार के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की होली खेली जाती है और सरकार खामोश है। देश लुटता रहा, मंत्री सरकारी खजाने का धन लुटाते रहे। लेकिन वजीरे आजम, कांग्रेस की राजमाता और युवराज के अंदर इतना माद्दा नहीं था कि वे किसी से प्रश्न कर सकें, इन परिस्थितियों में कैसे कह दिया जाए कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ईमानदार हैं।‘‘
इक्कीसवीं सदी का पहला दशक भारत गणराज्य के लिए बुरे सपने समान कहा जा सकता है। इस दशक में जितने घपले घोटाले सामने आए हैं उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। एक के बाद एक भ्रष्टाचार, घपले, घोटाले में घिरी कांर्ग्रेस के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं दिखा। इसी बीच इक्कीसवीं सदी में योग साधना के आकाश में धूमकेतू बनकर उभरे स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने र्भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए अभियान छेड़ दिया। कांग्रेस के शातिर प्रबंधकों ने बाबा रामदेव को घेर दिया। बेचारा योगी किसी तरह से जान बचाकर दिल्ली के रामलीला मैदान से भाग खड़ा हुआ। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले गांधीवादी अण्णा हजारे की आवाज सिहनाद बनकर उभरी और फिर क्या था। समूचा देश कांग्रेस और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जुट होकर खड़ा हो गया। देश में गली गली में ‘‘मैं अण्णा हूं‘‘ की आवाज ने कांग्रेस को घुटनो पर बैठने मजबूर कर दिया।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में महज एक साल में ही दस लाख करोड़ रूपयों की भ्रष्टाचार के हवन कुण्ड में आहुती देने से हाहाकार मच गया। नेशनल कैंपेन अगेंस्ट करप्शन ने मई 2009 से जनवरी 2011 तक के बीच हुए प्रमुख भ्रष्टाचार के महाकांडों की फेहरिस्त तैयार की है। इसमें पहली पायदान पर संचार मंत्रालय द्वारा टूजी स्पेक्ट्रम लाईसेंस में केंद्रीय महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक ने पौने दो सौ लाख रूपए की हानि का प्रकरण है। इस प्रकरण में सीबीआई ने पूर्व संचार मंत्री आदिमत्थू राजा सहित अनेेक अफसरान को शिकंजे में कस दिया है।
जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि टूजी में ही कांग्रेस और द्रविड़ मुनैत्र कषगम के नेताओं ने साठ हजार करोड़ की रिश्वत ली है। इसके बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की विपणन कंपनी और एक निजी क्षेत्र की कंपनी देवास मल्टी मीडिया के बीच दो उपग्रहों के दस ट्रांसपोंडर को बारह वर्ष के लिए लीज पर देने के मामले में सीएजी ने प्राथमिक परीक्षण में दो लाख करोड़ रूपए का नुकसान आंका है।
उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का अनाज नेपाल, बंग्लादेश और अफ्रीका जैसे देशों में बेचने का मामला प्रकाश में आया जिसमें दो लाख करोड़ का घोटाला सामने आया है। इसके बाद नंबर आता है राष्ट्रीयकृत बैंक का भवन आवासीय ऋण घोटाला जिसे छत्तीस हजार करोड़ रूपयों का आंका गया है। सिटी बैंक में अरबों रूपयों के केंद्रीय सरकार के मैटल स्क्रेप ट्रेडिंग कार्पाेरेशन के छः सौ करोड़ रूपए के सोने का महाघोटाला भी इसी फेहरिस्त में शामिल है।
महाराष्ट्र प्रदेश के पूना के एक अस्तबल के मालिक हसन अली खान के स्विस बैंक, यूबीएस ज्यूरिक में सवा आठ अरब डालर अर्थात लगभग छत्तीस हजार करोड़ रूपए के खाते के रहस्य से भी पर्दा उठा। 2009 - 2010 के बजट में यह रहस्य भी सामने आया कि हसन अली के उपर लगभग साढ़े पचास हजार करोड़ रूपयों का आयकर बाकी है। सिविल सोसायटी के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने सरकार की मुखालफत की तो सरकार ने उन पर तत्काल शिकंजा कस दिया किन्तु एक जरायमपेशा व्यक्तित्व पर पचास हजार करोड़ का आयकर कैसे बाकी रह गया यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।
एक चाटर्ड एकाउंटेंट का कथन था कि हसन के विदेशी खातों में छत्तीस हजार करोड़ के बजाए डेढ़ लाख करोड़ रूपए होना अनुमानित है। आयकर चोर एक मामलू घोडों के अस्तबल का मालिक हसन अली कितना रसूखदार है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक अजीज डोवाल, प्रोफेसर आर.वैद्यनाथन, एस.गुरूमूर्ति, महेश जेठमलानी के अलावा कांग्रेस के आलाकमान से भी संबंधों का खुलासा हुआ है।
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त जे.एम.लिंगदोह, पूर्व राजस्व सचिव जावेद चौधरी, सहित अनेक अफसरों ने केरल के पामोलिन कांड में आरोपी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पी.जे.थामस को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाए जाने को चुनौती दी। बाद में सरकार को इस मामले में अपने कदम वापस लेने पड़े और भ्रष्ट अधिकारी थामस को सीवीसी के पद से हटाना ही पड़ा। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल तब खुली जब पचपन हजार करोड़ रूपयों की लड़ाकू हवाई जहाज की खरीद से संबंधित गोपनीय नस्ती सड़क पर लावारिस हालत में मिली।
तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने निजी एयरलाईंस की मदद करते हुए एयर इंडिया के डैनों की हवा निकाल दी। आज आलम यह है कि एयर इंडिया भारी कर्जे में है और उसके पास तेल के बाकी पैसे चुकाने तक को पैसे नहीं है। आज एयर इंडिया के कर्मचारियों को तनख्वाह देने के बांदे हैं। खाद्य मंत्री शरद पंवार पर आरोप है कि उन्होने अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए कम दाम वाली चीनी और प्याज के निर्यात की अनुमति दे दी जिससे देश में इनका संकट तो पैदा हुआ ही साथ ही साथ इनकी दरें तेजी से उपर आईं। फिर पंवार ने इनका आयात आरंभ किया।
कार्पाेरेट घरानों की तगड़ी पैरोकार नीरा राड़िया के टेप ने तो मानो भारत के सियासी तालाब में मीटरांे उंची लहरें उछाल दीं। नीरा राडिया के टेप कांड में जब यह बात सामने आई कि द्रमुक के सांसद आदिमुत्थु राजा को मंत्री बनाए जाने लाबिंग की गई तब लोगों के हाथों के तोते उड़ गए। इसमें अनेक मंत्रियों पर सरेआम पंद्रह फीसदी कमीशन लेकर देश सेवा तक करने की बात भी कही गई। विडम्बना यह कि साफ साफ आरोपों के बाद भी न तो मनमोहन कुछ करने की स्थिति में हैं और न ही इस मामले में सोनिया गांधी ही कुछ कर पा रही हैं।
मामला अभी शांत नहीं हुआ है। सीएजी ने कामन वेल्थ गेम्स में हजारों करोड़ रूपयों की होली खेलने की बात कही गई। कांग्रेस के चतुर सुजान मंत्री कपिल सिब्बल कभी कलमाड़ी के बचाव में सामने आए तो कभी तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा के। अंततः दोनों ही को जेल की रोटी खानी पड़ रही है। केंद्रीय महालेखा नियंत्रक और परीक्षक ने कामन वेल्थ गेम्स में सत्तर हजार करोड़ रूपयों की अनियमितता पकड़ी है।
बिहार सरकार ने वहां के पूर्व राज्यपाल बूटा सिंह द्वारा अरबों रूपयों के नदी तटबंधों के ठेकों की जांच के आदेश भी जारी किए हैं। सीबीआई ने उनके पुत्र को एक करोड़ रूपए रिश्वत लेते रंगें हाथों धरा है। इतना ही नहीं सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भ्रष्टाचार के आरोपी प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी.एस.लाली को निलंबित कर उनके एवं मध्य प्रदेश काडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अरूणा शर्मा के खिलाफ जांच की सुस्तुति की है। रूस से विमानवाहक जंगी जहाज खरीदने के सिलसिले में रक्षा मंत्रालय द्वारा वरिष्ठ नौसेना अधिकारी की बर्खास्तगी की गई। सम्प्रग सरकार के लिए स्विस बैंक सहित अन्य बैंकों में जमा अस्सी लाख करोड़ रूपए से ज्यादा की देश वापसी आज भी पहेली बनी हुई है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने विदेशी बैंक के खाताधारकों के नाम सार्वजनिक करने को कहा गया है।
मैडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ.केतन देसाई को केंद्रीय जांच ब्यूरो के छापे के बाद पद से हटाया गया। अनेक गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना में अड़तीस हजार करोड़ रूपयों से ज्यादा के गोलमाल के आरोप लगाए हैं। नाफेड में चार हजार करोड़ रूपयों के नियमों को बलात ताक रख किए गए निवेश की जांच जारी है। केंद्र सरकार ने दिल्ली विकास अभिकरण में मकान आवंटन में घपलों की जांच आरंभ की है।
यह है देश में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी का हाल सखे! इतना सब कुछ होता रहा। समाचार पत्रों के साथ ही साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया और वेब मीडिया का गला चीखते चीखते रूंध गया किन्तु न तो मनमोहन के कानों में जूं रेंगी और न ही सरकार टस से मस हुई। मीडिया की आवाज सोनिया के दरबार में भी नक्कारखाने में तूती की ही आवाज साबित हुई। युवा भारत का कथित तौर पर स्वप्न देखने का दावा (मीडिया में प्रायोजित कर) करने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी भ्रष्टाचार के मामले में मौन साध लेते हैं।
भ्रष्टाचार पर जब हाय तौबा हदें लांघ जाती है तब मनमोहन सिंह देश के मीडिया घरानों के चुनिंदा संपादकों की टोली को बुलाकर उनके सामने खुद को बेबस और असहाय बताकर अपने कर्तव्यों की इती श्री कर लेते हैं। सवाल यह है कि अगर मनमोहन सिंह ईमानदार हैं उनमें नैतिकता है तो वे अपने आप को कमजोर बताने के बजाए प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र क्योें नही दे देते? आखिर क्या वजह है कि वे मजबूर होते हुए दूसरों की लानत मलानत झेलकर अपनी ईमानदार छवि को खराब कर रहे हैं? जाहिर है सत्ता की मलाई उन्हें यह सब करने पर मजबूर कर रही है।
वहीं दूसरी ओर राजनीति का ककहरा सीख रहे नेहरू गांधी परिवार (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नहीं) की पांचवीं पीढ़ी के प्रतिनिध कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी द्वारा भ्रष्टाचार के मामले को गठबंधन की मजबूरीबताई जाती है। राहुल गांधी शायद भूल जाते हैं कि किसी भी कीमत पर किन्हीं भी हालातों में गठबंधन धर्मकभी भी राष्ट्र धर्मसे बड़ा कतई नहीं हो सकता है। सरकार के सामने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की होली खेली जाती है और सरकार खामोश है। देश लुटता रहा, मंत्री सरकारी खजाने का धन लुटाते रहे। लेकिन वजीरे आजम, कांग्रेस की राजमाता और युवराज के अंदर इतना माद्दा नहीं था कि वे किसी से प्रश्न कर सकें, इन परिस्थितियों में कैसे कह दिया जाए कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ईमानदार हैं। (साई फीचर्स)
(क्रमशः जारी)

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

अर्थव्यवस्था को चाट चुकी है दीमक!


फेरबदल से क्या अलीबाबा . . . . 4

अर्थव्यवस्था को चाट चुकी है दीमक!

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य के इतिहास में इक्कीसवीं सदी का पहला दशक सदा याद रखा जाएगा। इस दशक के आरंभ के साथ ही भारत देश को जनसेवकों द्वारा लूटने का अनवरत सिलसिला आरंभ किया है। 2004 में भाजपानीत राजग सरकार की बिदाई के उपरांत जब कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने देश की सत्ता को अपने हाथों में लिया तो उन्हीं हाथों से देश को लूटना आरंभ हो गया। हालात देखकर लगने लगा कि अब जनसेवक नहीं उद्योगपति, पूंजीपति, मुनाफाखोर ही सरकार के संवाहक बन बैठे हैं।
2004 के उपरांत आज तक एक के बाद एक घपले घोटालों और भ्रष्टाचार के जितने भी महाकांड सामने आए हैं उनके बाद तो कांग्रेस और भाजपा को जनता से आंखें मिलाने का साहस ही नहीं करना था। वस्तुतः इस सबसे उलट इन नेताओं ने रटा रटाया जबाव -‘‘यह विपक्ष की साजिश है।‘‘ देकर अपने आपको बरी करना आरंभ कर दिया। लुटी पिटी जनता बेचारी जाए तो जाए कहां, गुहार लगाए तो किससे? सत्ता पक्ष लूट में लगा है तो विपक्ष में बैठे नेता उनकी लूट के माल में सहभागी बन रहे हैं।
मंहगाई का दानव जिस तरह लोगों को अपनी जद में ले रहा है उसे देखकर लगने लगा है कि जल्द ही देश में अराजकता का शासन सर चढ़कर बोलेगा। लोगों के पास मोबाईल रिचार्ज करने और सुरापान के पैसे आखिर आ कहां से रहे हैं। देश के हर छोटे जिले में अमूमन पांच करोड़ रूपए प्रतिमाह के मोबाईल रिचार्ज बाउचर बिक रहे हैं। कोई दस रूपए तो कोई पांच सौ रूपए के रिचार्ज डलवा रहा है।
चारों ओर लूट मची है। नेता देश लूट रहे हैं, व्यापारी आम आदमी को लूट रहे हैं। कंपनियां अपने उत्पादों पर नीचे एक छोटा सा स्टार लगाकर शर्तें लागूकर अपना हित साध रही हैं। जगह जगह लूटपाट, राहजनी, नकबजनी, चोरी डकैती हो रही है। बंग्लादेश से आए घुसपैठिए छुरे चाकू की नोक पर लोगों का जीना मुहाल किए हैं। मां बेटियों की अस्मत सरे राह लूटी जा रही है। अब तो आलम यह हो गया है कि धार्मिक आयोजनों की समाप्ति पर आयोजन के प्रांगड की सफाई में वहां कंडोम बहुतायत में मिल रहे हैं।
इस तरह की अराजकता को देखकर कोई भी कह देगा कि देश में सिस्टम ही नहीं बचा है। कांग्रेस की नजरों में युवराज राहुल गांधी (वस्तुतः वे सांसद के योग्य भी नहीं हैं, क्योंकि कांग्रेस और सहयोगियों द्वारा किए गए प्रमाणित भ्रष्टाचार और लूट पर भी उन्होंने अपना मुंह बंद कर रखा है) भी इस लूट में बराबरी के सहभागी माने जा सकते हैं। वे बिना ब्याज का लोन देते हैं, उनके बहनोई राबर्ट वढेरा बिना ब्याज का लोन लेते हैं, पर राहुल अपना मुंह सिले रहते हैं। इसे क्या समझा जाए? लूट में राहुल गांधी की मौन सहमति?
देश में सारी व्यवस्था सड़ गलकर सडांध मारने लगी है। फिर भी वजीरे आजम डॉ।मनमोहन सिंह और कांग्रेस का झंडा डंडा उठाने वाले इस गंदी बदबूदार व्यवथा के बारे में यह टिप्पणी कर सकते हैं कि देश के आधारभूत क्षेत्र की व्यवस्थाएं चाहे वह रेल्वे हो, नेशनल हाइवे और राजमार्ग, जहाजरानी, टेलीकाम, मानव संसाधन विकास या फिर उर्जा का क्षेत्र हो या कोई ओर क्षेत्र, का प्रबंधन कुशल, बुद्धिमान और सुघड हाथों में पूरी तरह सुरक्षित है।
जमीनी हकीकत यह है कि देश की अर्थव्यव्था स्वयंभू तथाकथित महान अर्थशास्त्री वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम भी यह जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की दीमक पूरी तरह चाट चुकी है। यही कारण है कि मंहगाई के आसमान छूते ग्राफ को कम करने के बजाए जनता को महज दिलासा ही देते हुए तारीख पर तारीख देते आए हैं। जब ईमानदार मीडिया (सरकार के हाथों बिके लालची और घराना पत्रकारिता वाले मीडिया को छोडकर) अपनी धार पजाता है तब पीएम कह उठते हैं कि मेरे हाथ में जादुई छडी नहीं है, पैसा पेड़ पर नही उगता है।
मृत्यु शैया पर पड़ी भारत की अर्थव्यवस्था को जिलाने (जिंदा करने) के लिए भगवान को अवतार लेना ही होगा। कहते हैं बुराई के प्रतीक रावण के वध के भगवान को राम का, हिरणकश्यम के नाश के लिए भगवान को प्रहलाद का तो कंस रूपी बुराई को समाप्त करने भगवान को कृष्ण का रूप लेकर प्रकट होना पड़ा। भारत गणराज्य की जनता भगवान के चौथे रूप का इंतजार बड़ी ही बेसब्री से कर रही है।
यह सच है कि मानव की याददाश्त बेहद कम होती है। लोग जल्दी ही पुरानी बात भूलकर नई चर्चा में लग जाते हैं। देश के राजनेता इस बात को बेहतर तरीके से जानते हैं। यही कारण है कि जब भी कोई घपला या घोटाला सामने आता है उसके चंद दिनों बाद किसी ना किसी चीज की कीमत मेें इजाफा कर दिया जाता है ताकि लोगों का ध्यान उस घोटाले से हट जाए। लाखों करोड रूपयों के कामन वेल्थ घोटाले की चर्चा आज ना मीडिया करता है और ना ही आम आदमी जबकि सारा का सारा धन आम आदमी की जेब से ही निकाला गया था।
प्रधानमंत्री ने अपनी और सरकार की छवि को बचाए रखने के लिए परंपरा को बदला है। अब तक सूचना और प्रसारण मंत्रालय के भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी ही पीएमओ में पीएम के मीडिया के प्रभारी या एडवाईजर हुआ करते थे। मनमोहन सिंह ने इस परंपरा को बदलकर निजी तौर पर इसे कथित रूप से ठेके पर दिया है। पीएम के मीडिया एडवाईजर का काम हरीश खरे के उपरांत अब पंकज पचौरी निभा रहे हैं।
हम यह बात दावे के साथ कह सकते हैं कि पंकज पचौरी भले ही एक लाख रूपए प्रतिमाह की पगार लेकर मनमोहन सिंह सरकार के लिए मीडिया को साध रहे हों, पर इस बात का जवाब वे भी नहीं दे सकते हैं कि देश के अधोसंरचना विकास, सड़क, बिजली, रेल, बंदरगाह, पानी, बांध, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि के लिए रकम कहां से जुटाई जाएगी? रीते पड़े खजाने से तो यह संभव नहीं है। इस सच्चाई से मनमोहन सिंह और उनके दमाद (केंद्रीय मंत्री और सांसद) एवं पंकज पचौरी भी वाकिफ होंगे कि सरकार ने ही देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खोखला कर दिया है।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि देश में गैरजरूरी खैराती योजनाओं में पैसा पानी की तरह बह रहा है। सांसद विधायकों और अन्य जनसेवकों और नौकरशाहों की विलासिता में जनता का पैसा बहाया जा रहा है। यक्ष प्रश्न आज भी यही खड़ा है कि जब सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाती है कि विकलांग और निशक्तजनों के लिए दी गई इमदाद को एक केंद्रीय मंत्री बिना डकार के पचा जाता है और सरकार उसको हटाने के बजाए पदोन्नति दे देती है तब अन्य योजनाओं में दिए गए धन की पहरेदारी कैसे संभव है? (साई फीचर्स)
(क्रमशः जारी)

बुधवार, 7 नवंबर 2012

अंग्रेजी मीडिया के भरोसे छवि निर्माण की कोशिश का मन!


फेरबदल से क्या अलीबाबा . . . . 3

अंग्रेजी मीडिया के भरोसे छवि निर्माण की कोशिश का मन!

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के मनमोहनी कार्यकाल में देश की जनता को भ्रम में रखकर जिस कदर लूटा और भ्रमित किया गया है उतना इसके पहले कभी नहीं किया गया था। यह सच है कि देश की राजनीति की दशा और दिशा दिल्ली से ही निर्धारित होती है। दिल्ली में माहौल बनाने का काम मूलतः अंग्रेजी मीडिया ही किया करता है। इसका सबसे अहम कारण यह है कि देश के नीति निर्धारकों को देश की मातृ भाषा हिन्दी के बजाए ब्रितानी हुकूमत की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी से ज्यादा मोह है।
एक आंकलन के अनुसार देश के शीर्ष राजनेता (कुछ खालिस देशी नेताओं को छोड़कर) अंग्रेजी में ही सारी बातें समझा करते हैं। देश को हांकने वाली कांग्रेस की राजमाता (बकौल एमपीसीसी चीफ कांति लाल भूरिया - राष्ट्रमाता) सोनिया गांधी को भी हिन्दी नहीं आती। वे इतालवी या अंग्रेजी में लिखा लिखाया भाषण पढती हैं उदहारण के लिए काम के उच्चारण के लिए के ए एम लिखा होता है।
इसी तरह देश के अन्य शीर्ष नेताओं को हिन्दी बोलना तो आसान है पर हिन्दी पढ़ना या लिखने में उनकी नानी याद आ जाती है। यही कारण है कि दिल्ली में अंग्रेजी मीडिया का बोलबाला है। कंप्यूटर भी हिन्दी नहीं समझता। कंप्यूटर के सारे कमांड आज भी अंग्रेजी में ही देने होते हैं। ब्लाग के इंटरनेट पर आ जाने और यूनीकोड फान्ट ने हिन्दी को इंटरनेट पर काफी हद तक समृद्ध कर दिया है, वरना हिन्दी का तो नामलेवा ही नहीं था इंटरनेट पर।
भारत गणराज्य के वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम भले ही अपने आप को महान अर्थशास्त्री प्रचारित करवाते रहे हों पर सच्चाई इससे एकदम उलट ही है। अंग्रेजी मीडिया के कुछ तबकों में अपनी मजबूत पकड़ का उपयोग कर दोनों ही महानुभाव अपने आपको कार्यकुशल और महान अर्थशास्त्री के बतौर महिमा मण्डित करवाने से नहीं चूकते हैं।
जहां तक रहा मंहगाई का सवाल तो रूपहले पर्दे की दामनीचलचित्र की तरह तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख से ही देश की जनता का मन बहलाते आए हैं मनमोहन सिंह। कभी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए थर्ड ग्रेड हिन्दी फिल्म के डायलाग की तरह बोल देते हैं -‘‘पैसा पेड़ों पर नहीं उगता।‘‘ तो कभी -‘‘मेरे हाथ में जादू की छड़ी नहीं है।‘‘
दरअसल मनमोहन सिंह खुद को ईमानदार बताने के चक्कर में बेईमानों की फौज के सेनापति बन बैठे हैं। वे अब भ्रष्टाचार के ईमानदार संरक्षक बनकर रह गए हैं। रीढ़ विहीन व्यक्तित्व आखिर कर भी क्या सकता है। आज तक मनमोहन सिंह ने एक भी चुनाव नहीं जीता है और कांग्रेस की राष्ट्रमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हाथ के चलते वे प्रधानमंत्री बने बैठे हैं। इन परिस्थितियों में उनका सोनिया का रबर स्टेंप बनना स्वाभाविक ही है।
रही बात सोनिया गांधी की तो सोनिया गांधी को देश की जनता से कोई लेना देना ही प्रतीत नहीं होता है। कांग्रेस का काम भी देश की सेवा के बजाए अब बस सोनिया राहुल की सेवा तक ही सीमित बचा है। कांग्रेस की आधिकारिक वेब साईट पर भी सिर्फ सोनिया और राहुल के गुणगान हो रहे हैं। पंडित नेहरू से लेकर नरसिंहराव तक इस वेब साईट से नदारत हैं।
एक प्रश्न आम भारतीय के दिमाग में घूमना स्वाभाविक ही है कि आखिर कौन है राहुल? क्यों किया जा रहा है इन्हें महिमा मण्डित? कांग्रेस के महासचिव और सांसद बस यही योग्यता है राहुल की। रही बात चमत्कारिक व्यक्तित्व की तो राहुल और सोनिया अपना घर उत्तर प्रदेश और अपने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली और अमेठी ही नहीं बचा पा रहे विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों तो इस देश को क्या खाक बचाएंगे।
बहरहाल, इस सत्र में गेंहू के समर्थन मूल्य को ना बढ़ाकर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने बहुत ही बड़ा आत्मघाती कदम उठाया है। सरकार ने रसूख वाली किसान लाबी को सिरे से नाराज कर दिया है। किसान लाबी के बीच असंतोष पनप रहा है। किसान लाबी का रोष और असंतोष इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि जब पिछले एक दशक से गेंहू का समर्थन मूल्य बढ़ता रहा हो और चुनाव के 14 माह पहले ही इसे ना बढ़ाया जाए तो इसे क्या कहा जाएगा?
अदूरदर्शी सरकार और इन कथित अर्थशास्त्रियों के नए नए प्रयोगों के चलते इस तरह के हालात निर्मित हुए हैं। सरकार ने भले ही खुदरा स्तर पर गेंहू और रोटी के आटे के दामों को ना बढ़ने देने के लिए गेंहूं का समर्थन मूल्य ना बढ़ाया हो पर जिस तरह से मंहगाई अपने पैर पसार रही है उसे देखकर लगता नहीं कि घरों में पहुंचने वाला आटा मंहगाई के इस कैंसर से अछूता रह पाएगा। सरकार की सोच इस मसले पर भले ही आम उपभोक्ताओं को राहत देने की रही हो पर सरकार के इस कदम से ना तो किसानों का ही हित सधेगा और ना ही आम आदमी की रोटी सस्ती हो सकेगी।
दरअसल, सरकार को कार्यकाल आरंभ करते ही अर्थव्यवथा में ढांचागत सुधार की कवायद करनी चाहिए थे, वस्तुतः उस समय सरकार में बैठी कांग्रेस सत्ता के मद में चूर थी। अब जबकि देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा हो तब इस तरह की सोच या कवायद आत्मघाती ही साबित हो सकती है। जिस किसी ने भी कांग्रेस को इस तरह की सोच पर काम करने का मशविरा दिया है वह निश्चित तौर पर यह चाह रहा होगा कि आने वाले समय में देश से कांग्रेस का नामोनिशान उसी तरह मिट जाए जिस तरह उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश से मिट चुका है। (साई फीचर्स)
(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

घर के लड़का गोंही चूसें मामा खाएं अमावट!


फेरबदल से क्या अलीबाबा .... 2

घर के लड़का गोंही चूसें मामा खाएं अमावट!

(लिमटी खरे)

आजादी के उपरांत गठित भारत गणराज्य में कांग्रेस के राज में नेहरू गांधी परिवार से इतर कम ही वजीरे आजम हुए हैं। इनमें से सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने का गौरव पंडित जवाहर लाल नेहरू तो गैर नेहरू गांधी परिवार में इसका गौरव वर्तमान वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह को जाता है। मनमोहन सिंह को वैसे तो ईमानदार कहा जाता रहा है किन्तु अब तो उन्हें मौन मोहन सिंह के साथ ही साथ भ्रष्टाचार का ईमानदार संरक्षक भी कहा जाने लगा है।
पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत गणराज्य के वजीरे आजम आजादी के दिन यानी 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के उपरांत गुलजारी लाल नंदा को इस पद पर बिठाया गया जो महज नौ दिन के प्रधानमंत्री रहे और वे 9 जून को हट गए। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के असमय निधन के उपरांत एक बार फिर गुलजारी लाल नंदा को 11 जनवरी से 13 दिन के लिए 24 जनवरी तक प्रधानमंत्री बनाया गया।
देश के प्रधानमंत्रियों में सबसे युवा प्रधानमंत्री देने का श्रेय कांग्रेस को तो सबसे बुजुर्ग वजीरे आजम देने का श्रेय जनता पार्टी को जाता है। जब आपातकाल की आग में देश जूझ रहा था, उस वक्त 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। इस समय मोरारजी की आयु 81 साल थी। वहीं 31 अक्टूबर 1984 को प्रियदर्शनी श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत जब राजीव गांधी को इस पद पर बिठाया गया तब उनकी आयु महज 40 साल थी।
भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत नेहरू गांधी परिवार के पंडित जवाहर लाल नेहरू, के उपरांत इनकी बेटी इंदिरा गांधी और इंदिरा गांधी के निधन के उपरांत इनके पुत्र राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। गैर नेहरू गांधी परिवार के सदस्यों में गुलजारी लाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, पी.व्ही.नरसिंहराव, अटल बिहारी बाजपेयी, एच.डी.देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल एवं मन मोहन सिंह का शुमार है।
आजादी के उपरांत भारत गणराज्य के विकास के लिए आवश्यक संसाधनों को जुटाने के लिए धन की महती आवश्यक्ता थी। इसे जनता पर कर लादकर ही जुटाया गया। मंहगाई का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता गया। इक्कीसवीं सदी के आरंभ तक मंहगाई का मंुह इतना नहीं खुला था। संप्रग की दूसरी सरकार के बनते ही मंहगाई मानों सुरसा का मुंह बनकर रह गई। अब तो मंहगाई पर लगाम लगाना केंद्र सरकार के बलबूते का काम प्रतीत नहीं हो रहा है।
मंहगाई पर नकेल डालना सरकार के लिए बहुत ही दुष्कर काम साबित होने वाला है। मंहगाई का मुद्दा सीधे जनता से जुड़ा हुआ है इसलिए जनता की नाराजगी के चलते दुबारा सरकार बनाने की बात सोचना दिन में सपने देखने जैसा ही है। इन परिस्थितियों में वित्त मंत्री पलिअप्पम चिदम्बरम को दूसरे रास्तों से पैसों की व्यवस्था करना अवश्यंभावी हो गया है। चिदम्बरम को राजस्व जुटाने की हर संभव पहल करनी होगी ताकि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मार्ग प्रशस्त करने और सोनिया गांधी के वोट जुटाने के फार्मूले वाली योजनाओं को अधिक से अधिक आवंटन दिया जा सके। इसके अलावा अतिरिक्त घाटे पर भी लगाम लगाना जरूरी है ताकि बैंक मुख्य नीतिगत दरों को कम करने का प्रयास कर सकें।
महान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह एवं अर्थ जगत की जाने मानी शख्सियत पलनिअप्पम चिदंबरम (संभवतः कागजों पर) के रहते भारत में मंहगाई का ग्राफ आसमान को छू गया है। अब इन परिस्थितियों में यक्ष प्रश्न यही है कि आखिर मंहगाई को कम करके राजस्व जुटाकर राजकोष को कैसे भरा जाए? इसका सबसे सरल रास्ता सरकार को यही समझ में आया है कि ईंधन और उर्वरक में दी जाने वाली सब्सीडी को कम किया जाए।
अब जबकि आम चुनावों से कांग्रेस महज 14 माह दूर है, तब क्या कांग्रेस अथवा केंद्र सरकार की इतनी ताकत है कि वह आम उपभोक्ताओं (विशेषकर वोटर्स का बड़ा वर्ग) को कीमतें बढ़ाकर या सब्सीडी कम कर नाराज करने का जोखिम उठाएगी? देखा जाए तो सरकार को इस तरह के कड़े फैसले लेने के पहले सौ मर्तबा सोचना ही होगा। वैसे सब्सीडी वाले सिलेन्डर्स की तादाद कम करके साल में महज छः करने का प्रयोग सफल होता नहीं दिख रहा है जिससे अब इनकी संख्या छः से बढ़ाकर नौ करने विचार चल रहा है। देखा जाए तो हर घर में कम से कम एक सिलेन्डर प्रतिमाह लगता ही है।
कांग्रेस के सामने बहुत सारे संकट एक साथ खड़े हुए हैं। राजकोष पूरी तरह खाली है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और उनके सारे सहयोगी मंत्री तथा सांसदों और अन्य जनसेवकों की विलासिता की आदत अभी भी जैसी की तैसी ही बनी हुई है। अली बाबा और उसके चालीस चोरों ने घपले घोटाले और भ्रष्टाचार कर देश को गिरवी रखने की तैयारी कर ली है। भारत की न्यायप्रीय सरकार का चेहरा तो देखिए तीस रूपए से कम रोजना कमाने वाले को सरकार गरीब नहीं मान रही है।
वहीं दूसरी ओर वर्ष 2010 में सांसदों को आठ लाख रूपए प्रतिवर्ष का बेसिक वेतन, चार लाख अस्सी हजार रूपए का संसदीय क्षेत्र भत्ता, चार लाख अस्सी हजार रूपए का कार्यालय और स्टेशनरी भत्ता, दैनिक भत्ते के रूप में तीन लाख साठ हजार रूपए साल, तेरह लाख निन्यानवे हजार रूपए का हवाई टिकिट, वातानुकूलित श्रेणी में असीमित रेल यात्राएं, दो लाख रूपए प्रतिवर्ष का दूरभाष व्यय, दिल्ली के पॉश इलाके में निशुल्क आवास और बिजली इस तरह कुल इकसठ लाख रूपए एक सांसद पर खर्च किया जा रहा है हर साल केंद्र सरकार द्वारा।
इस हिसाब से लोकसभा के 543 एवं राज्य सभा के सासंदों को मिला लिया जाए तो करीब 900 सांसदों पर केंद्र सरकार हर साल 54 हजार 900 करोड़ रूपए एवं पांच सालों में दो लाख 74 हजार पांच सौ करोड़ रूपए खर्च करती है। अब इन परिस्थितियों में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत गणराज्य में जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए स्थापित लोकतंत्र किस मुहाने पर पहुंच चुका है। निश्चित तौर पर अपना, अपने द्वारा और अपने लिए हो गई है लोकतंत्र की परिभाषा।
एक तरफ तीस रूपए प्रतिदिन अर्थात 900 रूपए माह यानी 10 हजार 800 रूपए सालाना कमाने वाला गरीब नहीं वहीं इन गरीबों को गरीब की संज्ञा देने वाला देश की सबसे बड़ी पंचायत का पंच हर साल 61 लाख रूपए कमा रहा है। इन परिस्थितियों में तो यही कहा जा सकता है कि -‘‘घर के लड़का गोहीं (आम की चुसी हुई गुठली) चूसें! मामा खाएं अमावट (आम के गूदे से बना एक स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ)!! (साई फीचर्स)

(क्रमशः जारी)

घर के लड़का गोंही चूसें मामा खाएं अमावट!


फेरबदल से क्या अलीबाबा .... 2

घर के लड़का गोंही चूसें मामा खाएं अमावट!

(लिमटी खरे)

आजादी के उपरांत गठित भारत गणराज्य में कांग्रेस के राज में नेहरू गांधी परिवार से इतर कम ही वजीरे आजम हुए हैं। इनमें से सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने का गौरव पंडित जवाहर लाल नेहरू तो गैर नेहरू गांधी परिवार में इसका गौरव वर्तमान वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह को जाता है। मनमोहन सिंह को वैसे तो ईमानदार कहा जाता रहा है किन्तु अब तो उन्हें मौन मोहन सिंह के साथ ही साथ भ्रष्टाचार का ईमानदार संरक्षक भी कहा जाने लगा है।
पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत गणराज्य के वजीरे आजम आजादी के दिन यानी 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के उपरांत गुलजारी लाल नंदा को इस पद पर बिठाया गया जो महज नौ दिन के प्रधानमंत्री रहे और वे 9 जून को हट गए। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के असमय निधन के उपरांत एक बार फिर गुलजारी लाल नंदा को 11 जनवरी से 13 दिन के लिए 24 जनवरी तक प्रधानमंत्री बनाया गया।
देश के प्रधानमंत्रियों में सबसे युवा प्रधानमंत्री देने का श्रेय कांग्रेस को तो सबसे बुजुर्ग वजीरे आजम देने का श्रेय जनता पार्टी को जाता है। जब आपातकाल की आग में देश जूझ रहा था, उस वक्त 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। इस समय मोरारजी की आयु 81 साल थी। वहीं 31 अक्टूबर 1984 को प्रियदर्शनी श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत जब राजीव गांधी को इस पद पर बिठाया गया तब उनकी आयु महज 40 साल थी।
भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत नेहरू गांधी परिवार के पंडित जवाहर लाल नेहरू, के उपरांत इनकी बेटी इंदिरा गांधी और इंदिरा गांधी के निधन के उपरांत इनके पुत्र राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। गैर नेहरू गांधी परिवार के सदस्यों में गुलजारी लाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, पी.व्ही.नरसिंहराव, अटल बिहारी बाजपेयी, एच.डी.देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल एवं मन मोहन सिंह का शुमार है।
आजादी के उपरांत भारत गणराज्य के विकास के लिए आवश्यक संसाधनों को जुटाने के लिए धन की महती आवश्यक्ता थी। इसे जनता पर कर लादकर ही जुटाया गया। मंहगाई का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता गया। इक्कीसवीं सदी के आरंभ तक मंहगाई का मंुह इतना नहीं खुला था। संप्रग की दूसरी सरकार के बनते ही मंहगाई मानों सुरसा का मुंह बनकर रह गई। अब तो मंहगाई पर लगाम लगाना केंद्र सरकार के बलबूते का काम प्रतीत नहीं हो रहा है।
मंहगाई पर नकेल डालना सरकार के लिए बहुत ही दुष्कर काम साबित होने वाला है। मंहगाई का मुद्दा सीधे जनता से जुड़ा हुआ है इसलिए जनता की नाराजगी के चलते दुबारा सरकार बनाने की बात सोचना दिन में सपने देखने जैसा ही है। इन परिस्थितियों में वित्त मंत्री पलिअप्पम चिदम्बरम को दूसरे रास्तों से पैसों की व्यवस्था करना अवश्यंभावी हो गया है। चिदम्बरम को राजस्व जुटाने की हर संभव पहल करनी होगी ताकि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मार्ग प्रशस्त करने और सोनिया गांधी के वोट जुटाने के फार्मूले वाली योजनाओं को अधिक से अधिक आवंटन दिया जा सके। इसके अलावा अतिरिक्त घाटे पर भी लगाम लगाना जरूरी है ताकि बैंक मुख्य नीतिगत दरों को कम करने का प्रयास कर सकें।
महान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह एवं अर्थ जगत की जाने मानी शख्सियत पलनिअप्पम चिदंबरम (संभवतः कागजों पर) के रहते भारत में मंहगाई का ग्राफ आसमान को छू गया है। अब इन परिस्थितियों में यक्ष प्रश्न यही है कि आखिर मंहगाई को कम करके राजस्व जुटाकर राजकोष को कैसे भरा जाए? इसका सबसे सरल रास्ता सरकार को यही समझ में आया है कि ईंधन और उर्वरक में दी जाने वाली सब्सीडी को कम किया जाए।
अब जबकि आम चुनावों से कांग्रेस महज 14 माह दूर है, तब क्या कांग्रेस अथवा केंद्र सरकार की इतनी ताकत है कि वह आम उपभोक्ताओं (विशेषकर वोटर्स का बड़ा वर्ग) को कीमतें बढ़ाकर या सब्सीडी कम कर नाराज करने का जोखिम उठाएगी? देखा जाए तो सरकार को इस तरह के कड़े फैसले लेने के पहले सौ मर्तबा सोचना ही होगा। वैसे सब्सीडी वाले सिलेन्डर्स की तादाद कम करके साल में महज छः करने का प्रयोग सफल होता नहीं दिख रहा है जिससे अब इनकी संख्या छः से बढ़ाकर नौ करने विचार चल रहा है। देखा जाए तो हर घर में कम से कम एक सिलेन्डर प्रतिमाह लगता ही है।
कांग्रेस के सामने बहुत सारे संकट एक साथ खड़े हुए हैं। राजकोष पूरी तरह खाली है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और उनके सारे सहयोगी मंत्री तथा सांसदों और अन्य जनसेवकों की विलासिता की आदत अभी भी जैसी की तैसी ही बनी हुई है। अली बाबा और उसके चालीस चोरों ने घपले घोटाले और भ्रष्टाचार कर देश को गिरवी रखने की तैयारी कर ली है। भारत की न्यायप्रीय सरकार का चेहरा तो देखिए तीस रूपए से कम रोजना कमाने वाले को सरकार गरीब नहीं मान रही है।
वहीं दूसरी ओर वर्ष 2010 में सांसदों को आठ लाख रूपए प्रतिवर्ष का बेसिक वेतन, चार लाख अस्सी हजार रूपए का संसदीय क्षेत्र भत्ता, चार लाख अस्सी हजार रूपए का कार्यालय और स्टेशनरी भत्ता, दैनिक भत्ते के रूप में तीन लाख साठ हजार रूपए साल, तेरह लाख निन्यानवे हजार रूपए का हवाई टिकिट, वातानुकूलित श्रेणी में असीमित रेल यात्राएं, दो लाख रूपए प्रतिवर्ष का दूरभाष व्यय, दिल्ली के पॉश इलाके में निशुल्क आवास और बिजली इस तरह कुल इकसठ लाख रूपए एक सांसद पर खर्च किया जा रहा है हर साल केंद्र सरकार द्वारा।
इस हिसाब से लोकसभा के 543 एवं राज्य सभा के सासंदों को मिला लिया जाए तो करीब 900 सांसदों पर केंद्र सरकार हर साल 54 हजार 900 करोड़ रूपए एवं पांच सालों में दो लाख 74 हजार पांच सौ करोड़ रूपए खर्च करती है। अब इन परिस्थितियों में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत गणराज्य में जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए स्थापित लोकतंत्र किस मुहाने पर पहुंच चुका है। निश्चित तौर पर अपना, अपने द्वारा और अपने लिए हो गई है लोकतंत्र की परिभाषा।
एक तरफ तीस रूपए प्रतिदिन अर्थात 900 रूपए माह यानी 10 हजार 800 रूपए सालाना कमाने वाला गरीब नहीं वहीं इन गरीबों को गरीब की संज्ञा देने वाला देश की सबसे बड़ी पंचायत का पंच हर साल 61 लाख रूपए कमा रहा है। इन परिस्थितियों में तो यही कहा जा सकता है कि -‘‘घर के लड़का गोहीं (आम की चुसी हुई गुठली) चूसें! मामा खाएं अमावट (आम के गूदे से बना एक स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ)!! (साई फीचर्स)

(क्रमशः जारी)