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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

सिवनी में खुलीं, ना जाने कितनी खबरों की दुकानें!

सिवनी में खुलीं, ना जाने कितनी खबरों की दुकानें!

(लिमटी खरे)

जो भी अधिकारी सिवनी में तैनात होता है एक माह बाद ही वह यहां के खबरों के दुकानदारोंसे बुरी तरह परेशान हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि औसतन सिवनी में देश के सबसे ज्यादा पत्रकार हैं। इनमें वास्तविक कितने हैं और फर्जी कितने हैं इस बारे में कहना मुश्किल ही है। मजाक में लोग कहने लगे हैं कि यार एक पत्थर उठाकर उछालो जिसे लगे उससे पूछना क्या करते हो, तपाक से वह बोले उठेगा -क्या बात करते हो पत्रकार हूं भई।सिवनी में पत्रकारिता को लोगों ने लाभ का धंधाबना लिया है।
ना जाने कितने पत्रकार संगठन सिवनी में अस्तित्व में हैं। आज ये संगठन पत्रकारों के हित संवंधर्न की दिशा में कितने सजग हैं यह बात वे स्वयं ही जानते होंगे। फरवरी में कर्फ्यू लगा, अखबार नहीं बटे, मीडिया घरों में कैद रहा, पर पत्रकार संगठन आश्चर्यजनक तौर पर मौन ही साधे रहे, क्या इस बात का जवाब है उनके पास कि प्रशासन की इस बेजा हरकत पर उन्होंने मुंह क्यों सिले रखा? चाय पान ठेले वाले, आरटीओ के दलाल, सब्जी विक्रेता, परचून की दुकान वाले, होटल किराना वाले, टेक्सी संचालक सभी आज इन संगठनों के सदस्य बताए जाते हैं। माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी स्थान से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार की पच्चीस कापी (औसतन पांच रूपए प्रति कापी) लाकर पत्रकार बनता है तो साल भर में उसे कम से कम साढ़े छः हजार रूपए खर्च करना होगा, पर इस तरह के संगठनों की सदस्यता महज सौ से पांच सौ रूपए प्रतिवर्ष में मिल जाती है। साथ ही साथ मिल जाता है प्रेस लिखा एक आईडी कार्ड, जिसे चमका कर वह गैर पत्रकारवास्तविक पत्रकारों की छवि पर बट्टा लगाता दिखता है। इतना ही नहीं, वाहनों में प्रेस लिखने का फैशन दिन ब दिन बढ़ गया है। आज जो अपना नाम भी ठीक से नहीं खिल सकते वे भी पत्रकार का तमगा लगाए घूम रहे हैं। देखा जाए तो यह पत्रकारिता धर्म के एकदम खिलाफ है।
बीते दिनों श्रमजीवी पत्रकार संघ की एक बैठक में हमने साफ तौर पर कहा था कि पत्रकारों के लिए पत्रकारिता मां के समान है और कोई भी पत्रकार अपनी मां को कोठे पर कतई नहीं बिठाएगा, अगर पत्रकारिता को बदनाम किया जा रहा है तो यह काम वे ही कर सकते हैं जो . . .। साथ ही साथ पीत पत्रकारिता या पत्रकारिता को धंध बनाने वालों को मशविरा दिया था कि बेहतर होगा कि वे लोग पत्रकारिता छोड़कर परचून की दुकान खोल लें, पर पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को बदनाम ना करें। एक पत्रकार मित्र ने हमसे कहा कि कहीं आपकी ईमानदारी के चक्कर में हमारा नुकसान ना हो जाए, कोई पत्रकार यह कहता पाया जा रहा है कि वे तो हमारे आदमियोंको चुन चुन कर नंगा कर रहे हैं। हमारा कहना महज इतना है कि कोई किसी का आदमी नहीं होता। क्या किसी ठेकेदार, नेता या व्यक्ति पर कोई पत्रकार सील लगा सकता है कि वह उसका आदमी है? जाहिर है नहीं। जब काले काम करने वाले सफेद पोशों को नंगा करने की जवाबदेही से बचकर उन्हें महिमा मण्डित करने का काम कथित मीडिया मुगल करने लगें तो ईमानदार पत्रकार क्या करें? आज आवश्यक्ता इस बात की है कि पत्रकारिता पेशे को लाभ का धंधा बनाने के बजाए अपनी मां का दर्जा दिया जाए, ताकि पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित किए जा सकें।
हमें क्या करना है?‘, ‘विज्ञापन पार्टी है बब्बा!‘, ‘अरे ऐसा मत लिखो, . . . नाराज हो जाएगा, दाल रोटी बंद हो जाएगी‘, ‘मकान बनाना है, मदद कौन करेगा‘, शादी करना है खर्चा बहुत है‘, ‘उपर से आदेश है, इनके खिलाफ नही छापना है‘, ‘झाबुआ पावर तो अपनी दुकान हैजिसको विज्ञापन चाहिए हमसे संपर्क करे, जैसे जुमलों से पत्रकारिता रूपी माता का आंचल छलनी ही होता है। गत दिवस मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के शीर्ष अधिकारी मेंहदीरत्ता ने कहा कि उन्होंने सिवनी के पत्रकारों के विज्ञापन के देयक आना पाई से बिचौलियों के हाथों भेज दिए हैं। अगर किसी को नहीं मिला हो तो प्रकाशन की तारीख, संस्थान का नाम और राशि लिखकर उन्हें 9977802499 पर एसएमएस किया जा सकता है, ताकि उन्हें यह पता लग सके कि पूरा भुगतान करने के बाद भी कितनी देनदारी अभी झाबुआ पावर की बाकी है।
लोग अक्सर कहा करते हैं कि सिवनी से प्रकाशित होने वाले अखबारों का कुछ करो भई। हमारा कहना है कि हम क्या कर सकते हैं, समाचार पत्र का शीर्षक लेने के लिए अनुविभागीय दण्डाधिकारी के माध्यम से भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक तक जाना होता है। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक द्वारा शीर्षक आवंटन कर जिला दण्डाधिकारी को सूचित किया जाता है। जिला दण्डाधिकारी के अधीन जनसंपर्क विभाग का एक कार्यालय कार्यरत होता है। जनसंपर्क विभाग का काम ही जिला प्रशासन और पत्रकारों के बीच समन्वय बनाने के साथ ही साथ शासन प्रशासन की जनकल्याणकारी नीतियों को जनता तक मीडिया के माध्यम से पहुंचाने का होता है।
इन परिस्थितियों में प्रश्न यही पैदा होता है कि आखिर वो कौन है जो सिवनी में मीडिया की हालत को सुधारेगा। जाहिर है जिला दण्डाधिकारी ही जनसंपर्क अधिकारी के माध्यम से मीडिया की स्थिति को सुधारने का काम करेंगे। वस्तुतः जनसंपर्क विभाग भी अपनी जवाबदेही से पीछे हटता आया है। अगर कोई समाचार पत्र का प्रकाशन नियमित ना होकर कभी कभार हो रहा है तो उस पर जिला जनसंपर्क अधिकारी को चाहिए कि इसकी जानकारी लिखित रूप से भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय को दें, और उस पर कार्यवाही सुनिश्चित करवाए।
समाचार पत्रों की आवधिकता दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, छःमाही या वार्षिक होती है। पर सिवनी में एक और आवधिकता दिखाई पड़ती है और वह है एक्छिकअर्थात जब मन चाहा कर दिया प्रकाशित। पंद्रह अगस्त, 26 जनवरी, होली, दीपावली तो मानो एक पर्व होता है अखबारों के लिए। सरकारी नुमाईंदो, विशेषकर वन विभाग के रेंजर्स, पीडब्लूडी, आरईएस, सिंचाई, पीएचई आदि विभागों के सब इंजीनियर या एसडीओ के कार्यालयों में सैकड़ों की तादाद में विज्ञापन के बिल पहुंच जाते हैं। अधिकारी हैरान परेशान हो उठते हैं, वे भी आखिर करें तो क्या?
आज सिवनी में आरएनआई में ‘‘डीब्लाक‘‘ (समाचार शीर्षक के अस्थाई सत्यापन के दो वर्ष के अंदर अगर स्थाई नहीं किया जाता है तो वह स्वतः ही निरस्त हो जाता है) हो चुके शीर्षकों के नाम पर समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं, जिनका अस्थाई पंजीयन समाप्त हो गया है वे भी सीना तानकर अखबार का प्रकाशन कर रहे हैं। नगर पालिका प्रशासन सहित सरकारी विभाग अखबारों को मनमर्नी के रेट पर बिलों का भुगतान कर रहे हैं।
जिन समाचार पत्रों का घोषणा पत्र सिवनी जिला दण्डाधिकारी के पास नहीं जमा है उन्हें भी लोकलकी श्रेणी में रखा जा रहा है। आयुक्त जनसंपर्क मध्य प्रदेश या डीएव्हीपी दिल्ली के द्वारा दिए गए रेट्स को दरकिनार कर उससे दस से पचास गुना ज्यादा दरों पर हो रहा है भुगतान, ना आडिट विभाग आपत्ति ले रहा है और ना ही कोई और। कुल मिलाकर सिवनी जिले में लूट मची हुई है। दुख और चिंता का विषय तो यह है कि इस लूट में अब नेता अधकारी और पत्रकारों का त्रिफलाबन चुका है।
इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी न जाने कितने समाचार चेनल्स की आईडी (माईक पर लगा चेनल का लोगो) दिखाई पड़ जाते हैं पत्रकार वार्ता में। एक बार सिवनी से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र (हिन्द गजट नहीं) ने लिखा था आखिर कहां दिखाई जाती हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा इतनी सारी ली गई बाईट्स)।
सूचना के अधिकार एक्टिविस्ट अधिवक्ता दादू निखलेंद्र नाथ सिंह ने नगर पालिका से विज्ञापन की सूची निकलवाई जिसमें पता नहीं किन किन अखबारों के नाम हैं जिनका नाम कभी सुना ही नहीं गया, कुछ तो समाचार पत्र वितरण एजेंसी को भी विज्ञापन जारी किया जाना दर्शाया गया है। अखबारों में सब प्रकाशित हुआ, विपक्ष में बैठी कांग्रेस और उसके उपाध्यक्ष राजिक अकील भी मुंह सिले हुए हैं, आखिर क्या कारण है? आखिर क्या वजह है कि शिवराज सिंह चौहान को पानी पी पी कर कोसने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता ओम प्रकाश तिवारी, जेपीएस तिवारी और रामदास ठाकुर सदा ही नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी, श्रीमति नीता पटेरिया, नरेश दिवाकर, डॉ.ढाल सिंह बिसेन, कमल मस्कोले, श्रीमति शशि ठाकुर की गलत नीतियों के खिलाफ अपनी कलम रेत में गड़ा देते हैं। जाहिर है ये कहीं ना कहीं भाजपा के इन नेताओं से उपकृत ही हैं, वरना और क्या वजह हो सकती है इनकी खामोशी की!
बहरहाल, किसके खिलाफ बोलना किसके खिलाफ नहीं, यह पार्टी की अंदरूनी नीति का मसला है, इससे हमें ज्यादा लेना देना नहंी है, पर जनता को भरमाईए तो मत। सिवनी में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। शिवराज सिंह चौहान को कोसने के लिए प्रदेश में मुकेश नायक हैं और भाजपा की ओर से देश में मनमोहन सिंह को कोसने के लिए प्रकाश जावड़ेकर हैं, उनकी रोजी रोटी मच छीनिए सिवनी के प्रवक्ता महोदयों। आपके कंधे पर सिवनी की जवाबदेही सौंपी गई है आप सिवनी की ही चिंता करें तो बेहतर होगा।
जिला कलेक्टर भरत यादव ने अप्रेल माह में जिला जनसंपर्क अधिकारी को ताकीद किया था कि वास्तविक पत्रकारों को चिन्हित किया जाए। उसके बाद उन्होंने दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्रों से आरएनआई पंजीयन और घोषणा पत्र की कापी चाही है। यह एक स्वागत योग्य कदम है, किन्तु इसमें पाक्षिक और मासिक समाचार पत्रों को क्यों छोड़ दिया गया है। साथ ही साथ सिवनी से बाहर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र और इलेक्ट्रानिक चेनल्स के संवदादाताओं से भी समय सीमा में उनके संपादकों से उनकी नियुक्ति का प्रमाणपत्र बुलवाया जाए। हो यह रहा है कि सालों पहले एक नियुक्ति पत्र जमा करवाने वाले व्यक्ति द्वारा सालों साल उसके ही दम पर अपनी धाक जमाई जाती है। चिंताजनक पहलू तो यह भी सामने आ रहा है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग अब मीडिया की आड़ लेने लगे हैं।
वस्तुतः यह जवाबदेही जिला प्रशासन और जिला जनसंपर्क अधिकारी की है कि वह मीडिया में बढ़ रहे फर्जीवाड़े को नियंत्रित करे। जिला जनसंपर्क अधिकारी को चाहिए कि अगर उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है (किसी भी आवधिकता वाले समाचार पत्र के नियमित प्रकाशन का प्रमाण पत्र आरएनआई किसे मानती है, या अखबार से संबंधित अन्य जानकारियां जिससे कि वह समाचार पत्र नियमित माना जाए) तो वे बाकायदा आरएनआई को पत्र लिखकर इसकी जानकारी मांग सकते हैं। डीएम और पीआरओ का एक सख्त कदम सिवनी में पत्रकारिता के क्षेत्र में बिखरी गंदगी को धोने में वाकई मील का पत्थर ही साबित होगा, आशा तो है कि संवेदनशील जिला कलेक्टर भरत यादव इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगे।

साथ ही साथ चुनाव के मौसम में कम से कम पेड न्यूज के बारे में सविस्तार उदहारणों के साथ अगर गाईड लाईन मीडिया तक लिखित रूप में पहुंचाई जाती तो यह मीडिया के लिए सुलभ हो जाता कि वह अपने आप को पेड न्यूज की लक्ष्मण रेखा से दूर ही रखती, वस्तुतः जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी गाईड लाईन में स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है।

बुधवार, 8 मई 2013

गौर क्या सिर्फ नागोर के लिए!


गौर क्या सिर्फ नागोर के लिए!

(संजीव प्रताप सिंह)

 उत्तर प्रदेश के नागौर गांव के हैं प्रदेश के स्थानीय शासन विकास मंत्री बाबू लाल गौर। उमा भारती सत्ता से बाहर हुंईं और जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें अपने गांव की याद आई और उत्तर प्रदेश के नागौर गांव जाकर उन्होंने वहां के विकास के लिए मध्य प्रदेश का खजाना लुटा दिया। उन्हें माटी का कर्ज याद आया। नब्बे के दशक के आरंभ में सुंदर लाल पटवा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में बाबू लाल गौर ने जो चमत्कार किया वह हर किसी के बस की बात नहीं थी। गौर ने प्रदेश के अनेक जिलों की संकरी गलियों को चौड़ा कर दिया। लोग संकरी गलियों से जब गुजरते थे तो नारकीय पीड़ा भोगा करते थे, पर 1992 के बाद इन सड़कों पर दुपहिया तो छोड़िए चौपहिया वाहन फर्राटे भरने लगे।
शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद बाबू लाल गौर की यह दूसरी सिवनी यात्रा थी। इसके पहले वे बरघाट आए थे। बाबू लाल गौर की सिवनी यात्रा से सिवनी को क्या फायदा हुआ यह बात कोई भी नहीं बता सकता है। उनकी सिवनी यात्रा से बस एक दिन के लिए सिवनी शहर साफ सुथरा दिखाई दिया है। इसके अलावा और कोई दूसरा लाभ प्रत्यक्षतः तो प्रतीत नहीं होता है। बाबूलाल गौर ने सिवनी के लोगों को सब्ज बाग दिखाए। उन्होंने ना जाने कितनी सौगातें देने की बात कही है। सवाल यह उठता है कि उनके द्वारा रेवड़ी की तरह बांटी गई सौगाते क्या वास्तव में अमली जामा पहन सकेंगी।
इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव हैं। सितम्बर या अक्टूबर में आचार संहिता लग जाएगी। मई का माह समाप्त होने को है। इन परिस्थितियों में तीन माह ही बचते हैं काम करने के लिए। इसमें से जून के दूसरे सप्ताह से मानसून की दस्तक सुनाई देने लगेगी। तब बाबू लाल गौर की घोषणाओं का क्या होगा यह कहना मुश्किल है। लगता है बाबू लाल गौर भाजपा के हिडन एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं। शहरी आबादी काफी हद तक बढ़ चुकी है और यह कम से कम एक विधानसभा के लिए निर्णायक की भूमिका अदा करती है।
बाबूलाल गौर जहां भी जा रहे हैं वहां अगर भाजपा का नगर पालिका या नगर निगम का अध्यक्ष है तो वे उसकी तारीफों में कसीदे पढ़ने से नहीं चूकते। मतलब साफ है कि नगर पालिका या नगर निगम की अर्कमण्यता का खामियाजा उस विधानसभा क्षेत्र की जनता भाजपा को ना भोगवाए। सिवनी में भी कमोबेश यही स्थिति है। सिवनी में भाजपा की नगर पालिका है। सिवनी का दुर्भाग्य है कि जिला मुख्यालय के निवासी साफ पानी पीने को तरस रहे हैं।
बाबूलाल गौर ने एक करोड़ तीन लाख रूपए की राशि एक सप्ताह यानी दस मई तक नगर पालिका सिवनी को उपलब्ध कराने की बात कही है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि जब पीने को ही पानी नहीं मिल पा रहा है तो आखिर स्वीमिंग पूल में पानी कहां से भरा जाएगा? बाबूलाल गौर सड़क मार्ग से हरवंश सिंह ठाकुर द्वारा आहूत रामकथा सुनकर लौटे, जाहिर है उन्हें उनकी गाड़ी में बैठे नेताओं ने बायीं ओर का भीमगढ़ तालाब तो दाईं ओर श्रीवनी फिल्टर प्लांट अवश्य दिखाया होगा। दोनों को देखने और फिर लंबा रास्ता तय कर सिवनी पहुंचने के बाद क्या बाबूलाल गौर के मन में यह प्रश्न नहीं कौंधा कि आखिर 22 किलोमीटर दूर तक फिल्टर्ड पानी कैसे पहुंच रहा होगा?
इसी अवसर पर सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया ने अवैध कालोनियों के विकास का मामला उठाया। शायद श्रीमति पटेरिया यह भूल गई होंगी कि वह मंच इस मामले को उठाने के लिए माकूल नहीं था। सिवनी की जनता ने एक बार उन्हें देश की सबसे बड़ी पंचायत में सांसद बनाकर भेजा और अब वे सिवनी की विधायक हैं, इस नाते इस तरह की बातें उठाने का सही मंच विधानसभा ही होता है क्योंकि वहां सब कुछ रिकार्डेड रहता है। जरूरी नहीं है कि जिस मंच से उन्होंने बात उठाई वहां से उनकी बात को बाबूलाल गौर भोपाल पहुंचने के बाद तवज्जो दें।
मौका सिवनी में आयोजित प्रोग्राम का और सिवनी तथा बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख बात करें बालाघाट की तो वाकई आश्चर्य ही होता है। क्या बाबूलाल गौर बालाघाट नहीं जाते? सांसद देशमुख की मांग पर बाबूलाल गौर ने बालाघाट जिले के कटंगी नगर परिषद के लिए 37 लाख रूपए मंजूर किए। वाकई आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि बाबूलाल गौर की इस घोषणा पर वहां उपस्थित सिवनी जिले के भाजपा के साथ ही साथ कांग्रेस के नेता भी तालियां पीटते रहे। कम से कम कांग्रेस के पार्षदों को तो उनसे यह प्रश्न करना था कि आखिर 2008 में विधानसभा चुनावों के बाद सिवनी नगर पालिका को शासन ने क्या दिया? कम से कम सिवनी नगर पालिका परिषद के पिछले और इस कार्यकाल के कारनामों की शिकायतों पर आखिर प्रदेश शासन मौन क्यों है इस बात को उठाना था। विडम्बना ही कही जाएगी कि कांग्रेस के पार्षद भी कठपुतली के मानिंद वहां सम्मोहित होकर तालियां ही बजाते रहे।
हालात देखकर लगता है कि बाबूलाल गौर जादूगर के मानिंद आए, अपना हिडन मूल एजेंडा निपटाया, नगर पालिका के कार्यक्रम में शामिल हुए, घोषणाएं की और चलते बने। सिवनी जिले में बाबूलाल गौर ने अपनी इस यात्रा में सड़क मार्ग से जो दूरी तय की है वह सिवनी से भोपाल की दूरी से ज्यादा है, इन परिस्थितियों में क्या उन्हें सरकारी उड़न खटोले की मंहगी सवारी गांठने की दरकार थी? निश्चित तौर पर नहीं, पर कोई कर भी क्या सकता है? पक्षाघात की शिकार विपक्ष में बैठी कांग्रेस को प्रदेश से जिला स्तर तक छद्म विरोध कर ही जनता को तमाशा जो दिखा रही है।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

एमपी महाराष्ट्र बार्डर खवासा पर लगता जाम!


एमपी महाराष्ट्र बार्डर खवासा पर लगता जाम!

 (लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है खवासा ग्राम, जहां मध्य प्रदेश सरकार के राजस्व और अफसरों के निजी खाते में जाने वाले राजस्व की प्राप्ति करोड़ों अरबों खरबों रूपयों में होती है। खवासा बार्डर सदा से ही चर्चा का केंद्र रही है। खवासा के इस बार्डर का सबसे दुखदाई पहलू यहां लगने वाला यातायात का जाम है। ट्रकों की लंबी कतारों को देखकर निजी वाहन वालों के पसीने आ जाते हैं। इस जाम के लगने के पीछे के कारणों पर अब तक ना तो किसी जिलाधिकारी ने ध्यान ही दिया है और ना ही ध्यान देने की जरूरत ही समझी है। वर्तमान जिला कलेक्टर भरत यादव ने एक साक्षात्कार में खवासा की सीमा चौकी पर छापे मारने की बात कही है जो प्रशंसनीय है।
देखा जाए तो खवासा में मुख्यतः परिवहन विभाग की जांच चौकी है जहां करोड़ों रूपयों के वारे न्यारे होते हैं। इस जांच चौकी के बारे में कहा जाता है कि यहां दक्षिण भारत सहित मध्य प्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों की कई ट्रांसपोर्ट कंपनियों द्वारा बाकायदा अपने माल वाहक वाहनों की सूची दी हुई है जिनसे निर्धारित से कम मात्रा में चौथ वसूली की जाती है। बाकी माल और यात्री वाहक वाहनों से हर माह चौथ वसूली के साथ ही साथ शासन द्वारा दिए गए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उनका चालान भी काटा जाता है।
इस जांच चौकी के बारे में बताया जाता है कि यह जांच चौकी रिमोट कंट्रोल से संचालित होती है। अर्थात यहां तैनात परिवहन विभाग और पुलिस विभाग के प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारियों के अलावा निजी गुंडा नुमा लोगों के द्वारा यहां सरकारी काम को अंजाम दिया जाता है। वैसे तो निजी गुर्गे जिला कलेक्टर की नाक के नीचे पंजीयक लेण्ड रिकार्ड अर्थात जहां जमीनों की खरीदी बिक्री होती है वहां भी काम करते दिख जाते हैं।
सूत्रों की बातों पर गर यकीन किया जाए तो इन निजी कर्मचारियों के हाथों में एक रिमोट घंटी का बटन होता है। सड़क पर लाल या पीली बत्ती देखते ही ये बटन दबा देते हैं और चौकी के अंदर सभी काम नियमानुसार संचालित होना आरंभ हो जाता है। बताते हैं यहां समिष और निरामिष भोजन बहत ही लजीज बनता है। यहां एक कैंटीन का संचालन भी होता है जहां शाकाहारी और मांसाहारी भोजन की माकूल व्यवस्था है। यहां यह सब कुछ निशुल्क ही है। कहा जाता है कि हर माह की चढ़ोत्री के हिसाब में इसे भी जोड़ दिया जाता है।
अगर, जिला कलेटर भरत यादव बिना सूचना के अचानक ही इस जांच चौकी में पहुंच जांए तो उन्हें सबसे पहले पिछले दरवाजे पर एक रजिस्टर रखा मिलेगा जिसमें नेताओं, पत्रकारों और प्रभावशाली लोगों के नाम और उन्हें दी जाने वाली मासिक चौथ की सूची मिल जाएगी। मेले ठेले, धरना प्रदर्शन आदि के लिए दी जाने वाली राशि का ब्योरा भी इसी पंजी में दर्ज होता है। निश्चित तौर पर यह राशि परिवहन विभाग या यहां पुलिस से प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारी अपनी जेब से तो देते नहीं होंगे। जो भी दिया जाता होगा वह वाहनों के स्वामी से ही वसूला जाता होगा।
इस तरह के भ्रष्टाचार के सागर में आकण्ठ डूबी है खवासा की जांच चौकी। खवासा में इसके अलावा मंडी, विक्रय कर आदि की जांच चौकियां भी हैं। यहां जाम क्यों लगता है इस बारे में कोई भी कुछ बताने को तैयार नहीं होता है। ज्यादा पूछताछ करने पर निजी गुण्डानुमा गुर्गों द्वारा हमला तक बोल दिया जाता है। मजे की बात तो यह है कि यहां पुलिस का एक सहायता केंद्र भी स्थापित है, पर सब कुछ हो रहा है ढके मुंदे नहीं उजागर तौर पर। यहां कभी भी पूरी तैनाती नहीं मिल पाती है। इस तरह की चौकियों में ईमानदारी पूरी पूरी बरती जाती है। एक एक सिपाही या हवलदार पखवाड़े तक घर पर आराम फरमाते हैं पर उनके हिस्से में कोई समझौता नहीं होता है। कहते हैं कि यहां से गुजरने वाले वाहनों से चौथ वसूली के उपरांत उन्हें गेट पास दिया जाता है, गेट पास के पहले उनकी डायरी में चिड़िया कौआ जैसी आकृति बना दी जाती है जो हर माह अलग शक्ल की होती है जिससे यह पता चल जाता है कि उस वाहन की एंट्री उस माह के लिए हो चुकी है।
असली मरण तो आम आदमी की होती है। सिवनी जिले के विधायक और सांसदों की कर्तव्यों के प्रति अनदेखी के चलते सिवनी की स्वास्थ्य सुविधाएं जो एक समय में महाकौशल संभाग में आर्युविज्ञान कालेज जबलपुर के बाद नंबर दो पर आती थी आज खुद आईसीसीयू में पड़ी कराह रही है, नतीजतन मरीजों को छोटी मोटी बीमारी होने पर भी सिवनी के प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय से नागपुर रिफर कर दिया जाता है। इसके पीछे चिकित्सकों को नागपुर के मंहगे अस्पतालों से मिलने वाला कमीशन ही बताया जा रहा है। जब मरीज नागपुर जाते हैं तो वे इस जाम में फंसकर नारकीय पीड़ा को भोगते हैं। स़क्षम लोग तो बरास्ता छिंदवाड़ा सौंसर होकर नागपुर पहुंच जाते हैं पर गरीब तो इसी रास्ते से जाने पर निर्भर हैं।
यहां यक्ष प्रश्न यह खड़ा हुआ है कि आखिर खवासा में एक साथ पचास से लेकर दो सौ ट्रकों की लाईन कैसे लग जाती है। अगर खवासा से महज दस किलोमीटर दूर महाराष्ट्र बार्डर की मानेगांव टेक चौकी से आप गुजरें तो वहां महज एकाध ट्रक ही खड़ा मिलता है। आखिर क्या वजह है कि महाराष्ट्र की जांच चौकी मिस्टर कलीन है और एमपी की जांच चौकी दागदार! मतलब साफ है कि दाल में कुछ काला है।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

शिव के राज में मानवता हुई तार तार


शिव के राज में मानवता हुई तार तार


(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ना जाने कितने नामों से जाना जाता है। शिवराज जब सांसद थे तब पांव पांव वाले भईया और जब देश के हृदय प्रदेश के निजाम बने तब वे बच्चों के मामा बन गए। मामा के राज में कानून और व्यवस्था की स्थिति इतनी गंभीर है कि उनकी भानजियां ही उनके राज में सुरक्षित नहीं हैं। शिव के राज में अबोध बालाओं के साथ दुराचार आम हो गया है। 17 अप्रेल को सिवनी जिले के आदिवासी विकासखण्ड घंसौर में जो कुछ हुआ वह देश का सर शर्म से झुकाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। एक पांच वर्षीय अबोध बच्ची के साथ बिहार के रहने वाले फिरोज नामक व्यक्ति ने कथित तौर पर घृषित काम किया। बच्ची जबलपुर में भर्ती है और उसकी हालत नाजुक बताई जा रही है।यह देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड का कर्मचारी बताया जा रहा है। मजे की बात तो यह है कि इस बाहरी व्यक्ति की मुसाफिरी भी घंसौर थाने में दर्ज नहीं बताई जा रही है।

सत्तर के दशक की समाप्ति पर दिल्ली में गीता चौपड़ा संजय चौपड़ा हत्याकांड ने देश को हिलाकर रख दिया था। उस समय रंगा और बिल्ला को इसके आरोप में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। कालांतर में बलात्कार के मामले सामने आए पर वहशियाना तरीके से हुए बलात्कार के मामले कम ही प्रकाश में आए।
इक्क्ीसवीं सदी के पहले दशक में दिल्ली से सटे निठारी में हुए निठारी कांड ने लोगों की रूह कंपा दी थी। जिस वहशीयाना तरीके से बच्चो के साथ अप्राकृतिक तरीके से योनाचार किया गया और उन्हेें मौत के घाट उतार दिया गया वह वाकई देश के हुक्मरानों के लिए शर्मनाक ही था।
पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में दामिनी के साथ चलती बस में हुए अमानवीय गेंग रेप ने देश को एक बार फिर दहला दिया। उस समय दिल्ली मानो ठहर गई थी। देश भर में दामिनी के लिए दुआएं हुईं पर दामिनी को काल ने हमसे छीन लिया। इस साल के आरंभ में देश भर में बलात्कार के जो मामले सामने आए।
हाल ही में दिल्ली में पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की बात सामने आई है। इसके कथित आरोपी मनोज को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। इस बच्ची के पेट में से मोमबत्ती और बोतल मिली है जो वाकई शोध का विषय है। यह वाकई दरिंदगी की हद है। पुलिस पर आरोप है कि उसने दो हजार में मामला सुलटाने का प्रयास किया था। एक एसीपी को तो न्यूज चेनल्स पर प्रोटेस्ट कर रही बाला पर थप्पड़ मारते तक दिखाया गया है।
इसी बीच खबर आई कि मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकासखण्ड में एक पांच साल की बच्ची के साथ फिरोज नामक युवक ने कथित तौर पर दुराचार किया है। बच्ची घर से गायब थी। बाद में वह स्थानीय मरघट में बेहोश पाई गई। घायल बच्ची आज भी जीवन और मृत्यु से संघर्ष कर रही है।
इस संबंध में पुलिस के सूत्रों का कहना है कि उक्त फिरोज बिहार का रहने वाला है और वह देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड में काम करता था। मजे की बात तो यह है कि बिहार से आकर सिवनी में जीवोकापर्जन करने वाले फिरोज की मुसाफिरी भी घंसौर थाने मेें दर्ज नहीं है, जबकि सिवनी जिला अतिसंवेदनशील जिलों की फेहरिस्त में ना केवल शामिल है वरन् पिछले माह यहां कर्फ्यू लगा था और इसके उपरांत यहां बम और असलाह बरामद हुआ था।
मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड का पावर प्लांट जबसे निर्मित होना आरंभ हुआ है तबसे यह विवादो में है। इसकी लोकसुनवाई गुपचुप तरीके से संपन्न हो जाती है और आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात के आरोप लगते हैं। यह पावर प्लांट रक्षित वन में निर्मित हो रहा है। इस पावर प्लांट की चारदीवारी के अंदर एक हिरण मरा पाया जाता है। दो दर्जन के लगभग मजदूरोें की मौत हो जाती है। पर किसी को इसकी सुध लेने की फुर्सत नहीं है।
वहीं दूसरी ओर मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के एडमिन विभाग में पदस्थ रविंद्र सिंह का कहना है कि उक्त आरोपी फिरोज मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड का कर्मचारी नहीं है। प्लांट निर्माणाधीन अवस्था में है अतः यहां दो दर्जन से ज्यादा ठेकेदार काम कर रहे हैं, हो सकता है उनमें से किसी ठेकेदार के पास वह काम करता हो।
बहरहाल, एमपी गर्वमेंट के मुलाजिम जिला जनसंपर्क अधिकारी घनश्याम सिरसाम द्वारा मीडिया पर्सन्स को एक एसएमएस भेजा जाता है जिसकी इबारत कुछ इस प्रकार है - माय डियर फ्रेंड, घंसौर में हुई दुराचार की घटना में पीडित बच्ची के इलाज का सारा खर्च झाबुआ पावर प्लांट वाले वहन कर रहे हैं। यदि इलाज के लिए बच्ची को किसी बड़े हास्पिटल ले जाने की जरूरत हुई तो उसका खर्च भी प्लांट का मैनेजमेंट ही उठाएगा। इसके अलावा झाबुआ पावर प्लांट मैनेजमेंट पीडित बच्ची के पिता को (उसकी योग्यता के अनुसार प्लांट में ही) नौकरी भी देगा . . .।
जैसे ही यह एसएमएस पीआरओ के मोबाईल नंबर 9425391768 से मीडिया पर्सन्स के पास पहुंचा वे चौंक गए। अमूमन जिला जनसंपर्क अधिकारी का काम मध्य प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार का है। इस बार पीआरओ द्वारा एक निजी कंपनी जो सिवनी जिले में अपना व्यवसायिक हित साध रही है के बचाव में उसके द्वारा किए जाने वाले काम का प्रचार प्रसार करते नजर आ रहे हैं।
देखा जाए तो यह काम मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के जनसंपर्क अधिकारी का है, जिसका सिवनी या मध्य प्रदेश में अता पता ही नहीं है। सिवनी जिले में लगने वाले 1200 मेगावाट के पावर प्लांट का एक भी कार्यालय साईट आफिस बरेला को छोड़कर सिवनी जिले में नहीं है। जबलपुर में भी एक कार्यालय है जो इस संस्थान ने पत्राचार के पते के लिए रख छोड़ा है।
कहा तो यहां तक जा रहा है कि मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड में काम करने वाले नेता नुमा ठेकेदारों के गुण्डों ने क्षेत्र में आतंक बरपाया हुआ है। जिले की घंसौर पुलिस इन आताताईयों का भी कुछ बिगाड़ने में स़क्षम नजर नहीं आती है।
मीडिया पर्सन्स के जेहन में अनेकों सवाल उपज रहे हैं, मसलन अगर वह कर्मचारी फिरोज मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड का कर्मचारी नहीं है तो फिर मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड आखिर उस बाला के इलाज को आगे कैसे आ गई? अपने जनसंपर्क विभाग से इस खबर को फ्लेश करवाने के बजाए मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड ने आखिर मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क महकमे के जिला जनसंपर्क अधिकारी का उपयोग क्यों किया? (साई फीचर्स)

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

खौफ का पर्याय बन गए थे प्राण


खौफ का पर्याय बन गए थे प्राण

(लिमटी खरे)

रूपहले पर्दे के अदाकार प्राण का नाम आते ही घरों की स्त्रीयों में एक दहशत छा जाती थी। सिनेमाघरों में प्राण को देखकर महिलाएं अपने बच्चों को अपने आंचल में छिपा लेती थीं। उस दौर में महिलाओं को लगता था कि पर्दे पर जो हो रहा है वह हकीकत में हो रहा है। प्राण इतना जीवंत अभिनय करते थे थे कि उनका विलेन का स्वरूप जी उठता था, इसलिए महिलाओ में उनके इमेज बेहद खराब बनी हुई थी। वास्तव में प्राण बेहद जिंदादिल इंसान थे। समय के साथ उन्होंने केरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में अपने आप को स्थापित किया। पहले वे विलेन के रूप में जबर्दस्त तरीके से स्थापित हो चुके थे।

बालीवुड के प्रसिद्ध विलेन और चरित्र अभिनेता प्राण सिकंद को फिल्मों में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया है। यह सम्मान भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के के नाम पर दिया जाता है। प्राण को तीन मई को विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में सम्मान दिया जायेगा. अपने छह दशक के कैरियर में 400 से अधिक फिल्में कर चुके प्राण ने 1998 में अभिनय को अलविदा कह दिया था। प्राण की हालत नाजुक है इसलिए वे शायद ही पुरूस्कार लेने जा पाएं।
12 फरवरी 1920 को दिल्ली में जन्म लेने वाले प्राण आज 93 वर्ष के हैं। प्राण का वास्तविक नाम प्राण किशन सिकन्द है। प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद एक सरकारी ठेकेदार थे, जो आम तौर पर सड़क और पुल का निर्माण करते थे। देहरादून के पास कलसी पुल उनका ही बनाया हुआ है। अपने काम के सिलसिले में इधर-उधर रहने वाले लाला केवल कृष्ण सिकंद के बेटे प्राण की शिक्षा कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर में हुई।
प्राण ने अपना कैरियर फोटोग्राफर के बतौर लाहौर में आरंभ किया था। प्राण एक्टर नहीं फोटोग्राफर बनना चाहते थे। प्राण ने आरंभ में महिलाओं का किरदार भी निभाया। उन्होंने सबसे पहले अपने शहर की रामलीला में सीता का किरदार निभाया था। प्राण को 1940 में यमला जटनामक फिल्म में पहली बार काम करने का अवसर मिला।
जब मुंबई आए प्राण तब उन्होनें फिल्मों में काम करना आरंभ किया ओर प्राण की पहली सबसे बड़ी हिट फिल्म थी बीआर चोपड़ा की अफसाना (1951) रही। एक अनुमान के अनुसार प्राण ने आधी सदी तक रूपहले पर्दे पर अपनी जानदार शानदार अदाकारी का जलवा दिखाया और चार सौ से अधिक फिल्मों में काम किया।
प्राण ने अपनी अधिकांश फिल्मों में बरखुरदार शब्द का इस्तेमाल किया। उनकी लटकती जुल्फें और बरखुरदार उनकी पहचान बन गई थी। आजादी के उपरांत सन 1948 में रिलीज जिद्दी और बड़ी बहन से उनकी पहचान खलनायक के रूप में बननी शुरू हुई और यही से शुरू हुआ प्राण का नया सफर। जिसमे राम और श्याम में उनकी भूमिका दमदार रही। प्राण विलेन ही नहीं रहे उन्होंने उपकार में मंगल चाचा का किरदार निभाकर अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।
जिस तरह पचहत्तर में आई अमिताभ बच्चन धर्मेंद्र अभिनीत शोले में गब्बर सिंह का किरदार अमजद खान ने निभाकर महिलाओं के दिल में दहशत पैदा कर दी थी, उसी तरह सत्तर के दशक के पहले प्राण को देखकर ही महिलाओं के मन से उन्हें बद्दुआ देना आरंभ कर देती थीं। प्राण की अदाकारी में इतना दम था कि वे महिलाओं और बच्चों के खासे दुश्मन बन बैठे थे।
निजी जिंदगी में प्राण अपनी इस इमेज से हटकर ही हैं। उनको खेलों का बड़ा शौक है। खिलाड़ियों की मदद को तो वह हरदम तैयार रहते हैं। बताया जाता है कि उन्होंने एक बार क्रिकेट अधिकारियों से कहा था कि वह कपिल देव की ऑस्ट्रेलिया में ट्रेनिंग का पूरा खर्चा उठाने के लिए तैयार हैं। प्राण चौरिटी के लिए क्रिकेट मैच भी खूब कराते थे। प्राण ने फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनमॉस को भी मदद की थी।
माना जाता है कि इंडियन सोसायटी में प्राण का नाम इतना बदनाम था कि साठ से सत्तर के दशक के बीच किसी ने भी अपने बच्चे का नाम प्राण नहीं रखा। एक्टिंग प्राण की पूजा थी। उनके करीबी बताते हैं कि फिल्म जंजीर में यारी है ईमान मेरा की शूटिंग के दौरान उनकी पीठ में जबर्दस्त दर्द था, पर उन्होंने इस दर्द के बाद भी जमकर नाचा।
वैसे प्राण का पूरा नाम प्राण किशन सिकंद है। उनकी शादी 1945 में शुक्ला अहलूवालिया से हुई। उनसे उनके दो बेटे अरविंद, सुनील व एक बेटी पिंकी है। प्राण को कुत्ते बहुत पसंद हैं। साथ ही उन्हें पाइप कलेक्ट करने का भी बड़ा शौक है। उन्होंने कई देशों के पाइप इकट्ठे किए हुए हैं। एसे अदाकार को उम्र के इस पड़ाव में दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजना फक्र की बात है पर अगर यह सम्मान उन्हें दस बीस साल पहले मिल जाता तो वे अपनी खुशी का इजहार बेहतर तरीके से कर सकते थे। (साई फीचर्स)

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

84 के दंगों की बैसाखी पर मनमोहन!


84 के दंगों की बैसाखी पर मनमोहन!


(लिमटी खरे)

जब जब मनमोहन सिंह संकट में आए हैं तब तब 1984 के सिख दंगों का जिन्न निकलकर बाहर आया है। वर्तमान में भी जब राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने की कवायद चरम पर है तब भी 84 के दंगों में जगदीश टाईटलर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया में टाईटलर अपनी सफाई पेश करते फिर रहे हैं कि वे निर्दोष हैं। हालात चीख चीख कर कह रहे हैं कि सोनिया गांधी ही सर्वोच्च सत्ता का केंद्र हैं मनमोहन सिंह तो महज एक रिमोट कंट्रोल आपरेटेड इक्यूपमेंट हैं। 1884 में इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत सिखों के विरोध में घृणा का वातावरण निर्मित कर कांग्रेस ने अभूतपूर्व मेजारिटी हासिल अवश्य की थी कांग्रेस ने 416 सीट पाई थी, पर यह सब कुछ सिखों के विरोध में फैलाई गई वितृष्णा के बूते हुआ। 84 के दंगों ने बटवारे की यादें ताजा कर दीं। यह ठीक उसी तरह हुआ जिस तरह मुहम्मद अली जिन्ना ने 1947 में लोगों के मन में जहर के बीच प्रस्फुटित करवा कर पाकिस्तान को नक्शे पर लाया गया था।

देश में सियासी तूफान मचा हुआ है। सियासत में सत्ता का केंद्र मनमोहन ंिसह के बजाए राहुल गांधी को बनवाने का जतन हो रहा है। राहुल गांधी को आगे कर उनका नाम भुनाकर सियासी पायदान चढ़ने वाले कांग्रेस के आलंबरदार उन्हें वजीरे आजम बनवाने की जुगत में हैं। मनमोहन सिंह को अपनी कुर्सी पर खतरा सामने से ही मंडराता दिख रहा है। जब जब मनमोहन सिंह पर संकट के बाद बादल छाए हैं तब तब 84 के सिख दंगों का जिन्न जिंदा ही हुआ है।
84 के दंगे भारत गणराज्य के सियासी इतिहास का सबसे बड़ा स्याह धब्बा है। कांग्रेस द्वारा प्रियदर्शनी की हत्या से उपजी घृणा की लहर को कैश करवाया जा रहा था। सिखों के साथ कत्लेआम मचा था और कांग्र्रेस के आलंबरदार हाथ पर हाथ रखे ही बैठे थे। उस समय की परिस्थितियों पर अगर गौर किया जाए तो उस वक्त उन सियासी लोगों के घरों पर भी हमले हो रहे थे जो इन दंगों की मुखालफत कर रहे थे। इस फेहरिस्त में प्रणव मुखर्जी, राम विलास पासवान, चंद्रशेखर आदि के घर इनमें शामिल थे।
1984 के दंगों के बारे में जिन्होंने भी सुना या देखा है वह पीढ़ी आज भी जीवित ही है। इस पीढ़ी ने अपने अध्ययन अध्यापन के दौरान इतिहास भी पढ़ा होगा। याद पड़ता है कि जिस तरह नादिरशाह और चंगेज खान या हिटलर ने लोगों पर कहर बरपाया था उसी तर्ज पर कांग्रेस के नेताओं की शह पर 1984 में सिर्फ और सिर्फ सिखों को ही निशाना बनाकर उन्हें मारा और लूटा जा रहा था।
1984 के दंगों के बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस को अशातीत सफलता मिली। कांग्रेस के रणनीतिकार फूले नहीं समा रहे थे। राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने सभी आतुर थे, पर असली खालिस कांग्रेसी जानते थे कि यह जीत कांग्रेस की नहीं वरन् कांग्रेस के लोगों द्वारा सिखों के खिलाफ पैदा की हुई नफरत की बुनियाद पर हासिल की गई थी। इस बात को प्रधानमंत्री के इर्द गिर्द रहने वाले भली भांति जानते समझते हैं। यही कारण है कि सिखों के रिसते जख्मों को बार बार हरा किया जाता है ताकि सिख प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह अपनी कुर्सी बचा सकें।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस का सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र आज भी 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी का सरकारी आवास ही बना हुआ है। अब यह कांग्रेस के बजाए सरकार की शक्ति और सत्ता का शीर्ष केंद्र बन चुका है। मनमोहन सिंह सिर्फ रिमोट से चलने वाले एक इंस्टूमेंट से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मनमोहन जुंडाली इस बात को भली भांति जानती है कि सोनिया के आगे प्रधानमंत्री होते हुए भी मनमोहन मिमियाते ही नजर आते हैं।
कांग्रेस में आजादी के बाद सत्ता की धुरी नेहरू गांधी परिवार के इर्द गिर्द ही सिमटी रही है। वर्तमान में भी सत्ता की धुरी सोनिया गांधी के हाथों में ही है, उनके पुत्र राहुल गांधी नंबर दो पर विराजमान हैं। मनमोहन सिंह वैगरा का नंबर इनके उपरांत ही लगता है। देखा जाए तो मनमोहन सिंह सरकार में कांग्रेस के प्रतिनिधि हैं, उस लिहाज से उनकी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं कांग्रेस के प्रति होना लाजिमी है पर कांग्रेस के लाभ के लिए अगर वे देश को ही गिरवी रखने का प्रयास करें तो यह अनुचित ही होगा।
जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक नेहरू गांधी परिवार ने अपने पास वजीरे आजम का पद रखा और कांग्रेस अध्यक्ष किसी और को बनाया। सोनिया गांधी चूंकि इटली मूल की थीं, शरद पंवार ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया फिर क्या था सोनिया को कदम वापस खेंचने पड़े और फिर मनमोहन सिंह उनकी पसंद बनकर सामने आए।
मनमोहन सिंह पर एक के बाद एक वार होते रहे, और सोनिया गांधी उनकी ढाल बनीं रहीं। अचानक ही सोनिया के सलाहकारों ने सत्ता के दोनों केन्द्र यानी प्रधानमंत्री निवास और 10, जनपथ के बीच खाई खोद दी। यह खाई कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। मनमोहन सिंह पर हमले हुए और 84 के सिख दंगों का जिन्न बाहर आया। 84 के दंगों में सिखों पर मरहम लगाने के लिए ज्ञानी जेल सिंह को देश का पहला नागरिक बनाया गया। अब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं, अगर उन्हें हटाया गया तो कांग्रेस को सिखों की बुराई मोल लेनी पड़ सकती है। (साई फीचर्स)

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

सत्ता के ढाई केंद्र का माडल!


सत्ता के ढाई केंद्र का माडल!


(लिमटी खरे)

देश की सियासी फिजां में इन दिनों बस एक ही बात पर चर्चा हो रही है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सही कह रहे हैं अथवा जनार्दन द्विवेदी। दोनों ही ने अपने अपने तरीके से सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के प्रयोग को सफल और असफल करार दिया है। दिग्विजय सिंह की बात में वंशवाद की हिमायत की बू आती है तो द्विवेदी का कहना वंशवाद की समाप्ति की ओर इशारा कर रहा है। भारत में ही इस बात का उदहारण मौजूद है कि यहां वंशवाद की परंपरा भी रही है तो वंशवाद से इतर ब्रितानी गोरों ने लंबे समय तक यहां राज भी किया है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का तिलिस्म दरक चुका है। कांग्रेस के अंदर अब नेहरू गांधी परिवार का चमत्कार ढहने पर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही भ्रष्टाचार पर अपना मुंह बंद रखकर देश की जनता की नजरों से उतर चुके हैं। राहुल के अंदर देश को संभालने का माद्दा नजर नहीं आता है, वहीं दूसरी ओर टाईम मेग्जीन एक बार फिर पलनिअप्पम चिदम्बरम को ही मनमोहन सिंह का सक्सेसर बता रही है। देखा जाए तो सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं देश में वर्तमान समय में!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसे आजादी के उपरांत महात्मा गांधी ने भंग करने की सिफारिश की थी में स्वाधीनता के बाद से ही सामंतशाही हावी रही है। कांग्रेस के अंदर वंशवाद का बटवृक्ष किसी से छिपा नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उपरांत इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, वरूण गांधी, सियासी बियावान में विचरण कर रहे हैं। इनमें से मेनका और वरूण कांग्रेस से बाहर हैं।
नब्बे के दशक में नरसिंहराव और सीताराम केसरी ने कांग्रेस को कुछ समय तक नेहरू गांधी परिवार की छाया से दूर रखा किन्तु उसके बाद एक बार फिर इस बटवृक्ष पर निठल्ले बैठे कांग्रेसी अमर बेल जैसे परजीवी बनकर लदे रहे और कांग्रेस की बागडोर तथा सत्ता की धुरी एक बार फिर सोनिया गांधी के पास लाकर रख दी। जैसे ही राहुल गांधी सोचने समझने के लायक हुए उन्हें भी महिमा मण्डित करना आरंभ कर दिया गया।
राहुल गांधी भी इन कांग्रेस के मठाधाीशों के रंग में ही रंग गए। बाद में जब राहुल को अहसास हुआ कि उनके पैरों के नीचे जमीन ही नहीं है तो वे हतप्रभ रह गए। राहुल ने धीरे धीरे अपने कदम वापस खींचे और प्रधानमंत्री ना बनने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। फिर क्या था राहुल को आगे कर सत्ता की मलाई चखने वाले निठल्लों को यह बात रास नहीं आई और उन्होंने फिरसे राहुल के पीएम बनने की संभावनाओं को हवा देना आरंभ कर राहुल के मन में पीएम बनने की अभिलाषाएं जगाना आरंभ कर दिया।
कांग्रेस के इस तरह के शातिर नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक है। जनता जाग चुकी है, मीडिया को प्रलोभन देकर आप अपने कब्जे में ले सकते हैं पर सोशल मीडिया ने अपनी जो दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है वह निश्चित तौर पर सियासी लोगों की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।
इतिहास साक्षी है कि देश पर आक्रमण कर बाबर से लेकर औरंजेब और बहादुर शाह जफर तक खानदानी राज रहा है। बादशाह अकबर ने इस देश पर पचास साल लगातार राज किया है। अकबर की न्यायप्रियता के कारण जो नींव रखी गई थी वह उनकी नाकारा आल औलादें सौ साल तक भुनाती रहीं। इसके बाद जब बहादुर शाह जफर ने देश पर राज किया तब कंपनी बहादुर यानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पैर पसारने के उपरांत लाल किले तक ही सिमट गया। उस वक्त राज जरूर जफर का था पर आदेश ईस्ट इंडिया कंपनी का ही चला करता था।
आज के दौर में यह उदहारण इसलिए भी प्रासंगिक माना जा सकता है क्योंकि आज राज नेहरू गांधी परिवार का ही चल रहा है। देश में उनकी मंशा कि बिना पत्ता भी नहीं खड़क रहा है। मनमोहन सिंह देश के वजीरे आजम जरूर हैं पर उनकी भी इतनी ताकत नहीं कि वे अपनी मर्जी से देश को चला सकें। देश की सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र सालों से 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी का आवास ही बना हुआ है।
इक्कीसवीं सदी का सपना देशवासियों ने बड़े ही चाव के साथ देखा था। आज इक्कीसवीं सदी का तेरहवां साल आधा बीतने को है, पर इसके बाद भी आज देश की रियाया अपने आप को गोरे ब्रितानियों के बजाए स्वदेशी कालों की गुलाम समझ रही है। जनता को जो मिलना चाहिए वह उसे मिल ही नहीं पा रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में दस सालों के लिए किया गया था। आज संविधान बने छः दशक से ज्यादा समय हो गया है पर देश के हुक्मरान इन्हें मुख्य धारा में ला नहीं पाए हैं, परिणामस्वरूप आज भी आरक्षण का जिन्न सामान्य वर्ग पर हावी है।
आज कांग्रेस की हालत इतनी गई गुजरी हो गई है कि वह जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के बजाए एक परिवार के भरोसे ही देश को हांकना चाह रही है। कांग्रेस के नेता एक परिवार विशेष के भाटचारण और महिमामण्डन को ही अपना मूल मंत्र मान रहे हैं। इन्हीं नेताओं के चलते इस परिवार के कथित युवा किन्तु वस्तुतः प्रोढ़ होते सदस्य को लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है।
शिवसेना भी राहुल पर वार कर रही है तो भाजपा उन्हें आड़े हाथों ले रही है। राहुल कहते हैं उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनना पर उन्हें पीएम बनाने के लिए कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सारे घोड़े छोड़ने पर आमदा नजर आ रहे हैं। राजा दिग्विजय सिंह द्वारा सोनिया और मनमोहन सिंह के दो पावर सेंटर को गलत और असफल बताया जाकर नई बहस छेड़ दी जाती है।
इसकी काट के रूप में जनार्दन द्विवेदी सोनिया मनमोहन के दो पावर सेंटर वाले फार्मूले को सफल निरूपित करते हैं। समझ में नहीं आता कि दो राजनेता इस तरह परस्पर विरोधी बयान देकर जनता को भ्रमित क्यों करना चाह रहे हैं। इसके पीछे उनका क्या हिडन एजेंडा है। उधर टाईम पत्रिका एक बार फिर पूरी ईमानदारी के साथ मनमोहन के सक्सेसर के बतौर पलनिअप्पम चिदम्बरम का नाम आगे कर रही है।
दिग्विजय सिंह या जनार्दन द्विवेदी जो चाहे कहें पर वस्तुस्थिति यह है कि देश में सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं। एक हैं 7, रेसकोर्स रोड़ पर रहने वाले प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, दूसरी 10, जनपथ में निवासरत यूपीए चेयर पर्सन श्रीमति सोनिया गांधी और तीसरे 12, तुगलक लेन को आशियाना बनाने वाले राहुल गांधी। इस तरह देश में सत्ता के ढाई केंद्र अस्तित्व में हैं।
42 साल के अम्योच्योर पालीटिशिन राहुल गांधी आज भी अपनी मां श्रीमति सोनिया गांधी के मानिंद लिखा लिखाया भाषण पढ़ रहे हैं। उद्योगपतियों से रूबरू राहुल के भाषण के दौरान उनका एक पन्ना कहीं खो गया तो वे बोल उठे आई लास्ट। क्या यही अपरिपक्व राजनेता देश को इक्कीसवीं सदी का सपना दिखाने में सफल हो पाएंगे? कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की देश के हालातों और भ्रष्टाचार को छोड़कर अन्य बेमतलब के विषयों पर बयानबाजी को देखकर कहा जा सकता है कि -‘‘कौन है सच्चा कौन है झूठा हर चेहरे पे नकाब है . . .! (साई फीचर्स)

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

अधनंगों के देश में खरबों का तमाशा!


अधनंगों के देश में खरबों का तमाशा!

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य जिसे कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था को ब्रितानी अंग्रेजों ने फिर मुगलों ने जमकर लूटा। 1947 में जब भारत देश को स्वाधीनता मिली उसके बाद माना जा रहा था कि देश की तस्वीर बदलेगी। बकौल अण्णा हजारे अब देश को काले अंग्रेज लूट रहे हैं। देश में आधी से ज्यादा आबादी के पास दो जून की रोटी मयस्सर नहीं है, उस भारत गणराज्य में अरबों खरबों रूपए की लागत से आईपीएल का आयोजन हास्यास्पद ही माना जाएगा। इस आयोजन में रूपहले पर्दे के करोड़पति अरबपति अदाकार, सियासी दुनिया के कलाकार, कारोबारी आदि की भूमिका है। इनके मन में देश के गरीबों के प्रति हमदर्दी लेशमात्र नहीं है। इनका कोई सामाजिक सरोकार भी नहीं बचा है। जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी के पास खाने के लाले पड़े हैं उस देश में क्या मंहगी टिकिट लेकर गरीब गुरबे गेंद और बल्ले का खेल खेल देखने की बात सोच भी पाएंगे। इस तरह के आयोजनों से देश में अपराध बढ़ने की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि युवा इसे देखने के लोभ में पैसा कमाने के लिए गलत रास्ता अख्तियार करने में शायद ही गुरेज करें। आज देश के हुक्मरानों ने भारत गणराज्य को बजार समझ लिया है। रियाया कराह रही है पर मनमोहन सिंह सरकार देश में नग्न तमाशे की इजाजत दे रहे हैं।

छटवां इंडियान प्रीमियर लीग क्रिकेट टूर्नामेंट कल शाम को आरंभ हो गया। इसके उद्यघाटन समारोह को टीवी पर देश दुनिया के लोगों ने देखा होगा। विकसित देशों के लोगों ने इसकी भव्यता को देखकर अंदाजा लगा ही लिया होगा कि भारत देश के हुक्मरान देश की गरीबी का जो चित्रण करते हैं वह असल नहीं छद्म है। मुंबई में स्टेडियम जाने पर भले ही किंग खान यानी शाहरूख खान पर प्रतिबंध हो पर कोलकता में वे दीपिका पादुकोण और कैटरीना कैफ के साथ कमर मटकाते नजर आए। इसी आईपीएल में शाहरूख खान पर शराब पीकर अभद्रता करने का आरोप है, और इसी आईपीएल में वे दिलेरी से ठुमके लगा रहे हैं। मतलब साफ है कि आईपीएल के आयोजनकर्ताओं का कोई ईमान धरम नहीं है।
एक जमाना था जब देश में टीवी नहीं था। याद पड़ता है कि 1983 में जब भारत ने विश्व कप हासिल किया था तब रात में रेडियो पर क्रिकेट की कामेंटरी सुनने के लिए मोहल्ले मोहल्ले लोगों की भीड़ जमा रहती थी। जसदेव सिंह, दिलीप दोषी जैसे कामेंटरेटर अपनी जादुई आवाज में लोगों को बांधे रखा करते थे। धीरे धीरे समय ने अपना चक्कर चलाया और अब टीवी पर सब कुछ दिखने लगा। वह समय था जब टेस्ट क्रिकेट को लोग धेर्य से देखा करते थे। उस समय वन डे क्रिकेट को ज्यादा पसंद नहीं किया जाता था।
समय बदला और अब फटाफट क्रिकेट यानी ट्वंटी ट्वंटी ने अपना रंग जमा लिया है। आज देश में फटाफट क्रिकेट बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो चुका है। क्रिकेट से ज्यादा पूछ परख हाकी की हुआ करती थी, विडम्बना ही कही जाएगी कि हाकी को बड़े प्रायोजक नहीं मिल पाए तो हाकी ने कालांतर में दम ही तोड़ दिया है। फटाफट क्रिकेट आज गेंद और बल्ले का गेम ना होकर एक बहुत बड़ा व्यापार बन चुका है। आज क्रिकेट के खिलाड़ी भी इस पवित्र खेल को पेशे की तरह अपनाने लगे हैं। खिलाड़ी क्रिकेट की मंडी में अपना सौदा कर रहे हैं जो चिंतनीय है।
आज कार्पोरेट घरानों ने इस खेल के खिलाड़ियों पर पानी की तरह पैसा बहाया है। सभी एक लगाकर दस कमाना चाहते हैं। यह तभी संभव हो पाएगा जब इन घरानों को खेल कम मैदान में सर्कस ज्यादा हो। कहने का तातपर्य इतना ही है कि अगर सीधे सीधे क्रिकेट हो तो इनका पैसा शायद ही वसूल हो पाए, पर खेल के बजाए तमाशा कर अच्छा खासा पैसा कमाया जा सकता है।
विडम्बना देखिए कि इस भारत गणराज्य में जहां नारी को पूरे कपड़े में सौंदर्य की देवी माना जाता है वहां टीवी पर घरों में माताओं बहनों के सामने चीयर्स गर्ल के रूप में छोटी स्कर्ट में चौके छक्के या आउट होने पर अश्लील नाच करते दिखाया जाता है। इस पर सैंसर बोर्ड या सूचना प्रसारण मंत्रालय को आपत्ति इसलिए नहीं होती है क्योंकि इस तमाशे से सरकार को भी करों के रूप में आय होती है। एक अनुमान के अनुसार इस तमाशे में दस हजार करोड़ रूपए से भी ज्यादा का तमाशा होता आया है।
अगर आय के स्त्रोत इसी तरह के रखने हैं तो सरकार को चाहिए कि वैश्यालयों को खुला लाईसेंस दे दे। प्रतिबंधित दवाओं और नशीले पदार्थों को पान की दुकानों के माध्यम से बिकवाना आरंभ कर दे, हत्या लूट जैसे जघन्य अपराधों को भी बड़ी राशि चुकाकर वैध बना दे, घरोंघर शराब बनवाने की छूट प्रदान कर दे। इस तरह के नंगे फूहड़ नाच करावाकर सरकार किस संस्कृति का पोषण कर रही है यह बात समझ से परे ही है।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि फटाफट क्रिकेट के आयोजकों को देश की दशा और दिशा से सरकारों की तरह ही लेना देना नहीं है। इन आयोजकों को देश से भी कोई लेना देना नहीं है, इनका कोई ईमान धरम नहीं है, इनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं है। देश में आज क्या परिस्थितियां हैं इस बात से ये कोसों दूर सिर्फ और सिर्फ अपना हित ही परमोधर्म मानकर चल रही हैं।
देश में महाराष्ट्र के भयंकर सूखे से सभी आवगत हैं। इसी सूबे से आने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शरद पंवार केंद्र में कृषि मंत्री बनकर किसानों के हितों के संवंर्धन का प्रहसन कर रहे हैं। इस सूबे में पानी के लिए किसान त्राहीमाम त्राहीमाम कह रहे हैं। इस सूबे की भाजपा की इकाई यहां आईपीएल का विरोध कर रही है। भाजपा के विरोध को सियासी चश्मा लगाकर देख रहे हैं अन्य सियासी दल।
कितने आश्चर्य की बात है कि इसी सूबे में स्यंभू संत आसाराम बापू हजारों लिटर पानी रंग में घोलकर बर्बाद कर आनंदित होते हैं, दूसरी और फटाफट क्रिकेट के लिए पिचों की क्योरिंग आदि में हजारों लिटर पानी बहा दिया जाएगा, पर किसानों के लिए पानी की बारी आते ही केंद्र और राज्य सरकारें हाथ खड़े कर देती हैं!
देश में कमोबेश सारे राजनीतिक दल इस आयोजन में अपनी मौन सहमति देते नजर आ रहे हैं। सूबे में पानी की एक एक बूंद के लिए लोग तरस रहे हैं वहीं स्टेडियम में पिच के रखरखाव के लिए लगभग 22 लाख लीटर पानी बहा दिया जाएगा। पत्रकार से राज्य सभा के रास्ते संसदीय सौंध तक पहुंचने वाले मंत्री राजीव शुक्ल ने फटाफट क्रिकेट के बचाव में बचकाने और गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य दिए हैं जिनकी निंदा होना चाहिए, वस्तुतः एसा हो नहीं रहा है।
बकौल राजीव शुक्ल अगर आईपीएल नहीं हुआ तो भी सूखा खत्म नहीं होने वाला है। सवाल यह है कि अगर इस तरह का फूहड़ आयोजन हो रहा है, जिसमें पानी की बर्बादी हो रही हो अश्लीलता परोसी जा रही हो, शाहरूख खान जैसे टीम के मालिक शराब पीकर स्टेडियम में दंगा फसाद पर आमदा हों और फिर राजीव शुक्ला इस तरह के बयान दें तो इसका मतलब क्या यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि कांग्रेस और केंद्र सरकार खुद ही देश में नंगाई और अनाचार को प्रश्रय दे रही है।
क्या इसे यह नहीं माना जाए कि सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस और कांग्रेस नीत संप्रग सरकार अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेही से मुंह मोड़ रही है? हालात देखकर लगने लगा है मानो इटली मूल की कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने भी पाश्चात संस्कृति में अपने आप को ढाल लिया है, मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने भारत गणराज्य को बाजार ही समझ लिया है!
दरअसल मीडिया में भी आईपीएल के विज्ञापन पटे पड़े हैं तो भला कोई इसकी मुखालफत कैसे करे। यह चुनाव नहीं है अतः माना जा सकता है कि यह पेड न्यूज का मामला नहीं है, पर भारतीय प्रेस परिषद को स्वतः ही इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए। अगर मीडिया इसके दुष्प्रभाव को रेखांकित नहीं कर रहा है तो कहीं ना कहीं विज्ञापन इसकी वजह हैं। विज्ञापनों के अहसान तले दबकर देश के साथ अगर अन्याय को बर्दाश्त कर रहा है घराना पत्रकारिता का जनम वर्तमान मीडिया तो उसकी भी निंदा की जानी चाहिए। (साई फीचर्स)