भ्रष्टाचार कांग्रेस की संस्कृति का
हिस्सा: अग्रवाल
(शिवेश नामदेव)
सिवनी (साई)। प्रदेश में अपना राजनैतिक
अस्तित्व समाप्त होने के भय से कांग्रेसी अब शोषितों और पीडितों के कन्धों पर
बन्दूक रखकर भाजपा पर राजनैतिक निशाना साधने की नाकाम कोशिश कर रहे है। कांग्रेस
ने बलात्कार जैसी निंदनीय और निर्मम घटनाओं पर संवेदना व्यक्त करने के बजाय उसे
राजनैतिक हथियार बना लिया है। धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीट कर समाज में
साम्प्रादियकता जहर घोलना कांग्रेस का इतिहास रहा है। भाजपा पर आरोप लगाने वाले
कांग्रेसी आज खुद कठघरे में खड़े है। देश में भ्रष्टाचार के कीर्तिमान बनाने वाले
कांग्रेसी प्रदेश सरकार पर उगंली उठाकर स्वयं का उपहास उडा रहे है। इस आशय के आरोप
भाजपा मीडिया प्रभारी श्रीकांत अग्रवाल द्वारा जारी विज्ञप्ति में लगये गये।
श्री अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस शासित
राज्यों में काले घन के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर लाठिया भांजी जाती है। भ्रष्टाचार
के खिलाफ आवाज उठाने वालो को जेल में डाल दिया जाता है। बलात्कार पीडितों को न्याय
दिलाने के लिये दोषियों के खिलाफ आन्दोलन करने वालों पर ऑंसू गैस और गोलियों दागी
जाती है। आंतकवादियों और अपरोधियों को संरक्षण देने के लिये कुख्यात हो चुके
कांग्रेसी प्रदेश की घटनाओं पर गैर जिम्मेदाराना राजनीति कर सत्ता में वापसी के
मंसूबे पाल रहे है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि देश, प्रदेश या जिले में कही भी महिलाओं के
साथ हो रही घटनाऐं वैहद निन्दनीय है। इनमें लिप्त दुराचारियों को पकडना और उन्हें
सजा दिलावाना सरकार और समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। मध्यप्रदेश शासन एवं
प्रशासन पूरी संवेदनशीलता से न सिर्फ आरोपियों को गिरफ्त में लेने के लिये
प्रतिवद्ध है बल्कि मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य जहां न्यायालय में सबसे
तीव्रगति से आरोपियों को मृत्युदण्ड तक की सजा सुनाई गई है। ऐसी घटनाओं पर
संवेदनशीलता व्यक्त करते हुये पीडितों और शोषितों का साथ देने तथा समाज में
सांस्कृतिक जागरूकता के प्रयास करने के बजाय कांग्रेसी पीडितों के कन्धें का उपयोग
राजनैतिक हितों के लिये कर रहें है। इन दिनों बढ़ रही इन घटनाओं के पीछे विकृत
मानसिकता के साथ ही पाश्चात्य संस्कृति के घृणित प्रभाव को भी नकारा नही जा सकता
दुभार्ग्य से कांग्रेस इस पाश्चात्य सस्कृति की पोषक और संरक्षक बनकर उभरी है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि भ्रष्टाचार
कांग्रेस की संस्कृति में शामिल है वह घपलो घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्त होकर
देश को दोनो हाथों से लूट रही है। इसके साथ ही कांग्रेस भ्रष्टाचारियों को बचाने
के लिये सी।बी।आई जैसी कानूनी संस्थाओं का दुरूप्रयोग कर रही है। इसके विपरीत
मध्यप्रदेश सरकार भ्रष्टचारियों के खिलाफ पूरी कठोरता वरत् हुये कार्यवाही कर रही
है। उसी का परिणाम है कि लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्था भ्रष्टचारियों पर खुलकर
कार्यवाही कर रही है।
श्री अग्रवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस
जिले के संवेदनशील वातावरण को दूषित करने का घटिया प्रयास कर रही है। लोगों में
अमन एकता और भाईचारे को बनाये रखने के प्रयास करने के बजाय पूर्व में कर्फ्यू के
दौरान हुई घटना और वर्तमान में कुछ अपराधी तत्वों के पकडे जाने की घटना को जिले के
कांग्रेसी अपना राजनैतिक हित साधने के लिए उपयोग करने के शर्मनाक प्रयासों में
जुटकर कानूनी कार्यवाही को प्रभावित करने का कुतसित प्रयास कर रहे है जो सर्वथा
निदनीय है। भाजपा पर संरक्षण का आरोप लगाने वाले कांग्रेसी आज खुद कठघरे में खड़े
है।
‘‘भारत गणराज्य में पहली बार एसी सरकार केंद्र में विराजी है जो न तो निर्णय लेने में सक्षम है और ना ही कड़े कदम उठाने में। दो दशक पहले मलेरिया जैसे बुखार के लिए कुनैन की कड़वी गोली को बलात गटकना होता था। आज देश उसी तरह के ज्वर से तप रहा है, कुनैन जैसी कड़वी गोली की दरकार है, पर सरकार है कि उसे गुटकने को राजी नहीं है। सरकार कहती है कि उसके पास वह सूची है जिसमें विदेशों में काला धन जमा है, पर उसे वह उजागर नहीं कर सकती है। विपक्ष अड़ा है नाम उजागर करने को। विपक्ष को चाहिए कि वह सरकार से नाम उजागर करने की जिद न करे। बेहतर होगा कि मुद्दे को राह से न भटकाए विपक्ष। इस फेहरिस्त में विपक्ष के ‘‘अपने चहेतों के नाम‘‘ भी होंगे। विदेश में जो धन जमा है वह काला है इस बात से इसलिए इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि उस धन पर सरकार को आयकर या अन्य कर प्राप्त नहीं हुए हैं। सरकार बेशक इनके नाम सार्वजनिक न करे, किन्तु इन काले धन की सूची वालों पर कार्यवाही से क्यों हिचक रही है?‘‘
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा कलेधन के मामले को 2008 में उठाना आरंभ किया था। इसके बाद यह मामला गति पकड़ता गया और फिर अंततः अब यह मामला पूरी तरह सुलग चुका है। सरकार को मजबूरी में स्विस बैंक से खाताधारकों की सूची बुलवानी पड़ी। इस सूची में कितने नाम हैं इस बारे में आधिकारिक तौर पर तो कुछ भी सामने नही आया है, किन्तु कहा जा रहा है कि इसमें 26 हजार लोगों के नाम हैं। काले धन के मामले में सरकार ने एक बात दावे के साथ कह दी कि इसमें पंद्रहवीं लोकसभा के किसी भी सांसद का नाम शामिल नहीं है।
विदेशों में जमा काला धन वाकई एक गंभीर मुद्दा है। अगर कोई भी व्यक्ति भारत से धन लेकर विदेश जा रहा है तो एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर तैनात सुरक्षा कर्मी क्या देखते रह गए। निश्चित तौर पर खामी हमारे सिस्टम में ही कहीं रही है। ग्रीन चेनल का लाभ उठाकर हमारे माननीय विदेशों से न जाने क्या क्या आपत्तिजनक वस्तुओं का आयात निर्यात करते रहे। कई बार तो माननीयों को इसके चलते शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी।
सरकार ने साफ कर दिया कि विभिन्न देशों के साथ हुए समझौतों की शर्तों के तहत वे विदेशों में जमा काले धन के बारे में जानकारी मिलने पर भी सार्वजनिक नहीं करने के लिए बाध्य हैं। संतोष की बात यह मानी जा सकती है कि सरकार ने इस बात को तो स्वीकार किया कि विदेशों में देश का धन जमा है और उसके संग्रहकर्ताओं की फेहरिस्त उसके हाथ में है। जिस धन को काला धन कहा जा रहा है उस धन पर सरकार को किसी प्रकार का कर नहीं मिला है जिससे यह काले धन की श्रेणी में आ जाता है। अब सवाल यह है कि इस तरह देश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को चंद पूंजीपतियों ने सरकार की आंख से काजल चुराने के मानिंद इसे ले जाकर विदेशों में सुरक्षित रखवा दिया है।
देश को इस तरह की नपुंसक सरकार की आवश्यक्ता हमारे हिसाब से कतई नहीं है। यह तो वह मिसाल हो गई कि हमें पता है कि चोरी किसने की है। हमारे पास पक्के सबूत हैं किन्तु कुछ शर्तों के कारण हम उनके नाम उजागर नहीं कर सकते हैं। विपक्ष का रवैया भी आश्चर्यजनक ही माना जा सकता है। विपक्ष इन काले धन के संग्रहकर्ताओं के नाम उजागर करने पर आमदा है। पूरा मामला नाम उजागर करने की बहस पर आकर टिका है और यहीं यह दम तोड़ देगा।
जब सरकार के पास काले धन के जमाकर्ताओं के नाम हैं तो सरकार अपनी एजेंसियों के माध्यम से उनके कामकाज का परीक्षण क्यों नहीं करवा लेती। अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। सरकार को पता चल जाएगा कि फलां पूंजीपति कितनी कर चोरी कर रहा है? सरकार के पास संसाधनों की कमी तो नहीं है। सरकार चाहे तो अपनी विभिन्न एजेंसियों को इन पूंजीपतियों के पीछे लगा दे और इन देश द्रोहियों के नाम उजागर किए बिना ही एक नजीर पेश कर सकती है।
वस्तुतः इसमें सियासी दलों को चंदा देने वाले बहुतायत में होंगे इसलिए न तो सरकार और न ही विपक्ष चाहेगा कि इस मामले में कोई कठोर कदम उठाया जाए। सत्ता और विपक्ष द्वारा इस मामले में जमकर लड़ाई का स्वांग रचा जाकर देशवासियों को गुमराह करने का ही प्रयास किया जाएगा। सरकार अपनी एजेंसियों को बतौर ट्रबल शूटर उपयोग करती है। लालू प्रसाद यादव जब सरकार को धमकाते हैं तो सीबीआई का शिकंजा कस जाता है। मायावती जब सरकार की गर्दन तक हाथ पहुंचाती हैं तो उनके खिलाफ मामले खुल जाते हैं। बाबा रामदेव जब सरकार के खिलाफ गरजते हैं तो सरकार उनकी जांच आरंभ कर देती है। ये सारे लोग जब सरकार के खिलाफ एक्सीलेटर कम कर देते हैं तो इनके खिलाफ जांच भी लंबित ही हो जाती हैं? क्या विपक्ष को यह नहीं दिखता? दिखता है पर क्या करें हमाम में सभी निर्वस्त्र ही हैं।
एक और संभावना अत्यंत बलवती होती दिख रही है। और वह है कि चूंकि सरकार के पास काले धन के संग्रहकर्ताओं की सूची आ गई है तो अब सरकार कहीं पुलिस कोतवाल की भूमिका में न आ जाए। कोतवाल के हाथ जब सटोरियों, जुआं खिलाने वालों, अवैध शराब बेचने वालों की सूची आ जाती है और अगर वह उन्हें न पकड़ना चाहे तो वह उन्हें बुलाकर धमकाता है और चौथ वसूली करता है। डर है कि केंद्र सरकार इन पूंजीपतियों से पार्टी और निजी फंड में इजाफे के मार्ग न प्रशस्त कर दे।
वित्त मंत्री बड़ी ही शान से कहते हैं कि काले धन की समस्या 1948 से ही है, फिर इस पर तत्काल चर्चा की क्या आवश्यक्ता है? वित्त मंत्री भूल जाते हैं कि 1948 के बाद आधी सदी से ज्यादा देश पर राज किया है कांग्रेस ने। वर्तमान में भी केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार है। अगर 1948 से समस्या है और अब तक समस्या का हल नहीं निकाला जा सका तो इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं कांग्रेस ही है। आज गठबंधन अस्तित्व में है, पर तब क्या था जब कांग्रेस ही पूरे बहुमत में सरकार पर काबिज होती थी? मुखर्जी शायद इस मामले को और पचास साल के लिए टालना चाह रहे हैं, जब भी काले धन पर तत्काल चर्चा की बात होगी तो यही कहा जाएगा कि अभी इसकी क्या जरूरत है।
इसकी जरूरत है प्रणव मुखर्जी साहेब, आज और अभी! देश का हर एक नागरिक जो सुबह उठने से लेकर रात को सोते वक्त तक जो कर अदा करता है यह उसी से अर्जित राजस्व का धन है, जिसके बारे में जनता को जानने और उसे वापस लाने का हक है भारत गणराज्य आजाद भारत गणराज्य के हर एक करदाता को, चाहे वह प्रत्यक्ष तौर पर या परोक्ष तौर पर कर अदा कर रहा हो। आप जनता के सेवक हैं शासक नहीं आपको जनता की भावनाओं की उनकी पस्थितियों की कद्र करनी होगी, वरना यह वही जनता है जिसने आपको सर माथे पर बिठाया है। देर नहीं लगेगी जब यही जनता आपको सत्ता के गलियारे से उठाकर बाहर फेंक देगी।
भारत गणराज्य में रहने वाला हर नागरिक सहिष्णु रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। जीयो और जीने दो के सिद्धांत को प्रतिपादित कर इस पर अमल करने में हिन्दुस्तान का कोई सानी नहीं है। भारत की न्याय प्रणाली कहती है कि भले ही सो मुजरिम छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। जिस पर आरोप सिद्ध हो चुके हों उसे दया माफी या अन्य रास्तों से बचने के मार्ग प्रशस्त कहीं होते हैं तो यह भारत गणराज्य ही है। अजमल कसाब, अफजल गुरू, अजहर मसूद जैसे अनेक उदहारण हमारे सामने हैं जिनमें भारत गणराज्य की सरकारें बेबस ही नजर आती हैं। जम्मू काश्मीर लिब्ररेशन फ्रंट के पांच आतंकियों को इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उस वक्त एक मंत्री की बेटी अगुआ कर ली गई थी। एक गरीब को जब किसी डकैत द्वारा पकड़ा जाता है तो उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता है, पर दूसरी ओर जब किसी नेता के वंशज को पकड़ा जाता है तब सरकार सारे नियम कायदों को ताक पर रखने से नहीं चूकती। जब धमाके होते हैं तो मरने वालों और घायलों को सरकार मुआवजा देती है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या नेहरू गांधी परिवार के वंशजों ने स्व.इंदिरा गांधी और स्व.राजीव गांधी की नृशंस हत्या के बाद मुआवजा कबूल किया था?
कहते हैं कि शत्रु वहीं सबसे अधिक आक्रमण करते हैं जहां एकता नहीं होती। जहां लोगों के बीच एकता का अभाव होगा वहां शत्रुओं को सर छिपाने और छिपकर वार करने मे सहूलियत होती है। ‘अनेकता में एकता, भारत की विशेषता‘ यह नारा आजादी के बाद तेजी से बुलंद हुआ था। अस्सी के दशक के उपरांत एकाएक भ्रष्टाचार ने सर उठाना आरंभ किया। इसके उपरांत देश पर शासक करने वालों ने ही देश को लूटना आरंभ किया। अपने संचित धन को कथित तौर पर इन नेताओं ने स्विस सहित विदेशी बैंकों में जमा करना आरंभ कर दिया। कहा जाता है कि इसके साथ ही साथ हिन्दुस्तान में भी स्विस बैंक की तर्ज पर एक कंपनी का उदय हुआ। इस कंपनी ने रातों रात तरक्की की। इस कंपनी में भी नेताओं, अफसरों और व्यवसाईयों का बेनामी पैसा लगा हुआ है। यही कारण है कि केंद्र और सूबाई सरकारें भी चाहकर इसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं।
बहरहाल, देश की नपुंसक सरकार को एक के बाद एक धमाकों ने जमकर दहलाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय बम विस्फोट की पहली जवाबदारी हूजी ने ली। हूजी का कहना है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा अगर माफ नहीं हुई तो इस तरह के धमाके और भी होते रहेंगे। इसके बाद इंडियन मुजाहिद्दीन ने इसकी जवाबदारी ले ली है। इसने यह धमाका क्यों किया है इसे साफ नहीं किया है। इंडियन मुजाहिद्दीन क्या कहता है यह और हूजी की धमकी का क्या असर होगा इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी ही होगी।
पिछले दो दशकों में एक बात तो उभरकर सामने आई है कि भारत गणराज्य की सरकार को फैसला न लेने या टालने की आदत हो गई है। नब्बे के दशक में इसकी शुरूआत कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंम्हाराव के शासनकाल से हुई। उनके प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने फैसले जमकर टाले। फिर क्या था नरसिम्हाराव के उपरांत सरकारों का प्यारा शगल बनकर रह गया है फैसलों को टालना। मसला चाहे आम आदमी की रोजी रोटी से जुड़ा हो या फिर आम आदमी की सुरक्षा से, हर मामले में सरकार मूक दर्शक ही बनी बैठी दिखती है।
आज बम धमाकों के पीछे यह कारण उभरकर सामने आया है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा को माफ किया जाए। कल अगर यही बात किसी और कारण से अजहर मसूद और अजमल कसाब के लिए सामने आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वोट बैंक की घ्रणित राजनीति के चलते राजनेता कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। स्व.राजीव गांधी की पुत्री प्रियंका वढ़ेरा खुद चलकर अपने पिता की हत्यारिन नलिनी से मिलने जेल गईं और मीडिया की सुर्खियां बटोरी। सालों बीतने पर भी प्रियंका ने यह नहीं बताया कि आखिर क्या वजह थी, कि वे अपने पिता के कातिल से मिलने जेल गईं थीं। आखिर कौन से प्रश्न प्रियंका के मानस पटल पर घुमड़ रहे थे जिनका जवाब लेने वे नलिनी से मिलने गई थीं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडू विधानसभा द्वारा जो किया है उसकी गूंज अनुगूंज समूचे भारत वर्ष को पार करती हुई जम्मू और काश्मीर तक सुनाई पड़ी है। जम्मू काश्मीर के निजाम उमर अब्दुल्ला ने गरम तवे पर रोटी सेंकते हुए एक प्रश्न जड़ ही दिया कि अगर यही मामला जम्मू काश्मीर विधानसभा द्वारा अफजल गुरू के संबंध में किया होता तो क्या देश में इसी तरह की शांति रहती? उमर के प्रश्न में दम है? क्या मानव मानव में भेद उचित है। यह जात पात, धर्म, मजहब, क्षेत्रवाद का मानवता में कोई स्थान है? जाहिर है नहीं,फिर एसा क्यों? उत्तर साफ है राजनेता ही हमें आपस में भेद करना सिखाते हैं। ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हमवतन हैं हिन्दोस्तां हमारा।
अल्प संख्यक समुदाय को प्रमुख राजनैतिक दलों ने अपना वोट बैंक माना है। यही कारण है कि आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों द्वारा अल्प संख्यकों की भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जाता है। राजीव के हत्यारों के मामले में खुद उनकी अर्धांग्नी और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी एवं राजीव पुत्र तथा कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी ने भी खामोशी ही अख्तियार कर रखी है। जब उनके परिजन ही मौन हैं तब कांग्रेसियों की फौज के साथ ही साथ बाकी देश का मौन रहना स्वाभाविक ही है।
वहीं दूसरी ओर चूंकि जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अफजल गुरू के बारे में एक साधारण सा प्रश्न किया तो देश भर के सियासी लोगों की भवें तन गईं। देखा जाए तो अफजल गुरू का अपराध कमोबेश राजीव के हत्यारों के समकक्ष ही माना जा सकता है। फिर अपराधियों के मामले में दोहरे मापदण्ड आखिर क्यों? आज समूचे देश में अफजल गुरू का मामला फिर जीवंत हो गया है। चौक चौराहों पर एक बार फिर लोग अफजल के मामले की जुगाली करते दिखने लगे हैं।
दिल्ली में हुए हालिया विस्फोट से इसे जोड़ा जा रहा है। बताया जाता है कि दिल्ली विस्फोट मामले में संकेत जुलाई में ही मिल चुके थे। संभावना यह भी है कि इस मामले में अफजल गुरू का नाम लाने से मामला हॉट बनाया जा सकता है। अगर अफजल को पहले ही फांसी दे दी गई होती तो आज यह मामला उठता ही नहीं कि उसकी फांसी की सजा को माफ नहीं किया तो और धमाके होंगे। आने वाले समय में अगर कोई अनहोनी हो और उनमें अजहर मसूद और अजमल कसाब को जोड़ा जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
दिल्ली के इस विस्फोट में मारे गए और घायलों को सरकार ने मुआवजे के तौर पर चंद लाख रूपए देने की पेशकश की है। हर बार एसा ही होता है। एक प्रश्न आज भी दिमाग में जस का तस ही बना हुआ है कि जब इस तरह के हादसे, उदहारण के तौर पर राजीव गांधी की बम धमाके में हुई हत्या के उपरांत सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को क्या उनकी पत्नि श्रीमति सोनिया गांधी, उनकी पुत्री प्रियंका और पुत्र राहुल ने स्वीकार किया था? क्या इंदिरा जी की हत्या के बाद सरकार ने उनके परिजनों को मुआवजा दिया था? क्या मध्य प्रदेश में नक्सलियों द्वारा नृशंस तरीके से गला रेतकर जब तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की हत्या की थी तब उनके परिजनों को सरकार ने मुआवजा दिया था? क्या ये सभी गरीब जनसेवक नहीं थे? अगर थे तो क्या इनके परिजनों को मुआवजे की दरकार नहीं?
दरअसल भारत गणराज्य की नपुंसक सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति के चलते ही यह सब हो पा रहा है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही जनता द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर न चुना गया हो, जिसे जनता ने दो बार नकार दिया हो, जो पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा के रास्ते संसद पहुंचा हो, जिसे खुद लोकसभा में मत देने का अधिकार ही न हो, जिस पर सरेआम आरोप लगें कि वह सोनिया गांधी के चाबी वाले खिलौने की तरह चल रहा हो, जो देश के सामने अपने आप को मजबूर बताए, जिसके लिए ‘राष्ट्र धर्म‘ से बड़ा ‘गठबंधन धर्म‘ हो उसके नेतृत्व वाली बिना रीढ़ की सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।
9/11 के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका पर आज तक कोई आतंकी हमला नहीं हुआ है। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने यह साबित कर दिया है कि उसकी सरहद पूरी तरह सुरक्षित है। इतना ही नहीं मुस्लिम देशों पर आक्रमण कर वहां के तानाशाहों की सल्तनत को नेस्तनाबूत भी किया है अमेरिका ने। दादागिरी के साथ किसी भी देश में घुसकर वहां अपनी सेना को खड़ा करना कोई अमेरिका से सीखे। वहीं दूसरी ओर सहिष्णू होने का दंभ भरने वाले भारत गणराज्य की सरकारें वास्तव में सहिष्णु के बजाए अब नामर्द ज्यादा नजर आ रहीं हैं। एक के बाद एक आतंकी हमलों और बम विस्फोटों से निरीह निर्दोष आम जनता और उसके गाढ़े पसीने की कमाई से बनी सरकारी संपत्ति नष्ट होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेसनीत केद्र सरकार नीरो के मानिंद बांसुरी बजा रही है। 2008 में देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए आतंकी हमले के उपरांत तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को भारी विरोध के बाद हटाया गया था। इसके बाद हुए बम धमाकों को देखने के बाद भी पलनिअप्पम चिदंबरम का नैतिक साहस तारीफे काबिल है कि वे आज भी अपनी कुर्सी से चिपके ही बैठे हैं। वे दिन हवा हुए जब इस तरह की किसी भी घटना की नैतिक जवाबदारी लेते हुए नेता अपने पद से त्यागपत्र दे दिया करते थे।
बुधवार को सुबह देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बम धमका हुआ। इलेक्ट्रानिक मीडिया के मार्फत जैसे ही देश को इसकी जानकारी मिली देश स्तब्ध रह गया। एक ईमेल के जरिए इसकी जवाबदारी हूजी ने ली है। प्रधानमंत्री इन दिनों बंग्लादेश की यात्रा पर हैं। हूजी को खाद पानी भी इसी मुल्क से मिलता है इस बात में शक की गुंजाईश कम ही है। इस समीकरण पर अगर गौर फरमाया जाए तो इसका क्या संदेश है?
आतंकवाद या इस तरह की घटनाएं निश्चित तौर पर सत्तारूढ़ लोगों के लिए एक चुनौति से कम नहीं है। देखा जाए तो देश में सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त है राजधानी दिल्ली। बावजूद इसके दिल्ली में अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ते ही जा रहा है। दिल्ली में न तो महिलाएं ही सुरक्षित हैं और न ही बच्चे और बुजुर्ग। केंद्र सरकार का मुख्यालय भी दिल्ली ही है। दिल्ली की कुर्सी पर तीन मर्तबा से शीला दीक्षित विराजमान हैं। वे खुद भी महिला हैं। इन परिस्थितियों में दिल्ली को दहलाने का साहस करना वाकई दुस्साहसिक कदम ही माना जाएगा। वह भी न्याय के मंदिर में। जहां सुरक्षा सबसे तगड़ी होती है। अगर दिल्ली का उच्च न्यायालय ही सुरक्षित नहीं है तो फिर भला सुदूर ग्रामीण अंचलों में कोई सुरक्षित हो सकता है?
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को शायद जमीनी हकीकत समझ में आ गई हो। वे जब राम मनोहर लोहिया अस्पताल में घायलों से मिलने पहुंचे तब उन्हें भी काले झंडों और सरकार तथा उनके खुद के खिलाफ लगने वाले नारों का सामना करना पड़ा। अगर राहुल गांधी अपने विवेक से राजनीति कर रहे होंगे तो निश्चित तौर पर यह घटना उनकी आत्मा को कचोटने के लिए काफी कही जा सकती है। वे खुद भी लोकसभा में सांसद हैं। सत्ता में उनके दल की ही सरकार है। राहुल गांधी नेहरू गांधी परिवार (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नहीं) की पांचवीं पीढ़ी के लीडर हैं। इसलिए उनकी बात में अपने आप ही वजन पैदा हो जाता है।
यक्ष प्रश्न यह है कि 1. क्या राहुल गांधी संसद में इस मामले को लेकर गृह मंत्री की भूमिका पर सवाल उठाने का दुस्साहस कर पाएंगे? 2. क्या राहुल गांधी अपने साथ आरएमएल अस्पताल में हुए इस तरह के व्यवहार पर आत्मावलोकन करने का साहस जुटा पाएंगे? 3. क्या राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम का त्यागपत्र मांगने का दुस्साहस कर पाएंगे? 4. क्या राहुल गांधी दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित से बतौर सांसद और जनता के नुमाईंदे कोई प्रश्न करने का दुस्साहस कर पाएंगे? 5. क्या कांग्रेस महासचिव की हैसियत से राहुल गांधी अपनी माता और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी से इस मामले में कड़े कदम उठाने की मांग कर पाएंगे? इसके साथ ही देश की जनता के दिलो दिमाग में उठने वाले सारे प्रश्नों का उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगा। इसका कारण यह है कि देश के सारे जनसेवकों की नैतिकता कभी की मर चुकी है।
दिल्ली पुलिस ने इसके पहले 25 मई को गेट नंबर सात के पास हुए धमाके से सबक नहीं लिया। दिल्ली में धमाके का स्थल संसद भवन से महज दो किलोमीटर तथा सुप्रीम कोर्ट से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर था। अति संवेदनशील और व्हीव्हीआईपी इलाके में हुए इस बम धमाके ने आतंकवाद से निपटने की सरकार की नीति और दावों की कलई खोलकर रख दी है। सरकार अब तरह तरह की बातें कहकर देश की जनता को तो बहला सकती है, पर दिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से खुद का सामना शायद ही सरकार का कोई नुमाईंदा करने का साहस जुटा पाए।
जनता के चुने हुए नुमाईंदे अपने साथ कारबाईन युक्त सुरक्षा गार्ड रखा करते हैं। कुछ को सरकारी गार्ड पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे निजी या किराए के पीएसओ पर यकीन रखते हैं और इनसे घिरे होते हैं। यह बात समझ से परे ही है कि जनता के द्वारा चुने हुए नुमाईंदे क्या अपनी रियाया से इतने भयाक्रांत हैं कि वे उनके बीच जाते वक्त भी तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था चाहते हैं। जिस जनता ने उन्हें अपने लिए चुना है उससे इन नुमाईंदों को भय कैसा?
सर्वाधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब संसद की कार्यवाही के चलते इस घटना को नापाक इरादों के लोगों ने अंजाम दे दिया। गौरतलब है कि इसके पहले लगभग दस साल पहले 13 दिसंबर 2001 को देश की सबसे बड़ी पंचायत पर आतंकी हमला हुआ था। वह हमला आज तक समूचे देश का सर शर्म से झुकाने के लिए काफी माना जाता है। इसके बाद भी देश के शासक नहीं चेते। इसके बाद भी एक के बाद एक हमले होते रहे और शासक मौज करते रहे। हद तो तब हो गई थी जब 2008 में 26/11 को देश की आर्थिक राजधानी पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ। देश की हांफती सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि अतिसंवेदनशील उच्च न्यायायल के क्षेत्र में न तो सीसीटीवी ही काम कर रहे थे और न ही मेटल डिटेक्टर ही।
देखा जाए तो बीते दो दशकों से आतंकवाद पर सियासी पार्टियों का ध्यान कुछ ज्यादा ही केंद्रित हो गया है। हर एक राजनैतिक दल आतंकवाद के दर्द को उभारकर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। आतंकवाद के सफाए की ओर इन दलों का ध्यान जरा सा भी नहीं जा रहा है। मुंबई में 2008 में हुए आतंकवादी हमले के बाद देश के सबसे कमजोर समझे जाने वाले गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने त्यागपत्र देकर अपने आप को नैतिक रूप से काफी हद तक मजबूत पेश किया था। आज देश के गृह मंत्री जैसे पद पर पलनिअप्पम चिदंबरम विराजे हैं। जिन पर अनेकानेक आरोप हैं। कांग्रेस शायद भूल गई कि देश के गृह मंत्री के पद पर लौह पुरूष माने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी हस्ती को भी कांग्रेस ने ही बिठाया था, जिनकी नैतिकता, कार्यप्रणाली और देशप्रेम के ज़ज़्बे को आज भी लोग सलाम करते हैं।
इस मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया में जिरह के दौरान भाजपा बड़ी बड़ी बातें करती है, पर भाजपा शायद यह भूल जाती है कि इसके पहले अटल इरादों वाले अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के गृहमंत्री रहे लाल कृष्ण आड़वाणी के कार्यकाल में खौफ का पर्याय बन चुके आतंकवादियों को सरकार ने अपने ही जहाजांे में ले जाकर कंधार में छोड़ा था। तब कहां गई थी इन नेताओं की नैतिकता?
इतना ही नहीं राजग के पीएम इन वेटिंग के गृह मंत्री के कार्यकाल में ही देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद पर आतंकवादी हमला हुआ, अक्षरधाम के रास्ते रघुनाथ मंदिर और अमरनाथ यात्रा के दौरान न जाने कितने निरीह लोगों को भूना गया। क्या देश के नेताओं की याददाश्त इतनी कमजोर हो गई है कि चंद साल पहले घटी घटनाओं को भी याद रखने में उन्हें परेशानी होने लगी है।
उधर मुंबई पर अगर आतंकी हमला न हुआ होता तो हिन्दुस्तान के नीति निर्धारकों की तंद्रा शायद ही टूट पाती। लोगों के आक्रोश, उद्वेलना और उन्मादी तेवर के आगे केंद्र सरकार को आम चुनावों का खौफ सताने लगा और आनन फानन ही सही पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन विधेयक 2008 (यूएपीए) लाया गया। दोनों ही सदनों से इस विधेयक को बिना किसी ना नुकुर के पारित कर दिया। यूएपीए में एक नई धारा जोड़कर इसे और अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया गया है, जिसके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति विस्फोटक, आग्नेय शस्त्र, घातक हथियार, खतरनाक विशाक्त रसायन, जैविक या रेडियोधर्मी हथियारों का उपयोग अथवा आतंकवादी, देश विरोधी गतिविधियों के लिए करना या सहयोग देता है, तो उसे सजा मिलेगी और इसे दस वर्षों तक बढ़ाया भी जा सकता है। इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति देश अथवा विदेश में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन का संग्रह करता है, तो उसे कम से कम 5 साल की कैद दी जा सकती है, जरूरत पड़ने पर कैद को आजीवन कारावास में भी तब्दील किया जा सकता है। यह कानून आज के समय में निष्प्रभावी ही प्रतीत हो रहा है।
एक अन्य पहलू पर अगर गौर किया जाए तो देश में आज आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, महंगाई और बेरोजगारी के समकक्ष अगर कोई मुद्दा खड़ा हुआ है तो वह है, बंग्लादेशी घुसपैठियों का। हमारी सरकारें ना मालूम क्यों इस ज्वलंत और बेहद संवेदनशील मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं कर रही है।
वैसे इसे कमोबेश निराशाजनक ही कहा जा सकता है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल ने अब तक विधानसभा या लोकसभा चुनावों मंे बंग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को छुआ तक नहीं है। मध्य प्रदेश में अलबत्ता सूबे के निजाम ने ज़रूर एक मर्तबा बंग्लादेशी घुसपैठियों को सूबे से बाहर निकालने की बात कही थी। कितने आश्चर्य की बात है कि देश में सभी राजनैतिक दल लोकसभा के चुनाव को भी स्थानीय निकायों के चुनाव की तरह ही स्थानीय मुद्दों पर लड़ रहे हैं। देश में फैली अराजकता, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि के मसले पर सभी राजनैतिक दल कमोबेश एक जैसा ही राग अलाप रहे हैं। अलापें भी क्यों न अखिर सियासत में तो सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की ही अगर बात की जाए तो यहां लगभग दस लाख से अधिक की तादाद में बंग्लादेशी निवास कर रहे हैं। बंग्लादेश से लुके छिपे सीमा पर कर भारत आए इन बंग्लादेशियों से जहां एक ओर आंतरिक सुरक्षा को खतरा है, वहीं दूसरी ओर ये स्थानीय संसाधनों और रोजगार पर भी कब्जा जमाते जा रहे हैं। खबरें तो यहां तक हैं कि इनके द्वारा बड़ी ही आसानी से राशन कार्ड, ड्रायविंग लाईसेंस, मतदाता पहचान पत्र आदि बनवाकर हिन्दुस्तानियों के हितों पर सीधे सीधे डाका डाला जा रहा है।
2009 अगस्त में उच्च न्यायालय ने सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर बंग्लादेशी मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था, साथ ही साथ मतदाता सूचियों में से बंग्लादेशियों के नाम विलोपित करने को भी कहा था। मजे की बात तो यह है कि देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के लिए सीधे सीधे जिम्मेदार गृह मंत्रालय भी यह स्वीकार करता है कि दिल्ली में अवैध तरीके से रह रहे बंग्लादेशियों की तादाद दस लाख के करीब है। कुछ साल पहले तक तो मध्य प्रदेश के खुफिया विभाग के पास उपलब्ध आकड़ांे में बंग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या महज ग्यारह ही दर्ज थी, जबकि उस वक्त वड़ी तादाद में ये मध्य प्रदेश में निवास कर रहे थे। आज देश में इनकी तादाद बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
गांधीवादी अण्णा हजारे की एक अपील पर देश के बच्चे, युवा, प्रौढ़, बुजुर्ग, वयोवृद्ध सभी सड़कों पर निकल आए। 16 अगस्त की सुबह से ही इलेक्ट्रानिक मीडिया की ‘फीस्ट‘ (लज़ीज भोजन) चल रही है। एंकर्स रिपोर्टस जगह जगह एकत्र भीड़ के साथ अपने अपने चेनल्स की टीआरपी बढ़ाने और ब्रेकिंग न्यूज देने का जतन कर रहे हैं। लोग भी घरों में दुबके बारिश के मौसम में चाय पकौड़ों के साथ दिल्ली का हाल जान रहे हैं। शाम ढलते ही ‘चियर्स‘ की आवाज के साथ फिर लोग टीवी पर ही आंखें गड़ा देते हैं। मयखानों में भी टीवी की भारी डिमांड हो गई है। चहुंओर अण्णा ही अण्णा नजर आ रहे हैं। अण्णा के अनशन के आठ दिन बाद मोटी चमड़ी वाले मंत्रियों को कुछ शर्म महसूस हुई और वजीरे आजम ने बैठकों का कभी न थमने वाला दौर आरंभ किया। अण्णा की हालत बिगड़ती जा रही है, पर प्रधानमंत्री बैठकों में व्यस्त हैं। वैसे यह शुभ संकेत से कम नहीं है कि अण्णा के अनशन के आठ दिनों बाद ही सही कम से कम बेशर्म, नपुंसक, निरंकुश, भ्रष्ट सरकार घुटनों पर खड़ी तो दिखाई दे रही है। देश में हुए घोटालों की शुरूआत आजादी के साथ ही आरंभ हो गई थी जो आज भी अनवरत ही जारी है।
देश ही नहीं विदेशों में भी यह प्रश्न आम हो चुका है कि क्या एक लोकपाल आने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? जाहिर है सभी का उत्तर है, नहीं। फिर यह हाय तौबा क्यों? क्यों भारत गणराज्य का हर आदमी एक सीधे सादे शांत सुशील बुजुर्गवार किशन बाबू राव हजारे उर्फ अण्णा हजारे के पीछे एक सप्ताह से ज्यादा समय से भाग रहा है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि अण्णा हजारे जो महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि नामक गांव के निवासी हैं के पीछे समूचा देश भेड़चाल चल रहा है, वह भी इतने शातिर राजनेताओं के होते हुए अहिंसक तरीके से! मतलब साफ है कि एक लोकपाल के आने से भ्रष्टाचार तो नहीं मिटने वाला पर देश की जनता अपने जनसेवकों के तौर तरीकों और नूरा कुश्ती से आज़िज आ चुकी है।
देश में घपलों घोटालों की फेहरिस्त बहुत ही लंबी है। इनमें सबसे अधिक कांग्रेस की झोली में जाते हैं। 1948 में वी.के.कृष्णा मेनन का अस्सी लाख का जीप घोटाला। 1956 में पचास लाख का बीएचयू फंड घोटाला। 1957 मंे हरिदास मुंद्रा का सवा करोड़ रूपए का घोटाला। 1960 में जयंत धर्मा तेजा का लोन घोटाला जो 22 करोड़ रूपए का था के बाद 1976 में इंडियन ऑयल का ऑयल डील का दो करोड़ दो लाख का घोटाला। 1981 में अब्दुल रहमान अंतुले का ट्रस्ट घोटाला तो 1987 में बोफोर्स तोप सौदे का 64 करोड़ एवं एचडीडब्लू कमीशन घोटाला बीस करोड़ रूपए का हुआ था। बोफोर्स तोप घोटाले के बाद राजीव गांधी को सत्ता से बाहर फेंक दिया गया था। बाद में कांग्रेस के दांव पेंच के चलते मामले का खात्मा ही लगा दिया गया।
1989 में सेट किट्स जालसाजी पौने दस करोड़ रूपए की एवं इस समय का बड़ा घोटाला दो हजार करोड़ का एयर बस घोटाला था। इसके बाद घोटाले करोड़ों रूपयों में तो हुए किन्तु वे हजारों करोड़ में तब्दील हो चुके थे। 1992 में बिग बुल हर्षद मेहता ने पांच हजार करोड़ का घोटाला कर सुर्खियां बटोरीं। इसके बाद बारी आती है साढ़े छः सौ करोड़ रूपए के चीनी घोटाले की जो 1994 में हुआ। 1995 में हुए घोटालों की फेहरिस्त काफी लंबी कही जा सकती है। इस साल 43 करोड़ रूपए का कस्टम एण्ड टेक्स घोटाला हुआ जिसे वीरेंद रस्तोगी ने किया। मेघालय में तीन सौ करोड़ का वन घोटाला, पांच हजार करोड़ का प्रीफेशियल एलाटमेंट घोटाला, चार सौ करोड़ रूपए का यूगोस्लेव दिनार घोटाला, एक हजार करोड़ का कॉबलर घोटाला भी इसी साल हुआ।
1996 का वर्ष लालू यादव के नाम हो जाता है। इस साल साढ़े नौ सौ करोड़ का चारा घोटाला हुआ लालू के शासन काल में। इसके अलावा यूरिया घोटाला 133 करोड़ रूपए और तेरह सौ करोड़ रूपए का उर्वरक आयात घोटाला भी हुआ। 1997 में हुए सुखराम टेलीकाम घोटाले में 15 सौ करोड़ रूपए के लेन देन की आशंका थी। यह पहला मामला था जब किसी राजनेता को सजा हुई हो। इसी साल बारह सौ करोड़ रूपए का म्यूचुअल फंड घोटाला, 374 करोड़ रूपए का एनसी पावर प्रोजेक्ट घोटाला एवं हवाला के सूत्रधार जैन बंधुओ का बिहार भूमि घोटाला चार सौ करोड़ रूपयों का हुआ। 1998 मंे आठ हजार करोड़ रूपयों का टीक प्लांटेशन और दो सौ दस करोड़ रूपयों का उदय गोयल का एग्रीकल्चर घोटाला हुआ।
2001 में केतन पारिख का प्रतिभूति घोटाला एक हजार करोड़, यूटीआई घोटाला 32 करोड़, दिनेश डालमिया का शेयर घोटाला 595 करोड़ रूपयों का हुआ। 2002 में संजय अग्रवाल के गृह निवेश में छः सौ करोड़ रूपए और कलकत्ता स्टाक एक्सचेंज का एक सौ बीस करोड़ रूपयों का घोटाला सामने आया। इसके बाद 2003 में तो गजब ही हो गया। इस साल तेलगी ने धूम मचा दी। तेलगी ने बीस हजार करोड़ रूपयों का स्टाम्प घोटाला कर सभी को चौंका दिया। 2005 में डीमेट घोटाले के खाते में एक हजार करोड़ रूपए तो बिहार बाढ़ आपदा का छोटा सा सत्रह करोड़ रूपए का घोटाला तथा स्कॉर्पियन पनडुब्बी का 18 हजार 978 करोड़ का घोटाला हुआ। 2006 में पंद्रह सौ करोड़ रूपए का पंजाब सिटी सेंटर प्रोजेक्ट घोटाला, 175 करोड़ रूपए का ताज कारीडोर घोटाला हुआ।
2008 के उपरांत घोटालों की बाढ़ सी आ गई। इस साल हसन अली का पचास हजार करोड़ का जो 39 हजार 120 करोड़ का बताया जा रहा है के अलावा स्विस बैंक में जमा काला धन लगभग 21 लाख करोड़ रूपए, 95 करोड़ का सोराष्ट्र बैंक घोटाला, पांच हजार करोड़ रूपए का सैन्य राशन घोटाला, आठ हजार करोड़ रूपए का रामलिंगा राजू का सत्यम घोटाला प्रकाश में आया। 2009 में ढाई हजार करोड़ रूपए का चावल निर्यात घोटाला, सात हजार करोड़ रूपए का उड़ीसा खदान घोटाला, चार हजार करोड़ का झारखण्ड खदान घोटाला और एक सौ तीस करोड़ रूपए का झारखण्ड मेडीकल घोटाला सामने अया। पिछले साल यानी 2010 में एक लाख 76 हजार करोड़ का टूजी घोटाला, सत्तर हजार करोड़ रूपए का कामन वेल्थ गेम्स घोटाला, साढ़े नौ अरब का आदर्श सोसायटी घोटाला, दो लाख करोड़ का एस बैण्ड तो पेंतीस हजार करोड़ का खाद्यान्न घोटाला सामने आया है। इस तरह आजादी के बाद से अब तक खरबों करोड़ के घोटाले हो चुके हैं जिनमें से कुछ ही प्रकाश में आ सके हैं।
इतने घपले घोटाले करने के बाद भी मोटी चमड़ी वाले राजनेताओं को शर्म नहीं आई कि उन्होंने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से एकत्र राजस्व की खुली लूट की है। इसमें सभी राजनैतिक पार्टियों की बराबर की भागीदारी है। कोई भी पार्टी अपने निहित स्वार्थों को तजकर देश की जनता के लिए कुछ करने का प्रयास नहीं करती है। संसद के अंदर नूरा कुश्ती का दौर आजादी के उपरांत से ही आरंभ हो गया था। इतिहास साक्षी है जब भी कोई घोटाला सामने आता है उसी वक्त केंद्र सरकार द्वारा इससे बचने के लिए पेट्रोलियम पदार्थों के दामों को बढ़ा दिया जाता है ताकि आम जनता का ध्यान इससे हट सके।
जनता अब जाग चुकी है। वैसे कहा जा रहा है कि अण्णा हजारे के आंदोलन को शीला दीक्षित द्वारा हवा दी जा रही है क्योंकि अब कामन वेल्थ गेम्स घोटालों की लपटें उन्हें घेरने लगी हैं। अण्णा के आंदोलन के बहाने विपक्ष और जनता का ध्यान कुछ समय के लिए ही सही इससे हट गया है। खैर जो भी हो देश की जनता ने अहिंसक तरीके से सड़कों को अण्णा के लिए थाम लिया है। अण्णा की सदगी, सच्चाई, पारदर्शिता, विनम्रता, दृढ़ता के सामने सारे राजनेता नतमस्तक ही नजर आ रहे हैं। जनता अण्णा को सर माथे पर बिठाए है। इसलिए क्योंकि अण्णा के साथ उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं जुड़ा दिख रहा है। कुछ समय पहले बाबा रामदेव का आंदोलन इसी रामलीला मैदान पर हुआ। सरकार ने बाबा के साथ बल प्रयोग किया और बाबा रामदेव ‘रणछोड़दास‘ हो गए।
अण्णा के अनशन के नौ दिनांे बाद सरकार अब बैठकों के दौर से गुजर रही है। साफ दिखने लगा है कि अण्णा एक अकेले नहीं हजारों हजारों करोड़ों अण्णा में तब्दील हो गए हैं। अब कड़वे वचन बोलने वाले कपिल सिब्बल और पलनिअप्पम चिदम्बरम एवं मनीष तिवारी समचार चेनल्स से एकदम गायब हो चुके हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि आधा दर्जन राष्ट्रों हुई क्रांति के बाद अब भारत का नंबर है। सरकार खुद वार्ता की पहल कर अण्णा की शर्तें मान रही है, इसे शुभ संकेत माना जाएगा। सरकार घुटनों के बल खड़ी है, यह सफलता अण्णा हजारे की नहीं वरन् 121 करोड़ आम हिन्दुस्तानियों की है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की इसमें अहम भूमिका है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को लाखों करोड़ रूपए के पैकेज की तैयारी की जा रही है, ताकि आंदोलन का रूख बदला जा सके। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर अब इस आंदोलन के शमन के प्रयास हुए तो इसके परिणाम बहुत अच्छे नहीं सामने आएंगे। सवाल यही है कि अगर सरकार को कथित सिविल सोसायटी की बातें माननी ही थीं तो फिर 16 अगस्त से अब तक इस तरह के सर्कस का क्या ओचित्य था? जाहिर है सरकार की मंशा में खोट है।
मंहगाई के नाम पर देश की एक सौ इक्कीस करोड़ जनता के रिसते, बदबू मारते घावों पर मरहम लगाने की गरज से केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा ने संसद में बहस करने का काम आरंभ किया है। संसद में मंहगाई पर जिस तरह की चर्चा हुई उसे देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस तरह की निरर्थक औचित्यहीन बहस से अच्छा था कि इन सड़ांध मारते घावों को बहने ही दिया जाता। जनता के मन में कुछ उम्मीद जगी किन्तु फिर वह अदृश्य रोशनी की तरह विलुप्त ही हो गई। संसद में मंहगाई पर बयानबाजी से ही मंहगाई कम होने वाली होती तो निश्चित तौर पर देश में मंहगाई कभी होती ही नहीं। देश के वजीरे आजम मंहगाई पर काबू करने के लिए ‘‘तारीख पर तारीख‘‘ ही दिए जा रहे हैं। सांसदों, विधायकों को भरपूर वेतन भत्ते और सुविधाएं मिल रही हैं, तो भला फिर भरे पेट लोगों को भूखों की चिन्ता क्यों होने लगी? हां चुनाव पास हैं तो चिन्ता का दिखावा आवश्यक है।
देश में भ्रष्टाचार अब सदाचार और शिष्टाचार का रूप ले चुका है। लोग भ्रष्टाचार को आवश्यक अंग की तरह लेने लगे हैं। अभी ज्यादा समय नहीं बीता है। अस्सी के दशक के आरंभ में सरकारी कार्यालयों में ‘घूस (रिश्वत) लेना और देना दोनों अपराध है, घूस लेने और देने वाले दोनों ही पाप के भागी हैं।‘ के जुमले लिखकर समाज लोगों में रिश्वत के लिए डर पैदा करता था। हमारे एक मित्र के पिता जो सब इंजीनियर (उस वक्त इन्हें ओवरसियर कहा जाता था) थे, वे बताते थे कि एक बार उन्होंने एक पालीस्टिर की शर्ट सिलवाई, पर उसे पहना केवल घर पर ही वह भी चोरी छिपे। डर था कि अगर सार्वजनिक तौर पर पहनकर निकल गए तो जांच बैठ जाएगी कि पालीस्टर जैसा मंहगा कपड़ा खरीदा कहां से। आज नेता हो या अफसर सभी मंहगी चीजों का उपभोग करने से ज्यादा उसके दिखावे में विश्वास करते हैं। अनेक राजनेता एसे हैं जो काम तो ‘जनसेवा‘ का कर रहे हैं पर हैं अनेक कंपनियों के मालिक।
मंहगाई पर सदन में बहस के दरवाजे खुले। यह बात जानकर देश का हर नागरिक खुश हो सकता है। किन्तु जिस तरह से मंहगाई पर बहस कर इसकी हवा निकाल दी गई वह निराशाजनक ही कहा जाएगा। देखा जाए तो सरकार भी भ्रष्टाचार पर बार बार के हमलों से आजिज आ चुकी है। सरकार भी चाह रही है कि एक बार इस पर बहस हो ही जाए। फिर कांग्रेस के कुशल रणनीतिकारों ने यही समय इसके लिए माकूल पाया। इसका कारण यह है कि भ्रष्टाचार के तीरों ने कर्नाटक में भाजपा के अंदर भी गहरे घाव कर दिए हैं, जिनसे रक्त बह रहा है। इन परिस्थितियों में कांग्रेस को सब कुछ सामान्य करने में ज्यादा मेहनत नहीं करना पड़ रहा है।
मंहगाई के मामले में नेताओं की अपनी अपनी राय है। कोई कह रहा है कि विकास का रथ आगे बढ़ने से मंहगाई बढ़ रही है तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी इसे सिरे से खारिज कर रहे हैं। वहीं यशवंत सिन्हा भ्रष्टाचार को मंहगाई के लिए जिम्मेवार बता रहे हैं। देखा जाए तो सिन्हा की बात में दम है। मंहगाई के गर्भ मंे कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की खाद अवश्य ही है। कालाबाजारी करने वाले कहीं न कहीं भ्रष्टाचार करके ही अपने आप को बचाते हैं। इतना ही नहीं देश में सौ रूपयों के भ्रष्टाचार की जगह अब अरबों रूपयों के भ्रष्टाचार ने ले ली है।
भारत गणराज्य में आज के समय में सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार से निपटने के बजाए नेताओं ने इसे आरोप प्रत्यारोप का जरिया बना लिया है। आज के समय में नैतिकता की बात करने वाले को महामूर्ख समझा जाता है। आज भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबी सरकार द्वारा विवादों मंे फसने के डर के चलते नए फैसले लेने में आनाकानी आरंभ कर दी है। जो फैसले लिए भी जा रहे हैं उनमें सबसे पहले यह देखा जाता है कि इसमें निहित स्वार्थ कहां तक है।
सरकार आज हरित क्रांति को मानो भुला चुकी है। आज के कांक्रीट युग में खेती की जमीनों का अधिग्रहण किस तरह किया जाए इस बात के मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने तो कालोनाईजर्स को वीकर सेक्शन के लिए बनने वाले ईडब्लूएस मकानों पर प्रतिबंध से मुक्त करने का फैसला ले लिया है।
मंहगाई के लिए सरकार की हाजिर जवाबी का कोई सानी नहीं है। कुछ समय पहले वह कमजोर मानसून को इसके लिए जिम्मेवार बताती थी, आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों की बढोत्तरी का हवाला देकर वह मंहगाई से बचना चहती है। सरकार भूल जाती है कि जनता की सेवा करने वाले किस कदर संसद में ही अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए व्याकुल दिखने वाले सांसदों के दवाब में आकर वेतन बढ़ाती है। सरकार के नुमाईंदों का वेतन कहां से आता है? जाहिर है जनता के गाढ़े पसीने की कमाई के करों से। फिर जो जनता सरकार की नुमाईंदगी प्रत्यक्ष तौर पर नही कर रही है उसकी दो वक्त की रोटी का जिम्मा किसका है? क्या सरकार को महज अपने कर्मचारियों और नेताओं के लिए ही मंहगाई से लड़ने उनका वेतना बढ़ाना चाहिए? वस्तुतः यह इसलिए हो रहा है क्योंकि ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोग नेताओं के लिए वोट बैंक से ज्यादा कुछ भी अहमियत नहीं रखते हैं।
सरकार इस स्थापित तथ्य की ओर से आंख फेर लेती है कि हर साल भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है। एसा नहीं कि सरकार द्वारा इसका कोई प्रबंध नहीं किया हो। सरकार ने वेयर हाउस बनवाने के लिए सब्सीडी भी दी थी। लोगों ने सब्सीडी का लाभ उठाया, बड़े बड़े गोदाम बनवाए फिर उन गोदामों में अनाज रखने के बजाए ज्यादा मुनाफे के चक्कर में अन्य सामग्रियां रखवाना आरंभ कर दिया। होना यह चाहिए था कि इन गोदामों में सब्सीडी देने के साथ ही कम से कम पांच सालों के लिए इनका उपयोग सरकारी अनाज के भण्डारण की शर्त रखी जानी चाहिए थी।
कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के मामले में सदन के सारे दलों ने एक अघोषित गठजोड़ कर रखा है। यही कारण है कि इस पर बहस के दौरान इसे मिटाने के लिए तो कोई सुझाव नही देता, बस एक दूसरे पर लांछन लगाकर एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास अवश्य ही किया जाता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर हालात यही रहे तो आने वाले दिनों में भारत का स्थान सोमालिया या इथोपिया जैसे भुखमरी के संगीन दौर से गुजर रहे राज्यों के उपर होगा।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर आक्रांताओं द्वारा एक के बाद एक हमले किए जा रहे हैं और देश के शासक मौन साधे अपनी कुर्सी बचाने के लिए ‘गठबंधन धर्म‘ का बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में भारत गणराज्य के समस्त दलों के नेताओं के इस ‘गठबंधन धर्म‘ के आगे ‘राष्ट्र धर्म‘ पूरी तरह बौना हो गया है। एक के बाद एक हमलों में चाहे वे आतंकी हों या नक्सली अथवा और किसी भी तरह के, हर बार देश के करदाता नागरिक को ही इसका भोगमान अपनी जान देकर भोगना पड़ा है। 2008 में मुंबई में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमलों के बाद भी सत्ता के मद में चूर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई, जिसका परिणाम था 13 जुलाई का सीरियल बम ब्लास्ट। 2008 में नैतिकता के आधार पर तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को त्यागपत्र देना चाहिए था, जो नाटकीय तरीके से लिया गया। अब हर मोर्चे पर विफल पलनिअप्पम चिदम्बरम की बारी है, किन्तु नेहरू गांधी परिवार की वर्तमान पीढ़ी की चरण वंदना करने वाले नेताओं की कुर्सी का एक भी पाया नहीं हिलाया जा सकता है। कांग्रेस के लिए ट्रबल शूटर की भूमिका में राजा दिग्विजय सिंह हैं, जो उल जलूल बयानबाजी से लोगों का ध्यान मुख्य मुद्दे से भटकाते आए हैं।
बीते दो दशकों से आतंकवाद पर सियासी पार्टियों का ध्यान कुछ ज्यादा ही केंद्रित हो गया है। हर एक राजनैतिक दल आतंकवाद के दर्द को उभारकर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। आतंकवाद के सफाए की ओर इन दलों का ध्यान जरा सा भी नहीं जा रहा है। तगड़ी सुरक्षा घेरे में चलने वाले राहुल, सोनिया सहित अन्य राजनेताओं को आजाद भारत गणराज्य के ‘असुरक्षित‘ आम आदमी का दर्द महसूस नहीं हो पाता है। देश में अराजकता इस कदर फैल गई है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रामीण स्तर से लेकर केंद्रीय स्तर तक हर एक सरकार की नुमाईंदगी करने वाला हर एक बंदा अपनी जेब भरने में लगा हुआ है।
नब्बे के दशक के आरंभ के साथ ही देश में बढ़े आतंकी हमलों के बाद कमोबेश हर राजनैतिक दल ने इस पर बयानबाजी करना ही मुनासिब समझा है। कितनी शर्म की बात है कि लगभग दो दशकों से आतंकवाद हमारे देश में फल फूल रहा है, और हमारे देश के नीति निर्धारक महज कोरी बयानबाजी कर जनता को गुमराह करने से नहीं चूक रहे हैं। इसके पहले कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में पराजय का मुंह देखने वाले शिवराज पाटिल को गृह मंत्रालय जैसा संवेदनशील और महात्वपूर्ण मंत्रालय सौंपकर पहले ही अपनी कमजोरी जाहिर कर दी थी। कांग्रेस शायद भूल गई कि देश के गृह मंत्री के पद पर लौह पुरूष माने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी हस्ती को भी कांग्रेस ने ही बिठाया था, जिनकी नैतिकता, कार्यप्रणाली और देशप्रेम के ज़ज़्बे को आज भी लोग सलाम करते हैं। पाटिल के बाद इस आसनी को चिदम्बरम को सौंपा गया। चिदम्बरम के कार्यकाल में यह मुंबई पर यह पहला आंतकी हमला है, किन्तु नक्सली हमलों में न जाने कितने लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
मंबई के इस और पिछले आतंकी हमलों पर भाजपा द्वारा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेकर हाय तौबा मचाई जा रही है। सरकार से त्यागपत्र की मांग की जा रही है। पर भाजपा शायद यह भूल जाती है कि इसके पहले अटल इरादों वाले अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के गृहमंत्री रहे लाल कृष्ण आड़वाणी के कार्यकाल में खौफ का पर्याय बन चुके आतंकवादियों को सरकार ने अपने ही जहाजांे में ले जाकर कंधार में छोड़ा था। तब कहां गई थी इन नेताओं की नैतिकता?
इतना ही नहीं राजग के पीएम इन वेटिंग के गृह मंत्री के कार्यकाल में ही देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद पर आतंकवादी हमला हुआ, अक्षरधाम के रास्ते रघुनाथ मंदिर और अमरनाथ यात्रा के दौरान न जाने कितने निरीह लोगों को भूना गया। क्या देश के नेताओं की याददाश्त इतनी कमजोर हो गई है कि चंद साल पहले घटी घटनाओं को भी याद रखने में उन्हें परेशानी होने लगी है।
उधर दूसरी ओर सत्ता की चाभी संभालने वाली कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी का कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कहा गया यह कथन वास्तविक कम चुनावी ज्यादा लगता है कि सरकार आतंकी हमलों के बाद मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती है। सोनिया गांधी यह भूल जाती हैं कि देश में आधी सदी से ज्यादा राज उन्हीं की कांग्रेस पार्टी ने किया है, और पिछले सवा सात सालों से देश में उन्हीं की पार्टी की सल्तनत है।
अब जबकि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव हो गए हैं, और कुछ में होने बाकी हैं के साथ ही साथ लोकसभा चुनाव की पदचाप भी सुनाई देने लगी है तब कांग्रेस अध्यक्ष की तंद्रा टूटती प्रतीत हो रही है। अब उन्हें आम आदमी (मतदाता़ की याद सताने लगी है। वे कहने लगीं हैं कि हाथ पर हाथ धरे रह कर हम अपने उपर हमला होने नहीं दे सकते हैं।
वैसे सोनिया गांधी ने परोक्ष रूप से अपनी ही सरकार पर निशाना साधते हुए यह तक कह डाला कि जनता को चाहिए पक्के इरादों वाली सरकार। सोनिया गांधी के रणनीतिकार उन्हें यह बताना भूल गए कि संप्रग के कार्यकाल में हुए आतंकी हमलों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उधर महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की ही सरकार है।
हमारी व्यक्तिगत राय में आतंकवाद के खिलाफ कठोर कदम न उठा पाने में सक्षम देश के राजनेताओं पर इसके लिए आपराधिक अनदेखी के मुकदमे दायर किए जाने चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के हाथों में दप्ती पर लिखी इबारत का जिकर यहां लाज़िमी होगा जिसमें उल्लेख किया गया था कि ‘‘हिन्दुस्तान को ज़ेड प्लस सुरक्षा कब मुहैया हो सकेगी?‘‘
यहां गौरतलब होगा कि यूपीए के शासनकाल में कुल दस हजार से अधिक बेकसूरों को जान से हाथ धोना पड़ा था, 2009 के साल में ही देश भर में हुए 11 आतंकी हमलों में 340 से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई। अगर कांग्रेस नैतिकता की बात करती है तो उस वक्त कांग्रेस की नैतिकता कहां थी, जब बेकसूर दम तोड़ रहे थे। कहा जा रहा है कि मुंबई में हुए बम हादसों की इबारत फरवरी में लिखी गई थी। भटकल बंधुओं की फोन वार्ता में ये तथ्य उभरकर सामने आए हैं।
इन धमाकों में लोगों से वसूले गए रंगदारी टेक्स का भी उपयोग किया गया है। इस खुलासे से बाबा रामदेव के उन आरोपों को भी बल मिलता है कि विदेशों में जमा काला धन आतंकियों के लिए संजीवनी का काम करता है। उधर इस पूरे मामले से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर ‘हिन्दु आतंकवाद‘ का मुद्दा उछाल दिया है। राजा का कहना है कि इसमें हिन्दु आतंकवादियों का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि जब आतंकवाद का कोई धर्म, मजहब, जात पात नहीं होती फिर इसे हिन्दु या किसी अन्य धर्म से जोड़ने का तात्पर्य समझ से परे है। कांग्रेस के संकटमोचक हैं राजा दिग्विजय सिंह। राजा सदा ही प्रतिकूल परिस्थितियों मंे अनाप शनाप बयानबाजी से सभी का ध्यान मुख्य मुद्दे से भटका कर अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होते हैं और मुद्दा लोगों की स्मृति से विस्मृत ही हो जाता है।
9/11 हमले के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका ने अपनी आंतरिक सुरक्षा इतनी तगड़ी कर दी कि वहां परिंदा भी पर मार नहीं सकता। इससे उलट भारत गणराज्य के नीतिनिर्धारिकों ने कथित तौर पर ‘सहिष्णू‘ का लबादा ओढ़ कर अपने ‘नपुंसक‘ होने की बात को छिपाने का घिनौना प्रयास किया है। अमेरिका में सभी को एक आंख से ही देखा जाता है। वहां विदेशी प्रवेश के नियम बहुत ही सख्त हैं। चाहे राजा हो या रंक सभी को एक ही नजर से देखकर तलाशी ली जाती है। इससे उलट भारत में 2008 के आतंकवादी हमले के बाद कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बन पाई है। विडम्बना है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ‘‘गठबंधन धर्म‘‘ निभाने के चलते अपनी बेबसी का इजहार करने से नहीं चूकते। क्या उनके पास इस बात का उत्तर है कि उनके लिए बड़ा कौन है -‘‘गठबंधन धर्म‘‘ या राष्ट्र धर्म‘‘?