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बुधवार, 7 मार्च 2012

फ्यूज हो गई कनफ्यूज भाजपा


फ्यूज हो गई कनफ्यूज भाजपा



(समीर चौंगावकर)

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस कमतर हुई है तो भाजपा की स्थिति कमतर से भी ज्यादा बदतर हो गई है. कभी भाजपा का गढ़ रहे उत्तर प्रदेश में ही अपनी लाज बचाने में कामयाब नहीं हो पाई और जितनी सीटें थीं उसमें से भी पांच सीटें गंवा दी. पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने वैसे तो प्लान किया था कि जितनी सीटें हैं उससे दोगुनी पर जाएंगे लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता ने न सिर्फ नितिन गडकरी को गर्त में डाल दिया बल्कि प्रदेश में पूरी भाजपा का ही लगभग सफाया हो गया है.
उत्तर प्रदेश में इस बार का विधानसभा चुनाव भाजपा के कई नेताओं और खुद पार्टी अध्यक्ष के लिए प्राथमिक परीक्षण बन गया था. नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति बेहतर करने के लिए सारे साधन और संसाधन झोंक दिये थे. नागपुर से दिल्ली होते हुए लखनऊ तक नितिन गडकरी ने कहीं कोई कमी नहीं रहने दी थी. लेकिन जब चुनाव परिणाम सामने आये तो पता चला कि नितिन गडकरी की सारी कवायद को जनता ने कोई तवज्जो नहीं दिया.
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बेहद चौंकानेवाला है. लेकिन केवल भाजपा ही नहीं चौंक रही है. भाजपा का वैचारिक आका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो भौचक्का रह गया है. पिछले पांच बार से जो अयोध्या भाजपा की परंपरागत सीट बन गई थी इस बार वह सीट भी हाथ से जाती रही. अयोध्या में हार को भाजपा गंभीरता से ले न लेलेकिन संघ ने बहुत गंभीरता से लिया है. अयोध्या में समाजवादी पार्टी के तेज नारायण पांडेय विजयी हुए हैं. इस सीट पर हार के बाद से ही नागपुर के महाल में सन्नाटा पसरा हुआ है. बताया जा रहा है कि संघ प्रमुख तक को सदमा लगा है. इसका कारण एक तो अयोध्या से भाजपा और संघ का भावनात्मक लगाव है तो दूसरा बड़ा कारण यह है कि अयोध्या की कुल आबादी में एक तिहाई स्वयंसेवक हैं. कॉडर की इतनी बड़ी संख्या के रहते अगर भाजपा अपनी अयोध्या को नहीं बचा पाई तो उसका लंकादहन होने से कौन रोक सकता है?
लेकिन अयोध्या के जाने का सदमा ही नहीं है. पथरदेवा से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही अपनी सीट नहीं बचा पाये तो इलाहाबाद से एक और वरिष्ठ नेता केशरीनाथ त्रिपाठी भी पटखनी खाकर औंधे गिरे पड़े हैं. गाजियाबाद से सांसद राजनाथ सिंह ने पूरे प्रदेश में जमकर दौरा किया था और जितनी सभाएं राजनाथ सिंह ने की थी उतनी शायद किसी और भाजपा नेता नहीं की. लेकिन तमाशा देखिए कि राजनाथ सिंह की गाजियाबाद सीट की वह सीट भी हाथ से जाती रही जिसकी बदौलत राजनाथ सिंह को लोकसभा चुनाव में जीत हासिल हुई थी. गाजियाबाद की साहिबाबाद सीट से सुनील शर्मा हार गये और लोनी में भी राजनाथ का लठैत लाठी नहीं भांज पाया. हांलालजी टंडन अपने बेटे गोपाल टंडन को चुनाव जितवाने में कामयाब नहीं हो पाये. इन हारते परिदृश्यों के बीच अगर कोई लाज बचाकर बाहर निकल आया है तो वे हैं कलराज मिश्र और उमा भारती जो कि लखऩऊ सिटी और चरखारी की सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं. शायद उमा भारती के होने का ही असर है कि पड़ोस की हमीरपुर सीट भी भाजपा के खाते में चली गई है.
अगर हम उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के चुनावी रणनीति का आंकलन करें तो हमें दिखता है कि पूरे प्रचार के दौरान भाजपा कन्फ्यूज दिखी. नेताओं की भीड़ ने भागदौड़ तो बहुत की लेकिन इस भागदौड़ और मंथन से वे कुछ हासिल नहीं कर पाये. नकवी जैसे नकारा नेता को प्रबंधन सौंप दिया गया जो चुनाव जीतने की रणनीति बनाने से ज्यादा अपनों पर उपकार करने में ही जुटे रहे. खुद गडकरी कहीं उमा भारती को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बताते तो कहीं कलराज मिश्र का नाम लेते. इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हुआ कि प्रदेश में भाजपा की बत्ती फ्यूज हो गई.
अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की इस करारी हार का खुद भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं पर क्या असर पड़ेगाभाजपा की इस हार की मार से न तो नितिन गडकरी बच पायेंगे और न ही संजय जोशी या उमा भारती को छुटकारा मिलेगा. भाजपा के अंदर जो योजनाएं पक रही थींउसके अनुसार अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होता तो संजय जोशी कई राज्यों के प्रभार के साथ राज्यसभा में नजर आते तो उमा भारती केन्द्र में महासचिव बन बिराजतीं. लेकिन अब ऐसा होना मुश्किल लगता है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हार की मार इन्हीं तीनों नेताओं पर ही पड़ेगी. प्रदेश के कुछ बड़े नेता मसलनराजनाथ सिंहलालजी टंडन या कलराज मिश्र को भी इस हार का खामियाजा भुगतना होगा.
उत्तर प्रदेश में भाजपा की इस हार से अगर नितिन गडकरीउमा भारती या संजय जोशी पर मार पड़ने की आशंका दिख रही है तो कुछ नेता ऐसे भी हैं जिनका कद पार्टी में ऊंचा उठेगा. इसमें सबसे पहला नाम नरेन्द्र मोदी का है. नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश नहीं गये. जो जानकारी है वह यह कि नरेन्द्र मोदी न तो चुनाव प्रबंधन से संतुष्ट थे और न ही संजय जोशी या सुधीन्द्र कुलकर्णी जैसे नेताओं की मौजूदगी से. नरेन्द्र मोदी के अलावा सुषमा स्वराजअरुण जेटली और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी राहत की सांस लेंगे जो दम साधे केवल प्रचार देख रहे थे.
उत्तर प्रदेश में हुई भाजपा की हार के बाद संघ कुछ बड़े बदलाव भी कर सकता है. आगामी 16-17-18 मार्च को संघ के पदाधिकारियों की अखिल भारतीय बैठक होनेवाली है. इस बैठक में भाजपा को ष्मजबूतष् करनेवाले कुछ ऐसे निर्णय लिये जा सकते हैं जिससे भाजपा के कुछ नेताओं पर गाज गिर सकती है. क्योंकि संघ को जितनी चिंता उत्तर प्रदेश में भाजपा के हारने की है उससे ज्यादा चिंता मुलायम सिंह यादव के जीतने की है. मौलाना मुलायम की उत्तर प्रदेश की मौजूदगी को संघ जाया नहीं जाने देगाइसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उत्तर प्रदेश की करारी शिकस्त के बाद भाजपा के कुछ बड़े नेता पस्त कर दिये जाएं.
(साई फीचर्स)

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

दरकने लगा है भाजपा का गढ़ महाकौशल प्रांत!


0 महाकौशल प्रांत का सपना . . . 15

दरकने लगा है भाजपा का गढ़ महाकौशल प्रांत!

महाकौशल को प्रथक कर शेष मध्य प्रदेश में लाभ में रह सकती है कांग्रेस



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। महाकौशल प्रांत एक समय में कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। वर्तमान में महाकौशल की 94 विधानसभाओं में भारतीय जनता पार्टी के वर्चस्व को नकारा नहीं जा सकता है। महाकौशल क्षेत्र के कांग्रेस के क्षत्रपों की अदूरदर्शी नीतियों के परिणाम स्वरूप महाकौशल में कांग्रेस के नीचे की जमीन खिसकी है। महाकौशल क्षेत्र के सिवनी जिले से मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमति उर्मिला सिंह और उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर ने इसका प्रतिनिधित्व भी किया है।
मध्यप्रदेश में तीसरी पारी का सपना देख रही भाजपा के लिए महाकौशल बेहद ही महत्वपूर्ण है। इस लिहाज से आगामी 26-27 दिसंबर को ग्वालियर में हो रही प्रदेश कार्यसमिति बैठक में इस अंचल को बचाने और यहां ताकत बघने की रणनीति पर पूरा ध्यान केंद्रित होगा। भाजपा जबलपुर, सागर, रीवा और शहडोल संभाग को मिलाकर अनेक जिलों को इसमें समाहित कर महाकोशल प्रांत मानती है।
एक आंकलन के अनुसार महाकौशल प्रांत की 94 विधानसभा सीटों में भाजपा वर्तमान में 62 पर काबिज है। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा ने कार्यसमिति बैठक पूर्व जो सर्वे करावाया है और संघ प्रमुख मोहन भागवत की पिछले माह हुई बैठकों के दौरान प्रचारकों से जो फीडबैक लिया गया है, उसके मुताबिक 22 सीटों में परिस्थितियां कमल खिल पाने के अनुकूल नहीं है। ऐसी स्थिति में हार की 32 और बेड परफारमेंस वाली 22 मिलाकर 54 सीटों में भाजपा की हालत पतली है। इन सीटों पर अन्य दलों का वर्चस्व बढ़ना भाजपा के लिए खतरनाक ही साबित हो सकता है।
भाजपा महाकौशल में शुरू से सक्रिय प्रदेश संगठन महामंत्री अरविंद मेनन को पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपेगी, वहीं यहां जिन अन्य नेताओं को सक्रिय किया जाएगा उनमें चंद्रमणि त्रिपाठी, फग्गनसिंह कुलस्ते, गौरीशंकर बिसेन, राकेश सिंह, रामकृष्ण कुसमरिया, श्रीमती नीता पटेरिया, चौधरी चंद्रभान सिंह, श्रीमती पद्मा शुक्ला, भूपेन्द्र सिंह, कुंवर विजय शाह, धीरज पटेरिया, विनोद गोटिया प्रमुख हैं। प्रदेश पदाधिकारियों, नगर जिला अध्यक्षों और प्रदेश कार्यसमिति सदस्यों को खासतौर पर ग्वालियर पहुंचने के निर्देश दिए हैं।
महाकौशल का वजन यहां के आदिवासी वोटों के कारण बचा है। ये मूलतः कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करते थे, जिनमें भाजपा ने सेंध लगा दी है। वर्तमान स्थिति में जो इन्हें प्रभावित कर ले ये उसी का हो जाता है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की आदिवासी अंचलों में हुई यात्रा के बाद भाजपा का सामाजिक महाकुंभ, गोटेगांव का आदिवासी सम्मेलन, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा के लगातार दौरे, अजा का अभ्यास वर्ग ये बता रहा है कि अजा, जजा और पिछघें के मार्फद राजनीतिक दल अपनी सियासी ताकत का यहां विस्तार करना ही चाह रहे हैं।
महाकौशल प्रांत में गोडवाना गणतंत्र पार्टी का अभ्युदय कांग्रेस और भाजपा दोनों ही के लिए परेशानी का सबब बन गया था। गोंडवाना का तो विधानसभा में खाता भी खुला, किन्तु कांग्रेस भाजपा के कुशल प्रबंधन के चलते गोंडवाना के विधायक ज्यादा कुछ प्रभावी नहीं हो पाए और अंत में गोंडवाना की जड़ें उखड़ने लगीं।
यह शानदार मौका है जब गोंडवाना गणतंत्र पार्टी एक बार फिर अपना प्रभाव जमाने के लिए प्रथक महाकौशल या गोंडवाना प्रांत का मुद्दा हवा में उछाल सकती है। इसके लिए गोंगापा को जमीनी स्तर व्यापक संघर्ष की रूपरेखा तैयार करनी होगी। कांग्रेस या भाजपा को अंतरिक या ब्हाय सहयोग देने के पहले वह यह मांग रखे कि प्रथक प्रांत को विधानसभा में पारित करवाया जाए तब जाकर प्रथक प्रांत का सपना साकार हो सकता है।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

शिवराज पर होगा नस्तियां निपटाने का भार


शिवराज पर होगा नस्तियां निपटाने का भार

सीएम मंत्री नहीं रोक पाएंगें फाईलें



(नंद किशोर)

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार नस्तियों के चलन को भी लोकसेवा प्रदाय गारंटी कानून के दायरे में लाने पर विचार कर रही है। ऐसा होने पर मुख्यमंत्री व मंत्री से लेकर अफसर तक सभी के लिए समय सीमा के भीतर फाइलों को निपटाना कानूनन जरूरी हो जाएगा। ऐसा हुआ तो दफ्तरों में फाइलों के ढेर नहीं दिखेंगे। आने वाले समय में यह व्यवस्था लागू होते ही मुख्यमंत्री पर काम का बोझ इस कदर बढ़ जाएगा कि उन्हें समय सीमा में नस्तियों का निराकरण हर हाल में करना अनिवार्य हो जाएगा।

लोक सेवाओं के बेहतर क्रियान्वयन और जवाबदेही विषय पर राज्य सरकार और यूएनडीपी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित वर्कशॉप में इस बात का संकेत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह तय किया जाएगा कि कौन-सी फाइल किसके पास कितने समय तक रहनी चाहिए। अगर किसी फाइल पर मुख्यमंत्री कोई फैसला नहीं लेते हैं तो इसका नुकसान अंततः राज्य को उठाना पड़ता है।

बैठक में यह बात उभरकर सामने आई कि लोक सेवाओं के बदले लोगों से एक टोकन शुल्क लिया जाना चाहिए, ताकि इसे लेकर आम जनता गंभीर रहे और उसे अपनी भी जिम्मेदारियों का एहसास होता रहे। इस तरह के कई सुझाव लोकसेवा प्रदान करने की समूची प्रक्रिया को मजबूत करने और इसमें जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

अम्बेडकर समारक एवं विकास का खर्चा उठाने तैयार हैं शिवराज


अम्बेडकर समारक एवं विकास का खर्चा उठाने तैयार हैं शिवराज

कार्यक्रम से बनाई पर्याप्त दूरी पर दिया आश्वासन



(एडविन अमान)

नई दिल्ली,। निजी और भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों प्रदेश सरकार के उड़न खटोले पर सरकारी खर्चे पर जब तब दिल्ली की यात्रा करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संविधान रचयिता डॉ.भीमराव अम्बेडकर परिनिर्वाण भूमि सम्मान कार्यक्रम समिति के एक प्रोग्राम में शिरकत करना ही मुनासिब नहीं समझा। इस दिन मुख्यमंत्री की व्यस्तताएं मध्य प्रदेश में ही रहीं। उल्लेखनीय होगा िकि इसके स्थान पर अगर भाजपा का कोई प्रोग्राम या उनका पारिवारिक जलसा होता तो वे निश्चित तौर पर दिल्ली में उपस्थित होते।

डॉ0 अम्बेडकर परिनिर्वाण भूमि सम्मान कार्यक्रम समिति दिल्ली द्वारा गत दिवस राष्ट्रीय श्रृद्धांजलि एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इन्द्रेश गजभिये, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आयोजन समिति एवं अध्यक्ष मध्यप्रदेश राज्य सहकारी अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम ने की। भारत रत्न डॉ0 बाबा साहेब अम्बेडकर की परमपावन परिनिर्वाण भूमि पर उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर राष्ट्रीय सम्मान एवं श्रृद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। शरद यादव कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। केन्द्रीय मंत्री मुकुल वासनिक, नारायण सामी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया, सांसद जे.डी. सेलम, पर्वू सांसद श्रीमती सत्याबेन, डॉ0 उदित राज और अमरीश गौतम भी अतिथि के रूप में मौजूद थे।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश में अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त होने के कारण इस अवसर पर उपस्थिति नहीं हो सके । उनकी अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री का संदेश इन्द्रेश गजभिये द्वारा पढ़ा गया। संदेश में श्री चौहान ने कहा कि बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रेरणा और आस्था को बढ़ाते हुए प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग के सर्वांगीर्ण विकास के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने बताया कि गैर आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में डॉ0 अम्बेडकर मांगलिक भवन बनाये गये हैं।

इसी प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक समरसता के लिए अनेक योजनाएं भी बनायी गयी हैं। उन्होंने कहा कि वे महान राष्ट्रभक्त और भारत माता के सच्चे सपूत थे। उन्होंने भारतीय संविधाान की रचना की और सदियों से वंचित उपेक्षित दलित समाज को सम्मान दिलाने के लिए जीवन के अंतिम क्षण तक संघर्ष करते हुए जहां अंतिम सांस लेकर महानिर्वाण को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि सन् 2003 में एनडीए सरकार ने दिल्ली स्थित इस परिनिर्वाण स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करके तत्कालिक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसके समग्र विकास की कार्य योजना बनायी थी।

उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि आठ वर्ष के उपरान्त भी अभी तक वहां कोई निर्माण और विकास का कार्य शुरू नहीं हुआ है। श्री चौहान ने बताया कि उन्होंने केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर प्रस्ताव भेजा है कि अगर केन्द्र सरकार स्मारक स्थल को डॉ0 अम्बेडकर के विशाल व्यक्तित्व के अनुरूप निर्मित करने में असमर्थ है और केन्द्र अनुमति देगी तो मध्यप्रदेश शासन इसका समग्र विकास और निर्माण का खर्चा वहन करने को तैयार है। 

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

मिशन 2013 के तहत साईज में लाए जाएंगे मंत्री


मिशन 2013 के तहत साईज में लाए जाएंगे मंत्री

अनेक मंत्रियों पर गाज गिरना तय


(नंद किशोर)

भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब अपनी तीसरी पारी खेलने के लिए बेहद संजीदा नजर आ रहे हैं। संगठन के राष्ट्रीय नेताओं चर्चा और ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद अब उन्होंने अपने पत्ते फेंटना आरंभ कर दिया है। विधानसभा में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के उपरांत अब शिवराज चौहान अपनी टीम को कसने में लग गए हैं।

बड़बोले और खराब छवि वाले मंत्रियों को तत्काल ही बदलने का मन बना चुके शिवराज की नई टीम उज्जव और धवल छवि वाली होगी। शिवराज के करीबी सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने मन बना लिया है कि अब तक जो हुआ सो हुआ अब भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर कार्यकर्ताओं की सुनी जाए ताकि कार्यकर्ता और जनता पुरानी बातों को भूल सके।

गौरतलब है कि जनता की याददाश्त बेहद ही कम होती है। जैसे ही जनता के काम आसानी से होने लगेंगे वह पुरानी तकलीफें भूल जाएगी। यही आलक कार्यकर्ताओं का होगा। आने वाले समय में मंत्रियों द्वारा विधायकों और जनता के साथ तालमेल बनाने का प्रयास किया जाएगा। विधायकों को भी क्षेत्र की जनता की सुध लेने के निर्देश मिलने वाले हैं।

सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री बाबूलाल गौर, सहकारिता और पीएचई मंत्री गौरीशंकर बिसेन, वन मंत्री सरताज सिंह, खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल और पीडब्लूडी की कमान संभाले नागेंद्र सिंह के पर कतरे जा सकते हैं। कमल पटेल और अनूप मिश्र लाल बत्ती पाने आतुर दिख रहे हैं। संगठन की हामी के बाद उनकी बांछें भी खिल सकती हैं।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

गड़करी के लिए खतरे की घंटी है मोदी का अभ्युदय


गड़करी के लिए खतरे की घंटी है मोदी का अभ्युदय

सेकंड टर्म दिख रहा मुश्किल में गड़करी का


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में सियासत की धुरी इन दिनों राजग के पीएम इन वेटिंग से हटे एल.के.आड़वाणी, भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी और सर्वशक्तिशाली होकर उभरे नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द ही घूम रही है। तीनों के बीच आपसी मतभेद और मनभेद होने के बाद भी सियासी फिजां में कुछ अस्पष्ट तस्वीरें उभरने लगी हैं, जिनके आधार पर कहा जाने लगा है कि गड़करी को पार्श्व में ढकेलने के लिए मोदी और आड़वाणी कभी भी हाथ मिला सकते हैं।

झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय ‘केशव कुंज‘ के सूत्रों का कहना है कि संघ नेतृत्व ने नरेंद्र मोदी से अपना पुराना वेमनस्य भुला दिया और संघ के इशारे पर ही एल.के.आड़वाणी ने भी मोदी को आगे करना आरंभ कर दिया है। उधर आड़वाणी ने सदा से ही यही चाहा है कि गड़करी किसी भी कीमत पर दूसरी बार भाजपाध्यक्ष न बन पाएं। गड़करी हैं कि अपने सधे कदमों से भाजपा के अंदर अपनी पैठ बनाते जा रहे हैं। पुराने भूले बिसरे गीत (भाजपा छोड़कर गए नेताओं) बजाकर नेताओं की घर वापसी से गड़करी ने कुछ नेताओं को नाराज अवश्य किया किन्तु इससे गड़करी ने पार्टी को मजबूती प्रदान की है।

अड़वाणी जुंडाली इन दिनों गड़करी के खिलाफ ताना बाना बुनने में लग चुकी है। सूत्रों का कहना है कि संघ के संकेतों को भांपकर अब अड़वाणी की मित्र मण्डली भी इस बात को जोर शोर से प्रचारित करवा रहा है कि मोदी ही भाजपा के अगले निजाम होंगे। मोदी और आड़वाणी की युती अगर बन गई तो निश्चित तौर पर यह नितिन गड़करी के लिए खतरे की ही घंटी साबित होगी।

नरेंद्र मोदी ने अब अपनी चाल चलते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कब्जे में करना आरंभ कर दिया है। मोदी के करीबी सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखते हुए मोदी ने पार्टी आलाकमान से पूछा है कि वहां के लिए कितनी रसद (पैसा और मसल पावर) चाहिए। उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन खराब भी रहा तो यह गड़करी के खाते में जाएगा और अगर प्रदर्शन अच्छा रहा तो मैन और मसल पावर का हवाला देकर मोदी गेंद अपने पाले में ले आएंगे।

रविवार, 27 नवंबर 2011

भाजपा में स्थापित हो चुके हैं गड़करी


भाजपा में स्थापित हो चुके हैं गड़करी

महात्वाकांक्षा उजागर न कर सबको साध लिया है गड़करी ने

रिसाए नेता फिर लौटे घर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की संस्कारधानी और सूबाई राजनीति से एकाएक उठकर भाजपाध्यक्ष बनकर राष्ट्रीय परिदृश्य में उभरने वाले नितिन गड़करी को कम ही आंका जा रहा था। माना जा रहा था कि वे पार्टी में अपने समकक्ष नेताओं के सामने बौने ही साबित होंगे। महात्वाकांक्षाओं को पिंजरें में बंद कर गड़करी ने वो चाल चली कि सारे पूर्वानुमान और आंकलन ही ध्वस्त हो गए। गड़करी अब भाजपा की राजनीति में पूरी तरह स्थापित ही नजर आ रहे हैं।

गड़करी के अध्यक्ष बनने के वक्त लोगों का आश्चर्य जायज था कि आखिर महाराष्ट्र जैसे सूबे का नेतृत्व भी न करने वाले व्यक्ति को कैसे देश का अध्यक्ष बना दिया गया। दरअसल गड़करी की जडें संघ में काफी गहराई तक गई हुईं हैं। अध्यक्ष बनने के बाद गड़करी ने कोई चुनाव नहीं लड़ा और अपनी व्यक्गित महात्वाकांक्षांओं को अपने उद्देश्य के उपर हावी नहीं होने दिया।

गड़करी के करीबी सूत्रों का कहना है कि भाजपा में गुटीय राजनीति समाप्त करने के लिए उन्होंने पार्टी से विमुख होकर गए रिसाए अर्थात नाराज नेताओं की घर वापसी का अभियान चलाया। गड़करी दरअसल पार्टी में व्याप्त गुटबाजी से बुरी तरह आहत थे। जैसे ही उन्होंने संजय जोशी के पुर्नवास और उमा भारती की घर वापसी का कदम उठाया वैसे ही उनका विरोध होना आरंभ हुआ।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहते थे कि उमा भारती की घर वापसी ना हो पर पिछड़े वोट बटोरने के लिए उमा की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी। उधर गुजरात के निजाम नरेंद्र मोदी थे संजय जोशी के पुर्नवास में सबसे बड़ी बाधा। गड़करी ने दोनों ही अप्रिय फैसले लिए और आज पार्टी में सब कुछ सामान्य ही नजर आ रहा है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

छग लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को इंदौर में सरकारी आवास!


दरियादिल शिवराज मेहरबान हैं जोशी पर

छग लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को इंदौर में सरकारी आवास!

राज्य के अधिकारियों को जिलों की कमान!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय और दिल्ली में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों के बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दरियादिली इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। शिव राज में मध्य प्रदेश में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी तो दिल्ली में प्रतिनियुक्ति की मलाई चाट रहे हैं, वहीं जिलों की कमान राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों के हवाले कर शिवराज ने नई मिसाल कायम की है।

दिल्ली में पदस्थ मध्य प्रदेश काडर के प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि भले ही केंद्रीय कार्मिक विभाग इस बारे में सख्ती अपना रहा हो कि राज्यों के अफसर केंद्र या अन्य जगहों पर पांच साल से ज्यादा प्रतिनियुक्ति पर नहीं रह सकते किन्तु फिर भी आईएएस लाबी इतनी तगड़ी है कि केंद्र चाहकर भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है। कार्मिक विभाग की सख्ती महज दिखावे के लिए ही है। मध्य प्रदेश काडर के ही अनेक अधिकारी आज पांच साल की अवधि पूरी करने के बाद भी दिल्ली में ही जमे हैं।

उधर शिवराज सिंह चौहान ने सूबे में पुलिस अधीक्षक जैसे संवेदनशील पदों की कमान राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को सौंप रखी है। जिलों में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भी राज्य पुलिस सेवा के ही अधिकारी हैं, जो अपने ही काडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के अधीन काम करने में अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं। सूबे में हर जिले में दो से तीन आईएएस अधिकारी भी पदस्थ हैं, जिनमें अक्सर टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है।

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ.प्रदीप जोशी अब छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हैं। जुगाड़ के धनी डॉ.जोशी को एमपी पीएससी इंदौर मुख्यालय में बतौर अध्यक्ष सरकारी आवास मिला हुआ है। जोशी का नया मुख्यालय रायपुर है, वहां भी उन्हें सरकारी आवास की पात्रता है। जोशी ने शिवराज से इस मकान को रखने की अवधि बढ़ाने का आग्रह किया। भोले भाले शिवराज तत्काल मान गए।

अब छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप जोशी रायपुर में काम करते हुए अपना आवास वहां से लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर दूर इंदौर में बनाए रखेंगे। एमपी गर्वमेंट की दरियादिली देखिए कि उसने दूसरे प्रदेश के एक अध्यक्ष को अपने प्रदेश में सरकारी आवास रखने की पात्रता दी है वह भी 15 मई 2012 तक के लिए। डॉ.जोशी का इंदौर प्रेम और शिव का डॉ.जोशी के प्रति अनुराग देखकर लोगों की आंखें भर आई होंगीं।

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

शिव को नहीं एमपी में दिलचस्पी


शिव को नहीं एमपी में दिलचस्पी

गणतंत्र दिवस पर थर्ड ग्रेड झांकी को नकारा केंद्र ने

गुजरात और तमिलनाडू भी हैं दौड़ से बाहर

महज एक दर्जन राज्यों की झांकियां होंगी राजपथ पर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलवाने में सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान को दिलचस्पी नहीं दिख रही है। यही कारण है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाली परेड में एमपी के द्वारा थर्ड ग्रेड झांकी प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार द्वारा सैद्धांतिक तौर पर नकार दिया गया है। इस बार कुल अठ्ठाईस राज्यों ने अपनी झांकियों के प्रस्ताव भेजे थे, पहली छटनी के बाद ये महज डेढ़ दर्जन ही रह गए हैं। अगले सप्ताह होने वाली बैठक में इनकी संख्या घटकर एक दर्जन रहने की उम्मीद जतलाई जा रही है।

केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि इस बार गुजरात में नरेंद्र मोदी और तमिलनाडू में जयललिता सरकार ने तो झांकी का प्रस्ताव ही नहीं भेजा है। इस बार कुल 28 राज्यों के प्रस्ताव आए हैं। रक्षा मामलों की विशेषज्ञ समिति ने इनमें से 16 प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इस माह के दूसरे पखवाड़े में होने वाली बैठक में ये महज बारह रहने की उम्मीद जतलाई जा रही है।

सूत्रों ने कहा कि मध्य प्रदेश द्वारा बड़ी राशि खर्च कर राजा भोज की थीम पर आधारित प्रदर्शनी तैयार करवाई गई थी। भोज नगरी की यह झांकी विशेषज्ञ समिति द्वारा सिरे से खारिज कर दी गई है। मध्य प्रदेश के आवासीय आयुक्त कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि शिवराज सरकार में अफसरशाही इस कदर हावी हो चुकी है कि बिना किसी से राय लिए हुए ही एक अधिकारी विशेष ने मंहगी झांकी की तैयारी को हरी झंडी दे दी थी।

सूत्रों के अनुसार दूसरी और मध्य प्रदेश से टूटकर अलग हुए छत्तीसगढ़ ने अपना अस्तित्व बरकरार रखा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस बार आदिवासी बाहुल्य बस्तर के आदिवासी गावों के घरों को बहुत ही मोहक तरीके से उकेरा है। इस मनमोहक झांकी में झांझरी कला का प्रदर्शन बहुत ही नायाब तरीके से किया गया है। सूत्रों के अनुसार छत्तीगढ़ की यह झांकी अंतिम दौर में चयनित होने वाली एक दर्जन झांकियों में शामिल हो सकती है।

वाकई बयानवीर हैं शिवराज!


वाकई बयानवीर हैं शिवराज!

विकास के मामले में निचली पायदान पर मध्य प्रदेश

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के भाजपा उपाध्यक्ष रघुनंदन शर्मा के द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भले ही बयानवीर कहने पर पद से हाथ धोना पड़ा हो, पर दूसरे दिन का शर्मा का बयान सोलह टके सही बैठ रहा है। बकौल शर्मा उन्होंने गलत बात नहीं कही थी, बात थोड़ी तल्ख जरूर थी पर सच्चाई के साथ थी। देश का विकास सूचकांक शर्मा की बात का शत प्रतिशत समर्थन करता नजर आ रहा है।

पीएचडी चेंबर ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के एक प्रतिवेदन ने इस बात का खुलासा किया है। शिवराज सिंह चौहान का जनसंपर्क विभाग भले ही विज्ञापनों के माध्यम से मध्य प्रदेश को आत्मनिर्भर और विकसित राज्य निरूपित करे पर जमीनी सच्चाई इससे कहीं उलट है। मीडिया के माध्यम से बरास्ता विज्ञापन मध्य प्रदेश सरकार ने देश भर में अपनी पीठ थपथपाते हुए खुद को विकसित या विकासशील निरूपित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है।

इस प्रतिवेदन में शीर्ष स्थान दिल्ली ने पाया है, दिल्ली 65.15 अंक के साथ पहली, हरियाणा 53.61 के साथ दूसरी तो पंजाब 52.21 के साथ तीसरी पायदान पर है। चौथे मुकाम पर उत्तराखण्ड है जिसका विकास सूचकांक 45.19 है, तो इसके बाद नंबर आता है हिमाचल का जो 44.49 के साथ पांचवे स्थान पर है। छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार 44.13 के साथ छटवें तो जम्मू काश्मीर 42.55 के साथ सातवें स्थान पर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर आता है जो 42.54 तो उसके बाद राजस्थान 42.34 के साथ नौवें स्थान पर है। दसवें स्थान पर शिवराज सिंह चौहान हैं जिन्होंने 38.34 नंबर लिए हैं।

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

पीएम तो नहीं बन पाएंगे आड़वाणी, बिटिया की ताजपोशी ही अंतिम विकल्प

उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 12 (समापन किस्त)

पीएम तो नहीं बन पाएंगे आड़वाणी, बिटिया की ताजपोशी ही अंतिम विकल्प

पच्यासी साल का पीएम होगा अस्वीकार्य

चुनाव बाद पांच साल में नब्बे को छू जाएंगे आड़वाणी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अगले लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 में निश्चित हैं, इस समय आड़वाणी की आयु पच्यासी साल की होगी। अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो अगले चुनावों तक वे नब्बे बरस के हो जाएंगे। इस ढलती उमर के व्यक्तित्व को बतौर प्रधानमंत्री स्वीकार करने में देश की एक तिहाई युवा तरूणाई अपने आप को असहज ही महसूस करेगी। इसके अलावा अटल सरकार में बतौर गृह मंत्री आड़वाणी के खाते में कोई खास उपलब्धि न होना भी सबसे बड़ी अड़चन के बतौर सामने आ रहा है। कंधार कांड, जिन्ना भक्ति जैसे मामले भी उनके खिलाफ माहौल बना रहे हैं।

हार्डकोर हिन्दुत्व का आलिंगन कर जिन्ना भक्ति के माध्यम से अपना दूसरा चेहरा दिखाकर आड़वाणी ने अपनी विश्वसनीयता को काफी कम किया है। जिन्ना को महिमा मण्डित करते हुए आड़वाणी ने संघ में भी अपनी पकड़ को ढीला कर दिया है। पार्टी में आपेक्षाकृत युवा नेताओं ने आड़वाणी को पार्श्व में ढकेलने के पुरजोर प्रयास किए हैं। उमा भारती प्रकरण भी आड़वाणी के लिए माईनस ही रहा। इतना ही नहीं उमा भारती की वापसी और फिर उनका निष्प्रभावी होना भी भाजपा में चर्चा का विषय ही बना हुआ है।

भाजपा और संघ में चल रही चर्चाओं के अनुसार आड़वाणी को अब स्टेट्समेन की भूमिका में आ जाना चाहिए। आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि संघ और भाजपा दोनों में ही आड़वाणी की सालों साल सेवा के सम्मान के बतौर उनकी पुत्री को उनकी राजनैतिक विरासत सौंपे जाने पर आपत्ति नहीं है। इसकी सैद्धांतिक सहमति दोनों ही के नेतृत्व ने दे दी है किन्तु प्रतिभा आड़वाणी को साथ लेकर देश भर में स्थापित करने की बात संघ और भाजपा नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

मीडिया से पींगे बढ़ा रहे गड़करी!


मीडिया से पींगे बढ़ा रहे गड़करी!

अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार बदले नजर आए गड़करी

दीपावली मिलन के नाम पर मिले मीडिया से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की सूबाई राजनीति से उठकर सीधे केंद्रीय राजनीति में पदार्पण करने वाले भाजपा के निजाम नितिन गड़करी ने अब मीडिया के प्रति अपनी सोच बदलना आरंभ कर दिया है। कल तक मीडिया से दूरी बनाने वाले गड़करी दीपावली मिलन के नाम पर पत्रकारों को दिए रात्रि भोज में पत्रकारों से काफी हद तक घुले मिले नजर आए। गड़करी को उनके सलाहकार ने मशविरा दिया है कि मीडिया से दूरी बनाकर वे ज्यादा दिन नहीं चल पाएंगे।

गड़करी के सरकारी आवास 13, तीन मूर्ति लेन में पत्रकार रात्रि भोज का निमंत्रण पाकर अचरज में थे। गड़करी के बदले बर्ताव से लोग हैरान थे। गड़करी सभी से बहुत आत्मीयता से मिल रहे थे और पत्रकारों को अपनी एक खास उपलब्धि बता रहे थे कि उन्होंने अपना ग्यारह किलो वजन कम कर लिया है। पत्रकार पार्टी में बहुत संभलकर चल रहे थे, पता नहीं गड़करी के मन में क्या है।

अपना टिफिन साथ लेकर खाने के शौकीन गड़करी ने पत्रकारों के साथ पार्टी में अपने आप को खाने की टेबिल से काफी दूर ही रखा। गड़करी के मीडिया एडवाईजर्स अशोक टंडन और राजकुमार शर्मा पत्रकारों के खैर मकदम में लगे रहे। रूढ़ी पत्रकारों से घुले मिले दिखे तो दूसरी ओर निर्मला सीतारमण पत्रकारों से गप्पयाती और ठहाके लगाती दिखीं। शहला मसूद कांड में घिरे सांसद तरूण विजय जरूर किनारा पकड़ने की नाकाम कोशिशें करते दिखे।

खाने की टेबिलों से महाराष्ट्र के व्यंजनों की खुशबू चारों ओर फैल रही थी। खाने के लिए गड़करी ने नागपुर से अपने पसंदीदा स्पेशल केटरर्स को बुला भेजा था। कुछ व्यंजन काफी हद तक मिर्च के साथ तीखे थे, सो पत्रकार सीसी करते नजर आए। वहीं मधुमेह के रोगी गड़करी ने अपने आप को तो मीठे से दूर रखा किन्तु पत्रकारों को मीठा व्यंजन दिल से परोसा गया। आईस्क्रीम इतनी सख्त थी कि उसे खाने में मीडिया के लोगों को पसीना चुचा गया।

आड़वाणी को पीएम नहीं देखना चाह रहे भाजपाई


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 10

आड़वाणी को पीएम नहीं देखना चाह रहे भाजपाई

मोदी, नितीश, शिवराज पर दांव लगाना चाह रहा संघ

युवाओं में नहीं आड़वाणी का क्रेज़

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस अब आड़वाणी को साईड लाईन करने की जुगत लगाने लगा है। भाजपा का युवा वर्ग तिरासी साल के आड़वाणी को पचाने की स्थिति मे नहीं है। युवाओं के मन में उमरदराज हो चुके आड़वाणी के प्रति अनुराग नहीं उमड़ पा रहा है। हालात देखकर लगने लगा है कि भाजपा और संघ दोनों ही मिलकर लाल कृष्ण आड़वाणी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाह रहा है।

भाजपा के अंदर चल रही बयार के अनुसार भाजपा के कार्यकर्ता ही आड़वाणी और उनकी रथ यात्रा के बारे में उत्साहित नहीं है। आड़वाणी के सामने तो कार्यकर्ता यह जताते हैं कि वे उन्हें पीएम बनवाना चाहते हैं किन्तु जब इसे अमली जामा पहनाने की बात आती है तब कार्यकर्ता चुप्पी साध लेते हैं।

संघ के सूत्रों का कहना है कि मुगालते की बजाए यथार्थ में ही जीना होगा। देश का तीन चौथाई मतदाता 35 साल की उमर से कम का है। अपेक्षाकृत युवाओं को तिरासी साल के उमर दराज आड़वाणी कतई रास नहीं आ रहे हैं। इस सबके अलावा पेंतीस साल से आड़वाणी ने जो चेहरा अपनाया था वह रातों रात तो बदला नहीं जा सकता है।

आजादी के उपरांत देश में संचार क्रांति चरम पर है। आज इंटरनेट, टीवी और मोबाईल का युग है, इसमें रथ यात्रा जैसे बाबा आदम के जमाने के निष्प्रभावी अस्त्र कब तक काम करेंगे। संसद की कार्यवाही भी अब घरों घर समाचार चेनल्स के माध्यम से पहुंच रही है। इन परिस्थितियों में संसद में सरकार के सामने कथित तौर पर घुटने टेकने के बाद रथ यात्रा का ओचित्य लोगों को समझ नहीं आ पा रहा है।

(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

आड़वाणी को अब रखा जाने लगा है ‘बेचारे‘ की श्रेणी में


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 9

आड़वाणी को अब रखा जाने लगा है बेचारेकी श्रेणी में

सालों साल तपस्या और तप का नतीजा सिफर

रथ यात्रा पूरी तरह फ्लाप हो रही साबित

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सालों साल भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आंखों के तारे बने रहे राजग की पीएम इन वेटिंग से हाल ही में हटे लाल कृष्ण आड़वाणी के हाथ अब संभावित अंतिम रथ यात्रा के बाद भी कुछ खास नहीं लगने की उम्मीद जताई जा रही है। संघ द्वारा तिरासी बसंत देख चुके उमर दराज एल.के.आड़वाणी को अब विश्राम की सलाह दी गई है। प्रधानमंत्री बनने की जुंग में ढलती उमर में भी आड़वाणी रथ यात्रा की अपनी जिद पूरी करने पर अड़े हुए हैं।

एक समय था जब आड़वाणी संघ की आंखों के तारे हुआ करते थे। उनकी एक बात पर संघ उनके पीछे आ खड़ा होता था, किन्तु पिछले कुछ सालों से आड़वाणी के कदमतालों ने उन्हें संघ से काफी दूर ले जाकर खड़ा कर दिया है। अब संघ आड़वाणी से सुरक्षित दूरी बनाकर ही चल रहा है। संघ मुख्यालय नागपुर के सूत्रों का दावा है कि संघ के शीर्ष नेतृत्व ने आड़वाणी को रथ यात्रा न करने की सलाह दी थी।

लगता है कि आड़वाणी आज भी इस मुगालते में हैं कि उनकी छवि पूर्व में अटल बिहारी बाजपेयी के साथ जुगलबंदी के वक्त जैसी है। दरअसल, अटल बिहारी बाजपेयी के द्वारा सक्रिय राजनीति से सन्यास लिए जाने के उपरांत आड़वाणी शीर्ष में इकलौते नेता बचे और उनकी अघोषित हुकूमत चलने लगी। कालांतर में उनके विरोधी सक्रिय हुए और फिर आड़वाणी की लोकप्रियता का ग्राफ एक एक कर नीचे की पायदान पर खिसकने लगा।

(क्रमशः जारी)

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

भाजपा नेतृत्व नहीं है आड़वाणी के साथ


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 8

भाजपा नेतृत्व नहीं है आड़वाणी के साथ

यात्री के हाथ अब तक कुछ नहीं लगा

अड़वाणी विरोधी हो रहे तेजी से सक्रिय

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। रथ यात्री एल.के.आड़वाणी अपने रथ में अकेले ही नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उनकी रथ यात्रा से किनारा ही कर रखा है। आला कमना का प्रापर मैसेज नहीं होने के कारण रथ यात्रा को सूबों के रिसपांस नहीं मिल पा रहा है। मीडिया में वांछित पब्लिसिटी नहीं मिलने से आड़वाणी बुरी तरह खफा और आहत हैं। इस बार आड़वाणी की रथयात्रा की सफलता में संदेह ही जताया जा रहा है। रथ यात्री (आड़वाणी) के साथ भाजपा नेता बेमन से ही चलते दिख रहे हैं।

रथ में सवार भाजपा नेताओं में दबी जुबान से चर्चा है कि जब आड़वाणी और उनकी पुत्री प्रतिभा को ही अभिवादन स्वीकार करना है तो भला बाकी नेता शोभा की सुपारी क्यों बनें? अब यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि राजग के पीएम इन वेटिंग से थककर अपने आप को अलग करने वाले लाल कृष्ण आड़वाणी अपनी पुत्री को राजनैतिक विरासत सौंपने उनकी ताजपोशी के पहले यह यात्रा कर रहे हैं।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी और संघ प्रमुख को भी आड़वाणी की यात्रा समझ में नहीं आ रही है। गड़करी ने रथ यात्रा के गुजरने वाले राज्यों में भी कोई खास संदेश नहीं भेजा है जिसके चलते राज्यों में भी रथ यात्रा फीकी ही दिख रही है। इसके साथ ही साथ मीडिया मैनेजमेंट इतना घटिया है कि आड़वाणी की रथ यात्रा को वांछित कव्हरेज भी नहीं मिल पा रहा है।

उधर संघ के आला नेताओं की राय भी गड़करी से कमोबेश मिलती जुलती ही है। दिल्ली में झंडेवालान स्थित केशव कुंज के सूत्रों का कहना है कि संघ मुख्यालय नागपुर का भी मानना है कि तिरासी बसंत देख चुके आड़वाणी को अब सक्रिय राजनीति तज देना चाहिए। आड़वाणी को चाहिए कि वे अब मार्गदर्शक की भूमिका में रहें न कि खुद सारथी बनें। इतने सालों के भाजपा को दिए योगदान के बदले भाजपा और संघ उनकी विरासत उनकी पुत्री को सौंपी जाए इसमें सहमत है किन्तु प्रतिभा के महिमा मण्डन के लिए देश व्यापी दौरा किसी के गले नहीं उतर रहा है।

(क्रमशः जारी)

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

रथ यात्रा से उत्साहित हैं लालू यादव


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 7

रथ यात्रा से उत्साहित हैं लालू यादव

नितिश कुमार का राजनैतिक अंत देख रहे हैं लालू यादव

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। तिरासी बसंत पार कर चुके एल.के.आड़वाणी की रथ यात्रा से तीन लोग प्रसन्न नजर आ रहे हैं। अव्वल तो उनकी पुत्री प्रतिभा दूसरे अनंत कुमार और तीसरे हैं लालू प्रसाद यादव। लालू इसलिए प्रसन्न हैं क्योंकि बिहार के निजाम नितीश कुमार द्वारा आड़वाणी की रथ यात्रा को झंडी दिखाने से अल्प संख्यक नितीश से नाता तोड़ सकते हैं।

बिहार की सत्ता से उखाड़ फेंके गए राजद सुप्रीमो लालू यादव का शनि 2009 से भारी चल रहा है। 2009 के चुनावों में उनकी पार्टी औंधे मुंह गिरी और वे केंद्र तथा बिहार दोनों ही जगह सत्ता की मलाई चखने से वंचित रह गए। सत्ता से बाहर रहने के कारण राजग में फंडिंग का अभाव हो रहा है और लालू यादव का कुनबा टूट टूट कर बिखर रहा है।

इन दिनों लालू प्रसाद यादव के चेहरे की लालिमा एक बार फिर बढ़ती दिख रही है। लालू यादव को विश्वास है कि नितीश कुमार द्वारा जब एल.के.आड़वाणी की रथ यात्रा को झंडी दिखाई गई उसके बाद से ही मुसलमीन (मुस्लिम समुदाय) नितीश कुमार से खफा हो गया है। अब मुस्लिम समुदाय के पास बिहार में लालू प्रसाद यादव से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। गौरतलब है कि 1990 में लालू प्रसाद यादव ने ही आड़वाणी की यात्रा को रोका और गिरफ्तार किया था, जिसके परिणामस्वरूप विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार धराशाई हुई थी।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

आखिर सन्यास की घोषणा क्यों नहीं कर रहे आड़वाणी


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 6

आखिर सन्यास की घोषणा क्यों नहीं कर रहे आड़वाणी

सरकार बनी तो पीएम नहीं तो बेटी को राजपाट सोंपने की तैयारी में आड़वाणी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और लौह पुरूष का अघोषित खिताब पाने वाले लाल कृष्ण आड़वाणी के मन में प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना अभी भी कुलाचें मार रही हैं। रथ यात्रा के बहाने समूचे देश की नब्ज टटोलने निकले आड़वाणी एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं। अगर सरकार बनी तो वजीरे आजम का पद हथिया लेंगे और अगर औंधे मुंह गिरी भाजपा तब भी आड़वाणी के हाथों में लड्डू ही होगा। वे रथ यात्रा के बहाने अपनी पुत्री को राजनैतिक तौर पर स्थापित कर चुकेंगे।

भारतीय जनता पार्टी के अंदर ही अंदर एक बात खदबदा रही है कि आखिर उमर के इस पड़ाव में आड़वाणी सन्यास की घोषणा क्यों नहीं कर रहे हैं। भाजपा के अंदरखाते से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो आड़वाणी राजनीति के चतुर सुजान हैं और वे एक तीर से अनेक निशाने साधने में महारथ हासिल करते हैं।

आड़वाणी जुंडाली में चल रही चर्चाओं के अनुसार रथ यात्रा के उपरांत आड़वाणी इसका आंकलन करेंगे कि अगली बार भाजपा की सरकार बन पाएगी कि नहीं। अगर उन्हें यकीन हुआ कि सरकार राजग की बैसाखी पर खड़ी हो सकती है तो वे प्रधानमंत्री बनने की अपनी महात्वाकांक्षा को फिर दुहरा देंगे। यही कारण है कि आड़वाणी अपने राजनैतिक वनवास की आधिकारिक घोषणा करने से हिचक रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि अगर राजग की सरकार नहीं भी बनती है तो भी आड़वाणी अपनी पुत्री प्रतिभा को अपनी राजनैतिक विरासत सौंपकर प्रतिभा का राजतिलक कर देंगे। आड़वाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि आड़वाणी ने अभी यह तय नहीं किया है कि वे गुजरात के गांधी नगर की अपनी लोकसभा सीट पर 2014 में लोकसभा चुनाव खुद लड़ेंगे या फिर अपनी पुत्री को यह सीट सौंप देंगे।

(क्रमशः जारी)