शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

10 july 2009

अपराध प्रदेश बना हृदय प्रदेश!

(लिमटी खरे)

भारतवर्ष का हृदय प्रदेश कहा जाने वाला मध्य प्रदेश अब अपराधियों के लिए सुरक्षित आरामगाह और वारदातों को अंजाम देने के लिए मुफीद माहौल तैयार करता जा रहा है। पिछले एक साल के ही ग्राफ पर अगर नजर डाली जाए तो लोग दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाएंगे कि प्रदेश में इस तरह का माहौल बना हुआ है कि यहां रहने वालों के लिए अब यह सूबा सुरक्षित किसी भी दृष्टिकोण से नहीं कहा जा सकता है।
धार जिले के धरमपुरी के विधायक पांची लाल मेड़ा द्वारा मध्य प्रदेश विधानसभा में उठाए गए प्रश्न के जवाब में मध्य प्रदेश सरकार ने स्वयं ही स्वीकार किया है कि मध्य प्रदेश सूबे में हर 4 घंटों में एक हत्या ओर 3 घंटे में एक बलात्कार और बलवा, हर छ: घंटे में एक अपहरण का प्रकरण सामने आता है।
01 जुलाई 2008 से 15 जून 2009 तक की समयावधि में सूबे में 2194 हत्याएं, 2836 बलात्कार, 941 अपरहण, 2758 बलवा सहित एक लाख 97 हजार 867 संगीन अपराध घटित हुए हैं। मध्य प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी समझी जाने वाले इंदौर शहर में अपराधों की तादाद में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। इंदौर में इस समयावधि में 130 हत्याएं, तो केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में 136 मामले बलात्कार के दर्ज किए गए।
मध्य प्रदेश को वैसे तो शांत प्रदेश के तौर पर जाना जाता रहा है। पिछले कुछ सालों से राजनैतिक दूरंदेशी और वोट के गणित ने इस प्रदेश के सारे समीकरण गड़बड़ा कर रख दिए हैं। सत्ता में चाहे भाजपा काबिज हो या कांग्रेस सभी ने प्रदेश की सुरक्षा और अमन चैन के साथ समझोता कर ही सरकार को चलाया है।
नक्सलवाद की समस्या इस सूबे के बालाघाट, मण्डला और डिंडोरी जिले के लिए सरदर्द बनी हुई है। वहीं संसाधनों के अभाव के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र आदि सूबे के अपराधिक चरित्र वाले लोगों के लिए यह प्रदेश सुरक्षित आशियाना बनकर रह गया है।
कितने आश्चर्य की बात है कि लगभग तीन साल पहले तक मध्य प्रदेश में बंग्लादेशी नागरिकों की संख्या महज 11 हुआ करती थी। वस्तुत: इनकी तादाद अगर कुल आबादी की 11 फीसदी कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगा। मध्य प्रदेश में सिमी के गुर्गे आतंक बरपाने से नहीं चूक रहे हैं।
पड़ोसी राज्यों की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के अनेक जिलों में संदिग्ध चरित्र वाले लोगों की बेरोकटोक आवाजाही से प्रदेश का सोहाद्र बिगड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी भोपाल, उज्जैन, इंदौर, जबलुपर, सिवनी, छिंदवाड़ा खण्डवा, बुरहानपुर आदि जिले अतिसंवेदनशील की श्रेणी में आते हैं।
पिछले दिनों जब सिमी का नेटवर्क तेजी से फैला तब गुप्तचर एजेंसियों ने मध्य प्रदेश के पांच जिलों को संवेदनशील घोषित किया था। विडम्बना ही कही जाएगी कि शिवराज के नेतृत्व वाली सरकार ने इन जिलों की चौकसी के लिए एहतियातन कदम भी नहीं उठाए। आज अगर इन जिलों में दहशतगर्दों ने अपनी मजबूत जमीन तैयार कर ली हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि प्रदेश की सीमाओं पर बने जांच नाके (चाहे वे परिवहन विभाग के हों या पुलिस के अथवा किसी और विभाग के) महज चौथ वसूली का अड्डा बनकर रह गए हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र प्रदेश से लगे मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में बिहार की एक कुख्यात गेंग द्वारा मुंबई के एक टेक्सी चालक का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार दिया था, बाद में उन्होंने ओने पोने दामों में किराए के वाहन को भी बेच दिया।
मध्य प्रदेश पुलिस का आलम समूचे प्रदेश में यह है कि हाईवे पेट्रोलिंग, गश्त आदि के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराए वाहनों में साहब बहादुरों के परिवारजन घूमते नजर आते हैं। पुलिस अधिकारियों की सेवा टहल में ही विभाग का एक बड़ा अमला काम करता नजर आता है, फिर इन परिस्थितियों में आम आदमी के जान माल की सुरक्षा की बात कैसे सोची जाए?
माना जाता है कि जब भी मुंबई पुलिस अंडरवल्र्ड पर शिकंजा कसती है, तब अपराधिक छवि वाले लोग इंदौर या भोपाल को अपनी शरण स्थली बना लेते हैं। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में दाउद, अबू सलेम जैसे लोगों के रिश्ते गहरे रहे हैं। इतना ही नहीं इन दहशतगर्दों ने भोपाल में अपनी मिल्कियत भी बना ली है।
मध्य प्रदेश की सरकारी मशीनरी के हाल अबू सलेम और मोनिका बेदी का पासपोर्ट कहता है। अपने जमाने में चर्चित सिने अभिनेत्री रहीं मोनिका बेदी का पासपोर्ट बनाते वक्त जरूरी दस्तावेजों में मोनिका बेदी के फोटो को देखकर भी किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, होता भी कैसे, जब सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार का घुन जो लगा हो।
मध्य प्रदेश में विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी अंर्तकलह से इस कदर जूझ रही है कि उसे भी आम जनता से जुड़े इस तरह के संवेदनशील मुद्दे दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। कांग्रेस की चुप्पी से जनता को लगने लगा है कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। जनता जान चुकी है कि राजनेतिक दलों के सामने प्रलाप करने से कोई हल निकलने वाला नहीं।
मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान को चाहिए कि अमन का टापू कहलाने वाला देश का हृदय प्रदेश जो कि अपराधियों के लिए चारागाह साबित हो रहा है, पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करवाकर उसे अमली जामा पहनाएं वरना कहीं देर न हो जाए और बिहार की श्रेणी में मध्य प्रदेश स्थान न पा ले।

--------------------------

घर के लड़का गोही चूंसे, मामा खाएं अमावट
0 मध्य प्रदेश में अंधेरा कर रोशन हो रही है दिल्ली
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में भले ही ग्रामीण अंचलों में 18 घंटे बिजली की कटौती हो रही हो, पर मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली को निबाZध रूप से बिजली की आपूर्ति की जा रही है।
दिल्ली सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कुशल प्रशासक और अपने दमखम पर तीसरी बार सत्तारूढ हुईं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की फटकार और क्लोज मानिटरिंग का असर अब साफ तौर पर दिखाई पड़ने लगा है। बारिश के न होने से उपजी गर्मी की समस्या से दिल्लीवासियों को निजात दिलाने के लिए बिजली कंपनियां मंहगी दरों पर बिजली खरीदकर दिल्लीवासियों को प्रदाय कर रहीं हैं।
सूत्र बताते हैं कि बीते बुधवार और गुरूवार को दिल्ली में बिजली संकट से निजात दिलाने के लिए कंपनियों ने मध्य प्रदेश और राजस्थान से बिजली खरीदी वह भी मंहगी दरों पर। मानसून की बेरूखी के चलते दिल्ली सरकार बिजली संकट की जद में खड़ा हो गया है।
उधर मध्य प्रदेश में जहां जिला मुख्यालयों में पांच घंटे बिजली कटोती जारी है, द्वारा दिल्ली सरकार को बिजली बेचने का कारण समझ से परे है। बुंदेलखण्ड की मशहूर कहावत ``घर (मध्य प्रदेश) के लड़का गोंही (आम की गुठली) चूसें, मामा (दिल्ली वाले) खाएं अमावट (आम के गूदे से बनने वाला एक खाद्य पदार्थ) को मध्य प्रदेश की शिव सरकार चरितार्थ करने पर तुली हुई है।
उधर विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी भाजपा के इस कदम में मौन स्वीकृति प्रदान किए हुए है। लगता है कि अगले विधान सभा में अभी साढ़े चार साल बाकी हैं इसलिए कांग्रेस चुप्पी साधे बैठी है, किन्तु कांग्रेस यह भूल रही है कि स्थानीय निकाय, पंचायत चुनाव इसी साल के अंत और अगले साल होने हैं। कांग्रेस की यह चुप्पी कांग्रेस को भारी पड़ सकती है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

09 july 2009

उत्तर दक्षिण गलियारे में पर्यावरण का पेंच

(लिमटी खरे)

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार की महात्वाकांक्षी स्विर्णम चतुभुZज और उत्तर दक्षिण, पूर्व पश्चिम गलियारे में वर्तमान केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश ने फच्चर फंसा दिया है। रमेश के तेवर देखकर लगता है कि मध्य प्रदेश से नागपुर के बीच बनने वाले फोरलेन का काम बीच में ही रोकना पड़ेगा।पिछले दिनों एक साक्षात्कार में रमेश ने साफ किया है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं की स्वीकृति उनका मंत्रालय कतई नहीं देगा। जयराम रमेश ने साफ तौर पर उत्तर दक्षिण गलियारे का उल्लेख कर कहा कि उत्तर दक्षिण गलियारा पेंच और कान्हा टाईगर रिजर्व से होकर गुजर रहा है, और वे इसे यहां से गुजरने नहीं देंगे।वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने बड़ी ही साफगोई से यह बात कह दी है कि अरूणाचल प्रदेश में प्रधानमंत्री से जिस परियोजना का उद्घाटन करवाया गया है, उसे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी ही नहीं मिली है। मतलब साफ है कि देश के वजीरे आला को ही धोखे में रखकर सरकारी मशीनरी देश में पर्यावरण के खात्मे पर तुली हुई है।बहरहाल उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश की दक्षिणी सीमा में अवस्थित पेंच नेशनल पार्क का 12 किलोमीटर लंबा रास्ता आता है। पूर्व में यह देश का सबसे लंबा और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का हिस्सा हुआ करता था। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के लखनादौन से उत्तरी पश्चिमी दिशा में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 26 (झांसी से लखनादौन) को उत्तर दक्षिण गलियारे में समाहित कर दिया गया है। इसके बाद रारा 7 के लखनादौन से नागपुर सीमा वाले हिस्से को भी इससे अलग कर इसे गलियारे में शामिल करवा दिया गया है।सवाल यह उठता है कि जब इस परियोजना को तैयार करवाया जा रहा था, तब इस तकनीकि बारीकी को तत्कालीन मंत्रियों के साथ ही साथ नौकरशाहों ने क्यों नजर अंदाज किया। पर्यावरण की दुहाई देकर सड़क या अन्य परियोजनाओं के काम रूकवाने की बात करने वाले जयराम रमेश के अंदर क्या इतना माद्दा है कि वे इसके विस्तृत प्रक्कलन (डीपीआर) को तैयार करवाने वाले से लेकर इसे अनुमति देने वाले तक सरकारी नुमाईंदे के खिलाफ ``जनता से बटोरे गए सरकारी धन के आपराधिक दुरूपयोग`` का मामला चला पाएंगे?कहने को तो जयराम रमेश ने कह दिया कि राजनैतिक दबाव से हटकर हमें पर्यावरण बचाने के लिए ना कहना सीखना होगा। ठीक है पर्यावरण को बचाना हमारी पहली प्राथमिकता है, किन्तु जनता के खून पसीने की कमाई जो करों के रूप में केंद्र और राज्य सरकारों के खजाने में जाती है, के अपव्यय को हम यूं ही देखते और सहते रहें!लगता है वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मातहतों ने उत्तर दक्षिण गलियारे की जमीनी हकीकत समझी ही नहीं है। इसका लगभग 12 किलोमीटर का हिस्सा पेंच टाईगर रिजर्व के बीच से होकर गुजरता है। इसके अलावा पेंच और कान्हा को जोड़ने वाले गलियारे का काम अभी आरंभ नहीं हुआ है। वास्तविकता यह है कि उत्तर दक्षिण गलियारे का एक इंच भी हिस्सा वर्तमान में कान्हा टाईगर रिजर्व की जद में नहीं है।इसके अलावा पेंच नेशनल पार्क के अस्तित्व में आने से दशकों पहले से यही 12 किलोमीटर का हिस्सा वह है, जिस पर से सालों से हल्के और भारी वाहन गुजर रहे हैं, क्योंकि कल तक यह राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का हिस्सा था। क्या पर्यावारण की दुहाई देकर जयराम रमेश उत्तर दक्षिण को मिलाने वाली इस जीवनरेखा को बंद करवा देंगे? अगर एसा हुआ तो उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ने वाली इस प्रमुख सड़क के बजाए वाहनों को घूमकर लंबी दूरी तय करना होगा।कुछ लोगों को अंदेशा है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री इस गलियारे को अपने संसदीय क्षेत्र से ले जाना चाहते हैं, इसलिए इस तरह की कवायद की जा रही है। हमारी नजरों में यह सही नहीं है। िंछंदवाड़ा से सौंसर तक के सड़क मार्ग में भी खुटामा और बिछुआ के जंगलों के इर्दगिर्द पेंच का कुछ हिस्सा पड़ता है, जिस पर भी रमेंश का फच्चर फंस ही जाएगा।जयराम रमेश की हुंकार से अब लगता है कि छिंदवाड़ा से बरास्ता सिवनी, मण्डला फोर्ट जाने वाली नेरो गेज रेल लाईन के अमान परिवर्तन के मार्ग भी प्रशस्त नहीं हो सकेंंगे, क्योंकि इसका भी कुछ हिस्सा कान्हा टाईगर रिजर्व की जद में है। गौरतलब होगा कि हाल ही में रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इस नेरो गेज के अमान परिवर्तन की घोषणा बजट में कर दी है।भले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री पर्यावरण की दुहाई देकर उत्तर दक्षिण गलियारे में पेंच और कान्हा टाईगर रिजर्व की कील ठोंकना चाह रहे हों, किन्तु उनकी बातें व्यवहारिक कहीं से भी नहीं लगती हैं। जिस मार्ग से सालों से यातायात की आवाजाही हो रही हो, उसे भले ही चौड़ा न किया जाए किन्तु उसे बंद करना तो कहीं से भी तर्क संगत नहीं लगता है।अब जबकि पेंच टाईगर रिजर्व के लगभग 12 किलोमीटर को छोड़कर उत्तर की ओर का फोरलेन का काम लगभग पूरा हो गया हो तब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री का इस तरह को हम वक्तव्य गैरजिम्मेदाराना मानते हैं। बेहतर होगा जयराम रमेश एक बार इस परियोजना की वस्तुस्थिति का अध्ययन बारीकी से करें उसके बाद ही कोई वक्तव्य दें वरना क्षेत्र में उनके वक्तव्य से कोहराम ही मचा हुआ है।


राहुल के एजेंडे से मध्य प्रदेश बाहर

युवराज की प्राथमिकता यूपी, टीएन और गुजरात

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने अपनी प्राथमिकताएं बदलनी आरंभ कर दी हैं। कल तक मध्य प्रदेश उनकी प्राथमिकता में था, किन्तु अब लगता है उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू और गुजरात उनकी प्राथमिकता में आ गया है। इन सूबों में वे कांग्रेस को मजबूती देने की जुगत लगाने वाले हैं।संसद भवन में पत्रकारों से रूबरू राहुल गांधी ने कहा कि संगठनात्मक दृष्टि से उत्तर प्रदेश को पांच भागों में बांटा जाएगा, ताकि संगठन को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सके। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में माया मेम साहिब और गुजरात में हिन्दुत्व के पुरोधा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की काट के लिए जल्उद ही राहुल गांधी अपनी टीम बनाने वाले हैं।बकौल कांग्रेस के अघोषित युवराज राहुल गांधी, `` पंजाब और पांडिचेरी में युवक कांग्रेस और राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के चुनाव सफलता पूर्वक कराने के बाद कांग्रेसियों में उत्साह है, और जल्द ही यूपी, टीएन और गुजरात में इस फामूZले को अपनाया जाएगा।राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में चूंकि राहुल गांधी का संसदीय क्षेत्र भी आता है, अत: प्राथमिकताओं की फेहरिस्त में यूपी को सबसे उपर स्थान मिला हुआ है। सूत्रों ने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश में मायावती पर लगाम लगाने के लिए यहां के लाट साहेब (राज्यपाल) की तलाश जारी है। वर्तमान राज्यपाल टी.वी राजेश्वर का कार्यकाल मंगलवार को पूरा हो गया है।सूत्रों ने कहा कि राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू दििग्वजय सिंह ने उन्हें मशविरा दिया है कि यूपी के लाटसाहेब की कुर्सी पर एसी शिक्सयत को बिठाया जाए जो परोक्ष रूप से सूबे में कांग्रेस का जनाधार बढ़ाने का काम कर सके। यूपी के लिए जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें शिवराज पाटिल, बलराम जाखड़, नारायण दत्त तिवारी, के अलावा अजुZन सिंह का नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहा है।सूत्रों ने यह भी बताया कि कुंवर अजुZन सिंह के बाद कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले राजा दििग्वजय सिंह ने एक और पांसा फेंककर राहुल गांधी को यह समझा दिया है कि उत्तर प्रदेश में मायावती को टक्कर देने के लिए नारायण दत्त तिवारी या फिर अजुZन सिंह जैसे घाघ नेता ही चाहिए। वैसे भी उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ही रहे हैं। राहुल गांधी भी दििग्वजय सिंह की इस बात से सैद्धांतिक तौर पर सहमत बताए जाते हैं।

बुधवार, 8 जुलाई 2009

राहुल के मार्ग प्रशस्त करता प्रणव दा का बजट

(लिमटी खरे)

राहुल के नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ा हुआ है, यह गांधी शब्द उनकी सोच को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के और करीब ले जा रहा है। पहले लगता था, कि राहुल गांधी देश की नब्ज को समझ नहीं सके हैं, किन्तु अब लगने लगा है कि उनके अघोषित राजनैतिक गुरू दििग्वजय सिंह के राजनीति के ककहरे ने उन्हें सब सिखा दिया है।देखा जाए तो यूपीए सरकार का यह बजट सरकार के उदारवादी आर्थिक एजेंडे की नहीं वरन राहुल गांधी की सोच का परिचायक अधिक है। परोक्ष रूप से राहुल गांधी ने महात्मा गांधी की सोच को अंगीकार किया है। गांव में बसने वाले देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ को असल भारत मानते थे बापू, और उसकी सोच और उसके हितों को साधने की बात सदैव बापू किया करते थे।राहुल गांधी ने भी गांव गांव नापा है। विपक्ष ने इसे पालीटिकल ड्रामा करार दिया, किन्तु राहुल विचलित हुए बिना ध्येय की ओर बढ़ रहे हैं। हालिया बजट में राहुल की छाप साफ दिखाई पड़ती है कि सरकार को दलाल स्ट्रीट और शेयर बाजार से कहीं अधिक गांव के आम आदमी आम भारतीय की ज्यादा चिंता करनी चाहिए।वैसे भी पार्टी के अंदरखाने में चल रही चर्चाओं के अनुसार राहुल गांधी का मानना है कि भाजपा ने सदा ही शेयर बाजार की सबसे ज्यादा चिंता की है। इससे उलट राहुल गांधी ने आम हिन्दुस्तानी को सक्षम बनाने की ठानी है। यही कारण है कि भाजपा के शाईनिंग इंडिया के स्थान पर कांग्रेस ने बुंलंद भारत का खालिस हिन्दी नारा अपनाया है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मुखिया भले ही नेहरू गांधी परिवार से इतर डॉ.एम.एम.सिंह हों पर कदमताल देखकर लगने लगा है कि आने वाले दो ढ़ाई सालों में ही कांग्रेस के युवराज राज्याभिषेक के लिए तैयार हो जाएंगे।प्रणव मुखर्जी ने अंतरिम बजट पेश किया है। कांग्रेस अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपा रही है, कांग्रेस भूल रही है कि गांव की ओर के नारे के साथ उसने गांव के आम आदमी को राहत देने की असफल कोशिश ही की है। आम आदमी की दाल रोटी आज भी उसकी पहुंच से कोसों दूर ही नजर आ रही है।वैसे गांवों और शहरों की आधारभूत संरचना के लिए इतना अधिक निवेश पहली बार किया गया है, यह सुखद बात कही जा सकती है। प्रणव मुखर्जी के साथ ही साथ पीएम और सोनिया एवं राहुल भी जानते हैं कि सरकारी अंटी (खजाने) से निकलने वाले धन का कितना और कहां कैसे उपयोग होता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि सरकारी खजाने से निकलने वाले एक एक रूपए का सदुपयोग हो।आजादी के बाद यह पहला बजट होगा जबकि प्रस्तावित व्यय का आंकड़ा दस हजार करोड़ रूपए को पार कर गया है, आजाद भारत का पहला बजट मात्र 193 करोड़ रूपयों का पेश किया गया था। इसमें से सत्तर फीसदी से अधिक का हिस्सा गैर योजनागत मद में व्यय किया जाएगा, जो कि निश्चित तौर पर चिंताजनक पहलू ही कहा जाएगा। वैसे भी योजनागत मद के आवंटन का साठ से अस्सी फीसदी हिस्सा कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढ़ जाया करता है।घुसपैठ रोकने के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता प्रशंसनीय है किन्तु सरकार को चाहिए कि वह अपने गेंहूं चावल के वादे को अमली जामा पहनाने के लिए उचित प्रबंध सुनिश्चित करे। सरकार ने 3 रूपए की दर से 25 किलो गेंहूं या चावल देने का वादा किया था। घुन लगी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के चलते सरकार की मंशा पूरी हो इसमें संदेह ही लग रहा है।वहीं दूसरी ओर सरकार ने किसानों को छ: फीसदी की दर से कर्ज मुहैया कराने की मंशा व्यक्त की है। इसके पहले कर्जमाफी के हाल किसी से छिपे नहीं हैं। मध्य प्रदेश में ही कर्ज माफी में भारतीय जनता पार्टी के नुमाईंदों ने अपनी मोटर सायकल, जीप आदि के कर्ज माफ करवाकर लगभग सत्तर अस्सी करोड़ की चपत लगा दी है।संप्रग सहयोगी लालू प्रसाद यादव की चिंता बेमानी नहीं कही जा सकती है कि सरकार ने कोसी के कहर की बिल्कुल परवाह नहीं की है। हर साल आतंक बरपाने वाली कोसी नदी से प्रभावितों के लिए बजट मे किसी तरह का जिकर न किया जाना प्रणव दा की असंवेदनशीलता दर्शाता है।कुल मिलाकर कांग्रेस के मैनेजरों ने बंगाल के सुपरस्टार कहे जाने वाले प्रणव मुखर्जी (दादा) और सुश्री ममता बेनर्जी (दीदी) को साधकर कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के 7 रेसकोर्स रोड़ (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री के सरकारी आवास) पहुंचने के सारे मार्ग प्रशस्त करने आरंभ कर दिए हैं।


कमल नाथ ने दिखाए फिर तीखे तेवर

राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम में गति लाने को कहा

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने विभागीय अधिकारियों की मुश्कें कसना आरंभ कर दिया है। कमल नाथ के तीखे तेवरों को देखकर विभागीय अधिकारी सकते में हैं। पिछली बार टी.बालू के कार्यकाल में मदमस्त हाथी की चाल चलने वाले अधिकारी अब बगलें झांकते नजर आ रहे हैं।गौरतलब होगा कि कार्यभार संभालने के ठीक बाद कमल नाथ ने अधिकारियों को ताकीद कर दिया था कि उन्हें सड़कें कागज पर नहीं वरन् जमीन पर दिखनी चाहिए। उस समय अधिकारियों को लगा था, कि कमल नाथ द्वारा शुरूआत में इस तरह का रवैया अपनाया जा रहा है जो समय के साथ ही शिथिल पड़ जाएगा।वर्तमान में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के उसी तरह के कड़े रूख को देखते हुए अधिकारियों की बोलती बंद हो गई है। हाल ही में उन्होंने दिल्ली में द्वारका स्थित प्राधिकरण के मुख्यालय का दौरा किया और मुख्यालय पर कार्यरत अधिकारियों और परियोजना कार्यान्वयन इकाईयों के परियोजना निदेशकों को संबोधित किया।अपने संबोधन में श्री नाथ ने कहा कि सड़क भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास की इ±जन है। देश में अच्छे बंदरगाह और हवाई अड्डे हो सकते हैं लेकिन अच्छी सड़कों के बिना इनका पूरा उपयोग नहÈ हो सकता। केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री श्री कमलनाथ ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों से राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम में गति लाने के लिए कार्य संस्—ति में बदलाव लाने को कहा है।वैसे कभी वन एवं पर्यावरण मंत्री रहे कमल नाथ के मार्ग की सबसे बाधा के रूप में वर्तमान वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश आ सकते हैं, क्योंकि एक साक्षात्कार में रमेश ने कहा था कि पर्यावरण को बचाने के लिए न कहना सीखना होगा एवं सड़क मार्ग के गलियारों के चक्कर में वनों का नुकसान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।कायस लगाया जा रहा है कि उत्तर दक्षिण गलियारे में कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के सीमावर्ती जिले सिवनी के पेंच रिजर्व फारेस्ट में से फोर लेन को ले जाने की अनुमति वन एवं पर्यावरण मंत्रालय शायद ही दे। माना जा रहा है कि रिजर्व फारेस्ट में आने वाले 12 किलोमीटर हिस्से को (जो वर्तमान में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का हिस्सा है) जैसा है, वैसा ही रहने देकर शेष भाग को फोरलेन में तब्दील कर दिया जाएगा।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

07 july 2009

अहमद, दििग्वजय के बीच घूमती कांग्रेसी सियासत की धुरी

(लिमटी खरे)

सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस 2004 के मुकाबले कुछ स्वस्थ्य दिख रही है। पिछली बार बूढ़ी और पथराई आंखों वाली कांग्रेस के चेहरे का नूर वापस आ गया है। उसकी आंखों में रोशनी और दिल जवां होने लगा है। कल तक गठबंधन की बैसाखियों पर चलने वाली कांग्रेस अब अपने पैरों पर चल निकली है।यह सब चमत्कार कैसे हुआ! इस सबके पीछे दो ही नाम सामने आ रहे हैं। पहला कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का और दूसरा नेहरू गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी राहुल गांधी का। मगर सवाल यह उठता है कि इनको राजनैतिक मशविरा कौन दे रहा है। पाश्र्व में (बिहाईंड द कर्टिंन) कौन है?सियासत समझने वाले हैरान हैं कि दस सालों तक का राजनैतिक सन्यास (किसी भी सरकारी पद का त्याग) लेने की घोषणा और उसे अमली जामा पहनाने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दििग्वजय सिंह केंद्रीय राजनीति में सबसे ताकतवर महासचिव कैसे बने हुए हैं?इसके अलावा कल तक विसेंट जार्ज के भरोसे चलने वाला 10 जनपथ अब किसके सहारे से चल रहा है? उत्तर है अहमद पटेल। कांग्रेस अध्यक्ष के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल कभी सामने आकर पब्लिसिटी पाने वालों में से नहीं हैं। कहा जाता है कि पटेल की फितरत में चमक दमक और मीडिया से दूर रहने के साथ ही साथ सारे सूत्र अपने हाथ में रखना है।कांग्रेस के सियासी आपरेशन के सेनापति माने जाने वाले अहमद पटेल की देखरेख में ही पिछला और यह चुनाव लड़ा गया है। टिकिट बंटवारे में उन्होंने अपने करीबियों को उपकृत किया तो अपने हेवीवेट विरोधियों को नापने के लिए उन्होंने मंत्रालय बंटवारे में कैंची चलवा दी।कोई अगर राहुल और सोनिया गांधी के सबसे करीबी दस लोगों की फेहरिस्त बनाना चाहे तो एक से दसवें नंबर पर दििग्वजय सिंह और अहमद पटेल का नाम ही आएगा। इसके बाद गिनती आगे आरंभ होगी, जिसमें नया नाम जुड़ने की गुंजाईश है।दििग्वजय सिंह ने उत्तर प्रदेश में अपने बूते अकेले चुनाव लड़ने की जिद की और 21 सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दीं। यह अलहदा बात है कि यूपी में कांग्रेस की कुछ हद तक ही सही हुई पुर्नवापसी के लिए उन्होंने राहुल गांधी के सर पर ताज बंधवाकर एक परिपक्व और दूरदृष्टा राजनेता होने का परिचय दिया है।दििग्वजय सिंह जानते हैं कि आने वाला समय राहुल गांधी का ही है। अत: उन्हें राजा ने बखूबी साध रखा है। वैसे भी देश भर में यह प्रचारित है कि राजा दििग्वजय सिंह आदिकाल के गुरू द्रोणाचार्य की तरह अजुZन को धनुZविद्या सिखा रहे हैं। राजा दििग्वजय सिंह को राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू की तरह ही देखा जाता है।रही बात अहमद पटेल की तो वे सोनिया गांधी के राजनैतिक गुरू होने का सौभाग्य तो नहीं मिल सका है किन्तु अहमद पटेल की सियासत को समझना हर किसी के बस की बात नहीं। सरकार बनाने के पहले शरद पवार, ममता बनर्जी और द्रमुक को अगर किसी ने साधा था तो वह अहमद पटेल ही थे।इसके बाद सरकार के गठन के उपरांत बारी आई बजट के माध्यम से जनता को लुभाने की। सबसे पहले देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर काबिज कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार के लोक लुभावन बजट के माध्यम से देश भर में यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि अगर रियाया कांग्रेस का साथ देती है तो उस पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा।इस पूरे खेल में अजुZन सिंह के उपरांत परिदृश्य में आए मध्य प्रदेश के चाणक्य राजनेता दििग्वजय सिंह ही पर्दे के पीछे से कठपुतलियां नचाते नजर आए। राजा दििग्वजय सिंह की ही सलाह पर राहुल गांधी ने शीला दीक्षित की मुश्कें कसीं और दिल्लीवासियों को कांग्रेस का साथ देने का तोहफा दिया।इसके बाद बारी आई केंदीय बजट की। सबसे पहले त्रणमूल कांग्रेस के कब्जे वाला रेल विभाग का बजट आया। इसमें दििग्वजय सिंह और अहमद पटेल के निर्देशन में कांग्रेस का आम आदमी पर ध्यान रखने का काम किया गया। ममता का रेल बजट काफी सराहा गया।फिर प्रणव मुखर्जी के आम बजट में भी राहुल गांधी की मंशानुसार ग्रामीणों को खास तवज्जो दी गई। यह भी दूरदृष्टा राजनेता दििग्वजय सिंह की ही सोच का परिणाम था। भले ही अहमद पटेल ने सक्रिय राजनीति में अपनी आमद दर्ज न कराई हो, किन्तु राजा दििग्वजय सिंह तो मध्य प्रदेश में दस साल तक लगातार राज करते रहे हैं, अत: उन्हें बजट की बारिकियां ज्यादा पता हैं।केंद्र सरकार में भले ही राजा दििग्वजय सिंह और अहमद पटेल का रोल सामने से किसी को नजर न आ रहा हो किन्तु पाश्र्व में रहकर दोनों ही कुशल राजनेता कठपुतलियां नचाने के काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं। आने वाले समय में जब राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री की बागडोर संभालने के लिए तैयार हो जाएंगे तब अहमद पटेल के बजाए राजा दििग्वजय सिंह की तूती केंद्र में बोलती साफ नजर आ सकती है।



कब तक होते रहेंगे शिक्षा को लेकर एक्सपेरीमेंट!

(लिमटी खरे)

भारतवर्ष में आजादी के बाद से ही शिक्षा को लेकर तरह तरह के सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। देश का मानव संसाधन मंत्रालय हमेशा से ही विवादों का घर बना रहा है। पिछले दो दशकों से यह मंत्रालय इसके मंत्रियों के लिए परीक्षण का अड्डा बन गया है। पहले मुरली मनोहर जोशी पर हिन्दुत्व तो अजुZन सिंह पर सेक्यूलरिज्म को प्रश्रय देने के आरोप लगे।सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि देश की शिक्षा व्यवस्था आज भी वही है जो 1935 में लार्ड मेकाले द्वारा आरंभ की गई थी। कहा जाता है कि ``अंग्रेज चले गए, गुलामी छोड़ गए।`` आज हम आजादी के बासठ सालों में भी अपनी शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था को इजाद नहीं कर सके हैं, देश की सरकारों के लिए यह शर्म की बात है। आज भी हम लगभग दो सौ साल पुरानी अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली में ही उलझे हुए हैं।वर्तमान मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने सौ दिनी घोषणा कार्यक्रम में अनेक शिगूफे छोड़ दिए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले पांच सालों तक यह मंत्रालय अगर कोई काम भी न करे तो इन शिगूफों के बल पर यह सदा ही चर्चा में बना रह सकता है। आश्चर्य है, पूर्व मानव संसाधन मंत्री डॉ. एम.एम.जोशी और अजुZन सिंह ने अब तक अपनी जुबान बंद रखी है। इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं दी है।वैसे सिब्बल का एक कदम सराहनीय कहा जाएगा जिसमें उन्होंने कहा है कि सरकार मानसून सत्र में ही एक महत्वपूर्ण विधेयक लाने जा रही है, जिसमें बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया करवाने की व्यवस्था होगी। सिब्बल के इस कदम से देश के नौनिहाल शालाओं की ओर आकषिZत हो सकते हैं।आज जरूरत इस बात की है कि शालाओं का माहौल इस तरह का बनाया जाए कि बच्चों में शाला जाने की ललक पैदा हो सके। फुटपाथों पर, चाय पान ठेलों यहां तक कि शराब ठेकों पर कल्लन, लल्लन, पप्पू, गुड्डू की आवाजें सुनाई देती हैं। इनके अभिभावक इन्हें पापी पेट की खातिर नौकरी करने पर मजबूर करते हैं। केंद्र की मध्यान भोजन योजना के बावजूद अगर जमीनी हकीकत यह है तो फिर कपिल सिब्बल के सारे प्रयासों पर पानी फिरते देर नहीं लगेगी।दूसरी महत्वपूर्ण बात दसवीं बोर्ड को समाप्त करने वाली है। हमारा मानना है कि बेहतर होता कि इस मामले में देशव्यापी बहस चलाई जाती फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाता। कम से कम राज्यों के शिक्षा मंत्रियों से तो मशविरा कर लिया होता। केंद्र में सिब्बल बैठे हैं अंतिम निर्णय आखिर में उन्हीं के हाथ होता, किन्तु इसके सुखद और दुखद दोनों ही परिणामों से कम से कम वे आवगत तो हो जाते।वैसे दसवीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त किए जाने का असर दोनों दिशाओं में हो सकता है। जब दसवीं बोर्ड के आधार पर कोई नौकरी नहीं मिलती और न ही किसी कांपीटीटिव एक्जाम के लिए इसको योग्यता माना गया है तब इस तरह की बोर्ड का ओचित्य भला क्या है? वैसे भी पूर्व में जब पांचवी बोर्ड को समाप्त किया गया था तब कुछ राज्यों में हायतौबा हुई फिर यही स्थिति आठवीं बोर्ड के दौरान भी बनी। आज सभी ने उस व्यवस्था को अंगीकार कर लिया है।वैसे दसवीं बोर्ड समाप्त होने से इसमें असफल या कम नंबर आने पर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम से बच्चे बच सकेंगे। आज जनवरी माह के आते है दसवीं के बच्चों के साथ ही साथ उनके अभिभावकों के सर पर तनाव हावी होने लगता है। मोटी मोटी कोर्स की किताबों के बीच दिन के 24 घंटे भी कम लगने लगते हैं।वहीं इसके नकारात्मक परिणामों पर भी गौर फरमाना जरूरी है। कुछ लोगों का मानना है कि बच्चा दसवीं बोर्ड में हल्का दबाव झेलकर बारहवीं बोर्ड के लिए मानसिक तौर पर तैयार हो जाता है। आने वाले दिनों में एक ही झटके को संभालना उसके लिए संभव हो सकेगा? बारहवीं का दबाव उसकी हिम्मत तोड़ कर रख देगा।बेहतर होता कि सरकार पहली से नौंवी तक की पायदानों में शिक्षा व्यवस्था को इतना चुस्त दुरूस्त बना देती कि दसवीं बोर्ड समाप्त करने की जरूरत ही नहीं रह जाती। दसवीं बोर्ड समाप्त करना समस्या का हल नहीं है। असल समस्या पहली से नौंवी कक्षा तक की व्यवस्था दुरूस्त करने की है।प्रोफेसर यशपाल की सिफारिशें वास्तव में अद्भुत कही जा सकती हैं। उन्होंने कहा है कि देश भर में कुकरमुत्ते के मानिंद उगे निजी कालेज को मान्यता देने का सिलसिला समाप्त होना चाहिए। आज पहुंच संपन्न लोगों ने शिक्षा को पूरी तरह से व्यवसाय बना दिया है, जो निंदनीय है। जगह जगह कम योग्यता वाले गैर अनुभवी शिक्षक देश में नई पौध तैयार कर रहे हैं। जिन्हें विषय के ककहरे का ज्ञान नहीं वे उस विषय का फलसफा पढ़ा रहे हैं।यशपाल समिति ने सिफारिश दी है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय तकनीकि शिक्षा परिषद, मेडीकल कांउसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं को भंग कर देना चाहिए। सच ही है इनके रहते अगर शिक्षा के क्षेत्र में इस कदर अराजकता फैलेगी तो इनके बनाए रखने का ओचित्य ही नहीं है।वैसे यह भी कहा जा रहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश खोलने के मार्ग प्रशस्त कर रही है यूपीए सरकार। गौरतलब होगा कि पूर्व में सरकार ने चिकित्सा के क्षेत्र को निजी हाथों में देकर एक एक्सपेरीमेंट किया था, जिसका परिणाम महंगी चिकित्सा सुविधाओं के रूप में सामने आया था।



और पारदशीZ हुआ सूचना का अधिकार

(लिमटी खरे)

सूचना के अधिकार का कानून संयुक्त प्रगतिशील गठबंघन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। कल तक मनमानी करने वाले सरकारी मुलाजिमों में कम से कम कुछ तो खौफ जागा है इस कानून के आने से। हाल ही में इसी कड़ी में एक और अभिनव बात को शामिल किया गया है।सरकारी नस्तियों में इंद्राज की जाने वाली टिप्पणियों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में मानने की केंद्र सरकार की घोषणा ने एक और क्रांति ला दी है। निश्चित तौर पर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर पारदशीZ प्रशासन की दिशा में यह एक बड़ी जीत मानी जा सकती है।इस मामले को लेकर पिछले कई दिनों से सरकार और सूचना आयोग के बीच टकराव की स्थिति बन चुकी थी। दरअसल कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की वेवसाईट पर दर्शाया गया था कि किसी भी नस्ती पर की गई विभागीय टिप्पणियां सूचना के अधिकार का हिस्सा नहीं हैं, अत: इन्हें जाहिर नहीं किया जा सकता है।शिकायतों के उपरांत सूचना आयुक्त ने अनेक बार विभाग को इस दावे को विलोपित करने को कहा था। दरअसल यूपीए सरकार के द्वारा पारित इस अभिनव कानून की धारा आठ में साफ है कि सुरक्षा और गुप्तचर से जुड़े अठ्ठारह संगठनों को छोड़कर किसी भी सरकारी कार्यालय से फाईल या नोटशीट पर दर्ज टिप्पणियों को इस कानून में दर्शित आवेदन देकर प्राप्त किया जा सकता है।जब सारी हदें पार हो गईं तो सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह को कड़ा रूख अिख्तयार करते हुए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को फटकार लगाते हुए चेतावनी दी कि आयोग का आदेश न मानने पर विभाग के दो अफसरान पर भारतीय दंड संहिता की धारा 166 के तहत मुकदमा चलाया जाएगा और जिसमें एक साल तक की सजा का प्रावधान भी है।वैसे यह अकाट्य सत्य ही है कि यूपीए का यह सूचना के अधिकार का कानून प्रशासन को असहज बनाने के लिए पर्याप्त ही कहा जा सकता है। अपनी गिल्तयां छिपाने की गरज से गोपनीयता का हवाला देकर ये सरकारी मुलाजिम इस कानून की धार को बोथरा करने के प्रयास जब तब करते आए हैं।इस कानून की जद से अनेक चीजों को बाहर रखने के असफल प्रयास अनेक मर्तबा हुए हैं। केंद्र के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने भी इस बारे में कोशिशें की पर सफलता हाथ नहीं लगी। यहां तक कि उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती ने भी अपने सूबे में अनेक विभागों को इसके दायरे से बाहर रखने के प्रयास किए हैं।हमारे मतानुसार इस अभिनव सूचना के अधिकार कानून ने एक ओर आम और निरीह जनता के पैरों के नीचे की जमीन मजबूत की है तो ईमानदार अफसरान के हौसले भी बुलंद किए हैं। अमूमन मलाईदार पदों पर चिपके रहने की गरज से सरकारी कर्मचारियों द्वारा राजनैतिक दबाव और प्रशासनिक आदर के चलते फाईलों पर नियम विरूद्ध इबारतें लिख दी जातीं हैं। ईमानदार कर्मचारी अब सूचना के अधिकार की दुहाई देकर इससे बचने में कामयाब हो जाएंगे।कई स्थानों पर तो नस्तियां तक गायब होने की खबरें भी हैं। पहले विभागीय जांच के दौरान रिकार्ड रूम में आग लगना, नस्तियां चोरी हो जाना आम बात हुआ करतीं थीं। कुछ साल पहले मध्य प्रदेश में शिष्टाचार विभाग में भी करोड़ों के घपलों की नस्तियां गायब कर दी गईं थीं।वर्तमान में ही सूचना का अधिकार इतना प्रभावी है कि आम जनता द्वारा इसका प्रयोग तहेदिल से किया जा रहा है। सरकार भी इस मामले में पूरी तरह संजीदा दिख रही है। देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति ने भी हाल ही में अपने अभिभाषण में कहा है कि सूचना के अधिकार को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।देश के अनेक हिस्सों से सूचना के अधिकार के बेजा इस्तेमाल की खबरें भी आने लगी हैं। सूचना के अधिकार में जानकारी मांगना फिर ``सेटिंग`` कर अपने आवेदन को आगे न बढ़ाने के भी अनेक प्रकरण सामने आए हैं। सरकार को चाहिए कि इस पक्ष को भी ध्यान में रखते हुए सूचना के अधिकार कानून में तब्दीली करे, ताकि आम जनता के हाथ में आया यह अभिनव अस्त्र कहीं दलालों के लिए तलवार न साबित हो जाए।



नज़ीर बन गया है नरसिंहपुर का बघुवार

(लिमटी खरे)

भारत गांव में बसता है, यह बात आईने की तरह साफ है। महानगरों की चका चौंध के बावजूद भी आज महानगरीय संस्कृति के लोग अमन चैन के लिए गांव की ओर रूख कर रहे हैं। आजादी के छ: दशकों के बाद भी देश के गांव अपने अस्तित्व को तलाश रहे है, इसी बीच मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले का बघुवार गांव आर्दश गांव की श्रेणी में नजीर बनकर उभरा है।2007 में निर्मल गांव का दर्जा प्राप्त बघुवार वैसे तो नरसिंहपुर विधानसभा और जनपद पंचायत करेली का हिस्सा है, किन्तु राजनैतिक दांवपेंचों से दूर इस गांव के लोगों ने मन में विकास की भावना को कोई भी बाधा रोक नहीं सकी है। यही कारण है कि इस गांव ने प्रगति के अनेक सौपान तय किए हैं।बकौल जनसंपर्क अधिकारी रिश्म देशमुख आजादी से अब तक इस गांव में कभी भी पंचायत चुनाव नहीं करवाए गए हैं। यहां हमेशासे ही आपसी सहमति से निर्विरोध ही पंचायत चुनाव संपन्न हो गए हैं। गांव के लगभग सभी लोग शिक्षित हैं, जो अपने आप में एक मिसाल से कम नहीं है।आपराधिक मामलों में भी इस गांव ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बताते हैं कि इस गांव का एक भी मामला थाने या अदालत में पंजीबद्ध नहीं है। यहां के सारे विवाद आपसी सहमति से ही सुलझा लिए जाते हैं, थाने, कोर्ट कचहरी की अगर नौबत भी आ जाती है तो आपसी राजीनामे के अस्त्र से उसे निपटा दिया जाता है।प्रगति और विकास के प्रति यह गांव कितना जागरूक है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शासन द्वारा किसी भी मद में मंजूर अनुदान से ज्यादा राशि इस गांव के लोग जन भागीदारी से जुटा लेते हैं, यही कारण है कि इस गांव में कभी विकास के पहिए थमे नहीं है।केंद्र सरकार के समग्र स्वच्छता अभियान की शत प्रतिशत सफलता देखना हो तो कोई नरसिंहपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव का भ्रमण करे। इस गांव में हर घर में पक्का शौचालय होना ही इस अभियान की पूर्णता को दर्शान के लिए काफी कहा जा सकता है।इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से नशामुक्त क्षेत्र है। वर्तमान में सरकारें आबकारी की आय बढ़ाने के लिए तरह तरह की जुगत लगा रही है, किन्तु सरकार की इन कोशिशों का असर इस गांव पर होता नहीं दिखता। अगर कोई नशा करता पाया भी जाता है तो गांव वाले एक राय होकर उसे गांव से बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूकते।इस गांव की लोकप्रियता सुनकर पिछले दिनों मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने भी यहां जाकर असलियत जानी, और वास्तविकता से रूबरू होकर उन्होंने तो घोषणा ही कर डाली कि अगर कोई गांव निर्विरोध ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव करेगा तो उसे पांच लाख रूपए की राशि बतौर समरस पुरूस्कार दी जाएगी।सच ही है राजनीति में ``साम दाम दण्ड और भेद`` सब कुछ जायज है, किन्तु अगर किसी गांव में चुनाव के बजाए आपसी सहमति से ही काम चलाया जा सके तो आपसी सोहाद्र बनने में समय नहीं लगेगा। वहीं दूसरी ओर नशा नाश की जड़ पर भी अगर काबू पाया जा सके तो देश में सुराज आने में समय नहीं लगेगा।आर्थिक संकट का रोना रोने वाली प्रदेश और केंद्र सरकारों के लिए भी एक अच्छा उदहरण पेश किया है बघुवारा ने। इस गांव के लोग अपने खुद के गांव के लिए अपनी जेब ढीली कर साबित कर रहे हैं कि वे खुदगर्ज न होकर गांव के लिए जीना जानते हैं, वरना आज के इस युग में हर कोई खुद के लिए ही जाने पर विश्वास करने लगा है।मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस गांव के लोगों की सभी मांगों को मानकर उनका हौसला बढ़ाया है, इसके लिए शिवराज सिंह चौहान साधुवाद के पात्र हैं। साथ ही शिवराज सिंह चौहान को चाहिए कि उनके सूबे में इस तरह के गांवों की संख्या एक से बढ़कर दशक फिर सैकड़ा पार करे इस तरह का उपजाउ माहौल तैयार करें। वैसे भी जनहित एवं कल्याणकारी योजनाओं के लिए शिवराज का नाम जाना जाता है।वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश सूबे में ही अशिक्षा और अज्ञान के चलते रतलाम जिले में ढाई साल का एक बच्चा नशे में दिन रात टुन्न रहता है, और किसी को पता तक नहीं! कितने आश्चर्य की बात है कि अत्याधुनिक संचार साधनों के होते हुए यह बात आज तक प्रकाश में नहीं आ सकी है। निश्चित तौर पर यह रतलाम जिला प्रशासन, वहां के जनप्रतिनिधियों और शिवराज सरकार विशेषकर केद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया के लिए शर्म की बात है, जिनका कि यह संसदीय क्षेत्र है।केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि इस गांव को प्रदेश और राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकाए ताकि देश के अन्य ग्रामों के लिए नज़ीर बन चुके बघुवारा से लोग प्रेरणा लेकर आपसी भाईचारे और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और अनुपालन को पूरी तरह सुनिश्चित कर सकें।

शुक्रवार, 26 जून 2009

रूपहले पर्दे के स्याह धब्बे

(लिमटी खरे)

हालीवुड का नाम जेहन में आते ही विश्व के सबसे शक्तिशाली सिनेमा के संसार का चित्र जीवंत हो जाता है। हर कोई हालीवुड में जाकर एक बार परफारमेंस दिखाने को आतुर दिखता है। वहीं दूसरी ओर हिन्दुस्तान के वालीवुड में काम करना हर भारतीय का सपना ही है।वालीवुड का क्रेज सत्तर के दशक के पहले उतना अधिक नहीं था, इसका कारण भारत की पुरातन संस्कृति का जिंदा होना था। तब मायानगरी लोगों के लिए आकर्षण और जिज्ञासा का विषय हुआ करता था। अस्सी के दशक के आरंभ में जैसे ही एशियाड के दौरान 1982 में रंगीन टेलीविजन ने भारत में पदार्पण किया और उसके बाद एक के बाद एक वर्जनाएं टूटती ही चली गईं। उसके बाद हिन्दुस्तान में पश्चिमी संस्कृति हावी होती चली गई।पहले महिलाओं की अदाकारी में भी पुरूष ही दाड़ी मूंछ मुंडाकर काम किया करते थे। उस दौरान महिलाओें का घर की दहलीज से बाहर कदम रखना अथवा पुरूषों के साथ घुलना मिलना वर्जित माना जाता था। भारत सदा से ही पुरूष प्रधान देश रहा है, इसीलिए यहां इस तरह की संस्कृति का जन्म हुआ है।आज की पीढी निश्चित तौर पर इसे दखियानूसी विचारधारा का घोतक मानती है, किन्तु आज जो फूहड़ प्रदर्शन चल रहा है, क्या वह हूबहू पश्चिमी संस्कृति है? जाहिर है नहीं यह वेस्टर्न कल्चर का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। आज की संस्कृति में टूटती सामाजिक मर्यादाएं और वर्जनाएं क्या उचित मानी जा सकती हैंत्रबहरहाल आज पर्दे पर हम नायक नायिकाओं को उन गढ़े हुए रोल में अदाकारी करते देख उनके जैसा बनने की चाहत दिल में पालते है, किन्तु असल जिंदगी में वे क्या कर रहे हैं, जब यह बात हमारे सामने उजागर होती है तो हमारा मुंह कसैला होना स्वाभाविक ही है।गेंगस्टर के नायक शाइनी आहूजा पर उनकी ही नौकरानी ने बलात्कार का आरोप लगा दिया। वह बलात्कार था या आपसी सहमति यह पुलिस की जांच का विषय है, किन्तु शादी शुदा शाईनी ने अगर इस तरह की नापाक हरकत की है तो इसके लिए निश्चित रूप से हमारी वर्तमान गंदी सड़ांध मारती दिग्भ्रमित संस्कृति ही पूरी तरह जिम्मेदार है। आने वाले दिनों में शाईनी के इस कृत्य को बढ़ा चढ़ा कर इस कदर प्रस्तुत किया जाएगा कि लोग इसके मूल की कहानी को भूल ही जाएंगे। पहले शादीशुदा मर्द अन्य ओरतों की ओर देखने से गुरेज ही करते थे, किन्तु टीवी सीरियल में हमेशा दिखाए जाने वाले ``एक्सट्रा मेरेटल अफेयर्स`` ने आज सारी परिभाषाएं ही बदलकर रख दी हैं।वालीवुड में देह शोषण की बात यह कोई नई नहीं है। सबसे पहले 2004 में प्रीति जैन नामक एक माडल ने फिल्मकार मधुर भण्डारकर पर देह शोषण का आरोप लगाया था। इसके बाद यह अनवरत सिलसिला शक्तिकपूर, आदित्य पंचोली, अमन वर्मा महेश भटकर आदि के रास्ते होकर चलता ही जा रहा है।वालीवुड में ``कािस्ंटग काउच`` के चर्चे चटखारे लेकर किए जाते हैं। यह सच है कि वालीवुड के सुनहले पर्दे के दूसरी और कालिख ही कालिख पुती हुई है। यह वह हमाम है जिसमें कमोबेश हर कोई शख्स नंगा ही खड़ा है। जिसकी चोरी पकड़ी गई वही चोर करार दिया गया है बाकी सब साहूकार बने बैठे हैं।मीडिया ने भी अपनी पाठक संख्या या टीआरपी बढ़ाने की गरज से ``पेज थ्री`` आरंभ कर दिया है, जिसमें सेलिब्रिटीज को रात की रंगीनियों में कैद कर लोगों के सामने परोसा जाता है। कल तक देश प्रेम का जज्बा जगाने वाली खबरों से अटा पड़ा मीडिया और फिल्म जगत आज क्या परोस रहा है?निश्चित तौर पर हमारी सराउंडिंग (आसपास का माहौल मिलने जुलने वाले) जैसी होगी हमारी सोच वैसी ही बनेगी। वालीवुड के बारे में जिस तरह की बातें मीडिया हमारे सामने लाएगा हमारी मानसिकता वालीवुड के बारे में वैसी ही बनेगी। रूपहले पर्दे पर ``गुड ब्वाय`` का किरदार निभाने वाले निजी जिंदगी में रातों रात ``बेड ब्वाय`` कैसे बन जाते हैं इसका उदहारण पिछले लगभग पांच सालों से देखने को मिल रहा है।एसा नहीं कि वालीवुड की तारिकाएं कास्टिंग काउच से अछूती हों। बदनामी के डर से वे अपना मुंह बंद रखने को मजबूर हैं। नीतू चंद्रा ने तो खुद को इससे दूर रखकर यह तक कह डाला था कि वालीवुड में कािस्ंटग काउच चरम पर है। अब देखना यह है कि शाईनी के बाद कौन सा चेहरा बेनकाब होता है, क्योंकि अब तक के हादसों से सबक लेकर वालीवुड के सुधरने की उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा।]

-----------------------------

कहां गईं टिकिट बिकने की शिकायतें!

0 आत्म मंथन में भी नही हो रहा टिकिटों के बिकने का जिकर

0 अपनी पीठ ठोंकर अनियमितताओं पर धूल डाल रही है कांग्रेस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली सहित अन्य राज्यों में बीते साल हुए विधानसभा चुनाव और देश के आम चुनावों में पार्टी फंड में कथित तौर पर चन्दा दिलवा कर कांग्रेस की टिकिट दिलाने वाले घालमेल की शिकायतों अब ठंडे बस्ते के हवाले कर दी गई हैं। ये शिकायतें जितनी तेजी से उठी थीं, उससे दुगनी गति से दफन कर दी गई हैं।कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय में चल रही चर्चाओं के अनुसार पार्टी के कुछ रसूखदार दलालनुमा नेताओं ने इस बार चुनावों में टिकिट का घालमेल जमकर किया। इसमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा आदि राज्यों में टिकिट बिकने की खबरें पहले जमकर उछलीं थीं।पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि आम चुनाव के पूर्व पार्टी ने लोकसभा सीटों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था। इनमें से ``अ`` श्रेणी की लोकसभा सीट को सबसे अधिक धनराशि मुहैया करवाई गई थी। इसके उपरांत गुणोत्तर क्रम में ब और स श्रेणी के संसदीय क्षेत्रों को उससे कम राशि दी गई थी।सूत्र बताते हैं कि इन दलालों ने पार्टी फंड के नाम पर टिकिट बेचकर पैसे बनाए ही बनाए साथ में पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए सहायता के तौर पर रूपयों की हेराफेरी भी कर डाली। उत्तर प्रदेश के एक सांसद जिनके नाम पर पार्टी के बहीखाते में 25 लाख रूपए दर्ज हैं, वे आवक हैं, क्योंकि रकम उन्होंने ली ही नहीं। अल्पसंख्यक कोटे के इन सांसद ने अपनी शिकायत पार्टी मुखिया के पास दर्ज करा दी है। यही आलम एक अन्य मुस्लिम सांसद का है जिनके खाते में पार्टी से पांच लाख रूपए की सहायता दर्ज है।पार्टी के एक नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी टिकिट बिकने और पार्टी फंड के बंदरबांट की शिकायतों पर समय रहते कदम उठा लेतीं तो कांग्रेस पार्टी सवा दो सौ से अधिक सीटों पर विजयश्री का परचम फहराती। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सुप्रीमो को उनकी किचिन केबनेट के सदस्य जिस रंग का चश्मा लगाकर सियासत दिखा रहे हैं, वे उसी रंग में सियासत को देख रही हैं, यही कारण है कि एक के बाद एक करके कांग्रेस के हाथ से देश के सूबे फिसलते ही जा रहे हैं।

--------------------------------------

. . . मतलब निरंकुश हो गए हैं मनमोहन!

0 सोनिया ने मनमोहन को लिखा खत, वादे याद दिलाए

नई दिल्ली। देश की सबसे शक्तिशाली महिला अगर डॉ. मनमोहन सिंह को देश के सबसे शक्तिशाली संवैधानिक पद पद बिठाएं और फिर खतो खिताब के जरिए उनसे बात करें तो यही माना जाएगा कि मनमोहन दूसरी पारी में पूरी तरह निरंकुश हो गए हैं, और अब सोनिया को उनसे बातचीत के लिए पत्रों का सहारा लेना पड़ रहा है।गौरतलब होगा कि माना जाता है कि सरकार का रिमोट कंट्रोल सोनिया गांधी के पास ही है। अगर चुनावी वादे याद दिलाने के लिए सोनिया गांधी ने मनमोहन को खत लिखा है तो इसके पीछे कोई न कोइ्रZ कहानी जरूर है। या तो यह पब्लिसिटी स्टंट है या फिर खतो खिताब के बाजीगर कुंवर अजुZन सिंह के किसी जहर बुझे तीर को निष्फल करने का कोई नया पैंतरा।बहरहाल कांग्रेस के आम कार्यकर्ता को हर महीने खत लिखने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस महीने पार्टी के एक खास कार्यकर्ता को पत्र लिखा है। सोनिया ने यह खत लिखा है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को। इसमें प्रधानमंत्री को कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में किए गए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनाने के वादे की याद दिलाई है। सोनिया ने लिखा है कि यूपीए के पिछले कार्यकाल में बनाए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की तर्ज पर यह कानून भी बनाया जाए। सोनिया खाद्य सुरक्षा को यूपीए के दूसरे कार्यकाल की प्रमुख योजना बनाना चाहती हैं। देश में इस साल मॉनसून के लेट हो जाने के कारण खरीफ की फसल पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका के बीच सोनिया का यह पत्र बहुत ही अहम है। हालांकि इस समय देश के सरकारी गोदाम अनाजों से ठसाठस हैं, मगर गरीबों के पास इसे खरीदने के लिए पैसा नहÈ। विÜव बैंक के मुताबिकए भारत में 45 करोड़ 60 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।स्थिति की गंभीरता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के कुल गरीबों में एक तिहाई भारतीय हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में 20 करोड़ लोगों को दोनों वक्त भोजन उपलब्ध नहÈ होता है। 50 प्रतिशत कुपोषण के शिकार हैं। इनमें 20 फीसदी की हालत बहुत ही गंभीर है। इस पृष्ठभूमि में यूपीए सरकार द्वारा कानून बनाकर 25 किलोग्राम गेहूं या चावल 3 रुपये प्रति किलो के हिसाब से उपलब्ध करवाना क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। सोनिया और प्रधानमंत्री द्वारा संयुक्त रूप से जारी कांग्रेस के घोषणा पत्र में किए वादे में कहा गया है कि खाने को अधिकार बनाया जाएगा।कानून बनाकर सब लोगों खासतौर से समाज के कमजोर तबके के लोगों को पूरा भोजन देने की गारंटी होगी।

गुरुवार, 25 जून 2009

दिल्ली, डेल्ही या नई दिल्ली!

(लिमटी खरे)

पूर्व चुनाव आयुक्त और वर्तमान केंद्रीय खेल मंत्री एम.एस.गिल ने पिछले दिनों एक नई बहस को जन्म दे दिया है। उन्होंने कहा है कि नई दिल्ली का नाम बदलकर राष्ट्रमण्डल खेलों के पूर्व दिल्ली कर देना चाहिए। कोई इसे नई दिल्ली, कोई दिल्ली तो कोई डेल्ही कहता है।शहरों, प्रदेशों और देशों का नाम बदलने की पंरपरा नई नहीं है। यह काफी अरसे से चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है। दिल्ली कभी इंद्रप्रस्थ तो कभी शाहजहांबाद हुआ करती थी। इलहाबाद को पहले प्रयाग के नाम से जाना जाता था, पटना का नाम पाटलिपुत्र और अज़ीमाबाद था। भारत को लोग पहले देवभूमि तो फिर आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था। यूं तो भारत के भी कई नाम चलन में हैं। कोई इसे भारत, कोई हिन्दुस्तान तो कोई इंडिया कहता फिरता है।हमारी अपनी नजर में नाम परिवर्तन के सिलसिले के जनक ब्रितानी शासक थे। जिनका उच्चारण ही नामों को बदल गया। दरअसल नाम परिवर्तन की वजह विस्मृत होती संस्कृति ही कही जा सकती है। पहले स्कूली पाठ्यक्रमों में भारत के इतिहास को घोलकर बच्चों के जेहन में बिठाया जाता था। संस्कृत जैसी िक्लष्ठ किन्तु सुमधुर भाषा का ज्ञान आवश्यक तौर पर दिया जाता था। आज पाश्चात संस्कृति की ओर बढ़ते आकर्षण ने सब कुछ समाप्त सा कर दिया है।आज की युवा पीढ़ी से अगर पूछा जाए कि भारत में कितने मुगल शासकों ने शासन किया? मुगल कब भारत पर कब्जा करने आए थे? अंग्रेजों ने किस कदर इस देवभूमि के योद्धाओं पर अत्याचार किए? इन समस्त प्रश्नों के जवाब में युवा पीढ़ी बगलें झांकती ही नजर आएगी।दरअसल आजादी के छ: दशकों में हिन्दुस्तान में राज करने वाले राजनेताओं ने हमारी संस्कृति और विरासत को नई पीढ़ी के दिलो दिमाग से निकालने के वे सारे सरल मार्ग प्रशस्त कर दिए जिनके माध्यम से हम अपने अतीत को जान सकते थे। युवा पीढ़ी को अनुमान ही नहीं होगा कि आजादी के दीवानों ने किस शिद्दत के साथ ब्रितानी हुकूमत के अत्याचार सहते हुए उनसे लोहा लिया और आजादी पाई। दरअसल आजादी की कीमत इन लोगों को पता ही नहीं है।``पदमपुराण`` में महाकाल की नगरी उज्जैन के एक दर्जन से अधिक नामों का उल्लेख किया गया है। इनमें अवन्तिका, उज्जयनी, पदमावत आदि का उल्लेख किया गया है। इन सभी नामों के पीछे अलग अलग वजह है। विदिशा को पहले भेलसा के नाम से जाना जाता था, एवं भेलसा की तोपों का कोई जवाब नहीं था। नाम बदलकर हम अपनी प्राचीन संस्कृति से जुड़े रहने के मार्ग ही प्रशस्त करते हैं।उदहारण के तौर पर श्राद्ध कर्म करते समय हम अपने स्वर्गवासी पुरखों को याद करते हैं। सवाल यह है कि क्या हम यह प्रक्रिया देवी देवताओं को खुश करने के लिए करते हैं? जाहिर है, नहीं, यह अपने पूर्वजों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ ही साथ उनके जीवन से प्रेरणा लेने, उनके साथ बिताए अच्छे बुरे पल याद करने का एक सहज तरीका हो सकता है। बेंगलौर को बंगलुरू, मैसूर को मैसूरू, कलकत्ता को कोलकता, मद्रास को चेन्नई, बंबइ्रZ को मुंबई, त्रिवेंद्रम को तिरूअनंतपुरम, कोचीन को कोच्ची करने के पीछे सांस्कृतिक वजहें ही हैं।अगर आप का नाम कोई गलत पुकारे तो आपको तकलीफ होना स्वाभाविक ही है। यही आलम शहर का है। अंग्रेज शासकों ने अपनी सुविधा के अनुसार शहरों के नए नाम निर्धारित किए थे। वस्तुत: दासता की समाप्ति के उपरांत हिन्दुस्तान के शहरों के पुराने नाम वापस रख दिए जाने चाहिए थे, पर एसा हुआ नहीं। अंग्रेजों के द्वारा दासता के दौरान दिए गए नामों को ही हम आज भी ढो रहे हैं। शहरों के नाम ही क्यों उनके बनाए नियम कायदे कानून यहां तक कि अंग्रेज रविवार को इबादत के लिए अपने आप को मुक्त रखना चाहते थे, सो आज भी सप्ताह का सरकारी अवकाश रविवार ही है। हम आजाद जरूर हो गए हैं, किन्तु आज भी ये सारे सिस्टम दर्शाते हैं कि हम मानसिक दासता से उबर नहीं सके हैं।बहरहाल एम.एस.गिल का कहना कि दिल्ली में यहां के मिजाज और संस्कृति की झलक मिलती है हास्यास्पद ही है। मुख्य चुनाव आयुक्त रहे गिल लंबे समय से दिल्ली में ही निवास कर रहे हैं, और अगर वे यह नहीं जानते कि दिल्ली की मूल पुरातन संस्कृति क्या अब बची है? पाश्चात संस्कृति का सबसे घिनौना और बिगड़ा रूप दिल्ली में ही देखने को मिलता है। हमारा कहना महज इतना ही है कि नाम अवश्य बदला जाए बशतेZ नाम बदलने का मकसद सही हो।


मनमानी के चलते प्रसार भारती कठघरे में!

0 अंदरूनी कर्मचारी ने ही की अनियमितताओं के खिलाफ आवाज बुलंद

0 चर्चाओं में है डी डी भोपाल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। प्रसार भारती में पिछले दिनों व्यापक स्तर पर हुई अनियमितताओं के चलते इसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। आम चुनावों के दौरान हुई एंकर्स की भर्ती और मध्य प्रदेश में भोपाल दूरदर्शन में जारी अनियमितताओं ने देश के एक मात्र राष्ट्रीय दृश्य और श्रृव्य ब्राडकास्टर की कलई खोलकर रख दी है।प्रसार भारती से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि प्रसार भारती ने मनमानी करते हुए अनेक एसी शिख्सयतों को वरिष्ठ एंकर के पद पर नियुक्त कर लिया है, जिनके पास अनुभव पांच साल से कम ही का है। इतना ही नहीं चहेतों (कारण चाहे जो भी हो) को उपकृत करने के लिए अनुभव में कोई कमी किए बिना ही इन्हें नियुक्त कर दिया गया है।इनमें से अनेक सामान्य स्नातक या बी टेक हैं, एवं इनके पास श्रृव्य एवं दृश्य मीडिया में काम करने का कोई अनुभव भी नहीं है। प्रसार भारती के ही एक कर्मचारी की याचिका पर केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (केट) ने प्रसार भारती को नोटिस भेजते हुए इसका जवाब चाहा है। याचिकाकर्ता द्वारा प्रसार भारती की समूची भर्ती प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया है।याचिका में कहा गया है कि गत वर्ष जारी विज्ञापनों में दूरदर्शन के लिए सीनियर एंकर, एंकर कम करस्पांडेंट, जूनियर एंकर कम करस्पांडेंट के लिए 13 सितम्बर तक आवेदन मंगाए गए थे। इसमें योग्यताएं क्रमश: पांच, तीन और एक साल के अनुभव के साथ मांगी गई थीं।तीन साल की अवधि के अनुबंध के लिए इनका वेतन भी 65 हजार, 45 हजार तथा 25 हजार रूपए तय किया गया था। मजे की बात तो यह है कि इसमें केंद्रीय मंत्रियों और संतरियों के सगे संबंधियों को भर्ती के लिए पत्रकारिता के अनुभव और पत्रकारिता की शिक्षा में छूट भी दी गई थी।याचिकाकर्ता का आरोप है कि इनमें भर्ती किए गए लोगों ने अपनी इंटरर्नशिप को भी अनुभव के दायरे में दर्शाया गया है, बावजूद इसके उनके पांच या तीन साल का अनुभव पूरा नहीं होता है।
इसी तरह के अनेक मामले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दूरदर्शन केंद्र में नित सुनने को मिल रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी किसी के नाम का भुगतान कोई और के द्वारा लिए जाने की चर्चाएं जमकर हैं। सूचना के अधिकार कानून में लगी एक अर्जी यहां के अधिकारियों के गले की फांस बन गई है। सूत्र बताते हैं कि सूचना के अधिकार की अर्जी के उपरांत आनन फानन यहां रिकार्ड भी दुरूस्त करवाए जा रहे हैं।

बुधवार, 24 जून 2009

यमुना को टेम्स नहीं यमुना ही बना दीजिए शीला जी


(लिमटी खरे)

कभी देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कल कल बहती यमुना नदी पिछले दो तीन दशकों से गंदे बदबूदार नाले में तब्दील हो गई है। दिल्ली में केंद्र और राज्य सरकार की नाक के नीचे सारी सीमाएं तोड़ते प्रदूषण ने यमुना का गला घोंटकर रख दिया है। आने वाले एक दशक तक इसके पुनुZद्धार की उम्मीद नहीं की जा सकती है।यमुनोत्री से इलहाबाद के संगम तक यमुना 1375 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती है। दिल्ली से पहले स्वच्छ निर्मल जल को लेकर आने वाली यमुना दिल्ली के बाद बुरी तरह प्रदूषित हो जाती है। यमुना के प्रदूषण में दिल्ली की भागीदारी 80 फीसदी से भी अधिक है। वजीराबाद से ओखला बैराज तक का 22 किलोमीटर लंबा यमुना का हिस्सा सबसे अधिक प्रदूषण की चपेट में है।यमुना नदी के साथ श्रृद्धालुओं की अगाध श्रृद्धा जगजाहिर है। भगवान श्रीकृष्ण की कथाएं यमुना नदी के बिना अधूरी सी लगती हैं। यमुना नदी का नाम सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा जेहन में जीवंत हो उठती है। मथुरा के बाद यमुना नदी ने श्याम वर्ण ओढ़ लिया है।दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित का यह बयान हास्यास्पद ही माना जाएगा कि यमुना नदी को लंदन की टेम्स नदी नहीं बनाया जा सकता है। हमारा कहना महज इतना ही है कि लंदन की टेम्स नदी ब्रितानी लोगों के लिए गर्व का विषय होगी, वह उन्हीं को मुबारक किन्तु शीला जी हिन्दुस्तान की शान मानी जाने वाली यमुना नदी को टेम्स न बनाकर कम से कम यमुना के रूप में तो ला दीजिए।बकौल शीला दीक्षित -``दशकों से दिल्ली का अव्यवस्थित विकास हुआ है। बाहर से लोग आते हैं, और जहां मन होता है बैठ जाते हैं।`` शीला दीक्षित का यह बयान पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना है। देखा जाए तो वे भी उत्तर प्रदेश से ही आईं हैं और दिल्ली पर एक दशक से हुकूमत कर रहीं हैं।अपना इस तरह का बचकाना बयान देने के पहले शीला दीक्षित शायद भूल गईं कि आजादी के बाद के छ: दशकों में से एक दशक से तक तो दिल्ली उन्हीं के कब्जे में है, और बीच का कुछ अरसा अगर छोड़ दिया जाए तो शेष समय तो दिल्ली की गद्दी पर कांग्रेस का ही शासन रहा है। शीला से बयान से लगता है मानो वे कह रहीं हों कि दिल्ली पर काबिज रही कांग्रेस की सरकारों ने यहां की बसाहट पर ध्यान नहीं दिया है।मुख्यमंत्री खुद स्वीकार करतीं हैं कि यमुना नाले में तब्दील हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि यमुना एक्शन प्लान एक और दो में 2800 करोड़ रूपए तो खर्च हुए हैं किन्तु ठोस तकनीक न होने से इसका वांछित परिणाम सामने नहीं आया। हम शीला दीक्षित को याद दिलाना चाहते हैं कि जो व्यय हुआ है, वह उन्हीं के शासनकाल में हुआ है, और अगर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को बिना परिणाम या ठोस तकनीक के बहाया गया है तो क्यों न इसे तैयार करने और अमली जामा पहनाने वालों पर जनता के धन के अपव्यय का आपराधिक मुकदमा चलाया जाए?शीला दीक्षित ने कहा कि इसकी सफाई में अभी सात आठ साल और लगेंगे। क्या एक नदी के महज 22 किलोमीटर के हिस्से को संरक्षित करने के लिए शीला दीक्षित को पिछली पारी के 10 साल और अभी के छ: महीने काफी नहीं हैं, जो दिल्लीवासियों को वे सात आठ साल का एक और झुनझुना पकड़ा रहीं हैं।शीला दीक्षित के लिए कामन वेल्थ गेम्स पहली प्राथमिकता बने हुए हैं। क्या शीला दीक्षित सरकार के लिए यह शर्म की बात नही होगी कि विदेशी खिलाड़ी और दर्शक दिल्ली में नाक पर रूमाल रखकर घूंमेंगे और विशेषकर यमुना को देखकर वे हिन्दुस्तान की राजधानी के बारे में क्या धारणा बनाएंगे? क्या शीला दीक्षित की नाक तब नहीं कटेगी जब कामन वेल्थ गेम्स की खबरों के बजाए अंतर्राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली की बदहाली और दुर्गंध से बजबजाती यमुना नदी के फोटो और स्टोरी छापेंगे?एक दशक तक सत्ता का सुख भोगकर तीसरी पारी खेलने वालीं दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री यमुना के मामले में बेबस ही नजर आईं। तेज तर्रार प्रशासक के तौर पर पहचान बना चुकीं शीला दीक्षित दस सालों मेें यमुना के लिए करोड़ों रूपए पानी में बहते हुए चुपचाप देखतीं रहीं और अब घड़ियाली आंसू बहाकर कह रहीं हैं कि यह शर्म की बात है कि यमुना एक गंदे नाले में तब्दील हो गई है।देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बहने वाली दिल्लीवासियों के लिए कभी जीवनदायनि रही यमुना नदी को भले ही शीला दीक्षित लंदन की टेम्स नदी बनाना चाहें पर दिल्लीवासियों की ओर से हम श्रीमति शीला दीक्षित से विनम्र गुजारिश करते हैं कि यमुना नदी को टेम्स मत बनाईये इसे पुरानी यमुना के स्वरूप में ही ले आईए।


अंतत: सच साबित हुई जगतगुरू की भविष्यवाणी

स्वामी स्वरूपानंद जी ने कहा था खण्डूरी कार्यकाल पूरा नहीं करेंगे

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। उत्तराखण्ड की भुवनचंद खण्डूरी के मामले में जगतगुरू शंक्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद की भविष्यवाणी सत्य साबित हुई, उन्होंने कहा था कि भुवन चंद खण्डूरी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। ज्ञातव्य है कि स्वरूपानंद जी ने कहा था कि चूंकि खण्डूरी का राज्याभिषेक रिक्ता तिथि को हुआ था इसलिए वे कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेंगे।गौरतलब होगा कि उत्तराखण्ड में विधायकों के पुरजोर विरोध के बावजूद भी खण्डूरी को दो मार्च 2007 को विधायक दल का नेता घोषित कर दिया गया था। बाद में उन्होंने अपने पथ प्रदर्शक और ज्योतिपीठ के एक अन्य दावेदार स्वामी माधवाश्रम की राय पर आठ मार्च को उस समय शपथ ली जब रिक्ता तिथि चल रही थी। खण्डूरी के करीबी सूत्रों का दावा है कि स्वामी माधवाश्रम ने खण्डूरी को सलाह दी थी कि 08 मार्च 2007 को प्रात: दस से बारह बजे के बीच वृष लग्न था, जो काफी समय बाद आया था।इतना ही नहीं, जब यह तिथि घोषित हुई तभी जगतगुरू शंक्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने शपथ ग्रहण की तिथि के बारे में कह दिया था कि वह तिथि खण्डूरी की मित्र नहीं शत्रु है, क्योंकि उस दिन चतुर्थी थी जिसे रिक्ता तिथि कहते हैं, यह तिथि राज्याभिषेक के लिए सबसे घातक मानी गई है।जगतगुरू शंक्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने कहा था कि चतुर्थी के स्वामी स्वयं भगवान गणेश होते हैं, जो विघ्न कर्ता और हर्ता दोनों ही होते हैं। रिक्ता तिथि पर आंरभ किया गया काम कभी सफल नहीं होता है। वही हुआ खण्डूरी के कार्यकाल में शत्रुओं ने सिर उठाया, अंतर्विरोध के कारण उन्हें पद का त्याग अंतत: करना ही पड़ा।

मंगलवार, 23 जून 2009

खासोआम है शीला सरकार का बजट

(लिमटी खरे)

मंहगाई बढ़ाने की सारी अटकलों पर विराम लगाते हुए शीला सरकार के वित्त मंत्री डॉ.अशोक वालिया ने इस बार दिल्ली की जनता को विशाल जनादेश का तोहफा सीधा सरल बजट देकर दिया है। तीसरी बार दिल्ली की कुर्सी पर काबिज हुई शीला दीक्षित के सामने चुनौतियों के अंबार के बावजूद इस तरह के बजट की उम्मीद नहीं की जा रही थी।बजट के पिटारे में डॉ.वालिया ने आम आदमी के लिए राहत का पैकेज ही सामने लाया है। सरकार ने किसी भी तरह का अतिरिक्त कर न लगाकर लोगों के अंदर भरोसा जताने का प्रयास किया है कि अगर वे वास्तव में विकास चाहते हैं तो कांग्रेस का दामन न छोड़ें।गौरतलब होगा कि बजट पूर्व अर्थशास्त्रियों के हवाले से मीडिया चीख चीख कर लोगों की नींद में खलल डाल रहा था कि दिल्ली सरकार का बजट इतना भयावह होगा कि आम दिल्लीवासी की रूह कांप जाएगी। वस्तुत: एसा कुछ दिखा नहीं। मीडिया की कपोल काल्पित बातें एक बार फिर उजागर हो गईं।मीडिया अटकलें लगा रहा था कि बजट में बिजली, रसोई गैस, दाल आदि पर दी जाने वाली सब्सीडी को सरकार समाप्त कर देगी, मीडिया के इन कायसों को झुठलाते हुए शीला दीक्षित सरकार ने आम आदमी की ओर एक कदम बढ़ाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।इस मनभावन बजट में आम आदमी से जुड़ी एक विशेष व्यवस्था ``परिवहन`` पर शीला सरकार ने खासा ध्यान दिया है। आने वाले समय में सड़कों पर लो फ्लोर बस तो भूमिगत एवं उपरी मार्ग पर दिल्ली मेट्रो की सेवा में तेजी से विस्तार हो सकेगा। वैसे भी अगले साल होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों के मद्देेनजर इनका विस्तार आवश्यक हो गया था।शीला सरकार ने आम आदमी से जुड़ी जलआपूर्ति और जल मल निकासी तथा शहरी विकास पर को दूसरी प्राथमिकता पर रखते हुए इसके लिए बजट का कुल 13.66 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया है। उम्मीद की जाएगी कि दिल्ली में इन व्यवस्थाओं को पटरी पर लाया जा सकेगा।2010 में होने वाले कामन वेल्थ गेम्स केंद्र और दिल्ली सरकार की प्रथमिकता में सबसे उपर हैं। यही कारण है कि दिल्ली सरकार ने इनके लिए 245 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया है। यह राशि आगे बढ़ाई भी जा सकती है। वैसे भी दिल्ली में इन गेम्स को संपन्न कराना शीला सरकार के लिए एक चुनौति से कम नहीं है।इस बार शीला सरकार ने लोगों के स्वास्थ्य के बारे में भी पहली बार सोचा है। मिलावटी शराब के प्रकरणों में आजीवन कारावास तो सार्वजनिक स्थानों को खुले मदिरालय में तब्दील करने वालों को पांच हजार रूपए के दण्ड से नवाजने का प्रावधान भी किया गया है। गौरतलब होगा कि दिल्ली में जहां तहां लोग खड़े होकर मदिरापान करते नजर आ ही जाते हैं, जिससे रहवासी विशेषकर महिलाएं प्रभावित हुए बिना नहीं हैं।इस बजट के नकारात्मक पहलू भी हैं। राष्ट्रमण्डल खेल से इतर दिल्ली वासियों की जरूरतें भी हैं, जिनका ध्यान रखना दिल्ली सरकार का फर्ज था। आम आदमी के लिए आवश्यक स्वास्थ्य, शिक्षा आदि पर शीला सरकार का ध्यान न जाना दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा।कामनवेल्थ गेम सफलता पूर्वक संपन्न कराना दिल्ली सरकार नहीं वरन दिल्ली की जनता का भी नैतिक दायित्व है, किन्तु अपना पेट काट, बच्चों के मुंह से निवाला छीनकर इसे संपन्न कराना कहां तक उचित माना जाएगा। दिल्ली की आबादी में पिछले कुछ सालों में हुए विस्फोट के उपरंात यहां स्कूली और उच्च शिक्षा के लिए नए संस्थानों की दरकार एक असेZ से है।इतना ही नहीं दिल्ली सरकार के बजट में बाल श्रमिक, श्रम कल्याण, अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, जेल, कला, पर्यटन, संस्कृति, कला, उद्योग आदि के क्षेत्रों की उपेक्षा अचरज की बात है। दिल्ली सरकार का पूरा ध्यान कामन वेल्थ गेम ही हैं, किन्तु शीला जी आपकी रियाया की इससे इतर जरूरतों को आप नहीं पूरा करेंगी तो अगली मर्तबा यही जनता जनार्दन आपको सत्ता के गलियारे से उठाकर बाहर फेंकने में गुरेज नहीं करेगी।

सोमवार, 22 जून 2009

जमीनी लोगों की तरफ कांग्रेस के बढ़ते कदम

(लिमटी खरे)

देश में गणतंत्र की स्थापना के छ: दशक हो चुके हैं। आधी सदी से ज्यादा इस देश पर कांग्रेस ने ही राज किया है। बाबजूद इसके आज भी सामंतशाही व्यवस्थाएं बदस्तूर जारी हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने कांग्रेस में सामंती उपाधियों का चलन बंद करने का सराहनीय फरमान जारी कर दिया है। लगता है आने वाले समय को देखते हुए जमीनी लोगों की तरफ कांग्रेस का यह बढ़ने वाला पहला कदम है।कांग्रेस अध्यक्ष ने पार्टी की पे्रस विज्ञप्तियों, बैठकों की कार्यवाही के विवरण, दस्तावेज आदि में नेताओं के नाम के पूर्व उनके राजा, महाराजा, कुंवर, नवाब, बेगम, श्रीमंत, रानी जैसे संबोधनों के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी है। वस्तुत: इस तरह की उपाधियां सामंती जमाने की यादें ताजा करने के लिए पर्याप्त कही जा सकती हैं। वैसे भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनका चलन ओचित्यहीन ही कहा जाएगा।आजाद भारत में जब एक के बाद एक रियासतों को भारत गणराज्य के अधीन राज्यों का हिस्सा बनाया गया था, तब राजा महाराजाओं को ``प्रिवी पर्स`` की सुविधा राजकीय खजाने से दिए जाने की व्यवस्था दी गई थी। लगभग चार दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया था।उस वक्त संभवत: श्रीमति इंदिरा गांधी की सोच यही रही होगी कि कांग्रेस को आम आदमी अपने से जुड़ी अपने हितों को साधने वाली पार्टी माने। श्रीमति सोनिया गांधी ने भी शायद उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह कदम उठाकर संदेश देना चाहा है कि कांग्रेस पार्टी आज भी आम आदमी की ही पार्टी है।वैसे देखा जाए तो बोल चाल, पोस्टर बेनर आदि में राजसी संबोधनों का उपयोग आज भी जारी है। नेताओं के मना करने के बाद भी उनके अनुयायी उनके नामों के आगे इस तरह के संबोधनों का प्रयोग कर आम आदमी को कांग्रेस से दूर कर दासता की याद दिलाने पर मजबूर कर देते हैं।पूर्व में मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार का एक फरमान कि तत्कालीन खेल मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया के नाम के आगे ``श्रीमंत`` लगाया जाए काफी चर्चित हुआ था, इतना ही नहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे के कार्यकाल में राजसी उपाधियों का चलन बहुत तेजी से हो रहा था।लगता है कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान की गहलोत सरकार द्वारा रजवाड़ी शब्दावली के लिए जारी निषेधाज्ञा के बाद यह कदम उठाया होगा। वैसे कांग्रेस में राजसी संबोधनों का इतिहास रहा है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दििग्वजय सिंह, कुंवर अजुZन सिंह, केद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, कर्ण सिंह, प्रतापगढ़ की सांसद रत्ना सिंह आदि अनेक उदहारण हैं, जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पूर्व राजधराने की रही है।उधर जैसी कि आशंका थी सोनिया के इस कदम का विरोध भी उसी शिद्दत से आरंभ हो गया है। स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी की केबनेट के नगीने और गोवा के राज्यपाल रहे पूर्व महाराजा भानु प्रकाश सिंह ने सोनिया के इस कदम की मुखालफत की है। बकौल सिंह सोनिया का यह कदम राजनैतिक वंशवाद से ध्यान हटाने का तुच्छ कदम है। इतना ही नहीं छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी एवं सतारा से राकपां सांसद ने भी सोनिया के इस कदम का विरोध किया है।वैसे यह अकाट्य सत्य है कि किसी अन्य पार्टी की तुलना में वंश को तरजीह देने की परंपरा, चाटुकारिता की संस्कृति और नेहरू गांधी परिवार को सर्वोच्च मानने का मानस कांग्रेस में अधिक है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपना उल्लू सीधा करने की गरज से कांग्रेसी नेताओं में चापलूसी और जी हजूरी कूट कूट कर भरी हुई है।कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी हों या कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी या फिर अन्य नेता, इन सभी के जन्मदिन के इश्तेहार पोस्टरों में बैगर सामंती संबोधनों के सामंती परंपरा का बखूबी निर्वहन किया जाता है। टिकिट बंटवारे में भी इसकी झलक कहीं न कहीं दिखाई दे ही जाती है।कांग्रेस में अब तक के इतिहास पर नजर डाली जाए तो सामंतशाहों को टिकिट देकर पार्टी ने उनके इलाकों में उनकी पुरानी वफादारी को भुनाने के सारे मार्ग प्रशस्त किए हैं। यही कारण है कि लंबे समय तक पार्टी के लिए समर्पित पार्टी का झंडा उठाकर चलने वाले लोगों को छांछ भी नसीब नहीं होता, जबकि ये सामंतशाही घरानों के वारिस दूध की मलाई ही मलाई चट कर जाते हैं।आजाद हिन्दुस्तान के राजनैतिक परिदृश्य पर अगर नजर डाली जाए तो हम पाएंगे कि भले ही देश के राजनेता या जनप्रतिनिधि राजा या महाराजा न कहलाते हों, पर उनका रहन सहन राजसी ठाठबाट से कम नहीं है। आज भी अनेक सूबों के निजाम अपने अपने यहां ``जनता दरबार`` लगाते हैं। दरबार तो पराधीनता के समय अंग्रेज या मुगल लगाया करते थे। आज भारत आजाद हुए साठ साल से ज्यादा समय बीत चुका है। इन राजनेताओं की सुरक्षा पर भी जरूरत से ज्यादा ही खर्च होता है।बहरहाल कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने सामंती उपाधियों को पार्टी से समाप्त करने का निर्णय तो ले लिया है किन्तु अगर वाकई वे कांग्रेस को आम आदमी की पार्टी बनाना चाह रहीं हैं तो पार्टी में मलाईदार पदों पर मनोनयन के बजाए उन्हें सीधा चुनाव कराना होगा। वर्तमान में सूबों के पार्टी प्रमुखों को कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से सीधा थोपा जाता है, जो अनुचित है।


कांग्रेस में सूबों के कायकल्प पर विचार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की सबसे ताकतवर महिला और कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ने अब राज्यों में कांग्रेस के संगठन को और अधिक ताकतवर बनाने की दिशा में कदम उठाने आरंभ कर दिए हैं। माना जा रहा है कि जल्द ही आधा दर्जन से अधिक सूबों में कांग्रेस के मुखिया बदले जाएंगे।कांग्रेस के शक्ति के केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों का दावा है कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता से आलाकमान बहुत ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रहा है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव परिणामों की राज्यवार समीक्षा के बाद आलाकमान ने अब सूबों की हालत पर जोर देने का मन बनाया है। इसके लिए कोर कमेटी ने अपना होमवर्क को अंतिम रूप भी दे दिया है।सूत्रों के अनुसार पर्दे के पीछे के सबसे शक्तिशाली कांग्रेसी अहमद पटेल ने आलाकमान को मशविरा दिया है कि जल्द ही जमीनी स्तर पर कांग्रेस की हालत सुधारी जाए। यही कारण है कि आलाकमान ने महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और बिहार में कांग्रेस के निजामों के पद पर नई तैनाती करने का मन बना लिया है।वैसे कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को कहा गया है कि वे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर विशेष ध्यान दें। मध्य प्रदेश जहां से कि कांग्रेस के दिग्गज कुंवर अजुZन िंसंह, राजा दििग्वजय सिंह, कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुभाष यादव, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया आदि आधार स्तंभ माने जाते हैं, वहां विधान और लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक क्यों रहा है।इसके साथ ही साथ छत्तीगढ़ में जहां कि मोतीलाल वोरा, अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल जैसी नामी गिरामी हस्तियां हों वहां कांग्रेस पिछले दस सालों से आैंधें मुंह क्यों गिर रही है। जोगी विरोधियों ने अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल के इस मामले में कान भरने आरंभ कर दिए हैं कि आखिर क्या वजह है कि अजीत जोगी अपनी पित्न को भी चुनाव नहीं जितवा सके हैं।गौरतलब होगा कि राजस्थान के सी.पी.जोशी और कर्नाटक के एम.ए.खरगे के मंत्री बन जाने के बाद ये पद रिक्त जैसे ही माने जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में प्रणव मुखर्जी के पास पहले भी मंत्री पद रहा है किन्तु अहमद पटेल चाहते हैं कि मुखर्जी किसी एक दायित्व का निर्वहन करें। केंद्र सरकार में महाराष्ट्र को बेहतर प्रतिनिधित्व देने के बाद अब चुनावों को देखते हुए संगठन में भी कसावट लाने की कवायद की जाएगी। पश्चिम बंगाल कांग्रेस की नजर में इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां चुनाव होने वाले हैं, और ममता बनर्जी सरकार में सहयोगी भी हैं, सो तालमेल बनाकर चलने वाले को इस सूबे में तरजीह दी जा सकती है।रही बात बिहार की सो नितीश कुमार की चमक कम न कर पाने वाले अनिल शर्मा से जवाब तलब किया गया है। गुजरात में हिन्दुत्व के पुरोधा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की चमक को कम न कर पाने वाले प्रदेशाध्यक्ष सिद्धार्थ पटेल के स्थान पर तेज तर्रार नेता की तलाश जारी है।इसके साथ ही साथ उड़ीसा में केपी सिंहदेव जिन्हें चुनाव के ठीक पहले बागडोर थमाई थी के इस बार बचने की संभावनाएं कुछ बलवती दिख रहीं हैं, वैसे तो उड़ीसा में पार्टी ने वांछित प्रदर्शन नहींं किया है, किन्तु अहमद पटेल से उनके संबध कहीं न कहीं काम आ सकते हैं। यही आलम झारखण्ड का है, वहां भी प्रदीप बालमुचू की गद्दी डांवाडोल ही लग रही है।


निर्मल ग्राम में पिछड़ा मध्य प्रदेश!

0 ग्रामीण विकास मंत्रालय ने निर्मल ग्राम पुरस्कार राशि छ: राज्यों को दी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की महात्वाकांक्षी योजना निर्मल ग्राम में मध्य प्रदेश बुरी तरह पिछड़ गया है। वर्ष 2008 के लिए जारी राशि में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का दूर दूर तक नामोनिशान नजर नहीं आ रहा है। इस योजना में दक्षिण भारत के राज्यों ने बाजी मार ली है।ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 3219.5 लाख रुपए वर्ष 2008 के दौरान छह राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र के निर्मल ग्राम पुरस्कार (एनजीपी) विजेता पंचायतों को नकद भुगतान करने हेतु जारी किया है।केरल को सबसे सफल पंचायती राज संस्थान राज्य के लिए एनजीपी पुरस्कार की बाकी बची नकद राशि का 5.00 लाख रुपया मंजूर कर दिया गया है। इस राशि को मिलाकर केरल राज्य को 2008 में एनजीपी पुरस्कारों के तहत 2992.00 लाख रुपए जारी कर दिए गए हैं।तमिलनाडु राज्य को सफल पंचायती राज संस्थान राज्यों में निर्मल ग्राम पुरस्कार (एनजीपी) के तहत नकद पुरस्कार के रूप में बाकी बची 2757.00 लाख रुपए की अंतिम एवं पूर्ण राशि जारी कर दी गई। आंध्र प्रदेश को एनजीपी पुरस्कार की बाकी बची 29 लाख रु0 की नकद राशि मंजूर कर दी गई है। इस राशि को मिलाकर आंध्र प्रदेश को एनजीपी पुरस्कारों के तहत 878.00 लाख रुपए जारी कर दिए गए हैं।बिहार को बाकी बची 4 लाख रुपए की एनजीपी पुरस्कार राशि जारी की गई है। इसके साथ ही 658 लाख रुपए की पूर्ण एवं अंतिम राशि जारी हो गई है। कर्नाटक को बाकी बची 188.00 लाख रुपए की एनजीपी पुरस्कार राशि जारी कर दी गई है। इसके साथ ही 1401.00 लाख रुपए की पूर्ण एवं अंतिम राशि एनजीपी पुरस्कारों के तहत कर्नाटक राज्य को जारी कर दी गई है।इसी प्रकार, महाराष्ट्र को 236 लाख रुपए की शेष राशि जारी कर दी गई है। इसके साथ ही 4959.50 लाख रुपए की पूर्ण एवं अंतिम राशि जारी कर दी गई है।इन छह राज्यों में बिहार के सफल पंचायती राज संस्थानों को 20 अक्तूबर, 2008 को गुवाहाटी में आयोजित एक समारोह में पुरस्—त किया गया, जबकि बाकी बचे पांच राज्यों -- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु को 8 दिसम्बर, 2008 को पुणे में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीÇसह पाटिल द्वारा पुरस्—त किया गया।सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत निर्मल ग्राम पुरस्कार और स्वच्छ गांव अवार्ड 2005 में शुरू किए गए थे। अपने परिचालन क्षेत्र में पूर्ण स्वच्छता हासिल करने वाली पंचायती राज संस्थाओं को सम्मानित और प्रोत्साहित करने के लिए ये पुरस्कार दिए जाते हैं। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान को जन आन्दोलन बनाने के लिए खुले में शौच करने से मुक्त होने तथा स्वच्छ गांव बनने वाले गांवों को स्वच्छ गांव अवार्ड दिया जाता है। इस वर्ष 12,075 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पंचायत पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीÇसह पाटिल ने हरियाणा (हिसार), असम (गुवाहाटी) और महाराष्ट्र (पुणे) में ये पुरस्कार प्रदान किए। विज्ञान भवन में 21 नवम्बर, 2008 को हुए समारोह में 105 ब्लॉक पंचायतों और 8 जिला पंचायतों को भी निर्मल ग्राम पुरस्कार से सम्मानिल किया गया। निर्मल ग्राम पुरस्कार जीतने वाले इन गांवों ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के ध्वजवाही स्वच्छता कार्यक्रम सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत हुई प्रगति को प्रदर्शित किया।

रविवार, 21 जून 2009

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

दस जनपथ में मध्य प्रदेश की भागीदारी समाप्त!

कांग्रेस के सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ में अब मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं का दबदबा लगभग पूरी तरह ही समाप्त हो गया है। कल तक इस बंग्ले की नाक के बाल माने जाने वाले कुंवर अजुZन सिंह और सुरेश पचौरी भी अब हाशिए पर ही आ गए हैं। अपनी कारगुजारियों और पे्रशर टेिक्टस के चलते कुंवर अजुZन सिंह को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है तो दूसरी और मध्य प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा में अपेक्षाकृत कम प्रभावी प्रदर्शन ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के प्रवेश के मार्ग में शूल बो दिए हैं। रही बात अन्य क्षत्रपों की तो दििग्वजय सिंह राहुल गांधी के अघोषित गुरू का काम संभाले हैं, तो अहमद पटेल की हट के चलते कमल नाथ भी सोनिया गांधी के करीब नहीं जा पा रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया से कुछ उम्मीद की जा रही थी, किन्तु उन्हें युवा होने के नाते राहुल गांधी के कोटे में ही रखा गया है। इस तरह आज के परिदृश्य में सोनिया गांधी की कोटरी में मध्य प्रदेश की भागीदारी नहीं बचती दिख रही है।

मंत्री जी जुआ जीते, केसीनों ने उन्हें बनाया

कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य के एक मंत्री ने जुंआ खेला और जीता भी। जी हां गोवा के पर्यटन मंत्री फ्रांसिस्को पचेको ने गोवा में एक जुंआघर में जाकर जमकर जुंआ खेला। रात भर चला दांव पेंच का सिलसिला थमा तो मंत्री जी लगभग एक करोड़ 53 लाख रूपए का दांव जीत चुके थे। अब बारी थी माल चुकाने की। केसीनो ने मंत्री जी से कुछ समय की मोहलत मांगी और जैसे तैसे कर 28 लाख चुका दिए। शेष रकम के लिए उसने अंगूठा दिखा दिया। मंत्री जी भी कम नहीं थे। उन्होंने केसीनो मालिक के खिलाफ रपट ही लिखवा दी। तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर केसीनो मालिक ने मंत्री जी और उसके साथी पर धमकी देने का आरोप लगा दिया। मंत्री जी के मित्र गिरफ्तार हो गए। इसमें आश्चर्य यह कि क्या पर्यटन मंत्री को केसीनो वालों ने नहीं पहचाना! और अगर मंत्री के साथ धोखाधड़ी तो बाहर से आने वाले पर्यटकों का क्या हाल होता होगा?

गोरी भाउ की कार्यप्रणाली चर्चाओं में

मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन की कार्यप्रणाली इन दिनों राजधानी दिल्ली में चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी वे आचार संहिता के दौरान घड़ी बांटकर चर्चा में आते हैं, तो कभी होली मिलन समारोह में बिना अनुमति डीजे बजाने या नोट लहराने को लेकर। कुछ दिनों पहले उन्होंने किसानों का ऋण माफ नहीं कर सकने जैसा बयान दे डाला। इस बार मामला कुछ अलग ही है। राजधानी भोपाल में सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान के साथ हुई सहकारी बैंकों के अध्यक्षों की एक बैठक के उपरांत सतना जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष और गौरी भाउ आपस में उलझ गए। दोनों और से अश्लील शब्दावली के तीर चलने लगे। बताते हैं कि चोर, बेईमान, लफंगे, पोंगापण्डित जैसे शब्दों के बाणों का भी जबर्दस्त इस्तेमाल हुआ। 11 अशोक रोड़ स्थित भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में इस पंगे के चर्चाएं लोग नमक मिर्च लगाकर कर रहे हैं।

एनआईए में मध्य प्रदेश काडर के आईपीएस

नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) में मध्य प्रदेश काडर के भारतीय पुलिस सेवा की पदस्थापना की गई है। माना जा रहा है कि दर्जन भर से ज्यादा आईपीएस इसके लिए लाबिंग कर रहे थे, किन्तु सफलता मिली पुलिस मुख्यालय में पदस्थ महानिरीक्षक कानून व्यवस्था संजीव कुमार िंसंह को। बताया जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री दििग्वजय सिंह के विशेष कृपापात्र उक्त अधिकारी को पूर्व में एनआईए में उप पुलिस महानिरीक्षक का पद दिया जा रहा था जिसके लिए उन्होने अपनी असहमति जता दी थी। बाद में आकाओं की जोड़ तोड़ के उपरांत संजीव कुमार सिंह को विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के पद पर नियुक्ति के आदेश जारी किए गए हैं।

कमल नाथ की तर्ज पर सुषमा!

विदिशा से जबर्दस्त विजय हासिल करने के बाद अब सुषमा स्वराज इस संसदीय क्षेत्र को छोड़ना कतई नहीं चाह रहीं हैं। यही कारण है कि उन्होंने केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की ही तर्ज पर काम करना आरंभ कर दिया है। वे अब विदिशा के दौरे समय निकाल कर रहीं हैं। इतना ही नही उन्होंने अपने दिल्ली स्थित आवास में विदिशा को लेकर एक अलग सेल भी बना दिया है, ताकि उनके संसदीय क्षेत्र का कोई भी मतदाता दिल्ली आकर खाली हाथ वापस न जाए। गौरतलब होगा कि केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के बारे में उनके संसदीय क्षेत्र में किंवदंती है कि उपर भोलेनाथ नीचे कमल नाथ। अथाZत कोई भी कमल नाथ के दरबार से खाली हाथ कभी भी वापस नहीं आता हैं। कमल नाथ संसदीय क्षेत्र के मसले में कोताही बर्दाश्त नहीं करते हैं। यह अलहदा बात है कि 1997 में सुंदर लाल पटवा ने उन्हें छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र से ही करारी शिकस्त दी थी। अब देखना यह है कि कमल नाथ के पदचिन्हों पर चलकर सुषमा स्वराज कितनी सफलता पातीं हैं।

फिजूलखर्च शिवराज सरकार!

जहां एक ओर मध्य प्रदेश सरकार आर्थिक बदहाली का रोना रो रही है, वहीं दूसरी ओर सूबे के निजाम और उनके सहयोगी हवाई यात्रा पर करोड़ों रूपए फूंक रही है। जी हां यह सच्चाई है जनाब। 2006 से इस साल फरवरी तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 770 घंटे हवा में रहकर दो करोड़ 63 लाख रूपए खर्च किए। जगदीश देवड़ा 3 घंटे, नारायण सिंह कुशवाह 16, हिम्मत कोठारी 11, रामपाल सिंह और जगन्नाथ सिंह 8 - 8, विजय शाह 06, मोती कश्यप और रंजना बघेल ने 5 - 5, तो पारस जैन और अखंड प्रताप सिंह ने 4, 4 घंटे हवा में रहकर कुल पोने तेरह करोड़ की चपत मध्य प्रदेश के खजाने को लगाई है। यह तो वही बात हुई कि जिस तरह सूखा ग्रस्त घोषित सिवनी जिले के जिला मुख्यालय में फव्वरों से पानी उगला जा रहा है, उसी तरह आर्थिक तंगी में सूबे की सरकार हवा में उड़कर गरीबों का खून पसीने का पैसा हवा में उड़ा रही है।

साडी दिल्ली दिलवालों की दिल्ली

केंद्रीय युवा मामलों के मंत्री एम.एस.गिल ने पिछले दिनों नई दिल्ली के नाम को बदलने की बात कहकर शांत पानी में कंकर मार दिया है। गिल ने गेंद को दिल्ली में तीसरी बार सत्तारूढ हुईं शीला दीक्षित की ओर उछालते हुए इस मामले में पहल करने को भी कह दिया है। उधर शीला ने मंद मंद मुस्कुराकर इस बात को ज्यादा हवा नहीं दी है। गिल ने नई दिल्ली का नाम फिर से दिल्ली करने का पुरजोर आग्रह किया है। इसके साथ ही उन्होंंने कोलकता, चेन्नई, मुंबई और बेंगलुरू का भी उदहारण दिया है। गिल ने इसे कामन वेल्थ गेम के पहले बदलने की मंशा भी जताई है। अब देखना यह है कि वाकई गिल साहेब दिल्ली का नाम परिवर्तन करना चाह रहे हैं या फिर शीला विरोधियों को एक नई तलवार पकड़ा रहे हैं।

योन शोषण की शिकार मप्र की स्कूली छात्राएं

मध्य प्रदेश में शालेय स्तर पर योन शोषण के मामले वैसे तो कम ही प्रकाश में आते हैं किन्तु मध्य प्रदेश राज्य महिला आयोग को मिली शिकायतों पर अगर गौर किया जाए तो यहां माध्यमिक स्तर पर छात्राओं के योन शोषण के मामले बहुत ही अधिक हैं। दरअसल विभागीय स्तर पर बनाई जाने वाली जांच समितियां इस तरह के मामलों को तत्काल ही किसी न किसी दबाव के चलते ठंडे बस्ते के हवाले कर देती हैं। वैसे शिकायतों की जांच और सुनवाई के बाद मामला पुलिस के हवाले कर दिया जाता है। पुलिस भी पुलिस ही ठहरी। इन परिस्थितियों में विभागीय समितियों को हाथी के बेशकीमति दांतों सेे कमतर नहीं आक रहा है महिला आयोग। दूसरा पहलू यह है कि मध्य प्रदेश में शिव का राज है, जहां महिलाओं के लिए अधिक से अधिक कल्याणकारी योजनाएं लाने की जुगत लगाई जा रही है। इसी को कहते हैं यारों दिया तले अंधेरा।

जाखड़ बने रहेंगे मध्य प्रदेश के लाट साहेब

मध्य प्रदेश में महामहिम राज्यपाल बलराम जाखड़ की कुर्सी के पाए अब शायद ही हिल सकें। पहले उन्हें महाराष्ट्र भेजे जाने का ताना बाना बुना जा रहा था। उनके स्थान पर राजस्थान के शीशराम ओला का नाम चल रहा था। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने अपने राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की सलाह पर शीशराम ओला को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाने का मन बना लिया है। वैसे मंत्रीमण्डल में शामिल न हो सके बालासाहेब विखे, अजुZन सिंह, हंसराज भारद्वाज, अनिल शास्त्री आदि गर्वनर बनने वालों की लाईन में खड़े दिख्.ााई दे रहे हैं। इनमें से अजुZन सिंह शायद ही कहीं जाकर लाट साहबी करने अपनी सहमति दें।

पुच्छल तारा

कभी सत्ता की गाड़ी हांकने में महारथी माने जाने वाले कुंवर अजुZन सिंह आज बेबस नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में शिरकत करने व्हील चेयर पर पहुंचे कुंवर साहेब ने पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया। बस शांत भाव से सभी को देखते रहे, मानो कह रहे हों अभी मैं शांत मुद्रा में हूं! गौरतलब होगा कि कुंवर साहेब की चुप्पी जब भी टूटती है, वह राजनैतिक हल्कों में सैलाब ही लाती है। अजुZन सिंह की चुप्पी से कांग्रेस के बड़े नेता अंदर ही अंदर बुरी तरह डरे सहमे नजर आ रहे हैं।


शनिवार, 20 जून 2009

20 june 2009

इससे बेहतर तो गुलामी ही थी. . . .

(लिमटी खरे)

पहले मुगल फिर ब्रितानी हुकूमत की दासता की जंजीरों से मुक्त हुए भारत को छ: दशक से अधिक समय बीत चुका है, किन्तु आज इक्कीसवीं सदी के भारत में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली मेें अगर किसी महिला को अपने शिशु को सड़क पर जन्म देना पड़े तो यह केंद्र और सूबे की सरकार को शर्मसार करने वाली बात है।गत दिवस राजधानी दिल्ली के गुरू तेग बहादुर अस्पताल में इसी तरह का एक वाक्या पेश आया। गर्भवती महिला अपने परिजनों के साथ चिकित्सालय के गेट पर सुरक्षा कर्मी से अंदर जाने मिन्नत करती रही। बाद में मदमस्त चिकित्सकों ने उसके पति को कागजी खानापूर्ती के लिए भेज दिया गया।इस दौरान गर्भवती महिला सड़क पर ही पड़ी तड़पती रही। अस्पताल में अराजकता का आलम यह था कि उसके पति को स्टेचर तक नसीब नहीं हुआ। परिणामस्वरूप महिला ने सड़क पर ही नवजात को जन्म दे दिया। यह अलहदा बात है कि जैसे ही अस्पताल प्रशासन को इस बात की इत्तेला मिली आनन फानन उस महिला को अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया।जब देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के अस्पतालों में चिकित्सकों की मुगलई चल रही है, तो फिर सुदूर ग्रामीण अंचलों में चिकित्सा सुविधा की भयावहता की कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सच ही है, आम हिन्दुस्तानी आज भी नीम हकीमों के भरोसे ही अपनी सेहत को रखे हुए है।सरकारें इस बारे में कुछ सोचें अथवा नहीं किन्तु सुखद बात यह है कि देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल इस बारे में अपनी पीड़ा अनेक बार जाहिर कर चुकीं हैं। महामहिम ने अनेकों बार देश में बिगड़ेल चिकित्सा व्यवस्था पर नाराजगी भी जताई है, किन्तु देश के मोटी चमड़ी वाले राजनेताओं पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा है।एसा नहीं कि महामहिम ने कोरी कागजी बातें की हों। महामहिम ने कहा था कि देश के 271 मेडिकल कालेज से प्रतिवर्ष 31 हजार चिकित्सक उपाधि ग्रहण करते हैं। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि इसके बावजूद भारत में आज भी छह लाख डाक्टरों व 10 लाख नसो± कÊ कमी है। राष्ट्रपति ने कहा था कि वैसे तो ग्यारहवÈ पंचवषÊय योजना में डाक्टरों के अभाव वाले राज्यों में 60 मेडिकल कालेज व 225 निर्र्सग कालेज खोलने का लक्ष्य है, लेकिन केवल संख्या बढ़ा देने से ही काम नहÈ चलेगा।सरकारी आंकड़े चाहे जो कहें पर ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मजरे, टोले, गांव या छोटे शहरों में रहने वाला आम भारतीय आज भी झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे पर ही है। इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं सरकारें। कितने आश्चर्य की बात है कि आजादी के साठ साल बीत जाने के बाद भी सरकारों द्वारा चिकित्सकों को ग्रामों की ओर भेजने के मार्ग प्रशस्त नहीं किए जा सके हैं।अपने अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), उप स्वास्थ्य केंद्र या सिटी डिस्पेंसरी तो स्वीकृत करा लेते हैं किन्तु इन अस्पतालों में कितना अमला वास्तव में कार्यरत है, इस बारे में देखने सुनने की फरसत किसी को भी नहीं है। सत्ता के मद में चूर ये जनप्रतिनिधि चुनावो की घोषणा के साथ ही एक बार फिर सक्रिय हो मतदाताओं को लुभावने वादों से पाट देते हैं।नेशनल रूलर हेल्थ मिशन के प्रतिवेदन पर अगर नज़र डाली जाए तो देश की साठ फीसदी से अधिक पीएचसी में सर्जन नहीं हैं, इतना ही नहीं पचास फीसदी जगह महिला चिकित्सक गायब हैं, तो 55 फीसदी जगह बाल रोग विशेषज्ञ। क्या ये भयावह आंकड़े सरकार की तंत्रा तोड़ने के लिए नाकाफी नहीं हैं।दिया तले अंधेरा की कहावत देश की सबसे बड़ी पंचायत में साफ हो जाती है। यूं तो सभी दल आरक्षण का झुनझुना बजाकर वोट बैंक तगड़ा करने की फिराक में रहते हैं किन्तु सांसदों के इलाज के लिए तैनात चिकित्सा कर्मियों में महज 22 फीसदी चिकित्सक ही आरक्षित वर्ग के हैं। हाल ही में सूचना के अधिकार में निकाली गई जानकारी से यह कड़वा सच सामने आया है। सांसदों के लिए तैनात 49 चिकित्सकों मेंसे नौ अनुसूचित जाति, एक एक अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं।बहरहाल प्रश्न यह उठता है कि आखिर चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे के माध्यम से जनसेवा को उतारू युवा गांव की ओर रूख क्यों नहीं करना चाहते? संभवत: विलासिता के आदी हो चुके युवाअों को गांव की धूल मिट्टी और अभाव का जीवन रास नहीं आता होगा इसी के चलते वे गांव नहीं जाना चाहते। इसके साथ ही साथ शहरों में सरकारी चिकित्सकों के आवासों पर लगने वाली मरीजों की भीड़ भी उन्हें आकषिZत करती होगी। हर जिला मुख्यालय का नामी सरकारी डॉक्टर किसी न किसी अध्यनरत चिकित्सक का `पायोनियर` भी होता होगा। उसके दवाखाने में लगी मरीजों की भीड़ उसे चिकित्सा पेशे को अपनाने को बेबस करती होगी।एक ही जगह पदस्थ रहकर अपनी निजी प्रेिक्टस (दुकान) जमाकर ये चिकित्सक अनिवार्य सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेकर बड़े बड़े आलीशान नर्सिंग होम की स्थापना कर मरीजों की जेबें हल्की करने से नहीं चूकते हैं। गाहे बेगाहे सांसद, विधायक, मंत्री के बीमार पड़ने पर उनकी तीमारदारी कर उनकी गुडबुक में अपना स्थान बनाकर ये तबादलों से अपने आप को बचाए रखते हैं।कहने को तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक न जाने कितने नेताओं ने कहा है कि भारत का दिल गांव में बसता है। पर गांव की सुध लेने वाला आखिर है कौन? इस सबके आभाव में अप्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी आज भारत के दिल के स्वास्थ्य के साथ सरेआम खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे हैं।महामहिम ने अपनी पीड़ा कुछ इस शब्दों में भी बयां कर सरकारोंं को चेताने का काम किया है कि उनके पिता भी जनसेवा के लिए चिकित्सक बनना चाहतीं थीं, किन्तु जलगांव में आयुZविज्ञान कालेज के न होने से उनके पिता का सपना अधूरा ही रह गया। मुद्दा मेडीकल कालेज का न होना नहीं है, मुद्दा तो यह है कि महामहिम ने आखिर देश के आखिरी आदमी के बारे में सोचकर अपनी भावनाओं से सरकारों को आवगत कराया है, मगर हमारी सरकारें भी महामहिम की मंशा पर पानी डालने से नहीं चूक रही हैं।देश की राजनैतिक राजधानी में केंद्र और राज्य सरकार की नाक के नीचे जब महिला को सड़क पर प्रसव के लिए मजबूर होना पड़ा तो शेष भारत की बात करना बेमानी ही होगी। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह बेलगाम दौड़ते चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को अपनी स्वार्थसिद्ध बनाने वाले चिकित्सकों के घोड़ों की रकाब कसें, वरना आने वाले समय में हालात को संभालना किसी भी सरकार के बस में नहीं होगा।


घर वापसी के बाद भी उपेक्षित हैं भाजपा नेता!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी से टूटकर फायर ब्रांड साध्वी उमाश्री भारती के नेतृत्व वाली भारतीय जनशक्ति पार्टी को मजबूत करने के बाद पुन: भाजपा में वापस आए नेताओं के मन में सत्ता और संगठन के रवैए को लेकर निराशा के भाव जन्म लेने लगे है। इन नेताओं को घरवासपी के बाद तोहफे के तौर पर अगर कुछ मिला है तो महज उपेक्षा। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी इस मुद्दे के उछलने की संभावना जताई जा रही है।गौरतलब होगा कि भाजश से नाता तोड़कर रघुनंदन शर्मा, प्रहलाद सिंह पटेल, गोरीशंकर शेजवार जैसे कद्दावर नेताओं के साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और नेताओें ने भाजपा में पुर्नवापसी की है। मान मनौव्वल और सेटिंग की राजनीति के चलते हुई घरवापसी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि इन नेताओं को कम से कम संगठन में महती जवाबदारी दी जाएगी, किन्तु एसा हुआ नहीं।इतना ही नहीं इन नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी भाजपा ने लोकसभा चुनावों में इन्हें नहीं उतारा। एक ओर भाजपा ने रघुनंदन शर्मा को राज्य सभा के रास्ते संसद में भेजा है, किन्तु यह भाजपा की मजबूरी माना जा रहा है। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार भाजश में निष्ठा रखने वाले भाजपाई विधायकों को पैजामे के अंदर ही रखने की गरज से रघुनंदन शर्मा को राज्य सभा का टिकिट दिया गया था, अन्यथा उमाश्री में निष्ठा रखने वाले विधायक उस दौरान सीधे सीधे कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार विवेक तन्खा के पक्ष में मतदान कर देते।मजे की बात तो यह है कि रघुनंदन शर्मा का मालवा, प्रहलाद सिंह पटेल का महाकौशल में जबर्दस्त प्रभाव है किन्तु लोकसभा चुनावों में पार्टी ने इन दोनों को कोई विशेष जवाबदारी नहीं दी, और तो और गोरीशंकर शेजवार को रायसेन में ही काम करने की सलाह तक दे डाली।पार्टी सूत्रों का कहना है कि जवाबदारी के बिना खाली बैठे तीनों नेताओं द्वारा उपेक्षा के दंश से मुक्ति के मार्ग खोजे जा रहे हैं। काडर बेस्ड पार्टी और फिर नई आमद होने के कारण ये नेता सार्वजनिक तौर पर टीका टिप्पणी करने से अपने आप को बचाए हुए हैं, किन्तु इनकी पीड़ा कहीं न कहीं किसी और रूप में सामने आ ही जाती है।

शुक्रवार, 19 जून 2009

19 june 2009

दमनकारी नीतियों का परिणाम है लालघाट का आतंक

(लिमटी खरे)

आजाद भारत के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका होगा जबकि केंद्र या राज्य सरकार से इतर कोई संगठन किसी क्षेत्र विशेष में अपनी सल्तनत चला रहा हो। पश्चिम बंगाल सूबे में कुछ इसी तरह की तस्वीर उभरकर सामने आई है। वैसे तो नक्सलवाद प्रभावित जिलों के कुछ इलाकों में भी उनका अपना कानून चलता है, किन्तु वह अघोषित तौर पर, सरकारी नुमाईंदे भी नक्सली कानून मानने को बाध्य रहते हैं, किन्तु सब कुछ दबे छुपे ही चलता रहता है।
उड़ीसा और झारखण्ड से लगे पश्चिम बंगाल के चार जिलों पश्चिमी और पूर्वी मिदनापुर, परूलिया, बांकुड़ा में पिछले तीन दिनों मेें जो कुछ हुआ वह पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव सरकार को शर्मसार करने के लिए काफी कहा जा सकता है। सियासी लड़ाई में भले ही एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़कर ठीकरा किसी के भी सर फोड़ने का कुित्सत प्रयास किया जाए, किन्तु यह निंदनीय है कि राज्य सरकार हालातों पर काबू पाने में पूरी तरह विफल रही है।
वैसे तो पिछले साल जब पश्चिमी मिदनापुर में मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के काफिले पर शालबनी में जो बारूदी सुरंग का हमला हुआ था, तभी बुद्धदेव सरकार को नक्सलवाद की भयावहता को समझ लेना चाहिए था, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। सरकार की अनदेखी के चलते पिछले लगभग सात आठ माह से इस इलाके में पुलिस का घुसना ही मुश्किल हो गया है। सरकारी सूचना 25 गांव पर माओवादियों के कब्जे की है, किन्तु वास्तविकता में इनकी संख्या कहीं ज्यादा है।
माओवादियों की जुर्रत तो देखिए उन्होंने लालगढ़ को आजाद घोषित कर दिया है। सुरक्षा बलों को वहां पहुंचने में एड़ी चोटी एक करनी पड़ रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि माओवादियों ने उत्तर पूर्व से दक्षिण पूर्व के गलियारे को ``आजाद क्षेत्र`` बनाने का मंसूबा भी पाल रखा है। इस गलियारे में पड़ने वाले सूबों की सरकारों ने अगर िढलाई बरती तो आने वाले दिनों में अखण्ड भारत के एक हिस्से में माओवादी अपना साम्राज्य स्थापित कर लेंगे।
सरकारी ढील पोल के चलते माओवादियों के बुलंद होसलों की बानगी है पिछला लोकसभा चुनाव। निष्पक्ष और निभीZक चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध चुनाव आयोग भी आम चुनावों के दौरान यहां मतदान केंद्र नहीं बना सका था। यहां से बाहर मतदान केंद्र बनाकर चुनाव संपन्न कराए गए। इस साल अप्रेल और मई में हुए लोकसभा चुनाव में जब हालात इतने संगीन थे, तब केंद्र और राज्य सराकर की चुप्पी रहस्यमय ही कही जाएगी।
सियासी नफा नुकसान के गणित में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के मसले में सदा से ही अनिश्चय का रूख अिख्तयार किया हुआ है। पिछले पांच सालों में वामदलों की बैसाखी पर चलने वाली कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने नंदीग्राम और सिंगूर की हिंसा पर कोई सकारात्मक पहल तक नहीं की। वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस का पश्चिम बंगाल में अस्तित्व और राज्य के विधानसभा चुनाव एक बड़ी मजबूरी के तौर पर सामने आ रहे हैंं।
यह विडम्बना से कम नहीं है कि माओवादियों के आतंक वाले राज्यों में जब भी कोई वारदात होती है तो वामदल पूरी तरह खामोश रहा करते हैं, किन्तु जब अपने प्रभावक्षेत्र वाले पश्चिम बंगाल की बात आती है तो सरकार तुरंत इस पर कार्यवाही करने तैयार हो जाती है। मतलब साफ है कि माओवादियों का नृत्य कहीं न कहीं किसी न किसी सियासी पार्टी के इशारों पर ही हो रहा है।
हालात देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि सूबे में माओवादियों का उद्देश्य बुद्धदेव सरकार को हिलाना है। उनके अधिकार वाले क्षेत्र में राज्य सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाकर माओवादियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, बिजली आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमान अपने हाथों में ले ली है।
लाख टके का सवाल यह है कि आखिर भोले भाले आदिवासी और ग्रामीण इन अलगाव वादी, माओवादी, नक्सलवादियों का साथ देने तैयार कैसे हो जाते हैं? जाहिर है जब सरकार उन्हें उनके मूलभूत अधिकार का संरक्षण और सुविधाओं को उपलब्ध नहीं कराएगी तो इस तरह की ताकतें इसका बेजा इस्तेमाल कर ग्रामीणों को अपने शिकंजे मेंं कसेंगी ही।
माओवादी सरेआम कह रहे हैं कि उन्हें कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है, वहीं देश के गृह मंत्री पी.चिंदम्बरम कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को इस मामले में क्लीन चिट देने से नही चूक रहे हैं। आज सवाल सिर्फ पश्चिम बंगाल का नहीं है। माओवादियों, के निशाने पर छत्तीगढ़, महाराष्ट्र, झारखण्ड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि हैं। अगर इन पर अभी लगाम नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में ये केंद्र और सूबे की सरकारों के लिए एक नासूर बनकर ही उभरेंगे।
वैसे भी अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अखण्ड भारत का बुर्ज कहा जाने वाला काश्मीर का कुछ हिस्सा अलग कर दिया गया है। इंटरनेट के किसी भी सर्च इंजन में अगर भारत के मानचित्र को सर्च किया जाए तो उपरी हिस्सा पहले की तुलना में काफी छोटा दिखाई देता है। वस्तुत: भारत सरकार को इन सर्च इंजन को चलाने वाले संगठनों को नोटिस देकर पूछना चाहिए कि भारत के मानचित्र के साथ छेड़छाड़ करने का अधिकार उन्हें किसने दिया? जब भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही इसकी फिकर नहीं है तो अंदरूनी मामलात के मामले में तो उससे कोई उम्मीद करना बेमानी ही होगा।



आर पार की लड़ाई मूड में दिख रहे वोरा और महंत

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के बीच आने वाले दिनों में आर पार की लड़ाई के आसार दिखने लगे हैं। दरअसल एआईसीसी के कोषाध्यक्ष एवं छग के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोती लाल वोरा और सांसद तथा पीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष चरण दास महंत के बीच वर्चस्व को लेकर चल रही जंंग गहरा गई है।
केंद्रीय मंत्रीमण्डल विस्तार में छग के इकलोते कांग्रेसी सांसद चरण दास महंत को न लिए जाने के पीछे राजनैतिक फिजां में तरह तरह की चर्चाओं का बाजार गर्मा गया था। इसमें अजीत जोगी के अलावा मोतीलाल वोरा द्वारा महंत के विरोध में अभियान चलाए जाने को प्रमुख वजह माना गया था।
उधर महंत के करीबी सूत्रों का कहना है कि चरण दास महंत को पूरी उम्मीद थी कि 15वीं लोकसभा में चुने जाने के उपरांत कांग्रेस सुप्रीमो उन्हें लाल बत्ती से नवाजेंगी। सूत्रों ने कहा कि इस मामले में वोरा द्वारा लगाए गए फच्चर के बाद महंत काफी सदमें में हैं। हाल में मोती लाल वोरा की रायपुर यात्रा के दौरान दोनों के बीच मेल मिलाप न होने की चर्चाएं एआईसीसी में गर्माने लगी हैं।
एआईसीसी सूत्रों का कहना है कि निजी यात्रा पर कांग्रेस कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा रायपुर गए थे, जहां वे पीसीसी भी कुछ देर के लिए गए। वोरा के आगमन की सूचना कार्यकारी अध्यक्ष महंत को दी गई किन्तु महंत ने तब तक कार्यालय की ओर रूख नहीं किया जब तक वोरा वहां रहे।
कल तक एक साथ कदमताल करने वाले चरण दास महंत और मोती लाल वोरा के बीच शीत युद्ध गहराने का सीधा सीधा लाभ प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को होने वाला है। बिना प्रयासों के ही उनके दो विरोधी महंत और वोरा एक दूसरे की जड़ें काटते नजर आ रहे हैं।

सोमवार, 15 जून 2009

DIARY 15 JUNE 2009

अंकुरित हो सकते हैं गैर संघ विचारधारा वाली भाजपा के बीज

लाल कृष्ण आड़वाणी के पीएम इन वेटिंग की टिकिट आरएसी या कनर्फम न होने से क्षुब्ध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खासा खफा नजर आ रहा है। पिछले दिनों संघ प्रमुख भागवत के कदमतालों से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सकते में है। भागवत की दिल्ली यात्रा के उपरांत बनते बिगड़ते समीकरणों में यह माना जा रहा था कि आने वाले समय में संघ द्वारा भाजपा को सीधे सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया जाएगा। इसके लिए संध ने भाजपाध्यक्ष के उपर एक ``पालक`` पद सृजित कर उस पर संघ के नेता को बिठाने की तैयारियां की जा रही थीं। इस नए कदम से भाजपा के अंदरखाने में खिचड़ी उबलना आरंभ हो गई है। भाजपा में गैर संघीय विचारधारा वालों को संघ का दखल बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। कहा जा रहा है कि जल्द ही भाजपा दो फाड़ होने वाली है, जिसमें संघ विचारधारा वाले लोग संघ के नियंत्रण वाली भाजपा में तो गैर संघीय विचारधारा वाले लोग अपना रास्ता अलग चुन लेंगे।

राजा की एक और फतह
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दििग्वजय सिंह ने भले ही दस सालों तक सक्रिय राजनीति से तौबा करने का कौल लिया हो पर उनके एक के बाद एक विजयी कदमों से लगने लगा है कि वे भी भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तरह एक दो रन के बजाए सिक्सर मारने में ही ज्यादा विश्वास रखते हैं। कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू की उपाधि पाने के उपरांत अब पीएम के सामने भी उनकी नाक उंची हो गई। मध्य प्रदेश में दिग्गी राजा के भरोसे चुनाव जीते राजगढ़ के सांसद नारायण सिंह आमलावे जो कि परंपरागत वेशभूषा में बड़ी सी पगड़ी लगाए हुए थे, को जब राजा ने वजीरे आजम से मिलवाया तो पीएम ने दििग्वजय सिंह की ओर देखकर चुटकी लेते हुए कहा -``भई वाह, आपकी पगड़ी तो मेरी पगड़ी से भी बड़ी है।

``परिवार के भरोसे जटिया!

लगता है भाजपा के कद्दावर नेता सत्यनारायण जटिया की कुंंंडली में शनि ने जमकर अड्डा जमा लिया है। आम चुनावों में बुरी तरह पराजित हुए सत्यनारायण जटिया के पास अब कार्यकर्ताओं का टोटा साफ दिखने लगा है। आजकल वे अपने परिवार के लोगों के साथ ही घूमते नजर आ रहे हैं। जटिया इस बार बारहवीं मर्तबा चुनाव मैदान में थे और यह उनका आठवां चुनाव था जिसमें वे धूल चाट गए। चुनाव हारने के उपरांत मीडिया ने काफी खोजबीन की किन्तु जटिया का कहीं पता नहीं चला। वे मोबाईल रखते नहीं सो उनसे संपर्क होने का सवाल ही नहीं उठता। पिछले दिनों जटिया अपने भाई और पुत्र के साथ ही नजर आए। उनके साथ उनके संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ताओं का टोटा साफ दिखाई पड़ रहा था। भाजपाई कहने से नहीं चूक रहे थे कि पराजित जटिया अब परिवारवाद को हवा देने का काम कर रहे हैं, माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जटिया परिवार का कोई अन्य सदस्य भी भाजपाई राजनीति में पदार्पण कर सकता है।

जोगी को वाकई जोगी बनाने की तैयारी
छत्तीसगढ़ सूबे के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी को अब राजनैतिक बिसात बिछाकर बाबा बैरागी अथाZत जोगी बनाने की तैयारियां की जा रही हैं। जोगी विरोधियो ंने नपे तुले कदमो ंसे जोगी के मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के कान भरने आरंभ कर दिए हैं। कहा जा रहा है कि जल्द ही अजीत जोगी को झारखण्ड का लाट साहब (राज्यपाल) बनाकर भेजने की तैयारियां की जा रही हैं। सोनिया को तर्क दिया गया है कि जोगी के राज्यपाल बनकर जाने से झारखण्ड के आदिवासियों में कांग्रेस के प्रति अच्छा संदेश जाएगा। वैसे दूसरा गुट यह प्रयास कर रहा है कि जोगी को सक्रिय राजनति से किनारा करवा तो दिया जाए पर झारखण्ड का राज्य पाल न बनाया जाए, क्योंकि जोड़ तोड़ के महारथी जोगी अगर झारखण्ड गए तो वहां अपना व्यापक जनाधार तैयार कर लेंगे। जोगी समर्थकों का कहना है कि जोगी को राज्यपाल न बनाकर उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर झारखण्ड भेजा जाए।

अजुZन हंसराज के लिए नई जवाबदारी की तलाश
मनमोहन सिंह सरकार में शामिल न किए गए कद्दावर नेता अजुZन सिंह, हंसराम भारद्वाज के लिए अब नई जवाबदारी की खोज की जा रही है, दोनों ही नेताअों ने राज्यपाल बनने से साफ इंकार कर दिया है। यह काम इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि कांग्रेस के आला नेताओं को खतरा है कि अगर ज्यादा दिन तक विन्ध्य के ठाकुर को खाली रखा गया तो आने वाले समय में विस्फोट ही विस्फोट होने की संभावनाएं हैं। कहा भी जाता है खाली दिमाग शैतान का घर। पहले अजुZन सिंह को उत्तर प्रदेश भेजा जा रहा था, पर उनके इंकार के बाद अब यूपी के लिए राहुल गांधी के सलाहकार कनिष्क के पिता एवं राजस्थान के राज्यपाल एस.के.सिंह का नाम आगे चल रहा है। वैसे भी यूपी युवराज के टारगेट में है। शीशराम ओला को मध्य प्रदेश, बलराम जाखड़ को महाराष्ट्र एवं अनिल शास्त्री को राजस्थान का लाट साहब बनाया जा सकता है।

पंच वषीZय योजना है इंदौर दाहोद रेलमार्ग
कांग्रेस भले ही आदिवासियों की कितनी भी हिमायती अपने आप को बताती रहे किन्तु जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। इसका जीता जागता उदहारण इंदौर दाहोद रेलखण्ड है। मक्सी, देवास, इंदौर, दाहोद गोधरा रेल मार्ग है। इस योजना को 1989 - 90 में स्वीकृति प्रदाय की गई थी। इसके बाद जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते यह रेल खण्ड ठण्डे बस्ते के हवाले हो गया। रतलाम के नए सांसद और केंद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया ने इस रेल लाईन को आरंभ कराने हेतु हरी झंडी अवश्य ही दिखाई है, किन्तु उन्होंने इस रेल खण्ड को पंच वषीZय योजना के रूप में पांच सालों में पूरा करने की बात कहकर सभी को चौंका दिया है। वैसे भी यह योजना पिछले बीस सालों से रेल मंत्रालय में पड़ी पड़ी धूल ही खा रही है। आदिवासियों के हितों का शोषण आखिर कांग्रेस कब तक करती रहेगी, यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

सोमदा बिन वामदल सूने
कम्युनिष्ट नेता एवं पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के बिना वामदलों की सांसे उखड़ती प्रतीत हो रही हैं। सोमनाथ चटर्जी को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद औंधे मुंह गिरी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अब सोमदा की वापसी के मार्ग प्रशस्त करने वाली है। दरअसल माकपा नेतृत्व पर सोमदा को वापस लेने का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। कहा जा रहा है कि अगामी 19 जून को पार्टी पोलित ब्यूरो की बैठक एवं उसके बाद 20 एवं 21 जून को होने वाली दो दिवसीय केंद्रीय कमेटी की बैठक में सोमदा को वापस लेने का मामला जोर शोर से उठ सकता है। केंद्रीय नेतृत्व इस आशंका के चलते सोमदा की वापसी के सारे मार्ग पहले ही्र प्रशस्त करने के मूड में दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि माकपा के गढ़ पश्चिम बंगाल में चुनावों के चलते पार्टी की दुर्दशा के लिए सोमदा को दरकिनार करना भी एक बड़ा कारण है।

आक्सीजन पर है छग कांग्रेस
पिछले एक दशक से छत्तीगढ़ में कांग्रेस का संगठन आईसीसीयू में ही पड़ा दिख रहा है। अजीत जोगी की प्रदेश में सरकार बनने के उपरांत छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचा है। छग में कांग्रेस के रसातल में जाने की प्रमुख वजह यहां पसरी गुटबाजी है। छग के इकलौते कांग्रेसी सांसद चरण दास महंत को केंद्र में मंत्री नहीं बनाया गया। इस पर छग कांग्रेस को प्रलाप, विलाप अवश्य करना चाहिए था, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। छग में इस बात को लेकर जलसा हुआ। अनेक कांग्रेसियों के घर रोशन भी हुए। जब वे सांसद बने तो कई घरों में मातम भी मना था। दूसरी ओर दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेता छग के कांग्रेसियों को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। जब भी कोई कांग्रेसी मिलने का प्रयास करता है तो उसकी बारी सबसे अंत में ही आती है। अगर आलम यही रहा तो नगरीय निकायों में भी लोकसभा की तरह ही सीट ढूंढना होगा।

चर्चित रहा संघ का महाकौशल सम्मेलन
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हाल ही में महाकौशल स्तरीय एक सम्मेलन का आयोजन जिला मुख्यालय सिवनी में किया। यह सम्मेलन देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली तक में चर्चा का विषय बना। हुआ यह कि संघ के इस कार्यक्रम के अंतिम दिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सिवनी शहर में रहने के बावजूद भी उन्होंने इस कार्यक्रम मे ंशिरकत नहीं की। वे आधे रास्ते से ही अपने उड़न खटोले की ओर गए और राजधानी भोपाल के लिए उड़ लिए। इसके उपरांत स्थानीय मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला में आयोजित सम्मेलन में भी शाला के शिखर पर संघ के भगवा ध्वज को देखकर लोग यह कहने से नहीं चूके कि कहीं यह संघ का ब्रितानी विचारधारा के साथ मिलाप तो नहीं!

पुच्छल तारा
लगता है कि कभी ``भाई साहेब, भाई साहेब``, कहकर न थकने वाले नेताओं ने अब अपनी निष्ठा बदल दी है। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के सिवनी प्रवास के दौरान भाजपा के उनके बड़े दो समर्थक जिनके पहले पूर्व लगा हुआ है की अनदेखी सियासी गलियारों में चर्चित हो रही है। हुआ यूं कि निजी यात्रा पर निकले भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री जिला मुख्यालय सिवनी में अल्प प्रवास पर रूके। उनके वहां से जाने के उपरांत उसी जगह से पूर्व विधायक डॉ.ढाल सिंह बिसेन फिर पूर्व सांसद एवं वर्तमान विधायक श्रीमति नीता पटेरिया गुजरीं, नीता पटेरिया गुजरीं। श्रीमति पटेरिया तो वहां रूकीं पर डॉ.बिसेन फर्राटे के साथ वहां से गुजर गए। भाजपाईयों में चल रही कानाफूसी के अनुसार कहीं दोनों पूर्व की निष्ठा तो नहीं बदल गई है।