शुक्रवार, 4 जून 2010

कब तक जहर पिएगा आवाम

. . . मतलब तब तक जहर पिए रियाया

शीतल पेय मामले में कोर्ट सख्त तो सरकार नरम!

(लिमटी खरे)

देश में कीटनाशक की अत्याधिक मात्रा से युक्त शीतल पेयजल की बिक्री के मामले में देश के सबसे बडे न्यायालय की ताजा टिप्पणी से साफ हो जाता है कि अपने स्वार्थों की बलिवेदी पर सरकार और देश के जनसेवकों द्वारा आवाम के स्वास्थ्य को किस कदर चढाया जा रहा है। देश में शीतल पेय के नाम पर कीटनाशक जैसा धीमा जहर पिलाने वाली बडी व्यापारिक कंपनियों की सरेराह की जाने वाली धोखाधडी और गडबडी होने पर उनके खिलाफ कार्यवाही करने के मसले पर सरकार का रवैया कितना टालमटोल भरा होता है।

गौरतलब है कि तकरीबन छः साल पूर्व एक याचिका के माध्यम से शीतल पेय को बाजार में आने से पूर्व उसकी गुणवत्ता जांच और कडे नियम कायदों को तय करने की मांग की गई थी। इसके पहले विज्ञान और पर्यावारण केंद्र (सीएसई) ने अपने प्रतिवेदन में इस बात का खुलासा किया था, कि हिन्दुस्तान में बिकने वाले शीतल पेयजल के कुछ ब्रांड में कीटनाशक की मात्रा निर्धारित से काफी अधिक है। संसद की स्थाई समिति भी 2004 में इस बात के लिए सरकार को ताकीद कर चुकी है कि देश में बिकने वाले शीतल पेयजल में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय निर्धारित मानकों से 42 फीसदी अधिक है।

इतना ही नहीं अगस्त 2006 में सीएसई ने पुनः इसी बात को रेखांकित किया था कि शीतल पेय में कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित से कई गुना अधिक है। देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने भी इस बात को स्वीकार किया है, बावजूद इसके सत्ता के मद में चूर सरकार में बैठे नुमाईंदों ने ठंडे पेय में कीटनाशकों की मात्रा, उसकी गुणवत्ता जांच आदि जैसे संवेदनशील मसले पर नियम कायदे तय करना जरूरी नहीं समझा है। सरकार के हाथ इस मामले में परोक्ष तौर पर बंधे होने से साफ जाहिर हो जाता है कि धीमा जहर पिलाने वाली इन व्यापारिक कंपनियों ने सरकार को अपना जरखरीद गुलाम बना रखा है।

जब जब अदालत द्वारा कडा रूख अख्तिायार कर सरकार को फटकारा जाता है, सरकार द्वारा ‘‘बस कुछ दिन और‘‘ का ब्रम्हास्त्र चलाकर अदालत को भी गुमराह कर दिया जाता है। हाल ही में भी वही हुआ। जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शीतल पेयों में मौजूद तत्वों का खुलासा करने के लिए अधिसूचना जारी करने में देरी को लेकर केंद्र को आडे हाथों लेते हुए उसकी खिंचाई की तो सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आती दिखाई दी। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण इस मामले में लल्लो चप्पो करता दिखाई दिया।

प्राधिकरण ने दलील दी कि नए नियम जारी करने में कम से कम तीन महीने का वक्त और लगेगा। पिछले अनेक वर्षों में सरकार के ढुलमुल रवैए को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यह अवधि भी सरकार को कम पडे। गौरतलब है कि मार्च 2007 में एन.के.गांगुली की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने जब मानक निर्धारित करने की सिफारिश की थी, तब सरकार ने अप्रेल 2009 तक इसे लागू करने का लक्ष्य रखा था। इसके ठीक एक साल एक माह बाद भी सरकार तीन माह का और समय चाह रही है।

सीएसई ने समूचे हिन्दुस्तान में जाकर विभिन्न स्थानों से शीतल पेय के निर्माताओं के उत्पाद ‘‘कोका कोला‘‘ और ‘‘पेप्सी‘‘ घराने के ग्यारह ब्रांड के सत्तावन नमूने एकत्र किए थे। इनकी जांच करने पर सीएसई ने पाया कि इनमें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खतरनाक तत्वों की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित की गई तय सीमा से लगभग पच्चीस गुना अधिक है। इस तरह के हानिकारक तत्व मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ ही साथ अनेग गंभीर संक्रामक बीमारियों के जनक भी हो सकते हैं। इस मामले में गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी सीएसई के सुर में सुर मिलाते हुए मानक निर्धारित करने पर बल दिया था।

शीतल पेय निर्माता कंपनियों की जुर्रत तो देखिए कि आज तक इन कंपनियों ने अपने पेय को बनाने में उपयोग में आने वाली वस्तुओं और रसायन को न केवल उजाकर किया वरन् धडल्ले से सरकारी कार्यक्रमों में अपने शीतल पेय को बेच भी रही हैं। इन व्यापारिक कंपनियों के ‘‘भारी बोझ‘‘ से दबी देश की सरकार और जनसेवकों के मुंह भी इस मसले पर सिले हुए ही हैं। यही कारण है कि शीतल पेय निर्माता कंपनियां मनमानी पर उतारूं हैं और सरकार इनके खिलाफ सख्ती का मानस तक नहीं बना पा रही है। सरकार के घुटने टेकने का अनुपम उदहारण था राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का कार्यकाल। उस समय राजग सरकार ने इन कंपनियों को ‘‘क्लीन चिट‘‘ तक दे दी गई थी, यह किस प्रलोभन के तहत दी गई थी, इस बात को तो राजग सरकार ही बेहतर जानती होगी पर रियाया के साथ राजग ने यह सबसे बडा अन्याय ही किया था कि धीमे जहर निर्माता कंपनी को निर्दोष होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया था।

‘‘सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का‘‘, कहावत को चरितार्थ करते हुए सरकार ने जांच का सरेआम माखौड उडाया है। शीतल पेय निर्माण में कीटनाशक या मानव स्वास्थ्य के लिए हानीकारक तथ्य मोजूद हैं अथवा नहंी इस बारे में सरकार क्या चाहती है और कितनी ईमानदारी से चाहती है उसकी मंशा और भी साफ तब हो जाती है जब गुणवत्ता तय करने के लिए गठित विशेषज्ञ समिति में कोला और अन्य कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को शामिल कर लिया जाता है। मतलब साफ है कि आरोपी को ही अपने बारे में फैसला देने का अधिकार दे दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय इस पर बुरी तरह खफा नजर आया। सरकार को फटकारते हुए कोर्ट ने कहा कि गुणवत्ता की जांच के लिए वैज्ञानिक समिति के पेनल में कोला कंपनियों के अधिकारियों को क्यों रखा गया है। साथ ही अधिसूचना जारी करने में लेट लतीफी करने वाले ढुलमुल सरकारी रवैए पर इस बार माननीय न्यायालय ने सख्त रवैया अपनाकर सरकार से प्रश्न करते हुए कहा कि ‘‘क्या तब तक लोगों को जहर ही पीना होगा!‘‘ सरकार लोगों को जहर पिलाने पर आमदा है और सत्ता तथा विपक्ष में बैठे विशाल जनादेश प्राप्त जनता के नुमाईंदे चुपचाप सब कुछ देख सुन रहे हैं, अब देश की जनता को ईश्वर पर ही भरोसा रखना चाहिए कि वही अवतार लेगा और जनता के दुख दर्द दूर करेगा, क्योंकि मोटी चमडी वाले जनसेवक तो अपने निहित स्वार्थों के आगे कुछ भी सुनने समझने को तैयार नहीं दिखते।

लो सरकार ही जहर पिला रही है




गुरुवार, 3 जून 2010

पहला नागरिक हो तो एसा!

पहला नागरिक हो तो एसा!
सालों बाद पानी किल्लत बिना गुजरी गरमी

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक तक सुबह और शाम दो समय नल के आदी थे, शहरवासी। इसके बाद पानी की किल्लत दिनों दिन बढती गई। एसा नहीं कि सिवनी में पानी के स्त्रोत नहीं हैं। पानी के पर्याप्त स्त्रोत होने के बाद भी जनसेवकों की अदूरदर्शिता का खामियाजा भगवान शिव की नगरी में रहने वालों को भोगना पडा। एशिया के सबसे बडे मिट्टी के बांध होने का गौरव पाने वाली संजय सरोवर परियोजना के होते हुए भी सिवनी शहरवासियों के कंठ सूखे ही रह जाते हैं। अपने आंचल में बबरिया, दलसागर, बुधवारी और मठ जैसे विशाल जलसंग्रह क्षमता वाले तालाब के अलावा रेल्वे स्टेशन से सटे हुए दो छोटे तालाब सहेजने के बाद भी अगर सिवनी में नागरिकों को निस्तार के लिए भी पर्याप्त पानी न मिल सके तो इसे जनसेवकों की अक्षम्य और बडी चूक की ही श्रेणी में रखा जाएगा।

नब्बे के दशक तक सिवनी शहर को पानी प्रदाय के लिए इकलौती पानी की टंकी टिग्गा मोहल्ला में हुआ करती थी, जिसे बबरिया और लखनवाडा के तट से पानी लाकर भरा जाता रहा है। कालांतर में पानी की टंकियों की संख्या बढी और भीमगढ बांध से सुआखेडा से सिवनी तक लंबी पाईपलाईन बिछा दी गई। इसे सिवनी शहर की आबादी को 2025 तक का आंककर दोनों समय पानी देने की गरज से बनाया गया था। कांग्रेस के शासनकाल में स्थापित इस परियोजना की गुणवत्ता पर उसी वक्त प्रश्न चिन्ह लग गया था। परीक्षण के दौरान ही कलेक्टोरेट के सर्किट हाउस वाले गेट के पास पाईप लाईन पानी का दवाब नहीं सह पाई और उसने आसमान की ओर मुंह कर दिया था। आज यह नल जल योजना माह में आधे दिन ही लोगों का साथ दे पाती है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, किसी भी जनसेवक ने इस घटिया, स्तरहीन नल जल योजना के बारे में कभी भी कोई प्रश्न विधानसभा में उठाने की जहमत नहीं उठाई। यह नल जल योजना तत्कालीन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री ठाकुर हरवंश सिंह के स्वर्णिम कार्यकाल का एक बदनुमा दाग है सिवनी के माथे पर। इस योजना के बारे में न तो कोई जनहित याचिका ही दायर करने का साहस जुटा पाया न ही मध्य प्रदेश की सबसे बडी पंचायत अर्थात विधानसभा में ही इसको चेलेंज किया जा सका है। यह क्यों नहीं किया जा सका, यह बात भी आईने के मानिंद साफ ही है, कि कौन किसके एहसानों तले बुरी तरह दबा हुआ है, किसने किस कारण अपना मंुह बंद कर रखा है! कौन जान बूझकर ही अपने नयनों पर काली पट्टी बांधे हुए हैं। ये सारे जतन बेमानी है, नेता सोच रहे हैं कि शतुरमुर्ग के मानिंद वे रेत में अपनी गर्दन गाडकर सोच रहे होंगे कि उन्हें कोई देख नहीं रहा है, पर सच्चाई इससे इतर ही है। जनता नेताओं की नूरा कुश्ती समझ चुकी है। समय समय पर किसी महाबली विशेष के विरोध का दिखावा भी अपना उल्लू सीधा करने की एक रणनीति का ही हिस्सा है।

जब से नगर पालिका परिषद में चुनी हुई परिषद विराजी है तब से याद नहीं पडता कि किसी गरमी के मौसम में पानी की किल्लत के बिना गुजारा हुआ हो। पिछले पांच सालों के कार्यकाल में तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त हुए हैं। सत्ता के मद में चूर परिषद ने लोगों को तीन तीन चार चार दिन तक पानी नहीं दिया, और मजे से अपने अपने घरों में फायर बिग्रंेड बुलाकर काम चलाया। भगवान शिव की नगरी सिवनी की सीधी साधी भोली भाली ने सब कुछ देखा सुना और सहा। नागरिकों को लगने लगा था कि ग्रीष्मकाल आरंभ होने के पहले ही फरवरी से अगस्त तक के सात माह पानी की किल्लत से आम जनता को गुजरना ही होगा। वस्तुतः हर साल एसा होता भी रहा है।

पानी की मारामारी के मामले में इस साल की गरमी का मौसम अपेक्षाकृत कम परेशानी भरा रहा है। अनेक मौकों पर हमने खुद भी देखा है कि नगर पालिका के युवा एवं उत्साही अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी द्वारा खुद ही गांधी भवन के पीछे पानी के स्त्रोत पर खडे होकर टेंकर्स में पानी भरवाया गया। इतना ही नहीं टेंकर पर खुद ही सवार होकर गली मोहल्लों में पानी की सप्लाई भी करवाई गई। देखा जाए तो सिवनी के इतिहास में यह पहला मौका होगा जबकि पालिका के किसी अध्यक्ष द्वारा जनता के इस पानी के दुख को समझा हो। इस साल शहर में पानी की किल्लत की खबरें बहुत ही कम प्रकाश में आई हैं। यह राजेश त्रिवेदी का भाग्य ही माना जाएगा कि इस साल गरमी के मौसम में सुआखेडा जलावर्धन योजना के पाईप लाईन भी ज्यादा नहीं फटे। नगर पालिका में कोई नया चमत्कार नहीं हुआ है। उतने ही टेंकर, फायर बिग्रेड, फायर फायटर हैं, उतनी ही तादाद में वे बिगडे पडे हैं, चालू हालत में उतने ही बल्कि कुछ कम ही टेक्टर्स और टेंकर्स हैं। वही कर्मचारी हैं, फिर इस बार पानी की किलकिल क्यों नहीं हुई।

जाहिर सी बात है कि आज से पहले प्रबंधन का अभाव हुआ करता था। अगर कुशल प्रबंधन में काम किया जाए तो संसाधन महत्वपूर्ण नहीं रह जाते फिर संसाधन भले ही कम क्यों न हों, लक्ष्य की प्राप्ति कठिन जरूर होती है, पर मुश्किल नहीं। राजेश त्रिवेदी ने इस बार गरमी में लोगों को पानी के लिए तरसने से बचाकर एक अनुकरणीय उदहारण कायम किया है, जिसकी हर शहर वासी को मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए। पूर्व में एक बार हमने अपने आलेख में अनुज राजेश के द्वारा किए जा रहे मोक्षधाम के जीर्णाेद्धार के बारे में लिखकर उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी, तब राजेश नगर पालिकाध्यक्ष के पद पर काबिज नहीं थे। आज राजेश सिवनी शहर के पहले नागरिक हैं। शहर की कमान उनके हाथ में है।

राजेश की दूरंदेशी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अध्यक्ष बनने के उपरांत राजेश ने हमसे पहली बात यही पूछी थी, कि सिवनी शहर को किस दिशा में आगे बढाया जा चुका है। शहर आज वाकई में अंदर ही अंदर भर चुका है। चारों दिशाओं में नाकों के बाहर जाने से लोग कतरा रहे हैं। सिवनी की नगर पालिका प्रदेश की पहली नगर पलिका है, जहां ड्रेस कोड लागू किया गया है। आम आदमी आज पालिका कार्यालय जाता है तो उसे वे ही कर्मचारी मान सम्मान देकर उसका काम कर रहे हैं। कम उमर में राजेश द्वारा जिस तरह अनुभवी कदमतालों के जरिए शहर को सलीके से लाने और करीने से सजाने का प्रयास किया है, वह प्रशंसनीय है। सिवनी शहर वासियों को चाहिए कि छोटी मोटी भ्रांतियों और अफवाहों पर कान न देकर राजेश त्रिवेदी के नगर पालिकाध्यक्ष रहते हुए अपने शहर को संवार लें।

निहित स्‍वार्थ में उलझते



निहित स्वार्थ को परे रखें जनसेवक 
 
वर्ष 2011 के लिए जनगणना के लिए भारत सरकार की सेनाएं (कर्मचारियों की फौज) सज गई हैं। हर घर जाकर भारत की वर्तमान जनसंख्या के बारे में आंकडे जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्ति्रया के पहले चरण में जनगणना में लगे अधिकारी लोगों के पास पहुंचने आरंभ हो गए हैं। बावजूद इसके संसद में बैठे जनसेवकों का एक बहुत बडा धड़ा आज भी इस बात पर आमदा ही नजर आ रहा है कि जनगणना को जातिगत आधार पर कराया जाए। आखिर जातिगत आधार पर जनगणना का औचित्य क्या है, इस बात पर कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, बस मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग की कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं सारे जनसेवक। जाति के अधार पर जनगणना के मासले पर केंद्रीय कैबिनेट भी किसी नतीजे पर नहीं पहंुच सकी है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय रहते इस मामले में विचार-विमर्श नहीं किया गया। आखिर क्या वजह है कि जनसेवकों के तर्क-कुर्तक पर केंद्र सरकार ठोस तर्क से लेस होकर सामने आने से घबरा रही है। जनगणना का काम आरंभ हो चुका है, फिर उसे करने या न करने में सरकार का संशय समझ से परे ही है। अगर देखा जाए तो भारत जैसा देश दुनिया में बिरला ही होगा, जहां हर वर्ग, धर्म, सम्भाव के लोगों को अपनी मनमर्जी के काम करने की पूरी आजादी है। इन परिस्थितियों में भारत में जनगणना को जाति, वर्ग, संप्रदाय से पूरी तरह मुक्त ही रखा जाना चाहिए था। एक तरफ तो भारत सरकार यह बात जोर-शोर से कहती है कि हम सिर्फ भारतीय हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना में जाति, वर्ग, संप्रदाय की बात कहना बेमानी ही होगा। भारत में जाति आधारित जनगणना का आगाज 1881 में हुआ था, जिसे 1931 में समाप्त कर दिया गया था। 1931 से 2001 तक किसी को भी जाति आधारित जनगणना नहीं किए जाने से कोई आपत्ति नहीं हुई। भारत गणराज्य के संविधान निर्माताओं ने भी जाति आधारित जनगणना को समर्थन नहीं दिया। देखा जाए तो जब बच्चा स्कूल में पढ़ता है, तब उसे यह पता नहीं होता है कि वह जिसके बाजू में बैठकर अध्ययन कर रहा है वह किस जाति का है। स्कूल में रोजाना आधी छुट्टी के वक्त जिसके साथ बैठकर वह अपना टिफिन शेयर करता है, वह किस जाति का है, उसे इससे कोई लेना देना नहीं होता है। बाद में जब वह पढ़-लिखकर नौकरी के लिए जाता है, तब जरूर उसे पता चलता है कि फलां नौकरी उसके उसी बाल सखा को मिल गई, क्योंकि वह पिछड़ा था, और वह इसलिए वंचित रह गया, क्योंकि वह अगड़ी जाति के घर में जन्म लेकर दुनिया में आया है। इस तरह के भेदभाव को जन्म देने वाली व्यवस्था को तत्काल से रोकने की जरूरत है। 
 
रोजनामचा ब्लॉब में लिमटी खरे

बुधवार, 2 जून 2010

रियाया को जहर पीने को मजबूर करते शासक

ठंडा मतलब जहर!
सरकार ही कीटनाशक पिलाए तो कोई क्या करे!

ठंडे का पैमाना क्या!

मतलब सरकार ही पिला रही है जहर!

(लिमटी खरे)

स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे बाबा रामदेव ने जब देश में ठंडे पेय के कुछ उत्पादों के खिलाफ देशव्यापी अभियान छेडा तब उसकी व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आईं थीं। देश में जब ठंडे पेय पदार्थ के कुछ ब्रांड ने कीटनाशक का काम आरंभ किया और लोगों ने इसे आजमाया तब जाकर उनकी आखें खुलीं, पर देश के शासकों की आंखे आज भी इस मामले में बंद ही नजर आ रही हैं। विडम्बना तो यह है कि भारत गणराज्य को आजाद हुए छः से ज्यादा दशक बीत चुके हैं, फिर भी सात सालों के बाद भी सरकार आज तक बाजार में बिक रहे ठंडे पेय के मानक तय नहीं कर पाई है। इससे साफ हो जाता है कि बाजार में बिकने वाले शीतल पेय की लाबी कितनी ताकतवर है कि इनको बनाने वाली कंपनियों के ‘‘भारी दबाव‘‘ के चलते देश की सबसे बडी पंचायत में बैठे जनसेवक अपने कर्तव्यों के प्रति कथित तौर पर उदासीन रवैया अख्तियार किए हुए हैं। अगर मामला उनके वेतन भत्ते बढाने का होता तो निश्चित तौर पर सारे के सारे लामबंद होकर कोई ठोस निष्कर्ष पर पहुंच चुके होते, मगर अफसोस यह मामला रियाया के स्वास्थ्य से जुडा हुआ है इसलिए आवाम का खेरख्वाह कोई भी नहीं है।

इस मसले में सबसे चौकाने वाली बात यह है कि देश में बिक रहे शीतल पेय में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय मानकों के हिसाब से 42 गुना अधिक पाई गई थी। इसके लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति ने सरकार से जल्द से जल्द शीतल पेय संबंधी मानक तय करने की पुरजोर सिफारिश भी की थी, पर नतीजा सिफर ही है। इस समिति का प्रतिवेदन फरवरी 2004 में संसद के पटल पर रखा गया था। इसके तीन साल बाद मार्च 2007 में एन.के.गांगुली की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञों की समिति ने भी केंद्र सरकार से कहा था कि शीतल पेय विशेषकर कोला में कीटनाशकों के मानक निर्धारित कर दिए जाएं। संसद की भेडचाल का आलम यह था कि सरकार ने अप्रेल 2009 तक इनका मानक लागू करने का लक्ष्य रखा था। कितने आश्चर्य की बात है कि जब यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि बाजार में जहर के तौर पर बिक रहे शीतल पेय में कीटनाशकों की मात्रा बहुत ज्यादा है, फिर भी सरकार ने इसे लागू करने के लिए दो साल का और वक्त मांगा। वक्त बीत गया पर आज भी शीतल पेय के मानक निर्धारित नहीं हो सके हैं।

इस मसले को प्रकाश में आए एक लंबा अरसा बीत चुका है फिर भी सरकार द्वारा कोई जरूरी कदम नहीं उठाए गए हैं। इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि शीतल पेय को बनाने वाली कंपनियों ने सरकार और जनसेवकों के मुंह भारी भरकम थैलियों से बंद कर दिए हों, पर देश के जनसेवकों को अपनी मर्यादा और लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना था, वस्तुतः जो नहीं हो पा रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इन शीतल पेय निर्माता कंपनियों के आगे भारत सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। बाबा रामदेव की अपील पर लोगों ने अपने घरों के शौचालय शीतल पेय के एक ब्रांड विशेष से साफ किए और पाया कि बाबा का कहना सही है, इसी के बाद से लोगों के शोचालयों में टायलेट क्लीनर का स्थान इस तरह के शीतल पेय ने ले लिया है। इतना ही नहीं लोगों नें अपनी फसलों पर इस ब्रांड का छिडकाव किया और पाया कि वाकई उनकी फसलें कीट पतंगों से बची हुई है। इस मामले में एक निजी टीवी चेनल के मद्य विरोधी एक विज्ञापन का जिकर लाजिमी होगा जिसमें बेटे को शराब पीता देख पिता उसकी शराब में एक कीडा डाल देता है और कहता है बेटा इसको पीने से आदमी मर भी सकता है। यह सुनकर बेटा तपाक से जवाब देता है कि पिता जी इसीलिए मैं पी रहा हूं कि पेट के कीडे मर जाएं।

केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पंवार खुद ही इस संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं, और उन्होंने ही स्वीकार किया है कि भारत के बाजार में बिकने वाले शीतल पेय में कीटनाशक की मात्रा अंतर्राष्ट्रीय मानकों के हिसाब से कई गुना अधिक है, तब क्या कारण है कि भारत गणराज्य की सरकार द्वारा अपने सवा सौ करोड से अधिक की आबादी वाले देश को इस धीमे जहर का सेवन करने पर मजबूर कर रही है। लोगों को धीमे जहर का अदी बनाने वाली शीतल पेय निर्माता कंपनियां सरकार को मुंह चिढाती ही नजर आ रही हैं। पेप्सिको इंडिया के प्रवक्ता का कहना है कि अगर सरकार शीतल पेय के अंतिम उत्पाद तक मानक लाती है तो वे इसका स्वागत करेंगे। सवाल यह है कि जिस मामले में यह साबित हो चुका है कि वह मानव उपयोग के लिए घातक है तब उसको तत्काल प्रभाव से बंद क्यों नहीं किया जा सकता है। जहां तक रही आखिरी उत्पाद की बात तो सरकार को कहना चाहिए कि आखिरी उत्पाद तक तो हम बाद में जाएंगे, पहले जिसमें जहर है उसे तो बंद कर दिया जाए।

भारत गणराज्य की विडम्बना देखिए, देश की सबसे बडी पंचायत में संसद सदस्यों की सेहत का ख्याल रखते हुए इन शीतल पेय की आपूर्ति संसद में तो रूकवा दी गई है, पर आवाम के लिए यह धीमा जहर हर चाय पान ठेले पर आज भी खुलेआम मिल रहा है। देशी विदेशी कंपनियां इस धीमी मौत के माध्यम से देश की जनता की सेहत से खिलवाड कर रही हैं। जब विशाल जनादेश पाकर आवाम को अमन चैन का सपना दिखा संसद में पक्ष और विपक्ष में बैठने वाले जनसेवक ही अपने कर्तव्यों से मुंह मोड लें तो फिर देशी और विदेशी कंपनियां अपने निहित स्वार्थ के लिए सरेराह जन सामान्य के स्वास्थ्य के साथ अगर खिलवाड कर रही हैं तो इसमें गलत क्या है। जब रक्षक ही अपने कर्तव्यों से मुंह मोड ले तो रियाया आखिर किससे उम्मीद लगाए।

शोभा की सुपारी बने सरकारी अस्‍पताल

अब कामरेडों का उठा भरोसा सरकारी अस्पताल से
मकपा, भाकपा के नेता चले कार्पोरेट अस्पताल की ओर

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली 02 जून। किफायत से चलने के लिए मशहूर कामरेड बीमार पडने पर अब सरकारी अस्पतालों के बजाए निजी अस्पतालों की ओर रूख करने लगे हैं। निजी तौर पर फाईव स्टार संस्कृति वाले अस्पालों को प्रमोट करने की गरज से सरकार द्वारा अपने स्वामित्व वाले सरकारी रूग्णालयों को दुर्दशाग्रस्त करने में कोई कसर नहीं रख छोड रही है। मामला चाहे केंद्र सरकार के अस्पतालों का हो या राज्यों की सरकारों के अधीन चलने वाले अस्पतालों का, हर जगह ही अस्पताल अपनी दुर्दशा पर खुद ही आंसू बहाने पर मजबूर हैं। कल तक माना जाता था कि कामरेड मतलब सादगी पसंद, मितव्ययता के साथ चलने वाला इंसान। आज कामरेड के मायने बदल गए हैं, आज कामरेड विलासिता को अंगीकार करने से नहीं चूक रहे हैं। कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के घर संपन्न हुए विवाह में जिस कदर का शोशा किया गया था, वह किसी से छिपा नहीं है।

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु जब बीमार पडे तो इलाज के लिए उन्हें कोलकता के एक कार्पोरेट अस्पताल में दाखिल करवाया गया। पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी जब अस्वस्थ्य हुए तब उन्हें भी कार्पोरेट अस्पताल में तीमारदारी के लिए ले जाया गया। मकापा के संस्थापक सदस्य हरकिशन सिंह सुरजीत को अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में दाखिल करवाने के उपरांत नोएडा स्थित कार्पोरेट अस्पताल में इलाज हेतु गए। उनका इलाज मंहगे आलीशान ‘‘मेट्रो अस्पताल‘‘ में किया गया था।

पिछले दिनों ‘हर एक नागरिक को निशुल्क इलाज मुहैया करवाने‘‘ के प्रस्ताव पर स्वास्थ्य संबंधी कामों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘प्रयास‘ और जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा राजधानी में आयोजित एक परिचर्चा में देश भर से आए स्वास्थ्य एक्टिविस्ट ने एक स्वर से यही बात कही थी कि देश भर में निजी अस्पतालों को बढावा देने के लिए सरकारों द्वारा जनबूझकर ही सरकारी अस्पतालों को दुर्दशा ग्रस्त छोड दिया गया है। मंहगे आलीशान अस्पतालों में गरीबों को इलाज के लिए धक्के खाने पडते हैं। गौरतलब है कि पिछले पांच सालों में राजधानी के मंहगे फोर्टिस अस्पताल ने सरकारी नियम कायदों को धता बताते हुए महज पांच गरीब मरीजों का ही इलाज किया था, रही बात सरकारी सुविधाओं की तो इस अस्पताल ने सरकार से मिलने वाली सारी सुविधाओं को पर्याप्त मात्रा में उपभोग किया जा रहा है।

देश के सबसे बडे सरकारी अस्पताल ‘एम्स‘ को भगवान भरोसे ही छोड दिया गया है। कहने को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एम्स में अपनी बायपास सर्जरी करवाई थी, पर कम ही लोग इस बात को जानते हैं कि देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई से निजी अस्पताल के एक कुशल सर्जन को इसके लिए पाबंद किया गया था, जिसने अपने साथ समूचा आपरेशन थियेटर ही लेकर आए थे। देश के सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा को देखकर सादगी पसंद कामरेड भी अब कार्पोारेट अस्पतालों की ओर रूख करने पर मजबूर हो गए हैं।

जात न पूछो साधु की




मंगलवार, 1 जून 2010

जनगणना में जात का क्या काम

जनगणना में जात का क्या काम

जाति आधारित जनगणना बढाएगी मानव से मानव की दूरी

निहित स्वार्थ को परे रखें जनसेवक

(लिमटी खरे)

2011 के लिए जनगणना के लिए भारत सरकार की सेनाएं (कर्मचारियांे की फोज) सज गईं हैं। हर घर जाकर भारत की वर्तमान जनसंख्या के बारे में आंकडे जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के पहले चरण में जनगणना में लगे अधिकारी लोगों के पास पहुंचने आरंभ हो गए हैं, बावजूद इसके संसद में बैठे जनसेवकों का एक बहुत बडा धडा आज भी इस बात पर आमदा ही नजर आ रहा हैं कि जनगणना को जातिगत अधार पर कराया जाए। आखिर जातिगत आधार पर जनगणना का ओचित्य क्या है, इस बात पर कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, बस मेरी मुर्गी की डेढ टांग की कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं सारे जनसेवक। जाति के अधार पर जनगणना के मासले पर केंद्रीय केबनेट भी किसी नतीजे पर नहीं पहंुच सकी है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि आखिर एसा क्या हुआ कि समय रहते इस मामले में विचार विमर्श क्यों नहीं किया गया। आखिर क्या वजह है कि जनसेवकों के तर्क कुर्तक पर केंद्र सरकार ठोस तर्क से लेस होकर सामने आने से क्यों घबरा ही है। कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी जाति आधारित जनगणना के पोषक बनकर सामने आए हैं, तब केंद्र सरकार क्या खाक इस मामले में बचाव के लिए आगे आ सकेगी। जनगणना का काम आरंभ हो चुका है फिर उसे करने या न करने में केंद्र सरकार का संशय समझ से परे ही है।

अगर देखा जाए तो भारत जैसा देश दुनिया में बिरला ही होगा, जहां हर वर्ग, धर्म, सम्भाव के लोगों को अपने मन मर्जी के काम करने की पूरी आजादी है। इन परिस्थितियों में भारत में जनगणना को जाति, वर्ग, संप्रदाय से पूरी तरह मुक्त ही रखा जाना चाहिए था। एक तरफ तो भारत सरकार यह बात जोर शोर से कहती है कि हम सिर्फ भारतीय हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना में जाति, वर्ग, संप्रदाय की बात कहना बेमानी ही होगा। भारत में जाति आधारित जनगणना का आगाज 1881 में हुआ था, जिसे 1931 में समाप्त कर दिया गया था। 1931 से 2001 तक किसी को भी जाति आधारित जनगणना नहीं किए जाने से कोई आपत्ति नहीं हुई। भारत गणराज्य के संविधान निर्माताओं ने भी जाति आधारित जनगणना को समर्थन नहीं दिया।

दरअसल, जाति आधारित जनगणना को हवा मिली है पिछडों को आरक्षण देने की कवायद के बाद। पिछडों के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं को लगने लगा है कि जाति अधारित जनगणना से अगडों और पिछडों की संख्या का ठीक ठीक भान होने पर वे अपनी राजनीति को और अधिक चमका सकेंगे। देखा जाए तो यह मामला काफी हद तक आईने की तरह ही साफ है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में भी इस तरह की मांग उठी थी, तब बाजपेयी की अगुआई में हुई मंत्रीमंडल की बैठक में इसे सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद पिछले साल नवंबन में केंद्रीय कानून मंत्री ने भी जाति आधारित जनगणना चाही थी, पर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने इसे भी खारिज ही कर दिया था।

जाति आधारित जनगणना चाहने वालों का तर्क सही करार दिया जा सकता है कि जब सरकार जाति के आधार पर आरक्षण और अन्य कार्यक्रमों का संचालन करती है तो फिर जनगणना को जाति के आधार पर क्यों नहीं! इस मामले में सरकार को सोचना ही होगा कि आखिर एसा क्यों! क्या देश के शासकों ने अब तक की नीतियां इतनी खोखली बनाईं थीं कि समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने के बावजूद भी देश को आजाद हुए 62 साल हो चुके हैं और पिछडों को मुख्यधारा में नहीं लाया जा सका है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जाति आधारित आरक्षण को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके स्थान पर अब गरीबों की आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए, क्योंकि गरीब की कोई जात नहीं होती। आर्थिक तौर पर पिछडे लोगों को वास्तव में सरकारी इमदाद की आवश्यक्ता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस मामले में ना तो केंद्र सरकार ही कोई ध्यान दे रही है और न ही विपक्ष में बैठे जनसेवक ही कोई प्रयास करते नजर आ रहे हैं।

भारत की आजादी के उपरांत यही अवधारणा जन्मी थी कि वंचित और दबे कुचले, असहाय समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की अस्थाई व्यवस्था की जाए ताकि ये अपना सामाजिक जीवन बेहतर बना सकें। यह व्यवस्था पहले दस सालों के लिए लागू की गई थी, बाद में किसी जांच आयोग के कार्यकाल की तरह इसकी समयावधि निरंतर ही बढाई जाती रही है। देखा जाए तो आरक्षण के पीछे मूल भावना यह रही है कि जात पात के भेदभाव को अंततोगत्वा समाप्त ही किया जाए। पिछले कुछ दशकों में आर्थिक सामाजिक विकास की सतत प्रक्रिया ने लोगों के रहन सहन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके परिणाम स्वरूप समाज और परिवार का ढांचा बदला है। एक समय था जब अंतर्जातीय विवाह करने वाले को आश्चर्य की नजर से देखा जाता था, पर आज खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों को अगर छोड दिया जाए तो इस तरह के विवाह आम हो चुके हैं।

2011 की जनगणना में 2,209 करोड रूपए फूंके जाने वाले हैं, इस बार। इस काम में 12 हजार टन कागज का प्रयोग किया जाएगा, एवं 64 करोड से ज्यादा फार्म भरे जाएंगे। इस काम में 25 लाख से अधिक कर्मचारी और अधिकारी शामिल हो रहे हैं इस काम में। इसमें 7 हजार कस्बे और 6 लाख गांव शामिल किए गए हैं। देखा जाए तो जब बच्चा स्कूल में पढता है, तब उसे यह पता नहीं होता है कि वह जिसके बाजू में बैठकर अध्ययन कर रहा है वह किस जाति का है, वह तो महज उसका नाम ही जानता है। स्कूल में रोजाना आधी छुट्टी के वक्त जिसके साथ बैठकर वह अपना टिफिन शेयर करता है, वह किस जाति का है उसे इससे कोई लेना देना नहीं होता है। बाद में जब वह पढ लिखकर नौकरी के लिए जाता है तब जरूर उसे पता चलता है कि फलां नौकरी उसके उसी बाल सखा को मिल गई क्योंकि वह पिछडा था, और वह इसलिए वंचित रह गया क्योंकि वह अगडी जाति के घर में जन्म लेकर दुनिया में आया है। इस तरह के भेदभाव को जन्म देने वाली व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से रोकने की महती आवश्यक्ता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारतवासियों की आपस में बढती कटुता को और अधिक बढाने के मार्ग प्रशस्त होंगे, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जनसेवकों को अपने निहित स्वार्थों को परे रखना ही होगा, और अखंड भारत में दरार डालने वाली जात पात की व्यवस्था पर लगाम लगाना होगा, वरना आने वाले कल के भारत की तस्वीर और भयावह हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सोज और आजाद आमने सामने

आजाद और सोज में ठनी रार
एक दूसरे से दुआ सलाम भी नहीं बची दोनों के बीच

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 जून। जम्मू काश्मीर के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री गुलाम नवी आजाद और वर्तमान अध्यक्ष सेफुद्दीन सोज के बीच तलवारें जमकर खिंच गईं हैं। दोनों के बीच कलह का आलम यह है कि अब दोनों के मध्य ‘‘टाकिंग टर्मस‘‘ भी नहीं बचे हैं। वैसे भी गुलाम नवी आजाद और सैफुद्दीन सोज के बीच का मन मुटाव किसी से छिपा नहीं है। कश्मीर के कांग्रेस के इन क्षत्रपों ने एक दूसरे के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार सार्वजनिक तौर पर करने से गुरेज भी नहीं किया है। जब भी आजाद कश्मीर जाते हैं तो उनकी बनती कोशिश होती है कि उनका सामना सोज से न हो पाए।

पिछले दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद जम्मू कश्मीर यात्रा पर थे। चार दिनों की अपनी यात्रा में व्यस्त क्षणों में से उन्होंने कुछ समय निकाला और पहुंच गए श्रीनगर के रायल स्प्रिंग कोर्स में गोल्फ खेलने। गुलाम को भान भी न होगा कि वहां उनकी मुलाकात अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी सैफुद्दीन सोज से हो जाएगी। जब गुलाम वहां थे, तभी वहां पहुंच गए जम्मू काश्मीर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज।

वहां उपस्थित लोगों के आश्चर्य की सीमा तब नहीं रही जब उन्होंनें देखा कि सूबे के कांग्रेस के दो वरिष्ठतम नेताओं ने एक दूसरे को सामने पाकर न केवल बातचीत से ही परहेज किया वरन् एक दूसरे को दुआ सलाम करना भी गैरमुनासिब ही समझा। अब लोग दोनों की इस कदर दुश्मनी के अंदरखाते की खबरें खोजने में लगे हुए हैं कि आखिर क्या वजह रही कि आजाद और सोज आपस में इतना दुराव क्यों पाले हुए क्यों हैं। बताते हैं कि सैफुद्दीन सोज ने अपनी टीम में पूर्व आतंकवादी कुक्का पार्रे के पुत्र इम्तियाज को अपनी टीम का सदस्य बना लिया है, आजाद खेमा इम्तियाज के कांग्रेस में प्रवेश के खिलाफ था, सो ठन गई रार दोनों ही नेताओं के बीच।

कबूतर भेजे पाक ने

पाक की नापाक करतूत






सोमवार, 31 मई 2010

पाकिस्तान भेज रहा है 'कबूतर जासूस'

ये है दिल्ली मेरी जान



लिमटी खरे




पाकिस्तान भेज रहा है 'कबूतर जासूस'
हिन्दुस्तान को हर तरह से अस्थिर करने की जुगत में लगे पाकिस्तान ने अपने नापाक इरादों के तहत अब कबूतर जासूस भेजना आरंभ कर दिया है। पिछले दिनों त्रिकुटा पर्वत पर विराजीं माता वेष्णो देवी के बेस केम्प कटडा में पकडे गए एक कबूतर के पैर पर कुछ संदिग्ध टेलीफोन नंबर और संदेश दर्ज था। इसी तरह का एक कूबतर पाक सीमा पर ततेयाल गांव के करीब भी पकडा गया है। 2009 में भी एक इसी तरह का कबूतर आरएसपुरा के पास सुचैतगढ में पकडा गया था। इन कबूतरों पर लिखे संदेशों की डिकोडिंग आरंभ कर दी गई है। हो सकता है कि इन कबूतरों के माध्यम से केमरा चिप आदि के माध्यम से चित्र वीडियो फुटेज आदि जुटाए जा रहे हों। जानकारों का कहना है कि इस तरह से कबूतर हमला कर पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण की नई रणनीति तैयार की जा रही हो। उधर कबूतरबाजों की माने तो इस तरह के खास कबूतरों को संदेश लाने ले जाने के काम में इस्तेमाल किया जाता है। ये कबूतर लगातार घंटो उडान भर सकते हैं और बिना रास्ता भटके अपने घर वापस लोट सकते हैं। उडान के पहले इन्हें बादाम, काले चने और दूध पिलाया जाता है। भारत में इस तरह की गतिविधियों के बाद अगर खुफिया एजेंसी हरकत में न आईं तो आने वाले दिनों में पाक के आतंकी पिल्ले फिर से हमला कर दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

प्लेटफार्म बिकता है बोलो खरीदोगे!
दिल्ली में प्लेटफार्म पर हुई भगदड से संबंधित नई कहानी प्रकाश में आ रही है। कहा जा रहा है कि इसके पीछे वैंडर्स का खेल है, जिससे उच्चाधिकारी भली भांति परिचित हैं। चर्चा है कि कौन सी रेलगाडी किस प्लेटफार्म पर आएगी इसको कौन तय करता है, जवाब है ‘‘चढावा‘‘। दरअसल रेल्वे स्टेशन पर खानपान और अन्य सामग्रियां बेचने वाले वेंडर्स के चढावे पर ही तय होता है कि कौन सी रेलगाडी किस प्लेटफार्म पर आएगी। ये वेंडर्स पहले से ही प्लेटफार्म पर अपनी ट्राली लगा लेते हैं। इसके बाद आरंभ होता है खेल। दिल्ली में बीते दिनों हुई दुर्घटना पर अगर नजर डाली जाए तो प्लेटफार्म नंबर 2 पर सात, छः और सात पर 80, 8 और 9 पर 70, 10 तथा 11 पर 60, 12 और 13 पर 125, 14 और 15 पर पचास अवैध वेंडर्स ने अपना डेरा जमा रखा था। गौरतलब है कि प्लेटफार्म 15 गाडी 13, 13 की 12 पर स्थानांतरित किया गया था। अब ममता दीदी को कौन समझाए कि रेल्वे के कण कण में भ्रष्टाचार समा चुका है, जिसे निकाल पाना शायद किसी के बस की बात नहीं है। हालात देखकर यही कहा जा सकता है, ‘‘प्लेटफार्म बिकता है बोलो खरीदोगे।‘‘

आप भी दे दो कसाब को फांसी
2008 में देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के इकलौते जिंदा दोषी कसाब के बारे में हर भारतीय का मन होता होगा कि कसाब की गर्दन हाथ में आ जाए और उसे फांसी पर चढा दिया जाए। वास्तविकता में तो आप एसा नहीं कर सकते किन्तु अगर आप चाहें तो इंटरनेट पर कसाब को फांसी पर चढा सकते हैं। नेट पर ‘आनलाईन रियल गेम्स डाट काम‘ पर ‘‘हेंग कसाब‘‘ नाम का खेल मोजूद है। इसके माध्यम से आप जितनी बार चाहे कसाब को फांसी पर चढा सकते हैं। हर बार सफलता पूर्वक फांसी देने पर आपको बाकायदा 100 प्वाईंट भी मिलंेगे। एक मिनिट के इस खेल में कसाब बचने की हर संभव कोशिश करता है। हिन्दुस्तान में यह खेल इतना लोकप्रिय हो गया है कि रोजाना एक लाख लोग कसाब को फांसी पर चढा रहे हैं।

उर्दू अकामदी का उर्दू को बढावा!
केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यक वोट बैंक तगडा करने की जुगत में उर्दू भाषा को बढाने का प्रयास किया जाता रहा है, इस मामले में कांग्रेस का कोई सानी नहीं है। उर्दू को बढावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा करोडों अरबों रूपए फूंके जाते हैं, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की उर्दू अकादमी द्वारा उर्दू जुबान के साहित्यकारों का सरेआम माखौल उडाया जा रहा है। वर्ष 2009 - 2010 के लिए अकादमी पुरूस्कारों की घोषणा की गई। चयन समिति ने विभिन्न स्तरों पर पुरूस्कारों के लिए देश भर से ग्यारह लोगों का चयन किया था। चयनित लोगों को उर्दू अकादमी के बुलावे का इंतजार था। इन लोगों का भरम तब टूटा जब इन्हें पुरूस्कार के लिए बुलावा तो नहीं आया पर इन्हें पुरूस्कार में मिली राशि और प्रशस्ति पत्र भारत डाक एवं तार विभाग के सौजन्य से घर बैठे ही प्राप्त हो गया। साहित्यकारों की आपत्ति वाजिब है, उनका कहना है कि उनका सम्मान बकायदा सम्मान समारोह आयोजित कर किया जाना चाहिए था, और महामहिम राज्यपाल द्वारा उन्हें पुरूस्Ńत किया जाना चाहिए था, वस्तुतः जो हुआ नहीं।

शेखावत के खाते में एक रूपैया 9 पैसा!
दिवंगत पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के एक बैंक खाते में कितनी रकम हो सकती है। जी हां आपको जानकर अश्चर्य होगा कि शेखावत के राजस्थान के उदयपुर स्थित महिला समृद्धि बैंक के खाते में महज एक रूपए 09 पैसे ही जमा हैं। इस खाते के खुलने के उपरांत से ही इसमें कोई लेन देन नहीं हुआ है। दरअसल 1995 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस बैंक का उद्घाटन किया था। उस समय बैंक के अनुरोध पर भैरो सिंह शेखावत ने महिला समृद्धि बैंक में खाता खुलवाया था। मजे की बात यह है कि उस समय शेखावत की जेब में महज बीस रूपए ही थे। गनीमत थी कि वहां उपस्थित बैंक कर्मी ने शेखावत के खाते को खोलने के लिए दो रूपए मिलाए तब जाकर 22 रूपए में उनका खाता खुल सका था। इस खाते में सालाना ब्याज जुडकर 2002 तक रकम 35 रूपए तक पहुंच गई थी। इसके उपरांत न्यूनतम बैलेंस 500 रूपए न रख पाने से उनके खाते से निर्धारित राशि का आहरण बैंक द्वारा लगातार किया जाता रहा है, जिससे अब उनके खाते की रकम घटकर एक रूपैया और 9 पैसा ही बची है।

आईएएस का छग से मोहभंग
नक्सलवाद की आग में झुलस रहे छत्तीसगढ सूबे से अफसरशाही की रीढ माने जाने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का मोह भंग होता जा रहा है। काडर बेस्ड अधिकारियों की तैनाती में अहम भूमिका निभाने वाले डीओपीटी मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार वह विभिन्न राज्यों में अधिकारियों की तैनाती में काडर रिव्यू में जुटा है। छग मेें नक्सलवादी समस्या को देखकर लगता था कि केंद्र सरकार द्वारा सूबे में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की अधिक तैनाती में अपनी सहमति दे देगा, वस्तुतः एसा होता नहीं दिख रहा है। सूबे ने केंद्र से 111 आईएएस अधिकारी मांगे थे, पर उसे मिले महज 103, वर्तमान में इनकी संख्या यहां 81 ही है। छग के अस्तित्व में आने के उपरांत वहां भेजे गए आईएएस अधिकारियों में से मोहम्मद सुलेमान, आई.बी.चहल, विनय शुक्ला, एस.के.राजू ने अपना काडर बदलवा लिया था। अब एम.गीता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा इसी आधार पर खटखटाया है कि जब इनका काडर बदला जा सकता है तो फिर गीता का क्यों नहीं। छग की नक्सल समस्या और भोगोलिक परिस्थितियों से घबराकर आईएएस अधिकारियों ने जुगाड का सहारा लेकर अपना काडर बदलवा लिया है या प्रयास जारी हैं।

राजनीति में माहिर हो गई ‘‘गुड्डी‘‘
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की अर्धांग्नी जया बच्चन ने कभी गुड्डी का किरदार बहुत ही करने से निभाया था, पर राजनैतिक बिसात पर वे गुड्डी नहीं रहीं बल्कि शतरंज की माहिर खिलाडी हो चुकी हैं। अपने बाल सखा राजीव गांधी के कहने पर राजनैतिक जीवन में प्रवेश करने वाले अमिताभ बच्चन को भले ही राजनीति रास न आई हो पर उनकी पत्नि की रग रग में राजनीति बसी दिख रही है। अमर प्रेम के तले दबे बच्चन परिवार की बहू जया ने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की राज्य सभा की पेशकश को जिस कदर ठुकराया है, वह किसी अनाडी राजनेता के बस की बात नहीं, एसे कदम घाघ राजनेता ही उठा सकते हैं। कल तक सायकल की सवारी करने वाले संजय दत्त, मनोज तिवारी, जया प्रदा ने पहले ही मुलायम को बाय बाय कह दिया है। वालीवुड द्वारा की जाने वाली सायकल की सवारी अब सपा के लिए गुजरे जमाने की बात हो गई है। उधर अमिताभ बच्चन की नरेंद्र मोदी से बढती नजदीकियों से कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनांे में जया बच्चन कमल पर बैठी दिखाई दें तो किसी को अश्चर्य नहीं होना चाहिए।

टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने सूबे के समस्त जिला कलेक्टर्स को 24 अप्रेल को एक परिपत्र भेजकर साफ निर्देश दिए थे कि जो भी मंत्री पूर्व सूचना देकर सूबे में आंए उनके लिए प्रोटोकाल का पालन किया जाए। उनकी खातिर तवज्जो में कोई कोर कसर नहीं रखी जाए। इसका अर्थ यह भी लगाया जा रहा है कि अगर कोई बिना सूचना के आता है तो उसकी परवाह न की जाए। मध्य प्रदेश सूबे का प्रतिनिधित्व करने वाले चार में से तीन मंत्री कांति लाल भूरिया, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरूण यादव ने शिवराज के इस फरमान पर अपनी गहरी नाराजगी जताई, पर कमल नाथ ने चिरपरिचित शांति का ही परिचय दिया। तीनों मंत्रियों ने पलटवार करते हुए कहा कि उनके द्वारा सूचना देने पर भी समीक्षा बैठकों में सूबे के आला अधिकारी नदारत ही रहते हैं। कांतिलाल भूरिया ने तो प्रधानमंत्री से यहां तक सिफारिश कर डाली कि अगर शिवराज बाज न आएं तो केंद्रंीय इमदाद को तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए। राजनैतिक बियावान में कमल नाथ की मुस्कुराहट और इस मसले पर शांति के अर्थ अपने अपने ढंग से खोजे जा रहे हैं।

भारत सुरक्षित है सैलानियों के लिए
आतंकी गतिविधियों के निशाने पर आए हिन्दुस्तान में विदेशी सैलानियों की आवाजाही काफी हद तक कम हो चुकी है। समूची दुनिया विशेषकर दुनिया के चौधरी अमेरिका ने अपने नागरिकों को हिन्दुस्तान न जाने का मशविरा दिया है। इस सबके चलते विदेशी राजस्व में आई कमी को दूर करने की गरज से केंद्र सरकार हरकत में आई है। केंद्रीय पर्यटन सचिव सुजीत बनर्जी ने टोरंटो में एक कार्यŘम में कहा कि भारत पूरे एशिया में न केवल विदेशी पर्यटकोें के लिए न केवल सुरक्षित स्थान है वरन् यह ध्यान, योग, चिकित्सा के क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है। भले ही भारत में आंतरिक और बाहरी अस्थिरता चल रही हो पर यह सच है कि यहां पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही अनुकूल माहौल है। भारत सरकार अगर वास्तव में विदेशी सैलानियों को आकर्षित करना चाह रही हो तो उसे चाहिए कि आंतरिक और बाहरी सुरक्षा की दीवारें अभैद्य करे, ताकि ‘अतिथि देवो भव‘ को साकार करने के लिए कम से कम उसे पर्यटक तो मिल सकें।

न्यायधीश होंगे जवाबदेह!
न्यायधीशों की जवाबदेही से संबंधित विधेयक को केंद्र सरकार अगले सत्र में पेश किया जा सकता है। उक्ताशय की बात केंद्रीय कानून मंत्री एम. वीरप्पा मोईली ने वैकल्पिक व्यापारिक मध्यस्थता एवं समाधान के एक अंतर्राटŞीय केंद्र के शिलान्यास के मौके पर कही। मोईली ने कहा कि न्यायधीश जवाबदेही बिल पर मंत्रियों के समूह अर्थात जीएमओ ने अपनी सहमति प्रदान कर दी है। इसके संसद के अगले सत्र में पेश होने की संभावना है। न्यायधीशों की उम्र बढाने पर भी केंद्र सरकार विचार कर रही है, पर यह विचार सिर्फ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों पर ही होगा। वर्तमान में न्यायधीशों की सेवानिवृति की आयु 62 वर्ष है, न्यायालयों में मुकदमों के बोझ को देखकर केंद्र सरकार ने विचार किया है कि न्यायधीशों की सेवानिवृति की आयु 62 से बढाकर 65 कर दी जाए।

सरकारी में दम है!
कौन कहता है कि सरकारी सिस्टम कोलेप्स हो चुका है। हो सकता है कि बाबूराज के चलते देखने में लगता हो कि सरकारी सिस्टम के धुर्रे उड रहे हों, पर स्कूल शिक्षा के मामले में प्राईवेट सेक्टर यानी निजी तौर पर चलने वाले स्कूलों से सरकारी स्कूल बहुत ही आगे निकल चुके हैं। निजी शालाओं में फीस का स्टकर्चर बहुत ही हेवी होता है, पर सरकारी स्कूल में फीस बहुत ज्यादा नहीं होती है। अस्सी के दशक के उपरांत आम धारणा बन गई थी कि सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चों का विकास औसत से कम ही होता है, यही कारण था कि निजी स्कूलों की तादाद गली कूचों में कुकुरमुत्तों की तरह हो गई थी। योग्य शिक्षकों के अभाव में इन शालाओं में अध्ययन अध्यापन का काम किसी तरह आगे बढाया जाता रहा है। पिछले कुछ सालों में यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि निजी शालाओं में पढाई का स्तर सरकारी स्कूलों की तुलना में कहीं गिरा हुआ है। इस साल के दसवीं, बारहवी के परीक्षा परिणामों पर अगर गौर फरमाया जाए तो निजी शालाओं के बजाए सरकारी स्कूलों के परफारमेंस में जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया है। सरकारी में दम है, जय हो . . .।

कैदी नंबर सी 7096 यानी कसाब
देश के आम नागरिक को भले ही यूनिक आईडेंटिटी नंबर न मिला हो पर मुंबई आतंकी हमले में पकडे गए इकलौती दोषी कसाब को एक नई पहचान अवश्य ही मिल गई है। पाकिस्तानी बंदूकधारी अजमल आमिर कसाब की नई पहचान है कैदी नंबर सी 7096। जेल के सूत्रों का कहना है कि दोषियों का रिकार्ड रखने के लिए उन्हें नंबर प्रदान किया जाता है। साथ ही जिनकी सजा तीन महीने तक की हो उन्हें ‘ए‘ श्रेणी में, तीन महीने से पांच साल तक की सजा वाले कैदियों को ‘बी‘ श्रेणी में रखा जाता है। चूंकि कसाब को मौत की सजा मिली है, अतः उसे सी श्रेणी में रखा गया है। कसाब को जेल में कोई काम नहीं दिया जाएगा। कसाब सिर्फ अपने कपडे ही धोएगा। कसाब के पास लांडŞी के पैसे नहीं है, इसलिए उसे यह काम खुद ही करना पडेगा। जेल में अकेला अलग थलग पडा कसाब रोज ही जेल अधिकारियों से पूछता है कि उससे मिलने उसके रिश्तेदार आए क्या। अमूमन सात बजे सुबह उठने वाले कसाब का सारा दिन कोठरी के कोने में बैठकर उंघते हुए ही बीतता है।

पुच्छल तारा
जिंदगी क्या है, मौत क्या है, इस बारे में कवियों, लेखकों ने अनगिनत बाते लिखीं हैं। किसी ने जिंदगी को सुनहरा पल तो किसी ने अंधेरे की कोठरी ही बता दिया है। इसी तरह मौत के बारे में भी तरह तरह की बातें लोगों के जेहन में आना स्वाभाविक ही है। नरेंद्र ठाकुर ‘‘गुड्डू‘‘ ने एक जबर्दस्त ईमेल भेजा है जो जिन्दगी और मौत के बीच रिश्ता कायम करते हुए इसे रेखांकित करता है कि जीवन और मृत्यु क्या है। वे लिखते हैं कि जिंदगी की सबसे बडी सच्चाई बयां कर रहा था मोक्षधाम यानि कब्रिस्तान के बाहर लगा एक नोटिस बोर्ड। इस पर लिखा था ‘‘मंजिल तो मेरी यही थी, बस जिंदगी गुजर गई यहां आते आते।‘‘

शुक्रवार, 28 मई 2010

शिव के माथे पर लगा बदनुमा दाग

शिव के माथे पर लगा बदनुमा दाग

हृदय प्रदेश में फिर दागदार हुई वर्दी

एसपी को लेना होगा नैतिक जिम्मेवारी

(लिमटी खरे)

हरियाणा प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर के द्वारा रूचिका गहरोत्रा के साथ की गई ज्यादती, रूचिका का काल कलवित होना और इंसाफ के लिए बीस साल तक रगडना, यह सब अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ है, कि अचानक ही देश के हृदय प्रदेश के छतरपुर जिले में दो कोमलांगी बालाओं द्वारा पुलिस की अमानवीय बर्बरता के सामने घुटने टेककर आत्महत्या करने का दिल दहलाने वाला वाक्या सामने आया है।

एक ओर मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपनी कमान वाले सूबे को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के ताने बाने बुन रहें हैं, वहीं दूसरी और उनकी सरकार के ही खाकी वर्दी वाले नुमाईंदों द्वारा आवाम के साथ बर्बरता की नायाब पेशकश प्रस्तुत की जा रही है। शिवराज सिंह चौहान इस हादसे में यह कहकर अपना पल्ला झाडने का प्रयास कर रहे हैं कि रक्षक ही भक्षक बन गए हैं। मामले की जांच अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी से करवाई जा रही है। इस मामले में छतरपुर के पुलिस अधीक्षक प्रेम सिंह बिष्ट ने ओरछा रोड थाना प्रभारी के.के.खनेजा सहित तीन को निलंबित कर दिया है।

दरअसल बिन मां की दो बच्चियों के पिता राजकुमार सिंह देश के नौनिहालों का भविष्य संवारने का काम करते हैं, वे पेशे से शिक्षक हैं। जब इनमें से एक अपने मित्र के साथ झांसी मार्ग से अपने घर लौट रही थी, तब ओरछा रोड थाने में पदस्थ सिपाही अरविंद पटेल और कन्हैया लाल ने उन्हेें धमकाया और जबरिया उस युवती को निर्वस्त्र कर अपने मोबाईल से उसके अश्लील वीडियो बना लिए। पीडिता ने इसकी शिकायत पुलिस अधीक्षक प्रेम सिंह बिष्ट से की, मगर नतीजा सिफर ही निकला।

शिव के राज में मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और बेलगाम अफसरशाही के बेलगाम घोडे तो पहले से ही दौडते आ रहे हैं, अब रियाया की जान माल का जिम्मा संभालने वाली खाकी वर्दी पहनने वालों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे अबोध मासूम बालाओें की इज्जत पर सरेआम हाथ डालने का दुस्साहस भी करने लगे हैं। इनके इस तरह के दुष्कृत्य की अगर उच्चाधिकारियों से शिकायत की जाती है, तो उच्चाधिकारी दोषियों को इस शर्त पर निलंबित करते हैं कि अगर पीडिता अपनी शिकायत वापस ले लें तो उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

जाहिर है कि उच्चाधिकारियों के इस तरह के प्रश्रय का लाभ उठाकर आरोपियों द्वारा अपनी खाकी वर्दी का रौब तो गांठा ही जाएगा। फिर अगर हाथ में लट्ठ लिए सिपाही गर्जेगा तो बेचारी आम जनता तो चूहे की तरह बिलों में छिपने को मजबूर होगी ही। गौरतलब होगा कि अभी दो दिन पहले ही इंदौर के अन्नपूर्णा नगर थाने में प्रदेश की सरकारी और गैरसरकारी जमीनों की हेराफेरी के एक बहुत बडे आरोपी और भूमाफिया बॉबी छावडा को इंदौर पुलिस हवालात में एयर कंडीशनर की व्यवस्था के लिए चर्चित होती है, फिर दो दिन बाद ही छतरपुर में अबोध बालाओं को इहलीला समाप्त करने पर मजबूर कर देती है।

छतरपुर की यह घटना निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश पुलिस के साथ ही साथ सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान के माथे पर कभी न धुलने वाले कलंक के मानिंद ही माना जा सकता है। याद पडता है कि जैसे ही भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश में सत्ता संभाली थी, तभी सवर्ण और दलित के बीच हुई तकरार के चलते सिवनी जिले में भोमाटोला कांड घटित हुआ था, इसमें सर्वण समाज के दर्जनों लोगों ने सारे गांव के सामने एक अधेड दलित महिला और उसकी जवान बहू का बलात्कार किया था। इस मामले में दोषियों को सजा मिल चुकी है, पर यह कांड भाजपा के सत्ता में आने के साथ ही हुआ था।

इस मामले में बताया जाता है कि भोपाल में प्रशिक्षण ले रहे छतरपुर के पुलिस अधीक्षक ने प्रभारी पुलिस अधीक्षक एवं छतरपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए थे कि दोनों ही आरोपियों को निलंबित किया जाए। जैसे ही उपर से कार्यवाही के डंडे की आशंका हुई इन दोनों ही आरोपियों ने पीडिता के बयान लेने गए सहयोगी आरक्षक दिनेश सिंह और प्रवीण त्रिपाठी के माध्यम से दोनों ही बालाओं पर अपनी शिकायत वापस लेने दबाव बनाया। किसी भी अधिकारी ने यह जानने का प्रयास अब तक नहीं किया है कि महिलाओं के बयान लेने के लिए महिला पुलिस को ले जाना सिंह और त्रिपाठी ने उचित क्यों नहीं समझा।

छतरपुर की यह घटना प्रदेश के उस हर मां बाप की पेशानी पर चिंता की लकीरें उभार सकती है, जिनकी जवान बच्चियां हैं। खाकी वर्दी के गुरूर में कोई भी सरकारी नुमाईंदा किसी के साथ भी मनमानी कर सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मध्य प्रदेश सूबे में आज की तारीख में कानून और व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची है। प्रदेश में पूरी तरह जंगलराज कायम है। कहीं आम जनता पर जुल्म ढाया जा रहा है तो कहीं मीडिया के इस तरह की गफलतों के खिलाफ आवाज उठाने पर उनके खिलाफ दमनात्मक कार्यवाहियां की जा रहीं हैं। यह सब देख सुन कर भी सूबे के निजाम ‘‘नीरो‘‘ के मानिंद बांसुरी बजा रहे हैं।

रूचिका का मामला देश में मीडिया ने उछाला। जोर शोर से उछले मामले में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राठौर को सजा दिलवाने में बीस बरस का समय लग गया है। उस हिसाब से यह मामला तो बहुत छोटा ही है। आज प्रिंट मीडिया की यह सुर्खियां बना हुआ है, पर निहित स्वार्थ में उलझा मीडिया भी इस खबर को एकध सप्ताह में बीच के पन्नों में लाकर इसका दम तोड देगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चेतना होगा। मीडिया को मध्य प्रदेश सरकार की तंद्रा तोडनी होगी। इस मामले में पुलिस अधीक्षक या प्रभारी पुलिस अधीक्षक को नैतिक जिम्मेदारी लेनी ही होगी, क्योंकि हर मामले में विभाग का प्रमुख ही जवाबदार होता है। सरकार को इस मामले में कठोर कदम उठाना ही होगा, अन्यथा आने वाले समय में शांत और सौम्य समझे जाने वाले देश के हृदय प्रदेश, मध्य प्रदेश के बिहार बनते देर नहीं लगेगी।

सोच विचार में गमन हैं राहुल


गुरुवार, 27 मई 2010

कब मिल सकेगा साफ पेयजल!


कब मिल सकेगा साफ पेयजल!

हर जिले में खुलेगी पेयजल परीक्षण प्रयोगशाला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 27 मई। भारत गणराज्य को ब्रितानी हुकूमत की गुलामी जंजीरें तोडे हुए छः दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है फिर भी आवाम को साफ पीने का पानी मुहैया न होना अब तक की सरकारों के लिए शर्म की बात कही जा सकती है। आम आदमी खाने के बिना गुजारा कर सकता है, पर पानी के बिना गुजारा संभव ही नहीं है। ब्रितानी राज में अंग्रेजों द्वारा साफ तौर पर कहा जाता था कि सारी सुविधाएं मुहैया कराना ब्रितानी हुकूमत की जवाबदारी है, पर पानी के लिए रियाया को खुद ही पहल करनी होगी। यही कारण था कि उस समय हर घर में एक कुंआ खोदा गया था। अमूमन हर घर में पानी की व्यवस्था खुद ही की जाती रही थी, आजादी के पहले तक।

आजादी के उपरांत 2010 में एक बार सरकार की तंद्रा टूटती नजर आ रही है। केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि आम जनता को पीने का पानी मुहैया करवाने के लिए अब हर जिले में पेयजल परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना की जाए। कंेद्र सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय देश के हर जिले में चार लाख रूपए व्यय कर इस तरह की प्रयोगशाला की संस्थापना करने जा रही है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत संचालित राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार की एक महात्वाकांक्षी योजना सामने आई है, जिसमें देश के हर नागरिक को साफ पीने का पानी मुहैया करवाना प्रमुख माना गया है।

ग्रामीण विकस मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि विभाग के पेयजल आपूर्ति विंग ने इस योजना को युद्ध स्तर पर अमली जामा पहनाने की ठान ली है। इस हेतु विभाग द्वारा शत प्रतिशत अनुदान भी मुहैया करवाया जा रहा है। सूत्रों ने कहा कि इस योजना को राज्यों की सरकारें चाहें तो अपने अपने स्तर पर आगे बढवा सकती हैं। केंद्र ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि अगर वे चाहें तो राष्ट्रीय पेयजल सहायता योजना में मिलने वाली राशि का पांच प्रतिशत हिस्सा प्रयोगशाला को बनाने में खर्च कर सकती हैं।

मुफ्त के आदी हो चुके जनसेवक

मुफ्त के आदी हो चुके जनसेवक

(लिमटी खरे)

देश को नीति अनीति का मार्ग दिखाने वाले जनसेवकों के मुंह में बत्तीसी के बजाए तेंतीसी है, अर्थात उनकी एक और दाढ है, और वह है हराम दाढ। इस तरह की बात अस्सी के दशक के उपरांत लोगों के बीच होती आई हैं। लोगों का कहना है कि इस दाढ के माध्यम से जनसेवकों का प्रयास होता है कि उन्हें अपने कार्यकाल या सेवानिवृति के उपरांत भी वे हर चीज का लाभ एकदम निशुल्क उठाएं एसा उनका प्रयास होता है। चूंकि नियम कायदे कानून उन्हें ही बनाने होते हैं तो वे अपने फायदे के सौदे के वक्त जबर्दस्त एका का प्रदर्शन करते हैं। भारत गणराज्य का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी सांसद विधायकों के वेतन और सुविधाओं के बढने की बात आई है, जनसेवकों ने सदन में मेजे थपथपाकर इसका स्वागत किया है। किसी ने भी खाली खजाने का हवाला देकर इसका विरोध नहीं किया है। कोई करे भी क्यों, उनका फायदा इस सबमें है, इसलिए वे जनता जनार्दन का ख्याल रखने के बजाए अपनी झोली भरने में ही दिलचस्पी रखते हैं।

जनसेवकों की मुफ्त में पाने की चाहत इस कदर बुलंद है कि उन्हें आवाम की तकलीफों से कोई लेना देना भी नहीं है। यही कारण है कि आलीशान सर्व सुविधायुक्त सरकारी आवास, बिजली, दूरभाष, परिवार के साथ मुफ्त हवाई और रेल यात्रा के बाद भी उन्हें संतोष नहीं है। राज्य सभा, लोकसभा के सदस्य, विधायक, विधानपरिषद के सदस्यों ने अब राजमार्ग पर बिना किसी शुल्क, टोल के दिए हुए समूचे देश की सडकों पर अपने वाहन दौडा सकेंगे।

केंद्रीय राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अब सांसद, विधायक, केंद्र और राज्य सरकार के वाहन, वीरता पुरूस्कार से नवाजे गए लोगों के वाहन राजमार्गों पर बिना शुल्क चुकाए अपना वाहन दौडा सकेंगे। वर्तमान में विधायकों को उनके सूबे में ही इस तरह की सुविधा मुहैया है। 2008 की टोल नीति में विधायकों को इस सुविधा से महरूम कर दिया गया था, जिसमें भारत के प्रधान न्यायधीश, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों तक को इस सुविधा का लाभ नहीं दिया गया था। अब यह सुविधा एक बार फिर बहाल कर दी गई है। भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उपस्थिति में यह फैसला लिया गया हैै। तीनों ने इस बार मीडिया को इससे मुक्त रखने की जहमत नहीं उठाई है, सो मीडिया के कार्पोरेट घरानों द्वारा इसका विरोध किया जाना लाजिमी है।

अब नेताजी को टोल से छूट मिल गई है, जाहिर है कि उनके काफिले में चलने वाले नेहले देहले भी इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए अपने आका जनसेवकों पर दवाब बनाएंगे। एक बार फिर मंथन होगा और संभव है कि आने वाले समय में जनसेवकों के काफिले में शामिल कुछ निर्धारित वाहनों को इससे मुक्त रखने का फैसला ले लिया जाए। इनके वाहनों से जो राजस्व नहीं वसूला जाएगा, उस राजस्व हानि को सरकार द्वारा आम जनता की जेब पर डाका डालकर ही वसूला जाएगा।

अमूमन हर बार जनसेवकों को मिलने वाले वेतन, भत्ते, सुख सुविधाओं पर उंगलियां उठती ही रही हैं। आवाम की तरफ से मुंह मोडे जनसेवकों को मिलने वाली अनगिनत छूट में एक और सुविधा का इजाफा करना देश की रियाया के साथ अन्याय ही माना जा सकता है। आम सामान्य लोगों की तुलना में सरकारी खजाने से सौ गुना ज्यादा लाभ उठाने वाले इन जनसेवकों सडक विकास की मद में विकास के मकसद से वसूले जाने वाले टोल से छूट देना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है। सडक परिवहन मंत्री कमल नाथ जानते होंगे कि अगर उन्होंने जनसेवकों को इस तरह की छूट प्रदान की है तो इससे टोल के जरिए वसूले जाने वाले राजस्व में दस फीसदी की कमी दर्ज हो सकती है।

आसमान छूती सुरसा के मुंह की तरह बढती मंहगाई में आम जनता किस तरह दो वक्त की रोटी जुटा पा रही है, इस बात से किसी भी जनसेवक को कुछ लेना देना नहीं है। कहने को खाली सरकारी खजाने और वैश्विक आर्थिक मंदी का कथित तौर पर प्रलाप कर तमाम तरह की कटौतियों को आम जनता पर ही लादा जा रहा है। इस कटौती का जनसेवकों की मोटी खाल पर कोई असर परिलक्षित नहीं हो रहा है। जनसेवकों का इस दौर में भी मंहगे कपडे पहनना, विलासितापूर्ण जीवन जीना, आलीशान बंग्लों में सरकार के खजाने से करोडों रूपए फूंकना, तीन या पांच सितारा होटलों में रात गुजारना, मंहगी सरकारी दावतें देना, विदेश यात्राएं आदि का क्रम अनवरत ही जारी है। सांसदों का सरकार पर दवाब बना हुआ है कि उनके वेतन और भत्तों में बढोत्तरी की जाए।

सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के साथ ही साथ कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी मितव्ययता बरतने का प्रहसन कर चुके हैं, बावजूद इसके अगर केंद्र सरकार का भूतल परिवहन मंत्रालय इस तरह का कदम उठाता है तो कहना ही पडेगा कि बीसवीं सदी में नेतृत्व की परवाह किसी को भी नहीं है। जिस तरह उपनिवेशवाद में आवाम और शासकों के बीच एक खाई हुआ करती थी, उसी की एक बानगी माना जा सकता है भूतल परिवहन मंत्रालय का यह फैसला, इस फैसले से शासक और रियाया के बीच खुदी खाई तेजी से बढने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

शुक्रवार, 21 मई 2010

एटीएम बब्बा नहीं रहे

एटीएम बब्बा नहीं रहे

पहली बार 1967 में हुआ था एटीएम का प्रयोग

भारत में जन्मा था एटीएम का जनक

(लिमटी खरे)

आधुनिकता के इस युग में लोग बहुत ही अधिक सुविधाभोगी हो चुके हैं। इस काल में जीवन चक्र को सहज बनाने में जिन लोगों ने अपना अपना योगदान दिया है, उनमें जान शेफर्ड बेरान का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा, वह इसलिए कि उन्होंने लोगों को पैसा निकालने के लिए बैंक की समयसीमा और लंबी लंबी कतारों से छुटकारा दिलाते हुए आटोमेटेड टेलर मशीन (एटीएम) का अविष्कार किया था, जो आज कमोबेश हर एक नागरिक के पास है।

स्काटलैंड मूल के माता पिता की संतान शेफर्ड का भारत से गहरा नाता रहा है। उनका जन्म भारत गणराज्य के मेघालय सूबे के शिलांग में हुआ था। कहते हैं आवश्यक्ता ही अविष्कार की जननी है। इसे ही चरितार्थ किया था शेफर्ड ने। सप्ताहांत का आनंद लेने के शौकीन शेफर्ड को बैंक से पैसा निकालने की झंझट के चलते वीकेंड के मजे खराब हो जाया करते थे। एक दिन नहाते नहाते उनके दिमाग में आया कि क्यों न एसी मशीन को इजाद किया जाए जिससे कहीं भी कभी भी धन की निकासी की जा सके। शेफर्ड ने स्वचलित चाकलेट वेंडिग मशीन को देखकर सोचा कि क्यों न इसी तर्ज पर धन निकासी की व्यवस्था की जाए।

धुन के पक्के 23 जून 1925 को जन्मे शेफर्ड ने एटीएम मशीन को बना ही दिया। पहली बार 27 जून 1967 को उत्तरी लंदन के एनफील्ड में बारक्लेज बैंक की शाखा में इसे प्रयोग के तौर पर लगाया गया। यह मशीन वर्तमान एटीएम मशीन से बिल्कुल भिन्न हुआ करती थी। इसका नाम उस वक्त डी ला रूई ऑटोमेटिक कैश सिस्टम (डीएससीएस) कहा जाता था। उस वक्त रसायन युक्त कोडिंग से विशेष जांच के उपरांत ही पैसा निकाला जाता था। इसमें एक खांचे में उपभोक्ता द्वारा अपना चेक रखकर अपनी निजी पहचान संख्या दर्ज करता था, तब दूसरे खांचे से दस पाउंड के नोट बाहर आते थे। एटीएम नोट निकालने वाला पहला उपभोक्ता मशहूर फिल्म ‘आन द बजेस‘ फिल्म के नायक रेग वर्नी थे।

यही युग था जब एटीएम मशीन के युग का सूत्रपात हुआ था। शेफर्ड ने आरंभिक समय में इसका पिन नंबर छः अंकों का रखा था। बाद में उनकी पत्नि का कहना था कि उन्हें चार अंकों की संख्या ही आसानी से याद रह पाती है, सो शेफर्ड ने इसे छः से बदलकर चार अंकों में कर दिया। आज समूची दुनिया में पिन कोड चार अंकों का ही है।

ब्रिटेन मंे स्काटलेंड के लोगों को वैसे तो बहुत ही कंजूस माना जाता है, पर ब्रितानी इस बात को गर्व से कह सकते हैं कि उनके बीच का ही एक व्यक्ति जो भारत मंे जन्मा हो, ने एक मशीन का अविष्कार कर दुनिया भर के बैंक की तिजोरियों के ताले चोबीसों घंटे के लिए खोल दिए हों। आज प्रोढ हो चली पीढी के स्मृति से यह बात कतई विस्मृत नहीं हुई होगी कि एटीएम संस्कृति के आने से पहले किस तरह लोग घंटों लाईन में लगकर बैंक में अपना जमा धन निकलवाया करते थे। रविवार या अवकाश के दिनों में लोगों को किस कदर परेशानियों से दो चार होना पडता था। कहा जाता था कि बैंक कभी भी लगातार तीन दिन तक बंद नही रहते। आज वे सारे मिथक टूट चुके हैं।

आज बिजली, बल्व, सायकल आदि के अविष्कारकों को हमने अपने पाठ्यक्रम की किताबों में पढा है, पर अनेक एसे अविष्कारक हुए हैं, जिनके बारे में बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं हो सकता है। मसलन इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के जनक सुजाता को कम ही लोग जानते हैं। सुजाता दक्षिण भारत के एक फिल्मकार थे। सरकार की उपेक्षा के कारण इस तरह की प्रतिभाओं के बारे में लोग जान ही नहीं पाते हैं। टेलीफोन के अविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल, बिजली के बल्व के अविष्कारक टॉमस आल्वा एडिसन को तो लोग जानते हैं, किन्तु फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, गैस चूल्हा, मोबाईल आदि रोजमर्रा उपयोग में आने वाली वस्तुओं के अविष्कारकों के बारे में कम ही लोग जानते हैं।

बीसवी शताब्दी के उत्तारर्ध में विज्ञान और टेक्नालाजी का विकास जिस दु्रत गति से हुआ और बदलाव की प्रक्रिया इतनी तेज रही कि लोगों केा इनके अविष्कारकों के बारे में जानने या याद रखने की फुर्सत ही नहीं मिल सकी। आने वाले दिनों में कागज की मुद्रा के स्थान पर प्लास्टिक मनी जिसे ई ट्रांजक्शन भी कहते हैं, का प्रचलन बहुत ज्यादा बढ सकता है। आज भी क्रेडिट, डेबिट कार्ड पूरी तरह प्रचलन में आ चुके हैं। लोग आज अपनी अंटी में ज्यादा रूपया रखने के बजाए इस तरह के कार्ड रखने में ही ज्यादा समझदारी समझते हैं। हमें धन्यवाद देना चाहिए जान शेफर्ड बैरन का जिन्होंने बैंक की तिजोरियों के दरवाजे चौबीसों घंटों के लिए खोल दिए वरना आज भी हम बाबा आदम के जमाने की व्यवस्था पर ही चलने को मजबूर रहते। शेफर्ड को एटीएम का जनक नहीं पितामह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। एटीएम बब्बा नहीं रहे इस बात का दुख सभी को होना चाहिए।

नकली नोटों के सौदागर



कौन जीतेगा - प्रजातंत्र या कमलनाथ ?

कौन जीतेगा - प्रजातंत्र या कमलनाथ ? 
राजेश स्थापक 

उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ने वाले उत्तर-दक्षिण गलियारे का भविष्य केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री कमलनाथ की जिद, संकुचित मानसिकता एवं स्वार्थ के कारण खतरे में पड़ता दिखायी दे रहा है। अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये व्यास नदी की धारा मोड़ने वाले कमलनाथ अब विशेषज्ञों द्वारा स्वीकृत उत्तर-दक्षिण गलियारे को अपनी मर्जी के हिसाब से अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा की ओर मोड़ना चाहते हैं। कमलनाथ की जिद के चलते राष्ट्रीय महत्व के इस गलियारा के अंतर्गत फोरलेन रोड का काम मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में आकर रूक गया है एवं फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट की पेशी के बीच अटका पड़ा है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने में कमलनाथ की ही विशेष भूमिका रही है।

वर्ष 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के सभी दिशाओं को फोरलेन मार्ग से जोड़ने का प्रस्ताव रखा था जो बाद में स्वीकृत होकर प्रधानमंत्री स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के नाम से अस्तित्व में आकर अटल सरकार के कार्यकाल के दौरान ही क्रियान्वित होने लगा। वर्ष 2004-05 के लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए (संप्रग) की सरकार बनी। तब एक बारगी ऐसा लगा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की इस परियोजना को कांग्रेस सरकार शायद ही आगे बढ़ाये। परंतु इस परियोजना का महत्व और उपयोगिता को देखते हुए वर्ष 2004-05 में बनी मनमोहन सिंह सरकार ने इस परियोजना को न केवल आगे बढ़ाया बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस परियोजना को पूर्ण कराने में व्यक्तिगत रूचि लेकर तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री टी.आर. बालू को भी निर्देशित किया।

इसी परियोजना के अंतर्गत उत्तर भारत के श्रीनगर को दक्षिण भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी तक फोरलेन सड़क से जोड़ा जाना है जिसे नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर नाम दिया गया। जाहिर है नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी है।

नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर के निर्माण का कार्य तक टी.आर. बालू के भूतल परिवहन मंत्री रहते तेज गति से चला। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र में पुनः कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार बनी। इस सरकार में विभिन्न कारणों के चलते कमलनाथ का कद कम करते हुए उन्हें सड़क परिवहन मंत्रालय दिया गया। कमलनाथ को सड़क परिवहन मंत्री बनते अपनी वर्षों पुरानी मंशा (जिसका जिक्र वे 29 जुलाई 2009 को राज्यसभा में दिये अपने बयान में कर चुके हैं) को पूरा करने का मौका मिल गया क्योंकि उत्तर-दक्षिण गलियारा उनके संसदीय क्षेत्र मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से मात्र 70 कि.मी. दूर सिवनी जिले से होकर नागपुर जा रहा था। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के स्कूल के जमाने से मित्र रहे ताकतवर कमलनाथ को लगा कि नदी की धारा की तरह वे नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर की दिशा अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा की तरफ मोड़ सकते हैं तब जबकि वे स्वयं उस मंत्रालय के मंत्री हैं जो यह गलियारा बना रहा है।

यहां से नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर को छिंदवाड़ा ले जाने की योजना पर अमल शुरू हुआ। इसके लिये सबसे पहले वर्ष 2007 के अंतिम महीनों में एक काल्पनिक खबर छपवायी गयी कि कान्हा नेशनल पार्क से एक बाघ 180 कि.मी. पैदल चल पेंच नेशनल पार्क पहुंचा जिससे लगभग 15 कि.मी. दूर से नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर के अंतर्गत फोरलेन सड़क को बनाया जाना है।

कॉरीडोर की फोरलेन सड़क को छिंदवाड़ा ले जाने के लिये वन्यप्राणियों और पर्यावरण का सहारा लेकर कथित तौर पर कमलनाथ के चचेरे भाई अशोक कुमार जो वार्डल्ड लाईफ ट्रस्ट नाम का एक अन्जान संगठन वन्यप्राणियों के संरक्षण के नाम पर चलाते हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर के माध्यम से यह निवेदन किया कि यदि सिवनी से नागपुर के बीच नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर की फोरलेन सड़क बनती है तो यह पेंच नेशनल पार्क के वन्यप्राणियों पर दुष्प्रभाव डालेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने वन्यप्राणी विशेषतौर से बाघों को ध्यान में रखते हुए तत्काल केन्द्रीय साधिकार समिति (सी.ई.सी.) को इस मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा। सी.ई.सी. की टीम में कमलनाथ के प्रभाव वाले नेशनल टाईगर कन्जर्वेशन ऑथारिटी के सदस्य सचिव डॉक्टर राजेश गोपाल को वन्यजीव विशेषज्ञ के बतौर शामिल किया गया। जैसी की उम्मीद थी डॉक्टर राजेश गोपाल ने अपनी विद्वता का परिचय देते हुए मध्य भारत के सिवनी जिले के जंगलों की ऐसी रिपोर्ट तैयार किया कि ऐसा लगा की देश के सारे बाघ इसी क्षेत्र में रहते हैं। डॉ. राजेश गोपाल ने यहां तक लिख डाला कि पेंच नेशनल पार्क से कान्हा नेशनल पार्क जिसके बीच की दूरी लगभग 200 कि.मी. दूर है एवं जिसके बीच से नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर को गुजरना है बाघ के पेंच से कान्हा नेशनल पार्क का प्राकृतिक रास्ता है। इसी रिपोर्ट ने डॉ. राजेश गोपाल की कमलनाथ के प्रति इरादे स्पष्ट कर दिया। वास्तव में पेंच और कान्हा किसी भी तरह से जंगल से जुड़े नहीं हैं। दोनों के बीच हजारों गांव कस्बे, रेल मार्ग, सड़क मार्ग, बांध, नदी इतनी कि इन सबको पार करके किसी बाघ को 200 कि.मी. दूरी पर कान्हा नेशनल पार्क तक पहुंचना लगभग असंभव कार्य है। तब जबकि सभी को पता है आज नेशनल पार्क के अंदर बाघों का शिकार धड़ल्ले से किया जा रहा है तब 200 कि.मी. के आबादी वाले इलाकों से गुजरकर कोई बाघ जीवित कैसे बचेगा।

भले ही डॉ. राजेश गोपाल की रिपोर्ट काल्पनिक एवं एक उद्देश्य विशेष को लेकर लिखी गयी हो लेकिन यह रिपोर्ट ने पर्यावरण एवं वन्यप्राणियों के शुभचिन्तकों एंव संवेदनशील मीडिया की कुछ सहानुभूति पाने में सफल हो गयी। दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों में बैठे पर्यावरणविदों और मीडिया को लगा कि वास्तव में सिवनी से गुजरने वाले नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर की फोरलेन सड़क से जंगली जानवरों को नुकसान पहुंचेगा। जबकि वास्तव में मध्य भारत के इस दुर्गम आदिवासी क्षेत्र की वास्तविकता किसी को पता नहीं है। स्वयं कमलनाथ के चचेरे भाई और वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट के उपाध्यक्ष  और वन्यप्राणियों के कथित संरक्षक अशोक कुमार को छिंदवाड़ा के जंगलों की वास्तविकता नहीं पता जहां से में फोरलेन मार्ग को ले जाने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत अपनी याचिका में दे रहे हैं।

वास्तव में पेंच नेशनल पार्क छिंदवाड़ा से घने जंगलों से जुड़ा हुआ है छिंदवाड़ा के ये घने जंगल प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र पचमढ़ी तक एक समान जुड़े हैं। यह सम्पूर्ण क्षेत्र सतपुड़ा पर्वतमाला का सघन वनों वाला क्षेत्र है जिसे वनविभाग ने देश की सर्वश्रेष्ठ जैवविविधताओं वाले क्षेत्रों में शामिल किया है। इस क्षेत्र के घने जंगलों में स्थानीय वन विभाग और ग्रामीणों को अक्सर बाघ और उसके पदचिन्ह दिखायी देते हैं। स्पष्ट है कि पेंच नेशनल पार्क के जंगली जानवर पार्क से सटे छिंदवाड़ा जिले के घने जंगलों की तरफ स्वाभाविक रूप से जायेंगे न कि उस तरफ जहां बसाहट हो, और सड़क मार्ग हो। लेकिन बाघ विशेषज्ञ डॉ. राजेश गोपाल ऐसा नहीं मानते हैं।

पिछले पांच वर्षों में देश के नेशनल पार्कों के अंदर मारे जा रहे बाघों के बारे में कभी न चिन्ता करने वाले डॉ. राजेश गोपाल और बाघों के कथित संरक्षक अशोक कुमार ने पेंच नेशनल पार्क और इस क्षेत्र के जंगलों और जंगली जानवरों के बारे में दिल्ली में बैठे मीडिया को न केवल गुमराह करने का प्रयास किया बल्कि फोरलेन सड़क को नरसिंहपुर-छिंदवाड़ा होते नागपुर ले जाने का पक्ष लेकर इस क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ जैवविविधता, लाखों पेड़ और देश के लुप्त होते बाघों को खतरे में डाल दिया।

यही नहीं इन कथित और छद्म पर्यावरणविदों को छिंदवाड़ा से नागपुर फोरलेन सड़क को बनाने के वो दुष्परिणाम भी नहीं दिख रहे हैं जिसे एक आम व्यक्ति आसानी से सोच सकता है। केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को जिद के दुष्परिणाम क्या निकलेंगे गौर करें। यदि फोरलेन सिवनी से सीधे नागपुर की बजाये छिंदवाड़ा होते हुए नागपुर बनायी जाती है जैसा कमलनाथ चाहते हैं तो इसका मतलब है सारे देश के लोगों को 70 कि.मी. अतिरिक्त वाहन चलाना पड़ेगा। यही नहीं इससे वर्तमान दर के हिसाब से लगभग 14 लाख रूपये अतिरिक्त पेट्रोल और डीजल का खर्चा वाहन मालिकों पर पड़ेगा। बात यहीं खत्म नहीं होती है 70 कि.मी. अतिरिक्त चलने से इस क्षेत्र में 900 टन कार्बन का उत्सर्जन प्रतिवर्ष होगा जो पर्यावरण और वनों के लिये कितना विनाशकारी है उसका पता शायद कमलनाथ और उनके चचेरे भाई अशोक को नहीं है। बात समाप्त यहीं नहीं होती है यदि कमलनाथ अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा से नागपुर फोरलेन बनवाते हैं तो उन्हें छिंदवाड़ा से नागपुर के बीच स्थित जंगलों के उच्च क्वालिटी वाले प्रथम वर्ग श्रेणी के 81,500 वृक्षों की बलि देना होगा यही नहीं छिंदवाड़ा से नागपुर के बीच जलेबी आकार की 22 कि.मी. लम्बी घाटी जो छिंदवाड़ा के हिस्से वाले पेंच नेशनल पार्क के करीब है पर फोरलेन सड़क यदि बना भी दी जाये तो इस घाटी पर बड़े वाहन बमुश्किल चल पायेंगे। ऊपर से 22 कि.मी. लम्बी इस घाटी के घाट को कम करने के लिए उसका विस्तार लगभग 30-32 कि.मी. तक करना पड़ेगा जिसका असर इस क्षेत्र की जैवविविधता और पेंच पार्क के बचे हुए चंद बाघों पर बुरी तरह से पड़ेगा।

सभी को पता है कि स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी महत्वपूर्ण परियोजना के पहले विशेषज्ञों द्वारा सर्वे कर फोरलेन सड़क बनाये जाने का प्लान तैयार किया गया था। आश्चर्य है टी.आर. बालू के सड़क परिवहन मंत्री रहते जो परियोजना सुगमता से चल रही थी वो कमलनाथ के सड़क परिवहन मंत्री बनने के बाद कैसे पर्यावरण मंत्रालय और कोर्ट कचहरी में उलझ कर रह गयी। क्यों कमलनाथ एक ही मंजिल के लिये तीन रास्तों का विकल्प दे रहे हैं। उनका दूसरा विकल्प है नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर की फोरलेन सड़क नरसिंहपुर से छिंदवाड़ा होते हुए नागपुर जाये जिसके लिये कमलनाथ लगभग ढ़ाई लाख वृक्षों को कटवाने को तैयार हैं।

आखिर क्यों ? कमलनाथ छिंदवाड़ा से फोरलेन सड़क तमाम सच्चाईयों के बाद ले जाना चाहते हैं। क्या वास्तव में आज तक पिछड़े एवं अविकसित आदिवासी छिंदवाड़ा जिले की जनता अगले चुनाव में उन्हंे फोरलेन सड़क के नाम पर वोट देगी। क्या उद्योपति कमलनाथ छिंदवाड़ा से नागपुर के बीच के क्षेत्रों में आदिवासी इलाकों में उद्योगों को मिली बेहिसाब छूट का फायदा उठाकर स्वयं और अपने उद्योपति मित्रों के उद्योग खुलवाना चाहते हैं। क्या कमलनाथ छिंदवाड़ा में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज-स्पेशल इकॉनामिक जोन) बनाकर अपने संसदीय क्षेत्र में घटते जनाधार को रोकना चाहते हैं या फिर क्या यह सब कमलनाथ अपनी जिद के कारण कर रहे हैं।

निःसंदेह यह सोच का विषय है कि क्या एक शक्तिशाली नेता और मंत्री अपने स्वार्थ के लिये देश के पर्यावरण, वन्यप्राणी और आम व्यक्तियों के साथ-साथ सरकारी खजाने पर इस तरह का खिलवाड़ कर सकता है क्योंकि लखनादौन से सिवनी के आगे 12 कि.मी. आगे अब तक फोरलेन सड़क बनाने में सरकार के बारह सौ करोड़ रूपये खर्च हो चुके और इस क्षेत्र में फोरलेन सड़क बनाने के लिये हजारों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। क्या सिवनी के आदिवासी जिन्होंने कभी जंगल बचाने के लिये अंग्रेजों के विरूद्ध जंगल सत्याग्रह कर अंग्रेजी बंदूकों की गोली खाकर शहादत दिया था। ऐसे आदिवासी जिनके लिये सिवनी से नागपुर जाने वाली फोरलेन सड़क लाईफ लाईन साबित होगी। क्या सिवनी के आदिवासियों अपने क्षेत्र के विकास को छीने जाने के बाद भी बाघ और जंगलों के प्रति वैसी सहानुभूति रखर पायेंगे जैसी वे आज तक रखते आये हैं। पिछले दिनों जब सिवनी जिले में कमलनाथ के विरूद्ध फोरलेन बचाओ आंदोलन हुआ था उस दौरान इस क्षेत्र के आदिवासियों ने यही चर्चा थी कि बाघों के कारण उनका विकास नहीं हो पा रहा है।

फिलहाल यह सम्पूर्ण मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है लेकिन पर्यावरण और बाघों के झूठे संरक्षण के नाम पर कमलनाथ अपने मकसद में कामयाब भी हो गये तो भी मूक बाघ, जंगली जानवर, वृक्ष, गरीब आदिवासी और सिवनी जिले के लाखों लोग जो पहले ही 21 अगस्त को कमलनाथ के 100 से ज्यादा पुतले जला चुके है कमलनाथ को कभी माफ नहीं करेंगे। क्योंकि स्वयं राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारी सिवनी से नागपुर फोरलेन सड़क के पक्ष में है और बाघ एवं अन्य जानवरों की सुरक्षा के लिये उन्होंने विश्व स्तर के व्यवहारिक सुझाव भी जिम्मेदार लोगों को बताया है। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट में ताकतवर, बलशाली कमलनाथ की जीत होती है या सिवनी जिले के 10 लाख लोगों की।

इसके अलावा इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सिवनी जिले के दस लाख लोगों के अलावा देश भर के मीडिया और बुद्धिजीवियों को भी बेसब्री से इंतजार है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के इस मामे में सिवनी के पक्ष में फैसले से देश भर में पर्यावरण के संरक्षण के साथ विकास जरूरी है का आधार बन जायेगा या फिर पर्यावरण और जंगली जानवरों के कथित संरक्षण के नाम पर देश में जगह-जगह बनाये जा रहे बांध, सड़कें, भवनों पर रोक लगना प्रारंभ हो जायेगी। क्योंकि सिवनी के लोगों और आदिवासी वर्ग में यह बात घर करने लगी है कि जंगलों एवं जंगली जानवरों की रक्षा करें हम और फ्लाई ओवर, मेट्रो ट्रेन और गगनचुम्बी इमारतों की सुविधायें ले दिल्ली और मुम्बई के लोग खासतौर से वाईल्ड ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अशोक कुमार जैसे लोग जिन्होंने पर्यावरण के नाम पर कभी एक पौधा नहीं लगाया, जिन्होंने बाघों को बचाने के लिये कुछ नहीं किया वे दिल्ली के अपने वातानुकूलित ऑफिस में बैठे-बैठे सैंकड़ों कि.मी. दूर सिवनी के जंगल और बाघों की चिन्ता कर रहे हैं।