मंगलवार, 5 जून 2012

उत्तराखण्ड भाजपा की बडी तैयारी; कांग्रेस विधायक भाजपा में हो सकते हैं शामिल


उत्तराखण्ड  भाजपा की बडी तैयारी; कांग्रेस विधायक भाजपा में हो सकते हैं शामिल

(चंद्र शेखर जोशी)

देहरादून (साई)। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भले ही सितारगंज से विधानसभा उपचुनाव लड़ने के संकेत देते हुए 3 जून को सितारगंज में कहा कि एक गीत है ‘समझने वाले समझ गए जो ना समझे वो अनाड़ी हैं।’   इसके अलावा काबीना मंत्री इंदिरा हृदयेश, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, मंत्रीप्रसाद नैथानी, हरीश दुर्गापाल, पूर्व मंत्री तिलक राज बेहड़ ने अपने संबोधन में मुख्यमंत्री बहुगुणा के इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ने की बात कहीं।
उत्तराखण्ड कांग्रेस सितारगंज विधानसभा सीट को मुख्यमंत्री के लिए बेहद सुरक्षित मान कर चल रही है। इस क्षेत्र में भितरघात की आशंका न के बराबर है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य जो मुख्यमंत्री के करीबी हैं, इस क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं। इस क्षेत्र में यशपाल आर्य अधिक प्रभावी नेता हैं, जिनके समर्थन से लोग मुख्यमंत्री को पसंद कर रहे हैं। वहीं सितारगंज सीट कांग्रेस के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य की सीट का हिस्सा रही है, तथा इस सीट पर हरीश रावत गुट का इस सीट पर प्रभाव नगण्य है।  मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य रविवार को दिल्ली रवाना हो गए जहां कांग्रेस हाईकमान से कई मामलों पर सहमति ली जा सकती है, वहीं विजय बहुगुणा उत्तहराखण्डं कांग्रेस अध्यलक्ष पद पर यशपाल आर्य को बनाये रखने के लिए प्रबल संस्तुैति करेगें।
इसके अलावा प्रचारित किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मूलतरू बंगाली हैं। उनके पूर्वज बंगाल से आकर टिहरी में बसे थे। यह बात बंगाली समुदाय की ओर से वितरित पर्चे में कही जा रही है। परन्तु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सितारगंज विधानसभा क्षेत्र में  दलित, मुस्लिम, बंगाली और थारू आबादी ज्यादा है, यहां से  कांग्रेस की जीत आसान नहीं होगी। अपने विधायक को गंवा कर चोट खाई भाजपा सितारगंज विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस से बदला लेने के लिए हर संभव दाव चलने के मूड में है।
भाजपा एक ऐसा ब्रहमास्त्र  चलाने जा रही है जिससे कांग्रेस निरीह व सकते में पड सकती है। भाजपा भी कांग्रेस को तू डाल डाल, मैं पात पात का सबक सिखाने की तैयारी कर रही है, कांग्रेस के वरिष्ठभ विधायक को भाजपा में शामिल कराकर कांग्रेस में हडकम्घ्प मचा सकती है। इसके अलावा पिछले विस चुनाव के परिणामों पर नजर डालें तो यहां कांग्रेस तीसरे स्थान पर यानी बसपा से भी पीछे रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाली विस्थापितों को भूमिधरी का अधिकार देने संबंधी हालिया फैसलों के बल पर मुख्य मंत्री को यहां से लडाने का फैसला लिया गया है, इस निर्णय से भले ही बंगाली विस्थापित कांग्रेस के पक्ष में आए हों लेकिन इस इलाके में बसा पहाड़ी व पंजाबी समुदाय इस वजह से शायद ही कांग्रेस के पक्ष में आए।
वहीं रुद्रपुर दंगों ने तराई में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया उसका फायदा भाजपा को मिला। ध्रुवीकरण की वजह से अल्पसंख्यक समुदाय भी बसपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा हुआ मगर दलित वोट बंट गया और उसका एक हिस्सा जहां बसपा के साथ डटा रहा, वहीं बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण भाजपा के साथ चला गया। उनका मानना है कि इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का असर अभी शेष है और विस उपचुनाव होने पर सियासी दल इसे फिर हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।
वहीं समाजवादी पार्टी युवजन सभा के प्रदेश अध्यक्ष मशकूर अहमद कुरैशी ने आरोप लगाया है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार तीन माह से आईसीयू से बाहर नहीं निकल पा रही है। मंत्री व विधायकों के झगड़ों के बीच आम जनता की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सीएम झूठी घोषणाएं कर रहे हैं।
रुड़की में कुरैशी ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री लगातार इस बात की घोषणा कर रहे है कि देहरादून व हरिद्वार में बिजली कटौती नहीं होगी, लेकिन जिले में लगातार बिजली कटौती की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है। संसदीय सचिव के घर में दिन दहाडे़ हुई डकैती ने सरकार के दावों की पोल खोलकर रख दी है।
वहीं भाजपा ने विधानसभा उपचुनाव में जीत के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं, रूद्रपुर शहर के तमाम कांग्रेसी व बसपा कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो गए। कुछ लोगों ने तो भाजपा में वापसी की। एक कार्यक्रम में विधायक राजकुमार ठुकराल व राजेश शुक्ला, पूर्व सांसद बलराज पासी तथा पार्टी जिलाध्यक्ष सुरेश परिहार के समक्ष कांग्रेस व बसपा कार्यकर्ताओं ने भाजपा का दामन थामा। इनमें पूर्व पालिका उपाध्यक्ष हरीश जल्होत्रा, सभासद गुरदीप गावा, व्यापार मंडल के बलराम अग्रवाल, पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष अभिनव छाबड़ा, राजीव गंगवार, सोनू खुराना, सन्नी खुराना, गगन अरोरा, बसपा के हरविंदर सिंह हारजी, राजीव जौहरी आदि शामिल हैं।
वहीं बसपा के पूर्व विधायक प्रेमानंद महाजन के भी शीघ्र भाजपा में शामिल होने की चर्चा हैं। भाजपा के कई नेता उनके संपर्क में हैं। पूर्व विधायक महाजन गदरपुर-पंतनगर सीट से लगातार दो बार चुने गए थे। विधानसभा सीटों के परिसीमन के बाद उन्होंने रुद्रपुर सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा। महाजन भाजपा का दामन थाम सकते हैं। भाजपा में आने के बाद उन्हें सितारगंज सीट से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ उतारा जा सकता है। चूंकि सितारगंज बंगाली बहुल क्षेत्र है, लिहाजा पार्टी उन्हें फिलहाल एक मुफीद उम्मीदवार के तौर पर देख रही है परन्तु  ज्यालदा संभावना बसपा के पूर्व विधायक नारायण पाल की ज्याददा है, वहीं बसपा ने नारायण पाल व उनके भाई मोहन पाल को पार्टी से निष्कासित किये जाने की घटना को उनके भाजपा में जाने की घटना से जोड कर देखा जा रहा है।
पार्टी विधायक किरण मंडल के इस्तीफे के झटके से उबरने की कोशिश में जुटी भाजपा अब कांग्रेस पर उसी की तर्ज पर पलटवार की भी तैयारी में है। भाजपा अपने गोपनीय मिशन के तहत कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक को भाजपा में लाने के लिए तौलमोल कर रही है और इनकी भाजपा के कई केंद्रीय नेताओं से इस संबंध में चर्चा भी हुई है।
वर्ष 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के लिए सीट खाली कराने को भाजपा ने कांग्रेस विधायक टीपीएस रावत का इस्तीफा कराया था तो अब कांग्रेस ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए सीट खाली कराने को भाजपा विधायक किरण मंडल से इस्तीफा दिला सीट खाली कराने में कामयाबी पाई। भाजपा के लिए यह किसी झटके से कम नहीं रहा क्योंकि विधानसभा चुनाव में पार्टी कांग्रेस से केवल एक सीट पीछे रही। अब भाजपा फिर इसी तर्ज पर कांग्रेस को एक झटका देने की कोशिश कर रही है।
चर्चा है कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक पिछले कुछ दिनों से भाजपा के राज्य और केंद्रीय स्तर के कुछ बड़े नेताओं के संपर्क में हैं। इनकी दिल्ली में भाजपा के कुछ वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं से कई दौर की वार्ताएं भी हो चुकी हैं। यह भी चर्चा है कि कांग्रेस से असंतुष्ट चल रहे इन विधायक की भाजपा नेताओं से नजदीकी की खबर पार्टी नेताओं को लगने से वह डैमेज कन्टोरल की तैयारी में जुट गये हैं।

छाता कहां भूलि आये लालकृष्ण आडवाणी?


छाता कहां भूलि आये लालकृष्ण आडवाणी?

(वीरेंद्र जैन)

एक दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर को साधारण भौतिक वस्तुएं भूल जाने की बीमारी थी। बरसात की एक शाम जब वे भीगे हुए अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे तो घर में प्रवेश से पहले ही तेज याददाश्त वाली उनकी पत्नी ने पूछा “छाता कहाँ है?” “वह तो कहीं खो गया” प्रोफेसर ने बताया घ्“...पर कहाँ?” पत्नी ने क्रोधपूर्ण जिज्ञासा की “ वह तो पता नहीं” वे बोले”आखिर आपको कब पता चला कि छाता खो गया है?” पत्नी का अगला प्रश्न था “जब बरसात बन्द हो गयी और मैंने छाता बन्द करने के लिए हाथ ऊपर किया तो पता चला कि छाता तो है ही नहीं” प्रोफेसर ने बताया।
भाजपा के वरिष्ठतम नेता पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी को भी भाजपा से जनता के निराश होने का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें सारी उम्मीदवारियों से मुक्त कर दिया गया अर्थात उनकी आशाओं पर न केवल पानी फेर दिया गया अपितु पौंछा भी लगा दिया गया। इतना ही नहीं गडकरी ने अपने चहेते भामाशाह अंशुमान मिश्रा द्वारा जो अपने पैसे की दम पर भाजपा अध्यक्ष को जेब में डाले हुए है, उनका अपमान भी करा दिया जिसने भारतीय राजनीति के इस सबसे वरिष्ठ नेता को रिटायर होकर नाती पोतों को खिलाने की सलाह दे डाली है और इस रामलीला पार्टी में राजनीतिक भूमिकाओं को अभिनेताओं की भूमिकाओं से तुलना करते हुए कहा है कि देश को ए.के. हंगल नहीं आमिर और रणवीर कपूर की जरूरत है। स्थिति की बिडम्बना यह भी है कि भरी पूरी पार्टी में उन लोगों का अकाल दिखा जो अपने नेता के इस अपमान का विरोध करते क्योंकि सारी ही पार्टी लालचियों और चापलूसों के गिरोह में बदल गयी है, जो गडकरी जैसी कठपुतली को सलाम कर सकते हैं पर अडवाणी के अपमान पर अफसोस भी नहीं कर सकते। जब अडवाणी के सहारे सत्ता तक पहुँचने की सम्भावनाएं थीं तब इन्हीं लोगों ने रथ यात्रा के दौरान उनको गिरफ्तार किये जाने पर पूरे देश में हिंसक उपद्रव कर दिये थे।
वैसे अडवाणी ने भाजपा के प्रति जनता के रुख का सार्वजनिक खुलासा अभी किया हो पर जहाँ जहाँ भाजपा की सरकारें हैं या वह किसी क्षेत्रीय पार्टी के नीचे किसी राज्य सरकार में सम्मलित है वहाँ वहाँ जनता की निराशा के पर्याप्त संकेत सूचना माध्यमों पर उपलब्ध हैं। उन्हें छुपाने के लिए सम्बन्धित राज्यों के जनसम्पर्क विभाग द्वारा पर्याप्त मात्रा में खैरातें बाँटी जा रही हैं, पर वे फिर भी रोके नहीं रुक रहीं। निराश जनता ने एनडीए का शासन भी भोग लिया है और वह जानती है कि सरकार के सहारे लूटखसोट करने में ये सबसे आगे रहते हैं इसलिए जनता अब इन्हें विकल्प के रूप में नहीं देख रही। जहाँ तक बाबूलाल कुशवाहा समेत उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से निकाले गये मंत्रियों को भाजपा में सम्मलित करने का सवाल है, वह भाजपा के लिए कोई नया हथकण्डा नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चलाने के लिए उन सुखराम से गलबहियाँ करने से गुरेज नहीं किया गया था जिन पर छापा पड़ने पर इन्होंने छह दिन तक संसद नहीं चलने दी थी। शिबू सोरेन समेत दागी मंत्रियों को हटाने के नाम पर इन्होंने सदन के कई महत्वपूर्ण दिन बरबाद करवा दिये थे उन्हीं के साथ आज झारखण्ड में सरकार बनाये हुए हैं और वही शिबू सोरेन अपने लड़के के नाम पर सरकार चला रहे हैं और अपनी सरकार में भाजपा अपना राज्य सभा का उम्मीदवार तक नहीं जितवा पाती। जिन जयललिता के भ्रष्टाचार के खिलाफ इन्होंने संसद में तूफान मचा दिया था उन्हीं के सहारे अटल बिहारी ने एनडीए की सरकार चलायी तथा इतनी चिरौरियां करते हुए चलायी कि जयललिता अटलजी के “रक्षा मंत्री” को घंटों बाहर बिठाये रखती थीं। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की शुरुआत भी एनडीए शासन काल में ही हो गयी थी, जिसमें अडवाणीजी उपप्रधानम्ंत्री थे व ‘प्रधान मंत्री के सारे काम’ देख रहे थे।    
सत्ता के लिए सारे अनैतिक हथकण्डे अपनाना व सभी तरह के समझौते करना गडकरी ने अपने पूर्ववर्तियों से ही सीखा है। टिकिट न मिलने या किसी अन्य असंतोष की वजह से अपनी पार्टी छोड़ने वाले सारे प्रमुख नेताओं को भाजपा ने आगे बढकर गले लगाया है और उसका एक बड़ा हिस्सा दलबदलुओं या लोकप्रिय सितारों को किराये से लेकर से भरा हुआ है। दलबदल करा के पूरे विधायक दल को किसी पर्यटन स्थल पर कैद करने की परम्परा भी भाजपा ने ही शुरू की थी व दलबदल में सौदेबाजी की शुरुआत भी मध्यप्रदेश में संविद शासन के लिए विजया राजे सिन्धिया द्वारा थैली खोल देने से ही हुयी थी। उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ छह छह महीने सरकार चलाने का बेहद हास्यस्पद प्रयोग भी भाजपा की देन है। इस पर इनके सहयोगी बाल ठाकरे ने व्यंग किया था कि अगर कुछ पैदा करना था तो छह छह महीने क्यों कम से कम नौ नौ महीने  का समझौता तो करना चाहिए था। समस्त दलबदलुओं समेत सौ लोगों का मंत्रिमण्डल बनाने का अजीब प्रयोग भी उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह सरकार में किया गया था जिसके मंत्रियों का यहाँ तक कहना था कि मंत्री बने छह महीने हो गये पर हमारे पास आज तक एक भी फाइल दस्तखत होने नहीं आयी। पूर्व डकैतों को टिकिट देने की शुरुआत भी भाजपा ने ही की थी जब उन्होंने मुलायम सिंह के खिलाफ मलखान सिंह को खड़ा किया था, बाद में तो यह फार्मूला ही चल निकला था। आज भी प्रत्येक चुनाव में आत्मसमर्पित दस्यु या जमानत पर छूटे अपराधी टिकिट माँगते देखे जाते हैं। नगर निकायों या पंचायती राज में तो उनमें से कई अभी भी विभिन्न पदों पर कब्जा किये हुए हैं। अभी हाल ही में हरियाणा के उपचुनाव में इन्होंने उन्हीं भजनलाल के बेटे के साथ समझौता किया था जिन्हें भ्रष्ट और अवसरवादी बताते हुए इन्होंने लम्बा समय गुजारा है।

(विस्फोट डॉट काम से सामार)

वे और उनके बालकिशन


वे और उनके बालकिशन

नई दिल्ली (साई)।पत्रकारिता पढ़ते सीखते वक्त कई बार अनुभवी लोग बोलते हैं कि खबर वह नहीं है जो आपको बताई या दिखाई जा रही है. खबर वह होती है जो आपसे छिपाई जाती है. कल बाबा रामदेव का तमाशे को देखने के बाद आज अखबारों को देखते हुए बार बार यही लगा कि तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों के लिए भी खबर वही है जो बाबा रामदेव बताएं. कल के तमाशे की आज तराशी हुई रिपोर्टिंग जो कहानी सुना रही है उसमें कोई दम नहीं है. दम हो भी तो उसका कोई उपयोग नहीं है. सिवाय इकोनॉमिक टाइम्स को छोड़कर किसी ने भी सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश नहीं की है.
ईटी भी दो घटनाओं को एक साथ जोड़ने में कामयाब तो नहीं हुआ है लेकिन उसने जो जानकारी दी है और खुद बाबा रामदेव ने जो कहा है उन दोनों को आपस में जोड़ दें तो कहानी आल क्लीयर हो जाती है. ईटी ने आध्यात्मिक गुरुओं के भौतिक साम्राज्य पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बाबा रामदेव के हवाले से कहा है कि आगामी अगस्त महीने तक बाबा रामदेव देशभर में स्वदेशी सेवा केन्द्र खोलने की योजना पर काम कर रहे हैं. इन स्वदेशी सेवा केन्द्रों के जरिए बाबा के कारखानों में बन रहे विभिन्न खाद्य अखाद्य वस्तुओं की मार्केटिंग और बिक्री की जाएगी. अब जरा कल वाली बाबा रामदेव की घोषणा को इस खबर के साथ मिला लीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके कार्यकर्ता अगस्त महीने तक देश के हर हिस्से में जाएंगे और कालेधन के खिलाफ लोगों को लामबंद करेंगे. तो रामदेव के हवाले से ईटी जो कह रहा है और खुद बाबा रामदेव जो बोल रहे हैं उन दोनों को मिला देने पर खबर यह बनती है कि कालेधन के खिलाफ मुहिम में उनके सेल्समैन अगले कुछ महीनों तक देशभर का दौरा करेंगे और स्वदेशी केन्द्र खोलेंगे. कालाधन स्वदेश वापस आये न आये बाबा रामदेव के सफेद धन का इंतजाम पुख्ता हो जाएगा. अगर ऐसा न होता तो सैकड़ों बसों में भरकर उनके समर्थकों को कल संसद मार्ग पर क्यों लाया जाता? संदेश क्लीयर है.
लेकिन इस आल क्लीयर कहानी को हमारे अखबार वाले क्यों नहीं पकड़ पा रहे हैं? शायद जन आंदोलन शब्द आते ही हमारे अखबारों के संपादक समूह गाफिल हो जाते हैं और भीड़, जनता और संगठित समूह में फर्क करना भूल जाते हैं. जो लोग कभी एमवे की मार्केटिंग मीटिंग में गये हों उन्हें ज्यादा अच्छे से यह बात समझ में आ सकती है कि बाबा रामदेव से ज्यादा मार्केटिंयरों की टीम एमवे की मीटिंग में होती है तो क्या उसे जनज्वार कह दिया जाना चाहिए? अगर रामदेव देश के महान क्रांतिकारी हैं तो एमवे के मैनेजरों को शूरवीर और अवतारों की उपाधि देने में क्या हर्ज है?
खैर, अखबार वाले इसी बात की रिपोर्टिंग करके प्रसन्न हैं कि उनके रिपोर्टर वहां थे जहां बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का सार्वजनिक मिलन हुआ. संसद मार्ग के हवाले से देश का सबसे बड़ा अखबार दैनिक जागरण लिखता है कि अन्ना बाबा की साझा हुंकार. इस साझा हुंकार में दोनों की साथ साथ फोटो भी छापी है और कालेधन पर रामदेव का और लोकपाल पर रामदेव के मुखारबिन्द से कही गई बातों को कोट अनकोट कर दिया है. बड़े भाई की यह लाइन है तो छोटा भाई दैनिक भास्कर क्यों पीछे रहता? आखिरकार भास्कर देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार है. इसलिए उसने भी लीड स्टोरी तो यही लिखी है कि कालेधन और लोकपाल की लड़ाई एक मंच से लेकिन साथ में एक छोटा सा स्लग भी लगाया है कि हालांकि मतभेद और साफ सफाई का दौर भी चला. ऐसा लगता है कि मंच पर मौजूद वैदिक जी के आभामंडल में अखबार इससे आगे जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. अमर उजाला ने तो हद ही कर दी. जरा हेडिंग देखिए- अगस्त तक आरपार का अल्टीमेटम. अरे काहे का अल्टीमेटम. स्वेदशी सेवा केन्द्र खोलने का या फिर कालाधन की वापसी का मुहिम चलाने का. खैर, अगर स्वदेशी सेवा केन्द्र खोलने से कुछ विज्ञापन वगैरह रिलीज होता है तो कौन जाने अमर उजाला का नंबर सबसे पहले आये, भले ही वह देश का तीसरा सबसे बड़ा अखबार क्यों न हो.
पंजाब केशरी को आंदोलन में नई धार भी दिखी और अनशन में दरार भी नजर आ गई. साथ में अश्विनी कुमार जी का विशेष संपादकीय भी है ष्कबीरा खड़ा बाजार में.ष् अश्विनी जी ने बिल्कुल सही फरमाया है. बस कबीरा की जगह अगर वे रामदेव लिख देते तो बात बन जाती. अपने आलोक मेहता का नेशनल दुनिया अमर उजाला और पंजाब केसरी से भी आगे निकल गया है. ष्भारत छोड़ो जैसा होगा आंदोलन.ष् इस लीड स्टोरी के साथ संदेश है कि काला धन वापस लाने की मुहिम चलाएंगे. और जो नहीं लिखा गया है वह रामदेव भी समझ लें कि जब वापस आ जाए तो कुछ धन ष्इधरष् भी लगवाएंगे क्योंकि नया अखबार शुरू किया है. थोड़ी कड़की दूर हो जाएगी.
चलिए बड़े अखबारों की गलतबयानियों और तराशी हुई रिपोर्टिंग को दिल्ली के एक दो छोटे अखबारों ने जरूर दूर करने की कोशिश की है जो सर्कुलेशन में इन भीमकाय अखबारों से भले ही कम हों लेकिन समझ में ज्यादा बेहतर नजर आते हैं. दिल्ली के दो अखबार राष्ट्रीय सहारा और नया इंडिया ने वह रिपोर्ट करने की कोशिश की है जो वास्तव में घटित हुआ है. राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है कि रामदेव के हाथ मिले दिल नहीं. नया इंडिया और करीब पहुंचा है और लाइन ली है कि बड़बोले बाबा के राग में दबा अनशन. साथ में संपादकीय भी है कि ष्रामदेव फिर भड़भड़ाए.ष् संपादकीय लिखता है कि रविवार को मैं और मेरे बालकृष्ण का भाव भी मुखर था. अन्ना और रामदेव के मिलन को नौटंकी बताता यह संपादकीय लिखता है कि -अन्ना हजारे बालकृष्ण के बीच अपनी तस्वीर बनवाई. कई संकेत दिये. बालकृष्ण को बैधता दिलवाई. सो फिर जाहिर हुआ कि रामदेव सिर्फ और सिर्फ बालकृष्ण के आसरे हैं.‘ ऐसा क्यों है?
कारण कुछ और नहीं बल्कि वही है जो ईटी ने लिखा है. बालकृष्ण उन सभी कंपनियों के मालिक हैं जहां बाबा रामदेव ने सफेद काला धन लगा रखा है. अब ऐसे में रामदेव के बालकिशन के अलावा किसी और की चिंता क्यों होगी? क्यों अखबार वालों तुम्हें भी छठी इंद्रिय को भी कुछ दिखाई सुनाई देता है या रिपोर्टिंग के वक्त उन्होंने काम करना बंद कर दिया है?

तमाशा-ए-बाबा रामदेव


तमाशा-ए-बाबा रामदेव

(संजय तिवारी)

जंतर मंतर पर बाबा रामदेव के तमाशे का यह उत्तरार्ध है. वैसे तकनीकि तौर पर यह स्थान संसद मार्ग या पार्लियामेन्ट स्ट्रीट कहा जाता है लेकिन कई बार बड़े आयोजनों के लिए अगर पहले से अनुमति मांगी जाए तो सरकार संसद मार्ग के एक हिस्से को ब्लाक करके प्रदर्शन करने की अनुमति दे देता है. रामदेव को जंतर मंतर की जगह संसद मार्ग की सड़क एलॉट कर दी गई थी. पार्लियामेन्ट थाने से कनाट प्लेस की लालबत्ती (सिग्नल) तक सड़क को आम परिवहन को रोक दिया गया था. लगभग पूरी सड़क पर रामदेव का विशाल पंडाल लगा था. 4 जून के अपमान का बदला लेने के लिए मानों 3 जून को रामदेव ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी.
जिस संसद मार्ग पर बाबा रामदेव का रोड शो हो रहा था उसके बगल में जंतर मंतर खाली पड़ा हो ऐसा नहीं है. पूरे जंतर मंतर पर सौ से अधिक बसें पार्क थीं. सैकड़ों दूसरे छोटे वाहन भी आड़े तिरछे खड़े थे जिनमें अधिकांश पर पीली पट्टी वाले नंबर प्लेट लगे थे. वही जो टूर एण्ड ट्रैवेल्स वाली गाड़ियों को दिये जाते हैं. ज्यादातर गाड़ियों पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों का कोड था जिसका मतलब था कि बाबा रामदेव के इस रोड शो में अधिकांश लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भरकर लाये गये थे. वहां मौजूद लोगों को देखकर यह बात और पक्की हो जाती थी उपस्थित लोगों में ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लोग ही शामिल थे. ज्यादातर ऐसे दिख रहे थे जो किसी न किसी रूप में रामदेव की योग विद्या या आयुर्वेद व्यापार से जुड़े हुए जान पड़ते थे. अधिकांश के कंधों पर पतंजलि योगपीठ का झोला बता रहा था कि वे बाबा रामदेव के सच्चे अनुयाई हैं. साफ था, बाबा रामदेव अपने समर्थकों को बसों में भरकर जंतर मंतर पहुंचे थे.
मंच भी क्या भव्य बनाया गया था. पहली बार किसी आयोजन में मंच के बैकड्रॉप की जगह मंच बराबर एलसीडी स्क्रीन दिखी. करीब चार ट्रॉली कैमरे, दर्जनों सीसीटीवी कैमरे, सड़क पर अस्थाई रूप से निर्मित किया गया पांडाल, पांडाल में केवल रामदेव की िवभिन्न भाव भंगिमाओं वाले पोस्टर और पोस्टरों पर भांति भांति के संदेश. कुछ पोस्टरों में आचार्य बालकृष्ण भी नजर आ रहे थे. मंच के सामने मीडियावालों को जगह दी गई थी. उनके कैमरे और तामझाम अलग. पूरे दिन के इस उपवाश में समर्थकों से भूखा रहने की कोई अपील की गई थी या नहीं, कह नहीं सकते लेकिन बसों में सबके लिए पूरी सब्जी के पैकेट तैयार थे. हालांकि आज दिल्ली में बादलों के कारण वैसी तपिश नहीं थी जैसी दो दिन पहले थी लेकिन अनशन स्थल पर कम से कम लोगों के लिए पैकेटवाला पानी पिलाने की पूरी व्यवस्था थी. रामदेव का अपना आर्थिक ही नहीं बल्कि सांगठनिक साम्राज्य भी है इसलिए इस एक दिवसीय अनशन या फिर उपवाश या फिर तमाशा के लिए रामदेव की विभिनन्न संस्थाओं के सेवादार चौकस थे और इस रोड शो को सफल बनाने की प्राण प्रण से पुरजोर कोशिश कर रहे थे.
और केवल सेवादार ही क्यों? मंच से बाबा रामदेव पतंजलि योगपीठ और दिव्य योग फार्मेसी को बंद करवाने की धमकी देनेवालों को सौ और अधिक कारखाने खोल लेने की नसीहत दे रहे थे तो मंच से नीचे स्वदेशी की टी शर्म पहने उनके कुछ कारिंदे सफेद धन की खोज में रामदेव की कंपनी के बने धनिया, मिर्चा से लेकर साबुन तेल तक के प्रचार वाला पर्चा बांट रहे थे. आंदोलन पर जो खर्च आया था उसकी कीमत वसूलतने के लिए अगर रामदेव की स्वदेशी कंपनी का थोड़ा प्रचार हो जाए और उनके उत्पादों का प्रसार बढ़ जाए तो इसमें हर्ज ही क्या था?
तो, जिस जंतर मंतर पर बाबा रामदेव सालभर पहले आना चाहते थे उस जंतर मंतर तक पहुंचने में बाबा रामदेव को सालभर लग गये. इस एक साल में बाबा रामदेव ने करीब 56 दफा कोशिश की और 16 बार सरकार को चिट्ठियां लिखीं तब जाकर बाबा रामदेव को जंतर मंतर तक जाने का रास्ता दिया गया. वह भी महज आठ घण्टों के लिए. सुबह दस से शाम छह बजे तक. जब बाबा रामदेव उत्तरार्ध के बीच शाम करीब सवा पांच बजे भाषण करने आये तो उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि कुछ लोग उन्हें मजाक कर रहे हैं तो छह बजे के बाद एक मिनट भी और अधिक हुआ तो कौन जाने पुलिस फिर से रामलीला कर दे. रामदेव ने दहाड़ते हुए कहा कि तो क्या हुआ? हम छह बजे से पहले अपना अनशन समाप्त कर देंगे. यह मजाक नहीं था. यह बाबा रामदेव की व्यवहार बुद्धि थी. करीब साल भर में आयकर और सीबीआई की जांच ने कम से कम उनकी अकल इतनी तो ठिकाने ला दी है कि औकात के बाहर जाकर दावे करना कई बार आत्मघाती साबित होता है. इसलिए बाबा रामदेव ने राजनीतिज्ञों में लालू का भी नाम लिया और सोनिया गांधी का जिक्र करते हुए पूज्य सोनिया गांधी का सम्मानित संबोधन दिया.
जब शाम को बाबा रामदेव बोलने के लिए खड़े हुए तब तक अन्ना हजारे बोल चुके थे और अरविन्द केजरीवाल से बाबा रामदेव का झगड़ा हो चुका था. इसलिए जब बाबा रामदेव बोलने के लिए खड़े हुए तो जो कुछ बोला उससे इतना अंदाज तो लग गया कि दोनों के बीच मतभेद बहुत गहरे हैं. कारण क्या है इसका भी संकेत बाबा रामदेव के भाषण में ही सुनादे दे गया. बाबा रामदेव ने कालेधन के सवाल पर जो सात सूत्रीय मांग पत्र सार्वजनिक किया उसमें उन्होंने जनप्रतिनिधियों से मिलने के कार्यक्रमों का खुलासा किया. इसमें ग्राम प्रधान से लेकर सांसद और मंत्री तक सभी शामिल हैं. यह भला अरविन्द केजरीवाल को क्यों रास आयेगा कि वे उन बाबा रामदेव के साथ उन जनप्रतिनिधियों से कालेधन के सवाल पर मिलें जिनसे कल तक लोकपाल के मुद्दे पर मिलते रहे हैं. वैसे भी सांसदों के घर के आगे धरना प्रदर्शन यह अरविन्द केजरीवाल के इंडिया अगेन्स्ट करप्शन का सफल कार्यक्रम था. अब क्या यह संभव है कि अरविन्द केजरीवाल सहित टीम अन्ना के अन्य सदस्य जनप्रतिनिधियों से बाबा रामदेव के एजंट के बतौर मिलने जाएं? फिर लोकपाल का क्या होगा? सीधे तौर पर बाबा रामदेव ने टीम अन्ना के वर्चस्व को चुनौती दे दी थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि अरविन्द केजरीवाल मंच छोड़कर चले गये.
अरविन्द के जाने के बाद हालांकि अन्ना हजारे शेष बचे रहे लेकिन बोलने का वक्त आया तो वे भी चरित्र निर्माण की दुहाई देने लगे. जैसे जैसे अन्ना हजारे चरित्र निर्माण और व्यक्तिगत चरित्र का बखान करते रहे बाबा रामदेव उचक उचक कर उन्हें देखते रहे. मानों वे यह उम्मीद कर रहे थे कि अन्ना हजारे कुछ ऐसा बोलें कि इस गर्मी में सर्दी का अहसास हो. अन्ना हजारे बोले लेकिन बहुत चतुराई से. उन्होंने दो तीन बातें ऐसी कहीं जो रामदेव के लिए राहतभरी हो सकती थीं. उन्होंने कहा हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है. कुछ लोग है जो मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन उन्होंने बड़ी चालाकी से खुद बाबा रामदेव के साथ जाने की बजाय यह कहा कि अब बाबा रामदेव हमारे साथ आ गये हैं इसलिए हम अपनी लड़ाई बहुत ताकतवर तरीके से आगे लेकर जाएंगे. गांव गांव लेकर जाएंगे. यह सब वे तब बोल रहे थे जब अरविन्द केजरीवाल मंच छोड़कर जा चुके थे.
तो, सवाल यह है कि बाबा रामदेव आखिर 3 जून को दिल्ली क्यों आये? क्या सिर्फ यह बताने के लिए वे नौ अगस्त को दोबारा दिल्ली आयेंगे आंदोलन करने या फिर इच्छाएं कुछ और थीं? संसद मार्ग पर रामदेव का तामझाम देखकर साफ लगता था कि वे शक्ति प्रदर्शन करने आये हैं. योगमाया से उनके पास अब इतना जन और धन उपलब्ध है कि वे जम जहां चाहें तंबू गाड़ सकते हैं. 4 जून 2011 की आधीरात को दिल्ली के रामलीला मैदान ने बाबा रामदेव को जनाना कपड़े पहनने पर मजबूर कर दिया था. उस वक्त अगर सब ठीक रहता तो बाबा रामदेव रामलीला मैदान की बजाय जंतर मंतर पर अनशन करते. रामदेव जंतर मंतर आये लेकिन साल भर बाद. मर्दाना कपड़ों में. मुस्कुराते हुए. दल बल के साथ. 100 से अधिक बसों में भरकर लाये गये अपने समर्थकों के सहारे. 56 कोशिशों के बाद जब दिल्ली सरकार ने उन्हें जंतर मंतर तक जाने और दिनभर का अनशन करने की इजाजत दे दी तो रामदेव ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. दिनभर पूरा जंतर मंतर तमाशा ए बाबा रामदेव का गवाह बना रहा. इस प्रायोजित तमाशा ए बाबा रामदेव से किसी को कुछ हासिल हो या न हो लेकिन इतना साबित हो गया है कि रामदेव को न तो कल जन समर्थन हासिल था और न आज हासिल है.

(लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक हैं)