शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

राजेश दुबे “डूबेजी” कृत कार्टूनलीला


राजेश दुबे डूबेजीकृत कार्टूनलीला

(सुरेंद्र जायस्वाल)

जबलपुर (साई)। त्रैमासिक-पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण 28 अक्टूबर 2012 को रानीदुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में कार्टूनलीला परिवार एवम सव्यसाची कला ग्रुप जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित है। कार्यक्रम के मुख्य  अतिथि इरफ़ान (जनसत्ता)  विशिष्ठ अतिथि श्री राजीव मित्तल (लखनऊ) होगें। साहित्यकार श्री ग्यानरंजन,श्री अमृत लाल वेगड़, श्री दिनेश अवस्थी, चित्रकार श्री सुरेश श्रीवास्तव कार्टून विधा पर वक्तव्य देंगे।
कार्टूनिष्ट राजेश दुबे डूबेजीका मानना है कि विज़ुअलिटी एवम समय की कमी से जूझते पाठकों को रेखाचित्र,कैरीकेचर,कार्टून, व्यंग्यचित्र के ज़रिये गुदगुदाते हैं। तक़नीकी एवम कला के संयुक्तिकरण का प्रयोग इश्तहारों एवम फ़िल्मों तक में किया जा रहा है। कार्टून दिलो दिमाग़ पर गहरा असर छोड़ते हैं। कार्टून विधा को आर के लक्ष्मण, सुधीर दर , अबू अब्राहम, काक, सुधीर तैलंग, अजीत नैनन, इरफ़ान, इस्माइल लहरी, देवेंद्र, अविषेक जयपुर, पवन पटना, हरिओम भोपाल, हाड़ा जयपुर  त्रियंबक शर्मा रायपुर,ने जीवंतता प्रदान की है। इस क्रम में कार्टूनिष्ट राजेश दुबे डूबेजीभी एक खास मुक़ाम पर हैं। इंटरनेट के पाठक में राजेश  डूबेजीके नाम से लोकप्रिय है।
श्री राजेश दुबे द्वारा बनाए कार्टूनों की प्रदर्शनी दिनांक 28 से 29 अक्टूबर 2012 तक आम जनता के लिये निरूशुल्क खुली रहेगी। सव्यसाची कला ग्रुप के अध्यक्ष सतीष बिल्लोरे,के।के।बैनर्जी, नितिन अग्रवाल, एवम कार्टूनलीला परिवार के सदस्यों ने उपस्थिति की अपील की है।

दिमाग के साथ ताकत का मेल!


राजनीति का नया ट्रेंड

दिमाग के साथ ताकत का मेल!

(सुरेंद्र सेठी)

नीमच (साई)। देश के भ्रड्ढतंत्र के खिलाफ संघर्ष कर रहे अरविन्द केजरीवाल अब राजनीति के अखाड़े में भी कुद पड़े है। दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए उनका राजनीतिक दल वहां मजबूती से काम करता ओर दोनों राजनीतिक दलों कांग्रेस / भाजपा को परेशान करता नजर आ रहा है। परिणाम क्या आयेगा। ये बाद की बात है पर, फिलहाल तो अरविन्द केजरीवाल अपने दिमागी कौशल का मसल पॉवर के साथ खुल्ले मेल का नया ट­ेंड दिखाते भी नजर आ रहे है। उनका यह नजरिया लोगो को ओर खासकर युवाओं को लुभाता नजर आ रहा है। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शद ने ठेठ फर्रूखाबादी लहजे में चुनौती दी तो केजरीवाल भी उस चुनौती का उसी शैली में एक अनुठे ढंग से जवाब देते नजर आ रहे है। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शद का घरेलु जिला है उत्तरप्रदेश क ा फर्रूखाबाद। उन पर केजरीवाल ने विकलांगों का पैसा खाने का आरोप लगाया तो वे भड़क गये ओर कहने लगे, केजरीवाल फर्रूखाबाद आ तो जाये वापस जा न सकेंगे। कोई दुसरा नेता होता तो डर जाता केन्द्रीय मंत्री की ताकत से। पर, केजरीवाल ने उनको चुनौती देेने का जो रास्ता चुना है वो देश में एक मिसाल है। उनका ये रास्ता अनुठा है। वे वहां जायंेगे पर अपने लठेत समर्थकों के घेरे में। उन्हें अगले महीने फर्रूखाबाद जाकर केन्द्रीय मंत्री के खिलाफ कुछ ओर नये खुलासे करने है। उनका सुरक्षा दस्ता किसान यूनियन तैयार कर रहा है। यूनियन ने मोर्चे के लिए अपने लठेतों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। 14 सो लाठीबध किसानों का दस्ता तैयार किया गया है। पचरोली गांव में इन लठेतों को रोज सूबह दो घंटे लाठी चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन लठेतों का एक दस्ता केजरीवाल के फर्रूखाबाद की सीमा में दाखिल होते ही उन्हें अपने संरक्षण में ले लेगा। दूसरा दस्ता सभा स्थल के पास तैनात रहेगा तो बाकी दस्ते सभा स्थल के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनायेंगे। राजनीति मंे चुनौतियों का उसी शैली में जवाब देने का ये प्रयोग केजरीवाल शुरू तो कर रहे है पर, ये कहां तक जायेगा तब शायद उनका ये प्रयोग देशभर में ब्रांड केजरीवाल के नाम से जाना जाएगा।

हिल गया लता का साम्राज्य


हिल गया लता का साम्राज्य

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। नगर में सट्टा व्यवसाय का संचालन करने वाली और सट्टा क्वीन के नाम से विख्यात प्राप्ति लता कुल्हाड़े देर सही लेकिन पुलिस के जाल में फंस ही गई। पुलिस कार्यवाही में एसआई श्रीमती प्रीति विजय तिवारी ने जाल बिछाकर इसे एक बोरा सट्टा पट्टी और 05 हजार रूपए नगद के साथ रंगे हाथ दबोच लिया।
इस मामले में एसआई प्रीति तिवारी की यह कार्यवाही काबिले तारीफ है, जिसने पुलिस की छवि पर लगते दाग को कुछ हद तक साफ किया है, लेकिन प्रश्र यह उठता है कि क्या इस कार्यवाही में लता के पास बचने के लिए कोई दूसरा उपाय थाए क्योंकि यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि सट्टा क्वीन के नाम से प्रसिद्ध रही यह महिला पुलिस प्रशासन के कुछ कर्मचारी और अधिकारियों से गहरा तालुक्क रखती है। यहीं नहीं पुलिस प्रशासन के सिपहे सालारों को अपने मकान में किराये से रखना और फिर उन्हीं का संरक्षण लेना इसकी पुरानी फितरत है।
ज्ञातव्य है कि लता बाई ने अपने घर पर एक एसआई को मकान किराये पर दे रखा था। एसआई बैस जो कि लता बाई के यहां किराये से रहते थे। जिले में पहली बार अनुविभागीय पुलिस अधिकारी के रूप में पदस्थ सिद्धार्थ बहुगुणा ने इस सट्टा नगरिया को संज्ञान में लेकर अपने अधीनस्थ अधिकारियों को कार्यवाही के आदेश दिये। तो थाना कोतवाली में कुंभकरणीय नींद पर सोए अधिकारी भी जाग गये और ऐन.केन. प्रकरेण लता के साम्राज्य को हिलाने की कोशिश में लग गये, जिस पर महिला एसआई श्रीमती प्रीति विजय तिवारी ने सफलता भी प्राप्त की।
मजे की बात तो यह है कि अपने धंधे में आंच आते देख और पुलिस शिंकजे में कसी लता बाई ने अपने आपको बचाने के लिए राष्ट्रचंडिका के प्रधान संपादक पर ही झूठा आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया, जो सरासर निराधार है। प्रश्र यह उठता है कि लता कुल्हाड़े पर तो पुलिस प्रशासन ने कार्यवाही करके अपने दाग धोने की कोशिश की है, लेकिन उन पुलिस अधिकारियों का क्या होगा जो सामने से लता बाई के इस सट्टा कारोबार को देखकर भी इसे संरक्षण देते आए हैंघ् क्या उन एसआई और पुलिस कर्मियों पर कभी गाज गिर पायेगीघ् नेट पर अपलोड उस वीडियों पर खाकीधारक पंद्रे और शुक्ला स्पष्ट नजर आ रहे हैंए जो सट्टा क्वीन के साथ चाय की चुश्कियां लेकर क्वीन के व्यवसाय के हाल.चाल जान रहे हैं,
- 5555 की मालकीन पंद्रे
नगर में यह चर्चा जोरों पर है कि किसी समय में कौड़ी को मोहताज लता बाई आज करोड़ों की मालकीन है और देखते ही देखते इसकी आर्थिक स्थिति आसमान छू रही है। कई लाखों का बैंक बैलेंस और नगर में महंगे. महंगे मकानों की मालकिन बन चुकी यह महिला किसी समय में पैदल चलती थी। सट्टे के व्यापार में कमाये काले धन से पहले यह दोपहिया वाहन पर उतरी और फिर देखते ही देखते चारपहिया वाहन में घूमने लगी। एमपी 28, 5555 पर लता बाई को नगर में अक्सर घूमते देखा गया हैए लेकिन पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि एमपी 28, 5555 एक खाकीधारक की पत्नी के नाम पर है।
आरटीओ विभाग छिंदवाड़ा में यह वाहन एएसआई पंद्रे की श्रीमती के नाम पर रजिस्टर्ड है। इन बातों से स्पष्ट होता है कि लता बाई को पंद्रे का खुला संरक्षण था। यहीं नहीं सूत्र तो यह भी बताते हैं कि पंद्रे लताबाई के साथ सट्टा के इस व्यापार में पार्टनरशिप भी चाहता था। इस पार्टनरशिप के ही लालच के कारण ही वह लताबाई पर इतना मेहरबान था और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को लता के इस कारोबार पर कार्यवाही करने से रोकता था। इन तथ्यों के उजागर होने के बाद अब देखना है कि क्या उच्चाधिकारियों की जांच पंद्रे पर गिरेगीघ् यह भविष्य की गर्त पर है।

जी न्यूज बना जिंदल के लिए फंदा


जी न्यूज बना जिंदल के लिए फंदा

(विस्फोट डॉट काम)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस सांसद व उद्योगपति नवीन जिंदल ने आज जी न्यूज पर आरोप लगाया कि जी न्यूज ने उनसे कोयला घोटाले की खबर न दिखाने के एवज में 100 करोड़ रुपए की मांग की थी। उन्होंने इस संबंध में जी न्यूज के संपादकों के साथ हुई बातचीत का टेप भी जारी किया। इस वीडियो में जी न्घ्यूज़ के मैनेजिंग एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को जिंदल के अधिकारियों के साथ बातचीत करते हुए दिखाया गया है। इसमें वे पैसों और कोयला घोटाले पर चर्चा कर रहे हैं। जिंदल ने इस मामले में दिल्ली पुलिस में 2 अक्तूबर को एफआईआर दर्ज भी कराई है।
नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिंदल ने जी न्यूज पर आरोप लगाते हुए कहा कि पहली मुलाकात में समीर आहलूवालिया ने 20 करोड़ रुपये मांगे और इस रकम को पांच-पांच करोड़ रुपये की किश्घ्त के रूप में चार साल तक चुकाने के लिए कहा। जिंदल ने कहा कि उनकी टीम ने फैसला लिया कि वे सच को सामने लाएंगे और सबूत जुटाने के लिए अगली बैठक में छिपे हुए कैमरों का सहारा लिया जाएगा। नवीन जिंदल ने कहा कि उन्घ्होंने जी न्घ्यूज़ के साथ 13, 17 और 20 सितंबर को भी मुलाकात की और इस दौरान जी न्घ्यूज़ ने 20 करोड़ की रकम को बढ़ाकर सीधे 100 करोड़ कर दिया।
जिंदल ने बताया कि जी न्यूज़ ने यह कहते हुए रकम बढ़ा दी कि उन्घ्होंने 20 करोड़ नहीं बल्कि 100 करोड़ ही मांगे थे, लेकिन पहली मुलाकात में कॉफी शॉप में शोर ज्घ्यादा होने के कारण सुनने में गलती हुई होगी। 13 सितंबर से बातचीत के दौरान जी न्घ्यूज़ और जी बिज़नेस को भरोसा होने लगा था कि हम उन्घ्हें पैसे दे देंगे और उन्घ्होंने अपने चौनल में हमारी कंपनी के खिलाफ खबरें दिखानी बंद कर दी। लेकिन 19 सितंबर को उन्घ्हें ये साफ हो गया था कि हम पैसे नहीं देंगे और इसके बाद चौनल ने 24 सितंबर से वापस हमारे खिलाफ खबरें दिखानी वापस शुरू कर दीं। जिंदल ने बताया कि उन्होंने इस टेप को ब्रॉडकास्ट एडिटर एसोशियएन को भी दिखाया था। इस टेप को दिल्ली पुलिस को भी सौंप दिया गया है।
इस पूरे मसले पर जी न्यूज ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वे जिंदल का स्टिंग ऑपरेशन कर रहे थे। जिंदल की प्रेस कॉन्घ्फ्रेंस के तुरंत बाद सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया ने अपने चौनल पर आकर कुछ कागज दिखाते कहा कि ये वो कॉन्ट्रेक्ट है जिसे हम चाहते थे कि नवीन जिंदल साइन करें। वो 100 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन करने को तैयार भी थे। अब नवीन जिंदल पूरी तस्वीर का रुख बदलना चाहते हैं। जी न्यूज पर हम लगातार मुहिम चला रहे हैं। हम 1.86 करोड़ के घोटाले में खुलासे कर रहे हैं। नवीन जिंदल चाहते थे कि उनके खिलाफ खबर रुक जाए। जो तस्वीरें उन्होंने दिखाई उनसे छेड़छाड़ की गई है।

विलय दिवस पर मुक्ति का संकल्प


विलय दिवस पर मुक्ति का संकल्प

(वीरेंद्र सिंह राजपूत/विस्फोट डॉट काम)

नई दिल्ली (साई)। 26 अक्टूबर कश्मीर के इतिहास में विलय दिवस के रूप में याद किया जाता है क्योंकि इसी दिन कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय के लिए संबंधित दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये थे। तब से लेकर आज तक कश्मीर में 26 अक्टूबर को विलय दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस बार विलय दिवस के मौके पर वीरेन्द्र सिंह चौहान मानते हैं कि कश्मीर में एक संकल्प दिवस के रूप में भी मनाया जाना चाहिए। वह संकल्प दिवस होना चाहिए कि कश्मीर के जो टुकड़े हमसे छीनकर चीन और पाकिस्तान के हिस्से में चले गये हैं उन्हें वापिस हासिल करके अधूरे विलय को पूरा किया जाना चाहिए।
26 अक्तूबर को कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने 1947 में अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय पत्र पर दस्तखत किए थे। राज्याध्यक्ष के नाते माउंटबेटन ने 27 अक्तूबर को इसे मंजूरी दी। इसका खाका हूबहू वही था जिसका भारत में शामिल हुए अन्य सैंकड़ों रजवाड़ों ने अपनी अपनी रियासत को भारत में शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया था। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया। भारत में जम्मू कश्मीर के विलय से संबंधित दस्तावेजों में यह सर्वाधिक वजनदार और मौलिक दस्तावेज हैं। राज्य में इसके बाद के घटनाचक्र और भारतीय संघ के साथ उसके रिश्तों को लेकर जितने भी सवाल रह रह कर उठते रहे हैं, यह दस्तावेज उनका सच्चा और सटीक उत्तर है। भारतद्रोहियों व पाकपरस्तों के पास इसकी कोई काट नहीं।
लिहाजा, विलय दिवस पर देशवासियों को महान देशभक्त और समाज सुधारक हरि सिंह को स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता जतानी चाहिए। कटु सत्य है कि स्वतंत्र भारत ने इस विभूति के साथ न्याय नहीं किया। विलय के बाद तुच्छ तात्कालिक सियासत के चलते इन्हें अपनी ही रियासत से बाहर रहने के लिए विवश कर दिया गया था। महाराजा हरि सिंह संभवतः पहले भारतीय शासक थे जिन्होंने अपने राज्य में छुआछूत के खिलाफ आधिकारिक रूप से अभियान छेड़ा, कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पुरजोर प्रयास किए और दीनबंधु सर छोटू राम से भी पहले भूमि सुधारों की वकालत करते हुए अपने यहां इस दिशा में पहलकदमी की।
विलय दिवस के अवसर पर 1947 में विभाजन के समय के घटनाचक्र पर एक निगाह डाल लेना भी ठीक रहेगा। दो सौ बरस भारत को लूटने के बाद फिरंगी अपना यूनियन जैक लपेट कर लंदन लौटने की प्रक्रिया में थे। लाल किले पर पंद्रह अगस्त को तिरंगी पताका फहराने के बाद देश आजादी के जश्न में मग्न था। उधर देश का एक बड़ा हिस्सा बंटवारे की उस विभीषिका से रूबरू हो रहा था जिसमें किसी भी साधारण लुटेरे की भांति फिरंगी जाते जाते भारतभूमि को झोंक गए थे। अपने सीधे नियंत्रण वाले भारत के भाग, जिसे कि वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे, को उन्होंने बरसों पहले अपनी चतुराई से चली चाल के आखिरी चरण के रूप में मजहबी आधार पर बांट दिया था। परंतु ब्रिटिश इंडिया  के दायरे से बाहर सैंकड़ों रजवाड़ों के मातहत भी तो भारत बिखरा पड़ा था। रजवाड़ों को उन्होंने अपना भविष्य कुछ नियमों के दायरे में खुद तय करने के लिए अधिकृत कर दिया था। इसके पीछे भी फिरंगी की मंशा यही थी कि उनके लौटने के बाद यहां अव्यवस्था, बिखराव और अराजकता का माहौल कायम रहे।
भारत के साथ जिन रियासतों और रजवाड़ों को जुड़ाव संभव था, उनकी संभाल सरदार पटेल ने बहुत कायदे से की। साम-दाम-दंड-भेद , जिस भी उपकरण की आवश्यकता पड़ी, उन्होंने उसका बखूबी उपयोग करते हुए मौजूदा भारत को दुनिया के मानचित्र पर उकेरने में अनूठी भूमिका निभाई। मगर जम्मू कश्मीर के संबंध में विभिन्न कारणों से ऐसा नही हुआ। इसकी एक वजह यह भी मानी जाती है कि पंडित नेहरू जम्मू कश्मीर के मामले में व्यक्तिगत तौर पर बहुत रूचि रखते थे। अन्य कारणों में रियासत की भौगोलिक और आतंरिक स्थितियों को शुमार कर सकते हैं। जम्मू कश्मीर एक ऐसा बड़ा राज्य था जिसकी सीमाएं पांच देशों को छूती थीं। यहां अधिक आबादी मुस्लिम थी और राजा हिंदू था। रियासत के अलग अलग हिस्सों मसलन गिलगित बाल्टिस्तान,कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के लोगों की आकांक्षाएं भी भिन्न भिन्न थी। महाराजा को इनके बीच संतुलन कायम करते हुए निर्णय लेना था। इस वजह से वे पंद्रह अगस्त तक कोई निर्णय नहीं ले सके। लिहाजा उन्होंने 14 अगस्त को भारत और पाकिस्तान दोनों को अलग अलग यथास्थिति समझौते के प्रस्ताव भेजे। पाकिस्तान के साथ वे अंतिम निर्णय होने तक यातायात और संचार के संबंध कायम रखने के साथ अनाक्रमण की संधि चाहते थे। पाक ने इसे तत्काल मान लिया चूंकि उसके हुकमरानों को लगता था कि ब्रिटेन के दबाव में महाराजा आखिर पाकिस्तान में विलय को राजी हो जाएंगे। भारत को हरि सिंह ने यथास्थिति समझौते का जो प्रस्ताव भेजा उसमें भारत के साथ उन्हीं संबंधों को कायम रखने की बात कही गई थी जैसे कि उनके ब्रिटिश इंडिया के साथ थे। भारत ने यह कह कर इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया कि हम परस्पर बातचीत के बाद ही ऐसा कोई करार करेंगे। फिर इस बातचीत के लिए कोई पहल दिल्ली ने की नहीं। इस बीच महाराजा भारत के नेतृत्व के साथ रियासत के भविष्य को लेकर लगातार विमर्श कर रहे थे।
चूंकि महाराजा के प्रति पंडित नेहरू का रवैया दोस्ताना कभी नहीं रहा था और वे विलय से पहले अपने मित्र शेख अब्दुल्ला को रियासत की सत्ता का साझीदार बनाने पर अडे़ थे, इसलिए महाराजा ने इस दिशा में भी पहलकदमी की। शेख सरकार का हिस्सा सितंबर में बना दिए गए।  इस पर पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर हाथ से खिसकता नजर आया। इसी बौखलाहट में पाकिस्तान ने 22 अक्तूबर को कबाइलियों के वेश में फौज भेज कर जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। पाकिस्तानियों ने रियासत में घुस कर जो कत्लोगारत मचायी उसका सामना करने में महाराजा की फौज को दिक्कत आनी ही थी। उन्होंने भारत से मदद मांगी। दिल्ली ने विलय से पूर्व सेना भेजने से इनकार कर दिया तो महाराजा ने राज्य के भारत में विलय को मंजूरी देने में भी कतई देरी नहीं की।
26 अक्तूबर को विलय पत्र पर महाराजा के दस्तखत हुए। 27 को माउंटबेटन की कलम चली और इसी दिन भारतीय फौज संकटग्रस्त कश्मीर में दाखिल हुई। जिस दिन भारतीय फौज वहां पंहुची, उस दिन वह भारतीय जम्मू कश्मीर था। उस दिन तक लगभग साढे़ चार हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर ही पाकिस्तान का कब्जा हुआ था। विलय से पहले चूकी दिल्ली विलय के बाद भी बहुत चौकस नहीं थी। कायदे से मामले को संभाला गया होता तो पाकिस्तान फौज की बढ़त को तत्काल रोका जा सकता था।हमलावर पाकिस्तान को पूरी तरह बाहर खदेडे़ बिना युद्धविराम की बात दिल्ली की बड़ी भूल थी।
जम्मू कश्मीर के मोर्चे पर भारत ने देशविभाजन से लेकर आज तक कई रणनीतिक गलतियां कीं। यह सिलसिला अभी जारी है। इस पर अलग से चर्चा फिर कभी करेंगे। मगर विलय दिवस की पृष्ठभूमि में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जम्मू कश्मीर को लेकर दिल्ली से जितनी भूलें हुई, उतने ही भ्रम भी हमारे अपनों और परायों ने फैलाए। उनमें से पहला भ्रम यह है कि राज्य का भारत में विलय सर्शत था। हकीकत यह है कि भारत में विलीन हुई तमाम रियासतों को विलय बिना शर्त हुआ। सर्शत विलय का तो कोई प्रावधान ही नहीं था। दूसरा भ्रम यह कि महाराजा ने विलय में देरी की। वस्तुतःमहाराजा हरि सिंह रियासत की स्थितियों के अनुसार सबसे विमर्श कर राज्य को भारत में मिलाना चाहते थे। उन्होंने वैसा ही किया भी। भारत के तत्कालीन नेतृत्व को इस बात का बखूबी एहसास भी था।
तीसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि भारत में राज्य का विलय अंतिम और पूर्ण नहीं है। वस्तुस्थिति यह है कि तमाम तकनीकी और कानूनी पक्षों के दृष्टिगत विलय निर्विवाद, वैधानिक और संपूर्ण है। बाद में राज्य की निर्वाचित संविधान सभा ने इसका अनुमोदन किया और यह भी कहा कि इस पर पुनर्विचार नहीं हो सकता। तथ्य यह है कि विलय पर फैसला लेने का हक केवल और केवल महाराजा को था। उन्होंने विधिवत इस काम को अंजाम भी दिया। रही बात बाद में मामले के यूएनओ में जाने की और इस संबंध में यूनाइटेड नेशन्स के कुछ प्रस्तावों कीए तो अपने जन्म से लेकर आज तक जम्मूकश्मीर के लिए जीभ लपलपा रहे पाकिस्तान समेत सारी दुनिया को पता है कि उन तथाकथित प्रस्तावों की कोई महत्ता और उपयोगिता नहीं है।
हां,राज्य के भारत के साथ एकीकरण के मामले में अगर कोई अधूरा काम बचा है तो वह है पाक और चीन के अवैध कब्जे वाली हमारी जमीन और जनता की मुक्ति का कार्य। हमारी संसद 1994 में सर्वसम्मत प्रस्ताव पास कर यह बात दुनिया को बता चुकी है। रक्षा मंत्री एंटनी ने कुछ हफ्ते पहले कुछ ऐसे ही शब्दों में संसद के संकल्प को दोहराया भी था। अब यह काम कूटनीति से हो या किसी अन्य तरीके से, यह देश के नेतृत्व को तय करना है।

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

त्रणमूल में चल रहा अंर्तद्वंद


त्रणमूल में चल रहा अंर्तद्वंद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में सरकार से अपने मंत्रियों को वापस लेने के फरमान के उपरांत त्रणमूल कांग्रेस में अंदर ही अंदर खींचतान बेहद तेज हो गई है। केंद्र सरकार से अलग हुए मंत्री अब अपने खोए रूतबे को पाने के लिए हर संभव प्रयास करने में लग गए हैं। केंद्र की तर्ज पर ममता ने एडवाईजरी काउंसिल का गठन भी कर दिया है।
त्रणमूल कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि जब केंद्र से हटे मंत्रियों ने अपने घटते रसूख के बारे में ममता बनर्जी से गुहार लगाई तब ममता बनर्जी ने एक नया और अनोखा प्रयोग किया। वैसे तो प्रधानमंत्री की पीएम एडवाईजरी काउंसिल का गठन करते हैं, पर अब ममता बनर्जी ने सीएम एडवाईजरी काउंसिल का गठन कर दिया है।
कहा जाता है कि जब दिनेश त्रिवेदी रेल मंत्री थे, तब ममता बनर्जी उनकी कारपोरेट सोच के चलते खासी नाराज हो गईं थीं। इसके बाद त्रणमूल के मंत्रियों के बाहर होने के पहले कोलकता के टाउन हाल में एक परिचर्चा त्रिवेदी ने रखवाई जिसका विषय था कि क्या त्रणूल के मंत्रियों को यूपीए में रहना चाहिए अथवा नहीं। इसमें दिनेश त्रिवेदी ने ममता बनर्जी की उपस्थिति में यूपीए को जमकर आड़े हाथों भी लिया था।
उधर, ममता बनर्जी ने मुकुल राय को परिवहन, सौगत राय को उद्योग, दिनेश त्रिवेदी को पर्यटन, शिशिर अधिकारी को ग्रामीण विकास, चौधरी मोहन को सुंदरवन विकास, सुल्तान अहमद को अल्प संख्यक विकास, सुदीप बंदोपाध्याय को नगर विकास का एडवाईजर सीएम एडवाईजर काउंसिल में बनाया है।
ममता के इस फरमान से केंद्र के रूखसत हुए मंत्री तो मजे में हैं, किन्तु पश्चिम बंगाल के मंत्रियों की बन आई है। सांसदों को वे सुपर मंत्री कहने लगे हैं। दरअसल, अंदर ही अंदर इन एडवाईजर को मंत्री अपने उपर एक बोझ समझने लगे हैं। इन एडवाईर्ज्स की कार्यप्रणाली से भी मंत्रियों और विधायकों में में रोष और असंतोष पनपता दिख रहा है।
त्रणमूल कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो विभागीय मंत्रियों को किसी भी फैसले को लागू करने के पहले नस्ती को ममता बनर्जी तक भेजना होता था, अब ये नस्तियां बरास्ता एडवाईजर्स जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर एडवाईजर्स को इतना अधिकार संपन्न बनाया गया है कि वे जब चाहें तब बिना मंत्रियों की जानकारी के कोई भी आदेश जारी कर सकते हैं। इस तरह मंत्रियों के अधिकार और रूतबा दोनों ही कम हो गया है।

युवराज घूमेंगे लाल बत्ती में!


युवराज घूमेंगे लाल बत्ती में!

(शरद खरे)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जल्द ही लाल बत्ती में भ्रमण कर सकते हैं। जी हां, राहुल गांधी को मनमोहन सिंह की कैबनेट में जगह मिलना तय माना जा रहा है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह नेहरू गांधी परिवार के इस कदर ऋणी लग रहे हैं कि वे राहुल को कैबनेट में शामिल कर आपने आप को धन्य ही समझेंगे।
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में एक बार फिर से सियासी सरगर्मियां बढ़ गयी हैं क्योंकि 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने कैबिनेट का विस्तार करने जा रहे हैं। लगातार घोटालों के आरोपों को झेल रही यूपीए सरकार के लिए यह कैबिनेट मीटिंग काफी अहम मानी जा रही है क्योंकि ऐसा कहा जा रहा है कि इस बार कांग्रेस युवराज राहुल गांधी कैबिनेट में शामिल हो सकते हैं।
पीएमओ के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि तीन मंत्रालयों के साथ छेड़छाण से सोनिया गांधी ने मना कर दिया है। वित्त मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रेल मंत्रालय को में कोई फेर-बदेल नहीं होगा लेकिन अंदर की खबर रखने वाले कह रहे हैं कि इस बार राहुल गांधी को कोई बड़ा और अहम मंत्रालय दिया जायेगा उपरोक्त तीनों क्षेत्रों को छोड़कर। अगर ऐसा होता है तो यह राहुल गांधी के लिए काफी अहम होगा क्योंकि साल 2014 में कांग्रेस राहुल गांधी को पीएम पद का उम्मीदवार मानकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
सियासी जानकारों का कहना है कि इस बार के फेरबदेल में राहुल कि युवा बिग्रेड जैसे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे लोगों को प्रमोट भी किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो यूपीए का एक अहम कदम होगा जो उसके आने वाले दिनों में उसके अस्तित्व की रूप रेखा तय करेगा। राहुल गांधी के कैबिनेट में शामिल होने की बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि पिछले दिनों राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह से डेढ़ घंटे तक मुलाकात की थी। उसके बाद ही पीएम ने मंत्रिमंडल के फेरबदल की घोषणा की।
पीएमओ के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को संकेत दिए कि राहुल गांधी को अगर टीम मनमोहन में स्थान मिलता है तो उन्हें मानव संसाधन अथवा ग्रामीण विकास मंत्री बनाया जा सकता है। इसके साथ ही साथ कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी को भी कैबनेट में स्थान मिलना तय माना जा रहा है। साथ ही साथ रेणुका चोधरी और चिरंजीवी को भी कैबनेट में शामिल किया जा सकता है।
सूत्रों ने बताया कि कैबिनेट में फेरबदल की तैयारी दो महीने से ज्यादा समय से चल रही है। कहा जा रहा है कि दो मंत्रालय वाले मंत्रियों के वजन को हल्का किया जा सकता है। राज्यसभा के उपसभापति रहमान खान अल्प संख्यक कल्याण मंत्रालय देने की चर्चाएं जोरों पर हैं। वहीं पश्चिम बंगाल को प्रतिनिधित्व देने के लिए दीपा दासमंुशी और रंजन चौधरी के नाम चल रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर स्टील मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले बेनी प्रसाद वर्मा और पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय की लाल बत्ती छीनने की चर्चाएं भी हैं। संप्रग सहयोगी एनसीपी के कोटे से मंत्री बनी अगाथा संगमा को हटाकर उनके स्थान पर तारिक अनवर को मंत्री बनाया जा सकता है।

हास्य सरताज जसपाल भट्टी का अवसान


हास्य सरताज जसपाल भट्टी का अवसान

(महेश रावलानी)

नई दिल्ली (साई)। घरेलू घटनाक्रमों में हास्य का तड़का देकर लोगों को पेट पकड़कर हंसते हुए लोटपोट होने पर मजबूर कर देने वाले मशूहर हास्य कलाकार जसपाल भट्टी का आज तड़के करीब तीन बजे जालंधर में सड़क हादसे में मौत हो गई। उनके बेटे जसराज भी दुर्घटना में घायल हुए हैं। जसपाल भट्टी ने अपना कैरियर चंडीगढ़ के एक दैनिक में कार्टूनकार के रूप में शुरू किया था और वे अपने नुक्कड़ नाटकों से सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य करते थे।
३ मार्च १९५५ को अमृतसर में जन्मे भट्टी की मोहाली के उनके स्टूडियो में चल रही जोंक फैक्टरी अब और हमको हंसा नहीं पाएगी। लेकिन उनके हास्य व्यंग से लोटपोट हाने वाले दूरदर्शन के दर्शक झ्उल्टा-पुल्टाश् और झ्फ्लॉप शोश् को कभी नहीं भुला पाएंगे। आम आदमी के दर्द को हास्य के माध्यम से उजागर करने वाले के अद्भुत कलाकार थे। जसपाल भट्टी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और विसंगतियों का पर्दाफाश करने के लिए सड़कों पर भी उतरे और उन पर अहिंसक रूप से चोट की और इसके लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।
दुर्घटना के समय भट्टी अपनी फिल्म पावर कटके प्रमोशन से लौट रहे थे, तभी उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे में जसपाल भट्टी के बेटे जसराज, फिल्म की हिरोइन और पीआरओ नवीन जोशी घायल हो गए। आज दोपहर बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके असमय निधन से बॉलीवुड के तमाम कलाकारों ने दुख जताया है।
दुर्घटना के बाद 57 वर्षीय भट्टी को जालंधर के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहां डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दुर्घटना में भट्टी का बेटा जसराज, उनकी फिल्म की हीरोइन सुरीली गौतम व एक अन्य व्यक्ति भी घायल हो गए। चण्डीगढ़ से 150 किलोमीटर दूर जालंधर के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।
भट्टी ने अपनी नई फिल्म पॉवर कट- का निर्माण व निर्देशन किया था। यह फिल्म शुक्रवार को प्रदर्शित होने वाली थी। इस फिल्म से उनका बेटा जसराज अभिनय की दुनिया में शुरुआत कर रहा था। नजदीकी सूत्रों ने बताया कि फिल्म के प्रचार के लिए वह 40 दिन के टूर पर थे। गुरुवार को जालंधर में एक मीडिया सम्मेलन के साथ इस टूर का समापन होना था।
भट्टी भारतीय टेलीविजन व बॉलीवुड फिल्मों का एक लोकप्रिय चेहरा थे। उन्होंने 80 के दशक के आखिर में व 90 के दशक में उल्टा-पुल्टाफ्लॉप शोजैसे कार्यक्रम देकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। उन्होंने 1999 में एक फिल्म माहौल ठीक हैका निर्देशन भी किया। यह फिल्म पुलिस, प्रशासन व समाज पर एक व्यंग्य है। भट्टी सबसे प्रसिद्ध सिख हास्य अभिनेता रहे हैं, जिन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय किया।
इंजीनियर कहें या कार्टूनिस्ट, अभिनेता कहें या डायरेक्टर-प्रोड्यूसर, व्यंग्यकार कहें या फिर कॉमेडियन। जसपाल भट्टी एक ऐसा नाम है जिन्होंने जहां भी हाथ आजमाया वहां अपनी छाप छोड़ी। 3 मार्च 1955 को अमृतसर में पैदा हुए जसपाल भट्टी शुरू से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे हैं। चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले जसपाल का झुकाव शुरू से ही अभिनय की तरफ रहा।
कॉलेज के दिनों में नॉनसेंस क्लब के जरिये उन्होंने स्ट्रीट प्ले से शुरुआत की। इसके बाद द ट्रिब्यून अखबार में कार्टूनिस्ट के तौर पर भी काम किया। लेकिन उन्होंने पहली बार तब सुर्खियां बटोरी जब दूरदर्शन में उल्टा पुल्टा शो लेकर आए। विशुद्ध कॉमेडी और बिना द्विअर्थी संवाद के ही उन्होंने कॉमेडी की एक नई मिसाल पेश की। 80 के दशक में शुरू हुए इस शो के लोग दीवाने हो गए थे। हाल ये था कि लोग दूरदर्शन में सुबह सुबह इस शो का बेसब्री से इंतजार करते थे।
उल्टा पुल्टा के साथ कॉमेडी का जो करियर शुरू हुआ उसके बाद जसपाल भट्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उल्टा पुल्टा के बाद फ्लॉप शो में वो अपनी पत्नी के साथ नजर आए। एक्टिंग के साथ साथ भट्टी ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। टीवी पर उनके दूसरे शोज में थैंक्यू जीजा जी, हॉय जिंदगी-बॉय जिंदगी, फुल टैंशन भी चर्चित रहे। छोटे पर्दे पर एक्टिंग के साथ साथ जसपाल भट्टी ने सब टीवी के शो कॉमेडी का किंग कौन में जज के भूमिका भी निभाई।
2008 में अपनी पत्नी सविता के साथ डांस शो नच बलिए में उन्होंने अपने डांस का हुनर भी दिखाया। टीवी शो ही नहीं बल्कि फिल्मों में भी जसपाल भट्टी ने कॉमेडी के रंग दिखाए। इनमें श्फनाश्, श्कुछ मीठा हो जाएश्, श्कुछ ना कहोश्, श्कोई मेरे दिल से पूछेश्, श्हमारा दिल आपके पास हैश्, श्आ अब लौट चलेंश्, श्इकबालश्, श्कारतूसश् जैसी कई फिल्में शामिल हैं। हाल के समय में वो अपने बेटे के साथ पावर कट फिल्म में व्यस्त थे।
फिल्म और टीवी सीरियल ही नहीं बल्कि सड़क पर उतरकर भी जसपाल भट्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी। कॉमेडी और व्यंग्य के जरिये न सिर्फ उन्होंने लोगों का मनोरंजन किया बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की और हमेशा समसामयिक ज्वलंत मुद्दों को उठाया। इसके लिए उन्होंने कभी भी फूहड़ा भाषा या द्विअर्थी संवाद का सहारा नहीं लिया।

14 हजार श्रृद्धालु एक साथ रूक सकेंगे बाबा के दरबार में


14 हजार श्रृद्धालु एक साथ रूक सकेंगे बाबा के दरबार में

(विनीता विश्वकर्मा)

शिर्डी (साई)। देश विदेश में श्रृद्धा का पर्याय बन चुके अहमदनगर के शिरडी गांव के फकीर साई बाबा के दर पर आने वाले लोगों के लिए यह खुशखबरी ही है कि अब साई बाबा संस्थान द्वारा एक और बड़े भक्त निवास का निर्माण करवाया गया है। इस नए भक्त निवास में एक साथ चौदह हजार श्रृद्धालु रूक सकते हैं।
शिर्डी स्थित साईं मंदिर को बुधवार को एक ऐसा आवासीय परिसर समर्पित किया गया, जिसमें 14,000 श्रद्धालुओं को ठहराया जा सकता है। यह देश में सर्वाधिक क्षमता वाली आवासीय सुविधा होगी। अत्याधुनिक पर्यावरण अनुकूल इस साईं आश्रम परिसर का उद्घाटन अगले महीने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा किए जाने की संभावना है।
इस परिसर का निर्माण पांच साल में पूरा हुआ है। इस पर 1.10 अरब रुपये खर्च आया है। इस परिसर में 1,536 कमरों वाला साई आश्रम-1, 192 शैयाओं (डॉरमिटरी) वाला साई आश्रम दो शामिल हैं। परिसर निर्माण का पूरा खर्च शिर्डी साईं ट्रस्ट, चेन्नई ने वहन किया है। परिसर में सड़क निर्माण, बिजली व्यवस्था, पैदल पथ, पार्किं ग जैसी सुविधाओं पर 45 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसे शिर्डी स्थित ट्रस्ट ने वहन किया। परिसर के उद्घाटन के बाद श्रद्धालु आश्रम में कमरों के लिए ऑनलाइन बुकिंग करा सकेंगे।

एफएम की भाषा सम्मानजनक हो


एफएम की भाषा सम्मानजनक हो

(महेंद्र देशमुख)

नई दिल्ली (साई)। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एफ एम रेडियो चौनलों से कहा है कि वे अपने कार्यक्रमों की भाषा पर दें और उन्हें साफ सुथरे तरीके से पेश करें। इन चौनलों को जारी परामर्श में मंत्रालय ने कहा है कि ऐसा देखा गया है कि एफ एम रेडियो पर कुछ प्रस्तुतकर्ता अभद्र और गंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। खासकर रात्रि पारी में ऐसा किया जाता है जिसका श्रोताओं पर गलत असर पड़ता है।
मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि इन रेडियो चौनलों को इस आधार पर अनुमति दी गई थी कि वे अपनी प्रस्तुति, संदेश, विज्ञापन या अन्य किसी सूचना में आपत्तिजनक, अश्लील और देश के कानूनों के खिलाफ कोई भी प्रस्तुति नहीं करेंगे। मंत्रालय ने कहा कि उनको आकाशवाणी के कार्यक्रमों की आचार संहिता का पालन करना पड़ेगा नही तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जायेगी।

दंगे होने पर सीधे हस्ताक्षेप करेगा केंद्र


दंगे होने पर सीधे हस्ताक्षेप करेगा केंद्र

(मणिका सोनल)

नई दिल्ली (साई)। केन्द्र सरकार ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के अनुरूप दंगे होने की स्थिति में और संवैधानिक तंत्र के भंग होने की संभावना को देखते हुए सीधे केन्द्र को हस्तक्षेप करने का अधिकार देने सहित विभिन्न मुद्दों पर राज्य सरकार की राय मांगी है।
गृह मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केन्द्र सरकार को इस बारे में अधिकार देने का कानून बनाया जाना चाहिए, जिससे कि वह कानून-व्यवस्था की ऐसी बड़ी समस्या पैदा होने पर अपने सुरक्षाबलों को तैनात कर सके, जिसके परिणामस्वरूप राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के बिगड़ने की संभावना हो।
लेकिन साथ में गृहमंत्रालय ने यह भी कहा है कि सुरक्षाकर्मियों की यह तैनाती तभी होनी चाहिए जब संबद्ध राज्य संविधान के अनुच्छेद २५६ के अंतर्गत केन्द्र द्वारा जारी निर्देश का पालन करने में विफल रहा हो। इस प्रकार की तैनाती अधिक से अधिक तीन महीने की अवधि के लिए होनी चाहिए। इस अवधि को संसद की मंजूरी से और तीन महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है।
अन्य मुद्दे, जिन पर राज्य सरकारों की राय मांगी गई है, उनमें अपराधों की जांच को अन्य पुलिस गतिविधियों से अलग रखना, नगर पालिका पुलिस सेवा का गठन, अर्दली प्रथा की समाप्ति और पुलिस बलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर ३३ प्रतिशत करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की-सार्वजनिक व्यवस्थाः प्रत्येक के लिए न्याय, सभी के लिए शांति-नाम की इस रिपोर्ट को वेबसाइट पर भी डाला है।

रीढ़ विहीन लोगों से घिरीं सोनिया


रीढ़ विहीन लोगों से घिरीं सोनिया

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस के इतिहास में पहली बार एसा हो रहा होगा जबकि कांग्रेस को समूचा देश पानी पी पी कर कोस रहा होगा। घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार, अनाचार सर चढ़कर बोल रहा है, पर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी मुंह सिले बैठे हैं।
घोषित तौर पर सोनिया गांधी को सियासी सोच समझ देने के लिए पाबंद अहमद पटेल भी प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव जीते नहीं हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा, महासचिव राजा दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला आदि सभी जनता को फेस कर चुनाव जीते नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश सूबा ही एक एसा राज्य रहा है जहां से कांग्रेस ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं। बावजूद इसके सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद उत्तर प्रदेश की हालत किसी से छिपी नहीं है। मजे की बात तो यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही के संसदीय क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश में होने के बाद भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आक्सीजन पर ही है।
सोनिया गांधी का वरद हस्त मिला है कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह को। अपने दस साल के शासनकाल में राजा दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को संगठनात्मक तौर पर इस स्थिति में ला दिया है कि अब देश के हृदय प्रदेश में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचा है।
मध्य प्रदेश में तो चर्चा होने लगी है कि प्रदेश और केंद्रीय स्तर के क्षत्रपों का यह प्रयास है कि उनके क्षेत्रों में उनके अलावा कांग्रेस का कोई सांसद या विधायक ही ना जीत पाए। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि इस तरह के आरोप अब कांग्रेस की बैठकों में लगने लगे हैं।
इसके उपरांत आता है कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को राजनैतिक समझबूझ प्रदान करने वाले राजनैतिक सचिव अहमद पटेल का। अहमद पटेल मूलतः गुजरात सूबे से हैं। गुजरात में कांग्रेस सालों से औंधे मुंह गिरी हुई है। कांग्रेस के अंदरखाने में यह बात तेजी से उठ रही है कि जो अहमद पटेल अपने राज्य में कांग्रेस को नहीं जिला सके वे अहमद पटेल भला सोनिया गांधी को क्या सलाह दे रहे होंगे कि देश में कांग्रेस को जिंदा करो?
अहमद पटेल कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं। उनकी जड़ें गुजरात राज्य में बुरी तरह खोखली हैं। गुजरात में भी कांग्रेस का नामलेवा नहीं बचा है। सोच समझ के धनी अहमद पटेल पर कुछ साल पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह को साईड लाईन करने का आरोप लगा था।
हाल ही में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की करीबी और गुजरात कांग्रेस की प्रवक्ता आसिफा खान ने अपने हाथमें कमलपकड़ लिया है।
माना जा रहा है कि आशिफा के बीजेपी में आने मोदी की मुस्लिम विरोधी छवि को भी सुधारने का मौका मिलेगा। प्रदेश पार्टी नेताओं का कहना है कि नरेंद्र मोदी के विकास को देखकर लोग बीजेपी के साथ जुड़ रहे हैं। प्रदेश में लोग जाति, धर्म से ऊपर उठकर विकास को तवज्जो दे रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस आसिफा के बीजेपी में शामिल होने को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही है।
आसिफा कांग्रेस की पुरानी सदस्य हैं और वे अहमद के गृह नगर भरूच की रहने वाली हैं। पेशे से पत्रकार रहीं आसिफा कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता थीं। उनके भाजपा का दामन थामने से कांग्रेस को जो झटका लगना है वह तो लगेगा ही साथ ही मोदी का मुस्लिम विरोधी आरोप काफी हद तक धुल सकता है।