गुरुवार, 8 अगस्त 2013

जिला कांग्रेस अध्यक्ष उपाध्यक्ष के बीच हुई हाथापाई!

जिला कांग्रेस अध्यक्ष उपाध्यक्ष के बीच हुई हाथापाई!

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हीरा आसवानी और उपाध्यक्ष खुमान सिंह के बीच आज हुई हाथापाई आज चर्चा का केंद्र बनी रही। भैरोगंज में नुक्कड़ सभा के दरम्यान घटी इस घटना को अगामी विधानसभा चुनावों में सिवनी विधानसभा से प्रत्याशी चयन को लेकर भी देखा जा रहा है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भैरोगंज में जब नुक्कड़ सभा समापन की ओर थी, और प्रोटोकाल के हिसाब से जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हीरा आसवानी भी अपना उद्बोधन दे चुके थे, तब जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष खुमान सिंह अपनी मोटर साईकल पर वहां पहुंचे।
बताया जाता है कि खुमान सिंह ने वहां पहुंचने के साथ ही अपना उद्बोधन देने के लिए दबाव बनाना आरंभ किया। इस पर वहां मौजूद जिला कांग्रेस के पदाधिकारियों ने खुमान सिंह को प्रोटोकाल का हवाला देते हुए उनसे इसके उपरांत डूंडा सिवनी में आयोजित होने वाली नुक्कड़ सभा में अपनी बात रखने की बात कही गई।
बताया जाता है कि इस पर खुमान सिंह आग बबूला हो गए और वहीं उन्होंने अपशब्दों का प्रयोग आरंभ कर दिया। जैसे ही स्थिति बिगड़ती दिखी वैसे ही जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हीरा आसवानी ने उन्हें वहां से कुछ दूर ले जाया गया। वहां दोनों के बीच गर्मागर्म बहस भी हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोनों के बीच बहस इस कदर बढ़ गई कि जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने एक दूसरे की कालर तक पकड़ ली। जैसे ही ममला गर्माया वैसे ही कांग्रेस के पदाधिकारी मौके पर पहुंचे और उन्होंने दोनों को अलग अलग किया। बताते हैं इसी बीच दोनों ही ने एक दूसरे को दो चार थप्पड़ तक रसीद कर दिए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इस मामले को शांत करवाने में नंदू यादव की भूमिका सराहनीय रही। किन्तु कांग्रेस के अंदर चल रही चर्चा के अनुसार सिवनी कांग्रेस के क्षत्रप हरवंश सिंह ठाकुर के अवसान के साथ ही जिला कांग्रेस में अनुशासनहीनता की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है, जिसे शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है।
कहा जा रहा है कि यह मामला अनुशासनहीनता के एक मामले की परणीति थी। बताया जाता है कि हरवंश सिंह ठाकुर के अस्थि कलश जब केवलारी गए थे, उस समय माईक छीनने को लेकर हीरा आसवानी द्वारा खुमान सिंह को एक शो कॉज नोटिस सर्व किया गया था, और खुमान सिंह इस नोटिस से आहत थे। मौके पर उन्होने अपशब्दों के साथ यह तक कहा कि कुछ लोग चाहते हैं कि खुमान सिंह को कांग्रेस से ही बाहर कर दिया जाए।
वही, कांग्रेस के अंदर यह बात भी तेजी से चल रही है कि इस मामले में दरअसल, विधानसभा चुनाव में टिकिट की दावेदारी गर्भनाल  में है। कहा जा रहा है कि हरवंश सिंह के अवसान के उपरांत अब कांग्रेस में कार्यकर्ता और नेताओं को किसी का भय नहीं बचा है। देखा जाए तो सिवनी में कांग्रेस की नैया बिना किसी खिवैया के मझधार में डोल रही है।
जून माह में सिवनी की इस डोलती नैया को थामने के लिए केंद्रीय मंत्री कमल नाथ सिवनी आए थे, किन्तु उनके आगमन के बाद भी सिवनी जिले के हित में किसी तरह की घोषणा ना होने से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में मायूसी का आलम पसर गया था। इसके बाद एक बार फिर कांग्रेस के कार्यकर्ता इधर उधर बिखरने लगे हैं।

जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के बीच हुई मारपीट, झूमाझपटी, कालर पकड़ने की इस घटना से कांग्रेस के अंदर एक तूफान सा खड़ा होता दिख रहा है। हरवंश सिंह के समय जिले के कांग्रेस के कार्यकर्ता भले ही उनकी नीतियों की पीठ पीछे बुराई करते थे, किन्तु इस तरह अध्यक्ष के साथ सार्वजनिक मंच पर मारपीट की घटना का क्या परिणाम होगा यह तो वक्त ही बताएगा।

रेल सुविधा के लिए कोई तो हुआ फिकरमंद

रेल सुविधा के लिए कोई तो हुआ फिकरमंद

(शरद खरे)

सिवनी में रेल सुविधाएं कष्टकारी हैं। यहां ब्रॉडगेज किसी सपने से कम नहीं है। सालों से कांग्रेस के नेता सिवनी के लोगों को ब्रॉडगेज का झूला झुलाते आ रहे हैं। जब भाजपा के सांसद बने तब भाजपा ने भी कांग्रेस की परंपरा को ही आगे बढ़ाया है। ब्रॉडगेज आज तक आई नहीं पर ब्रॉडगेज के नाम पर कांग्रेस भाजपा के नेताओं ने विज्ञापन छपवा-छपवाकर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ अवश्य ही किया है।
2006 में जब लालू यादव केंद्र में रेल मंत्री थे, उस वक्त कांग्रेस के जिले के क्षत्रप हरवंश सिंह ठाकुर जो कांग्रेस को अपने हिसाब से हांका करते थे, ने जिला कांग्रेस के प्रतिनिधिमण्डल को बस से दिल्ली ले जाया जाकर अनेक नेताओं से मिलवाया। यह प्रतिनिधि मण्डल उस समय कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से भी मिला था। लालू यादव जब छिंदवाड़ा आए तब उनसे भी प्रतिनिधिमण्डल को मिलवाया गया।
इसके बाद कांग्रेस और भाजपा कीए विज्ञापनों के प्रकाशन की होड़ देखते ही बनी। लालू यादव ने बतौर रेल मंत्री यह कह दिया कि छिंदवाड़ा नैनपुर ‘जैसे‘ रेलखण्ड का अमान परिवर्तन भी किया जाएगा। फिर क्या था कांग्रेस भाजपा के नेताओं ‘मय हरवंश सिंह के‘ पिल पड़े श्रेय लेने की होड़ में। उस वक्त मीडिया की सुर्खियों को देखकर लग रहा था मानों 2007 का सूरज बड़ी रेल लाईन पर ही निकलेगा।
2007 तो क्या 2013 का सूर्य भी निकल आया और ब्राडगेज का अता पता नहीं है। लोग निराश हैं, क्या करें समझ नहीं पा रहे हैं। ब्रॉडगेज के संघर्ष के लिए खुमान ंिसंह ठाकुर ने प्रयास किए। सिवनी से छिंदवाड़ा की पदयात्रा का आगाज़ किया। बाद में सिवनी की कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य के जाल में फंसकर खुमान सिंह भी कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनकर शांत हो गए। कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनने के बाद खुमान सिंह की धार भी बोथरी ही हो गई है।
रेल सुविधाओं या अमान परिवर्तन के लिए सिवनी के किसी भी सांसद ने अपनी ओर से सिवनी की आवाज को संसद में गुंजायमान नहीं किया है। वर्तमान में सिवनी के सांसदों में सुश्री विमला वर्मा, प्रहलाद सिंह पटेल, नीता पटेरिया, ही हैं एवं वर्तमान में के.डी.देशमुख तथा बसोरी सिह मसराम सिवनी के सांसद हैं। ये वर्तमान और पूर्व सांसद अपने अपने दिलों पर हाथ रखकर क्या इस बात को कह पाएंगे कि इन्होंने सिवनी जिले की जनता के द्वारा इन्हें दिए गए जनादेश का सम्मान किया है।
क्या कारण है कि आज तक छिंदवाड़ा से सिवनी होकर नैनपुर और जबलपुर के अमान परिवर्तन की बात जिले के सांसदों द्वारा पुरजोर तरीके से उठाई नहीं गई है? क्या कारण है कि यह रेल खण्ड आज भी बाबा आदम के जमाने की नैरोगेज के सहारे है? क्या कारण है कि एक के बाद एक करके यहां छोटी लाईन के डिब्बे कम होते जा रहे हैं और सांसद खामोश बैठे हैं? क्या यह सब बसोरी सिंह मसराम और के.डी.देशमुख को दिखाई नहीं पड़ता है? क्या बसोरी सिंह का संसदीय क्षेत्र महज मण्डला जिला है और के.डी.देशमुख महज बालाघाट जिले के सांसद हैं?
सिवनी में रहने वाले लोगों के जो रिश्तेदार बाहर हैं उनके लिए यह नेरोगेज रेल वाकई एक अजूबा है। नेरोगेज रेल को बाहर वाले आज की दौड़ती भागती दुनिया में अजब गजब चीज ही मानते हैं। सांसदों की अनदेखी का ही परिणाम है कि सिवनी जिले की सीमा से सटे जिलों में मण्डला को छोड़कर नागपुर, जबलपुर, छिंदवाड़ा, नरसिंहपुर यहां तक कि बालाघाट में भी ब्रॉडगेज की सीटी की आवाज सुनाई देने लगी है। सिवनी के लोग आज भी ब्रॉडगेज की सीटी को तरस रहे हैं।
बिलासपुर में गत दिवस संपन्न हुई रेल परामर्शदात्री समिति की बैठक में उपभोक्ता कांग्रेस के अध्यक्ष डी.बी.नायर ने अपने सुझाव रखकर कम से कम सिवनी का जिकर तो किया। डी.बी.नायर ने बताया कि छिंदवाड़ा से इंदौर के लिए तो आरक्षण की सुविधा है पर इंदौर से छिंदवाड़ा के लिए आरक्षण की सुविधा ही नहीं है। सिवनी में रेल्वे प्लेटफॉर्म पर शेड नहीं है। डी.बी.नायर ने वरिष्ठ नागरिकों को आरक्षण में कोटा निर्धारित करने की मांग भी रखी।
वस्तुतः ये सारे काम सिवनी जिले के सांसद द्वय बसोरी सिंह मसराम और के.डी.देशमुख के हैं। विडम्बना है कि कांग्रेस और भाजपा के सांसद गहन निंद्रा में हैं और उनका काम उपभोक्ता कांग्रेस के अध्यक्ष डी.बी.नायर कर रहे हैं। यह वाकई सिवनी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सियासी दलों के नेताओं द्वारा सिवनी के नागरिकों को सदा से ही ब्रॉडगेज के नाम पर भरमाया जा रहा है। सिवनी से छिंदवाड़ा और नैनपुर की ओर ब्रॉडगेज का काम आरंभ हुआ भी है और नहीं भी हुआ है।

चुनाव नजदीक हैं इसे देखकर ब्रॉडगेज का लालीपॉप पकड़ा दिया गया है। चुनाव तक छिंदवाड़ा से नैनपुर के रेलखण्ड में एक इंच भी काम नहीं होने वाला है। विधानसभा चुनावों के बाद एक बार पुनः लालीपॉप दिया जाएगा, तदोपरान्त लोकसभा के चुनावों के बाद यह मामला पांच साल के लिए ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया जाएगा। अभी संसद का सत्र चल रहा है। सिवनी के कांग्रेस के सांसद बसोरी सिंह मसराम और भाजपा के सांसद के.डी.देशमुख दिल्ली में चाहें तो देश की सबसे बड़ी पंचायत में छिंदवाड़ा से नैनपुर के अमान परिवर्तन को समय सीमा में बांधने, अब तक के आवंटन और आने वाले समय में अधिक आवंटन की मांग पुरजोर तरीके से उठा सकते हैं, पर वास्तव में इन दोनों के द्वारा ऐसा शायद ही किया जाए।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

नासूर बना खवासा बार्डर का जाम!

नासूर बना खवासा बार्डर का जाम!

चेम्बर ऑफ कामर्स ने खवासा बार्डर में ट्रेफिक जाम को लेकर सौंपा ज्ञापन

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। मध्य प्रदेश महाराष्ट्र सीमा पर खवासा बार्डर में वाहनों की अनावश्यक कतार से लगने वाले जाम से सभी परेशान हो चुके हैं। इस जाम में नेता, पत्रकार, व्यवसाई, आम आदमी सभी फंसकर हलाकान हो जाते हैं। मजे की बात तो यह है कि खवासा बार्डर से महज दस किलोमीटर दूर महाराष्ट्र की मानेगांव टेक परिवहन जांच चौकी में एक भी वाहन खड़ा नहीं दिखता।
लोगों का कहना है कि खवासा की जांच चौकियों में वाहन चालकों से सौदेबाजी के चलते वाहनों का जाम लगता है, वरना क्या कारण है कि मानेगांव टेक में रास्ता पूरी तरह साफ ही नजर आता है। कहा जा रहा है कि खवासा में होने वाली अवैध वूसली का हिस्सा प्रदेश सरकार के आला नेताओं, अधिकारियों सहित जिले में समान रूप से बांटा जाता है इसीलिए इस दिशा में अब तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है।
यहां यह उल्लेखनीय होगा कि अप्रेल माह में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया द्वारा जिला कलेक्टर भरत यादव एवं जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला के अलग अलग लिए गए साक्षात्कार में खवासा के जाम को प्रमुख रूप से उठाया था। अधिकारी द्वय ने अपने अपने जवाब में कहा था कि वे एक पखवाड़े के अंदर ही इस जाम से लोगों को निजात दिलवा देंगे। जिला कलेक्टर ने कहा था कि वे इसके लिए छापामार दल भी गठित करेंगे जो खवासा चौकी पर जाकर छापे मारेगा, ताकि वहां भ्रष्टाचार ना हो सके।
वहीं, एनएच पर स्थित खवासा बार्डर पर ट्रेफिक व्यवस्था सुचारू रूप से किये जाने हेतु सिवनी चेम्बर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के द्वारा एक ज्ञापन आज जिला कलेक्टर, एसपी एवं विक्रय कर विभाग को सौंपा गया।
सौपें गये ज्ञापन में मुख्य रूप से खवासा बार्ड पर छोटे वाहन, एम्बूलेंस आदि को बार्डर की ट्रेफिक व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं होने के कारण होने वाली परेशानियों से जिले के कलेक्टर को अवगत कराते हुए जनहित में शीघ्र अतिशीघ्र उक्त व्यवस्था को ठीक कराये जाने का निवेदन किया गया है, जिसमें प्रतिनिधिमंडल ने अपनी ओर से कुछ सुझाव भी प्रेषित किये हैं।

प्रतिनिधि मंडल में चेंबर के संरक्षक अनिल सिंघानिया, चेंबर के उपाध्यक्ष उधवदास आसवानी, सचिव संतोष अग्रवाल, कोषाध्यक्ष विनोद अग्रवाल, सराफा एसो. के अध्यक्ष अतुल मालू, प्रकाश टेंभरे, सुनील नाहर, प्रवेश भालोटिया आदि का समावेश था।

थम नहीं रहा डेंगू के लार्वा मिलने का सिलसिला!

थम नहीं रहा डेंगू के लार्वा मिलने का सिलसिला!

स्वास्थ्य विभाग ने अब तक नहीं जारी की जानलेवा डेंगू, मलेरिया की एडवाईज़री

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। मच्छर जनित जानलेवा डेंगू के लार्वा मिलने का सिलसिला थम ही नहीं पा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अनेक दल द्वारा सतत् रूप से विवेकानंद और शहीद वार्ड में घरों में एकत्र पानी में मच्छरों के लार्वा की खोज कर उन्हें नष्ट किए जाने का काम किया जा रहा है। नगर पालिका की अकर्मण्यता के चलते सिवनी जिला मुख्यालय डेंगू की चपेट में आ चुका है। अब तक डेंगू के प्रभावित सात मरीजों के मिलने की खबर है।

अस्पताल भरा, मरीज जमीन पर
जिला चिकित्सालय इन दिनों मरीजों से ओवर फ्लो चल रहे हैं। अस्पताल में मरीजों के लिए पलंग खाली नहीं है। आलम यह है कि मरीज जमीन पर पड़े कराह रहे हैं। कहा जा रहा है कि जबसे जिला चिकित्सालय की कमान सिविल सर्जन डॉ.सत्यनारायण सोनी के हाथों में आई है तबसे जिला चिकित्सालय खुद ही आईसीयू में भर्ती हो गया है। जिला चिकित्सालय में बुखार, सर्दी खांसी के मरीजों की हालत देखकर लग रहा है मानो बारिश अपना असर दिखा रही है।

यही है मलेरिया जागरूकता रैली का परिणाम
कुछ दिनों पूर्व जिला मलेरिया अधिकारी के निर्देशन में मलेरिया विभाग द्वारा एक जन जागरूकता रैली का आयोजन किया गया था। इस रैली में मच्छर जनित रोगों के बारे में उनके प्रभाव, लक्षण, होने के कारण, बचाव के उपाय आदि के बारे में विस्तार से बताए जाने की बात जिला मलेरिया अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति में कही गई थी।
बताया जाता है कि इससे उलट यह रैली शहर के विभिन्न भागों में भ्रमण करने के बजाए जिला चिकित्सालय में अवस्थित जिला मलेरिया कार्यालय से निकलकर महज बाहुबली चौक तक आकर वापस लौट गई थी। इस जन जागरूकता रैली में स्वास्थ्य विभाग के मुट्ठी भर लोगों ने शिरकत की थी।

कागजों में चल रही योजनाएं
मच्छर जनित रोगों के लिए केंद्र सरकार द्वारा पूर्व में राष्ट्रीय मलेरिया उन्नमूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा था। इसके तहत जिलों में मलेरिया के यूनिट स्थापित थे। बाद में मलेरिया के कर्मचारियों को परिवार नियोजन आदि के काम में संलग्न कर दिया गया। आज भी मलेरिया विभाग में पंप मैकेनिक, लेब टेक्निशियन आदि के पदों के एवज में वेतन निकल रहा है।

बाकी वार्ड में नहीं है ध्यान!
स्वास्थ्य विभाग के डेंगू एवं मलेरिया के विनिष्टीकरण अभियान का पूरा जोर जिला मुख्यालय में महज विवेकानन्द वार्ड और शहीद वार्ड में ही है। इन दोनों वार्ड के अलावा भी अन्य वार्ड में डेंगू या मलेरिया के लिए जिम्मेदार मच्छरों के लार्वा होने से इंकार नहीं किया जा सकता है, पर स्वास्थ्य विभाग का ध्यान इस ओर ना होना आश्चर्यजनक है।

नहीं जारी हुई एडवाईज़री!
स्वास्थ्य विभाग द्वारा 30 जुलाई को जनसंपर्क विभाग के माध्यम से विज्ञप्ति जारी कर स्वीकार किया गया था कि शहर में दो मरीज डेंगू प्रभावित हैं। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब तक डेंगू और मलेरिया के लिए एडवाईज़री जारी ना करना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। लगता है स्वास्थ्य विभाग यह मानकर चल रहा है कि सिवनी जिला मुख्यालय के सारे लोग डेंगू और मलेरिया के कारण, लक्षण, बचाव के उपाय आदि से भली भांति परिचित हैं।

ठण्ड में कहर बरपाएगा डेंगू!
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के दिल्ली ब्यूरो से मणिका सोनल ने भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सूत्रों के हवाले से बताया कि डेंगू के लिए जवाबदेह मच्छर का कहर ठण्ड के बढ़ते ही तेज हो जाता है। ठण्ड के मौसम में डेंगू का मच्छर अपने पूरे शवाब पर होता है। चूंकि ठण्ड के मौसम में पंखे आदि नहीं चलते इसलिए मच्छर के काटने की संभावनाएं और अधिक बढ़ जाती हैं।

दिन में काटता है डेंगू का मच्छर
डेंगू के लिए जवाबदेह मच्छर, दिन में ही लोगों को अपना शिकार बनाता है। इस लिहाज से दिन में संचालित होने वाली शिक्षण संस्थाओं और कार्यालयों में भी मच्छर को भगाने के पर्याप्त उपाय करना जरूरी हो गया है। जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि वह नगर पालिका प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को यह निर्देश दे कि सभी वार्ड में जांच दल बनवाकर घरों घर मच्छरों के लार्वा की जांच और विनिष्टीकरण की कार्यवाही करने के निर्देश दे।

सुनिश्चित की जाए जनभागीदारी

जानलेवा डेंगू के सातवें मरीज मिलने के बाद अब इसका कहर बढ़ने की उम्मीद से इंकार नही किया जा सकता है। अब इससे निपटने के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित किया जाना आवश्यक हो गया है। जिला प्रशासन को चाहिए कि इसके लिए गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की मदद ली जाकर, घरों घर अनेक प्रचार माध्यमों से जनजागरूकता फैलाएं।

स्कूल बस, फायदे का धंधा

स्कूल बस, फायदे का धंधा

(शरद खरे)

स्कूल बस का संचालन वाकई एक फायदे का सौदा साबित हो रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन, परिवहन विभाग चाहे जो निर्देश जारी करें पर स्कूल बस संचालकों की मोटी खाल पर इसका कोई असर नहीं होता है। लगता है उपर से नीचे तक कड़े निर्देश जारी करना उसी तरह की एक परंपरा बन चुका है जिस तरह कि इन निर्देशों को हवा में उड़ाने की परंपरा बन चुकी है।
स्कूल बस संचालन के लिए न्यायालयों के साथ ही साथ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा समय समय पर कड़े दिशा निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। निहित स्वार्थ और पैसा कमाने की अंधी प्रतिस्पर्धा में उलझे परिवहन विभाग और यातायात पुलिस को इन स्कूल बस संचालकों की मश्कें कसने की फुर्सत शायद नहीं है। कभी कभार निरीह आटो चालकों पर अवश्य ही यातायात पुलिस की सख्ती दिख जाती है।
देखा जाए तो स्कूल बस संचालन के नियम कायदे बेहद कड़े हैं। चूंकि इसमें देश के नौनिहाल और भविष्य, घरों से शाला तक का सफर तय करते हैं इसलिए इनकी सुरक्षा चाक चौबंद होना जरूरी ही है। दिल्ली सहित महानगरों में आए दिन स्कूल बस के हादसे, बसों में बच्चों के साथ यौन छेड़छाड़ आदि की शिकायतें मीडिया में पटी पड़ी हैं। बावजूद इसके सिवनी जिले मंें ना तो जिला प्रशासन ही इसके लिए संजीदा दिख रहा है ना ही शाला प्रबंधन।
ज्ञातव्य है कि पिछले साल मार्च में प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग के लोक शिक्षण संचालनालय ने स्कूल बसों के लिए एक नई गाइड लाइन तय की थी। दरअसल, स्कूल बसों के लगातार हादसों ने स्कूल शिक्षा विभाग के मोटी चमड़ी वाले आला अफसरान को जगाया था। 2012 में मार्च माह मेें ही प्रदेश शासन ने मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों का पालन कराने के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को अमल में लाने के लिए स्कूल बस के लिए जो दिशा निर्देश जारी किए हैं, उसमें इस बात का विशेष ख्याल रखा गया था कि जिस स्कूल बस में बच्चों को स्कूल तक लाने ले जाने का काम किया जाएगा वह बस कितनी महफूज होगी? उस बस में हर उस परिस्थिति से निपटने की तैयारी रहेगी जो रास्ते में किसी भी वक्त किसी के भी साथ घटित हो सकती है। किसी भी परिस्थिति से निपटने के सारे इंतजाम बस में उपलब्ध रहेंगे ताकि हर परिस्थिति से स्कूल बस में बैठे बच्चों को सुरक्षित बचाया जा सके।
उक्त समस्याओं पर विचार कर स्कूल बसों के लिए नियम-कायदों की गाइड लाइन तैयार की गई एवं इसे नवीन शिक्षण सत्र में समस्त स्कूल संचालकों के लिए जारी किया गया है। इसके अनुसार बस के आगे और पीछे बड़े अक्षरों में, सुवाच्य अक्षरों में स्कूल बस लिखा जाए। यदि बस किराये की है तो उस पर आगे एवं पीछे विद्यालयीन सेवा लिखा जाए। विद्यालय के लिए उपयोग में लायी जाने वाली किसी भी बस में निर्धारित सीटों से अधिक संख्या में बच्चे नहीं बैठाए जाएं। प्रत्येक बस में अनिवार्य रूप से फर्स्ट एड् बाक्स की व्यवस्था हो। बस की खिड़कियों में आधी पट्टियां अनिवार्य रूप से फिट कराई जाएं। प्रत्येक बस में अग्नि शमन यंत्र की व्यवस्था हो। बस में स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर चस्पा हांे। बस के दरवाजे पर सुरक्षित चिटकनी लगी हो। वाहन चालक को भारी वाहन चलाने का न्यूनतम पांच वर्ष का अनुभव होना चाहिए तथा पूर्व में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन का दोषी नहीं ठहराया गया होना चाहिए। मोटर वाहन नियम 17 के अनुसार प्रत्येक बस में बस चालक के अतिरिक्त एक अन्य योग्य व्यक्ति की व्यवस्था की जाए। बच्चों के बस्ते रखने के लिए सीटों के नीचे जगह की व्यवस्था की जानी चाहिये। सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को लाते-ले जाते समय बस में एक व्यक्ति यथासंभव स्कूल के एक शिक्षक की व्यवस्था की जाए।
वहीं, सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन) स्कूलों की बसों में अनपढ़ चालक-परिचालकों के हाथों में स्टेयरिंग नहीं थमाए जाने के निर्देश जारी किए गए थे। ड्राइवर 12 वीं व कंडक्टर के लिए 10 वीं पास होना अनिवार्य कर दिया है। कोई स्कूल संचालक या बस मालिक नियमों का उल्लंघन करता है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। बोर्ड सचिव विनीत जोशी द्वारा स्कूलों को इस संबंध में अवगत कराया जा चुका है। स्कूलों को निर्देश जारी किए गए हैं कि यदि ड्राइवर तेज गति से गाड़ी चलाने, शराब पीकर गाड़ी चलाने व खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाने को लेकर एक भी बार परिवहन विभाग की ओर से हुई चालान की कार्रवाई का दोषी होगा तो उसे काम पर नहीं रखा जाएगा। इसके साथ ही साथ सागर जिला कलेक्टर ने तो स्कूल बस में सीसीटीवी कैमरे लगाने की अनिवार्यता कर दी है।

इन दिशा निर्देशों का कितना पालन सिवनी में हो रहा है यह बात वाकई देखने योग्य है। सिवनी में सुबह सुबह बच्चों को लेकर शाला जाने वाली स्कूल बस या आटो चालकों का अगर यातायात पुलिस या आरटीओ विभाग ब्रीदिंग एनलाईजर लगाकर टेस्ट करें तो नब्बे फीसदी चालकों के मुंह से वैसे ही शराब का भपका आता मिलेगा, वह भी ब्रीदिंग एनलाईजर्स के बिना। यातायात पुलिस और आरटीओ से अपेक्षा है कि वे पैसा कमाने की अंधी दौड़ में अपने आप को इतना मशगूल ना कर लें कि देश के नौनिहालों के परिवहन की व्यवस्था को ही भूल जाएं। जिला कलेक्टर भरत यादव और जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला से भी इस संवेदनशील मामले में ध्यानाकर्षण की अपेक्षा की जा रही है।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

सिविल के इंजीनियर्स कर रहे इलेक्ट्रिकल का काम!

सिविल के इंजीनियर्स कर रहे इलेक्ट्रिकल का काम!

गिनीज बुक में दर्ज हो सकता है मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी का नाम

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के वक्त सिविल शाखा लेकर अध्ययन् करने वाले स्नात्क या स्नात्कोत्तर इंजीनियर्स की शाखा कुछ भी रही हो, पर मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी में इसका कोई महत्व नहीं रह गया है। सिविल शाखा लेकर अध्ययन् कर मकान, सड़क आदि बनाने में पारंगत इंजीनियर्स आज बिजली में इलेक्ट्रिकल शाखा का काम संभाले हुए हैं।
मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान बताया कि यह विडम्बना से कम नहीं है कि विद्युत मण्डल में ‘स्पेशलाईजेशन‘ का कोई महत्व नहीं है। मण्डल की नीति पता नहीं कैसी है कि यहां भवन बनाने वालों को तकनीकि काम जैसे संवेदनशील जॉब में रखा गया है।
इंजीनियरिंग स्नात्क उक्त अधिकारी का कहना है कि एक बार यह मान लिया जाता है कि इंजीनियरिंग में सिविल शाखा को छोड़कर किसी अन्य शाखा का स्नात्क चाहे तो सिविल का काम कर सकता है पर मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, आईटी जैसी विंग्स के पारंगत ही इसके काम के लिए उपयुक्त होते हैं।
उन्होंने बताया कि सिवनी में विद्युत मण्डल के काम के लिए इलेक्ट्रिकल शाखा वाले स्नात्क या स्नात्कोत्तर लोगों को ही काम पर रखा जाना चाहिए था। चूंकि यह बिजली का संवेदनशील मामला है अतः इस मामले में कोताही लोगों की परेशानी का सबब् बनने के साथ ही साथ किसी की जान भी ले सकती है।
उनके अनुसार अफसरों की मनमर्जी के बेलगाम घोड़े तेजी से दौड़ रहे हैं जिसके कारण आज आलम यह है कि विद्युत मण्डल में इलेक्ट्रिकल विंग के मलाईदार पदों पर, सालों से सिविल के इंजीनियर्स बैठकर मोटा माल काट रहे हैं। सालों से सिवनी में पदस्थ विद्युत मण्डल के अधिकारी कर्मचारी अब मोटी खाल के हो चुके हैं और उन्हें उपभोक्ताओं की शिकायत से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं बचा है।
विद्युत मण्डल के बारापत्थर में टूटी पुलिया स्थित कार्यालय में ही हैरान परेशान उपभोक्ताओं की टेलीफोन पर बजती घंटी से वहां तैनात कर्मियों को कोई लेना देना नहीं है। सौ पांच सौ रूपए बिजली के बिल वालों के बिल अब दो से पांच हजार आ रहे हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं है।
सरेआम बिजली चोरी हो रही पर अफसर मौन हैं। पिछले दिनों हिन्द गजट द्वारा सर्किट हाउस चौक पर यातायात पुलिस द्वारा की जा रही बिजली चोरी की शिकायत से अधीक्षण यंत्री को अवगत कराने के बाद भी कोई कार्यवाही ना होना आश्चर्य का विषय ही माना जाएगा। कहा जा रहा है कि बिजली चोरी करने वालों द्वारा लाईन मेन से लेकर अधीक्षण यंत्री तक को उनका हिस्सा पहुंचाया जाता हैं, वरना क्या कारण है कि एसई के संज्ञान में लाने के बाद भी बिजली चोरी का प्रकरण नहीं बनाया जाता है।
एक अन्य कर्मचारी ने भी पहचान उजागर ना करने की शर्त पर कहा कि चूंकि साहब लोग सिविल विंग के हैं और यह मामला तकनीकि है अतः साहब लोगों को इसकी बारीकी नहीं पता होती है। यही कारण है कि विद्युत मण्डल की स्थिति चरमरा चुकी है। उक्त कर्मचारी का कहना था कि पहले उसे भगवान में विश्वास नहीं था, पर विद्युत मण्डल की नौकरी करने के बाद वह मानने लगा है कि भगवान कहीं ना कहीं है अवश्य, वरना विद्युत मण्डल कैसे चल रहा है, जाहिर है भगवान भरोसे ही चल रहा है।
कथित तौर पर संवेदनशील सांसद के.डी.देशमुख, बसोरी सिंह मसराम, विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, श्रीमति शशि ठाकुर, कमल मर्सकोले ने भी अब तक इस बात को ना संसद में और ना ही विधानसभा में उठाया है। चर्चा है कि वे उठाते भी कैसे, वे तो चाभी से चलने वाले खिलौनों की तरह हो चुके हैं, जिसमें जनादेश देने वाली जनता का ध्यान रखना, उनकी जिम्मेदारी में शामिल नहीं है। बस आसपास के लोगों ने जितना बता दिया उतना ही करना उनका दायित्व बचा है।

वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी अपना मुंह पूरी तरह सिले बैठी है। वैसे यह मामला स्थानीय नहीं है, इस मामले में तो कांग्रेस के विज्ञप्तिवीर धार तेज कर सकते हैं। यह मामला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल से जुड़ा है। इस मामले में कांग्रेस के विज्ञप्तिवीरों को स्थानीय भाजपा नेताओं को कटघरे में खड़ा नहीं करना होगा, इसलिए बिजली के मामले में तो कम से कम वे अपनी रेत में गड़ी तलवारें निकालकर भाजपा (स्थानीय नहीं प्रदेश स्तर की) पर वार कर ही सकते हैं।

भूले से भी नहीं लगता मतलब बीएसएनएल

भूले से भी नहीं लगता मतलब बीएसएनएल

(शरद खरे)

सिवनी जिले में भारत संचार निगम लिमिटेड की सेवाएं बद् से बद्तर हो चुकी हैं। सरकारी तंत्र किस कदर जर्जर या कोलेप्स हो चुका है इसका नायाब नमूना है सिवनी जिले में बीएसएनएल की सेवाएं। लेण्ड लाईन में जब चाहे तब डायलटोन गायब रहती है कभी खरखराहट होती है तो मोबाईल माशाअल्लाह, क्या कहने। लगाएंगे राम को बात हो जाएगी रहीम से। डीएनडी करवाईए पर आपको कंपनियों के काल आते ही रहेंगे।
जिले में बीएसएनएल के अधिकारी जब चाहे तब कर्मचारियों का रोना ही रोते रहते हैं। अगर कर्मचारी नहीं हैं तो बीएसएनएल के अधिकारी इसे बंद कराने की सिफारिश सरकार से क्यों नहीं कर देते, कम से कम लोग बीएसएनएल के जरिए लुटने से तो बच जाएंगे। एक ओर तो बीएसएनएल बड़े बड़े आकर्षक विज्ञापनों के जरिए लोगों को नई नई योजनाएं बताकर लुभाता है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को सिवनी जिले में बीएसएनएल की सेवाएं ना मिल पाना आश्चर्य का ही विषय माना जाएगा।
एक समय था जब बीएसएनएल का एक छत्र राज हुआ करता था देश में। उस समय जिसके घर टेलीफोन के दो तार जाते दिख जाते थे, वह गांव का पटेल कहलाने लगता था। जिसके घर फोन हुआ करते थे वे रसूखदार समझे जाते थे, क्योंकि टेलीफोन का कनेक्शन लेना हर किसी के बस की बात नहीं हुआ करती थी। फोन का नंबर लगाईए और भूल जाईए कम से कम दस साल के लिए। जब आपकी बारी आएगी तब तक आपके सारे अरमान ठंडे हो चुके होंगे।
संचार का काम चूंकि सीधे सीधे केंद्र सरकार के अधीन ही आता है, अतः उस समय में संसद सदस्यों को हर साल बीस लोगों को नए फोन कनेक्शन देने के अधिकार होते थे अपने संसदीय क्षेत्र में। सांसदों द्वारा इस काम को बिना किसी लोभ लालच के किया जाता था। लोग अपने आप को धन्य समझा करते थे कि उन्हें उनके क्षेत्र के सांसद ने एक अदद् फोन की सिफारिश कर दी है, अब उनके घर पर फोन की घंटी घनघनाएगी।
प्रौढ़ हो रही पीढ़ी इस बात को नहीं भूली होगी कि पहले सिवनी में दूरभाष केंद्र वर्तमान पोस्ट ऑफिस के उत्तरी भाग के हिस्से में हुआ करता था। यहां से ही लोग आकर अपने संबंधियों, परिचितों आदि से ट्रंक काल लगाकर बात किया करते थे। लाईटनिंग यानी तत्काल और आर्डनरी यानी सामान्य काल की दरें भी अलग अलग ही हुआ करती थीं। 1993 में जब कुंवर अर्जुन सिंह केंद्र में संचार मंत्री थे तब सिवनी को एसटीडी की सुविधा मिली थी।
कांग्रेस के कद्दावर क्षत्रप रहे स्व.ठाकुर हरवंश सिंह के खाते में सिवनी की इकलौती उपलब्धि एसटीडी ही दिलवाना है, याद नहीं पड़ता कि स्व.हरवंश सिंह द्वारा इसके अलावा सिवनी को कुछ ‘अच्छी सौगात‘ दी हो। उनकी बाकी सौगातें जैसे भीमगढ़ जलावर्धन योजना आज भी सिवनी के लोगों के लिए सरदर्द से कम नहीं है। एक ही स्थान पर सैकड़ों पत्थर रखकर भूमिपूजन या शिलान्यास का अनोखा तरीका भी स्व. हरवंश सिंह की ही देन है, जिससे नेता और जनता के बीच का फासला तेजी से बढ़ गया है।
बहरहाल, कालांतर में सिवनी में आए सीडाट एक्सचेंज ने यहां विकास के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। एक के बाद एक करके अधिकारी बदलते गए और बीएसएनएल की सेवाएं गर्त में ही जाती गईं। आज अगर आपका टेलीफोन का इंस्ट्रूमेंट खराब हो जाए तो आपको बाज़ार से इसे खरीदना पड़ेगा। इस तरह की व्यवस्था बीएसएनएल के अधिकारियों द्वारा बताई जाती हैं। उनका कहना है कि विभाग में इंस्ट्रूमेंट की सप्लाई बंद हो गई है। पर अगर सांसद, विधायक, कलेक्टर के घर का फोन खराब हो जाए तब क्या वे इनसे यही बात कह पाएंगे कि बाज़ार से खरीद लीजिए!
ज़ाहिर है, नहीं कह पाएंगे। इसका तात्पर्य यह है कि सिवनी में टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट हैं। हो सकता है कि ये सीमित मात्रा में हों पर हैं तो सही। अगर आप नया कनेक्शन लें तो सिवनी में ही आपको नया डब्बा मिल जाएगा। आप उसे एक माह चलाएं फिर कटवा दें, फिर नया कनेक्शन ले लें, तब आपको दूसरा नया डिब्बा मिल जाएगा। यह बात समझ से परे है कि आखिर यहां पदस्थ अधिकारी किस नीति की बात करते हैं। विभाग का लाईन स्टाफ अपने काम को छोड़कर अन्य कामों में लगा हुआ है।
सबसे ज्यादा समस्या इंटरनेट की है। सिवनी शहर में एसपी बंग्ले के पास वाले मोबाईल के टॉवर की समस्या को हल कराने में एक उपभोक्ता को सिवनी से चीफ जनरल मैनेजर भोपाल तक के कार्यालय को हिलाना पड़ा। हर कदम पर उसे नई इबारत पढ़ने और सीखने को मिली। मामला चूंकि तकनीकि है इसलिए उपभोक्ता भी निरीह निरूत्तर ही रहते हैं। लोगों को मोबाईल के सिग्नल नहीं मिल रहे हैं, विभाग के अधिकारी आराम फरमा रहे हैं।

इंटरनेट विशेषकर ब्रॉड बैंड जब चाहे तब बैठ जाता है। विभाग से पूछने पर एक रटा रटाया जवाब सामने आता है कि जबलपुर वाले एंड पर प्रॉब्लम है। उपभोक्ता को इस बात से लेना देना नहीं है कि प्रॉब्लम किस एंड पर है। उपभोक्ता तो पैसा अदा कर रहा है उसे सेवाएं चाहिए, वह भी बिना रूके बिना समस्या के। यह विभाग की प्रॉब्लम है कि किस एंड पर है। रही बात हमारे सांसद के.डी.देशमुख और बसोरी सिंह मसराम की, तो इन दोनों को सिवनी से लेना देना ही नहीं है, एक मण्डला में मस्त हैं तो दूसरे बालाघाट में व्यस्त हैं। सिवनी की जनता समस्याओं से दो चार हो रही है तो होती रहे, इनकी बला से . . .।

रविवार, 4 अगस्त 2013

बुढ़िया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है मौत ने घर देख लिया. . .

बुढ़िया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है मौत ने घर देख लिया. . .

(लिमटी खरे)

मच्छर जनित रोग मलेरिया, डेंगू, जल जनित रोग डायरिया, उल्टी दस्त, हैजा, गेस्ट्रोएंट्राईटिस, अमीबाईसिस आदि की चपेट में भगवान शिव की नगरी पूरी तरह से है। नगर पालिका प्रशासन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी व लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की नजरों में मानो कुछ हुआ ही नहीं है। सभी नीरो के मानिंद चैन की बंसी बजाने में व्यस्त हैं। इनकी बंसी की सुमधुर तान पर तबले की थाप दे रहे हैं भाजपा सांसद के.डी.देशमुख, कांग्रेस के सांसद बसोरी सिंह मसराम, भाजपा विधायक श्रीमती नीता पटेरिया, श्रीमती शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले। इन पांचों जनसेवकों को इस बात की परवाह नहीं है कि इन्हें जनता ने जनादेश देकर लोकसभा और विधानसभा में भेजा है। इनकी ज्यादा नहीं तो कम से कम एक प्रतिशत तो जवाबदेही बनती है जनता के प्रति। अफसोस सांसद विधायक अपनी जवाबदेही भूल चुके हैं। सांसद के.डी.देशमुख और विधायक श्रीमती नीता पटेरिया के क्षेत्र में जिला मुख्यालय आता है। शहर में डेंगू फैलने की खबरें हैं एक व्यक्ति के मलेरिया से मरने की खबर है, पर कर्तव्यनिष्ठ सांसद और संवदेनशील विधायक की कर्तव्यनिष्ठा और संवेदनशीलता का अंदाजा लगाईए कि दोनों ने एक बार भी प्रभावित वार्ड का भ्रमण करने की जहमत नहीं उठाई है।
श्रीमती नीता पटेरिया के पति डॉ.एच.पी.पटेरिया जिला मलेरिया अधिकारी हैं, और सालों से सिवनी में पदस्थ हैं। वहीं लखनादौन विधायक श्रीमती शशि ठाकुर के पति डॉ.वाय.एस.ठाकुर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी हैं। दोनों ही भाजपा की विधायक हैं, के.ड़ी.देशमुख भी भाजपा के हैं, नगर पालिका अध्यक्ष भी भारतीय जनता पार्टी के ही हैं और आगामी विधानसभा के चुनावों में सिवनी सीट के प्रबल दावेदार भी माने जा रहे हैं। भाजपा संगठन भी शतुर्मुग बना बैठा है। अपने कार्यकर्ता भले ही वे सांसद विधायक या नगर पालिका अध्यक्ष हों, पर कार्यवाही करने से गुरेज कर रहा है संगठन, इसका तातपर्य यह है कि शहर में फैली इस तरह की अराजकता में संगठन की मौन सहमति है। अब यह बात प्रदेश या देश के भाजपा के आला लीडरान् को सोचना है कि कभी कांग्रेस के गढ़ रहे सिवनी में कांग्रेस के एक ‘विशेष क्षत्रप‘ की मेहरबानी से अपना राज कायम करने वाली भाजपा अब अपने इन सांसद विधायक और नगर पालिका अध्यक्ष एवं संगठन के ढुल मुल रवैए के चलते नागरिकों को अपने खिलाफ करती जा रही है। आने वाले चुनावों में भाजपा को अगर करारी शिकस्त मिले तो इसके लिए संगठन का नकारात्मक रवैया ही प्रमुख तौर पर जिम्मेदार माना जा सकता है।
सिवनी में लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं। लोगों को पीने तक को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। जगह जगह गंदगी के ढेर लगे हैं। अस्पताल में लोगों के साथ जानवरों से बदतर व्यवहार किया जा रहा है। पैसा ना होने पर अस्पताल से मरीजों को भगा दिया जाता है। पैंशनर्स को दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। जो थोड़ी बहुत दवाएं मिल भी रहीं हैं तो दवा इस तरह से दी जा रहीं हैं मानो अस्पताल के कर्मचारी पैंशनर्स को भीख दे रहे हैं। यह सब हो रहा है जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ.सत्य नारायण सोनी की आंखों के सामने, जिन पर आपरेशन के पहले बेहोश करने के एवज में पैसे लेने के हजारों संगीन आरोप हैं। दो दो विधायकों के पति जिला चिकित्सालय में पदस्थ हैं, फिर अस्पताल में इस तरह की अराजकता! क्या भाजपा संगठन को यह दिखाई नहीं दे रहा है? क्या भाजपा ने जिला संगठन की बागडोर किसी धृतराष्ट्र के हाथों सौंप दी है, जो धर्म अधर्म में भेद नहीं कर पा रहे हैं। कार्यकर्ता प्रेम (चाहे वह सांसद विधायक या पालिका अध्यक्ष हों) में अंधे होकर संगठन प्रमुख धृतराष्ट्र बनकर हस्तिनापुर (सिवनी) में अर्धम होता देख रहे हैं। वैसे राजनीति की एक लाईन में कही जाने वाली परिभाषा है -‘‘जिस नीति से राज हासिल हो वह राजनीति हैै।‘‘ किन्तु सियासत में रियाया का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है।
सिवनी के लोग पहले से ही निकम्मे और नपुंसक नगर पालिका प्रशासन के कारण नारकीय जीवन जी रहे थे वह क्या कम था, जो अब मलेरिया और डेंगू ‘दूबरे पर दो अषाढ़‘ के मानिंद आ खड़ा हुआ है। नगर पालिका ने साल भर साफ सफाई का ध्यान नहीं रखा है, साल भर पालिका की फागिंग मशीन धूल खाती रही, पर इसके लिए तेल और दवा की मद् में लाखों रूपए निकाल लिए गए हैं यह बात उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील सहित कांग्रेस के 12 पार्षद क्या जनता की नजरों से नजरें मिलाकर इस बात को कह पाएंगे कि फागिंग मशीन की मद में निकाली गई राशि के बजट प्रस्ताव का उन्होंने विरोध किया था? जाहिर है नहीं किया गया था विरोध, क्योंकि पालिका में ‘अली बाबा‘ के चालीस चोरंों में कांग्रेस के पार्षदों का भी समावेश है, जो समय समय पर पालिका अध्यक्ष को आंखें दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। क्या कांग्रेस के पार्षद अपने दिल पर हाथ रखकर कहने का साहस कर पाएंगे कि जनता की सेवा का बीड़ा उठाने के एवज में वे पालिका में ठेकेदारी नहीं कर रहे हैं। नाम किसी का काम किसी का की तर्ज पर पालिका के सौ फीसदी काम पार्षदों द्वारा ही करवाए जा रहे हैं, फिर सैंया भए कोतवाल की तर्ज पर गुणवत्ता विहीन काम का भी पूरा भुगतान कर दिया जाता है। नगर पालिका में खुली लूट मची है कोई देखने वाला नहीं है।
यही आलम विज्ञापनों का है। नगर पालिका द्वारा मीडिया के सामने विज्ञापन की रोटी डाल दी जाती है। किसकी दरें कितनी हैं, इस बात से पालिका को लेना देना नहीं है। पालिका अध्यक्ष द्वारा विज्ञापनों का प्रलोभन देकर मीडिया से मनमर्जी का काम करवाने का दावा भी किया जाता है। सार्वजनिक स्थानों पर मोबाईल लगाकर ‘फलां खबर छाप देना, उसकी . . . . . कर देना, अरे उसको मत छापना, हां विज्ञापन भिजवा रहे हैं, सर तक लाद देंगे विज्ञापन से मेरे भाई,‘ जैसे जुमले पालिका अध्यक्ष के मुंह से सुनने को मिल जाते हैं। मीडिया भी विज्ञापनों के पीछे भागकर अपनी नैतिकता खोता जा रहा है। पालिका अध्यक्ष द्वारा समाचार पत्रों को ‘रोटेशन‘ के हिसाब से विज्ञापन देने की बात कही जाती है, पर ‘रोटेशन‘ का मतलब शायद ‘कमीशन‘ से है। कहा जा रहा है कि जो अखबार पालिका को कमीशन देता है उसे सबसे ज्यादा विज्ञापन मिलते हैं। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो पालिका अध्यक्ष ही जाने पर अगर कोई सूचना के अधिकार में समाचार पत्रों की डीएवीपी, सीपीआर एमपी की दरें और पालिका द्वारा किए गए भुगतान की दरें निकलवा ले तो पालिका में एक बहुत बड़ा विज्ञापन घोटाला भी सामने आ सकता है। सूचना के अधिकार एक्टिविस्ट दादू निखलेंद्र नाथ सिंह द्वारा पूर्व में आरटीआई में निकलवाई गई जानकारी में ऐसे ऐसे समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी किए गए हैं जो भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय में या तो पंजीकृत नहीं हैं, या फिर दो साल की अवधि में स्थाई नहीं करवाए जाने पर डी ब्लाक हो चुके हैं। इसमें कुछ विज्ञापन तो समाचार पत्र वितरण एजेंसी को जारी किए गए हैं, जो दांतों तले उंगली दबाने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं।
बहरहाल, शहर में डेंगू का कहर जोरों पर है। डेंगू और मलेरिया जैसे खतरनाक और जानलेवा रोगों के मामले में संजीदा होने के बजाए नगर पालिका परिषद ‘कमीशन‘ के चक्कर में आकण्ठ डूबी है तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की नजर एनआरएचएम के ‘छीछड़ों‘ पर है। दोनों ही एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर अपनी अपनी जवाबदेही से बचना चाह रहे हैं, जो निंदनीय है। राजधानी दिल्ली में डेंगू का कहर किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली में स्वास्थ्य विभाग के बजाए इसकी कमान एनडीएमसी और डीएमसी यानी वहां की नगर निगम द्वारा संभाली जाती है। सिवनी में स्थिति उलट है निकम्मी नगर पालिका के प्रतिनिधि कमीशन के गंदे धंधे में उलझे हैं और मजबूरन स्वास्थ्य विभाग को कमान संभालना पड़ रहा है। एमसीडी द्वारा मीडिया को रोज मेल, फेक्स के जरिए यह बताया जाता है कि कितने घरों में एकत्र पानी की जांच की गई?, कहां कहां कौन से मच्छर का लार्वा मिला?, क्या समझाईश दी गई?, कितना जुर्माना किया गया?, कितनी रक्त पट्टिकाएं बनीं?, कितने पॉजिटिव मरीज मिले? आदि, पर सिवनी मेें तो मानो नगर पालिका परिषद का मूल काम नागरिकों की सेवा के स्थान पर पैसा बटोरना हो गया है। लोग तो यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि पालिका की जेसीवी मशीन खराब है उसके सुधारने में ही साढ़े तीन लाख रूपए का एस्टीमेट बनवा दिया गया है। बारिश के मौसम में उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है पर वह भी कमीशन के चक्कर में खराब ही पड़ी है, वरना पालिका के कर्णधार तो जेसीवी से पैसा सकेलते (खींचते)!
पिछले साल गोपालगंज के करीब सारसडोल में एक युवक को डेंगू से प्रभावित पाया गया था, वह नागपुर का रहने वाला था एवं बाद में उसकी मौत हो गई थी। इस साल चार मरीजों में से दो को डेंगू होने की पुष्टि स्वास्थ्य विभाग ने 30 जुलाई को की है। इसके उपरांत तीन दिन से स्वास्थ्य और पलिका प्रशासन मौन साधे हुए है कि डेंगू अभियान में उसने क्या किया है? डेंगू के लिए जिम्मेदार एडीज मच्छर का लार्वा मिलना सिवनी के लिए खतरे का संकेत है। डेंगू का प्रकोप ठण्ड के मौसम में बेहद तेज हो जाता है उस समय इस पर काबू पानी आसान नहीं होता है। डेंगू से निपटने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों के दल की आवश्यक्ता है। जब सिवनी में आम बुखार के लिए मरीज दर दर भटकता है तो भला उसे डेंगू जैसे जानलेवा रोग से निपटने के लिए सरकारी इमदाद कहां से मिल पाएगी?

बहुत पुरानी कहावत यहां चरितार्थ होती दिख रही है। कहते हैं किसी गांव में सब अजर अमर थे, किसी को मृत्यु नहीं आई थी, एक दिन अचानक वहां एक उमर दराज महिला मर गई तो गांव का गांव बोल उठा -‘‘बुढ़िया के मरने का गम नहीं! गम तो इस बात का है कि मौत ने घर देख लिया।‘‘ यही हाल डेंगू का है, चार मरीजों को डेंगू हुआ है उनके खून के प्लेटलेट्स कम होंगे, नागपुर या अन्य जगहों पर वे ईलाज करवाकर स्वस्थ्य होकर वापस आ जाएंगे, पर गम तो इस बात का ही रहेगा कि अब डेंगू के मच्छर ने सिवनी का घर देख लिया है।