मंगलवार, 10 नवंबर 2009

पुडिया के नशे की जद में मध्य प्रदेश

पुडिया के नशे की जद में मध्य प्रदेश

 
(लिमटी खरे)
 
महज चंद सेकन्ड्स में दुनिया जहान के सारे गम भुलाकर जन्नत की सैर करवाने वाली स्मेक की पुडिया का सबसे बडा बाजार बनकर उभर रहा है मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश के महाकौशल और राजधानी भोपाल में भी स्मेक की पुडिया का चलन बहुत ही तेजी से हो गया है।


बताते हैं कि भोपाल की देशी विदेश शराब दुकानों के आसपास खुले अघोषित और अवैध मयखाने (जहां बैठकर लोग बिना झिझक मदिरापान करते हैं) के इर्द गिर्द परिवारों को तबाह करने वाली यह पुडिया बहुत ही आसानी से सुलभ हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार एक बार किसी को इसकी लत लग जाए तो यह ``छूटती नहीं काफिर मुंह की लगी हुई`` की तर्ज पर आसानी से पीछा नहीं छोडती है।


खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो महाकौशल क्षेत्र में ही तीन सैकडा से अधिक लोग इस कारोबार में हैं, जो लोगों के घरों को उजाड़ने में कोई कसर नहीं रख छोड रहे हैं। इस गोरखधन्धे में न केवल बेरोजगार वरन् पुलिस के कारिंदों से लेकर श्वेत धवल कुर्ता पायजामा धारण करने वाले नेता भी शामिल हैं।


एक नशामुक्ति केंद्र के संचालक द्वारा किए गए सर्वेक्षण में यह तथ्य उभरकर सामने आया है। इतना ही नहीं टी आई (नगर निरीक्षक) प्रोजेक्ट के तहत संभाग के छ: जिलों में आठ सौ से भी अधिक नशेडी मिलना चिंताजनक पहलू माना जा सकता है। कुल मिलाकर यह माना जा सकता है कि नगर और गांवों में समान रूप से फैला हुआ है यह नशे का करोबार।


रेंज के पुलिस महानिरीक्षक एम.आर.कृष्णा के मुताबिक तो यह समस्या महाकौशल के तीस से ज्यादा गांवों में ज्यादा फैली हुई है। आश्चर्य जनक तथ्य तो यह उभरकर सामने आया है कि नशे की यह समस्या आज कल की नहीं वरन लगभग ढाई सौ साल पुरानी है।


बताते हैं कि ब्रितानी हुकूमत के समय में अफीम का नशा महाकौशल में सर चढकर बोल रहा था। उस दरम्यान अफीम का सेवन करने वालों को पकडने के लिए महाकौशल के नरसिंहपुर में एक विशेष थाना बनाया गया था, जिसके दस्तावेज भी मिलने का दावा किया जा रहा है।


नरसिंहपुर को कर्मभूमि बनाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा है कि वे आने वाले पांच सालों में क्षेत्र को नशामुक्त बनाने हेतु कृत संकल्पित हैं। बकौल प्रहलाद सिंह पटेल क्षेत्र में तीन सैकडा से भी अधिक लोग स्मेक के काले धंधे में लगे हुए हैं।


बबाZदी का विस्तार करने वाली स्मेक की पुडिया ने नरसिंहपुर जिले को पूरी तरह अपने शिकंजे में कसा हुआ है। नरसिंहपुर सदा से ही मशहूर रहा है। यहां का एक आदर्श ग्राम बुधवारा है, जहां आज तक कोई पुलिस प्रकरण पंजीबद्ध नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं इस गांव का निरीक्षण करके आए हैं।


नरसिंहपुर शिक्षा के क्षेत्र में पहले विशेष महत्व रखता था, आज यह नशेलों का जिला बनकर रह गया है। यहां नशे का आलम यह है कि पिछली विधानसभा के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों में एक युवक ने नशे की पुडिया रख दी थी। इस घटना से मुख्यमंत्री आवक रह गए थे। इसके बाद यहां नशे के विरोध में अभियान छेडा गया, किन्तु नशे के सौदागरों के आगे इस अभियान ने घुटने टेक दिए।


कहा तो यहां तक जा रहा है कि राजस्थान से नशे की यह बबाZदी की पुडिया नरसिंहपुर पहुंचती है। यूं तो राजस्थान से नरसिंहपुर का सीधा कोई तारतम्य नहीं जुडा हुआ है। अगर किसी को स्मेक लाना हो तो उसे रतलाम, देवास, इंदौर, सीहोर, उज्जैन, भोपाल, होशंगाबाद के रास्ते इसे लाना होगा। पुलिस के नशे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतने सारे जिलों की सीमाओं को पार कर परिवारों को बबाZद करने वाले इस नशे को नरसिंहपुर की सीमा में लाया जाता है, वह भी बिना किसी रोक टोक के।


चिकित्सकों के अनुसार इस नशे की लत इतनी बुरी है कि अगर इसके आदी व्यक्ति को यह न मिले तो वह मरने मारने पर आमदा हो जाता है। अस्सी के दशक के उपरांत चेनल्स पर भी स्मेक के बारे में जनजागृति फैलाने का उपक्रम किया गया था, किन्तु मध्य प्रदेश का महाकौशल और विशेषकर नरसिंहपुर जिला इससे अछूता ही रहा है।


राज्य सरकार द्वारा अगर समय रहते महाकौशल अंचल को परिवार को बबाZदी के कगार तक पहुंचाने वाली इस स्मेक के नशे की पुडिया पर अंकुश नहीं लगाया तो आने वाले समय में समूचा महाकौशल और फिर मध्य प्रदेश इसकी जद में होगा और तब भयावह स्थिति से निपटना शासन प्रशासन के लिए टेडी खीर ही साबित होगा।



सोमवार, 9 नवंबर 2009

स्वाइन फ्लू यानी भय का वायरस

स्वाइन फ्लू यानी भय का वायरस



(लिमटी खरे)



मेिक्सको के रास्ते भारत में पहुंची महामारी स्वाइन फ्लू का कहर शनै: शनै: बढते ही जा रहा है। पहले इसकी जद में देश के महानगर आए फिर इस बीमारी ने राज्यों की ओर रूख करना आरंभ कर दिया है, जो सोचनीय है। राजस्थान की राजधानी जयपुर मेें यह बीमारी कहर बरपा रही है।


जागरूकता की कमी के चलते पिछले एक दशक में हिन्दुस्तान में नई नई बीमारियों ने अपना घर बना लिया है। लगभग पांच साल पहले दिल्ली को डेंगू नामक जानलेवा बुखार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। इसके बाद डेंगू ने दो सालों के अंतराल के बाद राज्यों की ओर रूख किया है। आज देश भर में डेंगू नामक बीमारी से हजारों की तादाद में मरीज ग्रस्त हैं।


बीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही देश में कालरा, हैजा, कालाजार, टीबी आदि बीमारियों ने देश में आतंक बरपाया था, जिसका इलाज उस काल में संभव नहीं था। समय के साथ इन असाध्य बीमारियों का इलाज खोजा गया और इन पर नियंत्रण पाया गया।


नब्बे के दशक में असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त आदि से फैलने वाले एड्स ने सभी को डरा दिया था। आज भी एड्स का खौफ बरकरार ही है। इक्कीसवीं सदी में डेंगू, चिकन गुनिया, बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों ने अपने पैर पसारे। वायरस जनित इन बीमारियों का इलाज है, किन्तु जागरूकता का अभाव लोगों को असमय ही काल के गाल में ढकेल रहा है।


स्वाइन फ्लू का आतंक महानगरों के बाद अब गुलाबी शहर जयपुर सहित संपूर्ण राजस्थान में तबाही मचाने की तैयारी में दिख रहा है। कहा जा रहा था कि स्वाइन फ्लू का वायरस जैसे जैसे ठंड बढेगी वैसे वैसे ज्यादा सक्रिय और प्रभावी होगा, बावजूद इसके न तो केंद्र सरकार ने एहतियाती कदम उठाए और न ही सूबों की सरकार ने। अभी तो सदीZ ने अपना असर भी नहीं दिखाया है, जब शीत ऋतु पूरे शबाब पर होगी तब हालात पर काबू पाने में केंद्र और राज्य सरकारों को एडी चोटी एक करनी होगी।


राजस्थान में सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि एच 1 एन1 वायरस के माध्यम से फैलने वाला स्वाइन फ्लू अपनी जद में यहां के शालेय विद्यार्थियों को ले रहा है। राज्य के दस बडे स्कूलों के आधा सैकडा बच्चों में स्वाइन फ्लू के वायरस की पुष्टि निश्चित तौर पर चिंताजनक ही मानी जाएगी।


राज्य सरकार के आंकडों पर गौर फरमाया जाए तो अब तक 144 से भी अधिक लोगों में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हो गई है। यह आंकडा अभी और बढने की उम्मीद जताई जा रही है। राजस्थान चूंकि पर्यटन के नक्शे पर अहम स्थान रखता है, अत: यहां विदेशी पर्यटकों की खासी आमद होती है, तब इस वायरस के फैलने या आने के लिए खासा उपजाउ माहौल तैयार हो रहा है।


सूबे में लगभग डेढ सौ लोगों के इस बीमारी से संक्रमित होने के बाद राज्य प्रशासन की कुंभकणीZय तंद्रा टूटी है। केंद्र सरकार इस मामले में अभी भी नीरो की तरह चैन की ही बंसी बजा रही है। केंद्र और राज्य सरकार की अनदेखी का इससे बडा उदहारण और कोई नहीं हो सकता है कि जब इस रोग की आहट यहां सुनाई दी तब यहां इसकी जांच के लिए आवश्यक उपकरण तक उपलब्ध नहीं थे, परिणामस्वरूप पुष्टि होते होते स्वाइन फ्लू का संक्रमण अपना अच्छा खासा असर दिखा चुका था।


एक बात आज भी समझ से परे ही है कि जब इस तरह की कोई बीमारी या समस्या सर उठाती है, तो जागने और उससे निपटने में हमारी सरकारें किस बात पर विचार कर देरी करतीं हैं। लगता है कि सरकारें इनसे निपटने शुभ महूर्त का इंतेजार ही किया करतीं हैं।


स्वाइन फ्लू के संक्रमण हेतु गंदगी सबसे बडा वरदान साबित हो रही है। विस्फोटक आबादी इस बीमारी के लिए उर्वरक का काम कर रही है। जागरूकता के अभाव के चलते जगह जगह गंदगी और भीड भाड इस बीमारी के संवाहक का ही काम कर रही है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश की इस तरह की परिस्थितियां स्पर्श और स्वांस से बढने वाली इस बीमारी के लिए उपजाउ माहौल के मार्ग ही प्रशस्त कर रहीं हैं।


डेंगू, बर्ड फ्लू, चिकन गुनिया, स्वाईन फ्लू जैसी जानलेवा बीमारियों का सकारात्म पहलू यह है कि अब तक इन बीमारियों ने शहरों में ही अपना डेरा जमाया हुआ है। बिना चिकित्सकों के नीम हकीमों के भरोसे रहने वाले गांवों की ओर अगर इन बीमारियों ने रूख कर लिया तो स्थिति निश्चित तौर पर बेकाबू हो जाएगी। इसका प्रमुख कारण यह है कि भले ही सरकारें ग्रामीण स्वास्थ्य के बारे में चाहे जो दावा करें किन्तु जमीनी सच्चाई यह है कि ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सरकारी आवंटनों को डकारा जा रहा है।


करोड़ों अरबों रूपए व्यय कर इन बीमारियों पर नियंत्रण का दावा कर आधा बजट अंदर करने वाली सरकारों में बैठे नुमाईंदें को अब अपने अलावा आम जनता के बारे में भी सोचना होगा, वरना आने वाले कल की भयावह तस्वीर में भरे रंगों में उनकी भागीदारी से उन्हेें कोई नहीं रोक पाएगा। हमारी नजर में स्वाईन फ्लू जानलेवा जरूर है पर यह भय का वायरस है, जो आने वाले कल में यर्थाथ में तब्दील हो भी सकता है।

रविवार, 8 नवंबर 2009

युवराज के नौरत्न बनने के जुगाड में हैं नवीन जिंदल


ये है दिल्ली मेरी जान




(लिमटी खरे)

युवराज के नौरत्न बनने के जुगाड में हैं नवीन जिंदल




कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री एवं युवराज राहुल गांधी से समीप्य स्थापित करने के लिए वैसे तो देश भर के कांग्रेसी जतन कर रहे हैं, किन्तु उद्योगपति एवं कुरूक्षेत्र के कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल ने एक एसा तीर मारा है, जो निशाने पर तो लगा किन्तु कारगर साबित नहीं हुआ। सूत्रों की मानें तो नवीन ने हाल ही में श्वेत धवल चमचमाती चार लेसेक्स कार खरीदीं हैं, जो बुलेट, बम यहां तक कि मिसाईल प्रूफ भी हैं, जिनकी कीमत 85 लाख रूपए प्रतिकार है। इनमें से दो कारें उन्होंने राहुल गांधी को तोहफे में देने की हिम्मत की। बताते हैं राहुल गांधी को उन्होंने कहा कि खतरों को देखते हुए युवराज को इस सवारी में ही यात्रा करना चाहिए। युवराज राहुल गांधी ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए दोनों गाडियों की चाबियां रख लीं। कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी को जैसे ही इस बात की भनक लगी उन्होंने राहुल को बुलवा भेजा और जनता से सीधा संपर्क रखने की नसीहत दे डाली। मितव्ययता के इस दौर में आज्ञाकारी राहुल ने दोनों गाडियों की चाबी अपनी मां को सौंप दीं। दोनों वाहन अब कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ की शोभा बढा रहीं हैं, या अन्य कहीं यह तो कहा नहीं जा सकता है, पर राहुल ने सभी को जता दिया कि उनकी चाबी किसके पास है।




अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ . . .




मशहूर कव्वाली ``अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ, जिसकी बेटी ने सर पर उठा रखी दुनिया`` में अंगूर की बेटी अर्थात मदिरा का जिकर जिस शिद्दत से किया गया था, वही अंगूर की बेटी अब दिल्ली की शीला सरकार के लिए तारणहार बनती दिख रही है। 30 सितम्बर को समाप्त हुई नए वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में दिल्ली सरकार को तकरीबन 130 करोड रूपयों का घाटा उठाना पडा है। मामला चाहे स्टाम्प ड्यूटी का हो या फिर वाहनों के पंजीयन अथवा विलासिता की वस्तुओं का, हर मोर्चे पर दिल्ली सरकार को घाटा ही घाटा उठाना पडा है। घाटा तकरीबन साढे इक्कीस फीसदी तक पहुंच गया है। स्वाईन फ्लू और डेंगू के प्रकोप के चलते दिल्ली आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है। घाटे में चल रही दिल्ली सरकार को कामन वेल्थ गेम्स के फंड के चलते कुछ राहत अवश्य है। सरकार को सबसे बडी राहत आबकारी आय से है, बताते हैं कि दिल्ली सरकार को इस छमाही में शराब बिकने से 11 फीसदी का लाभ हुआ है। लगता है शीला दीक्षित ने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा इंदौर के एक पब के उदघाटन के समय कहे कथन को अंगीकार कर लिया है, जिसमें दिग्गी राजा ने कहा था कि सब टुन्न होकर पडे रहें और आपका भण्डार भरा रहे।




पंच प्यारे की महिमा




सिख धर्म में पंच प्यारे का अपना अलग महत्व है एवं इनको बहुत ही सम्मान के साथ देखा जाता है। मध्य प्रदेश में भी शिवराज सिंह सरकार के पंच प्यारे खासे चर्चाओं में हैं। कहा जाता है कि इन पंच प्यारे के इशारे के बिना प्रदेश में पत्ता भी नहीं हिल सकता है। संघ या भाजपा के वरिष्ठ नेता कितना भी जोर लगा लें जब तक फैसले पर इनकी मुहर न लग जाऐ तब तक वह अमली जामा नहीं पहन सकता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी अर्धांग्नी श्रीमति साधना सिंह, भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी इकबाल सिंह बैस, अनुराग जैन के अलावा मुख्यमंत्री के करीबी दिलीप सूर्यवंशी को राज्य की राजनैतिक एवं प्रशासनिक वीथिकाओं में पंच प्यारे कहा जा रहा है। राज्य के मुख्य सचिव राकेश साहनी के सक्सेसर को खोजने में भी इसी पंच प्यारे की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है। जिस तरह पूर्व में मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह के जमाने में उनके निज सहायक युनूस एवं राजा दिग्विजय सिंह जमाने में भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ.अमर सिंह, आईपीएस विवेक जोहरी एवं डॉ.शैलेंद्र श्रीवास्तव, राजा के सहायक महावीर प्रसाद वशिष्ठ, राजेंद्र रघुवंशी, की मुहर के बाद ही राजा फैसला लिया करते थे, उसी राह पर अब शिवराज सिंह चौहान चल पडे हैं।




बापू की परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहे जनसेवक




दिल्ली के एक बडे समाचार पत्र द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में पार्षद और विधायक तक महात्मा गांधी के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब न दे सके। उक्त समाचार पत्र द्वारा इन जनसेवकों से बापू के बारे में आधा दर्जन सवाल पूछे थे। इन सवालों के जवाब में अधिकतर जनसेवकों ने ``लगे रहे मुन्ना भाई`` की तर्ज पर ही जवाब दिए। किसी ने बापू के पांच पुत्र तो किसी ने बापू की सामान्य मृत्यु की बात कही। हद तो तब हो गई जब नेहरू गांधी परिवार की भक्ति में रत कांग्रेस के जनसेवकों ने बापू को राहुल का दादा या नाना बता डाला। कमोबेश यही बात बापू के पूरे नाम और जन्म स्थान के बारे में पूछे गए प्रश्नों के बारे में कही गई। सच ही है, आज के समय में आधी लंगोटी पहन ब्रितानी हुकूमत को लोहे के चने चबवाने वाले बापू को जब साल में दो ही मर्तबा याद किया जाएगा, उन पर चलचित्र न बनेंगे, बनेंगे तो ``लगे रहो मुन्ना भाई`` जैसे मजाक उडाने वाले, तब बापू को इतिहास की वस्तु बनने के मार्ग तो प्रशस्त होने ही हैं। कम ही सरकारी कार्यालयों में आज बापू के चित्र देखने को मिलते हैं। आज के समय गांधी का मतलब राहुल या सोनिया गांधी से जो लगाया जाने लगा है।







कोडा पर कांग्रेस का कोडा




झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा पर केंद्र में काबिज कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा जबर्दस्त कोडे बरसाए जा रहे हैं, मधु कोडा जिस करवट मिल रहे हैं उसी करवट उनको मारा जा रहा है। सत्ता से उतरने के बाद से ही कोडा का शनि जबर्दस्त तरीके से भारी होता दिख रहा है। उनकी सम्पत्ति देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई से लेकर दक्षिण आफ्रीका तक फैली है। नवोदित एक सूबे का सूबेदार जब इतनी अधिक संपत्ति का मालिक रातों रात बन सकता है तो अन्य प्रदेशों के मुखिया और पूर्व मुखियाओं के बारे में अनुमान लगाने से ही रोंगटे खडे हो जाते हैं, कि जिस देश में आम जनता को खाने को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं है, वहां एसे भी राजनेता हैं जो हजारों करोड रूपयों की संपत्ति के मालिक हैं। चर्चा है कि अगर कांग्रेस और भाजपा के बीच कोई अंदरूनी समझौता नहीं होता है तो मधु कोडा मामले में अनेक हैरत अंगेज जानकारियां सामने आ सकतीं हैं, जिसके बाद अनेक राज्यों के वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्रियों की रातों की नींद में खलल पड सकता है।




संकट में मुरली देवडा




देश के पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवडा इन दिनों खासे संकट में दिखाई दे रहे हैं। एक समय मशहूर उद्योगपति धीरू भाई अंबानी से गलबहियां डालकर चलने वाले देवडा अपने भतीजों (मुकेश और अनिल अंबानी) के झगडे के चलते काफी परेशान हैं। बताते हैं कि सपा नेता अमर सिंह के जेब से निकले अलाउद्दीन के चिराग ने मुकेश और अनिल को आपस में उलझा दिया। इस झगडे को शांत कराने में देवडा अंकल की भूमिका रही है, यह बात देवडा अक्सर ही कहा करते थे, किन्तु जब होम करने के साथ ही उनके हाथ जलते दिखे तो उन्होंने अपने आप को सीमित कर लिया। मुरली देवडा के बारे में अब देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की राजनैतिक फिजा में एक नई बात तैर रही है, कि मुरली देवडा अब योग्य चिकित्सक की तलाश कर रहे हैं। कुछ लोगों ने उन्हें ``मैं कौन हूं, मेरा सारथी (वाहन चालक) कौन है, कहते हुए भी सुना है। पता नहीं राजनीतिक बिसात में मुरली देवडा अब कौन सी चाल चलने वाले हैं।




दिन बहुरेंगे राजा की धरोहर के!




मध्य प्रदेश में दस साल राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह की धरोहरों के दिन बदलेंगे, यह यक्ष प्रश्न प्रदेश की सियासत में अब तक बना हुआ है। दरअसल हाल ही में संपन्न तेंदूखेडा विधानसभा के उप चुनावों के दौरान वहां चुनाव प्रचार करने सडक मार्ग से पहुंचे भाजपा विधायकों का दर्द यह था कि जर्जर सडकों से उनका पुर्जा पुर्जा पूरी तरह हिल गया था। एक बडबोले विधायक ने तो चुटकी लेते हुए यह तक कह दिया था कि लगभग छ साल बीत जाने के बाद भी भाजपा द्वारा दिग्गी राजा की धरोहर (जर्जर सडकें) क्यों सहेजकर रखी हुईं हैं। उस समय प्रदेश के मंत्रियों ने विधायकों को आश्वासन भी दिया था कि तेंदूखेडा में अगर भाजपा जीती तो प्रदेश में दिग्विजय सिंह की इस जर्जर सडक वाली धरोहर पर अवश्य ही ध्यान दिया जाएगा। पार्टी ने फतह हासिल कर ली है, सो अब लगता है कि प्रदेश की सडकों के भाग्य बदल सकते हैं।




राजनैतिक फतवा या फतवे की राजनीति




मुस्लिम धर्म में फतवे का अपना अलग महत्व है। इस्लाम को मानने वालों को नीति अनीति के बारे में जानकारी देने के लिए फतवे जारी किए जाते हैं। हाल ही में देवबंद में वंदे मातरम के खिलाफ जारी फतवे से सियासत उबल पडी है। केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में जारी इस फतवे से संकट और गहरा गया है। भाजपा उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने तो कांग्रेस पर सीधा सीधा आरोप लगाते हुए कह दिया है कि चिदम्बरम ने इस सम्मेलन में शिरकत करके फतवे को वैधानिकता प्रदान कर दी है। इस सम्मेलन में मौजूद स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव की चुप्पी को भी अनेक लोगों ने आडे हाथों लिया है। राजनैतिक विश्लेषक अब इस बात पर शोध में लगे हुए हैं कि यह फतवा राजनैतिक तौर पर जारी हुआ है या फतवे के बाद इस पर राजनैतिक रोटियां सेंकने का कुित्सत प्रयास किया जा रहा है।




जिसे जिंदा डिस्चार्ज किया उसका डेथ सर्टिफिकेट कैसे जारी करेंगे




अगर किसी मरीज को जिंदा ही अस्पताल द्वारा अपने यहां से डिस्चार्ज कर दिया गया हो, दो घंटे बाद उसका मृत्यु प्रमाणपत्र वही अस्पताल किस बिना पर जारी करेगा, यह समस्या मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के एक निजी अस्पताल के सामने आ गई है। हुआ दरअसल यूं कि सेना के सेवानिवृत एक अधिकारी की पित्न की राजधानी के पिपलानी स्थित आर.के. अस्पताल में भरती करवाया गया था। उंचे राजनैतिक रसूख रखने वाले डॉ.बिसारिया के स्वामित्व वाले इस अस्पताल से उक्त मरीज को 01 नवंबर को सुबह साढे दस बजे छुट्टी दे दी गई। परिजनों का कहना है कि इसके बाद उक्त महिला को दो इंजेक्शन लगाए गए जिससे उसकी हालत बिगडी और साढे बारह बजे उसका निधन हो गया। पुलिस द्वारा शव को अस्पताल से ही कब्जे में लिया गया। प्रथम दृष्टया मामला अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही का ही नजर आ रहा है। अब मुश्किल यह सामने आ रही है कि जिस महिला को जिंदा ही अस्पताल से बाहर कर दिया गया हो उसका शव उसी अस्पताल में कैसे मिला और अब कौन चिकित्सक अथवा चिकित्सालय उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करेगा।




कौन होगा भाजपाध्यक्ष




भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष की तलाश में अब संघ और भाजपा के बीच सर फटौव्वल आरंभ हो चुकी है। संघ प्रमुख ने साफ कह दिया है कि अरूण जेतली, सुषमा स्वराज से इतर कोई अन्य नया चेहरा ही भाजपा की कमान संभालेगा। उधर भाजपा में भी इन दो नामों के साथ ही साथ अनंत कुमार और वेंकैया नायडू के नामों पर भी असहमति बनती दिख रही है। मोहन भागवत के इशारे के बाद अब भाजपा में अंदरूनी गुटबाजी बहुत ही तेज हो गई है। हिन्दुत्व का चेहरा बनकर उभरे नरेंद्र मोदी और विकास पुरूष बने शिवराज सिंह चौहान इस दौड में हैं। सुरेश सोनी, सुरेश जोशी, मदन दास देवी आदि अलग अलग रायशुमारी में लगे हुए हैं। भले ही राजनाथ सिंह का यह कहना हो कि भाजपा का स्टेयरिंग संघ के हाथों में नहीं है, फिर भी भाजपाध्यक्ष जैसे अहम फैसले पर संघ की राय अंतिम ही मानी जाएगी। अब फैसला मोदी, शिवराज और बाला साहेब आप्टे के बीच ही होने के आसार दिखाई पड रहे हैं।




कैसे हो होसला अफजाई




लश्कर ए तैयबा के एक आतंकी को मौत के घाट उतारने वाली रूखसाना ने विशेष पुलिस अधिकारी की नौकरी की पेशकश को ठुकरा दिया है। निडर साहासी कश्मीरी बाला का कहना है कि उसे जम्मू काश्मीर पुलिस में विशेष पुलिस अधिकारी की नौकरी करना गवारा नहीं होगा। दरअसल विशेष पुलिस अधिकारी के पास किसी भी तरह के अधिकार नहीं होते हैं। रूखसाना का कहना कि देश भर के स्कूलों में सैन्य शिक्षा अनिवार्य कर देना चाहिए, ताकि बच्चों के मन से खौफ मिट सके और वे समाज और देश विरोधी ताकतों से जमकर लड सकें, सराहनीय है। जम्मू काश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में अगर एक बीस वषीZय कमसिन बााला ने लश्कर ए तैयाबा जैसे नामी आतंकी संगठन के एक आतंकी को मार गिराया है, तो उसकी हौसला अफजाई की जानी चाहिए। सरकार को चाहिए कि नियमों को शिथिल करते हुए रूखसाना को सीआरपीएफ में नौकरी दे ताकि अन्य भारतीय बच्चों के मन में भी आतंक से लडने का जज्बा पैदा हो सके।




मोबाईल चोर एमडी




ब्लेक बेरी मोबईल एक एसा मोबाईल है, जिसकी दीवानी सारी दुनिया यहां तक कि दुनिया के चौधरी कहे जाने वाले अमेरिका के प्रमुख बराक ओबामा भी हैं। इसी ब्लेक बेरी की चाहत में एक नामी गिरामी कंपनी के प्रबंध निदेशक को पुलिस की जलालत झेलनी पडी। पिछले दिनों जानी मानी ग्लास कंपनी के मेनेजर और ग्लास मेन्यूफेक्चरर एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके संजय सोमानमी को पुलिस ने गिरफ्तार किया। दरअसल एक अन्य व्यक्ति एन.के.पुरी जो आई सी 688 से मुंबई जा रहा था ने चेकिंग के दौरान अपना सामान स्केनर पर रख दिया था। इसी समय आई सी 439 से चेन्ने जा रहे सोमानमी ने अपना सामान भी रखा। बाद में पुरी का मोबाईल नहीं मिला। पुलिस ने सीसीटीवी की रिकार्डिंग देखकर सोमानमी को धर पकडा। बाद में वह मोबाईल जहाज के टायलेट से बरामद किया गया। कुछ हजार रूपयों के ब्लेक बेरी की चोरी के चक्कर में उलझे सोमनमी ने अपनी प्रतिष्ठा एक मिनिट में ही गंवा दी।




किसके सर होगी इसकी मौत की जिम्मेदारी




व्हीव्हीआईपीज की सुरक्षा व्यवस्था के चलते सडकों पर घंटों जाम लगना स्वाभावक है, किन्तु अगर एसे में कोई अल्लाह को प्यारा हो जाए तो उसके मौत की जिम्मेदारी किसके सर पर आयत होगी। चंडीगढ में पिछले दिनों यही हुआ। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की चंडीगढ यात्रा के दौरान उनका रूट लगाया (अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए यातायात को पूरी तरह रोकना) गया। इसी दौरान एक मरीज की गाडी भी उस जाम में फंस गई। जब प्रधानमंत्री के कारवां के गुजरने के उपरांत जाम से निकालकर उसकी एंबूलेंस अस्पताल पहुंची। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उस मरीज को बचाया नहीं जा सका। बाद में भले ही पीएम ने उस परिवार से माफी मांगी हो, पर पीएम की माफी से जाने वाले को लौटाया तो नहीं जा सकता। सरकार को चाहिए कि इस दिशा में पहल कर कुछ इस तरह के रास्ते निकाले जिससे व्हीआईपी मूवमेंट के दौरान आम जनता को परेशानी का सामना न करना पडे।




पुच्छल तारा




भारत माता की धरा की रक्षा में देश के जवान ही नहीं बल्कि जानवर भी जुटे हुए हैं, वह भी बिना किसी प्रशिक्षण के। पिछले दिनों जम्मू काश्मीर में सोपियां की एक गुफा से दो शव बरामद हुए हैं जिनकी पहचान हिजबुल मुजाहिद्दीन के पीर पंजाल के रेजीमेंट कमांडर सैफुल्ला और तहसील कमांडर कैसर के तौर पर की गई है। इनके पास 2 एके 56 रायफल, कुछ विस्फोटक और अन्य हथियार बरामद किए गए हैं। सूत्रों की मानें तो सुरक्षा बलों से बचते हुए ये एक गुफा की शरण में चले गए थे, जहां एक भालू ने इनका काम तमाम कर दिया।

शनिवार, 7 नवंबर 2009



शिव बनने लगे हैं ``राज``

(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश के सूबेदार शिवराज सिंह चौहान अब राज ठाकरे और शीला दीक्षित के नक्शे कदम पर चलते दिख रहे हैं। सूबाई हुकूमत को बरकरार रखने की गरज से राजनेताओं द्वारा असंयमित भाषा का प्रयोग कोई नया नहीं है। इसके पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के खिलाफ जहर उगला था।


मध्य प्रदेश के सतना में आयोजित एक कार्यक्रम में कथित तौर पर कहा कि मध्य प्रदेश में नौकरियों के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के निवासियों का स्वागत नहीं किया जाएगा। खबरों के अनुसार चौहान ने कहा है कि कारखाने सतना में लगें और उसमें नौकरी यूपी बिहार के लोग करें यह नहीं चलेगा।


इसके पहले दिल्ली की सत्ता पर तीसरी बार काबिज होने वाली मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित ने बदरपुर में एक कार्यक्रम में भी कुछ वक्तव्य देकर विवाद खडा कर दिया था। बकौल शीला दीक्षित -``दशकों से दिल्ली का अव्यवस्थित विकास हुआ है। बाहर से लोग आते हैं, और जहां मन होता है बैठ जाते हैं।`` शीला दीक्षित का यह बयान पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना था। देखा जाए तो वे भी उत्तर प्रदेश से ही आईं हैं और दिल्ली पर एक दशक से हुकूमत कर रहीं हैं।


अपना इस तरह का बचकाना बयान देने के पहले शीला दीक्षित शायद भूल गईं कि आजादी के बाद के छ: दशकों में से एक दशक से अधिक समय तक तो दिल्ली उन्हीं के कब्जे में है, और बीच का कुछ अरसा अगर छोड़ दिया जाए तो शेष समय तो दिल्ली की गद्दी पर कांग्रेस का ही शासन रहा है। शीला से बयान से लगता है मानो वे कह रहीं हों कि दिल्ली पर काबिज रही कांग्रेस की सरकारों ने यहां की बसाहट पर ध्यान नहीं दिया है।


मुंबई में महराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) सुप्रीमो एवं शिवसेना चीफ बाला साहेब ठाकरे के भतीजे ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ जमकर जहर उगला है। मनसे द्वारा लगातार उत्तर भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए तरह तरह की बयानबाजी और हथकंडे अपनाए जाते रहे हैं।


क्षेत्रीयता को बढावा देने वाले राजनेताओं की फेहरिस्त में अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम भी जुड गया है, जिन्होंने देश के हृदय प्रदेश में यूपी बिहार के लोगों की आमद नौकरियों के लिए बंद कराने की हुंकार भरकर नए विवाद को जन्म दे दिया है।


भारत गणराज्य में हर कोई नागरिक स्वतंत्र है। देश में जम्मू एवं काश्मीर के लोगों को छोड दिया जाए जिन्हें दोहरी नागरिकता प्राप्त है, के अलावा देश में हर कोई हर प्रांत में जाकर व्यापार, नौकरी कर सकता है। सामंतशाही के अवसान के उपरांत जम्मू एवं काश्मीर के निवासियों को दोहरी सुविधा प्रदाय की गई थी।


सवाल यह उठता है कि जब एक सूबे के निवासी द्वारा दूसरे सूबे में जाकर विवाह जैसा महात्वपूर्ण संस्कार को अंजाम दिया जाता है तो फिर नौकरियों में उनके साथ भेदभाव किस आधार पर किया करने की हुंकार या कल्पना की जाती है, यह बात समझ से परे ही है।


`शिवराज` जो अब `राज ठाकरे` की राह पर चलने का प्रयास कर रहे हैं, के बचाव में उतरे भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर का कहना कि शिवराज की तुलना राज ठाकरे से की जानी ठीक नहीं है, हर राज्य को अपने हितों को देखना पडता है, भी कम हास्यास्पद नहीं माना जाएगा। राज्य के निजामों को अपने अपने राज्यों के हितों का संवर्धन अवश्य करना चाहिए पर इसके लिए वे अपने संविधान में आवश्यक संशोधन करें। इस तरह की भडकाउ बयानबाजी से तो स्थितियां विस्फोटक ही होंगी।


जब इस मामले ने तूल पकडा तब शिवराज सिंह चौहान ने यू टर्न लेते हुए बात को संभालने का प्रयास भी किया है। अब वे कहने लगे हैं कि उन्होंने एसा कुछ नहीं कहा। मध्य प्रदेश में हर राज्य के लोगों का स्वागत करते हुए उन्होंने अपने पूर्व बयान का एक तरह से खण्डन ही किया है।


देखा जाए तो राजनेता अति उत्साह में कुछ इस तरह के वक्तव्य दे जाते हैं, जो उनके साथ ही साथ सारे राज्य के लिए उचित नहीं कहे जा सकते हैं। राजनेता हो या अभिनेता वह समाज के हर वर्ग के किसी न किसी का अगुआ होता है। उसके द्वारा कही गई बात को उनके समर्थक आत्मसात भी करते हैं, इस बात को राजनेताओं को भूलना नहीं चाहिए।


अपने वोट बैंक को बढाने और समर्थकों में इजाफे के लिए राजनेताओं को हर जतन करने चाहिए किन्तु इस तरह की घटिया बयानबाजी से बचना चाहिए जिसमें एक ही देश में दो राज्यों के निवासियों के बीच बैर बढे। आज मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे किस कदर ताल ठोक रहे हैं, और वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ कांग्रेस, प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के साथ ही साथ अन्य दल किस कदर खामोशी ओढे हुए हैं।


कहीं एसा न हो कि इन नेताअों के इस घिनौने तरीके सेे जनाधार बढाने के चक्कर में देश के समस्त राज्यों के निवासी एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। नेताओं को इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर एक सर्वदलीन नीति बनाने की आवश्यक्ता है, वरना आने वाला कल रक्त रंजित क्रांति से भरा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

राष्ट्रभक्ति पर विवाद!
 
(लिमटी खरे)

देश से बढकर कोई चीज नहीं है, मां से बढकर कोई नहीं है, सच्चाई और ईमान की राह पर चलना चाहिए, इस तरह की बातें बचपन से सुनते सुनते कान पक गए हैं। केद्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम, केंद्रीय संचार मंत्री सचिन पायलट, चर्चित योग गुरू बाबा रामदेव, आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर, स्वामी अग्निवेश, शियाओं के धर्मगुरू डॉ.काल्बे सादिक आदि की उपस्थिति में देवबंद में जमीअत ए उलेमा ए हिन्द की 30वीं महासभा में देशप्रेम का जज्बा जगाने वाले गीत बंदेमातरम पर विवाद खडा किया जाना शर्मनाक ही कहा जाएगा।


आनंदमठ पुस्तक के बंकिमचंद चटोपाध्याय द्वारा 1876 में रचित ``वन्दे मातरम`` को 1896 में पहली बार कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। यह गीत आरंभ से ही विवादित रहा है। इस गीत के पहले दो अंतरों को छोडकर शेष में धरती माता की तुलना मां दुगाZ से की गई है। संभवत: यही कारण है कि वंदेमातरम के बजाए ``जन गण मन`` को राष्ट्रगान बनाया गया था।


इस महासभा में इतनी बडी बडी हस्तियों के सामने वंदे मातरम के खिलाफ फतवा जारी किया जाना आश्चर्यजनक है। उससे भी आश्चर्यजनक इन तथाकथित बडी हस्तियों की चुप्पी है। देश के गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार और महत्वपूर्ण पद पर आसीन पी.चिदम्बरम का यह कहना भी हास्यास्पद है कि उनके सम्मेलन में रहते इस तरह का कोई फतवा जारी नहीं किया गया है। सवाल तो यह है कि जब संचार माध्यमों से उन्हें इस बात की जानकारी मिल ही चुकी है, तब उनकी इस बारे में क्या प्रतिक्रिया है।


जमीयत उलेमा ए हिन्द के मौलाना मुइजुद््दीन का कहना है कि इस गीत की कुछ लाईने इस्लाम के खिलाफ हैं। इस्लाम मां के सामने नतमस्तक होने की इजाजत नहीं देता। मुसलमान संगठनों, नेताओं और मौलाना मौलवियों ने देवबंद के इस फतवे को सही ठहराया है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि इस गीत की रचना के 133 एवं आजादी के बासठ सालों के बाद यह गीत गैर इस्लामी करार कैसे दिया जा सकता है।


इससे पूर्व जिन भी इस्लाम के अनुयायियों ने इसे गाया होगा क्या उन्हें काफिर करार दिया जाएगा। मध्य प्रदेश में तो भाजपा सरकार द्वारा इसे अनिवार्य कर दिया गया है। हर माह सरकारी कार्यालयों में वंदे मातरम गाया जाता है। देवबंद के इस फतवे के बाद इस प्रदेश में क्या हालात बनेंगे कहा नहीं जा सकता है।


केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में हुए इस विवाद को भाजपा ने लपकने में देर नहीं की। भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने तत्काल इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चिदंबरम की मौजूदगी का मतलब यह है कि कांग्रेस ने यह फतवा स्वीकार कर लिया है। राजनैतिक तौर पर तो नकवी ने बयान दे दिया किन्तु फतवे के बारे में उन्होंने चुप्पी साध ली।


इस महासभा में अनेक हस्तियां मौजूद थीं किन्तु किसी ने भी इस फतवे के बारे में कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा है। चर्चित स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने तो बाजी ही मार ली है। इस महासभा के कवरेज में बाबा रामदेव छाए हुए हैं। इलेक्ट्रनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया में पहले पेज पर बडी बडी तस्वीरें छपीं हैं बाबा रामदेव की। लगता है बाबा रामदेव का मीडिया मेनेजमेंट बडा ही गजब का है।


देश की दुर्दशा, काले धन, बिगडी व्यवस्था पर जब तब बयानबाजी करके चर्चाओं में रहने वाले बाबा रामदेव जिन्होंने हाल ही मेें राजनीति में कूदने के संकेत दिए थे, ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है। हर कोई जानता है कि मुसलमान इस देश में बहुत ही तगडा वोट बैंक है, इसलिए मुसलमानों से जुडे मामले में बोलने से राजनेता परहेज ही किया करते हैं।


देवबंद के कुछ फतवों को छोडकर शेष फतवे काफी अच्छे हैं। कुछ माह पूर्व कहा गया था कि गाय काटना इस्लाम के खिलाफ है, बावजूद इसके देश में गोकशी के अनगिनत प्रकरण सामने आ रहे हैं। शरियत को चाहिए कि पहले वह अपने फतवों का पालन सुनिश्चित करवाए, साथ ही साथ देशहित के खिलाफ बयानबाजी से बचना चाहिए।


भारत देश में हर किसी को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता है। हर कोई अपने तौर तरीके से रहने के लिए स्वतंत्र है, किन्तु इस सबके उपर भारत गणराज्य का संविधान है। संविधान की व्यवस्थाओं को मानना हम सबकी बाध्यता है। वंदेमातरम गीत किसी आम भारतीय फूहड चलचित्र का अश्लील गीत नहीं वरन देश प्रेम का जज्वा जगाने वाला शहादत का प्रतीक है।


भारत सरकार को चाहिए कि इस तरह के संवेदनशील मामले में तत्काल अपना रूख स्पष्ट करते हुए इस विवाद पर विराम लगाए वरना यह मामला एक चिंगारी के रूप में भडका है, राजनैतिक नफा नुकसान के चलते इसे शोला और आग का दरिया बनने में समय नहीं लगेगा, तब आग के दानावल में समूचा देश झुलस जाएगा और उसे बुझाना टेडी खीर ही साबित होगा।

बुधवार, 4 नवंबर 2009


राजमाता का निर्देश ठेंगे पर!




(लिमटी खरे)




मितव्ययता का संदेश देने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने न जाने कितने जतन किए, किन्तु उनकी पार्टी के ही चुने हुए जनसेवकों के लिए सोनिया गांधी के साफ निर्देशों पर लक्ष्मी मैया भारी पडती दिख रहीं हैं। सूखा राहत के लिए जनसेवकों से अपने वेतन का बीस फीसदी जमा करने के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी मध्य प्रदेश में वेतन से कटौती आरंभ नहीं हो सकी है।


कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के निर्देश के उपरांत एक सितम्बर से कांग्रेस के जनसेवकों को अपने अपने वेतन के बीस फीसदी की राशि को सूखा राहत मद में जमा कराया जाना था, जो कि अब तक आरंभ नहीं किया गया है।


देखा जाए तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लोकसभा सदस्य 12, राज्य सभा सदस्य 1 के साथ ही साथ 69 विधायक हैं। इसके अलावा 2 महापौर, 35 नगर पालिका अध्यक्ष, 98 नगर पंचायत अध्यक्ष, 18 जिला पंचायत अध्यक्ष और 120 जनपद पंचायत के अध्यक्ष हैं। इस तरह कुल 355 चुने हुए जनसेवक हैं, जिन्हें सूखा राहत मद में अपना वेतन जमा करवाना था।


नेहरू गांधी के नाम पर सियासत करने वाली कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई यह भूल गई कि उसी परिवार की चौथी पीढी अर्थात राजीव गांधी की अर्धांग्नी एवं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने फरमान जारी किया था कि एमपी, यूपी सहित देश भर में सूखे की आशंका को देखते हुए जनसेवक अपने अपने वेतन का बीस फीसदी स्थानीय स्तर पर ही जमा करवाएंगे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की 19 अगस्त की बैठक में श्रीमति सोनिया गांधी के इस प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित कर दिया था।


दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार और राजस्थान में कांग्रेस ने अपनी अध्यक्ष के इस प्रस्ताव को अमली जामा पहनाना आरंभ कर दिया किन्तु मध्य प्रदेश में सोनिया का आदेश ठेंगे पर ही रखा जा रहा है। प्रदेश से लेकर जिला, तहसील, ब्लाक स्तर पर भी कांग्रेस के सुस्सुप्तावस्था में पडे संगठन ने इस महत्वपूर्ण आदेश पर कोई पहल नहीं की है।


बताते हैं कि प्रदेश स्तर से जिला स्तर को इस तरह का कोई फरमान जारी ही नहीं किया गया है। अमूमन हर दल के लिए उसके अध्यक्ष का आदेश सर्वोपरि माना जाता है, फिर अगर उसकी मंशा को कार्यसमिति की मोहर लगा दी जाए तो उसका पालन सुनिश्चित ही माना जाता है।


मध्य प्रदेश में हालात इससे उलट ही नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में न तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी ही इस मसले पर गंभीर है और न ही जिलों की कांग्रेस कमेटियां। अब जबकि इस आदेश के पालन की समयावधि दो माह बीत चुकी है तब पिछली तिथि से जनसेवकों से उनके वेतन का बीस फीसदी लेना टेडी खीर ही साबित हो रहा है।


कांग्रेस का संगठन अंदर ही अंदर किस कदर खोखला हो चुका है, उसे साबित करने के लिए कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के इस फरमान की दुर्दशा ही काफी है। सच ही है जनसेवकों की जेब से धेला निकलवाना बहुत ही दुष्कर कार्य है।


आज अगर कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी या युवराज राहुल गांधी का दौरा कार्यक्रम होता तो निश्चित तौर पर इन्हीं जनसेवकों द्वारा स्वागत द्वार और विज्ञापनों में लाखों रूपए फूंक दिए जाते पर जब बात सूखा राहत की आई तो इन जनसेवकों ने फरमान को अनसुना करना ही उचित समझा।


देश में अनेक जनसेवक तो ऐसे भी हैं, जो होली दीपावली पर दिए जाने वाले विज्ञापनों का भुगतान भी अपनी जनसेवक निधि से करने से नहीं चूकते। एक एक जिले में रामायण मंडल या क्रिकेट क्लब की तादाद देखकर उसकी जांच करवा ली जाए तो केग को एक आश्चर्यजनक घोटाला मिलने की उम्मीद है।


इन परिस्थितियों में कांग्रेस की राजमता के सूखा राहत के मद में धन संग्रह की बात बेमानी ही नजर आ रही है। सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि कांग्रेस की प्रदेश इकाई द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष की बात को अनसुना करने की धृष्टता कैसे की गई। अमूमन पार्टी अध्यक्ष की मंशा पार्टी के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। सोनिया की मंशा के अघोषित तिरस्कार से पार्टी में उनकी गिरती छवि को समझा जा सकता है।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

माया मेम साहिब की नई टकसाल!



ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

माया मेम साहिब की नई टकसाल!


मुगल शासक मोहम्मद बिन तुगलक के पास जब अकूत धन संपदा एकत्र हो गई थी तब उन्हें भूत सवार हुआ था कुछ नया करने का, सो उन्होंने चमडे के सिक्के चलवा दिए थे। उत्तर प्रदेश में भी कुछ एसा ही होने के आसार नजर आ रहे हैं। भारतीय मुद्रा पर तीन शेर बाकायदा दिखाई पड़ते हैं। दरअसल ये चार शेर हैं, जिन्हें किसी भी कोण से देखने पर तीन ही दिखाई पड़ते हैं। यूपी की मुखिया मायावती भी कुछ कुछ समय बाद चमत्कार दिखाती रहीं हैं। कभी ताज कारीडोर में चर्चित होती हैं, तो कभी करोडों रूपए की मूर्तियां लगवाने में। हाल ही में एक नया ही मामला दिखाई पड़ रहा है। यूपी के बाग बगीचों, चौराहों पर लगाई गई गजराज (हाथी) की मर्तियां देखते ही बनती हैं। दरअसल हाथी मायावती की बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिन्ह भी है, सो मायावती इसका जमकर उपयोग कर रहीं हैं। इन हाथियों की विशेषता यह है कि इन्हें भी चार शेरों की ही तरह एक दूसरे से सटाकर खड़ा किया गया है किसी भी कोण से देखने पर तीन हाथी ही दिखाई पडते हैं। हर पल कुछ नया करने की चाहत रखने वाली माया मेम साहब अगर उत्तर प्रदेश में चलने वाली मुद्रा पर शेर के बजाए हाथी का ठप्पा लगवा दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।







द्रोपदी स्वयंवर के समय तेल के कडाहे में अर्जुन को घूमती मछली की केवल आंख ही नजर आ रही थी, और उनका निशाना नहीं चूका। उसी तर्ज पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी चल रहे हैं। नरेंद्र मोदी की नजर क्रिकेट की खास कुर्सी पर टिकी हुई है। मोदी वैसे भी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (जीसीए) के अध्यक्ष बन चुके हैं। भाजपा के एक नगीने अरूण जेटली इस वक्त भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के उपाध्यक्ष पद पर काबिज हैं। गुजरात में वर्तमान में तीन क्रिकेट एसोसिएशन अस्तित्व में हैं। मोदी एक पर काबिज हैं शेष दो को वे अपने प्रभाव में लाने को आतुर हैं। बीसीसीआई के चुनाव जल्द होने वाले हैं। नरेंद्र मोदी के इस आपरेशन में कुछ अडंगा आ गया है, इसका कारण है उन्हें स्वाईल फ्लू होना। कुछ दिन तक वे न तो किसी से मिल पाएंगे, और न ही राजनैतिक तौर पर कुछ कदम उठा सकेंगे। माना जा रहा है कि जैसे ही वे ठीक होंगे वैसे ही वे राजनैतिक तौर से तो सक्रिय होंगे ही, क्रिकेट में शरद पंवार के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए जुगत लगाएंगे। आने वाले समय में नरेंद्र मोदी अगर बीसीसीआई के अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हो सकते हैं।




फस्र्ट डे, फस्र्ट शो, हाउस फुल




पायरेसी के चलते अब सिनेमाघरों की हालत पतली हो चली है। अनेक टाकीज अब तेंदूपत्ते के गोदामों और व्यवसायिक काम्पलेक्सों मेें तब्दील हो चुके हैं। छोटे मझोले शहरों में टाकीज अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। एक समय था जब ``ज़य संतोषी मां`` जैसे चलचित्र 108 सप्ताह चले थे तो शोले ``फस्र्ट डे फस्र्ट शो में गजब की हाउस फु ल रही। सुरक्षा और संगीनों का हिसाब किताब रखने वाले केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय में लगाई गई कंडोेम मशीन के साथ भी कुछ इसी तरह का घटनाक्रम हुआ। नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाईजेशन (नाको) द्वारा मंत्रालय के पुरूष और महिला शौचालयों में लगाई गई 6 कंडोम मशीनों के परिणाम आश्चर्यजनक रहे। नाको के सूत्रों की मानें तो पहले ही दिन ये मशीनें पूरी तरह खाली हो गईं। आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि कंडोम मुुफत में नहीं वरन पांच रूपए में मुहैया करवाए गए थे। वैसे देश में एड्स के प्रति जागरूकता का अभियान अगर ईमानदारी से चलाया जाए तो न केवल एड्स बल्कि जनसंख्या पर नियंत्रण भी कारगर तरीके से पाया जा सकता है।




लालफीताशाही का कसता शिकंजा




सरकारी तंत्र में बेलगाम अफसरशाही की घोडे किस रफ्तार से दौड रहे हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशवासियों को अब तक विशिष्ट पहचान पत्र मिलना तो दूर इसके लिए बनाई गई परियोजना को कार्यालय तक नहीं मिल सका है। इंफोसिस के पूर्व प्रमुख नंदन नीलकनी के नेतृत्व में बडे ही जोर शोर से आरंभ की गई केंद्र सरकार की यह महात्वाकांक्षी परियोजना अभी भी कार्यालय और मुलाजिमों जैसी बुनियादी जरूरत से जूझ रही है। लालफीताशाही का आलम यह है कि प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह को इसके लिए खुद आगे आना पडा और खुद अपनी अध्यक्षता में एक मंत्रीमण्डलीय समिति का गठन करना पडा। यक्ष प्रश्न आज यह है कि प्रधानमंत्री खुद आखिर कहां कहां दखल देंगे। पीएम को चाहिए कि वे हर मामले में दखल देने के बजाए प्रशासनिक सुधारों की ओर तवज्जों दें ताकि अफसरशाही के बिगडेल घोडों पर नकेल कसी जा सके।


 मपो सबसे भ्रष्ट




कभी स्काटलेंड पुलिस के बाद विश्व में सबसे बेहतर मानी जाने वाली मुंबई पुलिस का अघोषित खिताब पाने वाली महाराष्ट्र पुलिस (मपो) रिश्वत लेने के मामले में सबसे आगे है। किसी ओर ने नहीं वरन भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो एबीसी ने यह बात कही है। (एबीसी) के केलेंडर में मपो के बाद दूसरी पायदान पर राजस्व विभाग और उसके बाद तीसरे नंबर पर बिजली बोर्ड को स्थान दिया गया है। आजादी के बाद आधी से ज्यादा सदी तक देश और प्रदेश पर राज करने वाली कांग्रेस के शासनकाल में पुलिस ही अगर निरंकुश और भ्रष्ट हो जाए तो फिर सूबे की रियाया किससे और कैसी उम्मीद रखे। वैसे भी भ्रष्टाचार के मामले में अब तक बिहार और उत्तर प्रदेश ने बाजी मारी है। हाल ही में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में हुआ भूमि घोटाला भी बहुत बडा माना जा रहा है। जनसेवकों और अफसरान के आपस में बने रिश्तों के चलते गरीब जनता की परवाह किसी को भी नहीं है।


जयराम ``जय जय राम``




अपने बयानों से चर्चाओं में आने वाले केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश अब सत्ता का उपयोग और दुरूपयोग दोनों ही बेहतर तरीके से सीख चुके हैं। उर्जा विभाग में राज्यमंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने अपने वाहन चालक दामोदर को ही अपना एपीएस बना लिया था। वर्तमान में कांग्रेस वार रूम के सहयोगी रहे वरद पांडे और मो.अली खान पर ज्यादा मेहरबान नजर आ रहे हैं। बताते हैं कि वरद को उन्होंने अपनी जान पहचान वाली एक बहुराष्ट्री़़़य कंपनी में सीईओ तो अली को सलाहकार बना लिया है। ला ग्रेजुएट अली को मंत्रालय में सलाहकार बनाने के लिए मंत्रालय ने बाकायदा विज्ञापन जारी किया। हजारों की तादाद में आवेदन आने के बाद भी किसी को भी साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया, बस अली को नियुक्त कर दिया गया है। मजे की बात तो यह है कि दोनों ही के पास कांग्रेस का कोई बेकग्राउंड नहीं है।


क्या सुधर सकेगी तस्वीर




अगले साल होने वाले तेरह दिनी राष्ट्र मण्डल खेलों में विदेशों से आने वाले मेहमानों के सामने देश और दिल्ली की बेहतरीन तस्वीर पेश करने की गरज से सरकार द्वारा तरह तरह के जतन किए जा रहे हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा दिल्ली के हर तबके के सर्विस प्रोवाईडर को शिक्षित करने का बीडा उठाया गया है, ताकि देश और दिल्ली की तस्वीर बदल सके। मंत्रालय द्वारा पूसा इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मेनेजमेंट से सहयोग लिया जा रहा है। टेक्सी और आटो चालकों को भी पंजीकृत कर प्रशक्षित किया जा रहा है। विदेशी पर्यटकों का खासा ध्यान आटो टेक्सी के बजाए भारतीय रिक्शों पर ज्यादा होता है, जिस ओर पर्यटन मंत्रालय का ध्यान नहीं है। रेल्वे स्टेशन पर उतरते ही ``होटल लॉज`` के नाम से त्रस्त करने वाले आटो टेक्सी और रिक्शेवालों को पर्यटन मंत्रालय क्या नसीहत दे पाएगा यह तो समय ही बताएगा किन्तु गैर पंजीकृत टेक्सी चालक कामन वेल्थ गेम्स के दौरान भारत की छवि बिगाडने में खासी भूमिका निभाएंगे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।


जेतली के जलवे




भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अरूण जेतली के जलवे भारत ही नहीं विदेशों में भी बरकरार हैं। आश्चर्य मत कीजिए, भले ही अरूण जेतली लोकसभा या विधानसभा चुनाव लडकर सीधे सीधे जनादेश पाने से कतराते रहे हों पर इंटरनेट के अथाह समुंदर में उनके नाम की पूछ परख ज्यादा है। बताते हैं कि अरूण जेतली ने जब अपने नाम के डोमिन नेम के लिए आवेदन दिया तो उन्हें पता चला कि यह डोमिन नेम तो पहले से ही न केवल रजिस्र्ड है, बल्कि इसके लिए बोलियां भी लगाई जा रही हैं। जेतली को पता चला कि उनके नाम से पंजीबद्ध डोमिन नेम 14445 अमेरिकी डालर अर्थात लगभग सात लाख रूपयों में उपलब्ध है। यह जानकर जेतली हतप्रभ रह गए। जेतली ने यह नाम उन्हें देने की पेशकश की तो उन्हें भी नीलामी में हिस्सा लेने को कहा गया। हारकर जेतली ने दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली है। न्यायमूर्ति एस.मुरलीधर ने फिलहाल जेतली के इस डोमिन नेम के प्रचार और नीलामी पर पाबंदी लगा दी है। अब देखना यह है कि जेतली को उनके नाम का हक मिल पाता है या फिर उन्हें भी नीलामी की कतार में खडे होकर अपना नाम वापस लेना पडेगा।






कहां गए गुरूकुल!


गुरूकुल, इस शब्द के उच्चारण के साथ ही जेहन में वन में विचरण करते हिरण, खरगोश आदि के साथ बच्चों को अध्ययन कराते आदि अनादि काल के ऋषियों की तस्वीर जीवंत हो उठती है। आज के समय में शिक्षा को व्यवसाय बना दिया गया है। आज शिक्षित करने के एवज में धन संग्रह महत्वपूर्ण विधा बनकर रह गई है। जहां तहां कुकुरमुत्ते की भांति स्कूल और कालेज खुल गए हैं, जहां उपाधियां बिक रहीं हैं। व्यवहारिक ज्ञान के नाम पर शैक्षणिक संस्थाएं चुप्पी साधे हुए हैं। राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी के नाम से पुकारा जाता है। बापू को महात्मा की उपाधि एक गुरूकुल में ही मिली थी। बापू जब कस्तूरबा गांधी के साथ 1915 में हरिद्वार गए थे तक उन्होंने वहां एक गुरूकुल के संस्थापक महात्मा मुंशीराम जिन्हें कालांतर में स्वामी श्रृद्धानन्द के नाम से जाना जाता था। 8 अप्रेल को वहां आयोजित एक समारोह में गुरूकुल के ब्रम्हचारियों ने बापू का सम्मान किया और पहली बार वहां बापू को महात्मा नाम से संबोधित किया गया था, बाद में यह उनके नाम का अभिन्न अंग बन गया था। अब जबकि गुरूकुल ही नहीं रहे तो बापू के आदशोZं पर चलने वालों के साथ ही साथ किसी नए महात्मा के पैदा होने पर संदेह ही होने लगता है।






कहां गई मितव्ययता की सीख!


कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने विमान की इकानामी क्लास की बीस सीटें खाली रखकर, तो युवराज राहुल गांधी ने शताब्दी की एक पूरी बोगी बुक करवाकर यात्रा कर मितव्ययता की एक अच्छी किन्तु मंहगी सीख देशवासियों को दी है। कांग्रेस की सत्ता की धुरी सोनिया और राहुल की तर्ज पर ही केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री कमल नाथ चल रहे हैं। अक्टूबर माह में दो बार वे अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाडा के प्रवास पर गए। इस दौरान उन्होंने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से छिंदवाडा की दूरी विशेष विमान ``चार्टर्ड प्लेन`` से तय की। विशेष विमान के लिए प्रतिघंटा लगभग एक लाख रूपए से अधिक की राशि का भुगतान करना होता है। दिल्ली से छिंदवाडा की दूरी हवाई जहाज से लगभग पोने दो घंटे में तय की जाती है। इस लिहाज से एक बार की यात्रा का खर्च लगभग दस लाख रूपए के उपर ही बैठता है। मंदी के दौर में एक ओर मां बेटे अर्थात सोनिया और राहुल मितव्ययता का प्रहसन कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी ही सरकार के एक मंत्री द्वारा चार्टर्ड प्लेन का उपयोग किया जा रहा हो तो आम आदमी तो कहेगा ही ``कांग्रेस की मितव्ययता की नौटंकी जिंदाबाद``!






सब पर भारी गणपति की सवारी


भगवान गणेश ने चूहे पर बैठकर ही धरती की परिक्रमा कर ली थी। भगवान गणेश के वाहन से सभी भयाक्रांत रहते हैं। कंप्यूटर में भी चूहे अर्थात माउस का खासा महत्व है। हाल ही मेें एक चूहे के कारण हवाई जहाज उडान नहीं भर सका। साउदी अरब में रियाद के लिए जाने वाली एयर इंडिया के एक विमान को उडान भरने से रोक दिया गया। बताते हैं कि उस विमान में मूषक ने आमद दे दी थी। कर्मचारी चूहे को खोजने में असफल रहे। बाद में दूसरा विमान मुहैया करवाकर यात्रियों को गंतव्य के लिए प्रस्थित किया गया। यह पहला मौका नहीं है जबकि चूहे के कारण विमान उडान न भर सका हो। कुछ दिनों पहले अमृतसर से लंदन जाने वाले एक विमान में चूहा घुस गया था, जिसके कारण विमान नियमित समय पर उड़ान नहीं भर सका था। वैसे भारतीय रेल में तीन शिक्सयतें ही मुफ्त में यात्रा कर सकतीं हैं, जिनमें से सांसद, पूर्व सांसद और स्वतंत्रता संग्राम सैनानी घोषित तौर पर तो चूहे अघोषित तौर पर बिना दाम चुकाए यात्रा कर सकते हैं। सरकार चाहे किसी की भी हो रेल मंत्री चाहे जो भी हो पर भगवान गणेश की सवारी निशुल्क ही यात्रा करती है।






पुच्छल तारा


कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस का गढ माने जाने वाले जम्मू एवं काश्मीर में पिछले दिनों सरकारी
मछली की आंख पर निगाहें हैं नरेंद्र मोदी की

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009


बाबा रामदेव का राष्ट्रधर्म


(लिमटी खरे)

जब भी किसी के पास अकूत दौलत और शोहरत आती है तो उसका रूझान राजनीति की ओर होना स्वाभाविक ही है। बीसवीं सदी के रूपहले पर्दे के महानायक रहे अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राज बब्बर, गोविंदा से लेकर लिकर किंग विजय माल्या तक इससे अछूते नहीं हैं। अब इसी कड़ी में बाबा रामदेव का पदापर्ण होने वाला है।


बाबा रामदेव मीडिया की सुर्खियों में बने रहना खूब जानते हैं। स्वयंभू योग गुरू बनकर भारत के आध्याित्मक क्षितिज पर स्थान बनाने वाले बाबा रामदेव ने कम समय में योग के माध्यम से अकूत दौलत एकत्र की इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।


राजीव गाधी का सपना था कि इक्कीसवीं सदी का भारत आत्मनिर्भर और सूचना और प्रोद्योगिकी के मामले में आत्मनिर्भर हो। कांग्रेस राजीव गाधी का यह सपना साकार तो नहीं कर सकी किन्तु बाबा रामदेव ने इक्कीसवीं सदी में भारत के लोगों को योग का दीवाना बना दिया है। यह सच है कि बाबा ने योग को नए क्लेवर में प्रस्तुत किया है।


एक सधे हुए व्यापारी की तरह बाबा रामदेव ने पहले अपनी योग की ``दुकान`` को फैलाना आरंभ किया। फिर घर घर में खासी दखल बना चुके न्यूज चेनल्स के माध्यम से अपने आप को जनता के बीच परोसा। बाबा खुद की पीठ थपथपाना भी खूब जानते हैं। किसी मदारी के तमाशे की तरह उनके योग शिवरों में मरीज अपने अपने को निरोगी होने के दावों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते और बाबा वाहवाही बटोरते।


बाबा रामदेव के लिए राष्ट्रधर्म कितना महात्वपूर्ण है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बाबा ने कौल लिया था कि जब तक वे संपूर्ण भारत को निरोगी नहीं बना देंगे तब तक वे देश की धरती के बाहर पांव नहीं रखेंगे। विदेश की वादियों का लोभ बाबा छोड नहीं सके और चल पडे विदेश।


देश में बाबा की ``कंपनी`` के बने उत्पाद मंहगे दामों पर धडल्ले से बिक रहे हैं। कोई कहता है बाबा इन उत्पादों के बदले मलाई काट रहे हैं। यह है बाबा का राष्ट्रधर्म। गरीब गुरबों को जहां खाने को एक निवाला तक नहीं है, क्या वह गरीब बाबा के बेशकीमति उत्पादों का लाभ उठा पाएगा।


रही बात बाबा के शिविरों की तो यह भी अमीरों के लिए ही होते हैं। बाबा के शिविर निशुल्क नहीं होते हैं। इसमें प्रवेश के लिए तगडी फीस देना होता है। बाबा के हरिद्वारा वाले आश्रम में लगने वाले विशेष शिविरों के लिए भी बाकायदाा `पेकेज` लिया जाता है, जिसमें कितने दिन और रात का रूकना खाना पीना है यह सब शामिल होता है।


भारत जैसे गरीब देश में बाबा के उत्पाद बिक रहे हैं, फिर बाबा ने पश्चिम की ओर रूख किया है। देश को गुलामी की जंजीरों में बांधने वाले ब्रितानी अब बाबा रामदेव के उत्पादों से स्वास्थ्य लाभ कर सकेंगे। लंदन में बाबा ने बेलग्रेव रोड पर नेचुरल हेल्थ शाप का उद्घाटन किया है। कल तक देश को निरोगी बनाने का दावा करने वाले रामदेव बाबा अब पश्चिमी देशों की ओर कूच कर रहे हैं, यही है बाबा रामदेव का राष्ट्रधर्म।


इसके पूर्व बाबा ने स्काटलेंड में 20 लाख पाउंड में जमीन खरीदकर वहां आश्रम की स्थापना के लिए भूमिपूजन कर चुके हैं। यह भूखण्ड सवा वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। वैश्विक मंदी के चलते इसके स्वामी ने इसे बेच दिया और मंदी के इस दौर में बाबा रामदेव जैसी शिख्सयत ने इसे खरीदा है तो बाबा की अंटी (जेब के माल) का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।


बाबा रामेदव के हरिद्वार स्थित पतांजली योग संस्थान मेें जाना आम आदमी के लिए आसान नहीं है। कहा जाता है कि अगर कोई बाबा की दवाओं की एजेंसी (जिला स्तर पर) लेना चाहे तो उसे एक मुश्त आठ लाख रूपए की दवाएं खरीदनी होती हैं। इतने मंहगे तरीके से अगर बाबा देश के गरीब गुरबों का इलाज करना चाह रहे हैं तो इससे बेहतर तो नीम हकीम ही हैं, जो कम से कम गरीबों की जेब देखकर ही अपनी फीस और दवाअों की कीमत निर्धारित करते हैं।


प्रसिद्धि और आकूत दौलत के बाद बाबा के मन में राजनैतिक महात्वाकांक्षाएं हिलोरे मारना स्वाभाविक ही है। लोकसभा चुनावों के पूर्व बाबा रामदेव ने भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए कहा था कि विदेशों में जमा काला धन वापस लाने वे सडकों पर उतरेंगे।


चुनाव हुए महीनों बीत गए पर बाबा सडकों पर नहीं उतरे। हां बाबा रामदेव हवा में उडकर विदेशों की खाक अवश्य छान रहे हैं। बाबा रामदेव ने देश में हर क्षेत्र में छाई बदहाली की नस दबाकर राजनेताओं के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। बाबा ने लोकसभा में अपने अनुयायी को भेजने की बात फिजां में उछालकर जनमानस टटोलने का प्रयास किया है।


5 जनवरी को पतांजली योगपीठ में ढाई करोड अनुयाईयों को इकट्ठा करने की बाबा की हुंकार से राजनेताओं की नींद में खलल पडना स्वाभाविक ही है। आने वाले समय में राजनेताओं द्वारा बाबा रामदेव के खिलाफ मुहिम आरंभ कर दी जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


वैसे बाबा के राष्ट्रधर्म पर हर राष्ट्र वासी को संशय होना स्वाभाविक ही है। जब बाबा रामदेव अपने पुराने कौल पर कायम नहीं रह पाए तो आने वाले समय में अगर वे या उनके अनुयायी देश की कमान संभाल लेंगे तब देश का क्या होगा इस बात का अंदाजा लगाना सहज नहीं होगा।

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

नकली नोट के बदले असली वोट

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)


नकली नोट के बदले असली वोट

केंद्र सरकार इस बात से हैरान परेशान है कि विदेशों से आने वाले नकली नोटों का चलन देश में तेजी से बढ़ने लगा है। हाल ही में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में नकली नोटों के बदले असली वोट की कारस्तानी से आदिवासी समुदाय में रोष और असंतोष की स्थिति निर्मित हो गई है। महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में नेताओं द्वारा कथित तौर पर वोट लेने के लिए प्रलोभन के तौर पर पांच सौ और हजार के नोटों की बरसात कर दी थी। दीपावली पर जब आदिवासी समुदाय इन नोटों को लेकर खरीददारी को निकला तो वह भोंचक्क रह गया, क्योंकि ये नोट नकली थे। भारतीय बेंकिग फोरम और समाजवादी पार्टी ने इस मामले की बाकायदा एफआईआर भी दर्ज करवाई हैै। राज्य में पुलिस ने बड़ी तादाद में नकली नोटों की बरामदगी भी की है। वोटर आश्चर्य चकित थे कि इस बार नेताओं द्वारा नोटों की अचानक बारिश कैसे की जा रही है। अब देखना यह है कि नकली नोटों से असली वोट खरीदने वाले नेताओं पर क्या कार्यवाही हो पाती है।


महिला आरक्षण को ही सेंध लगाती कांग्रेस
महाराष्ट्र में भले ही कांग्रेस और राकांपा ने बहुमत हासिल कर तीसरी मर्तबा सरकार बनाने के मार्ग प्रशस्त कर लिए हों किन्तु महिलाओं के नाम पर इन दोनों ही सियासी दलों के साथ ही साथ भाजपा और शिवसेना ने भी बेरूखी दिखाई है। 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस, भाजपा, राकांपा और शिवसेना ने 12 सीटों से ज्यादा पर उम्मीदवार खड़े नहीं किए हैं। सूबे मेें कांग्रेस ने 12 तो राकांपा ने छ:, शिवसेना और भाजपा ने महज आठ आठ महिलाओं पर दांव लगाया था। केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा वैसे तो महिला आरक्षण को पहली प्राथमिकता बनाया गया है, किन्तु जब भी टिकिट देने की बात आती है, कांग्रेस द्वारा ही अपनी कथनी पर अमल नहीं किया जाता है। भले ही महिला आरक्षण विधेयक परवान न चढ सका हो किन्तु पार्टी चाहे तो चुनावों में तो कम से कम फीसदी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर सकती है, इसके लिए उसे सरकार से अनुमति की दरकार कम से कम नहीं ही होगी, वस्तुत: एसा होता नहीं है। यही कारण है कि सत्ता या विपक्ष दोनों ही के द्वारा महिलाओं को खुश करने की गरज से तो मीठी मीठी बातें कर दी जाती हैं, किन्तु जब उनके चरितार्थ करने का समय आता है तो सियासी पार्टियां चुप्पी साध लेती हैं।


चुभने लगा है सादगी अभियान
आसमान छूती मंहगाई और मंदी के इस दौर में केंद्र सरकार द्वारा आरंभ किया गया मितव्ययता अभियान अब नेताओं और अधिकारियों को चुभने लगा है। कुछ मंत्री तो इसकी परवाह भी नहीं कर रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी इकानामी क्लास में यात्रा कर रहीं हैं, वहीं दूसरी ओर हाल ही में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा गए तो बाकायदा विशेष विमान की सेवाएं लीं। विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा और शशि थुरूर की तरह हो सकता है कि इस विमान का किराया उन्हीं ने अपनी जेब से ही दिया हो, किन्तु विलासिता तो विलासित ही मानी जाएगी। उधर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के करीबी सूत्रों की मानें तो यह सादगी अभियान की नौटंकी सितम्बर 2010 तक जारी रहने की उम्मीद है। सादगी और मितव्ययता के इस प्रहसन के चलते मंत्री, विधायक, सांसद और व्ही.व्ही.आई.पीज को अब घुटन महसूस होने लगी है, किन्तु कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के कोड़े के डर से सभी ने अपनी जुबान बंद कर रखी है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों की माने तो वित्त मंत्री द्वारा एक साल में सभी मंत्रालयों को 30 हजार करोड़ रूपयों की बचत का लक्ष्य दे दिया है।


वालीवुड बाला अब राजनीति की ओर
वालीवुड की मशहूर अभिनेत्री मनीषा कोईराला आने वाले दिनों मेें नेपाल की राजनीति में दो दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहीं हैं। हाल ही में मनीषा अपने दादा और नेपाल के पहले प्रधानमंत्री बी.पी.कोईराला के स्मारक पर अपने पिता प्रकाश और माता सुषमा के साथ गईं थीं। वे केवल वहां गईं ही नहीं वरन उन्होंने वहां दो घंटे भी बिताए। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन, चीची यानी गोविंदा आदि का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि अब उन्हें भी राजनीति का गलियारा भाने लगा है। वे भी आज के युग के ``जनसेवक`` बनकर नेपाल की रियाया की सेवा करना चाहतीं हैं। राजनैतिक बियावान में अब यह बात जोर पकड़ने लगी है कि मनीषा को आखिर आज के युग के ``जनसेवकों`` की कौन सी बात पसंद आई जो वे इस कीचड़ में खुद ही उतरने की तैयारी कर रहीं हैं, क्योंकि रूपया पैसा और शोहरत तो उनके पास पहले से ही है।


राजकुमारी ने की सफाई
बा अदब बा मुलाहजा, होशियार, राजकुमारी पधार रहीं हैं, ये गुजरे जमाने की बात हो गई है। वर्तमान में एक राजकुमारी सड़कों पर है, लोगों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ में एक राजकुमारी ने बाकायदा जमीन पर उतरकर झोपड़ पटि्टयों की सफाई आरंभ कर दी है। फ्रांस में जन्मी भारतीय राजकुमारी प्रिंसेस फे एरे उर्फ जहां आरा ने भारत को अब अपना घर बना लिया है। राजकुमारी लखनउ के मशहूर नवाब वाजिद अली शाह के पडपोतों में से एक से शादी की है। देश की एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) रेश फाउंडेशसन से अब जुड गई हैं जहाआरा। यह एनजीओ देश में झोपड पटि्टयों की साफ सफाई का काम बडी ही संजीदगी से किया करती है। जहांआरा इस पावन काम के लिए लखनउ के अलावा मुंबई और कोलकता भी जाएंगी।


अगली लोकसभा में बुजुर्गों की संख्या होगी कम
2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों में देश में अनेक वरिष्ठ नेताओं के चेहरे शायद ही देखने को मिलें। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी, राकांपा सुप्रीमो शरद पंवार, केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे तो बाकयदा सक्रिय राजनीति को बाय बाय करने की मंशा जता चुके हैं। पीएम डॉ.एम.एम.सिंह भी 77 साल के हो चुके हैं, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी दिसंबर में 66 की हो जाएंगी। प्रणव दा 74, आड़वाणी 82, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह 77 तो जार्ज फर्नाडिस 89 के हो चुके हैं। देखा जाए तो 2014 में सुषमा स्वराज, अरूण जेतली, गुलाम नवी आजाद, कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, लालू प्रसाद यादव जैसे दिग्गज राजनैतिक तौर पर अपनी अंतिम पारी ही खेल सकते हैं।


भाजपा के गांधी की फिर हुई उपेक्षा
भारतीय जनता पार्टी द्वारा लगातार अपने गांधी की उपेक्षा ही की जा रही है। नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के रूप में भाजपा में मेनका तो पांचवीं पीढ़ी के तौर पर वरूण गांधी विराजमान हैं। जब भी इन दोनों के महिमा मण्डन की बात आती है, भाजपा द्वारा हाथ खींच लिए जाते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र, हरियाणा और अरूणाचल के विधानसभा चुनावों में वरूण गांधी को पूरी तरह से उपेक्षित रखा गया है। स्टार प्रचारकों में भी वरूण का नाम नहीं था, उधर कांग्रेस में राहुल को हाथों हाथ लिया गया। इस सबसे खफा होकर सोनिया गांधी की देवरानी मेनका ने एक निजी सर्वेक्षण कंपनी से राहुल और वरूण की लोकप्रियता का सर्वे करवाया। सर्वे में पाया गया कि राहुल से ज्यादा लोकप्रिय वरूण हैं। सर्वे मेनेज्ड था या नहीं कहा नहीं जा सकता है। इस सर्वे को लेकर मेनका ने भाजपा सुप्रीमो राजनाथ के द्वार खटखटाए। राजनाथ ने साफ तौर पर कह दिया कि वरूण प्रचार के लिए स्वतंत्र हैं, किन्तु उन्हें स्टार प्रचारकों में शामिल नहीं किया जा सकता, फिर क्या था मेनका अपना सा मुंंह लेकर वापस लौट गईं।


सोनिया के प्रिय केंद्रीय मंत्री जैन की उपेक्षा
केंद्रीय मंत्रियों की आपस में किस कदर गलाकाट लड़ाई मची हुई है इसका साक्षात उदहारण झांसी के युवा केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन की उपेक्षा से साफ जाहिर हो जाता है। वाक्या झांसी से छिंदवाड़ा नई रेलगाडी को हरी झंडी दिखाने का था। केंद्रीय सडक एवं परिवहन मंत्री कमल नाथ ने अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा में शहरी विकास राज्य मंत्री सौगात राय के साथ इस रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाकर रवाना कर दिया। इसके दूसरे सिरे झांसी में इसका कोई नामलेवा ही नहीं था। चर्चा है कि प्रदीप जैन को उनकी औकात समझाने की गरज से इस पूरे कार्यक्रम से उन्हें दूर रखा गया है। वहीं सियासी गलियारों में यह बात भी जोर पकड़ रही हैं कि सोनिया गांधी के प्रिय पात्रों में शुमार रहने वाले प्रदीप जैन को इससे उपेक्षित रखना कहीं कमल नाथ को भारी न पड जाए। वे चाहते तो सौगात राय के बजाए प्रदीप जैन को भी साथ ले सकते थे। पर एसा हुआ नहीं, हो सकता है कमल नाथ को भय हो कि कहीं इस रेलगाडी के शुभारंभ का श्रेय प्रदीप जैन न ले जाएं।


विन्धय की रेली से कुछ हासिल होगा
मध्य प्रदेश में विन्धय क्षेत्र एक समय काफी ताकतवर माना जाता रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह और सफेद शेर के नाम से मशहूर पूर्व विधानसभाध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के नाम का डंका बजा करता था, समूचे प्रदेश में। अब दोनों ही के किस्से गुजरे जमाने की बात हो गई है। अर्जुन सिंह को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाने के उपरांत उनकी पुत्री को कांग्रेस ने टिकिट न देकर दर्शा दिया था कि साल दर साल कांग्रेस की सेवा के पारितोषक के तौर पर उन्हें क्या दिया जा रहा है। सुरेश पचौरी के साथ पंगा लेकर पहले ही उनके पुत्र अजय सिंह राहुल ने अपना काफी नुकसान करवा लिया था। विन्धय में श्रीनिवास तिवारी को साधकर सुरेश पचौरी ने ठाकुर लाबी को कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। अब अजय सिंह हैं दिग्विजय सिंह की शरण में। राजा दिग्विजय सिंह के पढाए पाठ के चलते विन्धय में राहुल सिंह शक्ति प्रदर्शन के लिए रेली करने वाले हैं। प्रदेश में मरणासन्न पड़ी कांग्रेस को विन्धय की इस रेली से कुछ हासिल हो एसा लगता तो नहीं है, पर अगर तीर राजा दिग्विजय सिंह के तरकश से निकला है तो फिर कुछ भी कहना मुश्किल ही है।


अंधेरे में वजीरे आला
प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम के दौरान बिजली गोल होने से अधिकारियों में दहशत बनी हुई है। यद्यपि बिजली गोल होने की घटना की जांच का प्रतिवेदन प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंच चुका है, पर उसमें पीएमओ की टीका टिप्पणी न होने से अभी भी टपके का डर बाकायदा बना हुआ है। दरअसल राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रधानमत्रंी के कार्यक्रम के दौरान बिजली गोल हो गई थी, जिससे प्रधानमंत्री की भवें तन गईं। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्लूडी) और नई दिल्ली मुनििस्पल कार्पोरेशन (एनडीएमसी) इस मामले में खाल बचाने की जुगत में लगी हुईं है। एनडीएमसी का कहना है कि सीपीडब्लूडी ने आटोमेटिक स्विच नहीं लगाया जिससे लाई ट चली गई। वहीं दूसरी ओर सीपीडब्लूडी का कहना है कि विज्ञान भवन में पीए का प्रोग्राम हाल नंबर 5 में आयोजित किया गया था, जो व्हीआईपी हाल नहीं है। वैसे भी लाईट जाने पर चालीस सेकंड में लाईट ठीक करने का मानक है, और विभाग ने तो बीस सेकंड में ही यह काम कर दिया था। अब देखना यह है कि इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय क्या रूख अपनाता है।


मीडिया से पंगा
दिल्ली के नेता प्रतिपक्ष विजय कुमार मल्होत्रा अब मीडिया से पंगा लेने के मूड में दिख रहे हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नसीहत देते हुए कहा है कि अगर वाकई शीला सरकार खर्च में कटोती करना चाह रहीं हैं, तो उन्हें अपने विज्ञापनों में कमी करनी होगी। बकौल मल्होत्रा कांग्रेस का मितव्ययता अभियान महज दिखावा ही है। कांग्रेस के मंत्रियों के फोटो रोजाना ही अखबारों में छप रहे हैं, और करोड़ों रूपयों को फिजूल में ही बहाया जा रहा है। मल्होत्रा जी शायद यह बात बखूबी जानते होंगे कि मीडिया का प्रत्यक्ष राजस्व विज्ञापनों से ही आता है। फिर वर्तमान के मीडिया के स्वरूप में विज्ञापनों के सहारे ही मीडिया मुगल अपनी अपनी ``पलिसी`` तय करने लगे हैं। विशेषकर घराना पत्रकारिता के उदय के उपरांत ``वास्तविक खबरों`` के बजाए ``प्रयोजित खबरों`` पर आकर टिक गया है, मीडिया। इन परिस्थितियों में वी.के.मल्होत्रा का यह बयान उनकी मीडिया से दूरी बनाने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।


किसको दें मुआवजा
मध्य प्रदेश के बड़़वानी जिले के राजघाट को लेकर असमंजस बरकरार ही है। दरअसल बड़वानी में महात्मा गांधी, कस्तूरबा गांधी और महादेव भाई देसाई की ``भस्मी`` सुरक्षित रखी हुई है। यहां बाकायदा चबूतरा बनाकर बापू की याद में राजघाट का निर्माण किया गया है। अब यह इलाका सरदार सरोवर परियोजना के चलते डूब में आ रहा है। बाकी लोगों को तो मुआवजा दे दिया गया है, पर बापू की सुध किसी को भी नहीं है। बताते हैं कि 12 फरवरी 1948 को तीनों ही की भस्मी लाकर यहां रखी गईं थीं। कलेक्टर बड़वानी राजपूत कहते हैं कि उनके पास इसको स्थानांतरित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। नर्मदा वेली डेवलपमेंट के अधीक्षण यंत्री का कहना है कि यह स्थल डूब में नहीं है, तो पुनर्वास अधिकारी ने कहा कि 1999 में प्रकरण बनाकर एक लाख तेईस हजार रूपए कलेक्टर के खाते में जमा करवाए जा चुके हैं। अफसरशाही के जाल में बापू के मध्य प्रदेश के इस राजघाट की सुध लेने वाला कोई नहीं है। चूंकि मामला किसी संस्था और बापू से जुडा है अत: किसी को इसमें धेला नहीं मिलने वाला।


तानाशाही के चलते शिवसेना हुई कमजोर
शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे की तानाशाही के चलते शिवसेना का जनाधार तेजी से कम होता रहा है, बची खुची कसर उनके अपने भतीजे राज ने निकाल दी। बालासाहेब ठाकरे के विश्वस्त माने जाने वाले चार नेता या तो कांग्रेस राकांपा की ताकत बन गए या फिर अपनी पार्टी बनाकर शिवसेना के विजय मार्ग पर शूल बनकर उभर गए। पिछले दो दशकों में छगन भुजबल, नारायण राणे, संजय निरूपम और राज ठाकरे ने बालासाहेब की शिवसेना को धूल चटवाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी है। इन सभी ने बाला साहेब के तानाशाही पर्ण रवैए के चलते ही अलग मार्ग पर चलने का मानस बनाया है। इनके इस तरह से जाने से एक ओर शिवसेना की जमीन कमजोर हुई वहीं दूसरी ओर शिवसेना क्षत्रपों की बौखलाहट तेजी से बढ़ी है। देखा जाए तो शिवसेना के ये आधार स्तंभ अपने अपने क्षेत्र में बेहद प्रभाव रखते थे, जिनका फायदा आज कांग्रेस और राकांपा उठा रही है।


पुच्छल तारा
शेरशाह सूरी के जमाने की ग्रांट नेशनल रोड जो बाद में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात बनी के लखनादौन से नागपुर तक के हिस्से को स्विर्णम चतुभुZज के उत्तर दक्षिण गलियारे का हिस्सा बनाए जाने के विवाद के चलते कांग्रेस को विदर्भ में काफी नुकसान उठाना पड़ा। दरअसल केंद्रीय भूलत परिवहन मंत्री कमल नाथ द्वारा यह प्रयास किया जा रहा था कि इस मार्ग को परिवर्तित कर छिंदवाड़ा से ले जाया जाए। इसमें वे कामयाब नहीं हो सके हैं। महाकोशल के सर्वमान्य नेता कमल नाथ को उसी महाकौशल के केंद्र बिन्दु सिवनी जिले में जितनी लानत मलानत झेलनी पड़ी उतनी शायद ही कहीं झेली हो। यहां तक कि उनकी अर्थी तक निकाल दी गई। इसका प्रभाव महाराष्ट्र के विदर्भ में भी पड़ा विदर्भ मेें कांग्रेस के दिग्गज नेता सतीश चतुर्वेदी और अनीस अहमद तक धूल चाटने पर मजबूर हो गए। कमल नाथ समर्थक आज भी उनका उजला पक्ष रखने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

मुख्यमंत्री जी, पधारो सा

मुख्यमंत्री जी, पधारो सा

लिमटी खरे

राजस्थान में किसी अतिथि के आगमन पर पधारो सा कहकर उसका स्वागत किया जाता है। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बुधवार को सिवनी आए तो सिवनी के समस्त नागरिकों ने दिल से उन्हें पधारो सा कहकर ही उनका स्वागत किया होगा। पहली मर्तबा लगा कि सिवनी शहर वाकई में इतना खूबसूरत है। दलसागर के मुहाने पर न तो कोई वाहन ही नजर आ रहा था, और न तो बस स्टेंड सहित सडकों पर वाहनों की धमाचौकडी। जिला मुख्यालय निवासियों ने बुधवार को मुख्यमंत्री का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया होगा। मंगलवार की शाम को पूरे शहर में पालिका प्रशासन के सफाई कर्मियों ने बडी ही संजीदगी से शहर को साफ किया। सफाई कर्मचारियों की तादाद देखकर लगा कि वाकई पालिका के पास सफाई अमले में इतनी तादाद में कर्मचारी मौजूद हैं। आम दिनों में इन कर्मचारियों को इनके मूल काम से इतर अफसरान और पदाधिकारियों की सेवा टहल में लगाया जाता है, यह अलहदा बात है।
मंगलवार और बुधवार की दर्मयानी रात में प्रशासन ने जिस मुस्तैदी से शहर की हाल ही में बनी जजZर सडकों के बदनुमा दाग सरीखे गड्ढों को भरा उसे देखकर सभी का मन बरबस यही कह रहा होगा, माननीय मुख्यमंत्री जी सिवनी से आपका प्रेम इसी तरह बना रहे और आप बिना नागा जल्द जल्द सिवनी आया करें।
बुधवार को सिवनी शहर को देखकर यही लग रहा था कि वाकई हमारा अपना सिवनी शहर कितना खूबसूरत है। अगर यातायात बुधवार की तरह व्यवस्थित रहे, लोग पूरे ट्रेफिक सेंस के साथ सडकों पर चलें, गुजरे जमाने की खूबसूरती की मिसाल कहा जाने वाले दलसागर की मेड पर वाहन न धुल्ों न सुधरें, तो यहां से आने जाने वाले को दलसागर अस्सी के दशक की भांति ही लुभाने लगेगा।
यक्ष प्रÜान् यह है कि मुख्यमंत्री अपनी दूसरी पारी में तीसरी बार सिवनी आए और चले गए, सिवनी को क्या हासिल हुआर्षोर्षो मुख्यमंत्री की पूर्व की घोषणाएं क्या अमली जामा पहन सकींर्षोर्षो इस बार की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणाएं क्या परवान चढ सकेंगीर्षोर्षो शिवराज सिंह चौहान सरल, सोम्य और भोली छवि के धनी हैं। प्रदेश में उनके कार्यकाल में आरंभ की गई योजनाओं ने जन सामान्य म्ों उनके प्रशंसकों में इजाफा ही किया है। यह सच है कि शिवराज सिंह चौहान के नाम पर भीड जुटाना कोई कठिन काम नहीं है। सवाल यह है कि यहां कोई तमाशा नहीं हो रहा है कि भीड जुटाई जाए। वस्तुत: प्रदेश के निजाम से रियाया को बहुत उम्मीदें हुआ करती हैं, चुने हुए जनसेवकों का यह दाियत्व होता है कि वे उन्हें जनादेश देने वालों की भावनाओं की कद्र करते हुए निजाम से कुछ मांगें, वह भी पूरी ईमानदारी के साथ।
सिवनी की विधाियका एवं परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसभा की अंतिम सांसद श्रीमति नीता पटेरिया, आधे जिले के सांसद के.डी.देशमुख ने पहली बार मुख्यमंत्री से मुंह खोलकर कुछ मांगा, पर विडम्बना ही कही जाएगी कि मुख्यमंत्री ने इन दोनों ही जनसेवकों की बात पर ध्यान नहीं दिया।
संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री ने माध्यमिक शाला भवनों के निमाZण के लिए ढाई करोड रूपए, †ˆ‡ शाला भवनों में अतिरिक्त कक्ष निमाZण का आÜवासन, कस्तूरबा कन्या शाला के निमाZण के लिए ‡Š लाख, स्वाराजहाट बाजार के निमाZण के लिए डेढ करोड, आई टी आई के जीणोZद्Ëाार के लिए ˆŒ लाख, थोक सब्जी मण्डी के लिए ‡ करोड, नसि±ग कालेज के लिए ˆ करोड, दलसागर के सोंदयीZकरण के लिए एक करोड नौ लाख, नगर विकास के लिए पालिका को ‡Œ लाख, बरघाट और छपारा के लिए पेयजल व्यवस्था के लिए ƒ„ लाख रूपयों की घोषणा की गई है।
अब लाख टके का सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की इन घोषणाओं को अमली जामा कौन पहनाएगा। पालिका की राशि तो प्राप्त हो जाएगी, क्योंकि इसमें आसानी से बंदरबांट किया जा सकता है। शेष मदों में राशि लाना दुष्कर ही प्रतीत हो रहा है। मुख्यमंत्री की घोषणाओं को जिलाधिकारी के माध्यम से प्रदेश सरकार को प्रेषित करना होगा ताकि इन्हें आने वाले बजट में शामिल करवाया जा सके। यह कार्य काफी कठिन होता है, क्योंकि बजट शाखा में ब्ौठे हुए हैं काफी दिमाग वाले लोग। वे जानते हैं कि कितना राजस्व आ रहा है और कितना व्यय किया जाना है। अमूमन मुख्यमंत्री की घोषणाएं काफी महत्वपूर्ण होती है, अत: इन्हें बजट में स्थान दिया जाता है, किन्तु इसके लिए जनसेवकों को अपने निहित स्वार्थ छोडकर ईमानदार पहल करनी होती है।
चूंकि नगरीय निकायों के चुनाव आने वाले हैं, अत: मुख्यमंत्री द्वारा दनादन घोषणाएं किया जाना स्वाभाविक ही है, अब सारी जवाबदारी जनसेवकों के कांधों पर आ जाती है कि वे इसे मूर्त रूप में तब्दील करवाने के लिए एडी चोटी एक कर दें। यह अच्छा मौका है, जबकि मुख्यमंत्री ने सिवनी को सौगातें देने का वायदा किया है, अब देखना यह है कि जनप्रतिनिधि इसे कितना भुना पाते हैं।
हम तो यही कहना चाहेंगे कि अगली बार जब भी प्रदेश के निजाम सिवनी प्रवास पर आएं तो कुछ समय लेकर आएं और कार के बजाए रिक्शे पर सिवनी जिले की सडकों पर भ्रमण करें तभी उन्हें सिवनी शहर की जमीनी हकीकत का भान हो सकेगा कि प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर करों से लदी फदी जनता लाखों करोडों रूपए खचZ कर बनाई गई सडकों पर किस प्रकार सर्कस के बाजीगरों की तरह चलने पर मजबूर है।

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

कहां खो गया कांग्रेस का चाणक्य!


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

कहां खो गया कांग्रेस का चाणक्य!

एक समय था जब देश की राजनीति में कुंवर अर्जन सिंह को कांग्रेस की आधुनिक रजनीति का चाणक्य माना जाता था। देश में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल पाता था। खतो खिताब की राजनीति के जनक अर्जुन सिंह चाहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हों या पंजाब के राज्याल या फिर केंद्र में मंत्री कोई भी उनसे पंगा लेने का साहस नहीं कर पाता था। जब अजंZन सिंह केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए तो आज के सबसे ताकतवर राजनेता अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, अिम्बका सोनी, जनार्दन द्विवेदी, राजीव शुक्ला जैसे धुरंधर अर्जुन सिंह का कीर्तन कर उनके नाम की माला जपते नहीं थकते थे। आज उनके पोषकों ने ही उन्हें राजनैतिक बियाबान से उठाकर किनारे करने में कसर नहीं रख छोड़ी है। अर्जुन सिंह के लगाए पौधे आज बट वृक्ष बन चुके हैं, विडम्बना यह है कि ये सारे बट वृक्ष आज सूरज का प्रकाश अर्जुन सिंह तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं। यही कारण है कि सूरज की रोशनी के अभाव में पिछले कुछ माहों से अर्जुन सिंह का वृक्ष पूरी तरह कुम्हला गया है।



शस्त्रों से खेलते सरकारी परिवार

मध्य प्रदेश में आजकल काफी उथल पुथल मची हुई है। इसका कारण सरकारी अस्त्रों के साथ सरकारी तंत्र में शामिल नुमाईंदों के परिवारों द्वारा खिलवाड़ किया जाना है। कुछ दिनों पूर्व पुलिस अधीक्षक जयदीप प्रसाद के नाबालिग पुत्र द्वारा सरकारी बंदूक एके 47 से हवाई फायर किया था। इसके बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उनकी पित्न साधना एवं पुत्र के हाथों में सरकारी बंदूकों के छाया चित्र विवाद को जन्म दे रहे हैं। इस दौरान शिवराज ने हवाई फायर भी किया था। एक तरफ तो केंद्र सरकार द्वारा एके 47 जैसी बंदूकों की गोलियों की कमी के चलते इसमें किफायत की सलाह दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य में एसपी के नाबालिक बेटे द्वारा सरेआम बिना लाईसेंस इससे गोली दागी जा रही है। कहने को तो महज छ: इंच के चाकू रखने पर आपके खिलाफ पुलिस आर्मस एक्ट के तहत मामला पंजीबद्ध कर सकती है, किन्तु ``समरथ को नही दोष गोसाईं``। इसके पहले भी भोपाल की एक समाज सेवी आरती भदोरिया के जन्म दिवस पर उनके अंगरक्षक द्वारा किए गए हवाई फायर के उपरांत पुलिस ने उस पर बाकायदा मुकदमा दायर किया था।



केबनेट बंक करने पर आमदा मंत्री

कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी को राजनीति की क्लास से बंक करने में आनंद आता है तो उनके मंत्री भला उनके पदचिन्हों पर क्यों न चलें। इस गुरूवार को प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने मंत्रीमण्डल समिति की बैठक (केबनेट) आहूत की, जिसमें आधे से अधिक मंत्री गायब रहे। तीन सूबों में विधानसभा चुनाव होने हैं, किन्तु कांग्रेस का सबसे अधिक ध्यान महाराष्ट्र पर ही नजर आ रहा है। अधिकतर मंत्री महाराष्ट्र में ही डेरा डाले हुए हैं। कृषि मंत्री शरद पंवार, नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल, उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे, भारी उद्योग मंत्री विलास राव देशमुख, पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा, पीएमओ में राज्य मंत्री पृथ्वीराज चौहान, सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक, दूरसंचार मंत्री गुरूदास कामत, सामाजिक न्याय राज्य मंत्री प्रतीक पटेल इस केबनेट से गायब रहे। चर्चा है कि इन मंत्रियों के दिल्ली से बाहर रहने और मंत्रालयों के कामकाज पर ध्यान न देने से मंत्रालयों के कामकाज पर जबर्दस्त असर पड़ रहा है। सूबों में कांग्रेस की सरकार बने न बने यह तय है कि इन मंत्रियों के इस तरह के रवैए से देश विकास के मार्ग पर मंथर गति से ही चल पाएगा।



मुसलमीनों से युवराज को परहेज

कांग्रेस के युवराज और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के राजनैतिक प्रबंधकों ने भले ही दलितों के घर युवराज को रात रूकवाकर मीडिया की सुर्खियों में ला दिया हो किन्तु हाल ही में आल इंडिया यूनाईटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.एम.ए.सिद्दकी ने राहुल गांधी को दलित मुसलमानों के घर रात गुजारने का मशविरा देकर नई बहस को जन्म दे दिया है। इतिहास गवाह है साल दर साल कांग्रेस का एक बड़ा वोट बैंक रहा है मुसलमीन (मुसलमानों के लिए एक पीर द्वारा उपयोग किया जाने वाला शब्द)। पिछले दो दशकों से मुसलमानों का कांग्रे्रस से मोहभंग होता जा रहा है, यह बात भी सच ही है। क्षेत्रीय दलों ने इस बड़े वोट बैंक में सेंध लगाकर कांग्रेस को जबर्दस्त झटका भी दिया है। यह बात भी साफ हो गई है कि राहुल गांधी मुसलमानों के घरों पर रूकने से परहेज ही कर रहे हैं। अब राहुल के प्रतिद्वंदी इस बात को हवा देने में लग गए हैं। एआईसीसी में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार राहुल को दलित गरीब मुसलमान के घर पर रूककर उसकी उजड़ी रसोई के दीदार भी करें, कि आधी सदी से ज्यादा देश पर शासन करने वाली कांग्रेस ने देश के गरीबों को क्या दिया है। चूंकि अमीर सांसदों, उद्योगपतियों के घरों पर होने वाली नौ लखा दावतों का लुत्फ तो काफी हद तक उठा चुके हैं, राहुल। अब उन्हें दलित मुसलमानों से परहेज नहीं करना चाहिए।



शोरी की मुश्कें कसने को बेताब हैं राजनाथ

एक समय में बोफोर्स के नाम पर पत्रकारिता के आकाश में पहुंचने वाले अरूण शोरी के मन में अब वही पत्रकार वाला कीड़ा कुलबुलाता दिख रहा है। यही कारण है कि वे अब पार्टी लाईन से हटकर पार्टी के बारे में अपने विचार खुलकर व्यक्त करने लगे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक निजी समाचार चेनल को दिए साक्षात्कार में पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह को ``हंप्टी डंप्टी`` कहकर सभी को चौंका दिया था। अरूण शोरी के साहस को देखकर चंदन मित्रा ने भी ताल ठोंकनी आरंभ कर दी है। पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह इससे खासे परेशान बताए जा रहे हैं। राजनाथ के सलाहकारों ने उन्हें मशविरा दिया कि वे पार्टी के मुखपत्र ``कमल संदेश`` के माध्यम से शोरी और मित्रा को साईज में लाएं। कमल संदेश के पिछले अंक में संपादकीय काफी करारी लिखी गई है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि कुछ पत्रकार एसे भी हैं जो भाजपा को चलाना चाहते हैं, यह बात तो समझ में आती है कि बतोर पत्रकार आप सलाह दें, किन्तु यह संभव नहीं है कि आपकी सलाह पर ही भाजपा चले। एक नहीं अनेकों नसीहतें दी गई हैं, पत्रकार से नेता बने भाजपाईयों को। राजनाथ के कड़े तेवर देखकर अभी तो शोरी और मित्रा खामोश हैं, पर आने वाले समय में क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता है।



ठेके पर स्कूल

एक ओर केंद्र और राज्यों की सरकारें नौनिहालों को शिक्षित करने के लिए एडी चोटी एक करने का प्रयास कर रहीं है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत देखकर लगने लगा है कि केंद्र और सूबे की सरकारें सरकारी धन को आग लगाने की नौटंकी से अधिक कुछ नहीं कर रही हैं। मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले के पुनावा ब्लाक की सुरगांव बंजारी प्राथमिक शाला में एक प्राचार्य ने अपना पद ही ठेके पर दे दिया। इस गांव में प्राचार्य हमेशा ही नदारत रहा करते थे। उन्होंने अपनी कुर्सी संभालने की जवाबदारी एक चरवाहे को दे दी थी। शाला के प्राचार्य ने बकायदा कुछ राशि माहवार तय कर उस चरवाहे को अपनी कुर्सी पर बिठा दिया था। मजे और आश्चर्य की बात तो यह रही कि शाला के शिक्षक और अन्य कर्मचारी उस चरवाहे के आदेश का उसी तरह पालन करते थे जैसे कि वे प्राचार्य के आदेशों का पालन करते हों। यह सारी बातें मनगढंत कहानी नहीं बल्कि शिक्षा विभाग के एक जांच दल को मिली शिकायत के बाद हुई जांच में सामने आई हकीकत है। बाद में उस प्राचार्य को निलंबित कर दिया गया। देश भर में ग्रामीण अंचलों में न जाने कितने चरवाहे, दूधवाले, खोमचेवाले शालाओं की कमान संभाले होंगे इसका अंदाजा लगाना मुश्किल ही है।



सोनिया का उपहास उड़ातीं शीला

मितव्ययता का संदेश देकर कम से कम कांग्रेस के लोगों को सुधारने के सोनिया गांधी की चीत्कार की गूंज दिल्ली सूबे में ही नहीं पहुंच पा रही है तो शेष भारत के कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की कौन कहे। दिल्ली में तीसरी बार काबिज हुईं श्रीमति शीला दीक्षित के मातहत ही सोनिया की अपील और दिशा निर्देशों का खुले आम माखौल उड़ा रहे हैं। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष योगानंद शास्त्री और विधानसभा सचिव सिद्धार्थ राव एक सप्ताह के लिए तंजानिया उड़ गए। इन दोनों की इस यात्रा पर ज्यादा नहीं महज 14 लाख रूपए खर्च होंगे। इतना ही नहीं दिल्ली सरकार के दो मंत्रियों की सत्य सदन स्थित कोठियों को ``रहने लायक`` बनाने के लिए भी ज्यादा नहीं महज पचास लाख रूपए ही खर्च किए जा रहे हैं। उद्योग मंत्री मंगतराम सिंघल के सरकारी आवास की फ्लोरिंग के लिए भी महज 15 लाख रूपयों की दरकार है। स्वास्थ्य मंत्री किरण वालिया की कोठी को चकाचक करने के लिए भी बस 25 लाख रूपए ही खर्च होना प्रस्तावित बताया जा रहा है। एसा नहीं कि राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की मितव्ययता की अपील का इन मंत्रियों पर कोई असर नहीं हुआ हो। सभी विधायकों ने अपने अपने वेतन का 20 फीसदी कटवाना आरंभ कर दिया है, किन्तु बंग्लों के मामले में उनकी राय सोनिया से जुदा ही नजर आ रही है।



भूख से मरती युवराज की रियाया

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी देश भर में घूम घूम कर भारत की खोज में लगे हुए हैं, वहीं उनके संसदीय क्षेत्र में लोग भूख से मर रहे हैं। बहुत पहले एक लघु कथा को कवि सम्मेलनों में सुनाया जाता था कि एक व्यक्ति बहुत ही बड़बोला था, कभी जर्मनी तो कभी अमेरिका की बातें कर वहां के मंत्रियों प्रधानमंत्री आदि के बारे में लोगों से पूछकर उन्हें शर्मसार किया करता था। अंत में वह कहता कि कभी बाहर घूमो तो जानो। एक शरारती बच्चे ने उससे ही उल्टे पूछ लिया ``राम लाल को जानते हो``। उसने इंकार से सर हिलाया तब वह बच्चा बोला ``कभी घर में भी रहो तो जानो``। इसी तर्ज पर राहुल गांधी देश भर की चिंता कर रहे हैं, पर अमेठी में हुई दलित नंदलाल की मौत के बारे में खामोशी की चादर आढे हुए हैं। अमेठी दौरे पर गए राहुल से उसने मदद की गुहार भी लगाई थी, किन्तु उसे आश्वासन के अलावा और कुछ नहीं मिला, मिलता भी कैसेर्षोर्षो राहुल को देश भर की जो फिकर सता रही है, सो घर की चिंता कौन करे



घर से बाहर निकलने से कतराती तीरथ

देश की आधी से अधिक आबादी के हितों और विकास के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार का महिला विकास मंत्रालय की महती जवाबदारी संभालने वाली संसद सदस्य कृष्णा तीरथ को अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर निकलने की फुर्सत ही नहीं मिल पा रही है। कितने आश्चर्य की बात है कि तीरथ दिल्ली में घर बैठे बैठे ही पचास करोड़ से अधिक की आबादी की चिंता कर रही हैं, यहीं बैठकर वे ढेर सारी योजनाओं को अमली जामा भी पहनाने से नहीं चूक रही हैं। केंद्र सरकार के सौ दिनी एजेंडे को पलीता लग गया। सरकार के गठन के पांच माह बाद भी तीरथ ने देश के अन्य हिस्सों में जाने की जहमत ही नहीं उठाई है। लगता है कि महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कृष्णा तीरथ द्वारा गणेश परिक्रमा के महत्व को समझ लिया है। यही कारण है कि उनके लिए समूचा देश सिमटकर 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) और 12 तुगलक लेन (राहुल गांधी का सरकारी आवास) में आ बसा है।



राजेंद्र शायद ही भुना पाएं विरासत

देश की पहली नागरिक महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पुत्र राजेंद्र सिंह शेखावत के लिए अमरावती विधानसभा का चुनाव काफी मंहगा साबित होता नजर आ रहा है। एक ओर उन्हेें माता जी की विरासत को बचाए रखना है, वहीं दूसरी ओर दो बार के विधायक रहे सुनील देशमुख निर्दलीय तौर पर उनके लिए परेशानी का सबब बन चुके हैं। कांग्रेस ने भले ही राजेंद्र बाबू को टिकिट दे दी हो पर कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के तरकश से निकले जहर बुझे तीरों से बच पाना उनके लिए मुश्किल ही दिख रहा है। आलम यह है कि प्रदेश कांग्रेस अमरावती से दूर ही दूर नजर आ रही है। सुनील देशमुख सरेआम यह कहते घूम रहे हैं कि राजेंद्र शेखावत को टिकिट उनकी माता प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने दिलवाई है। वहीं राजेंद्र शेखावत का कहना है कि उन्हें टिकिट उनकी मां ने नहीं वरन कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने खुद ही दी है। प्रतिभा पाटिल महामहिम हैं, उनके नाम का उपयोग बहुत ही संभलकर करना होगा राजेंद्र शेखावत को, वरना प्रोटोकाल टूटते ही राजेंद्र बाबू को लेने के देने न पड़ जाएं।



प्रफुल्ल पटेल का बदला जा सकता है मंत्रालय

नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को जल्द ही इस महकमे से मुक्त कर नई जवाबदारी दी जा सकती है। महाराष्ट्र के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री अपने पत्ते फेंट सकते हैं। वैसे भी शशि थुरूर, एम.एस.कृष्णा, ममता बेनर्जी पहले से ही उनकी नापसंदगी वाली सूची में शामिल हो चुके हैं, अब पटेल की कार्यप्रणाली से उन पर गाज गिरने की संभावनाएं बढ़ती दिख रही है। पहले जेट फिर एयर इंडिया की हड़ताल से पीएमओ नाखुश ही है। बताते हैं कि पीएम का मानना है कि पायलट हडताल को पटेल ने ठीक तरीके से ``हेंडल`` नहीं किया वरना हालात कुछ ओर होते। प्रधानमंत्री आवास के सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रफुल्ल पटेल को साफ शब्दों में चेतावनी दे दी है कि वे अपना रवैया बदल दें वरना महाराष्ट्र चुनाव के बाद उनका मंत्रालय ही बदल दिया जाएगा। उधर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों ने कहा कि महाराष्ट्र चुनावों के नतीजों के बाद अगर वहां राकांपा की स्थिति कमजोर रही तो हो सकता है कि पटेल को महत्वहीन मंत्रालय ही थमा दिया जाए।



पुच्छल तारा

देश का कोई भी कोना एसा नहीं होगा जहां आप भिखारियो से रूबरू न होएं। अक्सर हम सिनेमा में यही देखते हैं जिसमें कोई भी पात्र यही कहता है कि गरीबी से बड़ा जुर्म और कोई नहीं है। क्या गरीबी जुर्म हैर्षोर्षो इस बारे में एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की गई है। इस याचिका में बाम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट को भी चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि गरीबी कोई जुर्म नहीं है और अगर कोई गरीबी के कारण भीख मांगता है तो उसे क्राईम नहीं करार दिया जाना चाहिए, और इस आधार पर उसे गिरफ्तार कर सजा नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस याचिका पर सरकार से पूछा है कि क्या भीख मांगना क्राईम है