सोमवार, 14 दिसंबर 2009

पायलट युवराज की बढती मुसीबतें

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
पायलट युवराज की बढती मुसीबतें
कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी आए दिन सुर्खियों में बने हुए हैं, कभी वे शताब्दी की पूरी की पूरी बोगी बुक कराकर मितव्ययता का पाठ पढाने के लिए चर्चित रहे तो कभी अपनी कोलंबियाई गर्ल फ्रेंड के चक्कर में। हाल ही में यूपी के सीतापुर में अंधेरे में हेलीकाप्टर उतरवाने के मामले में अब वे विवादों में घिर गए हैं। मामला चूंकि भविष्य के प्रधानमंत्री का था और केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार है सो पवनहंस कंपनी ने अपने पायलट को बाहर का रास्ता दिखा दिया। राहुल गांधी के अनुसार अपने पिता पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी की तरह वे खुद एक कर्मशियल पायलट हैं (यह बात बहुत कम ही लोग जानते होंगे), और वे भला गलत काम करने पायलट पर अनैतिक दबाव क्यों डालेंगे। जिलाधिकारी संजीव कुमार ने अपने प्रतिवेदन में साफ कहा है कि सूर्यास्त 5 बजकर 13 मिनिट पर हुआ और युवराज का चौपर उतरा 5 बजकर 30 मिनिट पर। संजीव कुमार कहते हैं कि युवराज का हेलीकाप्टर निर्धारित एच मार्क के बगल में उतारा गया। अब जनता या तो संजीव कुमार की बात को सही माने या फिर राहुल गांधी की बात को, पर जनता को जवाब तो इस बात का चाहिए कि राहुल गांधी के अनुसार अगर सब कुछ सही था तो फिर पवन हंस कंपनी ने आखिर किस जुर्म में अपने पायलट को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
मितव्ययता का पाठ नहीं सीखे मंत्री
कांग्रेसनीत संप्रग सरकार में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी भले ही फिजूलखर्जी रोकने के लिए तरह तरह के प्रहसनों को अंजाम दें किन्तु उनकी सरकार के बेलगाम मंत्रियों को इससे कुछ लेना देना नहीं है। विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा और शशि थुरूर के बाद अब त्रणमूल कांग्रेस के एक मंत्री 37 लाख रूपए की होटल बिल अदायगी को लेकर चर्चित हो गए हैं। ममता बनर्जी के कोटे से पहली बार संसद सदस्य बने पर्यटन राज्यमंत्री सुल्तान अहमद ने एक पांच सितारा होटल को आशियाना बना रखा था, उन्हें होटल का 37 लाख रूपए का बिल अदा करना है। मंत्री बनने के पूर्व में आईटीडीसी के सम्राट होटल में ठहरे थे, एवं मंत्री बनते ही वे होटल अशोका के मेहमान बन गए। इतना ही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ कबीना मंत्री कमल नाथ ने हाल ही में मध्य प्रदेश की अनेक यात्राएं की हैं। ये यात्राएं स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर ज्यादा सरकारी कम प्रतीत हुईं। इन यात्राओं में उन्होने नियमित विमान सेवा के इकानामी क्लास को मात देते हुए चार्टर्ड प्लेन और चार्टर्ड हेलीकाप्टर का प्रयोग किया। यह है केंद्र सरकार के मंत्रियों की न दिखने वाली मितव्ययता।
भ्रष्टाचार में हाईकोर्ट को लेना पडा संज्ञान
मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार भ्रष्टाचारियों को किस कदर संरक्षण दे रही है, इसका जीता जागता उदहारण हाल ही में देखने को मिला। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका क्रमांक 5414/2009 में हाई कोर्ट ने कडा रूख अिख्तयार किया है। दरअसल मामला प्रदेश की सिवनी नगर पालिका में हुए जबर्दस्त भ्रष्टाचार का है। सडकों का निर्माण या तो घटिया हुआ या हुआ ही नहीं और भुगतान कर दिया गया पूरा का पूरा। बताते हैं कि इस मामले की शिकायत कई बार राज्य शासन से किए जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई। होती भी कैसे, प्रदेश में भाजपा सरकार और पालिका भी भाजपा की। जनहित याचिका पर गौर करके न्यायालय को ही संज्ञान लेना पडा। कहा जा रहा है कि न्यायालय ने जिला कलेक्टर को निर्देशित किया है कि इस प्रकरण में किसी अन्य अधिकारी को प्रकरण का ऑफीसर इंचार्ज नियुक्त न कर स्वयं ही व्यक्तिगत तौर पर अपना शपथ पत्र प्रस्तुत करें। वैसे प्रदेश की भाजपा शासित नगर पालिकाएं आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं, जिन पर नकेल कसना राज्य सरकार के बस के बाहर की ही बात प्रतीत हो रही है। इस अकेले प्रकरण में ही लगभग डेढ करोड रूपए की राशि बिना डकार लिए हजम कर ली गई है। कहा जा रहा है कि अगर पार्षद और अध्यक्ष की मिलीभगत से चलने वाली पलिका के पांच साल के काम की जांच करवाई जाए तो भ्रष्टाचार की रकम अरब तक पहुंच सकती है।
यह है चाचा नेहरू का हिन्दुस्तान
देश के पहले प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू को दो चीजों से बेहद लगाव था एक गुलाब का फूल तो दूसरा बच्चे। नेहरू गांधी परिवार की छटवीं पीढी की बहू सोनिया गांधी के इशारे पर पिछले लगभग छ: सालों से चल रही कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के राज में चाचा नेहरू के हिन्दुस्तान की भयावह तस्वीर सामने आ रही है, वह भी बच्चों के मामलों में। देश के स्वास्थ्य मंत्री भले ही स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के दावे प्रतिदावे करें, किन्तु जमीनी हकीकत इससे बहुत उलट ही है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद द्वारा लोकसभा के पटल पर रखी जानकारी इस हकीकत को बयां कर रही है। बाल मृत्यु दर के मामले में भारत अभी भी बहुत ही पीछे खडा नजर आ रहा है। 2007 में यह दर 55 तो 2008 में 53 थी। जिन देशों में मृत्युदर कम है, उनसे हिन्दुस्तान 143 नंबर पिछड चुका है। शायद भविष्यदृष्टा पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कभी एसा नहीं सोचा होगा कि उनके नवासे की दुल्हन के इशारों पर चलने वाली सरकार के राज में उनके प्यारे बच्चों की इस कदर दुर्गत होने वाली है।
आतंकी हैं या नक्सली
देश की आंतरिक सुरक्षा को सेंध लगाने का काम नक्सलवादी और आतंकवादी दोनों ही कर रहे हैं। केंद्र का मानना है कि नक्सलवादियों और आतंकवादियों में कोई अंतर नहीं है। देश के दोनों ही दुश्मनों को विदेशों से धन मिल रहा है। केंद्रीय गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्लई ने कहा है कि नक्सलवादियों को चीन से हथियार और धन मिल रहा है। आतंकवादी विदेश से इमदाद लाकर हिन्दुस्तान में तबाही बरपाते हैं तो नक्सलवादी आंतरिक व्यवस्थाओं को सुधारने के नाम पर जेहाद छेडे हुए हैं। केंद्रीय गृह सचिव ने कहा है तो निश्चित तौर पर उन्हें इस बारे में खुफिया सूत्रों ने ही पुख्ता जानकारी दी होगी। पिल्लई साहेब यह भूल रहे हैं कि देश में बाहरी और आंतरिक सुरक्षा की जवाबदारी उन्ही के महकमे की है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पिल्लई साहेब का मंत्रालय बजाए इस तरह के नापाक इरादों के साथ हिन्दुस्तान आने वाली विदेशी मदद को रोकने के बावजूद वह आ चुकी है का प्रोपोगंडा कर रहे हैं।
स्वाईन फ्लू ने ढहाया कालीन उद्योग
हिन्दुस्तान में स्वाईन फ्लू फिर से कहर बरपाने लगा है। मेिक्सको से आयतित इस महामारी ने भारत में अपना घर बना लिया है। अब विदेशों से आने वालों की जांच का ओचित्य इसलिए नहीं रह गया है, क्योंकि इसके वायरस अब भारत की सरजमीं पर बुरी तरह फैल चुके हैं। एक के बाद एक तबाही मचाने के बाद अब कालीन उद्योग पर इसकी नजरें इनायत होती दिख रहीं हैं। देश में बनने वाले बेहतरीन कालीनों के उन आर्डर को निरस्त किया जा रहा है, जो पहले से दिए गए थे। भारतीय कालीन उद्योग के निर्माता हैरान परेशान हैं कि आर्डर मिलने पर उन्होंने माल तो तैयार करवा लिया पर अब आर्डर निरस्त होने पर वे इन्हें किसके मत्थे मढें। अमेरिका और यूरोप के खरीददारोें से जब भी कालीन निर्माता माल भेजने की बात करते हैं तो वे हिन्दुस्तान में स्वाईन फ्लू के बारे में मालुमात करने लग जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार अब तक भारत के कालीन उद्योग जगत में लगभग 75 करोड रूपए का माल डंप हो चुका है। आर्थिक मंदी का शिकार भारत अब स्वाईन फ्लू जैसी महामारी के चलते एक बार फिर बैठने की स्थिति में आ गया है।
महारानी प्रकरण की सौगात मिलेगी नए अध्यक्ष को
राजस्थान की बलशाली महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया ने आखिर जता ही दिया कि वे कितनी अधिक ताकतवर हैं। शीर्ष नेतृत्व के बार बार कहने के बावजूद भी उन्होंने राज्य के नेता प्रतिपक्ष के पद से अपना त्यागपत्र नहीं सौंपा है। वर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह के गले की फांस बना रहा यशोधरा प्रकरण उन्होंने सुलझाने का प्रयास नहीं किया अलबत्ता इसे आने वाले अध्यक्ष के लिए पहले और सबसे बडे सरदर्द के तौर पर उन्हें देने के मार्ग ही प्रशस्त किए हैं। गौरतलब होगा कि राजनाथ सिंह का कार्यकाल इस माह ही समाप्त हो रहा है। पिछले छ: माह से भाजपा नेतृत्व के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया वसुंधरा का त्यागपत्र लेने में राजनाथ कामयाब नहीं हो सके हैं। उनके कार्यकाल का यह काला अध्याय ही माना जाएगा। दरअसल संघ के इशारों की कठपुतली बन चुकी भाजपा में संघ के आला नेताओं के गुटों के प्रश्रय प्राप्त नेता भाजपा की फजीहत करने पर तुले हुए हैं और संघ नेतृत्व धृतराष्ट्र की भूमिका में चुप्पी साधे बैठा है।
गफलत में है नंबर पोटेZबिलिटी
टेलीकाम रेगुलेटरी अथारिटी (ट्राई) ने भले ही मोबाईल उपभोक्ताओं को मनचाहे सेवा प्रदाता को चुनने की सुविधा देते हुए इसे 31 दिसंबर से लागू करने के आदेश दे दिए हों पर जमीनी हकीकत देखकर लगने लगा है कि इस साल के आखिरी दिन से इसे आरंभ किया जाना सशंकित ही है। बताते हैं कि सेवा प्रदाता कंपनियों ने इस मसले में चर्चा के लिए समय चाहा है। अब जब कंपनियां ही बातचीत के लिए समय मांग रहीं हैं तब 31 दिसंबर से यह अस्तित्व में कैसे आ सकती है। मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों का कहना है कि उनके पास अभी इस मामले में आधारभूत संरचना ही नहीं हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर खडा करने में उन्हें कम से कम छ: माह के समय की दरकार है। कंपनियां पशोपेश में हैं कि अगर 31 दिसंबर से इसे बलात लागू करवा दिया गया तो उनकी शामत आ जाएगी। कुछ उपभोक्ता शौकिया तौर पर यहां से वहां विचरण करें तो कुछ नेटवर्क की शिकायत से निजात पाने के लिए। साथ ही इसका शुल्क इतना कम है कि कोई भी इसे आप्ट कर सकता है। इसमें उपभोक्ता को कारण बताने की जरूरत भी नहीं है कि वह अपने सेवा प्रदाता को क्यों छोड रहा है।
मतलब इसलिए गायब रहे शाटगन
``जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं. . . `` जैसे रोबदार डायलग बोलने वाले शाटगन यानी शत्रुघ्न सिन्हा इस बार संसद में नजर नहीं आए। यह बात किसी मीडिया के जेहन में नहीं आई और सुखीZ भी नहीं बन पाई। हो सकता है संसद को कव्हर करने वाले रिपोर्टर्स ने इस छोटी सी बात पर ध्यान देना उचित न समझा हो, किन्तु शाटगन आखिर क्यों गायब रहे इसके पीछे गहरा राज छिपा हुआ है। दरअसल पांच साल के लंबे अंतराल के बाद शाटगन एक बार फिर रूपहले पर्दे पर दस्तक दे रहे हैं। हिन्दी, तमिल और तेलगू में बनने वाली एक फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा स्व.एन.टी.रामाराव का किरदार निभाने वाले हैं। इसके लिए उन्हें अपने रोबदार मूंछों को कटवाना पडा। अब समस्या यह थी कि मुंछकटे शत्रुघ्न सिन्हा अगर संसद में जाते तो उनके साथ वालों के बीच वे कुछ क्षण के लिए ही सही उपहास का विषय बन जाते। फिल्मों में तो नकली दाढी मूंछ लगाकर काम किया जा सकता है, निकल जाने पर रीटेक भी हो सकता है, पर असल जिंदगी में एसा रिस्क तो लिया नहीं जा सकता न।
फिर फिजूलखर्ची का रास्ता खोजा माया मेम साहिब ने
यूपी की निजाम मायावती बार बार जनता के गाढे पसीने की कमाई को पानी में बहाने के रास्ते खोजती रहतीं हैं। एक के बाद एक आईडियों से साफ तौर पर लगने लगा है कि मायावती ने बाकायदा पैसे की बरबादी कैसे की जाए इसके लिए अनवरत शोध करवाया है। यूपी सरकार के सूत्र कहते हैं कि आतंकी खतरों को देखते हुए मायावती का 5 कालीदास मार्ग का सरकारी निवास और बहुजन समाज पार्टी का कार्यालय दोनों ही बुलट प्रूफ बनाने का संकल्प लिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के निर्माण विभाग ने इसके लिए पंजाब के मोहाली के भारिज फैब्रिकेटर्स कंपनी के साथ करार भी कर लिया है। चूंकि वे घर के अलावा बसपा के कार्यालय में अक्सर आती जाती रहतीं हैं, इसलिए दोनों ही जगहों को बुलेट पू्रफ करना जरूरी है। चौंकिए मत इस कार्य में महज चार करोड पचास लाख रूपए ही खर्च होंगे।
नर्क से बदतर है लालू की साईड अपर बर्थ
भले ही वर्तमान रेल मंत्री ममता बनर्जी द्वारा स्वयंभू मेनेजमेंट गुरू एवं पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को उनकी औकात दिखाने की उधेडबुन में लगी हों पर आज भी रेल यात्री नारकीय यात्रा करने पर मजबूर हैं। रेल के शयनायन में 72 के बजाए 81 और 84 यात्री बिठाकर ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में लालू यादव ने साईड बर्थ में दो के स्थान पर तीन बर्थ करवा दी गईं थीं। इनमें साईड अपर बर्थ में लेटना यात्री के लिए बहुत ही कष्टकारी साबित होता था, सो फिर वापस 72 बर्थ ही रहने के आदेश जारी हो गए। विडम्बना तो यह है कि आदेश तो जारी हो गए पर साईड अपर बर्थ को नीचे नहीं खिसकाया गया, परिणामस्वरूप आज भी उपर लेटकर जाने वाले के प्राण ही निकल जाते हैं। इस आदेश को जारी हुए साल भर से अधिक समय बीत चुका है पर रेल्वे के डिब्बों में साईड अपर में यात्रा करना नरक से भी बदतर माना जा रहा है।
काले झंडे दिखाने के बीस साल बाद गया पार्षद जेल!
बीस साल का समय कम नहीं होता। बीस साल में एक नौजवान वोट देने के लायक हो जाता है। मध्य प्रदेश के भोपाल में तत्कालीन मंत्री एच.के.एल.भगत को काले झंडे दिखाने के आरोप में बीस साल बाद न्यायालय ने सजा सुनाई है। एक तरफ लगभग तीन करोड मुकदमों को निपटाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पंद्रह हजार न्यायधीशों को ठेके पर रखने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर एक मामले में बीस साल बाद सजा। 1989 में भाजपा के एक पार्षद पुष्पेंद्र जैन ने कांग्रेस के मंत्री एच.के.एल.भगत को भोपाल में यात्रा के दौरान काले झंडे दिखाए थे। न्यायालय ने पुष्पेंद्र के खिलाफ लंबित गिरफ्तारी वारंट खारिज करते हुए उसे जेल भेजने के आदेश दे दिए है। यह मामला 1989 से न्यायालय में लंबित है।
मितव्ययता का अनूठा उदहारण पेश करते शिवराज
समस्याओं से घिरे देश के हृदय प्रदेश पर गरीब होने के लाख आरोप लगें पर शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा मितव्ययता का एसा उदहारण पेश किया जा रहा है जिसे देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि मध्य प्रदेश गरीब गुरबों का प्रदेश है। मंदी की मार झेल रहे भारत के एमपी सूबे में जुलाई 2009 से अक्टूबर 2009 तक मंत्रियों ने हवाई यात्रा में जनता के गाढे पसीने की कमाई का महज 57 लाख 72 हजार रूपए ही उडाया है। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने 26 दिन हवाई तो 16 दिन हेलीकाप्टर में यात्रा की। इसके अलावा कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, गोरी शंकर बिसेन, अनूप मिश्रा, राजेंद्र शुक्ल, के.एल.अग्रवाल, तुकोजीराव पवार आदि ने हवाई यात्राओं में तबियत से जनता के माल को हवा में उडा दिया। इस तरह भाजपा की युवा पीढी के लिए आदर्श माने जाने वाले यशस्वी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में गरीब गुरबों का रखा जा रहा है ध्यान।
पुच्छल तारा
मुंबई से फारिया खान ने एक ईमेल भेजा है, जिसके अनुसार झंडू बाम और देश के प्रधानमंत्री डॉ.मन मोहन सिंह में क्या अंतर है। जवाब साफ है कि एक ``सरदार`` है तो दूसरा ``असरदार``।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

नए राज्यों के बहाने सियातस


नए राज्यों के बहाने सियातस
जनसेवकों द्वारा क्षेत्रवाद, भाषावाद को बढावा देने की कोशिश
(लिमटी खरे)

पृथक तेलंगाना के बाद अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर गडाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने तेलंगाना की ही तर्ज पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखण्ड को भी अगल राज्य बनाने की सिफारिश कर अलग राज्यों को बनाने के वातावरण प्रशस्त कर दिए हैं। उधर गोरखालेण्ड और विदर्भ के साथ ही साथ अब महाकौशल प्रांत बनाने की मांग भी जोर पकडने लगी है।
देखा जाए तो 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य में गणतंत्र की स्थापना की गई थी। भारत एक एसा देश है जहां संघीय कानूनों के अलावा राज्यों के अपने कानून भी अस्तित्व में हैं। देश के प्रत्येक भाग को विकसित और रियाया को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की गरज से यहां राज्यों का गठन या पुर्नगठन सामान्य प्रक्रिया है। इसी साल जून माह में केंद्र सरकार को देश के टीआरएस, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सहित विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से दस नए राज्यों के गठन के प्रस्ताव मिले थे, जिन्हें विचार हेतु सरकार ने स्वीकार कर लिया था।
गौरतलब होगा कि इससे पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने 2001 में तीन नए राज्यों का गठन किया था। जिनमें मध्य प्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ, उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड और बिहार से झारखण्ड की संरचना की थी। केंद्र को मिले प्रस्ताव में गुजरात से सौराष्ट्र, कर्नाटक से कोर्ग, बिहार से मिथिलांचल, आंध्र से तेलंगना, दार्जलिंग से गोरखालेण्ड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों से बुंदेलखण्ड, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों से विदर्भ के जन्म की बात कही गई है।
संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार संसद को यह अधिकार है कि वह किसी भी राज्य के क्षेत्रफल को कम या ज्यादा कर सकता है, उनके नाम में परिवर्तन कर सकता है। वह इस मसले में संबंधित राज्य से रायशुमारी कर सकता है, पर राय मानने के लिए वह बाध्य नहीं है।
जमीनी जरूरतों और दुश्वारियों को ध्यान में रख भारत गणराज्य के मानचित्र में राज्यों के नक्शों में फेरबदल का लंबा इतिहास है। ज्ञातव्य है कि सबसे पहले 1 अक्टूबर 1953 को प्रभावी भाषाई आंदोलन के चलते आंध्र प्रदेश अस्तित्व में आया था। इसके उपरांत दिसंबर 1953 में के.एम.पणिकर, सैयद फैजल अली और हृदयनाथ कुंजरू को जोडकर तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया गया था, जिसकी अनुशंसा पर व्यापक फेरबदल किए गए थे। इस व्यवस्था के तहत दो तरह के राज्य अस्तित्व में आए, एक पूर्ण राज्य दूसरे केंद्र शासित प्रदेश।
1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने पंजाब को तीन तो असम को सात राज्यों में विभाजित कर दिया था। इंदिरा गांधी ने यह प्रयोग काफी विचार विमर्श के उपरांत किया था, उन्हें डर था कि भाषाई, संस्कृति, बोलचाल के आधार पर अगर राज्यों का गठन किया गया तो संघीय ढांचा कहीं डगमगा न जाए, किन्तु उनका प्रयोग सफल रहा था।
अमूमन राज्यों के क्षेत्रफल को कम करने से आम जनता को ही राहत मिलती है, किन्तु अगर यह काम राजनैतिक मंतव्य को ध्यान में रखकर किया जाता है तो इसके परिणाम बहुत अच्छे सामने नहीं आते हैं। शासकों को यह नहीं भूलना चहिए कि राज्य के स्थापना खर्च में उसी राशि को फूंका जाता है जो गरीब गुरबों के विकास के लिए संचित निधि होती है।
उधर तेलंगाना के अस्तित्व में आने के मार्ग जैसे ही केंद्र सरकार ने प्रशस्त कर दिए वैसे ही आंध्र प्रदेश सुलग उठा। तेलगू देशम और कांग्रेस दोनों ही चाहते हैं कि तेलंगाना अस्तित्व में आए पर वर्तमान हालातों को देखकर यह संभव नहीं प्रतीत हो रहा है। गौरतलब होगा कि 1953 के पहले तेलंगाना और आंध्र दो पृथक राज्य हुआ करते थे।
इतिहास उठाकर देखा जाए तो पता चलता है कि हैदराबाद के निजाम अपनी रियासत को पाकिस्तान का अंग बनाना चाहते थे, पर तत्कालीन गृहमंत्री लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पुलिस को साथ ले निजाम के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। तब से आज तक निजाम की रियासत का प्रमुख शहर हैदराबाद विवादित ही रहा है।
आज तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में विवाद सिर्फ हैदराबाद को लेकर ही है। आज हैदराबाद महज आंध्र प्रदेश की राजधानी ही नहीं वरन अध्याधुनिक शहर बन गया है। प्रगति के अनेक सौपान तय कर चुका है चारमीनारों का यह शहर। प्रोद्योगिकी विकास का यहां यह आलम है कि आज लोग इसे हैदराबाद के बजाए ``साईबरावाद`` कहने से नहीं चूकते हैं।
आंध्र प्रदेश और प्रस्तावित तेलंगाना दोनों ही सूबों के नेता किसी भी कीमत पर हैदराबाद को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। हो सकता है कि केंद्र सरकार द्वारा पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ की तर्ज पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद को बनाकर इसका हल निकाल दे।
नब्बे के दशक के उपरांत राजनीति जिस कदर मैली हुई है उसकी व्याख्या मुश्किल ही है। इसी गंदी राजनीति से उपज रही है अलग राज्यों की मांग। रियाया के विकास के लिए अगर राज्यों को विभाजित किया जाता है तो उसके पीछे लक्ष्य विकास ही होना चाहिए।
वस्तुत: एसा हो नहीं रहा है। एक राज्य में उभरने वाले शक्ति केंद्र अपनी अपनी सल्तनत की बसाहट अलग ही चाह रहे हैं। मंत्रीपद से वंचित जनसेवक लाल बत्ती की चाह में कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। जनता के दुखदर्द से उन्हें कोई सरोकार नजर नहीं आता। अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए जनसेवकों द्वारा भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद को बढावा देना कोई नई बात नहीं है। यही कारण है कि विकास का नारा लेकर ``जनसेवा`` करने वाले ``जनसेवकों`` का तो विकास हो रहा है पर आम जनता फटी धोती में आधी रोटी से ही पेट भरने को मजबूर है।

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

महामहिम की सुरक्षा में गंभीरतम चूक

हवा में तैरती दहशत
(लिमटी खरे)


देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की सुरक्षा में भारत सरकार पूरी तरह लापरवाह ही नजर आ रही है। महामहिम के हेलीकाप्टर के पंखों का छत से टकराना सामान्य बात नहीं मानी जा सकती है। भारतीय वायूसेना इस मामले को किस तरह लेकर जांच करती है, यह उनका आंतरिक मामला है। स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट पर संचालक नागर विमान पत्तन प्राधिकरण (डीजीसीए) भी इस मामले की जांच करेगा, किन्तु भारत सरकार को एक बार फिर अतिविशिष्ट लोगों की सुरक्षा के बारे में सोचना आवश्यक है।

गौरतलब होगा कि गत दिवस महामहिम जब उडीसा प्रवास पर थीं जब भुवनेश्वर हवाई अड्डे पर महामहिम राष्ट्रपति के हेलीकाप्टर के पंखे एक छत से टकरा गए। यह तो गनीमत थी कि इस हादसे में महामहिम प्रतिभा देवी, उनके पति देवी सिंह पाटिल सहित उडीसा के लाट साहेब एम.सी.भंडारी बाल बाल बच गए।
महामहिम के साथ घटी इस गंभीर चूक को सरकार कितना वजन दे रही है इस बात का अंदाजा महामहिम के आधिकारिक निवास राष्ट्रपति भवन की बयानबाजी से लगाया जा सकता है। महामहिम निवास इसे साधारण घटना बता रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि जगन्नाथ पुरी में एक अर्बन हाट का उदघाटन करने के बाद महामहिम अपने पति और महामहिम राज्यपाल के साथ भुवनेश्वर लौट रहीं थीं जहां 16 सीटर चौपर के पंखे हवाई अड्डे की एक एस्बेस्टास की छत से जा टकराए और उसके चार में से तीन पंखे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।
गौरतलब होगा कि महामहिम राष्ट्रपति के साथ यह तीसरा गंभीर हादसा घटित हुआ है। इसके पूर्व भी मुंबई प्रवास के दौरान महामहिम के काफिले में शामिल एक हेलीकाप्टर को उतरने की अनुमति दे दी गई थी, साथ ही वहां एक यात्री विमान को उसी रनवे पर उडान भरने की अनुमति उसी वक्त दे दी गई थी। वह तो पायलट की सूझबूझ थी कि हादसा टल गया वरना भारत देश किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं बचता कि जहां का तंत्र अपने प्रथम नागरिक की ही हिफाजत नहीं कर सकता वहां का तंत्र देश की सवा सौ करोड से अधिक की जनता की जान माल की हिफाजत की रक्षा का दावा कैसे और किस मुंह से करता है।
उस वक्त वायूसेना द्वारा इस घटना के जांच के आदेश दिए थे, जांच में क्या सामने आया है इस बात का खुलासा अभी नहीं हो सका है, किन्तु फिजां में तैर रही चर्चाओें पर अगर यकीन किया जाए तो मुंबई का मामला पूरी तरह अहं का था। बताया जा रहा है कि जांच में यह बात साफ तौर पर सामने आई है कि इस प्रकरण में महामहिम के काफिले में शामिल चौपर के पायलट ने एयर ट्रेफिक कंट्रोल (एटीसी) से हेलीकाप्टर उतारने की अनुमति ही नहीं ली थी।
इसके बाद बीते दिनों ग्वालियर में महामहिम के आगमन के पूर्व एक घटना में मध्य प्रदेश के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री सूबे के सरकारी पायलट केप्टन अनंत सेठी की जागरूकता के चलते बच गए। उस समय सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर दो स्कावडन को ``कलर`` देने के निमित्त ग्वालियर आ रहीं थीं। सेना में कलर से बडा कोई तगमा नहीं होता है।
जिस समय मध्य प्रदेश सरकार का विमान रनवे पर लैंडिंग के लिए पहुंचा तभी टेक्सी ट्रेक (रनवे के बीच में से एक छोटा रनवे जिस से गुजरकर विमान हैंगर में जाते हैं) जिसे टेिक्नकल एरिया भी कहते हैं, जिस पर वायूसेना के लोग ही आ जा सकते हैं, से एक वाहन आता दिखाई देने पर एटीसी ने विमान के पायलट अनंत सेठी को गो अरांउंड (लेंडिंग के दर्मयान ही पुन: टेक ऑफ) के आदेश दे दिए।
इस घटना के महज 20 मिनिट बाद ही महामहिम राष्ट्रपति का विमान वहां उतरना था। अमूमन देखा जाए तो व्हीव्हीआईपी के आगमन के लगभग आधे घंटे पहले ही सडकों को सील कर दिया जाता है, फिर ग्वालियर में जहां महमहिम को उतरना था वह तो भारतीय वायूसेना का एक एयर बेस था, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।
इसके उपरांत इस घटना पर अपनी खाल बचाते हुए एयर फोर्स द्वारा यह कह दिया गया कि रनवे पर कुत्ते आ गए थे, जिस कारण एमपी गर्वमेंट के विमान को गो अरांउंड के आदेश देने पडे। सवाल यह उठता है कि वायू सेना के जिस रनवे पर उनका सर्वोच्च कमांडर आ रहा हो वह भी सर्वोच्च तगमा देना, उस रनवे पर कुत्ते आखिर कहां से आ गए। साथ ही साथ जब बीस मिनिट बाद महामहिम को आना था तो वे कुत्ते आखिर कहां हैं, क्या उन्हें पकड लिया गया या गोली मार दी गई। इस मामले में वायूसेना पूरी तरह खामोश ही नजर रही है। इस गंभीर लापरवाही पर केंद्रीय गृह मंत्री या देश के वजीरे आला की खामोशी आश्चर्यजनक ही थी।
बहरहाल गत दिवस भुवनेश्वर में हुआ हादसा सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है। गौरतलब होगा कि जब भी व्हीव्हीआईपी मूवमेंट होता है, तब एक एक जगह को मार्क किया जाता है। एक नहीं अनेकों बार उनके रूट की रिहर्सल होती है। उनके उपयोग में आने वाले वाहन या हेलीकाप्टर को कई बार दौडाया या उडाया जाता है।
इतना ही नहीं महामहिम राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को लेकर सडक पर चलने वाले वाहन या हवा में उडने वाले उडन खटोलों में उनके सारथी का परीक्षण बहुत बारीकी से किया जाता है। महामहिम के विमान या हेलीकाप्टर को उडाने वाले पायलट देश की वायूसेना के सर्वश्रेष्ठ पायलट ही होते हैं। इन पायलट को चुनते समय उनकी उडान दक्षता, आचार विचार, रहन सहन आदि मामलों में कतई कोताही नहीं बरती जाती है।
इसके साथ ही महामहिम के लिए बेहतर जहाज और बेहतर संसाधन मुहैया करवाए जाते हैं। भुवनेश्वर में भी यही हुआ होगा। महामहिम के आगमन के पूर्व पायलट ने कम से कम एक बार तो जगन्नाथ पुरी से भुवनेश्वर तक उडान भरकर रिहर्सल की ही होगी।
इसके अलावा जब भी विमान या चौपर लेंड करता है तो ग्रांउंड पर तकनीकी तौर पर प्रशिक्षित कर्मचारी द्वारा उसे पार्क करवाने का काम किया जाता है। सरल शब्दों में अगर कहें तो जमीन पर आने के उपरांत पायलट को सामने खडे कर्मचारी के इशारों पर ही मशीन को पार्क करना होता है।
हेलीकाप्टर जब भी उतारा जाता है तो जमीन पर बडे से गोल घेरे में एच का निशान बनाया जाता है, जिस पर ही जाकर यह खडा हो जाता है। इस निशान के इर्द गिर्द इतनी जगह क्लीयरेंस के लिए होती है कि हेलीकाप्टर के पंखे आसानी से घूम सकें। जाहिर सी बात है कि भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर के चौपर की लैंडिंग के लिए भुवनेश्वर में भी एसा ही किया गया होगा।
फिर क्या वजह थी कि महामहिम का हेलीकाप्टर इस ``एच`` को छोडकर दूर बने एक शेड से टकरा गया, और उसके तीन पंख मुड गए। जानकारों का कहना है कि गनीमत तो यह थी कि वहां एस्बेस्टास की शीट थी, अगर उसके स्थान पर पक्का लेंटर्न या लोहे का फ्रेम होता तो चौपर हवा में कितनी दूर फिकता और उसकी क्या गत होती इसकी कल्पना मात्र से ही सिहरन उतपन्न हो जाती है।
इसके पूर्व मध्य प्रदेश में मशहूर पाश्र्व गायिका अनुराधा पोडवाल को इंदौर से गुना ले जाते सरकारी हेलीकाप्टर की इंदौर के समीप ही फोर्स लैंडिंग में वे घायल हो गईं थीं, वह तो शुक्र था कि उनका चौपर खेत की गीली जमीन में गिरा, वरना अगर सतह सख्त होती तो हादसे की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यही बात भुवनेश्वर में लागू होती अगर हादसा होता, वहां रनवे तो पूरी तरह से सख्त ही था।
एक नहीं दो नहीं पूरी तीन बार महामहिम की विमान यात्रा में गंभीर अनियमितताएं अनेक संदेहों को जन्म दे रहीं हैं। यह पहला मौका था जबकि महामहिम खुद उस चौपर में सवार थीं। वरना दो हादसे तो उनके आने के पूर्व ही घटे थे। देश की पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति जो भारतीय सेनाओं की सर्वोच्च कमांडर हैं की हवाई यात्राओं में वायूसेना द्वारा इस तरह की गंभीरतम चूक को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। जब मुंबई हादसे में महामहिम के कान्वाय में शामिल चौपर के पायलट को दोषी माना जा चुका है, उसके बाद अगर इस तरह की अक्षम्य चूक हो तो संदेहों के बीज मन में प्रस्फुटित होना स्वाभाविक ही है।

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

ठेके पर न्यायधीश!

ठेके पर न्यायधीश!
(लिमटी खरे)


देश की अदालतों में मुकदमों का बोझ निश्चित तौर पर सरकार की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकाने के लिए काफी माना जा सकता है। सौ गुनाहगार बच जाएं पर एक निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए, सूत्र पर चल रही भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी से मिला न्याय, न्याय नहीं होता भी एक सूक्ति के तौर पर अंकित है। बारीक कानूनी दांव पेंच और न्यायधीशों की कमी के चलते अदालतें पेशी बढाने पर मजबूर हो जातीं हैं।
कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा बेकलाग निपटाने के लिए पश्चिमी देशों की तर्ज पर हाल ही में फैसला लिया गया है कि देश भर में लंबित कानूनी मामलों को निपटाने के लिए न्यायधीशों की नियुक्ति कांट्रेक्ट (ठेके) पर की जाए। कांग्रेस के इस कदम की व्यापक प्रतिक्रिया सामने आ रही है।
इससे पूर्व 1992 में देश में सबसे पहले कर्नाटक राज्य में न्यायालयों में पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया था, जिसे राज्य में भारी समर्थन मिला। सूबे की अदालतों में मुकदमों का बोझ काफी हद तक कम हो गया था। इसकी सफलता के उपरांत इसे मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में लागू करने का निर्णय लिया गया था।
उस वक्त मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय के न्यायधीशों ने कहा था कि पायलट प्रोजक्ट की सफलता इस बात पर ही टिकी है कि संबंधित सभी न्यायधीश अपनी कार्यालयीन अवधि में कितने प्रकरणों के निष्पादन में रूचि लेते हैं। साथ ही अधिवक्ताओं को भी अनावश्यक पेशी न बढाने हेतु अपील की गई थी।
दो साल बीते पायलट प्रोजेक्ट टांय टांय फिस्स हो गया। फिर देश में न्याय व्यवस्था ने मंथर गति से अपने गंतव्य की ओर रवानगी डाल दी। आज न्याय व्यवस्था की स्थिति देखकर सरकारों की रूह कांपना स्वाभाविक ही है। देश भर की अदालतों मं तीन करोड से ज्यादा मामले लंबित हैं, तो जेलों में क्षमता से कई गुना ज्यादा कैदी ठूंसे गए हैं। आज पीडितों को समय पर न्याय दिलवाना एक गंभीर समस्या बन गई है।
परिवार और उपभोक्ताओं से संबंधित मामलों के लिए अलग अलग कोर्ट की व्यवस्था के बाद भी आज इन अदालतों की देहरी पर पीडित चप्पल चटकाते ही नजर आते हैं। आश्चर्य की बात है कि मध्य प्रदेश की उपभोक्ता अदालत में 2003 में गई एक पीडिता को 2009 की समाप्ति तक न्याय नहीं मिल सका है। यह है देश की व्यवस्था।

कहने को तो देश में न्यायपालिका को सर्वोच्च का दर्जा दिया जाता है, किन्तु जनसेवकों ने इसे भी परोक्ष तौर पर इस व्यवस्था को अपने बाहूपाश में जकड रखा है। विडम्बना ही कही जाएगी कि कानून बनाने के लिए ``जनसेवक`` हैं, पर उसका पालन सुनिश्चित करवाने के लिए वे अपनी जवाबदारियों से बचा ही करते हैं।
आम आदमी की क्या बिसात कि वह कोर्ट का सम्मन लेने से इंकार कर दे, पर संप्रग सरकार के पिछले कार्यकाल में न्यायपालिका और विधायिका के बीच के टकराव को सभी ने करीब से देखा। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि देश के संविधान में न्यायपालिका को सर्वोच्च दर्जा दिया गया है किन्तु वह सिर्फ कागज तक ही सीमित है।
बहरहाल कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने तय किया है कि वह देश भर में 15 हजार न्यायधीशों को ठेके पर रखेगी जिन्हे साल भर में ढाई हजार मुकदमों में फैसला देने का लक्ष्य दिया जाएगा। देखा जाए तो 10 फैसले रोजाना की दर से इन ठेके पर रखे गए न्यायधीशों को निपटाने होंगे। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या देश में 15 हजार एसे सक्षम जज मिल पाएंगे जो रोजाना इतने मामलों की सुनवाई कर बिना दबाव सही फैसला दे पाएं।
अगर यह चमत्कार हो गया तो साल भर में पोने चार करोड मुकदमों का निपटारा हो जाएगा। गणित के सवाल की तरह इसे कागज पर तो हल किया जा सकता है किन्तु व्यवहारिक तौर पर यह असंभव ही है। इस व्यवस्था के आडे वर्तमान में प्रचलित पंगु व्यवस्था ही आएगी।
वस्तुत: अधिकतर मामलों में गवाह का उपस्थित न होना, सम्मन का तामील न होना, अभियोजन द्वारा समय पर चालान न पेश करना और गवाही में देर सबेर, अधिवक्ताओं द्वारा पेशी पर पेशी की तारीख लेना, जज के अवकाश पर होने आदि जैसी व्यवस्थाओं के चलते ठेके पर रखे गए न्यायधीश भी कैसे लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।
इतना ही नहीं, लक्ष्य के बोझ से दबे जज जब मुकदमों की सुनवाई करेंगे तो इस बात पर संशय ही है कि पीडित इंसाफ पा सकेंगे, क्योंकि उनके समझ लक्ष्य को पाना पहली प्राथमिकता होगा। वैसे लोक अदालतों में जिस तेजी से मामलों का निपटारा हो जाता है, उसे देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि बेहतर होगा कि सरकार लोक अदालतों की संख्या में इजाफा कर दे।

इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें नुकसान सिर्फ और सिर्फ पीडित पक्ष का ही होगा, क्योंकि सालों से चल रहे मामले में बिना पीडित पक्ष को सुनवाई के पर्याप्त मौके के मामले में फैसला दे दिया जाएगा। एक तरफ सरकार को लंबित मामलों की चिंता है तो वकीलों को अपनी जेब की, हर हाल में पीडित पक्ष की गरदन पर ही तलवार होने की अशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सरकार ने फास्ट ट्रेक कोर्ट की स्थापना की थी, जिसे काफी सराहा गया है। अगर सरकार द्वारा फास्ट ट्रेक कोर्ट की संख्या बढा दी जाती है तो ठेके पर न्यायधीश रखने की जरूरत शायद ही पडे। साथ ही पुलिस व्यवस्था में सुधार बहुत ही आवश्यक है। व्हीव्हीआईपी ड्यूटी, अनुसंधान, इंवेस्टीगेशन, यातायात, बेगार आदि के लिए अलग अलग विंग बनाई जाना आवश्यक है, ताकि पुलिस अपनी तफ्तीश समय रहते पूरी कर सके।
इसके अलावा न्यायधीशों के लिए इंन्सेंटिव बोनस, अभियोजन पक्ष चुस्त दुरूस्त करने के साथ ही हर मामले में पेशी की तारीख बढाने के लिए निश्चित टर्म (हर मामले में तारीख कितनी बार बढाई जा सकती है) निर्धारित की जाए। इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए न्यायपालिका को विधायिका के चंगुल से मुक्त कराया जाए, जो कि असंभव ही प्रतीत होता है।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

पंचायतों का आरक्षण

पंचायतों का आरक्षण
मध्य प्रदेश में जिला पंचायतों के चुनावों के लिए आरक्षण की घोषणा कर दी गई है। 50 जिला पंचायतों में रोटेशन के हिसाब से आरक्षण की प्रक्रिया को कराया गया है। अगले साल जिला पंचायतों के चुनाव होने वाले हैं। चुनाव दलीय आधार पर होगे या नहीं यह अभी स्पष्ट नहीं किया गया है।


12 साल की राजमाता!


12 साल की राजमाता!
(लिमटी खरे)

21वीं सदी की कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली महिला श्रीमति सोनिया गांधी इटली मूल की होने के बावजूद भी 1998 से लगातार सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पर राज कर रहीं हैं। कांग्रेस के प्रथम परिवार की पांचवीं पीढी की सदस्य बुधवार 9 दिसंबर को अपने जीवन के 65वें वर्ष में प्रवेश करने वाली हैं।
इसे महज संयोग नहीं कहा जाएगा कि दिसंबर के माह में जहां कांग्रेस अपनी स्थापना के 125 वर्ष पूरे करने जा रही है, वहीं इसी महीने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अपने जीवन के 64 वर्ष पूरे कर 65वें वर्ष में प्रवेश कर जाएंगीं। यूं तो सोनिया गांधी ने अनेक रिकार्ड अपने नाम कर लिए हैं, पर कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर वे लगातार 12 साल से पदासीन हैं।

गौरतलब होगा कि 1998 में जब स्व.सीताराम केसरी के स्थान पर उन्हें अध्यक्ष बनाने के प्रयास किए गए थे, तब उन्होंने इसके लिए साफ तौर पर इंकार कर दिया था। चमत्कारी नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस की हिलोरे मारती कश्ती को संभालने के लिए नेहरू गाध्ंाी परिवार के अलावा और कोई विकल्प कांग्रेस के पास नहीं था। यही कारण है कि कांग्र्रेस के शातिर नेताओं ने कांग्रेस के बजाए अपनी अस्मत बचाने के लिए सोनिया को राजनीति के भंवर में ढकेल दिया था।

जैसे ही सोनिया राजनीति में आईं, हिन्दी बोलना और समझना उनके लिए सबसे बडी चुनौति बनी। शरद पंवार ने सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड नई पार्टी का गठन कर लिया। इस समय विपक्ष द्वारा सोनिया गांधी को ``लीडर`` के बजाए ``रीडर`` का खिताब दिया गया, क्योंकि सोनिया गांधी द्वारा टूटी फूटी हिन्दी में अपने भाषण पढा ही किया करते थे।
राष्ट्र की मुख्य धारा से भटक चुकी कांग्रेस को एक बार फिर एकजुटता के सूत्र में पिरोना बहुत ही कठिन काम था। कांग्रेस की ही फूट का नतीजा था कि भाजपा ने तेरह दिन, तेरह महीने के बाद पांच साल तक लगातार शासन किया। इस कठिन घडी में कांग्रेस में नई जान फूंकना निश्चित तौर पर चुनौति से कम नहीं था।

नपे तुले कदमों से आगे बढती सोनिया गांधी का जप और तप आखिर काम आ गया। सोनिया के नेतृत्व में 2004 में कांग्रेस पहली बार सत्ता में आई। उस समय प्रधानमंत्री बनने का दबाव सोनिया पर सबसे अधिक था। दूरदृष्टि पक्का इरादा का मूलमंत्र लिए चल रहीं सोनिया ने यह पद ठुकराकर एक एसी मिसाल पेश की जिसकी तारीफ दुनिया भर में की गई।
माना जा रहा है कि सोनिया द्वारा यह त्याग नेहरू गांधी परिवार की छटवी पीढी अर्थात प्रियंका या राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनवाने के लिए किया गया था। प्रियंका गांधी द्वारा मुरादाबाद के व्यवसायी राबर्ट वढेरा से विवाह करने के उपरांत अब राहुल पर ही कांग्रेसियों की निगाहें टिक गईं।

2009 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में आई इस बार राहुल गांधी ने मंत्रीपद ठुकराकर फिर मिसाल पेश की। सत्ता के आदी हो चुके कांग्रेस के मोटी चमडी के आलंबरदारों को यह बात अच्छी तरह समझ में आ चुकी थी कि सत्ता की मलाई अगर चट करनी है तो इसके लिए नेहरू गांधी परिवार की चम्मच का सहारा लेना ही पडेगा। यही कारण है कि जुम्मा जुम्मा एक दशक पहले राजनीति में कदम रखने वाले राहुल गांधी के सामने तीन और चार दशक से राजनैतिक बियावान की खाक छानने वाले नेता नतमस्तक नजर आ रहे हैं।

चमत्कार को नमस्कार की तर्ज पर कांग्रेस ने नब्बे के दशक से अपने दो प्रेरणा स्त्रोतों को हाशिए पर ही डाल दिया है। इसमें पहले राजीव गांधी के पिता एवं इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी, जिनके चलते नेहरू परिवार की पुत्री इंदिरा को गांधी सरनेम मिला। दूसरे युवा तुर्क का खिताब पाने वाले संजय गांधी। संजय गांधी के निधन के उपरांत उनकी पित्न मेनका और पुत्र वरूण ने भाजपा का दामन थाम लिया तो कांग्रेस ने संजय के नाम से ही पर्याप्त दूरी बना ली। कांग्रेस के वास्तविक भविष्य दृष्टा तो संजय और फिरोज गांधी ही थे, जिनके नाम तक से आज कांग्रेस को एलर्जी ही दिख रही है।
केंद्र में भले ही कांग्रेस ने ताकत हासिल कर ली हो पर सिक्के का दूसरा पहलू काफी भयावह ही है। राज्यों में कांग्रेस जनाधार खोती जा रही है। इसका प्रमुख कारण सोनिया गांधी के इर्दगिर्द आधार विहीन लोगों का जमावडा होना है। सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल, निज सचिव विसेंट जार्ज आदि जैसे रीढ विहीन घोडों ने गणेश परिक्रमा को बढावा ही दिया है। यही कारण है कि जमीनी स्तर पर कांग्रेस का संगठन पूरी तरह मृत प्राय ही पडा है।
कांग्रेस के प्रथम परिवार की बहू पार्टी की इस तरह की पहली अध्यक्ष हैं जो इतालवी मूल की हैं एवं बोफोर्स कांड में क्लीन चिट पाने वाले क्वात्रोची भी इतालवी मूल के ही हैं। विडम्बना ही कही जाएगी कि जिस बोफोर्स कांड के चलते सोनिया के पति राजीव गांधी को सत्ता से बाहर होना पडा था, उसे ही कांग्रेसनीत सरकार द्वार क्लीन चिट दे दी गई।
आजादी के पहले ब्रितानी मूल की लंदन निवासी एनी बीसेंट (1917) और ब्रितानी मूल की ही केंब्रिज निवासी नीली सेनगुप्ता (1933) जैसी शिख्सयतें पार्टी की अध्यक्ष हुआ करतीं थी, जो कि विदेशी मूल के थे। नेहरू गांधी परिवार मेें सोनिया गांधी पांचवीं शिख्सयत हैं जो पार्टी का नेतृत्व कर रहीं हैं। इसके पूर्व मोती लाल नेहरू (1928), जवाहर लाल नेहरू (1929, 35, 51), इंदिरा गांधी (1978 से 1984) और राजीव गांधी (1984 से 1991) पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

नौनिहालों के प्रति गैर संजीदा सरकारें


नौनिहालों के प्रति गैर संजीदा सरकारें
(लिमटी खरे)

देश के भविष्य माने जाने वाले बच्चों के लिए सरकारों की अनेक लुभावनी योजनाएं अस्तित्व में होने के बावजूद भी बच्चों के प्रति सरकारें पूरी तरह लापरवाह ही नजर आ रहीं हैं। कहीं बच्चे कुपोषण का शिकार हैं तो कहीं बाल मृत्युदर का आंकडा आसमान छू रहा है। बच्चों पर अत्याचार के मामलों में भी रिकार्ड बढोत्तरी दर्ज की गई है।
यूनीसेफ द्वारा किए गए सर्वेक्षण में साफ तौर पर कहा गया है कि दुनिया भर के कुपोषण के शिकार बच्चों की कुल तादाद का एक तिहाई हिस्सा भारत में ही निवास करता है। इस चौंकाने वाले सर्वे को अगर मानें तो हिन्दुस्तान में पांच साल से कम उम्र के छ: करोड से ज्यादा बच्चे भारत की धरा पर ही भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं।

आजाद हिन्दुस्तान में जहां बच्चों के कल्याण के लिए सरकार अरबों रूपए खर्च कर योजनाओं का संचालन कर रही हैं, वहां अगर इस तरह के भयावह आंकडे अस्तित्व में हैं तो सरकारी योजनाओं के अमली जामा पहनाने के दावों की कलई अपने आप ही खुल जाती है।
यूनीसेफ का सर्वे मनगढंत तो नहीं माना जा सकता है। इसके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाले मध्य प्रदेश की तस्वीर इस मामले में सबसे भयावह है। यहां कुपोषण के शिकार बच्चों में से साठ फीसदी से अधिक बच्चों का वजन औसत भार से काफी कम है। यहां 33 फीसदी बच्चे गंभीर क्षय रोग की जद में हैं।

केरल के हालात भारत में सबसे अच्छे माने जा सकते हैं, जहां 29 फीसदी बच्चों का वजन औसत से कम तो 16 प्रतिशत बच्चे क्षय रोग का शिकार हैं। यह है आजादी के छ: दशकों के बाद का नेहरू गाध्ंाी (सोनिया, राहुल का नहीं) के आधुनिक भारत की उजली तस्वीर।
इसके अलावा भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा जारी प्रतिवेदन का ही अगर अध्ययन किया जाए तो आंकडे रोंगटे खडे करने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली इस संस्था के मुताबिक देश में वर्ष 2008 में नवजात शिशु मृत्युदर प्रति एक हजार जीवित शिशुओं में 53 थी।
वहीं यूनिसेफ की द स्टेट ऑफ द वल्र्ड चिल्ड्रन रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कम शिशुदर के गुणोत्तर क्रम में अगर देखा जाए तो भारत से कम शिशुदर दुनिया के 143 देशों की है। आधी सदी से अधिक समय तक देश पर राज करने वाली वर्तमान में सोनिया राहुल की कांग्रेस के लिए यह शर्म की बात ही कही जाएगी।
लोकसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद भी इस प्रतिवेदन को स्वीकार कर चुके हैं। 20 नवंबर को सांसद श्रीनिवासुलु रेड्डी और विलासराव मुत्तेमवार के प्रश्न के लिखित जवाब में आजाद ने कहा था कि नवजात शिशुदर के अनेक कारण हैं। साथ ही उन्होने कहा कि सरकार द्वारा इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए अनेक पहल की जा रहीं हैं।
आजाद की मानें तो देश के 18 राज्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कितने आश्चर्य की बात है कि इक्कीसवीं सदी में देश के 18 राज्य अभी भी बच्चों के जीवन को बचाने के लिए संसाधनों के लिए तरस ही रहे हैं।

प्रतिहजार जीवित शिशु मृत्यु दर के मामले में एक बार फिर देश के हृदय प्रदेश ने बाजी मारी है। भारत के महापंजीयक के प्रतिवेदन के अनुसार मध्य प्रदेश मेें प्रतिहजार जीवित शिशुओं में 2006 मृत्युदर 74, 2007 में 72, 2008 मेें 70 रही। दूसरे स्थान पर मायावती का यूपी रहा जहां 2006 में 71, 2007 में 69 तो 2008 में 70 है। इस मामले में गोवा की स्थिति काफी हद तक बेहतर है, जहां मृत्युदर प्रतिहजार में महज 10 ही हैै। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में यह आंकडा 35 है।
विडम्बना ही कही जाएगी कि एक तरफ सरकारें अंतरिक्ष पर जाने परमाणु अनुसंधान संपन्न होने के दावे पर दावे किए जा रही है, वहीं दूसरी ओर नवजात शिशुओं को बचाने में आज भी बाबा आदम के जमाने की योजनाओं को ही अमली जामा पहनाया जा रहा है।

बाल मजदूरी देश के हर राज्य में कैंसर की तरह फैल चुकी है। उत्तर प्रदेश का हर जिला इसकी जद में है। आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रदेश के पेंसठ जिलों में से पुलिस या संबंधित महकमे ने एक भी बाल मजदूर मुक्त नहीं करवाया है। अलबत्ता आगरा में 2008 में 373 तो 2009 में अब तक 241 बाल मजदूरों को मुक्त करवाया गया है। मेरठ में 229, रेल अनुभाग में 7, आजमगढ और लखनउ में 4,4, मिर्जापुर में 3 बच्चों को मुक्त करवाया गया। यह है पुलिस की रस्म अदायगी का आलम। बाल मजदूरों के पुनर्वास की दिशा में देश भर में सरकार असफल ही नजर आ रही है।
बच्चों पर होने वाले अपराधों के आंकडे भी कम डरावने नहीं हैं। कमोबेश हर सूबे में चाय पान की दुकानों सहित हर प्रतिष्ठान में ``छोटू, पप्पू, मुन्ना, राजा`` जैसे नामों के संबोधन वाले बाल श्रमिक मिलना आम बात है। जिस उमर में बच्चों के हाथों में कागज और कलम होनी चाहिए उस आयु में उनके हाथों में जूठे बर्तन होते हैं।
इस सबका सबसे दुखद पहलू यह है कि मयखानों में शराबियों के बीच जब ये बच्चे जाते हैं तो इनके मन मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पडता होगा यह बात अकल्पनीय ही है। विडम्बना ही कही जाएगी कि सरकारों द्वारा सख्त नियम कायदों के बावजूद इस तरह के सामाजिक अपराध को रोकने कोई कदम नही उठाया गया है।
यूनिसेफ से ही बाल मित्र का तमगा हासिल करने वाली उत्तर प्रदेश की पुलिस का दूसरा चेहरा भी लोगों के सामने आ चुका है। उत्तर प्रदेश में हर माह लगभग एक दर्जन बच्चे गायब हो जाते हैं, पर न तो सूबे के जनसेवकों को ही कोई फिकर है, और ना ही राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्यों को ही। गौरतलब होगा कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस की ही नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री इसी राज्य से संसदीय सौंध तक पहुंचे हैं।
हिन्दुस्तान की गरीबी का समूची दुनिया मजाक उडाती है और हमारे देश के शासक चुपचाप देश की अधनंगी भूखी जनता की नुमाईश विश्व के सामने किया करती है। जब भी कोई गोरा अंग्रेज हिन्दुस्तान भ्रमण पर आता है तो वह देश की एंटीक चीजों के साथ ही साथ चौक चौराहों पर मिलने वाले नायाब ``भिखारियों`` की तस्वीर खींचना नहीं भूलता। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि क्या भी,ख मांगना अपराध है।
इसी गरीबी की चादर ओढे भारत देश की झोपड पट्टी और बाल अपराध पर केंद्रित विदेशी फिल्म निर्माता के चलचित्र ``स्लमडाग मिलेनियर`` ने न जाने कितने अस्कर अपनी झोली में डाल लिए। अपने घिनौने पहलू को दुनिया भर के सामने उघाड कर हमारे देश की सरकार किस कदर प्रफुिल्लत होती रही मानो उसने जग ही जीत लिया हो। हालात देखकर यही कहा जा सकता है -``जय हो . . .``

रविवार, 6 दिसंबर 2009

मनमोहन की परवाह नहीं मंत्रियों को!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
मनमोहन की परवाह नहीं मंत्रियों को!


वजीरेआला डॉ.एम.एम.सिंह के निर्देशों की उनके मातहत मंत्री ही परवाह नहीं कर रहे हैं। अपने दूसरे कार्यकाल को और अधिक पारदशीZ बनाने की गरज से मनमोहन ने अपने मंत्रीमण्डल सहयोगियों से अपनी ``परफारमेंस रिपोर्ट`` जमा कराने को कहा था वह भी 30 नवंबर तक। आज डेड लाईन के एक सप्ताह बाद भी मनमोहन के मंत्रीमण्डल के सदस्यों के कानों में जूं नहीं रेंगी है। प्रधानमंत्री के कैबनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर ने सभी मंत्रियों को बाकायदा पत्र लिखकर सदस्यों के परफारमेंस की रिपोर्ट जमा कराने को कहा था। भाजपा की इस पर प्रतिक्रिया आई कि मनमोहनी दरबार की कारगुजारियां तो जनता के सामने हैं, फिर पीएम को प्रतिवेदन की क्या आवश्यक्ता हो गई। 20 हजार करोड के स्पेक्ट्रम घोटाले और भारी उद्योग मंत्रालय मे लेब बनाने के घोटाले किसी से छिपे नहीं हैं। मनमोहन के इस कदम से मंत्रीमण्डल में रोष और असंतोष की स्थिति बनती जा रही है। गैर पारंपरिक उर्जा मंत्री फारूख अब्दुल्ला इससे खासे खफा नजर आए। उन्होने कहा कि मंत्रियों के काम को तो जनता देखती है, फिर भला पीएम को कौन सी जरूरत आन पडी। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी पर निशाना साधने वाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री के इस कदम पर वे कौन सा तुरूप का इक्का चलतीं हैं। माना जा रहा है कि मंत्रियों के कामकाज की रिपोर्ट मंत्रियों से ही मांगकर मनमोहन सिंह ने शांत पानी में कंकड मार दिया है। आने वाले दिनों में मनमोहन सिंह के खिलाफ अगर मंत्री मोर्चा खोल दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

घर में ही फिसड्डी युवराज

कांग्रेस के ताकतवर महासचिव और कांग्रेसियों की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का करिश्मा इस बार उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों में नहीं चल पाया। राज्य में राज्य की 11 विधानसभा सीटों में से महज एक ही सीट हथिया पाई कांग्रेस। राहुल के कृपा पाकर केंद्र में राज्य मंत्री तक पहुचने वाले झांसी के प्रदीप जैन और पडरोना के आपीएन सिंह अपनी अपनी खाली की गईं विधानसभा सीट भी नहीं बचा पाए। इन दोनों ही नेताओं के करीबी अब सफाई देते घूम रहे हैं कि हमारे नेताओं ने तो पुरजोर मेहनत की थी, जब हमारे आका राहुल गांधी का ही जादू नहीं चला तो ये बेचारे क्या कर लेते। उत्तर प्रदेश में वे अपने ही संसदीय क्षेत्र की इसौली सीट को नहीं बचा पाए तो बाकी सूबे में वे क्या खाक जादू चलाते। कहने को तो सभी राहुल गांधी के देश भर में चल रहे जादू का जिकर करने से नहीं चूक रहे हैं, पर जब कांग्रेस की नजर में देश के युवराज अपने ही घर में फिसड्डी हैं तो फिर उनके नाम को कांग्रेसी कहां भुना सकते हैं, इस बारे में शोध जारी है।

पिता की विरासत ही सहारा

एक समय मध्य प्रदेश की राजनीति में सूरज बनकर उभरे कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह अब पिता के नाम का सहारा लेकर राजनैतिक तौर पर बलशाली होने का प्रयास कर रहे हैं। विधानसभा चुनावों के दौरान मध्य प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष का पद हथिया चुके अजय सिंह का ग्राफ राजनैतिक तौर पर काफी नीचे जाता जा रहा था। अजय सिंह ने पिछले दिनों कुंवर साहेब के गढ विन्ध्य प्रदेश में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने अपने पिता के चार दशक के राजनैतिक जीवन में उनके साथ कदम ताल मिलाकर चलने वाले कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया। विन्ध्य के चुरहट में उन्होंने इस कार्यक्रम को अंजाम दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री स्व.जवाहर लाल नेहरू के द्वारा जिस दिन कुंवर अर्जुन सिंह ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी उसी दिन को चुना था अजय सिंह ने। मध्य प्रदेश में केबनेट मंत्री रह चुके अजय सिंह यह भूल गए कि कुंवर अर्जुन सिंह ने उन्हीं जवाहर लाल नेहरू के आदशोZं पर चलने वाली कांग्रेस को तिलांजली देकर नारायण दत्त तिवारी के साथ मिलकर कांग्रेस छोडी और तिवारी कांग्रेस का गठन किया था।

. . . और अधूरी रह गई साध्वी की इच्छा

भारतीय जनशक्ति पार्टी की तेज तर्रार अध्यक्ष और साध्वी उमाश्री भारती जब बोलतीं हैं तो धारा प्रवाह में ही बोलती जाती हैं। कई बार उन्हें अपने इस बडबोलेपन के चलते शर्मसार होना पडा है। हाल ही में उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता एल.के.आडवाणी के साथ सर जोडकर बैठने के उपरांत कहा कि वे एनडीए (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) में शामिल होना चाहतीं हैं। राजद के संयोजक शरद यादव ने बिहार में विधानसभा चुनावों में पार्टी को होने वाले नुकसान के मद्देनजर इसे सिरे से खारिज कर दिया। वैसे भी यादव और उमाश्री के बीच सामंजस्य कम ही रहा है। बताते हैं कि बाद में भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले उमाश्री विरोधी अरूण जेतली द्वारा उमाश्री को यह कहलवाया गया कि दरअसल एनडीए अलग अलग पार्टियों के संसदीय दलों का गठबंधन है, जिसमें पार्टी का कम से कम एक संसद सदस्य तो होना चाहिए। चूंकि उनकी पार्टी का एक भी संसद सदस्य नहीं है, अत: वे इसका हिस्सा नहीं बन सकतीं। इस जवाब से उमाश्री तिलमिलाकर रह गईं। अब देखना यह है कि वे आगे क्या रणनीति बनातीं हैं।

नितिश की राह पर ममता!

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रीमण्डल की बैठक (कैबनेट) में उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे और रेल मंत्री ममता बनर्जी के बीच हुए हास परिहास के गूढ मायने खोजने में कांग्रेस के आला नेता व्यस्त हैं। दरअसल कैबनेट में शिंदे ने ममता को मौजूद पाकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछ लिया कि वे वहां कैसे, जबकि कैबनेट में रेल्वे का कोई एजेंडा भी नहीं है। इस पर ममता ने बडी ही सहजता के साथ जवाब दिया कि वे मंत्री हैं एवं बैठक मंत्रीमण्डल की ही है, यह बात इतर है कि वे तीन दिन दिल्ली में तो तीन दिन कोलकता में रहतीं हैं। इस निर्विकार सवाल जवाब से अनायास ही अन्य मंत्रियों के चेहरों पर मुस्कान दौड गई। एक मंत्री ने चुटकी लेते हुए कह ही दिया कि पहले रेल मंत्री रहे नितिश कुमार भी यही किया करते थे, और आज बिहार के निजाम हैं, आने वाले समय में बस आपकी ही बारी है।

अनुपस्थित मंत्री को फटकार लगाई विस अध्यक्ष ने

मध्य प्रदेश के आदिम जाति और अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह को एक दिन विधानसभा से गायब रहने पर विधानसभाध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी की खासी फटकार सुननी पडी। दरअसल हाल ही में समाप्त हुए विधानसभा सत्र में जब शाह के विभाग से संबंधित गैर सरकारी संकल्प पेश किया गया तब उसका जवाब देने विजय शाह सदन में मोजूद नहीं थे। विजय शाह के इस रवैए को घोर आपत्तिजनक मानते हुए रोहाणी ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। रोहाणी की नाराजगी का आलम यह था कि उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा को साफ तौर पर कहा कि मंत्री ने अपने अनुपस्थित रहने के बारे में आसंदी को भी कोई जानकारी नहीं दी। भविष्य में इस तरह नहीं होना चाहिए। वैसे भी विधायक या मंत्रियों का सदन से गायब रहना आम बात है, किन्तु जब संबंधित मंत्री को जवाब हो और वह सदन में अनुपस्थित रहे तो फिर आसंदी की नाराजगी जाहिर ही है।

चिदम्बरम के खिलाफ दिग्गी राजा का नया तीर

कांग्रेस की राजनीति के अब तक के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह के सक्रिय राजनीति से किनारा करने के बाद चाणक्य की भूमिका में आए सबसे शक्तिशाली महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर ली है। देश में माओवादियों के खिलाफ चिदंबरम ने काफी तेज गति से आक्रमक अभियान छेड रखा है। इसी बीच कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की बाई लाईन से एक दैनिक अखबार में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने माओवादियों पर कार्यवाही के लिए राजनीतिक संवाद के साथ ही साथ समाज और आर्थिक विकास की जमकर वकालत की है। केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार में एक ओर गृह मंत्री पूरे जोर शोर से अभियान को छेडे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर कंाग्रेस के सबसे शक्तिशाली महासचिव की मंशा उसी मामले में इससे उलट ही नजर आ रही है। अफसरान के सामने बडा असमंजस पैदा हो गया है कि वे सरकार की लाईन के साथ चलें या कांग्रेस की पार्टी लाईन को फालो करें।

इंतजार है शिव की आत्मकथा का

जब भी कोई राजनेता आत्मकथा लिखने का प्रयास करता है तब सियासी हल्कों में अनेक नेताओं की सांसे थम सी जाती हैं। इसका कारण यह है कि आत्मकथा लिखने वाला नेता अनेक अनछुए पहलुओं को भी उसमें शामिल कर सामने वाले के कपडे बडे ही करीने से उतार देता है। पिछले साल देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में हुए देश के सबसे बडे आतंकी हमले के कारण देश के गृह मंत्री की कुर्सी गंवाने वाले शिवराज पाटिल अब आत्मकथा लिख रहे हैं। हाथों से लिखी गई यह किताब लगभग एक हजार पेज की है। यद्यपि शिवराज पाटिल का कहना है कि इसमें मसालेदार कोई वाक्या नहीं होगा, न ही यह उनके बचाव का दस्तावेजी ही होगा। 74 वषीZय पाटिल के इस कथन से कम ही नेता इत्तेफाक रख रहे हैं कि इसमे किसी के कपडे नहीं उतारे जाएंगे। सियासी हल्कों में चर्चा है कि शिवराज को गृहमंत्री पद से पदच्युत करने वालों को इस किताब के प्रकाशन से सबसे ज्यादा तकलीफ हो रही है।

गडकरी के नाम से बासी कढी में आ गया उबाल

भाजपा में नए निजाम के चुनने की कवायद के दरम्यान महाराष्ट्र सूबे से नितिन गडकरी का नाम आने से अनेक नेताओं के फ्यूज उड गए हैं। संघ की ओर से भले ही यह स्पष्टीकरण दिया गया हो कि भाजपा में संघ कोई हस्ताक्षेप नहीं करेगा, किन्तु नया अध्यक्ष संघ की सहमति के बाद ही चुना जा सकेगा। संघ के दबाव ने नेताओं के मुंह पर टेप चिपका दिया है, किन्तु इशारों ही इशारों में चर्चाएं तो चल ही रहीं हैं। लोगों का कहना है कि महाराष्ट्र में पार्टी का बंटाधार करने का श्रेय जाता है तो नितिन गडकरी को ही, और राज्य में पार्टी को शर्मनाक स्तर तक पहुंचाने के बाद अगर उन्हें पारितोषक के तौर पर नेशनल हेड बनाया जाता है तो फिर भाजपा कहां जाकर गिरेगी यह नहीं कहा जा सकता है। भाजपा के अंदरखाते में उबल रही इस खिचडी की भनक संघ नेतृत्व को भी है। संघ के नेता परेशान हैं कि आखिर किसको भाजपा का नया मुखिया बनाकर पेश किया जाए। अब दौड में रह गए हैं शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी। इसमें से शिवराज सिंह चौहान का पडला काफी हद तक भारी ही दिख रहा है।

माया दरबार : मिश्रा आउट, दास इन

उत्तर प्रदेश की राजनीति में गुल खिलाने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर अपने इर्दगिर्द ही सोशल इंजीनियरिंग कर ली है। कल तक बसपा के सबसे ताकतवर महासचिव समझे जाने वाले सतीश मिश्रा के दिन लद चुके हैं, उनके स्थान पर कांग्रेस से आए धनकुबेर अखिलेश दास को ज्यादा तवज्जो मिलने लगी है। सतीश मिश्रा के साथ मिलकर मायावती ने उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सत्ता हासिल की। कुछ शिकायतों के चलते मायावती ने सतीश मिश्रा को दूर करना आरंभ कर दिया था। अब तो लगता है कि मायावती का ब्राम्हण प्रेम पूरी तरह समाप्त हो गया है। कल तक मिश्रा समर्थक आईएएस और आईपीएस लाबी अब हाशिए की ओर जाती जा रही है, उसका स्थान ले रहे हैं अखिलेश दास समर्थक अधिकारी। सत्ता का यही खेल है, नेता के आंख फेरते ही औकात दो कोडी की हो जाती है।

एसे तो हो गया आधुनिकी करण
इक्कीसवीं सदी के स्वप्न दृष्टा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को आदर्श मानने वाली कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की समाप्ति के संध्या काल में भी अपने आप को अत्याधुनिक बनाने का प्रयास नहीं किया है। केंद्र सरकार के अनेक विभागों की वेब साईट्स आज भी आधुनिकीकरण को मोहताज हैं। सूत्रों के अनुसार बार बार शिकायतें मिलने पर कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू राजा दिग्विजय सिंह के इशारे पर कैबनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर ने सभी विभागों के सचिवों को ताकीद किया है कि वे अपने अपने विभाग की वेव साईट्स में आवश्यक सुधार कार्य करवाएं। चंद्रशेखर ने साफ तौर पर कहा है कि आधुनिक तकनीक और इंटरनेट पर लोगों की बढती निर्भरता के चलते अब यह आवश्यक हो गया है कि विभागों की वेव साईट आधुनिक हों। कैबनेट सचिव ने विशेष तौर पर यह भी कहा है कि विभाग अपनी वेब साईट को अपडेट अवश्य करके रखें। एक ओर प्रधानमंत्री आधुनिकीकरण पर जोर दे रहे हैं, वहीं उनकी नाक के नीचे के महकमों में आज भी वेब साईट में बाबा आदम के जमाने की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पटियाला नहीं अब कोबरा पैग लीजिए

जाम छलकाने वालों के मुंह से आपने हमेशा पटियाला अर्थात बडा पैग के बारे में तो सुना होगा, अब पटियाला पैग छोडिए जनाब अब तो लीजिए कोबरा पैग। साईबर सिटी के नाम से पहचाना जाने वाला बैंगलुरू में पुलिस और वन विभाग के संयुक्त छापे में एक मशहूर पब से विषधर कोबरा के जहर से बनी शराब जप्त की गई। इस शराब के निर्माण के बारे मे बताते हैं कि इसको बनाने के लिए कोबरा को अल्कोहल से बने मर्तबान में कई दिनों तक रखा जाता है। इसके एक पैग की कीमत 1500 रूपए और पूरी बोतल 21 हजार रूपए की है। सांपों के जहर के शौकीनों के बीच यह काफी मशहूर है। इसके एक घूंट से ही आदमी दूसरी दुनिया की सैर करने लगता है। इस कोबरा शराब का देश के अन्य महानगरों में भी चलन होने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

निजी संस्था का प्रमोशन करती मध्य प्रदेश सरकार

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार इन दिनों विमानन के क्षेत्र की एक निजी संस्था के प्रमोशन में लगी हुई है। इसके लिए सरकार के जनसंपर्क विभाग द्वारा विमानन विभाग के हवाले से एक विज्ञापन भी जारी किया है। आरक्षित वर्ग के लिए एयर होस्टेज और फ्लाईट स्टीवर्ड के प्रशिक्षण के लिए भोपाल, जबलपुर अथवा इंदौर में फ्रेंकफिन इंस्टीट्यूट ऑफ एयर होस्टेज नामक संस्था के नाम से जारी है यह सरकारी विज्ञापन जिसमें आवेदन पत्र बाकायदा उक्त संस्था के संचालक के नाम से ही प्रकाशित किया गया है। इसमें प्रति उम्मीदवार को राज्य शासन द्वारा एक लाख रूपए प्रशिक्षण शुल्क के तौर पर स्वीकृत किया गया है, जो राज्य सरकार सीधे उक्त संस्था को जमा कर रही है। प्रदेश सरकार चाहती तो संचालक विमानन के पास आवेदन बुलाकर इस संस्था का नाम गुप्त रखती और बाद में फिर इस संस्था के पास प्रशिक्षण के लिए भेज देती। विज्ञापन देखकर यही प्रतीत होता है कि मानो सरकार द्वारा उक्त संस्था का धंधा जमाने के लिए इस तरह के जतन कर रही हो।

पुच्छल तारा
इस बार हमें भोपाल से नन्द किशोर जाधव द्वारा एक मेल मिला है जिसमें उन्होंने कहा है कि एक मर्तबा एक आदमी हवाई यात्रा पर जा रहा था। जैसे ही उसने हवाई जहाज पर चढना आरंभ हुआ आकाशवाणी हुई -``यह प्लेन दुघZटनाग्रस्त हो जाएगा और कोई भी जिंदा नहीं बचेगा।`` सचमुच वैसा ही हुआ। अगली बार वह रेल से यात्रा करने जैसे ही रेल पर चढने लगा आवाज आई इस रेल का एक्सीडेंट हो जाएगा। सचमुच वैसा ही हुआ। तीसरी बार वह बस से यात्रा करने जा रहा था फिर आवाज आई इस बस का एक्सीडेंट हो जाएगा। इस बार उस आदमी से नहीं रहा गया उसने पूछ ही लिया -``आप कौन हो भगवन।`` उधर से आवाज आई -``भगवान।`` आदमी छूटते ही बोला -``अरे आप उस वक्त कहां थे, जब मैं घोडी चढ रहा था!!!``

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

भारी हैं भारी उद्योग मंत्रालय के कारनामे

भारी हैं भारी उद्योग मंत्रालय के कारनामे

(लिमटी खरे)


अपने निहित स्वार्थों के लिए देश के नीति निर्धारक किस कदर नियम कायदों को अपनी जेब में रखते हैं इसका उदहारण स्वयंभू मेनेजमेंट गुरू लालू प्रसाद यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए, सुखराम ने संचार मंत्री रहते तो मधु कोडा ने मुख्यमंत्री रहते दिया है। अब भारी उद्योग मंत्रालय में तत्कालीन मंत्री संतोष मोहन देव और वर्तमान में विलासराव देशमुख के शागिZदों ने तबियत से घोटाले और घपले किए हैं।
अमूमन आम जनता की पहुंच से भारी उद्योग मंत्रालय काफी हद तक दूर ही रहता है, क्योंकि लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इस मंत्रालय से कभी दोचार होना ही नहीं पडता है। पिछली बार भारी उद्योग मंत्री बने संतोष मोहन देव ने तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए हैं।
देव के कार्यकाल में अपने चहेतों ठेका देने के लिए नियम कायदों को बलाए ताक रख दिया। देव के गुर्गों का आतंक इस कदर था कि किसी ने भी इनका विरोध करने का माद्दा नहीं था। जिन बेचारे देशप्रेमी सरकारी नुमाईंदों ने इसका प्रतिकार किया उन्हें अपनी नौकरी से ही हाथ धोना पडा।

यह तो देश का सौभाग्य था कि संतोष मोहन देव के कार्यकाल में अफसरशाही और भ्रष्टाचार के जो बेलगाम घोडे दौड रहे थे, वे रूक इसलिए गए कि देव लोकसभा चुनाव हार गए वरना अब तक तो भ्रष्टाचार के न जाने कितने कीर्तिमान स्थापित हो चुके होते।
हिन्दुस्तान में आटोमेटिक स्वचलित चलने वाले वाहनों की जांच परख के लिए देश भर में प्रयोगशालाओं की स्थाना के लिए केंद्र सरकार द्वारा अठ्ठारह सौ करोड रूपए आवंटित किए हैं। इस भारी भरकम राशि के बंदरबांट में भारी उद्योग मंत्रालय ने जमकर भाई भतीजावाद का खेल ``अंधा बांटे रेवडी, चीन्ह चीन्ह कर देय`` की तर्ज पर खेला।
भारी उद्योग मंत्रालय के तहत चलने वाली नेशनल आटोमेटिव टेस्टिंग एंड आर एण्ड डी इंफ्रास्टक्चर प्रोजेक्ट (नेट्रिप) को आवंटित 1800 करोड रूपए का हिसाब किताब भी किसी के पास नहीं है। दरअसल यह राशि रायबरेली, इंदौर, सिल्चर, अहमदनगर, चेन्नई, मानेश्वर आदि में प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए दी गई थी।
1800 करोड रूपए की भारी भरकम राशि में भ्रष्टाचार का खेल आरंभ हुआ कंसलटेंट की शुरूआत के साथ। इसके लिए ग्लोबल टेंडर बुलवाए गए, फिर स्पेन की आईडीआईएडीए, आईसीआए के कंसोर्टियम और आस्ट्रिया के एवीएल को संयुक्त तौर पर इसका कंसलटेंट बना दिया गया।

इस तरह संयुक्त कंपनियों के मार्गदर्शन में काम की शुरूआत हुई, फिर अचानक बीच में ही एवीएल कंपनी ने अपने आप को इस दोड से यह कहकर बाहर कर लिया कि वह इसके लिए निर्माण की निविदा के लिए पार्टीसिपेट करना चाहती है। नियमानुसार देखा जाए तो एवीएल का यह कदम सही था। नेट्रिप ने इसकी इजाजत एवीएल को दे दी।
वस्तुत: अगर एवीएल निर्माण कार्य में रूचि रख रही थी तो नेट्रिप को इस कंपनी को कंसलटेंट नहीं बनाना था, और बना दिया था तो फिर उसे निर्माण कार्य से प्रथक रखा जाना था। कहते हैं लक्ष्मी माता में सबसे अधिक ताकत होती है, और इसी के बल पर देश के नीतिनिर्धाकर आज चुनाव में भी जनादेश तक प्राप्त कर लेते हैं। जब लक्ष्मी माता की कृपा बरास्ता एवीएल नेट्रिप के अफसरान पर हो तो फिर नियम कायदों की धज्जियां उडना स्वाभाविक ही है।
भारी उद्योग मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो एवीएल ने पहले एक हाथ में लाठी और दूसरी में लालटेन लेकर इस परियोजना के बारे में अंधकारमय अंदरखाते की सारी बातों पर प्रकाश डाल दिया फिर ठेकेदार बनकर उसका जमकर फायदा उठाया।
सूत्रों के अनुसार नेट्रिप ने मां लक्ष्मी की चकाचौंध में ठेके की प्रक्रिया में भी बदलाव किया। इसके लिए नेट्रिप ने पारंपरिक सरकारी तरीको तजकर विशेष मूल्यांकन पद्यति इजाद की, जो एवीएल को ठेका दिलाने के लिए उपजाउ माहौल प्रशस्त कर रही थी।
तकनीकि समिति ने इसके बाद एक के बाद एक कर सारे समीकरण एवीएल के पक्ष में करने में कोई कसर नहीं रख छोडी। नेट्रिप ने पावर टैरिन टेस्टिंग इिक्वपमेंट के तहत चार निविदाएं आमंत्रित कीं। इनमें से एक में अमेरिकी मूल की बीईपी कंपनी ने एवीएल को पीछे छोडते हुए लगभग 2 अंक ज्यादा प्राप्त कर लिए।
बीईपी के आगे निकलने से सारा का सारा रायता ही बगर गया। एवीएल के एहसानों तले दबे नेट्रिप के सदस्य और कर्मचारी अधिकारियों ने यह ठेका एवीएल को दिलाने के लिए अब नया जतन आरंभ कर दिया। मजे की बात तो यह है कि इस प्रतिस्पर्धा में पिछडी एवीएल ने नेट्रिप को ही पत्र लिखकर निविदा मूल्यांकन में तब्दीली के सुझाव दे मारे।
चूंकि नेट्रिप की समस्त कठपुतलियों की डोर एवीएल के हाथों में ही थी, एवीएल जैसा चाहे उन्हें नचा रही थी, सो नेट्रिप ने 25 अगस्त को एक बैठक आहूत कर एवीएल के सुझावों को सर माथे पर रख उसकी मंशा के मुताबिक ही निर्णय ले लिया। नए पैमानों पर पुन: मूल्यांकन किया गया तो बीईपी जो दो अंक से ज्यादा से आगे थी वह एवीएल से .16 अंक पीछे आ गई।
इस तरह भारी उद्योग मंत्रालय में एक बहुत भारी घपला हुआ है, जिसकी अगर निष्पक्ष जांच की जाए तो अनेक व्हाईट कालर जनसेवकों की भ्रष्टाचार से सडांध मारती गंदी मैली कालर सामने आ सकती हैं। चूंकि मामला जनता से सीधा जुडा नहीं है, इसे उठाने से सत्ता पक्ष या विपक्ष को फौरी तौर पर कोई लाभ होने वाला नहीं है, इसलिए यह मामला ठंडे बस्ते के हवाले हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

क्या नकली नोट बटोरने बैठी है सरकार

क्या नकली नोट बटोरने बैठी है सरकार

आखिर क्यों नहीं रूक पा रहा है नकली नोट का फैलाव


(लिमटी खरे)


आतंकवादी अलगाववादी संगठनों द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था पर सेंध लगा दी है। देश में अरबों खराबों रूपए के नकली नोट का प्रचलन हो रहा है। सौ, पांच सौ और हजार के नकली नोट आज मार्केट में धडल्ले से चल रहे हैं। नोट को इस तरह तैयार किया गया है कि असली और नकली की पहचान आसानी से नहीं की जा सकती है।


यह सब काम सुनियोजित तरीके से ही किया जा रहा है। पूर्व में राजाओं द्वारा अगर किसी किले को फतह करना होता था तो सबसे पहले वह रसद के सारे रास्ते बंद कर दिया करता था, फिर जब भुखमरी की नौबत आ जाती तो किले का सरदार मजबूरी में आत्मसमर्पण को तैयार हो जाता।


हिन्दुस्तान में भी कमोबेश यही हो रहा है। विदेशी ताकतें देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करने में कोई कोर कसर नहीं रख रहे हैं। हमारे देश के नागरिक और नेता उनके इन नापाक इरादों को सफलता की पायदान चढाने के मार्ग पशस्त करने में लगे हुए हैं।


केंद्र सरकार ने गत दिवस राज्यसभा में यह स्वीकार किया है कि देश में नकली नोटों का चलन तेजी से बढता जा रहा है। केेंद्रीय वित्त राज्य मंत्री नमो नारायण मीणा ने एक प्रश्न के लिखित जवाब में कहा है कि 2006 में 83 करोड 9 लाख 44 हजार 769 रूपए मूल्य के 3 लाख 85 हजार 2 नोट पकडे गए थे।


इसके बाद 2007 में एक अरब 5 करोड 4 लाख 16 हजार 925 सममूल्य के 3 लाख 87 हजार 525 तो 2008 में इनकी संख्या बढकर 6 लाख 55 हजार 901 हो गई जिसकी कीमत दो अरब 56 करोड तीन लाख एक हजार 22 रूपए थी। इस साल 30 सितम्बर तक 2 लाख 47 हजार 995 नकली नोट पकड में आए जिनकी कीमत 90 करोड 7 लाख 64 हजार 200 रूपए थी।


इस तरह देखा जाए तो 2006 से अब तक 16 लाख 76 हजार 423 नकली नोट पकड पाई है सरकार जिसकी कीमत पांच अरब 34 करोड 42 लाख 26 हजार 916 रूपए है। इस बात से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खरबों रूपए व्यय कर देश की सीमाओं की चौकसियों के लिए तैनात तंत्र में घुन किस कदर लग चुकी है कि अरबों खरबों की नकली करंसी देश में आसानी से प्रवेश कर रही है जिसका एक अंश ही अभी सरकार ने अपने कब्जे में लिया है।


भारतीय अर्थ तंत्र तहस नहस होने के कगार पर है किन्तु देश के नीति निर्धारक अपने स्वार्थों को आज भी प्रथमिकता दिए हुए हैं। बाजार में बच्चों के लिए खेलने को बनाए जाने वाले नकली नोट दरअसल इन सौदागरों के लिए रिहर्सल की तरह ही होते हैं जिसमें नुक्ताचीनी निकालकर वे वास्तविक करंसी को छाप देते हैं।


कम ही देश होंगे जो नकली नोट की समस्या से दो चार हो रहे होंगे, अगर होंगे भी तो निश्चित तौर पर भारत जैसी समस्या उनके देश में नहीं होगी। दरअसल अन्य देशों में नेताओं के अंदर आज भी देशप्रेम का जज्बा जबर्दस्त तरीके से कूट कूट कर भरा हुआ है। उनके लिए उनका निहित स्वार्थ प्राथमिकता होगा किन्तु देशप्रेम से बढकर नहीं।


अस्सी के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के एक भाषण को सुनने का सौभाग्य हमें मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में मिला। उस वक्त सीमा से घुसपैठ जारी थी। अटल जी ने कहा कि हमारे देश के गृह मंत्री बयान देते हैं कि आज 25 घुसपैठिए भारत में प्रवेश कर गए। उन्होंने उस समय सरकार से प्रश्न किया था कि क्या सीमा पर तैनात हमारे जांबाज सिपाही इन घुसपैठियों की गिनती के लिए वहां तैनात की गई है, या घुसपैठ रोकने के लिए।


दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वित्त मंत्री आज राज्यसभा में बयानबाजी कर रहे हैं और विपक्ष ब्रहन्ला की तरह बर्ताव कर रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज दमदार विपक्ष के अभाव के चलते केंद्र और राज्य में सरकारें हिटलरशाही पर उतारू हैं। जिसके मन में जो आ रहा है, वह अपने चमडे के सिक्के चला रहा है। पिस रही है आम आवाम।


राज्य सभा में वित्त राज्य मंत्री मीणा के जवाब के बाद किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि सरकार ने आखिर नकली नोट के प्रचलन को रोकने के लिए क्या उपाय किए हैं। इन नकली नोटों के भारत में आने के मार्ग क्या हैं, इस पर विचार भी नहीं किया गया है।


कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के दौरान सियासी दलों के उम्मीदवारों ने तो हद ही कर दी थी। बताते हैं कि मतदाताओं को रिझाने के लिए उन्होंने नकली नोट की बरसात कर दी थी। इस तरह इन दावेदारों ने नकली नोट के बदले असली वोट पा लिया था।


मामला अगर किसी माननीय जनसेवक के निहित स्वार्थ से जुडा होता तो अब तक संसद में कुर्सियां चल जातीं पर मामला देश की अस्मत से जुडा है सो इसके लिए कोई जनसेवक आखिर परेशान हो भी तो क्यों। जनसेवा का दंभ भरने वाले जनसेवकों की तिजोरियों तो असली नोट भरे पडे हैं, फिर भला वे नकली नोट से जूझते आम हिन्दुस्तानी की परवाह करे भी तो क्यों।