बुधवार, 19 मई 2010

राज्‍यसभा के लिए मारामारी चरम पर

पिछले दरवाजे से प्रवेश के लिए रस्साकशी

सोनिया के सिपाहसलारों में गलाकाट स्पर्धा आरंभ

शर्मा पचोरी आमने सामने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 मई। सत्ता की मालई खाने के बाद जनसेवक दुबारा उसे पाने किस कदर आतुर रहते हैं, इसकी बानगी है मध्य प्रदेश और हरियाणा में रिक्त होने वाली राज्य सभा सीटों के लिए मचा घमासान। दोनों ही सीटों पर दावेदारों की संख्या देखकर कहा जा सकता है कि एक अनार सौ बीमार। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा हरियाणा तो पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी मध्य प्रदेश से रिक्त होने वाली सीट पर काबिज होकर पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से संसदीय सौंध तक पहुंचने का जतन कर रहे हैं। पचौरी और शर्मा दोनों ही दस जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के नौ रत्नों में समझे जाते हैं।

मध्य प्रदेश और हरियाणा से रिक्त होने वाली एक एक राज्य सभा सीट से किसकी लाटरी निकलेगी इसके लिए सोनिया गांधी के सिपाहसलारों में छिडी जंग देखते ही बन रही है। एक ओर वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा के लिए राज्य सभा से भेजने के लिए सूबे की तलाश तेजी से की जा रही है तो दूसरी ओर सोनिया के नाक कान समझे जाने वाले पूर्व कार्मिक मंत्री सुरेश पचौरी को पुनः संसद में लाने की तैयारियों की बिसात बिछाई जा रही है। आनंद शर्मा का कार्यकाल इसी साल दो अप्रेल को समाप्त हुआ है तो सुरेश पचौरी का कार्यकाल 2008 में अप्रेल में समाप्त हुआ था, इसके बाद उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का प्रमुख बनाकर भेज दिया गया था।

आनंद शर्मा का नाम हरियाणा से रिक्त होने वाली सीट के लिए चल पडा है। वहीं दूसरी ओर शर्मा विरोधियों ने एक समय मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे चौधरी वीरेंद्र सिंह का नाम आगे कर दिया है। वीरेंद्र के नाम पर आलाकमान असमंजस में पड गया है, क्योंकि चौधरी वीरेंद्र सिंह एक तरह से दस जनपथ की पसंद माने जाते हैं, पर आनंद शर्मा को दुबारा चुनकर लाना सरकार और कांग्रेस के लिए प्राथमिकता बन गई है। अगर हरियाण में शर्मा की दाल नहीं गली तो उन्हें भेजने के लिए महाराष्ट्र पर विचार किया जा सकता है। पर हरियाणा शर्मा को सूट करेगा, क्योंकि भले ही वे हिमाचल में जाकर बस गए हों पर उनके पिता हरियाणा में रहे हैं, इसलिए बाहरी का ठप्पा उन पर नहीं लग सकेगा।

रही बात मध्य प्रदेश की तो यहां प्यारे लाल खंडेलवाल और लक्ष्मीनारायण शर्मा के निधन के कारण दो सीट रिक्त हैं, साथ ही साथ अनिल माधव दुबे का कार्यकाल जून महीने में समाप्त हो रहा है। इन परिस्थितियों में रिक्त होने वाली तीन सीटों में से दो पर भाजपा का कब्जा होगा और एक कांग्रेस के खाते में जा सकती है। मध्य प्रदेश में सूबे के कांग्रेसी मुखिया सुरेश पचौरी की नजरें इस सीट पर हैं। पचौरी विरोधियों ने सूबे की वयोवद्ध तर्जुबेकार आदिवासी बेबाक नेता जमुना देवी का नाम आगे कर पचौरी की मुश्किलें काफी हद तक बढा दी हैं। जमुना देवी वर्तमान में मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, और महिला होने के साथ ही साथ आदिवासी समुदाय से हैं। जमुना देवी के ब्रम्हास्त्र के आगे पचौरी के पास कोई काट दूर दूर तक दिखाई ही नहीं पड रही है।

स्कूलों से चमडे के जूतों की बिदाई जल्द

स्कूलों से चमडे के जूतों की बिदाई जल्द

चमडे के बजाए कपडे के जूतों में नजर आएंगे विद्यार्थी

मेनका गांधी ने किया शंखनाद

विद्यार्थियों के गणवेश में बदलाव जरूरी
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 मई। औपनिवेशिक दासता का प्रतीक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह चमडे के चमचमाते जूतों से लैस विद्यार्थियों के पैरों में अब कपडे के पीटी शू नजर आएंगे। आने वाले दिनों में केनवास के कपडे वाले जूते ही स्कूली विद्यार्थियों के पैरों की शोभा बढाएंगे। शालेय संस्थाओं में इस मामले में सैद्धांतिक सहमति बना ली गई है, अब इंतजार है सरकार के औपचारिक आदेश का। अभी तक इस तरह के जूतों को बच्चे व्यायाम यानी पीटी या खेलकूद के दौरान ही पहना करते थे, अब रोजाना ही बच्चे अपनी यूनीफार्म के साथ इसे पहने दिखेंगे।

पशुओं के बचाने के मसले पर बेहद संजीदा रहने वाली नेहरू गांधी परिवार की बहू श्रीमति मेनका गांधी द्वारा इस तरह का प्रस्ताव दिया था, जिसे सीबीएसई, सीआईएससीई, के अलावा अनेक स्कूल बोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गयाहै। श्रीमति मेनका गांधी द्वारा जुलाई 2009 में इस आशय का एक प्रस्ताव केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र के माध्यम से दिया था। मेनका का कहना था कि स्कूल की वर्दी के साथ औपनिवेश दासता का प्रतीक चमडे के जूते की अनिवार्यता को समाप्त किया जाना चाहिए।

मेनका ने अपने पत्र में लिखा था कि हिन्दुस्तान के लोगों को चमडे के जूते पहनने का फैसला ब्रितानियों ने जबरिया थोपा था। मेनका कहतीं हैं कि फिरंगियों का यह फैसला न केवल बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानीकारक है, वरन् पर्यावरण की दृष्टि से भी उचित नहीं कहा जा सकता है। बकौल मेनका केनवास के जूतें से एक ओर जहां बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड पाएगा, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों के पैसों की बचत भी हो सकेगी।

देश में शिक्षा नीति के निर्धारक माने जाने वाले मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अनुरोध किया था कि वह एक आदेश जारी कर शालाओं से चमडे के जूतों को बेदखल कर दे। मेनका के पत्र को मंत्रालय ने भी हल्के में नहीं लिया। मंत्रालय ने इस बारे में शालाओं से संबंधित बोर्ड से बाकायदा रायशुमारी भी की थी। मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सीआईएससीई और सीबीएसई बोर्ड ने मेनका के प्रस्ताव से इत्तेफाक जताया है। दोनों ही शिक्षा बोर्ड चमडे के जूतों को पर्यावरण विरोधी और बच्चों की सेहत के लिए बहुत ही ज्यादा नुकसानदेह मानते हैं। बोर्ड का मानना है कि चमडे के जूते पसीना नहीं सोख पाते तथा उसके अंदर गंदगी पनपती रहती है, जबकि कपडे के जूते एक ओर पसीना सोख लेते हैं, वहीं दूसरी और केनवास शूज को धोकर साफ किया जा सकता है।

एक अनुमान के अनुसार आज निन्यानवे फीसदी सरकारी और गैर सरकारी शालाओं में गणवेश के साथ चमडे के जूतों का प्रयोग किया जाता है। जानवरों के हितों के लिए काम करने वाली संस्था पीपुल फार एनिमल (पीएफए) द्वारा भी चमडे जूतों को बच्चों के लिए हानीकारक ही माना गया है। संस्था का मानना है कि इससे ज्यादा चमडे की आवश्यक्ता होती है और पशुओं के प्रति क्रूरता को बढावा ही मिलता है। पीएफए के इस अभियान को देश भर में खासा समर्थन मिल रहा है, चेन्नई शहर में सोलह स्कूलों ने गणवेश के साथ चमडे के जूतों पर प्रतिबंध लगा दिया है।

केंद्रीय विदयालय के साथ नित नए प्रयोग

मंगलवार, 18 मई 2010

कौन सा किला संभाले हैं गडकरी


घर नहीं छोडना चाहते गडकरी

विदर्भ पर नजरें गडी हैं गडकरी की

नागपुर, चंद्रपुर, भण्डारा से किस्मत आजमाना चाहते हैं भाजपा के निजाम

कट्टर मुस्लिमों को भाजपा में लाने का एजेंडा है गडकरी का

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 मई। भाजपा के नए निजाम ने इस तरह के संकेत अवश्य दिए हैंे कि वे देश की सबसे बडी पंचायत में पिछले दरवाजे अर्थात राज्यसभा से जाने के कतई इच्छुक नहीं हैं, पर वे आम चुनावों में विदर्भ से किस्मत अवश्य ही आजमाना चाहेंगे। मुस्लिमों को रिझाने की दिशा में भी गडकरी ने भाजपा को आगे लाने के पक्षधर गडकरी ने पांच हजार कट्टर मुस्लिमों को भाजपा में लाकर यह मिथक तोडने का प्रयास किया जाएगा कि अल्पसंख्यकों की भाजपा से दूरी है।

एक समाचार पत्र के साथ चर्चा के दौरान नितिन गडकरी ने कुछ इसी आशय की बातें कहीं हैं। गडकरी का कहना था कि जब तक वे अध्यक्ष रहेंगे, चुनाव नहीं लडेंगे। यह बात गडकरी ने संभवतः इसलिए कही है, क्योंकि वे 2010 में अध्यक्ष बने हैं और उनका कार्यकाल दो वर्ष का होगा, तब तक कोई लोकसभा चुनाव नहीं होगा। 2014 में होने वाले आम चुनावों में वे अवश्य कूद सकते हैं।
गडकरी के करीबी सूत्रों ने भी कमोबेश इसी तरह की बात दोहराई है। सूत्रों का कहना है कि सूबाई राजनीति में भी गडकरी की प्राथमिकता विदर्भ ही हुआ करता था, सो अब भी वे विदर्भ से ही चुनाव लडने की जमीन तैयार कर रहे हैं। गडकरी नागपुर, भण्डारा या फिर चन्द्रपुर से किस्मत आजमा सकते हैं।

भाजपाध्यक्ष बनने के उपरांत गडकरी का ध्यान पार्टी को मजबूत कराने के साथ ही साथ अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोडने की ओर है। गडकरी चाहते हैं कि मुसलमानों में भाजपा और संघ के प्रति जो अविश्वास है, उसे दूर किया जाए। गडकरी का मिशन है कि देश के कट्टर पांच हजार मुसलमानों को भाजपा में शिरकत करवाकर वे मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति फैली गलतफहमी को दूर करने का प्रयास करेंगे।

गडकरी के करीबी सूत्र यह भी बताते हैं कि भाजपा के निजाम गडकरी समाज सेवा में भी खासी दखल रखते हैं। जनसेवक होने के दौरान उन्होंने लगभग चौदह सौ बच्चों के दिल के आपरेशन करवाए हैं इनमें से तीन सौ बच्चे मुसलमान हैं। गडकरी का मानना है कि राजनीति में छल प्रपंच का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सूत्रों की मानें तो गडकरी चाहते हैं कि भाजपा के नेता जनसेवा को सही मायनों में अपनाकर एक आदर्श प्रस्तुत करें।

सोमवार, 17 मई 2010

पीएम बनने का सपना संजोते दिग्विजय

दिग्गी की नजरें 7, रेसकोर्स पर

2012 में राष्ट्रपति बनाए जा सकते हैं मनमोह

आम चुनावों में राहुल शायद ही हों बतौर पीएम प्रोजेक्ट

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 17 मई। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में आने वाले दो वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन का रोडमेप तैयार होने लगा है। देश पर आधी सदी से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस में इन दिनों भविष्य में सत्ता की मलाई खाने की गलाकाट स्पर्धा मची हुई है। कांग्रेस का एक बडा वर्ग जहां अब सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) को 12 तुगलक लेन (राहुल गाध्ंाी का सरकारी आवास) ले जाना चाह रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ प्रबंधक चाह रहे हैं कि 2014 में होने वाले आम चुनावों में भी राहुल गांधी को बतौर प्रधानमंत्री न प्रोजेक्ट किया जाए। इस रोड मेप में 2012 को बहुत ही अहम माना जा रहा है।

10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि 2014 में संपन्न होने वाले आम चुनावों में वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ.मन मोहन सिंह को पार्टी का नेतृत्व नहीं करने देने के मसले पर सोनिया गांधी ने अपनी मुहर लगा दी है। सोनिया के इस तरह के संकेत के साथ ही कांग्र्रेस के अंदर अब 2012 के सन को महात्वपूर्ण माना जाने लगा है। 2012 में देश के महामहिम राष्ट्रपति का चुनाव होना है। कांग्रेस के प्रबंधकों का एक धडा इस प्रयास में लगा हुआ है कि वजीरेआजम डॉ.मन मोहन सिंह को या तो राष्ट्रपति बना दिया जाए या फिर उन्हें स्वास्थ्य कारणों से घर ही बिठा दिया जाए।

कांग्रेस के प्रबंधकों ने सोनिया गांधी को यह मशविरा भी दे दिया है कि अगर 2014 में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत लाने में कामयाब न हो सकी तो राहुल गांधी को पार्टी का नेतृत्व नही करना चाहिए। इन परिस्थितियों में भगवान राम के स्थान पर जिस तरह भरत ने खडांउं रखकर राज किया था, उसी तरह ‘‘खडांउं प्रधानमंत्री‘‘ की दरकार होगी। 2012 में 7, रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की इच्छाएं अब कांग्रेस के अनेक नेताओं के मन मस्तिष्क में कुलाचें भरने लगी हैं। इस दौड में प्रणव मुखर्जी, पलनिअप्पम चिदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे के नाम सामने आ रहे हैं।

कांग्रेस की इंटरनल केमिस्ट्री को अच्छी तरह समझने वालों की नजरें इन सारे नेताओं के बजाए इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के अघोषित चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह पर आकर टिक गईं हैं। मध्य प्रदेश में दस साल तक निष्कंटक राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह ने संयुक्त मध्य प्रदेश में तत्कालीन क्षत्रप विद्याचरण शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल, अजीत जोगी, माधव राव सिंधिया, कुंवर अर्जुंन सिंह और कमल नाथ जैसे धाकड और धुरंधर नेताओं को जिस कदर धूल चटाई थी, वह बात अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नही हुई है।

राजा दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार को वर्तमान में जिस तरह से भरोसे में लेकर नक्सलवाद के मसले पर वर्तमान गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम पर हमले किए हैं, उसे राजा की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की सीढी के तौर पर देखा जा रहा है। राजा के कदम ताल देखकर लगने लगा है कि वे राजपूत नेताओं को लामबंद करने के साथ ही साथ अपनी ठाकुर की छवि को उकेर कर उदारवादी नेताओं का समर्थन भी हासिल करने का जतन कर रहे हैं। चिदम्बरम पर एक जहर बुझा तीर दागकर हाल ही में राजा दिग्विजय सिंह ने कहा था कि पलनिअप्पम चिदम्बरम अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो उन्हें और अधिक उदार बनने की दरकार होगी।

वैसे कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू तथा कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को राह दिखाने के लिए एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में लालटेन लेकर चलने वाले राजा दिग्विजय सिंह एक बात शायद भूल रहे हैं कि कांग्रेस की परंपरा कुछ उलट ही रही है। नेहरू गांधी परिवार की मंशा से इतर जब भी किसी कांग्रेसी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को देखा है, उसे राजनैतिक बियावान में सन्यासी जीवन बिताने बलात ढकेल दिया जाता रहा है।

राजा दिग्विजय सिंह को इसके लिए कांग्रेस का बहुत पुराना नहीं बल्कि सत्तर के दशक के उपरांत का इतिहास ही पलटाना होगा। बाबू जगजीवन राम से बरास्ता हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी और कुंवर अर्जुन सिंह के मन की बातें सामने आने और मंशा स्पष्ट होने के उपरांत उनके साथ कांग्रेस ने किस कदर ‘‘अछूत‘‘ के मानिंद व्यवहार किया है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कल तक कुंवर अर्जुन सिंह के दिखाए पथ पर चलने वाली कांग्रेस ने आज उन्हें दूध की मख्खी के मानिंद निकालकर बाहर फेंक दिया है।

भाजपा मैनेज नहीं हुई तो जाएंगे हरवंश

 

अगर भाजपा मैनेज नहीं हुई तो विस उपाध्यक्ष का जाना तय
देश के हृदय प्रदेश में 2003 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी। इसके बाद 2008 में दुबारा कांग्रेस ने मुंह की खाई और शिवराज सिंह दुबारा सत्तारूढ हो गए। पिछले आठ सालों में भाजपा सरकार द्वारा कांग्रेस को अनेकानेक मुद्दे दिए थे, जिनको आधार बनाकर कांग्रेस द्वारा भाजपा को कटघरे में खडा किया जा सकता था। विडम्बना ही कही जाएगी कि आधी सदी से ज्यादा समय तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सबसे कमजोर विपक्ष क्या होता है, यह दिखा दिया है। भाजपा ने भी केंद्र या प्रदेश में कांग्रेस को भला बुरा कहा है पर यह नूरा कुश्ती से अधिक नहीं था। प्रभात झा के प्रदेश भाजपाध्यक्ष बनते ही भाजपा हरकत में आ गई है। उसने विधानसभा उपाध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठे कांग्रेस के ठाकुर हरवंश सिंह को विधानसभा सत्र के बहिष्कार को लेकर आडे हाथों लिया है। चर्चाओं के अनुसार अब तक प्रदेश में भाजपा हरवंश सिंह के इशारों पर ही कदम ताल करती रही है। पहली मर्तबा भाजपा ने सर उठाया है। प्रभात झा के नेतृत्व में भाजपा में जान फुंकती दिख रही है। इतिहास साक्षी है कि जब भी कांग्रेस के कद्दावर नेता हरवंश सिंह के खिलाफ कोई मुहिम छेडी गई है, उन्होंने अपनी कुशल प्रबंधन क्षमता का परिचय देकर उसे ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया है। सिंह के खिलाफ उन्हीं की कर्मभूमि की सिवनी की तत्कालीन भाजपा सांसद श्रीमति नीता पटेरिया ने आमानाला कांड में धारा 307 के तहत प्रकरण पंजीबद्ध करवाया था, सूबे में भाजपा सरकार के होते हुए यह प्रकरण का बनना और उसी सरकार के रहते हुए भी खात्मा के लिए अग्रसर होना हरवंश सिंह के कुशल प्रबंधन की एक बानगी ही माना जा रहा है। मध्य प्रदेश में चर्चा गरम है कि अगर इस बार भाजपा अगर विधान सभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के हाथों मैनेज नहीं हुई तो हरवंश सिंह को विधानसभा उपाध्यक्ष की संवैधानिक कुर्सी को छोडना ही पडेगा।
बिना काम की टीम गडकरी
भाजपा इन दिनों सुस्सुप्तावस्था में हैै। इसका कारण यह है कि भाजपा के नए निजाम की पहली दिल्ली रैली में ही वे गर्मी को सहन न कर पाए और गश खाकर गिर पडे। अब जब तक मौसम ठीक ठाक नहीं होता भाजपा के सुकुमार नेता प्रदर्शन से परहेज ही करेंगे। भारतीय जनता पार्टी मेें टीम गडकरी की घोषणा के लगभग पचास दिनों बाद भी वह पूरी तरह से निष्क्रीय ही दिख रही है, इसका कारण यह है कि टीम गडकरी का गठन तो कर लिया गया है, पर किसी को कोई जवाबदारी नहीं दी गई है। 11 अशोक रोड (भाजपा का नेशनल आफिस) में चल रही चर्चाओं के अनुसार बडे कद वाले हेवीवेट नेताओं को साधने के चक्कर में गडकरी द्वारा अनेक सूबों के भाजपाध्यक्षों की घोषणा भी नहीं कर सके हैं। पार्टी में विभिन्न प्रकोष्ट के अध्यक्षों के पद रिक्त हैं। इतना ही नहीं टीम गडकरी के पदाधिकारियों के बीच काम के बटवारे के अभाव में वे पार्टी मुख्यालय में आकर मुंह बजाने को मजबूर हैं। अब तो लोग नितिन गडकरी की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए यह भी कहने लगे हैं कि टीम गडकरी अब काम के अभाव में बिना काम की ही बची है।
बडबोलों ने घेरा मनमोहन को
देश के वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह इन दिनों खासे परेशान नजर आ रहे हैं, उनकी पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रहीं हैं। इसका प्रमुख कारण उनके ही मंत्रियों का जबान पर काबू न होना। शशि थुरूर, एम.एस.कृष्णा द्वारा मंहगे होटलों में रूककर, फिर थुरूर के आईपीएल और अन्य विवादों में फंसने के कारण हुई बिदाई, जयराम रमेश और कमल नाथ के हाट एण्ड कोल्ड वार, ए.राजा के घोटाले, चिदम्बरम वर्सिस दिग्विजय सिंह आदि विवादों के बाद अब एक बार फिर जयराम रमेश द्वारा अपने विभाग से इतर चीन की हिमायत करने के आरोप से प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह परेशान हो उठे हैं। रमेश ने चीन की संचार कंपनियों पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की थी। विपक्ष का कहना है कि भारत गणराज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश चीन के लाईजनिंग एजेंट के मानिंद काम कर रहे हैं, उन्हें तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। वहीं भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने मध्य प्रदेश के तेंदूखेडा में यह कहकर सनसनी फैला दी कि फोरलेन उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा से होकर जाएगा। यद्यपि यह कूटनीतिक बयान ही था, गौरतलब होगा कि स्वर्णिम चतुर्भुज का उत्तर दक्षिण गलियारा अब शेरशाह सूरी के जमाने के राष्ट्रीय रजमार्ग क्रमांक सात पर अवस्थित सिवनी के बजाए छिंदवाडा होकर जाए इसके लिए कमल नाथ प्रयासरत हैं। मामला चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, फिर कमल नाथ द्वारा इस तरह के बयान देने से लगने लगा है कि वे सर्वोच्च न्यायलय से अपने आप को उपर ही मान रहे हैं।
सुरेश की जमानत पर बचेंगे कैलाश
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह कार्यवाहक सुरेश सोनी की इन दिनों भाजपा में तूती बोल रही है। पहले मध्य प्रदेश में प्रभात झा के विरोध के बावजूद भी उन्हें प्रदेशाध्यक्ष का ताज पहनवाकर सोनी ने अपनी कुशल रणनीति और प्रबंधन गुरू होने का प्रमाण दे दिया। अब सुरेश सोनी मध्य प्रदेश के एक विवादस्पद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के तारण हार की भूमिका में नजर आ रहे हैं। भ्रष्टाचार और कदाचरण के अरोपों से घिरे कैलाश विजयवर्गीय की रवानगी इस सप्ताह तय थी। गंभीर आरोपों के बावजूद भी कैलाश का मंत्री पद पर बने रहना आश्चर्य का विषय ही माना जा रहा है। बताते हैं कि सुरेश विजयवर्गीय की कुर्सी के पायों को उनके विरोधी और खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी हिला नहीं पा रहे हैं, क्योंकि चारों पाए सुरेश सोनी ने जो पकड रखे हैं। सोनी के समर्थन और संरक्षण के कारण कैलाश विजयवर्गीय बने हुए हैं। मध्य प्रदेश की सूबाई राजनीति में सुरेश सोनी जिस कदर ताकतवर होकर उभर रहे हैं, वह निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए शुभ लक्षण नहीं माना जा रहा है।
दूजी बीबी नहीं है मैंटिनेंस की हकदार
पहले से शादी शुदा आदमी के तलाक के बिना अगर कोई महिला उससे शादी करती है तो वह महिला गुजारा भत्ता पाने की अधिकारी नहीं है। मुंबई उच्च न्यायालय के जस्टिस ए.पी.देशपाण्डे वाली डिविजन बैंच ने यह व्यवस्था देते हुए कहा है कि हिंदू विवाह कानून और यहां तक कि हिंदू एडाप्शन एंड मेंटिनेंस एक्ट (हामा) के तहत एसी महिला गुजारा भत्ता पाने के लिए दावा नहीं कर सकती है। उच्च न्यायालय का कहना है कि अगर पहली पत्नि जिंदा है तो दूसरे विवाह का अधार ही नहीं बनता है। वादी ने अपने परिवाद में कहा कि उसके पति ने उससे वैधानिक तौर पर विवाह रचाया था अतः वह गुजारा भत्ता की अधिकारिणी है। कोर्ट का कहना था कि जब वह हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत उसकी दूसरी पत्नि का दर्जा ही नहीं रखती है तो वह फिर गुजारा भत्ता की हकदार कैसे है। जब दूसरी पत्नि जानती है कि उसके कथित पति की पहली पत्नि जिंदा है, और वह उसके साथ रह रही है तब वह मैंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती है। हामा के तहत इस तरह का क्लेम तभी किया जा सकता था जबकि यह हिन्दू मेरिज एक्ट 1955 के प्रभाव में आने के पहले की गई हो। इसके लागू होने के पहले हिन्दू कस्टमरी कानून में दो पत्नियां वैध थीं।
मुफत में नहीं मिलने वाला ‘आधार‘
केंद्र सरकार देश के समस्त नागरिकों को अनिवार्य पहचान नम्बर ‘‘आधार‘‘ मुहैया करवाने जा रही है। देश में अवैध तरीके से रहने वाले बंग्लादेशी और पाकिस्तानी नागरिक इससे बुरी तरह भयाक्रांत हैं। इसका कारण यह है कि अगर बारीकी से कार्यवाही की गई तो इन्हें देश छोडने पर मजबूर होना पड सकता है। इस तरह का यूआईडी नंबर देश के नागरिकों से इसकी रकम वसूलेगा जबकि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों को यह निशुल्क मिल सकेगा। जनगणना आरंभ हो चुक है। यूआईडी प्राधिकरण 2011 से लोगों को यूआईडी नंबर मुहैया करवाएगा। सरकार एपीएल के लोगों से इसकी कितनी कीमत वसूलेगा इस बारे में अभी तय नहीं हो सका है। इस यूआईडी नंबर में महती जानकारियां होंगीं। लोगांे को इंतजार है कि लोगों का यह आधार लोगों की कितनी अधिक जेब ढीली करने के बाद उपलब्ध होगा। इससे केंद्र सरकार को हर वर्ग के लोगों की वास्तविक जानकारी तो मुहैया होगी ही साथ ही देश में घुसपैठियों के बारे में भी पता चल सकेगा।
हांफने लगा है त्रणमूल - कांग्रेस गठबंधन
पश्चिम बंगाल पर काबिज होने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और त्रणमूल कांग्रेस के बीच कभी न समाप्त होने वाली प्रतिस्पर्धा चल पडी है। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि त्रणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी को समझाया है कि अगर कांग्रेस उन्हें पश्चिम बंगाल में काबिज कराने में मदद करे तो त्रणमूल कांग्रेस द्वारा केंद्र मंे कांग्रेस को बिना शर्त और बिना मंत्री पद लिए समर्थन दिया जा सकता है। बताते हैं कि ममता के इस लाई लप्पा से कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह और बंगाल की राजनीति की धुरी रहे प्रणव मुखर्जी सहमत नहीं है। उनका कहना है कि कांग्रेस भले ही समझौते पर लडे पर किसी भी कीमत पर ममता को वहां प्रमोट नहीं किया जा सकता है। दोनों ही नेताओं को डर है कि अगर ममता को बंगाल पर काबिज कर दिया गया तो आने वाले दिनों में ममता फिर से केंद्र में कांग्रेस को आंखे दिखा सकतीं हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस और त्रणमूल कांग्रेस का गठबंधन लडखडाने लगा है।
नंबर पोर्टेबिलिटी मामले में दिल्ली अभी दूर है
नंबर वही, पर मोबाईल सेवा प्रदाता आपकी पसंद का, अर्थात नंबर पोर्टेबिलिटी के मामले में अभी और समय लगने की उम्मीद है। भारत संचार सेवा निगम लिमिटेड बीएसएनएल, महानगर संचार निगम लिमिटेड एमटीएनएल, सहित अनेक निजी मोबाईल सेवा प्रदाता इसके लिए तैयार नहीं हैं। लंबे समय से नंबर पोर्टेबिलिटी की बात सरकार द्वारा कही जा रही है, पर खराब सेवा देने वाली कंपनियों को डर है कि कहीं उसके उपभोक्ता किसी अन्य सेवा प्रदाता के पास न चले जाएं, इसीलिए इन कंपनियों द्वारा इसके लिए आवश्यक तकनीक विशेषकर एमएनपी गेटवे तक नहीं जुटाई गईं हैं। संचार विभाग द्वारा बार बार तिथियों को बढाने के बाद अब कहा गया है कि नंबर पोर्टेबिलिटी सुविधा आने वाले 30 जून से आरंभ कर दी जाएंगी। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत गणराज्य में नंबर पोर्टेबिलिटी का सपना अभी हकीकत में बदल नहीं पाएगा, इस मसले में अभी दिल्ली बहुत दूर ही नजर आ रही है।
समस्या की जड प्रगति मैदान गो आउट ऑफ डेल्ही
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों के चलते सडकों पर जाम लगना आम बात हो गई है। इंडिया गेट, आईटीओ, यमुना पार, इंद्रप्रस्थ वाली रिंग रोड, मथुरा रोड जैसी महात्वपूर्ण सडकों पर जाम लगने का प्रमुख कारण प्रगति मैदान ही है। यहां होने वाले आयोजन दिल्ली की रफ्तार को थाम देते हैं। यह हम नहीं संसद की एक समिति का कहना है। शांता कुमार की अध्यक्षता वाली वाणिज्य विभाग संबंधी संसदीय स्थाई समिति का कहना है कि आईटीपीओ के तहत आयोजित होने वाले व्यापार मेलों को प्रगति मैदान के बजाए दिल्ली शहर के बाहर जगह मुहैया करवाई जानी चाहिए, ताकि मेले ठेले के दौरान दिल्ली की यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके। समिति ने वाणिज्य और उद्योग विभाग की 2010 - 2011 की अनुदान मांगों के सबंध में 93वें प्रतिवेदन में यह सिफारिश की है। अब देखना यह है कि इस सिफारिश को सरकार वैसे ही मानती है, या फिर किसी को माननीय न्यायालय की शरण में जाना होगा।
साल भर में ही उखडने लगीं एयरपोर्ट की सांसें
देश की राजधानी दिल्ली को देश का आईना कहा जाता है। विदेशों से आने वाले इस शहर को देखकर शेष भारत के हालातों का अंदाजा आसानी से लगा सकता है। नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की शक्ल सूरत तो काफी सुधार दी गई है, किन्तु इससे लगा घरेलू हवाई अड्डा (डोमेस्टिक एयरपोर्ट) आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहाने पर मजबूर है। आलम यह है कि घरेलू हावाई अड्डे के आगमन अर्थात एरावल प्वाईंट पर एक तरफ की दीवार में दरारें साफ दिखाई पड रही हैं। डिपार्चर टर्मिनल की छत का पेंट उखडने लगा है। आग बुझाने वाले फायर एक्सटेंविशर भी गायब हैं। यह सब तब है जबकि डिपार्चर टर्मिनल 1 डी को 500 करोड रूपए खर्च कर अत्याधुनिक बनाया गया है। इसका व्यवसायिक उपयोग पिछले साल 19 अप्रेल से आरंभ हुआ था। इसमें लगी लिफ्ट में भी पावर बेकअप नहीं के बराबर है। विमानन विभाग के दिल्ली स्थित एयरपोर्ट के आलम यह हैं तो शेष भारत की कल्पना करना बेमानी ही होगा।
कामनवेल्थ में गोमांस नहीं
बार बार चेताने के बाद अब सरकार की तंद्रा टूटती दिख रही है। कामन वेल्थ गेम्स के दौरान मेहमानों को गोमांस परोसने की खबरों ने सरकार की नींद उडा दी थी। अब कामन वेल्थ गेम्स की आर्गनाईजिंग कमेटी ने साफ कर दिया है कि खेल के दौरान मेहमानों को बीफ अर्थात गोमांस नहीं परोसा जाएगा। वैसे कमेटी का प्रयास है कि खेल के दौरान एथलीट्स और उनके साथ आने वाले अधिकारियों को उत्तम क्वालिटी की केटरिंग सर्विस चोबीसों घंटों उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें पोष्टिक खाना और नाश्ते के साथ ही साथ डाईट के संबंध में पूरा ध्यान रखा जाएगा। वैसे अर्गनाईजिंग कमेटी आने वाले मेहमानों को उनका मनपसंद भोजन परोसने के लिए बाध्य ही है। गौरतलब है कि भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी से आग्रह किया था कि मेन्यू से बीफ को बाहर कर दिया जाए। भाजपा के प्रभाव वाली दिल्ली नगर निगम ने भी गोमांस परोसे जाने की खिलाफत करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था।
दाउद के निशाने पर थे मोदी
आईपीएल में आर्थिक अनियमितताओं और केंद्र सरकार के मंत्री शशि थुरूर को सत्ता के गलियारे से बाहर का रास्ता दिखाने वाले आईपीएल के पूर्व चेयर पर्सन ललित मोदी कुख्यात अंडर वर्ल्ड डॉन दाउद अब्रहाम के निशाने पर थे। इंटरपोल के बाद सबसे चुस्त पुलिस मानी जाने वाली मंुबई पुलिस को इस तरह के संकेत मिले थे कि ललित मोदी को आईपीएल 3 के दौरान ही मुंबई, दिल्ली या बंग्लुरू में जान से मारने की योजना थी। मुंबई पुलिस सूत्रों का कहना है कि इस साल जनवरी में ही पुलिस को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी और यही कारण है कि मोदी को हथियार बंद दो पुलिस कर्मी चोबीसों घंटे घेरे रहते थे। मोदी की सुरक्षा में प्रतिदिन का खर्च पचास हजार रूपए था। मोदी को एस्कार्ट तक मुहैया करवाई गई थी। अब तक इस बात का खुलासा नहीं हो सका है कि दाउद आखिर मोदी को मोत के घाट उतारना क्यों चाह रहा था। इसके पीछे आर्थिक वजह थी या फिर कोई अन्य विवाद।
ये है मंत्री जी का असली चेहरा
मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य मण्डला जिले में बीते दिवस बरात की एक बस बिजली की हाई टेंशन लाईन से टकराकर दुर्घटना ग्रस्त हो गई, इसमें 28 लोग घटनास्थल पर भगवान को प्यारे हो गए। हृदय विदारक इस घटना ने सभी को झझकोर कर रख दिया सिवाय सूबे के आदिवासी विकास के मंत्री के। ग्राम मण्डला के सूरजपुरा के पास बीते शुक्रवार को हुई इस दुर्घटना के बाद सूबे के तीन मंत्रियों ने पीडितों के परिजनों के पास जा उनका ढाढस बंधाने का उपक्रम किया। इसमें मण्डला मूल के मंत्री देवी सिंह सय्याम, मण्डला के प्रभारी मंत्री जगन्नाथ सिंह और आदिवासी विकास मामलों के मंत्री कुंवर विजय शाह शामिल थे। तीनों मंत्रियों ने परिजनों को सांत्वाना दी। इनमें से सय्याम और जगन्नाथ सिंह तो पीडितों के परिजनों से मिलने उनके गांव गए पर अजाक मंत्री कुंवर विजय शाह ने वहां जाना मुनासिब नहीं समझा। कुंवर विजय शाह ने इसके बजाए मण्डला जिले की धरोहर विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क की सैर करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। भीषण गर्मी में जंगल की सुरम्य वादियां बाहंे फैलाकर माननीय मंत्री जी को बुला जो रहीं थीं।
पुच्छल तारा
पिंकी उपाध्याय एक बहुत ही मजेदार ईमेल भेजते हैं, वे कहते हैं कि देश का हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश समूचे देश में पहला एसा प्रदेश है, जहां के लोग हर घंटे दो घंटे में खुशियां मनाते हैं। पूछिए कैसे, अरे बहुत आसान है भई आप भी आईए मध्य प्रदेश में और देखिए कि यह कैसे संभव होता है। अरे भाई साहब हर घंटे दो घंटे में सूबे के लोग खुशी से पागल होकर चिल्लाते हैं, ‘‘लाईट आ गई, लाईट आ गई।‘‘ दरअसल मध्य प्रदेश में बिजली की अघोषित कटौती ने यहां के रहने वालों के नाम में दम कर रखा है।

रविवार, 16 मई 2010

आपरेशन सुषमा गडकरी में लगे हैं आडवाणी

आपरेशन सुषमा गडकरी में लगे हैं आडवाणी

सुषमा के फ्लोर मेनेजमेंट को बढा चढा कर पेश कर रही आडवाणी मण्डली

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 मई। नितिन गडकरी की ताजपोशी के उपरांत बलात पार्श्व में ढकेल दिए गए राष्ट्रीय जनतांत्रिग गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी और उनकी मण्डली इन दिनों भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी और आडवाणी की जगह पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनीं सुषमा स्वराज की जडों में मट्ठा डालने का काम पूरे जतन से कर रहे हैं। नितिन गडकरी के खिलाफ आडवाणी मण्डली ने दुष्प्रचार तेज कर दिया है। गौरतलब है कि आडवाणी की मर्जी के खिलाफ संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सुषमा को नेता प्रतिपक्ष तो गडकरी को भाजपाध्यक्ष बनाया था।

राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी के करीबी सूत्रों का दावा है कि आडवाणी ने अपनी शातिर चालों से गडकरी और सुषमा को फ्लाप साबित करने और उनकी मण्डली ने शिबू सोरेन प्रकरण में नितिन गडकरी को घेरना आरंभ किया है। भाजपा के अंदरखते में चल रही चर्चाओं के अनुसार कटौती प्रस्ताव पर सरकार को घेरने के में विफल रही भाजपा की इस पराजय का ठीकरा सुषमा स्वराज के फ्लाप फ्लोर मेनेजमेंट पर फोडना आरंभ कर दिया है।

इसके बाद इसी मामले में भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी को भी असफल बताने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया को लीक की गई खबरों में इस बात को प्रमुखता से उछाला जा रहा है कि जब भाजपा झामुमो की संयुक्त सरकार थी तो फिर क्या सोरेन को दिल्ली बुलाकर भाजपा के खिलाफ वोट डलवाने के लिए बुलाया गया था। इतना ही नहीं डिनर डिप्लोमेसी के दर्मयान ही जब इस बात का खुलासा हुआ कि सोरेन ने लोकसभा में भाजपा के खिलाफ मताधिकार का प्रयोग किया तो कांग्रेस का तो कुछ नहीं बिगडा, भाजपा झामुमो की सरकार ही नेस्तनाबूत हो गई।

भाजपा के निजाम का कांटों भरा ताज पहनने के बाद नितिन गडकरी ने अपनी पहली उपलब्धि के तौर पर झारखण्ड में सरकार बनाकर साबित किया था कि उनका प्रबंधन बेहद अच्छा है। इसके बाद कटौती प्रस्ताव में भाजपा की शर्मनाक हार और उसी झारखण्ड में झामुमो और भाजपा की सरकार का गिरना अशुभ संकेत ही माना जा रहा है। इस सबके साथ ही साथ कुशाग्र बुद्धि के धनी एल.के.आडवाणी देश भर में सुषमा, गडकरी और संघ के खिलाफ यह संदेश देने में तो सफल रहे हैं कि सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी का प्रबंधन कितना उथला है, इसके अलावा संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सुषमा और गडकरी को पदों पर बिठाकर भाजपा का कितना नुकसान किया है।

गडकरी के करीबी सूत्रों की मानें तो शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत जब सोरेन को लेकर गडकरी के पास गए तो हेमंत को आधा घंटा तो सोरेन के बारे में समझाने में ही लग गया। दरअसल गडकरी यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि यही गुरू जी हैं, क्योंकि गडकरी सूबाई राजनीति से आए हैं और उन्होंने सोरेन से शायद ही कभी भेंट की हो। उधर राजनाथ सिंह के राईट हेण्ड निशिकान्त दुबे जो आजकल सुषमा स्वराज की गुड बुक्स में हैं, को शिबू सोरेन के साथ लगाया गया था, पर वे भी सोरेन को भाजपा के पक्ष में वोट दिलवाने में नाकामयाब रहे।

हालात देखकर लगने लगा है कि अपनी उपेक्षा से आहत वयोवृद्ध नेता एल.के.आडवाणी द्वारा अब चुन चुन कर भाजपा के उच्च पदों पर आसीन उन लोगों को निशाना बनाना आरंभ कर दिया है, जिनकी वजह से देश के पहले और इकलौते पीएम इन वेटिंग को बलात पार्श्व में ढकेला गया हो। अब देखना यह है कि आडवाणी मुख्य धारा में लौट पाते हैं या संघ अपनी दबी इच्छाओं को परवान चढा पाता है।

सावधान! टोल फ्री के चक्कर में लुट न जाना

सावधान! टोल फ्री के चक्कर में लुट न जाना
 
निजी सेवा प्रदाता वसूल रहे हैं बाकायदा शुल्क

 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 मई। किसी भी उत्पाद या अन्य विषयों की जानकारी के लिए मुफ्त की दूरभाष सेवा (टोल फ्री नंबर) का प्रयोग करने के पहले आप सौ बार सोच लीजिएगा, कहीं एसा न हो कि आप जिसे टोल फ्री नंबर समझ रहे हों वही नंबर के माध्यम से सेवा प्रदाता कंपनी आपकी जेब हल्की कर रही हो। यह सच है कि 10 और 11 मई की दर्मयानी रात 12 बजे से निजी सेवा प्रदाता कंपनियों ने टोल फ्री नंबर को भी सशुल्क में तब्दील कर दिया है।
 
संचार मंत्रालय के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि निजी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने इस तरह की व्यवस्था लागू कर दी है कि 11 मई के आरंभ होते ही अब उनका कोई भी नंबर टोल फ्री नंबर नहीं रह जाएगा। मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों के कस्टमर केयर के नंबर इसमें शामिल किए गए हैं कि नहीं यह बात अभी साफ नहीं हो सकी है। सूत्रों ने कहा है कि निजी तौर पर मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने किसी भी तरह की जानकारी देने को अब सशुल्क बना दिया है। 11 अंको वाले टोल फ्री नंबर अब सशुल्क ही हो गए हैं। इसके अलावा कंपनियों से बात करने पर भी पैसा लगेगा।
 
सूत्रों की मानें तो आईडिया, रिलायंस, भारती एयरटेल, वोडाफोन सहित सभी बडी और छोटी कंपनियों ने इस व्यवस्था को लागू कर दिया है। अमूमन प्री पेड उपभोक्ता द्वारा टोल फ्री नंबर से बात करने के बाद अपना बेलेंस चेक नहीं किया जाता है, और न ही पोस्ट पेड उपभोक्ता द्वारा अपने आईटमाईज्ड बिल को बारीकी से देखा जाता है। सूत्रों ने कहा कि इनमें से नामी गिरामी कंपनियांे ने तो एक अप्रेल से सात अप्रेल के बीच इसका प्रयोग कर उपभोक्ताओं की जेबें हल्की भी कर दीं हैं। बताते हैं कि टाटा ने इस व्यवस्था से अपने आप को अलग थलग ही रखा है।
 
इस नई व्यवस्था में उपभोक्ता को टोल फ्री नंबर पर बात करने पर कितना भोगमान भोगना होगा यह बात अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है। कंपनियों में चल रही चर्चाओं के अनुसार कंपनियां इस मामले में तीन मिनिट के लिए पचास पैसे शुल्क वसूलने की योजना बना रही है। अगर उपभोक्ता ने चर्चा एक सेकंड भी उपर की तो उसके दूसरे पचास पैसे कट जाएंगे।

कहां देख रहे हो


शनिवार, 15 मई 2010

केंद्रीय विद्यालय पर कोर्ट का डंडा

केंद्रीय विद्यालय पर कोर्ट का डंडा
 
केवीएस से पूछा अमीर गरीब में भेदभाव क्यों
 

(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली 15 मई। दिल्ली उच्च न्यायलय ने केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) से पूछा है कि वह अमीर और गरीब तथा उमर में भेदभाव कर देश के नौनिहालों को शिक्षा से महरूम कैसे रख सकता है। एसा दो अलग अलग शिकायतों पर दायर याचिका में कहा गया है। इन शिकायतों पर कोर्ट ने केवीएस से जवाब तलब किया है। उच्च न्यायालय के न्यायधीश कैलाश गंभीर ने गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) और दाखिले के दौरान आयु निर्धारण संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए केवीएस से जवाब मांगा है।
 
उच्च न्यायालय में दायर एक मामले में विकलांगता की मार झेल रहे विनय कुमार के तीन बच्चों की फीस माफ करने से केवीएस के इंकार और दूसरे मामले में केवीएस में दाखिले के दौरान उम्र केवल एक माह ज्यादा होने पर दाखिला देने से मना करने की शिकायत की गई है। कानूनविदों का कहना है कि शिक्षा के अधिकार कानून के उपरांत केवीएस बच्चों को अनिवार्य और आवश्यक्ता पडने पर निशुल्क शिक्षा देने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने केवीएस को फटकार लगाते हुए कहा है कि महज फीस अदा न कर पाने के कारण बच्चों की पढाई बाधित नहीं की जा सकती है।
 
एक अन्य मामले में केवीएस में दाखिले के वक्त अमन चौधरी की आयु सात साल एक माह और दो दिन थी, जिसके चलते केवीएस ने अमन को पहली कक्षा में दाखिला देने से मना कर दिया। पहली कक्षा में दाखिले के लिए आयु की सीमा चार से सात सात तक निर्धारित की गई है, जिसका पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। अमन के दाखिले के वक्त उसकी आयु निर्धारित आयु से महज एक माह दो दिन ज्यादा थी।
 
अमन की ओर से उनके अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने कहा कि दाखिले के वक्त निर्धारित से महज एक माह अधिक आयु होने पर दाखिले से इंकार करना न केवल अन्यायपूर्ण है वरन् शिक्षा के अधिकार कानून के तहत किए गए प्रावधान कि 7 से 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। अदालत ने दोनों ही मामलों में कडा रूख अपनाते हुए केवीएस को अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
 
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लागू हो जाने के उपरांत गरीबी या आयु के कारण किसी को भी शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता है, वहीं दूसरी और केंद्रीय विद्यालय संगठन का कहना है कि गरीबी रेखा के नीचे बीपीएल कार्डधारकों के महज दो बच्चों की ही फीस माफ की जा सकने का प्रावधान है, साथ ही साथ पहली कक्षा में दाखिले के लिए आयु सीमा चार से सात साल निर्धारित की गई है, जिसका कडाई से पालन किया जाता है।

नए राज्‍यों के बहाने सियासत



शुक्रवार, 14 मई 2010

दक्षिण का नेहरू गांधी परिवार

दक्षिण का नेहरू गांधी परिवार
 
करूणानिधि के उत्तराधिकारी खा रहे मलाई
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 14 मई। आजाद भारत में अगर किसी परिवार की तूती बोलती है तो वह है नेहरू गांधी परिवार की। इस परिवार के सदस्य पंडित जवाहर लाल नेहरू आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने तो उनकी पुत्री इंदिरा गांधी पहली महिला प्रधानमंत्री इसके बाद उनके पुत्र राजीव गांधी भी वजीरेआजम रहे। राजीव गांधी की पत्नि श्रीमति सोनिया गांधी आज किसी पद पर न होने के बाद भी देश की सबसे ताकतवर महिला हैं। उनके पुत्र राहुल गांधी कांग्रेस के युवा और ताकतवर महासचिव के साथ ही साथ कांग्रेसियों की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री भी हैं।
 
इसके बाद अगर देखा जाए तो दक्षिण भारत में भी एक नेहरू गांधी परिवार है, जिसका हर सदस्य मलाई खा रहा है। वह है तमिलनाडू के मुख्यमंत्री करूणानिधी। करूणानिधी आज उमरदराज हो चुके हैं, वे इतने आसक्त हो चुके हैं कि उनसे व्हील चेयर से उठा तक नहीं जाता है। उन्होंने बडी ही चतुराई से तमिलनाडू सूबे में अपने परिवार को स्थापित कर दिया है। अब वे निश्चिंत हैं, पर कुर्सी से चिपके ही हैं। उनके सामने ही उनके कुनबे में गलाकाट स्पर्धा मची हुई है, वे हैरान परेशान हैं, पर यह विवाद शांत होता नहीं दिखता।
 
करूणानिधी ने अपने बेटे एम.के.स्टालिन को उपमुख्यमंत्री की आसंदी दी हुई है, तो दूसरे बेटे एम.के.आगाझिरी को केंद्र सरकार में मंत्री बनवाया हुआ है। करूणानिधी की तीसरी और अंतिम पत्नि से पैदा हुई उनकी पुत्री कनिमोझी भी कहां पीछे रहने वाली थी, उसे भी करूणानिधी ने राज्यसभा के रास्ते संसदीय सौंध तक पहुंचा ही दिया।
 
करूणानिधी इन दिनों कुछ परेशान नजर आ रहे हैं। इसका कारण उनकी राजनैतिक विरासत को लेकर स्टालिन और आझागिरी के बीच होने वाला विवाद है। बताते हैं कि आझागिरी को न तो हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी में वे पारंगत हैं, सो तमिल बोलकर ही काम चलाते हैं, मगर दिल्ली तमिल में कही बात ठीक से सुन नहीं पाती है। पीएमओ के सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री भी उनसे खासे परेशान हैं। आझागिरी चाहते हैं कि वे वापस तमिलनाडू जाकर धूनी रमाएं, पर करूणानिधी चाहते हैं कि स्टालिन को मुख्यमंत्री बनाया जाए। दक्षिण के कथित नेहरू गांधी परिवार के मुखिया करूणानिधी के सामने सबसे बडा संकट यह है कि जयललिता भी वहां मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजरें गडाए बैठी हैं, और करूणानिधी के सामने भले ही वे बौनी हों पर उनके बेटों पर तो वे बीस ही पडने वालीं हैं।

गजब की है सत्ता के प्रति आतुरता

गुरुवार, 13 मई 2010

एक लाख रूपए रोजाना खर्च के बावजूद प्यासे हैं कंठ

एक लाख रूपए रोजाना खर्च के बावजूद प्यासे हैं कंठ 
बाड ही चरने लगी है खेत को
 
22 करोड की योजना में 13 करोड का बिजली का बिल बकाया
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसी सूबे में भगवान शिव की नगरी सिवनी में क्या समानता है, इस प्रश्न का उत्तर दोनों ही शहरों में रहने वाला हर एक नागरिक दे सकता है। दोनों ही शहरों में पेयजल के पर्याप्त स्त्रोत होने के बावजूद भी दोनों ही शहरों के नागरिकों के कंठ सूखे और मटके रीते रहते हैं। भोपाल में विशाल जलसंग्रह क्षमता वाले बडे तालाब और सिवनी शहर में पानी से लवरेज छः तालाब होने का कोई ओचित्य नहीं है। सिवनी में एशिया के सबसे बडे मिट्टी के बांध संजय सरोवर परियाजना के होते हुए भी शहरवासियों के कंठ सूखे ही रह जाते हैं। भोपाल के नागरिकों की प्यास बुझाने के लिए करोडों रूपए व्यय कर होशंगाबाद से नर्मदा जल भोपाल लाने की योजना पर काम चल रहा है।
 
कमोबेश यही आलम सिवनी शहर का है। सिवनी शहर में सौ साल पहले जब शहर की आबादी लगभग बीस हजार हुआ करती थी तब शहरवासियों को पानी की आपूर्ति के लिए 1904 में बबरिया जलाशय का निर्माण कराया गया था। इस तालाब से शहर में नहरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जाती थी। बताते हैं कि बबरिया जलाशय के में जब पानी ओवर फ्लो होता था तब एक नहर के माध्यम से इसका पानी शहर के बीच स्थित दलसागर तालाब में छोडा जाता था। दलसागर में पानी ज्यादा होने पर अंदर ही अंदर एक नहर के माध्यम से पानी बुधवारी तालाब पहुंचता था। बुधवारी तालाब के भर जाने पर यह पानी उसके पश्चिमी हिस्से से बाहर निकलकर बहते हुए बैनगंगा नदी में मिल जाया करता था। आज भी वे भूमिगत नहरें मौजूद हैं।
 
इसके उपरांत कालांतर में डॉ.विजय कुमार सरीन के दादा लाल हर गोविंद राय सरीन द्वारा भूमिगत पाईप लाईनों के माध्यम से पानी का प्रदाय आरंभ किया गया था। यही कारण है कि डॉ.वी.के.सरीन के दादा और अवतार सिंह के पिता को आज भी लोग ‘‘नल बाबू‘‘ के नाम से याद किया करते हैं। जब व्यवस्था में परिवर्तन हुआ तो पानी प्रदाय के लिए प्रयुक्त होने वाली नहरों ने गंदे पानी की निकासी के नालों का रूप ले लिया। शहर के बडे नाले पुरानी नहरें ही हैं, जिनसे पहले नागरिक प्यास बुझाते थे। इसी बीच सिवनी से लगभग 12 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में अवस्थित मुंडारा से निकलने वाली पुण्य सलिला बैनगंगा के लखनवाडा तट पर से पानी निकालकर छिंदवाडा रोड स्थित फिल्टर प्लांट लाया जाता था, और इसके बाद इस पानी को टंकियों के माध्यम से शहर में प्रदाया किया जाता था।
 
नब्बे के दशक में जब शहर की आबादी बढी तब कांग्रेस के शासनकाल में शहरवासियों को पानी पिलाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री विमला वर्मा के प्रयासों से बने भीमगढ बांध के जल भराव वाले क्षेत्र सुआखेडा से एक नल जल योजना बनाई गई। इससे पानी को पहले श्रीवनी लाया गया जहां इसे साफ कर फिर शहर की टंकियों को भरने का काम किया गया। इस कार्य योजना को 2025 में सिवनी की आबादी का अनुमान लगाकर दोनों समय पानी प्रदाय हो बनाया गया था। विडम्बना है कि दो समय तो छोड लोगों को महीने में बीस दिन भी एक समय पूरा पानी नहीं मिल पा रहा है। याद पडता है कि जब दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में सिवनी के प्रभारी मंत्री गणपत सिंह उईके ने श्रीवनी फिल्टर प्लांट का अवलोकन किया तो उन्होंने इसे देख बडा आश्चर्य व्यक्त किया था कि शहर से इतनी दूर पानी साफ कर फिर ले जाने पर क्या पानी साफ रह पाता होगा। उनके इस आश्चर्य को तत्कालीन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने हवा में उडा दिया।
 
आज आलम यह है कि जनवरी माह आते आते ही शहर की पेयजल व्यवस्था चरमराने लगती है। मजे की बात तो यह है कि इस योजना में दो जगहों पर मशीन के माध्यम से पानी निकाला जाता है पहले तो सूआखेडा में मशीन पानी खीचकर श्रीवनी भेजती है, फिर श्रीवनी से दूसरी मशीन साफ पानी को टंकियों तक पहुंचाती है। पालिका की जर्जर हालत किसी से छिपी नहीं है। इस साल तक सुआखेडा का बिजली का बिल पांच करोड 81 लाख 52 हजार रूपए बाकी है, तो श्रीवनी फिल्टर प्लांट का बिल 7 करोड 18 लाख 99 हजार। इस तरह कुल मिलाकर विद्युत मण्डल को पालिका की बिजली के बिल की देनदारी 13 करोड 51 हजार रूपए है। अपने देयकों की वसूली के लिए विद्युत मण्डल द्वारा जब तब पालिका की कालर पकडकर उसे लाईन काटने की धमकी दे दी जाती है।
 
जिले में राजनैतिक बिसात पर अपने मुहरे बिछाने वाले नेता यह बात भली भांति जानते हुए कि नगर पालिका को हर साल विकास की मद में मिलने वाली रकम का एक बहुत बडा भाग बिजली का बिल भरने में ही चला जाता है, फिर भी उनकी चुप्पी संदेहास्पद ही है। परिस्थितियों को देखकर लगता है कि कहीं एसा तो नहीं कि इस भीमगढ जलावर्धन योजना में बंदरबांट करने वाले जनसेवकों और ठेकेदारों के पेरोल पर ये नेता काम कर रहे हों। नल पानी उगलें अथवा नहीं इन नेताओं की सेहत पर असर इसलिए नही पडता है कि नगर पालिका में चाहे जिसकी सरकार हो, इन नेताओं के दरवाजों पर पानी के टंेकर इनकी एक आवाज पर हाजिर हो जाते हैं। मरण तो बेचारी निरीह जनता की ही है।
 
आश्चर्य की बात तो यह है कि भारी विरोध ढेर सारी शिकायतों और मुख्यमंत्री द्वारा भीमगढ जलावर्धन योजना की स्तरहीनता के लिए जांच के आदेश किए जाने के बाद भी इसकी जांच अब तक नहीं हो सकी है। जाहिर है कि घटिया निर्माण करने वाली लाबी के हाथ बहुत ही उपर तक हैं, जो इस जांच को रोकने में कामयाब रह रहे हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सत्ता में चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस, किसी ने भी जनता के दुखदर्द को समझना ही नहीं चाहा। निहित स्वार्थों में डूबे जनसेवकों को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि उन्हें विधायक या सांसद इसी जनता ने अपने मत को देकर बनाया है। जनता ने अगर आपको नेता समझकर आपके उपर विश्वास किया है तो आपका कर्तव्य बनता है कि निहित स्वार्थों को तिलांजली देकर आवाम के दुखदर्द को समझें।
 
कुछ सालों पहले तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर से चर्चा के दौरान उन्होंने बबरिया जलावर्धन योजना के बारे में बताया था। यह उनके लिए महात्वाकांक्षी योजना हुआ करती थी, और होना भी चाहिए था। उस दौरान हमने उन्हें कहा था कि भीमगढ जलावर्धन योजना की पाईप लाईन जब तब फूट जाया करती है, जिससे शहर वासी हलाकान हो जाते हैं। हमने सुझाव दिया था कि बेहतर होगा कि बबरिया जलावर्धन योजना में काम इस तरह करवाया जाए कि भीमगढ से आने वाली पाईप लाईन को सीधे बबरिया में छोडा जाए, और श्रीवनी के जलशोधन संयंत्र की मशीनों को बबरिया में लाकर स्थापित कर दिया जाए। इससे दो लाभ होंगे, अव्वल तो यह कि जब तब पाईप लाईन फूटने का असर शहरवासियों पर नहीं पडेगा क्योंकि बबरिया में इतना पानी रहता ही है कि यह एकाध माह तो शहर की पेयजल व्यवस्था को गडबडाने से बचा सकता है, दूसरे यह कि बबरिया से फिल्टर किया पानी काफी हद तक साफ ही रहकर लोगों के घरों तक पहुंच सकेगा। पता नहीं क्यों इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया।
 
आज हालात यह है कि भीमगढ से सिवनी तक पानी लाने में लगभग एक लाख रूपए रोज की बिजली जलाई जा रही है, फिर भी रियाया के कंठ सूखे ही हैं। उद्घाटन के बाद से ही भीमगढ जलावर्धन योजना की सांसें उखडने लगीं थीं। शहर के हेण्डपंप, कुंए, बावली, तालाब आदि जलस्त्रोत रखरखाव के अभाव में किसी काम के नहीं बचे हैं। जनता पानी के लिए इंतजार कर रही है किसी भागीरथी की क्योंकि जिन जनसेवकों पर भरोसा कर उसने उन्हें भागीरथी माना था, वे तो चुनाव में जीत दर्ज कराने के तत्काल बाद ही अपने भागीरथी के मौखटे को उतारकर असली चेहरे जनता को दिखा चुके हैं, जनता का दिल टूट चुका है, पर दुख तो इस बात का है कि जनता इनकी शिकायत करे तो किससे। सत्ता या विपक्ष में चाहे जो भी बैठा हो, उनकी नूरा कुश्ती देखकर जनता थक चुकी है, जनता अपने करम पर हाथ रखकर आसमान को ताक रही है, शायद वहीं से कोई फरिश्ता आए और उसकी पुकार सुन उसके प्यासे कंठ और रीते घडों में दो बूंद पानी की डाले।

बुधवार, 12 मई 2010

congress and jail singh

कांग्रेस मीरा का कार्ड खेल सकती है बिहार में

कांग्रेस मीरा का कार्ड खेल सकती है बिहार में
 
कांग्रेस को डर कहीं मीरा पीएम की कुर्सी न मांग लें
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 मई। बिहार में सत्ता हासिल करने के लिए सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस द्वारा चुनावों में भारत गणराज्य की पहली लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया जा सकता है। कांग्रेस किसी भी कीमत पर बिहार में सत्ता पाने को आतुर दिखाई पड रही है। कांग्रेस के मैनेजरों ने दलित एजेंडे को आगे बढाने के लिए कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को इस तरह का मशविरा दे दिया है।
 
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान जैसी ताकतों को काबू करने के लिए कांग्रेस का बिहार पर काबिज होना अत्यावश्यक है। यही कारण है कि पिछली मर्तबा विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य माने जाने वाले राजा दिग्विजय सिंह को बिहार के मामलों में सर्वेसर्वा बनाकर भेजा गया था।
 
कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज दोनों ही को दलित एजेंडे को आगे करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। बरसों से दलितों की सुध भूल चुकी काग्रेस को अचानक ही दलितों की याद आई और फिर राहुल गांधी ने दलितों के घरों पर रात रूककर खाना खाकर उन्हें कांग्रेस से जोडने की कवायद आरंभ की है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि सूबों में राहुल गांधी ने दलितों को गले लगाकर नई इबारत लिखी है।
 
उधर कांग्रेस के चाणक्यों ने लोकसभा अध्यक्ष पद पर दलित पुत्री मीरा कुमार की ताजपोशी करवाकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तो कांग्रेस ने महिलाओं के हिमायती होने का प्रहसन किया तो दूसरी ओर राहुल गांधी के दलित एजेंडे पर मोहर लगाई है। राहुल गांधी द्वारा बाबू जगजीवन राम को दलित आईकान के तौर पर एक बार फिर स्थापित करने का प्रयास किया गया है। कांग्रेस भूल जाती है कि उसने बाबू जगजीवन राम को बाहर का रास्ता इसलिए दिखाया था क्योंकि बाबू जी के मन में प्रधानमंत्री पद पाने की महात्वाकांक्षा जाग उठी थी।
 
अब दिल्ली आकर बस चुकीं उनकी पुत्री मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बनवा दिया गया है। बताया जाता है कि मीरा कुमार के मन में भी अब 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की महात्वाकांक्षाएं कुलांचे मार रहीं हैं। जैसे ही इसकी भनक कांग्रेस के मैनेजरों को लगी उन्होंने तत्काल एक तीर से कई निशाने साधने के लिए मीरा कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने की कवायद आरंभ कर दी है। कांग्रेस के सूत्रों का मानना है कि मीरा कुमार के बहाने कांग्रेस उत्तर प्रदेश के दलितों को भी साधने का प्रयास करने से नहीं चूकने वाली।

सोमवार, 10 मई 2010

और ज्ञानी जी को भूल गई कांग्रेस

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
और ज्ञानी जी को भूल गई कांग्रेस
नेहरू गांधी परिवार को महिमा मण्डित करने के लिए कांग्रेस के प्रबंधकों द्वारा तरह तरह के जतन किए जाते रहे हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा जी, राजीव जी की जयंती हो या पुण्य तिथि कांग्रेस और कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन उन्हें याद करने में न तो कांग्रेस ही कोई कसर रखती है, और न ही संप्रग सरकार। देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले पहले सिख्ख राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की जयंती को न केवल कांग्रेस बल्कि संप्रग सरकार भी भूल गई। इस दिन भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने न तो कोई विज्ञापन ही जारी किया और न तो कांग्रेस ने ही कोई प्रोग्राम का आयोजन किया। कृतघ्न राष्ट्र की ओर से दिल्ली विश्वकर्मा सभा के तत्वावधान में ही एक प्रोग्राम का आयोजन किया गया था। इस संबंध में खबर भी एकाध अखबार ने अपने अंदर के किसी पेज पर छापी। कितने आश्चर्य की बात है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश के पहले नागरिक की आसंदी पर बिराजने वाले ज्ञानी जेल सिंह को कांग्रेस द्वारा इतनी जल्दी ही भुला दिया गया, कांग्रेस भूले बिसरे गीत बजाए भी तो क्यों उसे तो बस नेहरू गांधी परिवार का तराना जो बजाना है।
2 करोड फंूकने के बाद भी नतीजा सिफर
जब भी किसी जनसेवक पर संकट के बादल गहराते हैं, वह अपने सहयोगियों को खुश करने की गरज से उनके सैरसपाटे का इंतजाम कर देता है। यही कुछ दिल्ली की नगर निगम में हुआ। एमसीडी ने पिछले तीन सालों में मेयर और पार्षदों की स्टेडी टूर के नाम पर की गई देश विदेश में की गई सैर सपाटे में दो करोड रूपए व्यय किए गए पर अब तक पार्षद या मेयर ने अपना प्रतिवेदन ही नहीं दिया है। यह बात सूचना के अधिकार के तहत सामने आई है। इसमें बताया गया है कि देश के अंदर यात्रा करने पर एक करोड 32 लाख 70 हजार 973 तो विदेशों की यात्राओं पर 65 लाख 66 हजार 929 रूपए खर्च किए गए हैं। मजे की बात तो यह है कि आदर्शों पर चलने का ढिंढोरा पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी एमसीडी पर काबिज है, और वह सदा से ही निगम की माली हालात ठीक नहीं होने का रोना रोती रहती है, जिससे निगम कर्मियों को न तो समय पर वेतन ही मिल पाता है, न ही गरीबों को पेंशन बंट पा रही है, नई योजनाएं पैसों के अभाव में दम तोड रही हैं। सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में निमग के मेयर और पार्षद जनता के गाढे पसीने की कमाई के दो करोड रूपए हवा में उडा देते हैं और न तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस ही सूं सां करती है और न ही चाल, चरित्र और चेहरा आधार पर सियासत करने वाली भाजपा के बडे नेता ही देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में अपनी नाक के नीचे होने वाले इस खेल पर कोई टिप्पणी करना उचित समझते हैं।
. . . तो इस्तीफा क्यों नहीं दे देते शरद पंवार
देश के कृषि मंत्री की आसनी पर विराजमान शरद पवार का कहना है कि सरकार सभी को सस्ता अनाज नही दे सकती है। कंेद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समान रूप से लागू करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान पंवार ने कहा कि सरकार ने इस साल साढे पांच सौ टन अनाज की रिकार्ड खरीदी की है। खाद्यान सब्सीडी जो 19 हजार करोड रूपए थी, वह बढकर 70 हजार करोड रूपए होने की उम्मीद है। पवार का कहना है कि गरीबी रेखा से उपर जीवन निर्वहन करने वालों को 2002 की कीमतों पर ही अनाज मिल रहा है। पवार साहब के घर पर अनाज शायद खरीदा ही नहीं जाता है, तभी उनको यह नहीं पता है कि 2002 में जो कीमतें थीं, आज वे आसमान छू रहीं हैं। दिल्ली में ही अगर सुबह घर से निकला जाए तो शाम तक सौ के नोट पर बने गांधी मुस्कुराते हुए दूसरे के हाथ में जाकर अगले गांधी के बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। अगर आप सुबह की चाय से लेकर रात का खाना तक बाहर खाते हैं तो मान लीजिए कि आपको कम से कम चार गांधी अर्थात चार सौ रूपए खर्च करने होंगे। अगर आप अनाज खरीदने जाएंगे तो आपके होश उड जाएंगे। देश के शासकों का यह धर्म है कि वह हर हाल में अपनी रियाया को खुश रखना है। शासक मां की तरह ही होता है, जिस तरह मां खुद भूखी रहकर अपने बच्चों का पेट भरती है, उसी तरह शासकों को रियाया की क्षुदा शांत करना चाहिए। विडम्बना है कि 21वीं सदी में शासक सिर्फ और सिर्फ अपना पेट भरने की जुगत में ही नजर आते हैं।
भाजपा के गांधी मुश्किल में
भारतीय जनता पार्टी के गांधी यानी वरूण गांधी के तल्ख तेवर कुछ ढीले नजर आ रहे हैं। इलाहबाद में वरूण गांधी द्वारा देश की आजादी में अपनी गजब की भूमिका निभाकर युवाओं के पायोनियर बने चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा पर चप्पल पहन कर माल्यार्पण करने पर वे विवादों के घेरे में आ गए हैं। इससे पहले भी वरूण ने पिछले साल मुसलमानों के प्रति नफरत भरे बयान कहकर विवादित हो गए थे। पीलीभीत के संसद सदस्य को भाजपा द्वारा यूपी में युवा आईकान बनाने का प्रयास अवश्य ही किया जा रहा है, पर वरूण की सलाकार मण्डली उन्हें हर कदम पर उलझा ही रही है। एक टीवी चेनल ने पहले आजाद की प्रतिमा स्थल के बाहर जूते चप्पल उतार कर ही माल्यापर्ण करने के बोर्ड को दिखाया फिर वरूण गांधी को सेंडल पहनकर माल्यापर्ण करते हुए दिखाया। वरूण की माता मेनका को अब तलाश है भाजपा में एसे सलाहकारों की जो उनकी जठानी सोनिया के पुत्र राहुल गांधी को मात देने की चालें चल सके।
. . . उनका क्या होगा जी जो वोट डाल चुके हैं
देश के गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम देर से ही सही जागे तो। अवैध तौर पर भारत में रह रहे बंग्लादेशियों को देश से बाहर खदेडने के लिए उन्होंने कठोर रूख अपनाने की बात कही है। कंेद्र सरकार का कहना है कि भारत में अवैध रूप से रह रहे बंग्लादेशियों को उनके देश वापस भेजा जाएगा। साथ ही 1971 की नागरिकता देने संबंधी नीति को बदला नहीं जाएगा। चिदम्बरम ने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि 2008 तक एक लाख बंग्लादेशियों को वापस भेजा जा चुका है। सदन में जब वाई.पी.त्रिवेदी ने प्रश्न किया कि मुंबई में बडी तादाद में बंग्लादेशी रह रहे हैं, और उनमें से अधिकांश ने राशन कार्ड और चालक अनुज्ञा तक बनवा लिया है, तो इस प्रश्न को बडी ही सफाई से चिमम्बरम टाल गए। देखा जाए तो समूचे देश में लाखों की तादाद में बंग्लादेश से आकर अवैध तौर पर रहने वालों की संख्या बहुत ही अधिक है। देश के हर सूबे में ये तेजी से फैल चुके हैं। कहा जा रहा है कि आम आदमी को राशन कार्ड, ड्राईविंग लाईसेंस, पासपोर्ट बनवाने में मशक्कत कर पसीना बहाना पडता हो, पर इनका काम चुटकियों में हो जाता है। मुंबई में तो इनकी बस्तियों पर अंडर वर्ल्ड सरगनाओं का हाथ भी बताया जाता है, तभी सडकों किनारे ये सीना तानकर मकान बनाकर रह रहे हैं।
योन शोषण का आरोप मंत्री बाहर
देश के जनसेवकों के चेहरे किस किस तरह के होते हैं, यह बात पिछले लगभग दो दशकों में बेहतर तरीके से उभरकर सामने आ रही है। कहीं सुखराम घोटाले में फंसते हैं तो कभी हवाला में सांसद उलझे तो कभी पैसा लेकर प्रश्न पूछने की बात सामने आई। इस सबके बाद भी मोटी चमडी वाले जनसेवकों पर कोई असर नहीं हुआ। नैतिकता का लबादा ओढकर अनैतिक काम करने वाले जनसेवकों की फेहरिस्त में कर्नाटक के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री हराथलु हलप्पा का नाम भी जुड गया है। हलप्पा पर आरोप है कि उन्होंने अपने मित्र और एक समाजिक कार्यकर्ता की पत्नि का यौन शोषण किया है। बताते हैं कि एक दिन जब वे अपने उक्त मित्र के घर पर भोजन के लिए आए और रात वहीं ठहर गए। इसके उपरांत आधी रात को उन्हें कुछ बेचेनी हुई तो उन्होंने अपने मित्र को अपने ही सुरक्षा कर्मी के साथ दवा लाने भेज दिया। जब उनका मित्र दवा लेकर लौटा तो उसकी पत्नि लुटी पिटी रोती मिली। जनसेवकों के द्वारा एसे कर्म किए जाने पर अब किससे क्या कहा जा सकता है।
डीएनए टेस्ट से घबराए तिवारी
राजभवन में रंगरेलियां मनाते केमरे में कैद होने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी ने अपना डीएनए टेस्ट कराने से साफ इंकार कर दिया है। यह बात उन्होंने उच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका के जवाब में दिए हलफनामे में कही है। तिवारी के खिलाफ रोहित शेखर नाम के एक युवक ने याचिका दायर कर खुद को उनका जैविक पुत्र बताया है। रोहित का कहना है कि उसकी माता उज्जवला शर्मा के साथ तिवारी के नाजायज ताल्लुकात रहे हैं। कोर्ट ने तिवारी से कहा था कि क्यों न उनका डीएनए परीक्षण करवाया जाए। साथ ही कोर्ट ने एक सौ से ज्यादा तस्वीरों में जिनमे रोहित के जन्म के उपरांत तिवारी को उसकी मा और रोहित के साथ दिखाया गया है, का जवाब भी मांगा है। तिवारी बस अपने आप को निर्दोष बता रहे हैं, वे इन तस्वीरों के मामले में पूरी तरह मौन ही हैं। तिवारी को कौन समझाए कि कोर्ट सबूतों के आधार पर चलती है। वह सरकार नहीं है कि किसी को लाभ या हानी पहुंचाने के लिए अपने फैसले अपनी तरह से दे।
भारतीय रेल को घर का ही समझ लिया था शायद
मध्य प्रदेश के रीवा संसदीय क्षेत्र के संसद सदस्य देवराज सिंह पटेल ने सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है, को मूल मंत्र मान लिया है। हुआ यूं कि वे अपनी बेटी के साथ सामान्य श्रेणी का टिकिट लेकर एसी सेकंड क्लास में विन्धयाचल एक्सप्रेस में रीवा से दिल्ली की यात्रा कर रहे थे। कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुंचने के पहले रेल्वे के चेकिंग दल जीआरपी, आरपीएफ के सदस्यों ने उनकी पुत्री को सामान्य श्रेणी का टिकिट होने पर पकड लिया। सांसद जी भडक गए, और शुरू हो गया हो हल्ला। सांसद जी को तो भारतीय रेल का पास के कारण छोड दिया गया पर टीसी उनकी बेटी के लिए अड गया। टीसी को कर्तव्य पूरा करते देख सांसद जी ने भी आपा खो दिया। उन्होंने अपने रूतबे का इस्तेमाल करते हुए टीसी को हडकाना आरंभ कर दिया। टीसी भी टस से मस नहीं हुआ, और उसने 2883 रूपए की रसीद बना ही दी। उस पर टीसी ने सांसद जी से हस्ताक्षर करने को कहा। सांसद जी भी जनसेवक ठहरे उन्होंने टीसी को देख लेने की धमकी दे डाली। सचल दल ने इसकी जानकारी कानपुर रेल्वे स्टेशन को दे दी। कानपुर रेल्वे स्टेशन पर एसी टू की बोगी को जीआरपी और आरपीएफ ने घेर लिया। फिर क्या था, बात बिगडती देख सांसद जी ने अपनी जेब हल्की की और 2883 रूपए टीसी को अदा किए तब जाकर बात बनी। वैसे भी सांसदों या पूर्व सांसदों के यात्रा के दौरान उनके नहले दहले अन्य पूर्व सांसदों के पास के नंबर पर यात्रा करते पाए जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। टीसी अदना सा सरकारी कर्मचारी है, वह आखिर करे भी तो क्या, बडे बाबू को अपना परिवार भी तो चलाना है।
15 हजार में एनपी सिस्टम की अधिसूचना जारी
कमल नाथ के नेतृत्व वाले केंद्रीय सडक एवं परिवहन मंत्रालय द्वारा भारी अंतर्विरोध के बाद भी देश भर के ट्रांसपोर्टस को 15 हजार रूपए में नेशनल परमिट देने की अधिसूचना आखिरकार जारी कर ही दी गई। दरअसल ट्रांसपोर्टस द्वारा लंबे समय से इस तरह की मांग की जा रही थी। ट्रांसपोर्टस के दबाव में मंत्रालय ने घोषणा की थी कि 1 मई से नेशनल परमिट महज 15 हजार रूपए में जारी किया जाएगा। कांग्रेसनीत महाराष्ट्र और तमिलनाडू सरकार के द्वारा हाथ खीच लिए जाने पर इसको अमली जामा एक मई को नहीं पहनाया जा सका। एक साल के लिए अब ट्रांसपोर्टस को एक वाहन के लिए 15 हजार रूपए में नेशनल परिमिट जारी किया जा सकेगा। इसके अलावा आवेदन के समय एक हजार रूपए की राशि अतिरिक्त जमा करवाना अनिवार्य होगा, जो उस राज्य के खाते में जाएगी जो राज्य इस परिमट को जारी करेगा। वैसे इस नई व्यवस्था से ट्रांसपोर्टस को अब बार बार राज्यों के झमेले में नहीं पडना पडेगा, पर इससे ट्रांसपोर्ट और पुलिस विभाग की काली कमाई पर डाका पड जाएगा, जिससे उनके चेहरों की रोनक उडना स्वाभाविक ही है।
मोदी को बतौर पीएम प्रस्तुत करने से हटे गडकरी
भाजपा के नए नवेले अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पहले तो कहा कि अगले चुनावों में नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री प्रस्तुत किया जाएगा, अब वे अपनी बात से ही हट रहे हैं, अब गडकरी का कहना है कि 2014 के आम चुनावों में मोदी को बतौर पीएम प्रस्तुत किया जाएगा यह अभी तय नहीं है। भाजपा के अंदरखाते में चल रही हलचल को अगर सही माना जाए तो गडकरी को मोदी पसंद नहीं हैं। गडकरी की ताजपोशी के पहले देश भर से भाजपा नेता और भाजपा शासित मुख्यमंत्रियांे ने दिल्ली जाकर गडकरी को बधाई दी थी, पर इस लंबी फेहरिस्त में नरेंद्र मोदी का नाम नहीं था। कहा जा रहा है कि उस वक्त राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के. आडवाणी को कमजोर करने के लिए गडकरी द्वारा मोदी का नाम आगे किया गया था। अब जबकि आडवाणी पार्श्व की ओर अग्रसर हैं, तब मोदी ने यू टर्न लेकर मोदी की पीएम बनने की संभावनाओं को क्षीण करना आरंभ कर दिया है। गडकरी जानते हैं कि अगर मोदी को ज्यादा आगे लाया गया तो भाजपा अपने अल्पसंख्यकों के वोट बैंक से हाथ धो बैठेगी।
पूर्व कप्तानों पर फटे बेदी
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी जो अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए सदा ही चर्चित रहे हैं ने एक बार फिर अपना मुंह खोला है। इंडियन प्रीमियर लीग में रूपयों के बंदरबांट की खबरों और प्रमाणों के बाद बेदी ने आईपीएल से जुडे तीन पूर्व कप्तानों सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री और मंसूर अली खां पटौदी की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हुए उन्हें कटघरे में खडा कर दिया है। एक निजी टीवी चेनल को दिए साक्षात्कार में इन तीनों पूर्व कप्तानों के विवादों के बाद भी आईपीएल से जुडे होने पर बेदी ने कहा है कि इसमें वित्तीय अनियमितताओं के आरोप के बाद कम से कम इन तीनों को अपने आप को आईपीएल से अलग कर लेना चाहिए था, पर एसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पैसे ने इन तीनों का मुंह बंद कर रखा है। शास्त्री और गावस्कर को कामेंट्र में व्यस्त होने की बात कहकर उन्होंने कहा कि पटोदी तो कुछ नहीं कर रहे हैं। और फिर बिना आर्थिक लाभ के आखिर कोई क्रिकेटर अपने नाम का उपयोग कैसे करने दे सकता है।
पेयजल संकट में पानी माफिया की पौ बारह
जीवन दायनी यमुना के मैले होने के बाद देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पेयजल संकट से कराह रही है। गरमी के मौसम में लोगों के साथ ही साथ पशु पक्षियों के कंठ भी सूखने लगे हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली में अस्सी फीसदी जनता पानी खरीदकर ही पीती है, क्योंकि नगर निगम के द्वारा नलों के माध्यम से प्रदाय किया जाने वाला पानी पीने योग्य है या नहीं इस पर सदा ही प्रश्न चिन्ह लगते रहे हैं। इस सबके चलते दिल्ली में पानी माफिया ने जगह जगह निजी बोर और आर ओ प्लांट लगा रखे हैं। आलम यह है कि दिल्ली वासी 25 से 75 रूपए में विभिन्न ब्रांड या अनब्रांडेड पानी के 20 लीटर के जार खरीदकर पानी पीने को मजबूर है। इसके अलावा ठंडे पानी के 20 लीटर के जार 15 से 25 रूपए में धडल्ले से बिक रहे हैं। दिल्ली में हर एक किलोमीटर में दर्जनों एसी मशीन जिसमें रेफरीजरेटेड ठंडे पानी की मशीन जिस पर एक रूपए में एक गिलास पानी मिलता है, दिखाई पड जाती हैं। देश की राजधानी में कांग्रेस की शीला दीक्षित और केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार के सामने अगर रियाया की यह हालत है तो सुदूर ग्रामीण अंचलों की कल्पना कर ही रोंगटे खडे होना स्वाभाविक ही है।
लो साहेब आ गई एक और लखटकिया
टाटा की लखटकिया कार नैनो बाजार में अपना वांछित असर नहीं दिखा सकी। नैनो को लखटकिया कार जरूर कहा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि नैनो सडक पर आते आते डेढ लाख तक पहुंच जाती है। आम आदमी की कार का सपना टाटा ने दिखाया अवश्य पर इसके इंजन की आवाज और सुरक्षा के मापदंडों के चलते यह आम आदमी की कार नहीं बन सकी। इसी बीच फ्रांस की एक कार कंपनी रैनो ने बजाज आटो लिमिटेड के साथ मिलकर एक और सस्ती कार जिसकी कीमत लगभग 25 हजार डालर अर्थात एक लाख दस हजार रूपए है, के भारत के बाजार में उतारने पर सहमति बना दी है। यह कार इसी साल भारत की सडकों का सीना चीरना चाह रही थी, पर कुछ कारणों के चलते इसे 2012 तक टाल दिया गया है। इसे तीन रूप में उतारा जाएगा, जिसमें एक लाख दस हजार, एक लाख 23 हजार और एक लाख 72 हजार में सकडों पर उतारा जाएगा। एक ओर टाटा कंपनी अपनी लखटकिया कार में कम कीमत के चलते उत्पादन में कठिनाई का समाना कर रही है, वहीं दूसरी ओर बजाज द्वारा इस तरह की घोषणा निश्चित तोर पर चौंकाने वाली ही कही जाएगी।
पुच्छल तारा
कसाब को बिरयानी परोसने की खबरों से आम भारतीय का दिल भारत सरकार की दरियादिली पर उसे कोसने पर मजबूर है। कसाब को जो सुविधाएं दी जा रहीं हैं, उससे आम भारतीय आहत है। दिल्ली से यशवंत श्रीवास्तव एक ईमेल भेजकर इस बात को रेखांकित करने का प्रयास कर रहे हैं। बकौल यशवंत -‘‘मीडिया ने कसाब से पूछा कि वह हिन्दुस्तान के बारे में क्या कहना चाहता है।‘‘ कसाब ने कुटिल मुस्कान के साथ जवाब दिया -‘‘हां, अब में उस वाक्य का अर्थ समझा हूं जो जगह जगह लिखा होता है। ‘अतिथि देवो भव‘‘ मानते हैं यह है अतुलनीय भारत।‘‘

कांग्रेस में फरबदल

रविवार, 9 मई 2010

चिकित्सकों की भी जय जय, जनसेवकों की भी जय जय . . .

चिकित्सकों की भी जय जय, जनसेवकों की भी जय जय . . .

(लिमटी खरे)

भगवान शिव की नगरी सिवनी में बीते दो तीन दिनों से जो हो रहा है, वह निश्चित तौर पर जिले के स्वर्णिम चिकित्सकीय इतिहास (90 के दशक तक के) में टाट का पैबंद के मानिंद ही नजर आ रहा है। बीते दिनों जबलपुर रोड पर एलआईसी के करीब हुई सडक दुर्घटना के बाद घायल बालिका के साथ जिला चिकित्सालय में पदस्थ सरकारी तनख्वाह पाने वाले चिकित्सकों ने अपने चेहरों से नकाब उतारकर जिस कदर अमानवीय चेहरे को बाहर लाया है, उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम होगा। बताते हैं कि इसके बाद जिलाधिकारी मनोहर लाल दुबे के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.आर.एस.चौहान ने जिला चिकित्सालय में पदस्थ चंद चिकित्सकों की चिकित्सा दुकान पर जाकर तालामारने की कार्यवाही की गई। इसमें डॉ.राम रजक, डॉ.पुरूषोत्तम सूर्या और डॉ.एस.के.नेमा नेमा की निजी तौर पर घरों से इतर चलाई जा रही दुकानों पर ताला जडा गया। आम जनता में सीएमएचओ डॉ.चौहान के द्वारा की गई कार्यवाही की बेहद अच्छी प्रतिक्रिया सामने आई है। इसी घटनाक्रम में डॉ.नेमा ने अपनी दुकान के ताले को तोड दिया।

इसके उपरांत शनिवार को जब सीएमएचओ डॉ.आर.एस.चौहान ने प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के नाम से सुशोभित मेडिकल कालेज की क्षमता वाले जिला चिकित्सालय में सुबह साढे आठ बजे उपस्थिति पंजी देखकर उसमें अनुपस्थित चिकित्सकों के नाम के सामने गैरहाजिरी लगानी आरंभ कर दी। विडम्बना देखिए कि जिस आरएमओ के भरोसे जिला चिकित्सालय की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं, उन्प्ही आरएमओ डॉ.राम रजक ने सीएमएचओ डॉ.चौहान को न केवल भद्दी भद्दी गालियां दी, बल्कि उनके हाथ से उपस्थिति पंजी छीन ली। बौखलाए डॉ. चौहान ने सिविल सर्जन डॉ.के.सी.मेश्राम को निर्देश दिया कि आरएमओ पर से डॉ.राम रजक को हटाकर किसी अन्य चिकित्सक को इसका प्रभार दिया जाए। यह है सिवनी जिला चिकित्सालय के हाल सखे।

अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में अस्तित्व में आए जिला चिकित्सालय को पूर्व में वहां संचालित किया जाता रहा है, जहां वर्तमान में निजी बस स्टेंड है। पूर्व केद्रीय मंत्री विमला वर्मा और स्व.गार्गीशंकर मिश्र के जमाने में इसे वहां से हटाकर बारापत्थर लाने की कार्यवाही की गई थी। उस समय यह जगह शहर से बाहर हुआ करती थी। गौरतलब है कि आज शहर का हृदय स्थल और भीडभाड वाला क्षेत्र बन गया है अस्पताल के इर्दगिर्द का क्षेत्र। सुश्री वर्मा जब तक प्रदेश सरकार में मंत्री के बतौर काम करती रहीं तब तक उन्होंने इस अस्पताल को संजीवनी देने की भरसक कोशिशें की। उनके जमाने में उनके प्रशासनिक गुणों के आगे सरकारी नुमाईंदे नतमस्तक ही हुआ करते थे। उनका दबदबा इतना हुआ करता था कि सरकारी कर्मचारी गफलत करने की बात भी नहीं सोच सकता था। विडम्बना ही है कि सुश्री विमला वर्मा के सक्रिय राजनीति से बिदा होते ही सिवनी जिले में भ्रष्टाचार, अनियमिततओं, भाई भतीजावाद आदि के बेलगाम घोडे दौडने आरंभ हो गए जिनकी रेस आज तक अनवरत ही जारी है।

याद पडता है कि जब पंडित महेश शुक्ला मध्य प्रदेश सरकार के विधि विधायी मंत्री हुआ करते थे, तब एक मर्तबा उन्होंने प्रातः साढे आठ बजे जाकर जिला चिकित्सालय की उपस्थिति पंजी का निरीक्षण किया था, उस समय चिकित्सकों में हडकम्प मच गया था। इसके उपरांत जनसेवकों ने इस ओर से अपना ध्यान हटा लिया। आज जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सक तनख्वाह तो सरकार से ले रहे हैं, पर मरीजों को अपने घरों पर बुलाकर उनकी जेबे हल्की कर उनका इलाज कर रहे हैं। कहने को तो जिला प्रशासन का एक उप जिलाध्यक्ष स्वास्थ्य विभाग का आफीसर इंचार्ज (ओआईसी) हुआ करता है, पर साल में एकाध दिन भी अगर वह अस्पताल की सुध लेता हो एसा नहीं लगता। जिला कलेक्टर को चाहिए कि बजाए सीएमएचओ के लगाम कसने के उनके द्वारा अपने मातहत ओआईसी डिप्टी कलेक्टर की मुश्कें कसें।

इसके साथ ही साथ जिले में चिकित्सा का धंधा जोर शोर से पनप रहा है। जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सकों की भव्य अट्ालिकाएं देखते ही बनती हैं। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सरकारी तनख्वाह में एसे विशाल भवन बनाए जा सकते हैं। जिला चिकित्सालय में पदस्थ स्टाफ द्वारा अस्पताल के समय में ही इनके साथ ही साथ निजी तौर पर संचालित होने वाले अस्पतालों में अपना बेशकीमती समय दिया जाता है। आज अगर किसी को एक्स रे कराना हो या खून की जांच, चिकित्सकों द्वारा वहीं भेजा जाता है जहां से उन्हें तगडा कमीशन मिलता है।

इतना ही नहीं जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सक अपने मरीजों को छोटी मोटी बीमारी होने पर रिफर करने में खासी महारथ रखते हैं। जरा सी जटिलता होने या फिर कृत्रिम तौर पर केस को जटिल बनाकर उसे नागपुर रिफर कर दिया जाता है। नागपुर के बडे आलीशान फाईव स्टार संस्कृति वाले अस्पतालों में मरीजों की गर्दन मोटी आरी से रेती जाती है। फिर उनसे वसूली रकम का बडा भाग सिवनी के चिकित्सकों को हर माह पहुंचाया जाता है। अब तो नागपुर के चिकित्सकों ने सिवनी में साप्ताहिक तौर पर आना भी आरंभ कर दिया है। यह परिपाटी लगभग पांच सालों से जारी है।

सिवनी के विधायकों, सांसदों के अलावा अन्य जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि भगवान शिव के इस जिले की जनता इतने विशाल जिला चिकित्सालय के होते हुए भी इलाज को क्यों तरस रही है। जिसकी मर्जी में जो आता है, वह उसे कर देता है। तत्कालीन जिला कलेक्टर एम.मोहन राव ने प्राईवेट वार्ड के पास एक फव्वारा बनाया था, जिसमें आज कुत्ते लघुशंका करते हैं। मोहम्मद सुलेमान ने इसकी बाउंड्री वाल को तोडकर व्यवसायिक काम्पलेक्स बना दिया जिसमें मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं। जी.के.सारस्वत ने अपने कार्यकाल में इसे अण्डा जेल बना दिया। कहा जाता है कि मरीजों को स्वच्छ हवा और वातावरण की आवश्यक्ता होती है, पर उन्होंने अपने हिटलरी फरमान से यहां हवा आने के सारे मार्ग बंद करवा दिए। अगर वे चाहते तो कारीडोर में लगे बांस के जंगलों के बजाए लोहे की जालियां लगवा दी जातीं तो वार्डों की सुरक्षा के साथ ही साथ मरीजों को साफ हवा तो नसीब हो पाती। हालात देखकर यही कहना चाहेंगे कि तुम्हारी (चिकित्सकों की) भी जय जय, हमारी (जनसेवकों की) भी जय जय, न तुम जीते न हम हारे . . .।