गुरुवार, 1 सितंबर 2011

सर चढ़कर बोल रहा है अंग्रेजी का बुखार

सर चढ़कर बोल रहा है अंग्रेजी का बुखार

(लिमटी खरे)

हिन्दी भारत गणराज्य की आधिकारिक राष्ट्रभाषा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर आज तक सभी जनसेवक हिन्दी की हिमायत करते आए हैं, फिर भी हिन्दी बहुत ही पिछड़ चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा राजभाषा का अलग प्रभाग बनाकर रखा है, बावजूद इसके हिन्दी को वांछित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। सरकारी कार्यालयों में हिन्दी को प्रोत्साहन देने की इबारत युक्त नारे तो चस्पा होते हैं पर इनके उपर अगल नहीं हो पाता है। सर्वोच्च न्यायालय तक में अंग्रेजी का खासा बोल बाला है। देश के शासक मूलतः अंग्रेजी को ही प्रोत्साहित करते नजर आते हैं। विडम्बना देखिए कि देश के अनेक हिस्सों में सूचना पटल पर स्थानीय भाषा के साथ ही साथ अंग्रेजी में होते हैं, इन पर हिन्दी का नामोनिशान नहीं होता है। समाचार पत्रों में पहले हिन्दी का विशेष ध्यान रखा जाता था किन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधकचरे ज्ञान वालों ने हिन्दी को दरकिनार कर अब हिन्दी अंग्रेजी के मिश्रित संस्करण हिंगलिशको बोलचाल की भाषा बना दिया है।
 
ग्लोबल भाषा का दर्जा पाने वाली इंग्लिश आज भारत गणराज्य में हिन्दी के उपरांत सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी भाषा बन चुकी है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि भारत गणराज्य में अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद यूरोपीय देशों में ब्रिटेन को छोड़कर अंग्रेजी बोलने वाले देशों से कहीं ज्यादा है। वर्ष 2001 की जनगणना में भारत में दो और तीन भाषाओं के जानकार या बोलने वालों की संख्या के आधार पर जुटाए गए आंकड़ोें से साफ होता है कि अंग्रेजी बोलने और समझने वाले भारतीयों की संख्या ब्रिटेन की जनता से दुगनी है।

इन आंकड़ों से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत में वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार साढ़े पच्चीस करोड़ लोग दो भाषाओं का ज्ञान रखते हैं। पौने नौ करोड़ लोग तीन या अधिक भाषा पर अच्छी कमान रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत गणराज्य में चौथाई जनसंख्या उस वक्त तक एक से ज्यादा भाषा बोलने में महारथ रखती थी। सबसे अश्चर्य का विषय तो यह रहा कि 2001 में दो लाख तीस हजार भारत वासियों ने अंग्रेजी को प्राथमिक भाषा का दर्जा दिया है। आठ करोड़ साठ लाख लोगों ने इसे दूसरी तो तीन करोड़ नब्बे लाख लोगों ने तीसरी भारतीय भाषा के तौर पर इसे चुना है। इस तरह भारत की जनसंख्या में से साढ़े बारह करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं।

दुनिया भर में अंग्रेजी बोलने वाले शीर्ष के पांच देशों में अमेरिका में छब्बीस करोड़ तीस लाख, भारत में बारह करोड़ पचास हजार, नाईजीरिया में सात करोड़ नब्बे लाख, ब्रिटेन और रूस में में छः करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं। भारत गणराज्य में बोली जाने वाली टॉप फाईव लेंग्वेज में 55 करोड़ 14 लाख लोग हिन्दी, बारह करोड़ पचास लाख लोग अंग्रेजी, नौ करोड़ ग्यारह लाख लोग बंगाली, आठ करोड़ पचास लाख लोग तेलगू और आठ करोड़ बयालीस लाख लोग मराठी बोलते हैं। इस तरह अंग्रेजी भारत गणराज्य की अनाधिकारिक तौर पर नंबर टू लंेग्वेज बन चुकी है।

देश की अन्य भाषा के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो तमिल बोलने वाले छः करोड़ सढ़सठ लाख, उर्दू के वाकिफगार पांच करोड़ नब्बे लाख, कन्नड़ की माहिती रखने वाले पांच करोड़ आठ लाख, गुजराती को बोलने वाले पांच करोड़ तीन लाख लोग हैं। इस देश में उड़िया बोलने वाले तीन करोड़ छियासठ लाख, मलयाली बोलने वाले तीन करोड़ अड़तीस लाख तो पंजाबी बोलने वाले तीन करोड़ 14 लाख, असमी के जानकार एक करोड़ 89 लाख लोग हैं।

हिन्दी बोलने के मामले में जो आंकड़े सामने आए हैं वे इस प्रकार हैं। हिन्दी बोलने वालों की तादाद 55 करोड़ 14 लाख थी जिसमें से 42 करोड़ बीस लाख लोगों ने पहली भाषा के तौर पर हिन्दी को पसंद किया है। नौ करोड़ 82 लाख लोगों ने इसे दूसरीतो तीन करोड़ 12 लाख लोगों ने इसे तीसरी भाषा का दर्जा दिया है। ये सारे आंकड़े 2001 की जनगणना के आधार पर सामने आए थे। 2011 की जनगणना पूरी होने पर इसमें आश्चर्यजनक अंतर दर्ज किया जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दुख तो इस बात को सोचकर होता है कि आजादी के 64 सालों में हम देश की करंसी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं दिला सके, हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बना सके। आज भी लोग मन से हिन्दी बोलने में शर्म महसूस ही करते हैं। क्षेत्रों में हिन्दी के बजाए अंग्रेजी को ही लोग अधिक महत्व देते हैं। हालात देखकर कभी कभी लगने लगता है कि कहीं अंग्रेजी तो हमारी मातृ भाषा नहीं? वैसे भी आज औसत आयु 60 ही मानी जा रही है, फिर 64 सालों के बाद भी हिन्दी की चिंदी इस तरह उड़ाई जा रही है।

हमारे देश में भी मीडिया ने हिन्दी के बजाए हिंगलिश (हिन्दी और अंग्रेजी का मिला जुला स्वरूप) को अंगीकार कर लिया है। अभी कुछ दिनों पहले फ्रांस ने एक सर्कुलर जारी कर फ्रांसिसी भाषा के अखबारों को ताकीद किया था कि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग निश्चित प्रतिशत से ज्यादा न करे। विडम्बना ही कही जाएगी कि हिन्दुस्तान में हिन्दी के संरक्षण के लिए सरकार के प्रयास नाकाफी ही हैं। सरकार ने हिन्दी के प्रोत्साहन को महज कागजों तक ही सीमित कर रखा है।

देश के कमोबेश हर बड़ी परीक्षाएं अंग्रेजी माध्यम में ही संचालित होती हैं। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायलय और देश की सबसे बड़ी पंचायत अर्थात संसद में भी अंग्रेजी का खासा बोलबाला है। देश के महामहिम राष्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री सभी देश को संबोधित करते हैं, अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं, बाद में उस अनुवाद को अनुवादक हिन्दी में प्रसारित करते हैं। हम आज भी गोरे ब्रितानियों की दसता की जंजीरों से अपने आप को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं।

हिन्दी भाषी राज्यों से हटकर अन्य राज्यों में सूचना पटल या अन्य उदघोषणाएं भी या तो क्षेत्रीय भाषा मंे होतीं हैं, या फिर अंग्रेजी मंे। अधिकतर कांप्टीटिव एक्जाम्स का माध्यम अंग्रेजी ही होता है। क्या यही हैं हमारे द्वारा छः दशकांे में चुनी गई सरकारों की प्रतिबद्धताएं! भारत की पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी ने तो हद ही कर दी थी। उन्होंने रेल मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण महकमे को संभालने के बाद ममता बनर्जी ने एक फरमान जारी किया था कि रेल्वे की परीक्षाएं या तो अंग्रेजी में संचालित की जाएं या फिर क्षेत्रीय भाषाओं में।

हिन्दी अंग्रेजी के साथ ही साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान पा चुकी क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा कराने से कोई रोक नही रहा है, पर यह हमारे देश की राष्ट्रभाषा की अस्मत का सवाल है। अभी लोग क्षेत्रीयता को लेकर तरह तरह के जहर उगल रहे हैं। शुक्र है कि भाषा विवाद अभी शांत है। क्षेत्रीय भाषाओं को तरजीह देने की बात समझ में आती है, किन्तु हिन्दी के बजाए अंग्रेजी को महत्व देना समझ से परे ही है। सवाल यह उठता है कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाष है, फिर हिन्दी की इस तरह दुर्दशा कोई कैसे कर सकता है। क्षेत्रीय भाषाओं को निश्चित तौर पर बढ़ावा मिलना चाहिए, किन्तु हिन्दी जो कि राष्ट्रभाषा है की इस तरह उपेक्षा करना संभव नहीं है, यह असंवेधानिक करार दिया जा सकता है, किन्तु आजाद भारत में वर्तमान परिस्थितियों में देश के नीति निर्धारक अपने अपने फायदों के लिए कानून की व्याख्या अपने हिसाब से करने में माहिर हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि आजाद हिन्दुस्तान में जहां राजभाषा के विकास के लिए गृह मंत्रालय के अधीन अलग से राजभाषा विकास विभाग की स्थापना की है। आफीशियल लेंग्वेज को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय एक तरफ पूरा जोर लगा रहा है, बावजूद इसके हिन्दी को वह स्थान आज भी नहीं मिल पा रहा है जिसकी वह हकदार है। सरकारें अपने अपने हिसाब से देश को हांकती आईं हैं। आज विदेशों में भी हिन्दी का चलन बढ़ चुका है। अनेक देश के लोग अब हिन्दी और संस्कृत सीखने में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।

कल तक कंप्यूटर जो सिर्फ अंग्रेजी में ही कमांड जानता था अब हिन्दी को भी अंगीकार कर चुका है। इंटरनेट पर हिन्दी का बोलबाला हो चुका है। ब्लाग की दुनिया ने तो हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेट के माध्यम से भाषाओं का सरताज बनाने के करीब पहुंचा दिया है। आज यूनिकोड़ फान्ट में अगर हिन्दी में टाईप किया जाए तो आपका कंप्यूटर और इंटरनेट भी उसे समझ जाता है। जब कंप्यूटर ने हिन्दी को अंगीकार कर लिया है तब फिर भारत सरकार को देश में इसे नंबर वन लेंग्वेज बनाकर सभी कार्यालयों में इसे लागू करने, देश में कोई भी सूचना पटल में हिन्दी के अलावा क्षेत्रीय भाषा में लागू करने का कड़ा फरमान क्यों जारी नहीं किया जाता है।

वर्तमान हालात देखकर लगता है मानो हिन्दी देश के लिए वैकल्पिक भाषा है, जबकि अंग्रेजी को वेकल्पिक भाषा होना चाहिए। देश के नीति निर्धारक जब भी मुंह खोलते हैं वे अंग्र्रेजी में ही बात करते हैं। कहा जाता है कि आला नेताओं को हिन्दी आती ही नहीं है। कांग्रेस में तो कहा जाता है कि अगर मदाम (श्रीमति सोनिया गांधी) को कोई संदेश भिजवाना है तो उसे अंग्रेजी में दिया जाए तब वे समझ पाती हैं। मिशनरी संचालित अनेक शालाओं में प्राचार्य और प्रबंधन एवं पालकों के बीच संवाद में अंग्रेजी की अज्ञानता ही बाधा के तौर पर समने आती है। सरकार को चाहिए कि इन विसंगतियों को देखते हुए हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए एक ठोस कार्ययोजना सुनिश्चित करे, वरना आने वाले समय में हिन्दी का नामलेवा भी नही बचेगा।

. . . और ‘दादा‘ बरस पड़े ‘महाराज‘ पर!

. . . और दादा बरस पड़े महाराज पर!

मीडिया का गुस्सा सिंधिया पर निकाला मुखर्जी ने

दादा के रोद्र रूप के आगे बगलें झांकते नजर आए ज्योतिरादित्य

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का पारा इन दिनों सातवें आसमान पर है। मीडिया जिस तरह से अण्णा हजारे को हाथों हाथ लिए हुए है उससे और कांग्रेस के रणनीतिकारों से प्रणव मुखर्जी खासे नाराज हैं। उनकी नाराजगी का नजला पिछले दिनों संसद में मध्य प्रदेश कोटे से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया पर टूटा।

मीडिया के शुभचिंतक समझे जाने वाले प्रणव मुखर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि जो दादा रोजना लगभग दो घंटे अखबारों से रूबरू रहते थे, पिछले एक पखवाड़े से उन्होंने अखबारों की तह भी नहीं खोली है, और तो और दादा ने समाचार चेनल्स की अण्णा के साथ कदम ताल के चलते टीवी भी चालू नहीं किया है।

प्रणव के एक खासुलखास ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि दादा आजकल पार्टी के राजनैतिक प्रबंधकों विशेषकर संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल से खासे खफा हैं। इसका कारण यह है कि बंसल ने अण्णा के मुद्दे पर विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया है। इतना ही नहीं लोकसभा में अध्यक्ष द्वारा नेता प्रतिपक्ष की अनुमति के बावजूद भी सुषमा स्वराज को बोलने का मौका नही दिया गया।

उन्होंने आगे कहा कि मंगलवार को जब सुषमा स्वराज को जब बोलने का मौका नहीं मिला उसके उपरांत सदन स्थगित होने के बाद जब ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद चलकर प्रणव मुखर्जी के कक्ष में गए और दादा से कहा कि अगर सुषमा जी को बोलने नहीं दिया गया तो इसका संदेश सरकार के खिलाफ जाएगा जिसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। फिर क्या था, दादा हत्थे से उखड़ गए। दादा ने सिंधिया पर लगभग चिल्लाते हुए कहा कि मुझे राजनीति सिखाने की आवश्यक्ता नहीं है। यह मत भूलो कि मैं तुम्हारी उमर से ज्यादा समय से राजनीति कर रहा हूं।

सूत्रों ने आगे कहा कि प्रणव को खतरा है कि सितम्बर के पहले सप्ताह में जब आपरेशन के उपरांत स्वास्थ्य लाभ लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी भारत वापस आएंगी तब अण्णा प्रकरण का सारा हिसाब किताब उन्हें ही देना होगा, जिसके लिए वे होमवर्क में जुटे हुए हैं, क्योंकि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने मंत्रीमण्डल विस्तार के पहले प्रणव की भावभंगिमाएं देखते हुए उनके खिलाफ तलवार पजा रखी थी। अब सोनिया के आने के बाद सबसे ज्यादा भद्द प्रणव दा की पिटने की उम्मीद जताई जा रही है।

मीडिया है सरकार के निशाने पर!

मीडिया है सरकार के निशाने पर!

सरकार मानती है कि अण्णा को मीडिया ने महानायक बनाया

मुलायम भारी खफा हैं मीडिया की रामलीला से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मयूर विहार से रामलाला मैदान बरास्ता तिहाड़ जेल किशन बाबू राव उर्फ अण्णा हजारे की तेरह दिनी यात्रा में ही वे महानायक कैसे बन गए? यह प्रश्न सरकार के दिमाग में कौंध रहा है। इसका जवाब मिल रहा है कि मीडिया ने ही इन तेरह दिनों में अण्णा को महानायक बना दिया है। यही कारण है कि सरकार अब अंदर ही अंदर इस प्रयास में लग गई है कि किसी तरह मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाए।

प्रधानमंत्री के करीबी सूत्रों ने बताया कि सर्वदलीय बैठक में मुलायम सिंह मीडिया पर जमकर बरसे। इस दौरान अनेक लोगों ने मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात तक कह मारी। इसके बाद हुई कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में अण्णा हजारे को लाईव दिखाने वाले चेनल्स के खिलाफ जमकर आक्रोश जताया सांसदों ने। सांसदों ने यहां तक सुझाव दे डाला कि इन चेनल्स के सैटेलाईट लिंक ही काट दिए जाने चाहिए।

कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो यह कहा जा रहा है कि जब अमेरिका जैसा सुपर पावर खुद भी विक्कीलीक्स के केबल्स को नहीं रोक सका तो सरकार क्या खाकर मीडिया को रोकेगी। मीडिया ने इस मामले में वही किया जो जनता चाह रही थी। कांग्रेसियों का मत है कि राहुल, सोनिया गांधी, नितिन गड़करी सभी सत्ता की मलाई परोक्ष तौर पर चख रहे हैं। ये चेहरे अभी नए और बेदाग हैं। यही कारण है कि इनके डमरू से भीड़ भी जुट जाती है और मीडिया की सुर्खियां भी बटोरी जाती हैं।

अण्णा के अनशन को प्रमखता देना समय की मांग थी। अण्णा अगर महानायक बने तो इसमें मीडिया की सकारात्मक और सरकार की नकारात्मक भूमिका प्रमुख तौर पर उत्तर दायी मानी जा सकती है। माना जा रहा है कि सरकार ने 13 दिन बाद जो किया अगर वह पहले ही दिन कर लेती तो अण्णा को महानायक बनने से रोका जा सकता था। आने वाले दिनों में सरकार द्वारा मीडिया पर अगर गाज गिराई जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

सरकारी जमीन सिब्बल के नाम!


अण्णा अनशन के अनछुए पहलू

अण्णा अनशन के अनछुए पहलू

(लिमटी खरे)

गांधीवादी किशन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे ने तेरहवें दिन अपना अनशन त्यागा, जिसे उन्होंने स्थगन की संज्ञा दी। अण्णा के समर्थन में समूचा देश एक सूत्र में पिरो दिया गया। बच्चे बूढ़े जवान सभी अण्णामय हो गए थे। चारों तरफ अण्णा ही अण्णा दिख रहे थे। कांग्रेस पहले तो आक्रमक रही फिर अचानक ही जनसैलाब की भावनाओं के सामने बैकफुट पर ही नजर आई। भाजपा ने भावनाएं समझीं और अण्णा का दामन थाम लिया। इन तेरह दिनों में देश ने बहुत कुछ खोया पाया। अण्णा ने अपना पूरा जीवन इन तेरह दिनों में जी लिया। उनके सहयोगी केजरीवाल थोड़े से राजनैतिक समझ में आए। अंत में उन्होंने जिस तरह से श्री श्री को महिमा मण्डित किया वह अनेकों के गले नहीं उतरा। आने वाले समय में किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल चुनाव लड़ लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने किरण बेदी को दिल्ली का पुलिस आयुक्त नहीं बनाया सो उन्होंने भी अपने इस अपमान का बदला ले ही लिया। रामलीला मैदान पर दूसरी बार कांग्रेस औंधे मुंह ही गिरी है। इस बार राहुल गांधी के सपनों का युवा भारत उनसे बेहद दूर हो गया है। सिब्बल और चिदम्बरम ने भरोसा खो दिया है तो बयानवीर राजा दिग्विजय सिंह इस बार आश्चर्यजनक तरीके से मौन ही साधे रहे।

15 अगस्त का दिन प्रोढ़ और वृद्ध हो चली पीढ़ी के लिए काफी महत्वपूर्ण है। वृद्ध जनों ने इस दिन देश की आजादी का जश्न देखा था तो प्रोढ़ हो चली पीढ़ी ने कोर्स की किताबों, चलचित्रों और कहानियों के माध्यम से स्वतंत्रता दिवस के बारे में ज्ञान हासिल किया। सत्तर के दशक के उपरांत कांग्रेस की सरकार द्वारा आजादी की कहानियों को हाशिए पर लाने का जतन आरंभ हो गया। कहा जाता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ही देश की भावी पीढ़ी को दिशा देने का काम करता है। अस्सी के दशक के आरंभ से ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अपने अपने दलों के निहित स्वार्थों के आगे देश की आन बान और शान को गौड़ कर दिया। कभी शिक्षा का कांग्रेसीकरण हुआ तो कभी भगवाकरण। देश में आजादी के परवाने महात्मा गांधी के जन्म दिवस को लोग ड्राई डे (मदिरा की दुकाने बंद होने का दिन) के तौर पर पहचानने लगे। इसी पर व्यंग्य करती हुई बात संजय दत्त अभिनीत लगे रहो मुन्ना भाईमें भी कही गई थी। इसके बाद भी सरकार नहीं चेती।

अगस्त का माह आने वाली पीढ़ी के लिए अब प्रासंगिक हो चला है। 15 अगस्त के बाद अब 16 से 28 अगस्त तक गांधीवादी समाज सेवी अण्णा हजारे के अनशन को युवा उसी तरह याद रख पाएंगे जिस तरह आज की प्रोढ़ हो चली पीढ़ी स्काईलेब को याद रख पाती है। कल जब कानून का रूप धारण कर लेगा जनलोकपाल तब यही पीढ़ी डेढ़ दो दशकों के बाद गर्व से कह सकेगी कि इस आंदोलन में उसने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। इस दौर के किस्से कहानियां वे अपनी आने वाली पीढ़ी को बड़े ही चाव से बताएंगे। फर्क महज इतना ही होगा कि हमें गोरे ब्रितानियों के जुल्म की दास्तान सुनाई जाती थी और आने वाली पीढ़ी अपने ही देश के जालिम शासकों की बातें सुनाएंगे।

13 दिन तक लगातार रामलीला मैदान अण्णा के अनशन का साक्षी रहा है। अण्णा के इस अनशन को हर दृष्टिकोण से मीडिया ने जनता के समक्ष रखा। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मीडिया ने ही अण्णा के इस आंदोलन में आहुतियां डालीं और आग को तेज किया। लोग जब अलह सुब्बह समाचार पत्र पढ़ते तो उनका मन जोश से भर उठता फिर जब वे समाचार चेनल्स पर देश भर में जुनून देखते तो उनकी बाहों की मछलियां अपने आप ही फड़कने लगतीं। फिर क्या, निकल पड़ते दो चार छः के झुंड में युवा सड़कों पर।
इन युवाओं का जोश देखकर हम अंदाजा ही लगा सकते हैं कि आजादी के पहले देश में क्या होता होगा। उस दौर में इसी तरह दो चार आठ के झंुड में जवान इंकलाब जिंदाबादके नारे लगाते होंगे और पुलिस के आते ही गलियों में छिप जाते होंगे। जिस तरह आजादी विषय पर आधारित सिनेमा में दिखाया जाता रहा है कमोबेश वही नजारा आज के युग के हिसाब से दिखाई दे रहा था समूचे भारत का अण्णा के आव्हान पर।

अण्णा को जब 16 अगस्त को घर से गिरफ्तार किया गया था, उस समय लोग इस मामले में ज्यादा संजीदा नहीं थे। दोपहर ढ़लते ही भ्रष्टाचार का विरोध उग्र होने लगा। सरकार ने अपने जासूसोंके माध्यम से सारी जानकारी लेना आरंभ किया। जब देखा कि जनसमर्थन जबर्दस्त तरीके से अण्णा के साथ है तो फिलहाल इसे टालोकी नीति अपनाकर अण्णा को रिहा कर दिया गया। अण्णा सीधे रामलीला मैदान गए और वहां जाकर उन्होंने मांगे पूरी न होने तक अनशन स्थल न छोड़ने की हुंकार भर दी। सरकार को अण्णा की यह बात गीदड़ भभकी ही लगी।

अण्णा के समर्थन में हुजूम देखकर खुद अण्णा अचंभित ही नजर आ रहे थे। उनके सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने माईक संभाल रखा था। बीच में किरण बेदी कुछ बोलतीं किन्तु कानूनविद प्रशांत भूषण पूरी तरह खामोश ही रहते। सरकार और अण्णा के बीच बातचीत बमुश्किल आरंभ हुई। इसी के साथ स्वामी अग्निवेश का फोन टेप सामने आया और उनके चेहरे से नकाब उठ गया। अण्णा के समर्थन में न जाने कितने लोग आए पर आमिर खान को छोड़कर किसी को भी अण्णा ने मंच पर स्थान नहीं दिया।
कपिल सिब्बल और पलनिअप्पम चिदम्बरम ने बाबा रामदेव को अपनी रणनीति में फंसाकर चारों खाने चित्त कर दिया था। बाबा रामदेव के असफल होने का इकलौता कारण उनके मानस पटल पर कुलाचंे मारती राजनैतिक महात्वाकांक्षाएं ही थीं। दस साल पहले सायकल पर चलने वाले रामकिशन यादव ने आज ग्यारह सौ करोड़ का साम्राज्य स्थापित कर लिया है। सरकार के हाथ में बाबा की यह दुखती रग थी, इसलिए बाबा रामदेव को रणछोड़दासबनना पड़ा।

कांग्रेस के इन शातिर प्रबंधकों ने यही दांव किशन बाबूराव यानी अण्णा हजारे पर चलाना चाहा। अण्णा हजारे के तो आगे पीछे कोई है नहीं। उन्होंने कोई संपत्ति नहीं जोड़ी है। सादगी की मिसाल अण्णा हजारे पर सिब्बल, चिदम्बरम के अलावा कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने व्यक्तिगत हमले किए वह भी सीमाओं को लांघते हुए। अण्णा हजारे इससे कतई विचलित नहीं हुए। सबसे आश्चर्य तो तब हुआ जब इन छिछले दर्जे के हमलों के बाद भी अण्णा के समर्थकों ने अपने आंदोलन को अहिंसक ही रखा। मनीष तिवारी के खिलाफ कोई गंदा बयान नहीं दिया। इस पूरे मामले में इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के अघोषित चाणक्य बन चुके राजा दिग्विजय सिंह की खामोशी इस वक्त शोध का विषय बनी हुई है।
अण्णा चूंकि महाराष्ट्र के हैं अतः उन्होंने विलासराव देशमुख पर भरोसा जताया और विलासराव ने ही अंत में प्रधानमंत्री का पत्र लाकर दिया तब जाकर अण्णा ने अपना अनशन स्थगित किया। अण्णा के इस अनशन में एक बात तारीफेकाबिल है कि देश में शातिर, घाघ, विषैले लोगों के होते हुए भी अण्णा के इस अनशन में देश भर में मिले व्यापक जनसमर्थन का तरीका पूरी तरह अहिंसक था। कहीं भी किसी ने भी राष्ट्रीय संपत्ति को निशाना बनाकर उसका नुकसान नहीं किया।

अण्णा विरोधियों ने तरह तरह की चाल चलकर अण्णा के अनशन को समाप्त करवाने का प्रयास किया किन्तु वे सफल नहीं हो पाए। बीच में मायावती ने अण्णा की मुखालफत कर डाली। उस वक्त यह बयार चल पड़ी कि अण्णा देश के संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर के कानून को बदलना चाह रहे हैं। यह चाल शायद इसलिए चली गई थी ताकि दलितों के मन में अण्णा के खिलाफ विषवमन किया जा सके। मीडिया ने साफ कर दिया कि अण्णा तो बाबा साहेब अंबेडकर के कानून का पालन ही सुनिश्चित करवाना चाह रहे हैं, तब जाकर मामला शांत हुआ।

इस आंदोलन में नेहरू गांधी परिवार की राजनैतिक तौर पर सक्रिय पांचवी पीढ़ी में राहुल गांधी बुरी तरह पिछड़ गए। राहुल गांधी अपने पिता की ही तरह युवाओं का भारत देखने की कथित तौर पर अभिलाषा रखते हैं। वे हमेशा युवाओं को आगे लाने की बात कहा करते हैं। युवाओं को कांग्रेस से जोड़ने के लिए उन्होंने बेहद जतन भी किए हैं। अण्णा के अनशन में युवाओं की जबर्दस्त भागीदारी देखकर राहुल के काकाजात भाई वरूण गांधी ने तो नब्ज पहचानी और अनशन स्थल पर जाकर अण्णा समर्थकों के बीच बैठ जाने को मीडिया ने जमकर हाईलाईट किया। राहुल गांधी के अनशन स्थल न जाने को लेकर युवा राहुल से खफा नजर आ रहे है।

राहुल गांधी का घर घेरने गए अण्णा समर्थकों को रामलीला मैदान में कोल्ड ड्रिंक और समोसे भिजवाने की अच्छी प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है। युवाओं का कहना है कि राहुल चाहते तो अनशस्थल पर समोसे के साथ चाय, दूध या लस्सी भिजवा सकते थे किन्तु विदेशी मानसिकता के गुलाम राहुल ने वहां विदेशी शीतल पेय भिजवाया जिसके खिलाफ बाबा रामदेव ने जेहाद छेड़ रखी है। मतलब साफ है कि राहुल के सलाहकार यह चाह रहे थे कि अनशन स्थल पर यह मैसेज भी चला जाए कि राहुल का विरोध करने वालों को राहुल गांधीगिरी से मना सकते हैं और वहां योग गुरू बाबा रामदेव को भी दूर रखा जाए।

कहते हैं कि कथित एक अध्यात्म गुरू ने वरूण गांधी और अण्णा की बात करवाई। अण्णा ने वरूण को अनशन मे आने न्योत दिया, किन्तु वे अपने कौल में बंधे थे कि किसी भी नेता को वे मंच पर स्थान नहीं देंगे, सो वरूण ने जनभावनाओं को भांपते हुए अनशनकारियों के बीच बैठना ही उचित समझा।

किरण बेदी देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी हैं। जब वे दिल्ली में पुलिस आयुक्त के लिए एलीजिबिल हुईं तब उनके स्थान पर किसी और को आयुक्त बना दिया गया। तब चिदंबरम ने उन्हें बुलाया और चिदंबरम से बात के बाद भी किरण बदेी ने खुद को दिल्ली के सीपी की दौड़ से बाहर किया था। उस वक्त तो किरण बेदी खामोश रह गईं किन्तु अब वे मन ही मन खुश जरूर होंगी क्योंकि अब सरकार उनके सामने घुटनों पर खड़ी दिख रही है।

अण्णा के चिकित्सक डॉ.नरेश त्रेहान को मुनाफे में ही पब्लिसिटी मिल गई है। अण्णा अपनी लड़ाई आम आदमी के लिए लड़ रहे हैं और आम आदमी की पहुंच से मीलों दूर हैं डॉ.त्रेहान। डॉ.त्रेहान को अमीरों और संपन्न वर्ग का चिकित्सक यानी राज वैद्य माना जाता है। अण्णा का उनसे इलाज करवाना उन पर भरोसा जताना आम आदमी को गवारा नहीं उतरा है। एक आम आदमी सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों के भरोेसे ही है।

अण्णा ने भी आम सरकारी चिकित्सक के बजाए डॉ.त्रेहान से इलाज करवाकर उन्हें बार बार मंच पर बुलवाकर, बाद में उनके अस्पताल में दाखिल होकर साबित कर दिया कि सरकारी चिकित्सकों पर उन्हें उसी तरह भरोसा नहीं है जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के घुटने के बदले जाते समय उन्हें नहीं था, जिस तरह कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को देश के बजाए अमेरिका में जाकर इलाज और ऑपरेशन करवाते वक्त नहीं था।

अण्णा से नाराजगी रखने वालों में पश्चिम बंगाल की निजाम ममता बनर्जी का नाम कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर है। मीडिया में अण्णा ही अण्णादेखकर उनकी बोलती बंद थी। कहते हैं कि ममता चाह रही थीं कि वे अपनी कोलकता दक्षिण लोकसभा सीट छोड़ने के पहले संसद में एक जोरदार भाषण दें जिसे लोग सालों साल याद रखें। ममता खुद भी एक जनआंदोलन के माध्यम से ही सत्ता की मलाई चख पा रही हैं। ममता का यह सपना सपना ही बनकर रह गया।

अण्णा के इस आंदोलन में नुकसान में सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही रही है। कांग्रेस में भी सबसे ज्यादा डैमेज राहुल गांधी का हुआ है। युवाओं का राहुल से मोह भंग हुआ है। पहले रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के मामले में राहुल गांधी खामोश रहे फिर अण्णा के मामले में तो उन्होंने हद ही कर दी। एक बार भी झूटे मंुह ही सार्वजनिक तौर पर अण्णा के हाल चाल नहीं जाने। कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल के बतौर संसद में राहुल का शानदार भाषण तैयार कर उनसे पढ़वाया। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने इस भाषण को राहुल का राष्ट्र के नाम संदेश बताकर इसकी हवा निकाल दी। यह सच है कि अण्णा हजारे का अनशन तुड़वाने में कांग्रेसनीत सरकार से ज्यादा विपक्ष की भूमिका रही है। सोनिया गांधी लौटेंगी तब इसकी समीक्षा होगी और फिर अगली बिसात बिछाई जाएगी।