सोमवार, 15 जुलाई 2013

मलेरिया रोधी अभियान की निकली हवा!

मलेरिया रोधी अभियान की निकली हवा!

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। जिले में मलेरिया धीरे धीरे अपने पैर पसार रहा है। शहर के अलावा कुरई केवलारी एवं अन्य गामीण क्षेत्रों से भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। बारिश के पूर्व मलेरिया विभाग द्वारा मलेरिया या डेंगू जैसी बीमारियों से बचाव के लिये अभियान जरूर चलाये जाते हैं, पर अन्ततः वे नाकाफी ही साबित हो रहे हैं।
इस बार बारिश के मौसम में मलेरिया और डायरिया के साथ मिलकर आक्रमण करने के मामलों को देखकर चिकित्सक हैरान हैं। कॉलरिक प्रकार का यह मलेरिया शुरूआत में बिल्कुल आंत्रशोथ या डायरिया, गेस्ट्रोइन्ट्राइटिस जैसा होता है। इसके बाद ही मलेरिया अपने असली रूप में सामने आता है। कालरिक मलेरिया में प्लेटलेट्स काउंट भी कम हो जाते हैं।
इससे संक्रमित मरीज एकदम परेशान हो जाता है। खून की जांच के लिए बनने वाली स्लाइड में हमलावर दिखाई नहीं देता है। इसमें मरीज को पेटदर्द, उल्टी दस्त और बुखार होता है। इस तरह वायवेक्स मलेरिया मरीज को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। शहर के साथ जिले के कई गंदगी वाले क्षेत्रों में शुरूआती बारिश से उपजे मच्छर अब जान के दुश्मन साबित हो रहे हैं।
चिकित्सक बताते हैं कि घरों के आसपास जगह-जगह इक्ट्ठा होने वाला पानी, मच्छरों के लार्वा को बढ़ावा देने में मददगार साबित होता है। और यहीं से संक्रमण की शुरूआत होती है। मच्छरों के लार्वा के बढ़ने से, मलेरिया के कई रूप सामने आते हैं। चिकित्सक भी मलेरिया और डायरिया के साथ आने को लेकर खासे हैरान हैं। इससे पीड़ित मरीज को आरंभ में एक-दो दिन की दवा की सलाह दी जाती है। खून की जांच में संक्रमण का पता लगाकर फिर उसके अनुरूप खुराक दी जाती है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान मौसम, इस बीमारी को अनुकूलता प्रदान कर रहा है। जिस समय बारिश नहीं होती है उस वक्त वातावरण में उमस बढ़ जाती है और तापमान में वृद्धि दर्ज की जाती है। शाम के समय ही घरों में कुछ ठण्डक महसूस की जाती है। इससे मच्छरों को भू-मध्य रेखा जैसा वातावरण मिलता है जो मच्छरों के हमले के लिए अनुकूलता प्रदान करता है। इसी कारण डेंगू वायरल बुखार, डायरिया, मलेरिया या अन्य प्रकार के बुखार के मामले सामने आते हैं।

चिंतनीय पहलू तो यह है कि मलेरिया विभाग इस बीमारी से बचाव का जितना प्रचार-प्रसार कर रहा है, यह बीमारी नित नये-नये रूप में सामने आ रही है। मजे की बात तो यह है कि सिवनी का मलेरिया विभाग भी आस-पास पानी इकट्ठा न होने की सलाह देता है लेकिन जिला अस्पताल परिसर में ही जहां-तहां उभरे बड़े-बड़े गड््ढों में पानी भरा देखा जा सकता है।

कंचन डोंगरे का ब्लड प्रेशर (90/140) बहुत हाई है: डॉ.बांद्रे

कंचन डोंगरे का ब्लड प्रेशर (90/140) बहुत हाई है: डॉ.बांद्रे

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। ‘‘पुलिस हिरासत से जेल भेजी गईं जनपद पंचायत सिवनी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे का रक्तचाप बहुत अधिक है, उन्हें कार्डियक प्राब्लम है, इसलिए उन्हें आईसोलेशन वार्ड के स्थान पर गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती करवाया गया है। उनका रक्तचाप 90/140 है।‘‘ उक्ताशय की बात कंचन डोंगरे का परीक्षण करने वाले चिकित्सक डॉ.बांद्रे ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कही।
ज्ञातव्य है कि विधायक निधि के ब्याज के नौ लाख चालीस हजार रूपए के गबन के आरोप में जनपद पंचायत सिवनी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे को शुक्रवार की शाम कोतवाली पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया था। शनिवार उन्हें न्यायालय में पेश किया गया था, जहां से उनका जेल वारंट कट गया था।
बताया जाता है कि जेल वारंट कटने के साथ ही कंचन डोंगरे का स्वास्थ्य बिगड़ना आरंभ हुआ और उन्हें जिला चिकित्सालय लाया गया। चिकित्सकों ने परीक्षण के उपरांत उन्हें भर्ती होने की सलाह दे डाली। अमूमन विचाराधीन कैदी या सजा याफ्ता कैदियों को आईसोलेशन वार्ड के एक कक्ष में रखा जाता है।
जिला चिकित्सालय के सूत्रों का कहना है कि कंचन डोंगरे को आईसोलेशन के बजाए आईसीसीयू के वातानुकूलित हाल में रखा गया है। उनकी सुरक्षा के लिए दो पुलिस अधिकारी भी तैनात हैं, जो कंचन डोंगरे को दिए जाने वाले भोजन या नाश्ते आदि का परीक्षण कर उन तक पहुंचने दे रहे हैं।
वैसे जनपद पंचायत की सीईओ के आईसोलेशन के बजाए आईसीसीयू में भर्ती होने की बात से शहर की फिजां में अनेक तरह की चर्चाएं तैर गई हैं। कहा जा रहा है कि पूर्व में डॉ.बांद्रे की सेवाएं शहर के एक विवादित अस्पताल को दी जा रही थीं। इसके बाद वे घंसौर चले गए थे, और अब सिवनी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
चर्चाएं यहां तक भी हैं कि अगर जनपद पंचायत की सीईओ कंचन डोंगरे को वाकई कार्डियक प्राब्लम है तो उनका ईसीजी करवाया जाए। साथ ही साथ जिला चिकित्सालय एवं निजी चिकित्सकों के एक दल अथवा मेडिकल बोर्ड से इस बात की पुष्टि की जाए कि वे वाकई बीमार हैं, या फिर जेल जाने के भय से यह स्वांग रच रही हैं।

वहीं दूसरी ओर शहर में एक बात की चर्चा और तेजी से चल रही है। कहा जा रहा है कि कंचन डोंगरे को बचाने के लिए भ्रष्ट सरपंच अब लाम बंद होने जा रहे हैं। ये सारे सरपंच एकजुट होकर किसी भी तरह से कंचन डोंगरे को बचाने की जुगत लगाने वाले हैं। चर्चाओं के अनुसार इनका मानना है कि अगर कंचन डोंगरे जेल जाती हैं और बारीकी से जांच होती है तो इसमें उन सभी भ्रष्ट सरपंचों की गरदन नपना तय ही है।

डीसीसी का काम आरंभ: नहीं पिटी मुनादी!

कांग्रेस भवन का मामला --- 3

डीसीसी का काम आरंभ: नहीं पिटी मुनादी!

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। केंद्रीय मंत्री कमल नाथ द्वारा 30 दिन में जिला कांग्रेस कमेटी का काम आरंभ होने की घोषणा की समयावधि भले ही 12 जून को पूरी हो गई हो, पर जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा इसके एक दिन के उपरांत गुपचुप तरीके से काम को आरंभ करवा दिया गया। जिला कांग्रेस के तीन और नगर कांग्रेस के एक प्रवक्ता भी इस मामले में खामोश ही रहे।
इस संबंध में जब जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हीरा आसवानी से चर्चा की गई तो हिन्द गजट से दूरभाष पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि यह कांग्रेस के संगठन के अंदर का मामला था, अतः समस्त सदस्यों को सूचना देकर 13 तारीख को इसके निर्माण की औपचारिक शुरूआत कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम की विज्ञप्ति आज जारी कर दी जाएगी, पर कार्यक्रम के पहले की विज्ञप्ति क्यों नहीं जारी हुई के सवाल पर उन्होंने कहा कि वह विज्ञप्ति जारी नहीं की गई है।
वहीं कांग्रेस के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार इस काम को आरंभ करवाने के पहले कांग्रेस को बाकायदा विज्ञप्ति जारी की जानी चाहिए थी, क्योंकि यह जिला कांग्रेस के लिए एक बहुत ही गर्व की बात है कि उसे एक अदद भवन मिलने जा रहा है जो कांग्रेस के कद्दावर नेता सालों में नहीं दे पाए हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि कांग्रेस के प्रवक्ताओं द्वारा समय समय पर भारतीय जनता पार्टी को घेरने पर तो पूरी मुस्तैदी दिखाते हैं पर जब बारी सिवनी में भाजपा या विधायकों को घेरने की आती है तब इनकी तोपें मौन हो जाती हैं। हाल ही में जनपद पंचायत सिवनी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे को गबन के मामले में पुलिस ने पकड़ा है, यह मामला वाकई कांग्रेस के लिए ऐसा था जिसे अगर वह भुनाती तो भाजपा को जवाब देना मुश्किल होता, वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं।
इधर, नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इमरान पटेल ने हिन्द गजट को बताया कि यह कार्यक्रम जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा आहूत था अतः विज्ञप्ति जारी करने की जवाबदेही भी उन्हीं की थी। उन्होंने कहा कि अगर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष द्वारा उन्हें निर्देशित किया गया होता तो नगर कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता द्वारा अवश्य ही विज्ञप्ति जारी कर दी जाती। जिला कांग्रेस कमेटी के तीन तीन प्रवक्ताओं द्वारा विज्ञप्ति क्यों नहीं जारी की गई है यह वाकई आश्चर्यजनक है।

वहीं, कांग्रेसी दबी जुबान से इस बारे में भी चर्चा करते नजर आ रहे हैं कि कांग्रेस के ‘‘कुछ चुनिंदा‘‘ नेताओं को सिवनी में केंद्रीय मंत्री कमल नाथ का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है, और वे इसकी मुखालफत भी कर रहे हैं। सिवनी में कमल नाथ की घोषणा के एक माह तक जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा इसे ठण्डे बस्ते के हवाले करने की चर्चाएं भी तेज हो चुकी हैं।

बिना संस्थापना प्रमाण पत्र के चल रही पाण्डे क्लासेस

बिना संस्थापना प्रमाण पत्र के चल रही पाण्डे क्लासेस

कोतवाली पुलिस ने नहीं दर्ज की मुसाफिरी!

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। शहर के पॉश इलाके बारापत्थर में संचालित होने वाली पाण्डे क्लासेस नगर पालिका सिवनी और गुमाश्ता विभाग की अनुमति के बिना ही धड़ल्ले से संचालित हो रही है। पाण्डे क्लासेस में नगर निगम भोपाल द्वारा शर्तों के अधीन वर्ष 2006 में दिए गए प्रमाण पत्र हो ही अपनी दीवार पर चस्पा कर लोगों को भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बारापत्थर में ब्रम्हकुमारीज आश्रम के समीप संचालित होने वाली पाण्डे क्लासेस की दीवार पर एक प्रमाण पत्र चस्पा है। इस प्रमाण पत्र में राज कुमार पाण्डे के पुत्र अनुराग पाण्डे को पाण्डे क्लासेस, दुकान नंबर सी - 47, परिजात काम्लेक्स, बिट्टन मार्केट, भोपाल में कोचिंग क्लास चलाने के लिए लाईसेंस नंबर 88/155 जारी किया गया है।
समाचार एजेंसी ऑॅफ इंडिया के भोपाल ब्यूरो से राजेश शर्मा ने बताया कि नगर निगम भोपाल में जमा पाण्डे क्लासेस के आवेदन नंबर 94 दिनांक 13 जून 2006 के तहत यह लाईसेंस पांच सौ रूपए फीस लेकर नगर निगम भोपाल द्वारा अखाद्य एवं अन्य सामग्री व्यापार संबंधी नगर पालिका निगम की धारा 356 एवं 427 के तहत दिया गया है। यह लाईसेंस 01 अप्रेल 2005 से 31 मार्च 2006 तक के लिए वैध था।
इस लाईसेंस को सिवनी में संचालित पाण्डे क्लासेस की दीवारों पर चस्पा करवाने का औचित्य समझ से परे ही है। इसी के साथ एक अन्य लाईसेंस भी एक अन्य दीवार पर चस्पा है। दोनों ही लाईसेंस में ‘अहस्तांरणीय‘ स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है। ये दोनों ही लाईसेंस भोपाल के लिए वैध हैं।

जानकारों का कहना है कि सिवनी में लंबे समय से संचालित पाण्डे क्लासेस को सिवनी में गुमाश्ता विभाग और नगर पालिका परिषद से संस्थापना प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य था। वहीं कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी संदेह के बादल ही मंडरा रहे हैं, क्योंकि पुलिस महानिरीक्षक संजय झा, जिला कलेक्टर भरत यादव एवं जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला ने स्पष्ट तौर पर बाहर से आकर व्यवसाय करने वालों की मुसाफिरी दर्ज करवाने की बात कही गई थी, किन्तु पाण्डे क्लासेस के संचालकों द्वारा इन नियमों को धता बताते हुए धड़ल्ले से अपना व्यवसाय संचालित किया जा रहा है।

लिपिक हड़ताल से हिल गया आम आदमी

लिपिक हड़ताल से हिल गया आम आदमी

(शरद खरे)

लिपिक वर्गीय हड़ताल लगातार जारी है। इस हड़ताल से आम आदमी बुरी तरह मुहाल हो गया है। राजस्व विभाग में सबसे बुरे हालात पैदा हो चुके हैं। दूर दूर से आने वाले मुवक्किलों को ना तो करीने से पेशी ही मिल पा रही है और ना ही उनकी समस्याओं का ही कोई हल सामने आ पा रहा है।
शासन ने इस हड़ताल पर अपना अड़ियल रवैया अपनाया हुआ है। शासन की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी इसके लिए नहीं किया जाना आश्चर्यजनक ही है। देखा जाए तो शासन का यह दायित्व है कि अगर उसके कर्मचारी हड़ताल पर हैं तो इस हड़ताल से आम आदमी प्रभावित ना हो।
वैसे भी यह चुनावी साल है। लगभग लगभग चुनावी घंटी बज चुकी है। चुनाव सर पर ही माने जा सकते हैं। चुनावों को करीब आता देख कर्मचारी संगठनों का भी लामबंद होना स्वाभाविक ही माना जा रहा है। वे भी अपनी बातें मनवाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं। उनके हिसाब से यही उचित समय है जबकि वे शासन को घुटनों पर खड़ा कर सकते हैं।
प्रदेश सरकार की ओर से भी इस हड़ताल के बारे में कोई वक्तव्य नहीं दिया गया है। ना ही काम पर वापस लौटने की पुरजोर अपील ही की गई है। उधर विपक्ष में बैठी कांग्रेस को भी मानों सांप सूंघ गया है। कांग्रेस ने भी इस मसले में अपना मुंह सिल रखा है। कर्मचारी निराश हैं। आखिर उच्च न्यायालय के पुराने फैसले को लागू करने में सरकार को क्या दिक्कत है यह समझ से ही परे बात है! अगर सरकार को कोई आपत्ति है तो कोर्ट का रास्ता उसके लिए खुला है पर वह कोर्ट जाने का जतन भी करती नहीं दिख रही है।
12 जुलाई 2011 में उच्च न्यायालय द्वारा यह व्यवस्था दी गई थी, जिसे लागू करवाने के लिए लिपिक लामबंद हुए हैं। शिवराज सिंह चौहान द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। यह समस्या 1981 से उपजी है। शिवराज सिंह चौहान के खबरिए उन्हें गलत जमीनी हकीकत से रूबरू करवा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि इस हड़ताल में सरकार के रवैए से प्रदेश के सत्तर हजार से अधिक लिपिकों और उनके परिवारों के साथ ही साथ इस हड़ताल से प्रभावित होने वाले लोग और उनके परिवार भी भाजपा के खिलाफ होते जा रहे हैं।
दरअसल, सरकार के समक्ष यह मामला चुनौती से कम नहीं है। अगर वह लिपिकों के सामने हथियार डालती है तो वैसे ही खाली पड़े खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा जिसे उठाने में वह सक्षम नहीं दिख रही है। वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं, विधायकों के वेतन भत्ते और सुविधांए बढ़ाते समय सरकार ने जरा सा भी नहीं सोचा। पर लिपिक चूंकि अदना सा सरकारी कर्मचारी है अतः उसकी मांग पर ध्यान देना वह शायद अपनी शान के खिलाफ ही समझ रही है।
शासन को यह भी शायद बताया गया है कि सरकारी योजनाओं पर इस हड़ताल का सीधा असर नहीं पड़ रहा है। पर यह बात भी आईने की तरह ही साफ है कि इस हड़ताल से सरकारी सिस्टम डगमगा गया है। चारों ओर हाहाकार की स्थिति निर्मित हो चुकी है। ग्रामीण अंचलों से अपने मुकदमे, काम आदि करवाने आने वाले लोगों की नस्तियां कहां हैं, इस बारे में अफसरान नहीं लिपिक ही जानते हैं। लिपिकों की अनुपस्थिति बताकर मुवक्किलों और जिनके काम हैं उन्हें घर वापस भेज दिया जा रहा है।
इन परिस्थितियों में ग्रामीणों को हर कदम पर परेशानी का सामना ही करना पड़ रहा है। ग्रामीणों की इन परेशानियों से शायद किसी को भी लेना देना नहीं है। ग्रामीणों के अंदर इस हड़ताल को लेकर रोष और असंतोष पनपता जा रहा है। ग्रामीणों को लगने लगा है कि सियासी दल चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं और दोनों ही को ग्रामीणों से कोई लेना देना नही है।
सरकार की ओर से इस हड़ताल को रोकने या समाप्त करने की दिशा में कोई प्रयास अब तक आरंभ नहीं हुए है, जिससे लग रहा है कि सरकार इस हड़ताल को लेकर संजीदा नहीं है। आज ग्यारहवें दिन भी हड़ताल जारी रही। दस दिनों तक अगर किसी कार्यालय में नस्तियां ना सरकें तो वहां क्या स्थिति होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
अक्सर यही होता है कि कोई भी संघ हड़ताल करता है तो उसमें यही माना जाता है कि उसका शीर्ष नेतृत्व अपने निजी हित साधकर मौन हो जाता है। इस बार कुछ और ही नजारा दिख रहा है। 11 दिन में मामला नहीं सुलटा, ना सरकार झुकी ना ही लिपिक। अब तो लगता है मानो लिपिक आर पार की लड़ाई के मूड में हैं। अगर यह हड़ताल एकाध सप्ताह और चल गई तो आम आदमी की तो बैंड ही बज जाएगी।

सिवनी जिले के विधायकों से अपेक्षा करना बेमानी ही होगा कि वे लिपिकों की इस हड़ताल की जमीनी हकीकत से सरकार और भाजपा संगठन को अवगत करवाएं, क्योंकि सिवनी जिले के विकास या समस्याओं में उनकी दिलचस्पी ही नजर नहीं आती है। अब कोई बीच का रास्ता ही नजर नहीं आता है। या तो सरकार को झुकना होगा या फिर लिपिक संघ को। विजय किसकी होगी यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही छिपी नजर आ रही है।

रविवार, 14 जुलाई 2013

अंततः रंग लाई इमरान पटेल की पहल!

अंततः रंग लाई इमरान पटेल की पहल!

(दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनी (साई)। सिवनी जिले की कांग्रेस कमेटी को आने वाले समय में अपना निजी भवन मिल सकेगा। आज इस भवन के लिए औपचारिक शुरूआत हो गई है।
ज्ञातव्य है कि गत 13 जून को केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के सिवनी आगमन के दौरान नगर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल द्वारा सार्वजनिक रूप से कमलनाथ से यह आग्रह किया गया था कि सिवनी में कांग्रेस भवन का निर्माण शीघ्र कराया जाए, जिसे तुरंत मानते हुए कमलनाथ ने मंच से ही घोषणा कर दी थी कि एक माह के भीतर सिवनी में कांग्रेस भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा।
इसी के चलते आज विधिवत कांग्रेस कार्यालय के लिए बनने वाले भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया। भवन के निर्माण कार्य प्रारंभ होने के समय जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी, नगर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल, श्रीमती नेहा सिंह, आशुतोष वर्मा, राजकुमार खुराना, मो। असलम, राजिक अकील, ओपी तिवारी, राजा बघेल, संतोष पंजवानी, हाजी सोहेल पाशा, दिलीप बघेल, शिव सनोडिया, प्रवेश भालोटिया, सुरेंद्र करोसिया सहित सभी कांग्रेसी मौजूद थे।
उल्लेखनीय है कि 11 जुलाई को कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल ने छिंदवाड़ा पहुंचकर कमलनाथ से उक्त निर्माण कार्य प्रारंभ किये जाने का आग्रह भी किया था, जिस पर उन्होंने बिना चंदा लिये कार्य प्रारंभ किये जाने की बात कही थी।
वहीं कांग्रेस के अंदरूनी स्तर पर चल रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो कांग्रेस के भवन के निर्माण में अभी बहुत सारे अड़ंगे बचे हुए हैं। कांग्रेस के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि इसका नक्शा वर्तमान में किसी इंजीनियर द्वारा तैयार किया गया है।
सूत्रों के अनुसार केंद्रीय मंत्री कमल नाथ द्वारा इसका नक्श नागपुर के एक सुप्रसिद्ध आर्कीटेक्ट द्वारा तैयार करवाने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों ने साई न्यूज को यह भी बताया कि जिस आर्कीटेक्ट ने छिंदवाड़ा कांग्रेस कमेटी के राजीव भवन का डिजाईन तैयार करवाया था उसी से सिवनी के कांग्रेस भवन का नक्शा तैयार करवाया जाना प्रस्तावित है।

इस भवन की लागत कितनी होगी? इसके लिए अभी जिला कांग्रेस कमेटी के पास कितना धन है? बाकी के धन की व्यवस्था कहां से की जाएगी? इस भवन के ट्रस्ट में किन किन लोगों का शुमार किया जाना प्रस्तावित है इस बारे में अभी कांग्रेस के प्रवक्ता और नेता मौन ही हैं।

स्वास्थ्य कारणों से जेल के बजाए अस्पताल पहुंची कंचन डोंगरे

स्वास्थ्य कारणों से जेल के बजाए अस्पताल पहुंची कंचन डोंगरे

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। नौ लाख चालीस हजार रूपए के गबन के आरोप में कल पुलिस हिरासत में आईं जनपद पंचायत सिवनी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे और लेखापाल बाल मुकुंद श्रीवास्तव को माननीय न्यायालय द्वारा जेल भेजने के आदेश जारी कर दिए गए किन्तु स्वास्थ्य कारणों से दोनों को जेल के बजाए जिला चिकित्सालय में भरती करा दिया गया है।
अनुविभागीय अधिकारी पुलिस संजीव कुमार ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि जनपद पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे और लेखापाल को गबन के आरोप में गत दिवस पुलिस ने अपनी हिरासत में लिया था, आज दोनों को माननीय न्यायालय के समक्ष पेश किया गया जहां से प्रकरण की सुनवाई के उपरांत दोनों का जेल वारंट काट दिया गया।
एसडीओपी संजीव कुमार ने बताया कि दोनों ने स्वास्थ्य कारणों की दुहाई दी, जिसके चलते जनपद पंचायत सिवनी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी कंचन डोंगरे एवं लेखापाल श्री श्रीवास्तव को जेल के स्थान पर जिला चिकित्सालय में भरती करवा दिया गया है।
ज्ञातव्य है कि सिवनी जनपद के जून माह के प्रथम सप्ताह में विधायक निधि के 9 लाख 40 हजार के गबन का मामला प्रकाश में आया था, तब जनपद पंचायत की सीईओ कंचन डोंगरे ने लिपिक नारायण डहेरिया के विरूद्ध एफआईआर दर्ज कराई गई थी। जनपद में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार विधायक निधि के 9 लाख 40 हजार रूपए पार हो जाना और इसकी भनक सीईओ कंचन डोंगरे, एकाउंट ऑफिसर को न होना आश्चर्यजनक है। बताया जाता है कि भले ही इस पूरे मामले का ठीकरा लिपिक नारायण डहेरिया के ऊपर फोड़ दिया गया हो, पर कोतवाली पुलिस ने आज कंचन डोंगरे को गिरफ्तार कर मामले की तह तक पहुंचने का प्रयास किया गया है।

पुलिस सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि एक चेक 2011 में गायब होने की सूचना जनपद के रिकार्ड में दर्ज करवाई गई थी। इसी चेक पर वर्तमान सीईओ कंचन डोंगरे ने हस्ताक्षर कर उसे आहरण के लिए भेज दिया। उधर, कंचन डोंगरे द्वारा इस मामले में पुलिस को निर्दोष बताया जाकर यह कहा जा रहा है कि यह मामला उनकी यहां तैनाती के पूर्व 2011 का है।

क्या वाकई आजादी के साढ़े छः दशक बीत गए!

क्या वाकई आजादी के साढ़े छः दशक बीत गए!

विमला वर्मा, नेहा सिंह, हरवंश सिंह जैसे कद्दावरों ने किया प्रतिनिधित्व, सालों से जान हथेली पर लेकर चल रहे ग्रामीण

(इंजीनियर उदित कपूर)

सिवनी (साई)। भारत गणराज्य को आजाद हुए साढ़े छः दशक होने को हैं। सरकारें चाहे कांग्रेस की रही हों या भाजपा की, या किसी भी दल की,, सभी ने विधानसभा क्षेत्र केवलारी में छलावा ही किया है। आज भी यहां के अनेक गांवों के वाशिंदे सड़क के अभाव में बारिश के माहों में रेल्वे की पटरी पर से ही आने जाने को मजबूर हैं। घर में चाहे कोई बीमार हो, बच्चों को स्कूल जाना हो, सा फसल को बेचने बाजार जाना हो, सभी रेल्वे की पटरी वाले पुल पर से जाने को मजबूर हैं। रूह तो तब कांप उठती है जब इसी बीच अगर सामने से रेलगाड़ी आ जाए।
देखा जाए तो रेल्वे की पटरी पर चलना गैर कानूनी है, पर मजबूर ग्रामीण क्या करें? उन्हें तो रोजमर्रा के काम निपटाने ही हैं। सुश्री विमला वर्मा और नेहा सिंह के कार्यकाल में आधुनिक भारत ने गति पकड़ ली थी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु मीडिया में विकास पुरूष होने का दावा करने वाले शालका पुरूष हरवंश सिंह ठाकुर ने चार बार यहां परचम लहराया और फिर भी सड़क या पुल का ना बन पाना अपने आप में आश्चर्य जनक ही माना जा सकता है।
अगर आप केवलारी विधानसभा के कुछ गांवों की सैर करें तो उन रास्ते पर, जहां हर कदम पर मौत अपने पंख फैलाए खड़ी है। इस इंतजार में कि कब चलने वाले के कदम डगमगाएं और कब वो उसे अपने आगोश में समेट ले। लोग दावा करते हैं कि इस रास्ते पर चलने की हिम्मत करना तो दूर, इसे देख कर ही आपकी रूह कांप जाएगी, लेकिन फिर भी लोग चलने को मजबूर हैं। ये जानते हुए भी कि इस रास्ते पर उठने वाला हर क़दम मौत का कदम है।
सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर रेल की पटरियों के बीच मौत का खेल जारी है। हर क़दम के साथ दिल की धड़कन घटती-बढ़ती है। हर गुज़रती ट्रेन के साथ ज़िंदगी की रेस जारी है। कोई साइकिल लिए, कोई खाली हाथ, तो कोई अपने बस्ते के साथ इस सफर पर है।
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में केवलारी विधानसभा के कंडीपार गांव के लोगों की यही नियती है, यही तक़दीर है। बारिश का मौसम शुरू होते ही इस गांव को पास के कस्बे से जोड़न वाली इकलौती कच्ची सड़क कीचड़ में कुछ ऐसे गुम हो जाती है कि क्या गाड़ी और क्या पैदल, इस सड़क से गुज़रना ही नामुमकिन हो जाता है। और बस इसी वजह से हर साल कंडीपार के लोग इसी तरह जान हथेली पर लेकर मौत का ये पुल पार करते हैं।
कंडीपार के बाशिंदों को यहां एक नहीं, बल्कि रोज़ाना तीन-तीन ऐसे मौत के पुलों से होकर गुज़रना होता है। इस इम्तेहान में वो पास हो गए तो ठीक, लेकिन फेल हुए तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही नतीजा और वो है मौत। वैसे इस गांव के तमाम लोग पुलों के इम्तेहान को लेकर इतने खुशकिस्मत भी नहीं हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो पुल के ऊपर से निकले तो थे मंज़िल की तलाश में, लेकिन पीछे से आती ट्रेन ने उन्हें कहीं और पहुंचा दिया।
मौत का ये रास्ता आखिर खत्म कहां होता है? ये रास्ता जहां ख़त्म होता है वहां पहुंच कर डर ख़त्म नहीं होता बल्कि और बढ़ जाता है, क्योंकि इस रास्ते के ख़ात्मे के साथ ही शुरू हो जाता है मौत का इससे भी ख़तरनाक खेल। हादसे का शिकार नौजवान गोविंद सूर्या ने कहा, ‘‘मैं पुल से गुज़र रहा था। ट्रेन आ गई। हड़बड़ाहट में नीचे गिर गया। रीढ़ की हड्डी टूट गई।‘‘
वहीं, दूसरी ओर कंडीपार की निवासी शीलावती का कहना है कि साहब, धड़-धड़ होवत है, जब तक बच्चा नहीं आवत। कंडीपार की निवासी स्कूल में पढ़ने वाली श्रद्धा इनावती के अनुसार, ट्रेन आती है, तो दौड़ कर निकल जाती हूं।

मुश्किल एक, दर्द अलग-अलग
ये दर्द है उस नौजवान का जो ज़िंदगी और मौत की रेस में अपनी बाज़ी हार गया। खुशकिस्मती से ज़िंदगी तो बच गई, लेकिन ज़िंदगी जीने लायक भी नहीं रही। एक डर है उस मां का, जो हर रोज़ हज़ार मन्नतों के बाद अपने कलेजे के टुकड़ों को तैयार कर स्कूल तो भेजती है, लेकिन जब तक बच्चे लौट कर घर नहीं आते, तब तक निगाहें दरवाज़े से हटती नहीं है। एक यह तकलीफ़ है उस नन्हीं गुड़िया की, जिसे हर रोज़ स्कूल जाने के लिए ज़िंदगी और मौत से पकड़म-पकड़ाई खेलनी पड़ती है।

क़दम पटरी पर, जान हथेली पर
मध्य प्रदेश के सिवनी ज़िले के इस गांव कंडीपार के बाशिंदों के पास दूसरा कोई चारा भी नहीं है। एक बार बारिश हुई नहीं कि गांव से बाहर जानेवाली इकलौती कच्ची सड़क चलने के काबिल नहीं रह जाती और तब पूरे गांव को हर काम के लिए बस इसी तरह तीन-तीन रेलवे पुलों के ऊपर से होकर गुज़रना पड़ता है, जान हथेली पर लेकर। मगर, धड़धड़ाती रेल गाड़ियों के बीच रोज़ाना मौत से दो-दो हाथ करते ये भोले-भाले गांववाले हर रोज़ खुशकिस्मत नहीं होते। एक बार जो इस इम्तेहान में फेल हो जाता है, समझ लीजिए कि उसकी ज़िंदगी ही उससे हमेशा-हमेशा के लिए रूठ जाती है।

यूं रूठ गई गोविंद की क़िस्मत
अब नौजवान गोविंद सूर्या को ही लीजिए। आज से कोई आठ साल पहले गोविंद इसी तरह रेलवे पुलिस के ऊपर से स्कूल जा रहा था। लेकिन बीच रास्ते में जो कुछ हुआ, वो गोविंद के लिए कभी ख़त्म होने वाला दर्द बन कर रह गया। पीठ में बस्ता टांगे मासूम गोविंद अभी पुल के बीचों-बीच पहुंचा ही था कि अचानक सामने से ट्रेन के आ गई। अब ना तो वो पीछे लौट सकता था और ना ही आगे बढ़ सकता था। कुछ देर के लिए तो गोविंद की सांसें ही थम गई और अगले ही पल वो डर के मारे पुल के ऊपर से सीधे नीचे जा गिरा। गोविंद के रीढ़ की हड्डी टूट गई और वो नदी के बीच ही बेहोश हो गया।

पटरी मौत, पटरी पर ज़िंदगी
गोविंद की ज़िंदगी तो बच गई, लेकिन उसके जिस्म के तमाम हिस्से अब भी ठीक से काम नहीं करते। पढ़ाई छूट गई और वो ज़िंदगी खुद पर बोझ बन गई। ये कहानी अकेले गोविंद की नहीं है, गोविंद के अलावा और भी बदकिस्मत हैं, जो इन पुलों का शिकार हो चुके हैं। इस गांव की एक बुजुर्ग महिला तो ट्रेन की टक्कर के बाद अपनी जान से ही चली गई, जबकि एक गर्भवती महिला ने दहशत के मारे पटरी के बगल में ही अपने बच्चे को जन्म दिया।
इतना होने के बावजूद आज़ादी से लेकर अब तक ना तो गांववालों को एक अदद पक्की सड़क मिली और ना ही उनकी किस्मत खुली। पांच किलोमीटर की एक सड़क बनाने में कितने दिन लगते हैं? एक महीना दो महीना या साल दो साल? लेकिन हमारे देश में इतनी ही लंबाई की एक सड़क ऐसी है, जो पिछले 66 सालों में नहीं बन सकी। लिहाज़ा जिन्हें इस सड़क से होकर गुज़रना था, वो रोज़ सिर पर कफ़न बांध कर सफ़र करते हैं।

पांच किलोमीटर, 66 साल
पांच किलोमीटर का ये एक ऐसा फ़ासला है जिसे पिछले 66 सालों में भी हम पाट ना पाए। देश के तमाम नेता, नौकरशाह, खुदमुख्तार और बयान बहादुर मिलकर भी पिछले 66 सालों में फकत पांच किलोमीटर का रास्ता भी इस गांव को नहीं दे पाए। वो रास्ता जिसपर जिसपर जिंदगी बेखौफ अपने कदम बढ़ाती। और बस इसी एक कमी की वजह से इस गांव के लोग हर साल पूरे चार महीने इसी तरह जान हथेली पर लेकर मौत के रास्ते हो कर गुज़रने को मजबूर हैं।
अगर इस गांव को उनका पांच किलोमीटर लंबा रास्ता मिल जाता तो ना तो बारिश में ये सड़क यूं कीचड़ में गुम हो जाती और ना ही ना ही इस सड़क से बचने के लिए यहां के बाशिंदों को मौत को छू कर निकलना पड़ता। मगर, अफ़सोस। कंडीपार गांव का यही सच है।

खाली गई गांववालों की हर कोशिश
ऐसा भी नहीं है कि इस गांव के लोगों ने इस पांच किलोमीटर को फासले को पूरा करने की कोशिश ना की हो। लेकिन हर बार उनकी कोशिश नेताओं के झूठे वादों और सरकारी दफ्तरों की फ़ाइलों में गुम होती रही। एक बार तो इस इलाके के दिवंगत कांग्रेसी विधायक ने यहां तक कह दिया कि चूंकि उनके गांव के लोगों ने उन्हें वोट नहीं देकर निराश कर दिया, इसलिए अब वे गांववालों को सड़क नहीं बना कर निराश करेंगे।
ये तो रही विधायक की बात, दूसरे नेता भी गांववालों को गोली देने में पीछे नहीं रहे। जब आज तक ने इस सिलसिले में कांग्रेस से बात की, तो उन्होंने सारा कसूर बीजेपी के सिर मढ़ दिया। एमपीसीसी के सदस्य राजकुमार खुराना ने कहा दस सालों से बीजेपी का शासन है। उन्हें ध्यान देना चाहिए। जबकि बीजेपी के पास इस गांव की बदकिस्मती को लेकर अलग ही दलील है।
वहीं, प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर ने कहा कि ये काम ग्राम पंचायत स्तर पर ही होना चाहिए था। वैसे कसूर सिर्फ़ सियासतदानों का ही नहीं है, नौकऱशाहों को भी जैसे कंडीपार की किस्मत बदलने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतज़ार है।
इस संबंध में सिवनी के जिलाधिकारी भरत यादव कहते हैं, ‘‘पीएमएसवाई के तहत अगले साल बन जाएगी सड़क।‘‘
. . . बातें हैं, बातों का क्या?

यहां जिला कलेक्टर अगले साल का दिलासा तो ज़रूर दे रहे हैं, लेकिन पिछले 66 सालों से गांववालों का तर्जुबा तो यही कहता है कि ये दिलासे, ये वादे और ये दावे दिल बहलाने के हथकंडे के सिवा कुछ भी नहीं। अब तो बस कंडीपार को दुआओं की दरकार है, जिससे किसी हादसे से पहले पांच किलोमीटर की पक्की सड़क की सूरत में लोगों को ज़िंदगी की गारंटी मिल जाए।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

आज से हो जाएगा कांग्रेस भवन का काम आरंभ: हीरा

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। जिला कांग्रेस कमेटी के बहुप्रतिक्षित भवन के निर्माण का काम शनिवार13 जुलाई से आरंभ हो जाएगा। उक्ताशय की बात जिला कांग्रेस कमेटी सिवनी के अध्यक्ष हीरा आसवानी ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कही। उन्होंने कहा कि डीसीसी बिल्डिंग के ट्रस्ट के लिए जिला कांग्रेस द्वारा केंद्रीय मंत्री कमल नाथ को ही अधिकार सौंप दिए हैं कि वे अपने हिसाब से इसके ट्रस्ट का गठन करें।
जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष हीरा आसवानी ने कहा कि यद्यपि अभी निर्माण एजेंसी तय नहीं की गई है, फिर भी जल्द ही निर्माण एजेंसी तय कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि भवन के ट्रस्ट के गठन के लिए केंद्रीय मंत्री कमल नाथ को ही जिला कांग्रेस कमेटी ने सारे अधिकार सौंप दिए हैं। उन्होंने बताया कि 13 जून से जिला कांग्रेस कमेटी के भवन की बाउंड्री वाल उठाने का काम आरंभ कर दिया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि 13 जून को लंबे समय बाद सिवनी आए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ ने महावीर लान में कार्यकर्ताओं से खचाखच भरे मैदान में यह कहा था कि उनकी जानकारी में यह आया है कि सिवनी में जिला कांग्रेस के पास अपना भवन नहीं है। उन्होंने वायदा किया था कि जिला कांग्रेस कमेटी के भवन का काम एक माह में आरंभ हो जाएगा।
वैसे तो तीस दिन तो शुक्रवार को ही पूरे हो चुके हैं, पर जिला कांग्रेस कमेटी के भवन का काम तो छोड़ें इसके नक्शे और जरूरी अनुमतियां लेने का काम भी पूरा नहीं हो सका है। उधर, कमल नाथ के द्वारा यह कहा जाना कि उनके संज्ञान में यह बात आई है कि जिला कांग्रेस कमेटी के पास एक अदद भवन नहीं है, को लेकर कांग्रेस के अंदर चर्चाओं का कभी ना थमने वाला दौर आरंभ हो गया है।
एक वरिष्ठ कांग्रेस के नेता ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से कहा कि सिवनी के कद्दावर नेता रहे हरवंश सिंह ठाकुर द्वारा लगभग तीस साल तक मध्य प्रदेश में सक्रिय राजनीति की और सिवनी की सियासी धुरी उनके आसपास ही घूमती रही है। उन्होंने कहा कि हरवंश सिंह ने जिला कांग्रेस के भवन बनाने के प्रयास अवश्य किए किन्तु उनके प्रयासों में ईमानदारी कितनी थी कि तीस सालों में भी सिवनी की जिला कांग्रेस के पास एक अदद भवन का टोटा रहा है। उन्होंने कहा कि इशारों ही इशारों में कमल नाथ द्वारा हरवंश सिंह समर्थकों को आईना भी दिखाया है।
वहीं, कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अभी सब कुछ हवा हवाई ही चल रहा है। एक माह में ना तो प्रशासन, ना ही नगर पालिका और ना ही अन्य सरकारी कार्यालयों से इसके लिए अनुमतियां ही ली गई हैं। रही बात नक्शे की तो अभी यह भी नहीं तय हो पाया है कि कांग्रेस कार्यालय को आवंटित सरकारी भूखण्ड में से कितने पर निर्माण किया जाना है और कितना स्थान खाली रखा जाएगा? कहा तो यह भी जा रहा है कि जिला कांग्रेस कमेटी के प्रस्तावित भवन में कितने कक्ष होंगे यह बात भी अभी सतही तौर पर भी तय नहीं की जा सकी है।
जिला कांग्रेस कमेटी के भवन को लेकर कांग्रेस में अंदर ही अंदर जमकर तलवारें खिंचती दिख रही हैं। कांग्रेसियों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार विधानसभा सिवनी के एक दावेदार के नाम पर दो गुटों की असहमति है, संभवतः यही कारण है कि जिला कांग्रेस कमेटी के द्वारा लंबे समय तक ट्रस्ट के लिए नाम ही प्रस्तावित नहीं किए गए थे।