शनिवार, 7 सितंबर 2013

नये राज्य से खुलेंगे विकास के द्वार

नये राज्य से खुलेंगे विकास के द्वार

विदर्भ के निर्माण की मांग के समर्थन में आगे आये महाकौशल का प्रस्तावित संभाग

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। आंध्रप्रदेश में पृथक तेलंगाना की मांग पूरी होने के साथ ही देश भर में नये प्रदेशों के निर्माण की मांग सम्बंधी जो आंधी चली है शायद वह इस अभागे और पिछड़े क्षेत्र के विकास में सहायक साबित हो सकती है। ज्ञातव्य है कि नये राज्यों की मांग के सिलसिले में महाराष्ट्र की उत्तरी सीमा में फैले लगभग एक दर्जन जिलों को मिलाकर नये विदर्भ प्रांत के गठन की मांग भी शामिल है।
यह सर्वविदित है कि प्रस्तावत विदर्भ राज्य की सीमा मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग के उन तीनों जिलों सिवनी, छिंदवाड़ा और बालाघाट को छूती हैं जिन्हें मिलाकर नये संभाग के गठन की घोषणा प्रदेश के मुखिया द्वारा पांच साल पहले की गयी थी किंतु इन पांच सालों में वह घोषणा पांच कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई।
नये प्रदेश के गठन और उसमें तीनों जिलों के शामिल होने की बात न तो कोरी कल्पना है, न असंभव और न ही मजाक। आधी सदी पहले तक सिवनी छिंदवाड़ा और बालाघाट जिले सी पी एण्ड बरार नामक उस ही प्रदेश के अंग थे जिसकी राजधानी नागपुर थी। राज्यों के पुनर्गठन के समय 1957 में उस प्रदेश के दो भाग कर सी पी अर्थात मध्यप्रांत को नवगठित मध्यप्रदेश में और बरार अर्थात विदर्भ को नये महाराष्ट्र राज्य में शामिल कर दिया गया।
मध्यप्रांत के साथ ही मध्यप्रदेश के वर्तमान तीन और तत्कालीन दो जिले बालाघाट एवं छिंदवाड़ा भी नये मध्यप्रदेश का हिस्सा बन गय थे। स्मरणीय है कि उस समय तक सिवनी जिले का अस्तित्व नहीं था बल्कि यह छिंदवाड़ा जिले की एक तहसील मात्र थी। नवगठित प्रदेश की राजधानी भोपाल है जिसकी दूरी बालाघाट से 500 कि.मी. सिवनी से 400 कि.मी. और और छिंदवाड़ा से 325 कि.मी. है।
इसके विपरीत पुराने प्रदेश की राजधानी और प्रस्तावित विदर्भ प्रदेश की राजधानी नागपुर की उपरोक्त तीनों ही जिलों से दूरी सवा सौ कि.मी. से अधिक नहीं है। यह भी सभी लोग भलीभांति जानते हैं कि इन तीनों ही जिलों के लोगों का व्यावसायिक, शैक्षणिक, सामाजिक और विशेषकर चिकित्सकीय सम्बंध अभी भी सबसे अधिक नागपुर से ही है। बालाघाट जिले का अधिकांश भूभाग, सिवनी जिले का दक्षिणी सीमांत क्षेत्र और छिंदवाड़ा जिले का एक तिहाई भाग महाराष्ट्र खासकर विदर्भ की संस्कृति से अत्याधिक प्रभावित है जहां की बोलचाल में भी उस संस्कृति का प्रभाव साफ नजर आता है।

ऐसी स्थिति में यदि केंद्र सरकार नये प्रदेशों के गठन पर नये सिरे से विचार करना प्रारंभ करती है तो प्रस्तावित संभाग के तीनों जिलों के राजनेताओं को इस पिछड़े क्षेत्र के उत्थान के लिये विदर्भ प्रदेश में सम्मिलित होने के लिये सयंुक्त रूप से प्रयास करना चाहिये। यह सर्वविदित है कि राजधानी के निकट होने का लाभ राजनेताओं और आम नागरिकों को मिलता है। हमेशा राजधानी के निकट वाले क्षेत्रों के विकास को पंख लग जाते हैं जबकि दूरस्थ क्षेत्र विकास में हमेशा पिछड़े रहते है। जैसा कि अभी प्रस्तावित संभाग के तीनों जिलों के विकास के साथ हो रहा है।

मिड डे मील में जलेबी पोहा!

मिड डे मील में जलेबी पोहा!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। नेताजी सुभाष स्कूल में शायद मिड डे मील के स्तर में जबर्दस्त सुधार आ चुका है। लंबे समय से कोतवाली के सामने स्थित इस शाला में मिड डे मील में जलेबी पोहा परोसा जा रहा है। जी हां, यह सच है जलेबी पोहा बच्चों के लिए नहीं, वरन शिक्षकों के नाश्ते के लिए परोसा जा रहा है।
नेताजी सुभाष स्कूल के एक शिक्षक ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि नेताजी सुभाष स्कूल में बच्चों को दिया जाने वाला मध्यान्ह भोजन पूरी तरह गुणवत्ता विहीन ही है। इसे प्रदाय करने वाले ठेकेदार ने एक बेहतरीन तरीका इजाद किया है शिक्षकों को साधने का।
उक्त शिक्षक की बात पर यदि यकीन किया जाए तो 15 अगस्त को शाला में परोसे गये मध्यान्ह भोजन में सब्जी बुरी तरह सडांध मार रही थी। उक्त ठेकेदार द्वारा शिक्षकों को रोजाना गरमा गरम जलेबी और पोहा का नाश्ता करवाया जाता है। जिसके एवज में शाला में उपस्थिति से ज्यादा तादाद में ठेकेदार के पास उपस्थिति दर्शाई जाती है।

बच्चों ने भी मध्यान्ह भोजन की शिकायत करते हुए कहा कि भोजन की गुणवत्ता बहुत ही खराब है। बावजूद इसके न तो जिला पंचायत की ओर से ही कोई शाला में जाकर मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता का निरीक्षण कर रहा है और न ही महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से ही संज्ञान लिया जा रहा है।

सफाई देने के चक्कर में कटवा दी हरी भरी मोटी डगाल

सफाई देने के चक्कर में कटवा दी हरी भरी मोटी डगाल

वाहन का कांच कैसे टूटा कोई पूछे इसके लिए गढ़ ली मनगढंत कहानी!

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। बारापत्थर क्षेत्र में रहने वाले भाजपा के एक जनसेवक ने रात के अंधेरे में कुत्तों के शोर से निपटने अपनी ही महिंद्रा कंपनी की चार पहिया वाहन का पिछला कांच जाने अनजाने में तोड़ने के उपरांत अब उन्होनंे एक नया कारनामा कर डाला है। किराए के आवास में निवासरत भाजपा के उक्त जनसेवक ने आवास की परिधि में लगे गुलमोहर के झाड़ की एक मोटी शाखा को कटवा दिया।
ज्ञातव्य है कि गत दिवस बारापत्थर क्षेत्र में निवासरत भारतीय जनता पार्टी के एक जनसेवक की तंद्रा रात को उस वक्त टूटी जब कुत्तों के झुण्ड ने आपस में कर्कश रूदन आरंभ किया। उक्त जनसेवक ने आव देखा न ताव और अपने अनुचर के साथ बाहर निकलकर इन कुत्तों पर अपने आंगन में पड़े पत्थर ताबड़तोड़ बरसाना आरंभ कर दिया।
भाजपा के उक्त जनसेवक संभवतः गहरी निंद्रा में रहे होंगे, और विधानसभा के पूर्व वे टिकिट को पक्की करने का सपना ही देख रहे होंगे, उनकी निंद्रा टूटने पर उनके गुस्से का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होनें कुत्तों पर ताबड़तोड़ पत्थर बरसाने आरंभ कर दिए थे। इसी में से एक पत्थर उन्होंने महिंद्रा कंपनी के अपने ही चौपहिया वाहन पर दे मारा और चूंकि उस पत्थर में उक्त भाजपा के जनसेवक के गुस्से का समावेश था, इसलिए उसकी तीव्रता बेहद तेज रही।
इस पत्थर से उनके महिंद्रा कंपनी के चौपहिया वाहन का पीछे का कांच चकनाचूर हो गया। कुत्ते भाग गए, तमाशा खत्म हुआ, तब उक्त जनसेवक को भान हुआ कि उन्होंने अपने ही वाहन का शीशा तोड़ दिया है। अब उन्हें यह चिंता सताने लगी कि अगर सुबह किसी ने देख लिया तो क्या जवाब दिया जाएगा? इसी उधेड़बुन में जैसे तैसे रात कटी, और सुबह सवेरे आठ बजे ही उन्होंने अपने वाहन का शीशा बदलने उसे रवाना कर दिया।
दैनिक हिन्द गजट ने सोमवार 02 सितम्बर को कुत्तों से परेशान जनसेवक ने नींद में तोड़ा अपने ही वाहन का कांचशीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इस समाचार में यद्यपि किसी का नाम नहीं था फिर भी चोर की दाढ़ी मेें तिनका कहावत को चरितार्थ करते हुए उक्त जनसेवक ने कई स्थान पर समाचार पत्र लेकर, जा जा कर न जाने कितने भाजपाईयों को इसलिए कोसा क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उनसे रश्क रखने वाले भाजपाईयों ने ही यह खबर लीक की है।
वहीं, कुछ भाजपाईयों ने मजे लेने की गरज से उक्त जनसेवक से बार बार उनके वाहन के बारे में पूछताछ की गई। बताया जाता है कि पूछताछ से उक्त जनसेवक काफी परेशान हो गए। इसी बीच अपने कुछ कांग्रेसी मित्रों से उन्होंने इस परेशानी की चर्चा की तो, कांग्रेस के कथित थिंक टैंक्स‘, ने उन्हें मशविरा दिया कि वे जहां निवासरत हैं वहां आसपास अगर कोई वृक्ष हो तो उसकी टहनी तोड़ कर नीचे डाल दो और कोई अगर पूछे तो कह देना कि यह टहनी गिरने से उनके वाहन का कांच टूटा है।
बताते हैं कि भाजपा के उक्त जनसेवक को यह बात जंच गई। उक्त जनसेवक जो किराए के मकान में निवासरत हैं ने अपने मकान मालिक और वन विभाग या नगर पालिका की इजाजत के बिना ही उस मकान में लगे गुलमोहर के बहुत पुराने वृक्ष की एक मोटी डगाल को निर्मम तरीके से कटवा डाला। वह डगाल धड़ाम से नीचे आ गई।
इसके बाद भाजपा के उक्त जनसेवक के चेहरे पर मुस्कान तैर गई, कि अब किसी ने पूछा तो कह दिया जाएगा कि यह डगाल टूटी और इसी से उनकी महिंद्रा कंपनी की गाड़ी का पीछे का कांच टूटा है। पर डगाल काटने की स्थिति तक पहुंचते पहुंचते लोग उस घटना को भूल गए और किसी ने भी भाजपा के उक्त जनसेवक से यह नहीं पूछा कि यह डगाल कैसे गिरी?

नए पुलिस अधीक्षक से अपेक्षाएं

नए पुलिस अधीक्षक से अपेक्षाएं

(शरद खरे)

सिवनी जिला शांति का टापू माना जाता रहा है। आज के समय में सिवनी शहर में आपराधिक गतिविधियां चरम पर हैं। जुंआ, सट्टा, वेश्यावृति, मारपीट, राहजनी, डकैती, फिरौती, हत्या, लूट आदि जैसी वारदातों का सिवनी में तेजी से इजाफा हुआ है। यह सब कुछ पिछले डेढ़ दो दशकों में तेजी से बढ़ा है।
इस बार तो हद ही हो गई 11 दिनों के अंतराल में ही दो निर्मम हत्याएं। जिला मुख्यालय दहल गया है। 26 जून को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के समीप सेना के एक जवान की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई, वह भी दिन दहाड़े। यह घटना जिले में आपराधिक तत्वों के पैर जमाने और पुलिस की ढ़ीली पकड़ को साबित करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।
बीते माह शुक्रवार और शनिवार की मध्य रात्रि में ललमटिया क्षेत्र में भारतीय जनता युवा मोर्चा के नगर मंत्री प्रशांत अग्रवाल उर्फ मुन्ना खैरी का शव जिस हालत में मिला वह वास्तव में दर्दनाक, भयावह, डरा देने वाला माना जा सकता है। इससे साबित हो जाता है कि शहर में पुलिस कितनी मुस्तैदी से गश्त कर रही है।
एक समय था जब सिवनी में घटे अपराध इतिहास बन जाते थे। प्रौढ़ हो रही पीढ़ी आज भी सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में हुए धूमा डकैती कांड़ जिसमे अमर सिंह और सज्जाद को फांसी की सजा हुई थी को याद करता है। इसके शहर में पुराने एलआईबी कार्यालय के पास, अमर टाकीज के समीप हुए कत्ल भी सालों साल लोगों की जुबान पर रहे।
सिवनी जिला ऐसा कतई नहीं था जैसा वर्तमान परिवेश में है। सिवनी में लोग हाथ में लट्ठ लेकर भी नहीं चलते दिखे, पर अब तो सरेराह जनसेवक होने का दावा करने वाले कमर में रिवाल्वर टांगकर घूम रहे हैं। यह कौन सी संस्कृति का आगाज हो रहा है, इनका साथ देने वाले भी सिवनी को बिहार बनाने पर आमदा प्रतीत हो रहे हैं।
सिवनी में बंदूक संस्कृति का आगाज शुभ लक्षण कतई नहीं माना जा सकता है। बीते सालों में सिवनी में गोलीबारी की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है, जो निंदनीय है। कालेज गोली काण्ड, के उपरांत नगर पालिका के सामने ही बरात की घोड़ी पर सवार दूल्हे को ही गोली मार दी जाती है, वह भी शहर कोतवाली से चंद कदम दूरी पर!
क्या कहा जाएगा इसे! निश्चित तौर पर इसके लिए दिशाहीन और स्वार्थपरक राजनीति ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। राजनेताओं संरक्षण में असमाजिक तत्व पूरी तरह फल फूल रहे हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मीडिया जैसे परोपकार और जनसेवा के क्षेत्र में भी आपराधिक तत्वों की आमद एक दुखद संकेत से कम नहीं है।
एक वक्त था, जब गांव में ‘‘जागते रहो‘‘ की आवाज लगाता चौकीदार लालटेन और हाथ में लकड़ी लिए आवाज करता घूमता था। उसकी आवाज में ही इतना दम होता था कि सब चैन से सोया करते थे। आज लोगों का अमन चैन गायब है। शहर की रखवाली के लिए कुछ नेपाली लोग रात भर जागा करते थे। अब उनके दीदार भी मुश्किल ही हैं।
पुलिस के वाहनों से चौकसी की जाती थी। अब तो पुलिस भी साधन संपन्न हो चुकी है। पुलिस के पास कल तक चीता कललाने वाले आज के ब्रेकर मोबाईल हैं। हर क्षेत्र में ये मुस्तैद हैं। बावजूद इसके शहर में अमन चैन कायम नहीं है। लोगों को सुरक्षा देने की जवाबदेही निश्चित तौर पर पुलिस की है।
पुलिस पर नजर रखने का काम कहीं ना कहीं सांसद और विधायकों का है। विडम्बना यह है कि जब सांसद विधायक ही अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने लगें तो आखिर जनता कहां जाएगी? सांसद विधायक ही जनता की सेवा के बजाए निहित स्वार्थों को प्राथमिकता देने लगे तो इस तरह की अराजकता का वातावरण निर्मित होना लाजिमी ही है।
महज ग्यारह दिनों में देश के लिए अपनी जान लगा देने वाले सेना के एक जवान को सरेराह ढलती शाम को चाकुओं से गोद दिया जाता है। उसके उपरांत प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अनुषांगिक संगठन के नगर मंत्री को गोलियों से भून दिया जाता है, पर विपक्ष में बैठी कांग्रेस अपना मुंह सिले बैठी है। अगर यही बात दिल्ली या भोपाल में हुई होती तो प्रवक्ताओं का कभी ना थमने वाला विज्ञप्तियों का सिलसिला कबका आरंभ हो चुका होता।
सिवनी में चोरियों की बाढ़ सी आई हुई है। जिले में गौवंश की तस्करी जमकर चल रही है। पुलिस व्यवस्थाएं मुस्तैद होने के दावे किए जाते रहे हैं। विडम्बना है कि पुलिस की व्यवस्थाएं लचर स्तर तक पहुंच चुकी हैं। खवासा में जाम से कराहती रहती है जनता। सभी जानते हैं कि खवासा की जांच चौकियों में जिस तरह से अवैध वसूली होती है वही जाम का प्रमुख कारक है।
कम ही समय में मिथलेश शुक्ला की बिदाई सिवनी से हो गई है। नवागत पुलिस अधीक्षक बी.पी.चंद्रवंशी ने कमान संभाल ली है। वे काफी अनुभवी पुलिस अधिकारी हैं। राजगढ़ और विदिशा दो जिलों की कमान वे संभाल चुके हैं। सिवनी में अनुभवी पुलिस अधिीक्षक की तैनाती सालों बाद हुई है। इसके पहले तो सिवनी को प्रशिक्षण का अड्डा बना दिया गया था। सिवनी को संवेदनशील की श्रेणी में भी रखा जाता रहा है और अधिकारियों को पहले जिले के बतौर यहां पदस्थ कर दिया जाता है।
नवागत पुलिस अधीक्षक बी.पी.चंद्रवंशी से जनापेक्षा है कि सिवनी में लचर पुलिस तंत्र को कसकर ठीक किया जाए यह उनकी पहली प्राथमिकता हो। साथ ही साथ जिले में चोरी पर अंकुश लगना बेहद आवश्यक है। रही बात कानून व्यवस्था की तो सिवनी में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा है उस पर अंकुश इसलिए भी लगाना आवश्यक है क्योंकि जल्द ही चुनाव होने वाले हैं, इन परिस्थितियों में जरायमपेशा लोगों का उपयोग सियासी दल करेंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यह पुलिस के लिए एक सरदर्द से कम साबित नहीं होने वाला है।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

पर्यावरण के नियमों को बलात ताक पर रख दिए हैं झाबुआ पावर ने

आदिवासियों को छलने में लगे गौतम थापर . . . 11

पर्यावरण के नियमों को बलात ताक पर रख दिए हैं झाबुआ पावर ने

वायदे के बाद अब तक एक भी पौधा नहीं लगाया कंपनी ने

(ब्यूरो कार्यालय)

घंसौर (साई)। मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाली अवंथा समूह की सहयोगी कंपनी झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा छटवीं अनुसूची में अधिसूचित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र घंसौर में डाले जा रहे 1260 मेगावाट के दो पावर प्लांट में पर्यावरण के नियमों को बलाए ताक रख दिया गया है। आश्चर्य इस बात पर है कि इसमें शासन प्रशासन सहित मध्य प्रदेश और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मण्डल भी गौतम थापर के कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। देश के हृदय प्रदेश में एक तरफ उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे में वन्य जीवों का आवागमन पेंच बना हुआ है तो दूसरी और दुर्लभ प्रजाति के काले हिरणों का घंसौर में डलने वाले इस संयंत्र के आसपास के क्षेत्र से पलायन भी मंत्री संत्रियों की जबरिया नींद में खलल नहीं डाल पा रहा है।
ज्ञातव्य है कि अवंथा समूह के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी गौतम थापर हैं। अवंथा समूह पेपर निर्माण, फुड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग, बिल्डिंग मैटेरियल जैसे क्षेत्र में काम करने वाला समूह है जिसकी परिसंपत्तियां खरबों रूपए से ज्यादा बताई जाती हैं। देश के मशहूर दून स्कूल में पले गौतम थापर की गिनती देश के सफलतम उद्योगपतियों में की जाती है।
घंसौर को देश की छटवीं अनूसूची में अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है। बावजूद इसके मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने इस क्षेत्र को झुलसाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था और सुरक्षा के उपाय किए बिना ही कोल आधारित तीन तीन पावर प्लांट को अनुमति दे दी है। इनमें से एक पावर प्लांट के तार तो टूजी घोटाले के मुख्य आरोपी आदिमत्थू राजा से सीधे सीधे जुड़े बताए जा रहे हैं। संभवतः यही कारण है कि राजा के जेल में रहने के कारण इस पावर प्लांट का काम अभी थाम दिया गया है।
प्रदूषण नियंत्रण मण्डल के आला अफसरान् के सामने ही कंपनी प्रबंधन ने इस बात को स्वीकारा कि वर्ष 2009 से अब तक उनके द्वारा वृक्षारोपण नहीं किया गया है। इतना ही नहीं कंपनी प्रबंधन ने इस बात को भी स्वीकारा कि अगर तब पौधे लगा दिए गए होते तो निश्चित तौर पर उनमें से साठ से सत्तर फीसदी पौधे आज जिंदा होते और उनकी उंचाई तीन चार फिट से ज्यादा हो गई होती। कंपनी ने हरित पट्टी बनाने कटिबद्धता तो दर्शाई पर इच्छुक कतई दिखाई नहीं दी। हरित पट्टी कब बनेगी इस बारे में कंपनी का मौन आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।
कंपनी ने आरंभ में अपने कार्यकारी सारांश में वायदा किया था कि पानी के स्त्रोत के लिए वह रानी अवंती बाई सागर परियोजना जबलपुर के बरगी बांध डूब क्षेत्र के गड़ाघाट और पायली गांव जो संयंत्र से दस किलोमीटर दूर दर्शाया गया है पर ही निर्भर करेगी। जब ग्रामीणों ने स्थानीय स्तर पर ही पानी के दोहन की बात कही तो कंपनी प्रबंधन चुप्पी साध गया। पर्यावरण के प्रभावों के बारे में कंपनी ने कोई चर्चा ही नहीं की।
गौतम थापर के स्वामित्व वाली कंपनी के सहयोगी प्रतिष्ठान द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर में लगाए जाने वाले इस संयंत्र में स्थानीय लोगों को रोजगार न दिया जाना आश्चर्यजनक ही है, जबकि जमीन अधिग्रहण के वक्त कंपनी ने लोक लुभावने वायदे किए थे। ग्रामीणों का आरोप है कि अब प्रबंधन के संयंत्र स्थित कारिंदे यह कहकर ग्रामीणों को भगा देते हैं कि वह वायदा उस वक्त के संयंत्र प्रमुख चितले ने किया था जो अब नहीं हैं। वर्तमान साईट प्रमुख मिश्रा को इससे कोई लेना देना ही नहीं है।

ग्रामीणों ने जब गौतम थापर के स्वामित्व वाली कंपनी के सहयोगी प्रतिष्ठान् द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर में लगाए जाने वाले पावर प्लांट के जिला मुख्यालय सिवनी के बजाए संभागीय मुख्यालय जबलपुर में कार्यालय होने की बात कही गई तो कंपनी प्रबंधन मौन ही रहा।

अंडर वर्ल्ड के गुर्गे आ सकते हैं सिवनी!

अंडर वर्ल्ड के गुर्गे आ सकते हैं सिवनी!

मोनिका बेदी की सुरक्षा के लिए फिकरमंद है अबू सलेम!

(दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनंी (साई)। सिवनी जिले में अंडरवर्ल्ड के गुर्गों की आमद हो सकती है, इन संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल, 15 सितम्बर को अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम की माशुका रहीं फिल्म अदाकारा मोनिका बेदी लखन कुंवर की नगरी में ठुमके लगाने आने वाली हैं। मोनिका बेदी की सुरक्षा की दृष्टि से सलेम के गुर्गे सिवनी में आमद दे सकते हैं।
प्रदेश की राजधानी भोपाल से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया ब्यूरो से नंद किशोर ने खुफिया तंत्र के सूत्रों के हवाले से बताया कि खुफिया विभाग को इस बात की जानकारी मिली है कि अंडर वर्ल्ड डॉन अबू सलेम की माशुका रही मोनिका बेदी को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में लखन कुंवर की नगरी में ठुमके लगवाने के लिए बुलवाया जा रहा है।
सूत्रों ने साई न्यूज को आगे बताया कि इसके पहले पिछले साल भी लखन कुंवर की नगरी में नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनावों के दौरान मोनिका बेदी को लखनादौन बुलवाने की बात सामने आई थी। सूत्रों की मानें तो उस वक्त भी खतरे की आशंका के चलते मोनिका बेदी को सिवनी न जाने का मशविरा दिया गया था।
सूत्रों की बातों में कितना दम है यह तो वे ही जाने पर पिछले साल नगर पंचायत लखनादौन के अध्यक्ष के चुनावों में भद्र महिला और कुशल ग्रहणी की छवि वाली निर्दलीय प्रत्याशी और लखनादौन नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय की मां श्रीमती सुधा राय के चुनावों में घोषणा के बाद भी मोनिका बेदी ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस बार एक साल का कार्यकाल पूरा करने पर भद्र महिला, सुघड़ और कुशल ग्रहणी की भूमिका वाली श्रीमती सुधा राय के द्वारा अंडर वर्ल्ड डॉन अबू सलेम की माशुका को लखन कुंवर की नगरी आमंत्रित करने से लोगों को जबर्दस्त हैरानी हो रही है। लोगों का कहना है कि समझदार और स्वच्छ छवि वाली श्रीमती सुधा राय से किसी को भी इस तरह की उम्मीद कतई नहीं थी कि वे अंडरवर्ल्ड के लोगों से रिश्ता रखने वालों को लखनादौन बुलवाएंगी।
लखनादौन नगर परिषद् के एक पार्षद ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि दरअसल, सुधा राय तो वाकई बहुत ही अच्छी और भोली-भाली हैं, पर उनकी खड़ांऊ कुर्सी पर रखकर उनके पुत्र दिनेश राय उर्फ मुनमुन द्वारा नगर पंचायत लखनादौन में अपनी मनमानी और गुण्डागर्दी चलाई जा रही है। बिना एग्रीमेंट के अगर दिनेश राय के ससुराल, हटा शहर के एक ठेकेदार द्वारा सड़क खोदी गई और कृषि उपज मण्डी की जमीन पर सब्जी मण्डी बनाई गई, नेशनल हाईवे पर बलात कॉम्पलेक्स बनवाया जा रहा है तो यह सब दिनेश राय की हठ धर्मिता ही है।
उधर, यह भी कहा जा रहा है कि अंडर वर्ल्ड डॉन अबू सलेम आज भी अपनी माशुका मोनिका बेदी पर जान छिड़कता है। मोनिका बेदी अगर सिवनी या लखनादौन आती हैं तो उनके साथ साए की तरह अंडरवर्ल्ड के ‘भाई लोग‘ भी सिवनी आ सकते हैं। अगर आलम यही रहा तो लखनादौन नगर परिषद् के इस तरह के जनता की अदालत में जाने के कार्यक्रम के चलते सिवनी में भाई लोगों की आदम रफत तेज हो सकती है जो सिवनी की शांत फिजां के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं होगा।

बी.पी.चंद्रवंशी ने एसपी का पदभार संभाला

बी.पी.चंद्रवंशी ने एसपी का पदभार संभाला

(पीयूष भार्गव)


सिवनी (साई)। नवागत पुलिस अधीक्षक बी.पी.चंद्रवंशी ने आज अपना पदभार ग्रहण कर लिया है। पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आज उन्होंने अपने मातहतों से सौजन्य भेंट की। इस अवसर पर निर्वतमान पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला भी उपस्थित थे। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया ने निर्वतमान पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला के उज्जवल भविष्य की कामना की। श्री शुक्ला ने कहा कि नवागत पुलिस अधीक्षक श्री चंद्रवंशी एक अनुभवी पुलिस अधीक्षक हैं, सिवनी को उनके अनुभवों का लाभ अवश्य ही मिलेगा।

टापू में तब्दील होता सिवनी

टापू में तब्दील होता सिवनी

(शरद खरे)

भगवान शिव के नाम से जाना जाता है सिवनी को। सिवनी एक समय में काफी हद तक समृद्धशाली समझा जाता रहा है। सिवनी की सबसे बड़ी खासियत यहां की रेल लाईन और शेरशाह सूरी के जमाने का उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला मार्ग था। आजादी के उपरांत देश ने तेजी से तरक्की की। छोटी और मीटर गेज लाईन को ब्राडगेज में तब्दील किया जाने लगा। सिवनी का नंबर कब आएगा, यह सोचते सोचते ही आजादी के वक्त जवान रही पीढ़ी भगवान को प्यारी होती गई। सिवनी में ब्राडगेज की कमी पूरी करता रहा नेशनल हाईवे नंबर सात।
एनएच 07 सिवनी की जीवन रेखा से कम नही है। यह मार्ग उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ता है। ब्राडगेज के अभाव में इस मार्ग का उपयोग माल ढुलाई के लिए सबसे ज्यादा किया जाता है। अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब इस मार्ग के दिन फिरे। अनेक षणयंत्रों के झटके झेलने के बाद भी यह मार्ग केंद्र सरकार के स्वर्णिम चर्तुभुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे का हिस्सा बना रहा।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जबसे पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा को उनके अपनों ने ही षणयंत्र के साथ सक्रिय राजनीति से हाशिए पर बिठा दिया है, तबसे सिवनी की अस्मत के साथ लगातार खिलवाड़ किया जाता रहा है। सालों साल प्रदेश और सिवनी में कांग्रेस की तूती बोलती आई है। विमला वर्मा के सियासी राजनीति से हटकर घर बैठते ही उनके अपने और उनकी आस्तीन में छिपे सपोलों ने फन काढ़ा और सिवनी के भविष्य के साथ खिलवाड़ आरंभ कर दिया।
उस दौरान कांग्रेस के दो या तीन शीर्ष नेताओं ने आपसे में जुगलबंदी कर ऐसा सियासी त्रिफला बनाया कि सिवनी के लोग इन नेताओं के समर्थन और विरोध के स्वांग में ही उलझकर रह गए। इसके बाद सिवनी की अस्मत को कथित तौर पर गिरवी रखने का षणयंत्र रचा गया। सिवनी को प्रदेश के बड़े क्षत्रपों के हाथों गिरवी रखकर इन लोगों ने खूब दावतें उड़ाईं, फाग गाए, जश्न मनाए। वस्तुतः सिवनी आज पूरी तरह अनाथ है तो उसके पीछे ये नेता कहीं न कहीं जवाबदेह जरूर हैं।
सिवनी में लोकसभा हुआ करती थी। ‘‘थी‘‘ शब्द का प्रयोग आज मजबूरी में इन्हीं नेताओं के कारण करना पड़ रहा है। जब सिवनी के विलोपन का प्रस्ताव ही नहीं था तो भला सिवनी लोकसभा विलोपित कैसे हो गई। कहां थे कांग्रेस के कथित दिमागऔर दिमागदारलोग। क्या सिवनी से लोकसभा का विलोपन कांग्रेस के क्षत्रप हरवंश सिंहके कारण हुआ! अगर हुआ तो आप सिवनी के नागरिक पहले हैं कांग्रेस के सदस्य बाद में! क्या कारण था कि इस मामले को पार्टी फोरम में नहीं उठाया गया, और अगर उठाया गया तो क्या कारण था कि इसके विरोध में कांग्रेस से त्यागपत्र की झड़ी नहीं लगी! मतलब साफ है कि इस षणयंत्र के जगमगाते लट्टू में कहीं न कहीं इन नेताओं की बैटरी से भी करंट जा रहा था।
सिवनी में फोरलेन का षणयंत्र रचा गया। इसके लिए वर्ष 2009 में घोषित तौर पर तत्कालीन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को दोषी करार दिया गया। सिवनी में कमल नाथ को इन्हीं नेताओं ने पुरानी फिल्मों के विलेन प्रेम चौपड़ा, और शत्रुघ्न सिन्हाबना दिया गया। कमल नाथ की प्रतीकात्मक शवयात्राएं निकाली गईं। जनमंच सिवनी एवं जनमंच लखनादौन ने मामले की नजाकत और गरम तवा देखकर इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी। सिवनी जिला इस मामले को लेकर सड़क में अडंगे के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ को ही जवाबदार मान रहा था। इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में जनमंच सिवनी की ओर से याचिका कर्ता वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और अधिवक्ता आशुतोष वर्मा की ओर से अपील प्रस्तुत की गई। वहीं लखनादौन जनमंच के सरपरस्त बने दिनेश राय ने भी अपनी अपील दाखिल की। सिवनी जनमंच ने लोगों से चंदा किया, लखनादौन जनमंच शायद धन्ना सेठ था इसलिए उसने किसी से चंदा नहीं लिया और कुरई जनमंच शायद साधनों या चंदे के अभाव में कहीं नहीं जा सका।

आज सिवनी से बालाघाट, सिवनी से नागपुर, सिवनी से जबलपुर, सिवनी से कटंगी, सिवनी से मण्डला, सिवनी से छिंदवाड़ा रोड़ जब चाहे तब बंद हो जाता है। सांसद, विधायक, भाजपा, कांग्रेस, अन्य राजनैतिक दलों के साथ ही साथ सड़क की लड़ाई लड़ने वाले जनमंच के त्रिफला भी मौन हैं। शायद सिवनी जनमंच का चंदा खत्म हो गया, लखनादौन जनमंच का ध्यान चुनाव की ओर हो, और कुरई का जनमंच . . .। कुल मिलाकर पिस तो सिवनी की जनता ही रही है। समझ में नहीं आता कि नेता आखिर यह कैसे सोच लेते हैं कि उनकी साल दो या चार साल पहले की हरकतें जनता कैसे भूल सकती है? कल तक सिवनी की जनता को सड़क के मामले में भरमाने, कमल नाथ को विलेन बनाने वाले नेता आज मौन क्यों हैं? सिवनी में सड़क की लड़ाई लड़ने के बजाए नेता नागपुर, जबलपुर, दिल्ली, छिंदवाड़ा जाकर सड़क के बारे में चर्चा कर फोटो अखबारों में छपवाकर क्या यह जतलाना चाहते हैं कि वे सिवनी की सरजमीं छोड़कर अन्य जिलों में सिवनी की सड़कों के लिए फिकरमंदर हैं? सभी नेताजी जानते हैं कि सड़क के जर्जर होने से सिवनी टापू बन गया है, जनता कराह रही है, चुप है इसका मतलब यह नहीं कि वह बेवकूफ है, वह सब कुछ सह रही है और नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के इंतजार में है जब वह इन नेताओं को देगी अपना माकूल जवाब।

बुधवार, 4 सितंबर 2013

भद्र महिला के आंगन में ठुमके लगाएगी डॉन की माशुका!

भद्र महिला के आंगन में ठुमके लगाएगी डॉन की माशुका!

(दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनी (साई)। लखनादौन में एक नया इतिहास बनने जा रहा है। एक नई परंपरा का आगाज़ होने जा रहा है। लखनादौन की प्रथम महिला श्रीमती सुधा राय की छवि एक भद्र महिला और सुघड़ ग्रहणी की है। बतौर नगर परिषद् अध्यक्ष एक साल का कार्यकाल पूरा होने पर इन्होंने जश्न मनाने का ऐलान किया है। इस जश्न में अंडर वर्ल्ड डॉन अबू सलेम की माशुका मोनिका बेदी लखनादौन आकर ठुमके लगाने वाली हैं, जिसकी बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं सामने नहीं आ रही हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर परिषद् लखनादौन अपने सफलतम एक वर्ष पूर्ण होने के बाद, परिषद् की अध्यक्ष श्रीमती सुधा राय जनता की अदालत में आगामी 15 सितम्बर को उपस्थित हो रही हैं। इस दौरान परिषद् द्वारा बीते एक वर्ष के अंतराल में कराये गये विभिन्न निर्माण कार्याें एवं विकास कार्याें के साथ, साल भर का हिसाब किताब जनता के सामने प्रस्तुत किया जायेगा।
कहा जा रहा है कि अपने पुत्र दिनेश राय की परंपराओं पर चलते हुए सुधा राय भी जनमत नहीं तो पद नहीं की विचारधारा के साथ श्रीमति सुधा राय अपने बीते एक वर्ष के कार्यकाल के दौरान नगर में हुये विकास कार्याे से यदि जनता संतुष्ट नहीं होती तो अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार तत्काल अपने पद से त्यागपत्र दे देंगी।
चर्चा है कि पिता या माता की परंपराओं को पुत्र या पुत्री आगे बढ़ाते हैं पर यहां तो उलट बंसी ही बज रही है। पुत्र की परंपराओं को माता जी द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। एक समाचार पत्र में छपी खबर के अनुसार इस संदर्भ में पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष दिनेश राय ने बताया कि जनता की अदालत लगाने की परम्परा मेरे कार्यकाल से प्रारंभ की गई थी उसे आगे बढ़ाते हुये मेरी माताश्री भी अध्यक्ष रहते हुये इस परम्परा का निर्वाह करेंगी और जनता की बीच उपस्थित होकर पाई पाई का हिसाब देंगी, इस दौरान अगर जनता उनके कार्याे से संतुष्ट होती है तो वह उन्हें पुनः आगे कार्यकाल को पूरा करने का मौका देगी और अगर जनता संतुष्ट नहीं है तो वे वहीं अपना इस्तीफा दे देंगी।

बताया जाता है कि बीते वर्षाे की भांति इस वर्ष भी रात्रि 7 बजे से जनता की अदालत कार्यक्रम के साथ मुम्बई से आये फिल्मी कलाकारों का रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन किया जावेगा। इस कार्यक्रम में मुम्बई से प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेत्री रवीना टण्डन, मोनिका बेदी, फिल्म अभिनेता गुलशन ग्रोवर, भीष्म पितामह एवं शक्तिमान मुकेश खन्ना, कॉमेडी कलाकार किशोर भानुशाली, टी.व्ही.सीरियल बालिका बधु की किरदार आनंदी अभिका गौर, लॉफ्टर चेलेन्जर एवं सिवनी की शान कहे जाने वाले एहसान कुरैशी, जिले की प्रसिद्ध गायिका ऋतु पाठक, देवीगीत गायिका शहनाज़ अख्तर, के अलावा 10 प्रसिद्ध कलाकार अपने अपने ढंग से दर्शकों का मनोरंजन करेंगे।

हर जिले में भाजपा एक सीट छोड़ सकती है रामदेव बाबा के लिए

हर जिले में भाजपा एक सीट छोड़ सकती है रामदेव बाबा के लिए

(प्रदीप आर्य)

भोपाल (साई)। बाबा रामदेव और भारतीय जनता पार्टी के बीच जमकर खिचड़ी पक रही है। बाबा रामदेव ने भाजपा पर दबाव बनाया है कि स्वाभिमान पार्टी के लिए मध्य प्रदेश के हर जिले में एक सीट को छोड़ा जाए।

समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के दिल्ली ब्यूरो से आकाश कुमार ने बताया कि बाबा रामदेव और भाजपा के शीर्ष नेताओं के बीच इस बात को लेकर सैद्धांतिक सहमति लगभग बन चुकी है कि प्रदेश में कुछ सीटों को बाबा रामदेव की स्वाभिमान पार्टी के लिए छोड़ा जाए। अब यह तय किया जाना बाकी है कि किन किन जिलों में कौन कौन सी सीटें इसके लिए छोड़ी जाएं।

करंट मारती बिजली

करंट मारती बिजली

(शरद खरे)

लोगों को बिजली, पानी, सुरक्षा, भोजन की व्यवस्था करना सरकार की महती जवाबदेही है। इसके लिए सरकार को हर स्तर पर हर संभव प्रयास करना आवश्यक होता है। सरकारों का दीन ईमान अब नहीं बचा है। यही कारण है कि सरकारें अब लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ ध्यान देना मुनासिब नहीं समझती हैं। सरकारों को अपनी रियाया की कोई चिंता नहीं रह गई है।
बड़े बूढ़े बताते हैं कि जब देश पर ब्रितानी हुकूमत थी, उस वक्त लोगों द्वारा पानी और प्रकाश की मांग की जाती थी तो क्रूर शासक लोगों पर कोड़े बरसाते हुए यह कहते कि पानी और प्रकाश देना उनका काम नहीं है। पानी के लिए घरों में कुएं खोदो और प्रकाश की व्यवस्था स्वयं ही करो।
आज आजादी के साढ़े छः दशकों के बाद भी देश प्रदेश की हालत उस समय से बदतर ही नजर आ रही है। आज के समय में लोग पानी, बिजली, साफ सफाई आदि बुनियादी व्यवस्थाओं को तरस ही रहे हैं। इसमें सिवनी जिला कोई अपवाद की श्रेणी में नहीं आता है सिवनी जिले में भी पानी और प्रकाश का अभाव साफ दिखाई पड़ जाता है।
सूबे के निजाम 22 जून को सिवनी में अटल ज्योति अभियान का श्रीगणेश करके चले गए हैं। सरकार और भाजपा दावा कर रही है कि चौबीसों घंटे बिजली प्रदेश में मिलना आरंभ हो गई है। जमीनी हकीकत कुछ और ही कह रही है। सुबह सवेरे से दोपहर बारह बजे तक बिजली की आंख मिचौली जारी रहती है। कभी कभार शाम को भी बिजली आंख मारने लगती है सिवनी जिला मुख्यालय में।
केवलारी और बरघाट विधानसभा की हालत लाईट के मामले में बहुत ही दयनीय है। अटल ज्योति अभियान के आरंभ होने के बाद भी लाईट का बुरा हाल है दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में। दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों के तीन दर्जन से ज्यादा गांव के वाशिंदे आजादी के बाद से लाईट के इंतजार में हैं।
इन गांवों में लाईट का न होना आश्चर्यजनक इसलिए भी है क्योंकि इन दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कांग्रेस और भाजपा के कद्दावर नेताओं ने विधानसभा और लोकसभा में किया है। आजादी के बाद साढ़े छः दशकों में भी कांग्रेस भाजपा के नुमाईंदों द्वारा लाईट के लिए इन गांव वालों की सुध न लिया जाना अपने आप में अनोखा ही मामला है।
विद्युत मण्डल के अधिकारी इन गांवों को वनबाधित ग्राम मानते हैं। वनबाधित क्या चीज होती है। जहां लोग रह रहे हैं, अगर वह वनबाधित क्षेत्र है तो उन्हें वहां से विस्थापित किया जाना चाहिए था, वस्तुतः जो हुआ नहीं। अगर विस्थापित नहीं किया गया तो उन्हें बिजली मुहैया करवानी चाहिए थी।
सरकारी चाल किस मंथर गति से चल रही है इसका साफ उदाहरण हैं ये गांव। इन गांवों में आजादी के उपरांत साढ़े छः दशकों में सरकारी नस्तियां परवान नहीं चढ़ पाई हैं, जो दुःखद है। एमपीईबी का कहना है कि वन विभाग इस क्षेत्र में केबल के माध्यम से लाईन डालने की बात कह रहा है पर विस्तृत प्राक्कलन में इसका जिकर नहीं है।
सरकारी स्तर पर बनाए गए विस्तृत प्राक्कलन या डीपीआर में क्या है, क्या नहीं है, इस बात से बेचारे ग्रामीणों को क्या लेना देना? ग्रामीण तो बस लाईट ही चाह रहे हैं। साढ़े छः दशकों में भी इन गांवों में रोशनी की किरण न पहुंच पाना, आश्चर्यजनक ही है। जब ग्रामीण स्तर पर यह हाल है तो भला कैसे मान लें कि कांग्रेस भारत निर्माण कर रही है और भाजपा का शाईनिंग इंडिया परवान चढ़ रहा होगा।
सरकारी स्तर पर दावे क्या हैं और इनकी जमीनी हकीकत क्या है इस बात के बारे में जनपद पंचायत घंसौर की अध्यक्ष चित्रलेखा नेताम की बात से स्थिति साफ हो जाती है। उनका कहना है कि एक लाईनमेन के भरोसे 45 गांव की व्यवस्था है। अगर यह सच है तो वाकई जमीनी हालात भयावह ही माने जाएंगे।
एक लाईनमेन भला 45 गांव की व्यवस्था कैसे संभाल सकता है। घंसौर में कुल 77 ग्राम पंचायत में 250 गांव हैं जिनमें लाईनमेन की तैनाती 15 है, इस लिहाज से चित्रलेखा नेताम का कहना सही ही साबित हो रहा है। हालात दयनीय और भयावह हैं, फिर भी मोटी चमड़ी वाले राजनेता और नौकरशाहों के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही है।
घंसौर की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि छोटा सा भी फाल्ट आने पर उसे सुधारने में हफ्तों लगना आम बात होगी। घंसौर जहां कि तीन तीन पावर प्लांट प्रस्तावित हैं, जिनकी ठेकेदारी वहीं के नेता नुमा दबंगकर रहे हैं, पर उन्हें भी गांव वालों की सुध लेने की फुर्सत नहीं है।

 बारिश के मौसम में कीट पतंगों का भय सदा ही बना रहता है। अंधेरे में लोग इनसे दो चार भी हो रहे हैं। गांवों में बिजली की समस्या बहुत ज्यादा होती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। युवा एवं उत्साही जिला कलेक्टर भरत यादव से अपेक्षा की जाती है कि जिस तरह वे एक एक कर सारे विभागों की मश्कें कस रहे हैं, उसी क्रम में वे मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल को भी अपनी प्राथमिकता पर रखें और जमीनी हालातों पर गौर फरमाकर कुछ ऐसे उपाय करें ताकि गांव के लोग भी बिजली का लाभ ले सकें।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

जहरीली हो जाएगी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा

आदिवासियों को छलने में लगे गौतम थापर . . .10

जहरीली हो जाएगी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा

झाबुआ पावर की राख घोलेगी बरगी बांध में जहर, हो जाएगा पानी जहरीला

(ब्यूरो कार्यालय)

घंसौर (साई)। देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान् झाबुआ पॉवर का सिवनी जिले की आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर में प्रस्तावित कोल आधारित पॉवर प्लांट से बड़ी तादाद में उड़ने वाली राख न केवल आसपास के जंगलों को प्रभावित करेगी वरन् यह विशाल जल संग्रह क्षमता वाले रानी अवंती सागर परियोजना के बरगी बांध के पानी में जहर घोलने का काम करेगी। गुपचुप जन सुनवाई कर प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की अनापत्ति प्रमाण पत्र पाने का सिलसिला अभी थमा नहीं है।
उल्लेखनीय है कि नर्मदा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों से होकर बहती हैं लेकिन नदी का 87 प्रतिशत जल प्रवाह मध्यप्रदेश में होने से, इस नदी को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है। आधुनिक विकास प्रक्रिया में मनुष्य ने अपने थोड़े से लाभ के लिए जल, वायु और पृथ्वी के साथ अनुचित छेड़-छाड़ कर इन प्राकृतिक संसाधनों को जो क्षति पहुंचाई है, इसके दुष्प्रभाव मनुष्य ही नहीं बल्कि जड़ चेतन जीव वनस्पतियों को भी भोगना पड़ रहा है। नर्मदा तट पर बसे गांव, छोटे-बड़े शहरों, छोटे-बड़े औद्योगिक उपक्रमों और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से की जाने वाली खेती के कारण उद्गम से सागर विलय तक नर्मदा प्रदूषित हो गई है और नर्मदा तट पर तथा नदी की अपवाह क्षेत्र में वनों की कमी के कारण आज नर्मदा में जल स्तर भी 20 वर्ष पहले की तुलना में घट गया है।
ऐसे में नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है, लेकिन मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारें औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नर्मदा की पवित्रता बहाल करने में ज्यादा रुचि नहीं ले रही हैं। नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक भी शहर के विस्तार और पर्यटकों के आवागमन के कारण नर्मदा जल प्रदूषण का शिकार हो गया है। इसके बाद, शहडोल, बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, खण्डवा, खरगोन आदि जिलों से गुजरती हुई नर्मदा महाराष्ट्र और गुजरात की ओर बहती है, लेकिन इन सभी जिलों में नर्मदा को प्रदूषित करने वाले मानव निर्मित सभी कारण मौजूद हैं।
अमलाई पेपर मिल शहडोल, अनेक शहरों के मानव मल और दूषित जल का अपवाह, नर्मदा को प्रदूषित करता है। सरकार ने औद्योगीकरण के लिए बिना सोचे समझे जो निति बनाई उससे भी नर्मदा जल में प्रदूषण बड़ा है, होशंगाबाद में भारत सरकार के सुरक्षा क़ागज कारखाने बड़वानी में शराब कारखाने से उन पवित्र स्थानों पर नर्मदा जल गंभीर रूप से प्रदूषित हुआ है। गर्मी में अपने उद्गम से लेकर, मण्डला, जबलपुर, बरमान घाट, होशंगाबाद, महेश्वर, ओंकारेश्वर, बड़वानी आदि स्थानों पर प्रदूषण विशेषज्ञों ने नर्मदा जल में घातक बेक्टेरिया और विषैले जीवाणु पाए जाने की ओर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।