रविवार, 9 अगस्त 2009

10 AUGEST 2009

आलेख 10 अगस्त 2009

आखिर क्यों करें हम सच का सामना

(लिमटी खरे)

मीडिया के एक स्वरूप निजी समाचार चेनल्स द्वारा अपनी टेलीवीजन रेटिंग प्वाईंट (टीआरपी) बढ़ाने के चक्कर में न जाने क्या क्या गुल खिलाए जाते हैं। दिन में एक वक्त सभी समाचार चेनल्स अपराध आधारित खबरें दिखातें हैं, तो कभी राशिफल से दर्शकों को लुभाने का प्रयास करते नजर आते हैं। कुछ समाचार चेनल्स तो घंटों तक फूहड़ हंसी मजाक की महफिल को दिखाते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि ये समाचार चेनल्स खबरों को दिखाने का काम कर रहे हैं, या फिर टीआरपी बढ़ाने और ज्यादा विज्ञापन बटोरने के चक्कर में समाज के सामने कुछ और परोस रहे हैं।
पहले कहा जाता था कि अखबार समाज का दर्पण होता है। दरअसल उस समय मीडिया का मतलब अखबार ही होता था। उस जमाने में समाचार पत्र से इतर और अन्य साधन नहीं हुआ करते थे। आज समाज में प्रिंट के अलावा इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो वेब मीडिया की खासी दखल हो चुकी है।
``सच का सामना`` सीरियल का विषय ही कुछ इस तरह का है कि लोगों की दिलचस्पी इसकी ओर बढ़ना स्वाभाविक ही है। सेक्स एक एसा विषय है, जिसके बारे में समाज का हर तबका जानने हेतु जिज्ञासू रहता है। आदि अनादि काल से यह कौतुहल का विषय रहा है। पुरातन काल में सेक्स को शास्त्र का दर्जा दिया गया था, कामदेव इस विधा के देवता माने गए थे।
महषिZ वात्सायन ने कामशास्त्र की रचना कर डाली। चंदेलों के राज में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो के मंदिर में उन्मुक्त काम क्रीड़ा मेें रत प्रतिमाएं आज देश और विदेशी सैलानियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रजनीश नामक चिंतक ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया था।
हमारा उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुंचाना कतई नहीं है, किन्तु आचार्य रजनीश ने भारत में सेक्स तो पश्चिम में शांति को उकेरा और पूरब और पश्चिम दोनो ही जगहों पर रजनीश को हाथों हाथ लिया गया। कम समय में ही आचार्य रजनीश ने समूचे विश्व में अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया था।
देखा जाए तो सच का सामना सीरियल मूलत: लोगों की निजी जिंदगी में तांकझांक ज्यादा करता है। आज भारत में अधकचरी पश्चिमी सभ्यता ने अपने लिए उपजाउ माहौल अवश्य तैयार कर लिया है, जो बहुत घातक है। भारत में टेलीवीजन पर दिखाए जाने वाले सीरियल ने समाज को गंदे बदबूदार सड़ांध मारते नाले में उतरने को मजबूर कर दिया है, जिसकी केवल निंदा करने से काम नहीं चलने वाला। इसके लिए देश के नीति निर्धारकों को ठोस और सार्थक कदम उठाने की आवश्यक्ता है।
आज आवश्यक्ता इस बात की है कि इन सीरियल के माध्यम से इसके निर्माता निर्देशक समाज को क्या संदेश देना चाहते हैंर्षोर्षो इस पर बहस होनी चाहिए। प्रेरणास्पद सीरियल के बजाए चिटलरी से भरपूर समाज और परिवार को तोड़ने, परस्त्री या पुरूष गमन, या बच्चों के लिए मनोरंजन के बजाए उनके मन मस्तिष्क में जहर घोलने वाले सीरियल पर तत्काल लगाम लगनी चाहिए।
हमें यह कहने में कोेई संकोच नहीं कि सच का सामना सीरियल व्यक्ति की नकारात्मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने वाला है। यह सीरियल स्वस्थ्य मनोरंजन के बजाए आदमी के अंदर की छिपी हुई कमीनगी को ग्लेमरस बनाकर परोसने का साधन मात्र है।
हमारे मतानुसार अगर आपको सच ही स्वीकारना है तो आप किसी पुजारी अथवा पादरी अथवा अपने परिजनों से बात कीजिए। अगर आपमें इतना साहस नहीं है तो डायरी लिखिए, क्योंकि आप समाज में हर व्यक्ति से झूठ बोल सकते हैं, किन्तु अपने आप से नहीं। अपने जिन्दगी के काले सफों को चंद सिक्कों की खनक के लिए जनता के सामने घटिया तरीके से परोसने का ओचित्य समझ से परे ही है।
आने वाले दिनों में इस सच का सामना सीरियल के कारण देश में परिवारोेंं का विघटन आरंभ हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि राजीव खण्डेलवाल के इस सीरियल में उनके सामने हाट सीट पर बैठने उनकी मां विजयलक्ष्मी ही तैयार नहीं है। राजीव को सोचना चाहिए कि इस तरह के घिनौने सीरियल के लिए जब उनकी मां ही तैयार नहीं हैं तो वे और देशवासियों की मां बहनों के सामने आखिर क्या परोस रहे हैंर्षोर्षो
हमारी निजी राय में तो इस तरह के घटिया और समाज को दिशाहीन बनाने वाले सीरियल तत्काल बंद कर देना चाहिए साथ ही सरकार को चाहिए कि सामज को दिग्भ्रमित करने वाले सीरियल पर भी रोक लगाए एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय को एक समिति बनाकर सीरियल दिखाने के पहले उसका उद्देश्य और समाज को मिलने वाली दिशा के बारे में तसल्ली होने के बाद ही इन्हें दिखाए जाने की अनुमति प्रदान करे, अन्यथा आने वाले समय में समाज का भयावह स्वस्प होगा और चेनल्स के साथ ही साथ सरकार भी इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार होगी।

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क्या सोनिया कांग्रेस में करेंगी महिला आरक्षण लागू!
0 महिलाओं की भागीदारी 33 फीसदी हो सकेगी कांग्रेस मेंर्षोर्षो
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। सवा सौ साल पुराने कांग्रेस संगठन में बदलाव की अटकलों के बीच अब यह चर्चा भी सियासी गलियारों में तेजी से घुमड़ने लगी है कि भले ही महिला आरक्षण बिल संसद में परवान न चढ़ सका हो पर क्या कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा कांग्रेस संगठन में इसे लागू करने की हिम्मत जुटा सकेंगीर्षोर्षो
कांग्रेस में सत्ता और शक्ति के केंद्र 10 जनपथ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि महिला होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी की इच्छा है कि पार्टी स्तर पर महिला आरक्षण को सबसे पहले लागू करवाया जाए। इसके लिए वे अनेक स्तरों पर पार्टी फोरम में चर्चा कर नेताओं के मानस को टटोल रहीं हैं।
सूत्रों ने आगे बताया कि उच्च स्तरीय कोर कमेटी ने इस मुद्दे पर रायशुमारी कर ली है। पार्टी में विर्कंग कमेटी में भी इस बात को लेकर चर्चा हो चुकी है कि भले ही संसद की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते महिला आरक्षण बिल की सांसे फूल गईं हों पर पार्टी स्तर पर इसे लागू करवाने से कोई रोक नहीं सकता है।
उधर कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड़ में चल रही चर्चाओं के अनुसार अगर पार्टी में 33 फीसदी स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए जाते हैं तो अनेक स्वयंभू महाबलियों का कद कम हो जाएगा, जिसके लिए वे इस फिराक में जोड़ तोड़ कर रहे हैं कि इसे लागू न किया जाए और अगर लागू होता भी है, तो किस स्वरूप में लागू किया जाए।
सूत्रों ने आगे बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष को यह मशविरा भी दिया गया है कि पार्टी में संविधान संशोधन कर लाटरी सिस्टम के जरिए महिलाओं को पद दिए जाएं इससे अंगद की तरह पैर जमाए नेताओं को एक तरफ आईना दिखाया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर इस लागू करने के साथ ही पार्टी नेतृत्व विवादों से भी परे रह सकेगा।
बताया जाता है कि कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया है कि कांग्रेस अपने संविधान में आवश्यक संशोधन कर पार्टी में 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दे। कांग्रेस द्वारा अगर संविधान संशोधन कर लिया जाता है तो फिर अन्य सियासी दलों को भी मजबूरी में अपने अपने संविधान में संशोधन कर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण करना होगा।

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भाजपा को उसके हाल पर छोड़ा संघ ने
0 चिंतन बैठक से किनारा करने की तैयारी में है संघ
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। भविष्य की रणनीति और लोकसभा में हुई शर्मनाक पराजय के मामले में होने वाली चिंतन बैइक से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने आप को दूर ही रखने का फैसला लिया है। संघ के कोई भी प्रतिनिधि के शिमला में 19 से 21 अगस्त तक आहूत बैठक में शामिल होने की संभावनाएं नहीं हैं।
संघ के विश्वस्त सूत्रो का कहना है कि संघ का शीर्ष नेतृत्व भाजपा को फिलहाल इस बैठक के मामले में उसके हाल पर ही छोड़ने का मानस बना रहा है। संघ अपने किसी भी प्रतिनिधि को इस बैठक में भेजने को राजी नहीं दिख रहा है। स्पून फीडिंग से उलट संघ अब इस मामले में इस रणनीति को अपना रहा है कि भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनौतियों से खुद ही जूझे।
उधर भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने कहा कि पार्टी ने संघ से इस बैठक में शिरकत करने का आग्रह किया है। पहले संघ की ओर से सुरेश सोनी के नाम की चर्चा हो रही थी, कि वे इस बैठक में संघ का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, किन्तु बाद में उनका नाम भी वापस ले लिया गया है। भाजपा की ओर से इस बैठक के लिए तय की गई सूची में संघ के किसी सदस्य का नाम न होना भी आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।

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