रविवार, 5 जून 2011

जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह


जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह

(लिमटी खरे)

ब्रितानी हुकूमत के काल में 13 अप्रेल 1919 में जनरल डायर ने अमृतसर के जलियां वाले बाग में निर्दोष लोगों को गोलियांे से भून दिया था, यह था गोरी चमड़ी वालों की बर्बरता का नंगा नाच। महात्मा गांधी के आर्दशों पर चलकर देश को आजादी मिली और फिर कायम हुआ भारत गणराज्य जिसमें लोकतंत्र को सर्वोपरि माना गया। 4 और 5 जून की दर्मयानी रात दिल्ली में जो हुआ वह एक बार फिर ब्रितानी हुकूमत की सामंतवादी सोच का परिचायक कहा जाएगा। जिस तरह गोरों ने साम, दाम, दण्ड भेद की नीति पर चलकर देश पर राज किया, कमोबेश उसी तरह कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा हाल ही में किया जा रहा है। अन्ना हजारे के बाद बाबा रामदेव के अनशन से हिली कांग्रेस को अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। बाबा रामदेव की मुहिम को जनता का समर्थन हासिल है, इस आंदोलन के दमन से सरकार की नीयत पर अनेक प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। लोग इसकी तुलना जनरल डायर की अमानवीयता और आपातकाल (इमरजेंसी) से करने से नहीं चूक रहे हैं।

देश की सरकार एक और अन्ना हैं हजारों‘, यह जुमला आज हर किसी की जुबां पर चढ़ चुका है। चाहे अन्ना हजारे ने बाबा के काले धन के मुद्दे को हाईजेक कर लिया हो, किन्तु 4 जून को स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जो भी किया उसे देखकर लगने लगा है मानो देश का आम आदमी भ्रष्टाचार घपले घोटालों से आजिज आ चुका है। इसके पहले अन्ना हजारे लोकपाल मामले में अपने तेवर दिखा चुके हैं। भले ही कांग्रेस इस मामले में बैकफुट पर हो, किन्तु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ने कांग्रेस के थिंक टेंक्स को गंभीर मंत्रणा पर विवश कर ही दिया है।

भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही साफ कर दिया गया था कि भारत देश न तो कोई कम्युनिष्ट देश है, न ही दुनिया का चैधरी अमेरिका और न ही अरब देश की सामन्ती व्यवस्था का प्रतीक, जहां देश का सर्वोच्च नागरिक स्वविवेकसे कोई भी कानून में तब्दीली का हक रखता हो। भारत गणराज्य में सबसे ताकतवर संवैधानिक पद प्रधानमंत्रीका माना गया है, किन्तु उसे भी निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत को सम्मन भेजकर हाजिर करने का हक है। इसी बिनहा पर यह कहा जा सकता है कि देश में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसे किसी भी कीमत पर छेड़ा नहीं जा सकता है।

बाबा रामदेव आखिर चाह क्या रहे हैं, यही न कि विदेशों में जमा देश का काला धन वापस स्वदेश लाया जाए। इसके लिए बाबा रामदेव लंबे समय से प्रयासरत हैं। यह अलहदा बात है कि उनकी इस मुहिम में बीच बीच में सडांध मारती राजनीति की बू भी आने लगती है, जब वे सियासत पर उतर आते हैं। लोगों को स्मरण दिलाना चाह रहा हूं कि जब लौह पुरूष का तमगा पाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हुआ तब उनकी कुल संपत्ति 259 रूपए थी। एसे थे नीतियों पर चलने वाले राजनेता। आज के राजनेताओं के पास अकूत दौलत है। क्या आम आदमी से ज्यादा धन को राष्ट्रीय संपत्ति नहीं माना जाए!

बाबा रामदेव को मनाने के लिए कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हालिया सबसे विश्वस्त दूत कपिल सिब्बल गए। सिब्बल और बाबा के बीच वार्ता चली, जो असफल ही रही। सिब्बल ने गोरे ब्रितानियों की चाल चलकर बाबा के राईट हेण्ड और कथित तौर पर नेपाली मूल के आचार्य बाल कृष्ण से अनशन समाप्ति का पत्र लिखवा लिया। यह बात समझ से परे है कि आखिर उन्होंने अनशन समाप्ति का पत्र अनशन प्रारंभ होने के पूर्व लिखकर क्यों दिया? कहीं एसा तो नहीं कि यह सब कुछ मिली जुली प्रायोजित कुश्ती हो? अमूमन इस तरह के पत्र अग्रिम में तो सरकार में शामिल करने के पूर्व मंत्रियों से लिखवाए जाते हैं ताकि समय बे समय काम आ सकें।

कांग्रेस का आरोप है कि बाबा के अनशन स्थल को फाईव स्टार सुविधाओं से लैस किया गया है। इसमें पैसा कौन लगा रहा है यह शोध का विषय है। सियासी दल के नुमाईंदे इस तरह के आरोप लगाने के पहले यह बात भूल जाते हैं कि जब कांग्रेस या भाजपा के अधिवेशन होते हैं तब फाईव तो क्या सेवन स्टार की सुविधाएं मुहैया होती हैं नेताओं को, तब वे इस तरह का प्रश्न दागने का नैतिक साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि बाबा के पीछे संघ है या भाजपा, सवाल तो यह है कि बाबा का मुद्दा सही है अथवा नहीं!

एक तरह से देखा जाए तो सरकार और कांग्रेस के ट्रबल शूटर बनकर एक कपिल सिब्बल पूरी तरह से असफल ही हुए हैं। बाबा रामदेव को कल शाम अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का प्रयास किया है, बाद में 4 और 5 जून की दर्मयानी रात में उन्हें बलात उठाही लिया गया, जो निंदनीय है। यह तो अच्छा हुआ कुटिल राजनेताओं ने बाबा के अनशन स्थल पर असमाजिक तत्वों का उपयोग कर रंग में भंग नहीं डाला, वरना मामला कुछ और रंग ले चुका होता।

बाबा रामदेव के इस तरह के अनशन से उनके पक्ष में बयार बह निकली है। दिल्ली इस बात की गवाह है कि सरकार के दमन चक्र के बावजूद भी बाबा रामदेव देश ने की जनता के मजबूत कांधों पर बैठकर भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद किया। बाबा रामदेव की हुंकार के आगे अन्ना हजारे का कद अब बौना नजर आने लगा है।

पहले सियासत तब गर्माई थी जब पिछले साल बाबा रामदेव ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी। पिछले माह बाबा रामदेव ने अपने कमोबेश हर साक्षात्कार में यही कहा कि सरकार के साथ बातचीत सकारात्मक चल रही है, पर इस बात से वे कन्नी ही काटते रहे कि क्या बातचीत चल रही है? एसा कौन सा हिडन एजेंडा था जिसे बताने में बाबा रामदेव आखिरी तक हिचकते रहे। बार बार सरकार के साथ बातचीत फिर अनशन और पत्र का खुलासा, फिर बाबा की धरपकड़! आम आदमी इस बात को समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर एकाएक बाबा रामदेव के साथ सकारात्मकबातचीत इस तरह की विपरीत परिस्थितियों में कैसे पहुंच गई?

जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का यह कथन भी विचारणीय ही है कि बाबा रामदेव अनशन से पहले अपने 11 हजार करोड़ रूपए के साम्राज्य की सफाई अवश्य कर लें। कल तक जिनके पास साईकल के पंचर जुड़वाने के पैसे नहीं होते थे, वे बाबा रामदेव आज अकूत दौलत पर राज कर रहे हैं। बाबा रामदेव को शंकराचार्य के इस आरोप की सफाई देना ही होगा कि बाबा रामदेव अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यह अनशन कर रहे हैं। उधर सिने स्टार सलमान खान ने भी बाबा रामदेव को योग सिखाने पर अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। पर जो भी हो बाबा रामदेव के अनशन को कुचलकर कांग्रेस ने यह साबित कर ही दिया है कि देश में कानून और व्यवस्था नाम की चीज नहीं बची है। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सरकार ने सभी को एक ही लाठी से हांकने का कुत्सित प्रयास किया है।

बाबा रामदेव के काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को कांग्रेस ने बहुत ही हल्के रूप में लिया। कांग्रेस को लगा योग सिखाने वाला एक बाबा आखिर कैसे सियासी ताकत के सामने टिक पाएगा। उधर बाबा रामदेव कछुए और खरगोश की कहानी में कछुए के मानिंद चलते रहे, अंत में अब बाबा रामदेव देश में सरकार के खिलाफ अलख जगाने में कामयाब हो ही गए। बाबा रामदेव ने योग से जुड़े लोगों को एक सूत्र में पिरोया और फिर सरकार को कटघरे में खड़ा कर ही दिया।

कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह ने जहर बुझे तीरों के मार्फत बाबा रामदेव को आहत करना चाहा किन्तुू वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद गंदी राजनीति के तहत बाबा रामदेव को सियासी ताने बाने में उलझाने का प्रयास किया गया, किन्तु बाबा रामदेव की साफगोई के चलते सरकार की चालें अंततः सामने आ ही गईं।

5 जून की मध्य रात्रि में बाबा रामदेव को अनशन स्थल से जिस तरह से उठाया गया वह लोकतांत्रिक तरीका किसी भी दृष्टिकोण से नहीं कहा जा सकता है। बाबा रामदेव की गिरफ्तारी को उनकी किडनेपिंग की संज्ञा दी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। कांगे्रस का कहना है कि बाबा रामदेव द्वारा जनता को भड़काया जा रहा था, किन्तु कांग्रेस इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाई कि आखिर कौन सी पंक्तियां थीं, जिनके माध्यम से बाबा रामदेव द्वारा लोगों को भरमाया जा रहा था।

पूरे घटनाक्रम का तातपर्य यह ही हुआ कि अगर आप सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे तो आपका बलात शमन कर दिया जाएगा। ये परिस्थितियां इसलिए भी निर्मित हो रही हैं क्योंकि निहित स्वार्थ को प्राथमिक मानकर लंबे समय से सत्ता, विपक्ष, नौकरशाही और मीडिया का गठजोड़ हो गया है। यही कारण है कि आज शासकों द्वारा लोकतंत्र को अपने जूते के तले रोंदने में जरा भी हिचक नहीं की जाती है। समय रहते अगर हम नहीं चेते तो देश में हिटलरशाही राज कायम होने में समय नहीें लगने वाला। इस पूरे मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी एवं ईमानदार छवि के धनी वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह की चुप्पी भी आश्चर्यजनक ही कही जाएगी।

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