गुरुवार, 17 सितंबर 2009

थुरूर का गुरूर

थुरूर का गुरूर बना कांग्रेस के गले की फांस

(लिमटी खरे)

विदेश में रहकर अपने जीवन के दो दशक से भी अधिक समय बिताने वाले देश के विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर के बयानों ने कांग्रेस के प्याले में तूफान ला दिया है। थुरूर की अनावश्यक बयानबाजी से अब कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के साथ ``हुई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी`` की सी स्थिति निर्मित हो गई है। एक तरफ वे सादगी का आडंबर कर कार्यकर्ताओं को संदेश देने का प्रयास कर रही हैं, तो दूसरी ओर मंत्रिमण्डल में शमिल मंत्री ही उनके इस कदम का उपहास उड़ाने से नहीं चूक रहे हैं।
गौरतलब होगा कि मंहगे आलीशान होटलों को लगभग तीन माहों से अपना आशियाना बनाए रखने के चलते विदेश मंत्री एम.एम.कृष्णा और राज्य मंत्री शशि थुरूर चर्चाओं में आ गए थे। इसके बाद उन्होंने इस विवाद को विराम देने की गरज से संभवत: यह बयान दे दिया कि उन्होने सरकारी धन का अपव्यय नहीं किया है। वे अपने अपने निजी खर्चों पर होटलों में रूके हुए थे।
सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस जनों को सादगी का संदेश देने की गरज से कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने कमान संभाली और लगभग बारह सीटें आरक्षित करवाकर उन्हें खाली रखकर विमान की इकानामी क्लास में यात्रा कर उन्होंने एक मिसाल पेश की है।
उनके पुत्र और कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी भला सादगी दर्शन में पीछे कहां रहने वाले थे। उन्होंने भी शताब्दी एक्सप्रेस की पूरी एक बोगी ही रिजर्व करवाकर सोनिया गांधी से बड़ी सादगी भरी यात्रा कर एक और बेहतरीन संदेश दे डाला। वस्तुत: देखा जाए तो इन दोनों ही की यात्राओं में हुए कुल खर्च का योग किया जाए तो वह चार्टर्ड हवाई जहाज से की जाने वाली यात्रा से ज्यादा ही निकलेगा।
बहरहाल, मामला जैसे तैसे थमता नजर आया कि इंटरनेट की सोशल वेव साईट पर विदेश राज्य मंत्री ने एक टिप्पणी कर बासी कढी मेें एक बार फिर उबाल ला दिया है। थुरूर ने विमान में इकानामी क्लास को ``केटल क्लास`` की उपाधि से नवाज दिया है, जिसका अर्थ है मवेशियों के परिवहन के लिए उपयुक्त दर्जा।विडम्बना ही कही जाएगी कि देश के नीति निर्धारक अभी भी देश की सांस्कृतिक आबोहवा से परिचित नहीं हो सके हैं। विदेशी मूल की भारतीय बहू श्रीमति सोनिया गांधी ने वषो बाद देश की संस्कृति और रहन सहन को अंगीकार किया। भले ही वह उन्होंने अपने मैनेजरों के कहने पर दिखावे के लिए किया हो, पर किया तो सही।
इसी तरह उनके पुत्र और नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के सदस्य राहुल गांधी भी अपनी कोलंबियाई गर्लफ्रेंड के चक्कर को लेकर जब तब चर्चाओं में बने रहते हैं। देश की सवा करोड़ से अधिक आबादी में एक अदद लड़की राहुल गांधी को जीवन साथी बनाने के लिए पसंद न आना आश्चर्य का ही विषय है। इसमें राहुल गांधी का दोष नहीं कहा जा सकता है। दरअसल जिसका लालन पालन (ब्राटअप) जैसे माहौल में हुआ हो, उसकी सोच कमोबेश उसी तरह की ही हो जाती है।
बहरहाल थुरूर द्वारा सवा करोड़ से अधिक की आबादी में एक से भी कम फीसदी आबादी जो कि हवाई यात्रा करती है, के दर्जे की तुलना मवेशियों से की गई है। कांग्रेस को मजबूरी में इस मामले में आगे आकर थुरूर की बातों की आलोचना करनी पड़ी है। एक समय था जब मंत्रियों या पदाधिकारियों को कुछ भी बोलने के पहले पार्टी लाईन की हिदायत दी जाती थी।
वर्तमान में इंटरनेट के अनंत सागर में गोते लगाकर मदमस्त मंत्री पार्टी लाईन को भूलकर नए इतिहास लिखने में ज्यादा व्यस्त दिख रहे हैं। शशि थुरूर के आचरण से पार्टी की भी काफी हद तक फजीहत हो रही है। राजनयिक से राजनीति की वादियों में विचरण करने वाले थुरूर शायद भूल गए हैं कि बतौर मंत्री उनकी एक भी टीका टिप्पणी सीधे सीधे कांग्रेस और सरकार का प्रतिनिधित्व करती है। थुरूर का बयान यह माना जा सकता है कि सरकार ही इकानामी क्लास के लोगों को मवेशी समझ रहा है।
चूंकि इस बयान को कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने खारिज किया है, अत: यह माना जा सकता है कि थुरूर की टिप्पणी से कांग्रेस अपने आप को अलग रख रही है। शशि थुरूर केंद्र सरकार में विदेश विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे के मंत्री हैं, अत: सरकारी तौर पर भी इस मामले में कोई टिप्पणी आना चाहिए।
वैसे भी थुरूर को यह समझना होगा कि वे सेलीब्रिटी नहीं हैं जो कि अपने प्रशसंकों से ब्लॉग के माध्यम से बात करें। शशि थुरूर आजाद भारत में विदेश राज्यमंत्री हैं। उन्हें देश की विदेश नीति के बारे में चिंता करनी चाहिए, न कि अपने प्रशंसकों के सवाल जवाब में उलझकर समय गंवाने की। ब्लाग लिखना या सवाल जवाब थुरूर का नितांत निजी मामला है, इस पर टिप्पणी करना बेमानी है, किन्तु जब पानी नाक तक पहुंच जाए तब मंत्रियों को चेताना भी जरूरी है। अगर थुरूर को वाकई अपने प्रशंसकों की इतनी ही फिकर है, और वे प्रशसंको की तादाद में इजाफा करना चाहते हैं तो हर माह एक राज्य में जाकर खुले मंच से सवाल जवाब करें तो बेहतर होगा।
थुरूर की टिप्पणी पर हायतौबा इसलिए भी मची है, क्योंकि थुरूर की टिप्पणी उस वक्त हुई जब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी दिल्ली से मुंबई तक विमान में इकानामी क्लास में और युवराज राहुल गांधी दिल्ली से लुधियाना तक शताब्दी में सफर कर चुके थे। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि इकानामी क्लास को मवेशियों का बाड़ा कहकर क्या सोनिया गांधी के लिए कोई टिप्पणी की गई है।
विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी द्वारा भी प्रभावी विपक्ष की भूमिका अदा न किया जाना निराशाजनक ही कहा जा सकता है। इस मामले में सरकार को घेरने के बजाए अंतर्कलह में फंसा विपक्ष खामोशी अिख्तयार किए हुए है। वस्तुत: यह एक एसा मुद्दा बैठे बिठाए विपक्ष को मिल गया है, जिसे लेकर वह जनता के बीच जाकर खासा जनसमर्थन हासिल कर सकता है।
जो भी हो, विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर की इस टिप्पणी से कांग्रेस बेकफुट पर आ गई है। थुरूर की टिप्पणी के बाद कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ.मन मोहन सिंह को कड़े कदम उठाने होंगे, वरना मंत्रीमण्डल में मनमानी करने वाले मंत्रियों की खासी फौज है, जो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए सरदर्द खड़ा करने से नहीं चूकेगी।
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सौ दिनी एजेंडा टांय टांय फिस्स

0 सादगी दर्शन स्वांग के पीछे टांय टांय फिस्स हो गया एजेंडा
0 एक रणनीति का अहम हिस्सा है सोनिया, राहुल का ``जात्रा नाटक``
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने के बाद कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा सौ दिन का एजेंडा बड़े ही जोर शोर से लागू किया था। सौ दिन पूरे हो गए किन्तु इस एजेंडे का क्या हुआ इस पर सरकार ने मौन साध रखा है।
सरकार ने राज्य विधानमण्डलों और संसद में महिलाओं के लिए तेंतीस प्रतिशत की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल पेश करने की बात इसमें प्रमुखता से रखी थी। इसके आलवा और अनेक बिन्दुओं का समावेश किया गया था, इस एजेंडे में।
इस बार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा प्रणाली में अमूल चूल परिवर्तन का एजेंडा रखकर खासी वाहवाही बटोरी इतना ही नहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी एचआरडी मिनिस्टर कपिल सिब्बल की पीठ थपथपाई। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी अपना आकर्षक एजेंडा पेश किया।
इस बार मंत्री बनने से चूक गए एक वरिष्ठ इंका नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि सरकार ने सौ दिनी एजेंडा ऐसे लागू किया था मानो सौ मीटर की रेस में उसेन बोल्ट दौड़ रहे हों। सौ दिन पूरे होने के बाद भी सरकार द्वारा रिपोर्ट कार्ड पेश न किया जाना यह दर्शाता है कि सरकार खुद ही अपने मंत्रियों के सौ दिनी काम काज से संतुष्ट नहीं है।
कहा जा रहा है कि अगर सरकार सौ दिनी एजेंडी का रिपोर्ट कार्ड पेश कर दे तो सरकार की खासी भद्द पिट सकती है। जानकारों का कहना है कि अगर विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा और शशि थुरूर का होटल विवाद न उपजा होता तो सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।
सादगी के प्रहसन ने देशवासियों का ध्यान बरबस ही खींच लिया। सोनिया की इकानामी क्लास और राहुल की शताब्दी यात्रा दो दिनों तक मीडिया की सुखीZ बनी रही। इसके बाद जैसे ही मामला कुछ ठंडा हुआ विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर की टि्वटर पर की गई टिप्पणी कि इकनामी क्लास माने मवेशी दर्जा ने तूल पकड़ लिया।
राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन नए विवादों की वजह से सरकार के सौ दिनों के एजेंडे का रिपोर्ट कार्ड दब गया है। सरकार के लिए इस तरह के विवाद वास्तव में तारण हार ही साबित हुए हैं। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के भरोसेमंद सूत्रों का दावा है कि सादगी प्रहसन में सोनिया गांधी ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा इसलिए लिया ताकि देश की जनता और विपक्ष सरकार के सौ दिनी एजेंडे का हिसाब किताब न मांग सके, और इसमे ही उलझकर रह जाए।

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पेंच कान्हा होगा आबादी मुक्त!

0 बाघ अभ्यारण्यों की बसाहट दूर करने की कवायद
0 केंद्र से मांगी ढाई हजार करोड़ की इमदाद
0 25 हजार परिवारों को विस्थापित करने की तैयारी
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के बाघ अभ्यारण्यों से इंसानी बसाहट को हटाने के लिए सूबे की सरकार ने केंद्र सरकार से ढाई हजार करोड़ रूपयों की मांग की है। प्रदेश के पेंच, कान्हा, सतपुड़ा, बांधवगढ़ बाघ अभ्याराण्यों को इंसानी दखलंदाजी से मुक्त करने की कार्ययोजना प्रदेश सरकार ने केंद्र को सौंपी है।
राष्ट्रीय बांघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार ने बाघों पर मंडराते खतरे को देखकर केंद्र से मदद की गुहार लगाई है। सूत्रों ने कहा कि इस मामले को एनटीसीए ने योजना आयोग के पास भेज दिया है। सूत्रों ने कहा कि प्रतिवेदन में कहा गया है कि सूबे में बाघों पर मंडराते खतरों को देखते हुए इन अभ्यारण्यों में बसे गांव खाली कराकर आबादी को अन्यत्र बसाया जाना तत्काल जरूरी है।
सूत्रों ने कहा कि इस प्रतिवेदन में साफ कहा गया है कि इन वन्य अभ्यारण्यों में निवास करने वाले पच्चीस हजार बीस परिवारों को चिन्हत किया गया है, जिन्हें यहां से हटाकर अन्यत्र बसाने की योजना है। सरकार द्वारा स्वेच्छा से इन अभ्यारण्यों को छोड़कर अन्यत्र जाने वाले परिवारों को दस लाख रूपए प्रति परिवार की दर से मुआवजा देने का प्रावधान किया है।
इस प्रतिवेदन में आगे कहा गया है कि नकद स्वीकार न करने वाले परिवारों को जमीन देने का विकल्प भी खुला रखा गया है। माना जा रहा है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के मध्य प्रदेश काडर के दो वरिष्ठ अधिकारियों कान्हा नेशनल पार्क में संचालक रहे राजेश गोपाल एवं संचालय वन्य प्राणी तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक रहे गंगोपाध्याय के पदस्थ होने के बाद मध्य प्रदेश में वन्य प्राणियों की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारियों के अनुसार मध्य प्रदेश में बाघों की तादाद मानव के हस्ताक्षेप, अवैध शिकार एवं सड़क दुघटनाओं तथा बीमारियों के चलते जहां 2007 में तीन सौ के लगभग थी, वह अब दो सौ का आंकड़ा ही पार कर पा रही है।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

कण कण में बसा है भ्रष्टाचार

(लिमटी खरे)
अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, जबकि भ्रष्टाचार को एक गंभीर बुराई के तौर पर देखा जाता था। सत्तक के दशक के पूर्वार्ध में हर एक सरकारी कार्यालय में ``घूस लेना और देना पाप है, घूस देने वाला और लेने वाला दोनों ही पाप के भागी हैं।`` जुमले की तिख्तयां लगी होती थीं।
अस्सी के दशक के आगाज के साथ ही हिन्दुस्तान को भ्रष्टाचार नाम के एक जानलेवा केंसर ने अपने आगोश में ले लिया है। विडम्बना यह है कि इस बीमारी का इलाज करने वाले खुद इस बीमारी की चपेट में आकर अंतिम स्टेज के केंसर की स्थिति में हैं। इनकी स्थिति हिन्दी चलचित्र के उस दृश्य में समझी जा सकती है, जब मरीज को देखकर डाक्टर यह कह उठता अब दवा नहीं दुआ की जरूरत है।
हिन्दुस्तान में तीन दशकों में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब देश की नींव ही खोखली होती प्रतीत हो रही है। देश के प्रधान न्यायधीश के.जी.बालकृष्णन ने एक संगोष्टी में भ्रष्टाचार पर न्यायपालिका की पीड़ा का इजहार कर ही दिया। यह सच है कि प्रजातंत्र के चारों स्तंभ इसकी जद में हैं।
सबसे अधिक आश्चर्य तो मीडिया की स्थिति पर होता है। सच को नंगा करने के ठोस इरादे के साथ प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ आखिर कहां जा रहा है, क्या कर रहा हैर्षोर्षो सच ही है, जबकि घराना पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ है, तब से मीडिया का स्वरूप बदला बदला सा दिखाई पड़ने लगा है।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज मीडिया में संपादक पूरी तरह प्रबंधक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर वे सर्वस्व न्योछावर करने को आतुर प्रतीत हो रहे हैं। यह सच है कि देश की जनता आज भी मीडिया पर आंख बंद करके भरोसा करती है, पर इसके मायने यह तो नहीं कि किसी को बचाने के लिए हम इस स्तर तक गिर जाएं।
हमारी नैतिकता भी कोई चीज है। पर आज नैतिकता की बातें करना बेमानी ही होगा। एक मर्तबा हमने हमारे एक पत्रकार मित्र को यह मशविरा दिया था कि कलम को बेचने या गिरवी रखने से तो बेहतर होगा कि परचून की दुकान ही खोल ली जाए। पत्रकारिता के उद्देश्य और सिद्धांत आज स्वार्थों की चादर के नीचे पड़े बुरी तरह कराह रहे हैं।
हम प्रधान न्यायधीश के इस कथन का पुरजोर समर्थन करते हैं कि भ्रष्टाचार में दोषी ठहराए गए सरकारी कर्मचारी की अवैध संपत्ति को जप्त करने के लिए कानून बनना चाहिए। सरकारी कर्मचारी ही क्यों अगर किसी भी ``जनसेवक`` भले ही वह सांसद, विधायक या और किसी व्यवस्था का अंग हो, और अगर उस पर भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध होता है तो उसकी संपत्ति जप्त होना चाहिए।
प्रधान न्यायधीश के वक्तव्य के बाद देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली ने भी संकेत दिया है कि जल्द ही संविधान की धारा 310 और 311 में आवश्यक संशोधन किया जाएगा। मोईली की इस पहल का चहुं ओर स्वागत किए जाने की आवश्यक्ता है। सरकारी नुमाईंदे आज इसी धारा की आड़ लेकर मौज कर रहे हैं।
दरअसल इस धारा के तहत किसी भी अधिकारी पर मुकदमा दायर करने के पहले संबंधित विभाग की अनुमति की आवश्यक्ता होती है। भ्रष्टाचार के सड़ांध मारते इस दलदल में अनुमति हेतु बनी फाईल न जाने किस कोने में धूल खाती फिरती है, यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं।
वैसे इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश आर.वी.रविंद्रन और बी.सुदर्शन रेड्डी की खण्डपीठ का एक आदेश नजीर बन सकता है, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि ``जनसेवक अगर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का अपराध करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पूर्वानुमति आवश्यक नहीं है। इस तरह के मामलात में कोर्ट बिना पूर्वानुमति के आरोप पत्र के आधार पर संज्ञान ले सकती है।``
भारतवर्ष में न्यायपालिका सर्वोच्च मानी गई है। पिछले दिनों सूचना के अधिकार की जद में न्यायपालिका को लाने की बात पर सर्वोच्च न्यायालय ने ही आपत्ति की थी। देश में भ्रष्टाचार छोटे मोटे रोग की तरह नहीं बल्कि लाईलाज केंसर की तरह पनप चुका है।हमारे विचार से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए पहला पत्थर राजनेताओ, अफसरान के बजाए न्यायपालिका को खुद ही मारना होगा। इसके लिए न्यायधीशों को विशेषाधिकार छोड़ने की पहल करना आवश्यक होगा। इसी से सबक लेकर बाकी व्यवस्था खुद ब खुद चुस्त दुरूस्त होने लगेगी।
आदि अनादि काल से कहा जाता रहा है कि ``कण कण में भगवान विराजते हैं`` आजाद भारत में यह उक्ति लागू होती है, किन्तु यहां ``कण कण में भ्रष्टाचार बसता है`` कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

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आड़वाणी से कन्नी काटते भाजपाई

0 फर्नाडिस को बताया सदगी की प्रतिमूर्ति

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी से अब भाजपा के वरिष्ठ नेता ही कन्नी काटते नजर आ रहे हैं। मंदी के दौर में सादगी अपनाने की कांग्रेस द्वारा चलाई गई मुहिम में हर दल इसे अपने अपने तरीके से प्रस्तुत कर रहा है। हाल ही में भाजपा ने जार्ज फर्नाडिस को सादगी की प्रतिमूर्ति बताकर पार्टी मंच पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
विलासिता के आदी हो चुके जनसेवकों के बीच सादगी व कम खर्चे में सार्वजनिक तौर पर जीवन यापन करने को लेकर चल रहे आडम्बर को राजनैतिक दल अपने अपने तौर तरीकों से प्रस्तुत कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े दूसरे दल भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडिस को सादगी पूर्वक जीवन यापन करने हेतु आदर्श बताया है।
कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा एकानामी क्लास एवं युवराज राहुल गांधी द्वारा रेल यात्रा के सवाल के जवाब में भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि जार्ज देश के एसे नेता हैं, जिन्होंने कभी भी रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा नहीं की है। उन्होंने कहा कि चूंकि राहुल और सोनिया पहली बार इस श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं, इसलिए वे चर्चाओं में आए हैं। रही बात जार्ज की तो वे तो सदा ही एसा किया है, इसलिए वे चर्चाओं में नहीं हैं।
आम चुनावों में भाजपा के कथित लौह पुरूष लाल कृष्ण आड़वाणी के ``व्यक्तित्व`` को चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा के प्रवक्ता रूडी से जब यह पूछा गया कि क्या भाजपा के वर्तमान आर्दश लाल कृष्ण आड़वाणी भी सामान्य श्रेणी में यात्रा करेंगेर्षोर्षो इस प्रश्न को रूडी पूरी तरह टाल गए।
भाजपा में चल रही चर्चाओं के अनुसार एल.के.आड़वाणी का सूर्य अब अस्ताचल की ओर गमन करता प्रतीत हो रहा है। यही कारण है कि भाजपा नेता अब आड़वाणी से न केवल किनारा करने लगे हैं, वरन उनसे जुड़े सवालों में भी सफाई देने से कतराने लगे हैं। संघ और आड़वाणी के बीच लगातार चलती तकरारों से भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेता अंदाजा लगाकर अब माईनस आड़वाणी, नई रणनीति बनाने की जुगत में दिखाई पड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब आड़वाणी के व्यक्तित्व को ही मुद्दा बनाया गया था तो अब भी सादगी के लिए आड़वाणी के नाम का ही जप किया जाना चाहिए था, वस्तुत: एसा हुआ नहीं उनके बजाए समाजवादी नेता फर्नाडिस को ही सादगी की प्रतिमूर्ति बताया गया है।

सोमवार, 14 सितंबर 2009

दूरदर्शन के 50 बरस

इस आलेख के लेखक समीर वर्मा, भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन में समाचार संपादक के पद पर कार्य करने के उपरांत वर्तमान में श्री वर्मा भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के फील्ड पब्लिसिटी प्रभाग में कार्यरत हैं। मूलत: पत्रकार रहे समीर वर्मा जबलपुर के रहने वाले हैं एवं इन्होंने अनेक समाचार पत्रों का संपादन भी किया है।

- लिमटी खरे



ऊँ साँई राम
दूरदर्शन के 50 बरस
बदलाव की बिंदास बयार
-समीर वर्मा,

भारतीय सूचना सेवा

इस लेख क® लिखने से पहले मैंने सूचना के सुपर हाइवे यानि सायबर स्पेस पर द® दिन तक विचरण किया। कारण था, यह जानना कि शरतीय की –श्य-श्रव्य आधारित एकमात्र ल®क प्रसारण सेवा ´´दूरदर्शन´´क® लेकर बुद्धिजीवियों,मीडिया विश्®षज्ञों और आम ल®गों की फिलहाल स®च क्या है र्षोर्षो इस दौरान इंटरनेट पर मीडिया से जुड़ी साईट® और ब्लाग्स क® छानने और बांचने के बाद बेहद सुकून हुआ कि चैनल क्रांति के ताजा दौर में “ी दूरदर्शन के प्रति ल®गों की स®च बेहद सकारात्मक है। ढेर सारी उम्मीदें हैं त® कई अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए ``दूरदर्शन´´ के प्रति आशर “ी जताया गया है। कहीं आल®चनाएं “ी है। ब्लागर्स ने त® दूरदर्शन से जुड़ी यादों क® लेकर बहस छेड़ रखी है कुछ ने त® हर दौर में दूरदर्शन से प्रसारित ह®ने वाले कर्णिप्रय और नेत्रिप्रय विज्ञापनों का वीडिय® संग्रहालय तक सायबर स्पेस में स्थापित कर दिया है। हर क®ई उस `टीवीरिया´ क® याद करत्® थक नहीं रहा है जब हर एक इसका शिकार था।तब और अब की यादों के बीच आज दूरदर्शन पचास बरस का ह® गया है। 15 सितंबर 1959 क® दिल्ली में दूरदर्शन का पहला प्रसारण प्रय®गात्मक आधार पर आध्® घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था। किसी “ी मीडिया के लिए पचाससाल का सफर बहुत मायने रखता है वक्त के साथ चलने में दूरदर्शन ने कई उतार-चढ़ाव तय किए हैं। एक ल®क प्रसारक सेवा के रुप में स्वायत्ता हासिल करने के बावजूद दूरदर्शन सूचना, शिक्षा और मन®रंजन के उÌेश्यों से “टका नहीं है। आज निजी चैनलों की मन®रंजन और बाजारवादी क्रांति के दौर में एकमात्र दूरदर्शन ही है। ज® समाजके स“ी वर्ग का ख्याल रखत्® हुए उनकी अपनी शषा संस्कृति क® मजबूती प्रदान करता आ रहा है। टी वी के माध्यम से शरतीय समाज में सामाजिक,सांस्कृतिक और वैचारिक क्रांति लाने में दूरदर्शन की उल्लेखनीय “ूमिका रही है। इन पचास बरसों में दूरदर्शन ने ज® विकास यात्रा तय की है व® काफी प्रेरणादायक है। जिस टेलीविजन क® प्रारंि“क दिनों में समाज का दुश्मन समझा जाता था, उसे बाद मे ल®गों ने `देवत्व´ प्रदान किया। किसी ने उसे `लीला´ समझा त® किसी के लिए व® ताकत है खबर है ज्ञान बढ़ाने वाला है, क®ई उसे एकांत का `साथी´ मानता है। टीवी के इस महत्व क® स्थापित करने में दूरदर्शन के `र®ल´ क® नकारा नहीं जा सकता। सन 1959 से लेकर 2009तक के पांच दशक में दूरदर्शन ने हर व® मुकाम हासिल किया है जिसका उसने लक्ष्य बना रखा था। हालांकि ´दूरदर्शन´की विकास यात्रा प्रारं“ में काफी धीमी रही लेकिन 1982 में रंगीन टेलीविजन आने के बाद ल®गों का रूझान इस और ज्यादा बढ़ा और एशियाइ ख्®लों के प्रसारण ने त® क्रांति ही ला दी। आज दूरदर्शन डायरेक्टर टू ह®म (डीटीएच) के अलावा 31 चैनलों का संचालन करता है। दूरदर्शन के देश“र में 1412 ट्रांसमीटर हैं और 66 स्टूडियों का क्ष्®त्रीय नेटवर्क है। कव्हरेज के हिसाब से दूरदर्शन देश की करीब 92 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या क® उपलब्ध है। एक सार्वजनिक प्रसारणकताZ के रुप में दूरदर्शन विÜव में सबसे बड़े क्ष्®त्र क® कवर करने वाला संस्थान है। दूरदर्शन के 31 चैनल जिनमें डीडी-1-राष्ट™ीय चैनल, डीडी न्यूज-समाचार चैनल, डीडी शरती- समृद्धि चैनल, डीडी स्प®टर्स-ख्®ल चैनल, डीडी राज्यसश- संसद चैनल, डीडी उर्दू -उर्दू शषा चैनल हैं। वहीं 11 प्रादेशिक शषाओं के चैनल है जिसमें -मलयालम, तमिल, उड़िया, त्®लुगू, बंगाली, कéड, मराठी, गुजराती, कश्मीरी, उत्तर पूर्व और पंजाबी शषा के कार्यक्रम प्रसारक चैनल शामिल हैं। इसके अलावा राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड, त्रिपुरा, मिज®रम और मेघालय समेत 12 राज्य नेटवर्क है। साथ ही एक अंतर्राष्ट™ीय चैनल डीडी इंडिया और एक शैक्षिक चैनल शामिल हैं। इतने अधिक चैनल शायद ही किसी निजी प्रसारक के पास ह®। ´सत्यम शिवम सुन्दरम´ दूरदर्शन का यही ध्येय वाक्य है। इसे ही ध्यान में रखत्® हुए दूरदर्शन देश की जनता के प्रति अपने फजZ क® निशता आ रहा है। एक दौर था जब दूरदर्शन का राज चलता था। कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों क® जब म®हल्ले के इक्के-दुक्के रइसों के घर में टीवी हुआ करता था और सारा म®हल्ला टीवी में आ रहे कार्यक्रमों क® आÜचर्यचकित सा देखता था। अगर सिर्फ मन®रंजन की बात करें त® `हम ल®ग´,बुनियाद ये ज® है जिंदगी, चित्रहार, नुôड़, मालगुड़ी डेज ,सिग्मा,स्पीड, जंगल बुक, कच्ची धूप, रजनी, कथासागर, विक्रम बेताल ने ज® मिसाल कायम की है उसकी तुलना आज के शायद ही किसी धारावाहिक से की जा सके। रामायण और महाशरत के प्रसारण ने त® `टीवी´ क® `ईÜवरत्व´ प्रदान किया । जब ये धारावाहिक आत्® त® पूरा परिवार हाथ ज®ड़कर देखता था। रामायण में राम और सीता का र®ल अदा करने वाले अरूण ग®विल और दीपिका पादुक®ण क® ल®ग आज “ी राम और सीता के रुप में पहचानत्® है त® नीतिश शरद्वाज महाशरत सीरियल के `कृष्ण´ के रुप मे जाने गए। वहीं शरत एक ख®ज, दि सव®र्ड अ‚फ टीपू सुल्तान और चाणक्य ने ल®गों क® शरत की ऐतिहासिक तस्वीर से रूबरू कराया। जबकि जासूस करमचंद, रिप®र्टर व्य®मकेश बक्शी, तहकीकात, सुराग और बैरिस्टर राय ज्ौसे धारावाहिकों ने समाज में ह® रही अपराधिक घटनाओं क® स्वस्थ ढंग से पेश करने की कला विकसित की। जिसके सामने आज के क्राईम आधारित कार्यक्रम कहीं नहीं लगत्®। दूरदर्शन ने न जाने ऐसे कितने ही सफल धारावाहिकों के माध्यम से टीवी मन®रंजन के क्ष्®त्र में कई मिसाले कायम की है। सही मायने में दूरदर्शन ने मन®रंजन के मायने ही बदल दिए थ्®। दूरदर्शन ने मन®रंजन के साथ-साथ ल®गों क® शिक्षित करने में “ी अहम “ूमिका अदा की है। मीडिया में ``एजुटेंमेंट´´ की आधारशिला दूरदर्शन ने ही रखी है। चित्रहार में प्रसारित गीतों के शब्दों क® सब-टाइटलिंग के द्वारा दिखाकर ल®गों में सुनकर और देखकर पढ़ने की अ®र प्रेरित किया। इससे शरत के साक्षरता अि“यान क® “ी नई दिशा मिली। वहीं विज्ञापनों में मिले सुर मेरा तुम्हारा ल®गों क® एकता का संदेश देने में कामयाब रहा त®, बुलंद शरत की बुलंद तस्वीर-हमारा बजाज से अपनी व्यावसायिक क्षमता का ल®हा“ी मनवाया ग्रामीण शरत के विकास में “ी दूरदर्शन के य®गदान क® “ुलाया नहीं जा सकता । सन् 1966 में कृषि दर्शन कार्यक्रम के द्वारा दूरदर्शन देश में हरित क्रांति लाने का सूत्रधार बना। इस कार्यक्रम का उÌेश्य था किसानों क® अपनी जमीन से ज®ड़े रखना और कृषि संबंधी जागरूकता लाना। आज “ी यह कार्यक्रम बदस्तूर जारी है और किसानों ग्रामीणों- की इसमें-उतनी ही शगीदारी है जितनी पहले थी। वक्त के साथ स्वरुप जरूर बदल गया है। सन् 1975 में साईट (सैटेलाईट-इन्स्ट™क्शनल टेलीविजन एक्सपेरीमेंट)परिय®जना ने त® दूरदर्शन के महत्व क® नई मजबूती दी। इसके जरिए यह साबित हुआ कि ग्रामीण, शिक्षा और विकास क® गति देने में दूरदर्शन एक सशक्त माध्यम है । दूरदर्शन ने अपने कार्यक्रमों के माध्यम से न जाने ऐसे कितने प्रय®ग किए ज® सामाजिक परिवर्तन और विकास के अग्रदूत बने। आज “ी दूरदर्शन ग्रामीण विकास की दिशा में अनूठी-“ूमिका निश रहाहै। `मेरे देश की धरती´ ज्ौसे कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण जीवन के हर पहलू से रूबरू कराया जा रहा है। जबकि आम आदमी क® स्वस्थ जीवन के प्रति जागरूक करने में “ी दूरदर्शन अहम “ूमिका निभा रहा है। ``कल्याणी´´ और ``जासूस विजय´´ऐसे ही कार्यक्रम है ज® स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने- का काम कर रहे हैं।अगर देश में ख्®लों के विकास की बात करें त® दूरदर्शन ने अपनी स्थापना के कुछ समय बाद से ही ख्®ल और खिलाड़ियों के लिए अपना अि“यान शुरू कर दिया था। सन् 1999 में पृथक डीडी स्प®टर्स चैनल शुरू किया गया। ज® देशका एकमात्र टू एयर स्प®टर्स -24 घंटे प्रसारक चैनल है। क्रिकेट के दीवाने इस देश में दूरदर्शन ने कबड्डी,ख®-ख®, कुश्ती जिसे खालिस देशी ख्®लों क® महत्व प्रदान किया और इन्हें ल®किप्रय बनाया। आज इस चैनल पर स“ी ख्®लों के राष्ट™ीय-अतंर्राष्ट™ीय टूर्नामेंट का सीधा प्रसारण किया जाता है। देश की विि“é संस्कृतियों के दर्शन “ी आज दूरदर्शन पर ही ह®त्® हैं। शाóीय नृत्य-संगीत ह® या ऐतिहासिक विरासत, दूरदर्शन का डीडी शरती चैनल स“ी का व्यापक कव्हरेज करता है। जबकि उत्तर पूर्व और विि“é शषा शषी ल®गों की जरूरतों उनके मन®रंजन का ख्याल प्रादेशिक शषा के चैनल कर रहे हैं। अंतर्राष्ट™ीय स्तर पर “ी दूरदर्शन ने अपनी आमद दजZ करा रखी है ´´डी डी इंडिया ´´ चैनल 1995 में इसी कड़ी में शुरू किया गया था। पहले इसका नाम डीडी वल्र्ड था। इस चैनल के माध्यम से अंतर्राष्ट™ीय दर्शकों के लिए शरत की सामाजिक सांस्कृतिक,राजनैतिक और आर्थिक स्थिति क® पेश किया जाता है। आज इसे 146 देशों में देखा जा रहा है। बात खबरों की कि जाये त® दूरदर्शन ने समाचारों के प्रसारण के मामले में रंग रुप और नई तकनीक जरूर अपना ली है लेकिन अ“ी “ी उसके समाचारों में `विÜवसनीयता´ श®शयमान है। बिना किसी राग-द्वेष, लाग लपेट और नाटकीयता के समाचारों की प्रस्तुति उसकी खूबी है। निजी समाचार चैनलों में ´न्यूज´ ज्ौसे गं“ीर विषय में जिस प्रकार से मन®रंजन का तड़का लगाया जाता है व® विषय की गं“ीरता क® खत्म करता है। लेकिन दूरदर्शन इस मामले में तारीफ के काबिल है। उसके समाचारों में छ®टे से कस्बे के किसान की खूबियों से लेकर तुर्कमेनिस्तान ज्ौसे अनजाने देश की खबरें “ी देखने क® मिल जाती है। 15 अगस्त 1965 क® प्रथम समाचार बुलेटिन का प्रसारण दूरदर्शन से किया गया था। तब से लेकर नेशनल चैनल पर रात 8.30 बज्® प्रसारित ह®ने वाला राष्ट™ीय समाचार बुलेटिन आज “ी बदस्तूर जारी है। उस समय के समाचार वाचक सलमा सुल्तान, मंजरी ज®शी, सरला माहेÜवरी, शम्मी नारंग, ज्®.व्ही.रमण और साधना श्रीवास्तव की आवाज आज “ी कानों में गूंजती है। समाचार की महत्ता क® देखत्® हुए ही दूरदर्शन ने 2003में पृथक से 24 घंटे का समाचार चैनल डीडी न्यूज शुरू किया । यह एक मात्र चैनल है ज® केबलविहीन और उपग्रह सुविधा रहित घरों तक पहुंचता है। इसकी पहुंच देश की आधी जनसंख्या तक है। डीडी न्यूज पर र®जाना 16 घंटे सीधा प्रसारण ह®ता है जिसमें हिन्दी में 17 और अंग्रेजी में 13 समाचार बुलेटिन शामिल है। उर्दू और संस्कृत में र®ज एक बुलेटिन के अलावा बघिर ल®गों के लिए हफ्त्® में एक बुलेटिन प्रसारित ह®ता है। साथ ही राज्यों की राजधानियों में 24 क्ष्®त्रीय समाचार एकांशों द्वारा प्रतिदिन 19 शषाओं में 89 बुलेटिन प्रसारित किए जात्® हैं। इसके अलावा डीडीन्यूजड‚टक‚म वेवसाईट पर हर र®ज द® घंटे के समाचार आनलाईन देख्® जा सकत्® हैं।वक्त के साथ बदलती तकनीक और “विष्य के टीवी क® देखत्® दूरदर्शन ने स्वयं क® अपडेट रखा है। दूरदर्शन के 16 चैनलों क® अब (डीबीवी-एच प्रसारण) म®बाइल पर देखा जा सकता है। जबकि एचडीटीवी (हाईडेफीनिशन टेलीविजन) और आईपीटीवी (इंटरनेट प्र®ट®काल टेलीविजन) प्रसारण तकनीक अपनाने क® लेकर त्ौयारियां चल रही हैं। 2010 के राष्ट™मंडल ख्®लों का प्रसारण एचडी सिग्नल पर ही किया जाएगा। ज® देश में पहली बार ह®गा। आज देश में 394 चैनल हैं। इनमें आध्® से अधिक समाचार और सामयिक विषयों पर आधारित चैनल हैं। मीडिया जगत में चैनलों की इस “ीड़ में कुछ ल®गों क® ``दूरदर्शन´´ख®या सा लगता है।क्योंकि `मन®रंजन´ की “ूख और बाजारवादी प्रथा के दवाब में ल®गों की स®च में बदलाव आया है। इसके लिए प्रचार-प्रसार के हथकंडे सबसे ज्यादा द®षी है।ज® ल®ग ऐसा स®चत्® है कि अब `दूरदर्शन´ क® देखता कौन है उन्हें यह जान लेना चाहिए कि केबल और डीटीएच पर आधारित निजी चैनलों की पहुंच सीमित वर्ग तक है और ``दूरदर्शन´ जिसकी पहुंच 92 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या तक है वो कश्मीर से कन्याकुमारी तक के ल®गों की जरूरतों क® ´मुफ्त´ में पूरा कर रहा है उन्हें शिक्षित करता है, सूचित करता है और स्वस्थ ढंग से उनका मन®रंजन करता है। पिछले पचास साल की टेलीविजन क्रांति का इतिहास असल मायने में दूरदर्शन का ही इतिहास है। इस देश में ´दूरदर्शन´ इलेक्ट™‚निक मीडिया जगत का कल्प वृक्ष है जिसकी जड़े बहुत गहरे तक है और जिसकी शाखाओं पर साढे तीन सौ से अधिक चैनल सुश®ि“त ह® रहे हैं। बेशक निजी चैनलों ने प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया है लेकिन इसके बावजूद दूरदर्शन अपनी स्थापना के उÌेश्यों पर अटल रहत्® हुए खुद क® मजबूत बनाये हुए है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि `दूरदर्शन´ देश की एकमात्र ल®क प्रसारण सेवा है वह निजी टीवी चैनलों की तरह व्यावसायिक तथा केवल मन®रंजन प्रधान नहीं ह® सकता। उसका मुख्य दायित्व जनहित क® ध्यान में रखकर सही सूचना देना सामाजिक आर्थिक जागरूकता बढ़ाना तथा स्वच्छ तरीके से मन®रंजन उपलब्ध कराना है। पचास साल में दूरदर्शन में बदलाव की ज® बिंदास बयार चली है उससे व® और तर®ताजा हुआ है।

मौका है सुधार लो यमुना की हालत

फिर उफनाई शीला की टेम्स

(लिमटी खरे)


विदेशी आक्रांताओं के जुल्मों की गवाह रही इंद्रप्रस्थ, दिल्ली, देहली आदि नामों से पुकारी जाने वाली सदियों से सत्ता का केंद्र बिन्दु रही देश की राजनैतिक राजधानी से कल कल बहने वाली यमुना नदी एक बाद फिर पूरे शबाब पर है। मीडिया चीख चीख कर कह रहा है कि दिल्ली में बाढ़ आ गई है।

दिल्ली में वाकई बाढ़ आई है, किन्तु जीवनदायनी यमुना के कारण नहीं। इस महानगर की जल मल निकासी की खराब और कमजोर प्रणाली के कारण। जरा सी बारिश में दिल्ली मेें यातायात अवरूद्ध हो जाता है। दिल्लीवासी असहनीय जाम से दो चार हो जाते हैं। जाम में फंसे मरीज की सांसे हलक में अटकी होती हैं, किन्तु दिल्ली पर शासन करने वाले निजामों के कानों में जूं भी नहीं रेंगतीं। हमारी आवाज भी उनके दरबार में नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हो सकती है। किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि हम इसका प्रतिकर न करें।

इसी साल जून माह में दिल्ली की कुर्सी पर तीसरी मर्तबा बैठने वाली कांग्रेस की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित ने चिंघाड़ कर कहा था कि यमुना को लंदन की टेम्स नदी नहीं बनाया जा सकता है। तब हमने अपने आलेख ``यमुना को टेम्स नहीं यमुना ही बने रहने दीजिए शीला जी`` यही लिखा था कि कम से कम इसे पुराने स्वरूप में तो लाया ही जा सकता है।
एक दशक से अधिक समय से दिल्ली में शीला दीक्षित निश्कंटक राज कर रहीं हैं। दिल्ली में यमुना नदी गंदे सड़ांध मारते बदबूदार नाले में तब्दील हो चुकी है। एयर कंडीशन्ड वाहनों में बैठकर जाने वाले राजनेता इसकी सड़ांध को महसूस नहीं कर सकते किन्तु अपने अपने साधनों से या ब्लूलाईन में सफर करने वाला आम दिल्ली वासी इस नदी की दुर्दशा महसूस कर आंसू बहाने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता है।

पिछले दिनों अचानक उफान पर आई यमुना में साफ स्वच्छ जल को देखकर आम दिल्लीवासी आल्हादित हुए बिना नहीं रहा होगा। आदिकाल के कवि रहमान, कबीर आदि आज अगर जिंदा होते तो सालों बाद दिखने वाली यमुना की लहरों की अटखेलियों पर निश्चित तौर पर छंद लिख चुके होते।

यमुनोत्री से इलहाबाद के संगम तक यमुना 1375 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती है। दिल्ली से पहले स्वच्छ निर्मल जल को लेकर आने वाली यमुना दिल्ली के बाद बुरी तरह प्रदूषित हो जाती है। यमुना के प्रदूषण में दिल्ली की भागीदारी 80 फीसदी से भी अधिक है। वजीराबाद से ओखला बैराज तक का 22 किलोमीटर लंबा यमुना का हिस्सा सबसे अधिक प्रदूषण की चपेट में है।

मुख्यमंत्री खुद स्वीकार करतीं हैं कि यमुना नाले में तब्दील हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि यमुना एक्शन प्लान एक और दो में 2800 करोड़ रूपए तो खर्च हुए हैं किन्तु ठोस तकनीक न होने से इसका वांछित परिणाम सामने नहीं आया। हम शीला दीक्षित को याद दिलाना चाहते हैं कि जो व्यय हुआ है, वह उन्हीं के शासनकाल में हुआ है, और अगर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को बिना परिणाम या ठोस तकनीक के बहाया गया है तो क्यों न इसे तैयार करने और अमली जामा पहनाने वालों पर जनता के धन के अपव्यय का आपराधिक मुकदमा चलाया जाएर्षोर्षो

कहा जाता है कि मथुरा के उपरांत यमुना का स्वरूप स्याह हो गया है। इसके पीछे कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने कालिया नाग का जब मर्दन किया था, उसके उपरांत उसके जहर से यह नदी काले रंग में रंग गई थी। यद्यपि भगवान कृष्ण की लीलाओं के चलते यह जहर किसी के लिए प्रणघातक नहीं बना। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त कालिया नागों (औद्योगिक एवं अन्य प्रकार के प्रदूषण) से जीवनदायनी पुण्य सलिला यमुना दिल्ली से ही स्याह रूप धारण कर आगे बढ़ जाती है।

आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि यमुना की गंदगी को पिछले तीन दशकों में प्रकृति ने महज पांच बार ही धोया है। सितम्बर 1978 में यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से काफी उपर (207.49 मीटर) था। इसके एक दशक बाद सितम्बर 1988 में जलस्तर 206.92 पहुंचा फिर सितम्बर 1995 में 206.83, सितम्बर 2008 में 206 मीटर फिर इस साल यह सितम्बर ही माह में 205.28 मीटर तक पहुंचा है।

यमुना में जलस्तर बढ़ने के साथ ही साथ इसकी गंदगी अपने आप ही बहकर आगे चली जाती है। विडम्बना ही कही जाएगी कि यमुना का जलस्तर जैसे जैसे कम होता है वैसे ही दिल्ली से निकलने वाली गंदगी इसे पुन: गंदे नाले में तब्दील कर देती है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में यमुना का पुनरूद्धार संभव नहीं हो पा रहा है।

यमुना नदी लंदन की टेम्स नदी नहीं बन सकती, मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की यह बात अक्षरश: सत्य है। यमुना में जलस्तर वर्तमान काफी अधिक है, यमुना की गंदगी इसके पानी में घुलकर दूर जा चुकी है। आने वाले दिनों में यमुना का जलस्तर कम होगा। यही सही मौका है, केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि अगले साल होने वाले राष्ट्रमण्डल खेल और भविष्य को ध्यान में रखते हुए यमुना में गंदगी का प्रवाह रोकने की दिशा में कठोर कदम उठाए। हो सकता है कड़े कदम राजनैतिक प्रश्रय प्राप्त लोगों के लिए अप्रिय हों, पर बुखार उतारने के लिए ``कुनैन`` की कड़वी दवा खानी ही पड़ती है।

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त्योहारों में खलल डालने की तैयारी में हैं आतंकी संगठन

0 दुनिया के चौधरी ने चेताया पर्याटकों को

0 लंदन के अखबार ने भी किया खुलासा!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मुस्लिमों के पाक महीने रमजान की समाप्ति पर मनने वाली ईद और हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक दशहरा और दीपावली पर दुनिया भर में कहर बरपाने वाले आतंकवादी संगठन भारत में कहर बरपा सकते हैं। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने भारत की ओर रूख करने वाले अमरिकी पर्याटकों को इस संबंध में चेतावनी जारी की है। इसके साथ ही साथ लंदन के प्रमुख अखबार संडे टेलीग्राफ ने भी इनकी हरकतों का खुलासा किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने बीते शनिवार को भारत यात्रा पर जाने वाले विजिटर्स को चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि ईद, दशहरा और दीपावली पर आतंकवादी संगठन हिन्दुस्तान की सरजमीं पर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।
बताया जाता है कि अमेरिका के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों में कहा गया है कि सितम्बर और अक्टूबर माह में हिन्दुस्तान की यात्रा पर जाने वाले अमेरिकी नागरिकी बहुत ज्यादा एहतियात बरतें और यह कोशिश करें कि वे भीड़भाड़ वाले इलाकों से न केवल दूर रहें वरन् लोगों की नजरों में आने से भी बचें।

सूत्र बताते हैं कि अमेरिका ने पिछले साल नवंबर में मुंबई में हुए देश के सबसे बड़े आतंकवादी हमले का जिकर करते हुए कहा है कि होटल और सार्वजनिक स्थल आतंकवादियों की पहली पसंद होते हैं। यात्रा के दौरान उन्हें हिदायत दी गई है कि वे स्थानीय समाचार पत्रों में छपी खबरों का विशेष ध्यान रखें।

इसके साथ ही साथ होटल, रेस्टारेंट, एंटरटेनमेंट प्लेसेस, धार्मिक स्थानों एवं सार्वजनिक स्थानों में जाने के पूर्व वहां मौजूद सुरक्षा संसाधनों एवं उनके स्तर का भी विशेष ख्याल रखें।
उधर ब्रितनी अखबार संडे टेलीग्राफ ने भी आतंकवादियों की हरकतों का खुलासा करते हुए साफ किया है कि हिन्दुस्तान में 2001 में संसद में हुए हमले के लिए जिम्मेदार अतंकवादी संगठन ``जैश ए मोहम्मद`` एक बार फिर से किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की तैयारी में है।

अखबार के मुताबिक इस संगठन ने पाकिस्तान के बहावलपुर कस्बे में अपना बेस केम्प बनाया हुआ है। केंप में जगह जगह पर भारत विरोधी नारे और लाल किले का नक्शा भी चिपकाने की बात अखबार द्वारा कही गई है। इसमें प्रकाशित खबर में कहा गया है कि केंप की दीवारों पर हिन्दुओं और यहूदियों के खिलाफ नारे भी बुलंद हैं।

संडे टेलीग्राफ ने आगे कहा है कि इस संगठन के लिए वहावलपुर कस्बा बड़ी ही मुफीद जगह है। यहां संचालित होने वाले एक हजार से अधिक मदरसों में जेहादी पाठ पढाया जा रहा है। गौरतलब होगा कि आईएसआई की मदद से अस्तित्व में आए इस संगठन का मुखिया मसूद अजहर है।

1999 में एक अपहृत विमान के यात्रियों को छोड़ने की कीमत पर अजहर को भारत सरकार द्वारा रिहा किया गया था। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने इसे विदेशी आतंकवादी गुट करार दिया जा चुका है। दुनिया भर के दवाब के चलते पाकिस्तान ने इस संगठन पर 2002 में प्रतिबंध लगा दिया था।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

युवराज के इलाके की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब!

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

युवराज के इलाके की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब!

कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र के बाद उनके पुत्र और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र की 450 करोड़ रूपए की सड़कें गायब होने पर हंगामा बरपने लगा है। राहुल के संसदीय क्षेत्र में साढ़े चार सौ करोड़ रूपयों की लागत से बनने वाली आठ सड़कें महज दो सालों में ही अस्तित्व खो चुकी हैं। 2006 में बनकर तैयार हुई इन लापता सड़कोें के मामले में संज्ञान लेते हुए राहुल गांधी ने केंद्रीय सड़क निधि से बनाई गई इन सड़कों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दिल्ली बुला भेजा है। इसके पूर्व कांग्रेस की राजमाता ने 2006 में उनके संसदीय क्षेत्र की रायबरेली से बरास्ता लालगंज, महाराजगंज सड़क में हुई धांधली पर 25 सितम्बर 2006 को मुकदमा दर्ज करवाया था। जांच में छ: दर्जन अफसर दोषी पाए गए थे, जिनमें से 13 को पुलिस ने धर दबोचा और 59 फरारी काट रहे हैं। मामला चूंकि तेज तर्रार भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से जुड़ा हुआ है, अत: इस मामले मेें दागी अफसर जल्द ही निलंबित हो सकेंगे। देखना यह है कि अपनी माताश्री की तर्ज पर राहुल बाबा भी एफआईआर दर्ज कराते हैं या फिर किसी की खाल बचाने के लिए . . . ।

जिन्ना प्रकरण में संघ के निशाने पर जसवंत

भाजपा के लिए सरदर्द बन चुके जिन्ना के जिन्न को उतारने के लिए अब संघ ने भी कमर कस ली है। भाजपा से निष्काशित नेता जसवंत सिंह के खिलाफ अब संघ ने भी जहर बुझे तीर चलाने आरंभ कर दिए हैं। संघ के वरिष्ठ चिंतक देवेन्द्र स्वरूप ने पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाती नुस्ली वाडिया के साथ किताब को लेकर जसवंत की सांठगांठ और इस संपूर्ण प्रकरण को बौद्धिक वेश्याचार का दर्जा दे दिया है। यद्यपि वाडिया ने इस मामले में अपनी सफाई अवश्य दे दी है किन्तु मामला अभी ठण्डा पड़ता नहीं दिखता। जिन्ना को लेकर भाजपा के पूर्व पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी भी मुंह की खा चुके हैं। लगता है भारतीय जनता पार्टी और संघ में अब जिन्ना प्रकरण को लेकर आरपार की ही लड़ाई आरंभ हो गई है। संघ के आला नेताओं को साधने की गरज से भाजपा प्रमुख राजनाथ सिंह ने भी यह कहकर सभी को चौंका दिया कि जिन्ना की प्रशंसा करने वालों की भाजपा में कोई जगह नहीं है। लगता है भाजपा में प्रजातंत्र के स्थान पर संघ द्वारा थोपी जाने वाली हिटलरशाही का स्थान सर्वोपरि हो गया है। हालात देखकर लोग यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि भाजपा में अब कोई भी अपने मन की बात कहने के लिए स्वतंत्र नहीं रह गया है।

एक मंत्री के दो परस्पर विरोधी वाक्ये!

केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के साथ दो परस्पर विरोधी वाक्ये प्रकाश में आए हैं, वह भी अगस्त के माह में ही। हुआ दरअसल यह कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में कमल नाथ से संबंधित दो याचिकाओं में नोटिस सर्व नहीं हो सका है। एक में बिना नोटिस के ही जवाब आ गया। सूबे के पूर्व मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह की चायिका पर उच्च न्यायालय ने एक नोटिस कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा के पते पर भेजा। बताते हैं कि नोटिस बेरंग वापस आ गया कि कमल नाथ वहां नहीं रहते। बाद में कमल नाथ के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर यह नोटिस भेजने जस्टिस के.के.लाहोटी की कोर्ट ने आदेशित किया। वहीं दूसरी ओर 13 अगस्त को लखनादौन के एक वकील द्वारा लगाई गई याचिका 1878 में नोटिस कमल नाथ को सर्व हुआ ही नहीं और 24 अगस्त को उनकी ओर से जवाब भी उच्च न्यायालय में पेश कर दिया गया। इतना ही नहीं 26 अगस्त को इसकी अंतिम सुनवाई कर केस का निपटारा भी हो गया। लोग गलत नहीं कहते - ``जय जय कमल नाथ``।

सिब्बल की तारीफ के मायने

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह के अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी दिल खोलकर केेंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की तारीफों में कसीदे गढ दिए हैं। राजनैतिक बिसात में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में उनसे वरिष्ठ मंत्री इन दिनों इस सबके पीछे छिपे मायने खोजने में लगे हुए हैं। लगभग एक दशक से ही राजनैतिक परिदृश्य में उभरकर आए सिब्बल ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को अचानक एसी कौन सी जड़ी सुंघा दी कि विज्ञान और प्रोद्योगिकी जैसे कम महत्व के मंत्रालय के उपरांत अचानक ही उन्हें हाई प्रोफाईल मंत्रालय की कमान सौंप दी गई। राजनैतिक बिसात पर वषोZं से नजर रखने वाले विद्वानों का मानना है कि गुजरे जमाने के राजनैतिक चाणक्य माने जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह की बिदाई के मार्ग प्रशस्त करने वाले सिब्बल को पारितोषक के तौर पर अर्जुन सिंह का ही मंत्रालय सौंपा गया है, एवं अपने एजेंडे पर सधे कदमों से चलने के कारण चहुं ओर ``सिब्बल जिंदाबाद`` के गगनभेदी नारे लग रहे हैं। दरअसल आलाकमान सिब्बल की तारीफ कर यह संदेश भी देने में सफल रहीं हैं कि अर्जुन सिंह जैसे घुर विरोधी को उन्होंने सिब्बल जैसी छोटी तलवार से ठिकाने लगा दिया है, ताकि भविष्य में कोई कांग्रेस सुप्रीमो से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर पंगा लेने का साहस न जुटा सके।

मन्ने भी दो युवराज का ईमेल और फेक्स

विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के करीबी सूबे हरियाणा में बासी कढी एक बार फिर उफान मारने लगी है। राज्य के टिकिट के दावेदार कांग्रेस के नेताओं की नजरें टिकिट के मसले पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर आकर टिक गई हैं। देश भर में यह प्रचारित हो ही गया है कि राहुल गांधी का कार्यालय अत्याधुनिक सायबर उपकरणों से सदा ही लैस रहता है। इन परिस्थितियों में हरियाणा में टिकिटार्थियों की जुबान पर बस एक ही बात है -``हमें भी चाहिए राहुल का ई - मेल और फेक्स नंबर।`` चुनाव की आपाधापी के चलते दावेदार यह मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली जाकर सत्ता और शक्ति के नए केंद्र 10 जनपथ (राहुल गांधी का सरकारी आवास) में जाकर उनसे रूबरू मुलाकात कर अपना बायोडाटा देने का मौका उन्हें शायद ही मिले। अत: हर उम्मीदवार अब अत्याधुनिक संचार माध्यम इंटर नेट और बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के संचार माध्यम फेक्स के माध्यम से अपनी बात बायोडाटा सहित राहुल बाबा तक पहुंचाने की जुगत में हैं।

परिक्रमा बनाम पराक्रम में फंसी भाजपा

संघ के दवाब में अपने नीतिगत फैसले न ले सकने वाली भारतीय जनता पार्टी के अंदर अब एक नई बहस छिड़ गई है। पार्टी के अगली पंक्ति के नेता अब ``गणेश परिक्रम और व्यक्तिगत पराक्रम`` के बीच के फासले को ढूंढनें में व्यस्त हैं। भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय के साथ ही साथ प्रदेश और जिला स्तर पर अंदरूनी लड़ाईयां सतह पर आने लगी हैं। एक दूसरे पर प्रत्यक्ष और परोक्ष आरोप प्रत्यारोप के उपरांत अब अपनी अपनी खाल बचाने के लिए पार्टी के छीजते (लुढकते) जनाधार के बारे में यहां वहां मुंह मारने से नहीं चूक रहे हैं नेताओं के समर्थक। भाजपा के वे नेता जो यह जानते हैं कि संघ की शरण में जाने पर उनके हर दुखाों का अंत हो जाएगा, वे इस मसले में संघ के दरवाजे पर अपनी पेशानी रगडकर भाजपा के आला नेताओं के कपड़े उतारने से भी नहीं चूक रहे हैं। अंर्तद्वंद में फंसी भाजपा की मध्यम श्रेणी वाली पंक्ति के पास अब कोई रास्ता प्रतीत नहीं हो रहा है, जिस पर चलकर वह नीतियों, आदशोZं, सिद्धांतों पर चलने वाली अपनी पुरानी भारतीय जनता पार्टी को वापस पा सकें।

अनेक रोल में हैं बिग बी

रूपहले पर्दे पर डबल रोल वाले किरदार न जाने कितने अभिनेताओं ने निभाए होंगे। सदी के सपुरस्टार अमिताभ बच्चन ने महान फिल्म में ट्रिपल रोल निभाया था। अब सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर में बिग बी के नाम से अनेकों एकाउंट न केवल बने हुए हैं वरन उन पर प्रशंसकों की तादाद भी बहुतायत में है। यह समझना बहुत ही दुष्कर है कि बिग बी का कौन सा प्रोफाईल असली है। अलग अलग खातों को देखकर यह लगता है कि बिग बी शायद ही किसी खाते में खुद लिख रहे हों। जानकारों का कहना है कि टि्वटर को लोकप्रिय बनाने की गरज से लोगों ने बिग बी के अनेक खाते बना दिए हैं। एसा नहीं कि सिर्फ बिग बी के ही अनेक खाते हैं। वालीवुड के हीरो हीरोईनों के इसमें कई रोल अर्थात कई खाते बने हुए हैं, इनमें आश्चर्यजनक बात यह है कि सभी में उनके प्रशंसकों की तादाद असामान्य तौर पर अधिक ही है। कहा जा सकता है जय हो नेट देवता जय हो टि्वटर पुजारी की।

जब पकडी गई चोरी

आम चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग को पिछले दिनों शर्मसार होना पड़ा। दरअसल एल.के.आड़वाणी बुरे समय में अपने पुराने मित्रों के साथ पृथ्वीराज रोड़ स्थित अपने पुराने मित्रों के साथ समय गुजार रहे थे पिछले दिनों। बताते हैं कि उस दिन दिल्ली के भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा और एल.के.आड़वाणी एक सुहानी शाम में उस दिन आड़वाणी के घर चाट पकोड़ों का लत्फ उठा रहे थे। तब माहौल को हल्का फुल्का बनाने की गरज से एकाएक आड़वाणी को याद आया और उन्होंने तपाक से मल्होत्रा जी से कहा याद है विजय जी जब 1967 मेें आप मुख्य कार्यकारी पार्षद हुआ करते थे, तब हम दोनों ही शाम को नियम से पंडारा रोड़ जाया करते थे, तब क्या आपको याद है कि मुझे कौन सी लजीज चीज बेहद पसंद हुआ करती थी। विजय मल्होत्रा ने भी आड़वाणी को खुश करने उत्तर दिया हां . . . `` चिकन मलाई टिक्का``। आड़वाणी को शायद इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी। वे धीरे से बोले -``हां आपकी याददाश्त को मानना ही पड़ेगा, मुझे . . . मलाई टिक्का बेहद पसंद था। दोनों के चेहरों की हवाईयां उड़ी हुईं थीं। पता नहीं किसकी चोरी पकड़ी गई थी उस वक्त।

दिग्गी का बोलबाला रहेगा महाराष्ट्र में

इस साल अक्टूबर में महाराष्ट्र में होने वाले चुनावों में कांग्रेस में नेता अगर किसी की परिक्रमा करेंगे तो वे हैं, तेजी से उभरकर सामने आए सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की। वर्तमान में सूबे में कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई है, जिसने पांच साल सफलता के साथ पूरे कर लिए हैं। कांग्रेसी सूत्रों का कहना है कि इस बार सूबे में जिताउ उम्मीदवारों पर ही कांग्रेस दांव लगाने वाली है। इसके लिए बाकायदा विभिन्न सर्वे एजेंसीज को हायर कर तीन स्तरों में सर्वेक्षण का दूसरा चरण पूरा कर लिया गया है। पहले चरण में चुनाव की घोषणा के बाद फिजां में तैरने वाले प्रमुख नाम तो दूसरे चरण में जीत की संभावना वाले नामों की पेनल तैयार करवा ली गई है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा के अनुरूप उनके अघोषित राजनैतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने महाराष्ट्र सूबे में युवा उम्मीदवारों को प्रमुखता देते हुए अपनी सूची को अंतिम रूप दे दिया है। वहीं महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पुत्र राजेंद्र सिंह ने भी अमरावती से टिकिट मांगकर सभी को चौंका दिया है। इतिहास का यह पहला मौका होगा जबकि किसी पदस्थ महामहिम के सगे संबंधी ने टिकिट की मांग की हो। यह अलहदा बात है कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ.शंकर दयाल शर्मा की पित्न विमला शर्मा एमपी से विधायक रहीं हैं, किन्तु 1992 से 1997 तक डॉ. शर्मा के महामहिम रहते उन्होंने कोई भी चुनाव नहीं लड़ा।

. . . तो भगवा धारण कर लेना चाहिए हुड्डा को

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा आम इंसान हैं, या उनके मुख में माता सरस्वती का वास है! यही प्रश्न आजकल हरियाणा के हर बंदे की जुबां पर है। हुड्डा द्वारा पिछले दिनों की गई भविष्यवाणियां आश्चर्यजनक तौर पर सोलह आना सच साबित हुईं हैं। पिछले दिनों भाजपा के साथ इनेलो के गठबंधन पर हुड्डा ने कहा था कि शून्य गुणा शून्य बराबर शून्य। हुआ भी यही लोकसभा चुनावों में दोनों ही औंधे मुंह गिर गए, और सूबे में अपना खाता भी न खोल सके। इसके बाद हुड्डा के श्रीमुख से निकला कि हजकां और बसपा का हनीमून ज्यादा दिन नहीं चलेगा। हुआ भी यही ढाई महीने के भीतर ही दोनों ने अलग अलग राह पकड़ ली। अब सूबे के निजाम ने भविष्यवाणी की है कि सूबे में एक बार फिर कांग्रेस पार्टी भारी बहुमतों के साथ वापस सरकार बनाएगी। हरियाणावासी अब कहने को मजबूर हो गए हैं कि अगर हुड्डा की भविष्यवाणी सच साबित हो गई तो फिर हुड्डा को अबकी बार मुख्यमंत्री निवास छोडकर भगवा वस्त्र धारण कर लेना चाहिए, क्योंकि राजनैतिक तौर पर भविष्यवाणियां तो सैकड़ों की तादाद में की जाती हैं, किन्तु कम ही सच साबित होती हैं, शेष को ठंडे बस्ते के हवाले ही कर दिया जाता है। जनता के सामने वे ही चर्चित की जातीं हैं, जो अक्षरश: सत्य साबित हुई हों।

निशंक की कुर्सी हिलाने की जुगत में खण्डूरी

उत्तराखण्ड में सत्ताच्युत हुए मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूरी द्वारा अब मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को कुर्सी से उतारने के प्रयास तेज कर दिए हैं। खण्डूरी के प्रयास इतनी दु्रत गति से बिना सोचे समझे हो रहे कि निशंक के एक ही पलटवार से उनके होश फाख्ता हो गए हैं। खण्डूरी ने गढ़वाल जाकर अफसरों को इस तरह बुला भेजा मानो बतौर मुख्यमंत्री वे दरबार सजा रहे हों। खण्डूरी सार्वजनिक तौर पर यह कहते घूम रहे थे कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे, और यही भ्रष्टाचार राज्य के विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनकर उभर गया है। निशंक समझ गए कि खण्डूरी का इशारा उन्हीं की तरफ है। निशंक भी आखिर कब तक सहते, उन्होंने भी खण्डूरी से पूछ ही लिया कि खण्डूरी ने कितने भ्रष्टाचारियों को ठिकाने लगाया है बस फिर क्या था, उंची आवाज में चिल्लाने वाले खण्डूरी को सांप सूंघ गया और एक बार फिर बियावन में खामोशी पसर चुकी है।

पुच्छल तारा

देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायायल द्वारा गठित की गई है केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी)। बताते हैं कि सीईसी का काम सुप्रीम कोर्ट में दखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए मौका मुआयना कर वास्तविक प्रतिवेदन सर्वोच्च न्यायालय को सौंपना है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नामक एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर भी सीईसी ने अपना प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। इस मामले में कांग्रेस का एक प्रतिनिधमण्डल केदं्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला, और वापस आकर उसने मीटिंग का ब्योरा दिया। कांग्रेस द्वारा जारी अधिकृत विज्ञप्ति में जयराम रमेश के हवाले से कहा गया है कि सीईसी के विशेष आमंत्रित सदस्य को पुन: स्थल निरीक्षण करने भेजा जाएगा। सवाल यह उठता है कि सीईसी जयराम रमेश के इशारे पर काम करने गठित की गई है, या फिर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन के लिए।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

प्रजातंत्र की ओर अग्रसर कांग्रेस

प्रजातंत्र की ओर अग्रसर कांग्रेस

(लिमटी खरे)
कहने को तो सवा सौ साल पुराना है कांग्रेस का इतिहास। भारत की आजादी में महात्वपूर्ण भूमिका निभाई है कांग्रेस ने। देश में प्रजातंत्र की स्थापना में कांग्रेस के योगदान को शायद ही भुलाया जा सके। कथनी और करनी में वास्तव में बहुत अंतर होता है। इस सबके बावजूद भी कांग्रेस ने प्रजातंत्र को अंगीकार नहीं किया है। कांग्रेस में आज भी राष्ट्रीय, प्रदेश अथवा जिला स्तर पर अध्यक्षों या अन्य पदाधिकारियों का चुनाव होने के बजाए उनका मनोनयन होने की ही परंपरा जारी है। इस तरह से देश में शिख से लेकर नख तक कांग्रेस में नेताओं को थोपने की परंपरा रही है।

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और महासचिव राहुल गांधी ने यह कहकर सभी को चौंका दिया है कि पार्टी अध्यक्षों के मनोनयन के बजाय अब उनका चुनाव किया जाएगा। राहुल का यह बयान दिवा स्पप्न की ही तरह दिखाई पड़ता है, किन्तु कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की बात को दरकिनार करने का साहस भी कांग्रेसियों में नहीं दिखता है।

आजादी के बाद से अब तक इतिहास खंगालने पर यही बात सामने आती है कि पार्टी के सुप्रीमो द्वारा ही विधायक दल का नेता अर्थात मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश के अध्यक्षों के मनोनयन की परिपाटी ही हावी रही है। कहने को तो कांग्रेस पार्टी प्रजातंत्र की हिमायती है किन्तु अपने अंदर ही कांग्रेस में प्रजातंत्र का अभाव साफ तौर पर परिलक्षित होता है।

बोरा बंद कर पार्टी जनों के सामने बोरा खोलकर उसमें से निकलने वाले नेता को सर्वमान्य नेता बनाने की कवायद में पार्टी के सुप्रीमो यह भूल जाते हैं कि इसी तरह के नेता जमीनी स्तर पर अपने पराए का भेद करवाकर गुटबाजी के लिए माकूल माहौल पैदा कर देते हैं।

हिन्दुस्तान का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भी हिन्दुस्तान के राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के बजाए हिटलरशाही ही हावी रही है। राहुल गांधी ने अगर बदलाव के बारे में विचार किया है, तो उनके इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए।

राहुल गांधी की सोच पर कांग्रेस पार्टी ने ईमानदारी से पहल की तो आने वाले दिनों में चापलूसी और मैनेजिंग पावर के बल पर उपरी पायदान पर पहुंचने वाले बिना रीढ के नेताओं के बदले जनता के बीच पैठ रखने और जनाधार वाले नेताओं के आगे आने के मार्ग प्रशस्त होने की उम्मीद है।

इतिहास गवाह है कि हर दफे मुख्यमंत्री के चुनाव के वक्त विधायकों की मंशा को और पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष चुनते समय प्रदेश के कार्यकर्ताअों की भावनाओं को सर्वोपरि बताने वाले सियासी दल अंत में फैसला आलाकमान पर ही छोड दिया करते हैं। इस तरह की विरोधाभासी कार्यप्रणाली से लोगों के मन में संशय ही पैदा होता है।

देश की प्रमुख सियासी पार्टी कांग्रेस हो या भाजपा अथवा कोई अन्य, हर दल में कमोबेश आलाकमान की मर्जी ही सर्वोपरि मानी जाती रही है। अर्जुन सिंह रहे हों या मोती लाल वोरा, अथवा भुवन चंद खण्डूरी, उमाश्री भारती, बाबू लाल गौर या फिर वसुंधरा राजे, सारे उदहारण इसी बात की ओर इशारा करते हैं कि पार्टी में विधायक नहीं वरन आलाकमान ही सर्वोपरि होता है।

सवाल यह उठता है कि जब सियासी दलों में विधायकों को ही अपने नेता चुनने का अधिकार नहीं है, तो फिर आम कार्यकर्ताओं की पूछ परख आखिर क्यों और कैसे हो पार्टी के चंद नेताओं से घिरे सुप्रीमो के नाक कान इसी तरह के नेता होते हैं जो अपने मैनेजिंग पावर के जरिए दरबार के नौ रत्नों में जगह बनाकर पार्टी की जड़ों में अपने निहित स्वार्थों के लिए मट्ठा डालने से भी नहीं चूकते।

कांग्रेस के युवा महासचिव राहुल गांधी की प्रदेशाध्यक्षों के मनोनयन के बजाए चुनाव की सोच को बारंबार सलाम। उम्मीद की जानी चाहिए कि राहुल गांधी की यह मंशा न केवल कांग्रेस पार्टी में फरमान के तौर पर ली जाए वरन् अन्य सियासी दलों में भी इसे नजीर के तौर पर अंगीकार किया जाना चाहिए। अभी समय है, अगर राजनीति के कीचड़ भरे तालाब में नील कमल खिलाने हैं तो इसकी सफाई बहुत जरूरी है, वरना आने वाली पीिढयां विदेशी आक्रांताओं के बजाए देशी चंद नेताओं की गुलामी करने पर गजबूर होगी।
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वैचारिक मंच पर संघ में मची है घमासान
0 समाज और राजनीति के नियंत्रण पर मचा है द्वंद
0 सत्ता के मद को नहीं भूलना चाहता संघ
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में मचे घमासान पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भले ही ``कभी हां कभी न`` की भूमिका में हो पर यह सच है कि संघ के अंदरखाने में असंतोष और खींचतान का सैलाब उमड रहा हो जो कभी भी फटकर बाहर आ सकता है।संघ के विभिन्न धड़ों में चल रही चर्चाओं को अगर सच माना जाए तो इन दिनों संघ के अंदर ही अंदर ``राजनीति नियंत्रित समाज`` या ``समाज नियंत्रित राजनीति`` पर अंर्तद्वंद की स्थिति बनी हुई है। कुछ लोग राजनीति से समाज को नियंत्रित करने के हिमायती हैं तो अनेक धड़े समाज से राजनीति को नियंत्रित करने के पेरोकार हैं।
सूत्रों की मानें तो वर्तमान संघ प्रमुख मोहन राव भागवत द्वारा संगठन को हेडगेवार और गुरू गोलवरकर के सिद्धांतों पर ले जाना चाहा जा रहा है, जिसके मुताबिक समाज को अगर बदल दिया जाए तो राजनीति खुद ब खुद बदल जाएगी। भागवत के इस सिद्धांत के समर्थन में संघ के वरिष्ठ नेता माधव गोविंद वैद्य और इंद्रेश आदि दिखाई पड़ रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर एक अन्य धड़ा चाह रहा है कि अगर समाज को बदलना है तो इसके लिए राजनीति पर नियंत्रण करना अत्यावश्यक होगा। इस धारा के हिमायती गुरूमूर्ति, राम माधव, मदन दास देवी, रज्जू भईया, देवरस प्रतीत हो रहे हैं। इसके अलावा बीच के रास्ते के पेरोकार भी संघ में दिख रहे हैं।
सुरेश सोनी, भैया जी और सुरेश जोशी वैसे तो मोहन भागवत के साथ खड़े दिख रहे हैं, किन्तु इनकी परछाई का अक्स कुछ और बयां कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि ये तीनों चाहते हैं कि इस मसले पर बीच का रास्ता अिख्तयार किया जाए।
उधर सूत्रों ने यह संकेत भी दिए हैं कि पिछले दो दशकों में बरास्ता भाजपा राजनीति और सत्ता में खासी घुसपैठ बना चुके संघ के नेता सत्ता के मद को खोना नहीं चाह रहे हैं। संघ के नेता जनसंघ से पूर्व के राजनीति विहीन बियावान में विचरण करने से अपने आप को बचा ही रहे हैं।
संघ में अंदर ही अंदर मचे इस घमासान के चलते संघ नेतृत्व भाजपा के बारे में कोई ठोस निर्णय लेने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रहा है। संघ का एक गुट चाहता है कि संघ और भाजपा के रिश्ते को वैचारिक मंच पर कुछ अघोषित नाम दे दिया जाए ताकि दोनों के बीच सामंजस्य बना रहे और संघ के नेता सत्ता और राजनीति के समुंदर में पहले की तरह गोते लगा सकें, वहीं कुछ नेता चाहते हैं कि भाजपा के बारे में कड़े निर्णय ले ही लिए जाएं।

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

किसी बड़े हादसे के इंतजार में है सरकारी तंत्र

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक के उपरांत देश में आतंक ने तेजी से पैर पसारने आरंभ कर दिए थे। इसके बाद सरकारें आती रहीं जाती रहीं किन्तु आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, नक्सलवाद जैसे तमाम केंसर देश की रग रग में फैल चुके हैं। आज यह बीमारी लाईलाज ही प्रतीत हो रही है।देश के आंतरिक सुरक्षा तंत्र की पोल तो उस वक्त ही खुल गई थी जब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में ही आतंकवादियों ने तफरी करते हुए फायरिंग कर दी थी। उस समय इस पंचायत के पंचगणों (सांसदों) के चेहरे देखने लायक थे। निजी समाचार चेनल्स में सांसदों के चेहरों से उड़ती हवाईयां साफ जाहिर कर रही थीं कि वे भी इन दहशतगर्दों से खौफजदा हैं। बावजूद इसके एकमत से कोई फैसला न लिया जाना निश्चित ही निराशाजनक और निंदनीय माना जा सकता है।संसद पर हमला, लाल किले पर हमला, देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला, मुंबई बम ब्लास्ट, दिल्ली के सीरियल ब्लास्ट आदि न जाने कितने हादसे हैं, जो सबक सीखने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि सरकार इन सबसे सचेत होने की बजाए अभी और किसी बड़े हादसे की राह तक रही है।अभी पिछले दिनों 11 अगस्त को ही महामहिम राष्ट्रपति के आवास एवं साउथ ब्लाक (प्रधानमंत्री कार्यालय) के उपर से एक निजी कंपनी का यात्री विमान उड़ान भरकर चला गया। वस्तुत: यह क्षेत्र नो फ्लाई जोन कहलाता है। इस क्षेत्र में बिना पूर्वानुमति के किसी को भी उड़ान भरने की इजाजत नहीं है। गलतफहमी के चलते अगर महामहिम आवास के सुरक्षा कर्मी इस विमान को अपनी एंटी एयरक्राफ्ट गन के निशाने पर ले लेते तो सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाता।मुंबई में भी महामहिम राष्ट्रपति के काफिले में शामिल हेलीकाप्टर और एक निजी हवाई कंपनी के यात्री विमान की दुघZटना को टाला गया था। बजट सत्र के दौरान भी संसद की लचर सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर केरल के पुन्नामी के मुस्लिम लीग के संसद सदस्य ई.टी.बशीर की पित्न रूखैया बख्श मजे से वित्त मंत्री का बजट भाषण सुन रहीं थीं। यह हादसा तब हुआ जब सदन में प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह, कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी, नेता प्रतिपक्ष एल.के.आड़वाणी सहित अनेक बड़े नेता मौजूद थे।दरअसल केरल से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस का मुस्लिम लीग से गठजोड़ है, अत: यह मामला वहीं रफा दफा करवा दिया गया, किन्तु चूक तो चूक ही कही जाएगी। 14 अगस्त 2002 को रफीक नामक एक व्यक्ति को संसद परिसर मेें जबरन घुसने की कोशिश में पकड़ा गया था, इसके बाद 22 सितम्बर 2002 को ही ब्रज लाल साहू नाम के एक व्यक्ति को दीफार फांदकर संसद में घुसने की कोशिश में पकड़ा गया।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश भर के चुने हुए जनसेवकों की इस पंचायत की सुरक्षा में अब तक सौ करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। इस साल लोकसभा के लिए सुरक्षा खर्च 384.65 करोड़ रूपए तो राज्य सभा के लिए यह 150.60 करोड़ के लगभग है। जनता के चुने हुए नुमाईंदों की सुरक्षा के लिए इतना व्यापक खर्च और आम जनता जिसके द्वारा दिए गए कर से यह सुरक्षा का ताना बाना बुना जा रहा है, उसकी सुरक्षा के लिए . . . ।वैसे भी कहा जाता है कि महामहिम आवास, पीएम हाउस, सोनिया गांधी के आवास, संसद आदि अतिसंवेदनशील जगहों में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुरक्षा तंत्र के इस दावे में कितनी हकीकत है, यह सब भली भांति जानते हैं। कहने को लोकसभा और राज्य सभा सचिवालय द्वारा जारी रेडियो फ्रीकवेंसी कार्ड के बिना कोई भी संसद में प्रवेश नहीं कर सकता है।इतना ही नहीं मंदी की मार झेलते भारत वर्ष में बेरोजगारी एक अभिषाप बनकर रह गई है। इन हालातों में देश के चंद लोगों की सुरक्षा के लिए साल भर में खर्च किए जाते हैं 226 करोड़ रूपए। जी हां, यह सच है। सूत्रों के अनुसार वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह, कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और सोनिया की पुत्री प्रियंका वढ़ेरा की सुरक्षा में लगा है स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) जिसका सालाना बजट 226 करोड़ रूपए है।गृह मंत्रालय के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2003 - 04 में एसपीजी का बजट 75 करोड़ रू. था। 2007 - 08 में यह बढ़कर 113 करोड़ रूपए, तो 2008 - 09 में यह 170 करोड़ रूपए का आंकड़ा पार कर गया था। प्रधानमंत्री की सुरक्षा के बारे में तो कहा जा सकता है किन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि 56 करोड़ 50 लाख रूपए सालाना की दर से नेहरू गांधी परिवार की चौथी और पांचवीं पीढ़ी के महज तीन सदस्य देश की जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई को उड़ा रहे हैं।बहरहाल इन सारी वारदातों, हजारों करोड़ रूपए फूंकने के बाद भी अब तक किसी भी सरकार द्वारा इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया जाना सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति की ओर ही इशारा करता है। हालात देखकर यही कहा जा सकता है कि ``कहां तो तय था चिरांगा, हरेक घर के लिए! कहां चिराग भी मयस्सर नहीं शहर के लिए!!``

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अंदर ही अंदर तलवार पजा रहे हैं भाजपा के क्षत्रप

0 आड़वाणी, राजनाथ, शेखावत और भागवत के बीच चल रही है अघोषित लड़ाई!

0 करोड़ रूपए का सवाल बन गया है ``कौन बनेगा भाजपाध्यक्षर्षोर्षो``

0 विखण्डन की स्थिति में आ पहुंची है भाजपा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगभग साढ़े तीन दशक पुरानी भारतीय जनता पार्टी के चार क्षत्रपों के बीच अंदर ही अंदर तनी तलवारों से भाजपा विखण्डन की स्थिति में आ पहुंची है। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी, भाजपाध्यक्ष आर.एन.सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति बी.एस.शेखावत और संघ प्रमुख एम.आर.भागवत के खेमे अंदर ही अंदर तलवारें पजा कर पैनी करने में जुटे हुए हैं।भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो आड़वाणी खेमे की नाराजगी पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे समिति को लेकर है। आप्टे, मुरलीधर राव और चंदन मित्रा से युक्त यह समिति आम चुनावों में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए खींच तान कर यह ब्लूप्रिंट तैयार कर चुकी है कि इस शर्मनाक पराजय का इकलौता कारण लाल कृष्ण आड़वाणी ही हैं। पूर्व विदेश मंत्री एंव पार्टी से निष्काशित नेता जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी ने भी पार्टी नेतृत्व पर सीधा निशाना साधकर माहोल को खदबदा दिया था।राजस्थान में वसुंधरा प्रकरण की आग अभी शांत नहीं हुई है। राख के अंदर चिंगारी जलती दिखाई दे रही है। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखवत परोक्ष तौर पर वसुंधरा को निपटाने की जुगत लगाए हुए हैं। उधर बिहार में भी उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के खिलाफ माहौल तैयार हो चुका है।पार्टी के प्रमुख अंदर अंदर खदबदाती इस खिचड़ी से इतर संघ के मोहन राव भागवत, के.एस.सुदर्शन और भाउसाहब जोशी के त्रिफला के कोप से बचने के मार्ग प्रशस्त करने में जुटे हुए हैं। राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से हैं, आम चुनावों में यूपी में महज 10 सीटें मिलना उनके लिए सबसे बड़ा माईनस प्वाईंट गिनाया जा रहा है।मध्य प्रदेश में कमोबेश अंर्तकलह कम कही जा सकती है, किन्तु उत्तराखण्ड में कोशियारी और खण्डूरी प्रकरण, राजस्थान का महारानी प्रकरण अब भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है। शेखावत ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल में 2003 से 2008 के बीच हुए 22000 करोड़ रूपयों के महाघोटाले के बारे में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर सनसनी फैलाई थी।वैसे भी आड़वाणी पोषित विजय कुमार मल्होत्रा, वसुंधरा राजे, भुवन चंद खण्डूरी, गोपी नाथ मुंडे आज भी असंतुष्ट भाजपाईयों के निशाने पर हैं। दिसंबर में होने वाले भाजपाध्यक्ष के चुनाव में प्रमुख रूप से अरूण जेतली, सुषमा स्वराज, बाल आप्टे, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शोरी और यशवंत सिन्हा के नाम सामने आ रहे हैं।कुल मिलाकर पार्टी के शीर्ष स्तर पर नेताओं की आपसी लड़ाई के चलते नीचे स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी हद तक टूटने लगा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कभी न समाप्त होने वाली इस अंर्तकलह के चलते भाजपा अब विखण्डन की स्थिति में पहुंच गई है।
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बुधवार, 9 सितंबर 2009

क्या संदेश देना चाह रहे हें जनसेवक

विलासिता का लबादा ओढ़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी

(लिमटी खरे)

किसी ने सच ही कहा है कि भारत वर्ष में सब कुछ संभव है। यहां जन्मजात अंधे को मोटर चलाने का लाईसेंस मिल सकता है। गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े फर्राटे से दौड़ जाते हैं, और भी न जाने क्या क्या! हमारे देश की भयावह गरीबी के परिदृश्य से भलीभांति परिचित सरकारी नुमाईंदे हवाई जहाज में यात्रा कर, पांच या सात सितारा होटल में रात बिताकर आखिर देश की जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं, यह समझ से परे ही है।कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने गठन के बाद सौ दिनी एजेंडा बनाया। सौ दिन पूरे हो गए पर उस एजेंडे का क्या हुआ किसी को नहीं पता। सरकार ने अपने इस एजेंडे में सांसदों के आवास को प्राथमिकता नहीं दी। आज भी अनेक संसद सदस्य किसी न किसी होटल में ही रात बिता रहे हैं, आश्चर्य तो इस बात पर है कि सौ दिनों के बाद भी संसद सदस्यों के लिए निर्धारित आवास ठीक नहीं हो सके हैं। यह है केंद्र सरकार की नाक के नीचे कच्छप गति से चलते प्रशासन की एक बानगी।वजीरे आज़म डॉ. एम.एम.सिंह ने अनावश्यक खर्चों पर कमी की अपील की है। निश्चित तौर पर यह बात उनकी सरकार के मंत्रियों और समस्त संसद सदस्यों पर भी लागू होगी। केंद्र सरकार में विदेश मंत्री जैसे महात्वपूर्ण ओहदे पर विराजमान एम.एस.कृष्णा और विदेश राज्य मंत्री एवं पूर्व राजनयिक शशि थुरूर ने तो सारी हदें पार ही कर दीं।खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो कृष्णा इन दिनों मोर्या शैराटन नाम के एक सात सितारा होटल के प्रेसिडेंशियल स्यूट को अपना आशियाना बनाए हुए थे, जिसका किराया एक लाख रूपए प्रतिदिन का है। यही हाल थुरूर का है वे तज मानसिंह के एिग्जक्यूटिव स्यूट में चालीस हजार रूपए प्रतिदिन के मान से रह रहे थे।पता नहीं जनता या अपने खुद के गाढ़े पसीने की कमाई हवा में उड़ाने वाले इन जनसेवकों को इस बात का इल्म है कि नहीं कि देश की 80 फीसदी जनता की औसत आय महज 20 रूपए प्रतिदिन ही है। मंत्रियों का यह तर्क कि उन्हें आवंटित बंग्ले अभी रहने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए वे होटलों में रह रहे हैं, भी गले से नहीं उतर पा रहा है।इन मंत्रियों ने यह पूछा जाना अत्यावश्यक होगा कि क्या कर्नाटक और केरल भवन के कक्ष इन मंत्रियों के रहने लायक नहीं हैं, जिन भवनों में सूबों के महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक रह सकते हैं, उन कक्षों में रहने में इन जनसेवकों को आखिर एतराज किस बात का है।वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की हिदायत के बाद दोनों ही मंत्रियों ने अपना आशियाना बदल दिया। कृष्णा विदेश सेवा संस्थान के गेस्ट हाउस में तो थुरूर ने इंडियन नेवी के अतिथिगृह की ओर रूख कर लिया है। जनसेवक कहलाने वाले कृष्णा ने कहा है कि वे अपने निजी खर्च पर होटल में रह रहे हैं। अगर वाकई एसा है तो लानत है एसे विलासिता पसंद जनप्रतिनिधियों पर।देश को आजादी दिलवाने वाले दीवानों ने सड़कों पर उतरकर सारे एशोआराम को सलाम भेजा था, तब कहीं जाकर हमें नसीब हुई आजादी। गांधी नेहरू के नाम को भुनाने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पार्टी क्या इस तरह की बयान बाजी पर किसी किस्म की टिप्पणी करने की जहमत उठाएगीर्षोर्षो क्या ये जनता के सेवक राष्ट्रपिता की उपाधि से नवाजे गए महात्मा गांधी के जीवन से कुछ प्रेरणा ले पाएंगेर्षोर्षोसवाल यह उठता है कि अगर इन मंत्रियों ने अपनी निजी व्यवस्था के तौर पर होटलों में रूकने का उपक्रम किया था, तो क्या वे आयकर रिटर्न में करोड़ों के होटल के भुगतान को दर्शाने का साहस कर पाएंगे। सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पास ``उपकृत`` करने के असीमित अधिकार होते हैं, इन परिस्थितियों में इन मंत्रियों के करोड़ों के होटल के बिल का भुगतान भी किसी ``कृपा प्राप्त शोहदे`` द्वारा कर दिया जाए तो किसी को अश्चर्य नहीं होना चाहिए।बेशक दोनों ही मंत्री अपने ``स्वयं`` के व्यय पर डेढ लाख रूपए प्रतिदिन के होटल में रात गुजार रहे होंगे, किन्तु न तो मंत्रियों ने और न ही होटल प्रबंधन ने यह बताने की जहमत उठाई कि वे कितना किराया दे चुके थे, या कितना किराया देना बाकी है। सादगी का आलाप रागने वाली कांग्रेस पार्टी के मंत्री इस कदर विलासिता का उपभोग करेंगे तो ``कांग्रेस का हाथ, गरीब के साथ`` नारे का क्या होगा।विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर ने तो नेट पर यह भी लिखा है कि अगर वे जनता का पैसा खर्च कर रहे होते तो शर्मिंदा होते, लेकिन वे जनता के बजाए अपना पैसा खर्च कर रहे हैं। मंत्री द्वय शायद बार बार यह भूल जाते हैं कि वे निजाम की भूमिका में हैं, रियाया के सुख दुख का ख्याल रखना उनका परम धर्म है।मंदी की मार से जूझ रहे हिन्दुस्तान में अब जबकि गरीबी महामारी की तरह फैल चुकी है, तब इस तरह की विलासिता का प्रदर्शन कर उसे सही ठहराने हेतु तरह तरह के जवाब देना कहां तक उचित माना जा सकता हैर्षोर्षो बेहतर होता दोनों ही मंत्री सादगी के साथ जहां अब रहने गए हैं, वहीं आरंभ से रहते एवं विलसिता पर किए गए खर्च को बाढ़ या सूखा पीडितों के बीच बटवाकर पुण्य कमाते। मंत्री द्वय अपने खर्च पर जो चाहे करना चाहें करें यह उनका नितांत निजी मामला है, किन्तु उन्हें चाहिए कि पहले वे मंत्री पद त्यागें, संसद की सदस्यता त्यागें, उसके उपरांत जो मर्जी वह करें। वर्तमान में चूंकि वे जनसेवक हैं, अत: उन्हें मर्यादित रहना अत्यंत जरूरी है। बुंदेलखण्ड की एक प्रसिद्ध कहावत का जिकर यहां करना लजिमी होगा, ``घर के लड़का (आम जनता) गोहीं (आम की गुठली) चूसें, और मामा (जनसेवक) खाएं अमावट (आम के गूदे को सुखाकर बनाया गया पदार्थ)।``

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फिर सकते हैं अरूण यादव के दिन

0 यदुवंशियों के त्रिफला की काट बनाने की जुगत में हैं राहुल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव अगर ठीक ठीक चले तो आने वाले दिनों में कांग्रेस उन्हें हाथों हाथ लेने की तैयारी में है। राहुल गांधी नजर इस युवा यदुवंशी पर आकर टिक चुकी है। लालू, मुलायम, शरद और अखिलेश यादव की काट के तौर पर अरूण यादव को तैयार किया जा रहा है।कांग्रेस के नए सत्ता ओर शक्ति के शीर्ष केंद्र 12 तुगलक लेन (कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का सरकरी आवास) के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि सत्ता के गुणदोष में लगभग पारंगत हो चुके राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव को तराशना आरंभ कर दिया है।सूत्रों की मानें तो महज दो साल का ही संसदीय अनुभव रखने वाले खण्डवा के सांसद अरूण को केंद्र मंें खेल और युवा मामलों में राज्यमंत्री बनाया गया था, इसके कुछ दिनों बाद ही उनका विभाग बदलकर उन्हें भारी उद्योग विभाग में राज्य मंत्री बना दिया गया है।अगले साल होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों की आपाधापी की वजह से अरूण यादव को शायद अन्य कामों में समय न मिल पाए, संभवत: इसी लिए उनका विभाग बदला गया है। सूत्रों ने यह भी बताया कि राहुल गांधी की सलाह पर ही अरूण यादव को बिहार की मुजफ्फरपुर और मध्य प्रदेश की गोहद विधानसभा में चुनाव प्रचार के लिए भेजा गया है।सूत्रों ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में अरूण यादव के परफारमेंस को देखने के बाद ही कांग्रेस के युवराज राहल गांधी द्वारा अरूण यादव की अगली भूमिका तय की जाएगी। वैसे कांग्रेस के अंदर युवा यदुवंशी अरूण यादव अगर कांग्रेस में अपनी पेठ जमाने में कामयाब हो गए तो आने वाले दिनों में राहुल गांधी द्वारा अरूण को लालू, शरद और मुलायम सिंह यादव की काट के तौर पर पेश कर दिया जाएगा
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मंगलवार, 8 सितंबर 2009

देश की आन पर फिर लग गई सेंध

देश की आन पर फिर लग गई सेंध

(लिमटी खरे)

देश की आन बान और शान का प्रतीक है, रायसीना हिल्स पर स्थित प्रथम नागरिक का सरकारी आवास यानी महामहिम राष्ट्रपति का निवास। यद्यपि इसका निर्माण देश पर राज करने वाले ब्रितानी शासकों ने करवाया था, अत: इसे दासता का प्रतीक भी माना जा सकता है, किन्तु आजाद भारत में राजनीति करने वाले नुमाईंदों ने इसे देश के पहले नागरिक के सरकारी आवास के तौर पर स्वीकार कर लिया है, तो इसे देश की आन बान और शान का प्रतीक माना जाने लगा है।
पिछले दिनों महामहिम के आवास की जिम से तीन जोड़ी डंबल और कम्पयूटर का चोरी होना आश्चर्यजनक और शर्मनाक ही माना जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आजादी के उपरांत कड़ी सुरक्षा के बीच महामहिम का आवास सदा से ही महफूज रहा है। जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां से कंप्यूटर और डंबल जैसी चीजें चोरी होना अपने आप में एक करिश्मे से कम नहीं है।
हमारे देश की लचर आंतरिक सुरक्षा का नमूना था, लाल किले, संसद और मुंबई में हुआ आतंकी हमला। देश में अंदर ही अंदर घुन की तरह आतंकवादी, अलगाववादी अपना काम कर गुजर रहे हैं, सरकारें आतीं हैं, चली जाती हैं, बयान बाजी होती है, पर नतीजा सदा ही सिफर ही होता है।
महामहिम राष्ट्रपति के आवास से छ: नग डंबल और एक संगणक (कम्पयूटर) की चोरी महज चालीस पचास हजार रूपए के नुकसान के तौर पर नहीं देखी जा सकती है। यह मामला काफी संगीन है। संगीनों के साए में 62 सालों से रहने वाले महामहिम के आवास से सामान की चोरी निश्चित तौर पर आंखों से काजल चुरा लेने की तरह ही माना जा सकता है।
पता नहीं उस कम्पयूटर में क्या गोपनीय तथ्य रहे होंगेर्षोर्षो यह तो तय हो गया है कि यह एक गंभीर मसला है। वैसे भी महामहिम का आवास तीन सुरक्षा घेरों में है। पहले घेरे में अर्धसैनिक बल, दूसरे में आईटीडीपी के कमांडो और दिल्ली पुलिस तथा तीसरे में कमांडो के साथ दिल्ली पुलिस के जवान सुरक्षा में लगे हैं।
चौबीसों घंटे छावनी बने रहने वाले महामहिम राष्ट्रपति के आवास में तीन पालियों में सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। अमूमन एक पाली में 225 जवान सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं। इतना ही नहीं प्रवेश द्वार पर अर्धसैनिक बल के जवान अत्याधुनिक हथियारों के साथ लैस होते हैं। इसके बावजूद इस तरह की घटना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं मानी जा सकती है।
महामहिम राष्ट्रपति के आवास में आम जनता के लिए 17, 31 और 35 नंबर के द्वार का इस्तेमाल किया जाता है। मजे की बात तो यह है कि आम लोगों के प्रवेश के लिए प्रवेश पत्र बनाया जाता है और कड़ी सुरक्षा के उपरांत ही महामहिम राष्ट्रपति के आवास में कोई आमद दे सकता है। यह वारदात गेट नंबर 17 के पास बने जिम में हुई है।
इसके अलावा फिरोजशाह रोड़ स्थित जनता दल यूनाईटेड के राज्य सभा के सांसद ऐजाज अली के सरकारी आवास में भी चोरी की घटना प्रकाश में आई है। इस आवास में मरम्मत का काम चल रहा है, यहां से भी बाथरूम से मंहगे फव्वारे और वाशबेसिन चोरी हो गए हैं। जनता यह जानकर आश्चर्य करेगी कि जनता के नुमाईंदे इस कदर विलासिता के सामान का उपभोग करते है, जिनकी कीमत उनकी पूरी माह की खुराक से भी कई गुना अधिक है।
संसद पर हुए हमले से लेकर मुंबई में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हमारे लिए सबक से कम नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि हम इन गंभीर हादसों से सीख लेने के बजाए नए हादसों को जन्म लेने के लिए उपजाउ माहौल तैयार करते हैं।
महामहिम आवास में हुई चोरी के मामले में यह भी संभव है कि रसूख के चलते साख बचाने की गरज से महामहिम आवास इस चोरी की घटना का खण्डन कर दे या फिर चोरी गए सामान की बरामदगी की बात कह दी जाए। कुल मिलाकर हाई सिक्यूरिटी जोन में घटी इस घटना में लीपापोती की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। मामला रफा दफा करना वैसे तो एक सामान्य बात है, किन्तु यह निंदनीय और शर्मनाक अवश्य है।
खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो महामहिम राष्ट्रपति के आवास में हुई चोरी में किसी कर्मचारी का ही हाथ है। अगर वाकई एसा है तो घर का भेदी ही लंका ढहाता है। महामहिम के आवास मेंं कर्मचारियों की लंबी चोडी फौज के बीच जयचंद को ढूंढना बहुत दुष्कर कार्य होगा।
देश के पहले नागरिक के घर पर हुई चोरी की इस घटना से जनता जनार्दन के मानस पटल पर उभर रहे सवालों के जवाब आज भी निरूत्तरित ही हैं। सरकारी तंत्र को चाहिए कि छोटी छोटी बात पर सामने आकर सफाई देने के अलावा इस मामले में भी वह आगे आए और सच्चाई को बिना लाग लपेट जनता के सामने रखे, क्योंकि मामला किसी एसे गैरे के घर चोरी का नहीं, वरन देश के पहले नागरिक के घर में हुई चोरी का है।

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नए क्लेवर में उभरकर आ रहा है ``सिमी``

0 सिमी ने उतार फेंका पुराना चोला

0 अब राजस्थान से संचालित हो रहा आपरेशन

0 लालच के चलते काश्मीर में अब हिन्दू भी आतंकवादी संगठनों में!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। हिन्दुस्तान में आतंक बरपाने के लिए जिम्मेदार प्रतिबंधात्मक संगठनों ने अब नई रणनीति के तहत अपने नाम और ठिकानों को बदलना आरंभ कर दिया है। ``लश्कर ए तैयबा`` की तर्ज पर अब सटूडेंट इसलामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) ने भी सरकार की आंख में धूल झोंकने की गरज से अपना नाम और ठिकाना बदल लिया है।
गृह मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि खुफिया विभाग ने सरकार को इस संबंध में अपनी एक खुफिया रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें खुलासा किया गया है कि सिमी ने अपना नाम बदलकर ``वहादत ए इस्लामी`` कर लिया है। इतना ही नहीं इस नए संगठन का मुख्यालय राजस्थान में बनाए जाने की खबर भी है।
सूत्रों ने आगे कहा कि प्रतिबंधात्मक संगठनों की मुश्कें कसने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा की जा रही सख्ती के चलते यह कदम उठाया गया है। गौरतलब होगा कि ``लश्कर ए तैयबा`` ने जिस तरह पूर्व में अपना नाम बदलकर ``जमात उद दावा`` कर लिया था, उसी तर्ज पर अब सिमी ने केंचुली उतारकर नया चोला पहना है।
सूत्रों की मानें तो वहादत ए इस्लामी वैसे तो सामाजिक कार्य करने वाला एक गैर सरकरी संगठन है, किन्तु पर्दे के पीछे का इसका स्वरूप काफी भयानक है। कहा जा रहा है कि हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम करने वाला दिल्ली ब्लास्ट का मास्टर माईंड और सिमी का फायनेंसर तौकीर पर्दे के पीछे से इसके लिए संसाधन मुहैया करवा रहा है।
बताया जाता है कि राजस्थान में अपना बेस बनाने के पीछे यह तर्क भी दिया जा रहा है कि वहां से सरहद पार पाकिस्तान में बैठे दहशतगर्द आकाओं से आसानी से संपर्क किया जा सकता है। चर्चा तो यहां तक भी है कि इस संगठन ने पिछले दिनों दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जमकर बैठकें भी की हैं।
सूत्रों ने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश सूबे के आजमगढ़ का रहने वाला जमाइल इस्लाम और बिहार में दरभंगा के अब्दुल कासिम ने काडर को बढाने की जिम्मेदारी अपने कांधों पर ली है। वैसे भी जमात उद दावा के मुखिया हफिज सईद के बारे में चीन की राय के बाद भारत सरकार असमंजस में ही है। बताते हैं कि चीन हाफिज सईद को अतंकवादी मानने को तैयार ही नहीं है।
उधर भरोसेमंद सूत्रों का यह भी कहना है कि जम्मू काश्मीर में लश्कर ए तैयबा, हरकत उल अंसार, अल बद्र, हिजबुल मुजाहिदीन आदि संगठनों में अब भारी तादाद में हिन्दू भी शामिल होने लगे हैं। इनमें से कुछ हिन्दू आतंकवादियों को तो ``ए`` श्रेणी में रखा गया है, जिन पर लाखों के इनाम हैं।पुलिस के आंकडों से उभरकर आई बात से यह तथ्य साफ हो जाता है कि 1996 से 17 हिन्दू आतंकी सक्रिय रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पैसे के लालच के चलते 16 से 25 साल के युवा इन आतंकी संगठनों के लिए काम कर रहे हैं। वैसे सुरक्षा बलों के साथ हुई मुटभेड में अब तक चार हिन्दू आतंकवादी मारे गए हैं। कुलदीप कुमार, उत्तम कुमार, बिपिन कुमार एवं बिट्टू कुमार नाम के ये आतंकी विभिन्न मुटभेड में मार गिराए गए हैं।

महिला आरक्षण में सोनिया पिछड़ीं, युवाओं में राहुल ने मारी बाजी

लिमटी की लालटेन

महिला आरक्षण में सोनिया पिछड़ीं, युवाओं में राहुल ने मारी बाजी

केंद्र सरकार के कार्यकाल के सौ दिन पूरे हो गए, इन सौ दिनी एजेंडे में महिला आरक्षण बिल को भी स्थान दिया गया था। महिला आरक्षण बिल न तो सरकार में न ही सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में परवान चढ़ सका। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी महिला होने के बावजूद भी इसे दोनों ही जगह लागू नहीं करवा सकीं। उधर कांग्रेस के युवराज एवं कांग्रेसियों की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने अपने ``युवाओं`` के एजेंडे को लागू करवाने में अघोषित तौर पर सफलता हासिल करवा ही ली। डॉ.एम.एम.सिंह के मंत्रीमण्डल में युवाओं की संख्या इस बार निश्चित तौर पर बढ़ी है। इतना ही नहीं राहुल ने हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में 20 फीसदी युवाओं को टिकिट देने की मांग कर एक बार फिर ताल ठोंक दी है। कांग्रेस मेें किसी की इतनी मजाल नहीं कि युवराज की बात का विरोध कर सके, सो जाहिर है इन तीनों राज्यों में बीस फीसदी युवा चेहरों को टिकिट मिलना तय ही है।

लेटर बम की जद में भाजपा

अनुशासित पार्टी होने का लबादा ओढने वाली भारतीय जनता पार्टी में अब लेटर बम की धूम मच गई है। एक के बाद एक पत्रों से भाजपा में अंदरूनी सैलाब उमडकर बाहर छलकने लगा है। हाल ही में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूरी ने हाईकमान को एक पत्र लिखकर कुछ एसे प्रश्न पूछ लिए हैं, जिनके चलते पार्टी हाईकमान सकते में है। बताया जाता है कि इस पत्र में कुछ इस तरह के सवाल पूछे गए हैं, जिनके जवाब देने से पार्टी के मुखिया सदा ही बचते आए हैं। देखा जाए तो समूचे देश में हुए आम चुनावों में भाजपा औंधे मुंंह गिरी है, फिर सिर्फ उत्तराखण्ड में ही पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन को अपने एजेंडे में सर्वोपरि क्यों रखार्षोर्षो पार्टी के आला नेताओं ने पहले भी परोक्ष तौर पर पार्टी की हार के बाद जिम्मेदार नेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर नवाजे जाने पर अपनी तल्ख नारजगी व्यक्त की जा चुकी है। लगता है पार्टी सुप्रीामो राजनाथ सिंह के कार्यकाल के अंतिम दिनों में भी वे विवादित होने से नहीं बच पाएंगे।

. . . पर कानून क्या कहता है

दुनिया भर में मशहूर किपलिंग की जंगल बुक के हीरो ``मोगली`` की कर्मस्थली से होकर गुजरने वाला स्विर्णम चतुZभुज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में फंसे पेंच को दूर कराने की गरज से एमपी के पूर्व वन मंत्री एवं विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमण्डल लेकर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला। इस दौरान एक मजेदार वाक्या सामने आया। जयराम रमेश ने इस मामले में सूबे के पूर्व वन मंत्री हरवंश सिंह से पूछा कि आप भी वनमंत्री रहे है, अगर आपके सामने इस तरह की स्थिति आती तो आप क्या करतेर्षोर्षो ठाकुर हरवंश सिंह ने जवाब दिया कि जनता ने हमें चुना है, जनहित में जो हो वही किया जाना चाहिए और वे भी एसा ही करते। इतनी बात को प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य द्वारा विज्ञप्ति के माध्यम से उनके कार्यक्षेत्र वाले जिले में मीडिया में बंटवा दिया गया। इसके बाद की बात गोल कर दी गई। सूत्रों के अनुसार जयराम रमेश ने साफ तौर पर कहा कि जनता के प्रति जवाबदेही सबसे अहम मामला है, किन्तु इस मामले में कानून क्या कहता हैर्षोर्षो केंद्रीय वनमंत्री ने कानून के हिसाब से चलने की बात ही कही। पेशे से अधिवक्ता रहे सूबे के पूर्व वन मंत्री ठाकुर हरवंश सिंह इस मामले में अगर वन विभाग के कानून की धारा दो का उल्लेख कर देते तो शायद जयराम रमेश निरूत्तर हो जाते, वस्तुत: ऐसा हुआ नहीं।

हेलीकाप्टर से भयाक्रांत आंध्र के नेता

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुघZटना में हुई मौत से सूबे के नेताओं में चौपर (हेलीकाप्टर) को लेकर भय व्याप्त हो गया है। दरअसल आज से लगभग साढ़े सात साल पहले भी एक सूबे के एक वरिष्ठ नेता हेलीकाप्टर दुघZटना में असमय ही काल के गाल में समा गए थे। 3 मार्च 2002 को आंध्र के ही एक नेता और देश के पूर्व लोकसभाध्यक्ष जी.एम.बालयोगी भी हेलीकाप्टर दुघZटना में अल्लाह को प्यारे हो गए थे। उस दिन बालयोगी अपने एक अंगरक्षक के साथ सुबह पौने आठ बजे भीमवरम से रवाना हुए, कुछ ही मिनटों में उनके हेलीकाप्टर में तकनीकि खराबी आई और उनका चौपर हाई टेंशन बिजली की लाईन से टकरा गया था। हाल ही में मुख्यमंत्री रेड्डी के साथ भी चौपर दुघZटना हुई। संयोग से दोनों ही हेलीकाप्टर बेल कंपनी के थे। आने वाले समय में अगर आंध्र क्या समूचे देश के राजनेता अमरिका की मशहूर कंपनी बेल के हेलीकाप्टर में बैठने से परहेज करें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

परिसीमन ने उड़ाई भाजपा की नींद

महाराष्ट्र प्रदेश में आसन्न चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के नेताओं की नींद उडी हुई है। इसका कारण परिसीमन का जिन्न है। परिसीमन आयोग की सिफारिशें लागू होने के उपरांत सूबे में अब शहरी मतदाताओं की भूमिका एकाएक महत्वपूर्ण हो गई है। भाजपा शिवसेना गठबंधन के बारे में एनालिसिस करने वालों का कहना है कि लोकसभा के चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि इस गठबंधन का प्रभाव शहरों के बजाए ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही इस गठबंधन की नाक का बाल बने राज ठाकरे के रवैए ने नेताओं की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने बहुत पहले से ही शहरी मतदाताओं के महत्व को पहचान लिया था, और बिजली दरों में बढोत्तरी, रिलायंस इन्फ्रास्टक्चर और बेस्ट बस सर्विस के खिलाफ प्रदर्शन में महात्वपूर्ण भूमिका निभाकर एमएनएस ने एक तरह से शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कवायद भी कर ली है। मनसे, शिवसेना और भाजपा के त्रिकोण में अब मनसे का पडला ही भारी दिखने लगा है। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने दहाड कर कहा है कि सूबे में मुख्यमंत्री वे ही बनाएंगे। ठाकरे की इस दहाड के बाद भाजपा और शिवसेना की धडकने तेज होना स्वाभाविक ही है।

गुटबाजी से परेशान हैं सोनिया

सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की जड़ें अब देश भर में कमजोर हो चुकीं हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। आधी सदी से अधिक समय तक देश में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अब सूबों और केदं्र में गठबंधन की बैसाखी लेकर चलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अध्यक्ष के तौर पर नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू सोनिया गांधी दस साल से अधिक का समय पूरा कर चुकीं हैं, पर उनके अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस में जान नहीं फूंकी जा सकी है। इसका कारण कांग्रेस के अंदर वर्चस्व को लेकर पसरी गुटबाजी ही है। एक दूसरे की जड़ें काटने के चक्कर में सूबों के क्षत्रप चुनावों में कांग्रेस को ही कमजोर करने से नहीं चूक रहे हैं। एक समय था जब नेता कांग्रेस को जिताने के लिए कृत संकल्पित नजर आते थे, किन्तु आज नेता ``खुद`` तक सिमटकर रह गए हैं। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने राजमाता को मशविरा दिया है कि नेता तो गुटबाजी करने से बाज नहीं आने वाले सो अब सीधे कार्यकर्ताओं से ही अपील की जाए। बताते हैं कि दिग्गी राजा की सलाह पर अब कांग्रेस अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को पत्र लिखकर एकजुट हो तीन राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस का परचम फहराने की अपील की है। देखना यह है कि सोनिया की कार्यकर्ताओं से की गई अपील कितनी कारगर साबित होती है।

नजीर बन सकता है फैसला

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 13 अगस्त को एक याचिका दायर की गई थी, इस याचिका पर फैसला महज 13 दिनों के अंदर 26 अगस्त को ही दे दिया गया। उच्च न्यायालय के इतिहास में संभवत: पहला मौका होगा जबकि न्यायालय द्वारा इतनी जल्दी किसी प्रकरण का निष्पादन किया हो। 8218 क्रमांक से दायर इस याचिका को लखनादौन के एक अधिवक्ता मनीष केसरवानी ने दायर किया था। उच्च न्यायलय के त्वरित फैसले से वकील जगत भले ही नाखुश होगा किन्तु पक्षकार तो लड्डू बांट रहे होंगे। पक्षकारों का हित चाहने वाले कुछ वकीलों का मत है कि देश के सबसे बड़े न्यायालय सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में संज्ञान लेतेह हुए देश की हर अदालत को इस तरह से त्वरित न्याय दिलवाने की पहल करनी चाहिए। वैसे भी देश की अदालतों में न्यायधीशों की कमी के चलते मुकदमों की तादाद बहुत अधिक बढ़ चुकी है।

शिवराज को असमंजस में डाला ज्योतिरादित्य ने

चंबल के महाराजा एवं केद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान सेे जिला मुख्यालय विदिशा में स्थित उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित तकनीकि कालेज को साधन संपन्न बनाने की गुहार लगाई है। दरअसल विदिशा के सम्राट अशोक इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना 01 नवंबर 1960 में उनके पूर्वजों सिंधिया राजघराने ने की थी। युवा तुर्क ज्योतिरादित्य ने पोषण आहार अनुदान के अलावा करोड़ 15 लाख रूपयों की पूर्व वषोZं के घाटे को भरने का आग्रह भी किया है। राजनैतिक बियावान में ज्योतिरादित्य के पिता एवं पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री माधव राव सिंधिया के सहयोगी रहे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने भी शिवराज सिंह चौहान को इसी आशय का एक पत्र लिखकर सिंधिया घराने के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार कर दिया है। बताते है कि इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान असमंजस में हैं। दरअसल विदिशा उनका पुराना तो सुषमा स्वराज का वर्तमान में संसदीय क्षेत्र है। इस मामले में सुषमा स्वराज द्वारा अभी तक कोई मांग नहीं की है। एसी स्थिति में अगर शिवराज सिंह द्वारा कांग्रेस के नेताओं के अनुरोध को स्वीकार कर लिया जाता है तो पार्टी मंच पर उनकी किरकिरी हो सकती है।

चुनाव और सड़क निर्माण से चिंतित हैं वासनिक

केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक महाराष्ट्र में अगले माह होने वाले चुनावों के चलते काफी चिंता में हैं। दरअसल अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रस्तावित स्विर्णम चतुभुZज योजना के अंतर्गत बनने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश सीमा के सिवनी जिले के तत्कालीन कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 के एक आदेश के तहत इस मार्ग पर काम रोक दिया गया है। इस मार्ग में आगे उनका संसदीय क्षेत्र भी आता है। 21 अगस्त को सिवनी जिले मेें हुए एतिहासिक बंद के बाद एनएच 07 पर पड़ने वाले महाराष्ट्र के कुछ हिस्से सुलग गए हैं। वहां भी आंदोलन तेजी से फैलने लगा है। इसी बीच खवासा से नागपुर तक के सड़क निर्माण के टेडर कर दिए गए हैं। सूत्रों का कहना है कि वासनिक की चिंता इस बात की है कि लोगों के बीच अब यह मैसेज जाने लगा है कि यह सब कुछ दिखावा 13 अक्टूबर तक के लिए है, चुनाव निपटने के बाद सडक निर्माण का काम आरंभ हो सकेगा या नहीं इस बारे में कहा नहीं जा सकता है।

विदेशी सगा, देशी सौतेला

विदेश से आई बीमारी स्वाईन फ्लू को केंद्र सरकार ने अपना सगा पुत्र मानते हुए उसे हाथों हाथ लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा इससे निपटने करोड़ों रूपए खर्च कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर देशी बीमारी के बारे में सरकार की अनदेखी आश्चर्यजनक है। उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में मेनिंगोकाकल मेनिंजाईटिस (मस्तिष्क ज्वर) का आतंक फैला हुआ है। विशेषकर गोरखपुर जिला इसकी सबसे ज्यादा चपेट में है। गोरखपुर में इस साल अब तक 213 लोग इस बीमारी के चलते काल के गाल में समा चुके हैं। इसके साथ ही साथ उड़ीसा के कालाहांडी में डायरिया का प्रकोप जबर्दस्त है। कालाहांडी में महज एक पखवाड़े में ही 38 जानें गई हैं। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री प्रसन्न आचार्य इस बात को स्वीकार भी कर चुके हैं। सच ही है जब आम आदमी ही मेड इन इंडिया की सील के बजाए मेड इन यूएसए को महत्व देता है तो भला बीमारी के बारे में सरकार इससे कैसे चूक जाए। मेिक्सको से उपजी बीमारी को भारत सरकार हाथों हाथ लेगी ही, देशी बीमारी का क्या उससे तो नीम हकीम ही निपट लेंगे।

खून की दो बूंद ही आतीं हैं काम

मध्य प्रदेश में व्याप्त बिजली के संकट से निपटने के लिए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपनी कर्मभूमि राजगढ़ में बिजली के संकट को लेकर प्रदर्शन किया। दिग्गी राजा के साथ कांग्रेसियों की भीड़ ने जब अपने तेवर दिखाए तो पुलिस ने तबियत से लाठियां भांजी। कहा जाता है कि भीड़ में जब ``सार्वजनिक अभिनंदन`` होता है तब लाठी किसी का चेहरा नहीं देखती। हुआ यही, पुलिस की लाठियों से दिग्विजय सिंह घायल हो गए। राजा के सर पर चोट आई, तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया जाकर सर पर टांके लगवाए गए। उधर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आनन फानन राजगढ़ को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया। इतिहास गवाह है, आंदोलनों में जब भी किसी देशभक्त का खून माटी पर गिरा है, विजय पताका वहीं फहरी है। अब जनता के बीच यह सवाल अवश्य ही उठने लगा है कि अपने अपने क्षेत्रों की समस्याओं के लिए इस तरह के आंदोलन कर पुलिस की लाठियां खाने वाले नेताओं की प्रजाति कहां विलुप्त हो गई हैर्षोर्षो वर्तमान में दिखावे के लिए विपक्ष में बैठे नेता सत्ता पक्ष के साथ ``नूरा कुश्ती`` लड़ते ही नजर आ रहे हैं।

पुच्छल तारा

देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायायल द्वारा गठित की गई है केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी)। बताते हैं कि सीईसी का काम सुप्रीम कोर्ट में दखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए मौका मुआयना कर वास्तविक प्रतिवेदन सर्वोच्च न्यायालय को सौंपना है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नामक एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर भी सीईसी ने अपना प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। इस मामले में कांग्रेस का एक प्रतिनिधमण्डल केदं्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मिला, और वापस आकर उसने मीटिंग का ब्योरा दिया। कांग्रेस द्वारा जारी अधिकृत विज्ञप्ति में जयराम रमेश के हवाले से कहा गया है कि सीईसी के विशेष आमंत्रित सदस्य को पुन: स्थल निरीक्षण करने भेजा जाएगा। सवाल यह उठता है कि सीईसी जयराम रमेश के इशारे पर काम करने गठित की गई है, या फिर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन के लिए।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

भाजपा की अंदरूनी मारकाट से संघ भी आया आजिज

भारतीय जनता पार्टी और अनुशासन एक सिक्के के दो पहलू हुआ करते थे, किन्तु अब यह इतिहास की बात हो गई है। भाजपा में अनुशासनहीनता के इतने उदहारण सामने आ चुके हैं कि अब लगने लगा है कि देश की सबसे गैर अनुशासित पार्टी में शुमार हो चुका है भाजपा का। कल तक भाजपा का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी अब भाजपा को उसके ही हाल पर छोडने का मानस बनाने लगा है। हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस मसले पर संघ की लाईन साफ कर दी है। बकौल भागवत अब संघ द्वारा भाजपा के मांगने पर ही उसे मशविरा दिया जाएगा। भागवत ने कहा कि भाजपा के अंदर जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी भी तरह से अच्छा नहीं माना जा सकता है। संघ प्रमुख ने कहा कि अब संघ द्वारा भाजपा के मांगने पर ही सलाह दी जाएगी। सच ही है, भाजपा के अंदर मची घमासान में पडकर संघ भला क्यों अपनी मिट्टी खराब करे।

कैसे रहेंगे स्टेटस सिंबाल के बिना

राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स के लिए सुरक्षा कर्मियों का काफिला उनके स्टेटस सिंबाल से कम नहीं है। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने इस तरह के नेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा कम कर दी है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने एक आदेश जारी कर 30 अति विशिष्ट व्यक्तियों की एक्स स्तर की सुरक्षा वापिस ले ली है। साथ ही मायावती, लालू प्रसाद यादव, मुरली मनोहर जोशी, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, शिवराज पाटिल, जगमोहन जैसे जन जन के नेताओं की एनएसजी भी वापस लेने की सिफारिश की गई है। सवाल यह उठता है कि जन जन के नेताओं को अपनी ही जनता से खतरा कैसार्षोर्षो और बिना स्टेटस सिंबाल के ये राजनेता सांस ले सकेंगे इस बात में भी संशय ही है।

मोदी के आपरेशन ``सी एच`` को झटका

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के साथ ही साथ में काफी गहरी पैठ रखते हैं। मोदी नपे तुले कदमों से पार्टी सुप्रीमो के सिंहासन की ओर बढ़ रहे थे। चर्चा है कि मोदी को उम्मीद थी कि उनका अघोषित एवं परोक्ष तौर पर चलने वाला आपरेशन ``सीएच`` (आपरेशन भाजपा के चेयरमेन की कुर्सी पाना) इस साल के दिसंबर तक पूरा हो जाएगा। सूत्रों के अनुसार मोदी मान कर चल रहे थे कि वषाZंत तक वे भाजपा के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हो जाएंगे। उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर पर उभरे बाला साहेब आप्टे और सुषमा स्वराज इन दिनों चर्चाओं के बाहर हैं। मोदी की किस्मत का सितारा उतना बुलंद नहीं दिख रहा है। भाजपा के अंदर मचे घमासान ने उनके इस आपरेशन को झटका दे दिया है। लाल कृष्ण आड़वाणी और अरूण जेतली इस मामले में मोदी के साथ हैं। सीएम से सीएच बनने की मोदी की चाह लगता है इतनी जल्दी पूरी होने वाली नहीं है।

अपने ही जाल में उलझे कमल नाथ

अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की महात्वाकांक्षी परियोजना स्विर्णम चतुभुZज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले फोरलेन मार्ग को लेकर सियासत पूरी तरह गर्मा चुकी है। आरोप प्रत्यारोपों के दौर के बीच 21 अगस्त को सिवनी में एतिहासिक बंद के दरम्यान केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के गली गली मे पुतले जलाए। चूंकि कमल नाथ महाकोशल के सर्वमान्य नेता माने जाते हैं अत: महाकौशल के ही सिवनी जिले में कमल नाथ का इस कदर विरोध होने से उन्हें पीडा होना लाजिमी है। इसके बाद एक के बाद एक घटनाक्रमों को अंजाम दिया गया। 27 अगस्त को दिल्ली में जारी कमल नाथ के बयान ने भ्रम और बढा दिया है। बकौल कमल नाथ सारा भ्रम सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका के निर्णय के चलते पैदा हुआ है। सिवनी वासी अब यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर कौन सी जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल है और इस पर कब और कौन सा निर्णय दिया गया है। वस्तुत: इस मामले में अब तक न तो कोई याचिका ही प्रकाश में आई है और न ही निर्णय

हुड्डा ने प्रशस्त किए अक्टूबर में चुनाव के मार्ग

हरियाणा विधानसभा को भंग करने की मुख्यमंत्री भूपेदं्र सिंह हुड्डा की सिफारिश के बाद अब लगने लगा है कि अक्टूबर के पहले पखवाड़े तक हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव करवा लिए जाएंगे। सितम्बर से अक्टूबर के बीच त्योहारों की सीरिज के चलते माना जा रहा है कि अक्टूबर मध्य तक तीनों राज्यों में चुनाव करवा लिए जाएंगे। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस भी इसी फिराक में दिख रही है कि इन तीनों राज्यों मे ंवह अपना वर्चस्व कायम रख सके। वैसे भी तेजड़ियों (व्यापार एवं मंहगाई में तेजी की संभावना व्यक्त करने वाले) के अनुसार दीपावली के बाद मंहगाई का ग्राफ तेजी से उपर उठने की संभावना है। पहले से ही कमर तोड़ मंहगाई के चलते टूटी जनता की कमर और अधिक टूटने की उम्मीद है। इससे पहले ही कांग्रेस चाहती है कि तीन राज्यों के चुनावों को अंजाम दे दिया जाए।

सकते में हैं चापलूस

झारखण्ड मे ंमुख्यमंत्री परिवर्तन के बाद नए निजाम के तेवर देखकर चापलूस बहुत असमंजस में हैं, कल तक सीएम के दाएं बाएं रहकर उनके कान भरकर अपना उल्लू सीधा करने वालों को अब नए निजाम के दरबार में जगह नहीं मिल पा रही है। झारखण्ड के ब्यूरोक्रेट्स अपने सीएम के सामने पडकर उनसे डायरेक्ट आई कान्टेक्ट बनाने के प्रयास करते नजर आ रहे हैं। नए मुख्यमंत्री ने इन अधिकारियों को जमकर लताड़ना आरंभ कर दिया है। अधिकारियों को सीएम ने ताकीद कर दिया है कि वे उनके अधीनस्थों से मिलकर ही सारे कामों को अंजाम दें। इसके बाद भी अगर को उषा (उत्सुक्ता की शांति) रह जाए, तब ही वे सीएम के दरबार में हाजिरी दें। बार बार चेहरा दिखाने से कुछ भी हासिल नही होने वाला है। सीएम कागजों के बजाए वास्तव में काम को अंजाम देने की मंशा रख रहे हैं। अब बेचारे कामचोर और चापलूस अधिकारी सकते में हैं, कि वे आखिर दरबार में जगह बनाएं तो कैसे।

मिस्टर क्लीन बनने की तैयारी में बसपा

ताज कारीडोर, चंदा और मूर्तियों के विवाद में फंसी बहुजन समाज पार्टी अब अपनी इमेज सुधारने की कवायद करने वाली है। बताते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती को उनके शोहदों ने मशविरा दिया है कि सूबे में बसपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, अत: अब मायावती ने इमेज सुधारने की पहल करने का फैसला लिया है। आने वाले साल में बसपा का चेहरा अगर बदला बदला दिखे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बताते हैं कि बसपा ने एक साल का एजेंडा बना लिया है, जिसमें कानून व्यवस्था के साथ ही साथ विकास की योजनाओं और जनहित को सर्वोपरि रखने का मूल मंत्र बनाया गया है। लोकसभा के नतीजों से बसपा में भूचाल आ गया है, और बसपा के नीति निर्धारकों ने अपना नया एजेंडा बसपा सुप्रीमो के सामने रख दिया है। बसपा सुप्रीमो ने संबंधित महकमों को पाबंद कर दिया है कि निर्माणाधीन स्मारकों का काम शीघ्र ही पूरा कर लिया जाए एवं इस कार्यकाल में और स्मारकों की स्थापना न की जाए। देखना है कि बसपा के नीति निर्धारकों की यह पहल कितना रंग लाती है।

मराठा क्षत्रप ने बढाई दिग्गी राजा की मुसीबत

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पंवार ने कांग्रेस की नींद में खलल डाल दिया है। मराठा क्षत्रप शरद पवार ने साफ तौर पर कह दिया है कि उसे महाराष्ट्र सूबे की 288 में से 122 सीटें चाहिए। इससे पूर्व कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली महासचिव दिग्विजय सिंह ने कह दिया था कि जब विदेशी मूल का मुद्दा ही नहीं रहा तो राकांपा को अब कांग्रेस में मिल जाना चाहिए। सूत्र बताते हैं कि राजा दिग्विजय सिंह का यह मशविरा मराठा क्षत्रप को रास नहीं आया। मराठा क्षत्रप यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं कि उनके सूबे में कोई भी किसी तरह का हस्ताक्षेप करे, वह भी सूबे में उनकी पार्टी के कांग्रेस में विलय की सलाह देकर। मराठा क्षत्रप काफी तेश में दिखाई पड़ रहे हैं। अर्जुन सिंह के बाद कांग्रे्रस की राजनीति के अघोषित चाणक्य माने जाने वाले दिग्विजय िंसंह की चालों को समझकर मराठा क्षत्रप शरद पंवार ने अपना दांव खेल दिया है। गेंद अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पाले में है, देखना है वे इस मसले का क्या निकाल निकालतीं हैं।

पुच्छल तारा

फोरलेन सिवनी से होकर जाएगी अथवा नहीं। इसका जवाब अभी भी एक पेटी में बंद है, यह पेटी कहां है कोई नहीं जानता अगर पेटी मिल भी जाए तो इसकी चाबी कहां है इसे खोजना बहुत मुश्किल है। यह पोराणिक जादुई कथा नहीं वरन 21वीं सदी में सच्ची कथा है। जितने मुंह उतनी बातों की तर्ज पर चल रहा है सारा मामला। ठोस आधार अब तक मिला है तो वह है पूर्व जिला कलेक्टर पी.नरहरि का कूटनीति भरा एक पत्र जिसमें सिवनी से खवासा की ओर के मार्ग पर वृक्षों की कटाई पर रोक लगाई गई थी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि लखनादौन से सिवनी मार्ग की निर्माण एजेंसी के पेटी कांटेक्टर मीनाक्षी ने नरहरि को साध लिया था, किन्तु इसके बाद की निर्माण एजेंसी गुजराती मूल के सद्भाव द्वारा एसा कोई जतन नहीं किया जा सका। जिलाधिकारी के पास असीमित अधिकार होते हैं, सो ये एजेंसी हाथ पर हाथ धरे बैठे है। अगर यही एजेंसी जिलाधिकारी के उक्त आदेश को उच्च न्यायालय या आयुक्त राजस्व जबलपुर के सामने चुनौति दे दे तो मामला कुछ सेटिल होने की उम्मीद है। इस मामले में जिले की जनता उनका साथ देगी ही साथ ही साथ राजनेताओं द्वारा निर्माण एजेंसी का साथ दिया जाना मजबूरी होगी।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कांग्रेस द्वारा भाजपा का सरेआम दोहन

0 केंद्र सरकार का उपक्रम दे रहा राज्य सरकार को अलसेट

0 समूचे प्रदेश में बांट दिए करोड़ों के चेक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के एक उपक्रम द्वारा मध्य प्रदेश में संचालिए केंद्र सरकारक की महात्वाकांक्षी परियोजना प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में जमकर पलीता लगाया जा रहा है। इस कंपनी द्वारा सौ फीसदी काम को ही सबलेट कर पेटी कांटेक्टर्स को प्रदाय कर दिया गया है।प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय संचार मंत्रालय की एक सहयोगी कंपनी टेलीकम्यूनिकेशन कंसलटेंट इं लिमिटेड (टीसीआईएल) द्वारा मध्य प्रदेश में पीएमजीएसवाय के तहत लगभग आधे प्रदेश में अपना साम्राज्य कायम कर लिया है। बताया जाता है कि उक्त कंपनी द्वारा लगभग 5 जिलों में सड़क निर्माण का काम किया जा रहा है।राजधानी दिल्ली स्थित ग्रेटर कैलाश पार्ट वन के टीसीआईएल भवन स्थित इस कंपनी के मुख्यालय में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार इस सरकारी उपक्रम द्वारा मध्य प्रदेश में 2005 के उपरांत करोड़ों रूपयों के सड़क निर्माण के कार्यों के ठेके प्राप्त किए हैं।टीसीआईएल के सूत्रों का कहना है कि अचानक अस्तित्व में आई इस कंपनी को प्री क्वालिफिकेशन सार्टिफिकेट (पीक्यू) कैसे हासिल हो गया। सूत्रों के अनुसार चूंकि यह सरकार एक उपक्रम है अत: इस बारे में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ज्यादा खुर्दबीनी नहीं की गई है।सूत्रों ने यह भी बताया कि उक्त कंपनी द्वारा अर्जित किए गए सड़क निर्माण के ठेकों को सबलेट कर पेटी कांटेक्टर्स को दे दिया गया है। बताया जाता है कि कंपनी को दिया गया सौ फीसदी काम ही सबलेट पर निर्मित हो रहा है। सूत्रों ने बताया कि नियमानुसार 25 फीसदी से अधिक का काम सबलेट नहीं किया जा सकता है।बताया जाता है कि उक्त सरकारी उपक्रम द्वारा पूर्व में सड़क निर्माण जैसा कोई काम नहीं किया गया है, फिर इसे किस आधार पर इतनी व्यापक मात्रा में सड़कों के ठेके आंख मूंदकर प्रदाय कर दिए गए हैं। चर्चाएं तो यहां तक है कि इस कंपनी की पीक्यू भी फर्जी हो सकती है।मध्य प्रदेश में चल रही बयार के अनुसार उक्त कंपनी द्वारा जिन पेटी कांटेक्टर्स के माध्यम से सड़क निर्माण का काम कराया जा रहा है, वह भी घटिया गुवणत्ता का है। कंपनी के पास योग्य कंसलटेंट, अनुभवी तकनीकि जानकारी वाले इंजीनियर्स आदि तंत्र के अभाव में कंपनी द्वारा पेटी कांटेक्टर्स के कार्य की गुणवत्ता का आंकलन नहीं किया जा पा रहा है।इतना ही नहीं मध्य प्रदेश सरकार का संबंधित अमला भी इस घटिया गुणवत्ता वाले काम को आंख मूंदकर संपादित होने दे रहा है।