शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

सड़क किनारे खिले कमल में उगने लगे हैं कांटे!

सिवनी भी मध्य प्रदेश सूबे का ही एक अंग है शिवराज जी
जयराम रमेश की मध्य प्रदेश यात्रा पर चुप्पी साधी एमपी गर्वमंेट ने

फोरलेन मामले को लेकर बयान रूपी तलवारें भजती रही हैं तबियत से

अपने कौल पर ही कायम न रह सके शिवराज

सिवनी वासी बुलंद करें यह नारा कि अन्याय और अत्याचार सहना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है

(लिमटी खरे)
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में राजग सरकार की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भज योजना के अभिन्न अंग बन चुके उत्तर दक्षिण गलियारे का भविष्य क्या होगा यह कोई नहीं जानता। किसी को यह पता नहीं कि यह मार्ग मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर जाएगा भी या नहीं। कयास तरह तरह के लगाए जा रहे हैं कि यह सिवनी से होकर जा भी सकता है और नहीं भी, भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाडा जो कि सिवनी जिले की पश्चिमी सीमा से सटा हुआ है, से होकर भी जा सकता है यह मार्ग। शेरशाह सूरी के जमाने का है यह एतिहासिक महात्व का मार्ग जिसे पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात के नाम से जाना जाता था। देश के सबसे लंबे और भारी यातायात दबाव के व्यस्ततम मार्ग का एक बडा हिस्सा अब एनएचएआई द्वारा प्रस्तावित उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे में तब्दील किया जाना प्रस्तावित है, जो सिवनी जिले में लखनादौन तहसील से आरंभ होकर प्रदेश की सीमा खवासा तक जा रहा है।
अटल सरकार की इस महात्वाकाक्षी योजना के इस मार्ग के निर्माण का काम युद्ध स्तर पर जारी भी किया गया है। वर्ष 2008 में दिसंबर माह में सिवनी जिले में एक नाटकीय मोड के तहत तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि ने आदेश क्रमांक 3266/फोले/2008 दिनांक 18 दिसंबर 2008 को जारी कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय साधिकार समिति (सीईसी) के सदस्य सचिव के पत्र क्रमांक 1-26/सीईसी/एससी/2008  - पी 1 दिनांक 15 दिसंबर 2008 जिसे सीईसी ने मुख्य सचिव मध्य प्रदेश शासन को लिखा था के हवाले से काम रूकवा दिया था।

जिला कलेक्टर के उक्त पत्र में सीईसी ने नेशनल हाईवे नंबर सात के चोडीकरण कार्य (न कि उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा) में ग्राम मोहगांव से खवासा तक पेंच टाईगर रिजर्व से लगे वन क्षेत्र और गैर वन क्षेत्रों में की जारी वृक्षों की कटाई पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अगामी आदेश तक रोक लगाने का अनुरोध करना भी उल्लेखित किया गया है। जिला कलेक्टर सिवनी ने अपने उक्त आदेश में इस प्रत्याशा के साथ कि राज्य शासन द्वारा इस मामले में अभी निर्देश प्राप्त होना है, उन समस्त आदेशों को जो कलेक्टर कार्यालय सिवनी द्वारा इस संबंध में पूर्व में जारी किए गए थे, को स्थगित कर दिया था। इसके उपरांत क्या राज्य शासन द्वारा इस मामले में कोई निर्देश दिए हैं या फिर नहीं इस मामले में जिला प्रशासन सिवनी ने अपना मुंह सिल रखा है।

मजे की बात तो यह है कि कलेक्टर सिवनी का दिसंबर 2008 का यह आदेश जुलाई 2009 में प्रायोजित तरीके से सिवनी की फिजां में तैराया गया। दिसंबर 2008 से जुलाई 2009 तक यह आदेश कैसे दबा रह गया यह बात आज भी यक्ष प्रश्न की भांति ही खडी हुई है। जुलाई 2009 में यह आदेश क्यों सामने लाया गया, यह भी एक पहेली ही बना हुआ है। आश्चर्यजनक तथ्य तो यह उभरकर सामने आया है कि जिला कलेक्टर के 18 दिसंबर 2008 के इस आदेश की प्रतिलिपि मुख्य सचिव म.प्र.शासन, मुख्य वन संरक्षक सिवनी, प्रोजेक्ट डायरेक्टर एनएचएआई, सिवनी, संबंधित विभागों के साथ ही साथ जिला जनसंपर्क अधिकारी कार्यालय सिवनी को सभी स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशन के लिए प्रेषित किया गया था।

कागजी खाना पूरी में तो सारी बातें बिल्कुल करीने से कायदे वाली की गईं हैं, जिला प्रशासन के समाचारों के लिए पाबंद जिला जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी अथवा नहीं जारी की जाने वाली दिसंबर की यह महात्वपर्ण खबर अखबारों से कैसे चूक गई यह शोध का ही विषय बना हुआ है। जिले के हिमायती बनने का ठेका लिए हुए आलंबरदारों ने को भी इस मसले पर कोई भनक नहीं लगना अपने आप में आश्चर्यजनक ही माना जा सकता है।

बात बात पर जिले के विकास, जिले के साथ अन्याय का रोना पीटकर चीत्कार मचाने वाले विज्ञप्ति वीर कांग्रेस और भाजपा के सिपाहसलारों ने भी इस मामले में अपने आप को बरी ही रखा है। जिले का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब भी सिवनी के साथ अन्याय हुआ है, वह अन्याय जनता के चुने हुए नुमाईंदों के द्वारा जनता को भ्रम में रखने के कारण ही हुआ है। मामला चाहे ब्राडगेज का हो, संभागीय मुख्यालय, सिवनी संसदीय सीट के विलोपन का या कोई और हर मर्तबा चुने हुए जनसेवकों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए सिवनी की जनता की भावनाओं के साथ तबियत से खिलवाड ही किया है।

फोरलेन मसले पर भी कमोबेश यही कुछ होता दिखा। जैसे ही जनता के सामने हकीकत आई, भगवान शिव की नगरी सिवनी की भोली भाली, सहनशील जनता का रोद्र रूप सामने आया। जनता का क्रोध देखने लायक था। इस समूचे मसले पर सियासी तंदूर के अंदर आग धधकती प्रतीत हुई जिसको जैसी रोटी बनी सेंक डाली गई। जनता के सामने हकीकत आने लगी। भारत गणराज्य के भूतल परिवहन मंत्री और सिवनी के पडोसी छिंदवाडा जिले के संसद सदस्य कमल नाथ पर शक की सुई जा टिकी। 21 अगस्त 2009 को सिवनी बंद को एतिहासिक सफलता मिली, और तो और लोग पान गुटके तक को तरस गए। सिवनी में जगह जगह पर कमल नाथ की अर्थियां निकली उनके पुतले जलाए गए, सिवनी में कमल नाथ के नाम पर राजनीति कर उनका परचम उठाने वाले किसी भी कांग्रेस के नेता ने इस मामले में कमल नाथ का पक्ष रखना ही मुनासिब नहीं समझा। कारण स्पष्ट था कि सिवनी के नागरिकों की जनभावनाएं बुरी तरह आहत हो गईं थी, कोई भी नागरिकों को भुलावे में रखकर उनके रिसते घावों पर मरहम लगाने का साहस नहीं कर पा रहा था।

मामला बिगडते देख और अपने आप को कटघरे में खडा पाकर कमल नाथ तब रक्षात्मक मुद्रा में आए, जब उन्हें लगा कि उनके सिवनी स्थित अनुयायी उनको इस मामले में बचाने में अपनी अपनी भूमिकाएं निभाने से कन्नी काट रहे हैं। 18 अगस्त 2009 की तिथि वाली कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र कार्यालय की विज्ञप्ति ने भी कमल नाथ के इस मामले में संलिप्त होने पर मुहर लगा दी। यह विज्ञप्ति कैसे और क्यों अस्तित्व में आई ये तो भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ही जानंे, पर चुनावों के दौरान बार बार सिवनी एवं अन्य जिलों को गोद लेकर अपनी गोद को अनाथालय बनाने वाले कमल नाथ चाहते तो एक मर्तबा अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा से महज सत्तर किलोमीटर दूर स्थित सिवनी आकर अपना पक्ष साफ कर सिवनी वालों के रिसते घावों पर मरहम लगा सकते थे, वस्तुतः एसा हुआ नहीं।

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति के अनुसार भारत सरकार के उत्तर दक्षिण कारीडोर कार्यक्रम के तहत मध्य प्रदेश महाराष्ट्र सीमा तक लिए 56 किलोमीटर लंबी सडक को स्वीकृति 20 फरवरी 2004 को दी गई थी। गौरतलब होगा कि मई 2004 में जब मनमोहन सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बने उसके उपरांत ही कमल नाथ को भूतल परिवहन विभाग की जवाबदारी सौंपी गई थी। विज्ञप्ति में आगे कहा गया है कि राजमार्ग के इस भाग में 16 हेक्टेयर पेंच नेशनल पार्क और 56 हेक्टेयर वन भूमि पडती है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से इसकी अनुमति लेने के लिए कार्यवाही 09 सितंबर 2004 को आरंभ की गई। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पेंच नेशनल पार्क की जमीन को छोडकर शेष की अनुमति 9 मई 2006 को प्रदान कर दी गई।

गौरतलब है कि देश के भूतल परिवहन मंत्री के कार्यालय से जारी इस विज्ञप्ति में सिवनी से उत्तर दिशा में जबलपुर मार्ग पर बंजारी के पास के क्षेत्र की अनुमति का कोई जिकर ही नहीं किया जाना अपने आप में यह दर्शाता है भूतल परिवहन मंत्री की मंशा क्या है। बंजारी के पास वाले इलाके की अनुमति भी उस दौरान तक केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा नहीं दी गई थी। भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति के अनुसार अगस्त 2008 से लेकर 18 अगस्त 2009 तक केंद्रीय सशक्त समिति ने स्थल का मुआयना किया, सभी पक्षों को सुना और लगभग एक माह पहले (18 अगस्त 2009 से) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी अनुशंसाएं प्रस्तुत कर दीं।

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति के अनुसार ‘‘सूत्रों‘‘ के अनुसार इस समिति ने अपनी अनुशंसाओं में सिवनी नागपुर को बाहरी वाहनों के लिए स्थाई रूप से बंद करने की अनुशंसा की है और नरसिंहपुर छिंदवाडा मार्ग को वैकल्पिक मार्ग के रूप में सुझाव दिया है। ‘ ‘ सुधि पाठकगठ स्वयं ही फैसला करें कि भारत गणराज्य के जिम्मेदार भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति में कमल नाथ को भी ‘सूत्रों‘ का हवाला देना पडा रहा है।‘‘

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति के अनुसार सडक परिवहन मंत्रालय समिति की इस अनुशंसा से सहमत नहीं है और सुप्रीम कोर्ट में इस मंत्रालय का यह प्रयास रहेगा कि किसी भी हाल में सडक को बंद नहीं होने दिया जाएगा तथा पेंच नेशनल पार्क में पडने वाले आठ किलोमीटर को छोडकर शेष भाग में फोरलेन विकसित किया जाए। मजे की बात तो यह है कि सिवनी वासियों द्वारा कमल नाथ को लानत मलानत भेजने के बाद अस्तित्व में आई भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय कार्यालय की विज्ञप्ति के उपरांत आज तक कमल नाथ के मंत्रालय द्वारा इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट में क्या प्रयास किए गए हैं, इस बारे में एक साल का इतिहास पूरी तरह मौन ही है।

इस विज्ञप्ति की अंतिम लाईन सिगरेट की डब्बी और शराब की बोतल पर पर स्टार के साथ चेतावनी की तरह ही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस बारे में जो आदेश दिए जाएंगे उनका पालन करना सरकार की मजबूरी होगा। सारी नूरा कुश्ती देखकर हमें एक बार फिर यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कमल नाथ की मंशा इस मामले में कतई साफ नहीं है, साथ ही साथ वे एसे जादूगर हैं, कि सिवनी में बैठे जिले के कथित तौर पर ठेकेदारों द्वारा अगर कमल नाथ के ‘‘पे रोल‘‘ पर उनकी रणनीति के तहत कमल नाथ को बुरा भला कहकर कमल नाथ का ही हित साधा जा रहा हो तो कोई बडी बात नहीं।‘‘ अपने निहित स्वार्थों के लिए इन ठेकेदारों द्वारा अगर जिले को कमल नाथ के पास गिरवी रख दिया हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

इतनी राम कहानी हो जाने के बाद इस मामले में मध्य प्रदेश में सत्तारूढ भाजपा ने भी छलांग लगाई। कमल नाथ के उपर जब आरोप प्रत्यारोपों का सिलसिला आरंभ हुआ तब भाजपा हरकत में आई और भाजपा के आलंबरदारों ने इस मामले में अपनी जुबान खोलना आरंभ किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो सिवनी प्रवास के दौरान यह तक कहा था कि भले ही सूरज पश्चिम से उगने लगे पर यह मार्ग सिवनी होकर ही जाएगा। मुख्यमंत्री ने दिल्ली प्रवास के दौरान भी सिवनी वासियों के दर्द को वन एवं पर्यावरण मंत्री और भूतल परिवहन मंत्री के सामने रखा था।

इस मसले में कुछ रोचक तथ्य हैं जिन्हें सिवनी जिले की जनता के साथ ही साथ देशवासियों के सामने रखना हम अपना फर्ज समझते हैं। सिवनी से नागपुर मार्ग की लंबाई 125 किलोमीटर है अगर इसे छिंदवाडा होकर ले जाया जाता है तो इसकी लंबाई बढकर 198 किलोमीटर हो जाती है। इस तरह छिंदवाडा होकर जाने में 73 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी बनेगी। गौरतलब है कि एनएचएआई की महात्वाकांक्षी परियोजना का पहला सूत्र ही दूरी को कम करना है।

सिवनी से होकर अगर यह मार्ग गुजरता है तो इसमें पेंच, दक्षिण सिवनी और महाराष्ट्र के वनों से होकर महज 34 किलोमीटर का हिस्सा गुजरेगा, किन्तु छिंदवाडा होकर ले जाने में यह 51 किलोमीटर हो जाता है। कहा जा रहा है कि पेंच और कान्हा के कारीडोर से होकर गुजरने के कारण इसका निर्माण रोकने के प्रयास जारी हैं। वह गैर सरकारी संगठन क्या इस बात पर गौर फरमाएगा कि पेंच से सतपुडा टाईगर रिजर्व का भी अघोषित करीडोर है, जिससे होकर वर्तमान में प्रस्तावित नरसिंहपुर छिंदवाडा नागपुर नेशनल हाईवे गुजरना है। सिवनी के वर्तमान अस्तित्व वाले मार्ग में महज पंद्रह से बीस मीटर की ही सडक को चौडा करना होगा, जबकि छिंदवाडा नेशनल हाईवे में तो साठ मीटर चौडा करना प्रस्तावित है।

सिवनी के मार्ग मे महज 181 हेक्टेयर का वनक्षेत्र ही आ रहा है, जबकि छिंदवाडा से ले जाने में 306 हेक्टेयर का वन क्षेत्र इसमें आ सकता है। वर्तमान में रोके गए मार्ग में लगभग सोलह हजार झाड ही काटने होंगे, जबकि छिंदवाडा से होकर गुजारने में 33 हजार झाड काटने होंगे, जिससे पर्यावरण पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पडेगा इस बारे में न तो केंद्रीय वन मंत्री जयराम रमेश ही सोच रहे हैं और न ही भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ। अगर इसे छिंदवाडा से ले जाया जाता है तो एक अनुमान के अनुसार प्रतिदिन साठ लाख रूपए अर्थात एक माह में अठ्ठारह करोड रूपए तो एक साल में 220 करोड रूपए का अतिरिक्त तेल लगेगा।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि जब वन एवं पर्यावरण मंत्री हाल ही में मध्य प्रदेश की यात्रा पर आए तब न तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने, न ही विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह, और न ही परिसीमन के उपरांत समाप्त हुई सिवनी लोकसभा की अंतिम सांसद एवं जिला मुख्यालय सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, बरघाट विधायक कमल मस्कोले सहित लखनादौन विधायक श्रीमति नीता पटेरिया और सांसद बसोरी मसराम एवं के.डी देशमुख ने इस बारे में जयराम रमेश से चर्चा करना मुनासिब समझा। गौरतलब है कि एनएचएआई द्वारा निर्माणाधीन यह मार्ग सांसद बसोरी सिंह मसराम, के.डी.देशमुख सहित विधायक ठाकुर हरवंश सिंह, नीता पटेरिया, शशि ठाकुर और कमल मस्कोले के संसदीय और विधानसभा क्षेत्र से होकर गुजर रहा है।

चलो मान लिया जाए कि सिवनी के जनता के चुने हुए नुमाईंदों को सिवनी जिले की जनता के दुखदर्द से कोई सरोकर नहीं है, चार बार के विधायक ठाकुर हरवंश सिंह, दो शशि ठाकुर, कमल मस्कोले के आलवा परिसीमन में विलुप्त हुई सिवनी लोकसभा सीट की अंतिम सांसद तथा जिला मुख्यालय सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया को जनता के प्रति जवाबदारी का अहसास न हो, या वे जनता के दुखदर्द से ज्यादा अपने आकाओं के प्रति प्रतिबद्ध हों, पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी आप तो भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश के निजाम हैं आप राजा हैं, आपको सिवनी जिला आपकी हुकूमत वाले मध्य प्रदेश का एक पिछडा जिला है।

शिवराज सिंह जी आप पर जवाबदारी आहूत होती है कि आप अपनी रियाया में से सिवनी जिले के निवासियों के साथ होने वाले अन्याय को देखते जानते बूझते हुए उससे मुंह न मोडें। राजनैतिक तौर पर आपकी बाध्यताएं और प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं, पर इन प्राथमिकताओं में सिवनी जिले की जनता का दुख दर्द भी शामिल होना चाहिए। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर यही अन्याय शिवराज सिंह के विधानसभा क्षेत्र बुधनी की जनता के साथ हो रहा होता तो आप निश्चित तौर पर जमीन आसमान एक कर देते। शिवराज सिंह जी आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आप बुधनी या अपने पुराने संसदीय क्षेत्र विदिशा नहीं वरन समूचे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

आज हालात यह हैं कि इस सडक का निर्माण कराने वाली मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी और सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा अपना अपना बोरिया बिस्तर लगभग समेट लिया गया है। क्या भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के अंदर इतना माद्दा है कि वह सद्भाव से आधिकारिक तौर पर यह पूछें कि पेंच और रक्षित वन को छोडकर खवासा में पांच सौ मीटर के टुकडे का निर्माण उसके द्वारा अब तक क्यों नहीं करवाया गया? क्या यह पूछने की जहमत भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ उठा सकते हैं कि सीलादेही के आगे फोरलेन मार्ग पर जो ट्रक वे लेन बनाई गई हैं, वहां रेस्तरां एवं अन्य सुविधाएं जो ठेके की शर्तों में थीं, उनका निर्माण क्यों नहीं किया गया है? क्या एनएचएआई से कमल नाथ जवाब तलब करेंगे कि क्या वजह है कि जिला मुख्यालय सिवनी में बनने वाले एनएचएआई के बायपास को जानबूझकर इतने विलंब से क्यों बनाया जा रहा है?

पर्यावरण के गरम तवे पर राजनीति करने वाले वन मंत्री जयराम रमेश क्या इस निर्माण में लगी एजेंसियों (एनएचएआई और उसके ठेकेदारों) से यह पूछ सकते हैं कि इस मार्ग पर कितने प्रजाति वाले कितनी आयु के वृक्ष कब कब काटे गए और उनके स्थान पर इन कंपनियों ने किस प्रजाति के कितने पौधों को कब कब कहां लगाया गया, और लगे हैं तो आज क्या वे जीवित हैं? पेड काटने और लगाने की अवधि के बीच के अंतर में होने वाला पर्यावरण असंतुलन क्या उचित है? क्या यह पर्यावरण संतुलन बिगाडने मंे भारत गणराज्य की सरकार का एक प्रयास नहीं है?

इन सब का उत्तर या तो भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, या वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के पास है या फिर इस निर्माण को अंजाम देने वाली कंपनियों के पास। अफसोस तो तब होता है जब केंद्र में विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी द्वारा भी इस मामले में अपनी मौन सहमति दे दी जाती है। एक दूसरे को जमकर कोसने वाली कांग्रेस और भाजपा की नूरा कुश्ती तब उजागर हो जाती है जब एक दूसरे पर अन्याय करने के आरोप लगाने वाली केंद्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार और मध्य प्रदेश की भाजपा की शिवराज सरकार एक दूसरे के गले में बाहंे डाले नजर आते हैं।

मध्य प्रदेश के लोक कर्म विभाग के मंत्री नागेंद्र सिंह नागोद एक दिन धन देने के मामले मेें केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री की उदारता के लिए उनका भाटचारण करते हैं तो दूसरे ही दिन कमल नाथ द्वारा मध्य प्रदेश सरकार को सडक बनाने के लिए देश की सबसे उत्तम सरकार होने का प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। आखिर विरोध किसका और कौन कर रहा है। सब कुछ दिखावा ही है, लोग देख रहे हैं मदारी डमरू बजा रहा है, जनता और मतदाता मंत्रमुग्ध हैं, पर इस सबसे कुल मिलाकर मरण तो सिवनी जिले की जनता की ही होनी है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दुर्भाग्य सिवनी की नियति बनकर रह गया है। अब तो सिवनी वासियों को यह नारा बुलंद करना ही होगा कि ‘‘अत्याचार और अन्याय सहना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।
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बुधवार, 14 जुलाई 2010

उमा के नाम पर उबले भाजपाई

आखिर उमा से इतने भयाक्रांत क्यों हैं भाजपाई!
बाबू लाल गौर के इस्तीफे की पेशकश के पीछे क्या है राज

मध्य प्रदेश में भाजपा में मच चुका है घमासान

(लिमटी खरे)

कभी भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रांड नेत्री रहीं उमा भारती की घर वापसी की अटकलों ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई के आलंबरदारों की धडकनों को बढा दिया है। उमा भारती जिस तरह भाजपा के आला नेताओं के मुंह पर लगभग थूक कर बाहर गईं थीं, उस वक्त के तेवर देखकर लगता था कि उमा भारती की घर वापसी किसी भी कीमत पर संभव नहीं होगी। समय वह चीज है जो हर घाव भर देता है, कट्टर दुश्मनों को भी गले लगने पर मजबूर कर देता है, और सच्चे मित्रों को एक दूसरे के सामने तलवार लेकर खडा भी कर देता है।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारतीय जनता पार्टी ने उमा भारती के दम पर 2003 में कांग्रेस के राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साला सरकार को उखाड फंेका था। उमा भारती के तेवरों से सभी भली भांति परिचित थे। उमा भारती पहले केंद्र सरकार में मंत्री रह चुकीं हैं, सो उनकी राजनैतिक दक्षता, प्रशासनिक क्षमता आदि पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाने की स्थिति में नहीं था।

बतौर मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती का कार्यकाल बहुत सहज तो नहीं कहा जा सकता है, काफी मामलात में उनका कार्यकाल विवादित ही माना जाएगा। मुख्यमंत्री रहते हुए उनके गुस्से का शिकार हुए अनेक अफसरान ने बहुत जिल्लत बरदाश्त की है, दबी जुबान से आज भी उन अफसरान के बारे में जब तब चर्चा होती है तो निश्चित तौर पर वे अफसरान अपनी बेइज्जती पर खुद को ही शर्मसार महसूस करते हैं।

उमा भारती के खिलाफ कर्नाटक की अदालत की कार्यवाही के उपरांत उन्होंने मुख्यमंत्री पद तजा। इसके उपरांत जब उनके मन की नहीं हुई तो वे बैठक से ही पैदल यात्रा पर निकल पडीं। उस यात्रा के बाद से ही उमा भारती के राजनैतिक कद के ग्राफ ने ढलान पकड ली।

उमा भारती द्वारा बनाई गई भारतीय जनशक्ति पार्टी ने शैशव काल में ही दम तोड दिया। बडे जोर शोर से उन्होंने भाजपा के खिलाफ बिगुल फूंका फिर एक कदम आगे दो कदम पीछे की रणनीति के चलते वे अपने आप को तो आगे जाता महसूस करतीं रहीं वस्तुतः वे अपने स्थान से काफी पीछे आकर खडी हो गईं थीं। उमा भारती की लोकप्रियता में गिरावट का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जब मध्य प्रदेश में उनके बलबूते भाजपा ने सरकार बना ली हो, फिर उनकी अपनी ही भारतीय जनशक्ति पार्टी बिना खाता खोले ही लोकसभा और विधान सभा के परिदृश्य से बाहर हो गई। यहां तक कि उमा भारती खुद भी अपनी कर्मस्थली टीकमगढ से चुनाव नहीं जीत सकीं।

समझा जाता है कि उमा भारती का दिमाग समझे जाने वाले प्रहलाद सिंह पटेल ने उमा भारती के असंतुलित और बिना सोचे समझे किए जाने वाले प्रयासों के चलते उनका साथ छोड वापस भाजपा में अपने आप को स्थापित कर लिया। अलग थलग पडी उमा भारती ने भी भाजपा में वापसी के प्रयास आरंभ कर दिए। कल तक राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी को पानी पी पी कर कोसने वाली उमा भारती ने उन्ही आडवाणी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए भाजश को लोकसभा मैदान से न केवल बाहर किया वरन् उन्होंने भाजपा के पक्ष में चुनावी समा भी बांधा।

जब जब उमा भारती की भाजपा मे ंवापसी की बयार बहती है, उमा विरोधी सर उठाकर खडे हो जाते हैं। उमा भारती की घर वापसी का सबसे अधिक असर मध्य प्रदेश की भाजपाई राजनीति पर होने वाला है। जब उमा भारती भाजपा को कोस रहीं थीं तब उनके कलदार सिक्के (कटटर समर्थक) राजनैतिक फिजां को भांपकर उनसे दूरी बनाने में लगे हुए थे। उमा भारती के नब्बे फीसदी चेले चाटे और समर्थकों ने उनका दामन छोड नए आकाओं की गणेश परिक्रमा आरंभ कर दी थी।

इस सप्ताह जब उमा भारती की घर वापसी की बात सामने आई तब सुमित्रा महाजन, बाबू लाल गौर, कैलाश विजयवर्गीय, जयभान पवैया, सरताज सिंह आदि उमा भारती की घरवापसी के लिए आगे आ गए। बाकी सारे नामों पर तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ पर बाबू लाल गौर की पल्टी मारने की बात लोगों को हजम नहीं हो सकी। उमा भारती अपना ताज बाबू लाल गौर को सौंपकर गईं थीं, किन्तु बाद में गौर ने ही उमा भारती को आंखें दिखाना आरंभ कर दिया था। मुख्यमंत्री ने तटस्थ रहकर यही कहा कि उमा भारती का निर्णय संगठन को ही करना है, उन्हें तो प्रदेश का दायित्व सौंपा गया है, जिसका वे निर्वहन कर रहे हैं।

दरअसल राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी चाहते हैं कि उमा भारती की घर वापसी हो जाए। आडवाणी मण्डली को डर सता रहा है कि उनसे नेता प्रतिपक्ष का ताज छीनने वाली सुषमा स्वराज अगर जमकर बैटिंग करने लगीं तो आडवणी को रिटायरमेंट लेना ही अंतिम विकल्प बचेगा। आडवाणी मण्डली के मन में 7 रेसकोर्स (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) में बैठकर देश चलाने की इच्छाएं कुलाचें मार रहीं हैं। वे किसी भी कीमत पर आडवाणी के अलावा किसी और को राजग का पीएम इन वेटिंग पर काबिज नहीं देखना चाहते हैं।

आडवाणी मण्डली जानती है कि सुषमा स्वराज की काट सिर्फ और सिर्फ उमा भारती ही हो सकती हैं। इसके साथ ही साथ मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह, प्रभात झा, सुषमा स्वराज की जुगलबंदी अगर चल निकली तो फिर ये ही केंद्र स्तर पर अपने आप को बहुत ताकतवर कर लेंगे। संभवतः यही कारण है कि आडवाणी को उल जलूल बकने वाली उमा भारती को भाजपा में वापस लाने वे ही आडवाणी सबसे ज्यादा लालायित दिखाई दे रहे हैं। आडवाणी मण्डली फुटबाल के ग्राउंड में उमा भारती की बाल को बहुत करीने से अपने गोल पोस्ट से ढकेलते हुए सामने वाले गोल पोस्ट तक ले तो जाते हैं पर जैसे ही उमा भारती की घरवापसी अर्थात गोल मारने की बारी आती है, रेफरी सीटी बजाकर हाफ साईड का फाउल जतला देता है। जिससे आडवाणी मण्डली की कवायद धरी की धरी रह जाती है।

अब जैसे ही उमा भारती की घरवापसी के मार्ग प्रशस्त हुए, वैसे ही मध्य प्रदेश भाजपा में उफान आ गया है। उमा भारती के सक्सेसर मुख्यमंत्री रहे बाबू लाल गौर ने अपने त्यागपत्र की पेशकश कर सभी को चौंका दिया है। उमा भारती की घरवापसी की पैरवी भाजपा के कुछ मंत्रियों द्वारा जिस तरह की जा रही है, उसे देखकर पार्टी की खामोशी तो हैरानी वाली है, पर राज्य सरकार की मंत्रीमण्डल की बैठक में बाबू लाल गौर ने पार्टी मुख्यमंत्री से अपना त्यागपत्र देने की बात कहकर ठहरे हुए पानी में कंकर मारकर हलचल मचा दी है।

यह पहला मोका होगा जबकि केबनेट बैठक आहूत करने और आरंभ करने के उपरांत नौकरशाहों को उस बैठक से बाहर कर दिया गया हो। इसके बाद यह केबनेट की बैठक पार्टी के मंत्रियों की बैठक में तब्दील हो गई थी। इस केबनेट के बाद आफीशियल ब्रीफिंग भी टाल दी गई। जिससे लगने लगा है कि अंदर सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। इस बैठक के उपरांत जो खबरें छन छन कर बाहर आई उससे साफ हो गया है कि उमा भारती की घर वापसी के मामले में मंत्रियों में भी धडे बट चुके हैं। कुछ सख्त खिलाफ हैं तो कुछ चाहते हैं कि तत्काल उनकी वापसी हो, एक धडा ‘‘कोउ हो नृप हमें का हानी‘‘ की तर्ज पर तटस्थ बना हुआ है।

उमा भारती के बहाने मंत्रियों ने अपनी अपनी भडास तबियत से निकाली। कैलाश विजयवर्गीय ने तो मुख्यमंत्री पर ही निशाना साधते हुए कहा कि मंत्रियों के खिलाफ बडे बडे समाचार छप रहे हैं और मुख्यमंत्री की तारीफ में कशीदे गढे जा रहे हैं, इस तरह काम कर है मध्य प्रदेश का जनसंपर्क विभाग, जबकि विभाग की जवाबदारी सरकार के मंत्रियों की तरफदारी की खबरें छापने की भले ही न हो पर मंत्रियों के बयान के प्रचार प्रसार की तो है, पर एसा कुछ उपक्रम करता जनसंपर्क विभाग दिख ही नहीं रहा है। जब जनसंपर्क विभाग ही राजनीति में उतर आए तो फिर किसी को क्या कहना चाहिए।

बाबू लाल गौर तो इतने आहत थे कि उन्होंने साफ कहा कि इतने सालों के संसदीय अनुभव के बाद उन्हें संसदीय ज्ञान सिखाया जाएगा? गौर का शिवराज से प्रश्न था कि क्या वे सरकार के बंधुआ हैं? क्या उन्हें हर बात को सरकार से पूछकर ही बोलना होगा? मंत्रियों ने सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन को भी बडबोलेपन के लिए आडे हाथों लिया और कहा कि जब किसानों को बिना ब्याज पर ऋण के मामले में कोई निर्णय हुआ ही नहीं है तो फिर बिसेन मीडिया को इसकी जानकारी कैसे दे रहे हैं।

बहरहाल सभी जानते हैं कि अगर उमा भारती भाजपा में वापस आ गईं तो वे अपने उन समर्थकों जिन्होंने उनके गर्दिश के दिनों में उनका साथ छोडकर नए आकाओं की सरपरस्ती में जा टिके थे, को चुन चुनकर उनकी औकात दिखा सकतीं हैं। उमा भारती के स्वभाव, गुस्से और कार्यप्रणाली से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं। शार्ट टेम्पर्ड उमा भारती की घर वापसी को लेकर भाजपा में मचे घमासान से पार्टी की बहुत अच्छी छवि जनता के बीच नहीं जा रही है यह बात बिल्कुल सत्य है।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

अपनों से घिरे मनमोहन

सहयोगी दल बढा रहे कांग्रेस की मुश्किलें
सोनिया और मनमोहन की पेशानी पर छलक रहा पसीना

अंदर ही अंदर खदबदाने लगा है असंतोष

अपनों ने ही घेरा कांग्रेस को

राहुल बना सकते हैं यूपी से दूरी

मोंटेक को भी अब चुभने लगा है कमल

जयराम बने कांग्रेस की बडी मुश्किल

(लिमटी खरे)

कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में उसके सहयोगी दलों ने अब रंग दिखाना आरंभ कर दिया है। कल तक शांति के साथ अपने अपने आवरण में चुप्पी साधे बैठे घटक दलों ने टर्राना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस के अंदरखाते से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार शरद पवार, मायावती, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव आदि ने अब कांग्रेस पर दवाब बढा दिया है। वहीं कांग्रेस के अपने मंत्री भी कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की परेशानी बढाने का ही उपक्रम कर रहे हैं। भारत गणराज्य के वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह अपनी केबनेट के बडबोले मंत्रियों से बुरी तरह परेशान नजर आ रहे हैं, यह तो विपक्ष है जो बोथरी धार लेकर सरकार पर वार कर रहा है, वरना अब तक तो कबकी गिर चुकी होती मनमोहन सरकार।

प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की मुश्किल यह है कि कांग्रेस के कोटे से मंत्री बने सांसद ही आपस में बुरी तरह लड रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है तो कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायस्वाल से भी उनकी अनबन सडकों पर है। गृह मंत्री पी.चिदम्बरम उल जलूल बयानबाजी पर आमदा हैं, तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी हैं कि मानते ही नहीं। कमर तोड मंहगाई के बाद भी वे कहने से नहीं चूक रहे हैं कि अभी और मंहगाई के लिए तैयार रहें। जैसे तैसे मामला शांत होता है वैसे ही कोई न कोई मंत्री छुर्रा छोड ही देता है।

हाल ही में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मांेटेक सिंह अहलूवालिया और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तकरार को देखकर लगने लगा है कि अहलूवालिया को अब कमल चुभने लगा है। अपने अंदर मचे इस तूफान से कांग्रेस आलाकमान बुरी तरह आहत बताई जा रही हैं। कांग्रेस के कुशल रणनीतिकार भी इस मामले को सुलटाने में अपने आप को अक्षम ही महसूस कर रहे हैं। पार्टी फोरम के बाहर जब सार्वजनिक तौर पर कोई बयान जारी किया जाता है तब मान लेना चाहिए कि पानी नाक के उपर आने लगा है। मनमोहन सरकार के दो मंत्री हैं जो किसी को भी देखकर बाहें चढाने लगते हैं, इनमें पहली पायदान पर वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश तथा दूसरी पायदान पर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ हैं।

जयराम रमेश ने तो आधी केबनेट से बुराई मोल ले रखी है, अपने आप को वे रावण की संज्ञा तक देने से नहीं चूक रहे हैं। रही बात कमल नाथ की तो कमल नाथ ने जयराम रमेश के साथ ही साथ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से भी दो दो हाथ कर लिए हैं। सडक निर्माण के लिए सरकारी खजाना नहीं खोलने का रोना रोने वाले कमल नाथ ने नियम कायदों को ताक पर रखकर कम यातायात दवाब वाले नरसिंहपुर, छिंदवाडा, नागपुर मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करवाने में सफलता हासिल कर ली। यह इसलिए हुआ क्योंकि यह उनके संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाडा का हिस्सा है।

इसके साथ ही साथ उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा से लगे हुए सिवनी जिले के साथ उन्होंने तबियत से अन्याय किया है। बार बार सिवनी सहित अनेक जिलांे को गोद लेकर अपनी गोद को अनाथालय बनाने वाले कमल नाथ पर आरोप है कि उन्होने एनएचएआई के उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे को अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाडा से ले जाने के षणयंत्र के चलते सिवनी जिले में इसका काम जानबूझकर अवरूद्ध करवाया है।

इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पेंच और कान्हा कारीडोर के मध्य से होकर जा रहा है यह मार्ग। वास्तविकता यह है कि इस मार्ग का पुरातन महत्व भी है। इस मार्ग का निर्माण शेरशाह सूरी ने करवाया था। बताते हैं कि इस मार्ग का प्रयोग आदि शंकराचार्य ने चारों पीठ की स्थापना के वक्त भी किया था। कहते हैं कि जयराम रमेश ने पर्यावरण का अडंगा इस मार्ग में इसलिए लगाया है क्योंकि उन्हें बताया गया है कि यह मार्ग कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है।

वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि नरसिंहपुर छिंदवाडा नागपुर मार्ग में छिंदवाडा से सौंसर का हिस्सा पेंच और पचमढी नेशनल पार्क के कारीडोर से होकर गुजर रहा है। इस मामले में गैर सरकारी संगठन सहित जनप्रतिनिधि और झंडाबरदार खामोशी का लबादा ओढे हैं यह आश्चर्यजनक है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि कमल नाथ के इस तरह के कदम से कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ माना जाने वाला सिवनी जिला पिछले लगभग चार विधानसभा और लोकसभा चुनावों से भाजपा का सुरक्षित दुर्ग में तब्दील हो चुका है।

योजना आयोग के सूत्रों का कहना है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कमल नाथ को इसलिए नापा क्योंकि उन्हें बताया गया कि कमल नाथ छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र में कुछ एसा करने जा रहे हैं जो विश्व या एशिया के मानचित्र पर अलग दिखाई दे। वे चाहते हैं कि छिंदवाडा जिले को विश्व या एशिया का सबसे बडा नेशनल हाईवे का जंग्शन बनाया जाए। सूत्रों की मानें तो इसके लिए कमल नाथ योजना आयोग से मनमाना आवंटन चाह रहे हैं, जो योजना आयोग के लिए देना संभव नहीं है। संभवतः यही कारण है कि कमल नाथ और अहलूवालिया के बीच की रार सडकों पर आ गई है।

बहरहाल कांग्रेस के सामने एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई की स्थिति बन गई है। अंदर की खींचतान से जैसे तैसे कांग्रेस निजात पा भी ले पर जब घटक दलें कांग्रेस की कालर पकडकर हडकाने का प्रयास करते हैं तो कांग्रेस का जमीर जाग उठता है, पर सत्ता की मलाई चखते रहने के चक्कर में कांग्रेस घटक दलों के इस तरह के प्रसासों के बाद भी खामोशी और बेशरमी से मुस्कुराती हुई बाहर आकर मीडिया से मुखातिब होती है।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ, (कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पिछले दो माहों से कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की नींद उडी हुई है। सरकार बनाते वक्त राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार, समाजवादी के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू प्रसाद यादव से कांग्रेस ने जो ‘‘अघोषित वायदे‘‘ किए थे, उन्हें पूरा करने में अब कांग्रेस की जान पर बन आई है।

कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बचाने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाने वाली बसपा अब कांग्रेस से अपना पारितोषक चाह रही है। सूत्रों का कहना है कि यूपी की निजाम मायावती ने कांग्रेस अध्यक्ष को दो टूक शब्दों मेें कह दिया है कि उसे उत्तर प्रदेश के लिए विशेष आर्थिक पैकेज चाहिए साथ ही साथ आय से अधिक सम्पत्ति और ताज कारीडोर मामले से उन्हें क्लीन चिट दिलाई जाए। मायावती की सबसे अहम शर्त तो यह है कि राहुल गांधी यूपी की अपनी यात्रा को तत्काल प्रभाव से विराम दें। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष के सलाहकारों ने सोनिया गांधी को कहा है कि अगर मायावती की मांगे मान ली गईं तो भविष्य में मायावती की लगाम खीचना बहुत ही मुश्किल होगा।

उपर से भले ही सब कुछ सामान्य लग रहा हो पर अंदर ही अंदर खिचडी खदबदा ही रही है। राकापा और कांग्रेस पूरी तरह आमने सामने आ गई है। शरद पवार ने सोनिया के खिलाफ तलवारें पजाना आरंभ कर दिया है। पिछले दिनों भाजपा के महाराष्ट्र के विधायक देवेंद्र फडनवीस ने घुडदोड के शौकीन हसन अली की स्विस बैंक की एक सीडी पेश कर सभी को चौंका दिया था। सीडी में फडनवीस का दावा है कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल, महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम विलासराव देशमुख, तत्कालीन गृह मंत्री आर.आर.पाटिल से ‘‘भेंट‘‘ के बाद ही उनकी नियुक्ति देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बतौर पुलिस आयुक्त की गई थी।

पवार इसलिए भी खौफजदा हैं, क्योंकि प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व वाला वित्त मंत्रालय इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल में हुए ‘‘खेल‘‘ की जांच कर रहा है वह भी परत दर परत। आईपीएल की टीम के स्वामियों के तार देश के राजनेता और जनसेवकों से जुडने से मामला और भी गंभीर हो उठा है। उधर कांग्रेस के प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने तो शरद पवार पर सीधे ही हमला बोलकर सभी को चौंका दिया था।

कांग्रेस के प्रबंधकों के कहने पर कांग्रेस अध्यक्ष ने भले ही आग और पानी का संतुलन इस तरह बनाया हो कि पवार को नियंत्रित करने उन्होंने इसी सूबे से मंत्रीमण्डल में विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे, मुकुल वासनिक, प्रतीक पटेल, पृथ्वीराज चौव्हाण आदि को लिया हो, पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल को राज्यपाल बना दिया हो, पर पवार तो पवार ही हैं। राजनीति की बिसात पर उनका हाथ असानी से नहीं पकडा जा सकता है। जब भी कांग्रेस पवार की गिरेबान तक हाथ पहुंचाने की सोचती है, पवार भागकर शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के साथ मिलकर एक फोटो खिचवाकर अखबारों में छपवा देते हैं, बस फिर क्या कांग्रेस अपने बढते हाथ को मुट्ठी में तब्दील कर वापस जेब में रख लेती है।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

अंत्‍तोगत्‍वा चुनौति बन ही गया पर्यावरण

भयावह लगने लगी है आने वाले कल की तस्वीर

पर्यावरण को हर कीमत पर होगा बचाना

महज 20 साल का तेल और 100 साल का बचा है कोयला

प्राकृतिक संसाधनों का करना होगा दोहन

जनजागरूकता फैलाना सरकार की महती जवाबदारी

(लिमटी खरे)

दुनिया की आबदी जिस द्रुत गति से बढ रही है, उसे देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आने वाले समय की कल्पना मात्र से रोंगटे खडे हो रहे हैं। दुनिया के पास महज बीस साल का तेल और सौ साल तक उपयोग करने के लिए कोयले का भंडार बचा है, समय रहते अगर इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो हमारी आने वाली पीढियां आधुनिकता का लबादा तो ओढ सकेंगी पर वे जीवन का निर्वाह आदिकाल के संसाधनों में ही करने को मजबूर होंगी। पेट्रोलियम के भंडार के समाप्त होते ही वाहनों के पहिए थम जाएंगे। सुपर सोनिक विमान का अत्याधुनिक वर्जन तो इजाद कर लिया जाएगा पर उसे किससे उडाया जाए यह विकराल समस्या होगी। हवा में तैरने वाली कार या बाईक तो बन जाएंगी पर उन्हें चलाया किससे जाए यह सबसे बडी समस्या होगी। आलम यही होगा जिस तरह अस्सी के दशक की शुरूआत तक शहरों में लगने वाले मेले ठेले, प्रदर्शनी आदि में लोग खडी मोटर सायकल पर बैठकर फोटो खिचाया करते थे। कहने का तातपर्य तब लोगों की खरीदने की ताकत कम थी, पर आने समय में ताकत होगी पर किस चीज से उसे चलाया जाए यह सबसे बडी समस्या होगी।

तेल के मामले में ही अगर देखा जाए तो मध्य एशिया में विश्व भर का तकरीबन साठ फीसदी तेल भंडार है। एनजी वॉच गु्रप 2007 के प्रतिवेदन पर नजर डाली जाए तो यहां जो तेल शेष है वह आज की आबादी और साधनों के मुताबिक तीस वर्षों के लिए ही है, यह आबादी जैसे ही बढेगी तेल की खपत बढते ही भंडार तेजी से समाप्त होता जाएगा। भारत गणराज्य के परिदृश्य मंे अगर देखा जाए तो 2005 के मुकाबले आने वाले दस वर्षों बाद अर्थात 2020 में इसकी जरूरत तीन गुना बढ चुकेगी। वर्ष 2009 के आंकडों पर अगर गौर फरमाया जाए तो भारत में तेल की खपत 2 करोड, 72 लाख 22 हजार बेरल प्रतिदिन है। वर्ल्ड एनर्जी के 2007 के प्रतिवेदन में साफ कहा गया है कि इस हिसाब से अगर खपत का अनुमान लगाया जाए तो तेल महज बीस सालों के लिए ही शेष बचा है।

कोयले का भंडार भी कमोबेश यही इशारा कर रहा है। भारत की खुले आसमान तले (ओपन कास्ट) और जमीन के अंदर वाली (अंडर ग्राउंड) खदानों में आने वाले सौ सालों के लिए पर्याप्त कोयले का भंडार है। भारत का रिजर्व कोयला भण्डारण लगभग 197 बिलियन टन है। कोयले के भण्डारण में भारत का स्थान विश्व में चौथा है। वैश्विक परिदृश्य में अगर देखा जाए तो वर्ल्ड एनर्जी काउंसिल की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयले के दो तिहाई रिजर्व स्टाक का भण्डारण अमेरिका, चीन, रूस, और आस्ट्रेलिया में ही है। कोल ईंधन का प्रमुख इस्तेमाल बिजली का उत्पादन ही माना जाता है। चालीस फीसदी कोयला इसमें खर्च किया जाता है।

यूरेनियम के मसले पर अगर गौर फरमाया जाए तो विश्व भर में होने वाली यूरेनियम की खपत का आधा हिस्सा मुख्यतः कनाडा, कजाकिस्तान और आस्ट्रेलिया से ही आता है। आंकडों पर बारीक नजर डाली जाए तो पता चलता है कि 2007 में महज ढाई प्रतिशत बिजली नाभकीय उर्जा से प्राप्त हुई थी। वर्तमान में भारत गणराज्य में 17 नाभिकीय रिएक्टर चार हजार एक सौ बीस मेगावाट बिजली का उत्पादन करते हैं। कहते हैं कि रामसेतु के नीचे भी यूरेनियम का अथाह भण्डार छिपा हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि प्रकृति द्वारा अपने आंचल में छिपाई इस बेशकीमती संपदा के समाप्त होने के उपरांत क्या किया जाएगा? इसका जवाब यह है कि प्राकृतिक तौर तरीकों को ही हमें अंगीकार कर इसमें ही भविष्य तलाशना होगा, बजाए समाप्त होने वाले भण्डारों के! वैज्ञानिक इस दिशा मे ंप्रयासरत अवश्य हैं पर विश्व की आवाम इस दिशा में न तो संवेदनशील ही है और न ही उसे जागरूक किया जा रहा है।

हवा, पानी और सूर्य तीनों चीजें न कभी समाप्त होंगी और न ही विलुप्त, चाहे कितने भी प्रयास कर लिए जाएं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि हम इनके दोहन और सही उपयोग के बारे में सोचें और लोगों को जगरूक बनाएं। शीत ऋतु में आज भी भारत गणराज्य में निन्यानवे फीसदी इलाकों में नहाने के पानी को गरम करने के लिए बिजली, कोयला या लकडी का उपयोग किया जाता है। वेकल्पिक स्त्रोतों के बारे में लोगों का ध्यान नहीं है।

उर्जा का सबसे बडा स्त्रोत हमारा सूर्य है। इस दिशा में सोचना बहुत ही आवश्यक है। सौर उर्जा का सही दिशा में उपयोग कर हम तेल और कोयले के भण्डार को सालों साल सुरक्षित रख सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर भारत गणराज्य जो कि उष्णकटिबंदीय है यहां पांच हजार ट्रिलियन किलोवाट घंटा सूर्य के प्रकाश के एक प्रतिशत हिस्से को भी परिवर्तित कर सकें तो भारत की जनता को पूरे साल उर्जा की कमी महसूस ही नहीं होगी। तब अघोषित बिजली कटौती से लोगों को पूरी तरह निजात मिल सकती है। सौर उर्जा के मामले में अगर वैश्विक परिदृश्य देखा जाए तो विश्व में धरती की सात वर्ग मीटर सतह को सूर्य की 29 किलोवाट उर्जा हर समय मिलती ही रहती है। सूर्य प्रतिमिनिट 2 किलोवाट घंटा उर्जा प्रतिवर्गमीटर धरती को देताा है।

इसके बाद बारी आती है हवा की। हवा को बहने से कोई रोक नहीं सकता है, हवा का उपयोग सही दिशा में करने की महती आवश्यक्ता है आज के समय में। ग्लोबल विण्ड एनर्जी काउंसिल के अनुसार अगर हवा संबंधी नीतियों को सही तरीके से अपना लिया जाए तो इससे 2030 तक 29 फीसदी बिजली की आपूर्ति सिर्फ वायू के सही उपयोग से सुनिश्चित की जा सकती है। भारत में स्थापित पवन उर्जा सेक्टर की क्षमता 10 हजार 242 दशमलव 3 मेगावाट है। भारत में लगे इन संयंत्रों की क्षमता छः फीसदी है पर उत्पादन महज एक दशमलव छः फीसदी ही है। विश्व में भारत का स्थान इस मामले में पांचवां है।

कल कल बहते जल स्त्रोतों और बारिश के पानी को अगर सही दिशा में उपयोग कर लिया जाए तो इस समस्या से काफी हद तक निजात पाई जा सकती है। भारत में हाईड्रो आधारित प्लांटस के लिए काफी उपजाउ माहौल है। भारत सरकार ने इस हेतु अलग से मंत्रालय भी बनाया है, पर नतीजा ढाक के तीन पात ही है। एशिया में पहली मर्तबा दार्जलिंग और शिमला में हाईड्रो पावर प्लांट की स्थापना की गई थी। वर्ष 2008 तक भारत गणराज्य में इंस्टाल क्षमता 36 हजार 877 दशमलव सात छः थी। वहीं दूसरी ओर अगर सारे देशों में बहने वाले पानी का दोहन किया जाए तो हाईड्रोपावर प्लांट हर साल सोलह हजार पांच सौ टेरावॉट उर्जा का उत्पादन करने में सक्षम होंगे। विश्व में चीन ने इसका सबसे अधिक और अच्छा दोहन का उदहारण प्रस्तुत किया जा रहा है, जहां हर साल पानी से दो हजार 474 टेरावाट उर्जा उत्पादन किया जा रहा है।

इन आंकडों पर अगर बारीकी से गौर फरमाया जाए तो निश्चित तौर पर स्थिति आने वाले समय में बहुत भयावह हो सकती है। अभी समय है, इस संकट को जल्द ही अलविदा कहने के लिए यह माकूल समय है। विश्व भर के देश सर जोडकर इस समस्या के बारे में सोचें। विश्व में सोचा जाए अथवा नहीं पर भारत गणराज्य को तो इस मामले में आज से ही आत्मनिर्भर होने के प्रयास आरंभ करना ही होगा, वरना आने वाली पीढियां जो संकट भोगेंगी और इतिहास सुनहरा इतिहास भी उनके सामने होगा, किन्तु उनके हाथों में अंधकारमय भविष्य ही होगा, उन परिस्थियों में वे हमें याद तो करेेंगी पर बहुत अच्छे तरीके और सम्मान के साथ तो कतई नहीं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हमें स्वार्थी समझा जाएगा, हमने अपने जीवनकाल में तो सुख भोग लिए किन्तु आने वाली पीढियों के लिए दुश्वारियां ही पैदा करते गए. . .।

भूख से मौत की नई परिभाषा

















सडक पर तोडा दम मतलब भूख से मौत

सुको की समिति ने दी अपनी सिफारिश

शहरी बेघरों का सर्वे करना होगा छः माह के अंदर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 12 जुलाई। भारत गणराज्य की सर्वोच्च अदालत से अपील की गई है कि भुखमरी सिद्ध होने पर कठोर सजा और मृतक के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा सुनिश्चित किया जाए। अगर दुर्घटना से इतर कोई मौत सडक पर होती है तो उसे भूख से हुई मौत ही माना जाए। यह सिद्ध होने पर कि उसकी मृत्यु दुर्घटना में नहीं हुई है, तो उसे भुखमरी की मौत ही माना जाएगा। ये सारी बातें खाद्य सुरक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति के प्रतिवेदन के उपरांत प्रकाश में आई हैं।

खाद्य सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई समिति के आयुक्त डॉ.एन.सी.सक्सेना और विशेष आयुक्त हर्ष मंदर ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि भारत गणराज्य की सर्वोच्च अदालत भारत के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को निर्देश दे कि यदि कोई व्यक्ति सडक पर मरता है और यह साबित हो जाता है कि उसकी मौत दुर्घटना या किसी बीमारी के चलते नहीं हुई है तो उसकी मौत को भूख से हुई मौत ही माना जाए।

इस तरह की मौत होने पर मौत का कारण सुनिश्चित करने हेतु सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत दण्डाधिकारी से जांच,मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन से उसकी मौखिक आटोप्सी, सक्षम चिकित्सक से उसका शव परीक्षण आदि आवश्यकतौर पर करवाया जाए। समिति ने सिफारिश की है कि अगर मौत का कारण भूख आता है तो इसके लिए सख्त दण्डात्मक कार्यवाही का प्रावधान किया जाए, और परिजनों को पर्याप्त मुआवजा भी प्रदान किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित इस समिति ने यह प्रावधान किया है कि सर्वोच्च न्यायालय राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को यह स्पष्ट निर्देश दे कि वे अपने अपने सूबों में शहरी बेघरों की पहचान इस साल अक्टूबर माह तक सुनिश्चित करे और उनकी वास्तविक संख्या के बारे में न्यायालय को आवगत करवाए। इस प्रतिवेदन पर केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र लिखकर उनका जवाब मांगा है।

घर की मुर्गी दाल बराबर, हीरामन को धूल चटाई पाल ने

ये है दिल्ली मेरी जान
 


(लिमटी खरे)


हीरामन को हरा बाजी मार ही ले गया पाल।
पुरानी कहावतें और मुहावरे यूं ही नहीं बने थे, उनके पीछे निहितार्थ को समझना होगा। न जाने कब से किस काल से लोग उक्तियों, कहावतों, मुहावरों मंे ही किसी कहानी का मर्म बता दिया करते थे। हाल हाल ही में इस तरह की बात चरितार्थ होती दिख रही है। हमारे देश में गली मोहल्ला, शहर, गांव, कस्बा, मजरा, टोला कहीं भी आपको एक चटाई बिछाए कुछ लिफाफों के साथ एक पिंजरे में ‘‘हीरामन‘‘ तोते के साथ तिलकधारी मिल जाएगा। वह तिलकधारी अपने हीरामन के माध्यम से आपका भाग्य बताता है, वह भी एक दो पांच और दस रूपए में। सालों साल यूं कहें कि सदियों से हीरामन की पुश्तें लोगों के भाग्य को उजागर करती आ रही हैं, भारत गणराज्य के लोग इसे, पोंगा पण्डित, रूढीवादी, लुटेरा न जाने क्या क्या उपमाएं देने से नहीं चूकते आए हैं। इसका खासा मजाक भी बना है राकेश रोशन जया प्रदा अभिनीत चलचित्र ‘‘कामचोर‘‘ में इसी तोते को मजाक बनाते हुए एक गाना भी फिल्माया गया था। अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। देश की मीडिया बिरादरी एक बदसूरत से पाल नामक आक्टोपस के द्वारा यह काम किए जाने पर उसे हाथों हाथ ले रही है, उसे आक्टोपस बाबा का नाम दिया जा रहा है, उसे महिमा मण्डित किया जा रहा है। यहां तक कि देश की सेलीब्रिटी अमिताभ बच्चन, अभिषेक, लारा दत्ता, फरहा खान आदि न जाने कौन कौन है जो आक्टोपस बाबा को सलाम भेज रहे हैं। अगर इसी तोते को अमेरिका ले जाया जाता और वह फुटबाल की भविष्यवाणी करता तब तो हिन्दुस्तान का औपनिवेशवाद की मानसिकता से ग्रसित मीडिया उसे हाथों हाथ लेता, क्योंकि उस पर अंग्रेजों के साथ होने की सील लगी होती। जो काम वह आक्टोपस कर रहा है वही काम सदियों से हमारा हीरामन भी कर रहा था, पर हीरामन की कोई पूछ परख नहीं।
दिग्गी के नहले पर प्रभात का दहला
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह जब कभी भी कुछ भी बोलते हैं तो उनके बारे में कहा जाता है कि वे तोल मोल के ही बोल निकालते हैं। राजा दिग्विजय सिंह की जुबान कभी भी फिसलती नहीं है। पहली बार राजा की जुबान फिसली और मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा ने उन्हें धोबी पाट दे चित्त कर दिया। हुआ यूं कि प्रभात झा के मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष हैं, और राजा दिग्विजय सिंह ने उन्हें आयतित बता दिया था। इस पर प्रभात झा हत्थे से उखड गए और लिख दिया राजा जी को पत्र। कहते हैं कि प्रभात झा ने पत्र में साफ लिखा है कि यह ठीक है कि वे बिहार से आए हैं, पर क्या राजा दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी की प्रदेशाध्यक्ष के बारे में एसा कहने का दुस्साहस कर पाएंगे कि श्रीमति सोनिया गांधी को इटली से आयात किया गया है। प्रभात झा का कहना सच है। पहले शरद पवार ने विदेशी मूल के मुद्दे को हवा देकर सोनिया गांधी को काफी लानत मलानत भिजवाई थी, यह अलहदा बात है कि सत्ता की मलाई चट करने के लिए कांग्रेस ने बाद में उन्हीं शरद पवार से हाथ मिला लिया। प्रभात झा तो भारत गणराज्य के बिहार सूबे से हैं, पर सोनिया गांधी तो उस देश से आईं हैं जिसका नाम बोफोर्स तोप की दलाली में कई बार उछला है, और कांग्रेस को दो दशकों से उस मामले में बेक फुट पर ही रहने पर मजबूर होना पडा है।
मनमोहन के बडबोले मंत्री
भारत गणराज्य के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह भले आदमी हैं। वे नरसिंहराव की तरह मोनी बाबा तो नहीं हैं, पर उनका रिमोट कंट्रोल कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ में ही है। मनमोहन चाहकर भी अपने मन की नहीं कर सकते हैं। मनमोहन के बडबोले मंत्रियों ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। शरद पवार मंहगाई पर सरकार के प्रतिकूल टिप्पणी करते हैं तो उपचुनाव के दौरान कमल नाथ कहते हैं कि देश में मंहगाई इसलिए बढी है, क्योंकि किसान दो वक्त खाने लगा है। पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर का अपना अलग अंदाज था, वे सोशल नेटवर्किंग वेवसाईट पर जाकर अपना दुखडा बयान करते थे कि काम के बोझ से वे दोहरे हो रहे हैं। अब बारी शरद पवार की है, पवार प्रधानमंत्री से मिले और चाहते हैं कि उनका बोझ कम किया जाए। अब वे अपनी पार्टी और क्रिकेट को समय देना चाह रहे हैं, एसा उनका कहना है। राजनैतिक हल्कों में बह रही फिजा संदेश ला रही है कि पवार बोझ से दोहरे होकर विभाग तजना नहीं चाहते, इसके पीछे की कहानी कुछ और है। यूं तो हर कोई लाल बत्ती की चाहत रखता है, पर आईसीसी जैसी चोबीसों घंटे दुहने को तैयार दुधारू गाय के अध्यक्ष बनने के बाद एकाध महत्वहीन विभाग का प्रभार अपने पास रखकर पवार चाहते हैं कि लाल बत्ती की लाल बत्ती उनके पास रहे और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की मलाई वे गुपचुप खाते भी रहें।
एसा क्या गलत कह दिया गडकरी ने
कांग्रेस के सियासी प्याले में जबर्दस्त तूफान मचा हुआ है। भाजपा के निजाम नितिन गडकरी का एक बयान कांग्रेस के लिए गले की फांस बनता दिख रहा है। इतिहास में यह पहला मौका है, जब विपक्ष के किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कांग्रेस पर इतना तल्ख वार किया हो। नितिन गडकरी ने महज इतना ही तो पूछा है कि क्या अफजल गुरू कांग्रेस का जवाई है, क्या कांग्रेस ने उसे अपनी बेटी दी है? क्या गलत कह दिया गडकरी ने जो कांग्रेस हत्थे से उखड रही है। सालों साल उसकी फांसी की फाई कांग्रेसनीत केंद और कांग्रेस की ही दिल्ली सरकार के बीच देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की सरहद में ही अगर मंत्रालयों की सीढियां चढती उतरती रहे तो इसे क्या कहा जाएगा। उसके बाद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी केंद्र सरकार को कटघरे में खडा करें तो फिर क्या कहा जाए। भडकी कांग्रेस का कहना है कि गडकरी को किसी मनोचिकित्सा केंद्र में ले जाया जाए। दरअसल मनोचिकित्सक की आवश्यक्ता गडकरी को नहीं, कांग्रेस को है। आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने के बाद भी नंगे भूखी जनता का खून चूसने वाली कांग्रेस की कमियां उजागर होना आरंभ हुंईं और कांग्रेस ने आपा खोया। कांग्रेस में अगर नैतिकता बची है तो वह जवाब क्यों नहीं देती कि अफजल गुरू का बचाव उसके द्वारा अखिर क्यों किया जा रहा है?
विकास का रावण: जयराम रमेश
हिन्दुस्तान में भगवान राम को ही पूजा जाता है। रावण का दशहरे में दहन किया जाता है। इसे बुराई पर अच्छाई की विजय माना जाता है। रावण की पूजा शायद ही काई करता हो, भारत गणराज्य में, या शायद ही कोई माता पिता हों जो अपने बच्चों का नाम रावण रखता हो। राम नाम के लाखों लोग भारत में मिल जाएंगे। राम के नाम वाले भारत गणराज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपनी भोपाल यात्रा के दौरान खुद को ही रावण बता दिया। भारतीय वन प्रबंध संस्थान में अफसरान को संबोधित करते वक्त जयराम रमेश इतने उत्तेजित हो गए कि वे बोल पडे, -‘‘मुझे विकास का रावण समझा जाता है।‘‘ अब जयराम रमेश को कौन समझाए कि बिना आग के धुआ नहीं निकलता हुजूर। आपकी आदावत केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से है, और आपने मध्य प्रदेश सिवनी जिले से होकर गुजरने वाली उत्तर दक्षिण गलियारे की फोर लेन में फच्चर फसा दिया है। आपको कौन समझाए कि जहां से यह गुजर रही है वह कमल नाथ का संसदीय क्षेत्र का हिस्सा नहीं है। रमेश जी आपको और कमल नाथ को देश में कहीं रावण समझा जाता हो या न हो, पर सिवनी जिले की जनता तो अपको रावण, क्या अस्सी के दशक तक के हिन्दी सिनेमा के विलेन शत्रुध्न सिन्हा और प्रेम चौपडा से कम नहीं मानती है।
दम तोडने लगा भोपाल गैस कांड का मामला
विश्व की सबसे बडी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड के फैसले के बाद समूचे देश में रोष असंतोष और आक्रोश का वातावरण निर्मित हो गया था। देशवासी इसके लिए सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और मध्य प्रदेश के उस वक्त के मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह की भूमिकाओं पर सवालिया निशान लगाने लगे थे। भाजपा को भी इस मामले में कटघरे में रखा गया था। इसी बीच सरकार ने तेल की कीमतों में इजाफा कर दिया। जैसा अंदेशा था, वही हुआ, सभी का ध्यान भोपाल गैस कांड से हटकर मंहगाई पर चला गया। मीडिया की सुर्खियां बना भोपाल गैस कांड का फैसला और कांड से जुडे पहलु बाद में अंदर के पेज पर छोटी खबरों के तौर पर दम तोडने लगे हैं। समाज सेवी संगठन भी मीडिया की इस बेरूखी से हैरान परेशान ही नजर आ रहे हैं। अब देखना है कि भोपाल गैस कांड के मामले में कौन सा नया छुर्रा छोडा जाता है जिससे एक बार फिर लोगों का ध्यान इसकी ओर आकर्षित होगा, ताकि मृतकों के परिजनों और पीडितों को न्याय मिल सके।
परिवारवाद की जद में भाजपा
अभी तक माना जाता था कि परिवारवाद का कापीराईट अगर किसी के पास है तो वह है सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। उत्तर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान से लगने लगा है कि परिवारवाद का पेटंेट और कापीराईट का कुछ अंश भाजपा के पास भी आ गया है। उत्तर प्रदेश में महासचिव के पांच पदों के लिए जडें जमाए बैठे चार बडे नेताओं के साहेबजादे लाईन में लगे हुए हैं। नेता चाह रहे हैं कि उनकी विरासत के साथ ही साथ राजनैतिक विरासत को भी उनके बच्चे ही आगे बढाएं। इसी कारण पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज, सूबे के पूर्व भाजपाध्यक्ष रमापतिराम त्रिपाठी के साहेबजादे शरदपति, लखनउ के सांसद लाल जी टंडन के पुत्र गोपाल और विधानमण्डल दल के नेता ओमप्रकाश के बेटे अनुराग सिंह के नामों को उनके वालिदान आगे कर रहे हैं। इन सभी के विरोधियों का कहना है कि चूंकि उत्तर प्रदेश जैसे बडे सूबे में प्रतिभाशाली युवाओं की कमी है, इसलिए राजनैतिक तौर पर सक्रिय रहे परिवारों के बच्चों को ही विरासत सौंपने की तैयारी की जा रही है।
लालू के दुर्दिन नहीं छोड रहे पीछा
मुसीबतें हैं कि चारा घोटाला के मुख्य सरगना के तौर पर चिन्हित और चर्चितत्र पूर्व रेल मंत्री एवं स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव का पीछा छोडने को राजी ही नहीं। राष्ट्रवादी जनता दल का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीना जाकर उसे राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा दिए जाने की तैयारियां की जा रही हैं। चुनाव आयोग ने राजद की उन दलीलों को दरकिनार कर दिया है जिसमें उसने कहा था कि झारखण्ड में अभी राष्ट्रपति शासन लागू है, यहां जल्द ही चुनाव की संभावना है और इन परिस्थितियों में राजद को नेशनल पार्टी का दर्जा बरकरार रखा जाए। चुनाव आयोग ने राजद को नोटिस जारी करते हुए कहा कि नागालेण्ड में चुनाव में हिस्सा न लेने के चलते क्यों न राजद की नेशनल पार्टी का दर्जा छीन लिया जाए। गौरतलब है कि नेशनल पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए यह आवश्यक है कि कम से कम चार राज्यों में राज्य स्तरीय दल की मान्यता पूरी करता हो, अर्थात इन चार राज्यों में उसे पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम छः फीसदी वोट मिले हों। चुनाव आयोग ने राजग मामले की सुनवाई लगभग पूरी कर ही ली है। हालात देखकर लगने लगा है कि स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव का प्रबंधन इस बार ढेर हो गया है, और आने वाले वक्त में उनका दल नेशनल पार्टी के बजाए राज्य की पार्टी बनकर रह जाएगा।
राकांपा के बदले सुर का राज!
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के जनक शरद पवार हैं, और शरद पंवार ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को विदेशी मूल का कहकर देश में बहस को जन्म दिया था। कभी कट्टर कांग्रेसी रहे पवार ने अपनी अलग पार्टी राकापा का गठन किया। एक दूसरे को गरियाने वाले पवार और कांग्रेस का चोली दामन का साथ हो गया। एक बार फिर पवार कुछ अलसाए से सरकार को गरियाते नजर आ रहे हैं। वे आईसीसी के चीफ बन गए हैं तो अब लाल बत्ती के साथ छोटा सा विभाग ही चाहते हैं। इस मामले में उन्होंन प्रधानमंत्री को अपनी इच्छा से आवगत करा दिया है। अब राकापा कोटे के दूसरे मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने चिंघाड भरी है वे नागरिक उड्डयन मंत्रालय पर छः साल से काबिज हैं, वे प्रधानमंत्री से कह रहे हैं कि उन्हें दूसरा विभाग दे दिया जाए। कुल मिलाकर यही लगने लगा है कि राकापां एक बार फिर सरकार के साथ बारगेन करने के मूड में आ चुकी है। राकापा चाहती है कि उसे दो के बजाए तीन स्थान मिलें और पंवार, पटेल के अलावा छगन भुजबल को केंद्र में लाया जाए और अगर भुजबल सूबाई राजनीति में ही फिट हैं तो फिर पवार की पुत्री सुप्रिया सुले को भी लाल बत्ती से नवाजा जाए। और तो और अब तो स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद भी चाहने लगे हैं कि उनका महकमा बदला जाए। अरे यहां हो क्या रहा है, देश के अनेक प्रदेशों में जिलों की बोली लगाई जाकर वहां कलेक्टर एसपी पदस्थ किए जाते हैं क्या उसी तर्ज पर देश के मंत्रालयों की बोलियां भी लगाई जाने लगी हैं।
गुमनाम पत्र ने मचाया भाजपा में तूफान
लगता है भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी के लिए 2010 शुभ नहीं है, या उनकी ताजपोशी के वक्त महूर्त ठीक नहीं था, यही कारण है कि उनके नेतृत्व में भाजपा अब भी पूरी तरह संभल नहीं पाई है। दिल्ली में रेली के दौरान गडकरी चक्कर खाकर गिर पडे। इसके बाद अनेकानेक मामले एसे सामने आए हैं जिससे भाजपा खुद ही अपनों से घिरती लगी। हाल ही में एक गुमनाम पत्र ने भाजपा के आला नेताओं की सांसे थाम दी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी श्याम जाजू के बैंक खाते का विवरण लेने की शिकायत जाजू द्वारा पुलिस में दर्ज करवाई गई थी, कि किसी अज्ञात व्यक्ति उनके पेन कार्ड की कापी लेकर बैंक गया था, बाद में उक्त व्यक्ति को पुलिस ने धर दबोचा था। यह मामला दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में चल रहा है। इस मामले में मोड तब आ गया जब अदालत को एक गुमनाम पत्र मिला है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि जाजू के पाए एक नहीं अनेकों पेन कार्ड हैं, जिनके माध्यम से वह करोडों अरबों के वारे न्यारे करता है। पत्र में लिखा है कि जाजू ने अलग अलग पते डालकर पेन कार्ड बनवाए हैं। बहरहाल इस पत्र से भाजपा में तूफान दिखाई दे रहा है, बडे नेताओं को डर है कि कहीं इस आंधी में उनकी पोल पट्टी भी उजागर न हो जाए।
हमें चाहिए, पगार, बंगला और कार!
कुपोषण के मामले में अव्वल माना जाना है देश के हृदय प्रदेश को। लोग मध्य प्रदेश को इथोपिया की संज्ञा भी दे चुके हैं। यहां सरकारी खजाने को भरने के लिए जनता पर कर पर कर लादे जा रहे हैं। जनता करों के बोझ से बढी मंहगाई से बुरी तरह कराह रही है, वहीं दूसरी ओर जनता के ही चुने गए नुमाईंदों को देखिए। विधायकों को जनता के दुखदर्द से काई लेना देना नहीं। उन्हें चाहिए बढी पगार। जब वे लाल बत्ती ले लेते हैं तो मंत्री कहलाते हैं। मंत्रियों के रहने के लिए राजधानी भोपाल में 45 बंग्ला, करबला, चार इमली, 74 बंग्ला, श्यामला हिल्स आदि जगहों पर दो सौ से ज्यादा बंगले हैं। मंत्रियों की ठसक तो देखिए उन्हें ये बंग्ले छोटे पडते हैं सो वे चाहते हैं, नए सर्वसुविधायुक्त आशियाने, जो करोडों रूपयों में बनेंगे। इसके अलावा मंत्रियों को अब पुरानी एम्बेसेडर कार की सवारी गांठना गवारा नहीं है। मंत्री चाहते हैं कि उन्हें विलासिता पूर्ण इनोवा या सफारी वाहन उपलब्ध कराए जाएं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी आपके प्रदेश की जनता मंहगाई से कराह रही है। आप केंद्र के द्वारा बढाई मंहगाई का विरोध कर धरना प्रदर्शन करते हैं, कम से कम अपने सूबे में टेक्स कम करके जनता को राहत तो दे दें। इसके साथ ही साथ मंत्रियों को समझाएं कि दिखावा न करते हुए किफायत से चलें।
पुच्छल तारा
मध्य प्रदेश में विद्युत की घोषित और अघोषित कटौती ने देश के हृदय प्रदेश के नागरिकों का जीना मुहाल कर रखा है। राजधानी भोपाल, संभागीय मुख्यालय, जिला, तहसील, विकासखण्ड मुख्यालय के अलावा ग्रामीण अंचलों के तो हाल ही बेहाल हैं। इंदौर जिले से रोली शर्मा ने ईमेल भेजा है। वे लिखतीं हैं कि एक अंग्रेज भारत आया, उसने मध्य प्रदेश के बारे में बहुत सुन रखा था। वह मध्य प्रदेश के एक गांव में गया और 15 दिन के लिए वहां रूक गया। 15 दिन बाद जब वह वापस लौटा तो वह दो वाक्य ही सीख पाया था। ‘‘पहली लाईन थी शुकर है लाईट आ गई।‘‘ और दूसरा वाक्य जो वह सीख पाया वह था -‘‘हे शिव - राज, फिर चली गई।‘‘

रविवार, 11 जुलाई 2010

550वीं पोस्‍ट

आरटीई में फिसड्डी बना मध्य प्रदेश

लाखों बच्चे पढाई से हैं वंचित

स्कूल शिक्षा विभाग के सर्वे से हुआ फर्जीवाडा उजागर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 11 जुलाई। देश के बच्चों को शिक्षित करने की गरज से केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार का कानून (आरटीई) बना दिया है, किन्तु देश का हृदय प्रदेश ही इस कानून का सरेआम माखौल उडा रहा है। मध्य प्रदेश में लाखों, हजारों बच्चे आज भी पढाई से वंचित हैं। केंद्र के कानून को तो छोडिए जब मध्य प्रदेश में खुद का ही जनशिक्षा अधिनियम 2001 लागू है, बावजूद इसके स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा इस संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।

गौरतलब है कि शिक्षा का मौलिक अधिकार अधिनियम 2009 जब से लागू हुआ है तब से छः से 14 साल तक के बच्चों को शिक्षा की अनिवार्यता लागू की गई है। इस अधिनियम के लागू होने के उपरांत स्कूल न जाने वाले समस्त बच्चों को स्कूल भेजकर दाखिला कराया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह जवाबदारी राज्य सरकार पर आहूत होती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी बच्चा इससे वंचित न रह जाए।

यहां उल्लेखनीय होगा कि केंद्र के शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के लागू होने के आठ साल पहले ही मध्य प्रदेश सरकार ने जनशिक्षा अधिनियम 2001 लागू कर दिया था, जिसके तहत सूबे में रहने वाले छः से चौदह साल के बच्चों का स्कूलों में दाखिला करवाना अनिवार्य बना दिया गया था। राजा दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबू लाल गौर के बाद अब शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश सूबे के निजाम हैं, पर किसी ने भी प्रदेश के उन बच्चों की ओर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा जो स्कूल जाने के बजाए दीगर काम में अपना दिन बिता देते हैं।

मानव संसाधन विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि मध्य प्रदेश में स्कूल शिक्षा की स्थिति वाकई चिंता जनक है। सूत्रों ने कहा कि जो तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं वे बहुत ही भयावह हैं। मध्य प्रदेश सूबें मे लाखों बच्चे एसे हैं जो आज भी स्कूल जाने से वंचित हैं। मानव संसाधन विभाग के एक आला अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि अकेले भोपाल संभाग का ही लें तो वहां दस हजार से अधिक बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। सीहोर में 424, बेतूल 3088, रायसेन 1331, भोपाल 1350, राजगढ 1136, होशंगाबाद 756, हरदा 657, विदिशा 488 बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। ये आंकडे स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2009 में कराए गए आंकडे हैं।

दरअसल शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो कंेद्र और राज्य सरकारों ने बना दिया है, किन्तु आर्थिक तंगी के कारण शालाओं में गरीब अपने बच्चों का दाखिला कैसे कराए यह समस्या आज भी बरकरार है। वस्तुतः होना यह चाहिए था कि सरकारी शालाओं में बीपीएल परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा के साथ ही साथ प्रदेश में चल रहे निजी स्कूलों में इस तरह के बच्चों के लिए कुछ फीसदी सीट आरक्षित करा दी जानी चाहिए।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

भ्रष्‍टाचार का घालमपेल है राष्‍ट्रमण्‍डल खेल में





(लिमटी खरे)

आजादी के बासठ सालों बाद भी भारत गणराज्य आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। सवा सौ साल पुरानी और भारत पर आधी सदी से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस के नेताओं ने देश को आत्मनिर्भर बनाने का बेहद प्रयास किया किन्तु उनके प्रयासों में संजीदगी न होने का नतीजा आज सामने ही है कि कांग्रेस के नेता तो आत्मनिर्भर हो गए पर आवाम ए हिन्द आज भी दो वक्त की रोटी के लिए मारा मारी पर मजबूर है। देश की सत्तर फीसदी से अधिक आबादी को दो जून की रोटी और साफ पानी नहीं मिल पा रहा है और अमीर जनसेवकों की एक एक शाम की पार्टी दस लाख रूपए तक की होती है। यह है नेहरू गांधी द्वारा देखे गए भारत के भविष्य की जनसेवकों द्वारा बनाई गई भयावह तस्वीर।

महज तीन माह बाद भारत गणराज्य की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कामन वेल्थ गेम्स होने वाले हैं। राजधानी दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाने की खबरें जब तब मीडिया की सुर्खियां बनी रहती हैं। केंद्र में पिछले छः सालों से कांग्रेसनीत संप्रग सरकार काबिज है तो दिल्ली में शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री के तौर पर तो रिकार्ड ही बना दिया है। आश्चर्य देखिए केंद्र और दिल्ली प्रदेश दोनों ही में कांग्रेस का जलजला है, आम आदमी के लिए फिरकमंद होने का स्वांग रचने वाली केद्र सरकार भले ही रियाया के लिए कोई सुविधा मुहैया कराए न कराए, टेक्स का बोझ अवश्य लाद देती है, कामन वेल्थ के लिए सरकार ने अपनी कथित तौर पर खाली खजाना खोल दिया है, बावजूद इसके दिल्ली आज की तारीख में भी कामन वेल्थ गेम्स के लिए तैयार नहीं है।

अरबों रूपयों में आग लगाकर भारत सरकार वैश्विक दृष्टिकोण से तो बहुत ही अच्छा काम कर रही है। भारत की साख पूरे विश्व में बहुत ही अच्छे मेजबान की बन सकती है बशर्ते कामन वेल्थ की तैयारियां समय पर पूरी हो जाएं। इंटरनेशनल लेबल के स्टेडियम, चमचमाती सडकें, फ्लाई ओवर, फुट ओवर ब्रिज, स्वीमिंग पूल, परिवहन के लिए यात्री बस, बस स्टेंड, मेट्रो रेल, आदि सब कुछ मानकों के आधार पर ही करने की कल्पना की गई थी। मई 2006 में लिखे एक आलेख में हमने साफ तौर पर लिखा था कि कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों के लिए अभी बहुत समय है, इसके लिए सरकार को चेत जाना चाहिए, वस्तुतः एसा हुआ नहीं।

सरकार को अपने मौखटे अर्थात वैश्विक छवि की बहुत ज्यादा चिंता है। वैश्विक स्तर पर छवि मजबूत तो की जा सकती है पर भूखे पेट नहीं। भारत सरकार को चाहिए कि वह अपनी प्राथमिकता वैश्विक छवि की जरूर रखे किन्तु भारत गणराज्य की रियाया का ध्यान भी पूरा पूरा रखे। भारत गणराज्य की रियाया आधे पेट खाकर जीवन यापन कर रही है। हरी और लाल लो फ्लोर बस देखकर विदेशी तो अपने आप को सहज महसूस कर सकते हैं किन्तु भारत की भूखी नंगी जनता का पेट इन विलासिता और भव्य चीजों से भरने वाला नहीं। कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य की सरकार को अपनी जनता की फिकर होने के बजाए वह दुबली हो रही है वैश्विक छवि की चिंता में। जब यही विदेशी आकर हमारे देश की नंगी भूखी जनता की तस्वीर खीचतें हैं और धरावी जैसी झोपडपट्टी पर फिल्म बनकर आस्कर अवार्ड लाती है तब इन्हें गरीबी के हाल में सालों साल रखने वाली सरकार का सीना चोडा हो जाता है, सरकार द्वारा इनके किरदारों के सम्मान में भोज तक का आयोजन किया जाता है।

जिस दिन भारत को कामन वेल्थ गेम्स की मेजबानी मिली थी, निश्चित तौर पर भारत सरकार के नीतिनिर्धारकों ने रात ढलते ही जाम टकराए होंगे, वाकई बहुत बडी सफलता थी वह। आज के हालात देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वे ही नीति निर्धारक अब यह कह रहे होंगे कि खेल खेल न होकर जी का जंजाल बनकर रह गए हैं। कामन वेल्थ गेम्स को लेकर इतना शोर शराबा आखिर क्यों?

आखिर क्यों भारत सरकार का खेल मंत्रालय और ओलंपिक संघ अपनी अपनी बांहें चढा रहा है? सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर आखिर ताल क्यों ठोकी जा रही है? खेल मंत्री एम.एस.गिल और ओआईसी के मुखिया सुरेश कलमाडी एक दूसरे के लिए तलवारें क्यों भांज रहे हैं? पुरानी कहवत है कि जर, जोरू और जमीन तीनों से बचकर ही रहना चाहिए। फसाद की जड में पैसा, औरत और प्रापर्टी ही प्रमुख वजह होती है। कामन वेल्थ के मामले में तो प्रापर्टी और औरत का दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। रह जाती है बात पैसे की तो भ्रष्टाचार के समंदर मंे आकंठ डूबा दिख रहा है खेलों का यह महाकुंभ।

शायद ही कोई एसा दिन जाता हो जब किसी न किसी समिति, उपसमिति के किसी कारनामें को उजागर न किया जाता हो। समिति, उपसमितियों की खासियत तो देखिए ये भी ओलंपिक संघ और खेल फेडरेशनों के रिश्तेनातेदारों से पटी पडीं हैं। अर्थात भ्रष्टाचार की गंगा बहाने के सारे मार्ग प्रशस्त हो चुके हैं। भारत सरकार की आंख मंे गांधरी की तरह पट्टी बंधी हुई है, और पुत्रमोह (खेल से जुडे राजनेताओं) में भारत सरकार ध्रतराष्ट्र की तरह अंधी हो गई है। आलम यह है कि खेलों से जुडे नेताओं ने अपने अपने रिश्तेदारों को तबियत से रेवडियां बांटी हैं। सारा का सारा खेल गुपचुप तरीके से हुआ है तो किसी को पता भी नहीं चला कि जनता से टेक्स के माध्यम से वसूले गए राजस्व में से बीस हजार करोड रूपयों में कहां, कैसे और कब आग लगा दी गई है?

15 सौ करोड रूपए के आरंभिक बजट वाले इस महाकुंभ का बजट सौ गुना बढकर पंद्रह हजार करोड रूपए हुआ। जिस कदर की लूट खसोट, सेटिंग भ्रष्टाचार, कदाचार चल रहा है, उसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह राशि बढकर पच्चीस सौ करोड भी हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इतनी विपुल राशि खर्च कर एक नए शहर की अधोसंरचना रखी जा सकती थी। वस्तुतः भ्रष्टाचार की गंगा वहां बहाने में थोडी कठिनाई ही होती, सो एसा नहीं किया गया।

सरकार चाहती तो इस पूरे आयोजन को दिल्ली में ही केंद्रित करने के बजाए इसके विभिन्न वर्गों को अलग अलग शहरों में कराती तो अधोसंरचना विकास में तेजी आ जाती। दिल्ली तो पहले से ही समृद्ध है, यहां दो हजार करोड रूपए व्यय करने का क्या ओचित्य। सरकार अगर चाहती तो अलग अलग सूबों के अलग अलग स्टेडियम का कायाकल्प कर देती तो उन शहरों की सुंदरता में चार चांद लग जाते और वहां का विकास द्रुत गति को पकड सकता था। विडम्बना यह है कि देश के निजामों की आखों में बंधी पट्टी में दिल्ली के आलवा और कोई शहर दिखता ही नहीं है।

अफसोस तो तब होता है जब इस पूरे मामले में ‘‘मीडिया‘‘ सहभागी हो जाता है। आयोजकों के चंद टुकडों के बदले उनके आगे पीछे दुम हिलाने वाले मीडिया के मित्रों से हमारा करबद्ध अनुरोध है कि इस पवित्र पेशे को बदनाम करने के बजाए ‘‘परचून की दुकान‘‘ खोल लें तो बेहतर होगा। अपने निहित स्वार्थों के लिए पूंजिपतियों की दहलीज पर माथा रगडने वाला ‘‘मीडिया का सच्चा बंदा‘‘ नहीं हो सकता है, उसे तो ‘‘दल्ला‘‘ अर्थात दलाल की संज्ञा ही दी जा सकती है।

यह बात भी उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात कि इतने बडे आयोजन में सरकार अभी हाथ बांधे खडी है, जैसे ही आयोजन पूरा होगा, सरकार जागेगी और फिर चलेगा जांच का सिलसिला। आयोजन के उपरांत जैसे ही कुर्सियां बटोरने और टेंट उखडने का काम होगा, जांच एजेंसियां आयोजकों और सरकार के मुलाजिमों पर उसी तरह टूट पडेंगी जिस तरह गुड पर मख्खी टूटती है। आयोजन समिति आयोजन की तैयारियों में व्यस्त हैं तो जांच एजेंसियां आयोजन से जुडे दागी लोगों की फाईलें दुरूस्त करने की तैयारियों में लगी हुई हैं।

समूची तैयारियों, गति, भ्रष्टाचार के समुंदर आदि को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आयोजन के उपरांत अगर जांच एजेंसियों ने इसकी जांच बारीकी और ईमानदारी से कर ली तो उजागर होने वाला घोटाला अब तक का सबसे बडा और अनोखा घोटाला होगा, जिसके बारे में भारत गणराज्य की रियाया को पता तक नहीं। सारी स्थिति परिस्थितियों को देखकर एक कहावत का उल्लेख करना लाजिमी होगा:-
‘‘उंट की चोरी निहुरे निहुरे (झुककर) नहीं हो सकती है।‘‘

भ्रष्‍ट टीआई को धरा लोकायुक्‍त ने

रिश्वत खोर टीआई को लोकायुक्त ने पकड़ा

(दिलीप बाटू)

रतलाम । वैसे तो पुलिस और भ्रष्टाचार का आपस में कोई रिश्ता नही है लेकिन
जब से पुलिस व्यवस्था में गिरावट आई है बगैर लिये दिये आज पुलिस से कोई
काम जनता नही करवा सकती है रिश्वत ही सिस्टम बन चुका है । आये दिन
रिश्वतखोरी की कई घटनायें हमने सुनी है लेकिन यह घटना उनसे कुछ अलग है ।
हुआ यूं कि बीते गुरुवार को उज्जैन लोकायुक्त टीम ने रतलाम जिले के
कालूखेड़ा टीआई गोपालसिंह चैहान को 45 हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार
किया ।
 
इस संबंध में जानकारी देते हुए लोकायुक्त एस.पी. अविनाश शर्मा ने बताया
कि कालूखेड़ा थाने पर पौने तीन किलो अफीम का एक प्रकरण एनडीपीएस एक्ट में
पिछले दिनों दर्ज हुआ था । जिसमें मांगु व राजू नाम के दो आरोपी जेल में
है आरोपियों ने पूछताछ के दौरान उन्होने अफीम सीतामऊ  क्षेत्र के नकेड़िया
गांव के रमेश शर्मा से लाने की बात कहीं थी । उसके बाद से ही टीआई गोपाल
चैहान अपने खबरी के माध्यम से रमेश शर्मा निवासी नकेड़िया से पांच लाख
रुपये रिश्वत के मांग रहे थे । जिस पर रमेश शर्मा ने करीब 25 दिन पूर्व
49 हजार रुपये की राशि टीआई को दे दी । लेकिन फिर भी टीआई चैहान 5 लाख पर
अड़े रहे।
 
श्री शर्मा ने बताया कि रमेश शर्मा ने इतनी बड़ी राशि देने मे असमर्थता
जताई, लेकिन फिर भी चैहान पैसे देने की बात पर अड़े रहे । बाद मे सौदा 2
लाख 25 हजार रुपए में तय हुआ । सौदा तय करने के बाद रमेश शर्मा ने
लोकायुक्त पुलिस से सम्पर्क किया और पूरा मामला बताया लोकायुक्त के सामने
आने के बाद लोकायुक्त पुलिस ने अपनी रणनीति बनाई जिसके बाद रमेश शर्मा ने
टीआई चैहान के खबरी पर्वतसिंह से सम्पर्क किया और उसे टीआई को देने के
लिए 50 हजार रुपए दिये ।
 
श्री शर्मा ने बताया कि पर्वतसिंह ने इस राशि मे से पांच हजार रुपये अपने
पास रखे और बाकी के 45 हजार रुपये वह कालूखेड़ा थाने पर जाकर टीआई गोपाल
चैहान को दे आया । जैसे ही पर्वतसिंह से टीआई ने 45 हजार रुपये लिये वैसे
ही लोकायुक्त टीम ने उन्हे धरदबोचा।  टीआई चैहान के विरुद्ध रिश्वत लेने
का मामला दर्ज कर उन्हे गिरफ्तार किया गया ।

अक्षरधाम पहुंचे शिव

मुख्यमंत्री चौहान ने स्वामी महाराज से लिया आशीर्वाद

नई दिल्ली। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गुरूवार की शाम को नई दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर जाकर संस्था के प्रमुख स्वामी महाराज से भेंटकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने अक्षरधाम परिसर में विभिन्न स्थलों का अवलोकन किया। श्री चौहान ने भारत के इतिहास को दर्शाने वाली गाथा का भी अवलोकन किया जिसमें भारत के इतिहास को बहुत ही खूबसूरत ढंग से दर्शाया गया है। श्री चौहान ने संगीतमय फव्वारे का भी अवलोकन किया और कार्यक्रम की सराहना की। मुख्यमंत्री ने अक्षरधाम परिसर के विभिन्न मंदिरों का भी अवलोकन किया।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

एमपी के मंत्रियों की मौजां ही मौजां


पगार बढवाने के बाद सरकार, अब चाहिए बंगला और कार

चुसता तो आखिर रियाया का ही खून

सरकारी बंगले हैं पर चाहिए भव्य और बडी अट्टालिकाएं

आप जनसेवक हैं, राजा समझने की भूल न करें मंत्रीवर

शिव राज में जनता बेहाल

चुनाव के वक्त जनता भगवान, चुनाव बाद नेता पहलवान

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत देश में प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी। प्रजातंत्र का अर्थ है, जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन। इसकी अवधारणा जिस वक्त रखी गई थी तब एसा सोचा गया था। आज के समय में यह अवधारणा बदल चुकी है। अब यह मामला जनसेवक का, जनसेवक द्वारा जनसेवक के लिए बन चुकी है। आज के समय में सांसद और विधायक पूरी तरह से अपने ही आप पर केंद्रित निहित स्वार्थों की राह पर खुद को देश को ले जाने लगे हैं। देश पर राज करने वाले जनसेवक अपने आप को जनता का सेवक बताकर बर्ताव राजा के मानिंद कर रहे हैं, देश और प्रदेशों के मंत्री अपने आप को जनसेवक के बजाए राज करने वाला समझकर यह सोच रहे हैं कि देश में आज भी आजादी पूर्व की सामंतशाही जीवित है। मंत्रियों के लिए नौकरशाह उनके लिए उनके गण और जनता उनकी जरखरीद गुलाम हो चुकी है, वे जो चाहें वो कर सकते हैं।

माले मुफ्त अर्थात सब कुछ निशुल्क पाने वाले जनसेवकों ने अपने सेवाकाल में भारी भरकम पगार और सेवानिवृत्ति के उपरांत खासी पेंशन की व्यवस्था करने के बाद अब मंत्रियों को भव्य अट्टालिका और मंहगी विलासिता भरी गाडियों की दरकार होना आश्चर्यजनक है। एक ओर देश के हृदय प्रदेश की शिवराज के नेतृत्व वाली सरकार के राज में आवाम करों के बोझ से बुरी तरह कराह रही है, वहीं दूसरी ओर मंत्रियों के दबाव में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों के लिए करोडों की लागत से बनने वाले बंगलों के लिए स्थान चयन की हरी झंडी देना निश्चित तौर पर उनका दुस्साहस ही माना जाएगा।

गौरतलब है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मंत्रियों के लिए चोहत्तर बंगला, चार इमली, करबला, पेंतालीस बंगला, पुराना सचिवालय, प्रोफेसर कालोनी, श्यामला हिल्स आदि इलाकों में हैं। नए भोपाल से लेकर पुराने भोपाल तक मंत्रियों के आवास छितरे पडे हुए हैं। मंत्री को जब पद और गोपनीयता की शपथ दिलवाने के बाद उसे आवास आवंटित किया जाता है तब उसके सरकारी आवास में पिन टू प्लेन सब कुछ सरकारी खर्च पर होता है। अर्थात कप प्लेट गिलास चम्मच से लेकर बिस्तर तोलिया तक सरकार मुहैया करवाती है। मंत्री को तो बस अपने कपडे का बक्सुआ (सूटकेस) लेकर उस आवास में जाना होता है। सवाल यह है कि जब मंत्री को एक सूटकेस उठाकर ही दूसरे आवास में जाना है तो फिर इन आवासों को वर्तमान में एक जगह पर ही क्यों नहीं कर दिया जाता है? क्यों किसी मंत्री के आवास को नई नवेली दुल्हन की तरह सजाने में लाखों करोडों रूपए हर बार फूंके जाते हैं।

हमारे कहने का तात्पर्य महज इतना है कि जिस तरह जिला मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक और जिला दण्डाधिकारी के मकान ईयर मार्क होते हैं, राज्य की राजधानी में महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री के आवास चिन्हित होते हैं, उसी तरह विभागों के आवास चिन्हित कर दिए जाने चाहिए जिससे जिस विभाग का मंत्री उसे वही आवास मिले। विभाग बदले जाने पर वह मंत्री अपना बक्सुआ लेकर दूसरे आवास में चला जाए। वस्तुतः एसा होता नहीं है। मंत्रीगण तो सरकारी आवास को अपनी जागीर समझ लेते हैं। एक बार मंत्री पद से हटने के बाद भी वे आवास को अपनी मिल्कियत समझकर उसको छोडने से कतराते हैं, अनेेक जनसेवक तो बंगले से भावनात्मक लगाव को दर्शाकर इमोशनल अत्याचार करने से नहीं चूकते हैं।

मध्य प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता का यह सुझाव स्वागत योग्य कहा जाएगा कि अगर मंत्रियों के आवास एक ही स्थान पर होंगे तो आगंतुकों को आने में कोई असुविधा नहीं होगी। सच है आज कोई मंत्री करबला में रह रहा है तो दूसरा उससे लगभग दस किलोमीटर दूर चार इमली में। आगंतुकों का इन मंत्रियों के घरों में जाने से तेल निकल जाता है। हमारा सुझाव है कि उमा शंकर गुप्ता की बात पर अमल करते हुए 74 बंगला या चार इमली के आवासों को विभागीय मंत्रियों के लिए चिन्हित कर दिया जाए। वैसे 45 बंगले के आवास भी मंत्रियों के हिसाब से उचित हैं, हां इन आवासों में रहने से उनके रूतबे में कमी जरूर हो सकती है।

वस्तुतः मंत्रियों के मन में ‘‘तेरी साडी मेरी साडी से सफेद कैसे?‘‘ की भावना रहती है। बडा भव्य बंगला, हरा भरा लान, लाल बत्ती का काफिला यह सब आजकल मंत्रियों के लिए शो ऑफ मेटेरियल बन चुका है। एक मंत्री के बंगला दफ्तर के बारे में दूसरे मंत्री के सामने अगर तारीफ कर दी जाए तो सुनने वाला मंत्री तत्काल पहले मंत्री से अच्छा कार्यालय बनाने का फरमान जारी कर देता है। मंत्री के आवासीय कार्यायल का रंग रोगन आखिर किस मद से किया जाता है। लोक निर्माण विभाग के पास सीमित बजट ही होता है, लोक कर्म विभाग का बजट इन मंत्रियों की फेहरिस्त के सामने उंट के मुंह में जीरा ही साबित होता है। फिर टोपी उछलकर विभाग के उपर ही आती है। विभाग में होशियार, चालाक और चपल (भ्रष्टतम समझे जाने वाले चापलूस अधिकारी कर्मचारी) मुलाजिमों द्वारा अपने मंत्री की मंशा को समझकर उनके हिसाब से सारा काम करवा देते हैं। इस तरह भ्रष्टाचार का अनवरत चलने वाला यह चक्र कभी टूट ही नहीं पाता है। चुनाव के दौरान जनता जनार्दन को सर पर बिठाकर भगवान मान लुभावने वादों से पाट देते हैं सारे माहौल को, किन्तु चुनाव के उपरांत नेताजी को अपनी जनता की कोई कदर नहीं रहती है।

पगार और पेंशन तो बढ गई, अब ‘‘इक बंगला बने न्यारा‘‘ की फरमाईश भी पूरी होने वाली है तो लगे हाथ क्यों न वाहन को भी सजीला सा अपना लिया जाए। भारत के इथोपिया माने जाने वाले मध्य प्रदेश में यहां राज करने वाली भाजपा सरकार और उसके मंत्रियों को देखिए। एक समय था जब एम्बेसडर कार को राजा गाडी माना जाता था। ‘स्टेटस सिंबल‘ होती थी इसकी सवारी। मंत्रियों मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों सभी की पहली पसंद हुआ करती थी एम्बेसेडर कार। कालांतर में नई मंहगी विलासिता भरी गाडियों के सडकों में उतरने के बाद जनसेवकों की नीयत इस पर डोलने लगी।

अगर आप विधायक या सांसद हैं तो आप निजी तौर पर मंहगी विलासिता भरी गाडी में फर्राटा भर सकते हैं, पर अगर आप मंत्री हैं तो आपको निश्चित तौर पर प्रोटोकाल को निभाना ही होगा। स्टेट गैरेज से आपको आवंटित वाहन में सफर करना आपकी मजबूरी होगी। भले ही आप दूसरे वाहन में सफर करें किन्तु आपके काफिले में वह वाहन होना अनिवार्य है। स्टेट गैरिज की मजबूरी है कि उसके पास एम्बेसेडर कार की भरमार है। मंत्रीपद ग्रहण करने के बाद मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा किराए के लग्जरी वाहन चंद दिनों के लिए मंत्रियों को मुहैया करवाए जाते हैं, किन्तु बाद में उन्हें स्टेट गैरेज की पुरानी एम्बेसडर कार से ही संतोष करना होता है। अरे इन मंत्रियों को छोडिए, स्टेटस सिंबाल के लिए ‘‘जेड प्लस‘‘ केटेगरी की सुरक्षा लेने वाले जनसेवक भी जब कहीं दौरे पर जाते हैं तो वे बुलट प्रूफ एम्बेसेडर में बेठने से बचते ही हैं, क्योंकि इसके कांच नहीं खुलते और कांच नहीं खुलेंगे तो नेता जी अपने समर्थकों का हाथ हिलाकर अभिवादन कैसे कर पाएंगे। इस बारे में राज्य शासन के गृह विभाग द्वारा कभी केंद्रीय गृह विभाग को नहीं बताया जाता कि जिसे अपने ही देश के नागरिकों से खतरा होने के कारण आपने जेड प्लस केटगरी की सुरक्षा दी है, उसे जनता के बीच जाते समय उस जेड प्लस की आवश्यक्ता नहीं है। अनेक माननीयों को सरकार द्वारा दिए गए गनमेन उनके लिए खलासी का काम करते हैं।

एम्बेसेडर से उब चुके मध्य प्रदेश के मंत्रियों को अब इनोवा और सफारी जैसी विलासिता भरी गाडियों की दरकार है। राज्य शासन इस बारे में गंभीरता से विचार भी कर रहा है। भव्य अट्टालिकाएं, विलासिता भरी गाडियां, मोटी पगार वेतन भत्ते, सब कुछ निशुल्क क्या आप इन परिस्थितियों में कह सकते हैं कि देश का हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। हालात तो बता रहे हैं कि गरीब भारत गणराज्य के अंदर सोने की चिडिया कहीं चहक रही है तो वह देश के हृदय प्रदेश अर्थात मध्य प्रदेश में।

मीडिया की ताकत को सलाम