बुधवार, 24 नवंबर 2010

कुशल प्रबंधकों की कमी से जूझती कांग्रेस

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

कुशल प्रबंधकों की कमी से जूझती कांग्रेस

भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतफा घिरने के बाद अब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को कुशल प्रबंधकों की कमी खासी खलने लगी है। एक समय था जब कांग्रेस में संकटमोचक के तौर पर बेहतरीन प्रबंधक कुंवर अर्जुन सिंह, गुलाम नवी आजाद, हंसराज भारद्वाज आदि कांग्रेस की लाज बचाने का काम करते थे, आज सिर्फ आजाद ही मंत्रीमण्डल का हिस्सा हैं, शेष दो नेता तो सक्रिय राजनीति से लगभग किनारा कर ही चुके हैं। बीते दिनों पत्रकारों से रूबरू वाम नेता सीताराम येचुरी ने साफ तौर पर कह दिया था कि मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में मंत्रियों की चाल मदमस्त हाथी के मानिंद है, बिगडेल और घमंडी मंत्रियों को विपक्ष से कोई लेना देना नहीं बचा है। कांग्रेस में प्रबंधन की कमान इन दिनांे सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल और महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के पास परोक्ष तौर पर ही है। दोनों ही नेता अपने निहित स्वार्थों के चलते कांग्र्रेस का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं रख छोड रहे हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को महिमा मण्डित करने के चलते अभी तक तो कांग्रेस की छवि पर कुछ खास असर नहीं पड़ा है, किन्तु अब भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कांग्रेस का सांसे लेना मुश्किल होने लगा है। कांग्रेस की राजमाता को अब कांग्रेस के अंदर वाले कुशल प्रबंधकों की कमी खलने लगी है।



चोरी और सीना जोरी

कामन वेल्थ गेम्स का घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला न जाने कितने घोटाले हैं जिनमें देश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को चंद नेताओं ने तबियत से उड़ाया और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार चुप्पी साधे बैठी रही। दूरसंचार मंत्री ए.राजा के मामले में तो प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी ने सारी हदें ही पार कर दी हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत की फटकार के बाद अब कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई पड़ रही है। युवराज पीएम के साथ खड़े होने का स्वांग रच रहे हैं। देश देख रहा है कि किस तरह उसके गाढे़ पसीने की कमाई को आग लगाई गई, और फिर कांग्रेस के कर्णधार लीपा पोती में जुटे हुए हैं। गजब की दिलेरी और अंधेरगर्दी है। देश की जनता जानना चाह रही है कि आखिर एक मंत्री का इतना साहस कैसे हो गया कि वह मंत्रीमण्डल के फैसले को बलाएताक पर रख दे? कानून मंत्रालय को अपने घर की लौंडी बना डाले? वजीरे आजम की आज्ञा को भी दरकिनार कर दे? यह सब संभव है तो सिर्फ और सिर्फ इक्कसवीं सदी की कांग्रेस में जिसकी बागडोर, श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों से राहुल गांधी के हाथों में हस्तांतरित होने को आतुर है।



भ्रष्टाचार पर अब मुंह खोला बाबा रामदेव ने भी

देश में भ्रष्टाचार मिटाने और स्विस बैंक सहित विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने के संकल्प को जगजाहिर करके सियासत की पायदान चढ़ने का सपना देखने वाले स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी अब मशहूर उद्योगपति रतन टाटा और राहुल बजाज के बाद अब भ्रष्ट सियासतदारों के खिलाफ मुुंह खोल दिया है। बाबा रामदेव का कहना है कि एक मंत्री ने उनसे रिश्वत के बतौर दो करोड़ रूपयों की मांग की थी। बाबा रामदेव के बाद सिहांसन संभाले पतांजली योग केंद्र के महामंत्री आचार्य बाल कृष्ण ने यह कहकर सभी को चौंका दिया है कि रिश्वत मांगने वाला आज भी उत्तराखण्ड सरकार में मंत्री है। लोग यह सोच सोच कर हैरान हैं कि आखिर कम समय में बाबा रामदेव परिपक्व राजनेता कैसे हो गए, कि उनसे रिश्वत मांगने वाले का नाम उन्होंने लंबे समय तक गुप्त रखा, फिर अब जाकर उसे मंझे हुए राजनेता के मानिंद उजागर कर दिया। लोगों का कहना है कि भले ही बाबा रामदेव भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेने की बात कह रहे हों, किन्तु जब उनसे रिश्वत मांगी गई तो वे मौन साधे बैठे रहे! बाबा रामदेव के इस मंझे हुए कदम से लोग कहने से नहीं चूक रहे हैं कि जय हो बाबा रामदेव की।



गडकरी की आगवानी ने खोली यूपी भाजपा की पोल

उत्तर पद्रेश में हासिए पर आ चुकी भारतीय जनता पार्टी का संगठनात्मक ढांचा उत्तर प्रदेश में किस कदर चरमरा चुका है इस बात की एक बानगी है भाजपा के निजाम नितिन गडकरी की पिछले दिनों हुई लखनऊ यात्रा। नितिन गडकरी जब चार्टर्ड प्लेन से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंचे तब अमौसी हवाई अड्डे पर उनकी आगवानी के लिए महज दो दर्जन लोग ही उपस्थित थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गड़करी जब उतरे तो मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं को देखकर उनकी भवें तन गई। भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में चल रही बयार के अनुसार नितिन गड़करी का कद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के अनुरूप नहीं होना इसका सबसे बड़ा कारण है। गडकरी के उतरते वक्त आलम यह था कि वहां लखनऊ के संसद सदस्य लालजी टण्डन, लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा सहित अनेक बड़े नेताओं ने भी गडकरी की आगवानी करना मुनासिब नहीं समझा। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब गडकरी के साथ आए कालराज मिश्र और रामलाल के स्वागत में भी नेताओं ने हवाई अड्डे पर आमद नहीं दी।



रूक नहीं रही कमल नाथ और रमेश की रार

भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बीच चल रही रस्साकशी थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जयराम रमेश के मंत्रालय के अडियल रवैऐ के चलते कमल नाथ की उनके गृह प्रदेश मध्य प्रदेश, उनके प्रभाव क्षेत्र महाकौशल में बुरी तरह भद्द पिट रही है। रमेश हैं कि खुद को पर्यावरण और वन्य जीवों का हिमायती दिखाने का उपक्रम कर रहे हैं, उधर सड़क परियोजनाओं में मंत्रालय की हरी झंडी न मिल पाने के चलते लोग हलाकान हुए बिना नहीं हैं। इसमें सबसे अधिक प्रभाव चार सौ साल पुरानी नागपुर जबलपुर सड़क पर पड़ रहा है। इस सड़क पर पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के काल्पनिक वन्य जीव कारीडोर का होना बताया जा रहा है, जिससे सिवनी जिले में इसका निर्माण रोक दिया गया है। दूसरी तरफ कमल नाथ पर आरोप है कि इस सड़क को वे अपनी संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा से होकर ले जाने पर आमदा हैं। मजे की बात तो यह है कि जहां से वे इसे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, वहां सतपुड़ा कारीडोर एक साल से भी अधिक समय से अस्तित्व में आ चुका है। सियासतदारों की सियासत जारी है, राहगीर परेशां हैं. . .।



राज का भय दिखा चव्हाण पर

महाराष्ट्र प्रदेश में अशोक चव्हाण के बाद सत्तारूढ हुए पृथ्वीराज चव्हाण पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे का भय साफ साफ दिखाई पड़ रहा है। मनसे के सुप्रीमो का मराठी प्रेम (वस्तुतः आतंक) सर चढ़कर बोल रहा है। ठाकरे के मराठी मानुष का प्रभाव पृथ्वीराज चव्हाण के शपथ ग्रहण में भी देखने को मिला। मंत्रीमण्डल की पहली बैठक के बाद पत्रकारों से रूबरू चव्हाण ने अंग्रेजी या हिन्दी में बोलने से स्पष्ट तौर पर इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वे भविष्य में भी सिर्फ मराठी में ही बात करेंगे। पृथ्वीराज चव्हाण को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस सूबे के वे निजाम बने हैं, वह अखण्ड भारत का ही हिस्सा है, और भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी है। कल तक वे केंद्र में मंत्री थे, तब तो उन्हें हिन्दी बोलने से परहेज नहीं था, आज अचानक हिन्दी से परहेज और मराठी से प्रेम के पीछे राज ठाकरे का भय ही है। मजे की बात तो यह है कि देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस भी राज ठाकरे के इस तरह के आंदोलन से बढ़ने वाले भाषावाद, क्षेत्रवाद के बावजूद भी अपना मुंह सिले हुए है।



कांग्रेस का ‘‘राजा‘‘ प्रेम

लगता है कांग्रेस आज भी राजशाही के प्रेम से उबर नहीं सकी है। राजा शब्द कांग्रेस को बेहद ही भाता है। चाहे कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह हों या फिर पूर्व संचार मंत्री ए.राजा। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच में रूखसत हुए राजा को संसद भवन में आवंटित कमरे पर आज भी उन्ही की पट्टिका चस्पा की गई है। संसद भवन में पहले माले पर उन्हें आवंटित कक्ष के आजू बाजू कानून मंत्री वीरप्पा मोईली और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के कक्ष हैं। गौरतलब है कि कानून मंत्री वीरप्पा मोईली पर राजा को बचाने की जवाबदारी आहूत मानी जा रही है। वहीं दूसरी ओर राजा के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार एचआरडी मिनिस्टर सिब्बल को सौंपा गया है। इस तरह दोनों ही राजा को बचाने की जुगत में लगाए गए लगते हैं। संसद में राजा के कक्ष पर उनके नाम की पट्टिका देखकर लगता है कि राजा चाहे कितने भी भ्रष्ट रहे हों, पर कांग्रेस उनका मोह नहीं छोड़ पा रही है।



अहमद पटेल से खफा हैं मनमोहन

कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल की क्या औकात बकत होगी, यह समझा जा सकता है। कांग्रेस के कद्दावर नेता भी पद पाने के लिए अहदम पटेल की चौखट पर नाक रगड़ते रहते हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने रात्रिभोज का आयोजन किया। इस रात्रिभोज में मेहमानों की सूची प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने पीएम से चर्चा के बाद फायनल की। इस सूची में ममता, लालू, मुलायम, पासवान के नाम गायब थे। सबसे अधिक हैरानी तो इस बात पर हुई कि कांग्रेस में सोनिया, मनमोहन के बाद तीसरी पायदान पर विराजे अहमद पटेल का नाम इस फेहरिस्त में शामिल नहीं किया गया था। कहते हैं कि पीएम के करीबी कुट्टी नायर की अहमद पटेल से ‘‘कुट्टी‘‘ चल रही है, सो उनके पर कुतर दिए गए। राजनैतिक वीथिकाओं में पीएम के डिनर की सूची से पटेल के नाम के कटने को हैरानी के साथ देखा जा रहा है, साथ ही यह भी माना जा रहा है कि अब पटेल का राजनैतिक ग्राफ भी शनैः शनैः नीचे आ सकता है।



200रूपए वाले सरदारजी हुए अंदर

राजधानी दिल्ली में पुलिस कर्मियों के बीच ‘‘200 रूपए वाले सरदारजी‘‘ के नाम से विख्यात अमृतपाल अब पुलिस हिरासत में हैं। ललिता पार्क हादसे के बाद पुलिस ने उन्हें पकड़ कर अंदर कर दिया है। कहते हैं कि सरदार जी के सारे नाजायज कामों पर पर्दा डालने के लिए वे किसी भी पुलिस वाले के आने पर उसे दो सौ रूपए पकड़ा दिया करते थे। सरदार जी के दर पर जब भी कोई वर्दी वाला गया बस वह दो सौ रूपए की चढ़ोत्री लेकर वापस लौट गया। पुलिस वालों के बीच सरदार अमृत पाल ‘200 रूपए वाले सरदार जी‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। कमजोर भवनों के जरिए लाखों करोड़ों कमाने वाले 200 रूपए वाले सरदार जी ने चंद रूपयों की खनक में न जाने कितनी जिन्दगियां बर्बाद कर डाली हैं। सरदार के 200 रूपए इतने ज्यादा असरदार होते थे कि पुलिस की भी हिम्मत इतनी नहीं होती थी कि वे सरदार पर अकोड़ा कस सके।



लालीपाप ही दिखाकर चले गए ओबामा

दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के लोगों की दीपावली खराब की, भारतीय व्यवस्थाओं को ढेंगा दिखाया, जलेबी लटकाई और विदा ले ली। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह अगर समूचे घटनाक्रम का विश्लेषण कर रहे होंगे तो वे पा रहे होंगे कि वाकई ओबामा की यात्रा से भारत को आखिर मिला क्या? भारत के खुफिया तंत्र के अधिकारी भी इस यात्रा में अपने आप को बौना महसूस ही करते रहे। देश की आन बान शान का प्रतीक संसद भवन में सारे नियम कायदों को बलाए ताक पर रखकर ओबामा के सुरक्षा अधिकारियों ने खुफिया कैमरे लगा दिए थे। यह भारत के लिए बेहद अपमान और आपत्तिजनक ही माना जाएगा। सुरक्षा परिषद में स्थाई आसनी के मामले में भी ओबामा ने खुलकर कुछ भी नहीं कहा। लोकसभा में ओबामा की यात्रा के दौरान लोकसभा टीवी के कैमरामैन भी ओबामा के इर्दगिर्द नहीं आ पाए। अमरिका अगर भारत को इतनी ही हीन भावना से देखता है, तो बेहतर होता कि ओबामा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संसद को संबोधित कर देते।



पटेल के खिलाफ जांच में नाथ की स्वीकारोक्ति

महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर और मध्य प्रदेश के बैतूल के बीच सड़क निर्माण में हुए कथित भ्रष्टाचार की आग शांत नहीं हो पाई है। लगभग छः माह पहले इस सड़क के निर्माण का ठेका दिल्ली की ओरिएंटल स्ट्रक्चर इंजीनियर्स प्राईवेट लिमिटेड को दिया गया था। इस मामले में सीबीआई ने एनएचएआई के दो अफसरों को पकड़कर उनके पास से एक करोड़ 86 लाख रूपए बरामद भी किए थे। इन अफसरों के फोन, ईमेल आदि के आधार पर सीबीआई ने एनएचएआई के सदस्य एस.आई.पटेल से पूछताछ की इजाजत भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से मांगी थी। सीबीआई के सूत्रों का दावा है कि 10 हजार आठ सौ करोड़ रूपए के ठेके में गफलत हुई है। कमल नाथ ने अनुमति देने से इंकार कर दिया है। दरअसल सीबीआई पटेल को गिरफ्तार कर पूछताछ करना चाह रही थी।



पापुलरटी बढ़ा रहे शिवराज

देश के हृदय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि आम आदमी की बनती जा रही है। सूबे में उनके बढ़ते रसूख से दिल्ली के अनेक नेताओं के पैरांे के नीचे की जमीन खिसकने लगी है। शिवराज ने जब से सत्ता संभाली है, तब से उनके द्वारा आरंभ की गई योजनाएं जनता को लुभाने लगी हैं। पहले वे पांव पांव वाले भईया के नाम से मशहूर थे। अब उन्होंने अपने निवास पर सरकारी खर्चे से न जाने कितनी पंचायतें आहूत कर लोगों को लुभा दिया है। फिलहाल वे हर सप्ताह वनवासी यात्रा से सूबे का नाप रहे हैं। भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में इन दिनों शिवराज की बेतकल्लुफी की चर्चाएं जमकर हो रही हैं। शिवराज कही भी चाय के ठेले पर जाकर चाय पीने से भी नहीं हिचकते हैं। इस सबसे पीछे शिवराज का उद्देश्य वे ही जाने पर सूबे में उनकी बढ़ती पकड़ ने अनेक नेताओं की नींद उडा दी है।



पुच्छल तारा

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बाघ प्रेम एक बार फिर चर्चाओं में है। पिछले दिनों एक बाघिन की मौत पर उन्होंने पता लगाने की कोशिश की है कि आखिर उसकी मौत कैसे हुई? इसके लिए बाकायदा जांच बिठा दी गई है। बाघों के संरक्षण के लिए कथित तौर पर कटिबद्ध जयराम रमेश की कार्यप्रणाली पर मध्य प्रदेश के जबलपुर से रवि प्रकाश ने ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि बाघिन की मौत पर जांच बिठा दी गई है, किन्तु दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक सेमीनार में स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव के बयान से कोई सरोकार नहीं, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक बाघिन के मरने पर इतना हंगामा बरपा दिया, किन्तु देश में अनगिनत गर्भवती महिलाओं की मौत पर किसी को कोई चिंता नहीं है। आखिर यही है नेहरू गांधी के सपनों का भारत, ‘‘जय हो‘‘।

सोमवार, 22 नवंबर 2010

कांग्रेस में सबसे बड़ा कद है राहुल का

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

कांग्रेस में सबसे बड़ा कद है राहुल का
सियासी दल चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, कांग्रेस की नजर मंे भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का कद सबसे बड़ा हो गया है। इस तरह की चर्चाएं कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के सियासतदारों के बीच चल पड़ी हैं। संसदीय सौंध में इन दिनों ओबामा की भारत यात्रा के दौरान हुए मजेदार वाक्ये को चटखारे लेकर परोसा जा रहा है। हुआ दरअसल यह कि दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के दरम्यान उन्हें संसद के सेंट्रल हाल में उन्हें भाषण देना था। इस समय डॉ.मुरली मनोहर जोशी, जयंती नटराजन और टी.सुब्बीरामी रेड्डी एक कतार में ही विराजमान थे। इसी बीच रेड्डी को संभवतः लगा कि वे वहां बैठकर ओबामा से हाथ नहीं मिला पाएंगे, सो अपनी इस सीट को ताकने की गुजारिश उन्होंने जोशी और नटराजन से की और अन्यत्र सीट की तलाश में निकल पड़े। इसी बीच कुछ नेताओं ने खाली सीट को कब्जाना चाहा, किन्तु मुरली मनोहर जोशी और जयंती नटराजन ने उन्हें बता दिया कि वह रेड्डी के लिए रखी हुई है। अचानक ही राहुल गांधी वहां आए और सीट खाली देखकर उस पर बैठ गए। राहुल को मना करने की हिम्मत नटराजन तो नहीं जुटा सकीं पर जोशी की खामोशी भी काफी कुछ कह गई। बात यहीं समाप्त नहीं हो रही है, लोग यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि अगर पीएम की कुर्सी पर राहुल धोखे से बैठ गए तो सरदार जी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति तय है।

तुरूप कार्ड छूने पर नाराज हुई कांग्रेस
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के उपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख के.एस.सुदर्शन के अमेरिकन गुप्तचर एजेंसी सीआईए के एजंेट होने के हमले के उपरांत कांग्रेस की बासी कढी में उबाल सा आ गया है। कांग्रेस इस बात का मातम मना रही है कि संघ के पूर्व सुप्रीमो ने आखिर ऐसा संगीन आरोप क्यों लगाया? उधर सोनिया गांधी के करीबी कांग्रेसियों से खार खाए कांग्रेस के कुछ सरमायादारों ने इस तरह के आरोपों को हवा देना आरंभ कर दिया है। हालात देखकर यह लगने लगा है कि संघ अब बैकफुट पर आ गया है। संघ ने सोनिया गांधी पर आरोप देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल मंे जड़े हैं। आरोपों के उपरांत कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपना विरोध दर्ज कराया। कहते हैं कि दिग्गी राजा के समर्थकों ने भोपाल के मीडिया पर्सन को बाकायदा फोन कर उन्होंने खबरों को प्रमुखता से छापने का अनुरोध किया। बाद में जब यह बात कांग्रेस के मध्य प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी को पता चली उन्होंने भी अपना विरोध दर्ज कराया। चर्चा है कि इस सबसे बाद भी पीसीसी में खामोशी ही पसरी रही।


शिव को चुभने लगा है अब कमल!
वैसे तो भगवान शिव को बेलपत्री, धतूरा आदि भाता है, पर अगर कोई कमल उन पर चढ़ा दे तो वे नाराज नहीं होते। मध्य प्रदेश के दो क्षत्रप कमल नाथ और शिवराज सिंह चौहान के बीच लगने लगा है कि अब हनीमून पूरी तरह से समाप्त हो गया है। बार बार लुभावने वादों से केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को तबियत से ‘‘मामा‘‘ बनाया। बाद मे जब मामला शिवराज की समझ में आया तब तक काफी देर हो चुकी थी। सूत्रों के अनुसार कमल नाथ ने मध्य प्रदेश को सबसे ज्यादा रकम देने का लाईलप्पा टिकाया, बाद में असलियत सामने आई तो प्रदेश भाजपा ने कमल नाथ को घेरने का प्रयास किया। इसी बीच खजुराहो की इंवेस्टर्स मीट का न्योता देने दिल्ली गए शिवराज को एक बार फिर लोक लुभावने सपने दिखाकर कमल नाथ ने शिवराज को चारों खाने चित्त कर दिया। इस मीट में अरूण यादव को छोड़कर और कोई नहीं पहुंचा। फिर क्या था शिव का तीसरा नेत्र तो खुलना ही था। कहा जा रहा है कि इस तीसरे नेत्र पर दिल्ली में बैठे भाजपा के आला नेता ही पट्टी बांधने की तैयारी में हैं।

अरूण डाउन, सुषमा अप
दुनिया के चौधरी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारतीय जनता पार्टी में भी अंदरूनी सियासत जबर्दस्त गर्मा गई है। ओबामा के जाने के बाद अब भाजपा के आला नेताओं की रंेकिंग भी अघोषित तौर पर की जाने लगी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्य सभा के अरूण जेतली के बीच भी नंबर वन की होड़ में दोनों ही के समर्थकों का मन उपर नीचे हुए बिना नहीं है। ओबामा की यात्रा में सुषमा स्वराज की टीआरपी में जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया है, किन्तु अरूण जेतली का ग्राफ नीचे आ गया है। ओबामा के दौरे में समयाभाव में यह तय कर पाना मुश्किल था कि सुषमा स्वराज को ओबामा से मिलवाया जाए या फिर अरूण जेतली को। अंततः मामला स्वराज के पक्ष में फैसला हुआ। सुषमा के मिलने के बाद जेतली खेमा अपने आप को बहुत बेईज्जत महसूस करता रहा। जेतली खेमे ने सारा जोर लगा दिया। बाद में प्रधानमंत्री के भोज में जेतली को ओबामा से मिलने का अवसर मिल ही गया। अब जेतली खेमा आहत है कि उनके सरमायादार अरूण जेतली की रेंकिग सुषमा स्वराज के बाद नंबर दो पर आ गई है।

‘‘गरीब कोटे‘‘ के कारण नए चव्हाण भी हैं संकट में
महाराष्ट्र के नए निजाम पृथ्वीराज चव्हाण पर भी अंधेरगर्दी, घोटाले की आंच आने लगी है। चव्हाण पर आरोप है कि उन्होनें बतौर सांसद अपने पद का दुरूपयोग कर आधा करोड़ मूल्य का एक फ्लेट महज चार लाख रूपए में खरीदा था। सूचना के अधिकार कार्यकर्ता ने इस बात का खुलासा करके ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया है। मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गाल्गली का दावा है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के वडाला क्षेत्र के भक्ति पार्क की बिल्डिंग नंबर 12 में पृथ्वीराज चव्हाण के नाम पर एक मकान है। सांसद चव्हाण को यह आवास ‘‘गरीब कोटे‘‘ में आवंटित किया गया है। 20 मई 2003 को चव्हाण केा यह फ्लेट आवंटित हुआ तब वे सांसद थे। चव्हाण द्वारा इस आवास के लिए जो दस्तावेज संलग्न किए गए थे, उसमें उनकी खुद की मासिक आय 76 हजार रूपए अर्थात नौ लाख बारह हजार रूपए सालाना और एक राशन कार्ड जो उनकी स्वर्गीय माता परमिलबाई दाजीसाहेब चव्हाण के नाम पर था, में पारिवारिक आय आठ हजार रूपए माहवार यानी लगभग एक लाख रूपए सालाना दर्शाई गई थी। कथित तौर पर बेदाग छवि के धनी समझे जाने वाले पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने नामांकन के दौरान दायर हलफनामे में भी इस फ्लेट का जिकर करना मुनासिब नहीं समझा था। कहा जा रहा है कि खुद दागदार मुख्यमंत्री क्या निर्वतमान दागदार नेता के काले कारनामों की जांच ईमानदारी से कर पाएगा।

‘‘राजा‘‘ को लेकर उबलने लगी है सियासत
टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में केंद्रीय संचार मंत्री ए.राजा के लिप्त होने के आरोपों के बाद विपक्ष ने अपनी बोथरी धार को पजाना आरंभ कर दिया है। विपक्ष चाहता है कि इस मामले में अव्वल तो राजा को हटाया जाए, फिर संयुक्त संसदीय समिति के जरिए इस पूरे घोटाले की जांच की जाए। पौने दो लाख करोड़ रूपयों के टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के सुर्खियों में बने रहने के बावजूद भी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के चेहरे पर शिकन भी नहीं दिख रही है। कांग्रेस अपने अधिवेशन में भ्रष्टाचार पर चर्चा न कर यही साबित कर रही है कि उसे भ्रष्टाचार और घोटालों से बहुत अधिक लेना देना नहीं है। उधर द्रमुक राजा के बचाव में आगे आ रहा है। द्रमुख ने साफ कहा है कि सीबीआई जांच के नतीजे आने तक विपक्ष को धैर्य रखना चाहिए, साथ ही यह धमकी भी दी है कि अगर राजा को हटाया तो सात मंत्री त्यागपत्र दे देंगे। अन्नाद्रमुक की जयललिता ने कांग्रेस के सामने जलेबी लटकाई है कि अगर राजा को हटाया जाता है तो वे 18 सांसदों का समर्थन जुटाकर सरकार को गिरने से बचा लेंगी। कांग्रेस के रणनीतिकार पशोपेश में हैं क्योंकि राजा को हटाकर अगर जयललिता को साधा तो जयललिता की बारगेनिंग कांग्रेस को बहुत अधिक मंहगी पड़ने वाली है।

भाजपा की ओर बढ़ रहा है एनडी का रूझान
एक समय कांग्रेस की नाक का बाल रहे नारायण दत्त तिवारी अब कांग्रेस में ही बेगाना महसूस कर रहे हैं। उमर दराज हो चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तिवारी कांग्रेस के रवैए से अपने आप को आहत महसूस कर रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस के खेमे में यह बात गूंजने लगी है कि सालों साल कांग्रेस का झंडा मजबूत करने में जीवन गंवाने वाले कांग्रेसियों को उमर के आखिरी पड़ाव में राजनैतिक तौर पर असहाय होना पड़ रहा है। इस मामले में लोग पूर्व प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंहराव, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह, सुश्री विमला वर्मा, विद्याचरण शुक्ल आदि का उदहारण दे रहे हैं। इनके मौका परस्त अनुयायी और चाहने वालों ने भी दूसरे गुटों को साधने में देरी नहीं की है। बहरहाल हाल ही में उत्तराखण्ड के स्थापना दिवस पर आंध्र के पूर्व राज्यपाल एन.डी.तिवारी की मोजूदगी से इन कयासों पर बल मिला कि वे भाजपा की बांह थाम सकते हैं, किन्तु नारायण दत्त तिवारी को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे दलों से भाजपा में जाने वालों की सीनियारिटी भाजपा में जीरो से ही आंकी जाती है।

राजा और पटेल में समानता!
कांग्रेस के आला नेता इन दिनों कांग्रेस के दो ताकतवर महासचिवों, राजा दिग्विजय सिंह और अहमद पटेल के बीच समानताएं खोज रहे हैं। समानता नंबर एक दोनों ही नेता कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के सबसे करीब हैं। दो - दोनों ही नेताओं से कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी मशविरा लिया करते हैं। तीन - कांग्रेस के आला क्षत्रप भी दोनों ही नेताओं की देहरी पर सर रगडकर अपने आप को धन्य समझते हैं। चार - दोनों ही नेताओं ने अपने अपने गुर्गों को ताकतवर बनाकर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। पांच - दोनों ही नेताओं की नजरें तिरछी होने पर कांग्रेस के आला कमान की नजरें तिरछी होने में समय नहीं लगता। छः - दोनों ही नेताओं का सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का है। सात - दोनों ही नेताओं ने प्रदेश से निकलकर केंद्रीय राजनीति में कम समय में ही अपने आप को स्थापित कर प्रभावशाली जगह बनाई है। कांग्रेस मुख्यालय में एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि एक समानता आप भूले जा रहे हैं, जिस तरह अहमद पटेल ने गुजरात में कांग्रेस का बट्टा बिठाकर नरेंद्र मोदी को मजबूत किया है, उसी राह पर चलते हुए राजा दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश मंे कांग्रेस का बट्टा बिठाकर भाजपा की उन्नति के मार्ग प्रशस्त किए हैं।

चर्चा में है भूतल परिवहन मंत्रालय!
यह बात तो सच है कि मूलतः उद्योगपति राजनेता कमल नाथ जिस किसी भी विभाग में मंत्री रहे हैं, वह विभाग चर्चाओं में आ ही जाता है। वन एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए पृथ्वी सम्मेलन में भारत की जोरदार उपस्थिति से उन्होंने तालियां बटोरी थीं। इसके बाद पदावनत होते हुए वस्त्र मंत्रालय संभाला, तब भी उनका मंत्रालय चर्चाओं में रहा। पिछली मर्तबा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का प्रभार संभालते हुए उन्होंने विदेश यात्राओं का खासा रिकार्ड कायम कर दिया, किन्तु अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा और मध्य प्रदेश की झोली सूनी ही रखी। अब भूतल परिवहन मंत्रालय जमकर चर्चा में है। सड़क परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय संबंधी संसदीय स्थाई समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों की सुस्त कार्यप्रणाली पर जमकर फटकार लगाई है। दरअसल मोटर वाहन अधिनियम के संशोधन को लेकर समिति ने विभाग को विरोध, शिकायतें और सुझाव भेजे थे। अधिकारियों ने इसका माकूल जवाब देना उचित नहीं समझा। समिति ने इसे अपनी तौहीन बताया है। समिति ने परिवहन सचिव को कहा है कि अब तक की गई तमाम कार्यवाही को लिखित तौर पर समिति के समक्ष पेश किया जाए।

यह है शिव के हाल में प्रजा का हाल सखे!
देश का हृदय प्रदेश कहलाता है मध्य प्रदेश। 2003 से इस प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का कथित सुशासन और राम राज्य चल रहा है। सबसे पहले उमा भारती फिर बाबूलाल गौर और अब पिछले लगभग पांच सालों से शिवराज सिंह चौहान इस सूबे के निजाम हैं। मध्य प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति अत्यंत जर्जर है। लूट, हत्या, मारपीट, बलवा न जाने कितने तरह के अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा है। छतरपुर में एक कैदी को पेशी पर ले जाने के दौरान सिपाही शराब पीते हैं, नशे में धुत्त सिपाहियों को चकमा देकर कैदी फरार हो जाता है। भोपाल की जिला अदालत की दीवार तोड़कर ग्यारह कैदी दिन दहाड़े भाग जाते हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार होते हैं, प्रताडित होती रहतीं हैं, पर सुशासन होने का दावा बदस्तूर जारी है। आश्चर्य तो तब होता है, जब कांग्रेस इस मामले में मौन साधे हुए मिलती है। चर्चा है कि एम पी में कांग्रेस और भाजपा के बीच अंडर टेबिल समझौते हुए हैं। हद तो तब हो गई जब संघ के धरने के दरम्यान चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था के बीच राजधानी भोपाल में आठ स्थानों पर महिलाओं की चेन लूट ली गई। पुलिस के अफसर भी क्या करें, उनके मातहत सिपाही सारा दिन कबाडियों के पास जाकर चोरी के माल की चौथ वसूली जो करते रहते हैं।

धक्का किसने दिया तलाश रहे हैं राजूखेड़ी
पुरानी कहानी है कि एक अखाड़े में पहलवान ताल ठोंककर लोगों को लड़ने के लिए बुला रहा था, ईनाम था एक हजार रूपए। इतने में एक जवां मर्द अखाड़े में कूद गया और उस नामी पहलवान को हराकर एक हजार रूपए ले आया। सबसे पहले उसने यह मालूमात करने की कोशिश की कि आखिर अखाड़े में उसे धक्का किसने दिया था, यह तो गनीमत थी कि वह बच गया वरना उसका राम नाम सत्य तय था। इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के पद के लिए मीडिया में नाम उछलने के बाद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी यह ढूंढ रहे हैं कि आखिर मीडिया में उनका नाम किसने उछाल दिया। अमूमन होता यही है कि जिसे भी कतार से हटाना होता है उसके नाम को हवा में उछाल दिया जाता है। दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले मीडिया पर्सन्स के फोन बार बार राजूखेड़ी को बधाई दे रहे हैं। वे असमंजस में हैं कि अभी तक उन्हें कोई सूचना नहीं पर नाम चल पड़ा है, आखिर गोदे (अखाड़े) में उन्हें धक्का किसने दिया। उधर कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह और बी.के. हरिप्रसाद ने अलग से उनका स्पष्टीकरण मांग कर उन्हें हलाकान कर रखा है।

पुच्छल तारा
देश के हृदय प्रदेश में चेन स्नेचिंग अर्थात सरे राह महिलाओं की चेन लूटने की घटनाओं से आहत हैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की महिलाएं। भोपाल से मुस्कान मलिक ने इस बारे में एक ई मेल भेजा है। मुस्कान लिखती हैं कि आधुनिक बहू के कम कपड़े और अश्लीलता के दिखावे को देखकर पुराने ख्यालों वाली उसकी सास ने कहा -‘‘बहू, क्या जमाना आ गया है, हम जब आए थे तब . . . .। वैसे लज्जा नारी का ‘आभूषण‘ होता है।‘‘ बहू तपाक से बोली -‘‘लेकिन मां जी, आजकल चेन स्नेचिंग इतनी ज्यादा हो रही है, गुण्डागर्दी चरम पर है, महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं पता है आपको? अब आप ही बताईए कि इन हालातो में भला कोई महिला ‘आभूषण‘ पहनने का साहस कर पाएगी?‘‘

सोमवार, 1 नवंबर 2010

दीपावली पर लगा ओबामा का ग्रहण

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

दीपावली पर लगा ओबामा का ग्रहण

अमावस्या के दिन होती है दीपावली। इस रात को घुप्प अंधेरे के बावजूद सारा हिन्दुस्तान कृत्रिम रोशनी से नहाया होता है। इस साल के त्योहारों पर मानो ग्रहण ही लग गया है। इस साल अधिकांश त्योहार वैसे भी रविवार के दिन ही पड़े, सो नौकरीपेशा लोगों की न जाने कितने दिनों की छुट्टी मारी गई। नवरात्र के समय राष्ट्रमण्डल खेलों ने दिल्लीवासियों का मजा फीका कर दिया था। वैसे भी दिल्ली में नवरात्र की खासी धूम रहा करती है। अब मुंबईवासियों पर दीपावली के मजे को किरकिरा करने की तैयारी की जा रही है। अवसर है दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा का। महाराष्ट्र की कांग्रेसनीत सरकार ने तुगलकी फरमान जारी कर दिया है कि मुंबईवासी दीपावली के पर उंची आवाज के फटाके नहीं चलाने का। स्काटलेंड यार्ड की पुलिस के बाद अघोषित तौर पर दूसरे नंबर का दर्जा पाने वाली मुंबई पुलिस भी चाह रही है कि मुंबईवासी उंची आवाज के फटाकों का प्रयोग न करें। यद्यपि इसके पीछे दलील दी जा रही है कि फटाखों की आवाजों से कहीं अफवाहें न फैलें और अफरातफरी का आलम न हो जाए, फिर भी कहा जा रहा है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम क्या इतना साहस कर पाएंगे कि वे क्रिसमस के मौके पर अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे, और इस तरह की अफवाहों से बचने के लिए अमेरिका फटाखे फोड़ने या जश्न मनाने पर पाबंदी लगा पाएगा?

गेम्स में भी दिखी पीएम की असफलता की छाप

भारत गणराज्य का दुर्भाग्य है कि देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन शख्स ने आज तक कोई चुनाव सीधे सीधे नहीं जीता है। हमेशा ही सरदार मनमोहन सिंह ने पिछले दरवाजे से ही दाखिला लिया है। जब से मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री का पद संभाला है तब से भारत में मंहगाई का ग्राफ है कि रूकने का नाम ही नहीं ले पा रहा है। कामन वेल्थ गेम्स में भी उनका यह प्रभाव देखने को मिल ही गया। खेलों के दौरान भारत ने हाकी में काफी उत्साहजनक प्रदर्शन किया। जिन भी खेलांे को देखने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और सोनिया गांधी के दमाद राबर्ट वढेरा गए, उन मैचों या खिलाडियों ने जीत हासिल की। हाकी के उत्साहजनक प्रदर्शन के बाद जब फायनल मैच देखने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पहुंचे तो भारत आठ शून्य से हार गया। कहने वाले यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि ‘‘जहां जहां पैर पड़े सन्तन के तहां तहां . .।‘‘

पितृ पुरूष को ही भूली भाजपा

भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान नेतृत्व कितना कृतध्न है कि वह अपने पितृ पुरूष पूर्व महामहिम राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत को ही भूल गई। भैरो सिंह शेखावत ने भाजपा की जड़ों को जमाने के लिए न जाने क्या क्या जतन किए थे। उनकी पुण्य तिथि पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा न तो केंद्रीय स्तर पर ही उनके गृह राज्य राजस्थान मंे ही कोई कार्यक्रम आयोजित करना ही मुनासिब समझा। भाजपा के उदय और उसके कार्यक्षेत्र के विस्तार में भैरो सिंह शेखावत के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए भैरो सिंह शेखावत सदा ही याद किए जाते रहेंगे, किन्तु लगता है भाजपा के नए निजाम नितिन गड़करी ने बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय की कहावत पर अमल करना आरंभ कर दिया है, यही कारण है कि भाजपा के पितृ पुरूष समझे जाने वाले भैरो सिंह शेखावत की पुण्य तिथि पर उन्हें याद तक नहीं फरमाया गया।

स्तरहीन बयानबाजी पर उतरे राजनेता

कहते हैं प्रेम और जग में सब कुछ जायज है, किन्तु सब कुछ नैतिकता के साथ ही जायज माना गया है। बिहार में आसन्न विधानसभा चुनावों में एक दूसरे के दामन पर कीचड़ उछालने में राजनेता अपनी वर्जनाएं ही भूलते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश से अपने राजनैतिक जीवन आरंभ करने वाले शरद यादव ने तो हद ही कर दी। एक चुनावी सभा में उन्होंने फरमाया कि जवाहर लाल, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी के बाद अब बबुआ राहुल गांधी राजकाज करने वालों में शामिल हो रहे हैं। उन्हें जो लिखकर दिया जाता है, वे पढ़ देते हैं उन्हें कुछ नहीं पता होता है। एसे नेता को गंगा में फेंक देना चाहिए। शरद यादव की उक्त बात से साफ हो जाता है कि वे राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव से कितने खौफजदा हैं। बेहतर होता शरद यादव राहुल गांधी को आमने सामने बहस की चुनौति देते। हो सकता है शरद यादव, राहुल पर भारी पड़ते, किन्तु स्तर हीन बयानबाजी राजनैतिक परिवेश में जहर ही घोलने का काम करती है।

चर्चा में प्रिंट मीडिया का एक विज्ञापन!

देश के बारह राज्यों में अपने आधा सैकड़ा से अधिक संस्करण निकालने वाले 64 साल पुराने एक अखबार में प्रकाशित होने वाला एक विज्ञापन इन दिनों चर्चाओं में है। इस विज्ञापन में एक व्यक्ति की शवयात्रा के दृश्य के साथ कुछ कोटेशन लिखे हुए हैं, जिसमें तंबाखू के उत्पाद के सेवन को न करने का मशविरा दिया गया है, वह भी चेतावनी के साथ। इस विज्ञापन की खासियत यह है कि इसमें जिस कोटेशन का उपयोग किया गया है, वही कोटेशन तम्बाखू सहित एवं रहित पान के विकल्प के तौर पर प्रचलित पाउच की निर्माता एक नामी गिरामी कंपनी द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा है। अब लोगों में जिज्ञासा इस बात की है कि आखिर उक्त मीडिया में घराना पत्रकारिता के एक स्तंभ माने जाने वाले उक्त विशाल समूह को आखिर यह गूढ ज्ञान कहां से प्राप्त हो गया कि उसने तम्बाखू के सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को जागरूक करना आरंभ कर दिया है, वह भी पाठकों के लिए जनहित की पहल के तौर पर। कहीं यह सब इसलिए तो नहीं क्योंकि उक्त पाउच निर्माता कंपनी द्वारा इस समूह को अपना विज्ञापन नहीं दिया गया?

और यह रहा सीबीएसई का एक नायाब कारनामा

देश भर में स्कूल संचालकों का काम अब बच्चों को शिक्षित करने के साथ ही साथ इसको व्यवसाय बनाने का हो गया है। बहुत ही मुनाफे का व्यवसाय बन गया है आज की तारीख में स्कूल खोलकर उसे संचालित करना। केपीटेशन फीस के नाम पर लाखों करोड़ों रूपए अब तक स्कूल संचालकों द्वारा डकारे जा चुके हैं। शाला संचालक चाहते हैं कि उनकी शाला को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से एफीलेशन मिल जाए। हाल ही में मध्य प्रदेश में निजी तौर पर संचालिए एक शिक्षण संस्था के साथ भी सीबीएसई ने जो किया वह निश्चित तौर पर अपने आप में अद्भुत ही माना जाएगा। शैक्षणिक सत्र 2010 - 2011 के लिए मान्यता आवेदन के निरीक्षण प्रतिवेदन में कमियां पाए जाने पर आवेदन निरस्त कर नया आवेदन करने के लिए आदेशित करने के बाद भी सीबीएसई बोर्ड ने इसी सत्र के लिए उसी आवेदन पर पुनः निरीक्षण कमेटी का गठन कर दिया। कहा जा रहा है कि अब सीबीएसई बोर्ड भी ‘‘लेन देन‘‘ के चक्कर से मुक्त नहीं है।

मंदी पड़ी भारती की रिंगटोन

भारत की बड़ी टेलीकाम कंपनियों की सिरमोर भारती एयरटेल की घंटी की आवाज इन दिनों मंदी पड़ती दिख रही है। जून की तिमाही मंे इसका मुनाफा 23 फीसदी नीचे आ गया है। अगर इसमें भारती की अफ्रीकी कंपनी जैन को शामिल किया जाए तो इस दौरान नुकसान बढ़कर 32 फीसदी हो जाता है। अप्रेल से जून की तिमाही में भारती का मुनाफा 1662 करोड़ रूपए था, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 2475 करोड़ रूपए का था। घरेलू बाजार में कड़ी चुनौति का सामना करने वाली भारती के सामने सबसे अधिक प्राथमिकता इस बात की है कि वह अफ्रीकी इकाई को लाभ में लाए। भारत में आज टेलीकाम से जुड़ने वालों की संख्या साठ फीसदी है। अगस्त माह के बाद टेलीकाम बाजार में आई कंपनियों और मोबाईल सेवा प्रदाताओं की गलाकाट स्पर्धा के कारण भारती को वैसे भी कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है। अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में भारती टेलकाम ने अनेक राज्यों में अपनी आमद दी थी, किन्तु अब उसकी जड़ें उतनी मजबूत नहीं मानी जा सकती हैं।

सरल या निरीह हैं प्रधानमंत्री

पिछले दिनों राष्ट्रमण्डल खेलों के उद्घाटन के दौरान हुए एक वाक्ये के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह बेहद ही सरल स्वभाव के हैं या निरीह हैं? कामन वेल्थ गेम्स का उद्घाटन हो रहा था, प्रधानमंत्री भी इस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। प्रधानमंत्री सिंह अपने लिए निर्धारित स्थान पर ही आसनी पर बैठे थे। इतने में राष्ट्रपति भवन के आला अधिकारी ने आकर पीएम से कहा कि वे अपने स्थान से थोड़ा सा हट जाएं, ताकि भारत गणराज्य की पहली महामहिम राष्ट्रपति के पति के लिए कुर्सी खाली हो सके। पीएम ने बिना ना नुकुर के आगा पीछा सोचे बिना ही देवी सिंह पाटिल के लिए स्थान दे दिया। देखा जाए तो यह प्रोटोकाल, सुरक्षा, और नैतिकता के लिहाज से उपयुक्त नहीं होने के साथ ही साथ अपमान जनक भी था। अब लोग कहने लगे हैं कि कहीं एसा न हो कि उन्हें किसी दिन कह दिया जाए कि आप 7, रेसकोर्स (प्रधानमंत्री के सरकारी आवास) से थोड़ा सा खिसक जाएं, इसे अब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का अशियाना बनाना है।

घर में नहीं हैं दाने, अम्मा चली भुनाने!

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में पेयजल आज भी सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। नब्बे फीसदी घरों में या तो वाटर प्यूरीफायर लगा हुआ है, या फिर बोतल बंद पानी का उपभोग ही किया जाता है, पर इस किल्लत से दिल्ली सरकार को लेना देना नहीं है। उसे तो परवाह है लो फ्लोर बस की चमचमाहट से। कामन वेल्थ गेम्स में देश का चेहरा उजला दिखाने की गरज से सड़कों पर दौड़ने वाली लो फ्लोर एसी और नान एसी बसों की धुलाई से उनकी चमक फीकी पड़ रही थी, सो इन लो फ्लोर बसों के रखरखाव का जिम्मा संभालने वाली टाटा कंपनी ने दिल्ली सरकार से आरओ वाटर के लिए प्लांट लगाने की इजाजत मांगी थी, जो उसे मिल गई है। सरकार ने नौ बस डिपो में रिवर्स ओसमोसिस (आरओ) प्लांट लगाने की इजाजत दी थी। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि दिल्ली में टेक्स देने वाले नागरिकों को साफ शुद्ध पानी मयस्सर नहीं है पर दिल्ली की लाईफ लाईन बन चुकी मेट्रो रेल गाड़ी की धुलाई भी आरओ जैसे अतिशुद्ध विषाणू रहित पानी से की जाती है। अब इसे कांग्रेसनीत शीला सरकार का चमत्कार ही माना जाए कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की नाक के नीचे सब कुछ हो रहा है पर कांग्रेस के आलंबरदार मौन साधे हुए हैं।

चूहों का पैसा ही ‘‘कुतर‘‘ गया विश्वविद्यालय!

राजस्थान में एक बड़े विश्वविद्यालय द्वारा चूहांे का पैसा ही कुतरने का मामला प्रकाश में आया है। राजस्थान विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग के एनीमल हाउस में रखे दुर्लभ प्रजाति के चूहों के संरक्षण के लिए स्वीकृत किए गए 11 लाख रूपए उपयोग के अभाव में लेप्स हो गए, जिसकी चर्चाएं मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय में चटखारे लेकर हो रही हैं। एनीमल हाउस में रखे अमेरिकन प्रजाति के सफेद चूहों की नस्ल अमेरिका के सुप्रसिद्ध वी स्टार इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने तैयार की थी। एचआरडी मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि इसके लिए दिए गए 11 लाख रूपयों को एनीमल हाउस में रखे प्राणियों के लिए एयर कंडीशनर आदि लगाने के लिए प्रदाय किया गया था, चूंकि बड़ी तादाद में एसी लगवाने पर आने वाले बिजली के बिल को उठाने में विश्वविद्यालय ने असमर्थता जता दी थी अतः यह काम रोक दिया गया, और राशि लेप्स हो गई। वी स्टार के नाम से प्रसिद्ध ये चूहे प्रयोगशाला में प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, पर विश्वविद्यालय प्रशासन की तुगलकशाही के चलते इनका संरक्षण का काम नहीं हो सका। आश्चर्य तो इस बात पर है कि इस मामले में प्राणियों पर होने वाले अत्याचार पर सदा ही बोलती रहने वाली मेनका गांधी भी खामोश ही हैं।

सुरक्षित हैं राजधानी वासी

राजधानी दिल्ली सदा से ही अपराधों के मामले में चर्चाओं में रही है। किन्तु राजधानी पुलिस के आंकड़ों के बाजीगरों ने इसे संतोषप्रद जताने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो आला 35 शहरों में अपराध के मामले में मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर पहली, राजनैतिक राजधानी भोपाल दूसरी तो जयपुर तीसरी पायदान पर है। दिल्ली का नंबर 12वें स्थान पर आता है। यद्यपि ब्यूरो के उक्त आंकड़े 2007 के हैं, फिर भी दिल्ली वासी यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि वे भोपाल इंदौर के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं। इसमें से वाहन चोरी और सड़क दुर्घटनाओं को माईनस कर दिया जाए तो दिल्ली का नंबर 20वें स्थान पर आ जाता है। इंदौर का क्राईम रेट 792, भोपाल का 760, जयपुर का 606, जबलपुर 585, विजयवाड़ा 552, पटना 526, कोच्चि 487, आईटी सिटी बंग्लुरू 461, तो दिल्ली का यह रेट 398 है। 2009 में दिल्ली का क्राईम रेट घटकर 277 हो गया है।

कुमारतुंगे की गुपचुप यात्रा!

श्रीलंका की पूर्व महामहिम राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगे पिछले दिनों मध्य प्रदेश के कान्हा अभ्यारण में सुस्ताने के बाद वापस रवाना हो गईं। कुमारतुंगे की कान्हा नेशनल पार्क की यात्रा को सुरक्षा कारणों से गोपनीय रखा गया था। गौरतलब है कि श्रीलंका में एलटीटीई के आतंक के सफाए में कुमारतुंगे की भी महती भूमिका रही है। इधर आदिवासी बाहुल्य मण्डला जिले की सीमा में अवस्थित कान्हा नेशनल पार्क का क्षेत्र भी नक्सलवादियों की शरणस्थली और कार्यस्थली के रूप में सालों से बना हुआ है। जब इसकी खबर मीडिया को लगी तो उन्होंने वन विभाग से संपर्क किया तब वन विभाग ने इस बात को महज अफवाह ही करार दिया। उनके भ्रमण के पूरे होने के बाद वन विभाग ने बताया कि सुरक्षा कारणों के चलते उनका दौरा गुप्त रखा गया था। कुमारतुंगे अपने साथ क्या संस्मरण लेकर गईं हो यह बात तो वे ही जाने पर किसी देश के पूर्व शीर्ष राजनयिक की यात्रा को गुप्त रखने से भारत गणराज्य की आंतरिक सुरक्षा कितनी मजबूत है, यह बात अपने आप ही सिद्ध हो जाती है।

पुच्छल तारा

दीपावली आने को है, दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का चलन भारत में जबर्दस्त है। लोग कर्म के बजाए भाग्य और भगवान पर ही विश्वास कर हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। इस मामले को रेखांकित करने के लिए अहमदाबाद से सुरभी बैस ने एक बेहतरीन ईमले भेजा है। सुरभी लिखती हैं कि बिल गेट्स ने लक्ष्मी पूजा कभी नहीं की, पर बिल गेट्स सबसे अमीर व्यक्ति हैं। आईंस्टीन ने कभी सरस्वती को नहीं पूजा पर वे सबसे इंटेलीजेंट साबित हुए, तो कर्म पर विश्वास रखें, भाग्य पर नहीं। वैसे भी किसी ने कहा है कि भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले वही पा पाते हैं, जो तेज दौडने वाले राह में पड़ी चीजों को चुनकर बाकी बेकार की चीजें छोड़ जाते हैं।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

कमल ताल पर मुजरा करती हृदय प्रदेश की भाजपा

कमल ताल पर मुजरा करती हृदय प्रदेश की भाजपा
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश मंे भारतीय जनता पार्टी के शासन के सात साल पूरे होने को आ रहे हैं। इन सात सालों में 2010 में सत्ता और संगठन में तालमेल की कमी जबर्दस्त परिलक्षित हो रही है। मामला चाहे निगम मण्डलों में लाल बत्ती बांटने का हो अथवा केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मंत्रियों के साथ जुगलबंदी का, हर मामले में सत्ता और संगठन का रूख अलग अलग ही साफ तौर पर दिखाई देता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और लोक कर्म मंत्री नागेंद्र सिंह भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में न केवल कशीदे गढ़ते हैं, वरन् मंत्री मुख्यमंत्री की छवि निर्माण का काम संभालने वाला जनसंपर्क महकमा भी कमल नाथ एवं अन्य मंत्रियों के साथ ‘‘सोजन्य भंेट‘‘ की अनेकानेक तस्वीरें बारंबार भेजता है, जिसमें उभय पक्ष मुस्कुराते हुए एक दूसरे का अभिवादन करते दिखते हैं। कभी मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिए कमल नाथ को घेरने का कार्यक्रम बनाकर उसे अमली जामा नहीं पहनाया जाता है, तो अब एक बार फिर एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रीमण्डल सहयोगियों के साथ वजीरे आजम डॉ. मनमोहन सिंह से मिलकर भूतल परिवहन मंत्रालय के द्वारा किए जाने वाले पक्षपात की शिकायत करने का तान छेड़ रही है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं मध्य प्रदेश भाजपा के कमल नाथ घेरो अभियान की तरह इस बार भी यह कार्यक्रम टांय टांय फिस्स न हो जाए, होता भी है तो हो इससे जनसेवकों को क्या लेना देना, अंत्तोगत्वा पिसना तो निरीह जनता जनार्दन को ही है। मजे की बात तो यह है कि इस मर्तबा शिवराज मंत्रीमण्डल सिर्फ और सिर्फ नर्मदापुरम के दो राष्ट्रीय राजमार्ग की दुर्दशा के लिए पीएम से मिलने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में जिस जिस जिले से होकर नेशनल हाईवे गुजरता है, उन जिलों में शिवराज सरकार की केबनेट की बैठक रख दी जाए तो कम से कम इन जिलों की किस्मत चमकने के मार्ग ही प्रशस्त होने की उम्मीद जग जाएगी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मण्डली ने नर्मदापुरम को जोड़ने वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली पर अफसोस जाहिर किया जाना आश्चर्यजनक माना जा रहा है। देखा जाए तो शिवराज मंत्रीमण्डल में समूचे सूबे के हर क्षेत्र को प्रतिनिधित्व दिया गया है, इन क्षेत्रों में से अनेक विधायक एसे भी हैं, जिनके विधानसभा क्षेत्र से नेशनल हाईवे होकर गुजर रहा है। इसके अलावा जब भी मुख्यमंत्री या मंत्री सड़क मार्ग से विचरण करते हैं, तब वे सड़कों की बदहाली से दो चार हुए बिना नहीं रहते हैं। बावजूद इसके मंत्रियों ने अपने अपने क्षेत्र या अन्य नेशनल हाईवे की दुर्दशा पर मौन ही साध रखा है।
संसदीय कार्य और विधि विधाई मंत्री एवं शिवराज सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा ने भोपाल में मीडिया से रूबरू होते हुए कहा कि 15 नवंबर के पहले मंत्रीमण्डल के सदस्य शिवराज सिंह की अगुआई में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से भेंट कर मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे की दुर्दशा का कच्चा चिट्ठा उनके समक्ष रखेंगे। राष्ट्रीय राजमार्ग का संधारण एवं निर्माण केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय की महती जवाबदारी है, जाहिर है यह मामला भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ ही जाएगा।
 
इसके पहले सितम्बर माह में मध्य प्रदेश भाजपा का कहना है कि वह 5 से 7 अक्टूबर तक नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले कस्बों और ग्रामों में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी फिर 22 से 24 अक्टूबर तक इन्ही ग्रामों में मानव श्रंखला बनाई जाने के उपरांत 10 नवंबर को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। भाजपा के इस निर्णय से कमल नाथ और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती और तेज हो गई थी। अब जबकि पांच से सात अक्टूबर और 22 से 24 अक्टूबर की तिथि भी निकल चुकी है, तब भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि आखिर वे कौन से हिडन रीजन और वेस्टेज इंटरेस्ट (छिपे हुए कारण, और निहित स्वार्थ) हैं जिनके चलते भाजपा जनता से सीधे जुड़े मुद्दे पर भी कमल नाथ को घेरने में अपने आप को असफल ही पा रही है।
 
जब मध्य प्रदेश में सत्ताधारी और केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा का आलम यह है तो गरीब गुरबों की कौन कहे, वह भी तब जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की आसनी पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सालों साल सींची गई मध्य प्रदेश की विदिशा संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीती सुषमा स्वराज विराजमान हों, तब भी मध्य प्रदेश की सड़कें इस तरह से बदहाल हो रही हो, केंद्र के मंत्री मध्य प्रदेश के साथ अन्याय कर रहे हों, इस अन्याय के बाद भी पता नहीं किस बात से उपकृत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और सूबे के लोक निर्माण मंत्री दोनों ही केंद्र सरकार को कोसकर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में तराना गा रहे हों, साथ ही साथ भाजपा द्वारा कमल नाथ के द्वारा प्रदेश के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने के आरोप में सड़कों पर उतरने की बात की जाए तो यह तथ्य निश्चित तौर पर शोध का ही विषय माना जाएगा।
 
दरअसल सड़कों या आवागमन के साधनों का राज्य, जिला, विकासखण्ड, कस्बों के विकास में महत्वपूर्ण रोल रहता है। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण दो सूबों को आपस में जोड़ने की गरज से किया गया था। जब भी कोई व्यक्ति एक सूबे से दूसरे सूबे में उद्योग धंधे के लिए जाता है तो सबसे पहले वह आवागमन के साधनों पर नजरें इनायत करता है। पूर्व में राजा दिग्विजय सिंह के शासनकाल मंे पर्यटकों को मध्य प्रदेश लाने वाली संस्थाओं ने यहां की बदहाल सड़कों को देखकर हाथ खड़े कर दिए थे। राजा दिग्विजय सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल के अंतिम सालों में पांच सौ करोड़ के बांड सड़कों के लिए जारी किए थे, जिन्हें भुनाया था शिवराज सरकार ने।
 
बहरहाल, इसके पहले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री ने दिल्ली में एक समारोह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तबियत से तारीफ की और यहां तक कहा कि मध्य प्रदेश को सिर्फ और सिर्फ सड़कों के मामले में केंद्र से पर्याप्त सहयोग और समर्थन मिल रहा है। मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री के कथन के बाद मध्य प्रदेश की ओर से दिल्ली में बैठे जनसंपर्क महकमे के अधिकारियों ने भी एमपी के चीफ मिनिस्टर शिवराज सिंह और केंद्रीय राजमार्ग मंत्री कमल नाथ के बीच मुस्कुराकर बातचीत करने वाले छाया चित्र और खबरें जारी कर दीं। मजे की बात तो यह है कि बारंबार शिवराज सिंह चौहान ने भी कमल नाथ को एक उदार मंत्री होने का प्रमाण पत्र जारी किया है।
बुरदलोई मार्ग स्थित मध्य प्रदेश भवन में पत्रकारों से रूबरू मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब केंद्र पर भेदभाव का आरोप मढ़ा तब पत्रकारों से शिवराज से पूछा था कि उनके लोक निर्माण विभाग के मंत्री तो कमल नाथ के पक्ष में कोरस गा रहे हैं, तब चिढकर शिवराज ने कहा था कि लोक निर्माण मंत्री क्या वे (शिवराज सिंह चौहान) भी कमल नाथ से मिलते हैं और कमल नाथ मध्य प्रदेश की मदद कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके लोक निर्माण मंत्री द्वारा कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में कांग्रेस के कोटे के मंत्री कमल नाथ द्वारा उदार भाव से अपने प्रदेश की भाजपा सरकार को मुक्त हस्त से मदद करने की बात जब फिजा में तैरी तो कमल नाथ की छवि दलगत राजनीति से उपर उठकर मदद करने वाले राजनेता की बन गई।
 
दिल्ली में हुई इसी पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दंभ भरकर कहा था कि केंद्र सरकार सिवनी जिले के साथ भेदभाव कर रही है। सिवनी जिले से होकर गुजरने वाला उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का काम भी केंद्र सरकार की गलत नीतियों के कारण ही रूका हुआ है। बाद में जब उनकी जानकारी में यह लाया गया कि काम 18 दिसंबर 2008 को तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के एक आदेश के तहत रोका गया है, न कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण। तब शिवराज सिंह चौहान ने एसे किसी आदेश के बारे में अनिभिज्ञता ही प्रकट की थी।
 
बहरहाल कल तक केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में कशीदे गढ़ने वाले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को अब अचानक (संगठन के कड़े रूख के उपरांत) दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। अब उन्हें भान हुआ है कि सबसे बड़े ‘‘सियासी जादूगर‘‘ कमल नाथ ने उन्हें अब तक जो सपने दिखाए थे, वे महज छलावा ही थे। सियासत के अखाड़े के स्वयंभू अपराजित अजेय (1997 में उपचुनाव में सुंदर लाल पटवा के हाथों जबर्दस्त पटकनी खाने को छोड़कर) योद्धा कमल नाथ ने एक ही धोबी पाट में प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्रियों को धूल चटवा दी है। अपने पत्र में नागेंद्र सिंह लिखते हैं कि प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गो का रखरखाव पूरी तरह एनएचएआई के हवाले कर दिया जाए या फिर इसके संधारण का काम पूरी तरह से मध्य प्रदेश सरकार को सौंप दिया जाए।
 
वैसे नागेंद्र सिंह की पीड़ा जायज है। कमल नाथ को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा न तो मई 2010 में केंद्र को भेजे गए राष्ट्रीय राजमार्गों के प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है, और न ही केंद्र द्वारा खुद ही उसका संधारण किया जा रहा है, नतीजतन ये राजमार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। नागें्रद सिंह को चाहिए कि वे इस बात को भी जनता के सामने लाएं कि उन्होंने लोक कर्म मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश की किन किन सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करने के प्रस्ताव कंेद्र को भेजे थे।
 
सियासी गलियारों में इस बात को लेकर भी तरह तरह की चर्चाएं हैं कि क्या कारण था कि बहुत ही कम यातायात दबाव वाले एवं कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से गुजरने वाले नरसिंहपुर, हर्रई, सिंगोड़ी, छिंदवाड़ा, उमरानाला, सौंसर, सावनेर, नागपुर मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग मंे तब्दील करने का प्रस्ताव उनके द्वारा केंद्र सरकार को भेजा गया था? जिस प्रस्ताव पर योजना आयोग ने कम यातायात दबाव के चलते अपना अडंगा लगा दिया है। सियासी जादूगर कमल नाथ ने एक एसा तीर चलाया था, जिसमें भाजपा के कुशाग्र बुद्धि के धनी समझे जाने वाले जनसेवक उलझकर रह गए हैं। राज्य की अनेक सड़कों को राष्ट्रीय राजमाग में तब्दील कराने का प्रस्ताव भेजकर प्रदेश सरकार ने इन सड़कों का संधारण बंद कर दिया था।
 
राज्य सरकार को लगने लगा था कि ये सड़कें जल्द ही राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील हो जाएंगी और फिर इनके रखरखाव या निर्माण का सरदर्द केंद्र के भरोसे ही होगा, जिससे इसमें व्यय होने वाले धन से राज्य सरकार पूरी तरह मुक्त होगी। वस्तुतः एसा हुआ नहीं, ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील नहीं हुई और आज भी ये प्रदेश सरकार की संपत्ति ही हैं। इतना ही नहीं दीगर राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण भी केंद्र द्वारा नही किए जाने से, संधारण के अभाव में इन सड़कों के धुर्रे पूरी तरह से उड़ चुके हैं। आम जनता को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि ये सड़कंे किसके स्वामित्व में हैं, वह तो राज्य से गुजरने वाली हर सड़क की दुर्दशा के लिए राज्य सरकार को ही पूरी तरह दोषी मानती है, भले ही केंद्र सरकार द्वारा इसका पैसा नहीं दिया जा रहा हो।
 
सड़कों बदहाली पर जनता के गुस्से को देखकर भाजपा की शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली सरकार बुरी तरह खौफजदा साफ दिखाई दे रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को घेरने के लिए वह अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह जगह नोटिस बोर्ड लगाने का मन बना रही है, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि इन सड़कों की बदहाली के लिए राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार कतई जवाबदार नही है। सूबे की सरकार मान रही होगी कि एसा करके कम से कम इन मार्गों पर चलने वालों को सच्चाई से रूबरू तो करवा ही दिया जाएगा।
 
जनता को इस बात से कतई लेना देना नहीं है कि सड़कें किसकी संपत्ति हैं, या इसके रख रखाव का जिम्मा किसका है। राज्य सरकार अगर बोर्ड लगा रही है तो फिर राज्य सरकार को उस नोटिस बोर्ड पर इस बात का उल्लेख भी करना चाहिए कि इसका संधारण करने वाला लोक कर्म विभाग का राष्ट्रीय राजमार्ग महकमा मूलतः किस राज्य की सेवा का अंग है। वस्तुतः इसके मातहत मध्य प्रदेश सरकार के कर्मचारी ही होते हैं। कर्मचारी मध्य प्रदेश के जिम्मेदारी केंद्र सरकार की अगर दोनों ही जगह एक दल की सरकार है, तब तो सामंजस्य बना रह सकता है, किन्तु अगर सरकारें अलग अलग दलों की हैं तो फिर सामंजस्य का अभाव निश्चित तौर पर परिलक्षित ही होगा।
 
सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि दीनदयाल उपाध्याय के बताए सिद्धांत पर चलने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने ही आदर्श पुरूष और मौखटे की अघोषित संज्ञा पाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम गलियारे में फच्चर फंसाने वाली कांग्रेस के मंत्रियों के खिलाफ जनता को दिखाने के लिए तो तलवारें पजा ली जातीं है, पर जब रण में उतरने की बारी आती है तो तलवारें रेत में गड़ाकर शतुर्मुग के मानिंद अपना सर जमीन में गड़ा दिया जाता है।
 
पूर्व में भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई द्वारा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा मध्य प्रदेश के साथ किए जाने वाले अन्याय का तराना बजाया था। इसके पहले भाजपा सरकार के ही मंत्री केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का चालीसा  गान कर रहे थे। मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर हस्ताक्षर अभियान, मानव श्रंखला और 10 नवंबर को प्रदेश भाजपाध्यक्ष प्रभात झा के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से मिलने का कार्यक्रम निर्धारित किया था, जो बाद में ‘अपरिहार्य‘ कारणों से परवान नहीं चढ़ सका।
 
अब शिवराज सरकार ने कमल नाथ के खिलाफ प्रत्यंचा चढ़ाई है, तरकश से तीर निकालने का स्वांग रचा है। जनता सब कुछ देख सुन रही है, समझ भी रही है। शिवराज सरकार के मंत्री तो आलीशान सरकारी वाहनों में सफर करते हैं। रही बात जनसेवकों की तो उनके लिए भी कथित तौर पर ‘‘उद्योगपति, करोबारी मित्रों‘‘ द्वारा विलासिता वाले वाहनों का प्रबंध कर दिया जाता है। इन वाहनों में चलने वालों को इस बात का किंचित मात्र भी भय नहीं होता है कि धुर्रे उड़ी सड़कों पर वाहन का कचूमर निकल जाएगा। आम जनता अपने गाढ़े पसीने की कमाई से खरीदे गए वाहन को बहुत ही संभाल कर चलाता है, फिर भी बदहाल सड़कें उसे राहत नहीं प्रदान कर पाती हैं।
 
अब उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का ही उदहारण लिया जाए तो इसमें मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह द्वारा नेशनल हाईवे के गड्ढे भरने के काम का बड़े ही भव्य कार्यक्रम में भूमिपूजन किया। 11 अक्टूबर से चार चरणों में होने वाले थिगड़े लगाने के इस काम को यह भी कहा गया कि इसे दो माह पूर्व ही स्वीकृत करवा लिया गया था। विडम्बना है कि आज 18 दिन बाद भी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) द्वारा यह कार्य आरंभ नहीं करवाया गया है। भाजपा इस मामले में मौन साधे हुए है, न जाने किस मुहूर्त का इंतजार कर ही है भाजपा।
 
हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सियासी दल चाहे अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी, किसी को भी आम आदमी की पीड़ा से कोई लेना देना नहीं है। सभी नेताओं की नैतिकता मानो मर चुकी है। आम आदमी मरता है तो मरता रहे, किन्तु जनसेवा का बीड़ा उठाने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं है। भाजपा की एमपी इकाई द्वारा नेशनल हाईवे को लेकर बनाई गई रणनीति के फिस्स हो जाने के बाद अगर शिवराज सरकार की कमल नाथ को घेरने की रणनीति भी औंधे मुंह गिर जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 
यहां एक बात का उल्लेख करना भी लाजिमी होगा कि मध्य प्रदेश भाजपा की कमान जब से प्रभात झा ने संभाली है, तब से संगठन में तो जान आती दिख रही है, किन्तु सत्ता और संगठन के बीच गहरी होती खाई अलग ही समझ में आ रही है। भाजपाध्यक्ष बनने के उपरांत प्रभात झा ने 09 मई को संगठन की सत्ता का विकेंदीकरण करने की घोषणा की थी। उन्होंने पार्टी क सह मुख्यालय छिंदवाड़ा, मण्डला और झाबुआ में बनाने की मंशा व्यक्त की थी। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस घोषणा को किए हुए छः माह बीतने को हैं, पर अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है। कहा जा रहा है चूंकि इस मामले में भी केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा जिला होने के कारण मामला ठंडे बस्ते के हवाले हो गया है। माना जा रहा है कि अगर पार्टी का सह कार्यालय छिंदवाड़ा में स्थापित हो जाएगा तो आने वाले दिनों में छिंदवाड़ा जिला भाजपा और छिंदवाड़ा जिला कांग्रेस की जुगलबंदी और नूरा कुश्ती पर विराम लग जाएगा।

आखिर सियासी जादूगर कमल नाथ का आभामण्डल है ही एसा। कमल नाथ का संसदीय क्षेत्र मध्य प्रदेश का छिंदवाड़ा जिला है, वह भी 1980 से। मूलतः व्यवासाई कमल नाथ को इंदिरा गांधी ने अपना तीसरा बेटा कहकर मध्य प्रदेश और छिंदवाड़ा को सौंपा था। तीस सालों में उन्हें मध्य प्रदेश से कितना मोह हुआ है, इस बात का उदहारण उनके केंद्र मंे वन एवं पर्यावरण, वस्त्र, वाणिज्य और उद्योग के उपरांत भूतल परिवहन मंत्री बनने से मिलता है। कमल नाथ के मंत्री बनने के उपरांत मध्य प्रदेश की झोली में इन विभागों में क्या क्या आया यह बात किसी से छिपी नहीं है। हालात देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच अनुभव नहीं हो रहा है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की सुर और ताल पर मध्य प्रदेश भाजपा मुजरा कर रही है।

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी शाला ने नान कमर्शियल होने का शपथ पत्र दिया है : खुशाल सिंह

सिवनी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड की मान्यता के संबंध में मध्य प्रदेश के

सिवनी जिले के सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के पिछले साल के निरीक्षण

में अनेकानेक कमियां पाई गईं थीं, जिसके चलते शाला का आवेदन निरस्त कर

दिया गया था। शाला ने अब अंडरटेकिंग दी है कि उसके द्वारा कमियां पूरी कर

दी गईं हैं, जिसके चलते एक बार फिर से निरीक्षण दल का गठन किया गया है,

जो मौके पर जाकर वास्तविकता का पता लगाकर अपना प्रतिवेदन केंद्रीय शिक्षा

बोर्ड को सौंपेगा, उसी आधार पर तय हो सकेगा कि इस शाला को सीबीएसई का

एफीलेशन दिया जा सकता है अथवा नहीं, उक्ताशय की बात केंद्रीय शिक्षा

बोर्ड के नई दिल्ली में प्रीत विहार स्थित एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव

खुशाल सिंह ने दैनिक यशोन्नति के साथ दूरभाष पर चर्चा के दौरान कही।

श्री सिंह ने कहा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का प्रकरण उनकी

जानकारी में है, इस शाला के बारे में उन्हें काफी मात्रा में पत्र और फोन

भी प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछली बार के निरीक्षण

के दौरान मिले प्रतिवेदन के उपरांत शाला के आवेदन को निरस्त करने संबंधी

पत्र क्रमांक सीबीएसई-एफी-एसएल-१७०१-१०११-२०१० दिनांक १२ मई २०१० श्री

सिंह के हस्ताक्षरों से ही जारी हुआ था। उन्होंने कहा कि पिछले साल

निरीक्षण के दौरान मिली विसंगतियों के बारे में शाला प्रबंधन द्वारा

अंडरटेकिंग देने के बाद ही दुबारा आईसी कमेटी का गठन किया गया है।

उपरोक्त संदर्भित पत्र में नया आवेदन देने की बात पर श्री सिंह ने चुप्पी

साध ली कि नए आवेदन के बजाए पुराने आवेदन पर अंडरटेकिंग देने पर निरीक्षण

दल का गठन किस आधार पर कर दिया गया।

इसके अलावा सीबीएसई की एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव ने कहा कि शाला

प्रबंधन ने यह कम्पलायंस भी दिया है कि उन्होंने कमियों को पूरा कर दिया

गया है। इसी कम्पलायंस के आधार पर सीबीएसई बोर्ड द्वारा कमेटी का गठन कर

दिया गया है। अब यह कमेटी मौके पर जाकर देखेगी कि पिछली बार जो कमियां

पाई गईं थीं, वे वास्तव में दुरूस्त कर दी गई हैं अथवा नहीं। गौरतलब होगा

कि पिछली बार निरीक्षण दल द्वारा दिए गए प्रतिवेदन में छ: कंडिकाओं वाला

निरस्तीकरण पत्र शाला प्रबंधन को सौंपा गया था, जिसमें साफ तौर पर कमियां

पाए जाने का उल्लेख किया गया था, इसके अलावा शाला नए भवन में स्थानांतरित

हो चुकी है, इस नए भवन में विद्यार्थियों की सुविधाओं के अनुरूप माहौल है

अथवा नहीं, पठन पाठन का स्तर कैसा है, आदि बातों का निरीक्षण भी निरीक्षण

दल द्वारा किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि शाला प्रबंधन द्वारा किसी भी प्रकार की केपीटेशन फीस

नहीं ली जा सकती है, जिसमें बिल्डिंग फंड आदि का समावेश है। दूरभाष पर

चर्चा करते हुए श्री सिंह ने कहा कि इसके साथ ही शाला प्रबंधन से सीबीएसई

ने नान कमर्शियल होने का शपथ पत्र भी लिया है। गौरतलब होगा कि

कुकुरमुत्ते के मानिंद खुल चुकी शालाओं में शिक्षा को व्यवसाय बना दिया

गया है।

श्री सिंह ने आगे कहा कि अगर किसी पालक या नागरिक को किसी भी तरह की

आपत्ति है तो वे अपनी आपत्ति को सचिव, सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकन्ड्री

एजूकेशन, शिक्षा केंद्र, 2, कम्युनिटी सेंटर, प्रीत विहार, विकास मार्ग,

नई दिल्ली ११००९२ के पते पर लिखित तौर पर अथवा दूरभाष क्रमांक ०११ -

२२५०९२५६ अथवा २२५०९२५९ पर सचिव या उनसे चर्चा कर दे सकता है। बताया जाता

है कि निरीक्षण दल में शामिल एक सदस्य प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय,

खमरिया, जबलपुर भी हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बहुत ही ज्यादा

नियमपसंद हैं। सूत्रों का कहना है कि अगर किसी को किसी भी प्रकार की शंका

कुशंका हो तो वे प्राचार्य से ०७६१ - २६०१७०३ पर सूचना दे सकते हैं। इन

सूचनाओं पर कार्यवाही करना अथवा नहीं करना प्राचार्य के विवेक पर ही

निर्भर करता है। वैसे निरीक्षण दल में शामिल दोनों ही मेम्बर पिछली बार

भी निरीक्षण में शामिल थे।

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने बैतूल में कहा कि गरीब दोनांे टाईम खाने लगा है, इसलिए मंहगाई बढ़ी। कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि शक्कर नहीं खाने से भारतवासी मर नहीं जाएंगे। अब योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अपनी जुबान खोली है मंहगाई के बारे में। बकौल अहलूवालिया मंहगाई बढ़ने का कारण ग्रामीण हैं। गांवों की समृद्धि और खुशहाली के कारण मंहगाई आसमान की ओर बढ़ रही है। कांग्रेस के बड़बोले मंत्रियों और सिपाहसलारों को यह बात याद रखनी चाहिए कि वजीरे आजम ने साफ कहा था कि दिसंबर तक मंहगाई पर काबू पा लिया जाएगा। दिसंबर आने को है न तो मनमोहन मंहगाई पर ही काबू पाने में सफल हो पाए हैं और न ही अपने बड़बोले मंत्रियों की कैंची की तरह चलती जुबान पर।

कलमाड़ी ने पढ़ा राहुल चालीसा
2010 में भीषणतम भ्रष्टाचार के लिए जबर्दस्त चर्चित रहे राष्ट्रमण्डल खेलों के समापन के बाद अब आयोजन समिति पर जांच के बादल मण्डराने लगे हैं। लगने लगा है कि जल्द ही जांच होगी और आयोजन समिति के सरगनाओं की गर्दनें नप जाएंगी। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को भी अब 33 करोड़ देवी देवताआंे की याद आनी आरंभ होना स्वाभाविक ही है। कलमाड़ी ने देवताआंे के साथ ही साथ समस्त आकाओं को भी सिद्ध करना आरंभ कर दिया है। आश्चर्य तो तब हुआ जबकि समापन समारोह में सुरेश कलमाड़ी ने अतिविशिष्ट लोगों के साथ ही साथ कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का नाम भी ले लिया। कलमाड़ी के राहुल चालीसा पढ़ते ही राहुल गांधी चौंके और उन्होंने हवा में प्रश्नवाचक तौर पर हाथ लहरा दिया, कि कामन वेल्थ गेम्स में भला उनकी भूमिका क्या रही? विशेषकर तब जब कामन वेल्थ गेम्स का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका हो, तब इसका मैला उठाने के समय कोई भी अपना नाम इससे जोड़कर अपनी मिट्टी खराब तो कतई नही करना चाहेगा।

दिग्गी राजा से भयाक्रांत हैं पचौरी
भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी में क्या समानता है? जी है, दोनों ही ने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है और दोनों ही राज्य सभा की बैसाखी के सहारे राजनीति करते रहे हैं। चौबीस साल तक पिछले दरवाजे अर्थात राज्य सभा से संसदीय सौंध तक पहुंचने वाले सुरेश पचौरी इन दिनों कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह से खासे खौफजदा नजर आ रहे हैं। राजनैतिक विश्लेषक यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर क्या कारण है कि वे राजा के खिलाफ मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। राजा दिग्विजय सिंह लगातार ही भोपाल आते रहते हैं। गाहे बेगाहे वे काफी हाउस पहुंचकर पत्रकारों के साथ ठहाके भी लगा लेते हैं। इनमें वे ही पत्रकार होते हैं जो राजा से उनके मुख्यमंत्रित्व काल में उपकृत हुए हैं। राजा कभी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यालय नहीं जाते हैं, इस बात की शिकायत पचौरी द्वारा अब तक कांग्रेस आलाकमान से न किया जाना आश्चर्य का ही विषय माना जा रहा है।

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘‘आदित्य‘‘ का उदय
नब्बे के दशक से महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में ठाकरे परिवार की भूमिका अहम रही है। शिवसेना को पालने पोसने वाले वयोवृद्ध नेता बाला साहेब ठाकरे अब उमर दराज हो चुके हैं। उनके पुत्र उद्धव ठाकरे ने जब शिवसेना की कमान संभाली तब ठाकरे परिवार में वर्चस्व की जंग सामने आई और ठाकरे परिवार में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन कर दिखा दिया कि वे बाला साहेब की टक्कर में खड़े होने की स्थिति में आ चुके हैं। वैसे भी राजनैतिक विरासत का हस्तांतरण पारिवारिक विरासत की तरह ही होता आया है, राहुल गांधी, वरूण गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद, सचिन पायलट की तर्ज पर अब ठाकरे परिवार की नई पेशकश के तौर बाला साहेब ने अपने पौत्र आदित्य का विधिवत अभिषेक कर दिया है। मुंबई में हाल ही में संपन्न शिवसेना की रैली में लाखों शिवसैनिकों के सामने बाला साहेब ने आदित्य को सभी से न केवल परिचित करवाया वरन् उसे आर्शीवाद देकर शिवसेना की सेवा के लिए कृतसंकल्पित भी किया। आदित्य यद्यपि अभी महज बीस बरस के हैं, किन्तु उनके तेवर देखकर लगने लगा है कि वे राज ठाकरे पर बीस ही पड़ सकते हैं।

सेवानिवृति के लिए किसकी अनुमति चाहते हैं प्रणव
पचहत्तर साल केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी अब राजनैतिक तौर पर सेवानिवृति चाहते हैं। नेहरू गांधी परिवार के कथित हिमायती प्रणव मुखर्जी का शुमार कांग्रेस के कुशल प्रबंधकों में किया जाता है। यद्यपि वे अनेक बार नेहरू गांधी परिवार के खिलाफ भी खड़े दिखे किन्तु सोनिया गांधी की मजबूरी प्रणव को लेकर चलने की रही है। मीडिया को दिए साक्षात्कार में प्रणव दा कहते हैं कि अगले आम चुनावों में राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। प्रणव की बात को सच मान लिया जाए तो अब प्रधानमंत्री पद पर डॉ.मनमोहन सिंह के दिन गिनती के ही बचे हैं। इसके साथ ही उन्होंने राजनैतिक तौर पर रिटार्यमेंट की इच्छा भी जताई है। प्रणव मुखर्जी संभवतः पहले राजनेता होंगे जो पद में रहते हुए सेवानिवृति की इच्छा जताई हो, वरना अब तक तो जनता द्वारा नकारे जाने या अल्लाह को प्यारे होने पर ही लोग राजनीति से हटे हैं। विडम्बना देखिए कि सरकारी नौकरी में सेवानिवृति की आयु 60 वर्ष निर्धारित है, किन्तु सरकार पर शासन करने वालों के लिए कोई सीमा नहीं। नए सरकारी नौकरों को पेंशन का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है, किन्तु अखिल भारतीय सेवाओं और जनसेवकों के लिए आज भी पेंशन का प्रावधान है, इस तरह की विसंगतियां भारत गणराज्य में ही दिख सकती हैं।

अरूण जेतली: भाजपा के नए ट्रबल शूटर
प्रमोद महाजन जब तक भाजपा में रहे तब तक उन्होने भारतीय जनता पार्टी के लिए संकट मोचक की भूमिका ही अदा की। उनके निधन के उपरांत भाजपा के अंदर नए ट्रबल शूटर की तलाश शिद्दत के साथ आरंभ हो गई थी। अनेक लोगों पर दांव लगाने के बाद अब भाजपा का संकटमोचक चेहरा सामने आया है वह है अरूण जेतली का। पिछले कुछ दिनों से जब भी भाजपा पर संकट के बादल गहराए, तब तब अरूण जेतली के मशविरों ने भाजपा को उबारा है। राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली का परिवार इस बात से खासा प्रभावित होता दिख रहा है। दरअसल जब भी पार्टी के अंदर, यूपीए सरकार में, या फिर सूबाई सरकारों पर कोई संकट आता है तब अरूण जेतली का ज्यादातर समय फोन पर ही बतियाने में निकल जाता है। मामला चाहे सी.पी.ठाकुर के त्यागपत्र का हो या कर्नाटक प्रहसन, हर बार जेतली ही संकट मोचक बने। जेतली का परिवार करे भी तो क्या, क्योंकि भाजपा में संकट हैं गले तक और संकट मोचक उंगलियों में गिने जाने योग्य।

अब दमोह में जिंदा जला दी गई शिवराज की भांजी
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सूबे की हर कन्या को अपनी भांजी माना जाता है, फिर भी उनकी अपनी ही सरकार के रहते हुए बालिकांए सुरक्षित नहीं हैं। पिछले दिनों टीकमगढ़ की एक बाला को दिल्ली ले जाकर बेच दिया गया था, और उसके साथ दुराचार होता रहा था। अब मध्य प्रदेश के ही दमोह जिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में बारहवीं की एक छात्रा के साथ प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर मे अध्ययनरत एक किशोर द्वारा न केवल ज्यादती की गई, वरन् जब पीड़िता ने इसकी रिपोर्ट थाने में दर्ज करानी चाही तो आरोपी ने अपने परिजनों के साथ उक्त बाला को जिंदा ही जलाकर मार डाला। पीडिता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करानी चाही किन्तु बारह बजे रात तक उसकी सुनवाई नहीं हुई अगले दिन सुबह ही आरोपी और उसके परिजन आ धमके और केरोसीन डाल आग लगाकर पीडिता की इहलीला ही समाप्त कर दी। पीडिता ने मृत्युपूर्व बयान में इसका उल्लेख कर दिया है।

कांग्रेस का नया त्रिफला चर्चा में
कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में मध्य प्रदेश के शूरवीरों की कमी नहीं है। बावजूद इसके पिछले लगभग दस सालों में मध्य प्रदेश में कांग्रेस संगठन बीमार पड़ा तीमारदारी के लिए तरस रहा है। कांग्रेस के मध्य प्रदेश के क्षत्रपांे ने कांग्रेस आलाकमान के दफ्तर में भले ही अपनी पैठ जमा ली हो, राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी को आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर अपने नंबर बढ़वाते रहे हों, पर जमीनी हकीकत इस सबसे उलट ही है। हाल ही में कांग्रेस की इंटरनल केमस्ट्री कुछ बदली बदली नजर आ रही है। कांग्रेस के दूर जाते तीन धु्रव अचानक ही एक साथ एक सुर में आलाप करते नजर आ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिह और युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच प्रतिस्पर्धा की बर्फ पिघलती दिख रही है। नाथ, सिंह और सिंधिया का नया त्रिफला क्या रंग लाएगा यह तो वक्त ही बताएगा, किन्तु इसके पहले बडे मियां (कमल नाथ) और छोटे मियां (राजा दिग्विजय सिंह) की जोड़ी ने दस साल तक मध्य प्रदेश के सारे क्षत्रपों को पानी भरने पर मजबूर अवश्य किया था।

चुनाव के साथ ही आए याद करोड़ों
बिहार में रण भूमि सज चुकी है। चुनाव में अब आरोप प्रत्यारोप का चुनाव तक न थमने वाला सिलसिला आरंभ हो चुका है। चुनाव संपन्न होते हुए इन आरोप प्रत्यारोपों के जहर बुझे तीर अपने आप ही तरकश में वापस चले जाएंगे। छः साल से केंद्र की कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को अपने रिमोट से चलाने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने भी बिहार चुनाव के यज्ञ में अपनी आहूति डालना आरंभ कर दिया है। पांच साल की नितीश कुमार की सरकार को केंद्र द्वारा दिए गए करोड़ों रूपयों का आडिट करने श्रीमति गांधी बिहार पहुंच गई हैं। गौरतलब है कि आडिट हर साल किया जाना चाहिए, किन्तु सियासी नफा नुकसान के मद्देनजर रख केंद्र ने भी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई के करोड़ों अरबों रूपए जो बिहार सरकार को दिए थे, उसका कोई हिसाब किताब नहीं रखा। मान लिया जाए कि बिहार की नितीश सरकार ने केद्र की करोड़ों अरबो रूपए की इमदाद को आग के हवाले कर दिया हो, किन्तु यह सब होता देख केंद्र सरकार घ्रतराष्ट्र की भूमिका में कैसे रही? इसका जवाब दे पाएंगी कांग्रेस की राजमाता?

बोला रावण: आई विल नाट डाई
इस बार दशहरे में ताजमहल को अपने दामन में समेटने वाले आगरा शहर में एक अजीब किन्तु मजेदार वाक्या प्रकाश में आया। आगरा में पिछले एक सदी (एक सौ साल) से चली रही रामलीला के इतिहास में नया मोड़ उस वक्त आ गया, जब भगवान राम द्वारा रावण को मारने का प्रयास किया जा रहा था, और रावण बोल उठा -‘‘आई विल नाट डाई।‘‘ हुआ यूं कि इस साल रामलीला के आयोजन में बहुत विलंब हो गया, जिससे जल्दी जल्दी ही कुछ प्रसंगों को निपटाकर राम रावण के अंतिम युद्ध को मंचित किया जा रहा था। समय की पाबंदी और कमी को देखकर आयोजकों के द्वारा रावण से कहा गया कि जल्द ही राम के तीर से अपना संहार करा ले। उधर दर्शकों के बीच हर एक संवाद पर जबर्दस्त करतल ध्वनि गूंज रही थी। रावण चाह रहा था कि वह अपने किरदार को पूरा जिए, सो बीच में ही उसने कह दिया -‘‘आपको जो कराना हो करो, बट, इतनी जल्दी, आई विल नाट डाई।‘‘

दीदी सुपर सीएम, कौन होगा रेल मंत्री
पश्चिम बंगाल में चुनाव पूर्व बह रही बयार को देखकर लगने लगा है कि राईटर्स बिल्डिंग पर त्रणमूल कांग्रेस अपना कब्जा बना ही लेगी। सूबे में अफरशाही के घोडे भी अब दीदी के इशारों पर दौड़ने लगे हैं। अभी चुनाव होने में लगभग आठ माह बाकी हैं, फिर भी बंगाल में वाम सरकार अपने आप को शासन में असहज महसूस कर रही है। इसका कारण यह है कि शासन के महत्वपूर्ण अंग नौकरशाहों ने अपनी निष्ठा दादा के बजाए दीदी के प्रति प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले नौकरशाहों से वाम सरकार सकते में है, वह कोई भी बड़े निर्णय को अमली जामा नहीं पहना पा रही है। भारत गणराज्य में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या होगी कि रेल मंत्री ने अपना कार्यभार ग्रहण करते ही अघोषित तौर पर रेल मंत्रालय को ही पश्चिम बंगाल स्थानांतरित करवा लिया। कोलकता में रहकर ममता बनर्जी रेल मंत्री कम पश्चिम बंगाल की सुपर सीएम की भूमिका में ज्यादा नजर आ रही हैं। त्रणमूल के पक्ष में बह रही हवा के चलते त्रणमूल कांग्रेस ने जनवरी में ही चुनाव करवाने का दबाव बढ़ा दिया है।

आंखे जाने के बाद जिंदा जलाने की गुहार!
मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य मण्डला जिले के योगीराज अस्पताल में मोतियाबिन्द का आपरेशन कराने आए ढाई दर्जन से अधिक लोगों ने मोतियाबिन्द के आपरेशन के दौरान अपनी आंखें ही गवां दी। कल तक दुनिया देखने वालों को जब मोतियाबिन्द के कारण कुछ धुंधला दिखना आरंभ हुआ तो उन्होंने आपरेशन कराने की सोची पर उन्हें क्या पता था कि वे अपनी आंखों को ही गंवा देंगे। महाकौशल अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या सबसे अधिक मण्डला और डिंडोरी जिले में है। इन आदिवासियों के हितों के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा करोड़ों अरबों रूपयों की इमदाद भेजी जाती है। विडम्बना यह है कि इन जिलों में पदस्थ होने वाले अधिकारियों द्वारा इस इमदाद में से अपना बड़ा हिस्सा वसूल लिया जाता रहा है। बहरहाल मोतियाबिन्द के गलत आपरेशन के कारण हुए संक्रमण का शिकार लोगों का कहना है कि आंखों में अब तक दर्द बना हुआ है, कहीं पीप मवाद बह रहा है। योगीराज अस्पताल के लोगों ने तो अपना काम कर दिखाया, अब इस बेरंग दुनिया में हम जीकर क्या करेंगे, बेहतर होगा कि हमें जिंदा ही जला दिया जाए। आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया की चीख पुकार के बावजूद भी 16 सितंम्बर से अब तक इस घटना की जांच के लिए उप संचालक स्तर के एक अधिकारी के अलावा किसी को पाबंद नहीं किया गया है।

पुच्छल तारा
भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, सड़कें खुदी हैं, ट्राफिक जाम है, सड़कों पर पानी भरा है, पैदाल पार पुल गिर गया, मेट्रो का पिलर गिर गया, और न जाने किन किन आरोपों के उपरांत अंततः कामन वेल्थ गेम्स निपट ही गए। अब बारी है भ्रष्टाचार की जांच की। पूर्व खेल एवं युवा मामलों के मंत्री मणि शंकर अय्यर ने भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ इन खेलों के दौरान दिल्ली से बाहर रहने की मंशा जताई थी। प्रशासन ने कुत्तों और भिखारियों को भी दिल्ली से बाहर कर दिया था। अब खेल खतम पैसा हजम। सो भोपाल से नंद किशोर जाधव एक ईमेल भेजकर सरकार को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। नंद किशोर लिखते हैं कि राष्ट्र मण्डल खेल समाप्त हो गए हैं। अब सरकार को चाहिए कि वह मुनादी पिटवा दे कि अब दिल्ली की सरहद में कुत्ते, भिखारी और मणिशंकर अय्यर वैगरा लौट सकते हैं।