शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

फिर आरंभ हुआ शिक्षा को लेकर नया प्रयोग

फिर आरंभ हुआ शिक्षा को लेकर नया प्रयोग

(लिमटी खरे)

देश की नई पीढी की शिक्षा की दशा और दिशा निर्धारित करने के लिए पाबंद मानव संसाधन और विकास मंत्रालय जिस भी राजनैतिक दल के कब्जे में रहा है, उसी ने अपना एजेंडा इस पर थोपा है। किसी ने भी भावी पीढ़ी की चिंता नहीं की है। हाल ही में योजना आयोग के माध्यम से एचआरडी विभाग ने एसे शिक्षण संस्थानों की स्थापना के मार्ग प्रशस्त किए हैं जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। भारत गणराज्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, पानी बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं देने में ही शासक नाकाम रहे हैं। इस व्यवस्थाओं को सरकारों ने निजी हाथों में देकर अपनी ही रियाया का गला घोंटने का प्रयास किया है जिसकी महज निंदा से काम नहीं चलने वाला। देश की राजनधानी दिल्ली में बिजली के करंट से लोगों की जेबें खाली हो चुकी हैं, वहीं स्वास्थ्य के नाम पर पांच सितारा अस्पताल रूपी दुकानों में आम नागरिक इसलिए लुट पिट रहा है क्योंकि सरकार के पास अपने अस्पतालों में संसाधन नहीं हैं। देश के हृदय प्रदेश में सरकारी सड़क परिवहन पर ताला लग गया है। प्राईवेट बस आपरेटर्स के गुण्डे यात्रियों की गरदन पर छुरी रखकर मनमानी टिकिट वसूल रहे हैं। देश भर में शिक्षा की मंहगी दुकाने सजी हुईं हैं। कुल मिलाकर इस देश का धनी धोरी शायद अब कोई नहीं बचा है।
 
एक अप्रेल का दिन बचपन से ही अप्रेल फूल बनाने के नाम से जाना जाता रहा है। इस दिन जो चाहे झूट सच बोला जाए, सब कुछ माफ ही होता है। इस दिन किए गंभीर से गंभीर मजाक को भी माफ ही कर दिया जाता है। सरकार ने इसी दिन से अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने की घोषणा की थी। यह बात मजाक था या सच इस बारे में तो सरकार ही जाने पर आम जनता जरूर इसे मजाक के तौर पर ही ले रही है।

शिक्षा आदि अनादिकाल से ही एक बुनियादी जरूरत समझी जाती रही है। पहले गुरूकुलों में बच्चों को व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था थी, जो कालांतर में अव्यवहारिक शिक्षा प्रणाली में तब्दील हो गई। आजाद भारत में शासकों ने अपनी मर्जी से शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करना आरंभ कर दिया। अब शिक्षा जरूरत के हिसाब से नहीं वरन् सत्ताधारी पार्टी के एजेंडे के हिसाब से तय की जाती है। कभी शिक्षा का भगवाकरण किया जाता है, तो कभी सामंती मानसिकता की छटा इसमें झलकने लगती है।

वर्तमान में अनिवार्य शिक्षा के कानून में 6 से 14 साल के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा प्रवेश, पहली से आठवीं कक्षा तक अनुर्तीण करने पर प्रतिबंध, शारीरिक और मानसिक दण्ड पर प्रतिबंध, शिक्षकों को जनगणना, आपदा प्रबंधन और चुनाव को छोडकर अन्य बेगार के कामों में न उलझाने की शर्त, निजी शालाओं में केपीटेशन फीस पर प्रतिबंध, गैर अनुदान प्राप्त शालाओं के लिए अपने पडोस के मोहल्लों के न्यूनतम 25 फीसदी बच्चों को अनिवार्य तौर पर निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

जिस तरह लोगों को आज इतने समय बाद भी रोजगार गारंटी कानून के बारे में जानकारी पूरी नहीं हो सकी है, उसी तरह आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून टॉय टॉय फिस्स हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस नए कानून से किसी को राहत मिली हो या न मिली हो कम से कम गुरूजन तो मिठाई बांट ही रहे होंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा से इतर बेगार के कामों में जो उलझाया जाता था, उससे उन्हें निजात मिल ही जाएगी। अब वे धूप में परिवार कल्याण और पल्स पोलियो जैसे अभियानों में चप्पल चटकाने से बच सकते हैं।

लगता है अनिवार्य शिक्षा कानून का मसौदा केंद्र में बैठे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली सहित अन्य महानगरों और बडे शहरों को ध्यान में रखकर बनाया है। इसमें शाला की क्षमता के न्यूनतम 25 फीसदी उन छात्रों को निशुल्क शिक्षा देने की बात कही गई है, जो गरीब हैं। हाल ही में स्वास्थ्य महकमे में दिल्ली की स्वास्थ्य मंत्री किरण वालिया ने ही बताया था कि दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में पिछले पांच सालों में महज पांच गरीबों का ही इलाज हो सका है। जब देश के नीति निर्धारकों की जमात के स्थल पर ही इस तरह की व्यवस्थाएं फल फूल रही हों तब बाकी की कौन कहे। आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून की धज्जियां अगर उडती दिख जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

अगर देखा जाए तो मानक आधार पर कमोबेश हर शाला भले ही वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र की उसमें बुनियादी सुविधाएं तो पहले दिन से ही और न्यूनतम अधोसंरचना विकास का काम तीन साल में उलब्ध कराना आवश्यक होता है। इसके अलावा पुरूष और महिला शिक्षक के लिए टीचर्स रूम, अलग अलग शौचालय, साफ पेयजल, खेल का मैदान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, बाउंड्रीवाल और फंेसिंग, किचन शेड, स्वच्छ और हवादार वातावरण होना आवश्यक ही होता है।

छात्रों के साथ शिक्षकों के अनुपात में अगर देखा जाए तो सीबीएसई के नियमों के हिसाब से एक कक्षा में चालीस से अधिक विद्याथियों को बिठाना गलत है, फिर भी सीबीएसई से एफीलेटिड शालाओं में सरेआम इन नियमों को तोडा जा रहा है। शिक्ष्कों के अनुपात मे मामले में अमूमन साठ तक दो, नब्बे तक तीन, 120 तक चार, 200 तक पांच शिक्षकों की आवश्यक्ता होती है।

अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं में जनता के गाढे पसीने की कमाई खर्च कर सरकारी खजाना खाली करने वाले देश के जनसेवकों ने अब देश का भविष्य गढने की नई तकनीक इजाद की है। अब किराए के शिक्षक देश का भविष्य तय कर रहे हैं। कल तक पूर्णकालिक शिक्षकों का स्थान अब अंशकालीन और तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया है। निजी स्कूल तो शिक्षकों का सरेआम शोषण कर रहे हैं। अनेक शालाएं एसी भी हैं, जहां शिक्षकों को महज 500 रूपए की पगार पाकर 2500 रूपए पर दस्तखत कर रहे हैं। अनेक शालाओं में तो सीबीएसई से एफीलेशन के बाद भी एनसीईआरटी की सस्ती किताबों के बजाए निजी प्रकाशनों की मंहगी किताबों के चलन के लिए विद्यार्थियों को बाध्य किया जाता है।

आज जमाना बदल चुका है। आज शिक्षा को एक मिशन के बजाए व्यवसाय के तौर पर देखा जाता है। एक जमाना था जब हम प्राईमारी स्कूल में पढा करते थे, तब पाठ्यक्रम के बजाए व्यवहारिक शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता था। हमारा एक कालखण्ड गेम्स का एक पीटी का तो एक क्राफ्ट (इसमें तकली पोनी के सहारे रूई से धागा बनाया जाना सिखाया जाता था, चरखा चलाने की शिक्षा दी जाती थी) का भी होता था। कुल मिलाकर उस काल को हम आधुनिक गुरूकुल की संज्ञा दे सकते हैं।

आदि अनादी काल से गुरूकुलों में व्यवहारिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता था। ऋषि मुनि अपने शिष्यों को लकडी काटने बटोरने से लेकर जीवन के हर पडाव में आने वाली व्यवहारिक कठिनाईयों से शिष्यों को रूबरू कराते थे। इसके साथ ही साथ धर्म अर्धम की शिक्षा भी दिया करते थे। बदलाव प्रकृति की सतत प्रक्रिया है। जमाना बदलता रहा और शिक्षा के तौर तरीकों में भी बदलाव होता रहा।

सत्तर के दशक की समाप्ति तक बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी थी। इसके उपरांत बदलाव की बयार शनैः शनैः तेज होकर अब सुपरसोनिक गति में तब्दील होती जा रही है। हमारे विचार से शिक्षा को लेकर जितने प्रयोग भारतवर्ष में हुए हैं, उतने शायद ही किसी अन्य देश में हुए हों। जब जब सरकारें बदलीं, सबसे पहले हमला शिक्षा प्रणाली पर ही हुआ।

देश के भूत वर्तमान और भविष्य को देखने के बजाए निजामों ने अपनी पसंद को ही थोपने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। रही सही कसर शालाओं के प्रबंधन ने पूरी कर दी। अनेक सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए प्रबंधन के तुगलकी फरमान ने बच्चों की जान ही निकाल दी। शिक्षकों को अध्यापन से इतर बेगार के कामों में लगाने से उनका ध्यान अपने मूल कार्य से भटकना स्वाभाविक ही है। शिक्षक ही देश का भविष्य गढते हैं, किन्तु आज देश के भविष्य को बनाने वाले शिक्षकों से जनगणना, मतदाता सूची संशोधन, पल्स पोलियो जैसे कामों में लगा दिया जाता है। शिक्षकों को यह बात रास कतई नहीं आती है। यही कारण है कि शिक्षकों ने भी अपने मूल काम को तवज्जो देना बंद ही कर दिया है।

दिशाविहीन देश की शिक्षा प्रणाली को पटरी पर लाना निश्चित तौर पर आज सबसे बडी चुनौति बन गई है। बच्चों के कांधे आज बस्तों के बोझ से बुरी तरह दबे हुए हैं। दस से पंद्रह किलो से भी अधिक के बस्ते छोटे छोटे बच्चे अपने कांधों पर लादकर चलने पर मजबूर हैं। इतना ही नहीं ठंड हो या बरसात, हर मौसम में शालाओं का समय बच्चों के मन में शिक्षा के प्रति वितृष्णा का भाव भर रहा है। शाला प्रबंधन इतना भी निष्ठुर हो सकता है कि हाड गलाने वाली ठण्ड में अलह सुब्बह छः बजे बच्चा अपने अपने घरों से स्कूल के लिए रफत डालने पर मजबूर हैं।

इन परिस्थितियों में केंद्रीय विद्यालय संगठन की पहल का देश भर में निश्चित तौर पर खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए जिसमें उसने स्कूली बच्चों के प्रति पहली बार मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए बस्तों के वजन को कम करने का मुद्दा उठाया है। केवीसी के अनुसार बस्ते का कुल वजन छः किलो से अधिक नहीं होना चाहिए। यह सच है कि बच्चों को कम उमर में किताबी कीडा बनाने से उन्हें व्यवहारिक के बाजए मशीनी बनाने का ज्यादा प्रयास किया जा रहा है। आज हाई स्कूल की कोर्स की मोटी किताब को एक शैक्षणिक सत्र में कतई पूरा नहीं किया जा सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली में बच्चों की प्रतिभा का सहज विकास नहीं हो पा रहा है।

एसा नहीं है कि स्कूली बच्चों के बस्तों के बोझ से देश के शासक परिचित न हों। इसके पहले भी अनेकों बार बच्चों के बस्तों और होमवर्क को कम करने की कवायद की गई थी, किन्तु सदा ही इस मामले में नतीजा सिफर ही निकलकर आया। प्रोफेसर यशपाल समिति, चंद्राकर समिति ने भी कमोबेश इस पर चिंता जताई थी। यशपाल कमेटी की सिफारिश पर बस्ते का बोझ कम करने को लेकर देशव्यापी बहस छिड गई थी, जो समय के साथ पार्श्व बलात ही में ढकेल दी गई। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि देश में लालफीताशाही के चलते यशपाल समिति की सिफारिशें धूल खाती रहीं और बच्चे स्कूल बैग के बोझ तले दबते चले गए।

जनता के गाढे पसीने की कमाई से मोटी पगार पाने वाले बिगडेल नौकरशाहों के राज में शिक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि 1988 में तत्कालीन संसद सदस्य चंदूलाल चंद्राकर की अध्यक्षता में बनी चंद्राकर समीति का प्रतिवेदन ही गायब है। संसद की आश्वासन समीति की फटकार के बाद जनवरी 2009 में एक बार फिर ‘‘चंद्राकर समीति की रिपोर्ट‘‘ खोजने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अपने शीर्ष अधिकारियों से लैस एक ओर समिति बना दी थी। मजे की बात तो यह है कि समीति की सिफारिश ढूंढने बनाई गई समीति भी मूल फाईल को खोजने में नाकामयाब रही है।

जानकारों का कहना है कि अगर संसद की आश्वासन समिति के पास यह मामला नहीं होता तो कब का इसे ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया जाता। दरअसल 1992 में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने सदन में इस समिति के प्रतिवेदन को लागू करवाने का आश्वासन दिया था। इसके बाद से यह सदन की संपत्ति के साथ ही साथ एचआरडी मिनिस्ट्री के गले की फांस बन गई है।

आज की शिक्षा प्रणाली महज डिग्री लेने का साधन बनकर रह गई है। अस्सी के दशक के उपरांत पैदा हुए अधिकांश बच्चों को यह नहीं मालुम है कि देश पर मुगलों ने कब आक्रमण किया था, कब अंग्रेजों ने हमें अपना गुलाम बना लिया था, कैसे और कितने जुल्म सहने के बाद देश को आजादी मिली। वर्तमान भारत की तस्वीर कुछ इसी तरह की है, जिसकी कल्पना न महात्मा गांधी ने की होगी और न ही पंडित जवाहर लाल नेहरू ने। आज की युवा पीढी आजादी के सही मायने और मोल को नहीं पहचानती है, यही कारण है कि आज एक बार फिर ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह चीन द्वारा सस्ते ‘‘चाईनीज आईटम्स‘‘ के बहाने हमारी अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने की तैयारी की जा रही है।

रही सही कसर अब मानव संसाधन विभाग द्वारा योजना आयोग के माध्यम से निकाल दी है। देश में आने वाले समय में उच्च शिक्षा किस अंधेरी सुरंग में घुसने वाली है इसका अंदाजा योजना आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय की सांठगांठ से लग जाता है। योजना आयोग की मंशा है कि देश में ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की संस्थापना की जाए जिनका उद्देश्य लाभ कमाना हो। आयोग का दृष्टिकोण पत्र दर्शाता है कि एक अप्रेल 2012 से आरंभ होने वाली बाहरवीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा का क्षेत्र जिसमें तकनीकि शिक्षा को विशेष तौर पर चिन्हित किया गया है में निजी क्षेत्र के लिए मार्ग प्रशस्त करने की बात कही गई है।

कोई भी उद्योगपति एक का एक हजार किए बिना भला इस क्षेत्र में हाथ क्यों डालने चला? जहां पूंजी का निवेश होगा, वहां प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है। इससे गुणवत्ता भी बढ़ेगी ही इसमें शक की गुंजाईश नहीं है। यह सब तो ठीक है किन्तु यह सब लागू होने के बाद इसका एक स्याह पहलू भी है जिसे नजर अंदाज कतई नहीं किया जा सकता है। और वह है कि कहीं यह सब करने के बाद मंहगी शिक्षा प्रणाली कहीं देश के सत्तर करोड़ से अधिक आबादी में रहने वाले गरीब गुरबों की पहुंच से दूर न हो जाए। इसके लिए जरूरी है कि अगर इसकी अनुमति दी जाए तो सशर्त और शर्त में चालीस फीसदी सीट गरीब गुरबों के लिए आरक्षित रखने का बंधन रखा जाए, जिसका पालन न करने पर उनकी मान्यता निरस्त करने का प्रावधान भी किया जाए।

इसके साथ ही साथ देश के नौनिहालों को देखते हुए आवश्यक्ता इस बात की है कि अब नए सिरे से शिक्षा प्रणाली को समझा, देखा, परखा और लागू किया जाए। स्कूलों में क्या पढाना चाहिए, अनावश्यक विषयों को वैकल्पिक बनाया जाए, बच्चों को सारी कापी किताबें रोजाना शाला ले जाना गैर जरूरी किया जाना चाहिए। इस सबके साथ ही साथ पढाई में बच्चों रूचि बरकरार रहे इसके लिए मैदानी, प्रयोगात्मक और अन्य माध्यमों से बच्चों को स्कूल की ओर आकर्षित करना होगा। इस दिशा में सरकार को कठोर और अप्रिय कदम उठाने से नहीं चूकना चाहिए। सरकार का यह प्रयास महज केवीएस तक ही न सीमित रहे। इसे देश के हर स्कूल को लागू करने के लिए ठोस कार्ययोजना सुनिश्चित करना ही होगा।

साथ ही साथ जहां तक शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने की बात रही तो सरकार को चाहिए कि इस अनिवार्य शिक्षा कानून में संशोधन करे। इसमें भारतीय रेल, दिल्ली परिवहन निगम और महाराष्ट्र राज्य सडक परिवहन की तर्ज पर पैसेंजर फाल्ट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। जिस तरह इनमें सफर करने पर टिकिट लेने की जवाबदारी यात्री की ही होती है। चेकिंग के दौरान अगर टिकिट नहीं पाया गया तो यात्री पर भारी जुर्माना किया जाता है। उसी तर्ज पर हर बच्चे के अभिभावक की यह जवाबदारी सुनिश्चत की जाए कि उसका बच्चा स्कूल जाए यह उसकी जवाबदारी है। निरीक्षण के दौरान अगर पाया गया कि कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है तो उसके अभिभावक पर भारी पेनाल्टी लगाई जानी चाहिए। सरकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान, स्कूल चलें हम, मध्यान भोजन आदि योजनाओं पर अरबों खरबों रूपए व्यय किए जा चुके हैं, पर नतीजा सिफर ही है। निजाम अगर वाकई चाहते हैं कि उनकी रियाया पढी लिखी और समझदार हो तो इसके लिए उन्हें वातानुकूलित कमरों से अपने आप को निकालकर गांव की धूल में सनना होगा तभी अतुल्य भारत की असली तस्वीर से वे रूबरू हो सकेंगे।

एमपी में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा देने की मांग उठी

एमपी में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा देने की मांग उठी

पंजाब राज्य चाहता है 9 राज्यों में मिले पंजाबी को पूरा सम्मान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पंजाब सरकार द्वारा पंजाबी भाषा को प्रोत्साहित करने के लिए फिर प्रयास आरंभ किए जा रहे हैं। पंजाब के विधायक चाहते हैं कि मध्य प्रदेश सहित देश के नौ राज्यों मंे पंजाबी भाषा को लेग्वेज नंबर टू का दर्जा दिया जाए। गौरतलब है कि इसके लिए पंजाब सरकार ने पिछले ही साल विधानसभा में एक प्रस्ताव भी पारित किया था। पंजाब के अधिकांश विधायकों का मानना है कि मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एण्ड काश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र एवं उत्तराखण्ड में चूंकि पंजाबी समुदाय के लोग बहुतायत में हैं इसलिए यहां पंजाबी भाषा को दूसरी भाषा का दर्जा दिया जाए।

विधायकों का मानना है कि पंजाबी, चंकि पंजाबियों की मातृभाषा, उनकी पहचान और पंजाब प्रदेश की राजभाषा है, और इन राज्यों में पंजाबी को अहमियत नहीं दी जा रही है जो चिंता का विषय है। विधानसभा में पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि पंजाबी को मध्य प्रदेश नौ राज्यों में दूसरी भाषा का दर्जा दिया जाकर इन सूबों में पंजाबी को पढ़ाए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। ज्ञातव्य है कि दिल्ली और हरियाणा सरकार ने इस भाषा को अपने राज्य की दूसरी भाषा बना दिया है।

यहां यह उल्लेखनीय होगा कि भारत गणराज्य में अंग्रेजी को अघोषित तौर पर लैंग्वेज नंबर टू का दर्जा हासिल है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया के चौधरी अमेरिका के 26 हजार 30 लाख लोग अंग्रेजी बोलते हैं। इंग्लिश स्पोकन के मामले में अमेरिका नंबर एक पर है तो भारत में साढ़े बारह करोड़ लोग अंग्रेजी बोलकर नंबर टू पर हैं। देश में बोली जाने वाली टाप फाईव भाषाओं में हिन्दी के बोलने वाले साढ़े पचपन करोड़, अंग्रजी के बारह करोड़ तिरेपन लाख, बंगाली के नौ करोड़ ग्यारह लाख तो तेलगू के साढ़े आठ करोड़ एवं मराठी के आठ करोड़ बयालीस लाख लोग हैं। ये आंकड़े वर्ष 2001 की जनसंख्या के आधार पर निकाले गए हैं।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

सर चढ़कर बोल रहा है अंग्रेजी का बुखार

सर चढ़कर बोल रहा है अंग्रेजी का बुखार

(लिमटी खरे)

हिन्दी भारत गणराज्य की आधिकारिक राष्ट्रभाषा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर आज तक सभी जनसेवक हिन्दी की हिमायत करते आए हैं, फिर भी हिन्दी बहुत ही पिछड़ चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा राजभाषा का अलग प्रभाग बनाकर रखा है, बावजूद इसके हिन्दी को वांछित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। सरकारी कार्यालयों में हिन्दी को प्रोत्साहन देने की इबारत युक्त नारे तो चस्पा होते हैं पर इनके उपर अगल नहीं हो पाता है। सर्वोच्च न्यायालय तक में अंग्रेजी का खासा बोल बाला है। देश के शासक मूलतः अंग्रेजी को ही प्रोत्साहित करते नजर आते हैं। विडम्बना देखिए कि देश के अनेक हिस्सों में सूचना पटल पर स्थानीय भाषा के साथ ही साथ अंग्रेजी में होते हैं, इन पर हिन्दी का नामोनिशान नहीं होता है। समाचार पत्रों में पहले हिन्दी का विशेष ध्यान रखा जाता था किन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधकचरे ज्ञान वालों ने हिन्दी को दरकिनार कर अब हिन्दी अंग्रेजी के मिश्रित संस्करण ‘हिंगलिश‘ को बोलचाल की भाषा बना दिया है।
 
ग्लोबल भाषा का दर्जा पाने वाली इंग्लिश आज भारत गणराज्य में हिन्दी के उपरांत सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी भाषा बन चुकी है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि भारत गणराज्य में अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद यूरोपीय देशों में ब्रिटेन को छोड़कर अंग्रेजी बोलने वाले देशों से कहीं ज्यादा है। वर्ष 2001 की जनगणना में भारत में दो और तीन भाषाओं के जानकार या बोलने वालों की संख्या के आधार पर जुटाए गए आंकड़ोें से साफ होता है कि अंग्रेजी बोलने और समझने वाले भारतीयों की संख्या ब्रिटेन की जनता से दुगनी है।

इन आंकड़ों से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत में वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार साढ़े पच्चीस करोड़ लोग दो भाषाओं का ज्ञान रखते हैं। पौने नौ करोड़ लोग तीन या अधिक भाषा पर अच्छी कमान रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत गणराज्य में चौथाई जनसंख्या उस वक्त तक एक से ज्यादा भाषा बोलने में महारथ रखती थी। सबसे अश्चर्य का विषय तो यह रहा कि 2001 में दो लाख तीस हजार भारत वासियों ने अंग्रेजी को प्राथमिक भाषा का दर्जा दिया है। आठ करोड़ साठ लाख लोगों ने इसे दूसरी तो तीन करोड़ नब्बे लाख लोगों ने तीसरी भारतीय भाषा के तौर पर इसे चुना है। इस तरह भारत की जनसंख्या में से साढ़े बारह करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं।

दुनिया भर में अंग्रेजी बोलने वाले शीर्ष के पांच देशों में अमेरिका में छब्बीस करोड़ तीस लाख, भारत में बारह करोड़ पचास हजार, नाईजीरिया में सात करोड़ नब्बे लाख, ब्रिटेन और रूस में में छः करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं। भारत गणराज्य में बोली जाने वाली टॉप फाईव लेंग्वेज में 55 करोड़ 14 लाख लोग हिन्दी, बारह करोड़ पचास लाख लोग अंग्रेजी, नौ करोड़ ग्यारह लाख लोग बंगाली, आठ करोड़ पचास लाख लोग तेलगू और आठ करोड़ बयालीस लाख लोग मराठी बोलते हैं। इस तरह अंग्रेजी भारत गणराज्य की अनाधिकारिक तौर पर नंबर टू लंेग्वेज बन चुकी है।

देश की अन्य भाषा के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो तमिल बोलने वाले छः करोड़ सढ़सठ लाख, उर्दू के वाकिफगार पांच करोड़ नब्बे लाख, कन्नड़ की माहिती रखने वाले पांच करोड़ आठ लाख, गुजराती को बोलने वाले पांच करोड़ तीन लाख लोग हैं। इस देश में उड़िया बोलने वाले तीन करोड़ छियासठ लाख, मलयाली बोलने वाले तीन करोड़ अड़तीस लाख तो पंजाबी बोलने वाले तीन करोड़ 14 लाख, असमी के जानकार एक करोड़ 89 लाख लोग हैं।

हिन्दी बोलने के मामले में जो आंकड़े सामने आए हैं वे इस प्रकार हैं। हिन्दी बोलने वालों की तादाद 55 करोड़ 14 लाख थी जिसमें से 42 करोड़ बीस लाख लोगों ने पहली भाषा के तौर पर हिन्दी को पसंद किया है। नौ करोड़ 82 लाख लोगों ने इसे दूसरीतो तीन करोड़ 12 लाख लोगों ने इसे तीसरी भाषा का दर्जा दिया है। ये सारे आंकड़े 2001 की जनगणना के आधार पर सामने आए थे। 2011 की जनगणना पूरी होने पर इसमें आश्चर्यजनक अंतर दर्ज किया जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दुख तो इस बात को सोचकर होता है कि आजादी के 64 सालों में हम देश की करंसी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं दिला सके, हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बना सके। आज भी लोग मन से हिन्दी बोलने में शर्म महसूस ही करते हैं। क्षेत्रों में हिन्दी के बजाए अंग्रेजी को ही लोग अधिक महत्व देते हैं। हालात देखकर कभी कभी लगने लगता है कि कहीं अंग्रेजी तो हमारी मातृ भाषा नहीं? वैसे भी आज औसत आयु 60 ही मानी जा रही है, फिर 64 सालों के बाद भी हिन्दी की चिंदी इस तरह उड़ाई जा रही है।

हमारे देश में भी मीडिया ने हिन्दी के बजाए हिंगलिश (हिन्दी और अंग्रेजी का मिला जुला स्वरूप) को अंगीकार कर लिया है। अभी कुछ दिनों पहले फ्रांस ने एक सर्कुलर जारी कर फ्रांसिसी भाषा के अखबारों को ताकीद किया था कि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग निश्चित प्रतिशत से ज्यादा न करे। विडम्बना ही कही जाएगी कि हिन्दुस्तान में हिन्दी के संरक्षण के लिए सरकार के प्रयास नाकाफी ही हैं। सरकार ने हिन्दी के प्रोत्साहन को महज कागजों तक ही सीमित कर रखा है।

देश के कमोबेश हर बड़ी परीक्षाएं अंग्रेजी माध्यम में ही संचालित होती हैं। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायलय और देश की सबसे बड़ी पंचायत अर्थात संसद में भी अंग्रेजी का खासा बोलबाला है। देश के महामहिम राष्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री सभी देश को संबोधित करते हैं, अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं, बाद में उस अनुवाद को अनुवादक हिन्दी में प्रसारित करते हैं। हम आज भी गोरे ब्रितानियों की दसता की जंजीरों से अपने आप को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं।

हिन्दी भाषी राज्यों से हटकर अन्य राज्यों में सूचना पटल या अन्य उदघोषणाएं भी या तो क्षेत्रीय भाषा मंे होतीं हैं, या फिर अंग्रेजी मंे। अधिकतर कांप्टीटिव एक्जाम्स का माध्यम अंग्रेजी ही होता है। क्या यही हैं हमारे द्वारा छः दशकांे में चुनी गई सरकारों की प्रतिबद्धताएं! भारत की पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी ने तो हद ही कर दी थी। उन्होंने रेल मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण महकमे को संभालने के बाद ममता बनर्जी ने एक फरमान जारी किया था कि रेल्वे की परीक्षाएं या तो अंग्रेजी में संचालित की जाएं या फिर क्षेत्रीय भाषाओं में।

हिन्दी अंग्रेजी के साथ ही साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान पा चुकी क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा कराने से कोई रोक नही रहा है, पर यह हमारे देश की राष्ट्रभाषा की अस्मत का सवाल है। अभी लोग क्षेत्रीयता को लेकर तरह तरह के जहर उगल रहे हैं। शुक्र है कि भाषा विवाद अभी शांत है। क्षेत्रीय भाषाओं को तरजीह देने की बात समझ में आती है, किन्तु हिन्दी के बजाए अंग्रेजी को महत्व देना समझ से परे ही है। सवाल यह उठता है कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाष है, फिर हिन्दी की इस तरह दुर्दशा कोई कैसे कर सकता है। क्षेत्रीय भाषाओं को निश्चित तौर पर बढ़ावा मिलना चाहिए, किन्तु हिन्दी जो कि राष्ट्रभाषा है की इस तरह उपेक्षा करना संभव नहीं है, यह असंवेधानिक करार दिया जा सकता है, किन्तु आजाद भारत में वर्तमान परिस्थितियों में देश के नीति निर्धारक अपने अपने फायदों के लिए कानून की व्याख्या अपने हिसाब से करने में माहिर हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि आजाद हिन्दुस्तान में जहां राजभाषा के विकास के लिए गृह मंत्रालय के अधीन अलग से राजभाषा विकास विभाग की स्थापना की है। आफीशियल लेंग्वेज को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय एक तरफ पूरा जोर लगा रहा है, बावजूद इसके हिन्दी को वह स्थान आज भी नहीं मिल पा रहा है जिसकी वह हकदार है। सरकारें अपने अपने हिसाब से देश को हांकती आईं हैं। आज विदेशों में भी हिन्दी का चलन बढ़ चुका है। अनेक देश के लोग अब हिन्दी और संस्कृत सीखने में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।

कल तक कंप्यूटर जो सिर्फ अंग्रेजी में ही कमांड जानता था अब हिन्दी को भी अंगीकार कर चुका है। इंटरनेट पर हिन्दी का बोलबाला हो चुका है। ब्लाग की दुनिया ने तो हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेट के माध्यम से भाषाओं का सरताज बनाने के करीब पहुंचा दिया है। आज यूनिकोड़ फान्ट में अगर हिन्दी में टाईप किया जाए तो आपका कंप्यूटर और इंटरनेट भी उसे समझ जाता है। जब कंप्यूटर ने हिन्दी को अंगीकार कर लिया है तब फिर भारत सरकार को देश में इसे नंबर वन लेंग्वेज बनाकर सभी कार्यालयों में इसे लागू करने, देश में कोई भी सूचना पटल में हिन्दी के अलावा क्षेत्रीय भाषा में लागू करने का कड़ा फरमान क्यों जारी नहीं किया जाता है।

वर्तमान हालात देखकर लगता है मानो हिन्दी देश के लिए वैकल्पिक भाषा है, जबकि अंग्रेजी को वेकल्पिक भाषा होना चाहिए। देश के नीति निर्धारक जब भी मुंह खोलते हैं वे अंग्र्रेजी में ही बात करते हैं। कहा जाता है कि आला नेताओं को हिन्दी आती ही नहीं है। कांग्रेस में तो कहा जाता है कि अगर मदाम (श्रीमति सोनिया गांधी) को कोई संदेश भिजवाना है तो उसे अंग्रेजी में दिया जाए तब वे समझ पाती हैं। मिशनरी संचालित अनेक शालाओं में प्राचार्य और प्रबंधन एवं पालकों के बीच संवाद में अंग्रेजी की अज्ञानता ही बाधा के तौर पर समने आती है। सरकार को चाहिए कि इन विसंगतियों को देखते हुए हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए एक ठोस कार्ययोजना सुनिश्चित करे, वरना आने वाले समय में हिन्दी का नामलेवा भी नही बचेगा।

. . . और ‘दादा‘ बरस पड़े ‘महाराज‘ पर!

. . . और दादा बरस पड़े महाराज पर!

मीडिया का गुस्सा सिंधिया पर निकाला मुखर्जी ने

दादा के रोद्र रूप के आगे बगलें झांकते नजर आए ज्योतिरादित्य

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का पारा इन दिनों सातवें आसमान पर है। मीडिया जिस तरह से अण्णा हजारे को हाथों हाथ लिए हुए है उससे और कांग्रेस के रणनीतिकारों से प्रणव मुखर्जी खासे नाराज हैं। उनकी नाराजगी का नजला पिछले दिनों संसद में मध्य प्रदेश कोटे से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया पर टूटा।

मीडिया के शुभचिंतक समझे जाने वाले प्रणव मुखर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि जो दादा रोजना लगभग दो घंटे अखबारों से रूबरू रहते थे, पिछले एक पखवाड़े से उन्होंने अखबारों की तह भी नहीं खोली है, और तो और दादा ने समाचार चेनल्स की अण्णा के साथ कदम ताल के चलते टीवी भी चालू नहीं किया है।

प्रणव के एक खासुलखास ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि दादा आजकल पार्टी के राजनैतिक प्रबंधकों विशेषकर संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल से खासे खफा हैं। इसका कारण यह है कि बंसल ने अण्णा के मुद्दे पर विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया है। इतना ही नहीं लोकसभा में अध्यक्ष द्वारा नेता प्रतिपक्ष की अनुमति के बावजूद भी सुषमा स्वराज को बोलने का मौका नही दिया गया।

उन्होंने आगे कहा कि मंगलवार को जब सुषमा स्वराज को जब बोलने का मौका नहीं मिला उसके उपरांत सदन स्थगित होने के बाद जब ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद चलकर प्रणव मुखर्जी के कक्ष में गए और दादा से कहा कि अगर सुषमा जी को बोलने नहीं दिया गया तो इसका संदेश सरकार के खिलाफ जाएगा जिसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। फिर क्या था, दादा हत्थे से उखड़ गए। दादा ने सिंधिया पर लगभग चिल्लाते हुए कहा कि मुझे राजनीति सिखाने की आवश्यक्ता नहीं है। यह मत भूलो कि मैं तुम्हारी उमर से ज्यादा समय से राजनीति कर रहा हूं।

सूत्रों ने आगे कहा कि प्रणव को खतरा है कि सितम्बर के पहले सप्ताह में जब आपरेशन के उपरांत स्वास्थ्य लाभ लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी भारत वापस आएंगी तब अण्णा प्रकरण का सारा हिसाब किताब उन्हें ही देना होगा, जिसके लिए वे होमवर्क में जुटे हुए हैं, क्योंकि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने मंत्रीमण्डल विस्तार के पहले प्रणव की भावभंगिमाएं देखते हुए उनके खिलाफ तलवार पजा रखी थी। अब सोनिया के आने के बाद सबसे ज्यादा भद्द प्रणव दा की पिटने की उम्मीद जताई जा रही है।

मीडिया है सरकार के निशाने पर!

मीडिया है सरकार के निशाने पर!

सरकार मानती है कि अण्णा को मीडिया ने महानायक बनाया

मुलायम भारी खफा हैं मीडिया की रामलीला से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मयूर विहार से रामलाला मैदान बरास्ता तिहाड़ जेल किशन बाबू राव उर्फ अण्णा हजारे की तेरह दिनी यात्रा में ही वे महानायक कैसे बन गए? यह प्रश्न सरकार के दिमाग में कौंध रहा है। इसका जवाब मिल रहा है कि मीडिया ने ही इन तेरह दिनों में अण्णा को महानायक बना दिया है। यही कारण है कि सरकार अब अंदर ही अंदर इस प्रयास में लग गई है कि किसी तरह मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाए।

प्रधानमंत्री के करीबी सूत्रों ने बताया कि सर्वदलीय बैठक में मुलायम सिंह मीडिया पर जमकर बरसे। इस दौरान अनेक लोगों ने मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात तक कह मारी। इसके बाद हुई कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में अण्णा हजारे को लाईव दिखाने वाले चेनल्स के खिलाफ जमकर आक्रोश जताया सांसदों ने। सांसदों ने यहां तक सुझाव दे डाला कि इन चेनल्स के सैटेलाईट लिंक ही काट दिए जाने चाहिए।

कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो यह कहा जा रहा है कि जब अमेरिका जैसा सुपर पावर खुद भी विक्कीलीक्स के केबल्स को नहीं रोक सका तो सरकार क्या खाकर मीडिया को रोकेगी। मीडिया ने इस मामले में वही किया जो जनता चाह रही थी। कांग्रेसियों का मत है कि राहुल, सोनिया गांधी, नितिन गड़करी सभी सत्ता की मलाई परोक्ष तौर पर चख रहे हैं। ये चेहरे अभी नए और बेदाग हैं। यही कारण है कि इनके डमरू से भीड़ भी जुट जाती है और मीडिया की सुर्खियां भी बटोरी जाती हैं।

अण्णा के अनशन को प्रमखता देना समय की मांग थी। अण्णा अगर महानायक बने तो इसमें मीडिया की सकारात्मक और सरकार की नकारात्मक भूमिका प्रमुख तौर पर उत्तर दायी मानी जा सकती है। माना जा रहा है कि सरकार ने 13 दिन बाद जो किया अगर वह पहले ही दिन कर लेती तो अण्णा को महानायक बनने से रोका जा सकता था। आने वाले दिनों में सरकार द्वारा मीडिया पर अगर गाज गिराई जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।