बुधवार, 7 अगस्त 2013

स्कूल बस, फायदे का धंधा

स्कूल बस, फायदे का धंधा

(शरद खरे)

स्कूल बस का संचालन वाकई एक फायदे का सौदा साबित हो रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन, परिवहन विभाग चाहे जो निर्देश जारी करें पर स्कूल बस संचालकों की मोटी खाल पर इसका कोई असर नहीं होता है। लगता है उपर से नीचे तक कड़े निर्देश जारी करना उसी तरह की एक परंपरा बन चुका है जिस तरह कि इन निर्देशों को हवा में उड़ाने की परंपरा बन चुकी है।
स्कूल बस संचालन के लिए न्यायालयों के साथ ही साथ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा समय समय पर कड़े दिशा निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। निहित स्वार्थ और पैसा कमाने की अंधी प्रतिस्पर्धा में उलझे परिवहन विभाग और यातायात पुलिस को इन स्कूल बस संचालकों की मश्कें कसने की फुर्सत शायद नहीं है। कभी कभार निरीह आटो चालकों पर अवश्य ही यातायात पुलिस की सख्ती दिख जाती है।
देखा जाए तो स्कूल बस संचालन के नियम कायदे बेहद कड़े हैं। चूंकि इसमें देश के नौनिहाल और भविष्य, घरों से शाला तक का सफर तय करते हैं इसलिए इनकी सुरक्षा चाक चौबंद होना जरूरी ही है। दिल्ली सहित महानगरों में आए दिन स्कूल बस के हादसे, बसों में बच्चों के साथ यौन छेड़छाड़ आदि की शिकायतें मीडिया में पटी पड़ी हैं। बावजूद इसके सिवनी जिले मंें ना तो जिला प्रशासन ही इसके लिए संजीदा दिख रहा है ना ही शाला प्रबंधन।
ज्ञातव्य है कि पिछले साल मार्च में प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग के लोक शिक्षण संचालनालय ने स्कूल बसों के लिए एक नई गाइड लाइन तय की थी। दरअसल, स्कूल बसों के लगातार हादसों ने स्कूल शिक्षा विभाग के मोटी चमड़ी वाले आला अफसरान को जगाया था। 2012 में मार्च माह मेें ही प्रदेश शासन ने मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों का पालन कराने के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को अमल में लाने के लिए स्कूल बस के लिए जो दिशा निर्देश जारी किए हैं, उसमें इस बात का विशेष ख्याल रखा गया था कि जिस स्कूल बस में बच्चों को स्कूल तक लाने ले जाने का काम किया जाएगा वह बस कितनी महफूज होगी? उस बस में हर उस परिस्थिति से निपटने की तैयारी रहेगी जो रास्ते में किसी भी वक्त किसी के भी साथ घटित हो सकती है। किसी भी परिस्थिति से निपटने के सारे इंतजाम बस में उपलब्ध रहेंगे ताकि हर परिस्थिति से स्कूल बस में बैठे बच्चों को सुरक्षित बचाया जा सके।
उक्त समस्याओं पर विचार कर स्कूल बसों के लिए नियम-कायदों की गाइड लाइन तैयार की गई एवं इसे नवीन शिक्षण सत्र में समस्त स्कूल संचालकों के लिए जारी किया गया है। इसके अनुसार बस के आगे और पीछे बड़े अक्षरों में, सुवाच्य अक्षरों में स्कूल बस लिखा जाए। यदि बस किराये की है तो उस पर आगे एवं पीछे विद्यालयीन सेवा लिखा जाए। विद्यालय के लिए उपयोग में लायी जाने वाली किसी भी बस में निर्धारित सीटों से अधिक संख्या में बच्चे नहीं बैठाए जाएं। प्रत्येक बस में अनिवार्य रूप से फर्स्ट एड् बाक्स की व्यवस्था हो। बस की खिड़कियों में आधी पट्टियां अनिवार्य रूप से फिट कराई जाएं। प्रत्येक बस में अग्नि शमन यंत्र की व्यवस्था हो। बस में स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर चस्पा हांे। बस के दरवाजे पर सुरक्षित चिटकनी लगी हो। वाहन चालक को भारी वाहन चलाने का न्यूनतम पांच वर्ष का अनुभव होना चाहिए तथा पूर्व में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन का दोषी नहीं ठहराया गया होना चाहिए। मोटर वाहन नियम 17 के अनुसार प्रत्येक बस में बस चालक के अतिरिक्त एक अन्य योग्य व्यक्ति की व्यवस्था की जाए। बच्चों के बस्ते रखने के लिए सीटों के नीचे जगह की व्यवस्था की जानी चाहिये। सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को लाते-ले जाते समय बस में एक व्यक्ति यथासंभव स्कूल के एक शिक्षक की व्यवस्था की जाए।
वहीं, सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन) स्कूलों की बसों में अनपढ़ चालक-परिचालकों के हाथों में स्टेयरिंग नहीं थमाए जाने के निर्देश जारी किए गए थे। ड्राइवर 12 वीं व कंडक्टर के लिए 10 वीं पास होना अनिवार्य कर दिया है। कोई स्कूल संचालक या बस मालिक नियमों का उल्लंघन करता है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। बोर्ड सचिव विनीत जोशी द्वारा स्कूलों को इस संबंध में अवगत कराया जा चुका है। स्कूलों को निर्देश जारी किए गए हैं कि यदि ड्राइवर तेज गति से गाड़ी चलाने, शराब पीकर गाड़ी चलाने व खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाने को लेकर एक भी बार परिवहन विभाग की ओर से हुई चालान की कार्रवाई का दोषी होगा तो उसे काम पर नहीं रखा जाएगा। इसके साथ ही साथ सागर जिला कलेक्टर ने तो स्कूल बस में सीसीटीवी कैमरे लगाने की अनिवार्यता कर दी है।

इन दिशा निर्देशों का कितना पालन सिवनी में हो रहा है यह बात वाकई देखने योग्य है। सिवनी में सुबह सुबह बच्चों को लेकर शाला जाने वाली स्कूल बस या आटो चालकों का अगर यातायात पुलिस या आरटीओ विभाग ब्रीदिंग एनलाईजर लगाकर टेस्ट करें तो नब्बे फीसदी चालकों के मुंह से वैसे ही शराब का भपका आता मिलेगा, वह भी ब्रीदिंग एनलाईजर्स के बिना। यातायात पुलिस और आरटीओ से अपेक्षा है कि वे पैसा कमाने की अंधी दौड़ में अपने आप को इतना मशगूल ना कर लें कि देश के नौनिहालों के परिवहन की व्यवस्था को ही भूल जाएं। जिला कलेक्टर भरत यादव और जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला से भी इस संवेदनशील मामले में ध्यानाकर्षण की अपेक्षा की जा रही है।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

सिविल के इंजीनियर्स कर रहे इलेक्ट्रिकल का काम!

सिविल के इंजीनियर्स कर रहे इलेक्ट्रिकल का काम!

गिनीज बुक में दर्ज हो सकता है मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी का नाम

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के वक्त सिविल शाखा लेकर अध्ययन् करने वाले स्नात्क या स्नात्कोत्तर इंजीनियर्स की शाखा कुछ भी रही हो, पर मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी में इसका कोई महत्व नहीं रह गया है। सिविल शाखा लेकर अध्ययन् कर मकान, सड़क आदि बनाने में पारंगत इंजीनियर्स आज बिजली में इलेक्ट्रिकल शाखा का काम संभाले हुए हैं।
मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान बताया कि यह विडम्बना से कम नहीं है कि विद्युत मण्डल में स्पेशलाईजेशनका कोई महत्व नहीं है। मण्डल की नीति पता नहीं कैसी है कि यहां भवन बनाने वालों को तकनीकि काम जैसे संवेदनशील जॉब में रखा गया है।
इंजीनियरिंग स्नात्क उक्त अधिकारी का कहना है कि एक बार यह मान लिया जाता है कि इंजीनियरिंग में सिविल शाखा को छोड़कर किसी अन्य शाखा का स्नात्क चाहे तो सिविल का काम कर सकता है पर मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, आईटी जैसी विंग्स के पारंगत ही इसके काम के लिए उपयुक्त होते हैं।
उन्होंने बताया कि सिवनी में विद्युत मण्डल के काम के लिए इलेक्ट्रिकल शाखा वाले स्नात्क या स्नात्कोत्तर लोगों को ही काम पर रखा जाना चाहिए था। चूंकि यह बिजली का संवेदनशील मामला है अतः इस मामले में कोताही लोगों की परेशानी का सबब् बनने के साथ ही साथ किसी की जान भी ले सकती है।
उनके अनुसार अफसरों की मनमर्जी के बेलगाम घोड़े तेजी से दौड़ रहे हैं जिसके कारण आज आलम यह है कि विद्युत मण्डल में इलेक्ट्रिकल विंग के मलाईदार पदों पर, सालों से सिविल के इंजीनियर्स बैठकर मोटा माल काट रहे हैं। सालों से सिवनी में पदस्थ विद्युत मण्डल के अधिकारी कर्मचारी अब मोटी खाल के हो चुके हैं और उन्हें उपभोक्ताओं की शिकायत से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं बचा है।
विद्युत मण्डल के बारापत्थर में टूटी पुलिया स्थित कार्यालय में ही हैरान परेशान उपभोक्ताओं की टेलीफोन पर बजती घंटी से वहां तैनात कर्मियों को कोई लेना देना नहीं है। सौ पांच सौ रूपए बिजली के बिल वालों के बिल अब दो से पांच हजार आ रहे हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं है।
सरेआम बिजली चोरी हो रही पर अफसर मौन हैं। पिछले दिनों हिन्द गजट द्वारा सर्किट हाउस चौक पर यातायात पुलिस द्वारा की जा रही बिजली चोरी की शिकायत से अधीक्षण यंत्री को अवगत कराने के बाद भी कोई कार्यवाही ना होना आश्चर्य का विषय ही माना जाएगा। कहा जा रहा है कि बिजली चोरी करने वालों द्वारा लाईन मेन से लेकर अधीक्षण यंत्री तक को उनका हिस्सा पहुंचाया जाता हैं, वरना क्या कारण है कि एसई के संज्ञान में लाने के बाद भी बिजली चोरी का प्रकरण नहीं बनाया जाता है।
एक अन्य कर्मचारी ने भी पहचान उजागर ना करने की शर्त पर कहा कि चूंकि साहब लोग सिविल विंग के हैं और यह मामला तकनीकि है अतः साहब लोगों को इसकी बारीकी नहीं पता होती है। यही कारण है कि विद्युत मण्डल की स्थिति चरमरा चुकी है। उक्त कर्मचारी का कहना था कि पहले उसे भगवान में विश्वास नहीं था, पर विद्युत मण्डल की नौकरी करने के बाद वह मानने लगा है कि भगवान कहीं ना कहीं है अवश्य, वरना विद्युत मण्डल कैसे चल रहा है, जाहिर है भगवान भरोसे ही चल रहा है।
कथित तौर पर संवेदनशील सांसद के.डी.देशमुख, बसोरी सिंह मसराम, विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, श्रीमति शशि ठाकुर, कमल मर्सकोले ने भी अब तक इस बात को ना संसद में और ना ही विधानसभा में उठाया है। चर्चा है कि वे उठाते भी कैसे, वे तो चाभी से चलने वाले खिलौनों की तरह हो चुके हैं, जिसमें जनादेश देने वाली जनता का ध्यान रखना, उनकी जिम्मेदारी में शामिल नहीं है। बस आसपास के लोगों ने जितना बता दिया उतना ही करना उनका दायित्व बचा है।

वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी अपना मुंह पूरी तरह सिले बैठी है। वैसे यह मामला स्थानीय नहीं है, इस मामले में तो कांग्रेस के विज्ञप्तिवीर धार तेज कर सकते हैं। यह मामला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल से जुड़ा है। इस मामले में कांग्रेस के विज्ञप्तिवीरों को स्थानीय भाजपा नेताओं को कटघरे में खड़ा नहीं करना होगा, इसलिए बिजली के मामले में तो कम से कम वे अपनी रेत में गड़ी तलवारें निकालकर भाजपा (स्थानीय नहीं प्रदेश स्तर की) पर वार कर ही सकते हैं।

भूले से भी नहीं लगता मतलब बीएसएनएल

भूले से भी नहीं लगता मतलब बीएसएनएल

(शरद खरे)

सिवनी जिले में भारत संचार निगम लिमिटेड की सेवाएं बद् से बद्तर हो चुकी हैं। सरकारी तंत्र किस कदर जर्जर या कोलेप्स हो चुका है इसका नायाब नमूना है सिवनी जिले में बीएसएनएल की सेवाएं। लेण्ड लाईन में जब चाहे तब डायलटोन गायब रहती है कभी खरखराहट होती है तो मोबाईल माशाअल्लाह, क्या कहने। लगाएंगे राम को बात हो जाएगी रहीम से। डीएनडी करवाईए पर आपको कंपनियों के काल आते ही रहेंगे।
जिले में बीएसएनएल के अधिकारी जब चाहे तब कर्मचारियों का रोना ही रोते रहते हैं। अगर कर्मचारी नहीं हैं तो बीएसएनएल के अधिकारी इसे बंद कराने की सिफारिश सरकार से क्यों नहीं कर देते, कम से कम लोग बीएसएनएल के जरिए लुटने से तो बच जाएंगे। एक ओर तो बीएसएनएल बड़े बड़े आकर्षक विज्ञापनों के जरिए लोगों को नई नई योजनाएं बताकर लुभाता है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को सिवनी जिले में बीएसएनएल की सेवाएं ना मिल पाना आश्चर्य का ही विषय माना जाएगा।
एक समय था जब बीएसएनएल का एक छत्र राज हुआ करता था देश में। उस समय जिसके घर टेलीफोन के दो तार जाते दिख जाते थे, वह गांव का पटेल कहलाने लगता था। जिसके घर फोन हुआ करते थे वे रसूखदार समझे जाते थे, क्योंकि टेलीफोन का कनेक्शन लेना हर किसी के बस की बात नहीं हुआ करती थी। फोन का नंबर लगाईए और भूल जाईए कम से कम दस साल के लिए। जब आपकी बारी आएगी तब तक आपके सारे अरमान ठंडे हो चुके होंगे।
संचार का काम चूंकि सीधे सीधे केंद्र सरकार के अधीन ही आता है, अतः उस समय में संसद सदस्यों को हर साल बीस लोगों को नए फोन कनेक्शन देने के अधिकार होते थे अपने संसदीय क्षेत्र में। सांसदों द्वारा इस काम को बिना किसी लोभ लालच के किया जाता था। लोग अपने आप को धन्य समझा करते थे कि उन्हें उनके क्षेत्र के सांसद ने एक अदद् फोन की सिफारिश कर दी है, अब उनके घर पर फोन की घंटी घनघनाएगी।
प्रौढ़ हो रही पीढ़ी इस बात को नहीं भूली होगी कि पहले सिवनी में दूरभाष केंद्र वर्तमान पोस्ट ऑफिस के उत्तरी भाग के हिस्से में हुआ करता था। यहां से ही लोग आकर अपने संबंधियों, परिचितों आदि से ट्रंक काल लगाकर बात किया करते थे। लाईटनिंग यानी तत्काल और आर्डनरी यानी सामान्य काल की दरें भी अलग अलग ही हुआ करती थीं। 1993 में जब कुंवर अर्जुन सिंह केंद्र में संचार मंत्री थे तब सिवनी को एसटीडी की सुविधा मिली थी।
कांग्रेस के कद्दावर क्षत्रप रहे स्व.ठाकुर हरवंश सिंह के खाते में सिवनी की इकलौती उपलब्धि एसटीडी ही दिलवाना है, याद नहीं पड़ता कि स्व.हरवंश सिंह द्वारा इसके अलावा सिवनी को कुछ अच्छी सौगातदी हो। उनकी बाकी सौगातें जैसे भीमगढ़ जलावर्धन योजना आज भी सिवनी के लोगों के लिए सरदर्द से कम नहीं है। एक ही स्थान पर सैकड़ों पत्थर रखकर भूमिपूजन या शिलान्यास का अनोखा तरीका भी स्व. हरवंश सिंह की ही देन है, जिससे नेता और जनता के बीच का फासला तेजी से बढ़ गया है।
बहरहाल, कालांतर में सिवनी में आए सीडाट एक्सचेंज ने यहां विकास के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। एक के बाद एक करके अधिकारी बदलते गए और बीएसएनएल की सेवाएं गर्त में ही जाती गईं। आज अगर आपका टेलीफोन का इंस्ट्रूमेंट खराब हो जाए तो आपको बाज़ार से इसे खरीदना पड़ेगा। इस तरह की व्यवस्था बीएसएनएल के अधिकारियों द्वारा बताई जाती हैं। उनका कहना है कि विभाग में इंस्ट्रूमेंट की सप्लाई बंद हो गई है। पर अगर सांसद, विधायक, कलेक्टर के घर का फोन खराब हो जाए तब क्या वे इनसे यही बात कह पाएंगे कि बाज़ार से खरीद लीजिए!
ज़ाहिर है, नहीं कह पाएंगे। इसका तात्पर्य यह है कि सिवनी में टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट हैं। हो सकता है कि ये सीमित मात्रा में हों पर हैं तो सही। अगर आप नया कनेक्शन लें तो सिवनी में ही आपको नया डब्बा मिल जाएगा। आप उसे एक माह चलाएं फिर कटवा दें, फिर नया कनेक्शन ले लें, तब आपको दूसरा नया डिब्बा मिल जाएगा। यह बात समझ से परे है कि आखिर यहां पदस्थ अधिकारी किस नीति की बात करते हैं। विभाग का लाईन स्टाफ अपने काम को छोड़कर अन्य कामों में लगा हुआ है।
सबसे ज्यादा समस्या इंटरनेट की है। सिवनी शहर में एसपी बंग्ले के पास वाले मोबाईल के टॉवर की समस्या को हल कराने में एक उपभोक्ता को सिवनी से चीफ जनरल मैनेजर भोपाल तक के कार्यालय को हिलाना पड़ा। हर कदम पर उसे नई इबारत पढ़ने और सीखने को मिली। मामला चूंकि तकनीकि है इसलिए उपभोक्ता भी निरीह निरूत्तर ही रहते हैं। लोगों को मोबाईल के सिग्नल नहीं मिल रहे हैं, विभाग के अधिकारी आराम फरमा रहे हैं।

इंटरनेट विशेषकर ब्रॉड बैंड जब चाहे तब बैठ जाता है। विभाग से पूछने पर एक रटा रटाया जवाब सामने आता है कि जबलपुर वाले एंड पर प्रॉब्लम है। उपभोक्ता को इस बात से लेना देना नहीं है कि प्रॉब्लम किस एंड पर है। उपभोक्ता तो पैसा अदा कर रहा है उसे सेवाएं चाहिए, वह भी बिना रूके बिना समस्या के। यह विभाग की प्रॉब्लम है कि किस एंड पर है। रही बात हमारे सांसद के.डी.देशमुख और बसोरी सिंह मसराम की, तो इन दोनों को सिवनी से लेना देना ही नहीं है, एक मण्डला में मस्त हैं तो दूसरे बालाघाट में व्यस्त हैं। सिवनी की जनता समस्याओं से दो चार हो रही है तो होती रहे, इनकी बला से . . .।

रविवार, 4 अगस्त 2013

बुढ़िया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है मौत ने घर देख लिया. . .

बुढ़िया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है मौत ने घर देख लिया. . .

(लिमटी खरे)

मच्छर जनित रोग मलेरिया, डेंगू, जल जनित रोग डायरिया, उल्टी दस्त, हैजा, गेस्ट्रोएंट्राईटिस, अमीबाईसिस आदि की चपेट में भगवान शिव की नगरी पूरी तरह से है। नगर पालिका प्रशासन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी व लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की नजरों में मानो कुछ हुआ ही नहीं है। सभी नीरो के मानिंद चैन की बंसी बजाने में व्यस्त हैं। इनकी बंसी की सुमधुर तान पर तबले की थाप दे रहे हैं भाजपा सांसद के.डी.देशमुख, कांग्रेस के सांसद बसोरी सिंह मसराम, भाजपा विधायक श्रीमती नीता पटेरिया, श्रीमती शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले। इन पांचों जनसेवकों को इस बात की परवाह नहीं है कि इन्हें जनता ने जनादेश देकर लोकसभा और विधानसभा में भेजा है। इनकी ज्यादा नहीं तो कम से कम एक प्रतिशत तो जवाबदेही बनती है जनता के प्रति। अफसोस सांसद विधायक अपनी जवाबदेही भूल चुके हैं। सांसद के.डी.देशमुख और विधायक श्रीमती नीता पटेरिया के क्षेत्र में जिला मुख्यालय आता है। शहर में डेंगू फैलने की खबरें हैं एक व्यक्ति के मलेरिया से मरने की खबर है, पर कर्तव्यनिष्ठ सांसद और संवदेनशील विधायक की कर्तव्यनिष्ठा और संवेदनशीलता का अंदाजा लगाईए कि दोनों ने एक बार भी प्रभावित वार्ड का भ्रमण करने की जहमत नहीं उठाई है।
श्रीमती नीता पटेरिया के पति डॉ.एच.पी.पटेरिया जिला मलेरिया अधिकारी हैं, और सालों से सिवनी में पदस्थ हैं। वहीं लखनादौन विधायक श्रीमती शशि ठाकुर के पति डॉ.वाय.एस.ठाकुर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी हैं। दोनों ही भाजपा की विधायक हैं, के.ड़ी.देशमुख भी भाजपा के हैं, नगर पालिका अध्यक्ष भी भारतीय जनता पार्टी के ही हैं और आगामी विधानसभा के चुनावों में सिवनी सीट के प्रबल दावेदार भी माने जा रहे हैं। भाजपा संगठन भी शतुर्मुग बना बैठा है। अपने कार्यकर्ता भले ही वे सांसद विधायक या नगर पालिका अध्यक्ष हों, पर कार्यवाही करने से गुरेज कर रहा है संगठन, इसका तातपर्य यह है कि शहर में फैली इस तरह की अराजकता में संगठन की मौन सहमति है। अब यह बात प्रदेश या देश के भाजपा के आला लीडरान् को सोचना है कि कभी कांग्रेस के गढ़ रहे सिवनी में कांग्रेस के एक विशेष क्षत्रपकी मेहरबानी से अपना राज कायम करने वाली भाजपा अब अपने इन सांसद विधायक और नगर पालिका अध्यक्ष एवं संगठन के ढुल मुल रवैए के चलते नागरिकों को अपने खिलाफ करती जा रही है। आने वाले चुनावों में भाजपा को अगर करारी शिकस्त मिले तो इसके लिए संगठन का नकारात्मक रवैया ही प्रमुख तौर पर जिम्मेदार माना जा सकता है।
सिवनी में लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं। लोगों को पीने तक को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। जगह जगह गंदगी के ढेर लगे हैं। अस्पताल में लोगों के साथ जानवरों से बदतर व्यवहार किया जा रहा है। पैसा ना होने पर अस्पताल से मरीजों को भगा दिया जाता है। पैंशनर्स को दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। जो थोड़ी बहुत दवाएं मिल भी रहीं हैं तो दवा इस तरह से दी जा रहीं हैं मानो अस्पताल के कर्मचारी पैंशनर्स को भीख दे रहे हैं। यह सब हो रहा है जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ.सत्य नारायण सोनी की आंखों के सामने, जिन पर आपरेशन के पहले बेहोश करने के एवज में पैसे लेने के हजारों संगीन आरोप हैं। दो दो विधायकों के पति जिला चिकित्सालय में पदस्थ हैं, फिर अस्पताल में इस तरह की अराजकता! क्या भाजपा संगठन को यह दिखाई नहीं दे रहा है? क्या भाजपा ने जिला संगठन की बागडोर किसी धृतराष्ट्र के हाथों सौंप दी है, जो धर्म अधर्म में भेद नहीं कर पा रहे हैं। कार्यकर्ता प्रेम (चाहे वह सांसद विधायक या पालिका अध्यक्ष हों) में अंधे होकर संगठन प्रमुख धृतराष्ट्र बनकर हस्तिनापुर (सिवनी) में अर्धम होता देख रहे हैं। वैसे राजनीति की एक लाईन में कही जाने वाली परिभाषा है -‘‘जिस नीति से राज हासिल हो वह राजनीति हैै।‘‘ किन्तु सियासत में रियाया का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है।
सिवनी के लोग पहले से ही निकम्मे और नपुंसक नगर पालिका प्रशासन के कारण नारकीय जीवन जी रहे थे वह क्या कम था, जो अब मलेरिया और डेंगू दूबरे पर दो अषाढ़के मानिंद आ खड़ा हुआ है। नगर पालिका ने साल भर साफ सफाई का ध्यान नहीं रखा है, साल भर पालिका की फागिंग मशीन धूल खाती रही, पर इसके लिए तेल और दवा की मद् में लाखों रूपए निकाल लिए गए हैं यह बात उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील सहित कांग्रेस के 12 पार्षद क्या जनता की नजरों से नजरें मिलाकर इस बात को कह पाएंगे कि फागिंग मशीन की मद में निकाली गई राशि के बजट प्रस्ताव का उन्होंने विरोध किया था? जाहिर है नहीं किया गया था विरोध, क्योंकि पालिका में अली बाबाके चालीस चोरंों में कांग्रेस के पार्षदों का भी समावेश है, जो समय समय पर पालिका अध्यक्ष को आंखें दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। क्या कांग्रेस के पार्षद अपने दिल पर हाथ रखकर कहने का साहस कर पाएंगे कि जनता की सेवा का बीड़ा उठाने के एवज में वे पालिका में ठेकेदारी नहीं कर रहे हैं। नाम किसी का काम किसी का की तर्ज पर पालिका के सौ फीसदी काम पार्षदों द्वारा ही करवाए जा रहे हैं, फिर सैंया भए कोतवाल की तर्ज पर गुणवत्ता विहीन काम का भी पूरा भुगतान कर दिया जाता है। नगर पालिका में खुली लूट मची है कोई देखने वाला नहीं है।
यही आलम विज्ञापनों का है। नगर पालिका द्वारा मीडिया के सामने विज्ञापन की रोटी डाल दी जाती है। किसकी दरें कितनी हैं, इस बात से पालिका को लेना देना नहीं है। पालिका अध्यक्ष द्वारा विज्ञापनों का प्रलोभन देकर मीडिया से मनमर्जी का काम करवाने का दावा भी किया जाता है। सार्वजनिक स्थानों पर मोबाईल लगाकर फलां खबर छाप देना, उसकी . . . . . कर देना, अरे उसको मत छापना, हां विज्ञापन भिजवा रहे हैं, सर तक लाद देंगे विज्ञापन से मेरे भाई,‘ जैसे जुमले पालिका अध्यक्ष के मुंह से सुनने को मिल जाते हैं। मीडिया भी विज्ञापनों के पीछे भागकर अपनी नैतिकता खोता जा रहा है। पालिका अध्यक्ष द्वारा समाचार पत्रों को रोटेशनके हिसाब से विज्ञापन देने की बात कही जाती है, पर रोटेशनका मतलब शायद कमीशनसे है। कहा जा रहा है कि जो अखबार पालिका को कमीशन देता है उसे सबसे ज्यादा विज्ञापन मिलते हैं। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो पालिका अध्यक्ष ही जाने पर अगर कोई सूचना के अधिकार में समाचार पत्रों की डीएवीपी, सीपीआर एमपी की दरें और पालिका द्वारा किए गए भुगतान की दरें निकलवा ले तो पालिका में एक बहुत बड़ा विज्ञापन घोटाला भी सामने आ सकता है। सूचना के अधिकार एक्टिविस्ट दादू निखलेंद्र नाथ सिंह द्वारा पूर्व में आरटीआई में निकलवाई गई जानकारी में ऐसे ऐसे समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी किए गए हैं जो भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय में या तो पंजीकृत नहीं हैं, या फिर दो साल की अवधि में स्थाई नहीं करवाए जाने पर डी ब्लाक हो चुके हैं। इसमें कुछ विज्ञापन तो समाचार पत्र वितरण एजेंसी को जारी किए गए हैं, जो दांतों तले उंगली दबाने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं।
बहरहाल, शहर में डेंगू का कहर जोरों पर है। डेंगू और मलेरिया जैसे खतरनाक और जानलेवा रोगों के मामले में संजीदा होने के बजाए नगर पालिका परिषद कमीशनके चक्कर में आकण्ठ डूबी है तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की नजर एनआरएचएम के छीछड़ोंपर है। दोनों ही एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर अपनी अपनी जवाबदेही से बचना चाह रहे हैं, जो निंदनीय है। राजधानी दिल्ली में डेंगू का कहर किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली में स्वास्थ्य विभाग के बजाए इसकी कमान एनडीएमसी और डीएमसी यानी वहां की नगर निगम द्वारा संभाली जाती है। सिवनी में स्थिति उलट है निकम्मी नगर पालिका के प्रतिनिधि कमीशन के गंदे धंधे में उलझे हैं और मजबूरन स्वास्थ्य विभाग को कमान संभालना पड़ रहा है। एमसीडी द्वारा मीडिया को रोज मेल, फेक्स के जरिए यह बताया जाता है कि कितने घरों में एकत्र पानी की जांच की गई?, कहां कहां कौन से मच्छर का लार्वा मिला?, क्या समझाईश दी गई?, कितना जुर्माना किया गया?, कितनी रक्त पट्टिकाएं बनीं?, कितने पॉजिटिव मरीज मिले? आदि, पर सिवनी मेें तो मानो नगर पालिका परिषद का मूल काम नागरिकों की सेवा के स्थान पर पैसा बटोरना हो गया है। लोग तो यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि पालिका की जेसीवी मशीन खराब है उसके सुधारने में ही साढ़े तीन लाख रूपए का एस्टीमेट बनवा दिया गया है। बारिश के मौसम में उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है पर वह भी कमीशन के चक्कर में खराब ही पड़ी है, वरना पालिका के कर्णधार तो जेसीवी से पैसा सकेलते (खींचते)!
पिछले साल गोपालगंज के करीब सारसडोल में एक युवक को डेंगू से प्रभावित पाया गया था, वह नागपुर का रहने वाला था एवं बाद में उसकी मौत हो गई थी। इस साल चार मरीजों में से दो को डेंगू होने की पुष्टि स्वास्थ्य विभाग ने 30 जुलाई को की है। इसके उपरांत तीन दिन से स्वास्थ्य और पलिका प्रशासन मौन साधे हुए है कि डेंगू अभियान में उसने क्या किया है? डेंगू के लिए जिम्मेदार एडीज मच्छर का लार्वा मिलना सिवनी के लिए खतरे का संकेत है। डेंगू का प्रकोप ठण्ड के मौसम में बेहद तेज हो जाता है उस समय इस पर काबू पानी आसान नहीं होता है। डेंगू से निपटने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों के दल की आवश्यक्ता है। जब सिवनी में आम बुखार के लिए मरीज दर दर भटकता है तो भला उसे डेंगू जैसे जानलेवा रोग से निपटने के लिए सरकारी इमदाद कहां से मिल पाएगी?

बहुत पुरानी कहावत यहां चरितार्थ होती दिख रही है। कहते हैं किसी गांव में सब अजर अमर थे, किसी को मृत्यु नहीं आई थी, एक दिन अचानक वहां एक उमर दराज महिला मर गई तो गांव का गांव बोल उठा -‘‘बुढ़िया के मरने का गम नहीं! गम तो इस बात का है कि मौत ने घर देख लिया।‘‘ यही हाल डेंगू का है, चार मरीजों को डेंगू हुआ है उनके खून के प्लेटलेट्स कम होंगे, नागपुर या अन्य जगहों पर वे ईलाज करवाकर स्वस्थ्य होकर वापस आ जाएंगे, पर गम तो इस बात का ही रहेगा कि अब डेंगू के मच्छर ने सिवनी का घर देख लिया है।

शनिवार, 3 अगस्त 2013

पालिका हेल्थ के बीच आरोप प्रत्यारोप का सबब बना डेंगू अभियान!

पालिका हेल्थ के बीच आरोप प्रत्यारोप का सबब बना डेंगू अभियान!

रस्म अदायगी बन रही है मलेरिया या डेंगू के लार्वा की जांच!

(दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनी (साई)। शहर में मच्छरों की आबादी दिनों दिन बढ़ रही है, और नगर पालिका तथा स्वास्थ्य विभाग आपस में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़कर अपनी खाल बचाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। आज कलेक्टर के समक्ष भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.वाय.एस.ठाकुर तथा मुख्य नगर पालिका अधिकारी सी.के.मेश्राम के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा।
कलेक्टरेट के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि शहर में डेंगू और मलेरिया की भयावह स्थिति को देखकर संवेदनशील जिला कलेक्टर भरत यादव ने सीएमओ पालिका और स्वास्थ्य को तलब किया। दोनों ही से शहर की स्थिति की ताजा जानकारी और स्पष्टीकरण जिला कलेक्टर द्वारा मांगे गए।
सूत्रों के अनुसार जिला कलेक्टर जैसे जिले के शीर्ष अधिकारी की वरिष्ठता को भी दरकिनार कर दोनों ही सीएमओ एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप में उलझ गए। सूत्रों की मानें तो दोनों ही ने इस काम के लिए एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए अपना दामन बचाने का प्रयास किया।
उधर, शहर में डेंगू और मलेरिया का कहर जारी है। देर से ही सही स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू और मलेरिया की रोकथाम के लिए उपाय आरंभ किए हैं। प्रशासन के उपाय इसलिए नाकाफी माने जा रहे हैं क्योंकि इस काम में लगे कर्मचारी प्रशिक्षित नही हैं। लोगों के घरों की छतों तक जाने का मार्ग ना होने से छतों की चेकिंग नहीं हो पा रही है।

दो वार्ड हैं सबसे ज्यादा प्रभावित
मच्छर जनित रोगों मलेरिया और डेंगू से प्रभावित दो वार्ड ही प्रमुख रूप से अब तक सामने आए हैं। पहला विवेकानन्द वार्ड और ूदूसरा शहीद वार्ड है। इन दोनों ही वार्डों में स्वास्थ्य विभाग की टीम घरों घर जाकर मच्छरों का लार्वा एकत्र कर उनकी जांच और मौके पर ही टेमोफॉस नामक दवा से उन्हें नष्ट कर रही है।

बेबस है टीम
दोनों ही वार्डों में छतों पर जाने का रास्ता अनेक घरों में ना होने के कारण जांच दल छतों पर नही पहुंच पा रहा है। जिससे यह पता नहीं चल पा रहा है कि छतों पर मच्छरों का लार्वा है अथवा नहीं। यह टीम नसेनी, सीढ़ी आदि के अभाव में अपने आप को असहाय ही महसूस कर रही है।

जरूरत है जनजागरूकता की
मच्छर जनित रोगों से निपटने के लिए लोगों को जागरूक करने की महती जरूरत महसूस की जा रही है। जन जागरूकता के अभाव में लोगों द्वारा इस तरह की जानलेवा बीमारियों के प्रति ज्यादा जानकारी ना होने से लोग इसे बेहद हल्के में ले रहे हैं।

डेंगू के लक्षण बताए प्रशासन
प्रभावित वार्डों में ना तो लोगों को यह पता है कि डेंगू बुखार के लक्षण क्या हैं? यह कैसे फैलता है और इससे बचने के उपाय क्या हैं? माना जा रहा है कि जनभागीदारी के बिना प्रशासन अगर अपनी ओर से इससे निपटने का प्रयास युद्ध स्तर पर भी करेगा तो भी उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।

रस्म अदायगी लग रहा है अभियान!
घर-घर जाकर डेंगू का लार्वा की जांच करने वाला दल क्या पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम कर रहा है? या फिर सिर्फ रस्म अदायगी कर अपने सरकारी दस्तावेज में आंकड़े एकत्रित कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि शहीद वार्ड और विवेकानंद वार्ड में डेंगू का लार्वा की जांच करने घूम रहे दल के कुछ लोग घरों में जाकर सिर्फ मुखिया का नाम लिख रहे हैं।
इसके अलावा न तो वह कंटेनरों में लार्वा की जांच कर रहे हैं और न ही गंदगी की? ऐसे में जांच दल द्वारा स्वास्थ्य विभाग को जो आंकड़े सौंपे जा रहे हैं, उनमें सच्चाई कितनी है? यह भी जांच का विषय है। गत दिवस एक सेवानिवृत्त शिक्षक के घर में भी ऐसा ही हुआ, जहां डेंगू लार्वा की जांच करने गये दल ने महिलाओं से घर के मुखिया का नाम पूछा और अपने कागज में अंकित किया और वापस आ गये, ऐसे में डेंगू लार्वा की जांच करने वाले दल की कार्यप्रणाली सिर्फ रस्म अदायगी ही समझ में आती है और कुछ नही।

रोजाना करें रिपोर्ट सार्वजनिक!

डेंगू वाकई बहुत ही खतरनाक माना जाता है। स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि रोजाना कितनी रक्त पट्टिकाओं की जांच की गई, कितने घरों में लार्वा की जांच की गई? कितने घरों में मलेरिया के, कितने घरों में डेंगू के लिए जिम्मेदार मच्छरों के लार्वा मिले, इस बारे में रोजाना जनसंपर्क विभाग के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग को अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करना चाहिए।

तालाब फूटने से बह गई मछलियां!

तालाब फूटने से बह गई मछलियां!

(शिवशंकर गोस्वामी)

सोनखार (साई)। केवलारी विकासखण्ड के अंतर्गत ग्राम सिन्दरसी का खिड़सी तालाब अत्याधिक बारिश को सह नहीं सका और जर्जर हो चुके इस तालाब की मेढ़ टूट गई जिससे तालाब का पानी बह गया। इस तालाब में पाली जा रही मछलियां भी पानी के साथ ही बह गईं जिससे मत्स्य पालक किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उगली की मछुआ सहकारी समिति मर्यादित के अंतर्गत ग्राम पंचायत बावली के ग्राम सिन्दरसी में खिड़सी तालाब की हालत अत्यंत जर्जर हो चुकी थी। इस तालाब के संधारण का काम पूर्व में ग्राम पंचायत के सरपंचों द्वारा नहीं कराया गया ना ही विभाग के अधिकारियों द्वारा ही इस ओर कोई ध्यान दिया गया।
बताया जाता है कि बीते दिवस हुई भारी बारिश से तालाब का जलस्तर एकाएक बढ़ गया और तालाब की कमजोर पार, एकाएक धराशाई हो गई जिससे तालाब का पानी निकलकर लोगों के खेतों में घुस गया। इस तरह पानी खेतों में घुसने से एक ओर लोगों की फसल का नुकसान हुआ वहीं दूसरी ओर तालाब में पाली जा रही मछलियां भी बह गईं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार गांव के किसान बेनीराम रमानंदी, रामकुमार बरमैया, संपत शांडिल्य आदि ने खिड़सी तालाब में मछली पालन का काम आरंभ किया था। इस तालाब में उनके द्वारा वर्षा के पूर्व और वर्षा काल में मछलियों के प्रजनन के समय डाले गए बीज और उनसे निकली मछलियां भी पानी के साथ बह गईं जिससे उन्हें भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है।

विधायक पति हैं मौतों के जिम्मेदार!: इमरान पटेल

विधायक पति हैं मौतों के जिम्मेदार!: इमरान पटेल

नीता पटेरिया, शशि ठाकुर क्या सीएमओ, डीएमओ, नगर पालिका अध्यक्ष के खिलाफ कठोर कार्यवाही की करेंगी शिकायत

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। जिला मुख्यालय सिवनी की बद् से बदतर स्थिति के लिए सिवनी विधायक श्रीमति नीता पटेरिया के और जिला मलेरिया अधिकारी डॉ.एच.पी.पटेरिया एवं लखनादौन विधायक श्रीमति शशि ठाकुर के पति तथा सिवनी में पदस्थ मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.वाय.एस.ठाकुर के साथ ही साथ भाजपा के नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी पूरी तरह जिम्मेदार हैं।उक्ताशय की बात नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इमरान पटेल द्वारा आज यहां जारी विज्ञप्ति में कही गई है।
नगर कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता फिरोज खान के हस्ताक्षरों से जारी पत्र विज्ञप्ति में कहा गया है कि नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के अध्यक्षयीय कार्यकाल में शहर के लोग नारकीय जीवन रहे हैं। उन्होंने कहा कि निकम्मी नगर पालिका में कमीशन के अलावा और दूसरा कोई काम नहीं हो रहा है। नगर के लोग डेंगू मलेरिया से पीड़ित हैं पर पालिका अध्यक्ष सिर्फ पैसा बनाने में लगे हुए हैं। इमरान पटेल ने आरोप लगाया कि शहर के लोग गटर का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, पर यह बात ना तो जिला प्रशासन के मुखिया कलेक्टर भरत यादव को दिख रही है और ना ही विधायक श्रीमति नीता पटेरिया ना ही भाजपा के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर ही इस मामले में कोई कार्यवाही कर रहे हैं।
इमरान पटेल ने आगे कहा कि सिवनी शहर में नगर पालिका परिषद् द्वारा मच्छरों के खात्मे के उपाय करने के बजाए मच्छर पाले जा रहे हैं। जिला अस्पताल जिसमें जिला मलेरिया अधिकारी का कार्यालय है उसकी अगर जांच की जाए तो सबसे अधिक मच्छरों के लार्वा अस्पताल प्रांगड़ में ही मिलेंगे। इस परिसर में जिला मलेरिया अधिकारी और विधायक श्रीमति नीता पटेरिया के पति डॉ.पटेरिया के साथ ही साथ मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकरी तथा विधायक शशि ठाकुर के पति डॉ.वाय.एस.ठाकुर रोज आकर अपने अपने कार्यालयों में बैठते हैं।
शहर कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता फिरोज खान ने शहर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल के हवाले से आगे कहा है कि शासन की नीतियों का खुला माखौल विधायक द्वय द्वारा उड़ाया जा रहा है। डॉ.पटेरिया और डॉ.ठाकुर की तैनाती तीन साल से अधिक समय से सिवनी में है। डॉ.पटेरिया की तो नौकरी का अधिकांश समय सिवनी में ही बीता है। उन्होंने जिला निर्वाचन अधिकारी से प्रश्न पूछते हुए कहा है कि तीन साल से अधिक समय से एक जिले में तैनात विभागों के मुखिया के स्थानांतरण के लिए क्या वे शासन को पत्र लिखेंगे?
इसके साथ ही साथ शहर इंका प्रवक्ता फिरोज खान ने शहर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल के हवाले से कहा है कि भाजपा आदिवासी विरोधी है। इमरान पटेल का आरोप है कि घंसौर में डलने वाले झाबुआ पावर प्लांट का एक भी कार्यालय सिवनी में नहीं है और भाजपा के विधायक शांत हैं। सिवनी में कार्यालय ना होने के चलते हर क्षेत्र विशेषकर मीडिया में पावर प्लांट के दलालों का दबदबा बढ़ चुका है।

इमरान पटेल ने सिवनी विधायक श्रीमति नीता पटेरिया और लखनादौन विधायक श्रीमति शशि ठाकुर से प्रश्न किया है कि सिवनी में डेंगू और मलेरिया के साथ ही साथ आंत्रशोध, उल्टी दस्त जैसी बीमारियों का पर्याप्त ईलाज ना हो पाने, इनके लिए उपजाऊ माहौल तैयार करवाने आदि के लिए जवाबदेह मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमओ), डॉ.वाय.एस.ठाकुर, जिला मलेरिया अधिकारी (डीएमओ) डॉ.एच.पी.पटेरिया एवं नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी एवं मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) सी.के.मेश्राम के खिलाफ कठोर कार्यवाही की अनुशंसा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, प्रमुख सचिव स्थानीय शासन विभाग, आयुक्त स्वास्थ्य, आयुक्त नगरीय प्रशासन से करने का साहस जुटा पाएंगी, या सत्ता के मद में चूर पुरोहित के पैसे चुराने के आरोप, भाजपा कार्यालय के लिए जनता के पैसे पर नलकूप खुदवाने वाली, व्यापारियों से पहले बिजली के ट्रांसफार्मर के लिए बीस हजार रूपए लेकर वापस करने वाली विधायक एवं व्यवसाईयों से लीज डीड के लिए बीस लाख रूपए मांगने वाले नगर पालिका अध्यक्ष को भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर अपने कार्यालय की सजावट की वस्तु बनाकर रखना चाहेंगे।

गैस घरेलू, उपयोग व्यवसायिक!

गैस घरेलू, उपयोग व्यवसायिक!

(शरद खरे)

एक समय था जब रसोई में जंगल से काटी गई लकड़ियां, उसका बुरादा और कोयला भोजन आदि को पकाने के लिए उपयोग में लाया जाता था। आजाद भारत गणराज्य में जब वनों की सुरक्षा के उपाय आरंभ हुए और वनों के संरक्षण के मद्देनजर द्रव रूप में गैस को सिलेंडर में भरना आरंभ किया गया तब जंगल से लकड़ी काटने को हतोत्साहित किया गया। उस समय रूढ़ीवादी पीढ़ी ने रसोई गैस को अंगीकार नहीं किया। मजबूरी में सरकार ने रसाई गैस को प्रोत्साहित करने के लिए इस पर सब्सिडी लागू की ताकि लोग इसकी ओर आकर्षित हो सकें।
कालांतर में रसोई गैस की मांग तेजी से बढ़ी। इसका कारण यह था कि इसका प्रयोग बेहद आसान था। आसानी के साथ लोग बिना धुंए, राख के भोजन आदि को पकाने का काम करने लगे। सुरसा की तरह बढ़ रही मंहगाई के मौसम में जलाऊ लकड़ी की दरें भी आसमान छूने लगीं। इस दौर में सब्सिडाईज्ड रसोई गैस सभी को आकर्षित कर रही थी। लोगों के घरों के कच्चे चूल्हे का स्थान रसोई गैस वाले चूल्हों ने ले लिया।
इसी दौर में गोबर गैस से खाना पकाने को भी प्रोत्साहित किया जा रहा था। गोबर गैस के अनेक संयंत्र देश भर में संस्थापित किए गए। गोबर गैस से पकाए गए खाने में कुछ अजीब सी गंध आती थी, अतः यह प्रयोग बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाया। देश की राजधानी दिल्ली में अनेक कालोनियों के घरों में गोबर गैस की पाईप लाईन आज भी घरों घर में डली हैं जिनमें निर्धारित अवधि में रोजाना गैस प्रदाय की जाती है।
रसोई गैस अब कमोबेश देश के सत्तर फीसदी घरों में भोजन पकाने के उपयोग में आ रही है। कुछ सालों पहले तक रसोई गैस कनेक्शन लेना आसान बात नहीं थी। इस समय संसद सदस्य के पास सालाना लगभग सौ गैस कनेक्शन देने का अधिकार होता था। रसोई गैस कनेक्शन में सांसद का कूपन व्हीव्हीआईपी होने का संकेत माना जाता था। इस दौर में अनेक गैस एजेंसी संचालकों ने सांसदों के कूपन खरीदकरसांसदों को लखपति तो खुद को भी काफी अमीर बना लिया।
आज रसोई गैस का कनेक्शन लेना बहुत कठिन काम नहीं है। आज के समय में रसोई गैस का व्यवसायिक उपयोग जमकर हो रहा है। होटल, ढाबे, चाय पान के ठेलों सहित मेले ठेले, शादी ब्याह, जन्मोत्सव आदि में भी रसोई गैस के सिलेन्डर का धड़ल्ले से व्यवसायिक उपयोग हो रहा है। होटलों में हाथी के दिखाने के दांत के मानिंद एक नीला सिलेंडर काउंटर के करीब रख दिया जाता है पर रसोई में लाल रंग वाले सब्सिडी युक्त सिलेंडर का प्रयोग हो रहा है।
और तो और अब तो पेट्रोल से चलने वाले दो और चार पहिया वाहनों को सीएनजी से चलाया जाने लगा है। सीएनजी किट डलवाकर लोग सीएनजी के टैंक में सब्सिडाईज्ड रसोई गैस के सिलेन्डर पलटवा रहे हैं। एलपीजी जबसे ईंधन के रूप में प्रयुक्त होने लगी है तबसे वाहन संचालकों की बांछे खिल गई हैं। पेट्रोल से चलने वाले वाहन जहां चार रूपए प्रति किलोमीटर की दर पर पेट्रोल से चलते हैं वहीं रसोई गैस जो ब्लेक में भी खरीदे तो उसका वाहन महज एक रूपए पचास पैसे प्रतिकिलोमीटर की दर से चलता है।
सालों से घरेलू गैस का दुरूपयोग धड़ल्ले से हो रहा है, पर इसकी रोकथाम में खाद्य विभाग और जिला प्रशासन पूरी तरह नाकाम ही रहा है। हां, चतुर सुजान खाद्य विभाग द्वारा कुछ माहों के अंतराल में एक विशेष अभियान चलाया जाकर जांच की रस्म अदायगी कर ली जाती है। इस रस्म अदायगी में जनसंपर्क विभाग के माध्यम से खाद्य विभाग द्वारा विज्ञप्ति भी जारी कर दी जाती है जिसमें जिला कलेक्टर को ‘‘गदगद‘‘ करने की गरज से जिला कलेक्टर के निर्देशानुसार या आदेशानुसारउक्त अभियान को संचालित करने की बात कह दी जाती है।
ना जाने कितने डीजल से संचालित होने वाले वाहन नीले करोसीन से संचालित हो रहे हैं। शहर में अनेक स्थानों पर रसोई गैस के सिलेन्डर को सीएनजी के टेंक में पलटाने का बेहद खतरनाक काम घनी आबादी वाले क्षेत्रों में संचालित किया जा रहा है। रसोई गैस को सीएनजी टैंक में दो तरह से डाला जाता है एक पंप मेन्युअल तौर पर आपरेट होता है जिसमें पांव के हवा भरने वाले पंप जैसा काम करना होता है, तो दूसरा बिजली से चलने वाली मशीन होती है जो महज दस मिनिट में ही साढ़े चौदह किलो गैस को सीएनजी टैंक में रसोई गैस के सिलेंडर से भर देती है।
क्या खाद्य विभाग, परिवहन विभाग या जिला प्रशासन अथवा पुलिस प्रशासन ने जिले में सीएनजी से चल रहे वाहनों के संचालकों से यह पूछा है कि वे सीएनजी कहां से भरवा रहे हैं, जबकि सिवनी में सीएनजी फिलिंग स्टेशन है ही नहीं! अगर नागपुर जबलपुर से भरवाकर आ रहे हैं तो आने जाने में कितनी गैस की खपत हुई है। क्या कभी सीएनजी गैस के कैश मैमो और लाग बुक देखा है जिम्मेदार लोगों ने! जाहिर है नहीं, मलतब साफ है कि किसी को भी अपने कर्तव्यों का बोध नहीं है। सभी बस मोटा माल काटने की जुगत में ही हैं।

मारा मारी के इस युग में आम जनता को रसोई गैस का एक सिलेन्डर भरवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होता है, वहीं, ब्लेक में इन होटल, ढाबा संचालकों के साथ ही साथ वाहन चालकों को पता नहीं आसानी से कैसे रसोई गैस का सिलेन्डर मिल जाता है। रसोई गैस का धड़ल्ले से व्यवसायिक उपयोग हो रहा है और जिला प्रशासन ने अपने लिए धृतराष्ट्र की भूमिका चुन रखी है. . .।