शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

भाजपा जिलाध्यक्ष एवं नगरपालिका अध्यक्ष का द्वंद चरम सीमा पर


भाजपा जिलाध्यक्ष एवं नगरपालिका अध्यक्ष का द्वंद चरम सीमा पर

पार्टी हाईकमान से हस्तक्षेप की मांग की ओम दुबे ने

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। नगरपालिका परिषद द्वारा आहूत साधारण सम्मेलन जिसमें नगर विकास के लिए अनेकों कार्याें को स्वीकृति दी जानी थी जिसमें भाजपा के 9 पार्षदों द्वारा बैठक का बहिष्कार करना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इन 9 पार्षदों द्वारा बैठक का बहिष्कार करने का नेतृत्व भाजपा के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर कर रहे थे जो किसी भी दृृष्टि से उचित नहीं है।
उक्त बात वरिष्ठ पत्रकार एवं भाजपा नेता ओम दुबे द्वारा जारी विज्ञप्ति में कही गयी है। उन्होंने आगे कहा कि यदि नगरपालिका अध्यक्ष एवं भाजपा पार्षदों में कोई मतभेद है या सामंजस्य की कमी दिखायी देती है तो भाजपा के जिलाध्यक्ष का कर्त्तव्य था कि वे नगरपालिका अध्यक्ष और पार्षदों को बुलाकर मतभेद दूर कर सामंजस्य बैठालने का काम करते, परंतु उन्होंने ऐसा न करके भाजपा पार्षदों का मनोबल बढ़ाया साथ ही शहर में होने वाले विकास के कार्याें में भी अंड़गा लगाया।
श्री दुबे ने आगे कहा कि सही तो यह होता कि यदि भाजपा के पार्षद, अध्यक्ष एवं नगरपालिका अधिकारियों की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं थे या उनकी बातों को अनदेखा करते थे तो वे नगरपालिका की बैठक में जाकर वहां अपनी बात मनवाने के लिए पुरजोर विरोध, आंदोलन, अनशन करते हुए अपनी बात को जनता के सामने और भी अच्छी तरह से उजागर कर सकते थे।
उन्होंने कहा कि भाजपा पार्षदों की बैठक में अनुपस्थिति के बावजूद कांग्रेस के पार्षदों के सहयोग से शहर विकास के अनेक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास कराए गए। ऐसी स्थिति में भाजपा पार्षदों का विरोध का कोई मायना नहीं रह जाता। बल्कि उन्होंने अपने-अपने वार्डाें में कराए जाने वाले कार्याें की बात बैठक में न रखकर अपने वार्डाें को विकास कार्याें से वंचित भी कर दिया।
वरिष्ठ पत्रकार ने यह भी कहा कि यदि भाजपा पार्षदों को नगरपालिका में भ्रष्टाचार की बू आ रही थी तो उन्होंने नगरपालिका की बैठक में इस बात को उजागर करना उचित क्यों नहीं समझा। यदि 9 पार्षद मिलकर नगरपालिका की बैठक में किसी भी भ्रष्टाचार के मुद्दें को पुरजोर तरीके से उठाते तो किसी की हिम्मत नहीं थी कि मामला को दबा दिया जाये। वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार के मुद्दों की बातें आमजनता तक भी सरल तरीके से पहंुच सकती थी।
श्री दुबे ने आगे कहा कि बैठक में भ्रष्टाचार की बात न उठाकर बैठक का बहिष्कार करना फिर किसी हॉटल में भाजपा के जिलाध्यक्ष के साथ भोज करना। इसी दौरान फोटो ले रहे एक पत्रकार के साथ अशोभनीय व्यवहार भी किसी दृष्टि से उचित नहीं है। दूसरी ओर नगरपालिका के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का भी कर्त्तव्य है कि वे शहर विकास के लिए सभी पार्षदों को लेकर चलें तथा उनकी सलाह को अमलीजामा पहनाने का भी काम करें। यदि सभी मिलजुलकर सामंजस्य से काम करेंगे तो आपसी मतभेद तो समाप्त होंगे ही, शहर का विकास भी तीव्र गति से होगा।
ओम दुबे ने कहा कि भाजपा के पार्षद बैठक का बहिष्कार कर जिला भाजपा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर के साथ शहर के एक हॉटल में भोजन कर रहे थे। इस दौरान एक पत्रकार द्वारा फोटो लेने पर हुए विवाद की भी शहर में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुयी है। पार्षदों के साथ भाजपा के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर की भोज के दौरान फोटो लेने पर किस बात की आपत्ति थी। भोजन करना कोई चोरी का काम नहीं था, न ही कोई अनैतिक कार्य की फोटो ली जा रही थी। इससे यह कहावत चरितार्थ होती है कि चोर की दाढ़ी में तिनका। सिवनी विधानसभा के चुनाव के बाद नगरपालिका के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी एवं भाजपा के पराजित प्रत्याशी व भाजपा के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर के बीच जो द्वंद लगातार चल रहा है वह कब समाप्त होगा, समझ के परे है।
श्री दुबे ने जारी विज्ञप्ति में कुछ तल्ख तेवरों के साथ कहा कि श्री दिवाकर का आरोप है कि उनकी पराजय के पीछे नगरपालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी की अहम भूमिका रही है जबकि पराजय के पीछे और भी अनेक कारण थे। जिसमें प्रमुख कारण यह था कि श्री दिवाकर ने भाजपा के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर अपना कब्जा जमाकर बैठे थे। अनेक पदों में उनकी अकेले की नियुक्ति के कारण बाकी और भी वरिष्ठ कार्यकर्ता अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगे थे। पार्टी के अनेक महत्वपूर्ण निर्णय भी श्री दिवाकर अपनी मनमर्जी से करते थे। जिले से अपनी समस्याओं को लेकर आए हुए कार्यकर्ताओं की कोई बात नहीं सुनी जाती थी और वे अपने आप को असहाय समझने लगे थे।
वरिष्ठ पत्रकार एवं भाजपा नेता ओम दुबे ने पार्टी हाईकमान को भेजे अपने पत्र में कहा है कि सिवनी जिले में भारतीय जनता पार्टी को भारी नुकसान पहंुचने के लिए नरेश दिवाकर प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। एक तो उन्होंने सभी पद अपने पास रखे दूसरी ओर सिवनी जिले की अन्य विधानसभा क्षेत्रों में संगठन के मुखिया के नाते उन्होंने न तो कोई दौरा कर पाया न ही कार्यकर्ता में व्याप्त आक्रोश को समाप्त करने में सफल हो पाये।
श्री दुबे ने पत्र में उल्लेख किया है कि यदि कार्यकर्ताओं के बीच बैठक कर उनकी समस्याओं का निराकरण और उनके आक्रोश को शांत किया जाता तो जिले के विधानसभा चुनाव में भाजपा की इतनी खराब स्थिति नहीं होती। अभी जब श्री दिवाकर ने अपने पद से स्तीफा दे दिया है तो उनका कर्त्तव्य था कि वे पार्टी हाईकमान से निवेदन करके जिले में किसी भी अच्छे भाजपा के व्यक्ति को भाजपा जिलाध्यक्ष की बागडोर के लिए दबाव बना सकते थे। जिससे उनकी छवि में भी निखार आता और संगठन का कार्य जिले में सुचारू रूप से प्रारंभ हो जाता।
ओम दुबे ने अपने पत्र के अंत में कहा है कि स्तीफा देने के बावजूद श्री दिवाकर अभी भी अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाले हुए हैं और ऐसे निर्णय ले रहे हैं जिससे जिले में पार्टी को और आने वाले लोकसभा चुनाव में फिर से नुकसान होने की संभावना प्रबल दिखायी दे रही है। अच्छा तो यह होगा कि श्री दिवाकर सभी पदों से मुक्त होकर कुछ दिनों के लिए आत्म चिंतन एवं मनन करें और पार्टी को मजबूत बनाने में सहयोग प्रदान करें। पार्टी हाईकमान को भी चाहिए कि इन दोनों नेताओं के द्वंद को समाप्त करने के लिए कोई उपाय करे वरना लड़ाई का अंत, अंततः खराब ही होता है।

राजेश नरेश के वर्चस्व की जंग में चूरा होता भाजपा का बाड़ा!


राजेश नरेश के वर्चस्व की जंग में चूरा होता भाजपा का बाड़ा!

पार्टी हित के बजाए गणेश परिक्रमा हावी होती दिख रही सिवनी भाजपा में

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। भारतीय जनता पार्टी की जिला इकाई के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के बीच वर्चस्व की अघोषित जंग में जिला भाजपा पिसती नजर आ रही है। नरेश दिवाकर दस साल विधायक रहने के साथ ही साथ महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी रहे हैं तो दूसरी ओर राजेश त्रिवेदी संगठनात्मक राजनीति करके 2009 के अंत में नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद हेतु चुनकर आए हैं।
कहा जा रहा है कि इस लिहाज से राजेश त्रिवेदी अभी नरेश दिवाकर से काफी कनिष्ठ हैं। भाजपा के एक पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि सिवनी में जिला भाजपा अब व्यक्तिगत जंग का अखाड़ा बनकर रह गई है। किसी को भी पार्टी के हित से लेना देना नहीं रह गया है। पार्टी में अब उसकी ही पूछ परख है जो नेताओं की गणेश परिक्रमा कर रहा है।

लंबे समय से चल रहा चूहा बिल्ली का खेल!
भाजपा के एक अन्य पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि जिला भाजपा में चूहा बिल्ली का खेल लंबे समय से सतत जारी है। वस्तुतः यह वर्चस्व की जंग का मामला है। पार्टी हितों को दरकिनार कर एक दूसरे पर वार करने का कोई भी मौका पदाधिकारियों द्वारा नहीं चूका जा रहा है। जब भी जिस पदाधिकारी को जिसके भी विरूद्ध कोई मसला मिलता है वह उसे उछालकर दूर से आग तापता नजर आता है।

नीता नरेश हटाओ के पोस्टर्स की रही धूम
भारतीय जनता पार्टी को वैसे तो काडर बेस्ड अनुशासित पार्टी माना जाता है, किन्तु सिवनी में जो हो रहा है उसे देखकर शायद ही कोई कहेगा कि यह उसी काडर बेस्ड भाजपा की जिला इकाई है। विधानसभा चुनावों के पूर्व जब टिकिट हेतु रायशुमारी की जा रही थी, उस समय भी नीता नरेश हटाओ, भाजपा बचाओ के गगन भेदी नारों ने आसमान गुंजायमान कर दिया था। चुनाव के चलते भी इसी इबारत के पोस्टर्स भी शहर भर में चस्पा किए गए। वस्तुतः भाजपा में हर बात को पार्टी मंच पर ही रखने का रिवाज रहा है, पर यहां ऐसा नहीं हुआ।

लीज मामले को पार्टी फोरम में था निपटाना!
एक अन्य पदाधिकारी ने दबी जुबान से कहा कि राजेश त्रिवेदी और नरेश दिवाकर के बीच वर्चस्व की जंग लंबे समय से चली आ रही है। संगठन के डंडे के डर से उन्होंने भी नाम उजागर न करने की शर्त पर ही साई न्यूज से चर्चा के दौरान कहा कि इसके पहले गंज की लीज के मामले में भी भाजपा जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर सीधे नगर पालिका की मुखालफत करने जिला कलेक्टर से मिलने चले गए थे। उन्होंने कहा कि यह मामला भाजपा के ही नगर पालिका अध्यक्ष का था अतः नैतिकता के आधार पर इस मामले को पार्टी कार्यालय के अंदर ही सुलटा लिया जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा न कर पालिका अध्यक्ष को नीचा दिखाने की गरज से पार्टी मंच से इतर कलेक्टर से मिलकर मामले को तूल दिया गया।

राजेश का हुआ निलंबन
विधानसभा चुनाव के उपरांत जब भाजपा प्रत्याशी नरेश दिवाकर दूसरे स्थान पर रहे तब उसके बाद भाजपा के प्रदेश कार्यालय की ओर से नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी को निलंबित कर दिया गया। उनका निलंबन समाप्त हुआ या नहीं यह बात अभी भी रहस्य ही है। वैसे वे नगर पालिका के चुने हुए अध्यक्ष हैं अतः उनके खिलाफ कार्यवाही का उनके पद पर शायद ही कोई असर हो। राजेश त्रिवेदी को किन शिकायतों के आधार पर निलंबित किया गया है इस बारे में भी भाजपा मौन ही साधे हुए है।

हो रही भाजपा की छवि धूमिल
सिवनी में भारतीय जनता पार्टी के अंदर ही अंदर चल रही वर्चस्व की गलाकाट स्पर्धा में पार्टी की छवि पर प्रतिकूल असर हुए बिना नहीं है। पार्टी का निचला कार्यकर्ता अब उहापोह की स्थिति में है, कि अगर अनुशासन हीनता की जाती है तो उस पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। इस तरह के आचरण से निचले स्तर के कार्यकर्ता द्वारा आने वाले समय में उसकी बातें न मानी जाने या स्वार्थपूर्ति न होने पर अनुशासनहीनता करने की कोशिश अगर की जाती है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

पार्टी मंच पर निपटना था पार्षदों का विरोध
वहीं कहा जा रहा है कि 15 जनवरी को नगर पालिका परिषद की साधारण सभा में भाजपा के पार्षदों के विरोध को पार्टी मंच पर ही 13 या 14 जनवरी को ही निपटा लिया जाना चाहिए था। गौरतलब होगा कि समााचार एजेंसी ऑफ इंडिया और दैनिक हिन्द गजट द्वारा चार साल बाद विकास हेतु एक राय बन रही पार्षदों कीएवं मिले मौका मारो चौका की तर्ज पर एक हो रहे पालिका के पार्षदशीर्षक से समाचारों के प्रसारण एवं प्रकाशन में पालिका की साधारण सभा के बारे में सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी को प्रकाशित एवं प्रसारित किया गया था। देखा जाए तो 15 जनवरी के पहले ही भाजपा संगठन को इस मामले को पार्टी कार्यालय में ही पार्षदों और नगर पालिका अध्यक्ष को बुलवाकर बैठक कर सहमति बनवा ली जाती तो न तो पालिका में भाजपा को नीचा देखना पड़ता और न ही भाजपा की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता।

अप्रैल मई में हो सकते हैं लोकसभा चुनाव
नब्बे के दशक के उपरांत सिवनी को भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है। आने वाले समय में अप्रैल या मई माह में लोकसभा चुनाव भी हैं। भाजपा के अंदर मची इस अंर्तकलह के छींटे आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के दामन पर अगर पड़ जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आश्चर्य तो इस बात पर है कि इतना सब कुछ होने के उपरांत भी भाजपा के संगठन मंत्रियों द्वारा लगातार चुप्पी ही अख्तियार रखी जा रही है।

पेंच पर बयानबाजी!


पेंच पर बयानबाजी!

(शरद खरे)

देश के अन्नदाता किसानों के लिए फसलों के बेहतर उत्पादन हेतु सबसे महती आवश्यक्ता पानी की ही होती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। सिवनी के किसानों के लिए भीमगढ़ बांध वरदान से कम नहीं है। भीमगढ़ का पानी पलारी, केवलारी क्षेत्र के किसानों के लिए एक बेहतर और उपजाऊ माहौल पैदा कर रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। भीमगढ़ के चलते ही पलारी क्षेत्र को सिवनी जिले का पंजाब भी कहा जाने लगा है। सिवनी में शेष इलाकों में पैदावार तो है पर पानी की कमी के चलते पैदावार प्रभावित हो रही है।
सालों से सिवनी के किसान पेंच व्यपवर्तन परियोजना की राह तक रहे हैं। ब्रितानी हुकूमत के दौरान इस परियोजना का सर्वेक्षण करवाए जाने के कुछ प्रमाण मिलते हैं। याद पड़ता है कि जैसे ही दिग्विजय सिंह ने प्रदेश में 1993 में सत्ता संभाली उसके बाद उन्होंने पेंच परियोजना की नींव रखी। सत्तर के दशक में भी इस परियोजना में कुछ काम हुआ है, पर यह काम कागजी घोड़े दौड़ाने तक ही सीमित रहा है।
यह परियोजना ंिछंदवाड़ा जिले के विकासखण्ड चौरई के ग्राम माचागौरा में प्रस्तावित थी। बताते हैं कि इसमें ठेके को लेकर आपसी अहं का टकराव हुआ और इस परियोजना पर मानो ग्रहण लग गया। नेताओं की बाजीगरी में इस परियोजना की नस्ती इस कार्यालय से उस कार्यालय और न्यायालय की सीढ़ी चढ़ती उतरती रही। 2006 में दस फरवरी को तत्कालीन विधायक हरवंश सिंह के नेतृत्व में दिल्ली गए कांग्रेस के प्रतिनिधिमण्डल ने इस परियोजना के साथ ही साथ रेल एवं अन्य मामलों को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, जल संसाघन मंत्री सैफुद्दीन सोज, रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के साथ ही साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनके दिल्ली स्थित निवास पर भेंट की थी।
प्रदेश सरकार के भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक ईमानदार अधिकारी राधेश्याम जुलानिया ने इस परियोजना में खासी रूचि ली और इस परियोजना के लगभग सारे अडं़गों को हटवाने का प्रयास किया। वहीं, कुछ नेताओं की शह पर उनके कारिंदों ने सिवनी की फिजां में यह बात तैरा दी कि आर.एस.जुलानिया इस काम को बंद करना चाह रहे हैं। सर्किट हाउस सिवनी में सिवनी के उत्साही युवाओं और श्री जुलानिया के बीच हुई झड़प संभवतः इन्हीं अफवाहों का नतीजा थी।
राधेश्याम जुलानिया के प्रयास अब आकार लेते दिख रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के सूत्र भोपाल में गहरी पैठ रखते होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। हो सकता है अपने-अपने सोर्सेज से मिली खबरों के आधार पर कांग्रेस भाजपा द्वारा इसका श्रेय लेने का प्रयास किया जा रहा हो। वहीं विधायक दिनेश राय के पक्ष से भी इस परियोजना का काम आरंभ कराने की बात कही जा रही है। कुल मिलाकर श्रेय लेने की गंदी राजनीति का आगाज हो चुका है। वस्तुतः किसानों का किसमें हित है यह बात प्राथमिकता वाली होना चाहिए। श्रेय बाद में लिया जा सकता है, वरना कहीं श्रेय की राजनीति में पेंच परियोजना पर ग्रहण न लग जाए और इसे पूरा न होने देने की ठानने वाले नेताओं की बलवती अभिलाषाएं फिर हरी हो जाएं।

पेपर लीक होने के बाद भी परीक्षा नहीं हुई निरस्त!


पेपर लीक होने के बाद भी परीक्षा नहीं हुई निरस्त!

(सोनाली खरे)

नई दिल्ली (साई)। नेशनल इश्योरेंस कंपनी की सैकड़ों पदों पर भर्ती के लिए हुई परीक्षा के पेपर लीक होने के बाद भी इस परीक्षा को अब तक निरस्त न किया जाना आश्चर्य का विषय बनता जा रहा है। दिसंबर में हुई परीक्षा को निरस्त करने के लिए कंपनी ने नोटिस तो जारी कर दिया था किन्तु कहा जा रहा है कि जब इस मामले में शोरगुल नहीं हो रहा है तो इसे निरस्त करने का अब क्या ओचित्य!
प्राप्त जानकारी के अनुसार सितम्बर में आयोजित इस परीक्षा के पर्चे लीक होने के कारण इन परीक्षाओं को 15,22 और 29 दिसंबर को आयोजित किया गया था। 23 दिसंबर को लखनऊ सहित कुछ अन्य स्थानों पर 29 दिसंबर के प्रस्तावित पर्चे लीक होने की खबरें सोशल मीडिया पर आईं तब अधिकारियों द्वारा इन खबरों को महज अफवाह बताकर खारिज कर दिया था।
इस संबंध में कंपनी के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि 40,000 आवेदकों ने उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारी के पद के लिए आवेदन किया था। 29 दिसंबर को रविवार को परीक्षा शहर में 21 केन्द्रों पर आयोजित की जा रही थी। परीक्षा लखनऊ और उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद में और देश भर में छह और शहरों में आयोजित की गई थी।
इस संबंध में अंग्रेजी समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया के पास लीक प्रश्न पत्र की एक प्रति पहुंची थी और यह रविवार की सुबह पारा क्षेत्र में स्थित केंद्र में पर्यवेक्षकों की मदद से जांची गई। बाद में इसका परीक्षण करने पर पर्चे में शामिल तीस से चालीस फीसदी प्रश्न परीक्षा में शामिल पर्चे के अनुसार ही पाए गए थे। इसमें सेट तक का मिलना होना बताया गया था।
इस संबंध में सूत्रों ने साई न्यूज को आगे बताया कि लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रविंद्र गौड़ ने भी कंपनी के कोलकता स्थित कार्मिक विभाग को इसकी सूचना दी थी। इसके बाद भी इस संबंध में अब तक कोई कार्यवाही न किया जाना आश्चर्य का विषय ही माना जा रहा है।

हो हल्ला नहीं तो परीक्षा निरस्त नहीं!
कंपनी के सूत्रों का कहना है कि इस संबंध में ज्यादा शोर शराबा नहीं होने पर कंपनी के आला दर्जे के अधिकारियों का मानना है कि शोर शराबा नहीं हो रहा है इसलिए इस परीक्षा को निरस्त करने का कोई ओचित्य नहीं है। वैसे सूत्रों की मानें तो कंपनी के अधिकारी अभी वेट एण्ड वाच की स्थिति में हैं। अगर हो हल्ला ज्यादा होता है तो आने वाले दिनों में इसे निरस्त भी किया जा सकता है।

सैटिंगबाजों का खेल
वहींकंपनी के सूत्रों ने आगे बताया कि चूंकि इस परीक्षा में सैटिंगबाज सक्रिय थे अतः वे चाह रहे हैं कि इस परीक्षा को निरस्त न किया जाए। सूत्रों की मानें तो लोगों से बड़ी मात्रा में रिश्वत लेकर उन्हें पास करवाकर सिलेक्ट करवाने की जवाबदेही इन मध्यस्थों ने ली थी और अब उनकी कोशिश है कि यह परीक्षा निरस्त नहीं हो और उनका काम बना रहे।

1434 पदों के लिए हुई थी परीक्षा
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस एडमिस्ट्रेटिव आफीसर के लिए हुई इस परीक्षा में कुल 1434 पदों के लिए परीक्षा हुई थी। इसमें नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के 423, न्यू इंडिया इंश्योरेंस के 494, ओरिएंटल इंश्योरेंस के 223 एवं यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेंस के 294 पदों के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी। 15 दिसंबर को 21 तो 22 दिसंबर को 13 एवं 29 दिसंबर को 8 परीक्षा केंद्रों में परीक्षा आयोजित की गई थी।

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

शराब व्यवसाई का मस्ज़िद का सरपरस्त बनना निंदनीय: रानू

शराब व्यवसाई का मस्ज़िद का सरपरस्त बनना निंदनीय: रानू

(अय्यूब कुरैशी)

सिवनी (साई)। शराब कारोबार से जुड़े दिनेश राय उर्फ मुनमुन का एक मस्ज़िद का सरपरस्त बनना या सरपरस्त बताना निंदनीय है। या तो शराब कारोबारी दिनेश राय शराब का कारोबार बंद करें या फिर मस्ज़िद के सरपरस्त पद से अपने आप को विलग करें। उक्ताशय की बात नगर कांग्रेस मंत्री शाहिद खान रानूद्वारा जारी विज्ञप्ति में कही गई है।
नगर कांग्रेस मंत्री शाहिद खान रानू के हस्ताक्षरों से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि लखनादौन नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय उर्फ मुनमुन को लखनादौन की एक मस्ज़िद का सरपरस्त बनाना या सार्वजनिक जगहों पर सरपरस्त बताना निंदनीय है, क्योंकि धार्मिक स्थलों का और खास तौर पर मस्ज़िदों का किसी ओहदे में ऐसे व्यक्ति को रहने का कोई अधिकार नहीं है जो शराब जैसे व्यवसाय से जुड़ा हो।
नगर कांग्रेस मंत्री शाहिद खान रानूने आगे कहा है कि दिनेश राय उर्फ मुनमुन के अंदर अगर जरा सी भी नैतिकता है तो यह स्पष्ट कर दें कि वह किसी मस्ज़िद के सरपरस्त नहीं हैं या यह स्पष्ट कर दें कि शराब व्यवसाय से उनका या उनके परिवार का कोई सरोकार नहीं है।
शाहिद खान रानूने अपनी विज्ञप्ति में कहा है कि महज राजनीति के लिए धार्मिक संस्थाओं से जुड़ना निंदनीय कृत्य है, क्योंकि कोई धर्म समाज में नशा जैसी बीमारी फैलाने और घरों को तबाह करने वालों को सरपरस्त बनाने की इजाजत नहीं देता। इसलिए समय रहते दिनेश राय उर्फ मुनमुन मस्ज़िद के सरपरस्त पद से हट जाएं या शराब का व्यवसाय बंद कर दें ताकि उन पर कोई उंगली न उठा सके।

गौरतलब है कि बीते दिनों दिनेश राय के समर्थकों के हवाले से मीडिया में यह बात उछली थी कि दिनेश राय उर्फ मुनमुन शराब का कारोबार नहीं करते हैं, पर दिनेश राय उर्फ मुनमुन द्वारा अपने नामांकन के साथ चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार सोशल मीडिया को जो मेल आईडी दी है उस आईडी में दिनेश राय को म्युनिस्पिल काउंसिल लखनादौन का अध्यक्ष और लिकर कांट्रेक्टर बताया गया है।

दुर्घटनाएं और ट्रामा यूनिट

दुर्घटनाएं और ट्रामा यूनिट

(शरद खरे)

सिवनी में पिछले दिनों एक के बाद एक दुर्घटनाएं घटी हैं। इनमें कुछ लोगों की जान भी गई है। सिवनी में फोरलेन है और फोरलेन पर वाहनों की गति पर नियंत्रण रखना संभव नहीं प्रतीत होता है। सिवनी जिले के लिए राहत की बात है कि अनेकानेक षणयंत्रकारियों जिनमें सिवनी जिले के जयचंदभी शामिल थे और हैं, के रहते हुए भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे का मुंह आज भी सिवनी से नहीं मोड़ा गया है। इस सड़क को बंद कराने में न जाने कितने षणयंत्रकारियों द्वारा अपने अपने स्तर पर दांव पेंच चलाए गए, सिवनी के लोगों को आक्रोशित आवेशित कर सड़कों पर उतारा गया, कांग्रेस की शह पर भाजपा तो भाजपा की शह पर कांग्रेस को तबियत से कोसा गया, इस षणयंत्र में ठेकेदारों से सांठगांठ कर लाखों रूपए वसूलने की चर्चाएं भी सिवनी की फिजां में हैं, अपने अपने निहित स्वार्थ और व्यवसायों को भी लोगों की भावनाओं की भट्टी पर चढ़ाकर पकाया गया, और न जाने क्या क्या किया गया इस षणयंत्र के तहत।
क्या हमारा घर परिवार नहीं है, जो हम चौबीसों घंटे आंदोलन करें और बाकी लोग घर में बैठे रहें‘‘, ‘हमें क्या लेना देना है यार‘, ‘भाजपा को क्यों नहीं कोसते, क्या लोगों को कांग्रेस ही चोर नजर आती है‘, कल तक तो बड़ी बड़ी बातें करते थे, आज खामोश क्यों हो?‘, ‘भाजपा के विधायकों को क्यों नहीं घेरते?‘, ‘जब एक बार तय हो गया था कि किसी नेता के पास नहीं जाना है तो फिर राहुल गांधी की चिरौरी करने क्यों गए?‘ आदि जैसे जुमले आज भी सिवनी की फिजां में तैर रहे हैं। 2008 के दिसंबर में बुने गए षणयंत्र के ताने बाने का निष्कर्ष आज भी जर्जर फोरलेन के रूप में सिवनी वासियों के सामने है।
एनएचएआई के नियम कायदों के अनुसार फोरलेन पर वाहनों की गति अन्य सड़कों की तुलना में काफी अधिक ही हुआ करती है। दिल्ली से चंडीगढ़ हाईवे हो या दिल्ली जयपुर, इन हाईवे पर ओव्हर लोडेड ट्रक भी हांफते हुए नहीं बल्कि हिरण की तरह कुलांचे भरते नजर आते हैं। कमोबेश यही आलम स्वर्णिम चतुर्भुज और उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम गलियारे में जहां जहां सड़क का निर्माण हो चुका है, वहां है। सिवनी जिले में भी लगभग साठ किलोमीटर से ज्यादा सड़क का निर्माण फोरलेन के रूप में हो चुका है। इस सड़क पर वाहन तेज रफ्तार से चल रहे हैं। इन वाहनों की अंधी रफ्तार के कारण भागने से दुर्घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। सिवनी जिले में एक के बाद एक सड़क दुर्घटनाओं से लगने लगा है कि एनएचएआई का चतुष्गामी हाईवे लोगों के लिए काल बनता जा रहा है। अगर सिवनी जिले की सीमा में दुर्घटनाओं की तादाद ज्यादा है तो निश्चित तौर पर यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि इससे लोगों पर खतरा मण्डराने लगा है।
अगर यह सत्य है तो निश्चित तौर पर सिवनी में सड़क के निर्माण में ही कहीं न कहीं खामी होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। हो सकता है लोगों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से फोरलेन के डिवाईडर तोड़ लिए हों (इसका एक नायाब उदाहरण, लखनादौन में बार एॅसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश राय के स्वामित्व वाले राय पेट्रोलियम के सामने का टूटा डिवाईडर है, जिसे दुरूस्त कराने या उस पर किसी पर जुर्माना लगाने का साहस भी एनएचएआई नहीं जुटा पा रही है, हो सकता है एनएचएआई भी इसे चुनावी मुद्दा बनने की राह ही देख रहा हो)।
सिवनी में एनएचएआई ने कुछ मार्ग के कुछ हिस्से को बनाकर आरंभ कर दिया है और इसका टोल भी वसूला जाने लगा है। एनएचएआई के मापदण्डों के हिसाब से सिवनी जिले में जगह जगह सड़क किनारे दुर्घटना के उपरांत प्राथमिकोपचार के लिए स्वास्थ्य केंद्र, एंबूलेंस, हाईवे पेट्रोल आदि की व्यवस्था की जानी चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि एनएचएआई के हाईवे पेट्रोल लिखे वाहन में टोल प्लाजा के कर्मचारियों के लिए खाना, किराना और दूध ढुलते बारापत्थर से रोजाना देखा जा सकता है।

रही बात गंभीर दुर्घटना में घायलों को तत्काल चिकित्सा मुहैया कराने की, तो इसके लिए सड़क निर्माण के ठेकेदार को बाकायदा ट्रामा यूनिट की स्थापना फोरलेन पर ही की जानी चाहिए थी। यह सिवनी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां के नपुंसक नेतृत्व के कारण सिवनी में सड़क निर्माण के ठेकेदार मलाई खा रहे हैं और दुर्घटनाओं में घायल लोग दम तोड़ रहे हैं। बताते हैं कि ट्रामा यूनिट की स्थापना जिला चिकित्सालय के ब्हाय रोगी कक्ष के पीछे अंदर घुमावदार रास्ते के बाद की जा रही है। एनएचएआई के अधिकारियों के साथ ही साथ चिकित्सा विशेषज्ञों को इस बात का भान बेहतर तरीके से होगा के दुर्घटना में घायल के लिए एक एक सेकंड का समय कीमती होता है। हर शहर में जहां दुर्घटनाओं की संभावनाएं ज्यादा होती हैं वहां ट्रामा सेंटर की स्थापना मुख्य मार्ग पर इस तरह से की जाती है ताकि दुर्घटना आदि में घायल मरीज को बिना किसी विध्न के तत्काल चिकित्सकीय मदद उपलब्ध हो सके।

रविवार, 17 नवंबर 2013

सिवनी विधानसभा में भाजपा ने खोया आपा!

सिवनी विधानसभा में भाजपा ने खोया आपा!

नरेश दिवाकर की सभा में तलवार बाजी के बाद अब निर्दलीय के समर्थकों की हुई पिटाई

(अय्यूब कुरैशी)

सिवनी (साई)। विधानसभा चुनाव में मतदान की तिथि जैसे जैसे करीब आती जा रही है, वैसे वैसे अब करो या मरो की स्थिति सभी के सामने निर्मित होती जा रही है। गत दिवस पुसेरा में भाजपा के प्रत्याशी नरेश दिवाकर के जनसंपर्क के दौरान हुई तलवार बाजी के बाद अब आज सुबह बस स्टैंड पर एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा के नेताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी के समर्थकों की धुनाई कर दी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक नेशनल चैनल के द्वारा आज निजी बस स्टैंड पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में कांग्रेस के राजकुमार खुराना, भाजपा के नरेश दिवाकर एवं निर्दलीय दिनेश राय उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान उत्साहित कार्यकर्ताओं द्वारा अपने अपने नेताओं के समर्थन में नरेबाजी की जा रही थी।
बताया जाता है कि इस नारेबाजी से क्रुद्ध होकर भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा निर्दलीय प्रत्याशी के समर्थन में नारेबाजी कर रहे कार्यकर्ताओं के साथ तू तू मैं मैं आरंभ कर दी गई। बात धीरे धीरे बढ़ी तो भाजपा के नेताओं ने छोटी पुलिस लाईन निवासी अर्पित दुबे की मौके पर ही तबियत से धुनाई कर दी।
प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार भाजपा नेताओं के चेहरे पर बौखलाहट साफ दिखाई दे रही थी। इस बौखलाहट के चलते भाजपा के नेताओं द्वारा निर्दलीय के समर्थक को बेतहाशा पीटा गया।
गौरतलब है कि भाजपा के सिवनी विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी नरेश दिवाकर की उपस्थिति में मारपीट की यह दूसरी घटना है। इसके पूर्व पुसेरा ग्राम में उनके जनसंपर्क के दौरान ही भाजपा के कार्यकर्ताओं ने मसल पॉवर का प्रदर्शन कर वहां तलवार बाजी कर दी थी, जिसमें कुछ लोग घायल हो गए थे।
आज घटी इस घटना में उभय पक्षों ने कोतवाली सिवनी में जाकर आवेदन देकर एक दूसरे के विरूद्ध कार्यवाही के लिए पुलिस से आग्रह किया है। भाजपा के नेताओं या कार्यकर्ताओं द्वारा इस तरह आपा खोने की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं कही जा रही है।

पप्पू सोनी ने अर्पित दुबे और अर्पित दुबे द्वारा पप्पू सोनी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई है। पुलिस ने मुलाहजा करवाया है जिसमें चोटें सामान्य हैं। अतः पुलिस इंवेस्टीगेशन का मामला नहीं बनता है। उभय पक्ष चाहें तो कोर्ट में वाद पेश कर सकते हैं। इस मामले में कोर्ट के आदेश से ही इंवेस्टीगेशन हो सकता है।
अमित दाणी,

नगर निरीक्षक, कोतवाली सिवनी

बागी निष्कासित पर धर्मेंद्र, संजय पर कांग्रेस मौन!

बागी निष्कासित पर धर्मेंद्र, संजय पर कांग्रेस मौन!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। देर से ही सही जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ बगावत करने वालों को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है। नाम वापसी 11 नवंबर को थी, पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ कमर कसने वाले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को निष्कासित करने में संगठन को शायद पसीना आ रहा था, संभवतः यही कारण है कि पांच दिन बाद यह निर्णय लिया गया है।
पार्टी प्रवक्ता ओम प्रकाश तिवारी के हस्ताक्षरों से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि प्रदेश कां्रगेस के निर्देशानुसार जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हीरा आसवानी ने जिले की चारों विधानसभा क्षेत्रों के कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं को प्राथमिक सदस्यता से तत्काल निष्कासित कर दिया है।
कांग्रेस द्वारा बरघाट विधानसभा से सीता मर्सकोले, सिवनी विधानसभा से आशा यशपाल भलावी, केवलारी विधानसभा से सतीश नाग, शक्ति सिंह, लखनादौन विधानसभा से नेपाल सिंह, राजेश्वरी उईके के नाम शामिल हैं। इसकी सूचना प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भेज दी गई है।

वहीं, दूसरी ओर सिवनी में 14 नवंबर को राजग के उप प्रधानमंत्री एल.के.आडवाणी की जनसभा में भाजपा की सदस्यता लेने वाले जिला कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष धर्मेंद सिंह ठाकुर तथा कमल नाथ प्रशंसक फोरम के संजय चौधरी के बारे में कांग्रेस ने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक निष्काशन जैसा कोई कदम नहीं उठाया है, जिसके बारे में तरह तरह की चर्चाएं सिवनी की सियासी फिजां में तैर रहीं हैं।

कांग्रेस भाजपा ने सदा ही छला है केवलारी के निवासियों को!

कौन समझेगा सिवनी की प्रसव वेदना. . .4

कांग्रेस भाजपा ने सदा ही छला है केवलारी के निवासियों को!

विमला वर्मा, नेहा सिंह, हरवंश सिंह जैसे कद्दावरों ने किया प्रतिनिधित्व, सालों से जान हथेली पर लेकर चल रहे ग्रामीण

(महेश रावलानी/पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। भारत गणराज्य को आज़ाद हुए साढ़े छः दशक होने को हैं। सरकारें चाहे कांग्रेस की रही हों या भाजपा की, या किसी भी दल की, सभी ने विधानसभा क्षेत्र केवलारी में छलावा ही किया है। आज भी यहां के अनेक गांवों के वाशिंदे सड़क के अभाव में बारिश के माहों में रेल्वे की पटरी पर से ही आने जाने को मजबूर हैं। घर में चाहे कोई बीमार हो, बच्चों को स्कूल जाना हो या फसल को बेचने बाजार जाना हो, सभी रेल्वे की पटरी वाले पुल पर से जाने को मजबूर हैं। रूह तो तब कांप उठती है जब इसी बीच अगर सामने से रेलगाड़ी आ जाए।
देखा जाए तो रेल्वे की पटरी पर चलना गैर कानूनी है, पर मजबूर ग्रामीण क्या करें? उन्हें तो रोजमर्रा के काम निपटाने ही हैं। सुश्री विमला वर्मा और नेहा सिंह के कार्यकाल में आधुनिक भारत ने गति पकड़ ली थी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु मीडिया में विकास पुरूष होने का दावा करने वाले शलाका पुरूष हरवंश सिंह ठाकुर ने चार बार यहां परचम लहराया और फिर भी सड़क या पुल का न बन पाना अपने आप में आश्चर्य जनक ही माना जा सकता है।
अगर आप केवलारी विधानसभा के कुछ गांवों की सैर करें तो उन रास्ते पर, जहां हर कदम पर मौत अपने पंख फैलाए खड़ी है। इस इंतजार में कि कब चलने वाले के कदम डगमगाएं और कब वो उसे अपने आगोश में समेट ले। लोग दावा करते हैं कि इस रास्ते पर चलने की हिम्मत करना तो दूर, इसे देख कर ही आपकी रूह कांप जाएगी, लेकिन फिर भी लोग चलने को मजबूर हैं। ये जानते हुए भी कि इस रास्ते पर उठने वाला हर क़दम मौत का कदम है।
सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर रेल की पटरियों के बीच मौत का खेल जारी है। हर क़दम के साथ दिल की धड़कन घटती-बढ़ती है। हर गुज़रती ट्रेन के साथ ज़िंदगी की रेस जारी है। कोई साइकिल लिए, कोई खाली हाथ, तो कोई अपने बस्ते के साथ इस सफर पर है।
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में केवलारी विधानसभा के कंडीपार गांव के लोगों की यही नियती है, यही तक़दीर है। बारिश का मौसम शुरू होते ही इस गांव को पास के कस्बे से जोड़ने वाली इकलौती कच्ची सड़क कीचड़ में कुछ ऐसे गुम हो जाती है कि क्या गाड़ी और क्या पैदल, इस सड़क से गुज़रना ही नामुमकिन हो जाता है। और बस इसी वजह से हर साल कंडीपार के लोग इसी तरह जान हथेली पर लेकर मौत का ये पुल पार करते हैं।
कंडीपार के वाशिंदों को यहां एक नहीं, बल्कि रोज़ाना तीन-तीन ऐसे मौत के पुलों से होकर गुज़रना होता है। इस इम्तेहान में वो पास हो गए तो ठीक, लेकिन फेल हुए तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही नतीजा और वो है मौत। वैसे इस गांव के तमाम लोग पुलों के इम्तेहान को लेकर इतने खुशकिस्मत भी नहीं हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो पुल के ऊपर से निकले तो थे मंज़िल की तलाश में, लेकिन पीछे से आती ट्रेन ने उन्हें कहीं और पहुंचा दिया।
मौत का ये रास्ता आखिर खत्म कहां होता है? ये रास्ता जहां ख़त्म होता है वहां पहुंच कर डर ख़त्म नहीं होता बल्कि और बढ़ जाता है, क्योंकि इस रास्ते के ख़ात्मे के साथ ही शुरू हो जाता है मौत का इससे भी ख़तरनाक खेल। हादसे का शिकार नौजवान गोविंद सूर्या ने कहा, ‘‘मैं पुल से गुज़र रहा था। ट्रेन आ गई। हड़बड़ाहट में नीचे गिर गया। रीढ़ की हड्डी टूट गई।‘‘
वहीं, दूसरी ओर कंडीपार की निवासी शीलावती का कहना है कि साहब, धड़-धड़ होवत है, जब तक बच्चा नहीं आवत। कंडीपार की निवासी स्कूल में पढ़ने वाली श्रद्धा इनवाती के अनुसार, ट्रेन आती है, तो दौड़ कर निकल जाती हूं।

मुश्किल एक, दर्द अलग-अलग
ये दर्द है उस नौजवान का जो ज़िंदगी और मौत की रेस में अपनी बाज़ी हार गया। खुशकिस्मती से ज़िंदगी तो बच गई, लेकिन ज़िंदगी जीने लायक भी नहीं रही। एक डर है उस मां का, जो हर रोज़ हज़ार मन्नतों के बाद अपने कलेजे के टुकड़ों को तैयार कर स्कूल तो भेजती है, लेकिन जब तक बच्चे लौट कर घर नहीं आते, तब तक निगाहें दरवाज़े से हटती नहीं है। एक यह तकलीफ़ है उस नन्हीं गुड़िया की, जिसे हर रोज़ स्कूल जाने के लिए ज़िंदगी और मौत से पकड़म-पकड़ाई खेलनी पड़ती है।

क़दम पटरी पर, जान हथेली पर
मध्य प्रदेश के सिवनी ज़िले के इस गांव कंडीपार के बाशिंदों के पास दूसरा कोई चारा भी नहीं है। एक बार बारिश हुई नहीं कि गांव से बाहर जानेवाली इकलौती कच्ची सड़क चलने के काबिल नहीं रह जाती और तब पूरे गांव को हर काम के लिए बस इसी तरह तीन-तीन रेलवे पुलों के ऊपर से होकर गुज़रना पड़ता है, जान हथेली पर लेकर। मगर, धड़धड़ाती रेल गाड़ियों के बीच रोज़ाना मौत से दो-दो हाथ करते ये भोले-भाले गांववाले हर रोज़ खुशकिस्मत नहीं होते। एक बार जो इस इम्तेहान में फेल हो जाता है, समझ लीजिए कि उसकी ज़िंदगी ही उससे हमेशा-हमेशा के लिए रूठ जाती है।

यूं रूठ गई गोविंद की क़िस्मत
अब नौजवान गोविंद सूर्या को ही लीजिए। आज से कोई आठ साल पहले गोविंद इसी तरह रेलवे पुलिस के ऊपर से स्कूल जा रहा था। लेकिन बीच रास्ते में जो कुछ हुआ, वो गोविंद के लिए कभी ख़त्म होने वाला दर्द बन कर रह गया। पीठ में बस्ता टांगे मासूम गोविंद अभी पुल के बीचों-बीच पहुंचा ही था कि अचानक सामने से ट्रेन के आ गई। अब ना तो वो पीछे लौट सकता था और ना ही आगे बढ़ सकता था। कुछ देर के लिए तो गोविंद की सांसें ही थम गई और अगले ही पल वो डर के मारे पुल के ऊपर से सीधे नीचे जा गिरा। गोविंद के रीढ़ की हड्डी टूट गई और वो नदी के बीच ही बेहोश हो गया।

पटरी मौत, पटरी पर ज़िंदगी
गोविंद की ज़िंदगी तो बच गई, लेकिन उसके जिस्म के तमाम हिस्से अब भी ठीक से काम नहीं करते। पढ़ाई छूट गई और वो ज़िंदगी खुद पर बोझ बन गई। ये कहानी अकेले गोविंद की नहीं है, गोविंद के अलावा और भी बदकिस्मत हैं, जो इन पुलों का शिकार हो चुके हैं। इस गांव की एक बुजुर्ग महिला तो ट्रेन की टक्कर के बाद अपनी जान से ही चली गई, जबकि एक गर्भवती महिला ने दहशत के मारे पटरी के बगल में ही अपने बच्चे को जन्म दिया।
इतना होने के बावजूद आज़ादी से लेकर अब तक ना तो गांववालों को एक अदद पक्की सड़क मिली और ना ही उनकी किस्मत खुली। पांच किलोमीटर की एक सड़क बनाने में कितने दिन लगते हैं? एक महीना दो महीना या साल दो साल? लेकिन हमारे देश में इतनी ही लंबाई की एक सड़क ऐसी है, जो पिछले 66 सालों में नहीं बन सकी। लिहाज़ा जिन्हें इस सड़क से होकर गुज़रना था, वो रोज़ सिर पर कफ़न बांध कर सफ़र करते हैं।

पांच किलोमीटर, 66 साल
पांच किलोमीटर का ये एक ऐसा फ़ासला है जिसे पिछले 66 सालों में भी हम पाट ना पाए। देश के तमाम नेता, नौकरशाह, खुदमुख्तार और बयान बहादुर मिलकर भी पिछले 66 सालों में फकत पांच किलोमीटर का रास्ता भी इस गांव को नहीं दे पाए। वो रास्ता जिसपर जिसपर जिंदगी बेखौफ अपने कदम बढ़ाती। और बस इसी एक कमी की वजह से इस गांव के लोग हर साल पूरे चार महीने इसी तरह जान हथेली पर लेकर मौत के रास्ते हो कर गुज़रने को मजबूर हैं।
अगर इस गांव को उनका पांच किलोमीटर लंबा रास्ता मिल जाता तो ना तो बारिश में ये सड़क यूं कीचड़ में गुम हो जाती और ना ही ना ही इस सड़क से बचने के लिए यहां के बाशिंदों को मौत को छू कर निकलना पड़ता। मगर, अफ़सोस। कंडीपार गांव का यही सच है।

खाली गई गांववालों की हर कोशिश
ऐसा भी नहीं है कि इस गांव के लोगों ने इस पांच किलोमीटर को फासले को पूरा करने की कोशिश ना की हो। लेकिन हर बार उनकी कोशिश नेताओं के झूठे वादों और सरकारी दफ्तरों की फ़ाइलों में गुम होती रही। केवलारी विधानसभा पर कांग्रेस सबसे ज्यादा समय तक काबिज रही है बावजूद इसके क्षेत्र समस्याओं के मकड़जाल से मुक्त नहीं हो सका है। क्षेत्र में कांग्रेस की सुश्री विमला वर्मा तो भाजपा की ओर से श्रीमति नेहा सिंह (अब कांग्रेस में) के बाद हरवंश सिंह ठाकुर चार बार इस क्षेत्र के विधायक रहे हैं। इतने दिग्गज नेताओं के हाथों में क्षेत्र की कमान होने के बाद भी क्षेत्र के लोगों की सुध आज तक किसी ने लेना मुनासिब नहीं समझा है।