बुधवार, 20 जनवरी 2010

युवराज की स्पष्टवादिता या खाल बचाने की कोशिश


युवराज की स्पष्टवादिता या खाल बचाने की कोशिश


अगर सिस्टम से नहीं आए हैं तो फिर महासचिव का पद तज क्यों नहीं देते राहुल

(लिमटी खरे)


सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस अब निस्सन्देह ``खानदानी परचून की दुकान`` बनकर रह गई है। इसमें नेतृत्व ``सर्वाधिकार सुरक्षित`` का मामला बन गया है। आजादी के बाद कांग्रेस की कमान नेहरू गांधी परिवार के इर्द गिर्द ही रही है। मोतीलाल नेहरू के बाद उनके पुत्र जवाहर लाल नेहरू फिर उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी के उपरान्त बडे पुत्र राजीव गांधी, फिर इतालवी मूल की उनकी पित्न सोनिया गांधी के पास कांग्रेस की सत्ता और ताकत की चाबी रही है। जिस तरह परचून की दुकान के स्वामित्व को एक के बाद एक कर आने वाली पीढी को हस्तान्तरित किया जाता है, ठीक उसी तर्ज पर अब कांग्रेस की अन्दरूनी सत्ता की कुंजी नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढी को हस्तान्तरित करने की तैयारियां चल रहीं हैं।


कांग्रेस की नज़र में देश के भावी प्रधानमन्त्री एवं युवराज राहुल गांधी का मीडिया मेनेजमेंट तारीफे काबिल है। युवराज का रोड शो हो या फिर किसी सूबे में जाकर दलित सेवा का प्रहसन, हर बार देश के शीर्ष मीडिया के चुनिन्दा सरमायादारों को जबर्दस्त तरीके से उपकृत कर युवराज के महिमा मण्डन का खेल खेला जा रहा है। देश भर में युवराज राहुल गांधी को इस तरह पेश किया जा रहा है, मानो उनके अलावा देश को सम्भालने का माद्दा किसी नेता के पास नहीं है।


भारतीय राजनीति की इससे बडी विडम्बना और क्या होगी कि विपक्ष भी राहुल गांधी के महिमा मण्डन के आलाप गा रहा है। देश का प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अपनी धार बोथरी कर चुका है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार में मंहगाई चरम पर है, चहुं ओर भ्रष्टाचार मचा हुआ है। मन्त्री उल जलूल बकवास कर रहे हैं, देश की जनता हलाकान है, पर पिछले एक माह से भाजपा की ओर से इसके विरोध की आवाज कहीं से भी नहीं सुनाई दे रही है। और तो और भाजपा शासित राज्यों में भी चुप्पी को देखकर कहा जा सकता है कि ``यहां पर सब शान्ति शान्ति है।``


बहरहाल कांग्रेस के युवा महासचिव परिवारवाद की मुखालफत करते नज़र आते हैं, पर जब इसे अंगीकार करने का मसला आता है तो वे भी मौन ही धारण कर लेते हैं। कांग्रेसजन सोनिया और राहुल गांधी को भले ही सत्ता प्राप्ति के मार्ग के तौर पर इस्तेमाल कर रही हो, पर राहुल गांधी को अपने उपर बिठाने के लिए वरिष्ठ नेता अपने आप को असहज महसूस कर रहे हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के ऑफ द रिकार्ड बातचीत में महारथ रखने वालों ने राहुल के खिलाफ गुपचुप अभियान भी छेड रखा है, जिसमें एकाएक ``अवतरित`` होकर सांसद और महासचिव बनने के पीछे की कहानियां और किंवदन्तियां राजनैतिक फिजां में बलात तैरायी जा रही हैं।

राहुल गांधी के राजनैतिक प्रबंधक और मार्गदर्शक काफी सतर्क हैं। वे राहुल गांधी को हर हाल में 7 रेसकोर्स (प्रधानमन्त्री के सरकारी आवास) तक पहुंचाने के लिए हर ताना बाना बुनने को तैयार हैं। यही कारण है कि बीते साल के आखिरी माहों में राजस्थान यात्रा पर गए राहुल गाध्ंाी ने जयपुर में साफ कह दिया था कि वे भी सिस्टम से नहीं आए हैं। राहुल ने बडी ही साफगोई के साथ यह कहा कि उनके परिवार के लोग राजनीति में हैं, अत: वे इसमें आए हैं, पर यह सही तरीका नहीं है।


यह बात सर्वविदित है कि देश का हर परिवार चाहता है कि भगत सिंह पैदा जरूर हो, पर वह बाजू वाले घर में, अर्थात बलिदान दिया जरूर जाए पर अपने घर के बजाए साथ वाले घर से किसी का बलिदान दिया जाए। राहुल ने यह बात भी कही थी कि नेता वही बनेगा जिसके पीछे जनता होगी। राहुल गांधी इस तरह के वक्तव्य देते वक्त भूल जाते हैं कि कांग्रेस में ही उनकी माता और अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के इर्द गिर्द की सलाहकारों की भीड बिना रीढ के लोगों की है। न जाने कितने सूबों में प्रदेशाध्यक्ष के पद पर एसे लोग बैठे हैं, जो कभी चुनाव नहीं जीते। देश के वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह खुद इसकी जीती जागती मिसाल हैं। जनता द्वारा जिन लोगों को चुनाव में नकार दिया जाता है, उन्हें विधान परिषद या राज्य सभा के माध्यम से उपर भेजने की परंपरा नई नहीं है।


परिवारवाद की जहां तक बात है तो भारतीय राजनीति में परिवारवाद के नायाब उदहारणों में उनका अपना परिवार, शरद पवार, चरण सिंह, बाल ठाकरे, दिग्विजय सिंह, चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, कुंवर अर्जुन सिंह, आम प्रकाश चौटाला, लालू प्रसाद यादव आदि हैं। अगर एक सरकारी नौकर सेवा में रहते दम तोडता है तो उसके परिजनों को `अनुकंपा नियुक्ति` के लिए चप्पलें चटकानी होती हैं, किन्तु जहां तक राजनीति की बात है इसमें अनुकंपा नियुक्ति तत्काल मिल जाती है।

जब भी किसी सूबे में कांग्रेस सत्ता में आती है, तब चुनाव के पहले यही कहा जाता है कि मुख्यमन्त्री के चयन का मामला चुने हुए विधायकों पर ही होगा। वस्तुत: एसा होता नहीं है, कांग्रेस हो या भाजपा जब भी निजाम चुनने की बारी आती है तो फैसला हाई कमान पर छोड दिया जाता है। फिर इन चुने हुए जनसेवकों की राय का क्या महत्व। मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर वही काबिज होता है जो शीर्ष नेतृत्व की ``गणेश परिक्रमा`` में उस्ताद होता है।

हाल ही में मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने एक बार फिर कांग्रेस में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। वे फिर यही बात दुहरा रहे हैं कि कांग्रेस में शीर्ष पर पहुंचने के लिए उनके परदादा से लेकर उनकी मां का राजनीति के शीर्ष में होना ही है। विदेशों में पले बढे राहुल गांधी भारत की जमीनी हकीकत से परिचित नहीं हैं। देश के इतिहास और सभ्यता के बारे में उन्हें अभी और स्वाध्याय की आवश्यक्ता है।

राहुल गांधी को चाहिए कि वे अगर वाकई में देश में राजनैतिक सिस्टम और परंपरा को बदलना चाह रहे हों तो एक नजीर पेश करें। वे साधारण कार्यकर्ता की तरह बर्ताव करें। उनसे वरिष्ठ नेताओं की कांग्रेस की सालों साल सेवा का सम्मान करते हुए सबसे पहले महासचिव पद को त्यागें। फिर साल दर साल कांग्रेस का झण्डा उठाने वाले साधारण कार्यकर्ताओं को आगे लाने और लाभ पहुंचाने के मार्ग प्रशस्त करें।


भाषण देकर वे नैतिकता का पाठ पढा सकते हैं पर महात्मा गांधी ने लोगों को अपने जीवन के माध्यम से सन्देश दिए थे, यही कारण है कि आज नेहरू गांधी परिवार से इतर महात्मा गांधी को ``राष्ट्र का पिता`` का दर्जा दिया गया है। आप अपने परिवार के कारण राजनीति में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाकर शीर्ष पर बैठ तो सकते हैं, देश की सत्ता की बागडोर भी अपने हाथों में ले सकते हैं, मीडिया में महिमा मण्डन करवाकर नेम फेम भी कमा सकते हैं, किन्तु जहां तक लोगों के दिलों में बसने का सवाल है तो उसके लिए तो आपको अपनी कथनी और करनी में एकरूपता लानी ही होगी।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

कम्युनिष्ट राजनीति के शक्तिपुंज का अवसान


कम्युनिष्ट राजनीति के शक्तिपुंज का अवसान


अपना कद सदा पार्टी से कम ही आंका ज्योति बाबू ने

(लिमटी खरे)

अपना सारा जीवन कोलकता के इर्दगिर्द समेटने वाले कम्यूनिस्ट नेता ज्योति बसु का जीवन अनेक मामलों में लोगों के लिए उदहारण बन चुका है। भले ही उन्होंने पश्चिम बंगाल के कोलकता को अपनी कर्मस्थली के रूप में विकसित किया हो पर राष्ट्रीय परिदृश्य में उनके महत्व को कभी भी कमतर नहीं आंका गया। उन्होंने एक एसा अनूठा उदहारण पेश किया है जिसमें साफ परिलक्षित होता है कि कोई भी किसी भी सूबे में रहकर देश के राजनैतिक क्षितिज पर अपनी भूमिका और स्थान सुरक्षित कर सकता है।


ज्योति दा इसी तरह की बिरली शिक्सयत में से एक थे। वे देश में सबसे अधिक समय तक किसी सूबे के निजाम भी रहे हैं। हिन्दुस्तान में वामपन्थी विचारधारा के सशक्त स्तंभ के तौर पर उभरे थे बसु। इतना ही नहीं बसु एक समझदार, परिपक्व और धीरगम्भीर नेतृत्व क्षमता के धनी थे। जिस तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विदेशों में अध्ययन के उपरान्त देशसेवा की, कमोबेश उसी तर्ज पर ज्योति बसु ने ब्रिटेन में कानून के उच्च अध्ययन के उपरान्त भारत वापसी पर कम्युनिस्ट आन्दोलन में खुद को झोंक दिया था।


ज्योतिकिरण बसु को उनके परिवारजन प्यार से ``गण`` पुकारते थे। 1935 में वे ब्रिटेन गए और वहां भारतवंशी कम्युनिस्ट विचारधारा के रजनी पाम दत्त के संपर्क में आए। इसके बाद लन्दन स्कूल ऑफ इकानामिक्स के राजनीति शास्त्र के व्याख्याता हेलाल्ड लॉस्की, के व्याख्यानों का उन पर गहरा असर हुआ। चूंकि लॉस्की खुद वाम विचारधारा के बहुत बडे पोषक थे, अत: इसके उपरान्त बसु वाम विचारधारा में रच बस गए।

1944 में कम्युनिस्ट आन्दोलन से खुद को जोडने वाले बसु 1946 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य बने। इसके बाद बसु ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। 23 साल का अरसा कम नहीं होता। अगर कोई लगातार इतने समय तक एक ही राज्य का मुख्यमन्त्री रहे तो मान लेना चाहिए कि उसकी कार्यशैली में दम है, तभी सूबे की रियाया उस पर लगातार भरोसा कर सीएम की कुर्सी पर उसे काबिज करती रही है।

आपातकाल के दौरान 1977 में बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठे फिर अपने स्वास्थ्य कारणों के चलते 2000 में उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया। बसु की कुशल कार्यप्रणाली और लोकप्रियता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य की जनता ने उन पर 23 साल लगातार विश्वास किया।


मुख्यमन्त्री निवास को जतने के बाद उन्होंने एक और अनुकरणीय पहल की। वे पार्टी के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका में आ गए, वरना आज के राजनेता उमरदराज होने के बाद भी सत्ता का मोह नहीं छोड पाते हैं। ढलते और कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद व्हील चेयर और अन्य चिकित्सा उपकरणों का सहारा लेकर चलने वाले राजनेताओं को बसु से पे्ररणा लेना चाहिए। जिस तरह अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने आप को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया है, उसी मानिन्द अब एल.के.आडवाणी, कुंवर अर्जुन सिंह, प्रभा राव, आदि को राजनीति को अलविदा कहकर पार्टी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाना चाहिए, किन्तु सत्ता मोह का कुलबुलाता कीडा उन्हें यह सब करने से रोक देता है।

पश्चिम बंगाल में भूमिसुधार कानून और पंचायत राज के सफल क्रियान्वयन ने बसु को जननायक बनाया था। ज्योति बसु ने आम आदमी के हितों को साधने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। देश में कम्युनिस्ट पार्टी के पर्याय के तौर पर देखे जाने लगे थे ज्योति बसु। एक तरफ जब विश्व में कम्युनिस्ट सोच का सूरज अस्ताचल की ओर चल दिया था, तब भी हिन्दुस्तान में कम्युनिज्म विचारधारा का पर्याप्त पोषण सिर्फ और सिर्फ ज्योति बसु के चलते ही हो सका।

बसु के अन्दर योग्यताओं का अकूत भण्डारण था। एक समय आया था जब केन्द्र में घालमेल सरकार बनने का समय आया तब ज्योति बसु को प्रधानमन्त्री मान ही लिया गया था। वक्ती हालात इस ओर इशारा कर रहे थे कि सर्वमान्य नेता के तौर पर ज्योति दा के अलावा और कोई नाम नहीं सामने आ पाया। इस समय पार्टी ने अपनी दखियानूस विचारधारा के चलते ज्योति दा को इसकी अनुमति नहीं दी। ज्योति दा ने पार्टी के फैसले को चुपचाप शिरोधार्य कर लिया। उस समय उन्होंने इस मसले पर एक लाईन की टिप्पणी ``एक एतिहासिक भूल`` कहने के बाद अपने काम कोे पुन: आगे बढा दिया।

मुख्यमन्त्री पद के तजने के बाद वे हाशिए में चले गए हों एसा नहीं था। पार्टी जानती थी कि ज्योत दा का क्या महत्व है, राजनीति में। ज्योति दा के दीघZकालिक अनुभवों का पर्याप्त दोहन किया इन दस सालों में पार्टी ने, वरना आज की गलाकाट राजनैतिक स्पर्धा में वर्चस्व की जंग के चलते बसु को हासिए में डालने में देर नहीं की जाती। यह तो उनका निर्मल स्वभाव, त्याग, तपस्या और बलिदान था जिसका लगातार सम्मान किया था पार्टी ने।


ज्योति बसु आज के समय में बहुत प्रसंगिक माने जा सकते हैं। आज जब नैतिकता की राजनीति और चरित्रवान जनसेवकों का स्पष्ट अभाव है, तब ज्योति बसु का जीवन प्रेरणा के तौर पर काम आ सकता है। ज्योति बसु जैसे गम्भीर और अनुशासित नेता, जिनके अन्दर राजनैतिक सोच कूट कूट कर भरी थी, दुनिया भर में लाल झण्डे के लगभग अवसान के बावजूद भी हिन्दुस्तान जैसे देश में उसे फक्र के साथ फहराना, सिर्फ और सिर्फ बसु के बस की ही बात थी। ऐसे महामना को शत शत नमन. . .।

जब युवराज को सहना पडा जबर्दस्त विरोध


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

जब युवराज को सहना पडा जबर्दस्त विरोध

सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बारे में मीडिया सदा ही सकारात्मक खबरों को प्राथमिकता के आधार पर स्थान दे रहा है। इसका कारण यही है कि नेहरू गांधी परिवार की पांचवीं पीढी के सदस्य राहुल गांधी के मीडिया मेनेजरों की रणनीति काफी तगडी है। युवराज चाहे रेल में सफर कर मितव्ययता का ढोंग रचें या फिर रोड शो करें, बडी मात्रा में लक्ष्मी मैया को बहाकर मीडिया पर्सन्स को उपकृत किया जाकर राहुल गांधी का महिमा मण्डन करने से नहीं चूकते राहुल के रणनीतिकार। रही बात राहुल के विरोध की तो उस मामले में मीडिया की चुप्पी आश्चर्यजनक ही मानी जाएगी। बीते दिनों दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को विद्यार्थियों के भारी विरोध का सामना करना पडा। दरअसल यह विरोध राहुल के बजाए देश के नीति निर्धारकों का था, जो पूरी तरह सकारात्मक बात पर ही आधारित था। राहुल भले ही मनमोहनी मन्त्रीमण्डल के सदस्य न हों पर उनकी ताकत हर कोई जानता है। छात्रों का गुस्सा इस बात पर था कि एक ओर बजट में छूट देकर औद्योगिक घरानों को प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर लाभ पहुंचाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस से युवाओं को जोडने का सपना देखने वाले राहुल गांधी की कांग्रेस विश्वविद्यालयों की फीस में इजाफा कर पढने वालों की परेशानियों में इजाफा ही कर रही है। पुरानी मान्यता है कि किसी भी राजा के इर्दगिर्द अगर ``भाट`` एकत्रित हो जाएं तो उसका पतन अवश्यंभावी है, क्योंकि फिर वह जमीनी हकीकत से दो चार नहीं हो पाता है।

खाना जरूरी है या पीना!
आज के जनसेवक अपने निहित स्वार्थों में कितना डूब चुके हैं कि उन्हें रियाया की कोई चिन्ता नहीं है। महाराष्ट्र में धान से बनने वाली शराब निर्माता फेक्टरियों को सूबे की चव्हाण सरकार ने 25 से 30 करोड के अनुदान की घोषण की थी। सरकार के इस फैसले का कांग्रेस और भाजपा दोनों ही ने स्वागत किया था। आखिर इस फैसले को हाथों हाथ लिया भी क्यों न जाता, ज्यादातर फैक्टरियां जनसेवकों के रिश्तेदारों और वाकिफगारों की जो ठहरीं। सरकार के इस फैसले के खिलाफ एक जनहित याचिका भी लगा दी गई मुम्बई हाईकोर्ट में। उच्च न्यायालय ने चव्हाण सरकार से पूछा है कि अनाज ज्यादा जरूरी है या शराब। गौरतलब है कि सूबे में अनाज की कमी और कर्ज के बोझ तले दबे अनेक किसानों ने आत्महत्या जैसा रास्ता अिख्तयार किया है। देश के कृषि मन्त्री और सूबे के पूर्व निजाम शरद पंवार भाजपा के गोपीनाथ मुण्डे द्वारा चव्हाण की इस घोषणा का स्वागत साफ करता है कि इन्हें अपने रिश्तेदारों की ज्यादा परवाह है या जनता की। बहरहाल कोर्ट ने अनुदान पर रोक लगाकर सरकार से जवाब तलब किया है।

अर्न लीव एन्वाय कर रहे हैं चाणक्य
राजनीति भी एक तरह की नौकरी ही होती हैै। जिस तरह सरकारी नौकरी में केजुवल लीव, मेडिकल लीव के अलावा जिन अवकाश का नगदीकरण कराया जा सकता हो वह कहलाता है अर्जित अवकाश अर्थात अर्न लीव। उतने अवकाश अपने अर्जित किए हैं। हर साल निश्चित मात्रा में अर्जित अवकाश दिए जाते हैं। कांग्रेस की राजनीति में बीते दशक के अन्तिम दौर के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह भी सालों साल राजनीति कर अपने कमाए अवकाशों का अब उपयोग कर रहे हैं। पिछले एक पखवाडे में वे मध्य प्रदेश के प्रवास पर रहे। कुंवर साहेब जब भी जहां भी जाते हैं, कांग्रेस के क्षत्रपों की सांसे थम जाती हैं। अर्जुन सिंह बेहतर तरीके से जानते हैं कि उन्हें कब कौन सा तीर चलाना है। इस बार वे अपने व्यवसायी मित्र सैम वर्मा के एक सप्ताह तक मेहमान रहने के बाद राजधानी भोपाल में केरवां बांध के करीब अपनी कोठी ``देवश्री`` में अपने पुत्र एवं प्रदेश के पूर्व कबीना मन्त्री अजय सिंह एवं परिवार के साथ रहे। इस दौरान उन्होंने अपने आप को सबसे अलग थलग ``आईसोलेटेड`` करके रखा, जिससे नेताओं की नीदें उडी हुई हैं। जाते जाते कुंवर साहेब यह जरूर कह गए कि वे अपने ``अर्जित अवकाश`` का उपयोग कर रहे हैं। इस अवकाश में क्या सन्देश छिपा है यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा।

सिंघल की शरण में बापू

गुजरात में नरेन्द्र मोदी के कोप का भाजन बने स्वयंभू प्रवचनकर्ता सन्त आशाराम बापू पर एक के बाद एक हमले से वे व्यथित नज़र आ रहे हैं। मोदी की मश्कें कसने के लिए उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेताओं की देहरी पर दस्तक देना आरम्भ कर दिया है। बीते दिनों बापू ने एल.के.आडवाणी से संपर्क कर मोदी को शान्त करवाने का आग्रह किया। राजनीति के दांव पेंच उम्दा तरीके से जानने वाले आडवाणी ने अपने हाथ झटककर साफ कह दिया कि बापू, मोदी किसी की भी नहीं सुनते हैं, यहां तक कि मेरी भी नहीं। इसके बाद मोदी से निजात पाने बापू ने विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल को साधा। अशोक सिंघल इसके लिए राजी हो गए और पहुचे मोदी के दरबार में। बताते हैं कि मोदी ने लिफाफे का मजमून ही भांपकर संक्षेप में पटाक्षेप करते हुए एक ही लाईन कही -``क्यों अपनी वषोZं की तपस्या को भंग करने पर आमदा हैं अशोक जी।`` फिर क्या था, मोदी एक ओर बढ लिए और सिंघल चुपचाप खडे होकर बगलें झांकते रहे।

लाट साहेब के मसले में दीदी और कांग्रेस आमने सामने

पश्चिम बंगाल के लाट साहेब के बंग्ले में नए भरती होना है। आने वाले विधानसभा चुनावों को देखकर ममता चाहतीं हैं कि राज्यपाल उनकी पसन्द का हो, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अपना वर्चस्व बढाने के लिए अपनी पसन्द के व्यक्ति को इस पर बिठाना चाहती है। ममता ने जस्टिस सच्चर के नाम पर वीटो कर दिया है। कांग्रेस चाह रही है कि मोहसिना किदवई को इस पद पर बिठाया जाए। कांग्रेस के राजनैतिक मैनेजर अब सर जोडकर बैठ गए हैं कि अगर ममता के हिसाब से राज्यपाल बिठा दिया गया तो आने वाले समय में रेल मन्त्रालय पर कांग्रेस अपना मन्त्री बिठा सकती है, पर बंगाल में शासन करते करते ममता के केन्द्र की राजनीति में दखल से कांग्रेस इंकार नहीं कर पा रही है। कांग्रेस के सामने उगलत निगलत पीर घनेरी सी स्थिति निर्मित हो चुकी है। ममता की मानें तो बंगाल हाथ से जाता है और नहीं मानते हैं तो ममता के तेवर कडे होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।


700 करोड के घाटे में रहा वाली वुड
देश के नागरिकों का शिक्षाप्रद मनोरंजन करने वाली रूपहले पर्दे की दुनिया ``वालीवुड`` अब पूरी तरह से व्यवसायिक हो गया है। अब लोगों को प्रेरणा देने वाले चलचित्रों के बजाए उबाउ और गन्दगी भरी फिल्में बनने लगी हैं। पिछले साल वालीवुड पर भी वैश्विक मन्दी का असर देखने को मिला। एक अनुमान के अनुसार 2009 में वालीवुड को 700 करोड रूपए का नेट घाटा हुआ है। नवोदित अभिनेता और अभिनेत्रियों के ठुमकों और छोटे पर्दे पर इनके विवादों, रियलिटी शो के साथ ही साथ पायरेटिड सीडी, डीवीडी के चलते वालीवुड को खासा नुकसान उठाना पडा। वैसे भी 2008 नवंबर में आर्थिक राजधानी मुम्बई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले से सहमी ही रही मायापुरी। बीते साल लव आज कल, दे दना दन, कमीने, आल दी बेस्ट, न्यूयार्क, वेक अप सिड, वांटेड, राज द मिस्टी कांट्रीन्यूज, देव डी, 13 बी जैसी फिल्मों ने सफल या औसत कारोबार कर वालीवुड को संकट से काफी हद तक उबारा है।

बावर्ची खाने तक दखल रखते हैं राठौर!
बहुचर्चित रूचिका काण्ड के प्रमुख आरोपी हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक शंभू प्रसाद सिंह राठौर की पहुंच केन्द्रीय मन्त्री के किचिन तक है। जी हां, बीते दिनों राठौर ने यूपी के शाहजहांपुर स्थित केन्द्रीय पेट्रोलियम मन्त्री जतिन प्रसाद के पुश्तैनी आवास ``प्रसाद भवन`` में आमद दी। बताते हैं कि जतिन की अनुपस्थिति में राठौर ने उनकी माता कान्ता प्रसाद के साथ एकान्त में लंबी चर्चा की। राठौर मूलत: लखीमपुर खीरी के निवासी हैं जो जतिन के संसदीय क्षेत्र का एक हिस्सा माना जा सकता है। मीडिया की मानें तो जतिन प्रसाद के विवाहोपरान्त 19 फरवरी को होने वाले प्रीतिभोज के इन्तजाम अली बनकर गए थे राठौर। वे इसके लिए बावर्ची को लेकर लखनउ में पंजीकृत टवेरा यूपी 32, सीवाई 4057 में सवार होकर यहां पहुंचे थे। जानकार राठौर की इस यात्रा के अनेक अर्थ लगा रहे हैं। जैसे जैसे राठौर पर शिकंजा कसते जा रहा है, वैसे वैसे राठौर के चेहरे की हवाईयां उड रहीं हैं, और उनके हाथ पांव मारने के प्रयासों में तेजी से इजाफा हो रहा है।

. . . और लगा हाईजेक हो गया विमान!
कोहरे की मार के चलते हवाई यात्रियों को खामियाजा भुगतना कोई नई बात नहीं है। बीते दिनों जेद्दा से दिल्ली आ रहे एयर इण्डिया के एक विमान को दिल्ली के बजाए मुम्बई में उतारे जाने से खासा हंगामा खडा हो गया। अमूमन दिल्ली में जब कोहरा होता है तो विमान को चण्डीगढ या जयपुर में उतारा जाता है, पर इस विमान को इसके बजाए मुम्बई ले जाया गया। एयर इण्डिया की उडान संख्या एआई - 891ए, को जब बीते दिन मुम्बई में उतारा गया तो उसमे ंसवार कुछ हज यात्रियों के सबर का बांध टूट गया। जब उद्घोषणा की गई कि यात्रियों को रात में होटलों में ठहराया जाएगा तो गुस्साए यात्रियों ने विमान के दरवाजे बन्द कर दिए, और किसी भी सुरक्षा कर्मी को अन्दर नहीं घुसने दिया गया। शाम पांच बजे उतरे विमान के चालक दल और अन्य सदस्यों को भी यात्रियों ने 15 घंटे बाद ही विमान से उतरने दिया। काफी मशक्कत के बाद अगले दिन एक बजे यात्रियों को लेेकर यह विमान दिल्ली के लिए रवाना हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सारी रात यह लगता रहा कि मानो विमान को हाईजेक कर लिया गया हो।

राजमाता की अमर प्रशंसा के निहितार्थ
बहुत साधारण परिवेश से उठकर राजनैतिक बिसात पर एक खासा किन्तु विवादित मुकाम हासिल करने वाले समाजवादी नेता अमर सिंह के हर वक्तव्य के गर्भ में कुछ न कुछ सन्देश छिपा होता है। अपनी ही पार्टी में बेगाने हुए अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को एक मुकाम दिलाया है, यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं। जोडतोड में माहिर अमर सिंह इन दिनों अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं और अब उनकी जोडतोड किसी दल के लिए नहीं वरन खुद के लिए है। पूर्व में वे भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी बाजपेयी की खासी प्रशंसा कर चुके हैं। अब उनकी गुणगान गाथा का शीर्षक कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी पर आकर टिक गया है। अपने ब्लाग पर उन्होंने अटल, सोनिया के अलावा अरूण जेतली और फारूख अब्दुल्ला को सराहा है। राजनैतिक बियावान में अब अमर सिंह की सोनिया की शान में गढे गए कशदों के निहितार्थ क्या हो सकते हैं इस बात पर शोध चल रहा है। हो सकता है अटल शोरी के माध्यम से भाजपा तो सोनिया के बहाने कांग्रेस में अपनी संभावनाओं को तलाश कर रहे हों।

हिन्दुस्तानी का सबसे मंहगा पता
भारत का रहने वाला कोई भी चमत्कार कर सकता है। हाल ही में दुनिया की सबसे उंची इमारत बुर्ज दुबई के सौवें तल के मालिक बनकर भारतीय मूल के बी.आर.शेट्टी के पैर जमीन पर नहीं पड रहे होंगे। न्यू मेडिकल सेंटर ग्रुप ऑफ हॉिस्पटल्स के संस्थापक शेट्टी दुबई की खरबपति शिख्सयतों में से एक हैं। उन्होंने 860 डॉलर प्रति वर्ग फुट के हिसाब से 15 हजार वर्ग फिट के लिए लगभग 64 करोड रूपए का भुगतान किया है। एक तरफ भारत में आम आदमी को पहनने को आधी लंगोटी और खाने को चौथाई रोटी नसीब नहीं है, वहीं दूसरी ओर भारतीय मूल के ही लोग विदेशों में रहकर अकूत धन संपदा एकत्र कर मौज कर रहे है। यह निश्चित तौर पर उनकी अपनी मेहनत और लगन का ही फल है, किन्तु देश के जनसेवकों की दिनों दिन बढती संपत्ति पर किसी भी एजेंसी का कोई चेक पोस्ट नहीं है। माना जा रहा है कि विदेशी धरती पर किसी हिन्दुस्तानी का यह सबसे मंहगा पता हो सकता है।

बाजपेयी को याद हैं प्रहलाद पटेल
पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी के जेहन में आज भी पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद सिंह पटेल की यादें ताजा हैं। भाजपा के नए निजाम के दरबार में हाजिरी भरने पहुचे मध्य प्रदेश भाजपा के आला नेताओं ने सोचा लगे हाथ अटल जी से भी सोजन्य भेंट कर ली जाए। अटल बिहारी से मिलने भाजपा के सारे नेता एक साथ पहुचें। सभी को आश्चर्य हुआ कि सूबे के तमाम वरिष्ठ, उमर दराज नेताओं को बाजपेयी ने पहचाना तक नहीं, जबकि उन सभी ने बाजपेयी के साथ सालों साल काम किया है। सारे नेता तब चकित रह गए जब राजनैतिक बिसात पर हाशिए पर ढकेल दिए गए पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद सिंह पटेल को बाजपेयी ने पहचान लिया। बताते हैं कि जैसे ही बाजपेयी की नज़रें प्रहलाद पटेल पर पडी, उनके चेहरे पर चिरपरिचित मुस्कान आई और उन्होंने इशारों ही इशारों में पटेल से कुशलक्षेम पूछ डाली। एक समय में भाजश नेता उमाश्री भारती के करीबी रहे प्रहलाद पटेल बाजपेयी के प्रधानमन्त्रित्व काल के अन्तिम समय में कोयला राज्यमन्त्री रह चुके हैं। जानकारों का मानना है कि प्रहलाद पटेल जिस से एक मर्तबा मिल लें वे अपने व्यवहार से अपनी अमिट छाप छोड जाते हैं। बाजपेयी को भी इसी तरह का कोई वाक्या याद रह गया होगा।

फूलों का कारोबार 400 करोड!
पावन नगरी हरिद्वार में मकर संक्रान्ति से आरम्भ हुए कुंभ में हाड गलाने वाली ठण्ड के बावजूद उमडी भक्तों की तादाद से पता चल जाता है कि देश की जनता कितनी धर्म भीरू है। आस्था के इस महाकुंभ के लिए वैसे तो हरिद्वार पूरी तरह तैयार नहीं है, फिर भी कुंभ का आगाज हो चुका है। दिल्ली से बरास्ता रूडकी हरिद्वार जाने वाले रास्ते का निर्माण जारी है। चार माह तक चलने वाले इस कुंभ में सिर्फ फूलों का व्यवसाय ही चार सौ करोड रूपए से अधिक होने की संभावना है। मेले के दौरान गंगा तट पर बने देवी देवताओं के मन्दिरों की सजावट, धार्मिक पण्डालों की सजावट, प्रतिमाओं के श्रंगार, देवी देवताओं पर अर्पित होने वाले फूलों के लिए हजारों टन फूलों की दरकार है। राज्य मे फूल उत्पादक किसानों ने इसकी तैयारी कर ली है। सरकार ने इस बार कुंभ में पडने वाली फूलों की आवश्यक्ता को देखते हुए नि:शुल्क बीज भी उपलब्ध करवाए थे।

ये है दिल्ली पुलिस मेरी जान!
देश की व्यवसायिक राजधानी दिल्ली में इस साल कामन वेल्थ गेम्स होने हैं। पुलिस पूरी तरह चाक चौबन्द है। कदम कदम पर पुलिस आप पर नज़र रख रही है। बुजुर्गों की सुरक्षा की जवाबदारी पहली प्राथमिकता है, ये सारे दावे हैं दिल्ली पुलिस के, मगर हकीकत इससे उलट ही नज़र आ रही है। कामन वेल्थ की चौकस व्यवस्थाओं के बीच दिल्ली में तीन आतंकवादी फरार हो जाते हैं। इसके बाद दिल्ली पुलिस रेड अलर्ट जारी करती है। रेड एलर्ट के मायने क्या हैं। रेड अलर्ट के बीच पूर्वी दिल्ली में शहदरा इलाके में जीटी रोड स्थित ``यूको बैंक के अन्दर से`` एक 72 वषीZय वयोवृद्ध नागरिक चरन सिंह खोखर के पास से 60 हजार रूपए छुडाकर एक युवक भाग गया। अभी तक तो राह चलते झपटमारी की बातें सुनी जाती थीं, पहली मर्तबा बैंक के अन्दर से सुरक्षा गार्ड की मौजूदगी में एक बुजुर्ग लुट गया दिनदहाडे। ये है दिल्ली पुलिस मेरी जान।

पुच्छल तारा
भारत की व्यवस्थाओं पर चोट करता हुआ एक एसएमएस भेजा है मध्य प्रदेश के सिवनी से आलोक जैन, ``पिंकी`` ने। हम एक बहुत ही गजब के देश में रहते हैं, जहां फोन करने पर एम्बूलेंस और पुलिस से तेज गति से पिज्जा आपके घर पहुंच जाता है। यह एक एसा अनोख देख है जहां कार के लिए लोन महज आठ फीसदी की दर पर मौजूद है, पर शिक्षा के लिए ऋण अगर आप चाहें तो वह आज भी 12 फीदसी की दर पर ही मिल रहा है। कहना ही पडेगा ``आई लव माई इण्डिया``

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

कैसे बचेगी भारत की साख

कैसे बचेगी भारत की साख

कामन वेल्थ गेम्स के लिए तैयार नहीं हैं स्टेडियम!

(लिमटी खरे)

पिछले चार सालों से भारत सरकार द्वारा राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए जोर शोर से तैयारियां किए जाने का दावा किया जा रहा है। अब जबकि कामन वेल्थ गेम्स के लिए उल्टी गिनती आरंभ हो चुकी है, तब भी इन खेलों के लिए निर्धारित देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के एक भी क्रीडांगन के हाल खेलों के लिहाज से उपयुक्त नहीं कहे जा सकते हैं। देश के खेल मंत्री एम.एस.गिल ने 25 नवंबर को देश की सबसे बडी पंचायत ``संसद`` में देश की जनता को भरोसा दिलाया था कि कम से कम चार स्टेडियम तो 31 दिसंबर तक बनकर तैयार हो जाएंगे।

विडम्बना ही कही जाएगी कि सत्ता के मद में चूर देश की सरकार और सभी ``जनसेवक`` सिर्फ निहित स्वार्थाें को ही तवज्जो दे रहे हैं। किसी को भी इस बात की कतई परवाह नहीं है कि इस साल के अंत में होने वाले कामन वेल्थ गेम्स में शिरकत करने वाले विदेशी महमान देश की राजनैतिक राजधानी और खेलों की क्या तस्वीर लेकर वापस जाएंगे। वैश्विक स्तर पर भारत की छवि किस तरह की बनेगी इस मामले से देश के नीति निर्धारकों को कतई लेना देना नही है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी कई बार ``हांथ पांव फूलने`` जैसे मुहावरों का इस्तेमाल कर अपनी पीडा का इजहार कर दिया है कि वे कामन वेल्थ गेम्स की कच्छप गति से कतई संतुष्ट नही हैं। पैसों की कमी का रोना कामन वेल्थ की तैयारियों के बीच जबर्दस्त तरीके से रोया है शीला दीक्षित ने। समय सीमा में काम पूरा न होने का ठीकरा शीला दीक्षित पर फूटना तय है। इससे बचने के लिए वे नित नए बहाने बनाकर अपनी खाल बचाने का प्रयास कर रहीं हैं।

जहां तक इन खेलों के लिए क्रीडांगन का सवाल है, तो औसत तौर पर देखा जाए तो अभी पचास फीसदी काम अधूरा ही पडा हुआ है। कामन वेल्थ गेम्स के तहत 17 तरह के खेलों के लिए 14 क्रीडांगनों का निर्माण प्रस्तावित है। पिछले चार सालों में केंद्र और दिल्ली दोनों ही में सत्तारूढ कांग्रेस की सरकारें पैर पसारकर बैठीं थीं। अब जब काउंटडाउन आरंभ हो गया है तो सभी अपनी अपनी खाल बचाने की जुगत लगा रहे हैं।

गौरतलब है कि स्टेडियम निर्माण की मंथर गति को लेकर अक्टूबर में कामन वेल्थ गेम्स फेडरेशन के सम्मेलन में जबर्दस्त हंगामा हुआ था। इसके बाद केंद्र सरकार की आंखें खुलीं और प्रधानमंत्री ने कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों की जवाबदारी केंद्रीय खेल मंत्री के कांधों पर डाल दी।

देश की अस्मत बनने जा रहे कामनवेल्थ गेम्स में भी अफसरशाही के बेलगाम घोडे जबर्दस्त तरीके से बेखटके दौड रहे हैं। लाल फीताशाही का आलम यह है कि 25 नवंबर को संसद में खेलमंत्री गिल ने इन 14 स्टेडियम के निर्माण के लिए नई डेड लाईन घोषित कर दी थी। इनमें से लगभग पौन दर्जन स्टेडियम के निर्माण में साठ से नब्बे दिन का विलंब ही बताया गया था।

मजे की बात तो यह है कि देश के खिलाडियों का भविष्य गढने वाले खेल मंत्री ने जो कोल दिया था उसके अनुसार त्यागराज और तालकटोरा दोनों ही स्टेडियम को 31 दिसंबर 2009 तक तथा ध्यानचंद स्टेडियम और कर्ण सिंह शूटिंग रेंज को 15 दिसंबर तक पूरा होना था। अधिकारियों और जनसेवकों की मदमस्त चाल के चलते 2009 बीत गया और 2010 का आधा माह भी, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ही है।

कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर जो खबरें छन छन कर बाहर आ रहीं हैं, उन पर अगर यकीन किया जाए तो पता चलता है कि इन चारों की डेड लाईन समाप्त होने के बाद भी अभी इनकी पूर्णता में कम से कम एक माह की अवधि की और दरकार है।

जिम्नास्टिक, साईकिलिंग, कुश्ती आदि के लिए निर्धारित इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम का काम अभी महज साठ फीसदी ही हुआ है। इसी तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी तरणताल का काम जिस गति से चल रहा है वह निश्चित तौर पर शर्मनाक ही कहा जा सकता है।

कामन वेल्थ गेम्स के लिए आधार माने जाने वाले नेहरू स्टेडियम का काम अभी आधे से ज्यादा बाकी पडा हुआ है। इस महत्वपूर्ण स्टेडियम की तैयारियां कितनी हो पाईं हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस स्टेडियम में एथलेटिक्स, भारोत्तोलन आदि स्पर्धाओं के उद्घाटन और समापन होने हैं, उसके निर्माण के लिए डेडलाईन जून तय की गई है।

सवाल यह उठता है कि अगर खेल मंत्री एम.एस.गिल के द्वारा निर्धारित की गई समय सीमा के अंदर क्रीडांगनों का निर्माण पूरा नहीं किया जा सका तो हालात किस कदर शर्मनाक और चिंताजनक होंगे यह बात सोचकर ही रीड की हड्डी में पसीना आ जाता है। और अगर पूरा कर भी लिया गया तो भी यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या इनमें टेस्ट इवेंट के लिए समय बच पाएगा।

यह तो एक बानगी है भारत के द्वारा मेजबानी किए जाने वाले कामन वेल्थ गेम्स की। इसमें अभी दिल्ली की सूरत को संवारना बहुत जरूरी है। इसके अलावा विदेशी महमानों के रहने खाने की व्यवस्था करना भी एक बडी समस्या बनकर उभरेगा। दिल्ली में जगह जगह पसरी गंदगी, बेलगाम और बिगडेल यातायात के साधन, सडकों पर लगते जाम, जब तब आग लगने के चलते धुंआ उगलतीं डीटीसी की बस, सडांध मारते सार्वजनिक शौचालय आदि के साथ क्या दिल्ली अपने आप को कामन वेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए तैयार है। जी हां कागजों पर तो यह तैयारी पूरी ही मानी जाएगी, पर यथार्थ के धरातल पर हकीकत कुछ और ही है।

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

वदीZ वाले गुण्डा!

वदीZ वाले गुण्डा!

वदीZ पर तमगे नहीं टंगे हैं दाग

(लिमटी खरे)


आजाद हिन्दुस्तान में देश की जनता अमन चैन से गुजर बसर कर सके इसलिए हर साल सैकडों पुलिस के जवान अपने प्राणों की आहूति दिया करते हैं। पुलिसकर्मियों के इस बलिदान के चलते लोगों की नजरों में पुलिस की छवि उजली उजली नजर आती है। पुलिस पर लोगों का भरोसा इसी के चलते कायम हो पाता है। विडम्बना यह है कि इन्हीं के बीच कुछ भेडिए भी खाकी पहन कर लोगों के मन में खाकी के प्रति रोष और असंतोष भर देते हैं।

सालों पहले एक ख्यातिलब्ध लेखक की नावेल ``वदीZ वाला गुण्डा`` पढी थी। उस वक्त पुलिस में इस तरह के खाकी गुण्डों की तादाद इक्का दुक्का हुआ करती थी। आज के समय में पुलिस में वदीZ वाले गुण्डों की खासी तादाद हो गई है, जो रियाया का अमन चैन लूट रहे हैं। इतना सब होने के बाद भी अमन चैन से लोगों को रहने देने का दावा करने वाले हाकिमों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती है। देश के शासक जनता को महफूज रखने के बजाए इन बर्बर पुलिसियों के दागदार सीने पर मेडल पर मेडल लटकाए जा रहे हैं।

राष्ट्रपति का उत्कृष्ट सेवा पदक उन पुलिसियों को दिया जाता है जो 15 साल की सेवा बेदाग पूरी कर चुके हों और उनका सालाना गोपनीय प्रतिवेदन (एसीआर) आउट स्टेंडिंग श्रेणी का हो। इसके अलावा उस पर कोई आपराधिक प्रकरण न चल रहा हो, एवं पुलिस प्रमुख की संस्तुति भी इसके साथ होना जरूरी है। इस तरह के प्रकरण को राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय गृह विभाग को भेज दिया जाता है।

जहां चयन समिति द्वारा इन नामों पर विचार कर उन श्रेष्ठ अधिकारियों का चयन करती है जो वाकई इस पदक के हकदार हों। यह समिति अपनी अनुशंसा के बाद इसे दूसरी समिति को नाम के साथ प्रतिवेदन भेजती है, जहां एक बार फिर स्क्रीनिंग के उपरांत नामों को चुन कर उसे गृह सचिव के माध्यम से राष्ट्रपति सचिवालय को भेज दिया जाता है। महामहिम राष्ट्रपति की मंजूरी के उपरांत गणतंत्र या स्वाधीनता दिवस पर इन पदकों की घोषणा की जाती है।


हाल ही में रूचिका के मामले में चर्चा में आए 1965 बेच के हरियाणा काडर के पुलिस अधिकारी शंभू प्रसाद सिंह राठौर को एसा ही पदक मिला था। अब सवाल यह उठता है कि इस तरह के निष्ठुर और अमानवीय सोच रखने वाले अधिकारी को पदक देने के लिए उसके नाम पर विचार के लिए इतनी सीिढयां लांघी गई हों, फिर भी कोई इस दागी अफसर को पहचान न पाया हो यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। दरअसल दोष भारतीय व्यवस्था में ही है।

राठौर अकेले नहीं हैं, जिन्होने वदीZ के रौब के चलते मनमानी की हो। देश का पुलिस महकमा राठौरों से अटा पडा है। पुलिस के डंडे के आगे किसी की नहीं चलती। हरियाणा काडर के ही 76 बेच के आईपीएस अधिकारी और सूबे में जेल प्रशासन के महानिदेश रहे रविकांत शर्मा इन दिनों तिहाड जेल में सजा काट रहे हैं, उन पर पत्रकार शिवानी भटनागर की हत्या का ताना बाना बुनने के लिए प्रमुख दोषी करार दिया गया है।


87 बेच के गुजरात काडर के अधिकारी डीजी बंजारा को शेहराबुद्दीन शेख को लश्कर ए तैयबा का आतंकवादी मानकर फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप है। फिलहाल ये हिरासत में हैं और इन पर मुकदमा दायर है। महाराष्ट्र काडर के क्राईम बांच के उपयुक्त बीएन साल्वे एसे अधिकारी हैं जो एक माफिया डान की क्रिसमस पार्टी में ठुमके लगाते दिखे थे। इन्हें निलंबित किया गया है।

यहीं के 71 बेच के अधिकारी एस.एस.विर्क को पुलिस महानिदेशक रहते हुए ही गिरफ्तार किया गया था। विर्क की गिरफ्तारी देश में अपनी तरह की पहली मिसाल थी कि मुखिया पद पर रहते किसी को पकडा गया हो। इन पर पद का दुरूपयोग का संगीन आरोप था। इतना ही नहीं देश की रक्षा करने वाले कांधों पर मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप भी लगते रहे हैं। 95 बेच के जम्मू काश्मीर काडर के अधिकारी शाजी मोहन का हाल कुछ यही बयां करता है। मोहन को चंडीगढ में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो में जोनल डारेक्टर बनाया गया था। पिछले साल जनवरी में वे मुंबई में आतंकवाद निरोधक बल के हाथों हेरोईन के साथ पकडे गए थे।

पुलिस के डर से उसकी पकड से आम अपराधी फरारी काटते हैं। पर यहां तो भारतीय पुलिस सेवा के अफसर ही फरारी काट रहे हैं। 97 बेच के राजस्थान काडर के आईपीएस अधिकारी मधुकर टंडन पर आरोप है कि उन्होंने राजस्थान पुलिस महानिदेशक रहते हुए दौसा जिले की एक आदिसावी महिला का अपहरण कर उसके साथ नोएडा में बलात्कार किया। फिलहाल टंडन पिछले 13 सालों से फरार हैं।


झारखण्ड के 75 बेच के अधिकारी पी.एस.नटराजन को पांच साल पहले एक स्टिंग आपरेशन में पकडा गया था। नटराजन पर आरोप है कि उन्होंने भी एक आदिवासी महिला के साथ मुंह काला किया है। फिलहाल नटराजन फरार ही हैं। यूटी काडर के 77 बेच के अधिकारी आर.के.शर्मा की कहनी भी दिलचस्प है। 2002 में उन्हें घर में काम करने वाली एक बाई के साथ बलात्कार करने के आरोप में पकडा गया था, वे फिलहाल अपनी सजा काट रहे हैं।

हरियाणा राज्य दागी अधिकारियों से अटा पडा है। एसपीएस राठौर, रविकांत शर्मा के साथ ही साथ यहां 77 बेच के अधिकारी और राज्य के पुलिस महानिरीक्षक रहे हरीश कुमार को पुलिस ने धोखाधडी के आरोप में पकडा था, वे तिहाड जेल में सजा काट रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बी.एस.थींड 74 बेच के आईपीएस हैं। इन पर एक व्यवसायी अशोक मित्तल से जबरिया वसूली का आरोप है। गिल भी पीछे नहीं हैं, उन पर एक महिला अधिकारी से छेडछाड का संगीन आरोप है।

दागदार वदीZ के एक नहीं अनेको उदहारण मौजूद हैं देश के हर राज्य में। आश्चर्य तो तब होता है, जब इस तरह के दागी अधिकारी अपने सीने पर वदीZ को गौरवािन्वत करने वाले मेडल पहनने का दुस्साहस कैसे कर पाते हैं। क्या इनकी अंतरात्मा इन्हें कुछ नहीं कहती।

पुलिस के चंद अधिकारियों के इस तरह निरंकुश होने के पीछे सबसे बडी वजह यह है कि इन्हें जनसेवकों का खासा प्रश्रय प्राप्त हो जाता है। राजनीति, पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के घोंटे में अगर मीडिया का तडका भी लग जाए तो राठौर जैसी शिक्सयतों का उदय होता है, जो रूचिका जैसी निरीह बाला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं।

मीडिया भले ही सालों बाद रूचिका मामले को उजागर करने के लिए अपनी पीठ थपथपा रही हो पर मीडिया तब कहां था जब यह घटना घटी थी। कहने का तातपर्य महज इतना ही है कि मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खम्बा माना गया है, और मीडिया आज के समय में कार्पोरेट बजार में तब्दील हो गया है। यही कारण है कि वदीZ वाले गुण्डों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं, तथा रूचिकाओं की आत्महत्याओं के प्रकरणों में हो रही है बढोत्तरी।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

अपने क्षेत्र में महज पच्चीस फीसदी लोगों को ही जोड पाए युवराज!


ये है दिल्ली मेरी जान



(लिमटी खरे)

अपने क्षेत्र में महज पच्चीस फीसदी लोगों को ही जोड पाए युवराज!

आजाद हिन्दुस्तान पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी अब ``उंची दुकान फीका पकवान`` ही साबित होते जा रहे हैं। कहने को तो वे देश भर में युवाओं को कांग्रेस से जोडने का बीडा अपने युवा से अधेड होते कांधों पर उठाए हुए हैं, पर वे अपने संसदीय क्षेत्र में ही इस मामले मेें बहुत पीछे नजर आने लगे हैं। बीते 12 नवंबर से 15 दिसंबर तक अपने संसदीय क्षेत्र में उन्होंने कांग्रेस से युवाओं को जोडने का लक्ष्य रखा था एक लाख का, किन्तु इसके एवज में वे जोड पाए महज 24 हजार 862 युवाओं को ही। उनके संसदीय क्षेत्र की गोरी गंज विधानसभा में 5200, अमेठी में 5888, तिलोई में 5307 के साथ ही साथ ही साथ जगदीशपुर में महज 4667 युवाओं को ही कांग्रेस की रीतियों और नीतियोें से लुभा सके। गौरतलब है कि अमेठी में 14 लाख 30 हजार 857 मतदाता हैं, जिसमें से पचास फीसदी ही मतदान के प्रति जागरूक हैं। पिछले दिनों अपने चाचा और कांग्रेस के वास्तविक भविष्यदृष्टा स्व.संजय गांधी के नाम पर मुंशीगंज में बने अस्पताल के अतिथिगृह में युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से रूबरू राहुल गांधी की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ जाहिर कर रहीं थीं कि वे अपने ही संसदीय क्षेत्र में अपने इस महात्वाकांक्षी अभियान की हवा निकलने से कितने परेशान हैं। जब राहुल बाबा अपने ही संसदीय क्षेत्र में निर्धारित लक्ष्य से एक चौथाई से भी कम पर आकर रूक गए हों तब देश के अन्य हिस्सों की जमीनी हालात पर चर्चा बेमानी ही होगी।


िढंढोरा 14 का पहुंचे महज 3!
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने खुद को महिमा मण्डित करने के ढेर सारे जतन किए। इनमें अनेक में वे कामयाब भी हुए। कभी हिन्दुस्तान के हर आदमी को निरोग करने के लक्ष्य के उपरांत ही भारत की धरा के बाहर कदम रखने का कौल लेने वाले बाबा रामदेव ने बीच में ही अपनी बात को काटकर विदेशों की सैर कर डाली। धर्मनगरी हरिद्वार में बाबा रामदेव के भव्य और पांच सितारा आश्रम में मेगाफुड और हर्बल पार्क के उद्घाटन के लिए िढंढोरा पीटा गया था कि इसमें देश के 14 सूबों के निजाम शिरकत करेंगे। जब उद्घाटन हुआ तो वहां मौजूद थे महज भाजपा शासित मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री। तीन मुख्यमंत्रियों के बीच केंद्रीय मंत्री सबोध कांत सहाय भी कुछ ज्यादा सहज नजर नहीं आ रहे थे। उन्होंने भी बाबा रामदेव के खुद के महिमा मण्डन पर परोक्ष तौर पर कटाक्ष कर ही दिया। सहाय ने कहा कि अगर बाकी के 11 राज्यों के सीएम भी वहां होते तो वे एक साथ सभी उपस्थित मुख्यमंत्रियों के सूबों में एक साथ हर्बल पार्क की स्थापना की घोषणा भी लगे हाथ कर ही देते। गौरतबल है कि रांची में स्थापित एसे ही फुड पार्क की स्थापना बाबा के सहयोग से की गई है जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा पचास लाख रूपए का अनुदान भी दिया जा रहा है। भाजपाई सूबों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति से कांग्रेस को समझ में आ गया है कि बाबा रामदेव कहीं न कहीं संघ के हिमायती ही हैं, सो कन्नी काट ली कांग्रेसी निजामों ने।


नहीं चाहिए हमें पुरूस्कार!

यदि किसी को सम्मान से नवाजा जाए तो भला कौन बेवकूफ होगा जो इससे इंकार करेगा। आज के युग में खुद को महिमा मण्डित करने का एसा चलन चल पडा है कि लोग प्रायोजित कर पुरूस्कार ग्रहण करते हैं। इन परिस्थितियों में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के समक्ष बीते दिनों बडी ही दुविधा की स्थिति बन गई। पांचवे राष्ट्रीय सडक सुरक्षा पुरूस्कार के लिए चुने गए सामाजिक कार्यकर्ताओं में से महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सडक सुरक्षा के लिए री विमलेश्वरी रोड सेफ्टी नामक एक गैर सरकारी संस्था के विनायक खेलकर ने यह कहते हुए मंच पर ही सम्मान लेने से इंकार कर दिया कि जब तक सउक दुघZटनाओं को रोकने के लिए विभिन्न केंद्रीय और राज्यों के मंत्रालयों तथा विभागों के बीच तालमेल नहीं बनता तब तक वे सम्मान ग्रहण नहीं करेंगे। खेलकर की बात सुनकर सकते में आ गए कमल नाथ। उन्होंने कुछ देर चर्चा के दौरान खेलकर को मनाने की नाकाम कोशिश की। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि केंद्र और राज्य के सडक से जुडे महकमों में तालमेल का अभाव है। चलो खेलकर के माध्यम से ही सही कम से कम केंद्र सरकार के महकमे के हाकिमों की नींद तो टूटी।


मोदी को नहीं जम रहा है गडकरी का अध्यक्ष बनना

भाजपा के कद्दावर नेता और भाजपाध्यक्ष पद के सबसे सशक्त दावेदार रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को महाराष्ट्र की राजनीति से राजनैतिक परिदृश्य में धूमकेतू बनकर उभरे नितिन गडकरी का भाजपाध्यक्ष बनना शायद गले नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि मोदी के पास अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने की फुर्सत भी नहीं है। गौरतलब है कि दिसंबर के मध्य में भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए गडकरी से औपचारिक मुलाकात हेतु राजग और भाजपा शासित सूबों के मुख्यमंत्री और अध्यक्ष के अलावा अन्य पदाधिकरी उनकी देहरी पर दस्तक दे चुके हैं। नरेंद्र मोदी के मामले में पार्टी अब बचाव की मुद्रा में ही दिखाई पड रही है। मोदी और गडकरी के बीच क्या अदावत है यह तो वे ही जानें पर पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने अवश्य इस मामले में सफाई देते हुए कहा कि समय की कमी के चलते मोदी पार्टी अध्यक्ष गडकरी से मिलने नहीं आ सके हैं, पर फोन पर मोदी ने गडकरी को बधाई दे दी है।

चाणक्य पहुंचे बालाजी की शरण में!

कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य रहे कुंवर अर्जुन सिंह की राजनीति का सूरज भले ही अस्ताचल की ओर हो पर वे अगर कहीं आते जाते हैं तो सियासतदारों के कान खडे होना स्वाभाविक ही है। पूजन पाठ, अनुष्ठान के लिए मशहूर अर्जुन सिंह ने दिल्ली की सियासी गर्माहट को छोडकर नए साल में मध्य प्रदेश के बेतूल जिले में एक सप्ताह से अधिक का समय बिताया तो राजनेताओं की नींद में खलल पडना आरंभ हो गया। अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि बैतूल शहर के पास स्थित बालाजीपुरम के मंदिर और ताप्ती के तट पर कुंवर साहेब ने कुछ पूजन और अनुष्ठानों को कराया है। चलने फिरने में असमर्थ हो चुके अर्जुन सिंह अब वहील चेयर के माध्यम से आना जाना करते हैं। जब यह बात राजनेताओं को पता चली कि वे एक हफ्ते से अधिक समय तक एमपी के बैतूल में रहे और उनके समर्थकों से भी सिंह के दौरे को गोपनीय रखा गया तो सभी चौकन्ने हो गए। इसके पहले गुमनामी के अंधेरे में उत्तराखण्ड में सिंह ने लंबा समय पहाडों की वादियों में गुजारा था। राजनैतिक फिजां में कयास लगाए जा रहे हैं कि अर्जुन सिंह की इस खामोशी के पीछे कहीं आने वाले तूफान के संकेत तो नहीं।


अब कौन सी ताकत पकडेगी बापू को!
पिछले दो दशकों में हिन्दुस्तान की धर्मभीरू जनता का जमकर शोषण किया है स्वयंभू आध्याित्मक गुरूओं ने। अपने वाकजाल और तरह तरह के चमत्कारों के माध्यम से बाबाओं ने जनता को अपना मुरीद बना लिया है। गुजरात के स्वयंभू संत आशाराम बापू पर वहां की सरकार का कडा रूख काफी हद तक भारी पड रहा है। कल तक चिंघाडने वाले आशाराम बापू पिछले कुछ दिनों से शांति का जीवन व्यतीत कर रहे थे। मध्य प्रदेश में उन्होंने एक बयान देकर नया बखेडा खडा कर दिया। गुपचुप मध्य प्रदेश की सैर पर गए बापू के सम्मान में राज्य सरकार द्वारा पलक पांवडे बिछा दिए गए। एमपी के हरदा जिले के चारखेडा स्थित अपने आश्रम में बापू ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री अब तक बापू से सात बार माफी मांग चुके हैं। अपने अहं में चूर बापू ने यह तक कह डाला कि दुनिया में कोई ताकत एसी नहीं है, जो उन्हें गिरफ्तार कर सके। अपनी तुलना जगतगुरू शंक्राचार्य जयेंद्र सरस्वती से करते हुए बापू यह तक कह गए कि जिस तरह जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार करने से जयललिता का तख्ता पलट हुआ था, ठीक उसी तरह उनके खिलाफ षणयंत्र करने वालों की सत्ता पलट हो जाएगी।


नशा शराब में होता तो नाचती बोतल . . .
देश के शासक चाहे जितने कानून कायदे बना ले, उसका पालन जितनी भी मुस्तैदी से करवा ले पर मयकशों को तो पीने का बहाना चाहिए। इसके लिए वे कानून को ताक पर रखने से भी पीछे नहीं रहते। 2009 में दिल्ली की यातायात पुलिस की सुस्त चाल के बावजूद शराब पीकर वाहन चलाने वालों ने एक नया रिकार्ड बना दिया है। वर्ष 2008 से साठ फीसदी ज्यादा लोगों के चालान शराब पीकर वाहन चलाने के जुर्म में काटे गए हैं। यातायात पुलिस के लिए सरदर्द बनने वाले शराबी वाहन चालकों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा कोई अच्छा संकेत कतई नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2008 में जहां शराबी वाहनों चालकों के 7579 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं बीते साल 12,109 लोगों के चालान इस मद में काटे गए हैं। यह कमाल तब हुआ जब साल भर यातायात पुलिस का अमला यातायात नियमों की अनदेखी के लिए प्रसिद्धि पा चुका था। सच है नशा शराब में होता तो नाचती बोतल . . .।


नए साल पर डेढ सौ करोड के एसएमएस!
क्या भारत देश अभी पिछडा हुआ है, क्या हिन्दुस्तान आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है, इस तरह के सवाल भले ही आम हों किन्तु जमीनी हालात देखकर किसी भी दृष्टिकोण से यह नहीं लगता कि इन बातों में बहुत ज्यादा दम है। सवा सौ करोड की आबादी वाले इस भारतवर्ष में करीब 50 करोड फोन उपभोक्ता हैं, जिनमें से 43 करोड मोबाईल धारक हैं। अब यह आंकडा साबित करता हैं कि हर दूसरे आदमी के पास फोन है। हैरानी तब बढ जाती है जब पता चलता है कि 31 दिसंबर से 01 जनवरी के बीच महज एक दिन में डेढ सौ करोड रूपए के एसएमएस भेजे गए। यद्यपि यह आंकडा पिछली दीपावली के आंकडे को पार नहीं कर सका है, फिर भी डेढ सौ करोड रूपए मायने रखते हैं। जिस देश में सत्तर फीसदी लोगों को दो टाईम का भोजन नसीब न हो, जहां तन ढांकने लोगों के पास पर्याप्त कपडे न हों, वहां एक दिन में वह भी अंग्रेजी कलेंडर के नए साल में डेढ सौ करोड रूपए फूंकने का ओचित्य समझ से परे ही है।


सादगी की मिसाल बने अरूण यादव!
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र एवं केंद्रीय भारी उद्योग राज्यमंत्री अरूण यादव ने सादगी की गजब मिसाल कायम की है। मध्य प्रदेश के खण्डवा से चुनाव लोकसभा चुनाव जीते अरूण यादव ने नया साल दलितों के बीच मनाया। यद्यपि वे दो जनवरी को खरगोन के सनावद क्षेत्र के लोधी ग्राम पहुंचे पर नए साल में अपने जनसेवक को अपने बीच देखकर गांव के लोग फूले नहीं समाए। गांव में वे एक दलित देवराम के घर पहुंचे और भोजन किया। इस भोज की विशेषता यह रही कि चर्चा के दौरान ही अरूण यादव ने देवराम को कहा कि वे उसी के घर भोजन करेंगे। देवराम अचंभित होकर कभी अपने झोपडे तो कभी केंद्रीय मंत्री को निहारता रहा। भोजन तैयार होने तक लगभग आधे घंटे से भी अधिक समय तक वे देवराम के घर पर ही रूके रहे, और ग्रामीणों से चर्चा की। अरूण यादव की सादगी देखकर देवराम के मुंह से बरबस ही निकल पडा कि जिस तरह भगवान राम शबरी के घर गए थे, उसी तरह अरूण यादव उनके घर पहुचे हैं।


अपरंपार ही है साई की लीला

महाराष्ट्र प्रदेश के अहमद नगर जिले में एक अनजान कस्बा था, शिरडी, जब इस गांव में साई नाम का बालक आया तबसे यह कस्बा भारत के मानचित्र में विशेष स्थान रखने लगा है। शिरडी के फकीर साई बाबा के आज देश विदेश में न जाने कितने भक्त फैले हैं। साई बाबा ने अपना सारा जीवन परमार्थ के लिए बडी ही सादगी से गुजार दिया। बाबा के भक्तों को बाबा की कृपा से अपार सुख और समृद्धि मिलती है इस बात में भी संदेह नही है। हर साल बाबा के भक्त बाबा के लिए कुछ न कुछ नया कर ही जाते हैं। कोई सोने का सिंहासन देता है तो कोई भक्तों को ठहरने के लिए विशाल भक्त निवास की स्थापना करवाता है। बीते साल के अंतिम सप्ताह में बाबा के संस्थान को 10 करोड रूपए का दान मिला है। 23 से 31 दिसंबर के बीच के दान में यह सबसे अधिक दान है। इसके पूर्व 2007 में सात करोड तो 2008 में इसी अवधि में बाबा के मंदिर को 8 करोड का दान मिला था। 2009 के साल में बाबा के शिरडी संस्थान को 240 करोड की राशि दान में मिली है। बाबा के संस्थान को चाहिए कि शिरडी में एक एसा भव्य अस्पताल बनाए जहां हर प्रकार के रोगों का निशुल्क इलाज हो सके। शायद बाबा की मंशा सभी को स्वस्थ्य और संपन्न रखने की ही हो।

ये दिल्ली का जाम है लवली जी

दिल्ली को मयकशों और यातायात दोनों के जाम के लिए पहचाना जाने लगा है। यहां दिन उगते ही पैग (जाम) लगाने वालों और इसी समय से सडकों पर यातायात जाम लगाने वालों की कमी नहीं है। कल तक इस तरह की बातें दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री अरविंद कुमार लवली ने मीडिया के माध्यम से ही सुनी होंगी पर पहली मर्तबा वे इस जाम से रूबरू हो ही गए। वाक्या यमुना बैंक से आनन्द विहार मेट्रो रूट के उदघाटन का है। बुधवार को बारह बजे केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मार्ग पर मेट्रो रेल को हरी झंडी दिखाकर इसका शुभारंभ किया। जब हरी झंडी दिखाई जा रही थी तब लवली दिल्ली के जाम से जूझ रहे थे। फिर क्या था, अतिथि इस रेल में सवार होकर आनन्द विहार पहुंचे। आनन्द विहार में लवली इनके साथ हुए और फिर वहां से मेट्रो से वापस यमुना बैंक पहुंचे। अब शायद दिल्ली सरकार के एक मंत्री को समझ में आ ही गया होगा कि दिल्ली की जनता कितनी सहनशील है कि घंटों जाम में फंसे रहने के बावजूद भी अपना आपा नहीं खोती।

कांग्रेस के बस की बात नहीं महिला आरक्षण
कांग्रेस भले ही देश के सर्वोच्च पद महामहिम राष्ट्रपति पर पहली महिला श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार को बिठाकर अपनी पीठ थपथपा रही हो पर लगता नहीं है कि कांग्रेस के बस की बात रह गई है महिलाओं को आगे लाना। जिस पार्टी की कमान पिछले दस सालों से श्रीमति सोनिया गांधी के हाथ में रही हो, उस पार्टी की राजस्थान इकाई को एक अदद महिला भी नहीं मिल सकी है, पंचायत चुनाव के प्रभारी बनाने के लिए। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता पर काबिज है। कांग्रेस भले ही महिलाओं को बढावा देने और उन्हें आरक्षण देने के छद्म दावे करे किन्तु पार्टी के अंदर उसकी सोच इससे उलट ही है। राजस्थान में आरक्षण के बाद के परिदृश्य में अब 33 जिला परिषदों में से 16 की कमान इस मर्तबा महिलाओं के हाथों में होगी। महिला आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.गिरिजा व्यास, महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभा ठाकुर के राजस्थान मूल के होने के बाद भी कांग्रेस को सूबे में प्रभारी बनाने के लिए एक भी योग्य महिला नेत्री का न मिलना आश्चय जनक ही माना जाएगा।

पुच्छल तारा
दिल्ली भीषण ठंड और कोहरे की जद में है। आवागमन मानों थम सा गया हो। दिल्ली की रफ्तार में बे्रक लग गए हैं। सडकों पर दिन रात गाडियां मानों रेंग रहीं हों। दिल्ली से ही रोशनी भार्गव ने मेल भेजा है कि इन हालातों में सालों बाद दिल्ली में वाहन चालकों में ट्रेफिक सेंस जागा है। पहली बार गाडी चलाने वाले रेड लाईट पर बहुत संभलकर चल रहे हैं, कोई भी रेड लाईट जंप नहीं कर रहा है। यह वाकई सुखद अनुभूति है कि कोहरे में ही सही दिल्ली में यातायात नियमों का अक्षरश: पालन होता दिख रहा है। एसा कुछ भी नहीं है। दरअसल जान सबको प्यारी है। कोई भी कोहरे में रेड लाईट जम्प कर एक्सीडेंट का जोखिम नही उठाना चाहता है। पता नहीं कब कौन सी गाडी सामने से आ जाए और ठोककर चली जाए। सो बेहतरी इसी में है कि चौक चौराहों पर हरी लाईट होने पर ही अपनी गाडी आगे बढाएं।

रविवार, 10 जनवरी 2010

टि्वटर को खरीद क्यों नहीं लेती भारत सरकार!


टि्वटर को खरीद क्यों नहीं लेती भारत सरकार!

थुरूर कांग्रेस की तो टि्वटर थुरूर की कमजोरी

शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा हो रहे हैं थुरूर के

(लिमटी खरे)

भारत के विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर और विवादों का न टूटने वाला नाता गहराता जा रहा है। थुरूर एक के बाद एक हमले कर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को मुश्किलों में डालने से नहीं चूक रहे हैं। कभी वे हवाई जहाज की इकानामी क्लास को मवेशी का बाडा तो कभी काम के बोझ तले दबे होने की पीडा उजागर करते हैं। अपने ही विभाग के कबीना मंत्री के फैसले के खिलाफ भी वे खुलकर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे हैं। थुरूर की इन नादानियों को कमतर आंककर कांग्रेस नेतृत्व हल्की फुल्की झिडकी लगाकर ही संतोष कर लेती है। मोटी चमडी वाले थुरूर पर इन छोटी मोटी डांट का असर होता नहीं दिख रहा है।


हाल ही में एसोसिएशन ऑफ इंडियन डिप्लोमेट और इंडियन कांउसिल ऑफ वल्र्ड अफेयर्स के एक कार्यक्रम में शिरकत के दौरान विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर ने भारत पर डेढ सौ से अधिक साल तक राज करने वाले ब्रिटेन के लेबर एमपी बी.पारेख के द्वारा देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी की विदेश नीति की आलोचना का न केवल समर्थन किया है, वरन् इसमें अपनी और से कशीदे भी गढे हैं।

बकौल थुरूर, सभ्यता की विरासत की अभिव्यक्ति में महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू ने असाधारण योगदान दिया है, साथ ही दोनों ने दुनिया में भारत का स्थान बनाया है, लेकिन विदेश नीति के संचालन के लिए हमें यह नकारात्मक छवि भी दी है कि यह नीति अन्य लोगों के व्यवहार पर नैतिकता भरी टिप्पणी पर ही संचालित होती है। वैसे कांग्रेस ने इसे नेहरू की विदेश नीति की आलोचना के तौर पर लिया है।


थुरूर चूंकि भारत गणराज्य के विदेश राज्य मंत्री जैसे जिम्मेदार ओहदे पर हैं, इस लिहाज से उनके द्वारा कही गई बात भारत सरकार की बात ही मानी जाएगी। वैसे भी शशि थुरूर भारत के राजनयिक रहे हैं, और उनकी जिन्दगी का बहुत बडा हिस्सा उन्होंने भारत के बाहर ही गुजारा है। थुरूर अगर नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेश नीति की आलोचना कर रहे हैं तो इस बात में दम अवश्य होगा। अब भारत सरकार या सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को नैतिकता के आधार पर यह स्पष्ट करना ही होगा कि नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेश नीति सही थी या उसमें थुरूर ने जो गिल्तयां निकालीं हैं वे सही हैं। इस मामले में कांग्रेस या भारत सरकार मौन रहती है तो यह दोनों ही की मौन स्वीकृति के तौर पर लिया जा सकता है।

इतना सब होने पर विपक्ष चुप्पी साधे बैठा है। दरअसल विपक्ष भी नहीं चाहता है कि थुरूर को मंत्री पद से हटाया जाए। एक अकेला विदेश राज्य मंत्री ही विपक्ष की भूमिका का निर्वहन जो कर रहा है। अपनी ही सरकार की नीतियों पर तल्ख टिप्पणियां भले ही थुरूर को सुर्खियों में रखे हुए हो पर इससे नुकसान में तो कांग्रेस ही आ रही है।

गौरतलब है कि पूर्व में थुरूर ने कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के दिल्ली से मुंबई तक के इकानामी क्लास के हवाई सफर के तत्काल बाद इकानामी क्लास को केटल क्लास अर्थात मवेशी का बाडा की संज्ञा दे दी थी। सोशल नेटविर्कंग वेव साईट टि्वटर का मोह बडबोले शशि थुरूर आज तक नहीं छोड पाए हैं। विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा के वीजा नियमों को कडा करने के फैसले के उपरांत थुरूर ने उस पर भी टिप्पणी कर दी थी।

एक के बाद एक गिल्त करने के बाद भी थुरूर का भारत सरकार के जिम्मेदार मंत्री पद पर बने रहना सभी को आश्चर्यचकित किए हुए है। जिस तरह महाभारत काल मेें शिशुपाल के सौ अपराधों को एक के बाद एक कृष्ण ने क्षमा किए थे, लगता है उसी तर्ज पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी थुरूर के बडबोलेपन को नजर अंदाज करती जा रहीं हैं। वैसे भी राजनयिक से जनसेवक बने शशि थुरूर कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की पसंद हैं। संभवत: यही कारण है कि कांग्रेस को एक के बाद एक नुकसान पहुंचाने वाले शशि थुरूर पर लगाम कसने से पुत्रमोह में अंधी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी भी कठोर कदम उठाने से हिचक ही रहीं हैं।

हालात देखकर लगने लगा है कि बडबोले विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर के लिए सरकारी कामकाज से ज्यादा टि्वटर पर अपने लाखों प्रशंसकों के सवालों का जवाब देना और उल जलूल बातें बोलकर मीडिया की सुर्खियों में बने रहना ज्यादा अहम हो गया है। शशि थुरूर की इन हरकतों के बाद भी अगर कांग्रेस उन्हें मंत्री के तौर पर झेल रही है तो यह साबित होता है कि थुरूर कांग्रेस की मजबूरी बन गए हैं, कारण चाहे जो भी हो। इसके अलावा दूसरी बात यह साफ तौर पर उभरकर सामने आ रही है कि थुरूर के लिए अनर्गल बयान बाजी और टि्वटर प्रेम एक अच्छा शगल बनकर रह गया है।

हमारी नजर में थुरूर के इस तरह के कदमों का कांग्रेस के पास कोई ईलाज नहीं है। अब दो ही रास्ते बचते हैं, अव्वल तो यह कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार टि्वटर नाम की सोशल नेटविर्कंग वेव साईट को ही खरीद ले और उसे नेशनल इंफरमेंशन सेंटर (एनआईसी) के हवाले कर दे, ताकि सरकारी नोटशीट और लिखापढी भी अब इसके माध्यम से संचालित हों, ताकि कांग्रेस के लाडले थुरूर का टि्वटर से मन भी बहलता रहेगा और कांग्रेस भी बदनामी से बच जाएगी। दूसरे यह कि भारत में इस वेव साईट को ही प्रतिबंधित कर दिया जाए। इससे थुरूर की मन की बातें भारत छोडकर शेष दुनिया में तो पढा जा सकेगा पर भारत में मीडिया में थुरूर के बडबोलेपन को स्थान नहीं मिल सकेगा। इस तरह थुरूर का टि्वटर प्रेम भी जिंदा रहेगा और कांग्रेस की लाज भी बच जाएगी।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

मकर संक्रति का इंतजार कर रही है कांग्रेस


मकर संक्रति का इंतजार कर रही है कांग्रेस


रूढीवादी मान्यताओं को अभी भी निभा रही है कांग्रेस

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली 09 जनवरी। सत्ता और संगठन में फेरबदल के लिए सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस आज भी पुरानी परंपराओं का बाकायदा निर्वहन कर रही है। भारतीय प्राचीन परंपराओं के अनुसार अच्छे काम के लिए पूस माह के बाद मकर संक्राति के बाद का समय शुभ माना जाता है। अत: कांग्रेस भी अपने ढांचे में फेरबदल के लिए इस शुभ घडी का इंतजार कर रही है।


कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राजनैतिक पंडितों ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया है कि कांग्रेस के संगठन और सत्ता के केंद्रों में परिवर्तन के लिए 14 जनवरी के बाद का समय शुभ है।

अपने अंधविश्वासों के लिए प्रसिद्ध कांग्रेस के लिए अभी तीन राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति सबसे अहम मसला है। इसका कारण यह है कि गणतंत्र की स्थापना के पचास साल पूरे होने पर राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के राजभवन में स्थायी नियुक्ति इसलिए किया जाना अनिवार्य होगा, क्योंकि तीनों सूबों की राजधानी में लाट साहेब (महामहिम राज्यपाल) को गणतंत्र दिवस की परेड की सलामी भी लेना है। वर्तमान में इन सूबों के राजभवनों में अन्य प्रदेशों के लाट साहबों को अतिरिक्त प्रभार देकर बिठाया गया है। इसके आलावा महाराष्ट्र और पंजाब में भी राजभवन रिक्त होने वाले हैं।


राज्यपालों के मामले में प्रधानमंत्री की राय अपनी पार्टी की अध्यक्ष से कुछ जुदा समझ में आ रही है। पीएमओ के सूत्रों का दावा है कि वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह राज्यपालों के पदों पर नौकरशाहों की नियुक्ति के हिमायती हैं, ताकि राज्यों पर निगरानी रखी जा सके। नौकरशाहों में सच्चर समिति के अध्यक्ष रहे राजेंद्र सच्चर, पूर्व केबनेट सचिव रहे बी.के.चतुर्वेदी, पद्मनाभैया के अलावा विवादस्पद रहे रोनेन सेन का नाम चर्चाओं में है। गौरतलब है कि सेन ने संसद सदस्यों को ``हेड लेस चिकन`` कहकर सनसनी फैला दी थी।

इससे उलट कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी सूत्रों का कहना है कि राजमाता चाहतीं हैं कि इन पदों पर राजनेताओं को बिठाकर उन्हें ``एडजेस्ट`` किया जाए। सोनिया चाहतीं हैं कि शीशराम ओला, मोहसिना किदवई, पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल जैसे नाम राजनीतिक फिजां में तैर रहे हैं।


कांग्रेस सबसे अधिक पशोपेश में पश्चिम बंगाल को लेकर है। बंगाल में रेलमंत्री अगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजेंद्र सच्चर पर दांव लगाना चाह रहीं हैं। ममता के करीबियों का कहना है कि ममता बनर्जी को सच्चर से कोई खास लगाव नहीं है। वह तो बस मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सच्चर समिति के अध्यक्ष रहे राजेंद्र सच्चर को कोलकता के राजभवन पर काबिज कर अल्पसंख्यकों को रिझाने के फार्मूले पर आगे बढ रहीं हैं।

कांग्रेस बंगाल के राजभवन पर मोहसिना किदवई के नाम पर जोर मार रही है। उधर मोहसिना इसके लिए राजी ही नहीं बताई जा रहीं हैं। सूत्रों ने बताया कि मोहसिना को मनाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल के वयोवृद्ध नेता प्रणव मुखर्जी को जिम्मेदारी सौंपी है। बताया जाता है कि प्रणव और मोहसिना के बीच हुई कई दौर की चर्चाओं में एक तरफ जहां प्रणव दा ने मोहसिना को सोनिया का संदेश दिया तो मोहसिना ने साफ तोर पर कह दिया कि वे अपना राज्यसभा का कार्यकाल बढवाने में ज्यादा इच्छुक हैं।

बंगाल का मसला कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कूटनीतिक चाल चलते हुए मीडिया में यह उछाल दिया कि वे राजेंद्र सच्चर को बंगाल के लाट साहब बनाने के लिए आतुर हैं। अब कांग्रेस अगर सच्चर से मुंह फेरती है तो सूबे में अल्पसंख्यक कांग्रेस से दूर हो सकते हैं, और अगर हामी भरती है तो जीत ममता की ही मानी जाएगी। यही कारण है कि कांग्रेस का नेतृत्व अपना पूरा जोर लगा रहा है कि मोहसिना किदवई को इसके लिए राजी करवा लिया जाए।

इसके अलावा पद्मनाभैया को आंध्र प्रदेश के मौजूदा संकट निपटाने के लिए वहां भेजा जा सकता है। रोनेन सेन को पंजाब भेजा सकता है। इसके अलावा छत्तीसगढ के महामहिम राज्यपाल नरसिम्हन को भी आंध्र भेजने पर विचार विमर्श किया जा रहा है। उन्हें अगर वहां भेजा जाता है तो फिर छत्तीसगढ के लिए शीशराम ओला के नाम पर विचार संभव है।

राज्यपालो की नियुक्ति के बाद सोनिया गांधी केंद्र सरकार में कांग्रेस के मंत्रियों के परफारमेंस के हिसाब से फेरबदल कर सकतीं हैं। इसमें युवाओं को महत्वपूर्ण जवाबदारी से नवाजे जाने की उम्मीद है। केंद्र में होने वाले फेरबदल के उपरांत कांग्रेस की राजमाता संगठनात्मक स्तर पर अपने पत्ते फेंटेंगी पर उम्मीद है कि इस बार वे अपने सलाहकारों के बजाए कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के लिए भविष्य का रोडमेप बनाने की तैयारी में संगठन में अमूल चूल परिवर्तन कर सकतीं हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

चिकित्सा कर क्यो नहीं लगाती सरकार!

चिकित्सा कर क्यो नहीं लगाती सरकार!

एक कर से सभी रोगों का इलाज संभव

(लिमटी खरे)


भारत को आजाद हुए बासठ साल से अधिक बीत चुके हैं। मानव जीवन में अगर कोई बासठ बसंत देख ले तो उसे उमरदराज माना जाता है। सरकार भी बासठ साल की आयु में अपने कर्तव्य से सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। राजनीति में यह नहीं होता है। राजनीति में 45 से 65 की उमर तक जवान ही माना जाता है। इन बासठ सालों देश पर हुकूमत करने वाली सरकारें अपनी ही रियाया को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने में नाकाम रहीं हैं, इससे ज्यादा और शर्म की बात हिन्दुस्तान के लिए क्या हो सकती है।

अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर भारत के हितों को अब तक कुबाZन ही किया गया है, यहां के जनसेवकों ने। देश में सरकारी तौर पर आयुZविज्ञान (मेडिकल), आयुर्वेदिक, दंत, और होम्योपैथिक कालेज का संचालन किया जाता रहा है। अब तो निजी क्षेत्र की इसमें भागीदारी हो चुकी है। भारत में न जाने कितने चिकित्सक हर साल इन संस्थाओं से पढकर बाहर निकलते हैं। इन चिकित्सकों को जब दाखिला दिलाया जाता है तो सबसे पहले दिन इन्हें एक सौगंध खिलाई जाती है, जिसमें हर हाल में बीमार की सेवा का कौल दिलाया जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पढाई पूरी करने के साथ ही इन चिकित्सकों की यह कसम हवा में उड जाती है।


हाल ही में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को सुझाव दिया है कि एमबीबीएस की डिग्री के बाद अगर कोई विद्यार्थी तीन साल तक ग्रामीण अंचलों में सेवा का वायदा करे तो स्नातकोत्तर की परीक्षा में 25 फीसदी आरक्षण लागू किया जाए। सवाल यह उठता है कि इस व्यवसायिक पाठ्यक्रम में प्रलोभन का क्या काम।

भारत को भी अन्य देशों की भांति चिकित्सा की डिग्री के उपरांत पंजीयन के पहले यह शर्त रख देना चाहिए कि सुदूर ग्रामीण अंचलों और पहुंच विहीन क्षेत्रों में कम से कम छ: माह, विकासखण्ड, तहसील और जिला मुख्यालय से निर्धारित दूरी में एक साल तक सेवाएं देने वाले चिकित्सकों का सशर्त पंजीयन किया जाएगा कि वे अपनी सेवाओं का प्रमाणपत्र जब जमा करेंगे तब उनका स्थाई पंजीयन किया जाएगा।

इसके अलावा अगर केंद्र सरकर विदेशों की तरह स्वास्थ्य कर लगा दे तो सारी समस्या का निदान ही हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि न्यूनतम सालाना शुल्क पर साधारण और कुछ अधिक शुल्क पर असाध्य बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त मुहैया करवाए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले इस कर से मुक्त रखे जाएं। अगर एसा हुआ तो चिकित्सकों की जमी जकडी दुकानों पर ताले लगने में देर नहीं लगेगी। मोटी कमाई करने वाले मेडिकल स्टोर और दवा कंपनियों के मेडिकल रिपरजेंटेटिव भी अपना का समेटने लग जाएंगे। जब अस्पताल में ही इलाज और दवाएं मुफत में मिलेंगी तो भला कोई निजी चिकित्सकों के पास क्यों जाएगा। इससे निजी तौर पर चिकित्सा पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगी। डिग्री धारी चिकित्सक सरकारी तौर पर ही इलाज करने को बाध्य होंगे।



एक खबर के अनुसार आने वाले चार सालों में भारत पर डेढ सौ से ज्यादा समय तक राज करने वाले ब्रिटेन से लगभग पच्चीस हजार चिकित्सक भारत लौटने के इच्छुक हैं। इनकी वतन वापसी से अखिल भारतीय आयुZविज्ञान संस्थान की बिहार, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, उडीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खुलने वाली नई शाखाओं में चिकित्सकों के टोटे से निजात मिलने की उम्मीद है।

आज हिन्दुस्तान में चिकित्सा सुविधाओं का आलम यह है कि देश में 45 करोड से भी अधिक लोगों को अने निवास के इर्द गिर्द सवास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। देश में औसतन 10 हजार लोगों के लिए अस्पतालों में सिर्फ सात बिस्तर मौजूद हैं, जिसका औसत विश्व में 40 है। भारत में हर साल तकरीबन 41 हजार चिकित्सकों की आवश्यक्ता है, जबकि देश में उपलब्धता महज 17 हजार ही है।


सौ टके का सवाल यह है कि अस्सी के दशक के उपरांत चिकित्सकों का ग्रामीण अंचलों से मोह क्यों भंग हुआ है। इसका कारण साफ है कि तेज रफ्तार से भागती जिंदगी में भारत के युवाओं को आधुनिकता की हवा लग गई है। कहने को भारत की आत्मा गांव में बसती है मगर कोई भी स्नातक या स्नातकोत्तर चिकित्सक गांव की ओर रूख इसलिए नहीं करना चाहता है, क्योंकि गांव में साफ सुथरा जीवन, बिजली, पेयजल, शौचालय, शिक्षा, खेलकूद, मनोरंजन आदि के साधानों का जबर्दस्त टोटा है। भारत सरकार के गांव के विकास के दावों की हकीकत देश के किसी भी आम गांव में जाकर बेहतर समझी और देखी जा सकती है।

इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर केंद्र में काबिज हुई कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार द्वारा अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ग्रामीण स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की शुरूआत की थी। 2005 में इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को भी आरंभ किया गया था। अपने अंदर वास्तव में ग्रामीणों को स्वस्थ्य रखने की अनेक योजनाओं को अंगीकार किए इस मिशन की असफलता के पीछे यह कारण है कि इसे बिना पूरी तैयारी किए हुए ही आनन फानन में लागू कर दिया गया।


दरअसल इस मिशन की सफलता चिकित्सकों पर ही टिकी थी, जो ग्रामीण अंचलों में सेवाएं देने को तैयार हों। अमूमन देश के युवा चिकित्सक बडे और नामी अस्पतालों में काम करके अनुभव और शोहरत कमाना चाहते हैं, फिर वे अपना निजी काम आरंभ कर नोट छापने की मशीन लगा लेते हैं। अस्पतालों में मिलने वाले मिक्सचर (अस्सी के दशक तक दवाएं अस्पताल से ही मुफ्त मिला करतीं थीं, जिसमें पीने के लिए मिलने वाली दवा को मिक्सचर के आम नाम से ही पुकारा जाता था) में राजनीति के तडके ने जायका इस कदर बिगाडा कि योग्य चिकित्सकों ने सरकारी अस्पतालों को बाय बाय कहना आरंभ कर दिया।

आज देश भर में दवा कंपनियों ने चिकित्सकों के साथ सांठगांठ कर आम जनता की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। लुभावने पैकेज के चलते चिकित्सकों की कलम भी उन्हीं दवाओं की सिफारिश करती नजर आती है, जिसमें उन्हें दवा कंपनी से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लाभ मिल रहा हो। चिकित्सकों को पिन टू प्लेन अर्थात हर जरूरी चीज को मुहैया करवा रहीं हैं, दवा कंपनियां।

इस साल केंद्र सरकार ने एक अनुकरणीय कदम उठाकर चिकित्सकों के पेट पर लात जमा दी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक जनवरी से चिकित्सकों के लिए नई आचार संहिता जारी कर दी है। अब चिकित्सक दवा कंपनियों से न तो कोई उपहार ले सकेंगे और न ही कंपनी के पैसे पर देश विदेश की सैर कर सकेंगे। दरअसल, चिकित्सक और दवा कंपनियों की सांठगांठ से मरीज की जेब ही हल्की होती है। अनेक नर्सिंग होम के संचालकों के परिवार को दवा कंपनियां न केवल विदेश यात्रा करवातीं हैं, बल्कि उनके लिए शापिंग का प्रबंध भी करती हैं। अब अगर एसा पाया गया तो चिकित्सक पर कार्यवाही कर उसकी चिकित्सक की डिग्री भी रद्द किए जाने का प्रावधान है।

केंद्र सरकार की हेल्थ मिनिस्ट्री ने अब एमसीआई के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने पर विचार आरंभ किया है। यहां से पढकर निकले चिकित्सक पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में ही अपनी सेवाएं देने प्रतिबद्ध होंगे। इतना ही नहीं इनके लिए संस्थानों की स्थापना भी ग्रामीण क्षेत्रों में ही की जाएगी। अगले माह फरवरी में होने वाले सम्मेलन में इसको मूर्तरूप दिया जा सकता है। सुई का कांटा फिर वही अटक जाएगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते इसमें छात्र तो प्रवेश ले लेंगे, किन्तु उन्हें पढाने वाले शिक्षक क्या गांव की ओर रूख करना पसंद करेंगे।

इस सबसे उलट छत्तीसगढ में सच्चे चिकित्सकों की तस्वीर भी दिखाई पडती है। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से डिग्री हासिल करने वाले चिकित्सकों ने रायुपर से लगभग 120 किलोमीटर दूर गनियारी गांव में एक अनूठा खपरेल वाला अस्पताल खोला है। दिल्ली निवासी डॉ. योगेंद्र जैन और गुडगांव निवासी डॉ.रमन कटियार ने एम्स से एमबीबीएस किया है। इन दोनों ने पिछले लगभग एक दशक पूर्व इस गांव में जनस्वास्थ्य केंद्र की आधार शिला रखी। आज कारवां इतना आगे बढ गया कि यहां दस चिकित्सक हैं जिनमें से नौ एमडी हैं और पांच ने तो एम्स से एमडी की है। ये आज 1500 के तकरीबन गांव वालों का इलाज कर रहे हैं। लोगों के मुंह से इन्हें देखकर बरबस ही निकल पडता है, इन्हें डालर नहीं दुआ कमानी थी जनाब।