गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मप्र के पांच अन्य अधिकारी पुरस्कृत

मध्यप्रदेश में वन अधिकार अधिनियम 2006 के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिये

मप्र के पांच अन्य अधिकारी पुरस्कृत

प्रधानमन्त्री डा0 मनमोहन सिंह द्वारा सिविल सर्विस डे पर सात अधिकारी सम्मानित

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली, 21 अपै्रल। प्रधानमन्त्री डा0 मनमोहन सिंह ने सिविल सर्वित डे पर आज यहां विज्ञान भवन में उत्कृष्ट कायोंZ के लिये मध्यप्रदेश के सात अधिकारियों को सम्मानित किया। प्रधानमन्त्री डा0 सिंह ने जिन अधिकारियों को सम्मानित किया उनमें अपर मुख्य सचिव श्री ओ0पी0 रावत, प्रमुख सचिव

श्री जयदीप गोविन्द, श्री संजय दुबे, श्रीमती रिश्म शमी, श्री गुलशन बामरा, श्री अनिल ओबेराय और आदिम जाति कल्याण विभाग के अपर संचालक श्री अशोक उपाध्याय शामिल हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 के उत्कृष्ट क्रियान्वयन में श्री ओ0पी0 रावत के नेतृत्व में श्री जयदीप गोविन्द, श्रीमती रिश्म शमी, श्री अनिल ओबेराय और श्री अशोक उपाध्याय ने सराहनीय भूमिका निभाई। वन अधिकार अधिनियम 2006 का क्रियान्वयन मध्यप्रदेश में बहुत अच्छा हुआ है। मध्यप्रदेश में हुए अच्छे काम को देखने के लिए महाराष्ट्र और गुजरात की टीम ने भी मध्यप्रदेश का दौरा किया था और कार्य को सराहा था।

श्री ओ0पी0 रावत वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के समय प्रमुख सचिव आदिम जाति कल्याण विभाग और श्री जयदीप गोविन्द, आयुक्त आदिम जाति कल्याण विभाग के पद पर कार्यरत थे। श्रीमती रिश्म शमी, श्री अनिल ओबेराय और श्री अशोक उपाध्याय वन अधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन के समय आदिम जाति कल्याण विभाग में पदस्थ थे। इन सभी अधिकारियों को संयुक्त रूप से पुरस्कृत किया गया है।

व्यक्तिगत श्रेणी में तत्कालीन जबलपुर कलेक्टर श्री संजय दुबे को विभिन्न धमोंZ के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने और धार्मिक इमारतों के अतिक्रमण हटाये जाने पर और तत्कालीन कलेक्टर बालाघाट श्री गुलशन बामरा को नक्सल प्रभावित क्षेत्र मेें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अन्तर्गत आम आदमी की सहभागिता करने पर प्रधानमन्त्री डा0 मनमोहन सिंह ने पुरस्कृत किया।

राष्ट्रपति से मिले चौहान और रोहाणी

राष्ट्रपति से मिले चौहान और रोहाणी

स्विर्णम मध्यप्रदेश बनाने विधानसभा के विशेष सत्र को सम्बोधन के लिए आमन्त्रण

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली, 22 अपै्रल। मुख्यमन्त्री श्री शिवराज सिंह चौहान और विधानसभा अध्यक्ष श्री ईश्वरदास रोहाणी ने आज यहां नई दिल्ली में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से सौजन्य भेंट की। राष्ट्रपति भवन में हुई मुलाकात के अवसर पर संसदीय कार्यमन्त्री श्री नरोत्तम मिश्रा भी उपस्थित थे।

श्री चौहान और श्री रोहाणी ने राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल से स्विर्णम मध्यप्रदेश बनाने के लिए विशेष सत्र को सम्बोधित कर मार्गदर्शन देने का अनुरोध किया। राष्ट्रपति महोदया को अवगत कराया गया कि विधानसभा की सर्वदलीय कार्य मन्त्रणा समिति ने सर्वसम्मति से निर्णय कर राष्ट्रपति जी को विशेष सत्र में बुलाने का आग्रह किया है।

मुख्यमन्त्री श्री चौहान और विधानसभा अध्यक्ष श्री रोहाणी ने श्रीमती पाटिल को अवगत कराया कि मध्यप्रदेश विधानसभा की कार्यवाही के सुचारू संचालन में सभी दलों के नेता दलीय निष्ठा से ऊपर उठकर सहयोग करते हैं। इस कारण विधानसभा की कार्यवाही के दौरान मार्शल का उपयोग नहीं किया गया। सभी दलों के रचनात्मक सहयोग के कारण विधानसभा की कार्यवाही स्थगित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सभी दलों के विधायक लोकतन्त्रीय अनुशासन में रहकर जनहित की समस्याओं पर विधानसभा में व्यापक बहस करते हैं। राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने मध्यप्रदेश विधानसभा की गौरवशाली परम्परा की सराहना की।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा . . .

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा . . .

कहां गई सुराही, छागल, मटके

पानी का व्यवसायीकरण बनाम राजनैतिक दिवालियापन

पानी माफिया की मुट्ठी में कैद है हिन्दुस्तान की सियासत

(लिमटी खरे)

ब्रितानी जब हिन्दुस्तान पर राज किया करते थे, तब उन्होंने साफ कहा था कि आवाम को पानी मुहैया कराना उनकी जवाबदारियों में शामिल नहीं है। जिसे पानी की दरकार हो वह अपने घर पर कुंआ खोदे और पानी पिए। यही कारण था कि पुराने घरों में पानी के स्त्रोत के तौर पर एक कुआ अवश्य ही होता था। ईश्वर की नायाब रचना है मनुष्य और मनुष्य हर चीज के बिना गुजारा कर सकता है, पर बिना पानी के वह जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। आज चान्द या मंगल पर जीवन की खोज की जा रही है। इन ग्रहों पर यही खोजा जा रहा है कि अगर वहां पानी होगा तो वहां जीवन भी हो सकता है।

देश की विडम्बना तो देखिए आज देश को ब्रितानियों के हाथों से आजाद हुए छ: दशक से भी ज्यादा का समय बीत चुका है, किन्तु आज भी पानी के लिए सुदूर इलाकों के लोग तरस रहे हैं। अरे दूर क्यों जाते हैं, देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में अलह सुब्बह चार बजे से ही भोर होते होते लोग घरों के बर्तन लेकर नलों पर जाकर पानी भरकर लाने पर मजबूर हैं। दिल्ली के दो चेहरे आपको देखने को मिल जाएंगे। एक तरफ संपन्न लोगों की जमात है जिनके घरों पर पानी के टेंकर हरियाली सींच रहे हैं, तो दूसरी ओर गरीब गुरबे हैं जिनकी दिनचर्या पानी की तलाश से आरम्भ होकर वहीं समाप्त भी हो जाती है।

देश की भद्र दिखने वालीं किन्तु साधारण और जमीनी सोच की धनी रेलमन्त्री ममता बनर्जी ने रेल यात्रियों को सस्ता पानी मुहैया कराने की ठानी है। उनके इस कदम की मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए कि कम से कम किसी शासक ने तो आवाम की बुनियादी आवश्यक्ता पर नज़रें इनायत की। देखा जाए तो पूर्व रेलमन्त्री और स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने रेल में गरीब गुरबों के लिए जनता भोजन आरम्भ किया था। दस रूपए में यात्रियों को पुडी और सब्जी के पेकेट मिलने लगे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि लालू प्रसाद यादव की कुल्हड में चाय और जनता भोजन की योजना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई। वास्तविक धरातल पर अगर देखा जाए तो आम यात्री को न कुल्हड में चाय नसीब है और न ही जनता खाना ही मुहैया हो पा रहा है। चुंनिन्दा रेल्वे स्टेशन पर जनता खाना दिखाकर उसकी तस्वीरों से रेल मन्त्रियों को सन्तुष्ट किया जाता है।

कितने आश्चर्य की बात है कि रेल में जनता खाना कहने को दस रूपए का है, और पीने के पानी की बोतल 12 से 15 रूपए की। इस तरह की विसंगति की ओर किसी का ध्यान गया क्यों नहीं। बहरहाल रेल मन्त्री ने अपने यात्रियों को पांच या छ: रूपए में पानी की बोतल मुहैया करवाने के लिए वाटर फिल्टर और पैकेजिंग प्लांट की शुरूआत कर एक अच्छा कदम उठाया है। देखा जाए तो रेल मन्त्री ममता बनर्जी की इस पहल के दूसरे पहलू पर भी गोर किया जाना चाहिए। जब भारतीय रेल अपने यात्रियों को आधी से कम दर में पानी मुहैया कराने का सोच सकती है तो समझा जा सकता है कि देश में पानी का माफिया कितना हावी हो चुका है कि सरकार पानी जैसी मूल भूत सुविधा के सामने पानी माफिया के आगे घुटने टेके खडी हुई है।

चालीस के पेटे में पहुंच चुकी पीढी के दिलोदिमाग से अभी यह बात विस्मृत नहीं हुई होगी जब वे परिवार के साथ सफर किया करते थे तो साथ में पानी के लिए सुराही या छागल (एक विशेष मोटे कपडे की बनी थैली जिसमें पानी ठण्डा रहता था) अवश्य ही रखी जाती थी। राजकुमार अभिनीत मशहूर फिल्म ``पाकीजा`` में जब राजकुमार रेलगाडी में चढता है तो मीना कुमारी के पास रखी सुराही से पानी पीता है। कहने का तात्पर्य यह कि उस वक्त पानी बेमोल था, आज पानी अनमोल है पर इसका मोल बहुत ज्यादा हो गया है।

कितने आश्चर्य की बात है कि करोडों रूपयों के लाभ को दर्शाने वाली भारतीय रेल अपने यात्रियों पर इतनी दिलदार और मेहरबान नहीं हो सकती है कि वह उन्हें निशुल्क पानी जैसी सुविधा भी उपलब्ध करा सके। आईएसओ प्राप्त भोपाल एक्सपे्रस सहित कुछ रेलगाडियों में वाटर प्यूरीफायर लगाए गए थे, जिसमें एक रूपए में एक लीटर तो पांच रूपए में एक लीटर ठण्डा पानी उपलब्ध था। समय के साथ रखरखाव के अभाव में ये मशीनें अब शोभा की सुपारी बनकर रह गईं हैं।

देश के शासकों द्वारा अस्सी के दशक तक पानी के लिए चिन्ता जाहिर की जाती रही है। पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर ने अपनी भारत यात्रा में स्वच्छ पेयजल को देश की सबसे बडी समस्या बताया था। स्व.राजीव गांधी ने तो स्वच्छ पेयजल के लिए एक मिशन की स्थापना ही कर दी थी। इसके बाद अटल बिहारी बाजपेयी ने पानी के महत्व को समझा और गांवों में पेयजल मुहैया करवाने पर अपनी चिन्ता जाहिर की थी। वर्तमान में कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है। इसके पहले नरसिंहराव भी कांग्रेस के ही प्रधानमन्त्री रहे हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब राजीव गांधी द्वारा आरम्भ किए गए मिशन के बावजूद उनकी ही कांग्रेस द्वारा बीस सालों में भी स्वच्छ पेयजल जैसी न्यूनतम सुविधा तक उपलब्ध नहीं कराई गई है।

आज पानी का व्यवसायीकरण हो गया है। उद्योगपति अब नदियों तालाबों को खरीदने आगे आकर सरकार पर दबाव बनाने लगे हैंं क्या हो गया है महात्मा गांधी के देश के लोगों को! कहां गई नैतिकता, जिसके चलते आधी धोती पहनकर बापू ने उन अंग्रेजों केा खदेडा था, जिनके बारे में कहा जाता था कि ब्रितानियों के राज में सूरज डूबता नहीं है। सरकार अगर नहीं चेती तो वह दिन दूर नहीं जब देश में केंसर की तरह पनपता माफिया लोगों के सांस लेने की कीमत भी उनसे वसूल करेगा।

दिग्गी के जहर बुझे तीर के निहितार्थ

दिग्गी के जहर बुझे तीर के निहितार्थ

चिदम्बरम को साईज में लाने आलकमान ने की है कवायद

कांग्रेस की इंटरनल केमिस्ट्री से बेहतर वाकिफ हैं राजा

थुरूर प्रकरण से ध्यान हटाने की थी कोशिश

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 21 अप्रेल। व्यापार जगत की खबरों को देने वाले एक समाचार पत्र में नक्सलवाद पर अपना आलेख छपवाकर दिग्गी राजा ने ठहरे पानी में कंकर मारकर हलचल तो पैदा कर दी है। राजनैतिक विश्लेषक अब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री राजा दिग्विजय सिंह के इस जहर बुझे तीर के पीछे के मन्तव्य खोजने में लगे हैं। वैसे दिग्विजय सिंह के राजनैतिक जीवन के हिसाब से कहा जा सकता है कि राजा ने यह तीर भले ही निकाला अपने तरकश से हो, पर इसको रोशन करने वाले तार दस जनपथ की ही बैटरी में जाकर जुडेंगे, जहां से इसे उर्जा मिल रही है।

दस जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी के बाद कांग्रेस के नंबर दो ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने यह कदम कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी से विचार विमर्श के उपरान्त ही उठाया है। सूत्रों ने कहा कि गृह मन्त्री बनने के बाद पलनिअप्पम चिदम्बरम की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ही तेजी से उपर आया है। उनकी कार्यप्रणाली के चलते अब गुप्तचर संस्थाएं सीधे उन्हें रिपोर्ट करने लगीं हैं। सरकार में नंबर दो पोजीशन पा चुके चिदम्बरम के पर कतरकर उन्हें साईज में लाने आलाकमान ने अपने विश्वस्त राजा दिग्विजय सिंह के मार्फत यह कदम उठाया है।

इस मामले में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि राजा दिग्विजय सिंह कांग्रेस की रग रग से वाकिफ हैं, यही कारण है कि कभी राजनीति में कांग्रेस के चाणक्य रहे कुंवर अर्जुन सिंह के शागिर्द राजा दिग्विजय सिंह ने तिवारी कांग्रेस के गठन के वक्त भी उस नाजुक दौर में न केवल अर्जुन सिंह को साधे रखा था, वरन् कांग्रेस में भी मध्य प्रदेश जैसे सूबे में अपनी कुर्सी सलामत रखी थी। राजा दिग्विजय सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे कांग्रेस का अन्दरूनी रसायन शास्त्र बखूबी जानते हैं, वे जानते हैं कि किससे किसे मिलाने पर क्या समीकरण बन सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि शशि थुरूर प्रकरण में कांग्रेस की बुरी तरह भद्द पिट रही थी, इसी के चलते राजा दिग्विजय सिंह ने ही सोनिया गांधी को मशविरा दिया था कि इस तरह का एक आलेख अगर वे अपने नाम से प्रकाशित करवा देते हैं तो लोगों का ध्यान इससे बट जाएगा। राजा ने इसके लिए व्यापार की खबरों वाला अखबार इसलिए चुना क्योंकि राजनीति में रूचि रखने वाले लोग कम ही पढा करते हैं, और आलेख के प्रकाशन तक गोपनीयता बनी रहेगी। अगले दिन जब उस अखबार के रिफरेंस से बडे अखबारों में खबर छपी तक जाकर लोग चेते और मामले ने तूल पकडा।

इसके बाद एक के बाद एक खबरें मीडिया जगत में तय रणनीति के मुताबिक प्लांट की जाती रहीं ताकि चिदम्बरम को अहसास हो जाए कि आलाकमान उनकी सक्रियता से खफा है। लोगों को आश्चर्य तो तब हुआ जब सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के एक जिम्मेदार महासचिव ने यह बात पार्टी फोरम के बजाए अखबार के माध्यम से की और उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही का नाम तक नहीं लिया गया, सिर्फ चेताया गया, वह भी इतने गम्भीर मसले पर। शनै: शनै: सबको समझ में आ गया कि राजा अगर गुर्राया है तो इसके पीछे चाबी कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ से ही भरी गई है।

वैसे मीडिया में प्लांट की गई इस खबर में दम लगने लगा है कि छत्तीसगढ और उडीसा में नक्सली कार्यवाही की आड में चिदम्बरम खनन कंपनियों का हित साध रहे हैं। इन क्षेत्रों में खनन का काम करने वाली वेदान्ता कम्पनी के एक संचालकों में देश के गृह मन्त्री पलनिअप्पम चिदम्बरम भी रह चुके हैं। राज्य सभा के रास्ते संसदीय सौंध पहुंचे मणि शंकर अय्यर ने तो साफ तौर पर यह बात कह दी थी कि यूपीए सरकार की नक्सल नीति वेदान्ता, एस्सार, पोस्को और मित्तल जैसे बडे व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

मील का पत्थर साबित होगी न्याय की यह जीत

मील का पत्थर साबित होगी न्याय की यह जीत
 
रसूखदारों के हाथ की लौण्डी नहीं है भारत की कानून व्यवस्था
 
फैसले से रियाया का कानून पर भरोसा बढा
 
जनसेवक बरकरार रखें जनता के भरोसे को
(लिमटी खरे)

जेसिका लाल हत्याकाण्ड मामले में देश की सबसे बडी अदालत द्वारा जो फैसला दिया गया, उससे भारत की न्याय व्यवस्था पर आम आदमी का भरोसा और अधिक बढ जाएगा। आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, अनेक फिल्मों में भी इस डायलाग को सैकडों बार दुहराया जा चुका है। वहीं दूसरी ओर आजाद हिन्दुस्तान में लोगों के मन में एक और धारणा घर कर गई है कि काननू के हाथ चाहे जितने मर्जी लंबे हो पर वे हाथ रसूखदार, धनाड्य, संपन्न, ताकतवर लोगों को छू भी नहीं पाते हैं। इसी अवधारणा के चलते आम आदमी मान रहा था कि इस मामले में आरोपियों को सजा मिलना मुश्किल ही नहीं नामूमकिन ही है, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। ग्यारह साल के लंबे इन्तजार के बावजूद ही सही पर न्याय मिलने पर सभी सन्तुष्ट नज़र आ रहे हैं।
जेसिका लाल जैसे हत्याकाण्ड दरअसल अधकचरी पश्चिमी संस्कृति की विकृति का लबादा ओढने की परिणीति ही हैं। महानगरों में परिवारों के अन्दर शर्म हया बची ही नहीं है। बाप बेटे के साथ शराब गटक रहा है तो बेटी मां के सामने ही सिगरेट के छल्ले उडा रही है। जब सांस्कृतिक रूप से हमारा नैतिक पतन होगा तो उसमें से पैदा होंगे जेसिका लाल हत्याकाण्ड जैसे वाक्ये।
 
29 अप्रेल 199 को भी यही हुआ था। दक्षिणी दिल्ली के कुतुब कोलोनेड रेस्टारेंट की मालिकिन बीना रमानी द्वारा दी गई पार्टी में माडल जेसिका लाल को शराब बांटने की जवाबदारी सौंपी गई थी। आधी रात बीतने के बाद मनु शर्म अपने दोस्तों के साथ वहां आया और दो बजे उसने शराब की मांग की। चौथे पहर के आगाज के साथ अगर कोई शराब मांगे तो उसकी और उसके परिवार की मानसिकता को बेहतर समझा जा सकता है। जेसीका द्वारा मना करने पर मनु ने हवाई फायर किया और फिर जेसिका के सिर में घुसा दी एक गोली। बाद में वे वहां से भाग निकले और चौथे पहर में ही अपनी टाटा सफारी को वहां से उठवा लिया। पुलिस ने 2 मई को बरामद किया। मामला पंजीबद्ध हुआ, गवाहों में अनेक लोग सामने आए, पर चूंकि मनु हरियाणा के बाहूबली नेता विनोद शर्मा के पुत्र हैं, इसलिए वही हुआ जिसका अन्दाजा था। अदालत में श्यान मुंशी, शिवदास, करन राजपूत सहित चश्मदीद अपने अपने दर्ज बयानों से मुकर गए।
 
इसके बाद लगने लगा था कि मामला ठण्डे बस्ते के हवाले ही होने वाला है। गवाही के अभाव में 21 फरवरी 2006 को सभी नौ आरोपियों को बरी कर दिया गया। दिल्ली पुलिस ने मामले को घटना के सात साल बाद 13 मार्च को उच्च न्यायालय में पेश किया। 18 दिसम्बर 2006 को एक बार फिर मनु शर्मा, विकास यादव और अमरदीप को दोषी करार देते हुए 20 दिसम्बर 2006 को फैसला सुनाया जिसमें मनु को उमर कैद और विकास एवं अमरदीप को चार चार साल की कैद की सजा सुनाई। 02 फरवरी 2007 को मनु शर्मा ने उच्चतम न्यायालय में अपनी अपील पेश की, और अन्त में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
 
इस पूरे मामले में मीडिया और सामाजिक संस्थाओं की जितनी भी तारीफ की जाए कम होगी, क्योंकि इन्ही के माध्यम से यह प्रकरण लोगों की स्मृति से विस्मृत न हो सका। मीडिया अगर उस वक्त अभियान न छेडता तो आज मनु सहित विकास ओर अमरदीप खुले साण्ड की तरह तबाही मचा रहे होते। जेसिका को लगी गोली को बदलकर भी अदालत को गुमराह करने का कुित्सत प्रयास किया गया, पर उच्च न्यायालय ने पारखी नज़रों से सच्चाई का पता लगा ही लिया।
 
एसा नहीं कि रसूखदारों के द्वारा पहली बार इस तरह के प्रयास किए गए हों। इससे पहले 2 जुलाई 1995 को दिल्ली युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा ने अपनी पित्न नैना साहनी को मारकर तन्दूर में डाल दिया था, तब तन्दूर काण्ड जमकर उछला। 03 नवंबर 2003 को अदालत ने सुशील शर्मा को दोषी पाते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई। उच्च न्यायालय ने भी निचली अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए उसे बरकरार रखा।
 
इसी तरह 17 फरवरी को बहुचर्चित नेता डी.पी.यादव की बेटी भारती के मित्र नितीश कटारा की हत्या कर दी गई थी। अदालत ने दोनों को आजीवन कैद की सजा सुनाई। 23 जनवरी 1999 को इण्डियन एक्सपे्रस अखबार की पत्रकार शिवानी भटनागर की हत्या में शक की सुई दिल्ली में पदस्थ भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी आर.के.शर्मा के इर्द गिर्द घूमी। अदालत ने इस मामले में शर्मा और दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। जनवरी 1995 में कानून की पढाई करने वाली प्रियदर्शनी भट्ट के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई थी। आरोपी सन्तोष कुमार सिंह पुलिस के रसूखदार का बेटा था। जाहिर था पुलिस ने उसका साथ दिया। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उसे छोड दिया। मीडिया ने जब हो हल्ला मचाया तब दुबारा केस खुला और दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसे फांसी की सजा सुनाई।
 
कुल मिलाकर यह सब जागरूकता के चलते ही सम्भव हो सका। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि अगर कहीं कोई अन्याय हो रहा है तो हम कम से कम उसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस तो करें। प्रसिद्ध विचारक शिव खेडा द्वारा उद्यत एक कोटेशन का जिकर यहां लाजिमी होगा कि अगर कोई आपके पडोसी पर अत्याचार कर रहा है, और आप शान्त हैं तो उसके बाद नंबर आपका ही आने वाला है।

अब थुरूर की नागरिका पर सवालिया निशान!

अब थुरूर की नागरिका पर सवालिया निशान!

एक पत्रकार ने मांगी आरटीआई के तहत जानकारी

बढ सकतीं हैं कांग्रेस और थुरूर की मुश्किलें

लौटानी पड सकती है खर्च की पाई पाई

छोडना पडेगा बंग्ला, नार्थ या साउथ ब्लाक होगा आशियाना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सोशल नेटविर्कंग वेव साईट टि्वटर के माध्यम से अघोषित तौर पर लोकप्रिय विवादित शिख्सयत का खिताब पाने वाले निर्वतमान विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर को भारत सरकार ने जरूर अपने कुनबे से बाहर का रास्ता दिखा दिया हो पर थुरूर की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। केरल के एक मलयाली भाषा के समाचार पोर्टल चलाने वाले एक पत्रकार ने अब सूचना के अधिकार के माध्यम से शशि थुरूर की भारतीय नागरिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। थुरूर अगर अपनी नागरिकता को प्रमाणित नहीं कर पाए तो उनके मन्त्री पद के बाद सांसद की कुर्सी भी उनसे छीनी जा सकती है। उस स्थिति में बतौर सांसद उन्होंने भारत गणराज्य की सरकार का जो भी धन खर्च किया होगा उसकी वसूली भी उनसे सम्भव है।

एक समाचार पोर्टल से जुडे ए.के.वर्मा ने शशि थुरूर द्वारा केरल राज्य के तिरअनन्तपुरम की मतदाता सूची में नाम जुडवाने का प्रमाणपत्र की प्रमाणिक प्रतिलिपी मांगकर सनसनी फैला दी है। केरल सरकार के सूत्रों का कहना है कि शशि थुरूर ने लोकसभा चुनावों के पहले 27 अक्टूबर 2008 को भारतीय निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में नाम जुडवाने का आवेदन दिया था। वर्मा ने उस पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा है कि क्या आवेदन करते समय शशि थुरूर भारत के सामान्य नागरिक थे। कहा जा रहा है कि इसी दिन शशि थुरूर ने अपने मकान मालिक के साथ किराएनामा अनुबंध (रेंटल लीज एग्रीमेंट) निष्पादित किया था।

मामले का पेंच कई जगह उलझता प्रतीत हो रहा है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि शशि थुरूर की तिरूअनन्तपुरम की नागरिकता के बारे में अभी स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। सूत्रों ने आगे बताया कि तिरूअनन्तपुरम की नगर पालिका निगम के कोवाडियार वार्ड के पार्षद ए.सुनील कुमार ने अपने लेटर हेड पर निगम के सचिव को पत्र लिखा था, जिसमें इबारत के बतौर यह उल्लेख किया गया था कि शशि थुरूर टी.सी./9/277/(2) कोवाडियार वार्ड के निवासी हैं, और उन्हें राशन कार्ड में नाम शामिल कराना है, अत: शशि थुरूर को निवास प्रमाण पत्र जारी किया जाए। इससे स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि सालों साल हिन्दुस्तान की सरजमीं से बाहर रहकर नौकरी करने वाले थुरूर के पास न तो भारत की नागरिकता है, न राशन कार्ड और न ही निवास प्रमाण पत्र।

इस मामले की गुत्थी तब और उलझती नज़र आती है जब निगम की पंजी में यह दर्ज है कि वे अति विशिष्ट व्यक्ति (व्हीव्हीआईपी) हैं, और अतिविशिष्ट व्यक्ति आवासीय समझौते और तिरूअनन्तपुरम नगर निगम प्रमाण पत्र क्रमांक 3175 दिनांक 06 नवंबर 2008 के अनुसार वे उपरोक्त विर्णत पते के निवासी हैं। देखा जाए तो मतदाता सूची में नाम पंजीबद्ध करवाने के लिए आवेदक को उस संसदीय क्षेत्र का मूल निवासी होना अत्यावश्यक होता है, साथ ही साथ मतदाता सूची में नाम शामिल करवाने के लिए आवेदक को फार्म 06 भी भरकर देना होता है, साथ ही थुरूर ने फार्म की धारा चार को भी नहीं भरा है जिसमें आवेदक को इस बात का उल्लेख करना होता है कि वह उस पते पर कब से निवास कर रहा है।

लगने लगा है कि विवाद और शशि थुरूर दोनों ही का चोली दामन का साथ है। शशि थुरूर ने होटल ताज में जो गुलछरेZ उडाए हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। एआईसीसी मुख्यालय में चल रही चर्चाओ के अनुसार पता नहीं शशि थुरूर में क्या खासियत है जो कांग्रेस की राजमाता भी उनसे यह पूछने का साहस नहीं कर पा रहीं हैं कि होटल में दो माह तक मेहमानी का भोगमान किसने भोगा है। अब इस नई आफत के चलते एक बार फिर कांग्रेस और थुरूर की फजीहत होने ही वाली है।

उधर मन्त्रीपद गंवाने के बाद शशि थुरूर को बडे सरकारी बंग्ले को रिक्त करना होगा। वे पहली बार संसद बने हैं, इसलिए बडे बंग्ले की उन्हें पात्रता नहीं है। संसद के सूत्रों का कहना है कि पहली बार बने संसद सदस्यों को अमूमन नार्थ या सउथ ब्लाक में ही आवास दिया जाता है। लंबे राजनैैतिक अनुभवों को देखकर पहली बार संसद पहुंचे सदस्यों को अवश्य कोठियां दी गईं हैं।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

मोदी का सिक्सर, थुरूर मैदान के बाहर

कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को - - -(3)
 
मोदी का सिक्सर, थुरूर मैदान के बाहर
 
ट्वंटी ट्वंटी अब निर्याणक मोड पर
 
मन्त्री ने दिया सांसद की हैसियत से बयान
 
बडे बेआबरू होकर तेरे कूचे से थुरूर निकले
(लिमटी खरे)

आजाद भारत के एक जिम्मेदार मन्त्री शशि थुरूर और आईपीएल के चेयरपर्सन ललित मोदी के बीच आरम्भ हुए अन्तहीन विवाद में रोजाना ही कोई न कोई रोचक मोड आता जा रहा है। अब भारत गणराज्य के मन्त्री शशि थुरूर ने देश की सबसे बडी पंचायत में अपनी सफाई बतौर मन्त्री न देकर बतौर सांसद देकर नए विवाद को जन्म दे दिया है। थुरूर के इस कदम से न केवल उनकी खुद की वरन् समूची कांग्रेस की भद्द पिटती नज़र आ रही है। प्रधानमन्त्री ने अप्रिय और कडा कदम उठाते हुए शशि थुरूर को मन्त्रीमण्डल से रूखसत कर दिया है।
 
थुरूर की इस बचकानी हरकत पर मन्त्रीमण्डल के एक अन्य सहयोगी फारूख अबदुल्ला ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर वे थुरूर की जगह होते तो देश और सरकार की गरिमा को बचाने के लिए वे त्यागपत्र दे देते। फारूख अब्दुल्ला का कहना था कि शशि थुरूर को सुनन्दा से अपने रिश्ते छिपाना नहीं चाहिए था। अब्दुल्ला के बयान को कांग्रेस ने काफी गम्भीरता से लिया है। कांग्रेस को डर था कि शशि थुरूर के मामले में अगर ज्यादा लोगों के मुंह खुल गए तो उसे परेशानी उठानी पड सकती है।
 
शशि थुरूर की रूखसती के बाद अब ललित मोदी को धोबीघाट पर कपडे की तरह धुलाई की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस इस मामले में बेकफुट पर है और अब मोदी जिस करवट मिलेंगे उस करवट ही उनकी धुनाई होगी। मामला आगे न बढे इसलिए अब ललित मोदी के जानने वालों पर भी गाज गिराकर मोदी को भयाक्रान्त करने का प्रयास किया जाएगा। उधर आयकर का शिकंजा भी मोदी मण्डली पर जमकर कसने की उम्मीद से इंकार नहीं किया जा सकता है। रान्देवू स्पोर्टस केे सीईओ शैलेन्द्र गायकवाड के भाई रवि गायकवाड जो क्षेत्रीय उप परिवहन अधिकारी हैं, एवं उनका स्थानान्तरण मराठवाडा से बीड कर दिया गया था, को निलंबित करने की प्रक्रिया महाराष्ट्र की कांग्रेसनीत सरकार ने आरम्भ कर ही दी है।
 
सबसे अधिक आश्चर्य तो उन खबरों पर होता है, जिनमें कहा जा रहा है कि आईपीएल विवाद उभरने के पहले ही केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को जो रिपोर्ट सोंपी गई थी उसमें मोदी के रिश्तेदारों के नामों सहित अनेक नामों को विवादित माना गया था। इतना ही नहीं तीन सालों में मोदी की संपत्ति में बेतहाशा बढोत्तरी की बात भी इस रिपोर्ट में थी। बावजूद इसके केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड आखिर कार्यवाही के लिए किसकी हरी झण्डी का इन्तजार कर रहा था, जो इस विवाद के बाद सक्रिय हुआ।
 
भाजपा ने भी एक तीर से कई निशाने साधते हुए थुरूर को पलनिअप्पम चिदंबर से सबक लेने की नसीहत दे डाली है। भाजपा का कहना है कि नरसिंहराव सरकार में जब चिदम्बरम वाणिज्य मन्त्री थे, तब उन पर उनकी पित्न को एक कंपनी के शेयर बाजार से कम कीमत पर देने के आरोप लगे थे, तब चिदम्बरम ने तत्काल नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दे दिया था, पर थुरूर कुर्सी से चिपके रहे और आखिरकार उन्हें बेइज्जत होकर जाना पडा।
 
टि्वटर से चर्चा में आए थुरूर का विवादों से गहरा नाता रहा है। कांग्रेस की सदस्यता लेते वक्त शशि थुरूर ने कोिच्च में शशि थुरूर ने देश के राष्ट्रगान का सरासर अपमान किया था। अमूमन राष्ट्रगीत के बजते, गाते, सुनते समय हर भारतवासी सावधान की मुद्रा में रहता है, पर विदेशों में ज्यादा समय बिताने वाले शशि थुरूर ने सावधान की मुद्रा को न अपनाकर दुनिया के चौधरी अमेरिका की तर्ज पर दिल पर हाथ रखकर इसे न केवल खुद गाया वरन् लोगों को भी एसा करने प्रेरित किया।
 
पिछले साल वैश्विक स्तर पर आर्थिक मन्दी के चलते हर जगह फिजूलखर्ची पर रोक के बावजूद भी शशि थुरूर ने सरकारी खर्च पर फाईव स्टार होटल को अपना आशियाना बना लिया था। सितम्बर 2009 में होटल ताज के फाईव स्टार सूट में दो माह रहने के बाद आज तक यह बात सार्वजनिक नहीं हो सकी है कि उस होटल का भोगमान (बिल) किसने भोगा, भारत सरकार ने, थुरूर ने या उनके किसी मित्र ने। इस मामले के उजागर होने पर कांग्रेस को बहुत जिल्लत झेलनी पडी थी।
 
इसी माह शशि थुरूर ने एक और हंगामा खडा किया। देशवासियों को दिखाने के लिए जब कांग्रेस की राजमाता ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से व्यवसायिक राजधानी मुम्बई तक का हवाई सफर 20 सीटों को खाली करवाकर इकानामी क्लास में किया तब दूसरे ही दिन थुरूर ने सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर पर हवाई जहाज की इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) की संज्ञा दे दी। इसके बाद कांग्रेस को खून का घूंट पीना पडा क्योंकि इसके सोनिया गांधी की यात्रा से जोडकर देखा जा रहा था।
 
दिसम्बर 2009 में जब केन्द्रीय गृह मन्त्रालय ने वीजा सम्बंधी नियमों को कडे करने का फैसला लिया तब फिर शशि थुरूर ने इसे गैरवाजिब बताया। दरअसल यह फैसला इसलिए लिया गया था, क्योंकि 26/11 की साजिश में शामिल आरोपी डेविड हेडली और तहव्वूर राणा को लांग टर्म मल्टी एंट्री वीजा मिला हुआ था। इस पर भी थुरूर की टि्वट ने सरकार के खिलाफ ही जहर उगला था।
 
देश के पहले प्रधानमन्त्री और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के परनाना जवाहर लाल नेहरू को भी शशि थुरूर ने नहीं बख्शा। 8 जनवरी 2010 को लार्ड भीखू पारेख के एक प्रोग्राम मे शशि थुरूर का कहना था कि गांधी के योगदान और नेहरू की नीतियों से देश की स्थिति मजबूत तो हुई है, किन्तु इससे विश्व के सामने हमारी नकारात्मक छवि बनी है। हम वैश्विक मसलों पर नैतिकता को रगडते रहते हैं। इतना ही नहीं देश जिस मोहनदास करमचन्द गांधी को राष्ट्र का पिता मानकर नमन करता है उनकी जयन्ती पर शशि थुरूर का मानना है कि गांधी जयन्ती पर घर पर न बैठा जाए, काम किया जाए।
 
शशि थुरूर के ग्यारह महीनों के कार्यकाल में उन्होंने कांग्रेस को तबियत से नुकसान पहुंचाया है, फिर भी कांग्रेस की राजमता श्रीमति सोनिया गांधी और वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह ने उन्हें गले से लगाकर रखा एवं शिशुपाल की तरह उनकी गिल्तयों को भी माफ किया। कांग्रेस ने एसा क्यों किया यह तो वह ही जाने पर शशि थुरूर कांग्रेस के उजले दामन पर एक बदनुमा दाग बनकर इतिहास में सदा कांग्रेस के लिए खटकेगा। आने वाले चुनावों में भी शशि थुरूर का मामला एक मुद्दे की तरह उछाला जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सिहांसन पर बोने ही नज़र आ रहे हैं गडकरी

सिहांसन पर बोने ही नज़र आ रहे हैं गडकरी

गद्दी सम्भालने में हो रही परेशानी
 
गुटबाजी आ रही काम में आडे
 21 की रेली बनी प्रतिष्ठा का प्रश्न
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अप्रेल। सूबाई राजनीति से निकलकर एकाएक राष्ट्रीय परिदृश्य में बिठा दिए गए भाजपा के नए निजाम नितन गडकरी को अब गद्दी सम्भालना मुश्किल हो रहा है। सालों से केन्द्र की राजनीति में जमे जकडे नेताओं के काकस में वे धीरे धीरे घिरते नज़र आ रहे हैं। भाजपा में फैली गुटबाजी और सत्ता के लिए ललक के साथ ही महात्वाकांक्षी नेताओं ने गडकरी को बोना ही साबित करना आरम्भ कर दिया है। 21 अप्रेल को आहूत रेली की सफलता पर उनका आने वाला समय कैसा होगा यह काफी हद तक निर्भर करेगा।
 
भाजपा को घुन की तरह खाने वाले नेताओं के तेवरों को देखकर नितिन गडकरी को अपने अनेक फैसले खुद ही बदलने पड रहे हैं। भाजपा के नेताओं को अपने अपने क्षेत्रों में माह में कम से कम आठ दिन रहने के निर्देश के बाद उसे बदलकर आठ दिन करना गडकरी की मजबूरी हो गई थी। इसके अलावा 21 अप्रेल की रेली में दस लाख लोगों के जमावडे के लक्ष्य को भी घटाकर साढे तीन लाख पर लाकर खडा करना पडा। यह सब इन्ही घाघ नेताओं के कदम तालों के चलते हुआ है।
 
गौरतलब है कि गडकरी ने अध्यक्ष बनने के बाद यह कहा था कि वे अपनी टीम में उन्हीं लोगों को स्थान देंगे जो हर माह कम से कम दस दिन अपने क्षेत्र को समय देंगे। जब ``टीम गडकरी`` का गठन हुआ तो उसमें पुराने पदाधिकारियों को देखकर हर कोई इसे नई बोतल में पुरानी शराब की संज्ञा देने से नहीं चूका। टीम गडकरी के गठन के साथ ही साथ असन्तोष की खिचडी भी खदबदाने लगी है। लोग इसमें रूपहले पर्दे के अनुभवहीन अदाकारों को शोभा की सुपारी बनाए जाने से खासे खफा नज़र आ रहे हैं।
 
उधर नितिन गडकरी ने अब सूबों के अध्यक्षों की मश्कें कसना आरम्भ कर दिया है। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि गडकरी ने एक फरमान जारी किया है जिसमें साफ कहा गया है कि पार्टी के कार्यकर्ता अपनी समस्या के लिए पार्टी अध्यक्ष के कार्यालय के बाहर कतई न जाएं। अपनी समस्याएं पार्टी अध्यक्ष को न बताकर उन्हें दल के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष रखने पर वे खासे नाराज नज़र आ रहे हैं।
 
नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी मुद्दे को सिर्फ और सिर्फ पार्टी अध्यक्ष के दफ्तर में ही उठाया जा सकेगा, एवं पार्टी अध्यक्ष का कार्यालय ही उस पर कार्यवाही करेगा। शिकायतों को अब सीधे वरिष्ठ नेताओं तक ले जाने की मनाही है। सूत्रों ने साफ किया कि कार्यकर्ता चाहे तो वरिष्ठ नेता से मिल सकता है, किन्तु अपनी समस्या के बारे में वह नेता से चर्चा नहीं करेगा। गडकरी का यह कदम पार्टी को वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव और गणेश परिक्रमा से मुक्त कराने के तौर पर देखा जा रहा है। संघ भी गडकरी की इस अभिनव पहल में उसके साथ ही खडा दिखाई दे रहा है।

राजा का काटा नहीं मागता है पानी

ये है दिल्ली मेरी जान
 (लिमटी खरे)
राजा का काटा नहीं मागता है पानी
देश के हृदय प्रदेश में दस साल लगातार राज करने वाले कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह को इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के आधुनिक चाणक्य की उपाधि से अघोषित तौर पर नवाजा जाता है। मध्य प्रदेश में अपने शासनकाल में उन्होंने संयुक्त मध्य प्रदेश में विद्याचरण, श्यामाचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह, स्व.माधव राव सिंधिया, अजीत जोगी, कमल नाथ जैसे दिग्गजों को धूल चटा दी थी। इसके बाद 2003 में कांग्रेस के औंधे मुंह गिरने के बाद उन्होंने केन्द्र की राजनीति की ओर रूख किया है। आज की तारीख में राजा दिग्विजय िंसंह कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राहुल गांधी के बाद दूसरी पायदान पर विराजे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ गृहमन्त्री पी.चिदम्बरम के खिलाफ टीका टिप्पणी कर ठहरे हुए पानी में हलचल मचा दी है। सियासी हल्कों में चल रही बयार के अनुसार दिग्विजय के इस कदम के पीछे राहुल गांधी का समर्थन था। उधर कांग्रेस की राजमाता को भी भरोसे में लिया गया था। यह अलहदा बात है कि तय रणनीति के अनुसार बाद में कांग्रेस ने इस बात से पल्ला झाड लिया, पर दिग्गी राजा के जहर बुझे तीर का ही कमाल था कि पलनिअप्पम चिदम्बरम को आनन फानन अपना त्यागपत्र पेश करना पडा था।
सोनिया से सियासी गणित बिठाने में लगीं ममता
पश्चिम बंगाल में रेल्वे के विज्ञापनों से कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमन्त्री मन मोहन सिंह के फोटो यह कहकर निकालने वालीं कि रेलवे के विज्ञापनों में मनमोहन सोनिया का क्या काम, ममता बनर्जी अब सोनिया गांधी से राजनैतिक गणित ठीक ठाक करने में जुट गईं हैं। इसी तारतम्य में ममता बनर्जी ने उत्तर रेल्वे द्वारा सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने की कवायद को ठण्डे बस्ते में डाल दिया है। रेल्वे के सूत्रोें का कहना है कि मानव रहित रेल्वे क्रासिंग पर होने वाली दुघZटनाओं को रोकने के लिए उत्तर रेल्वे ने यह प्रस्ताव दिया था कि अमिताभ बच्चन को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाकर बिना मानव वाली रेल्वे क्रासिंग के खतरों के बारे में आगाह करें तो लोग उनका अनुसरण आसानी से कर लेंगे। बताते हैं कि अमिताभ इसके लिए तैयार भी हो गए थे, तभी ममता दीदी को किसी ने बताया कि बिग बी की एंट्री से सोनिया खफा हो सकतीं हैं, सो ममता ने तत्काल इस मामले को लंबित करने के निर्देश दे दिए। अब ममता चाहतीं हैं कि 22 अप्रेल को बंटने वाले रेल मन्त्री पुरूस्कार को सोनिया के हाथों बटवाया जाए, पर 10 जनपथ की महारानी इसके लिए तैयार होती नहीं दिख रहीं हैं।
गोविन्दाचार्य ने दिखाए तेवर
भाजपा छोडकर गए दो नेताओं गोविन्दाचार्य और उमा भारती ने अपने द्वारा बनाई गई पार्टियों से त्यागपत्र देकर एक मिसाल कायम की है। इन दोनों ही नेताओं की भाजपा में वापसी को लेकर अटकलों और अफवाहों के न थमने वाले दौर चल पडे हैं। दोनों ही नेताओं की घर वापसी में उनको पसन्द न करने वाले नेताओं ने रोढे अटकाने आरम्भ कर दिए हैं। इसी बीच भाजपा के नए निजाम ने गोविन्दाचार्य की घर वापसी के लिए प्रायशचित की शर्त से गोविन्दाचार्य बुरी तरह भडक गए हैं। उन्होंने भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी को जुबान पर लगाम लगाने की नसीहत तक दे डाली है। कभी भाजपा के थिंक टेंक रहे गोविन्दाचार्य के बारे में नए नवेले और सूबाई राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचने वाले नितिन गडकरी को वैसे सोच समझकर ही बयान जारी करना चाहिए था। उन्होंने गडकरी को उनकी औकात दिखाते हुए कहा कि गडकरी को वाणी में संयम रखने की जरूरत है, जिससे उनकी छवि अनर्गल बोलने वाले और सतही एवं अक्षम नेता की न बन सके। गोविन्दाचार्य का कहना है कि उन्हें पार्टी से निकाला नहीं गया था, वे 9 सितम्बर 2000 को अध्ययनावकाश पर गए थे और 2003 के बाद उन्होंने प्राथमिक सदस्यता का नवीनीकरण नहीं कराया है।
घर के लडका गोंही चूसें, मामा खाएं अमावट
बहुत पुरानी बुन्देलखण्डी कहावत -``घर के लडका गोंही (आम की गुठली) चूसें, मामा खाएं अमावट (आम के रस से बनने वाला एक स्वादिष्ट पदार्थ) को चरितार्थ करते हुए, वैश्विक मन्दी के इस दौर में एक और जहां देश की आधी से अधिक आबादी को एक जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रमण्डल खेलों से जुडी परियोजनाओं की समीक्षाओं को लेकर सुरेश कलमाडी की अध्यक्षता आयोजित 57 बैठकों में ही महज 29 लाख 26 हजार रूपए का नाश्ता गटक गए अधिकारी। है न अचरज की बात। कार्यकारी बोर्ड की एक दिन में हुई बैठक मे ंनाश्ते का कुल खर्च सिर्फ एक लाख 75 हजार रूपए आया है। यह बात सूचना के अधिकार में निकाली गई जानकारी में सामने आई हैं पहले तो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन देखकर अधिकारियों के हाथ पांव ही फूल गए थे। काफी समय ना नुकुर करने के बाद जब आला अधिकारियों ने निर्देश दिया तब पांच महीनों बाद यह जानकारी मुहैया करवाई गई। नियमानुसार एक माह में जानकारी देने का प्रावधान है।
सज्जन की राह पर कमल नाथ!
चोरासी के दंगों की फाईलें बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं। छब्बीस साल बाद भी अगर दंगों के बारे में प्रकरण चल रहे हों तो भारत सरकार और कानून व्यवस्था को सलाम ही करना बेहतर होगा। साल दर साल प्रकरण चल रहे हैं, मीडिया में उछल रहे हैं। विपक्ष में बैठी भाजपा ने छ: साल लगातार शासन भी किया, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात। जाहिर है केन्द्र की सत्ता में चाहे कांग्रेस सत्तारूढ हो या भाजपा, दोनों मिलकर नूरा कुश्ती ही खेलते हैं, जनता तमाशबीन खडी चुपचाप सब कुछ देखती सुनती रहती है। सज्जन कुमार को इसमें बुरी तरह लपेट दिया गया है। इससे पहले कमल नाथ सहित अनेक नेताओं को क्लीन चिट दे दी गई थी। कमल नाथ का दुर्भाग्य तो देखिए कि जब वे अमेरिका में थे, तभी वहां की एक संघीय अदालत में न्यूयार्क के एक सिख संगठन सिख्ख फॉर जस्टिस की ओर से जसबीर सिंह और महिन्दर सिंह ने मामला दर्ज कराते हुए एलियन टॉटर्स क्लेम्स अधिनियम के तहत कमल नाथ को दण्ड देने और मुआवजा दिलाने की मांग की है। जसबीर ने अपने परिवार के 24 सदस्य खोए हैं तो उस वक्त दो साल के रहे महिन्दर ने अपने पिता को गंवाया था।
सूख गई मैया दाई की बाण गंगा
प्रकृति से लगातार हो रही छेडछाड से पर्यावरण का असन्तुल साफ दिखाई देने लगा है। कभी भीषण गर्मी तो कभी हाड कपाने वाली ठण्ड, और तो और सबसे अधिक बारिश वाले चेरापूंजी के सर से खिताब भी छिनने लगा है कि वहां सबसे ज्यादा पानी गिरता है। चहुं ओर हाहाकार मचा हुआ है। त्रिकुटा पर्वत पर विराजीं माता वेष्णो देवी के चरणों को धोने वाली बाणगंगा अब पूरी तरह सूख चुकी है। माता रानी के दर्शन को जाने वाले श्रृद्धालु इस पवित्र नदी में डुबकी अवश्य लगाते हैं। यह नदी समाखल क्षेत्र के 200 फुट उंचे पहाड के मध्य से प्रकट हुई है। इस नदी में माता रानी की गुफा से आने वाला झरना आगे जाकर मिल जाता है। बारिश की कमी से समाखल का तालाब पूरी तरह सूख चुका है। बाण गंगा के बारे में कहा जाता है कि अब तक यह नदी कभी भी नहीं सूखी यह पहला मौका है जब नदी सूख गई है। श्रृद्धालु इसे प्रलय का आगज ही मान रहे हैं।
पत्रकारों को रिझाया ममता ने
मीडिया को प्रजातन्त्र का चौथा स्तंभ माना गया है। मीडिया की ताकत से राजनेता अनजान नहीं है। मीडिया चाहे तो सरकार बना दे चाहे तो गिरा दे। आज मीडिया पथभ्रष्ट हो गया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मीडिया को रिझाने के लिए ममता बनर्जी ने पत्रकारों के साथ साथ साल में एक बार उसकी अर्धांग्नी को भी ले जाने की छूट प्रदान की थी। इससे वे तलाकशुदा, कंवारे और वे पत्रकार नाराज थे, जिनकी अर्धांग्नी अल्लाह को प्यारी हो गईं, सो ममता ने पत्रकारों के किसी भी सहचर को साल में एक बार आधे किराए पर यात्रा की अनुमति दे दी। अब ममता ने एक नया पांसा फेंका है, जिसके मुताबिक पत्रकारों के 18 साल तक के आश्रित बच्चे भी साल में एक बार पचास फीसदी किराए में यात्रा कर सकेंगे। वर्तमान में राजधानी शताब्दी एक्सपे्रस सहित सभी रेल गाडियों में पत्रकारों को पचास फीसदी किराए में असीमित यात्रा की सुविधा प्राप्त है। पत्रकार हैरान न हों, पश्चिम बंगाल चुनाव तक ममता बनर्जी पत्रकारों पर यूं ही मेहरबान रहने वालीं हैं।
राशि गरीबों या कलेक्टर के विकास के लिए
महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना की राशि गरीबों को रोजगार मुहैया कराने खर्च हो रही है या फिर कलेक्टर बंगलों को भव्य बनाने के लिए इस बात पर अब बहस चल पडी है। पहली बार मन्त्री बने ग्रामीण विकास राज्यमन्त्री प्रदीप जैन ने मध्य प्रदेश सरकार पर गम्भीर आरोप लगाया है कि केन्द्र सरकार द्वारा इस मद में दी जाने वाली राशि का दुरूपयोग हो रहा है। जिलों में जिलाधिकारियों के बंग्लों का रख रखाव इस मद की राशि से किया जा रहा है। प्रदीप जैन का आरोप है कि वर्ष 2009 - 10 में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत केन्द्र सरकार द्वारा 72061.418 लाख रूपए की राशि दी गई थी, जिसमें से राज्य द्वारा महज 53379.327 लाख रूपए ही खर्च किए हैं। इस मद में 15 सौ करोड रूपए की राशि तो मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने खर्च ही नहीं की। मजे की बात तो यह है कि मध्य प्रदेश कोटे से मन्त्री बने कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कान्तिलाल भूरिया, अरूण यादव सहित कांग्रेस के सांसदों ने कभी इस पहलू पर गौर ही नहीं फरमाया कि केन्द्र पोषित योजनाओं से उनके संसदीय क्षेत्र में चल रही योजनाओ में क्या घालमेल हो रहे है, वे ध्यान दें तो क्यों! आखिर 2013 में ही तो उन्हें दोबरा जनता के सामने जाना है, तब तक जनता सब कुछ भूल ही चुकी होगी।
आडवाणी आउट : मोदी इन
भारतीय जनता पार्टी का स्टेयरिंग सम्भालने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अब आने वाले आम चुनावोें के लिए भूमिका बांधन आरम्भ कर दिया है। हाल ही में संघ ने कहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों में गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ही भाजपा की ओर से प्रधानमन्त्री के दावेदार होंगे। इसके पहले एसआईटी द्वारा मोदी को तलब करने के मसले पर भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने कहा था कि मोदी प्रधानमन्त्री बनने के योग्य हैं और वे इन सब झंझटों से पार पा लेंगे। मोदी की तारीफों में गडकरी और संघ की एक सी सुरताल से अडवाणी की भजन मण्डली सकते में है। आडवाणी की मण्डली को अभी भी उम्मीद है कि आने वाले चुनावों में राजग एक बार फिर से आडवाणी पर दांव लगाएगा, पर संघ गडकरी की जुगलबन्दी से उनकी आशाओं पर तुषारापात होता लग रहा है। दूसरी ओर पीएम इन वेटिंग की राह में दूसरी सबसे सशक्त दावेदार सुषमा स्वराज द्वारा भी इस तरह की चाल चलकर आडवाणी को पाश्र्व में ढकेला जा सकता है।
बेटी के चक्कर में बेटों को दुश्मन न बना लें शिवराज
मध्य प्रदेश सूबे में बेटियों को बहुत ही सम्मान से देखा जाने लगा है। महिलाओं का हितैषी बन चुका है देश का हृदय प्रदेश, यह बात सोलह आने सच है। मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान भी बिटियों के लिए दीवाने बावले दिख रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में एक नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर एक वाक्या सुनाया। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में एक कार्यक्रम के दौरान शिवराज सिंह चौहान भावावेश में कुछ ज्यादा ही कह गए। उनके अनुसार कल तक यह मान्यता थी कि बेटा बुढापे की लाठी है, पर आज यह मिथक टूट गया है, बेटों की हरकतों को देखकर उन पर अविश्वास होने लगा है। अरे भले मानस अगर आज से 50, 55 साल पहले अगर इसी बात को सोचा गया होता तो आज मध्य प्रदेश को शिवराज सिंह चौहान जैसा योग्य मुख्यमन्त्री कैसे मिलता। शिवराज जी बेटियों की चाहत में जाने अनजाने में कहीं आप बेटों के मन में विरोध तो नहीं जगाने लगे हैं।
``आल इज नाट वेल`` विदिन बिग बी एण्ड अमर
समाजवादी पार्टी से बखाZस्त किए गए शातिर राजनेता अमर सिंह और सदी के महानायक बिग बी के बीच सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। इस बार मुम्बई यात्रा पर आए अमर सिंह ने पहली दफा अमिताभ बच्चन के घर न रूककर सन्देश दे दिया है कि उनके बीच कुछ न कुछ गडबड अवश्य ही है। अमर सिंह ने अपने ब्लाग में लिखा है कि 9 अप्रेल को अपनी मुम्बई यात्रा के दौरान वे पहली बार अमिताभ बच्चन के घर नहीं रूके। अमूमन हर बार वे होटल में कमरा बुक अवश्य ही करवाते थे, पर अमिताभ के घर रात जरूर गुजारते थे। वैसे जया बच्चन के जन्म दिन पर वे बाकायदा उनके घर गए और शुभकामनाएं दीं। सदा ही खामोश रहकर वार करने वाले सदी के महानायक अमिताभ बच्चन इस मामले में पूरी तरह खामोश हैं। अमर सिंह अपनी ओर से अवश्य बार बार यह संकेत दे रहे हैं कि उनके और बिग बी के बीच अब सब कुछ सामान्य नहीं है।
सिलिकॉन इंप्लांट, जरा संभल कर
अपनी खूबसूरती को बढाने और शरीर को सुडोल आकार देने के लिए महानगरों में सिलिकॉन इम्पलांट का जोर है। पर अब यही बालओं के लिए खतरे की घंटी बजा रही है। दरअसल हवाई अड्डों पर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा लगऐ स्केनर अब महिलाओं के द्वारा शरीर में सिलिकॉन इम्पलांट करने पर जोर से बीप बजाने लगता है। यह सिलिकॉन को एक मेटल की तरह डिटेक्ट करता है। वैसे इस तरह की घटनाएं कम ही प्रकाश में आईं हैं पर लोगों की प्राईवेसी के मद्देनज़र महिलाओं की चेकिंग के लिए अलग से कक्ष और मशीन के चीखने पर महिला सुरक्षा कर्मी शरीर की किसी अन्य बन्द कमरे में जांच कर पुष्टि करेंगी कि महिला ने सिलिकॉन इम्पलांट करवाया है या फिर कोई अस्त्र शस्त्र छुपाकर रखा है।
पुच्छल तारा
पिछले दिनों बस्तर में हुए अब तक के सबसे बडे नक्सली हमले के बाद पूरे देश में इनके समर्थन ओर विरोध पर चर्चाएं चल पडीं हैं। इसी बीच एक खबर आई कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भी नक्सल विचारधारा के पोषक लोग हैं। गुजरात के वापी शहर से अनन्त अग्रवाल ई मेल भेजते हैं कि देश भर में कुकुर मुत्ते की तरह गली गली में स्कूल कालेज खुल गए हैं, तब नक्सलवादी अपना स्कूल या कालेज क्यों नहीं चलते, उनके पास जेनएयू है तो. . . .।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पंवार पर बरसे राजनाथ

पंवार पर बरसे राजनाथ

छ: माह में पहली मर्तबा सर उठाया भाजपा ने
 
गडकरी को पीछे छोडने की तैयारी में राजनाथ
 
अपने कार्यकाल में नहीं पद छोडने के बाद दिखाए तीखे तेवर
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 17 अप्रेल। भाजपाध्यक्ष के पद से उतरने के बाद अब राजनाथ सिंह ने नितिन गडकरी की निष्क्रीयता का फायदा उठाकर एक बार फिर सक्रिय रोल अदा करने की ठान ली है। सालों साल मौनी बाबा बने रहने वाले राजनाथ सिंह ने अचानक ही कांग्रेस के कद्दावर संसद सदस्य अवतार सिंह भडाना के संसदीय क्षेत्र फरीदाबाद में जाकर भारतीय खाद्य निगम के गौदामों का औचक निरीक्षण कर सबको चौंका दिया।

फरीदाबाद और पलवल में जाकर राजनाथ सिंह ने गोदामों में सड रहे गेंहूं के बारे में अपनी चिन्ता को सार्वजनिक किया। एफसीआई के गौदाम में रखरखाव के अभाव में सड रहे गेंहूं को देखकर राजनाथ सिंह हत्थे से उखड गए। उन्होंने कहा कि सक्सेना कमेटी का प्रतिवेदन कहता है कि देश में 51 फीसदी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। सरकारी तन्त्र को आडे हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि बेलगाम अफसरशाही और बिगडेल बाबूराज के चलते बीपीएल कार्ड ही गरीबों को नसीब नहीं हो पा रहे हैं। जहां बीपीएल कार्डधारकों को अनाज मिल भी रहा है, वहां उन्हें सडा गेंहू मिलाकर दिया जा रहा है।
 
राजनाथ सिंह का आरोप था कि पिछले दो सालों में रखखरवाव और भण्डारण के अभाव मेें बहत्तर लाख 36 हजार 235 टन गेंहूं सड गया। इस तरह सडे गेंहू के नमूने सदन में पेश किए जाएंगे, और सांसदों की समिति बनाकर गेंहूं के सडने के कारणों का पता लगाने, जवाबदेही तय करने और खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने की मांग की जाएगी।
 
राजनाथ के एकाएक सक्रिय होने से भाजपा के आला नेताओं के कान खडे हो गए हैं। राजनाथ सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि सितम्बर माह से भाजपा के नए निजाम के चुनने और ताजपोशी का उपक्रम किया जा रहा था। इसके बाद अब तक पिछले छ: माहों में केन्द्र सरकार की मनमानियों के खिलाफ भाजपा की धार बोथरी ही रही है। इसी बात को राजनाथ सिंह को समझाया गया है कि जब गडकरी सक्रिय होकर आगे आएं तब तक तो आप अपना काम युद्ध स्तर पर जारी रखिए। गौरतलब होगा कि अपने खुद के कार्यकाल में राजनाथ सिंह पूरी तरह मौनी बाबा के रोल में नज़र आए थे।

रैली के खर्च को लेकर देशमुख परेशान

रैली के खर्च को लेकर देशमुख परेशान

दो जिलों के लोगों का भार पडेगा केडी भाउ पर
 
साढे तीन लाख लोग जुटेंगे महारैली में
 
दो करोड रूपए का खाना खा जाएंगे भाजपाई
 

दिल्ली प्रदेश भाजपा के फूले हान्थ पांव
लिमटी खरे
नई दिल्ली 17 अप्रेल। भाजपा की प्रस्तावित 21 अप्रेल की रैली को लेकर मध्य प्रदेश के बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख की तबियत कुछ नासाज होती दिख रही है। परिसीमन के उपरान्त उनके संसदीय क्षेत्र जिला बालाघाट में विलोपित की गई सिवनी लोकसभा की सिवनी और बरघाट विधानसभा को जोड दिया गया है। अब उनके मत्थे सिवनी और बालाघाट के भाजपाईयों के रूकने खाने की व्यवस्था का भार सहना पड सकता है।
 
भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय 11 अशोक रोड के सूत्रों का कहना है कि इस रेली में लगभग साढे तीन लाख लोगों के आने की उम्मीद है। इसमं से उत्तर प्रदेश से एक लाख, बिहार, हरियाणा और राजस्थान से पेन्तीस हजार, मध्य प्रदेश से 25 हजार, छत्तीसगढ, गुजरात और महाराष्ट्र से 15 हजार, पंजाब से 12 हजार, हिमाचल, उत्तराखण्ड और कर्नाटक से दस हजार लोगों के आने की संभावना है। इस रेली को भव्य बनाने के लिए भाजपा के मीडिया मैनेजरों ने कमर कस ली है।
 
इस रैली में मेजबानी करने के लिए दिल्ली प्रदेश भाजपा के कांधों पर जबर्दस्त भार डाल दिया गया है। साढे तीन लाख लोगों के लिए व्यस्था करने में प्रदेश भाजपा को पसीना आ रहा है। जब तब शीला दीक्षित की सरकार को मंहगाई के लिए घेरने वाली भाजपा अब खुद आन्तरिक तौर पर मंहगाई से जूझ रही है। इस रैली में आने वाले लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था सबसे बडा सरदर्द बनने जा रहा है भाजपा के लिए।
 
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि चूंकि रेली दिल्ली में आहूत हा रही है, इसलिए देश भर में जहां जहां से भी भाजपा के उम्मीदवार जीतकर सांसद बने हैं, वहां वहां उनके संसदीय क्षेत्र वाले जिलों से आने वाले कार्यकर्ताओं के रहने खाने की जवाबदारी उन संसद सदस्यों के जिम्मे कर दी गई है। भाजपा के एक पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि इसे वे संसद सदस्य सबसे ज्यादा परेशान हैं जिनके संसदीय क्षेत्र में एक से ज्यादा जिले आते हैं। वैसे जहां जहां भाजपा की सरकार है, वहां अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा कार्यकर्ताओं को मदद करने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। मध्य प्रदेश के बाालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख के जिम्मे सिवनी और बालाघाट जिलों की कमान सौंपी गई है।
 
प्राप्त जानकारी के अनुसार सिवनी और बालाघाट से आने वाले कुल कार्यकर्ता और पदाधिकारियों की संख्या लगभग 1000 हो रही है, जिनका रूकना और खाने का इन्तजाम करने की बात से के.डी.देशमुख की पेशानी पर पसीने की बून्दे छलक रहीं है। इस सम्बंध में जब के.डी.देशमुख से उनके मोबाईल 9013180120 और 9425403008 पर संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनके दोनों ही मोबाईल ऑउट ऑफ कवरेज का गाना गाते मिले। कहा जा रहा है कि कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के आने की खबर और उनके इन्तजाम अली बनाए जाने से घबराकर उन्होंने अपने मोबाईल ही स्विच ऑफ कर लिए हैं।
 
उधर दिल्ली भाजपा के सूत्रों की मानें तो दिल्ली भाजपा के हर जिलाध्यक्ष को दस दस हजार रूपए जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। रेली के बाद प्रदेश भाजपा के गठन की कवायद भी की जानी है, अत: पहल फुर्सत में ही जिलाध्यक्षों ने बिना ना नुकुर के ही अपना अंशदान जमा करवा दिया। सूत्रों की मानें तो दिल्ली भाजपा को यह रेली दो करोड रूपए की चोट देकर जाने वाली है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

अब सुषमा ने साधा आडवाणी पर निशाना

अब सुषमा ने साधा आडवाणी पर निशाना
 
उमा के मामले में खोला सुषमा ने मुंह
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 अप्रेल। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की उमा भारती को भाजपा में वापस लाने की कवायद को लोकसभा में उनकी सक्सेसर नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने पलीता लगा दिया है। पिछले दिनों जयपुर में भाजपा के स्थापना दिवस समारोह में सुषमा स्वराज के बयान को पार्टी आलाकमान गम्भीरता से ले रहा है। सुषमा ने कहा था कि भाजपा में अनुशासनहीनता बढती ही जा रही है, जो चिन्तनीय है।
 
स्थापना दिवस समारोह में शिरकत करते हुए कहा कि 1980 में अपनी स्थापना के साथ भारतीय जनता पार्टी ने अनेक आयाम तय किए हैं। भाजपा पर देश की जनता ने भरोसा जताया और भाजपा ने केन्द्र में लगातार छ: साल शासन किया। इतना ही नहीं वर्तमान में छ: सूबों में भाजपा की सरकार काबिज है, तो तीन राज्यों में प्रमुख विपक्षी दल है। केन्द्र में भाजपा प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत से है। सुषमा का मानना था कि सत्ता में रहने के साथ ही साथ भाजपा में कदाचरण आया है साथ ही अनुशासन में कमी हुई है, जिसे स्वीकार करने में किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए।
 
इसी दौरान उन्होंने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमन्त्री उमा भारती की भाजपा में वापसी को नकारते हुए कहा कि भाजपा में किसी भी स्तर पर इस तरह की चर्चा नहीं चल रही है। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सुषमा स्वराज के बयान को पार्टी आलाकमान बहुत ही गम्भीरता से ले रहा है। शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि उमा भारती का मामला बहुत ही संवेदनशील है, और अगर सुषमा स्वराज ने कोई बयान दे दिया है, तो अब उमा भारती की जल्द वापसी के ताने बाने को कुछ दिन के लिए स्थगित कर दिया जाए, क्योंकि सुषमा स्वराज जमीन से जुडी कद्दावर नेता हैं।
 
जानकारों का मानना है कि अनुशासनहीनता की बात कहकर इसे स्वीकार करने की नसीहत दे सुषमा स्वराज ने परोक्ष तौर पर एल.के.आडवाणी पर निशाना साधा है। राजधानी की सियासी फिजाओं में यह चर्चा तेजी से चल रही है कि सुषमा स्वराज के सधे कदम और रणनीति को देखकर राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी को लगने लगा है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में उनके बजाए सुषमा स्वराज को ही आगे किया जाएगा, इस तरह उनका 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमन्त्री का सरकारी आवास) जाने का सपना उन्हें धूल धुसारित होता दिख रहा है।
 
चर्चाओं के अनुसार आडवाणी की कीर्तन मण्डली यह चाह रही है कि किसी भी तरह उमा भारती को भाजपा में प्रवेश मिल जाए और फिर यह मण्डली उमा भारती को पार्टी के अन्दर ही सुषमा स्वराज की काट बनाकर खडा कर दें, ताकि सुषमा इसमें उलझी रहें और आडवाणी को 2013 में होने वाले चुनावों में एक बार फिर जोर आजमाने का मौका मिल सके। कहा जा रहा है कि स्थिति परिस्थिति को भांपकर सुषमा स्वराज ने अब परोक्ष तौर पर अपनी बात कहकर आडवाणी के गुब्बारे की हवा निकाल दी है। गडकरी के करीबी सूत्रों का कहना है कि उमा भारती की वापसी अब जल्द सम्भव नहीं दिख रही है। उधर पार्टी में वापसी में देरी को देखकर उमा भारती का फटना स्वाभाविक ही माना जा रहा है। भाजपा में चल रही चर्चाओं के अनुसार अगर भारती को जल्द ही वापस नहीं बुलाया गया तो वे पानी पी पी कर एक बार फिर भाजपाईयों को कोसने से बाज नहीं आने वालीं।

हमसे पंगा न लेना मोदी साहेब


कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को - - -(2)
 
हमसे पंगा न लेना मोदी साहेब
 
इनकम टेक्स और सीबीआई बन चुकी है केन्द्र सरकार की लौण्डी
 
मतलब के लिए हो रहा सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल
 
सरकारी महकमों को इशारों पर नचा रहे निजाम
 
विवाद न होता तो इण्डियन पैसा लीग की न खुलती कलई
 
(लिमटी खरे)

``इण्डियन पैसा लीग`` की परतें अब उधडने लगी हैं। पहली बार ही जब आईपीएल की शुरूआत हुई थी, तब से ही मीडिया चीख चीख कर इसमें पैसों के हेरफेर की बातें कहता आ रहा है, पर केन्द्र सरकार धृतराष्ट्र की भूमिका में ही नज़र आ रहा था। आयकर विभाग की आंख खुलते खुलते सूरज आसमान पर बीचों बीच ही आ गया है। अगर आईपीएल के चेयरमेन ललित मोदी और भारत गणराज्य के विदेश राज्यमन्त्री के बीच सोशल नेटविर्कंग वेव साईट टि्वटर पर टि्वट टि्वट की 20 - 20 न हुई होती तो प्रधानमन्त्री कार्यालय हरकत में न आया होता, और वह आयकर विभाग को निर्देश भी जारी न करता कि आईपीएल में हो रहे गोरखधंधे की जांच करे। यह है आजाद भारत के गणराज्य के हालात। विवाद के बाद की परिस्थितियों को देखकर यही कहा जा सकता है कि शशि थुरूर अब मुंह चिढाते हुए ललित मोदी से कह रहे हों कि हमसे पंगा मत लेना ललित मोदी साहेब, हम सरकार हैं, इस देश को चलाते हैं, और आपको अब एसा उलझाएंगे कि आपकी सात पीिढयां भी याद रखेंगी। वैसे अभी इस मामले में और भी बहुत सारे पहलुओं की परतें समय के साथ उधडती जाएंगी।
 
आयकर विभाग यह जांच करने में लगा हुआ है कि कहीं टीम की खरीद फरोख्त में अण्डरवल्र्ड का पैसा तो नहीं लगा है। इसके अलावा आयकर विभाग ने खातों की जांच के लिए विशेष दल बना लिया है। इसी बीच कोिच्च टीम के प्रवक्ता और प्रबंधन में बदलाव कर दिया गया है। अब इसके सीईओ दुबई के व्यवसायी हर्षद मेहता होंगे। जांच पूरी तरह से ललित मोदी के इर्दगिर्द केन्द्रित होना शंका को जन्म दे रहा है। मामला चूंकि विदेश राज्य मन्त्री की महिला मित्र सुनन्दा पुष्कर के कारण आरम्भ हुआ था, अत: आयकर विभाग को सुनन्दा को भी जांच के घेरे में लिया जाना चाहिए, वस्तुत: एसा हो नही रहा है। सुनन्दा पुष्कर के मामले में आयकर विभाग पूरी तरह खामोश है। इसी से लगने लगा है कि सरकारी महकामों को देश को चलाने वाले निजाम अपने इशारों पर नचाते हैं। चाहे आयकर विभाग हो या सीबीआई हर बार इनकी कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठती आईं हैं। बिहार में चारा घोटाले की जांच हो या जय ललिता के खिलाफ मामलों की हर बार केन्द्र सरकार द्वारा अपने मतलब के लिए नेताओं पर दबाव बनाने की गरज से इन संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि केन्द्र सरकार की संस्थाएं स्वतन्त्र तौर पर काम करने की बजाए देश के शासकों की लौण्डी बनकर रह गईं है।
 
कोिच्च फ्रेंचाईजी के प्रवक्ता सत्यजीत गायकवाड के इस कथन का हम स्वागत करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि अब सभी टीम की फ्रेंचाईजी के नाम उजागर किए जाने चाहिए। जनता को पता तो चले कि कौन कौन से धनकुबेर किस किस टीम के लिए पैसा लगा रहे हैं और उनके धन के स्त्रोत क्या हैं। एक तरफ देश की दो तिहाई आबादी के पास एक जून खाने को रोटी के लाले पडे हैं, वहीं दूसरी ओर देश के धनकुबरे करोडों अरबों रूपए में टीम खरीद रहे हैं, इन परिस्थितियों में पैदा होने वाली विसंगतियों, पारदर्शिताविहीन, असंयमित, शासन प्रणाली के लिए कौन जिम्मेदार है।
 
अब आईपीएल में केवल दो ही टीम नज़र आ रही हैं एक है ललित मोदी की तो दूसरी शशि थुरूर की। दोनों ही टीमों में खिलाडियों ने अपनी अपनी आमद देना आरम्भ कर दिया है। अब सियासत बहुत तेज हो गई है। मोदी की टीम में गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी साईलेंट रोल अदा करते दिख रहे हैं तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष एवं भारत सरकार के कृषि मन्त्री शरद पवार उनके समर्थन में सामने आ गए हैं। शरद पवार का मानना है कि ललित मोदी ने टीम के प्रायोजकों का नाम सार्वजनिक कर कोई गलत काम नहीं किया है। आईपीएल में पारदर्शिता बहुत जरूरी है। कम से कम यह पता तो लगना चाहिए कि इसमें अण्डरवल्र्ड सिण्डीकेट का धन तो नहीं लगा है। वहीं दूसरी तरह बीसीसीआई के वर्तमान अध्यक्ष शशांक मनोहर मोदी से खफा हैं। कोिच्च की टीम के प्रायोजकों के नाम सार्वजनिक करने पर वे ललित मोदी को तल्ख भाषा में एक खत लिख चुके हैं। मनोहर अब आईपीएल कमिश्नर पर से मोदी की रूखसती चाहते हैं, पर आईपीएल के संविधान के अनुसार मोदी को इस पद से 2012 तक पदच्युत नहीं किया जा सकता है।
 
अब चूंकि शशि थुरूर के उपर उछलने वाले कीचड के चलते कांग्रेस और केन्द्र सरकार दोनों ही की बुरी तरह भद्द पिट रही है इसलिए आयकर का डण्डा चलाया गया है। मोदी को इतना उलझा दिया जाएगा कि वे सपने में भी शशि थुरूर का नाम सुनकर सहम जाएंगे। थुरूर ने अपने पद का उपयोग अपनी कथित प्रेयसी को निशुल्क 70 करोड की हिस्सेदारी दिलाने में किया या नहीं, आयकर अधिकारियों को सजग करने के लिए किया या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा, किन्तु जाने अनजाने उन्होंने सांप की पूंछ पर पैर रख ही दिया है। मोदी के समर्थकों ने अगर थुरूर की पित्न क्रिस्टी गिलिज के कान भरने आरम्भ कर दिए और गिलिज ने इस मामले में सुनन्दा पुष्कर और थुरूर के सम्बंधों के बारे में कुछ भी अरूचिकर कह दिया तो थुरूर को लेने के देने पड जाएंगे। वैसे थुरूर इस वक्त कनाडा के भारतीय दूतावास के सतत संपर्क में हैं ताकि गिलिज पर नज़र रखी जा सके। बताते हैं कि थुरूर ने दूतावास के अधिकारियों को निर्देशित भी किया है कि वे गिलिज को गढी हुई कहानी सुनाकर शान्त रहने के लिए बाद्य करें। वैसे भी किस्मत से उनके पास विदेश मन्त्रालय है, जिसके अधीन ही सारे दूतावास आते हैं।
मामला चूंकि खेल से जुडा है, इसलिए इस मामले में देश के खेल मन्त्री की चुप्पी आश्चर्यजनक है। आईपीएल में मोदी थुरूर विवाद ने समूची दुनिया में भारत का सिर शर्म से नीचा कर दिया है। आजादी के बाद हिन्दुस्तान पर आधी सदी से अधिक राज करने वाली कांग्रेस का नैतिक स्तर कितना गिर गया है, कि आज भी वह उस मन्त्री को गले लगाकर रखी है, जिसके कारण देश ही नहीं दुनिया भर में गली मोहल्लों में चर्चे आम हो गए हैं। भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करने वाली कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी और कांग्रेस के भविष्य के प्रधानन्त्री ओर युवराज राहुल गांधी भी इस मामले में मौन हैं। एसा लगने लगा है कि इन दोनों के नेतृत्व में कांग्रेस का चेहरा बहुत ज्यादा बदसूरत हो गया है। नैतिकता दम तोड चुकी है। विदेशों में पली बढी सोनिया और राहुल गांधी को शायद शुचिता और पवित्रता के मायने नहीं पता हैं। जिन कांग्रेसियों को इसके मायने मालूम भी हैं, वे इन दोनों से इतनी दूर बैठे हैं कि वे इन्हें समझाने का साहस भी नहीं जुटा सकते। ``उनका विवाद है मेडम हमें क्या करना है`` की नीति छोडनी होगी। यह विवाद किसी और का नहीं एक मन्त्री के पद के दुरूपयोग का है। देशवासियों की स्मृति से अभी वह बात विस्मृत नहीं हुई होगी जब शशि थुरूर ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। केरल के कोिच्च में इसी लोकसभा चुनाव के पहले देश के सम्मान के प्रतीक राष्ट्रीय गान को गाने के वक्त हिन्दुस्तान की परंपरा के अनुसार थुरूर सावधान की मुद्रा में खडे होने के बजाए न केवल खुद ने दुनिया के चौधरी अमेरिका की परंपरा के मुताबिक सीने पर हाथ रखकर जनगणमन गाया वरन् दूसरों को भी एसा करने को कहा।
 
क्या शशि थुरूर जैसे मन्त्रियों के अनगिनत अपराधों को क्षमा करते हुए इन्हीं की अगुआई में इक्कसवीं सदी में भारत के नवनिर्माण का सपना देखा जा रहा है। अगर एसा है तो बन्द कीजिए सोनिया और राहुल जी भारत का नवनिर्माण। देश की जनता को क्या आप सभी ने बेवकूफ समझ रखा है। जब लालू यादव आंखें दिखाते हैं तो सीबीआई नकेल कसती है, जब वे हथियार डाल देते हैं तो सीबीआई खामोश हो जाती है। देश की संस्थाएं जिन उद्देश्यों को लेकर बनाई गईं थीं, उन्हें स्वतन्त्र कीजिए ताकि वे अपना काम मुस्तैदी से कर सकें। इन संस्थाओं को चाबी से चलने वाला खिलौना मत बनाईए कि जितनी चाबी आप भरें उतना ही चले यह खिलौना। क्या यही है हमारे आदर्श राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कांग्रेस। आज शासक, धनाड्य वर्ग अर्थात महलों और गरीब जनता यानी झोपडी के बीच फासला बहुत ज्यादा बढ गया है, जो दिल्ली में बैठे शासकों को दिखाई नहीं दे रहा है। समय रहते अगर इस खाई नहीं पाटा गया तो वह दिन दूर नहीं जब अपने अधिकारों के लिए जनता सडकों पर उतर आएगी।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को

कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को
आप भारत गणराज्य के जिम्मेदार मन्त्री हैं थुरूर साहेब
थुरूर को क्यों झेल रही है कांग्रेस!


(लिमटी खरे)

सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर और शशि थुरूर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हो चुके हैं। हालात देखकर लगता है कि आजाद भारत के गणराज्य में विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर सोते जागते बस टि्वटर के ही सपने देखते रहते हैं। उन्हें भारत सरकार के कामकाज से कोई खास लेना देना नहीं है। वे बस इस वेव साईट पर अपने प्रशंसकों से रूबरू होते रहते हैं। वे इस वेव साईट को प्रचार प्रसार का एक अच्छा माध्यम भी मानते हैं। हमने अपने पूर्व आलेखों में साफ तौर पर कहा था कि बदनामी से बचने के लिए भारत सरकार को टि्वटर खरीद लेना चाहिए, और अपने सारे के सारे काम काज इस पर ही निष्पादित करने चाहिए। पहली बार उंट पहाड के नीचे आता दिख रहा है। आईपीएल में लगे धन के मामले में जब ललित मोदी ने टि्वटर पर चीजें सार्वजनिक की तो थुरूर तिलमिला उठे।

आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी ने अपने टि्वटर के पेज पर जब आईपीएल में कोिच्च टीम के हिस्सेदारों के नाम उजागर किए तब हंगामा मचा। इस फेहरिस्त में ब्यूटीशियन सुनन्दा पुष्कर का नाम भी है। इस टीम को रोन्देवू स्पोर्टस क्लब ने 1533 करोड रूपए की बोली लगाकर खरीदा है। इसमें सुनन्दा की हिस्सेदारी सत्तर करोड रूपए बताई गई है, जिन्हें यह फ्री इक्वीटी के तौर पर दी गई है। इसमें 25 फीसदी रोन्देवू तो 19 फीसदी शेयर सुनन्दा के पास है। हाल ही में सुनन्दा शशि थुरूर की तीसरी बीवी बनने की खबरों की अफवाहों से चर्चा में आईं हैं। मोदी का आरोप है कि थुरूर के दबाव में यह हिस्सेदारी सुनन्दा को दी गई है।
 
केन्द्रीय मन्त्री जतिन प्रसाद के ब्याह से चर्चा में आईं हैं सुनन्दा पुष्कर। दरअसल जतिन की शादी में केन्द्रीय विदेश राज्यमन्त्री शशि थुरूर अपनी एक महिला मित्र के गले में हाथ डाले घूम रहे थे। यह महिला मित्र और कोई नहीं सुनन्दा पुष्कर ही थीं। वूमेन कालेज श्रीनगर से ग्रेजुएट सुनन्दा 2005 मेें टीकाम इंवेस्टमेंट कंपनी में सेल्स मैनेजर थीं। इसके बाद वे दुबई में जाकर निर्माण करोबार से जुड गईं थीं। सुनन्दा के पिता सेवानिवृत लेिफ्टनेंट कर्नल पीएन दास श्रीनगर जाकर सेटल हो गए थे। सुनन्दा दिल्ली के एक होटल में काम करती थी, तभी उसने कश्मीरी युवक से शादी की पर शादी परवान न चढ सकी और दोनों का तलाक हो गया। इसके बाद उसने दुबई में शादी की, सुनन्दा के पति की दिल्ली में सडक दुघZटना में मौत हो गई थी। अगर थुरूर की वे जीवन संगनी बनती हैं तो यह उनकी तीसरी शादी होगी। इसी तरह चर्चा है कि थुरूर भी अपनी सात समन्दर पार वाली पित्न से तलाक लेने वाले हैं सो थुरूर की भी यह तीसरी शादी होगी।
 
बहरहाल समूचे घटनाक्रम को देखकर एक बात साफ होने लगी है कि अपने जीवन का आधे से ज्यादा समय विदेशों में बिताने वाले शशि थुरूर के मन में लक्ष्मी के प्रति मोह हद से ज्यादा बढ चुका है। शशि थुरूर भूल जाते हैं कि वे अब ब्यूरोक्रेट नहीं हैं, आम नागरिक नहीं हैं, वे भारत गणराज्य के जिम्मेदार मन्त्री पद की आसनी पर हैं, जहां ये सारी बातें शोभा नहीं देती। शादी ब्याह करना, निभना न निभना उनका नितान्त निजी मामला हो सकता है, पर जहां तक रही रूपयों पैसों की बात तो उसमें कोई भी बात निजी नहीं रह जाती जबकि आप जनसेवक हों। आईपीएल में हो रही धनवषाZ से सभी उसकी ओर आकषिZत हो रहे हैं। क्रिकेट की दीवानी समूची दुनिया है। भारत में इसका जादू सर चढकर बोल रहा है। आईपीएल में पैसे बन रहे हैं। इस पर खेला जाने वाला सट्टा भी अरबों खरबों को पार कर गया है। क्या राजनेता, क्या उद्योगपति क्या रूपहले पर्दे के सितारे। सभी एक ही भाषा में राग अलाप रहे हैं। शाहरूक ने तो यह तक कह दिया कि अगर उनकी टीम जीती तो वे नंगे होकर स्टेडियम में नाच करेंगे। शाहरूक के बयान के बाद भी भारत सरकार चुप बैठी है। अरे भई हिन्दुस्तान संसकारों के कारण जाना जाता है, यहां नग्नता का कोई स्थान नहीं है। वैसे भी इस मर्तबा मामला कुछ फसव्वल वाला लग रहा है। सार्वजनिक पद पर बैठे एक जनसेवक खासकर जब वह भारत गणराज्य का जिम्मेदार मन्त्री हो तब उससे तो सटीक राजनैतिक आचरण, उत्तम चरित्र और जवाबदेही तथा पारदर्शिता की उम्मीद बेमानी नहीं होगी। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस मामले में शशि थुरूर का परफारमेंस ऋणात्मक ही रहा है। जिस तरह थुरूर एकाएक राजनैतिक परिदृश्य में आए और मन्त्रीपद की आसनी से नवाजे गए वह भारतीय राजनीति में ही सम्भव है। थुरूर जैसे गैर जिम्मेदार मन्त्री ने अब तक कभी भी परिपक्वता नहीं दिखाई है।
 
थुरूर कहते हैं कि मोदी ने गोपनीयता के नियमों का उल्लंघन किया है जिसमें कहा गया है कि आईपीएल की टीमों के मालिकों के बारे में कोई जानकारी उजागर न करने की शर्त रखी गई थी। सवाल यह उठता है कि जब पारदर्शिता का दायरा न्यायधीशों की कुर्सी तक पसर चुका हो तब पर्दे के पीछे के इन मालिकों के चेहरों के नकाब क्यों नहीं उतरना चाहिए। अगर इसमें मालिकों की गोपनीयता की शर्त रखी गई है तो जाहिर है कि इसमें गलत धंधों में लिप्त लोगों का पैसा लगा होगा तभी उन्होंने आईपीएल में इस तरह की शर्त रखवाई।
 
वैसे देखा जाए तो शशि थुरूर का विवादों से साक्षात्कार उनके मन्त्री बनने के बाद ही हुआ है। वैश्विक आर्थिक मन्दी के दौर में जब कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी ने दिल्ली से मुम्बई की यात्रा विमान में बीस सीट खाली छुडवाकर इकानामी क्लास में की तो शशि थुरूर ने इसके बाद टि्वटर पर टिप्पणी करते हुए इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) की संज्ञा दे डाली। विदेश दौरे से लोटने पर उन्होंने काम के बोझ की बात भी बात कही थी। बार बार चेताने के बाद भी थुरूर का टि्वटर प्रेम बरकार ही है। पता नहीं कांग्रेस उन्हें सहन क्योें कर रही है। भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की सौ गिल्तयों को माफ किया था, पर उसके बाद उसे दण्डित किया था। अब यह बात तो कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ही जाने कि वे थुरूर की कितनी गिल्तयों को सहने का प्रण ले चुकीं हैं।
 
इसी तरह ठहरे हुए पानी में कंकर मारकर लहरें पैदा करने वाले ललित मोदी भी कम विवादित नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में विदेश में पढाई के दौरान अमेरिका के डरहम काउंटी में जज द्वारा उन पर 1985 में चार सौ ग्राम कोकीन रखने और अपहरण करने का आरोप मढा गया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था, और प्ली बारगेन के माध्यम से सजा से बच गए थे। मोदी पर 2005 में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बनने के दौरान घालमेल करने का आरोप है। आईपीएल के दौरान भारत के सम्मान के प्रतीक तिरंगे पर शराब रखकर पिलवाने का मामला अभी पुलिस के पास विचाराधीन ही है। इसके अलावा भाजपा की वसुंधरा राजे की सरकार के कार्यकाल में उन पर भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से दुर्वयवहार के अनेक आरोप हैं। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी की तर्ज पर अब मोदी पर भी महिला मित्र का दांव फेंका गया है। बताते हैं कि मोदी ने अक्रीकी माडल ग्रेब्रीला दैमित्री का वीजा रद्द करवाने का प्रयास किया था। मोदी और इस माडल के सम्बंधों के बारे में अब तरह तरह की चर्चाएं आम होती जा रहीं हैं।
 
शशि थुरूर को बचाने अब उनके पक्ष में उनकी कथित प्रेयसी सुनन्दा पुष्कर आ गईं हैं। सुनन्दा का कहना है कि शशि थुरूर एक ईमानदार और उसूलों पर चलने वाले इंसान हैं। मीडिया में आईं खबरों के अनुसार सुनन्दा इस वक्त दुबई में हैं और वे टीम में उनकी हिस्सेदारी में थुरूर की कोई भूमिका है। उन्होंने कहा कि वे पहले कोलकता नाईट राईडर्स से जुडना चाह रहीं थीं, और अब अपनी सेवाएं केिच्च की टीम को दे रहीं हैं। उधर शाहरूख खान इस बात का खण्डन कर रहे हैं कि सुनन्दा ने कभी उनसे जुडने की पेशकश की थी।
 
इस मामले का सबसे गम्भीरतम पक्ष यह है कि विपक्ष ने आरोप लगाया है कि आईपीएल की टीम को खरीदने के लिए भारत गणराज्य के मन्त्री शशि थुरूर ने अपने पद का इस्तेमाल किया और उसके एवज में मिलने वाली मेहनताने (रिश्वत) को उन्होंने अपनी होने वाली पित्न सुनन्दा की झोली में डलवा दिया। शशि थुरूर और सुनन्दा चौधरी दोनों ही आपस में एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं यह बात पूरी तरह स्थापित हो चकी है। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो यह मामला एक मन्त्री द्वारा निजी लाभ के लिए पद के दुरूपयोग का है, नैतिकता के नाते प्रधानमन्त्री डॉ. मन मोहन सिंह को वापस लौटते ही तत्काल प्रभाव से थुरूर को पद से प्रथक कर देना चाहिए। कांग्रेस के पास यह एक अच्छा मौका है, थुरूर से पीछा छुडाने का।
 
यह मामला अब देश की सबसे बडी अदालत तक पहुंच चुका है। अधिवक्ता अजय अग्रवाल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि कोिच्च टीम को खरीदने के लिए कथित तौर पर हवाला के माध्यम से काले धन को इसमें शामिल किए जाने की आशंका है। अग्रवाल ने इस मामले में न्यायालय के विशेष जांच दल या फिर सीबीआई से इसे करवाने की गुहार लगाई है।
 
जानकारों का कहना है कि थुरूर मोदी विवाद के जरिए सियासी हिसाब किताब भी बराबर किए जा रहे हैं। इस विवाद के तार दरअसल कांग्रेस, भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस के क्रिकेट से जुडे नेताओं की बेटरी में जाकर ही मिल रहे हैं। इस विवाद को उर्जा वहीं से मिल रही है। कहा जा रहा है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कुछ दिग्गजों ने मोदी को शह दी है। ये सभी कोिच्च की टीम की इतनी अधिक बोली को पचा नहीं पा रहे हैं। इन बिग गन्स का सीधा सम्बंध मुम्बई और अहमदाबाद के अनेक कार्पोरेट घरानों से है।
 
दूसरी ओर भाजपा के साथ मोदी की गलबहिंयां देखकर कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रही है। कहा जा रहा है कि केरल की टीम के साथ वहां के लोगों का भावनात्मक लगाव है। केरल में अगले साल विधानसभा चुनाव भी हैं। यही कारण है कि शशि थुरूर के द्वारा अत्त मचाने के बाद भी कांग्रेस उन्हें गोदी में ही खिला रही है। कांग्रेस को भय है कि कहीं कोिच्च टीम के विवाद से राज्य में कांग्रेस के खिलाफ माहौल न बन जाए जिसका खामियाजा उसे अगले चुनावों में उठाना पडे। इसी के मद्देनज़र कांग्रेस अध्यक्ष ने विदेश मन्त्री एम.एस.कृष्णा और कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला दोनों को 10 जनपथ बुला भेजा। इसके बाद सोनिया ने अपने तारणहार प्रणव मुखर्जी को तलब किया है। इनके बीच शशि थुरूर को लेकर क्या रणनीति तय हुई यह तो वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी।