बुधवार, 16 जून 2010

करात के खिलाफ उग्र हो रहे असंतोष के स्‍वर


भारी होने लगा है प्रकाश करात का शनि

बार बार मुंह की खाने के बाद माकपा में भूकंप की आहट

बसी कढी में आ सकता है उबाल

येचुरी संभाल सकते हैं कमान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 जून। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी सेना की हार होती है, उसकी जवाबदेही उसके सेनापति पर ही आयत होती है। सेनापति से ही हर सैनिक हार की जिम्मेदारी लेने की उम्मीद रखता है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में भी इन दिनों कुछ इसी तरह के समीकरण बनते दिख रहे हैं। बार बार मुंह की खाने के बाद अब माकपा में हार के लिए जवाबदार सेनापति प्रकाश करात के खिलाफ रोष और असंतोष के स्वर मुखर होने लगे हैं। 1964 में अस्तित्व में आई माकपा से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी द्वारा करात की जडों में मट्ठा डालने की कवायद की जा रही है।

लोकसभा चुनावों में बुरी तरह मार खाने के बाद माकपा के अंदर असंतोष के बादल घुमडने लगे थे। उसके उपरांत वाम दलों के गढ रहे पश्चिम बंगाल में जिस तरह का चमत्कारिक परफारमेंस त्रणमूल कांग्रेस ने दिखाया है, उसने रही सही कसर पूरी कर दी है। माकपा की हालत देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि माकपा में इस बारिश में रोष और असंतोष के बादल फट सकते हैं, और उससे आने वाले सैलाब में माकपा के सबसे शक्तिशाली और कट्टरवादी समझे जाने वाले महासचिव प्रकाश करात इसमें बह सकते हैं।

लोकसभा में औंधे मुंह गिरने के उपरांत पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से माकपा बुरी तरह आहत है। माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि वैसे तो पश्चिम बंगाल में माकपा का खासा रसूख है, पर प्रकाश करात की हिटलरशाही के कारण पार्टी ने अपना आधार खो दिया है। उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली में हुई पार्टी की पोलित ब्यूरो की बैठक में इस बारे में गंभीर विचार विमर्श किया गया। मकपा की नीति निर्धारित करने वाली संस्था ‘‘पार्टी कांग्रेस‘‘ ने आरोप लगाया है कि प्रकाश करात ने पार्टी की निर्धारित लाईन से अलग हटकर अपनी मनमानी चलाकर पार्टी को रसातल में आने पर मजबूर कर दिया है। पोलित ब्यूरो ने इस मामले को काफी गंभीरता से लिया है।

जानकारों का कहना है कि प्रकाश करात की खिलाफत को पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी हवा दे रहे हैं। वैसे भी मकपा में 36 साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी महासचिव पर इतने संगीन आरोप लगे हों। यही कारण है कि अब तक इस तरह के आरोपों पर विचार के लिए केंद्रीय समिति की बैठक आहूत करने की आवश्यक्ता कभी नहीं पडी। इसमें केंद्रीय समिति के 85 सदस्यों के अलावा अन्य सूबों के 275 सदस्य शामिल होते हैं।

माकपा के सूत्रों का कहना है कि प्रकाश करात की सबसे बडी समस्या यह हो सकती है कि पश्चिम बंगाल की पार्टी की स्थानीय इकाई पहले से ही करात के खिलाफत मंे झंडा उठाए है। वर्तमान में करात के लिए यह संतोष की बात है कि माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई मौन साधे हुए है। कहा जा रहा है कि माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी दोनों ही माकूल वक्त का इंतजार कर रहे हैं।

अंतत: मीडिया ने दिखा ही दी ताकत


मीडिया तुझे सलाम

छब्बीस साल बाद ही सही कम से कम होश में तो आया मीडिया

तानाशाहों को अपनी ताकत का अहसास करवाया मीडिया ने

जनता आपके साथ फिर किस बात की चिंता

(लिमटी खरे)

कारपोरेट सेक्टर की लौंडी बना मृत्यु शैया पर पडा देश में प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ ‘मीडिया‘ के शरीर में अब कुछ हलचल दिखने लगी है। अब लगने लगा है कि किसी चिकित्सक की परीक्षण शैया पर पडे मीडिया के जीवित होने की कुछ उम्मीद है, वरना देश के मीडिया के लिए भी पुरानी फिल्मों के डालयाग की आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी थी, कि ‘‘अब दवा नहीं दुआ की जरूरत है।‘‘ मामला चाहे आरूषी का हो रूचिका का या फिर भोपाल की दिल दहला देने वाली भीषणतम गैस त्रासदी, हर मामले में मीडिया ने देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर तानाशाहों को उनकी औकात बताकर अपनी ताकत का अहसास करवाय। छब्बीस साल से खामोशी अख्तियार करने वाले मीडिया ने आखिर मुंह खोला और भोपाल गैस मामले में अंततोगत्वा देश के वजीरे आजम को मीडिया के सामने आकर प्रश्नों के जवाब देने पडे। यह एक सुखद शुरूआत के तौर पर देखा जाना चाहिए, वरना निहित स्वार्थों के चलते कारपोरेट सेक्टर के धनाड्यों ने अपने पैसों के बल पर मीडिया को खरीदकर पत्रकारों को जरखरीद गुलाम बनाकर रख दिया है। हमें तो अब खुद को पत्रकार कहने में शर्म महसूस होने लगी है। जब मीडिया के लोगों को अपने मालिकों के इशारांे पर ‘‘दलाली‘‘ करते पाते हैं तो लगता है बेहतर होता कि मीडिया में आने के बजाए वे किसी ‘‘परचून की दुकान‘‘ खोल लें, कम से कम पत्रकारिता को मिशन मानने वाले तो चेन से अपना काम कर पाएंगे।

बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य रहे कुंवर अर्जुन सिंह ने देश के मीडया मुगलों और उनकी देहरी पर नाक रगडकर उन्हें ‘‘साहेब सलाम‘‘ कहने वालों को जिस कदर उपकृत किया है, वह किसी से छिपा नहीं है। देश के हृदय प्रदेश में ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करने वालों के मुंह में कुंवर अर्जुन सिंह ने जिस खून को लगाया है, वह निश्चित तौर पर निंदनीय है। इसके उपरांत जितने भी जनसेवकों ने जैसा चाहा मीडिया ने उनकी छवि उसी के अनुरूप बनाई। ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों के लिए अब जगह ही नहीं बची है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज देश के बडे बडे घरानों में पत्रकारिता जनसेवा के स्थान पर लाभ कमाने का पेशा बन चुकी है। संपादक कंपनियों के मुख्य कार्यकारी या कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) की भूमिका में खडे हैं, तो संवाददाता या मीडिया कर्मी उनके एजेंट बनकर रह गए हैं, जो मालिकों के लिए लाभ कमाने का साधन बनकर रह गए हैं। घरानों के लिए ‘‘प्रिंट जाब‘‘, ठेका, सरकारी सप्लाई, मंत्रियों के साथ लाईजनिंग अब पत्रकारों का प्रिय शगल बन गया है। हमें तो आश्चर्य तब होता है जब घरानों के अखबारों के संपादक मंत्रियों या मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद उन्हें गुलदस्ता भेंट करने जाते हैं। मीडिया की अपनी एक साख होती है, एक आदर्श होते हैं। किसी को पुष्प गुच्छ भेंट करना कहीं से गलत नहीं है, पर चाटुकारिता के तहत यह करना उचित कदापि नहीं कहा जा सकता है।

रही बात जनसेवकों की तो जनसेवक आज एक दूसरे को नीचा दिखाने, निहित स्वार्थों के लिए अपने प्रतिद्वंदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में गुरेज भी नहीं करते। 1984 में भोपाल गैस कांड के उपरांत सूबे में मोतीलाल वोरा, दिग्विजय ंिसह के अलावा सुंदर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर, शिवराज सिंह चौहान आदि मुख्यमंत्री रहे। आज सुंदर लाल पटवा द्वारा कुंवर अर्जुन सिंह पर वार किया जा रहा है। मीडिया को उनके साक्षात्कार के वक्त यह पूछना चाहिए था कि आज आप जो आरोप कुंवर अर्जुन सिंह पर लगा रहे हैं, उस वक्त आपने अपनी चोंच बंद क्यों रखी थी, जब आप मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वह भी ढाई साल। तब आपने कुंवर अर्जुन सिंह, मोती सिंह, स्वराज पुरी आदि पर मुकदमा कायम क्यों नहीं करवा दिया। ये सभी तो कांग्रेस से उपकृत थे। आप भाजपा के मुख्यमंत्री थे, अगर आप वाकई आज घडियाली आंसू नहीं बहा रहे हैं तो आपको 1990 से 92 तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान इस बात को करना चाहिए था, वस्तुतः आपने नहीं किया, जाहिर है आप भी मोका परस्त की श्रेणी में खडे दिखाई दे रहे हैं।

आज भाजपा द्वारा मीडिया द्वारा मिस्टर क्लीन की उपाधि से नवाजे गए स्व.राजीव गांधी पर शक की सुई ले जाकर टिकाई जा रही है। यह बात उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात कि नेहरू गांधी परिवार के बिना कांग्रेस जिंदा नहीं रह सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस के प्रबंधकों ने बडी ही चतुराई से योजनाबद्ध तरीके से इटली मूल की सोनिया गांधी को कांग्रेस में सर्वशक्तिमान बनाकर प्रस्तुत कर दिया। भोपाल गैस मामले में भाजपा का ‘सोनिया प्रलाप‘ अनुचित नहीं है, क्योंकि सोनिया का कद आज इतना बडा हो चुका है कि उनकी छवि को डेमेज किए बिना भाजपा कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड सकती है। बस लोगों की समझ का ही फेर कहा जाएगा कि भाजपा की सरकार 1990 से 1992 और उसके बाद 2003 से अब तक मध्य प्रदेश में है, फिर आज शिवराज सिंह चौहान जो कदम उठा रहे हैं, वे कदम भाजपा की सरकार ने पहले क्यों नहीं उठाए। केंद्र में भी तीन मर्तबा अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व मे ंभाजपा आई फिर इस मामले में खामोशी का राज क्या था। क्यों अब तक भाजपा की सरकार तरफ से कुंवर अर्जुन सिंह को बचाया जाता रहा। क्यों तत्कालीन जिला कलेक्टर मोती सिंह और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी की खाल बचाई गई। सेवा निवृति के उपरांत स्वराज पुरी को इसी भाजपा सरकार ने लाल बत्ती से नवाजा, इसके पीछे क्या वजह रही! क्या भाजपाईयों में इतनी नैतिकता बची है कि वे इसका जवाब दे सकें। क्या कांग्रेस पलटवार कर भाजपा से यह प्रतिप्रश्न करने का माद्दा रखती है। इसका उत्तर नकारात्मक ही आएगा, क्योंकि भाजपा हो या कांग्रेस ‘‘हमाम में सब नंगे हैं‘‘ का जुमला सभी पर चरितार्थ होता है।

मीडिया ने पहली बार न्यायपालिका के खिलाफ भी धार पैनी की है। अनेक कारपोरेट घरानों के समाचार पत्रों ने आश्चर्यजनक रूप से देश के सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश ए.एम.अहमदी की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाकर किसी को चौंकाया हो या न हो हम तो इस कदम से हतप्रभ हैं। अमूमन न्यायपालिका के खिलाफ मीडिया जाने से गुरेज ही करता है। पहली मर्तबा जस्टिस अहमदी को 1996 में उनके फैसलों के लिए कटघरे में खडा किया गया है। यह सच है कि अमूमन सर्वोच्च न्यायालय आरोप तय करने के मामलें में अपने आप को बचाता है, पर इससे इतर भोपाल गैस कांड मामले में कोर्ट ने यह रूख नहीं अपनाते हुए आरोप तय किए। अब मामला उछल चुका है तो प्रजातंत्र के तीनों स्थापित स्तंभों की भद्द पिटना तय है।

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम को इसमें घसीटे जाने के बाद हरकत में आई कांग्रेस ने अब कुंवर अर्जुन सिंह का बचाव आरंभ कर दिया है, कांग्रेस को डर है कि अगर कहीं अर्जुन सिंह ने मुंह खोल दिया तो लेने के देने पड जाएंगे। अर्जुन सिंह उस वक्त मुख्यमंत्री थे, और कांग्रेस ने उन्हें उमर के इस पडाव में बहुत लज्जित किया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी का यह बयान हास्यास्पद ही कहा जाएगा कि 15 हजार लोगों को मौत के मुंह में भेजने और लाखों को बीमार बनाने के लिए जिम्मेदार वारेन एंडरसन को भोपाल की बिगडती कानून और व्यवस्था की स्थिति के मद्देनजर भोपाल से बाहर भेजा गया था। प्रणव मुखर्जी इस बात पर मौन हैं कि एक अभियुक्त को भोपाल के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी खुद ही सारथी बनकर तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के साथ बिठाकर हवाई अड्डे क्यों ले गए, एंडरसन को सरकारी विमान किस हैसियत से मुहैया करवाया गया। क्या वह व्हीव्हीआईपी था, नहीं तो किसके इशारे पर यह सब हुआ, क्या पंद्रह हजार से अधिक मौतों का मुआवजा कांग्रेस और भाजपा के जनसेवकों ने चुपचाप लेकर अपनी नैतिकता को बेच दिया!

अव्वल तो उस वक्त अफरातफरी के माहौल में कानून और व्यवस्था की एसी कोई मारामारी नहीं थी, चलिए एक बार मान भी लिया जाए कि कानून व्यवस्था की स्थिति के मद्देनजर एसा किया गया था, पर क्या प्रणव मुखर्जी इस बात पर प्रकाश डालेंगे कि उसे भोपाल से बाहर भेजा गया था तो वह फिर भारत के बाहर कैसे चला गया! क्या भोपाल गैस कांड के चलते देश में कानून व्यवस्था बिगडने का डर था जो वारेन एंडरसन को देश के बाहर भिजवा दिया गया। अरे प्रणव दा को कौन समझाए कि देश का आम नागरिक समझदार है और उसके मानस पटल पर न जाने कितने प्रश्न घुमडते ही रहते हैं। लगता है प्रणव मुखर्जी जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं हैं। एक मामूली से एक्सीडेंट करने पर आरोपी को पुलिस आदमी से गधा बना देती है, उसका तेल निकाल देती है, यहां जाओ, वहां जाओ, यह करो, जमानत दार लाओ, कागज लाओ, कार्बन लाओ, पेन लाओ, चाय पिलाओ, वगैरा वगैरा, फिर हजारों मौतों के जिम्मेदार और लाखों को बीमार करने वाले दोषी एंडरसन को मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ‘‘राजकीय अतिथि‘‘ जैसा सुलूक क्यों किया! ये सारे यक्ष प्रश्न आज भी निरूत्तर ही हैं।

सोनिया गांधी भले ही कांग्रेस की सर्वशक्तिमान नेता बन चुकीं हों, किन्तु उनके इर्द गिर्द बिना रीढ के लोग ही कब्जा जमाए बैठे हैं। यही कारण है कि कांग्रेस का ग्राफ दिनोंदिन नीचे आता जा रहा है। कांग्रेस ने 1984 गैस कांड के उपरंात इससे अपना पल्ला झााडने की कोशिश की। आजादी के उपरांत जनसेवकों में नेतिकता की कमी निरंतर बढती ही गई, आवाम ने इसको महसूस भी किया है। सत्ता पक्ष तो रीढ विहीन ही हो गया है, वस्तुतः 1984 में भी वही हुआ। सत्ता पक्ष खामोश रहकर अपने बचाव के ताने बाने बुनता रहा, किन्तु सबसे अधिक आश्चर्य तो विपक्ष पर है, आखिर विपक्ष की क्या मजबूरी थी कि वह सालों साल खामोश रहा। क्या यह माना जाए कि विपक्ष ने भी 15 हजार लोगों की मौत का सौदा यूनियन कार्बाईड से कर लिया! और तो और अटल बिहारी बाजपेयी सरकार में यूनियन कार्बाईड के हिन्दुस्तान के प्रमुख रहे केशुब महिंद्रा को पुरूस्कार से नवाजा। अब जनता ही कर सकती है भले बुरे का फैसला।

मृत्यु शैया पर पडे मीडिया के हाथ पांव में हरकत से कुछ उम्मीदें जगी हैं। भोपाल गैस कांड मामले में समूचा देश मीडिया की वाहवाही करते नहीं थक रहा है। हम यह कहना चाहते हैं कि जब देश का हर नागरिक आपके साथ है तो फिर देर किस बात की। अब मौका आ गया है कि कांग्रेस भाजपा और अन्य दलों के जनसेवकों के चेहरों से नकाब नोचकर फंेका जाए। अपने निहित स्वार्थों को तिलांजली देकर अब हम सब भारतीय एक हो जाएं और जनता को इन जनसेवकों की हकीकत से रूबरू करवाएं, कि पिछले 26 सालों में चुने हुए और गैर चुने हुए नुमाईंदों ने भोपाल गैस कांड के तंदूर पर क्या क्या नहीं सेंका, उन्हें उनकी मनचाही मुराद मिली होगी, पर नहीं मिल सका तो पीडितों को न्याय। अगर मीडिया ने यह कर दिखाया तो यह निश्चित तौर पर भोपाल गैस कांड में मारे गए सभी निर्दोष लोगों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजली होगी, और तब देश का हर नागरिक यही कहते मिलेगा -‘‘मीडिया, वी मस्ट सैल्यूट यू।‘‘

सोमवार, 14 जून 2010

हमारा महानगर रोजनामचा



ये है दिल्ली मेरी जान
 
(लिमटी खरे)

एंडरसन से बडे अपराधी हैं मोती सिंह
भोपाल गैस कांड के फैसले के बाद अब राजनैतिक फिजां में एक बार फिर गर्माहट महसूस की जाने लगी है। साल दर साल चुप्पी साधने के बाद अब सेवानिवृत लोगों की जुबानों के ताले टूटने लगे हैं। इसी क्रम में इस हादसे के वक्त भोपाल के तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी ने खुलासा किया है कि उन्होंने यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एण्डरसन को तत्कालीन मुख्य सचिव के कहने पर भोपाल से बाहर भेजा था, उसकी जमानत का इंतजाम भी मोती सिंह के प्रयासों से ही हुआ था। सवाल यह उठता है कि क्या उपरी दबाव में मोती सिंह ने जिला दण्डाधिकारी के पद की सारी वर्जनाएं तोड दी थीं। अगर उन्होंने एसा किया था तो क्या उन्होंने कागजों पर कहीं ‘‘उपरी दबाव‘‘ का जिकर किया था। जाहिर है नहीं किया होगा, वरना वह भी अब सामने आ चुका होता। जिला दण्डाधिकारी रहते मोती सिंह ने जो अपराध किया था, वह अक्षम्य अपराध की श्रेणी में है। केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि वह मोती सिंह के इस बयान के आधार पर ही भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी मोती सिंह के खिलाफ आपराधिक षणयंत का ताना बाना बुनने का मुकदमा दायर करे। जैसे ही मोती सिंह को आरोपी बनाया जाएगा, वैसे ही इस षणयंत्र के हिस्से रहे लोग कीडों की तरह बिलबिलाते सामने आ जाएंगे। हालात देखकर यह लगता है कि सारी हकीकत सामने आने के बाद भी कांग्रेस नीत केंद्र और भाजपा की राज्य सरकार इस मामले में महज रस्मअदायगी के कुछ नहीं कर रही है।
नेहरू गांधी परिवार को आडे हाथों लिया गडकरी ने
सवा सौ साल पुरानी और देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पर भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने जमकर बोछार की है। कांग्रेस अध्यक्ष पद को परिवार विशेष की संपत्ति बताते हुए उन्होंने कहा कि देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह जैसे सीनियर लीडर चाहकर भी कांग्रेस के अध्यक्ष पद को नहीं पा सकते हैं, क्योंकि यह एक खास परिवार के सदस्यों के लिए रिजर्व है। अपना खुद का उदहारण देते हुए गडकरी ने कहा कि वे दिल्ली के लोगों, यहां की सडकों को भी नहीं जानते हैं, और उनके जैसे सामान्य कार्यकर्ता को पार्टी के अध्यक्ष जैसा ताज पहनाया गया है, जिससे साफ हो जाता है कि भारतीय जनता पार्टी आज भी अपने उसूलों पर चल रही है, और यहां प्रजातंत्र जिन्दा है। वैसे गडकरी की बात मंे दम प्रतीत होता है, आजादी के उपरांत कांग्रेस के शासन में प्रधानमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष पद पर बिरले ही नेता होंगे जो वहां तक पहुंच पाए हों। सोनिया गांधी अगर सक्रिय राजनीति से सन्यास लेना चाहें तो उनके स्थान पर राहुल गांधी की ताजपोशी करने में कांग्रेस देर नहीं करने वाली।
शीला के मुंह लगना नहीं चाहते शिवराज
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के बाद गृह मंत्री का पद खोने वाले पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल की मुश्किलें दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित ने खासी बढा दी हैं। एक निजी टीवी चेनल पर अफजल के मामले में चर्चा के दौरान शीला ने कहा था कि हो सकता है, आप जो सोच रहे हों वह सही हो, ममला केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा अफजल को बचाने से संबंधित था। गृह मंत्रालय के 16 स्मरण पत्रों के उपरांत दिल्ली सरकार ने अफजल से संबंधित फाईल को एलजी यानी दिल्ली के राज्यपाल के पास भेजी है। शीला के द्वारा इशारों ही इशारों मेें जब तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल पर निशाना साधा गया है। इस मामले में बीते दिनों जब पंजाब के लाट साहेब शिवराज पाटिल से जब प्रतिक्रिया जाननी चाही गई तो उन्होंने दू टूक शब्दों में यह कहकर अपना पल्ला झाड लिया कि वे किसी के साथ ‘‘तू-तू, मैं-मैं‘‘ में नहीं पडना चाहते। पाटिल जानते हैं कि अगर उन्होंने कुछ भी कहा तो शीला दीक्षित के तेवर और भी तल्ख हो सकते हैं, जो आने वाले समय में पाटिल के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं।
साथियों से उलझना जयराम की फितरत
पहले कमल नाथ के साथ तलवारें भांज चुके केद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री इन दिनों कोयला राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायस्वाल के साथ जोर अजमाईश में व्यस्त हैं। जयराम रमेश ने कोयला खदानों को ‘‘गो एरिया‘‘ और ‘‘नो गो एरिया‘‘ में बांट दिया है। जायस्वाल चाहते हैं कि नो गो एरिया में उत्खनन के बदले वे कंपनसेटरी फारेस्ट लगाकर इसकी भरपाई कर देंगे, किन्तु जयराम रमेश हैं कि मानते ही नहीं। हारकर जायस्वाल ने पूरे प्रकरण का विस्त्रत नोट बनाकर प्रधानमंत्री को प्रेषित कर दिया है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने जयराम रमेश को इसकी समीक्षा करने को कहा, तो जयराम रमेश ने समीझा के पहले ही अपनी नीति के पक्ष में ठोस तथ्य पेश कर प्रधानमंत्री को संतुष्ट कर दिया। सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि अब प्रधानमंत्री दोनों ही मंत्रियों को साथ बिठाकर बात करने वाले हैं। नो गो एरिया में 48 फीसदी खदानें आती हैं जिसमें 619 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है। इससे केंद्र को 20 हजार करोड रूपए का नुकसान और एक लाख से अधिक मजदूरों का रोजगार छिनने की उम्मीद है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के नियम कायदों को समझकर जयराम रमेश ने अन्य सभी मंत्रालयों पर काबिज मंत्रियों के होश उडाकर रख दिए हैं।
शेषाद्रि के निशाने पर गडकरी
भाजपा के नए निजाम अपनी छःमाही भी नहीं पूरी कर पाए कि उनके खिलाफ असंतोष के स्वर प्रस्फुटित होने लगे हैं। राज्यसभा में टिकिट का बंटवारा गडकरी के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। संघ के मुखपत्र आर्गेनाईजर के संपादक रह चुके शेषाद्रिचारी ने मुखर होकर गडकरी पर निशाना साधा है। यह पहला मौका है, जब पार्टी के अध्यक्ष के खिलाफ किसी ने सार्वजनिक तौर पर मोर्चा खोला हो। शेषाद्रिचारी का मानना है कि गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद जमीनी कार्यकर्ता उपेक्षित और मायूस है, पार्टी की छवि वैसी नहीं बन पा रही है, जैसी होना चाहिए। तरूण विजय को टिकिट देने का खुला विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि दो चार पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखने वाले को टिकिट देने का वे विरोध करते हैं। गडकरी के करीबी सूत्र भले ही यह कह रहे हों कि शेषाद्रिचारी को राज्यसभा का टिकिट न मिल पाने से खफा होकर अर्नगल प्रलाप कर रहे हों, पर शेषाद्रिचारी ने मुखर विरोध कर पुरानी कहवात यहां चरितार्थ करने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं, ‘‘बुढिया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है कि मौत ने घर देख लिया।‘‘
भरपूर चिकित्सक फिर भी सरकार लाचार
देश में चिकित्सक उत्पादन का खासा माहौल है। जहां तहां निजी और सरकारी आयुर्विज्ञान, आर्युवेदिक, होम्योपैथिक, यूनानी पद्यति वाले कालेज हर साल न जाने कितने चिकित्सक उगल रहे हैं, फिर भी सरकार के पास चिकित्सकों का टोटा साफ दिखाई दे रहा है। इसका कारण सरकार की गलत और अदूरदर्शी नीतियां ही हैं। सरकारी आंकडों पर अगर नजर दौडाएं तो पता चलता है कि देश में कुल साढे पांच लाख चिकित्सक हैं जिसमें साढे छः लाख चिकित्सकों की कमी है। देश में 34 हजार एमबीबीएस, 19 हजार एमडी या एमएस की सीट हैं। देखा जाए तो तीन हजार की आबादी पर एक चिकित्सक मौजूद है। चिकित्सकों की कमी को देखते हुए केद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि चिकित्सकों की सेवानिवृति की आयु को बढाकर 65 साल कर दिया जाए। अरे आजाद साहेब को कौन समझाए कि इससे कुछ नहीं होने वाला, चिकित्सा शिक्षा पूरी होने के उपरांत चिकित्सकांे का पंजीयन तब किया जाए जब वे एक साल तक गांव में अपनी सेवाएं दे दें। अगर एसा होगा तो हर साल लगभग चोंतीस हजार चिकित्सक देश के गांव में मरीजों के लिए उपलब्ध रहेंगे।
देश भर में चल रहे हैं चिडिया कौआ
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने खजूर के झाडों के बीच में उगते सूरज के स्टीकर लगाकर चलने वाली गाडियों को पकडकर रहस्योद्याटन किया है कि एक गिरोह दिल्ली यातायात पुलिस की मदद से भारी व्यवसायिक वाहनों से वसूली में रत था। देखा जाए तो देश भर में इस तरह का कारोबार फल फूल रहा है। हर एक ट्रक या बस चालक के पास छोटी सी डायरी अवश्य होती है, जिसमें उसके रूट में पडने वाले थानों के कर्मचारी, यातायात पुलिस और परिवहन विभाग के मातहत अपने अपने तरीके से हर माह की अलग अलग निशानी के स्टीकर या फिर एसे हस्ताक्षर कर देते हैं मानो चिडिया कौआ उड रहे हों। देश में बिना वैध परमिट, अनुज्ञा, कर चोरी के साथ ही साथ ओव्हर लोडिंग का कारोबार इसी आधार पर जमकर हो रहा है। एसा नहीं कि देश और सूबों के शासकों विशेषकर परिवहन मंत्रियों को इस बात की जानकारी न हो, बावजूद इसके इस तरह की लाबी जबरिया वसूल पर लगी हुई है। सूबों की परिवहन जांच चौकियां दलालों के हवाले हैं। इन चौकियों में अपनी कद काठी से उंचा लट्ठ रखकर गुण्डों की फौज खडी दिखाई दे जाती है। मजे की बात तो यह है कि देश भर की जांच चौकियों से बाकायदा ‘‘चौथ‘‘ की राशि नेता, जनसेवक, प्रशासन, पुलिस के साथ ही साथ प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ ‘‘मीडिया‘‘ को भी निर्बाध रूप से पहुंचती है, यही कारण है कि इनका धंधा फल फूल रहा है।
अब एलजेपी की अग्निपरीक्षा
17 जून को होने वाले राज्यसभा के चुनावों में एलजेपी और उसके सर्वेसर्वा राम विलास पासवान दोनों ही की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। बिहार में पांच सीटों के लिए चुनाव होना है, छः उम्मीदवार मैदान में हैं। 243 सदस्यीय विधान सभा में जडीयू के 82, आरजेडी के 56, भाजपा के 54, एलजेपी के 12, कांग्रेस के 10, सीपीआई माले और बीएसपी के पांच पांच, सीपीआ्र के तीन और सीपीएम और एनसीपी के एक एक सदस्यो के साथ ही साथ निर्दलीय विधायकों की संख्या 12 है। इसके साथ ही जो परिदृश्य सामने आ रहा है, उसके अनुसार जेडीयू और भाजपा के तीन, आरजेडी के एक का जीतना तय है। मामला पांचवी सीट का फंसा है, जिसके लिए राम विलास पासवान और कर्नाटक के व्यवसाई बी.जी.उदय मैदान में हैं। पासवान के पास 12 वोट हैं पर उन्हें आवश्यक्ता है 41 की। उदय निर्दलीय के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव हार चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री पासवान को औकात दिखाने के चलते अनेक राजनैतिक धुरंधरों ने उदय को बेक करना आरंभ कर दिया है। बिहार में कांग्रेस अकेले ही विधानसभा रण में उतरना चाह रही है, इसीलिए पासवान का समर्थन न करने के अनेक कारण भी आलाकमान को गिना दिए गए हैं।
कुछ क्लिंटन ने दिया कुछ ओबामा देंगे
दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रेजीडेंट बराक ओबामा जल्द ही भारत की यात्रा पर आ सकते हैं। भारत सरकार इस बात के लिए अंदर ही अंदर खुश हो रही है कि उसका सौभाग्य है कि दुनिया का चौधरी अमेरिका का पहला नागरिक ‘‘अंकल सेम‘‘ उसका आथित्य स्वीकार कर उसे कृतार्थ करने वाला है। गौरतलब है कि इसके पूर्व जब तत्कालीन अमेरिकी प्रेजीडेंट बिल क्लिंटन भारत दौरे पर आए थे, तब उनके सुरक्षा तंत्र को लेकर भारत में खासा बवाल कटा था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर क्लिंटन के जाने के पूर्व उनके सुरक्षा दस्ते के श्वानों ने तलाशी ली थी। कुत्ता तो कुत्ता ही होता है, भले ही वह महामहिम की सुरक्षा व्यवस्था में क्यों न काम कर रहा हो। हो सकता है कि समाधि में सूंघते सूंघते उसने कहीं टांग ही उठा दी हो। क्लिंटन के उस भारत दौरे के बाद हिन्दुस्तान को कुछ खास हासिल नहीं हो सका था, अब देखना यह है कि बराक ओबामा हिन्दुस्तान की यात्रा पर आने के बाद क्या सौगात दे पाते हैं।
खाली खजाना जनसेवकों पर लुटाया शिवराज ने
मध्य प्रदेश सरकार के खजाने में पर्याप्त धन नहीं है, यही कारण है कि सूबे में करारोपण की गति तेज हो गई है। पिछले डेढ दशक में मध्य प्रदेश की माली हालत जर्जर हो चुकी है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। एक के बाद एक निगम में तालाबंदी के आसार नजर आ रहे हैं। इस खाली खजाने को सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने अपने विधायकों पर लुटाना आरंभ कर दिया है। विधायकों का वेतन 35 हजार से बढाकर 50 हजार रूपए, निशुल्क बस यात्रा के बदले हर माह ढाई सौ रूपए बस भत्ता भी दिया जाएगा। सूबे में मंत्री का वेतन बासठ हजार, राज्य मंत्री का वेतन साठ हजार, विधानसभा अध्यक्ष का साठ हजार तीन सौ तो विधानसभा उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष का वेतन सत्तावन हजार है। इसके पहले 3 अक्टूबर 2007 को विधायकों का वेतन बढाया गया था। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि आना फ्री, जाना फ्री, रहना फ्री, बिजली फ्री, सब कुछ फ्री फिर वेतन जबर्दस्त। विधायक चाहे किसी भी दल के हों पर इस मामले में किसी ने भी यह आवाज नहीं उठाई कि सब कुछ फ्री होने पर वेतन बढाने का क्या ओचित्य! विधायकों के बढे वेतन की राशि अगर गरीबों के कल्याण में खर्च की जाती तो बात ही कुछ ओर होती।
सुराज अधिवेशन को संभाला स्वराज ने
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए भाजपा के सुराज अधिवेशन पर शनि की काली छाया पड ही गई। इस सम्मेलन में पहुंचे भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के मुंह का जायका अवश्य ही बिगडा होगा। दरअसल अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ चुनाव लडने वाले राम जेठमलानी, पत्रकार तरूण विजय, व्यवसाई अजय मारू को टिकिट देने से भाजपा के अनेक धडे नाराज हैं। इस अधिवेशन के अंतिम दिन राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी, निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह, यशवंत सिन्हा ने अधिवेशन को संबोधित ही नहीं किया। राजनाथ बच्चों के एक प्रोग्राम तो यशवंत सिन्हा एयरपोर्ट से ही वापस लौट गए। अरूण जेतली और गोपीनाथ मुंडे ने भी अधिवेशन की ओर रूख करना मुनासिब नहीं समझा। बात बिगडती देख लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला और समापन भाषण में गांधीगिरी को अपनाने की बात कहकर माहौल को हल्का किया।
पता नहीं चलेगा कि पीएम ने थरूर को लताडा या नहीं
प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने अपने बडबोले मंत्री शशि थरूर के त्यागपत्र के एन पहले हुई मुलाकात में उनसे क्या बातचीत की, उन्हें लताडा, पुचकारा या क्या कहा इस बात के बारे में देशवासी कुछ भी नहंी जान सकेंगे। दरअसल सूचना के अधिकार के तहत अभिषेक शुक्ला नामक युवक ने प्रधानमंत्री कार्यालय से 17 से 19 अप्रेल के बीच प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर के बीच हुई चर्चा का ब्योरा मांगा था। प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस मुलाकात के ब्योरे को देने अथवा सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है। पीएमओ के अनुसार जिन भेंटवार्ताओं मंे देश की संप्रभुता, अखण्डता, सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक और आर्थिक हितांे और दूसरे देशों के साथ बातचीत की जाती है, उनका ब्योरा सूचना के अधिकार के तहत नहीं दिया जा सकता है। अब यह बात तो प्रधानमंत्री ही जाने या थरूर के दोनों के बीच किस लाभ हानि की शर्त पर थरूर ने अपना त्यागपत्र दिया था।
पुच्छल तारा
मध्य प्रदेश में लोग बिजली की घोषित और अघोषित कटौती से बुरी तरह परेशान हैं। होशंगाबाद जिले के इटारसी से विपिन सिंह राजपूत ने ईमेल भेजकर देश के हृदय प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर कटाक्ष किया है। विपिन लिखते हैं -‘‘मध्य प्रदेश की एक सच्ची कहानी सुनिए। एक लडकी और एक लडका आपस में बहुत प्रेम करते थे। जैसे ही इस बात का पता लकडी के पिता को चला, उसने लडके को पकडकर बुलवाया। लडका जैसे ही आया, लडकी के पिता ने उसे लिटाकर बिजली से चलने वाली आरी उसके गले पर रख दी। चलती आरी जैसे ही लडके के गले के करीब पहुंची लडके के प्रांण गले में अटक गए। मगर यह क्या, तभी लाईट चली गई। लडके ने जोर से नारा लगाया -‘‘शिवराज सिंह चौहान, जिन्दाबाद।‘‘

ये है मोबाईल कंपनियों का हाल सखे



रविवार, 13 जून 2010

patna bjp

अब लगेंगे शिकायत के भी पैसे!

मोबाईल सेवा प्रदाता मचा रहे लूट
सरकार ने आंख पर बांध रखी है पट्टी

सावधान! टोल फ्री के चक्कर में लुट न जाना

(लिमटी खरे)

बाजार में बिक रही वस्तुओं में छोटा सा स्टार लगाकर शर्तें लागू का प्रचलन आज का नहीं बरसों पुराना है, ताकि उपभोक्ता उन पर किसी तरह का क्लेम न कर सके। हाल ही में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने भी अपने उपभोक्ताओं को लूटने की नई योजना पर काम करना आरंभ कर दिया है। अगर आप अपनी मोबाईल की सेवा में काल ड्राप, नेटवर्क कंजेशन, या अन्य किसी समस्या से परेशान हैं और आप अपने सेवा प्रदाता के कस्टमर केयर के पास अपनी शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं, तो थोडा रूकिए, अब ये काल पहले की तरह निशुल्क नहीं हैं, इन पर अब पचास पैसा प्रति काल की दर से चार्ज किया जाने लगा है।

ठगा उपभोक्ता जब अपना मोबाईल का बेलेंस चेक करता है तो वह हर बार के पचास पैसे कम पाता है। उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज कराए तो किसके पास और अब तो शिकायतें भी सशुल्क हो गईं हैं। अपने स्वार्थाें, वेतन भत्तों और सुविधाओं को बढाने वाले जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि उपभोक्ता पर क्या गुजरेगी। देश और सूबों की सरकारों का बस अगर चले तो वे तो पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराने पर बाकायदा शुल्क लेकर रसीद काटना भी आरंभ कर दे। वैसे भी अस्पतालों में रोगी कल्याण और अन्य निधियों में बाकायदा शुल्क लेकर पर्ची दी जाती है, इतना ही नहीं उसी काउंटर के उपर लिखा होता है -‘‘इस अस्पताल में इलाज का कोई पैसा नहीं लिया जाता है।‘‘

बहरहाल मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों का यह प्रयास निश्चित तौर पर उन्हें सुकून देने में काफी हद तक सहायक साबित होगा। अपने लक्ष्य के लिए मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां तरह तरह की आकर्षक योजनाओं का प्रलोभन देकर उपभोक्ताओं को फंसाने से नहीं चूकतीं हैं, बाद में जब उपभोक्ता कंपनी की सेवाओं से उकता कर हलाकान हो जाता है, तब वह कंपनी के कस्टमर केयर में अपनी शिकायत दर्ज कराने के पहले सौ मर्तबा सोचेगा, कि उसकी शिकायत का पैसा भी उसे भरना होगा। सीधा से बिजनिस का फंडा है जितनी खराब सेवाएं, उतनी अधिक शिकायतें और जितनी अधिक शिकायतें उतनी सेवा प्रदाता कंपनी की कमाई।

सरकार और मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों की इस अंधेरगर्दी में टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) ने भी अपनी सहमति जताकर देश के करोडों मोबाईल उपभोक्ताओं की जेब पर सेवा प्रदाता कंपनियों को डाका डालने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं, जो अनुचित ही है। सेवा प्रदाता कंपनियों के खराब नेटवर्क की समस्या और सर्विस से जूझता उपभोक्ता आखिर अपनी शिकायत लेकर जाए तो जाए कहां। क्या ट्राई को यह नहीं मालुम कि उपभोक्ता द्वारा सेवा प्रदाता कंपनियों के कस्टमर केयर में घंटों ‘‘आप कतार में हैं‘‘ का केसट सुनकर दूसरी ओर से आने वाली मधुर आवाज सुनने या उनसे बतियाने के लिए अपना समय खराब नहीं किया जाता है। कुछ सेवा प्रदाता कंपनियों के कस्टमर केयर में बैठे कारिंदे तो आपके द्वारा कही बात को ही दुहरा कर आपकी सहन शक्ति की परीक्षा लेने का प्रयास भी करते हैं। ट्राई की सहमति पर आश्चर्य इसलिए है कि बिना उपभोक्ताओं का पक्ष सुने वह अपनी सहमति कैसे दे सकती है।

मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों का यह कहना कि कस्टमर केयर में आने वाले अस्सी फीसदी काल बेकार होते हैं, एकदम बकवास है। आज के दौडते भागते युग में किसे इतनी फुर्सत है कि वह आधे पोन घंटे तक अपने मोबाईल को इंगेज रखकर सेवा प्रदाता कंपनी के कस्टमर केयर से बात करेगा। इसी आधार पर सेवा प्रदाता कंपनियों ने अब तक के अपने प्रचारित टोल फ्री नंबर्स को बिना किसी उदद्योषणा के सशुल्क बना दिया है। अनेक उपभोक्ताओं को तो इसका भान ही नहीं है कि कस्टमर केयर पर बात करना अब सशुल्क हो गया है।

एसे तो मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां अपने उत्पादों या योजनाओं के बारे में अपने उपभोक्ताओं को हर दस मिनिट में एक एसएमएस भेजकर परेशान करती रहती हैं, पर इतने बडे फैसले के उपरांत उसे लागू करने के बाद भी सरकारी उपक्रम बीएसएनएल, एमटीएल सहित निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने एक भी एसएमएस भेजने की जहमत नहीं उठाई है। इस मामले में सरकार के साथ ही साथ ट्राई की चुप्पी आश्चर्यजनक ही कही जाएगी।

सरकार और टेलीकॉम रेग्युलेटरी अर्थारिटी को चाहिए कि पहले से लुटे पिटे उपभोक्ता को लूटने के सारे रास्ते बंद करने हेतु इस मसले पर एक बार फिर गंभीरता से विचार करे। उपभोक्ताओं की शिकायतों को निश्चित समयावधि में सुनकर उनके निपटारे की व्यवस्था सुनिश्चित किया जाना अत्यावश्यक है, वरना आने वाले समय में मोबाईल उपभोक्ताओं के बीच सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ ही साथ ट्राई की साख बिगडते देर नहीं लगेगी।

यह क्‍या हो रहा है चिदम्‍बरम जी

घुसपेठ के मामले में अव्वल रहा 2009

गृह मंत्रालय की आंतरिक रिपोर्ट में खुलासा

पाक में आतंकी मजबूत हुए

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 जून। देश को अस्थिर करने के मामले में पडोसी देश पाकिस्तान की करतूतों में तेजी से इजाफा हुआ है। पिछले साल पाकिस्तान की ओर से आने वाले घुसपैठियों की तादाद में रिकार्ड इजाफा हुआ है। भारत की सीमा पर चोकस सिपाही भी इन घुसपैठों को रोकने में नाकामयाब रहे हैं। पाकिस्तान में आतंकवादियों ने अपने ठिकानों को बहुत सशक्त, समृद्ध और सुरक्षित बना लिया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की आंतरिक रिपोर्ट कुछ इसी तरह का खुलासा कर रही है। आंतरिक प्रतिवेदन में कहा गया है कि पकिस्तान की ओर जम्मू काश्मीर के रास्ते घुसपैठ को जबर्दस्त बढावा दिया जा रहा है। मंत्रालय के सालाना प्रतिवेदन में कहा गया है कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने का काम अनवरत जारी है। वर्ष 2008 में जहां घुसपैठ की घटनाएं 342 थी, वह 2009 में बढकर 485 हो गई है।

प्रतिवेदन इशारा कर रहा है कि पिछले सालों की तुलना में देश में अशांत करने की कवायद कुछ ज्यादा ही हुई है। इसमें हिंसक घटनाओं की संख्या बढी है। इतना ही नहीं नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों को मौत के घाट उतारने की वारदातों में इजाफा हुआ है। इसकी चपेट में नक्सलप्रभावित सूबे विशेषकर आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उडीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र इनके निशाने पर रहे हैं।

मजे की बात तो यह है कि इतना सब होने के बाद भी केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह वार्षिक प्रतिवेदन स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण में ही बता रहा है। देश में विदेशी ताकतें आकर तांडव मचा रही हैं। देश की आर्थिक राजधानी पर अब तक का सबसे बडा आतंकी हमला होता है, संसद पर हमले होते रहे हैं। नक्लसवादी पूरे शबाब पर हैं, अमन चेन कहीं नही है, फिर भी पलनिअप्पम चिदंबर के नेतृत्व वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय स्थिति नियंत्रण में बताकर बरगलाने से नहीं चूक रहा है।

500वीं पोस्‍ट

मतलब आडवाणी ने किया था बाजपेयी को कमजोर!
जेठमलानी के मामले में होने लगे हैं खुलासे

. . . तो आडवाणी के कहने पर खडे हुए थे जेठमलानी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 जून। प्रसिद्ध अधिवक्ता राम जेठमलानी को राज्यसभा का टिकिट देने के मामले में भारतीय जनता पार्टी में विद्रोह के स्वर मुखर होने लगे हैं। अब भाजपाई दबी जुबान से राम जेठमलानी और बाजपेयी की युती के चलते पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के मौखटा रहे अटल बिहारी बाजपेयी के बीच खुदी खाई के बारे में नित नए तथ्यों को उजागर करते जा रहे हैं। अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ 2004 में निर्दलीय के तौर पर चुनाव लडने वाले जेठमलानी के बारे में असंतोष और रोष की स्थिति गहराती ही जा रही है।

भाजपा में चल रही बयार के अनुसार राम जेठमलानी सिंधी समाज के होने के बाद भी गांधीनगर से आडवाणी के खिलाफ चुनाव मैदान में नहीं उतरे जबकि गांधी नगर और गुजरात में सिंधी समाज के लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है। इससे उलट वे 2004 में अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ लखनउ से चुनावी समर में उतरे थे। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि आडवाणी और जेठमलानी की युती के चलते जेठमलानी ने अटल बिहारी के खिलाफ चुनाव मैदान में कमान संभाली थी।
भाजपा के सूत्रों की माने तो राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी पिछले कुछ सालों से राम जेठमलानी पर खासे महरबान हैं। इस बार भी उन्हें राज्यसभा के रास्ते संसदीय सौंध तक पहुंचाने में आडवाणी ने एडी चोटी एक कर दी। आडवाणी ने दांव फेंका था कि जेठमलानी को मध्य प्रदेश से राज्य सभा में भेजा जाए, किन्तु सुषमा स्वराज और शिवराज के विरोध के चलते आडवाणी की चल नहीं पाई।

आडवाणी के करीबी सूत्रों का दावा है कि इसी महीने पांच तारीख को एक नेता नुमा व्यक्ति ने आडवाणी के आवास से बाबू लाल मरांडी को फोन पर इस बात के लिए तैयार किया जा रहा था कि अगर मरांडी सहयोग करें तो जेठमलानी को झारखण्ड से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार राज्य सभा में पहुंचाया जा सकता है। इस पर मरांडी ने साफ इंकार कर दिया था। जेठमलानी पर मेहरबान आडवाणी ने अंततः सभी के पुरजोर विरोध के बावजूद भी जेठमलानी को राजस्थान से भाजपा का घोषित उम्मीदवार बनवाने में सफलता हासिल कर ही ली।

एसा नहीं कि आडवाणी की इन चालों का अटल बिहारी बाजपेयी को भान न हो। 2006 में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री केलाश जोशी की पुस्तक ‘‘अध्यक्ष जी‘‘ के विमोचन समारोह में जब एल.के.आडवाणी भाषण देने खडे हुए उस वक्त अटल बिहारी बाजपेयी लघु शंका को बाहर गए थे। वापस आने पर जब उनकी बारी आई तो उन्होंने इशारों ही इशारों में कहा था कि उनके पहले आडवाणी ने उद्बोधन में क्या कहा उन्हें नहीं पता, पता नहीं आडवाणी कब क्या कह जाते हैं। अटल की इस बात से आडवाणी की पेशानी पर बल साफ दिखाई दे रहे थे।

अटल को भूली भाजपा



शुक्रवार, 11 जून 2010

पटना बनेगा भाजपा का अखाडा

पटना में फट सकता है नेताओं का आक्रोश
विवादित मुद्दों पर चलेंगी तलवारें

असंतुष्ट निकालेंगे भडास

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 11 जून। भारतीय जनता पार्टी की पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हंगामेदार होने के आसार नजर आ रहे हैं। शनिवार 12 जून को आहूत दो दिवसीय बैठक के लिए असंतुष्टों की तैयारियों को देखकर पार्टी के आला नेताओं के होश उडे हुए हैं। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि इस बैठक में अनेक विवादस्पद मुद्दों पर तल्ख बहस होने की उम्मीद है। गौरतलब है कि नितिन गडकरी के पार्टी की कमान संभालने के बाद हाशिए में आए नेताओं और नए नवेले नेताओं की मुगलई से त्रस्त नेताओं ने एक दूसरे को लामबंद करना आरंभ कर दिया था। सभी को उचित मोके की तलाश थी जो शनिवार को पटना में मिलने जा रहा है।

हाल ही में राज्य सभा चुनावों में संसदीय बोर्ड के असहमत होने के बाद भी वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी को टिकिट दिए जाने से अटल बिहारी बाजपेयी खेमा बुरी तरह आहत है। जेठमलानी पूर्व में अटल बिहारी के खिलाफ चुनाव तक लड चुके है। इसके साथ ही साथ पत्रकार तरूण विजय को पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा से भेजने का विरोध संघ के ही वरिष्ठ प्रचारक शेषाद्रि चारी ने किया था। इस मामले में चारी ने अपनी नाराजगी से गडकरी को भी आवगत कराया जा चुका है।

जाति आधारित जनगणना के मामले में एक धडा इसे सही बता रहा है, तो दूसरा इसकी खिलाफत में एडी चोटी एक किए हुए है। इस मसले पर भाजपा के नीति निर्धारकों का धडा परोक्ष तौर पर अपनी सहमति दे चुका है, किन्तु इस मामले में संघ ने अपना विरोध जताया है। भाजपा आलाकमान के सामने अब मुश्किल यह है कि अगर इस मसले पर पार्टी मंच पर चर्चा होगी तब भाजपा क्या स्टंेड लेगी, यह तय नहीं है, एक ओर संघ विरोध में खडा है तो दूसरी ओर भाजपा के आला नेता इसके पक्ष में हैं।

भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पटना में इस अधिवेशन को कराने के पीछे यह तर्क था कि इस साल के अंत में बिहार को चुनावी दौर से गुजरना है, और इसी बहाने बिहार में भाजपा को संगठित करने का मौका मिलेगा, किन्तु जमीनी हकीकत देखकर लगने लगा है कि बिहार में भाजपा संगठन में एकता के बजाए सम्मेलन में फैलने वाली गुटबाजी की आशंका के चलते बिखराव की उम्मीद ज्यादा है। इस सम्मेलन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नवोदित फायर ब्रांड गांधी ‘‘वरूण फिरोज गांधी‘‘ की अगली भूमिका को लेकर भी संदेह बना हुआ है।

पाक का कारनामा

गुरुवार, 10 जून 2010

गैस कांड पर जिम्‍मेदारी से भागती कांग्रेस


गैस कांड पर कांग्रेस को तोडना होगा मौन!

अब बढेगी अर्जुन सिंह की पूछ परख

उपेक्षा से आहत अर्जुन उठा सकते हैं गांडीव

उघडती जा रही हैं षणयंत्रों की परतें

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

(लिमटी खरे)

छब्बीस साल पहले जब देश के हृदय प्रदेश में दुनिया की सबसे बडी औद्योगिक त्रासदी हुई थी, उस वक्त कांग्रेस के बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह इस सूबे के निजाम हुआ करते थे। यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को रातों रात भोपाल से भगा देने के षणयंत्र पर से धीरे धीरे पर्दा उठता जा रहा है। उस दौरान का प्रशासनिक अमला अब अपनी बंद जुबान खोल रहा है। तथ्यों के सामने आने से सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का रक्तचाप एकाएक बढ गया है। कांग्रेस की धुरी पिछले कुछ सालों से नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू सोनिया गांधी के इर्दगिर्द घूम रही है। सोनिया के राजनैतिक प्रबंधक और सलाहकारों ने कुंवर अर्जुन सिंह का पत्ता कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के केंद्र 10, जनपथ से कटवा दिया है। कुंवर अर्जुन सिंह भले ही अपनी पीडा को उजागर न करें पर उनकी खामोशी बताती है कि वे अपने आप को किस कदर उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

कांग्रेस के प्रबंधकों को सपने में भी भान न होगा कि भोपाल गैस कांड के फैसले के बाद उठे बवंडर में कांग्रेस का आशियाना बुरी तरह हिल जाएगा। चाणक्य की चालें चलने में माहिर कुंवर अर्जुन सिंह उस वक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, जब यह कांड हुआ। किसके कहने पर वारेन एंडरसन को गिरफ्तार कर, यूनियन कार्बाईड के गेस्ट हाउस में रखा गया था, जिसमें फोन की सुविधा उपलब्ध थी, और किसके कहने पर एंडरसन को सरकारी विमान मुहैया करवाकर देश से भाग जाने का मौका दिया गया। एक निजी समाचार चेनल को दिए गए साक्षात्कार में भोपाल के तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह कहते हैं कि तत्कालीन मुख्य सचिव के आदेश की तामीली में उन्होंने यूनियन कार्बाईड के एक कर्मचारी को इसके लिए तैयार किया कि वह एंडरसन की जमानत ले लें। यह है आजादी के बाद 37 साल बाद की भारत गणराज्य की तस्वीर। अगर आम आदमी को पुलिस गिरफ्तार करे तो उसके जमानतदार की चप्पलें घिस जाती हैं जमानत लेने में। यहां तो जिले का मालिक कहा जाने वाला जिला कलेक्टर खुद ही जमानत के लिए उपजाउ माहौल मुहैया करवा रहा है।

आजादी के उपरांत 1977 का कुछ समय, चंद्रशेखर, देवगोडा, अटल बिहारी बाजपेयी आदि की सरकारों का कार्यकाल अगर छोड दिया जाए तो आधी सदी से ज्यादा समय तक देश पर सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने ही हुकूमत की है। अब आम जनता अंदाजा लगा सकती है कि सुशासन देने का वादा करने वाली, कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ का दावा करने वाली कांग्रेस का दामन खुद कितना दागदार है। माना जाता है कि अस्सी के दशक तक राजनीति में नैतिकता का स्थान था, किन्तु यह मिथक एक झटके में तब टूट गया जब पंद्रह हजार से अधिक लोगों को लीलने वाली कंपनी के प्रमुख को सरकारी सुरक्षा में देश से भागने के मार्ग प्रशस्त किए गए। इन सबके बाद भी कांग्रेस की चुप्पी निस्संदेह राष्ट्रीय शर्म की बात है। विदेशों में पली बढीं सोनिया एन्टोनिया माईनो (सोनिया गांधी का असली नाम) भारत की संस्कृति से आज भी पूरी तरह वाकिफ नहीं हो सकीं हैं।

इतनी बडी त्रासदी के बाद अब अगर भारतीय प्रशासिनक सेवा का कोई अधिकारी जो उस वक्त जिला दण्डाधिकारी जैसे जिम्मेदार पद पर रहा हो, आज कोई बात कह रहा है तो कम से कम सोनिया को चाहिए था कि वे इस मामले में दो शब्द तो बोलतीं। एक और जहां ग्लोबल मीडिया में भोपाल गैस कांड का फैसला और भारत की सरकार को लताड दी जा रही हो वहां भारत की सबसे ताकतवर महिला मानी जाने वाली श्रीमति सोनिया गांधी मंुह सिले बैठीं हो तो क्या कहा जाएगा। सोनिया महिला हैं, मां हैं, वे उन माताओं के दर्द को समझ सकतीं हैं, जिन्होंने इस कांड में अपने गुदडी के लाल खोए होंगे। वैसे भोपाल गैस कांड के पूरे प्रकरण और फैसले ने देश की जांच एजेंसी सीबीआई की भूमिका पर एसा सवालिया निशान लगा दिया है, जो शायद ही कभी मिट सके।

इतना ही नहीं सीबीआई के एक पूर्व अधिकारी ने तो साफ तोर पर कह दिया है कि विदेश मंत्रालय के साफ निर्देशों के चलते उन्होंने इस मामले के मुख्य अभियुक्त एंडरसन के प्रत्यार्पण के मामले को आगे नहीं बढाया था। भारत के नीति निर्धारकों की कूटनीतिक चालें समझ से परे हैं। केंद्र सरकार राग अलाप रही है कि यह मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दुनिया के चौधरी अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री राबर्ट ब्लेक ने साफ शब्दों में कह दिया है कि अमेरिका के लिए ‘‘दिस चेप्टर इस ओवर।‘‘ अब यूनियन कार्बाईड या फिर भोपाल गैस कांड के बारे में अमेरिका कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है।

पता नहीं क्यों भारत सरकार यह समझने को तैयार क्यों नहीं है कि यही सही वक्त है, जब अमेरिका पर खासा दबाव बनाया जा सकता है। राबर्ट ब्लेक का प्रलाप व्यर्थ नहीं है। अमेरिका चाहता है कि परमाणु उर्जा से संबंधित ‘न्यूक्लियर लाईबिलिटी बिल‘ भारत की संसद में पास हो जाए। अगर भोपाल गैस त्रासदी को हवा दी गई तो निश्चित तौर पर यह मामला लटक जाएगा, तब अमेरिका के भारत की सरजमीं पर न्यूक्लियर उर्जा से संबंधित मशीने, उपकरण और माल भेजना आसान नहीं होगा। भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका की सरकार यह मानती है कि इंसान वही है जिसकी रगों में अमेरिकी रक्त का संचार हो रहा है, इसी तर्ज पर भारत को दुनिया विशेषकर अमेरिका को यह जतलाना होगा कि भारत गणराज्य की सरकार की नजर में भारतीय पहले हैं, बाकी दुनिया के लोग बाद में। इतनी बडी त्रासदी जिसमें पंद्रह हजार से ज्यादा जाने गईं हों और लाखों प्रभावित हुए हों, इस तरह की आपराधिक भूल को अक्षम्य ही माना जाएगा। छब्बीस बरसों मेें अर्जुन सिंह के बाद भाजपा के सुंदर लाल पटवा सहित कांग्रेस के अनेक मुख्यमंत्री काबिज रहे हैं मध्य प्रदेश में, किन्तु सभी हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। मतलब साफ है कि यूनियन कार्बाईड द्वारा इन जनसेवकों के निहित स्वार्थों को पूरा किया गया होगा, वरना क्या वजह थी कि ये चुपचाप बैठे रहे।

भोपाल गैस कांड का फैसला आने के बाद समूचे देश में इसकी तल्ख प्रतिक्रिया हुई है। लोगों ने अब तक की सरकारों और विशेषकर कांग्रेस को दिल से कोसा है। हडबडी में सरकार जागी है। भारत गणराज्य की सरकार ने मंत्रियों के समूह का गठन कर डाला है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश की सरकार अब उंची अदालत में जाने की बात कह रही है। बहुत पुरानी कहावत है, ‘‘अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत।‘‘ कम ही लोग शायद ही इस बात को जानते हों कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में भोपाल गैस कांड से जुडे मसलों के लिए मंत्री समूह का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष तत्कालीन मानव संसाधन और विकास मंत्री अर्जुन सिंह ही थे। अर्जुन सिंह चतुर सुजान हैं, सो वे जानबूझकर इस मामले को उपेक्षित करते रहे ताकि वक्त आने पर इसे भुनाया जा सके।

तत्कालीन डीएम मोती सिंह, सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह आदि के खुलासे से साफ हो गया है कि देश की जांच एजेंसी और सरकारें राजनेताओं के हाथों की लौंडी बनकर नाच रही हैं। विपक्ष भी इस मामले में तल्ख तेवर नहीं अपना रहा है, जो आश्चर्यजनकी ही माना जाएगा। बहरहाल अब गेंद एक बार फिल मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पाले में आ गई है। आने वाले दिनों में कंुवर अर्जुन सिंह की पूछ परख बढ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुंवर अर्जुन सिंह मंण्े हुए राजनेता हैं, उनके हाथ में अनायास ही एक एसा तीर लग गया है जिससे अनेक निशाने साधे जा सकते हैं, राज्य सभा का कार्यकाल भी उनका काफी कम बचा है। चूंकि हादसे के वक्त केंद्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, अतः कांग्रेस इस मामले में अपनी जवाबदारी से नहीं बच सकती है। अर्जुन सिंह अगर मौन रहते हैं तो कांग्रेस इस जिल्लत से खुद को निकाल लेगी,। विपक्ष की बोथली धार से कुछ होता नहीं दिखता, किन्तु अगर कुंवर साहेब ने मुंह खोला तो कांग्रेस के लिए देश को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।

वाह री किस्‍मत

इसे कहते हे किस्मत कंधे पर अपने पालतू कुत्ते को उठाकर ले जा रही महिला शायद ये भूल गई की वो अपनी ही बेटी को ऊँगली पकड़ कर घसीट रही हे , इसे आप कुत्ते की किस्मत को अच्छी कहे या बच्ची की किस्मत को ख़राब  पर किस्मत तो किस्मत हे भाई

हमें यह फोटो भेजा है मंदसौर मध्‍य प्रदेश दिलीप गुप्‍ता ने, भई वाह

न्‍याय को भटकते पीडित

दुर्घटना बीमा दावा अदायगी तुरंत

120 दिन में मिलेगा दुर्घटना दावा

दिल्ली पुलिस की अभिनव पहल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 10 जून। दुर्घटना बीमा के क्लेम हेतु अब दिल्ली मंे किसी को दर दर भटकने की आवश्यक्ता नहीं होगी। अप्रेल माह से दिल्ली पुलिस ने सूबे के हर एक पुलिस स्टेशन में दुर्घटन सेल की स्थापना कर दी है, जो इस बात को सुनिश्चित करेगा कि दुर्घटना दावा घटना के महज चार माह यानी 120 दिन अथवा अधिकतम छः माह के भीतर निपट जाए। दिल्ली उच्च न्यायालय के डंडे के बाद हरकत में आई दिल्ली पुलिस ने यह कदम उठाते हुए पायलट प्रोजेक्ट की संज्ञा भी दी है। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) द्वारा इसके लिए अत्याधुनिक तंत्र भी तैयार किया जा हा है।

दिल्ली यातायात पुलिस के आंकडों पर अगर गौर फरमाया जाए तो दिल्ली में हर रोज डेढ दर्जन दुर्घटनाएं घटती हैं, और औसतन पांच लोग रोजाना असमय ही इसमें दम तोड देते हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्रों का कहना है कि भले ही कोर्ट की फटकार के उपरांत यह सेल अस्तित्व में आया हो पर इसका मुख्य उद्देश्य पीडितों को समय पर न्याय दिलवाना है। सूत्रों का कहना है कि दुर्घटना से जुडे हर तथ्य मसलन, एफआईआर, कानूनी चिकित्सकीय रिपोर्ट (एमएलसी) आदि को ऑन लाईन ही अद्यतन (अपडेट) किया जाएगा।

इस सेल के मुख्य काम की फेहरिस्त में यह भी शुमार किया गया है कि प्रकरण के आते ही सबसे पहले संबंधित बीमा एजेंसी को अपने पास बुलाया जाए। इंश्योरेंस कंपनी सारे आंकडे वेब साईट से लेकर आवश्यक कागजात तत्काल मुहैया करवाएंगी। दिल्ली के डेढ सौ से अधिक पुलिस अधिकारी युद्ध स्तर पर इन प्रकरणों का निपटारा करके उसे बीमा कंपनी को अंतिम कार्यवाही हेतु सौंप देंगे। एमएसीटी की वेब साईट पर इन सारी जानकारियों को अपलोड कर दिया जाएगा।

एमएसीटी का काम पीडित पक्षकार को क्षतिपूर्ति तय होने तक का सारा डाटा तैयार करना होगा। इसके अलावा बीमा कंपनियों के लिए बीमा दावा के चेक जारी करने के लिए समय सीमा भी निर्धारित करने को कहा गया है। एमएसीटी के कर्मचारियों को ताकीद किया गया है कि वे पीडित के प्रति सहानुभूति पूर्वक पेश आकर जल्द से जल्द पक्षकार को धनादेश (चेक) सौंपना सुनिश्चित करे।

गौरतलब है कि 2005 में दुर्घटनाओं की तादाद 9009, वर्ष 2006 में 8838, वर्ष 2007 में 8270, वर्ष 2008 में 8108 और वर्ष 2009 में इसकी संख्या 6752 थी। इन दुर्घटनाआंे में वर्ष 2005 में 1953, वर्ष 2006 में 1910, वर्ष 2007 में 2099, वर्ष 2008 में 1927 और पिछले साल इसकी संख्या 2165 थी। 2007 और 2008 में ट्रक दुर्घटनाआं की तादाद 236/250, ब्लू लाईन किलर बस से 138/102, कमर्शियल व्हीकल्स से 445/436, कार से 226/176 तो हिट एण्ड रन के 719/743 प्रकरण दर्ज किए गए जिनमें मौत हुईं थीं। इस तरह पिछले पांच सालों में कुल 40 हजार 977 दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 10 हजार 54 थी।

पीने पिलाने की उमर में भेद क्यों?

दिल्ली के आबकारी कानून लागू होने में हो सकती है देर

केंद्र और राज्य के बीच उम्र को लेकर रस्साकशी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 10 जून। आने वाले समय मंे देश की राजनैतिक राजधानी में 25 साल से कम के युवा मद्य का सेवन नहीं कर पाएंगे। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर आए दिन अघोषित मयखाने पाए जाने पर पीने वालों पर जुर्माना 200 रूपए से बढाकर पांच हजार रूपए कर दिया गया है। केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार का यह कानून नागवार गुजरता प्रतीत हो रहा है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को लिखे एक पत्र में अपनी कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं।

गौरतलब होगा कि वर्तमान में दिल्ली में पंजाब एक्साईज एक्ट 1914 लागू है। दिल्ली सरकार का नया आबकारी कानून केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए मंत्रालयों की सीढियां चढ उतर रहा है। दिल्ली सरकार के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि इस कानून के प्राप्त होने के साथ ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले मंे राज्य के वित्त मंत्री डॉ.अशोक कुमार वालिया को पत्र लिखकर कुछ मामलात में सफाई मांगी है।

सूत्रों ने आगे बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र में कहा गया है कि दिल्ली के नए आबकारी कानून में कहा गया है कि दिल्ली मंे नया कानून लागू होने के बाद शराब का सेवन करने वालों की उमर पच्चीस साल होना चाहिए पर शराब परोसने वाले महज 21 साल के हो सकते हैं, इसका आशय क्या है। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार के इस पत्र का जवाब डॉ.वालिया ने केंद्र को भेज दिया है, जिसमें साफ कहा गया है कि माननीय न्यायालय के उस आदेश के परिपालन में एसा प्रावधान किया गया है, जिसमें कहा गया है कि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को रोजगार मुहैया कराने सरकार आगे आए।

इस नए कानून के बारे में कहा जा रहा है कि दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर मद्यपान करते पकडे जाने पर अब तक की सजा का प्रावधान दो सौ रूपए से बढाकर पांच हजार रूपए कर दिया गया है। इसके साथ ही साथ अवैध शराब रखने वालों के खिलाफ भी कडी कार्यवाही का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं अगर इस तरह की शराब पीने से किसी की मौत हो जाती है तो दोषी पाए गए व्यक्ति को मृत्युदण्ड और दस लाख रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। यद्यपि अधिकारी मानते हैं कि इस नए कानून के अमल में आने के उपरांत दिल्ली में अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह रूक जाएगा, किन्तु अवैध शराब बेचने में होने वाले मुनाफे के चलते यह लाबी इतनी ताकतवर हो चुकी है कि नया आबकारी कानून अमली जामा पहन पाए इसमें संशय ही लग रहा है।

बुधवार, 9 जून 2010

कब तक छला जाएगा मोबाईल उपभोक्‍ता

क्यों हो रहा है नंबर पोर्टेबिलिटी में विलंब

कब तक करें उपभोक्ता इंतेजार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 09 जून। पुराने सेवा प्रदाता द्वारा प्रदत्त मोबाईल नंबर को मनचाहे सेवा प्रदाता के साथ संबद्ध कराने वाली मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी सुविधा (एमएनपी) आरंभ होने में अभी और इंतजार करना होगा। दरअसल मोबाईल सेवा प्रदाता सरकरी उपक्रम बीएसएनएल और एमटीएनएल क अलावा कुछ निजी सेवा प्रदाता कंपनियां इसके लिए आवश्यक तैयारियां नहीं कर पाई हैं। इन कंपनियों को आवश्यक अत्याधुनिक तकनीकि उपकरणों की संस्थापना में विलंब हो रहा है, यही कारण है कि सरकार भी इस मामले में मौन साधे बैठी है।

दूरसंचार महकमे के आला सूत्रों का कहना है कि भारत संचार निगम लिमिटेड, महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड सहित लगभग तीन अन्य निजी सेवा प्रदाता इस योजना को आरंभ करने में आवश्यक एमएनपी गेटवे संस्थापित नहीं कर सकीं हैं। तकनीकि जानकारों का मानना है कि एमएनपी सेवा की कल्पना एमएनपी गेटवे के बिना संभव नहीं है। कुछ कंपनियां इस तकनीक की खरीदी के लिए आदेश तो प्रसारित कर चुकी हैं, अब उन्हें इतजार इसकी आपूर्ति का है।

उधर दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) के सूत्रों का कहना है कि एमएनपी सेवा में बार बार हो रहे विलंब से ट्राई नाखुश ही है। सूत्रों की मानें तो इस योजना को अमली जामा पहनाने में बारंबार हो रहे विलंब से खफा ट्राई जल्द ही सरकार को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी से आवगत कराने वाली है। गौरतलब होगा कि बार बार तिथियों की घोषणा करने वाले दूरसंचार विभाग द्वारा हाल ही में 30 जून से इस सेवा को लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, किन्तु जमीनी तैयारियों को देखकर लगने लगा है कि यह भी संभव नही है कि 30 जून से इसे अस्तित्व में लाया जा सके। इसके पूर्व दूरसंचार विभाग ने इसे 31 दिसंबर 2009 तक लागू करने की बात कही थी, फिर बाद में समय सीमा 31 मार्च तक बढा दी गई थी।

दूरसंचार विभाग में चल रही चर्चाओं के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को विभाग की ओर से इस सेवा के परीक्षण के लिए 15 मई तक का लक्ष्य रखा था, जिसमें सेवा प्रदाता कंपनियां परीक्षण करने में पूरी तरह असफल ही रहीं हैं। खुद भारत संचार निगम और महानगर टेलीफोन निगम द्वारा भी इसका परीक्षण पुख्ता तौर पर नहीं किया जाना भी कहा जा रहा है। बार बार उपभोक्ताओं को सपने दिखाने के उपरांत तिथियां आगे बढाने से उपभोक्ताओं में भी निराशा पनपना स्वाभाविक ही है।

यहां उल्लेखनीय होगा कि मोबाईल के क्षेत्र में सबसे बडे नेटवर्क वाले सरकारी उपक्रम बीएसएनएल और एमटीएनएल के उपभोक्ताओं की आज देश में खासी है, किन्तु इसके नेटवर्क प्राब्लम, काल ड्राप, लाईन कंजेशन आदि के चलते उपभोक्ता इससे बुरी तरह त्रस्त हो चुके हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर संभाग में विशेषकर सिवनी में तो आलम यह है कि अगर बीएसएनएल उपभोक्ता अपने सामने बैठे दूसरे उपभोक्ता का नंबर मिलाए तो वह आउट ऑफ कररेज एरिया या व्यस्त बता देता है।