मंगलवार, 6 जुलाई 2010

कांग्रेसी भी आजिज आ चुके हैं मंहगाई से

विपक्ष के बंद को कांग्रेस का समर्थन!

कांग्रेसियों ने भी नहीं खोले अपने प्रतिष्ठान!

जनसेवकों को आखिर जनता के समर्थन की क्या जरूरत!

संसद में क्यों नहीं एकजुटता दिखाता विपक्ष!

नहीं चेते तो भविष्य में तानाशाह और हिटलर कहलाएंगे कांग्रेस के शासक

(लिमटी खरे)

05 जुलाई 2010, सालों बाद किसी मामले में भारत बंद को आशातीत सफलता मिली। देश के कोने कोने से जो खबरें आ रहीं थीं, उन्हें देखकर लग रहा था मानो देश की जनता सुरसा के मुंह की तरह बढती मंहगाई से हलाकान हो चकी है। विपक्ष के आव्हान पर देशवासियों ने अपने अपने प्रतिष्ठानों को बंद रखा। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि केंद्र में सत्तारूढ कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के घटक दलों विशेषकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विपक्ष के इस बंद के दौरान अपने अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर मंहगाई के प्रति अपना आक्रोश जता ही दिया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के इस मोन समर्थन से लगने लगा है कि अपने आकाओं की नीतियों पर कांग्रेस के कारिंदों का रोष और असंतोष भडकने लगा है।

दो ढाई दशक बाद जनता का गुस्सा इस कदर उबलता दिखाई पडा है। संप्रग सरकार के लिए खुली चेतावनी से कम नही है, बंद की इस कदर की सफलता। विपक्ष कहने को एकजुट था, पर अगर वाकई विपक्ष ने एकजुटता दिखाई होती तो देश में इससे भी साफ, मजबूत और स्पष्ट संदेश दिया जा सकता था। कार्यकर्ता चाहे किसी भी दल का हो जब वह देखता है कि उसके बीच से चुना गया विधायक या सांसद अपने वेतन भत्तों के मामले में तो सदन की मेजें थपथपा देता है पर जब भारत गणराज्य की जनता के दुख दर्द की बारी आती है तो वह अपने कर्तव्यों से मुंह चुराता घूमता है, तब उसका मन अपने आला नेताओं के प्रति वितृष्णा से भर जाता है, कि अपनी सुख सुविधा के लिए तो जनता के चुने हुए नुमाईंदे फिरक मंद हैं पर जब बात रियाया की आती है तो वे मौन साध लेते हैं।

मंहगाई के मुद्दे पर न जाने कितनी ही बार विधानसभा, लोकसभा, विधानपरिषद और राज्यसभा के चुने हुए नुमाईंदों ने जनता का समर्थन चाहा और जनता को सडकों पर उतारा है। जनता क्या वाकई बेवकूफ बनाने के लिए है। एक यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि जब जनता ने आपको चुनकर सक्षम मंच अर्थात लोकसभा, राज्य सभा, विधानसभा या विधानपरिषद दे दिया है फिर भारत गणराज्य में जनता के चुने हुए नुमाईंदों को आखिर जनता के पास जाकर जनता को सडकों पर उतारकर सहयोग लेने की क्या जरूरत है। विपक्ष चाहे तो इस मामले में ही एक जुट हो जाए तो सरकार एक दिन भी नहीं चल सकती है। विडम्बना ही कही जाएगी कि जब सदन में मंहगाई का मुद्दा उछाला जाता है तो एक सूत्र मेें पिरे विपक्ष की लडी के एक एक गुरिए छिटककर दूर दूर जा गिरते हैं और जनता को मंहगाई झेलने पर मजबूर होना पडता है। जनता के चुने नुमाईंदों को महंगाई के मामले में सदन में सरकार को घेरना चाहिए, वस्तुतः एसा होता नहीं है। जनता को दिखाने के लिए विपक्ष को मंहगाई बढने पर सडक पर उतरने का प्रहसन करना ही होता है, ताकि भारत गणराज्य के आवाम को लगे कि उनकी बात सुनने वाला भी कोई है।

बंद के दौरान हिंसा भी होती है, यह हिंसा किसके इशारे पर होती है, यह बात सभी जानते है। बंद के दौरान नेता अपने प्रतिद्वंदियों से खुन्नस निकालने में नहीं चूकते एक दूसरे से जलन रखने वाले नेता एक दूसरे के प्रतिष्ठानों में तोडफोड कराकर आर्थिक तोर पर उन्हें तोडने का प्रयास करते हैं। मरण तो जनता की ही होती है। जब सरकारी संपत्ति का नुकसान किया जाता है, तो उसकी भरपाई सरकार कहां से करती है? जाहिर है सरकार के पास कोई टकसाल तो नहीं लगी है, या सोना चांदी रूपया पैसा उगाने वाला पेड तो नहीं है, वह भारत गणराज्य की जनता पर ही करों का भार थोपकर उससे अर्जित होने वाले राजस्व से ही सरकारी संपत्ति की तोडफोड को दुरूस्त कराती है।

सवा सौ साल पुरानी और आजाद भारत में आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस की राजमाता इन दिनों चाटुकार प्रबंधकों से घिर चुकी हैं तभी तो उनके दरबार में जनता जनार्दन की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह ही साबित हो रही है। बिना रीढ अर्थात जनाधारा के कांग्रेसी मैनेजरों को इस बात को न तो खुद ही भी नहीं भूलना चाहिए और अपनी राजमाता को भी वाकिफ करवा देना चाहिए कि विपक्ष ने जिस तरह की एकजुटता पांच जुलाई को दिखाई वही एकजुटता 1989 में विपक्ष् दिखाई थी, तब भी एतिहासिक भारत बंद का आव्हान किया गया था। इसके उपरांत लोकसभा से सामूहिक तौर पर त्यागपत्र देने का अदम्य साहस दिखाया था जनसेवकों ने उस वक्त। विपक्ष के इस अदम्य साहस और एकजुटता का नतीजा 1990 के चुनावों में उभरकर सामने आया और कांग्रेस को जनता ने सत्ता के गलियारे से उठाकर बाहर फंेक दिया था। उसके उपरांत जनमोर्चा की सरकार विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में केंद्र में बैठी।

सत्ता की मलाई सदा ही चखती रही कांग्रेस के लिए यह सदमे से कम नहीं था। यद्यपि भाजपा के राम मंदिर प्रेम के चलते संयुक्त विपक्ष का गठबंधन तार तार हो गया पर यह सच है कि 1990 में लगे उस झटके से कांग्रेस आज तक उबर नहीं सकी है। नब्बे के दशक में राजनीति में आ चुके कट्टर कांग्रेसियों की नींद आज भी 90 के कारनामे से टूट ही जाती है। इस बार भी विपक्ष के तेवर कुछ उसी तरह के ही लग रहे हैं। अगर जनता के दिमाग में वे कांग्रेस को वालीवुड के सत्तर के दशक के विलेन रहे शत्रुध्न सिन्हा और प्रेम चौपडा की तरह पेश करने में सफल रही तो जनता एक बार फिर कांग्रेस को सत्ता के गलियारे से बाहर फंेकने में गुरेज नहीं करने वाली।

05 जुलाई के एतिहासिक बंद से विपक्ष गदगद है। सभी इस बंद का श्रेय लेकर अपनी खुद की पीठ थपथपा रहा है। विपक्ष को चाहिए कि मंहगाई आखिर बढी क्यों है, इस पर राष्ट्रव्यापी बहस आरंभ करवाए। इसके लिए विपक्ष को अपने निहित स्वार्थों की तिलांजली देना अनिवार्य होगा, पर क्या विपक्ष में इतना माद्दा है कि वह अपने निहित स्वार्थों को भारत गणराज्य की जनता के स्वार्थों के सामने गौड कर पाएगा? जाहिर है इसका उत्तर नकारात्मक ही आने वाला है।

विपक्ष की इस एक जुटता से घबराए भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विपक्ष को उसकी जिम्मेदारी समझने की बात कह रहे हैं, अरे भले मानुस आप सबसे पहले अपनी जिम्मेदारी को तो समझो। क्या प्रधानमंत्री अपने द्वारा दिए गए आश्वासनों की लंबी फेहरिस्त पर गौर फरमाने का उपक्रम करेंगे, जिसमें उन्हों बारंबार यह बात कही थी कि हमारे इस कदम के परिणाम स्वरूप मंहगाई का ग्राफ एकदम नीचे आ जाएगा। कभी मानसून को कोसा तो कभी वैश्विक मंदी का रोना रोया, फिर तारीख पर तारीख कि फलां समय से मंहगाई कम होना आरंभ हो जाएगा! क्या वह महज आश्वासन ही था? क्या यह जनता को बहलाने के लिए एक घुनघुना था, जिसे जनता कुछ समय तक बजाकर अपना ध्यान बटाए? एक तरफ भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे डॉ.एम.एम.सिंह सब कुछ निशुल्क पाने वाले सांसदों का वेतन पांच गुना बढाने की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर आम जनता की कमर मंहगाई से टूटने के बाद इसी भारत गणराज्य के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा ‘‘अभी और बढेगी मंहगाई‘‘ जैसे बयान पर चुप्पी साधे रहते हैं।

रही बात तेल के दाम बढाने की, तो इस बारे में देश में शायद ही कोई हो जो इससे असहमत हो। हर आदमी यही चाहता है कि सरकार को घाटा न हो। विचारणीय प्रश्न तो यह है कि जब भोपाल गैस कांड के प्रमुख अभियुक्त वारेन एण्डरसन के मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पति और युवराज राहुल गांधी के पिता एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को घिरता पाया गया और जब देश में मंहगाई चरम पर है तभी तेल को नियंत्रण से मुक्त क्यों किया गया। जाहिर सी बात है कि भारत गणराज्य में मंहगाई इतना संवेदनशील मुद्दा है कि आदमी इस मुद्दे के सामने सारे मामलों को भूल ही जाता है। यही इस मामले में भी हुआ अब आम आदमी को लगने लगा है कि राजीव गांधी ने अगर एण्डरसन को छोडा तो छोडा यार पर इस मंहगाई से कैसे निपटा जाए इस बारे में सोचो। किसी राजनैतिक दल या राजनेता के जिंदाबाद या मुर्दाबाद के नारे लगाने से पेट भरने वाला नहीं। पेट भरने को तो अनाज ही चाहिए और अनाज के पैसा, वो कहां से आएगा यह सोचना पहली प्राथमिकता है।

सरकार ने तेल को नियंत्रण से मुक्त करने का विचार कर लिया, पर उस तेल पर सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले भारी भरकम कर जिससे देश के नौकरशाहों और जनसेवकों की मोटी पगार बनती है को कम करने के बारे में सरकार ने विचार तक नहीं किया है। क्या यही है भगवान राम का भारत देश? क्या इसी भारत की कल्पना करके ब्रितानियों के दांत खट्टे कर अपने प्राणों की आहुती दी थी देशभक्तों ने? क्या यही है महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के आदर्शों पर चलने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का इक्कीसवीं सदी का भयावह चेहरा? इन प्रश्नों का उत्तर भारत गणराज्य की जनता देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और पर्दे के पीछे से उन्हें रिमोट कंट्रोल से चलाने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को देना ही होगा। आखिर क्या वजह है कि भोपाल गैस कांड के बारे में मुंह सिलने वाली सोनिया और राहुल गांधी, इसके बाद मंहगाई के मामले में भी चुप्पी साधे हुए हैं।

क्या यह सोनिया और राहुल का फर्ज नहीं है कि वे आम जनता के दुख दर्द के लिए भारत गणराज्य की सरकार से आग्रह करें? गरीबों के घर जाकर रात बिताने से कुछ नहीं होता राहुल गांधी जी, साल भर में दो दिन अगर आप गरीब की झोपडी में रहकर आ गए तो उसकी गरीबी दूर नहीं होने वाली। उसकी गरीबी तब और केवल तब दूर होगी जब आप संसद सत्र आरंभ होते ही पहले दिन अपनी ही सरकार को इस बात के लिए घेरें कि तेल कीमतों पर करों को कम क्यों नहीं किया जा रहा है, साथ ही साथ माले मुफ्त पाने वाले जनसेवकों के वेतन भत्ते क्यों बढाए जा रहे हैं, जो पहले से ही लखपति करोडपति है, उसे वेतन देने का क्या ओचित्य। सोनिया जी अब आपको गूंगी गुडिया बनकर नहीं रहना है आपको अपने पुत्र राहुल को भी समझाना होगा कि सरकार की गलत नीतियों का विरोध करना आवश्यक है, वरना आने वाले समय में देश का जो इतिहास लिखा जाएगा उसें कांग्रेस के शासकों को ‘‘तानाशाह‘‘ और ‘‘हिटलर‘‘ की उपाधि से नवाजा जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सोनिया ही हैं कांग्रेस की राजमाता



सोमवार, 5 जुलाई 2010

सोनिया के इर्दगिर्द सिमटती कांग्रेस की धुरी


ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

कांग्रेस में कोई नहीं जो अध्यक्ष बन पाए!
सवा सौ साल पुरानी वह कांग्रेस जिसने भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है, में इक्कीसवीं सदी में एक भी एसा कद्दावर नेता नहीं है, जो कांग्रेस का रहनुमा बन सके, यही कारण है कि 9 दिसंबर 1998 के बाद से कांग्रेस को राह दिखाने का काम नेहरू गांधी परिवार की इतालवी बहू सोनिया गांधी कर रही हैं। इस माह अगर एक बार फिर से सोनिया को पार्टी अध्यक्ष चुन लिया जाता है तो वे पंद्रह साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहकर पुराने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर देंगी। एक तरफ सोनिया गांधी निर्विरोध अध्यक्ष चुनी जाती रहीं हैं, पर दूसरी तरफ कांग्रेस के अंदर अंदर ही इस बात के लिए भी असंतोष पनपने लगा है कि क्या नेहरू गांधी परिवार से इतर किसी में इतना माद्दा नहीं है कि वह सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की बागडोर थाम सके? भले ही डॉ.मनमोहन सिंह को दूसरी मर्तबा प्रधानमंत्री बनाया गया हो पर उनका रिमोट तो सोनिया के हाथ में ही माना जाता है। कांग्रेसी विचलित हो रहे हैं कि आने वाले समय में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अपने राज्याभिषेक की तैयारियों में व्यस्त हैं, फिर सालों साल कांग्रेस का झंडा उठाने वाले आम कार्यकर्ताओं की क्या औकात बकत! कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के अनेक नेता भी भयाक्रांत हैं, कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी ढलती उम्र के चलते उन्हें अनिवार्य सेवानिवृति न दिला दी जाए।
भागवत पुराण बिना जसवंत की वापसी से नाराज है संघ
अपनी किताब में पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना की शान में कसीदे गढने वाले जसवंत सिंह की घर वापसी से संघ की भवें तन चुकी हैं। संघ के सूत्रों का कहना है कि जसवंत के प्रोग्राम में शामिल हुए राम जेठमलानी जो अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड चुके हैं को राज्य सभा में भेजना पहले ही से संघ को नागवार गुजर रहा है। सूत्रों की मानें तो संघ ने अब सरकार के विरोध की अपनी लाईन तय कर ली है, संघ की इस लाईन को लेकर भाजपा में गहरा प्रतिरोध सामने आ रहा है। भाजपा प्रमुख नितिन गडकरी के छः माह के कार्यकाल में संघ को कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी का वर्चस्व आज भी भाजपा पर वैसा ही है, जो पूर्व में राजनाथ सिंह के समय होता था। गडकरी की दब्बू कार्यशैली को देखकर संघ के अंदर अब सवाल खडे किए जाने लगे हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत और भैया जी जोशी जल्द ही दिल्ली जाकर भाजपा के शीर्ष नेताओं को पाठ पढाने वाले हैं। इस तरह का संदेश भाजपा के आला नेताओं को भेजा भी जा चुका है, अब देखना है कि भाजपा में संघ की चलती है या आडवाणी की।
झा ही ला सकते हैं उमा के जीवन में प्रभात
तेज तर्रार साध्वी उमा भारती की भाजपा में घर वापसी की बातें एक बार फिर सियासी गलियारों में गर्माहट ला रही हैं। फायर ब्रांड नेत्री मानी जाने वाली उमा दो बार भाजपा को छोडकर जा चुकी हैं, दोनों ही बार उन्होंने पार्टी को चुपचाप नहीं वरन् आला नेताओं को लानत मलानत भेजकर पार्टी को तजा था। उमा के ब्रेन माने जाने वाले प्रहलाद सिंह पटेल जबसे उनसे प्रथक हुए हैं, तब से ही उमा मुख्यधारा में आने को छटपटा रही हैं। राजनैतिक समीकरणों के जानकार भी पूरे मामले को समझ ही नहीं पा रहे हैं कि कल तक पानी पी कर आडवाणी को कोसा था उमा ने और आज आडवाणी ही उमा की घर वापसी के लिए सबसे ज्यादा आतुर दिखाई दे रहे हैं। उमा वैसे मध्य प्रदेश सूबे से हैं, और भाजपा को त्यागने के उपरांत उमा ने मध्य प्रदेश में जो ताण्डव किया था, वह किसी से छिपा नहीं है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी उमा की घरवापसी को गैर जरूरी बता रहे हैं, पर वे इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। रही बात सूबे के भाजपा प्रमुख प्रभात झा की तो प्रभात झा की जमानत पर ही उमा भारती की भाजपा में वापसी संभव दिखाई दे रही है।
तेल की कीमतें और सांसदों का वेतन बढाना जरूरी था!
भारत गणराज्य में तेल की कीमतों में जब तब उछाल आ जात है। पेट्रोलियम पदार्थों की दरों में बेतहाशा बढोत्तरी का सीधा असर देश की जनता पर पडता है। जब भी कोई संवेदनशील मामला उछलता है सरकार झट से तेल की कीमतों में इजाफा कर अपनी खाल बचाने और लोगों का ध्यान उससे हटाने की कोशिश करती है। भाजपा का आरोप है कि सरकार ने छः सालों में 33 कार पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में इजाफा किया है। तेल की कीमतों में बढोत्तरी पर भारत गणराज्य के वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह का कहना है कि यह भारत की अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए जरूरी था। सांसदों ने बडी ही चतुराई से इसी शोर शराबे के बीच अपने वेतन भत्ते पांच गुना बढवाने की बात भी मनवा ली और किसी को पता ही नहीं चला। अरे मनमोहन सिंह जी, आप देश के प्रधानमंत्री हैं, अगर आप देश के सांसदों के वेतन को पांच गुना कम भी कर देते तो उनकी सेहत पर कोई असर नहीं होता, पर आप देश को यह भी तो बताईए कि सब कुछ निशुल्क होने के बाद भारी भरकम वेतन भत्ते और पेंशन का क्या ओचित्य है! आप तो एक रूपए वेतन लेते हैं, पर आपके मंत्रीमण्डल के सहयोगी देश की जनता के गाढे पसीने की कमाई को किस कदर उडा रही है इस बारे में भी तो गौर फरमाना जरूरी है, साथ ही अपने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को भी नसीहत दें कि वे सरेआम यह तो न कहें कि अभी तो ये अंगडाई है आगे और लडाई है अर्थात अभी मंहगाई और बढेगी, उसके लिए तैयार रहें।
सूदखोरी का नायब तरीका!
देश भर में सूदखोरी का व्यापार सरेआम चल रहा है। पुलिस सब कुछ जानती है, पर खामोश बैठी है। पांच प्रतिशत मासिक न्यूनतम दर अर्थात साठ फीसदी सालाना की ब्याज दर पर हो रहा है यह व्यापार। अगर आपने एक लाख रूपए सूद पर लिए हैं तो साल भर बाद आपको एक लाख साठ हजार रूपए की चपत तय समझो। जुंए, सट्टे, नशे की लत में फंसे युवाओं द्वारा अपना सब कुछ रहन रखकर ब्याज पर पैसे उठाए जा रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों को तो बिना गारंटी ही पैसा सूद पर दे दिया जाता है। सरकार कर्मचारियों की वेतन प्रणाली को अत्याधुनिक बनाकर सरकार ने उनके खाते में सीधे सीधे पैसा डाल दिया जाता है, ताकि वे एटीएम के माध्यम से जहां चाहे वहां पैसा निकाल सकें। सूदखोरों द्वारा ब्याजप पर पैसा देते वक्त एटीएम और पासवर्ड अपने पास रख लिया जाता है, फिर वेतन आते ही वे गट्ठा भर एटीएम ले जाकर राशि का आहरण कर अपने ब्याज की रकम काटकर बाकायदा सरकारी कर्मचारियों को वेतन बांटते नजर आते हैं। लोगों की पासबुक, चेकबुक, एटीएम कार्ड सब कुछ ब्याजखोरों के कब्जे में ही रहते हैं। बापू तेरा देश वाकई महान है. . .।
भाजपा भी बरी नहीं है गैस हादसे से
2 और 3 दिसंबर की दर्मयानी रात को भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई अब तक की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के स्याह छीटों से कांग्रेस का दामन तो पूरा काला हो चुका है, पर इससे भारतीय जनता पार्टी की छवि पर भी काले बदनुमा दाग उभरते दिखाई पड रहे हैं। इस त्रासदी के उपरांत मध्य प्रदेश में सुंदर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर के अलावा वर्तमान निजाम शिवराज सिंह चौहान ने गैस पीडितों के हक के लिए कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं केंद्र में भी अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाई पर वहां भी कोई सुनवाई नहीं हो सकी। सीबीआई जो कि केंद्र सरकार की लौंडी मानी जाती है, ने अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में वर्ष 2002 में इस त्रासदी के लिए जवाबदार वारेन एण्डरसन को बचाने का प्रयास किया था। उस वक्त सीबीआई ने भोपाल के सीजेएम की अदालत में आवेदन दाखिल कर कहा था कि एण्डरसन के खिलाफ लापरवाही बरतने का आरोप लगाया जाए न कि हजारों लोगों की हत्या का। यद्यपि कोर्ट ने सीबीआई की दलील खारिज कर दी थी, किन्तु इस तरह के प्रयास से भाजपा की वर्तमान कथनी और उस वक्त की करनी में भेद साफ हो जाता है।
ग्लोबल मंदी का असर कांग्रेस पर!
वेश्विक आर्थिक मंदी की जद में है समूची दुनिया इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु भारत गणराज्य के मंत्री सांसद, विधायकों पर इसका कोई असर नहीं है, उनकी फिजूल खर्ची और अधिक गति से चल रही है। आर्थिक मंदी जब दूर होने की स्थिति में आ रही है, तब सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को होश आया है कि उसके कार्यालय के खर्चे बहुत अधिक हैं, सो अब द्वारा अपने कर्मचारियों को अनिवार्य तौर पर बलात सेवानिवृत करने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाने का प्रयास किया जा रहा है। 11 प्रदेशों और कंेद्र में बैठी कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय में सवा सौ से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, इनमें से आधे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने वाला है। गौरतलब है कि इनमें से कई कर्मचारी तो कांग्रेस के न जाने कितने अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के हाथ रह चुके हैं। इन कर्मचारियों को सरकार की तर्ज पर वीआरएस दिया जाएगा या नहीं यह तय नहीं है, पर कांग्रेस मुख्यालय के कर्मचारी इन दिनों अपने अपने आकाओं को सिद्ध करने में लगे हैं कि उन पर कास्ट कटिंग की गाज न गिर जाए। वैसे एसा माना जाता है कि अगर कहीं भी कोई पार्टी सत्ता में हो तो फिर पार्टी के बढे हुए खर्चे भी मीट आउट करना आसान ही होता है। लगता है कांग्रेस के सूबाई निजामों द्वारा आला कमान को जजिया कर नहीं दिया जा रहा है, जिससे कांग्रेस के सालों साल वफादार रहे कर्मचारियोें को बाहर का रास्ता दिखाया जाने वाला है।
मिश्रा के इस्तीफे से घबराए हरवंश
एमपी में हत्या के मामले में फंसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा के त्यागपत्र के बाद मध्यप्रदेश का सियासी अखाडा एक बार फिर भरता दिखाई दे रहा है। सत्ताधारी भाजपा के एक कद्दावर मंत्री के त्यागपत्र से अनेक विधायकों को मानो सांप सूंघ गया है। अनूप मिश्रा के उपरांत राज्य के आदिवासी कल्याण मंत्री विजय शाह की बारी है। इस फेहरिस्त में विधायक कमल पटेल, आशारानी सिंह के अलावा और भी हैं। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि कांग्रेस के विधायक और मध्य प्रदेश विधानसभा में उपाध्यक्ष जैसे संवैधनिक पद पर बैठे ठाकुर हरवंश सिंह पर लगभग डेढ साल पहले तत्कालीन सांसद एवं वर्तमान विधायक श्रीमति नीता पटेरिया पर जान लेवा हमला करवाने के आरोप में धारा 307 का प्रकरण पंजीबद्ध है, के उपरांत हाल ही में उन पर धोखाधडी की धारा 420 का प्रकरण पंजीबद्ध होने के बाद भी उन्हें संवेधानिक पद से हटाने की मांग भाजपा द्वारा प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर नहीं की गई है। पहला मामला आमानाला कांड के नाम से जाना जाता है तो दूसरा भी आमानाला में ही घटित हुआ, दोनें के बीच लगभग सौ किलोमीटर का अंतर है। इसे अब धूम वन, धूम टू की तर्ज पर आमानाला वन और आमानाला टू के नाम से जाना जाने लगा है। डेढ साल पहले हुए मामले में भी अब तक कोई कार्यवाही न होना भाजपा और कांग्रेस की नूरा कुश्ती का प्रमाण ही माना जा रहा है। लगता है अनूप मिश्रा के त्यागपत्र से ठाकुर हरवंश सिंह घबरा गए हैं, और उन्होंने आनन फानन एक पत्रकार वार्ता लेकर कुछ सच्चे झूठे कागज उसमें बटवाकर अपने आप को बेदाग बताने का प्रयास किया है। मीडिया के कुछ मित्रों ने हरवंश सिंह के उजले पक्ष को ही जनता के सामने लाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझा है, मीडिया का काम निष्पक्ष रहकर जनता के सामने हकीकत को लाना है, वस्तुतः इस मामले में एसा होता दिख नहीं रहा है।
फिर निकला राम मंदिर का जिन्न
1992 में विवादस्पद बाबरी ढांचा ढहाने के बाद भाजपा सत्ता की मलाई चख चुकी है। राम मंदिर विवाद को भाजपा ने गहन चिकित्सा इकाई अर्थात आईसीयू में डाल कर रखा है। इस मामले को बाकायदा आक्सीजन दी जा रही है ताकि यह जिन्दा रहे। लोगों की भावनाओं से जुडे इस मामले में भाजपा ने कभी भी कठोर कदम उठाने का साहस नहीं किया है। समय समय पर राम मंदिर के मामले को उछालकर भाजपा द्वारा भारत गणराज्य की जनता को बरगलाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी है। हाल ही में भाजपा के ही एक अंग समझे जाने वाले विश्व हिन्दु परिषद के नेता प्रवीण तोगडिया ने शांत पानी में यह कहकर कंकर मार दिया है कि राम मंदिर के निर्माण की कवायद 16 अगस्त से आरंभ कर दी जाएगी। चूंकि जनता अब भाजपा के इस स्टेंड को अच्छे से समझ चुकी है कि भाजपा के लिए राम मंदिर का मसला महज सत्ता प्राप्ति का साधन बनकर रह गया है, इसलिए अब भाजपा ने विहिप के माध्यम से इस संवेदनशील मामले में साधु संतों को एक छत के नीचे लाना आरंभ किया है।
प्रदूषण से बढते अस्थमा रोगी
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में लोगों को बारिश आते ही कम से कम एक चीज से तो निजात मिली, और वह है उडती हुई धूल। यद्यपि बारिश की फुहार ने मौसम में उमस तबियत से बढा दी है, पर लोग खुश हैं कि कम से कम उन्हें कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों के कारण चल रहे निर्माण कार्याें की धूल से तो मुक्ति मिली। दिल्ली में आलम यह है कि आप किसी भी क्षेत्र में चले जाएं वहां धूल धक्कड आपके स्वश्न तंत्र को प्रभावित किए बिना नहीं रहेगा। लंग फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बात उभरकर सामने आई है कि जन्म के साथ ही दो तो पचास के पेटे वाले 12 फीसदी लोग आक्सीजन न मिल पाने के चलते अस्थमा की जद में चले जाते हैं। दिल्ली में सांसद विधायकों को इसका एहसास इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वे तो बख्तरबंद एयर कंडीशन गाडियों में बैठे खुद ही धूल उडाते घूमते रहते हैं, मरण तो आम जनता की ही होती है, जो सडकों पर धक्के खाते चलती है।
. . . तो भगवान ही मालिक है हवाई अड्डों का
केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री और राकपां नेता प्रफुल्ल पटेल एक जमीन को धोखाधडी कर बेचने के आरोप में घिर गए हैं। मध्य प्रदेश के बेतूल की एक अदालत ने उनके स्वामित्व वाली फर्म में उनके साथ उनके नौ अन्य भागीदारों को 19 जुलाई को उपस्थित होने का निर्देश दिया है। गौरतलब है कि प्रफुल्ल पटेल की ‘‘छोटा भाई जेठा भाई‘‘ नामक एक फर्म है जिसने लगभग सात साल पहले मध्य प्रदेश के बेतूल में 17 हजार वर्ग फुट जमीन को दो अलग अलग लोगों को बेच दिया था। 19 मई 2003 को बैतूल जिले से गुजरने वाले नेशनल हाईवे नंबर 69 पर अवस्थित इस जमीन को नवनीत गर्ग नामक व्यक्ति को इनके द्वारा बेचा गया था। इसके एक माह बाद ही इसी जमीन को केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल और उनके भागीदारों ने 11 जून 2003 को अशोक दीक्षित नाम के एक अन्य व्यक्ति को बेच दिया गया। अगर यह मामला सत्य है तो भगवान ही मालिक है देश के हवाई अड्डों, एयर इंडिया और इंडियन एयरलाईंस का. . .।
पुच्छल तारा
भारत गणराज्य में पेट्रोलियम पदार्थों की बढी कीमतों पर भाजपा द्वारा सोमवार को भारत बंद का आव्हान किया गया है। एक कट्टर भाजपाई ने ईमेल पर तेल की कीमतों का जिकर किया है। वे लिखते हैं कि पेट्रोल की कीमतें पाकिस्तान में 26 रूपए, बांग्लादेश में 22 रूपए, नेपाल में 34, बर्मा में 30, अफगानिस्तान 36, कतर में 30, मगर भारत गणराज्य में 53 रूपए। दरअसल यह भारत में 16 रूपए पचास पैसे प्रति लिटर ही है। इसमें केंद्रीय कर 11 रूपए 80 पैसे, एक्साईज ड्यूटी नो रूपए पचहत्तर पैसे, स्टेट टेक्स 8 रूपए, वेट टेक्स चार रूपए इस तरह कुल मिलाकर इसकी कीमत हो जाती है पचार रूपए पांच पैसे फिर तीन रूपए किस बात के। अरे बाबा तीन रूपए भारत गणराज्य की जनता को बेवकूफ बनाने के हैं, अगर एसा नहीं होता तो देश में पेट्रोल सोलह रूपए पचास पैसे में नहीं बिकता, इतना कर लगाने के बाद भी अगर पेट्रोलियम कंपनियों को घाटा हो रहा है तब तो पीठ थपथपानी ही पडेगी कांग्रेस की. .  .।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

ओबामा से डरे मनमोहन



राठोर दोषी फिर पुरी और सिंह कैसे बरी

राम से अंग्रेजी आती है श्याम से नहीं!

राठौर की पेंशन रूकी पर पुरी और सिंह अब भी बरी!

क्यों मेहरबान है केंद्र पुरी और मोती सिंह पर

(लिमटी खरे)

जब स्कूल में पढा करते थे तब छटवीं कक्षा से अंग्रेजी का ककहरा सीखने को मिलता था। नवमी कक्षा में जाकर ग्रामर का पूरा ज्ञान मिलने लगा। तब अंग्रेजी की प्रकांड विद्वान स्व.प्रभाकर मुकुंद ढबले सर ने अंग्रेजी सिखाई। उस वक्त राम बाजार जाता है को तो अंग्रेजी में अनुवादित कर लिया करते थे, पर जब राम के स्थान पर श्याम का नाम लिया जाता तो विद्यार्थी बगलें झांकने लगते। उस वक्त ढबले सर उपहास उडाते हुए कहते कि राम से अंग्रेजी आती है, श्याम से नहीं।

यही आलम भोपाल गैस कांड और अन्य मामलों में दोषियों के समझ में आ रहे हैं। रूचिका मामले में दोषी आरोपी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर की पेंशन स्थायी तौर पर रोकने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। यह स्वागत योग्य कदम है। इससे अन्य अधिकारियों को अनैतिक काम न करने की सीख मिल सकेगी। अगर सजा का प्रावधान कठोर होगा तो अधिकारी नियमों का माखौल उडाने के पहले सौ मर्तबा सोचने पर मजबूर होंगे।

सवाल यह उठता है कि दो अलग अलग मामलों में केंद्र सरकार का रूख प्रथक प्रथक क्यों है। राठौर ने तो रूचिका के साथ बदसलूकी की और वह साबित हुआ। भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश में छब्बीस साल पहले हुई दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के आरोपी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एण्डरसन को राजकीय सम्मान के साथ बिदा करने वाले एण्डरसन के तत्कालीन बाडीगार्ड, उनके वाहन के सारथी और भोपाल के तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और भोपाल के ही तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के खिलाफ भारत सरकार कठोर कदम उठाने में देरी क्यों कर रही है यह बात समझ से ही परे है।

समाचार चेनल्स में उस दौरान के दिखाए गए फुटेज से स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह सरकारी लाल बत्ती लगी कार में वारेन एण्डरसन शान से पीछे की सीट पर अधिकारी की तरह बैठा है और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी उसकी कार को हांक रहे हैं। कंडक्टर की सीट पर डीएम मोती सिंह विराजमान हैं। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि जब एण्डरसन को सरकारी विमान से रवाना किया गया तब दोनों ही अधिकारियों ने उसे सेल्यूट भी किया था।

जहां तक राठोर का सवाल है तो भारतीय पुलिस सेवा के उस अधिकारी ने एक बाला के साथ अपने पद का रौब गांठने का प्रयास किया था, जिससे आजिज आकर रूचिका गहरोत्रा को अपनी इहलीला समाप्त करने पर मजबूर होना पडा था। रूचिका के परिजनों ने कई दिन तक राठौर की यातना को झेला। इस सबके बाद भी हरियाणा की निर्लज्ज कांग्रेस सरकार ने रूचिका के कातिल राठौर को सरमाथे पर बिठाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। रूचिका को भी सालों बाद न्याय मिल सका। केंद्र और प्रदेश की कांग्रेस सरकारों को न जाने इन अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से क्या मोह होता है, कि वे इनके खिलाफ कठोर कदम उठाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती हैं, यही कारण है कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के हौसले बुलंदी पर हैं, और वे मनमानी पर पूरी तरह उतारू हैं।

अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की अकूत दौलत के बारे में अगर बारीकी से जांच पडताल की जाए तो देश का आखिरी आदमी तक दांतों तले उंगली दबा लेगा। सांसद, विधायकों की भांति ही इनको सारी सुविधाओं के बावजूद भी भारी भरकम वेतन दिया जाना आश्चर्य जनक ही कहा जाएगा। इन सारे माननीयों के वेतन भत्तों को देखकर कोन कह सकता है कि भारत देश आज गरीब है। यह अलहदा बात है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है, जिसे दो वक्त की रोटी भी ठीक तरीके से नसीब नहीं होती है, और ये माननीय हर घंटे मलाई चट करने पर आमदा हैं।

राठौर अखिल भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं, तो स्वराज पुरी भी उसी सेवा के सेवानिवृत और मोती सिंह अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं। जब एसपीएस राठोर की पेंशन रोकी जा सकती है तो स्वराज पुरी और मोती सिंह में क्या सुरखाब के पर जडे हुए हैं। मीडिया के माध्यम से पुरी और सिंह दोनों ही को भोपाल गैस कांड के सरगना को सुरक्षित भगाने का अपराध साबित हो चुका है, फिर केंद्र सरकार किस बात का इंतजार कर रही है?

केंद्र सरकार को चाहिए कि रूचिका की आत्महत्या के दिन से एसपीएस राठोर को दी गई सारी सुविधाएं, वेतन भत्ते, यात्रा देयकों आदि की वसूली मय ब्याज के की जाए, तभी दूसरे अधिकारियों को सबक मिल सकेगा। ठीक इसी तरह स्वराज पुरी और मोती सिंह को भी दिसंबर 1984 के उपरांत दी गई सुविधाएं, वेतन भत्ते, यात्रा देयक, पेंशन आदि की वसूल मय ब्याज के की जानी चाहिए। इन सभी की संपत्ति को कुर्क कर कार्यवाही की जाए तो यह एक नजीर होगी, कि आला अधिकारी आने वाले समय में मनमानी न कर पाएंगे। अगर एसा नहीं होता है तो स्व.पी.एम.ढबले सर की बात को ही दुहराना होगा कि राम (राठोर) से अंग्रेजी आती है श्याम (पुरी और मोती सिंह) से नहीं. . . .।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्रधानमंत्री जी क्‍या आप भी गैस पीडितों को भूल गए

क्या आप भी ओबामा से डर गए मनमोहन जी!
भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का नहीं खुल पाया अमेरिका के सामने मुंह!

सामरिक विषयों के साथ भोपाल गैस कांड पर चर्चा उचित नहीं समझी मनमोहन ने

आखिर क्यों डरते हैं भारत के नीति निर्धारक अमेरिका से

(लिमटी खरे)

दुनिया का चौधरी माना जाता है अमेरिका को। सारे विश्व के कायदे कानून से परे हटकर अनेकों बार मनमानी की है अमेरिका ने, पर समूची दुनिया उसके डंडे के डर के आगे नतमस्तक रही है। बीसवीं शताब्दी में अमेरिका को टक्कर देता रहा है सोवियत रूस, किन्तु कालांतर में सोवियत रूस भी आपसी लडाई में बुरी तरह टूट गया है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में चीन एक महाशक्ति बनकर उभरा है। आज अमेरिका और चीन दोनों ही एक दूसरे के सामने हैं। अमेरिका को नंबर वन बरकरार रखने और चीन को पहली पायदान तक पहुंचने के लिए अगर किसी की दरकार है तो वह है भारत गणराज्य के सहयोग की।

छब्बीस साल पहले भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश में हुई गैस त्रासदी दुनिया की भीषणतम औद्योगिक क्रांति थी। इसमें बीस हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, और लाखों लोग आज भी इसका दंश भुगत रहे हैं। भारत गणराज्य की कांग्रेस और भाजपा की नपुंसक सरकारों द्वारा छब्बीस साल तक अपने ही वतन के लोगों को इस आग में जलने दिया। देश के गद्दारों ने इस भीषणतम त्रासदी के गुनाहगारों को देश से बाहर भिजवाने के मार्ग प्रशस्त किए। गुनाहगारों को देश से बाहर भेजा गया तो इस तरह मानों वे किसी दूसरे देश के राजनयिक हों या राष्ट्र के अतिथि! यह सब देख सुनकर घोर आश्चर्य होता है कि देश के गद्दारों को किस तरह कांग्रेस ने अपने दामन में आज भी स्थान दिया हुआ है।

अपने निहित स्वार्थों को परवान चढाकर मारे गए लोगों और पीडितों और उनके परिजनों को मुआवजा न दिलवाकर सत्ता के इन दलालों ने अपनी जेबें भर लीं। सालों साल अपने सीने में राज दफन करने वालों ने किस कदर 26 साल तक अपने सीने में यह बोझ दबाए रखा, फिर भी वे सीना तानकर चलते रहे। आज उन सारे के सारे जनसेवकों की नैतिकता एक बार अचानक जागी है, कोई किसी को दोषी बता रहा है, तो कोई राज की बातें अपनी आत्मकथा में लिखने की बात कहकर अपने आला नेताओं को भयाक्रांत करने का प्रयास कर रहा है। कुल मिलाकर देश के सियासी रंगमंच पर सारे किरदार स्वांग रचकर खडे हो गए हैं और एक बार फिर छब्बीस साल के अंतराल के उपरांत ये सभी भारत गणराज्य की जनता को मामा (बेवकूफ) बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश में शिवराज के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार इस प्रकरण को दोबारा नए सिरे से आरंभ करने की दलील दे रही है। भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह बात भूल जाते हैं कि उनको प्रदेश पर राज करते चार साल से अधिक का समय हो चुका है। इसके पहले वे सालों साल संसद सदस्य रहे हैं, तब उन्होंने भोपाल गैस पीडितों के हक के लिए क्या किया, इस बात को आवाम ए हिन्द जानना चाहता है। इसके साथ ही साथ उनके पहले भारतीय जनता पार्टी के सुंदर लाल पटवा, उमाश्री भारती और बाबू लाल गौर भी मध्य प्रदेश पर काबिज रह चुके हैं। शिवराज जी आपके साथ ही साथ भारती, गौर और पटवा की भूमिका पर भी आपको प्रकाश डालना होगा। विडम्बना यही है कि ये सब आपकी पार्टी के हैं या रहे हैं तो आपकी जुबान इस मामले में सिली ही रहेगी। भाजपा के तेवर भोपाल गैस मामले में जितने तीखे होना चाहिए था, उतने तीखे दिख नहीं रहे हैं। भाजपा भी बचाव की मुद्रा हमें ही ज्यादा दिखाई दे रही है।

उधर कांग्रेस इस मामले आक्रमक के बजाए रक्षात्मक मुद्रा में प्रतीत हो रही है। कांग्रेस के दामन पर इस मसले में छीटे ज्यादा उछलने की आशंका है। तत्कालीन प्रधानमंत्री और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के पति स्व.राजीव गांधी पर भी इस मामले की कालिख उडकर जाती हुई प्रतीत हो रही है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह से पूछने का साहस कोई भी नेता नहीं जुटा पा रहा है कि आखिर कौन सी एसी विषम परिस्थितियां उपज गईं थीं कि उन्होंने इस कांड के प्रमुख दोषी और यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन भारत प्रमख वारेन एण्डरसन को व्हीव्हीआईपी ट्रीटमेंट देकर, तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह की अभिरक्षा में भोपाल से भागने दिया।

कांग्रेस का डर स्वाभाविक है कि अगर इस मामले में सोनिया गांधी अपना मुंह खोलती हैं तो उनके पति की मिट््टी खराब करने में कुंवर अर्जुन सिंह को देर नहीं लगेगी, किन्तु इस मामले में भाजपा का स्टेंड समझ से परे है। भारतीय जनता पार्टी आखिर कुंवर अर्जुन सिंह से पूछने में हिचक क्यों रही है। क्या भाजपा के अंदर भोपाल गैस कांड से प्रभावितों के प्रति हमदर्दी समाप्त हो चुकी है? क्या भाजपा की संवदेनाएं मर चुकी हैं? अगर नहीं तो भाजपा दिल्ली में जाकर कुंवर अर्जुन सिंह के निवास के सामने धरना देने से कतरा क्यों रही है। केंद्र में तो कांग्रेस की सरकार है, यह मामला पालिटिकल माईलेज के लिए भाजपा को सूट हो सकता है, पर भाजपा फिर भी मौन ही साधे हुए है, जो वास्तव में आश्चर्यजनक ही लगता है। इतना ही नहीं भोपाल गैस पीडितों की सहायता के लिए आगे आए गैर सरकारी संगठन भी खबरों में बने रहने के लिए एकता का प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या यह उनका दायित्व नहीं बनता है कि वे भी इस मामले में दिल्ली जाकर जंतर मंतर पर कुंवर अर्जुन सिंह और तत्कालीन केंद्र सरकार की भूमिका पर शोर शराबा करे?

छब्बीस साल बाद फैसला आने के बाद सबसे निरीह, दीन हीन हालत में कोई दिख रहा है तो वह है भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस की ही नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी। देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन ने तो भोपाल गैस कांड के बारे में अपना मुंह खोला है, पर राहुल और सोनिया ने अपने जबडों को भींचकर रखा है। केंद्र सरकार ने मंत्री समूह का गठन कर दिया है, पर आज भी गैस पीडितों के सीनों पर सांप ही लोट रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें चाहे जितने आयोग का गठन कर प्रयोग कर ले पर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि नतीजा सिफर ही होगा, क्योंकि जब तक किसी भी चीज को टाईम फ्रेम (समय सीमा) में न बांधा जाए तब तक कुछ भी हल नहीं निकाला जा सकता है।

भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह अमेरिका यात्रा पर गए। वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति से मिले, सामरिक विषयों पर चर्चा भी हुई, पर ओबामा का मन मोहने वाले डॉ.मनमोहन सिंह यह भूल गए कि उन्हें ओबामा से बीस हजार लोगों के कातिल और लाखों को स्थाई तौर पर अपंग बनाने वाले यूनियन कार्बाईड और वारेन एंडरसन के बारे में भी चर्चा करना है। एंडरसन के प्रत्यापर्ण के बारे में अगर मनमोहन सिंह चर्चा करते तो कुछ न कुछ बात आगे बढती। वैसे भी भारत अमेरिका के बीच प्रत्यार्पण संधि लागू है, जिसके तहत एण्डरसन को भारत लाया जा सकता था।

एक बात आज तक किसी को समझ में नहीं आई है कि आखिर एसा क्या है कि भारत गणराज्य के नीति निर्धारक दुनिया के चौधरी अमेरिका से खौफजदा रहते हैं। बुश जब हिन्दुस्तान आते हैं तो हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित करने के पहले अमेरिकी श्वान बापू की समाधि का निरीक्षण करते हैं। कहा जाता है कि ब्रितानियों का सूरज कभी नहीं डूबता था, बावजूद इसके आधी धोती पहनकर बापू ने इन ब्रितानियों को भारत से खदेडा। आज समूचे विश्व में बापू को शांति और अहिंसा का दूत माना जाता है, फिर क्या अमेरिकी श्वान का उनकी समाधिस्थल पर जाना बापू के अपमान की श्रेणी में नहीं आता है। इतना ही नहीं जब बुश के साथ डॉ.मनमोहन सिंह फोटो खिचावाते हैं तो हमारे वजीरे आजम सावधान मुद्रा में तो बुश हंसते हुए मनमोहन के कांधे पर हाथ रखे होते हैं। फोटो देखकर लगता है मानो शेर के साथ किसी बिल्ली को खडा कर दिया गया हो, जो थर थर कांप रही हो।

इस बात का जवाब तो डॉ. मनमोहन सिंह से आवाम ए हिन्द चाहता है कि आखिर क्या वजह थी कि दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम नागरिक बराक ओबामा के सामने आपने भोपाल गैस कांड के मसले पर अपना मुंह क्यों नहीं खोला? भाजपा न पूछे न पूछे, भाजपा कांग्रेस के किस अहसान तले दबी है यह तो वह ही जाने, पर कांग्रेस के सच्चे सिपाहियों को चाहिए कि वे देश की खातिर अपनी राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, अपने युवराज राहुल गांधी और प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिह से यह सवाल अवश्य करे कि आखिर कौन सी एसी वजह है कि सभी ने भोपाल गैस कांड के मामले में अपनी जुबानें बंद कर रखीं हैं।

बुधवार, 30 जून 2010

कहां गई बापू के सपनों की कांग्रेस

आदर्शों से भटकी बापू की कांग्रेस!

सोनिया को वेतन भत्ते अस्वीकार कर पेश करना होगा नजीर

लोकतंत्र में रियाया से अधिक खुद की सुख सुविधा की चिंता!

वेतन भत्तों में अटकी रहती है जनसेवकों की सांसे

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में आज सुबह उठकर चाय पीने से रात के खाने तक हर मामले में भारत की जनता पर करारोपण इतना जबर्दस्त है कि वह चाहकर भी आजाद भारत में सांसे नहीं ले पा रही है। जनता जनार्दन के लिए अब जीना मुहाल ही हो चुका है, बावजूद इसके भारत गणराज्य में जनसेवक चाहे वे नौकरशाह हों, विधायक या सांसद, सभी अपने वेतन भत्तों में उत्तरोत्तर वृद्धि ही करवाते जा रहे हैं। भात गणराज्य में 1952 में संवैधानिक तौर पर संसद का गठन हुआ था, इसके दो साल बाद सांसदों को वेतन भत्ते देने का प्रावधान करने वाला कानून अस्तित्व में आया था। मजे की बात तो यह है कि तब से अब तक 25 मर्तबा संसद सदस्यों के वेतन भत्ते बढाने का काम किया गया है। जैसे जैसे मंहगाई का सूचकांक उपर उठता है, जनसेवक इसकी चपेट में खुद को घिरा महसूस करते हैं और अपने वेतन भत्तों में बेतहाशा इजाफा करने के मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि जनसेवकों को आवाम ए हिन्द के दुख दर्द से कोई सरोकार नहीं है।

हाल ही में संसद की स्थाई समिति ने सांसदो के वेतन को एक दो नहीं वरन पांच गुना बढाने की सिफारिश की है। वर्तमान में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार केंद्र पर काबिज है। कांग्रेस द्वारा समय समय पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को भुनाया जाता रहा है, यह बात किसी से छिपी नहीं है, पर जब बापू के आदर्शों पर चलने की बारी आती है तो कांग्रेस के वर्तमान सरमायादार पल्ला झाडने से गुरेज भी नहीं करते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि महात्मा गांधी कभी भी सांसदों को वेतन भत्ते देने के पक्ष में नहीं रहे हैं। संविधान सभा सहित अनेक नेताओं ने आजादी के उपरांत देश के खाली खजाने को देखकर बिना वेतन ही काम करने का निर्णय लिया था, और उसे अमली जामा पहनाया भी।

संसद हो अथवा विधानसभा या विधान परिषद जब भी वेतन भत्ते बढाने की बात आती है, इसका स्वागत सभी सदस्य मेजें थपथपाकर करते हैं। सवाल यह उठता है कि खुद ही अपने वेतन का निर्धारण करना कहां की नैतिकता है। जब मंहगाई या करारोपण की बात आती है तब सांसद गरीब की थाली में से निवाले निकालने में गुरेज नहीं करते और अपनी जेब भरने की बारी आती है, तब वे संकोच नहीं करते। नौकरशाह, सरकारी कर्मचारी, सांसद, विधायक को तो एक तारीख को उनकी पगार मिल जाती है, पर जो नौकरी में नहीं हैं, खुद ही श्रम कर आजीवीकोपार्जन का काम करते हैं, उनका हिस्से में आखिर क्या आता है! उनके हिस्से में तो करों से लदा फदा मंहगा सामान ही आता है। आम आदमी के लिए क्या मोटी पगार पाने वाले जनसेवक कुछ सोचने की स्थिति में रहते हैं, जवाब नकारात्मक ही मिलता है इन सारी बातों का। फिर कैसे और कौन कह सकता है कि दुनिया के सबसे बडे प्रजातांत्रिक देश के निवासी हैं। यह तो हिटलरशाही की श्रेणी में ही आता है।

एक तरफ पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, रसोई गैस के दाम बढाकर देश की जनता की कमर तोडने का कुत्सित प्रयास किया गया, तो दूसरी ओर जनता की सेवा का आडंबर रचने वाले जनता के चुने नुमाईंदों ने अपना वेतन बढाकर जनता को मुंह चिढाने का प्रयास भी किया है, जो निंदनीय ही कहा जाएगा। रीढ विहीन विपक्ष ने भी अपने निहित स्वार्थ के चलते वेतन भत्ते बढाने में हामी भरी है, सवाल यह उठता है कि इसके बाद सरकार के गलत कदमों का विरोध करने का नैतिक साहस क्या उनके पास बचेगा! कांग्रेस के कुशाग्र बुद्धि वाले रणनीतिकारों ने सांसदों के वेतन भत्तों को पांच गुना बढाने की जलेबी लटकाकर विपक्ष की विरोध की धार को पूरी तरह बोथरा ही किया है। अब क्या मुंह लेकर विपक्ष जनता के सामने जाकर मूल्यवृद्धि का विरोध करेगा। जनता जब उनसे पूछेगी कि अपने वेतन भत्तों में बढोत्तरी के लिए हां और मूल्य वृद्धि के लिए ना, यह कैसा तरीका है काम करने का। जनता जब उनसे पूछेगी कि आपके वेतन भत्ते इसलिए बढे क्योंकि मंहगाई का असर आप पर है, तब हम गरीब गुरबों पर क्या मंहगाई का असर नहीं होगा। जब माननीय सांसद खुद अपने और अपने परिवार को एक सहायक के साथ वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा करवा सकते हैं सब कुछ निशुल्क पा सकते हैं तब फिर वेतन भत्ते बढाने का क्या ओचित्य! क्या इन सारे प्रश्नों के जवाब हैं माननीय सांसदों के पास।

मंहगाई का हवाला देकर वेतन भत्ते बढवाने में किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिए पर जनता अपने चुने हुए माननीयों से यह सवाल करने का अधिकार अवश्य ही रखती है कि क्या कभी किसी माननीय ने संसद में इस बात को पुरजोर तरीके से उठाकर इस पर बहस करना चाहा है कि आखिर क्या वजह है कि मंहगाई सुरसा की तरह मुंह फाडती जा रही है। एक समय था जब राजनीति में नेतिकता का अहम स्थान था। उस वक्त के माननीय संसद में बहस इसलिए किया करते थे ताकि उसका कुछ परिणाम निकले, हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज संसद सदस्य बहस महज इसलिए करते हैं कि संसद के चलने के दौरान उनको मिलने वाले भत्तों में कमी न हो पाए।

याद पडता है कि भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत 1995 - 96 में जब सांसदों के वेतन को बढाया जा रहा था तब फारवर्ड ब्लाक के सांसद बसु ने इसके लिए लोकसभा का बहिष्कार किया था। क्या आज कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, करोडों की संपत्ति वाले कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी, करोडपति सांसद लाल कृष्ण आडवाणी, नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली सहित अन्य माननीय सांसदों में इतना माद्दा है कि वे जनता के हितों को देखते हुए बढे हुए वेतन भत्तों का विरोध कर सकें? किसी भी मामले में संसद में हंगामा न हो एसा हो ही नहीं सकता है, अनेकों मर्तबा तो संसद को स्थगित तक करने की नौबत आती है, किन्तु जब माननीयों के वेतन भत्ते बढाने की बारी आती है तो हंगामा शोर शराबा मानो थम जाता हो, मेजें थपथपाकर सभी एक स्वर से इसका स्वागत करते हैं, क्या यह आम जनता के साथ छल की श्रेणी में नहीं आता है।

आज भारत गणराज्य के वजीरे आजम एक रूपए वेतन लेकर एक नजीर पेश कर रहे हैं। क्या सोनिया गांधी, राहुल गांधी, एल.के.आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरूण जेतली आदि में इतना माद्दा है कि वे भी अपने वेतन को एक रूपए के रूप में प्रतीकात्मक कर लें। अरे और तो छोडिए जब कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने सारे जनसेवकों से अपने वेतन का एक हिस्सा सूखा पीडितों के लिए दान देने का फरमान जारी किया तब सारे जनसेवक बगलें झांकने लगे। कांग्रेस के उद्दंड जनसेवकों ने अपनी ही राजमाता के फरमान की हुकुम उदली करने में जरा भी संकोच नहीं किया, मजबूरन सोनिया गांधी को अपने उस आदेश पर ज्यादा जोर देने के बजाए उसे ‘‘नाट प्रेस‘‘ अर्थात कोई कार्यवाही नहीं चाहते की श्रेणी में लाकर रख दिया। आज जनता मंहगाई के बोझ से दबी हुई है एसे में एक शेर कहना मुनासिब होगा


‘‘ये सारा जिस्म बोझ (मंहगाई) से झुककर दोहरा हुआ होगा!

मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा. . . !!

मुंह तो खोलिए सोनिया गांधी जी

सोमवार, 28 जून 2010

क्‍या इतना ही दर्द था भोपाल गैस कांड के लिए

कहां गया भोपाल गैस कांड का दर्द

मंहगाई के शोर में गुम गया गैस कांड

ध्यान भटकाने, केंद्र सरकार का नायाब तरीका

विपक्ष, मीडिया सभी ने साधा मौन

सब चिंतित पर आम आदमी की चिंता किसी को नहीं

(लिमटी खरे)

भोपाल गैस कांड का फैसला आने के उपरांत मीडिया ने इसे जिस तरह से पेश किया उससे देश भर में गैस पीडितों के प्रति सच्ची हमदर्दी उपजी थी। चहुं ओर से कांग्रेस सरकार को लानत मलानत भेजने का काम किया जा रहा था। गैस कांड के प्रमुख दोषी एवं यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को देश से भगाने और गैस पीडितों के लिए कम मुआवजा दिलवाने के लिए तत्कालीन राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र और कंुवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार को दोषी माना जा रहा था। मीडिया की संजीदगी की वजह से मामला आग पकडने लगा था, लगने लगा था कि आने वाले दिनों में कहीं कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को शर्मसार होकर गद्दी न छोडना पड जाए।

छब्बीस साल साल पुराने मामले में जैसे ही कांग्रेस ने अपने आप को घिरता महसूस किया, उसके प्रबंधको ने तत्काल अपनी राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के कान फूंके और मंहगाई कें जिन्न को बोतल से बाहर निकालने का मशविरा दे डाला। इतिहास साक्षी है जब जब सत्ताधारी दल किसी भी मुद्दे पर घिरने की स्थिति में आते हैं, वे सबसे पहले मंहगाई को बढाने का ही उपक्रम करते हैं, क्योंकि मंहगाई का सीधा सीधा संबंध आम जनता से होता है। आम जनता जैसे ही मंहगाई को बढता देखती है, उसे सारे मामलों से कोई लेना देना नहीं रह जाता है, फिर रियाया सिर्फ और सिर्फ अपने पेट के लिए ही फिकरमंद हो उठती है।

इस बार भी यही हुआ केंद्र सरकार ने प्रट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढा दी। यद्यपि यह बात काफी समय से चली आ रही थी कि इसकी मूल्यवृद्धि अत्यावश्यक है, किन्तु मंहगाई से जुडे इस महत्वपूर्ण मामले में मूल्यवृद्धि को केंद्र सरकार ने इसलिए रोककर रखा था, कि वक्त आने पर यह ब्रम्हास्त्र चलाया जा सके। सरकार चाहे अपने कदम को न्यायोचित ठहराने के लिए जो जतन कर लें, पर यह सत्य है कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और मिट्टी के तेल के दाम बढाकर सरकार ने आम आदमी को जीवन यापन में और दुष्कर दिनों का आगाज करवा दिया है। लुटा पिटा आम आदमी अपने नसीब को कोसने के अलावा और कुछ करने की स्थिति मंे अपने आप को नहीं पा रहा है, क्योंकि आम आदमी के लिए लडने वाला विपक्ष भी रीढविहीन होकर सत्ताधारी दल के एजेंट की भांति ही कार्यकरता नजर आ रहा है।

सरकार इस बात से नावाकिफ हो यह संभव नहीं है कि डीजल की दरें बढाने का असर पिन टू प्लेन अर्थात हर एक चीज पर पडने वाला है। डीजल मंहगा होगा तो आवागमन मंहगा होगा, रेल बस का किराया बढेगा, माल ढुलाई बढेगी, जाहिर है बडी दरों की भरपाई कोई अपनी जेब से तो करने से रहा, तो इसकी भरपाई जनता का गला काटकर ही की जाएगी। जनसेवकों को इससे क्या लेना देना। जनसेवकों को तो ‘‘आना फ्री, जाना फ्री, रहना फ्री, बिजली फ्री, सब्सीडाईज्ड खाना, उपर से मोटी पगार और पेंशन‘‘ फिर भला उन्हें आम आदमी के दुख दर्द से क्या लेना देना।

आज सत्तर फीसदी जनता को दो जून की रोटी के लिए कितनी मशक्कत करनी पडती है, यह बात किसी जनसेवक को क्या और कैसे पता होगी। गरीब के घर का चूल्हा कैसे जलता है, गरीब अपने और अपने परिवार के लिए कैसे दो वक्त की रोटी का जुगाड कर पाता है, इस बात के बारे में तानाशाह शासक क्या जानें। वनों के राष्ट्रीयकरण के बाद चूल्हे के लिए लकडी जुगाडना कितना दुष्कर है, यह बात कोई गरीब से पूछे। इन परिस्थितियों में गैस कंपनियों के आताताई डीलर्स के पास से चार सौ रूपए का गैस सिलेंडर खरीदकर गरीब अपना चूल्हा जलाए तो कैसे। सरकारों चाहे वह केंद्र हो या राज्यों की, सभी को चाहिए कि पेट्रोलियम पदार्थों पर उन्होंने जो उपकर और कर लगाए हैं, उसे हटाएं सेस हटाएं, स्वर्णिम चतुर्भुज के लिए एक रूपए सेस, अस्सी के दशक में लगाया गया तीन रूपए का खाडी अधिभार, आदि अब तक जारी हैं, इन सबको तत्काल प्रभाव से अगर हटा लिया जाए तो भी आम जनता को पेट्रोल डीजल आज से सस्सा ही मिलेगा।

हम इस बात से सहमत हैं कि विपक्ष द्वारा धरना, प्रदर्शन, अनशन आदि के माध्यम से ही अपना विरोध दर्ज करा सकता है, किन्तु पिछले कुछ सालों में विपक्ष का विरोध प्रतीकात्मक ही रहा है। समय के साथ विपक्ष ने अपने विरोध की धार बोथरी कर सत्ताधारी दल के एजेंट की भूमिका ही निभाई है। नब्बे के दशक के आरंभ के उपरांत एसा कोई भी उदहारण नहीं मिलता है, जिसमें विपक्ष ने आम आदमी के लिए अहिंसा की जंग की हो। जब संसद या विधानसभा में उन्हें अपना पराक्रम दिखाने का मौका मिलता है तो वे सत्ताधारी दल के फेंकी गई रोटी के टुकडे से ‘‘मैनेज‘‘ हो जाते हैं।

आज के परिदृश्य को देखें तो सारी बातें साफ ही हो जाती हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को आपने पुत्र राहुल गांधी को कांग्रेस का सर्वेसर्वा बनाने की चिंता है, राहुल को उत्तर प्रदेश और बिहार पर कब्जा करने की चिंता है, उधर मायावती उत्तर प्रदेश में अपनी साख बचाने चिंतित हैं। मुलायम चिंतित हैं कि किस तरह यूपी से मायाराज को समाप्त किया जाए, अमर सिंह को चिंता सता रही है कि वे मुलायम से अपने अपमान का बदला कैसे लें, ममता बनर्जी को रेल मंत्रालय से ज्यादा चिंता पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने की है, विपक्ष में बैठी भाजपा के नेताओं को चिंता है अपने खिसकते जनाधार की, सो वे पुराने नेताओं की घरवापसी के लिए चिंतित हैं, वहीं भाजपा का दूसरा धडा इसलिए चिंतित है कि कहीं भाजपा को पानी पी पी कर कोसने वाले नेताओं की घरवापसी न हो जाए। अब आप ही बताएं कि इस सबमें आम आदमी की चिंता किसे है! जाहिर है किसी को भी नहीं। इन परिस्थितियों में बस एक ही चारा रह जाता है कि आम आदमी को ही अब सडक पर उतरकर अपनी लडाई का परचम बुलंद करना होगा।

पेट्रोलियम पदार्थ की कीमतें बढाने के मामले में सरकार का कदम ठीक हो सकता है, पर हमारी नजर में यह समय किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है। सरकार को बिना किसी दबाव में इस निर्णय को वापस लेना चाहिए। देश में भोपाल गैस कांड के बारे में चल रही बहस को स्वस्थ्य और स्पोर्टिंग वे में लेना चाहिए। अगर कहीं कांग्रेस ने गल्ती भी की है तो उसे स्वीकारना होगा। अपनी गल्ति छिपाने के लिए तरह तरह के तर्क कुतर्क तो सभी दिया करते हैं, पर जिसके अंदर जरा भी नैतिकता होती है वह अपनी गल्ति को स्वीकारने में जरा भी नहीं हिचकता। कांग्रेस को नेतिकता दिखानी ही होगी, भले ही वह उसका प्रहसन करे। जब विपक्ष को कांग्रेस ने अपने घर की लौंडी बना लिया है, विपक्ष ज्वलंत मुद्दों पर कांग्रेस के साथ विरोध का स्वांग रचता है, देश की भोली भाली जनता सत्ता और विपक्ष में बैठे दलों के डमरू पर खुदको नचा रही हो, फिर कांग्रेस को ईमानदार होने का स्वांग रचने में भला क्या आपत्ति।

मंहगाई ने गायब कर दिया भोपाल गैस कांड का दर्द


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

मंहगाई से दम तोडा ‘‘गैस कांड‘‘ ने
26 साल घिसटने के उपरांत भोपाल गैस कांड का जो फैसला आया उसने 2 और 3 दिसंबर 1984 को भोपाल में रिसी गैस से ज्यादा दम घोंटा है पीडितों और मृतकों के परिवारों का। जैसे तैसे इस मामले की आग को हवा मिली और यह पूरी तरह सुलगने लगा। मीडिया, स्वयंसेवी संगठनों ने इस मामले में सरकार विशेषकर तत्कालीन प्रधानमंत्री और वर्तमान कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के पति और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के पिता स्व.राजीव गांधी को भी कटघरे में खडा कर दिया। ममला बिगडते देख कांग्रेस ने अपने चिरपरिचित अंदाज में लोगों का ध्यान इस ओर से हटाने की गरज से पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढा दिए। कल तक मीडिया की सुर्खी बन भोपाल गैस कांड को शुक्रवार को मीडिया की प्रमख खबरों में स्थान नहीं मिल सका। यह तो होना ही था। पेट्रोल पोने चार रूपए, डीजल 2 रूपए तो रसोई गैस को 35 रूपए बढा दिया गया है। इतिहास गवाह है कि जब कभी भी रियाया का ध्यान किसी मुद्दे से हटाना होता है, सरकार द्वारा उसी वक्त मंहगाई को बढा दिया जाता है। मंहगाई एक एसा मुद्दा है, जिसके बढने से आम आदमी का ध्यान बंटना स्वाभाविक ही है। आने वाले दिनों में भोपाल गैस कांड का मसला मंहगाई की मार के आगे दम तोड दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अलबत्ता इसमें कांग्रेस के चाणक्य माने जाने वाले कुंवर अर्जुन ंिसह और तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी की छवि अवश्य ही धवल बनी रहेगी।
क्या इनके लिए मंहगाई मायने नहीं रखती!
सरकार चाहे कंेद्र की हो किसी सूबे की, हर माह किसी न किसी बहाने से तानाशाह शासकों द्वारा कोई न कोई कर को बढाकर या नया कर लादकर जनता की कमर बोझ से दबा दी जाती है। हाल ही में पेट्रोल डीजल और रसोई गैस की कीमतों को बढाकर सरकार ने एक बार फिर जनता जनार्दन के धैर्य की परीक्षा लेना चाहा है। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे वेट कम करें ताकि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें कम हो सकें। सूबों की सरकारों ने अपने विधायकों के वेतन भत्ते इस कदर बढा दिए है कि विधायक भी सरकारों का विरोध करने की स्थिति में नहीं है। यही आलम केंद्र सरकार का है। आना फ्री, जाना फ्री, खाना फ्री, रहना फ्री, फोन फ्री, हवाई जहाज फ्री, इलाज फ्री, सब कुछ फ्री फिर अकूत वेतन और भत्तों की आवश्यक्ता समझ से परे ही है। इतना ही नहीं हाल ही में सरकार ने सांसदों के वेतन को दुगना करने का मन भी बना लिया है। सांसदों को संसद के सत्र के दौरान एक हजार के बजाए दो हजार रूपए रोज भत्ता, संसदीय क्षेत्र भत्ता बीस से बढाकर चालीस हजार, कार्यालय खर्च बीस से बढाकर चोंतीस, हजार करने का निर्णय लिया गया है। वर्तमान में प्रथम श्रेणी वातानुकूलित श्रेणी में निशुल्क यात्रा आदि की सुविधाएं मिल रही हैं। सवाल तो यह उठ रहा है कि जनसेवकों पर करोडों अरबों फूंककर जनता की जेब पर टेक्स बढाकर डाका डालना क्या शासकों को तानाशाह की श्रेणी में लाकर खडा नहीं कर रहा है।
यह है कांग्रेस का हाल सखे!
‘‘आदर्श, नैतिकता, इंसानियत, सही राह पर चलना, किसी को तकलीफ न देना, आदि‘‘, हैं सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की रीतियां नीतियां। क्या वास्तव में कांग्रेस इन पर चल रही है, जवाब नकारात्मक ही आने वाला है। अस्सी के दशक के आरंभ से ही कांग्रेस ने नैतिकता को अपने तन से दूर कर दिया था। इसके बाद भ्रष्टाचार, अनाचार, हिटलरशाही आदि इसके प्रमुख गुणधर्म बनकर रह गए। झारखण्ड में कांग्रेस ने एक नई नजीर पेश की है, जिससे देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को खुद को शर्मसार महसूस करना चाहिए। दरअसल देश क पहले महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को झारखण्ड में दुमका में एक जमीन शिक्षण संस्था के निर्माण के लिए सत्तर साल पहले दान की गई थी। आज उस जमीन की कीमत पंद्रह करोड रूपए के लगभग है। चूंकि कांग्रेस द्वारा इतिहास पुरूषों को अपनी निजी संपत्ति माना जाता है इसी के चलते उसने राजेंद्र प्रसाद को दान में मिली जमीन को भी अपना मानकर इस पर कार्यालय बनाने के लिए शिलान्यास पत्थर तक लगवा दिया। मान गए सोनिया जी अपको, आपके मार्गदर्शन और निर्देशन में कांग्रेस इस तरह के कामों में तो बुलंदियों को छू ही लेगी।
युवराज अब ‘‘मिशन बिहार‘‘ पर
कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने अब बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों के रण हेतु अपने तरकश में तीर भरने आरंभ कर दिए हैं। कभी भी रणभेरी बज सकती है और कांग्रेस, भाजपा, जययू, राजद सहित सारे सियासी दल इसमें कूद पडेंगे। राहुल गांधी के विश्वस्त चालीस लोग बिहार के अंदरूनी इलाकों में जाकर सर्वे का काम आरंभ कर चुके हैं। चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के प्रबंधकों को डेमेज कंट्रोल में लगा दिया गया है। राहुल की चार माह पूर्व की बिहार यात्रा से कांग्रेस में कुछ उर्जा का संचार हुआ था, और सूबे में कांग्रेस के पक्ष में बयार बहना आरंभ हुआ था, इसके उपरांत राजद से कांग्रेस में आए पप्पू यादव और साधु यादव एवं शर्मा और टाईटलर के बीच हुई तकरारों ने कांग्रेस को फिर से पीछे धकेलना आरंभ कर दिया है। बिहार में चुनावों में डबल एम ही हावी होता है। अर्थात मनी पावर और मसल पावर दानों ही बिहार में हावी रहते हैं। युवराज राहुल गांधी का कहना है कि इस बार आपराधिक छवि वाले नेताओं को कांग्रेस बाहर का रास्ता दिखाएगी। युवराज को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह बिहार के मामले में कुछ कह रहे हैं जहां डबल एम के बिना कुछ नहीं हो सकता है। कहीं एसा न हो कि बिहार में कांग्रेस की सूरत और सीरत बिगाडने के चक्कर में युवराज बिहार से कांग्रेस का नामोनिशान ही मिटा दें।
महाराष्ट्र या मद्यराष्ट्र!
महान राष्ट्र के तौर पर पहचाना जाता है महाराष्ट्र। इस सबू का देश की आजादी मंे योगदान किसी से छिपा नहीं है। इस सबूे के वर्तमान शासक यहां के लोगों को दो वक्त की रोटी तो मुहैया नहीं करवा सकते हैं, यद्यपि वे इस सूबे के लोगों को चोबीसों घंटे ‘‘टुल्ली‘‘ रखने की जुगत अवश्य ही लगा रहे हैं। यहां स्वर्णमहोत्सवी वर्ष में महाराष्ट्र अब पूरी तरह मद्यराष्ट्र बनने की राह पर अग्रसर है। पहले यहां अंगूर की फिर ज्वार की शराब बनाई जाती थी। कालांतर में काजू, जामुन और ज्वार ने भी लोगों को मदहोश करने के लिए अपने आप को शराब बनाने में झोंक दिया। अब महाराष्ट्र में लोगों को शराब के स्वाद में परिवर्तन के लिए पहाड की मैना कहे जाने वाले करोंदे का उपयोग करने की अनुमति दे दी गई है। इतना ही नहीं इस पर सरकार द्वारा अनुदान भी दिया जा रहा है। सच ही कहा है-,‘‘अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ, जिसकी बेटी (शराब) ने उठा रखी सर पे दुनिया।‘‘
किन्नर अलग से चाहते हैं जनगणना!
जब जनगणना हो रही है तो स्त्री और पुरूषों के साथ ही साथ किन्नरों की जनगणना अलग से होनी चाहिए। सच है, ईश्वर ने इन्हें न पुरूष की श्रेणी में रखा है न ही महिला की। यह वर्ग समाज के हाशिए पर ही जीवनयापन करने पर मजबूर है। समाज में इन्हें प्रतिष्ठित स्थान नहीं मिल सका है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक किन्नरों को समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। बाद में लोगों की सोच बदली और इन्हें कमोबेश बराबरी का दर्जा मिल ही गया। 2011 की जनगणना के लिए किन्नरों ने मांग कर दी है कि इनकी जनगणना पृथक से की जानी चाहिए। किन्नरों की बढती संख्या और वोट बैंक की चिंता को देखकर सियासी दलों ने भी किन्नरों की इस मांग पर मूक, स्पष्ट या फिर दबे छुपे समर्थन देना आरंभ कर दिया है। वैसे सच ही है हाशिए पर जीवन यापन करने वाले इस वर्ग को सभ्य समाज ने पूरी तरह ही भुला दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही ने किन्नरों की मांग को उचित ठहराते हुए इसका समर्थन कर दिया है, तो लगता है केंद्र सरकार भी इस पर अपनी मुहर लगा ही देगा।
ममता दी की चप्पल!
साधारण घरेलू महिला की छवि वाली केंद्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी की सादगी के बारे में सभी बेहतर तरीके से जानते हैं कि आडम्बर ममता दीदी को कतई नहीं भाता है। वे सरकारी गाडी या मंहगी विलासिता वाली कार के बजाए मारूति मेक की अपनी छोटी सी कार में चलना ही पसंद करती हैं। ममता बनर्जी के पैरों में मध्य प्रदेश के पूर्व गैस राहत मंत्री आरिफ अकील की तरह ही स्लीपर हुआ करतीं है। वे चाहे जहां जाएं पर स्लीपर का मोह वे तज नहीं पातीं है। एक चप्पल निर्माता कंपनी ने ममता दी की शान में ध्धृष्टता कर मारी। कहते हैं उसने ममता की इजाजत के बिना ही उनकी चप्पल वाली फोटो अपने विज्ञापन में छाप दी। विपक्ष ने आरोप लगा दिया कि इस विज्ञापन के एवज में ममता ने कंपनी से पैसे लिए हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव करीब हैं, तो आरोप प्रत्यारोपों का अंतहीन सिलसिला तो जारी ही रहेगा। चूंकि मामला लाभ का बन रहा है तो ममता की पेशानी पर परेशानी झलकना स्वाभाविक ही है इसके पहले कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और जया बच्चन इसमें उलझ चुकीं हैं। अगर यह साबित हो गया तो ममता की सांसदी खतरे में पड सकती है। ममला पुलिस के पास है, देखते हैं विपक्ष किस स्तर तक ममता को घेरने में कामयाब हो पाता है।
मुखिया को ही नहीं पता कितने बच्चे हैं उसके!
क्या यह संभव है कि घर के मुखिया को इस बात का इल्म न हो कि उसके कुल कितने बच्चे हैं। जी हां भारत गणराज्य में यह बात साफ तौर पर उभरकर आई है कि मुखिया ही नहीं जानता कि उसकी कितनी शाखाएं हैं। देश के पंचायत राज मंत्रालय को ही नहीं पता है कि देश में कितनी पंचायतें हैं, है न आश्चर्य की बात। ग्रामीण विकास संबंधी संसद की स्थाई समिति ने पंचायती राज मंत्रालय संबंधी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह आश्चर्यजनक है कि पंचायती राज मंत्रालय को ही नहीं पता की आज की तारीख में देश में कितनी जिला पंचायतें हैं। मंत्रालय कहता है कि देश में 608 जिले हैं जबकि समिति को पता चला है कि देश में 619 जिले हैं। अब आवाम ए हिन्द इस बात का अंदाजा सहज ही लगा सकती है कि भारत गणराज्य में तानाशाह शासक किस कदर मस्ती के मद में चूर होकर रियाया के साथ नाईंसाफी करने पर आमदा हैं। अब तो बस भगवान राम के अवतार ही का इंतजार है, जो आकर इन कंस, रावण, हिरणकश्यप रूपी आताताईयों से जनता को निजात दिलाए।
डाओ केमिकल पर फैसला क्यों नहीं!
भोपाल गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाईड को खरीदने वाली डाओ केमिकल की जिम्मेदारी तय करने में कांग्रेसनीत केंद्र सरकार आखिर क्यांे हीला हवाला कर रही है। इससे संबंधित मामला अदालत में लंबित होने का हवाला देकर केंद्र सरकार भले ही अपना दामन बचाने का प्रयास कर रही हो पर वह रेत में गर्दन गडाए शतुर्मुग से अधिक कुछ और नहीं कर पा रही है। पूर्व में डाओ केमिकल के साथ जो 47 करोड डालर का फैसला हुआ था, उसे बढाने के मामले में भी कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। आश्चर्य तो इस बात पर है कि मंत्रीमण्डल की पांच बैठकों के बाद भी यह मामला निरूत्तरित ही है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि भोपाल गैस कांड के बाद 26 सालों के उपरांत आए लचर फैसले से देश भर में गुस्सा चरम पर है, और केंद्र सरकार है कि ठीक उसी तरह चैन की बंसी बजा रही है जिस तरह जलते रोम देश के दौरान वहां का शासक नीरो चैन की बंसी बजा रहा था।
महिलाएं अबला या ‘‘आ बला‘‘!
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यवस्था से समूचा पुरूष समाज सकते में आ गया है। दिल्ली में दहेज उत्पीडन मामले में पत्नि सहित ससुराल पक्ष के लोगों ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ आपराधिक मामला पंजीबद्ध करवाया है। अब इस मामले में उच्च न्यायालय ने कहा है कि वह अपनी पत्नि के लिए मकान खरीदे या जेल जाने को तैयार रहे। इसके लिए कोर्ट ने पत्नि से अठ्ठारह लाख रूपए तक का मकान देखने को भी कहा है। देश में महिलाओं के पक्ष में कानून के लचीलेपन का बेजा फायदा उठाने से महिलाएं चूक नहीं रहीं हैं। दहेज उत्पीडन जैसे हथियार के जरिए महिलाओं द्वारा पुरूषों को प्रताडित किया जाता रहा है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि दशकों पुराने बने इस कानून में संशोधन के लिए राष्ट्रव्यापी बहस करवाई जाए और उसके उपरांत इसमें संशोधन किया जाए। सवाल यह उठता है कि अगर पति सक्षम नहीं है तो वह आखिर कहां से अपनी पत्नि या बच्चों को गुजारा भत्ता देगा! एक तरफ तो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की वकालत हो रही है उससे उलट इस मामले में सारी जिम्मेदारी पति पर ही आयत करना उचित नहीं कहा जा सकता है।
जवाब में खोल ही दी नकल माफिया की पोल
स्कूल हो या कालेज उत्तर प्रदेश में नकल माफिया का बोलबाला इतना है कि सरकारें उनका कुछ भी नहीं बिगाडने की स्थिति में हैं। यूपी बोर्ड भले ही एशिया की सबसे बडी परीक्षा करवाने का गौरव अपने भाल पर बांधे अपनी पीठ ठोक रहा हो पर यह सत्य है कि यूपी में नकल माफिया की जडें बहुत ही गहरी हैं। विश्व के सात अजूबों में शामिल ताज महल को अपने आंचल में समेटने वाले आगरा शहर में डेढ दर्जन विद्यार्थियों ने अपने भविष्य की परवाह न करते हुए उत्तर पुस्तिकाओं में प्रश्नपत्र को हल करने के बजाए नकल माफिया का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया है। इन विद्यार्थियों ने लिखा है कि पांच हजार न देने पर फेल कराने की धमकी दी थी, नकल माफिया ने। इतना ही नहीं इसमें तीन शिक्षक, दो लिपिक और बीस नकल माफियाओं के नामों का उल्लेख किया गया है। इन सभी ने आग्रह किया है कि उनकी बात को बोर्ड तक पहुंचाया जाए। अरे विद्यार्थी मित्रों क्या आप यह मानते हैं कि बोर्ड की मिलीभगत के बिना यह सब संभव है, नहीं न, तो बस अब क्या किया जा सकता है, सिस्टम मंे ही जंग लग चुकी है, फिर किससे उम्मीद रखी जाए।
लालू यादव का पुत्रमोह
संप्रग सरकार के पहले चरण में स्वयंभू प्रबंधन गुरू बनकर उभरे लालू प्रसाद यादव इन दिनों राजनीति से निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर हैं। लालू यादव को संप्रग दो में तवज्जो नहीं मिल सकी है। उनका रेल महकमा भी अब उन्हें घास नहीं डाल रहा है। तेज तर्रार ममता बनर्जी को रेल विभाग का दायित्व सौंपा गया है। लालू यादव के मन में अब पुत्रमोह जबर्दस्त तरीके से जागा है। अन्य नेताओं की तरह लालू यादव ने भी अब अपनी विरासत अपने उत्तारधिकारी तेजस्वी को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। इसके पहले वे अपनी अर्धांग्नी को राजनीति में कुदा चुके हैं। लगता है कि लालू यादव यह संदेश देना चाह रहे हैं कि वंशवाद की राजनीति का कापीराईट नेहरू गांधी परिवार वाली कांग्रेस के पास नहीं है, वे भी इसका उपयोग कर सकते हैं। लालू की बदौलत आईपीएल टीम के सदस्य तो बन गए तेजस्वी पर वे अभी बडे खिलाडियों की सेवा टहल में ही लगे हैं, राजनीति में वे उपर से उतरंेगे तो जाहिर है उन्हें किसी की सेवा टहल नहीं करना होगा।
पुच्छल तारा
जिंदगी और मौत को अनेक कवियों, शायरों, कथाकरों आदि ने परिभाषित किया है। जिंदगी के बारे में न जाने कितनी बातें कहीं गईं हैं, और उससे कहीं ओर मौत के बारे में दोनों के बीच सामंजस्य भी बिठाया गया है। गुड्डू ठाकुर एक ईमेल भेजकर इसी को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। गुड्डू ठाकुर लिखते हैं कि सरदार भगत सिंह ने सही कहा था कि ‘‘जिंदगी तो अपनी ही ‘दम‘ पर जी जाती है. . . .।‘‘ क्योंकि . . . ‘‘औरों के कांधों पर तो ‘जनाजे‘ ही उठा करते हैं. . . .।‘‘

शुक्रवार, 25 जून 2010

सांप के भागने के बाद लकीर तक नहीं पीटी जनसेवकों ने!

सुस्सुप्तावस्था के 26 साल

वोट बैंक की खातिर अब घडियाली आंसू बहा रहे हैं नेता

एंडरसन को लाने के बजाए देश के दोषियों को डाला जाए जेल में

आखिर क्यों खामोश हैं कांग्रेस की राजमाता

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक तक माध्यमिक शिक्षा के अध्ययन के दरम्यान प्राणी विज्ञान विषय मंे मेंढक के बारे में सविस्तार पढाया जाता था। मेंढक बारिश में पूरी तरह सक्रिय हो जाते हैं फिर उसके बाद शनैः शनैः वे निष्क्रीय होने लगते हैं। साल में कुछ माह एसे होते हैं, जिनमें मेंढक न कुछ खाते हैं न पीते हैं, बस पडे रहते हैं, यह कहलाती है ‘‘सुस्सुप्तावस्था‘‘। आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य की सरकारें रीढ विहीन विपक्ष दोनों ही दुनिया की अब तक की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी ‘भोपाल गैस कांड‘ के छब्बीस साल बीतने तक सुस्सुप्तावस्था में रहे। इसका फैसला आने के बाद फिर इन दोनों ही बिरादरी के मेंढकों ने अपना मुंह खोला और बारिश की फुहार होते ही टर्राना आरंभ कर दिया है।

कितने आश्चर्य की बात है कि बीस हजार लोगों को असमय ही मौत के मुंह में ढकेलने और लाखों को स्थाई या आंशिक अपंग और बीमार बनाने के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को भारत सरकार के नुमाईंदे, अखिल भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश काडर के अधिकारी तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिह और जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी दोनों ही सरकारी वाहन में उस हत्यारे के चालक परिचालक बनकर उसे राजकीय अतिथि के मानिंद विमानतल तक छोडने गए। सभी ने इस तरह के फुटेज निजी समाचार चेनल्स में देखे हैं।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी छोटी मोटी बात को तानकर चद्दर बनाने वाले राजनेताओं ने छब्बीस साल तक इस मामले में मौन साधे रखा था। किसी ने इसमें हताहत हुए या जान गंवा चुके लोगों की सुध नहीं ली। न्यायालय ने चाहे जो सजा दी है, किन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह तो इस मामले में जनता के कटघरे में दोषी सिद्ध हो चुके हैं। मामला आईने के मानिंद साफ है कि कांग्रेस के सर्वेसर्वा रहे नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढी के पायोनियर स्व.राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र और कांग्रेस की ही कुंवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने हत्यारे वारेन एंडरसन को सुरक्षित भारत से बाहर जाने के मार्ग प्रशस्त किए थे।

1984 के गैस हादसे के उपरांत के घटनाक्रम से साफ हो जाता है कि कार्पोरेट जगत में यह संदेश साफ तौर पर चला गया कि जहरीले कीटनाशकों का करोबार करने वाली अंतर्राष्ट्रीय फर्म चाहें तो अपनी लापरवाही के बाद हजारों हत्याएं और लाखों को मजबूर बनने के बाद भी पैसे के दम पर साफ बचकर निकल सकते हैं। भारत गणराज्य की नपुंसक तत्कालीन कांग्रेस सरकार और मध्य प्रदेश की सरकार ने अपनी रियाया के प्रति जवाबदेही दर्शाने के बजाए आरोपी गोरी चमडी वालों की जवाबदेही को ढांकने का ही प्रयास किया, जो निंदनीय है। 1992 में विश्व विकास प्रतिवेदन मेें अमेरिका के लारेंस समर्स ने प्रस्तवा दिया था कि प्रदूषणकारी उद्योगों को तीसरी दुनिया अर्थात गरीब या अविकसित देशों की ओर भेज वहां की अर्थव्यवस्था को सुद्रढ किया जाए। दरअसल यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाए अपने देशों को प्रदूषण से मुक्त करने का कुत्सित प्रयास था, जिसे हिन्दुस्तान के तानाशाह शासक नहीं समझ सके।

आज मीडिया सहित सभी लोग इस बात पर अडिग हैं कि नब्बे के पेटे में जी रहे वारेन एंडरसन को भारत लाया जाए। भारत को अमेरिका के साथ की गई प्रत्यार्पण संधि के तहत अब तक यह कदम उठा लेना चाहिए था, किन्तु ‘‘समरथ को कहां दोष गोसाईं।‘‘ अमेरिका दुनिया का चौधरी है, भारत उससे दबता है, डरता है, दहशत खाता है, यह बात सत्य है। यही कारण है कि अमेरिका के सामने वह उंची आवाज में बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। एंडरसन को भारत नहीं लाया गया और भविष्य में भी उसके आने की संभावनाएं बहुत बलवती नहीं प्रतीत होती हैं, फिर सवाल यह उठता है कि एंडरसन को भारत से भगाने के लिए दोषियों के मामले में केंद्र सरकार मौन क्यों साधे हुए है। क्या वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह सहित कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का यह दायित्व नहीं बनता है कि वे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह से जोर डालकर इस बात को पूछें कि आखिर कौन था जिसने हजारों लाखों लोगों की हत्या और बीमार होने के दोषी एंडरसन को भारत से भगाया! जाहिर सी बात है दोनों ही कुंवर अर्जुन सिंह से यह बात पूछने का साहस नहीं कर पाएंगे, क्योंकि अगर कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी गाडी का स्टेयरिंग तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के पति स्व.राजीव गांधी की ओर कर दिया तब क्या होगा। बस इतनी सी बात से खौफजदा होकर कांग्रेस चुपचाप बैठी अपनी भद्द पिटवा रही है।

भोपाल गैस कांड के उपरांत सरकारी मशीनरी द्वारा उठाए गए हर कदम को ‘‘विचित्र किन्तु सत्य‘‘ की श्रेणी में रखा जा सकता है। 1996 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूरे मामले को कमजोर कर दिया, आरोपों की लीपापोती कर दी गई और सीबीआई चुपचाप सब कुछ देखती सुनती रही। कांग्रेस का जमीर तो देखिए कितना गिर गया, उसने सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्याधीश जस्टिस ए.एम.अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल का प्रमुख बना दिया। इतना ही नहीं भाजपा ने कुछ घंटों के लिए एंडरसन के सारथी और बाडी गार्ड बने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को राज्यमंत्री का दर्जा दिया। जब बात उछली तो उन्हें हटा दिया गया। बाद में स्वराज पुरी को कांग्रेस ने एंडरसन को भगाने का पारितोषक दे दिया। मनरेगा में पुरी की नियुक्ति एमीनंेट सिटीजन के तौर पर कर दी गई। आखिर यह सब कुछ कर कांग्रेस और भाजपा क्या संदेश देना चाहती हैं, यह बात समझ से परे ही है। विदेश यात्रा से लौटने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि इस हासदे के लिए व्यवस्था नहीं व्यक्ति दोषी है! जिसका जो मन आ रहा है दे रहा है वक्तव्य जमा कर। विज्ञप्तिवीर, और बयानवीर नेताओं की सेनाएं सज चुकी हैं, चारों तरफ से बयान और विज्ञप्तियों के तीरों की बौछारें हो रहीं हैं। देश की जनता विशेषकर गैस से प्रभावित लोगों के परिवार अवसाद में जा रहे हैं, पर किसी को इस बात की कोई परवाह नहीं है।

देखा जाए तो भोपाल गैस पीडितों के लिए सरकार के अब तक के प्रयास नाकाफी ही हैं। राजधानी भोपाल का कमला नेहरू चिकित्सालय बनने के बाद कितने दिनों तक शोभा की सुपारी बना रहा। हमीदिया अस्पताल के छोटे से मिक वार्ड में ठसाठस भरे कराहते मरीजों ने न जाने कितने दिनों तक हिटलर के गेस चेम्बर की यातना भोगी है। वस्तुतः देखा जाए तो यूनियन कार्बाईड के संयत्र का विषेला कचरा अभी तक हटाया नहीं गया है। इतना ही नहीं आसपास के रहवासियों को आज भी पीने का साफ पानी मुहैया नहीं है। छब्बीस सालों में भी अगर कांग्रेस और भाजपा ने सत्ता की मलाई खाने के बाद भी गैस पीडितों के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए हैं तो उन्हें सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार कतई नहीं है। हमारे कहने से क्या होता है, आज मोटी चमडी वाले जनसेवकों को तो यह भी पता नहीं है कि नैतिकता किस चिडिया का नाम है।

गुरुवार, 24 जून 2010

क्या हो गया नेहरू गांधी की कांग्रेस को!

वर्तमान कालिख पोत रहा है कांग्रेस के स्वर्णिम इतिहास पर

हजारों के कातिल एंडरसन के बाडीगार्ड को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस

मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन बनाया स्वराज पुरी को

(लिमटी खरे)

‘‘भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका किसने निभाई? भारत गणराज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सत्तर के दशक तक ईमानदारी तक किसने प्रयास किया? देश को विकास के पथ पर कौन ले जाने प्रयासरत रहा है? भारत पर जान न्योछावर करने वाले  सच्चे वीर सपूत किस दल से संबद्ध थे?‘‘ इन सारे जवाबों का एक ही उत्तर आता है और वह है ‘‘कांग्रेस‘‘। वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा इससे उलटा ही दिख रहा है। अस्सी के दशक के उपरांत की कांग्रेस ने सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का मौखटा अवश्य ही लगाया हुआ है, पर वह काम अपने मूल आदर्श और उद्देश्यों से हटकर ही कर रही है। सच ही कहा है ‘‘जब नास मनुस का छाता है, तब विवेक मर जाता है।‘‘ कांग्रेस के साथ भी कुछ इसी तरह का हो रहा है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेस का विवेक, आत्म सम्मान और स्वाभिमान या तो मर चुका है, या फिर उसने विदेशियों के हाथों गिरवी रख दिया है।

भोपाल गैस कांड के घटने के बाद छब्बीस साल तक वही कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है, अनर्गल उल जलूल हरकतों पर उतारू हो गई है। कांग्रेस के कदम देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में अब प्रजातंत्र नहीं बचा है, देश में हिटलर शाही हावी हो चुकी है। कांग्रेस को जो मन में आ रहा है, वैसे फैसले ले रही है, बिना रीढ का विपक्ष भी आंखों पर पट्टी बांधकर चुपचाप देशवासियों के साथ अन्याय हो सह रहा है। वामदल हों या भाजपा या और किसी दल के सियासी नुमाईंदे सभी मलाई खाने को ही अपना प्रमुख धर्म मानकर काम करने में जुटे हुए हैं, आवाम के दुख दर्द से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं रहा है। रियाया मरती है तो मरती रहे, हम तो नोट छाप रहे हैं, जिसको जो सोचना है, सोचता रहे हम तो शतुर्मुग के मानिंद अपना सर रेत में गडाकर यह सोच रहे हैं कि हमें कोई देख नहीं रहा है।

2 और 3 दिसंबर 1984 में देश के हृदय प्रदेश में घटे भोपाल गैस हादसे में बीस हजार से अधिक लोग असमय ही काल कलवित हो गए थे, पांच लाख से ज्यादा प्रभावित या तो अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं या फिर घिसट घिसट कर जीवन यापन करने पर मजबूर हैं, पर जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। लेना देना हो भी तो क्यों, उनका अपना कोई सगा इसमें थोडे ही प्रभावित हुआ है। देश की जनता की जान की कीमत इन सभी जनसेवकों के लिए कीडे मकोडों से ज्यादा थोडे ही है। मोटी चमडी वाले जनसेवकों ने तो भोपाल हादसे में मारे गए लोगों के शवों पर सियासी रोटियां सेकने से भी गुरेज नहीं किया। छब्बीस साल तक गैस पीडित अपना दुखडा लेकर सरकारांे के सामने गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई है। अब जब फैसला आ गया है तब सारे दलों के लोगों का जमीर जागा है, वह भी जनता को लुभाने और दिखाने के लिए, अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए।

भोपाल गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन को भारत लाकर उसकी सुरक्षित वापसी में प्रत्यक्षतः प्रमुख भूमिका वाले भोपाल के तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को प्रदेश में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्ति के बाद मध्य प्रदेश में नर्मदा घटी विकास प्राधिकरण में शिकायत निवारण अथारिटी में पदस्थ कर राज्य मंत्री का दर्जा देकर उपकृत किया, अब किस मुंह से भाजपा गैस पीडितों के लिए लडने का दावा कर रही है यह बात समझ से ही परे है। 14 जून को मीडिया ने जब पूर्व मुख्यमंत्री सुंदर लाल पटवा से यह सवाल किया तब भाजपा का जमीर जगा और 15 जून को स्वराज पुरी को उनके पद से हटा दिया गया।

सेवानिवृत वरिष्ठ नौकरशाहों पर पता नहीं क्यों जनसेवक और सरकारें मेहरबान रहा करती हैं। हो सकता है कि सेवाकाल में जनसेवकों के अनैतिक कामों को अंजाम देने के बदले में उन्हें सरकारों द्वारा इस तरह का पारितोषक दिया जाता हो। मध्यप प्रदेश की भाजपा सरकार ने स्वराज पुरी को उनके पद से प्रथक किया तो ‘‘तेरी साडी मेरी साडी से सफेद कैसे‘‘ की तर्ज पर केद्र में सत्तारूढ कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एंडरसन के ‘‘बाडी गार्ड‘‘ रहे स्वराज पुरी को हाथों हाथ ले लिया है। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की पसंद बने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने स्वराज पुरी को महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में एमिनेंट सिटीजन बना दिया गया है। स्वराज पुरी की नियुक्ति दो वर्षों के लिए की गई है।

खबर है कि पुरी सहित पांच दर्जन से अधिक लोगों की नियुक्ति इस पद पर की गई है। इनका काम मनरेगा की जमीनी हालातों का जायजा लेकर केंद्र को रिपोर्ट सौंपना है। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री जोशी ने सभी सूबों के ग्रामीण विकास मंत्रियों को पत्र लिखकर न केवल इनकी नियुक्ति की सूचना दी है, वरन् पुरी सहित अन्य सिटीजन्स को उनके भ्रमण के दौरान आवश्यक सहयोग और सुविधाएं भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। चूंकि पुरी पर मध्य प्रदेश में दबाव है, अतः उन्हें छत्तीसगढ के राजनांदगांव का प्रभार सौंपा गया है।

आवाम ए हिन्द (भारत गणराज्य की जनता) की स्मृति से अभी यह विस्मृत नहीं हुआ है कि चंद दिनों पहले ही समाचार चेनल्स ने गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी के प्रहसन और उसके बाद एंडरसन के ‘‘बाडीगार्ड‘‘ और ‘‘सारथी‘‘ बनकर सरकारी वाहन में तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के साथ विमानतल तक पहुंचाने और राजकीय अतिथि के मानिंद उसे भगाने के फुटेज दिखाए गए थे। जनता के मन मस्तिष्क में कांग्रेस और भाजपा के प्रति यह सब देख सुनकर भावनाएं किस तरह की होंगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

कांग्रेस का इतिहास अस्सी के दशक तक स्वर्णिम माना जा सकता है। अस्सी के दशक के उपरांत जब स्व.राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा आम जनता के लिए भेजे गए एक रूपए में से चंद पैसे ही जनता के हित में खर्च हो पाते हैं। जब भारत गणराज्य जैसे शक्तिशाली देश का वजीरेआजम ही इस तरह की बात को स्वीकार करे वह भी सार्वजनिक तौर पर तो क्या कहा जा सकता है। इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार की जडों में खाद और पानी तबियत से डाला गया है। एक समय था जब सरकारी कार्यालयों में दप्तियां चस्पा होती थीं, जिन पर लिखा होता था, ‘‘घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, घूस लेने और देने वाले दोनों ही पाप के भागी हैं।‘‘ कालांतर में इस तरह के जुमले इतिहास की बात हो चुके हैं। नैतिकता आज दम तोड चुकी है, हावी हैं तो निहित स्वार्थ।

रीढ विहीन विपक्ष भी अपनी बोथली धार लिए सत्तापक्ष से युद्ध का स्वांग रच रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीन दशकों से चल रही ‘‘नूरा कुश्ती‘‘ से जनता उब चुकी है। अब विपक्ष की कथित हुंकार सुनकर जनता को उबकाई आने लगी है। बीस हजार लोगों के कातिल वारेन एंडरसन के बाडीगार्ड को भाजपा ने अपनी दहलीज से भगाया तो उसी स्वराज पुरी को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस, और पुरी को नियुक्त कर दिया मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन, वह भी दो साल के लिए। आज जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि नेहरू गांधी के सिद्धांतो पर चलने वाली कांग्रेस को अचानक क्या हो गया है?

बुधवार, 23 जून 2010

भोपाल गैस कांड के तंदूर पर रोटियां सेंकने से बाज आंए राजनेता

समझ से परे है सरकार का अहमदी प्रेम

दोषी अफसरान को भाल का तिलक क्यों बनाती रहीं सरकारें

जीएमओ में कमल नाथ का क्या काम

अर्जुन की अध्यक्षता वाले जीएमओ की सिफारिश का क्या हुआ!

क्या जनता के ध्यान भटकाव के लिए गठित होते हैं जीएमओ

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सत्तर के दशक के उपरांत देश में नैतिकता को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया गया है। मानवीय मूल्यों पर निहित स्वार्थ पूरी तरह हावी हो गए हैं। कहने को भारत गणराज्य का प्रजातंत्र समूचे विश्व में अनूठा है, पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। आज सत्ताधारी दल के साथ ही साथ विपक्ष ने अपने आदर्श, नैतिकता, जनसेवा पर अपने खुद के बनाए गए स्वार्थांे को हावी कर लिया है। ‘‘हमें क्या लेना देना, हमारे साथ कौन सा बुरा हुआ, हम क्यों किसी के पचडे में फंसें, जनता कौन सा खाने को देती है, कल वो हमारे खिलाफ खडा हो गया तो, हमें राजनीति करनी है भईया, हम उनके मामले मंे नहीं बोलेंगे तो कल वे हमारे मामले में मुंह नहीं खोलेंगे, आदि जैसी सोच के चलते भारत में राजनैतिक स्तर रसातल से भी नीचे चला गया है।

छब्बीस साल पहले देश के हृदय प्रदेश भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के बाद उसके लिए जिम्मेदार रहे अफसरान को न केवल उस वक्त केंद्र और सूबें में सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस ने मलाईदार ओहदों पर रखा, वरन जब विपक्ष में बैठी भाजपा को मौका मिला उसने भी भोपाल गैस त्रासदी के इन बदनुमा दागों को अपने भाल का तिलक बनाने से गुरेज नहीं किया। देश की सबसे बडी अदालत में जब जस्टिस ए.एस.अहमदी ने धाराओं को बदला तब केंद्र सरकार शांत रही। फिर उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों को सेवानिवृत्ति के बाद मोटी पेंशन देने के बाद भी उनके पुनर्वास के लिए उन्हें किसी निगम मण्डल, आयोग, ट्रस्ट का सदस्य या अध्यक्ष बनाने की अपनी प्रवृत्ति के चलते इनकी लाख गलतियां माफी योग्य हो जाती हैं।

इसी तर्ज पर जस्टिस अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया गया। क्या सरकार ने एक बारगी भी यह नहीं सोचा कि इन धाराओं को बदलकर जस्टिस अहमदी ने भोपाल में मारे गए बीस हजार से अधिक लोगों और पांच लाख से अधिक पीडित या उनके परिवारों के साथ अन्याय किया है। सच ही है राजनीति को अगर एक लाईन में परिभाषित किया जाए तो ‘‘जिस नीति से राज हासिल हो वही राजनीति है।‘‘ कांग्रेस या भाजपा को इस बात से क्या लेना देना था और है कि किन परिस्थितियों में धाराओं को बदला गया।

भोपाल में न्यायालय में मोहन प्रकाश तिवारी ने जो फैसला दिया उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि उन्होंने अपने विवेक से सही फैसला दिया है। जब प्रकरण को ही कमजोर कर प्रस्तुत किया गया तो भारतीय कानून के अनुसार उसके लिए जितनी सजा का प्रावधान होगा वही तो फैसला दिया जाएगा। चूंकि देश की सबसे बडी अदालत ने पहली बार आरोप तय किए थे, तो उससे निचली अदालत उसे किस आधार पर बदल सकती है। भारतीय काननू में यह अधिकार उपरी अदालतों को है कि वे अपने नीचे की अदालतों के फैसलों की समीक्षा कर नई व्यवस्था दें।

जब फैसला आ चुका है, देश व्यापी बहस आरंभ हो चुकी है, तब फिर पूर्व न्यायाधिपति को भोपाल मेमोरियल का अध्यक्ष बनाए रखने का ओचित्य समझ से परे है। सरकार को चाहिए था कि तत्काल प्रभाव से उन्हें इस पद से हटा देेते। मामला आईने की तरह साफ है। सबको सब कुछ समझ में आ रहा है कि दोषी कौन है, पर ‘‘हमें क्या करना है‘‘ वाली सोच के चलते जनता गुमराह होती जा रही है।

प्रधानमंत्री को भी लगा कि मामला कुछ संगीन और संवेदनशील होता जा रहा है। देश भर में इसके खिलाफ माहौल बनता जा रहा है तो उन्होंने भी मंत्री समूह के गठन की औपचारिकता निभा दी। इस मंत्री समूह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को भी रखा गया है। कमल नाथ अस्सी से लगातार संसद सदस्य हैं, चोरासी में भी वे संसद सदस्य थे। राजीव और संजय गांधी के उपरांत प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ का यह पहला टेन्योर था सांसद के रूप में। वे मध्य प्रदेश के छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र से चुगे गए थे। इसके बाद वे नरसिंहराव सरकार में वन एवं पर्यवरण तथा वस्त्र मंत्री रहे हैं। इसके बाद वाणिज्य उद्योग और अब भूतल परिवहन मंत्री हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि बतौर सांसद मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी कमल नाथ ने आज तक भोपाल गैस कांड के लिए क्या किया है!

इसका उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही आएगा। जब तीस सालों में उन्होंने अपने निर्वाचन वाले सूबे में भोपाल गैस कांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुछ नहीं कहा और किया तो अब मंत्री समूह में रहकर वे क्या कर लेंगे। वरिष्ठ पत्रकार ‘‘आलोक तोमर‘‘ अपनी वेव साईट में लिखते हैं कि कमल नाथ भोपाल के गुनाहगार कैसे हैं! वे लिखते हैं कि कमल नाथ के खिलाफ एक बात उछाली जा रही है कि वाशिंगटन में 28 जून 2007 को कमल नाथ की एक पत्र वार्ता को उछाला जा रहा है कि जिसमें उन्होने कहा था कि डाओ केमिकल ने यूनियन कार्बाईड को खरीद लिया है, हादसे के वक्त डाओ केमिकल अस्तित्व में नहीं थी। वरिष्ठ राजनेता और तीस साल की सांसदी कर चुके कमल नाथ को डाओ केमिकल का पक्ष लेने के बजाए भोपाल गैस कांड के मृतकों के परिजनों और पीडितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था, जो उन्होंने किसी भी दृष्टि से नहीं दिखाया। भोपाल कांड के मृतकों की कीमत पर डाओ केमिकल को देश में फिर से आमद देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह भोपाल गैस कांड के मृतकों और पीडितों को एक गाली से कम नहीं है। आज आरोप प्रत्यारोप के कभी न थमने वाले दौर आरंभ हो चुके हैं। भोपाल गैस कांड के फैसले से सियासी तंदूर फिर गरम होकर लाल हो चुका है। सभी जनसेवक अब अपने अपने हिसाब से इसमें अपने विरोधियों के खिलाफ तंदूरी रोटी सेंकना आरंभ कर चुके हैं। एक दूसरे के कपडे उतारने वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि मृतकों के परिजनों और पीडितों को उनके वर्चस्व की लडाई से कोई लेना देना चहीं है, वे तो बस न्याय चाह रहे हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गैस राहत मंत्री बाबू लाल गौर का जमीर भी अचानक जागा है। उन्होंने भी इस तंदूर में अपनी दो चार रोटियां चिपका दी हैं। गौर का कहना है कि 1991 में जब वे गैस राहत मंत्री थे तब उन्होने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव को पत्र भी लिखा था। बकौल गौर भोपाल के गैस प्रभावित 36 वार्ड के पांच लाख 58 हजार 245 गैस प्रभावितों में से महज 42 हजार 208 पीडितों को ही मुआवजा देने की बात कही थी उस समय के मंत्री समूह ने। गौर के इस प्रस्ताव पर कि शेष बीस वार्ड के पांच लाख 16 हजार 37 पीडितों को मुआवजा देने पर उस समय गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष कुंवर अर्जुन सिंह सहमत थे। बाबू लाल गौर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, पर वे इस बात को बताने से क्यों कतरा रहे हैं कि उन्होंने विधायक रहते इस मामले को कितनी मर्तबा विधानसभा के पटल पर उठाया। वे भोपाल शहर से ही विधायक चुने जाते आए हैं, वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने विधानसभा क्षेत्र के भोपाल शहर के गैस पीडितों के लिए क्या प्रयास किए। बाबू लाल गौर को इन बातों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री डॉ मन मोहन सिंह क्या सारे राजनेता इस बात को जानते हैं कि पब्लिक मेमोरी (जनता की याददाश्त) बहुत ही कमजोर होती है। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर या संसद पर हमला हो या फिर देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले की बात। हर मामले में जैसे ही घटना घटती है, वैसे ही चौक चौराहों, पान की दुकानों पर बहस गरम हो जाती है, फिर समय के साथ ही ये चर्चाएं दम तोड देती हैं। भोपाल गैस कांड में भी कुछ यही हो रहा है। मामला अभी गर्म है सो कुछ न कुछ तो करना ही है। मंत्री समूह का गठन कर जनता को भटकाना ही उचित लगा सरकार को। क्या भाजपा के अंदर इतना माद्दा है कि वह कंेद्र सरकार से प्रश्न करे कि गैस कांड के वक्त मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में 1991 गठित मंत्री समूह की सिफारिशें क्या थीं, और क्या उन्हें लागू किया गया, अगर नहीं तो अब एक बार फिर से मंत्री समूह के गठन का ओचित्य क्या है! क्या इसका गठन मामले को शांत करने और जनता का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाने के लिए है। मीडिया अगर ठान ले और इस मामले को सीरियल के तौर पर चलाते रहे तो देश प्रदेश की सरकारों के साथ ही जनसेवकों को घुटने टेकने पर मजबूर होना पडेगा, यही गैस कांड के मृतकों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजली होगी और न्याय की आस में पथरा चुकी पीडितों की आखों में रोशनी की किरण का सूत्रपात हो सकेगा।