मंगलवार, 14 सितंबर 2010

चप्पल फीवर से घिरे हैं युवराज

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

चप्पल फीवर से घिरे हैं युवराज

जब से राजनेताओं के उपर जूते चप्पल फेंकने की घटनाएं घटना आरंभ हो गई हैं, तब से राजनेताओं के मन में जूते चप्पलों का खौफ जबर्दस्त तरीके से छाने लगा है। पिछले दिनों कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी के एक कार्यक्रम में भी चप्पल जूतों के डर की छाया साफ साफ दिखाई पड़ी। महाराष्ट्र के अकोला में पंजाब राव देशमुख कृषि विद्यापीठ में संपन्न हुए राहुल गांधी के कार्यक्रम में सुरक्षा कर्मियों द्वारा किसी भी छात्र को चप्पल पहनकर हाल के अंदर प्रवेश करने नहीं दिया गया। नाराज छात्रों द्वारा कार्यक्रम का अघोषित बहिष्कार कर दिया। राहुल गांधी एक दिन के प्रवास पर अकोला गए थे, जहां उन्हें युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करना था। चप्पल फीवर के चलते राहुल गांधी के सुरक्षा कर्मियों ने विद्यार्थियों के बेल्ट और चप्पल बाहर ही उतरवाना चालू कर दिया। नाराज छात्रों ने नारेबाजी करते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। जब सुरक्षा कर्मियों को अपनी भूल का एहसास हुआ तब तक तो चिडिया खेत चुग चुकी थी। राहुल गांधी भी अपने इस तरह के फीके कार्यक्रम से खासे खफा ही नजर आए।

सरकार कर रही है गरीबों का खाना खराब

देश में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है, यह बात प्रायमरी स्कूल की कक्षाओं से लेकर प्रोढ़ावस्था तक हिन्दुस्तान में जतलाई जाती रही है। सरकारी गोदामों में सड़ते अनाज पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने चिंता जताकर सरकार को आड़े हाथांे लेते हुए फटकार लगाई थी कि अनाज को सड़ने के बजाए गरीबों में मुफत में बांट दिया जाए तो बेहतर होगा। देश के नीति निर्धारकों को इस बात की परवाह नहीं है कि गरीबों को दो वक्त की रोटी मिल रही है कि नहीं, उन्हें तो बस अपने वेतन भत्तों ेस मतलब है। पिछले साल केंद्र अक्टूबर माह से अब तक केंद्र सरकार द्वारा एक करोड़ दस लाख टन अनाज का आवंटन जारी किया था। राज्य सरकारों ने इसमें से महज 33 लाख 80 हजार टन अनाज ही उठाया है। दरसअल अनाज का की कीमत बहुत ज्यादा होती है, जिससे सूबों की सरकारें खरीदनें आनाकानी करती हैं। इसके अलावा ब्रेड और बिस्किट बनाने वाली कंपनियों द्वारा भी गरीबों के अनाज पर नजरें लगाई जाती हैं, जिससे निवाला गरीबों के पास जाने के बजाए इन कंपनियों के खाते में चला जाता है।

राम के भरोसे है भाजपा

भारतीय जनता पार्टी चाहे जो भी कहे पर वह भगवान राम को छोड़ने की स्थिति में कतई नहीं है। जब तब राम के नाम को भुनाकर सत्ता हासिल करने में भी भाजपा को गुरेज नहीं होता है। राम के नाम पर सबसे अधिक राजनैतिक रोटियां किसी ने सेंकी हैं, तो वे हैं राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी। यह अलहदा बात है कि सत्ता की मलाई को चखने के साथ ही भाजपा द्वारा राम के नाम को ‘‘राम भरोसे‘‘ ही छोड़ दिया जाता है। केंद्र में तीन बार सत्ता का स्वाद चखने वाली भाजपा ने जब मौका मिला था, तब उसने राम के नाम का भरपूर उपयोग किया है। बाबरी ढांचे और राम जन्म भूमि के मामले में अभी इलहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आना अभी बाकी है। इसके फैसले के बाद एक बार फिर राम एजेंडे पर भाजपा लौट आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने लखनऊ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के समापन अवसर पर पुनः राम को याद करते हुए कहा है कि भाजपा सब कुछ छोड़ सकती है, राम को नहीं, क्योंकि राम, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति की पहचान है।


कामन वेल्थ गेम्स के चलते पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के भौडसी स्थित फार्म हाउस के दिन फिर सकते हैं। हरियाणा में 588 एकड़ में फैले इस फार्म हाउस में प्लांटेशन और झीलों के सोंदर्यीकरण का जिम्मा वन विभाग का था, साथ ही इसके रखरखाव और पर्यटकों को अकर्षित करने की जवाबदारी पर्यटन विभाग के कांधों पर दी गई थी। पूर्व में बनाई गई कार्ययोजना में पर्यटकों को रात रूकने की सुविधा भी इस फार्म हाउस में उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी। अब जबकि राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन में गिनती के ही दिन बचे हैं, तब किसी का ध्यान पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के फार्म हाउस की ओर नहीं जा रहा है। इस फार्म हाउस की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी प्रशासन को सौंपी गई थी, साथ ही साथ पर्यटकों को भीड़ भाड़ से दूर प्राकृतिक माहौल देने के लिए बीस अतिरिक्त कमरों के निर्माण की बात भी फिजा में थी। आज चंद्रशेखर के फार्म हाउस की हालत क्या है, इस बारे में सोचने समझने की न तो किसी के पास फुर्सत है और न ही इसमें किसी को लाभ ही दिख रहा है।

अवैध खदानों का गढ़ बना एमपी

देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश में शिव का राज चल रहा है। मध्य प्रदेश में इस समय सबसे अधिक कोई काम हो रहा है तो वह है, अवैध उत्खनन का। कांग्रेस का आरोप है कि शिवराज के संरक्षण में उनके नाते रिश्तेदार और भाजपाईयों द्वारा अवैध तौर पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में कहा गया है कि पर्यावरण की स्वीकृति के बिना मध्य प्रदेश में 11 सौ से अधिक अवैध खदाने चल रही हैं। मुख्य न्यायाधिपति जस्टिस एस.आर.आलम और जस्टिस अर.एस.गर्ग की युगल पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर कहा है कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली खदानों के लिए पर्यावरण की अनुमति लेना अनिवार्य है। बताते हैं कि याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार ने इस नियम के बाद भी पूरे प्रदेश में तकरीबन 11 सौ से अधिक रेत या बजरी खदानों के संचालन के लिए छूट प्रदान की है, जो अवैधानिक है।

राजघाट जाने से कतराते अमन के सौदागर

आधी धोती में उन ब्रितानियों को जिनका सूरज कभी नहीं डूबता था, को भारत देश से भगाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में देश विदेश के लोग आकर दिल्ली के राजघाट में जाकर अपना मत्था अवश्य ही टेका करते हैं। पिछले कुछ दिनों से यह बात सामने आ रही है कि अमन के सौदागर जब भी भारत आए हैं, उन्होंने बापू की समाधी जाने से अपने आप को बचाकर ही रखा है। पिछले दिनों अतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के महानिदेशक मोहम्मद अली बरदेई जब इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित हुए तब बापू को श्रृद्धांजली अर्पित करने नहीं गए। इसके पहले विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक पास्कल लेमी ने भी तीन दिन दिल्ली में अपना समय बिताया पर वे भी राजघाट जाने से बचते रहे। और तो और समूची दुनिया में शांति बनाए रखने की बातों की हिमायती अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन द्वारा दिल्ली यात्रा के दौरान राजघाट से दूरी बनाए रखी। कुल मिलाकर भारत सरकार द्वारा बापू के बारे में जाने अनजाने हर परिदृश्य में कम भाव दिए जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर बापू के नाम की ब्रेंडिंग की जरूरत है।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

प्रख्यात साहित्यकार, व्यंग्यकार, कहानीकार रहे शरद जोशी ने एक व्यंग्य कथा लिखी थी, शीर्षक था ‘‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे‘‘। आज के परिदृश्य में भारत में यह बात सौ फीसदी फिट ही बैठ रही है। भारत में आज भ्रष्टों की तादाद बहुत ही ज्यादा हो चुकी है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त रहे प्रत्युश सिन्हा का कहना है कि देश में महज 20 फीसदी लोग ही ईमानदार बचे हैं। हर तीन में से एक भारतीय भ्रष्ट है। सिन्हा का यह कहना वाकई पुराने दिनों या सत्तर के दशक की याद ताजा करता है कि सत्तर के दशक की सामप्ति तक भ्रष्टाचार में रत सरकारी कर्मचारी को लोग हिकारत भरी नजरों से देखा करते थे। इतना ही नहीं इसे सामाजिक तौर पर कलंक माना जाता था। उस समय हर कार्यालय में यही लिखा होता था कि घूस यानी रिश्वत लेना और देना दोनों ही अपराध है और लेने वाला तथा देने वाला दोनों ही पाप के भागी हैं।

नेहवाल ने चलाया तीर

भारत में कामन वेल्थ गेम्स होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार की बातें अब केंद्र सरकार द्वारा मैनेज की जा चुकी हैं। कल तक भ्रष्टाचार के बारे में गला फाडने वाला मीडिया अब शांति से बैठ गया है। सब कुछ ‘‘मैनेज‘‘ है। इसी बीच राजीव गांघी खेल रत्न अवार्ड से नवाजी गई विश्व की तीसरे नंबर की बेडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल ने नया शिगूफा छोड दिया है। सायना का कहना है कि भारत देश कामन वेल्थ गेम्स आयोजित करने में सक्षम है ही नहीं। सबसे ज्यादा मजे की बात तो यह है कि सायना नेहवाल दिल्ली कामन वेल्थ गेम्स की ब्रांड एम्बेसेडर है। सायना की इस तरह की बयान बाजी से आयोजन समिति सकते में है। सायना की नजरें स्टेडियम पर गईं और उन्होने स्टेडियम की खुलकर आलोचना की है। अब जबकि समय कम बचा है तब एक ब्रांड एम्बेसेडर की इस तरह की टिप्पणी वाकई में आयोजकों के हाथ पैर फुलाने के लिए पर्याप्त है।

बदला लेकर रहेगी फिजा

भजनलाल परिवार की बहू रही फिजा मोहम्मद अब भी प्रतिशोध की आग में जल रही है। फिजा मानती है कि भजनलाल परिवार का राजनैतिक तौर पर अवसान हो चुका है। चंद्रमोहन के साथ शादी करने के बाद फिजा बनने वाली का कहना है कि धर्म कोई कपड़ा नहीं है जिसे बार बार बदला जाए। उनका कहना है कि वे फिजा हैं और फिजा ही रहेंगी। फिजा को खतरा है कि भजनलाल और चंद्रमोहन द्वारा पंजाब पुलिस के माध्यम से उन पर दबाव बनवाया जा रहा है कि वे भजनलाल परिवार पर चल रहे प्रकरण वापस ले लें। अकेले रहने का हवाला देते हुए फिजा का कहना है कि उन्होने भूपेंद्र ंिसंह हुड्डा के नेतृत्व वाली सरकार से सुरक्षा मांगी पर उन्हें सुरक्षा नहीं मिल सकी है। हरियाणा में बढ़ते अपराध के लिए शासन प्रशासन को भी आड़े हाथों लेते हुए फिजा का कहना था कि वे एक संगठन को खड़ा करने पर विचार कर रही हैं। अगर फिजा ने दम मारा तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में भजनलाल परिवार पर संकट के बादल छा सकते हैं।

पुच्छल तारा

आज के समय में धूम्रपान और मद्यपान के बढ़ते चलन को देखकर नीचम से समीर सिन्हा ने एक ई मेल भेजा है। शिक्षक ने अपने छात्र से पूछा कि दो एसे किंग के नाम बताओ जो लोगों के मुंुह पर मुस्कुराहट सुकून और शांति लाए हों। एक छात्र खड़ा हुआ और बोला -‘‘सर, स्मो ‘किंग‘ और ड्रिं ‘किंग‘।‘‘
दिन फिर सकते हैं चंद्रशेखर के फार्महाउस के

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

बाऊ-बायोलाजी के अनुसार मानव शरीर पर प्रभाव

बाऊ-बायोलाजी के अनुसार भवन एवं पर्यावरण का मानव शरीर पर प्रभाव
    बाऊ-बायोलाजी का विकास लगभग 30 वर्ष पूर्व जर्मन डॉ0 गुस्ताक प्रेहरर वान फोल के अध्ययन के साथ प्रारंभ हुआ । जहॉं उसने एक गॉव में प्रेक्टिस करते समय पाया कि गॉंव में अधिकतर कैंसर मरीजों की संख्या भू चुम्बकीय विकिरण के कारण हैं तथा जिन कैंसर मरीजों की मौत हुई हैं वे विकृत भूगर्भीय चुम्बकीय क्षेत्र पर सोते थें । इस खोज से पृथ्वी के भू-चुम्बकीय प्रभाव तथा भवन निर्माण सामग्री से होने वाले विकिरण के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ । आज अधिकतर लोग सीमेंट, कांक्रीट एवं कांच के डब्बें में लगभग 90 प्रतिशत से ज्यादा समय व्यतीत करते हैं । उस पर भी मजा यह हैं कि इन सीमेंट के डिब्बों में जिन्हें हम घर या कार्यालय कहते हैं, में उपयोग की जाने वाली सामग्री सिनेटिक या आर्टिफिशियल होती हैं, फलस्वरूप अधिक से अधिक वक्त व्यक्ति रोगी होता चला जा रहा हैं । विभिन्न अप्राकृतिक सामग्री के उपयोग से हमारे वातावरण में वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा हैं ।
    बाऊ-बायोलाजी एक जर्मन वाक्य हैं जिसमें बाऊ का अर्थ होता हैं भवन एवं बायो ग्रीक शब्द हैं जिसका अर्थ हैं जीवन अर्थात् जीवन का विज्ञान । इन दोनों शब्दों को जोड़ते हुये जो शब्द बनता हैं उसका अर्थ हैं भवन एवं जीवन के अंर्तसम्बधों का विज्ञान ।
    बाऊ-बायोलाजी के दो कार्य क्षेत्र हैं पहला भवन निर्माण सामग्री का मानवीय स्वास्थ्य पर प्रभाव का अध्ययन एवं दूसरा इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी को भवन तथा कार्यालयों के निर्माण एवं सुधार करने हेतु उपयोग करना ।
आन्तरिक वायु प्रदूषण
    बाऊ-बायोलाजी सबसे प्रमुख समस्या आन्तरिक वायु प्रदूषण बताती हैं । घर या कार्यालय की आन्तरिक हवा में पेट्रोकेमिकल द्वारा निर्मित रसायन होते हैं और इनमें भी वे अत्यंत खतरनाक हैं जिनमें क्लोरीन उपयोग होती हैं, साथ ही एस्बेस्टोस,फायबर, सिन्थेटिक, माइक्रो ग्लास एवं कई अन्य प्रकार के टेक्सटाईल सामग्री वायु की गुणवत्ता को खराब कर रही हैं, यही नहीं धूल, धुऑं आदि के कारण भी इस स्थिति को और विकृत कर रहे हैं, कीटनाशक दवाऐं एवं रसायन न केवल आन्तरिक अपितु किसानों द्वारा फसलों पर इनके छिड़काव के कारण बाहर ग्रामीण वायु भी प्रदूषित हो रही हैं ।
विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र
    विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र दोनों ए0सी0 करंट हैं । दोनों एक दूसरें के अन्योन्याश्रित हैं, जहॉं तार में विद्युत प्रवाहित होती हैं, वहॉं चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित होता हैं, जहॉं चुम्बकीय धारा प्रवाहित होती हैं, वहॉ विद्युत क्षेत्र निर्मित होता हैं।    सामान्यतः शरीर का वोल्टेज 20 मि0ली0 वोल्ट पाया जाता हैं, परंतु वही व्यक्ति जब ऐसे बिस्तर पर सोता हैं जिसके पास बेड स्वीच आदि लगे हैं, या विद्युत धारा द्वारा बिस्तर को गर्म किया जाता हैं तो उसके शरीर का वोल्टेज 87000 मिली वोल्ट हो जाता हैं । यदि इस प्रकार के अधिक वोल्टेज के साथ लंबे समय तक रहा जायें तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती हैं ।
भवन निर्माण सामग्री द्वारा रेडीयेशन
    यह एक स्थापित तथ्य हैं कि प्रत्येक अणु में ऊर्जा होती हैं एवं प्रत्येक पदार्थ से ऊर्जा का विकिरण होता हैं, यह ऊर्जा विकिरण कहीं धनात्मक होता हैं एवं कहीं ऋणात्मक । हमारे भवन में प्रयुक्त सामग्री के ऊर्जा विकिरण के संयुक्त प्रभाव के फलस्वरूप वहॉं के पर्यावरण में जो ऊर्जा निर्मित होती हैं वह हमारे शरीर पर प्रभाव डालती हैं । इन सभी विकिरण को आज यंत्रों की सहायता से नापा जा सकता हैं और ऋणात्मक प्रभाव डालने वाली ऊर्जा को समाप्त करने के उपाय किये जा सकते हैं ।
बाऊ-बायोलाजी के सिद्धांत
1- भवन निर्माण स्थल चयन की प्रक्रिया में भू बायोलाजी का अध्ययन करें ।
2- आवास, उद्योग केन्द्रों को मुख्य ट्राफिक सड़को से दूर रखें ।
3- भवन के पास हरित क्षेत्र बनायें ।
4- घर की प्लानिंग एवं विकास में परिवार की आवश्यकता एवं मानवीय विषय को ध्यान में रखें ।
5- भवन सामग्री प्राकृतिक मूल की हों ।
6- दिवाल, छत एवं फर्श में उपयोग की जाने वाली सामग्री वायु को प्रवाहित करने में सहायक हों ।
7- भवन के अन्दर की हवा प्रदूषित या आर्द्र नहीं हो ऐसी भवन निर्माण सामग्री का उपयोग करें ।
8- भवन की अन्दर की सतह पर ऐसी सामग्री का उपयोग करें जो हवा के प्रदूषण को सोख लें एवं हवा को फिल्टर कर सकें ।
9- भवन के अन्दर के ताप संग्रहण एवं ताप इन्सुलेशन ने उचित तालमेल बनाये रखें।
10- भवन की सतह एवं वायु के तापमान में संतुलन बनाये रखें ।
11- ताप के लिये सौर ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करें ।
12- यह सुनिश्चित करें कि भवन में प्राकृतिक एवं सुखद अहसास हो, नशीली या विषैली बदबू को दूर रखें ।
13- भवन में प्रकाश एवं रंग मानव प्रकृति को शांत रखें, ऐसी व्यवस्था होनी चाहियें ।
    हमारा शरीर अति सूक्ष्म यंत्र हैं जो किसी भी स्वास्थ्य विरोधी तत्व, गंदा रंग इत्यादि का लंबे समय तक सानिध्य से उसका प्रतिफल भुगतते हैं ।
                          संकलनकर्ता
                        अनुराग अग्रवाल
                    ज्योतिष, अंकशास्त्र एवं वास्तु विशेषज्ञ
            अग्रवाल हाऊस, सुभाष वार्ड सिवनी म0प्र0, मो0 09425445623

यह है सागर में मनरेगा का हाल सखे

यह है सागर में मनरेगा का हाल सखे

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को सागर जिले में क्रियान्वित हुए ढाई साल पूरे हो गये। योजना का क्रियान्वयन कैसा हो रहा है, यह इस बात पर निर्भ्।र है कि उसमें अधिकारियों की रुचि  कैसी है। मगर दुर्भाग्य है कि सागर जिले में मनरेगा प्रशासनिक दुर्गति का श्ंिाकार है। मनरेगा स्कीम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत ग्रामीण परिवारों के वयस्क व्यक्तियों को ,जो अकुशल मानव श्रम करने को तैयार हैं ,एक वित्तीय वर्ष में एक परिवार को कम से कम सौ दिवस का रोजगार उपलब्ध कराकर आजीविका सुनिश्चित करना एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसम्पत्तियॉं सृजित करना  है।
 
मनरेगा स्कीम अन्तर्गत एक वित्तीय वर्ष में सौ दिन का रोजगार प्राप्त करने के लिए एक परिवार पात्र है। सौ दिन के रोजगार की उपलब्धता को परिवार में निवासरत समस्त वयस्क व्यक्तियों के बीच विभाजित करने का प्रावधान स्कीम में है। पता ही है कि सागर जिले में स्कीम लागू होने के शुरुआती दौर में ग्राम पंचायत स्तर पर किए जाने वाले कार्यो के सेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट बनाये गये। और यहीं से भ्रष्टाचार करने की शुरुआत भी हो गई। मसलन, मनरेगा के अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि गॉवों में ऐसे निर्माण कार्य ही कराये जायें, जिनमें ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने पर 60 प्रतिशत राशि खर्च हो और कार्य में लगने वाली निर्माण सामग्री पर 40 प्रतिशत राशि लगे। मगर उक्त प्रावधान की खुलेआम धज्जियॉ उढ़ाकर लगभग प्रत्येक ग्राम पंचायत में सीमेन्ट-कॉंक्रीट रोड शामिल कर लिए गये। चूॅकि ग्राम पंचायत को 5 लाख रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने का अधिकार है, अतः सीमेन्ट- कॉंक्रीट रोड के एस्टीमेट 4लाख 98हजार रुपये के बनाये गये।

यह महज संयोग नहीं कि जिले की लगभग सभी ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत 4.98 लाख रुपये के सीसी रोड मंजूर किये गये। बात साफ है कि 4.98 लाख रुपये का एक एस्टीमेट बनाकर जिले के सभी 11 ब्लाक में उसकी फोटोकापी बॉट दी गई। सीसी रोड में मजदूरी पर कम और सामग्री पर ज्यादा खर्च आता है। सीसी रोड निर्माण में ठेकेदार या सरपंच को कैसी कमाई है, यह जगजाहिर है। आशय यह कि मनरेगा की नेक मंशा में छेद कर भ्रष्टाचार की राह निकालने की शुरुआत सेल्फ ऑफ प्रोजेक्ट में सीसी रोड जैसे कार्यो को शामिल कर हुई। भ्रष्टाचार का यह प्रशासनिक पक्ष है, जो जिला कलेक्टर और जिला पंचायत के  तत्कालीन सीईओ की संलिप्ता के बगैर संभव नहीं था।
 
गौरतलब है कि मनरेगा स्कीम में एक वित्तीय वर्ष में एक परिवार को सौ दिन का रोजगार पाने की पात्रता है। यानि किसी परिवार में दस वयस्क सदस्य हैं और उनमें से जो रोजगार की मॉंग करते हैं, उनमें प्रत्येक व्यक्ति को नहीं, बल्कि सबको जोडकर सौ दिन का रोजगार दिया जायेगा। यहॉ मनरेगा के बेरोजगारी भत्ते ने गॉव वालों की नीयत खराब कर दी। स्कीम आते ही यह बात जोरों से प्रचारित हो गई थी कि मनरेगा में जिन्हें रोजगार नहीं मिल पायेगा, उन्हें बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। इसे समझें कि अगर दस वयस्क व्यक्तियों का एक संयुक्त परिवार है तो उसे सौ दिन का रोजगार मिलेगा और अगर दो लोगों का परिवार है तो उसे भी सौ दिन का रोजगार मिलेगा, नहीं तो बेरोजगारी भत्ता है ही। इस तरह अधिक रोजगार और अधिक बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए दस वयस्क व्यक्तियों के संयुक्त परिवार ने अलग-अलग पॉच परिवार दर्शते हुए पॅाच जॉबकार्ड बनवा लिए। जबकि वे एक ही घर में रह रहे हैं और एक ही चूल्हे पर उनका संयुक्त भेजन बनता है। उधर तीसरी चालाकी अधिकॉश सरपंच और पंचायत सचिवों ने की कि फर्जी जॉबकार्ड बनवाकर अपने कब्जे में कर लिए। ताकि उनके नाम पर मस्टर भरकर रकम हडपी जा सके। 
 
ष्टाचार और नीयत का खोट भरी उक्त चालाकियों से मीडिया में लगातार जो खबरें सामने आई हैं, उनका सार यह है कि निगरानी की चाक-चौबंद व्यवस्थाओं के बावजूद निर्माण कार्यो  की गुणवत्ता ठाक नहीं है। जो लोग गॉव में है ही नहीं, उनके फर्जी जॉबकार्ड पर मस्टर भरकर शासकीय धन का गवन किया गया है। निर्माण कार्यो में सामग्री पर अधिक और रोजगार देने पर कम  राशि खर्च की गई है। जिन लोगों से मजदूरी कराई गई उसका भुगतान नहीं किया गया या फिर  निर्धारित अवधि से काफी विलम्ब से भुगतान हुआ। रोजगार देने के फर्जी मस्टर बनाये गये और सामग्री खरीद के फर्जी बिल। यहॉ एक और बात सामने आई कि सरपंच व पंचायत सचिव ने अपने परिजनो तथा चहेतों के जॉबकार्ड भरकर रकम निकाली अथवा उन्हें अधिक काम दिया। दूसरी बात यह कि लोगों से कार्य कराये बगैर उन्हें कुछ रुपये देकर उनके जॉगकार्ड व मस्टर में रोजगार दर्ज कर रकम हडपी गई।
          
हैरत की बात यह कि उपरोक्त कारगुजारियॉ मनरेगा के कानून में गुणवत्ता, निगरानी और मूल्यॉंकन की चाकचौबन्द व्यवस्था किये जाने के बाद हो रही है। मसलन, योजना अन्तर्गत राज्य एवं जिला स्त्र पर  क्वालिटी मानिटर्स को यह सुनिश्चित करना है कि कार्यो की गुणवत्ता निर्धरित मापदण्डों क अनुरुप हो।
 
योजना की निगरानी हेतु जिला, जनपद और ग्राम पंचायत स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है। ग्राम सभा को यह दायित्व सौंपा गया है कि ग्राम पंचायत द्वारा कराये जाने वाले कार्यो का सतत निरीक्षण करे। कराये गये कार्यो का सामाजिक अंकेक्षण करे। जनपद पंचायत का यह दायित्व है कि वह जनपद स्तरीय कार्यो का सतत निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण करे। यही जिम्मेदारी जिला पंचायत को दी गई है। 

उल्लेखनीय है कि मनरेगा स्कीम में कलेक्टर को जिला कार्यक्रम समन्वयक तैनात किया गया गया है। जिन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे योजना के क्रियान्वयन की पाक्षिक समीक्षा करेंगे, अधीनस्थ कर्मचारियों को  समुचित निर्देश देंगे। मगर उपरोक्त स्तर पर कोई भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहा। जिस कारण गजरुरतमंद ग्रामीणों को गॉव में ही रोजगार उपलब्ध कराने की एक महत्वपूर्ण योजना भ्रष्टाचार करने का जरिया बनकर रह गई है।    
         

सोमवार, 6 सितंबर 2010

सरकार के मुंह पर रहमान का साढ़े पांच करोड़ का तमाचा

चलाचली की बेला में चिदम्बरम


भारत गणराज्य के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की रूखसती की बेला आ गई है। एक के बाद एक हर मोर्चे पर नाकामी का सेहरा अपने सर बांधने वाले चिदम्बरम के खिलाफ कांग्रेस में भी अंदर ही अंदर रोष और असंतोष के स्वर खदबदाने लगे हैं।



कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि चौथी बार कांग्रेस की कमान संभालने वाली राजमाता श्रीमती सोनिया गांधी को बताया गया है कि चिदम्बरम खुद ही पार्टी लाईन के खिलाफ जाकर अल्पसंख्यकों और कांग्रेस के बीच बनी दूरी को पाटने के बजाए उसे गहरा करने का ही उपक्रम कर रहे हैं। पार्टी के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद आदि ने चिदम्बरम के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है। उधर वन्य जीव और पर्यावरण के नए पहरूआ बनकर उभरे वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने नियमागिरी की पहाडियोंमें वेदांता पर रोक लगाकर चिदम्बरम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मुंबई में हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के उपरांत कुर्सी संभालने वाले गृह मंत्री के कार्यकाल में नक्सलवाद, अलगाववाद, माओवाद, आतंकवाद का नया चेहरा सामने आया है। नक्सलवादियों ने जहां एक ओर बर्बरता का नया इतिहास लिखा है, वहीं सरकार इन सभी पर काबू पाने में असफल ही रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही सोनिया गांधी सरकार में कांग्रेस के मंत्रियों के पत्ते फेंटने वाली हैं, और उसमें चिदम्बरम के स्थान पर कोई दूसरा शख्स गृह मंत्रालय की कमान संभाल सकता है।



सरकार के मुंह पर रहमान का साढ़े पांच करोड़ का तमाचा

कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में भ्रष्टाचार की गूंज चारों ओर जमकर मची हुई है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि इसे राष्टन्न्ीय पर्व के तौर पर देखा जाना चाहिए। कांग्रेस कहती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच गेम्स के उपरांत की जाएगी, तब दोषियों को सजा दिलाई जाएगी। कामन वेल्थ गेम्स के बिगडने से दुनिया भर में भारत की छवि क्या बनेगी इसकी चिंता है सरकार और कांग्रेस को। गेम्स के लिए थीम सांग बनाने हेतु आस्कर विजेता ए.आर.रहमान को साढ़े पांच करोड़ रूपए का पैकेज दिया गया था, कि वे वक्का वक्का से बेहतर सांग तैयार करें। रहमान ने गाना तैयार किया, गाना गया गया, पर सभी के चेहरों पर लटकी मायूसी साफ जाहिर कर रही थी कि ए.आर.रहमान ने सरकार के मुंह पर साढ़े पांच करोड़ रूपए का जबर्दस्त तमाचा जड़ दिया है। कहते हैं कि उद्यघाटन समारोह को गरिमामय और आकर्षक बनाने के लिए अब किंग खान यानी शाहरूख को न्योता देने की तैयारियां की जा रही हैं। शाहरूख खान को बुलाने का मतलब जनता की जेब पर एक बार फिर डाका डालकर करोड़ों रूपए निकालना। अरे भई अगर थीम सांग पसंद नहीं आया तो दूसरा बनवाया जाए या फिर आयोजन समिति से इसकी राशि वसूली जाए!



तेरा तुझको अर्पण, का लागे मोरा

सरकार इस बात पर संतोष जता रही है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास का रथ द्रुत गति से दौड़ रहा है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट ही नजर आ रही है। नक्सलवादी नेताओं का मानना है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की किरण प्रस्फुटित हो जाएगी तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। यही कारण है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की किरण अब तक नहीं पहुंच सकी है। नक्सलवादियों द्वारा सरकार के द्वारा इस क्षेत्र के विकास के लिए भेजी जाने वाली इमदाद को हड़पकर उसका उपयोग सरकार के खिलाफ ही मोर्चा खोलने में किया जा रहा है। अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए नक्सलवादियों को धन की आवश्यक्ता होती है, और कहा जा रहा है कि यह धन नक्सलवादियों द्वारा सरकार की योजनाओं पर सीधे सीधे डाका डालकर ही जुगाड़ा जा रहा है। सच ही है तेरा तुझको अर्पण का लागे मोरा।



मालू की अभिनव पहल

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के इंजीनियरिंग सेल के प्रदेशाध्यक्ष प्रसन्न चंद मालू ने एक अभिनव पहल की है, जिसकी प्रशंसा मुक्त कंठ से होना चाहिए। मूलतः सर गोविंदराम सक्सेरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी एण्ड साईंस इंदौर (जीएसटीआई) से पास आउट प्रसन्न मालू द्वारा सिवनी जिले के निर्धन बच्चों के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए निशुल्क वातावरण बनाया जाना प्रशंसनीय कहा जाएगा। प्रसन्न मालू द्वारा अपने सहपाठी सुनील डांडीर जो कि टन्नबा इंजीनियरिंग कालेज भोपाल के प्रबंध निदेशक हैं, से अनुरोध किया कि सिवनी जिले के गरीब प्रतिभावान बच्चों को उनके इंजीनियरिंग कालेज में निशुल्क अध्ययन की सुविधा प्रदान करे। मालू के अनुरोध को डांडीर ने स्वीकारा और पहले दो फिर बाद में पांच बच्चों को निशुल्क तौर पर अपने कालेज में अध्ययन हेतु निशुल्क व्यवस्था प्रदान कर दी। प्रसन्न मालू की तरह सिवनी में अनेक संपन्न लोग होंगे जिनके संपर्क में न जाने कितने कालेज, स्कूल के संचालक होंगे पर किसी ने भी सिवनी के बच्चों के हित में इस तरह की बात नहीं सोची होगी। सिवनी के संपन्न लोगों को प्रसन्न मालू की सकारात्मक सोच से प्रेरणा लेकर और भी बच्चों के सुनहरे भविष्य के मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।



कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राजमाता का कापीराईट

सवा सौ साल पुरानी और भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पर आजादी के उपरांत नेहरू गांधी परिवार की छाया जबर्दस्त तरीके से पड़ी है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की धुरी घूमती रही है। कांग्रेस में की पोस्ट पर सदा ही गांधी नेहरू परिवार के सदस्य का जलजला रहा है। दरी और झंडे उठाने वाले कांग्रेसी उमर दराज होकर अपनी कमर झुका चले पर उन्हें उनकी निष्ठा का फल कभी भी नहीं मिला। कांग्रेस में गणेश परिक्रमा करने वाले नेताओं को ही सम्मान और पद से नवाजा जाता रहा है। विश्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी 1998 से लगातार कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। देखा जाए तो उन्हें तीसरी बार अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद नैतिकता के नाते ही सही इस पद को त्याग देना चाहिए था। कहा जा रहा है कि अभी वे एक दशक तक और इस पद पर बनी रहेंगी, ताकि कांग्रेस की नकेल नेहरू गांधी परिवार के हाथों में ही रहे।



युवराज ने जाना रियाया का हाल

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी की ओर रूख किया है। कई माह बाद युवराज को अपनी रियाया के बारे में जानने की सूझी है। बताते हैं कि अपने अघोषित राजनैतिक गुरू कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के मशविरे के बाद राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र में दिलचस्पी लेना आरंभ कर दिया है। दरअसल राहुल गांधी और सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र की बदहाली को विपक्ष द्वारा मुद्दे के तौर पर तैयार करवाना आरंभ कर दिया है, जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की राजमाता और युवराज को होने वाली परेशानी के मद्देनजर राजा दिग्विजय सिंह ने अमेठी वासियों के दुखदर्द को अपना दुखदर्द बनाने का मशविरा दे दिया है। हाल ही में एक महिला की फरियाद पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के मुसाफिर खाना कोतवाली जाने के साथ ही साथ पुलिस से कार्यवाही की गुजारिश की। राहुल गांधी द्वारा जिस शालीनता से पुलिस के साथ व्यवहार किया उससे कोतवाली में उपस्थित पुलिस कर्मी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।



विकलांग मंत्रालय बनाने की सिफारिश

मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के.जी.बालकृष्णन ने देश में विकलांगों के लिए प्रथक से एक मंत्रालय बनाने की सिफारिश की है। बालकृष्णन का कहना है कि विकलांगों के लिए नियम कायदे तो बहुतेरे बन चुके हैं किन्तु वे कानून जमीनी स्तर पर लागू हुए हैं या नहीं इस बारे में सुध लेने की फुर्सत किसी को भी नहीं है। देश भर के लगभग सवा दो करोड़ विकलांग लोगों के लिए बने कानूनों में ढिलाई बरतने पर राज्य सरकारों के प्रति अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर करते हुए बालकृष्णन ने कहा कि विकलांगों के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए कानूनों को लागू करने के लिए प्रभावी निगरानी प्रणाली को विकसित किया जाना आवश्यक है। बालकृष्णन का मानना सही है कि अधिकांश विकलांग गरीब और असहाय तबके से हैं, अतः इसके लिए प्रथक से मंत्रालय बनाया जाकर कानून का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। बालकृष्णन का कहना है कि समाज भी इनके प्रति पूर्वाग्रह से ही ग्रसित नजर आ रहा है।



पीलीभीत में नहीं है गांधी प्रतिमा

राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी की उपाधि ऐसे ही नहीं दी गई थी। बापू ने आधी लंगोटी में उघारे बदन ही ब्रितानियों को खदेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नेहरू गांधी परिवार का अभिन्न अंग रहीं मेनका गांधी और वरूण गांधी का पीलीभीत से लगाव किसी से छिपा नहीं है। आपको यह जानकर अश्चर्य होगा कि पीलीभीत जिला मुख्यालय देश का इकलौता ऐसा जिला मुख्यालय है जहां महात्मा गांधी की एक भी प्रतिमा मौजूद नहीं है। पीलीभीत में बापू के नाम पर दो सभागार और एक स्पोर्टस कांपलेक्स अवश्य ही है। पूर्व कलेक्टर और वर्तमान कांग्रेसी नेता इंदु प्रकाश एरन ने यहां गांधी स्टेडियम की स्थापना करवाई किन्तु प्रतिमा का प्रस्ताव था ही नहीं। अब गांधी की प्रतिमा लगना और भी दुष्कर हो गया है क्योंकि यूपी गर्वनर्मेंट ने किसी भी महापुरूष की प्रतिमा या मूर्ति स्थापना के पूर्व अनुमति की बाध्यता को लागू कर दिया है। पीलिभीत देश का संभवतः इकलौता जिला होगा जहां बापू की प्रतिमा ही नहीं लगी हो।



बिग बी का अंग्रेजी डर!

भारत पर राज करने वाले ब्रितानियों का डर उस वक्त के हर भारतवासी के मन में था। आजादी के बाद शनैः शनैः वह डर समाप्त हो गया। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को अंग्रेज नहीं पर उनके द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी भाषा का डर जबर्दस्त तरीके से सताता रहा है। ‘नमक हलाल‘ सिनेमा में अवश्य ही दर्शकों ने अमिताभ बच्चन को ‘‘आई केन टाक इन इंगलिश, आई केन वाक इन इंगलिश, आई केन लाफ इन इंगलिश, बिकाज इंगलिश इज ए वेरी फनी लेंग्वेज‘‘ बोलते हुए सुना होगा, किन्तु बिग बी अंग्रेजी से बहुत ही खौफ खाते थे। अपने ब्लाग पर अमिताभ लिखते हैं कि वे एक जमाने में अंग्रेजी ग्रामर से बहुत ही डरा करते थे। इसी कारण से उन्होंने कालेज में बीए आनर्स ें अंग्रेजी में दाखिला लेने से इंकार कर दिया था। अब भले ही अमिताभ द्वारा फर्राटेदार अंग्रेजी में लोगों से बातचीत की जाती हो पर सच्चाई यह है कि स्कूल कालेज के जमाने में बिग बी को अंग्रेजी से बहुत ही ज्यादा डर लगा करता था।



पीएम लांघने वाले थे खर्च की निर्धारित सीमा

ख्यातिलब्ध पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने 95 साल के जीवन में राजनैतिक तौर पर न जाने कितने उतार चढ़ाव देखे होंगे। राजधानी दिल्ली के वाशिंदे होने के कारण सत्ता को भी उन्होने काफी करीब से देखा। सत्ता को चलाने वालों ने भी खुशवंत सिंह के साथ गलबहियां डाली होंगी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। खुशवंत सिंह की हाल ही में बाजार में आई किताब ‘एब्सेल्यूट खुशवंत: द लो डाउन आन लाईफ, डेथ एंड मोस्ट थिंग्स इन बिटवीन‘, में वे लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने 1999 में उनसे चुनाव के दौरान टेक्सियों के किराए के लिए दो लाख रूपए नकद लिए थे, यह राशि पीएम के दमाद ने खुशवंत सिंह से ली थी। चुनाव हारने के बाद मनमोहन सिंह ने राशि को खुशवंत सिंह को लौटा दिया। सवाल यह उठता है कि 1999 में अगर महज टेक्सियों के लिए ही दो लाख रूपए खर्च करने की योजना हो तो चुनाव पर कुल कितना व्यय किया होगा मनमोहन सिंह ने उस वक्त। क्या इस तरह के खर्च चुनाव में खर्च की निर्धारित सीमा को पार नहीं किया होगा?

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

हजार टन बारूद मचा सकता है तबाही

आसमान निगल गया या धरती लील गई जिंदा बमों को
 
कहां गायब हो गए बारूद से लदे फदे 164 वाहन?
 
प्रशासन और पुलिस बहुत गंभीर नहीं है हादसे के प्रति
 
अनुज्ञा समाप्ति के बाद भी बिक रहा था बारूद!
 
नियमों में कड़े संशोधन है जरूरी
 
(लिमटी खरे)

राजस्थान के गर्भ में पैदा हुआ बारूद जिसमें से लगभग एक हजार टन बारूद 164 ट्रकों में लादकर गन्तव्य की ओर रवाना किया गया था, वह अचानक ही गायब हो गया। ट्रकों की साईज इतनी छोटी भी नहीं होती है कि कोई उसे आसानी से छिपा सके। वैसे भी ज्वलनशील पदार्थ या बारूद ले जाने वाले ट्रकों की बनावट आम ट्रकों से अलग ही होती है। फिर 164 ट्रकों को आखिर कहां और कैसे गायब कर दिया गया है, यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

भारत में आंतरिक और बाहरी तौर पर आज आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के मामले में आग जिस तेजी से सुलग रही है, उसे देखते हुए 872 टन बारूद का हवा में गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है। इस मामले को राजस्थान सहित छः राज्यों की पुलिस जिस हल्के तरीके से ले रही है, उसे देखकर लगता है कि सरकारें ही इस तरह के हिंसक आंदोलनों के लिए उपजाऊ माहौल प्रशस्त करती हैं।

देखा जाए तो सुरक्षा एजेंसियों की नींद इस तरह के संगीन और बड़े मामले में उड़ना चाहिए था। दो माह से अधिक समय पूर्व हुई यह कथित चोरी के बाद पुलिस के हाथों खाली ट्रक के अलावा कुछ नहीं लग सका है। पुलिस और प्रशासन हैं कि एक दूसरे पर जवाबदारी डालने पर तुले हुए हैं। इतनी व्यापक मात्रा में गायब हुआ विस्फोटक बारूद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है।

गौरतलब है कि गत दिनों सूरत में हुए विस्फोट में राजस्थान के ही धौलपुर में मचकुंड के पास 1979 - 80 में स्थापित राजस्थान एक्सप्लोसिव एवं केमिकल लिमटेड (आरईसीएल) बरूद फेक्ट्री में बने विस्फोटक और डेटोनेटर के इस्तेमाल की पुष्टि की गई थी। 164 ट्रक विस्फोटक के गायब होने के बाद धौलपुर पुलिस की तंद्रा टूटी है। धौलपुर के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र कुमार अब यह जांच करवा रहे हैं कि कितना माल वहां से निकला और कहां गया? पुलिस अधीक्षक का यह कहना कि कंपनी द्वारा माल निकासी की सूचना देने के बाद भी विस्फोटकों से लदे फदे वाहनों को सुरक्षा मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है, बहुत ही हास्यास्पद माना जाएगा।

नियमानुसार तो विस्फोटकों से लदी लारी को पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई जाना चाहिए, अथवा अगर कोई कंपनी इसका परिवहन कर रही है तो उसे निजी तौर पर आर्मड सिक्यूरिटी गार्ड की मदद लेना चाहिए। विशेष प्रकार की कमोबेश बख्तरबंद गाडियों को पहचानना किसी के लिए कठिन नहीं है। ये लारी जब सुनसान इलाकों से होकर गुजरती हैं, तब इन्हें लूटना नक्सलवादी, आतंकवादी या डकैतों के लिए बहुत ही आसान होता है।

वैसे भी विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा इस तरह की लूट एवं अन्य घटनाओें की आशंकाओं के मद्देनजर फेक्ट्री से विस्फोटक को गंतव्य तक कड़ी सुरक्षा में पहुंचाने का निर्देश पहले ही जारी किया जा चुका है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर बारूद का निर्माण या भण्डारण होता है, उन स्थलों का निरीक्षण संबंधित जिले के जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को कम से कम छः माह में एक बार करना अत्यावश्यक होता है।

अगर पुलिस की जवाबदारी में इन वाहनों की सुरक्षा का शुमार नहीं है तो फिर किस हक से अब पुलिस द्वारा इसकी तहकीकात की जा रही है कि माल कितना निकला और कहां गया? साथ ही साथ जब पुलिस के कारिंदे सड़कों पर खड़े होकर इन्हीं ट्रक चालकों से ‘चौथ‘ वसूलते हैं तब वे कागज पत्तर देखकर ही उस पर लदे माल की तादाद, अनुज्ञा आदि के बारे में पूछताछ कर ही अपनी ‘चौथ‘ के रेट तय करते हैं।

इतना ही नहीं जब हर बार माल की लदाई के साथ ही इसकी सूचना जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को लिखित तौर पर भेज दी जाती है तो फिर क्या वजह है कि अधिकारियों द्वारा इन वाहनों का भौतिक सत्यापन कराना भी जरूरी नहीं समझा। इस तरह के संवेदनशील मामलों को धौलपुर के जिलाधिकारी और जिला पुलिस अधीक्षक ने बहुत ही हल्के रूप में लिया है, जिसकी निंदा से काम नहीं चलने वाला, इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की आवश्यक्ता है।

यहां उल्लेखनीय होगा कि लगभग सोलह साल पहले 1994 में विस्फोटकों के पड़ोसी देश बंग्लादेश भेजने, दो वर्ष पूर्व हैदराबाद, सायबर सिटी बैंग्लुरू और सूरत में हुए बम विस्फोटों में यह तथ्य कमोबेश स्थापित हो चुका था कि इनमें प्रयुक्त विस्फोटक आरईसीएल के ही थे, फिर प्रशासन ने इस मामले को बहुत ही सतही तौर पर लिया।

इस मामले में अनेक लचीले पेंच उभरकर सामने आ रहे हैं। बारूद निर्माता आरईसीएल के महाप्रबंधक वाई.सी.उपाध्याय का कहना है कि उनका काम विस्फोटक बेचना है, खरीददार उसका क्या करता है इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं है। इसका मतलब यह है कि अगर आतंकवादी आकर उनसे माल खरीदे तो वे देश की कीमत पर उसे भी माल बेचने से गुरेज नहीं करेंगे। उपाध्याय यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि जिन्हें माल बेचा गया उनका लाईसेंस समाप्त हो गया था। सवाल यह उठता है कि लाईसेंस समाप्त होने पर नवीनीकरण न होने या नवीनीकरण होने की प्रत्याशा में क्या बारूद बेचा जाना युक्तिसंगत माना जाएगा?

लाईसेंस नवीनीकरण की पद्धति बहुत ही उलझी हुई है। अनुज्ञा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी कंपनी द्वारा संबंधित उपभोक्ता को तब तक माल बेच सकती है जब तक कि उसकी अनुज्ञा निरस्त होने की सूचना कंपनी को न मिल जाए। देखा जाए तो कंपनी को हर बार कंसाईंमेंट जारी करने के पहले लाईसेंस की मूल प्रति देखने के साथ ही साथ प्रमाणित छाया प्रति भी अपने पास रखना चाहिए। अगर किसी की अनुज्ञा को आगे नहीं बढ़ाया गया है तो उसकी आपूर्ति को तत्काल प्रभाव से रोक ही दिया जाना चाहिए।

किस वाहन में कितना माल कहां के लिए रवाना किया गया, रास्ते में कहां कितना माल उतारा गया, इस मामले से न तो विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय को ही कोई लेना देना है और न ही आरईसीएल कंपनी को। कंपनी का काम विस्फोटक बेचना और नियंत्रक कार्यालय का काम सिर्फ कागज पत्तर दुरूस्त कर रखना ही लगता है। जिस डीलर या उपभोक्ता के पास अनुज्ञा है उसे कितना माल बेचा गया है, इसका भौतिक सत्यापन विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा किया ही नहीं जाता है।

यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में विस्फोटक गया कहां? विस्फोटक का उपयोग क्या क्या हो सकता है। इस विस्फोटक के पहले दुरूपयोग के बारे में यही कहा जा सकता है कि इसे देश में अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों के हाथों बेच दिया गया हो, या उनके द्वारा लूट लिया गया हो। इस विस्फोटक का उपयोग नक्सलवादी, अलगाववादी, आतंकवादी, उग्रवादी, माओवादी आदि द्वारा गलत तौर पर किया जा सकता है।

दूसरी आशंका यह भी जताई जा रही है कि विस्फोटक को सड़क, बांध आदि निर्माण में लगी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया हो, जिससे वे कम लागत में ज्यादा लाभ कमाने के लिए अवैध खनन के तौर पर प्रयोग कर सकती हैं। देश भर में सक्रिय खनन माफिया जिससे कि सफेदपोश, जनसेवक, खद्दरधारी और नौकरशाह प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं के द्वारा इसका प्रयोग किया जा सकता है।

कुल मिलाकर 164 ट्रक में 872 टन बारूद गायब हुए दो माह से अधिक समय बीत चुका है पर न तो राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा की सरकारों के माथे पर पसीना छलका है और न ही आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के लिए संजीदा होने का प्रहसन करने वाले कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की पेशानी पर ही चिंता की लकीरें उभरी हैं! उभरें भी आखिर क्यों? इससे जनसेवकों को क्या लेना देना, जान पर तो आवाम ए हिन्द की बन आना है, जनसेवक तो सुरक्षा घेरे में महफूज ही रहने वाले हैं।

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सीबीएसई मान्यता मिली नहीं, ख्वाब हैं इंजीनियरिंग कालेज के!

सिवनी 03 दिसंबर। भगवान शिव की नगरी में संचालित होने वाले शिक्षण संस्थाओं में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की मान्यता को लेकर भ्रम की स्थिति बनी ही हुई है। किसे सीबीएसई बोर्ड ने अपनी मान्यता दी है, किसे नहीं यह बात आज भी साफ नहीं हो सकी है, और न ही मध्य प्रदेश सरकार के शिक्षा महकमे के जिला स्तर पर सर्वोच्च कमांडिंग आफीसर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा ही इस बारे में स्थिति स्पष्ट करना ही श्रेष्यस्कर समझा है।

जिला शिक्षा अधिकारी के मौन रवैए से नवमी, से लेकर बारहवीं के विद्यार्थियों के पालकों में मानस पटल पर छाए संशय के बादल छटने के बजाए घुमड़ने आरंभ हो गए हैं। जैसे जैसे नवमी कक्षा में सीबीएसई के एनरोलमेंट की तारीख पास आती जा रही है, वैसे वैसे विद्यार्थियों के पालकों के हृदय की धड़कने तेज होना आरंभ हो गई हैं।

पालकों के मन में यह बात अब भी घूम रही है, कि उनके आखों के तारे आखिर सीबीएसई बोर्ड के अधीन शिक्षा दीक्षा ग्रहण कर परीक्षा देंगे अथवा उन्हें मध्य प्रदेश बोर्ड के तहत परीक्षा देने पर मजबूर किया जाएगा? गौरतलब है कि दसवीं बोर्ड कक्षा के लिए नामांकन एक साल पूर्व अर्थात नवमीं कक्षा में ही करवा दिया जाता है। बोर्ड के पास चूंकि विद्यार्थियों की तादाद बहुत ज्यादा होती है अतः बोर्ड द्वारा एक साल की अवधि में इन्हें व्यवस्थित करने की गरज से ही नवमीं में इनका एनरोलमेंट किया जाता है।

नगर में संचालित होने वाली अनेक शालाओं द्वारा अपने यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों को आश्वस्त कराया गया था कि उनके आंखों के तारों को सीबीएसई बोर्ड के तहत ही परीक्षा दिलवाई जाएगी। इस हेतु सीबीएसई मान्यता की कार्यवाही उनकी शाला और सीबीएसई बोर्ड के बीच जारी है। बताया जाता है कि वर्ष 2010 - 2011 के शैक्षणिक सत्र लिए सीबीएसई बोर्ड की मान्यता संबंधी सिवनी की शालाओं के आवेदन में से अनेक शालाओं के आवेदन वांछित अर्हताएं पूरी न किए जाने पर निरस्त कर दिए गए हैं।

सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों का कहना है कि इन शालाओं द्वारा एक बार फिर से शैक्षणिक सत्र 2011 - 2012 हेतु सीबीएसई बोर्ड की मान्यता के संबंध में आवेदन दिया गया है। इन शालाओं द्वारा अपने अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए मुस्तैद रहने को कहा गया है कि कभी भी सीबीएसई बोर्ड का निरीक्षण दल आ सकता है, जिसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर रखी जाएं।

सूत्रों का आगे कहना है कि अभी तक किसी भी शाला के लिए इंस्पेक्शन कमेटी (आईसी मेम्बर) का गठन नहीं किया गया है, अतः जल्द ही निरीक्षण का प्रश्न ही नहीं उठता है। सूत्रों ने कहा कि जैसे ही आईसी मेम्बरान तय कर दिए जाएंगे वैसे ही इंटरनेट पर सीबीएसई की वेब साईट पर यह प्रदर्शित कर दिया जाएगा कि किस शाला का निरीक्षण किस केंद्रीय, जवाहर नवोदय या निजी शाला के प्राचार्य द्वारा किया जा रहा है। तब उस शाला में अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों या अन्य संबंधितों द्वारा आई सी मेम्बरान के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है।

बहरहाल, जिले में निजी तौर पर चल रही एक शाला जिसे अभी सीबीएसई बोर्ड की मान्यता नहीं मिली सकी है, के द्वारा सिवनी में इंजीनियरिंग कालेज खोलने की कवायद करने की सुगबुगाहट भी मिल रही है। गौरतलब है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में प्रदेश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुल इंजीनियरिंग कालेज की सफलता के परचम को देखकर लोग इसके दीवाने होते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में उक्त शाला के संचालकों द्वारा सीबीएसई बोर्ड की मान्यता को दरकिनार कर अब सिवनी में ही इंजीनियरिंग कालेेज खोलने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। जो शाला प्रबंधन सीबीएसई बोर्ड की मान्यता लेने में अक्षम रहा हो, वह अगर इंजीनियरिंग कालेज की नींव रखता है, तो उसकी नींव कितनी खोखली होगी इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 22

सिवनी से हो सकता है मोबाईल कंपनियांे का मोहभंग

सिवनी से गुजरने वाले फोरलेन उत्तर दक्षिण गलियारे का काम अगर पूरा नहीं किया गया तो आने वाले समय में सिवनी में बजने वाली विभिन्न सेवा प्रदाता कंपनियों के मोबाईल की घंटियां सुनाई देना बंद हो सकता है। यह एक बहुत बड़े घाटे के तोर पर फोरलेन के सिवनी से न होकर गुजरने के खामियाजे के तौर पर सामने आ सकता है। वैसे भी बीएसएनएल के अलावा अन्य सेवा प्रदाता कंपनियों ने सिवनी में इंटरनेट ब्राड बेण्ड को आरंभ कर इस सुविधा को वापस ले लिया था, जिसका कारण सिवनी से इन कंपनियों को वांछित राजस्व न मिल पाना ही बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सिवनी में मोबाईल के क्षेत्र में भी सेवा प्रदाता कंपनियों को पर्याप्त राजस्व नहीं मिल पा रहा है। चूंकि स्वर्णिम चतुर्भज और उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम गलियारे के मार्ग में पड़ने वाले स्थानों पर मोबाईल नेटवर्क देना इन कंपनियों की मजबूरी बन गई थी अतः सिवनी को इन कमोबेश हर कंपनी ने अपने नक्शे में शामिल कर लिया है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 03 सितम्बर। सिवनी वासी अवश्य ही मुगालते में होंगे कि जो भी नया मोबाईल सेवा प्रदाता बाजार में आमद दे रहा है, उसकी नजरों में सिवनी एक अच्छा बाजार बनकर उभरा है, यही कारण है कि सिवनी में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां अपनी आमद दे चुकी हैं। सिवनी में कुछ मोबाईल सेवा प्रदाताओं को अगर छोड़ दिया जाए तो कमोबेश समस्त मोबाईल सेवा प्रदाताओं के एजेंट और नेटवर्क के लिए मोबाईल टावर स्थापित हो चुके हैं।
 
इन मोबाईल सेवा प्रदाताओं में से कुछ ने बाजार की नब्ज को पहचानते हुए यहां अपना इंटरनेट कनेक्शन का जाल भी बिछाना आरंभ कर दिया था। इस मामले में सेवा प्रदाता कंपनियों ने सामान्य के साथ ही साथ तेज गति की इंटरनेट सेवा के रूप में ब्राड बेण्ड का आगाज भी कर दिया था। ब्राड बेण्ड की सेवाओं में से बीएसएनएल को छोड़कर अन्य सेवाओं ने जल्द ही दम तोड़ दिया था।
 
इसके उपरांत निजी तोर पर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों ने सिवनी से अपने अपने ब्राड बेण्ड इंटरनेट कनेक्शन को समाप्त ही कर दिया था। ब्राड बेण्ड की सेवाएं इसके उपरांत भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही जनता के बीच परोसी जा रही थीं। इंटरनेट के शौकीन लोगों की मजबूरी हो गई थी कि वे तेज गति में इंटरनेट सर्फिंग के लिए बीएसएनएल की सेवाओं को ही लें। आरोपित है कि बीएसएनएल की इंटरनेट सेवाएं हर दम बाधित ही हुआ करती हैं। कभी गति बहुत ही धीमी होती है, तो कभी सिग्नल की ही दिक्कतों से उपभोक्ताओं को दो चार होना पड़ता है।
 
निजी तौर पर सेवा प्रदान करने वाली सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी में अनेक मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने अपनी आमद इसलिए दी हैं, क्योंकि स्वर्णिम चतुष्गामी सड़क और उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम सड़क गलियारे के इर्द गिर्द उन्हें अपनी कंपनी के मोबाईल का नेटवर्क देना जरूरी हो गया है। यही कारण है कि सिवनी से होकर गुजरने वाले चतुष्गामी सड़क गलियारे के इर्दगिर्द भी मोबाईल के नेटवर्क को उपलब्ध कराने की गरज से कंपनियों ने सिवनी में अपना मोबाईल नेटवर्क का जाल बिछाया है।
 
जिस तरह से सिवनी से उत्तर दक्षिण गलियारे को अन्यत्र ले जाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में तस्वीर कुछ धुंघली अस्पष्ट किन्तु बदली बदली सी ही दिख रही है। माना जा रहा है कि अगर उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे पर से सिवनी जिले का नाम अगर मिटा दिया गया तो निजी तौर पर सेवा प्रदान करने वाली मोबाईल कंपनियांे ने जिस तरह अपने ब्राड बेण्ड कनेक्शन सिवनी से गायब कर दिए हैं, उसी तरह वे अपने नेटवर्क को भी सिवनी से उठाकर उस जगह ले जाएंगे जहां से होकर यह फोरलेन गलियारा जाएगा। उन परिस्थितियों में सेवा प्रदाता मोबाईल कंपनियों का सिवनी से मोह भंग होना स्वाभाविक ही माना जा रहा है।

कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि सिवनी में फोरलेन गलियारे के निर्माण में फंसे पेंच की आहट सुनने के उपरांत निजी तौर पर इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों ने अपनी अपनी ब्राडबेण्ड सेवाएं यहां से हटा ली थीं। इस मामले में सच्चाई कितनी है, यह तो सेवा प्रदाता कंपनी जाने किन्तु यह सच है कि सिवनी में ब्राड बेण्ड इंटरनेट कनेक्शन सिर्फ और सिर्फ भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही परोसा जा रहा है।

एनएचएआई के नक्‍शे से सिवनी गायब

उत्तर दक्षिण गलियारे की बाधाएं हटें: राजेंद्र गुप्त

गुजरात के सूरज को पश्चिम बंगाल के कोलकाता से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 6 को चतुष्मार्गी मार्ग के रूप में विस्तारित किया जा रहा हैं । यह मार्ग नागझिरा एवं नवेगांव बाघ प्राणी उद्यान भंडारा जिले में बैनगंगा नदी के पुल से छत्तीसगढ़ की सीमा तक के 80 किलोमीटर के अतिसंवेदनशील क्षेत्र से गुजर रहा हैं । इस मार्ग के कारण बाघ सहित अन्य वन्य जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुये वन्य एवं पर्यावरण प्रेमियों की आपत्ति पर इस मार्ग का काम रोक दिया गया था व इस मार्ग पर संकट के बादल मंडराने लगे थें ।
 
इस विवाद को हल करने के लिये एन0एच0ए0आई0 द्वारा रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक आर0आर0 इंदुरकर को नियुक्त किया गया । उन्होंने एन0एच0ए0आई0 एवं वन अधिकारियों से चर्चा कर अपनी रिपोर्ट में वन्य प्राणियों एवं पर्यावरण की सुरक्षा के लिये कई महत्वपूर्ण सुझाव दियें । 

एन0एच0ए0आई0 द्वारा उनके सुझावों को मानकर मामला वन विभाग को सौंप दिया गया । इन सुझावों के अनुसार 80 किलोमीटर के इस अतिसंवदेनशील क्षेत्र में इस मार्ग पर वन्य प्राणियों के लिये 3 करोड़ 60 लाख रूपयें की लागत से आठ भूमिगत मार्ग बनेंगें ताकि वन्य प्राणी बिना सड़क पर आए इन भूमिगत मार्गो से दूसरी ओर निकल जायें । 1 करोड़ 20 लाख की लागत से चालीस किलोमीटर पर लंबी बाड़ (फैंसिंग) की जायेंगी, साथ ही वन्य प्राणियों के लिये 10 बचाव द्वार, 10 रैम्प, मवेशियों को रोकने के लिये 14 पिंजड़े एवं वाहन चालको की सुविधा के लिये 18 साइन बोर्ड बनाने होंगें । उक्त कार्य एन0एच0ए0आई0 को करना होगा और इस पर लगभग 4 करोड़ 90 लाख रूपयें खर्च होगें । इन सुझावों को मानकर एन0एच0ए0आई0 ने राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 के न केवल विस्तारीकरण का मार्ग प्रशस्त किया हैं वरन् वन्य जीवों एवं प्राणियों के सुरक्षित आवागमन हेतु भूमिगत मार्ग बनाने के साथ ही उनके लिये पानी की पर्याप्त व्यवस्था करने पर भी सहमत हो गया हैं ।
 
ठीक यही स्थिति राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 7 जो कि काश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ता हैं के अंतर्गत बनने वाले चतुष्मार्गी मार्ग को सिवनी से नागपुर के बीच स्थित पेंच टाईगर रिजर्व के कारण रोक दिया गया है । जब एन0एच0ए0आई0 और वनविभाग राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 6 के अंतर्गत रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक आर0आर0 इंदुरकर के सुझावों को मानकर वन्य प्राणियों के सुरक्षित आवागमन के लिये भूमिगत मार्ग बनाने व पर्याप्त पानी की व्यवस्था करने हेतु सहमत होकर राष्ट्रीय राजमार्ग 6 की बाधाओं को दूर कर सकतेे हैं, तो उन्हें म0प्र0 के सिवनी जिले में स्थित पेंच टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणियों एवं जीवों की सुरक्षा व सुरक्षित आवागमन हेतु भूमिगम मार्ग व पर्याप्त पानी की व्यवस्था कर इस मार्ग में आ रही बाधाओं को शीघ्रातीशीघ्र हल कर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 7 के विस्तारीकरण का मार्ग भी प्रशस्त करना चाहियें ।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

थ्री जी के पहले प्रस्तावित थी नंबर पोर्टेबिलिटी

तारीख पर तारीख ही मिल रही है एमएनपी में
 
कब स्वतंत्र होगा मोबाईल उपभोक्ता अपने आपरेटर को बदलने
 
ट्राई और सरकार के बीच रस्साकशी का आनंद ले रहे हैं आपरेटर
 
एमएनपी के मामले में अभी दिल्ली दूर है
 
(लिमटी खरे)

खराब सेवा प्रदाता मोबाईल कंपनियों के नंबर दूसरे अच्छे सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ अदला बदली के मामले में केंद्र सरकार और दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) के बीच चल रही तनातनी का नतीजा है कि अब तक मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को हरी झंडी नहीं दिखाई जा सकी है। बार बार तारीख पर तारीख देने के उपरांत भी एमएनपी में विलंब को कांग्रेस नीत केंद्र में बैठी भारत सरकार की सबसे बड़ी विफलता ही माना सकता है। वैसे तो अनेक एसे मोर्चे हैं जिन पर भारत सरकार ने विफलता के नए आयामों को छुआ है किन्तु मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ्य के बाद एमएनपी एक एसा मसला है जो आज देश के कमोबेश हर आदमी से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
 
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा एमएनपी के मसले को अनेकों बार टाला जा चुका है। यह क्यों हो रहा है? किसके दबाव में हो रहा है? इसके पीछे किसको प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ पहुंचाने की जनसेवकों की मंशा है, यह तो केंद्र सरकार ही जाने पर 31 दिसंबर 2009 के पहले दो मर्तबा एमएनपी की तारीख देकर उसे टाला गया था। अंत में 31 दिसंबर 2009 को डेड लाईन बना दिया गया था।
 
इसके उपरांत केंद्र सरकार ने मोबाईल पोर्टेबिलिटी को लागू करने की तारीख बढ़ाकर इस साल मई के पहले सप्ताह तक कर दी गई थी। यह तिथि गुजरने के बाद एक बार फिर 30 जून तक के लिए समयावधि बढ़ा दी गई थी। इस साल अप्रेल के पहले सप्ताह में ट्राई द्वारा कहा गया था कि वह एमएनपी में हो रहे अनावश्यक विलंब को लेकर चिंतित है, और जल्द ही दूरसंचार विभाग को इस संबंध में पत्र लिखने जा रहा है।
 
ट्राई द्वारा एमएनपी सेवाओं में बार बार हो रहे विलंब के कारणों का पता लगाने के लिए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखकर पता करने की बात कही गई थी कि आखिर क्या वजह है कि इस सुविधा को लागू नहीं किया जा पा रहा है। इससे पहले अप्रेल में ही दूरसंचार विभाग द्वारा कहा गया था कि वह इस मसले को निजी सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ होने वाली बैठक में भी उठाने जा रहा है।
 
शुरूआती दौर में सरकारी कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल द्वारा ही इस संबंध में आवश्यक तकनीकी तैयारियां विशेषकर एमएनपी गेटवे की स्थापना ही नहीं किया जा सका था। पिछले माह में जब तीसरी पीढ़ी के मोबाईल यानी 3 जी की सेवाएं आरंभ कराने की बात सामने आई थी, तब सरकार द्वारा दूरसंचार कंपनियों के सामने यह शर्त रख दी थी कि दूरसंचार कंपनियों को किसी भी तरह की नई सेवा आरंभ करने के पहले मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को आरंभ करना आवश्यक होगा। सरकार की इस कड़ी शर्त के आगे निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां झुकती नजर आ रही थीं।

सरकार ने इसके साथ ही निजी सेवा प्रदाता कंपनियों से कहा था कि वे एमएनपी को अक्टूबर माह में आरंभ करवा दें। विडम्बना यह है कि बीएसएनएल और एमटीएनएल ने तो 3 जी सेवाओं को आम उपभोक्ताओं के लिए लागू कर दिया है, पर उसे अपनी एमएनपी की शर्त के बारे में शायद याद नहीं रहा। अगर सरकार को अपनी कड़ी शर्त के बारे में याद होता तो निश्चित तौर पर 3 जी सुविधाएं लांच करने के पहले सरकारी कंपनियों द्वारा एमएनपी को अमली जामा अवश्य ही पहनाया होता।
 
सरकारी और निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को संभवतः यह भय सता रहा है कि अगर एमएनपी को लागू कर दिया गया तो खराब नेटवर्क, काल ड्राप, मनमाना बिल, छिपी हुई शर्तों आदि से आजिज आ चुके उपभोक्ता किसी अन्य सेवा प्रदाता की शरण में न चले जाएं। अगर एसा होगा तो उनके राजस्व में जबर्दस्त कमी दर्ज की जा सकती है। अभी वर्तमान नियम कायदों को देखकर यह कहा जा सकता है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी चाहे सरकारी क्षेत्र की हो या निजी क्षेत्र की हर किसी का एकाधिकार मोबाईल सेक्टर पर दिख रहा है। एमएनपी के लागू होने के बाद कंपनियों का एकाधिकार पूरी तरह से समाप्त होने की उम्मीद है। इसके उपरांत बाजार में वही कंपनी टिक पाएगी जिसकी शर्तें साफ हों, और नेटवर्क तथा सुविधाएं जनता को पसंद आएंगी।
 
दरअसल एमएनपी की कल्पना एमएनपी गेटवे तकनीक के बिना किया जाना संभव ही नहीं है। कुछ कंपनियां जहां इस तकनीक के लिए वांछित उपकरणों के लिए आपूर्ति का इंतजार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ कंपनियां इसकी खरीददारी के लिए आदेश देने की गरज से सुरक्षा इजाजत की बाट जोह रही हैं। कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने की स्थिति में कतई नहीं दिख रही हैं। सरकार का यह मानना है कि जो कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने में विलंब का दोषी पाई जाएंगी, उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी।

कुल मिलाकर मोबाईल नंबर स्थाई रखकर अपने सेवा प्रदाता की सेवाएं बदलने वाली योजना एमएनपी में बार बार तारीख पर तारीख मिलने से साफ होने लगा है कि निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां इसके लिए क्लीन हेण्ड से आगे आने को तैयार कतई नहीं है। साथ ही साथ सरकार भी यह नहीं चाह रही है कि इन सेवा प्रदाता कंपनियों की इस मामले में मश्कें कसी जाएं। सरकार पर किस बात का दबाव है, यह बात तो सरकार ही बेहतर जान समझ सकती है, किन्तु एमएनपी में तारीख पर तारीख से मरण अंतत्तोगत्वा उपभोक्ता की ही हो रही है।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 21

क्यों बढ़ा मोबाईल कंपनियों का सिवनी के प्रति आकर्षण
मोबाईल के क्षेत्र में सिवनी जिले में रिलायंस, बीएसएनएल दो ही कंपनियों ने मुख्य तौर पर अपना नेटवर्क स्थापित किया था। इनमें से भारत संचार निगम लिमिटेड का नेटवर्क हर जगह मिलने के चलते सिवनी को इसके नक्शे में स्थान मिला था। 2003 के उपरांत सिवनी जिले में अचानक ही निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों की बाढ़ सी आ गई। सिवनी वासी हतप्रभ थे कि मोबाईल कंपनियों को सिवनी में एसा क्या पोटेंशियल दिखा कि उन्होंने अपना नेटवर्क यहां स्थापित कर लिया। दरअसल निजी कंपनियों को उत्तर दक्षिण गलियारे में हर स्थान पर मोबाईल का नेटवर्क अपने उपभोक्ताओं को प्रदान करना था, इसीलिए सिवनी में भी अनेक कंपनियों ने अपने अपने स्टाकिस्ट भी बना दिए।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 02 सितम्बर। आज सिवनी जिले में देश की शायद ही कोई एसी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी हो जिसका नेटवर्क न मिल रहा हो। कल तक बीएसएनएल की सिम लेने के लिए मारामारी के लिए मशहूर सिवनी में अब चाहे जिस कंपनी की सिम आसानी से उपलब्ध हो पा रही है। सिवनीवासी आश्चर्यचकित थे कि देश की नामी गिरामी कंपनियों को आखिर सिवनी जिले में एसा क्या दिखा कि सेवा प्रदाता कंपनियों ने अपना गढ सिवनी को बना लिया। सिवनी में उपभोक्ताओं की तादाद देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि सिवनी में नेटवर्क स्थापित करना इन कंपनियों के लिए कहीं से कहीं तक फायदे का सौदा साबित हो।
 
इक्कीसवीं सदी के आरंभ में जैसे ही बीएसएनएल ने सिवनी में अपना मोबाईल नेटवर्क आरंभ किया तब सिवनी में बीएसएनएल की सिम प्राप्त करना अपने आप में एक स्टेटस सिंबाल बन गया था। इसका कारण यह था कि उस समय मोबाईल फोन को विलासिता की श्रेणी में रखा गया था। उस दौरान मोबाईल के हेण्ड सेट भी आज की तुलना बहुत ही अधिक मंहगे हुआ करते थे। 2003 के उपरांत सिवनी में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने न केवल यहां मजबूत नेटवर्क के लिए अपने मोबाईल टावर ही स्थापित किए, वरन यहां सिम की बिकावली के लिए अपने अपने स्टाकिस्ट या एजेंट भी नियुक्त कर दिए।
 
शुरूआती दौर में तो लोगों को भ्रम रहा कि निजी तौर पर मोबाईल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को लग रहा था कि सिवनी से उन्हें खासा राजस्व मिल पाएगा जिसके चलते सिवनी में अनेक कंपनियों ने अपनी सेवाएं आरंभ कर दी हैं। शनैः शनैः यह बात साफ होने लगी कि सिवनी से होकर गुजरने वाले उत्तर दक्षिण चतुष्गामी सड़क मार्ग के चलते ही यहां अनेक मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियांे ने अपनी आमद दी है।
 
बताया जाता है कि उत्तर दक्षिण चतुष्गामी सड़क मार्ग के सिवनी से होकर गुजरने के कारण ही सिवनी में इन कंपनियों ने अपनी नजरें इनायत की थीं। दरअसल मोबाईल कंपनियां चाह रही थीं कि स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग नार्थ साउथ और ईस्ट वेस्ट कारीडोर पर मोबाईल धारकों को मोबाईल सेवा निर्बाध तौर पर मिलती रहे। यही कारण है कि मार्ग में पड़ने वाले हर जिले, तहसील, विकासखण्ड, या कस्बे में मोबाईल की रिंगटोन बजना आरंभ हो गई थी।
 
सिवनी में भी कमोबेश यही हुआ। निजी तोर पर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों द्वारा यहां नेटवर्क हेतु अपने मोबाईल टावर्स स्थापित करना आरंभ कर दिया। इन सभी का मुकाबला भारत सरकार के उपक्रम भारत संचार निगम लिमिटेड से था, अतः इन्होंने अपने अपने बीटीएस को अधिक शक्तिशाली बनाना आरंभ किया। वरना सिवनी में मोबाईल के उपभोक्ताओं से अर्जित राजस्व इन कंपनियों के खर्चों की तुलना में उंट के मुंह में जीरे के समान ही था।

बताया जाता है कि कंपनियों को यह भय भी सता रहा था कि अगर उन्होने सड़क मार्ग मेें अपना नेटवर्क कमजोर दिया या नहीं दिया तो आने वाले समय में उसके उपभोक्ता किसी अन्य मोबाईल सेवा प्रदाता की सेवाएं लेना आरंभ न कर दे। इसलिए घाटे का सौदा होने के बावजूद भी कंपनियों ने सिवनी में अपनी सेवाएं व्यापक स्तर पर देना आरंभ कर दिया था, जो अब तक जारी है। सिवनी जिले में भले ही लखनादौन से खवासा तक सड़क मार्ग में सभी कंपनियों की घंटियां घनघना रही हों पर जरूरी नहीं है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों में भी उनकी आवाज सुनाई दे रही हो।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

22-23 अक्टूबर को खजुराहो में ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट में भाग लेने का आग्रह


उद्योगपतियांे से मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिए मंत्री श्री विजयवर्गीय का आमंत्रण

नई दिल्ली, 1 सितम्बर 2010 मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय ने आज यहां नई दिल्ली में पीएचडी हाउस में आयोजित उद्योगपतियों के सम्मेलन में उद्योगपतियों को प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित किया। श्री विजयवर्गीय ने बताया कि उद्योगों को 24 घंटे बिजली और पानी दिया जा रहा है। प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए सड़कों सहित अधोसंरचना का तेजी से विकास किया गया है। अब प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण है। 

श्री विजयवर्गीय ने उद्योगपतियों से कहा कि 6 वर्ष पहले अधोसंरचना के अभाव में उद्योगों को आमंत्रित करने में संकोच होता था।  अब सड़कों सहित सभी सुविधायें उपलब्ध कराने के कारण हमारे पास उद्योग लगाने के लिए सभी मूलभूत सुविधाओं सहित बहुत कुछ है। हर जिले में उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन चिन्हित कर लैंड बैंक बनाये गये हैं। प्रदेश में कुशल एवं अकुशल मानव संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। प्रदेश में उद्योग लगाने की अपार संभावनाओं के लिए प्रचुर मात्रा में खनिज साधन, प्राकृतिक संसाधन और खाद्य प्रसंस्करण के लिए फल एवं सब्जियां उपलब्ध हैं। कानून एवं व्यवस्था बहुत अच्छी होने के कारण पूंजी निवेश के लिए अच्छा वातावरण है। श्रमिक शांति भी पूरे देश में सबसे अच्छी है। राज्य में डाकूओं की फिल्में बनती थीं किन्तु अब प्रदेश में एक भी डाकू नहीं है। प्रदेश की पारदर्शी उद्योग नीति में मेगा प्रोजेक्ट स्थापित करने के लिए विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं। नागपुरी संतरे के नाम से बिकने वाला 80 प्रतिशत संतरा तथा भुसावली केले के नाम से बिकने वाला 80 प्रतिशत केला मध्यप्रदेश में पैदा होता है। धनिया और मिर्ची मध्यप्रदेश की श्रेष्ठ गुणवत्ता की है। सोयाबीन मध्यप्रदेश में सर्वाधिक पैदा होता है। प्रदेश के गेहूं की क्वालिटी भी देश में सर्वश्रेष्ठ है। इन सभी अनुकूल परिस्थितियों में मध्यप्रदेश में पूंजी निवेश में अपार संभावनाएं हैं। श्री विजयवर्गीय ने उद्योगपतियों से खजुराहो में 22 और 23 अक्टूबर को ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट में सम्मिलित होने का आग्रह किया। 

प्रारम्भ में पीएचडी चैम्बर ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के वाइस प्रेसीडेंट श्री सलिल भंडारी और पीएचडी के एम.पी. कमेटी के चेयरमेन श्री अनिल अग्रवाल ने उद्योगपतियों की ओर श्री विजयवर्गीय का स्वागत किया। श्री सलिल भंडारी ने इस अवसर पर उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती जमीन, प्राकृतिक संसाधन और  कुशल मानव संसाधन की उपलब्धता के कारण मध्यप्रदेश उद्योगों की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। मध्यप्रदेश की सरकार उद्योग मित्र होने के कारण हमेशा सहयोग करती है। प्रदेश की औद्योगिक नीति भी उद्योगों के अनुकूल है। श्री भंडारी ने कहा कि अगर अभी प्रदेश में उद्योग लगाने में पीछे रह गये तो आगे आने वाले समय में मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

प्रारम्भ में प्रमुख सचिव श्री पी.के. दास और मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक श्री अनिल जैन ने उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिए प्रदेश में दी जा रही सुविधाओं की जानकारी दी। इस अवसर पर अनेक उद्योगपतियों ने उद्योग लगाने के संबंध में जानकारी चाही। इस सम्मेलन में जे.के. टायर की ओर से श्री मनोज मुदानी, साइबर मीडिया उद्योग के श्री राज पाठक,उद्योगपति श्री आशीष विज, श्री हरीश चावला, ओमेक्स ग्रुप की ओर से श्री के.सी. चावला, इंटरकान्टीनेन्टल कन्सलटेन्ट की ओर से श्री एम.एस. बालकृष्णनन, आई.सी. आर. ए. उद्योग के श्री राशि ग्रोवर, एसाराम बिजनेस ग्रुप की ओर से श्री एस.के. नेमानी सहित लगभग 50 उद्योगपति उपस्थित थे।

गरीबों के मुंह से निवाला छीनने पर आमदा क्यों है कांग्रेस

मत भूलिए! न्याय पालिका सर्वोच्च है पवार साहेब
 
आईसीसी के साथ गरीब गुरबों की तरफ भी देखें कृषि मंत्री
 
अनाज सडता है सडता रहे पर गरीबों में नहीं बटेगा!
 
संसद को बनना था जनता की आवाज, पर अदालत में उठी हक की आवाज
 
(लिमटी खरे)

हर साल लाखों टन अनाज सड़ता रहता है, और हर साल करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में रहते हैं! ये दो तस्वीरें हैं भारत गणराज्य की जिसे ब्रितानियों की गुलामी से मुक्ति मिले छः दशक से ज्यादा समय हो चुका है। साठ साल की उमर में सरकार भी अपने कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। माना जाता है कि साठ साल की उमर में आदमी अपनी सारी अभिलाषाएं लगभग पूरी कर चुकता है। भारत का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि साठ सालों के बीतने के बाद भी भारत में बुनियादी समस्याएं न केवल जस की तस बनी हुई हैं, वरन बढ़ी ही हैं।
 
देश में लाखों टन अनाज सड़ने की बात पर भारत की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर सरकार अनाज को ठीक तरीके से संरक्षित नहीं कर सकती है तो वह उसे गरीब और भुखमरी के शिकार लोगों के बीच बटवा दे। कृषि प्रधान भारत देश में वैसे भी अनाज सड़ने या खराब होकर फेंके जाने को सबसे बड़ी बुराई के तौर पर देखा जाता है।
 
इधर अनाज के सड़ने की खबर से देश की सबसे बड़ी अदालत का आक्रोश लोगों को दिखा वहीं सियासत के धनी केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने मीडिया को ही इसके लिए दोषी बताकर कह दिया कि खाद्यान्न सड़ने की खबरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। शरद पवार का कथन और राज्य सभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो.के.वी.थामस के दिए वक्तव्य में असमानता ही दिख रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री का कहना था कि भले ही बर्बाद हो जाए अनाज पर गरीबों के मुफ्त में इसे नहीं बांटा जा सकता है। खुद कृषि मंत्री ने पिछले महीने ही लोकसभा में जानकारी दी थी कि 6 करोड़ 86 लाख रूपए मूल्य का 11 हजार 700 टन अनाज बर्बाद हो गया।
 
देश का कृषि मंत्रालय निर्दलीय पी.राजीव और के.एन.बालगोपाल के पूछे प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहता है कि देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। 01 जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया। पिछले साल 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ था। 2008 - 2009 में 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल बरबाद हुआ था। वर्ष 2007 - 2008 में 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह देखा जाए तो तीन सालों में देश के एफसीआई के गोदाम कुल 3881 टन गेंहू और 55 हजार 458 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह इस साल 01 जुलाई तक के खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार सालांे में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज बरबाद हुआ है।
 
शीर्ष अदालत की टिप्पणी के बाद शरद पवार ने उसे कोर्ट की सलाह मानकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इससे नाराज अदालत ने साफ किया है कि उन्होंने अनाज के बारे में सरकार को सलाह नहीं दी है, यह कोर्ट का आदेश है। शरद पवार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत गणराज्य में न्यायपालिका को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हर देशवासी का यह नैतिक दायित्व है कि वह अदालत के हर फैसले का पूरा पूरा सम्मान करे।
 
गत दिवस सदन में इस मामले को लेकर गर्मा गरम बहस भी छेड दी गई थी। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेकर सरकार से स्पष्टीकरण तक मांग डाला। सदन में शरद पवार का यह वक्तव्य बचकाना ही माना जाएगा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति हासिल करने का प्रयास कर रही है, इसके बाद कोर्ट की मंशा के अनुरूप ही सरकार द्वारा कदम उठाए जाएंगे। गौरतलब है कि कोर्ट ने अतिरिक्त सालीसिटर जनरल की उपस्थिति में ही सरकार की मश्कें कसीं थीं। सरकार की ओर से खड़े एडीशनल सालीसिटर जनरल चाहते तो तत्काल ही उन्हें कोर्ट के आदेश की प्रति उपलब्ध हो जाती।
 
देखा जाए तो आजाद भारत में जनता की आवाज, संसद या विधानसभा को बनना चाहिए, किन्तु विडम्बना यह है कि ये दोनों ही अपने दायित्वों के निर्वहन में अक्षम ही प्रतीत हो रही हैं, इसका कारण इनमें बैठे जनता के प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर चुने गए नुमाईंदों की बदलती प्राथमिकताएं हैं। जनता अपना अमूल्य वोट देकर जिन्हें चुनती है, जनता को चुनाव के वक्त लोक लुभावने वायदों से पाट देते हैं, वे ही नुमाईंदे जीतने के बाद जनता के द्वारा दिए जनादेश को सबसे पहले ही भूलकर अपने निहत स्वार्थों को प्राथमिकता बना लेते हैं।
 
सत्तर के दशक तक जनता के दुख दर्द के लिए सदन के किसी कोने में हमदर्दी और संवेदनशीलता दिखाई पड़ती थी, किन्तु अब तो सदन में बैठे जनता के नुमाईंदे पूरी तरह निष्ठुर ही नजर आ रहे हैं। देश की शीर्ष अदालत के फैसले को केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने जिस तरह हवा में उड़ा दिया और बाकी सांसद चुप्पी साधे बैठे रहे उससे इन सभी की जनता के प्रति संवदेनहीनता साफ साफ दिखाई पड़ी। होना यह चाहिए था कि जनता के चुने हुए नुमाईंदों को शरद पवार के केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए सड़े अनाज का ब्योरा मांगना चाहिए था। दरअसल शरद पवार की प्राथमिकता देश की सेवा से ज्यादा क्रिकेट की सेवा की बन चुकी है। पिछले कई सालों से पवार ने अपना पूरा पूरा ध्यान देश की बजाए क्रिकेट में लगाया हुआ है।
 
हाल ही में शरद पवार ने प्रधानमंत्री से कहा भी था कि उनका बोझ कुछ कम किया जाए, इसके पीछे यही कारण नजर आ रहा था कि पवार को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया था। आईसीसी एक मलाईदार संस्था है, इसके अध्यक्ष बनने पर शरद पवार को मान सम्मान, धन और रूतबे की कमी कतई नहीं रहती किन्तु लाल बत्ती का प्रेम उनसे शायद छोड़ा नहीं जा रहा है। यही कारण है कि वे चाहते हैं कि उन्हें एकाध महत्वहीन विभाग की जवाबदारी सौंप दी जाए ताकि वे मंत्री पद की सुविधाएं और सम्मान पृथक से पाते रहें।
 
आजाद भारत में इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि आधी सदी से ज्यादा देश पर शासन करने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को ‘‘विदेशी मूल‘‘ का कहने वाले शरद पवार ने कांग्रेस से हटकर अपनी एक नई पार्टी बनाई और सत्ता की मलाई खाने के लिए उसी कांग्रेस को अपने सामने घुटनों पर बैठने पर विवश किया। अब पवार सरेआम अपना मंत्रालय बदलने और मंत्रालय न बदल पाने की स्थिति में शीर्ष अदालत के फैसले को सलाह का रूप देने पर तुले हुए हैं। क्या यह कांग्रेस की भद्द पिटवाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
 
बहरहाल अब शरद पवार के कांधों पर इंटरनेशलन क्रिकेट की कमान आ गई है। पवार के कांधे वैसे भी अब तक देश के लगभग सवा सौ करोड़ लोगों का बोझ उठाकर थक चुके होंगे अतः उन्हें आराम की दरकार है। कांग्रेस को चाहिए कि पवार जैसे मंझे हुए राजनेता को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाए ताकि वे इंटरनेशनल लेबल पर करिश्मा दिखा सकें। वैसे भी अब तक पवार की प्राथमिकता की सूची में देश के गरीब गुरबे रहे ही कहां हैं।
 
शरद पवार के गृह राज्य में गरीब किसान एक के बाद एक आत्महत्या करते रहे, सूबे में उनकी और कांग्रेस की जुगल बंदी की सरकार रही, केंद्र में वे खुद ही कृषि मंत्री हैं। इसके बावजूद सब कुछ होता रहा। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि अब तक पवार के लिए चिंता का विषय गरीब गुरबे, आत्महत्या करते किसान, भूख से मरते गरीब, आधे पेट सोते आम भारतीय कभी नहीं रहे हैं, पवार के लिए सबसे बड़ी चिंता तो विभिन्न देशों विशेषकर पाकिस्तान के बेईमान खिलाड़ियों की जांच है।

केंद्रीय स्तर पर अनाज के भंडारण के लिए वेयर हाउस बनाने हेतु न जाने कितनी सुविधा, सब्सीडी केंद्र सरकार द्वारा दी गई है। अनेक स्थानों पर वेयर हाउस आज भी कागजों पर ही बने दिखाई दे रहे हैं। नेताओं और पहुंच संपन्न लोगों ने सरकारी इमदाद का बंदरबांट तबियत से किया है। क्या केंद्र सरकार का यह दायित्व नहीं है कि सरकारी मदद से बने वेयर हाउस का मौका मुआयना कर दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराए। हर जिले में तैनात जिला कलेक्टर अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही होते हैं, जो सीधे सीधे कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) के अधीन आते हैं। केंद्र सरकार अगर चाहे तो दो माह की निश्चित समयावधि देकर जिलों के कलेक्टर्स को आदेशित कर वस्तुस्थिति का पता लगवाकर गफलत करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है। यह सब करने के लिए सरकार को अपनी मंशा साफ करके ही ‘क्लीन हेण्ड‘ से आगे आना होगा, वरना बरबादी का जो सिलसिला चल रहा है, वह कालांतर में और भयवह स्परूप में आकर जारी ही रहेगा।

700वीं पोस्ट फोरलेन विवाद का सच ------------------- 20

उसी से ठंडा उसी से गरम!

मिडिल स्कूल में अंग्रेजी की एक कहानी जिसका भावार्थ था कि मुट्ठी बंद कर फूंक मारने से ठंड के समय में गरमी किन्तु उबले आलू को ठंडा करते समय फूंक मारने से वह ठंडा हो जाता है, कमोबेश हर किसी ने पढ़ी होगी। बचपन में कोतुहल अवश्य ही हुआ करता होगा कि उसी काम को करने से चीज ठंडी हो जाती है, पर ठंड के दिनों में फूंक मारने से मुट्ठी गरम कैसे हो जाती है। उसी तर्ज पर वाईल्ड लाईफ के काल्पनिक कारीडोर को आधार बनाकर किसी एनजीओ ने सर्वोच्च न्यायालय में सिवनी खवासा से होकर जाने वाले चतुष्गामी मार्ग को रोकने की अपील दायर की है, जबकि दूसरी ओर प्रस्तावित एनएच छिंदवाड़ा सौंसर सावनेर नागपुर मार्ग को तो अस्तित्व में आने वाला सतपुड़ा टाईगर कारीडोर दो जगह बाधित कर रहा है, फिर भी सब ओर खामोशी ही पसरी नजर आ रही है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 सितम्बर। स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने का षणयंत्र किसका है इस बात से अभी तक कुहासा हट नहीं सका है। लखनादौन से सिवनी होकर नागपुर जाने वाले 1545 में शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित मार्ग का अस्तित्व मिटाने की सजिश की जा रही है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट नामक एक गैर सरकारी संगठन इस साजिश में एक इंस्टूमंेट की तरह सामने आया है। इस एनजीओ को सिवनी जिले से क्या बुराई है, यह बात अभी तक साफ नहीं हो सकी है।
 
बताया जाता है कि उक्त एनजीओ द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर सिवनी से खवासा के बीच सड़क मार्ग में पड़ने वाले रक्षित वन एवं पेंच नेशनल पार्क के हिस्से से सड़क न गुजारने का अनुरोध किया है। इसके उपरांत का जो घटनाक्रम प्रकाश में आया उसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की साधिकार समिति (सीईसी) ने गुपचुप तरीके से विवादित स्थलों का निरीक्षण किया। चूंकि उस समय तक चतुष्गामी सड़क के निर्माण का काम मोहगांव तक पहुंच चुका था, अतः सीईसी ने संभवतः आगे के काम को रूकवाने की गरज से तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि से इस मार्ग में पेड़ कटाई की अनुमति न देने का अनुरोध किया।
 
तत्कालीन कलेक्टर नरहरि ने सीईसी के अनुरोध को यह कहकर स्वीकार कर लिया कि इस संबंध में राज्य शासन से निर्देश प्राप्त होना अभी बाकी है, पर मोहगांव से खवासा तक वन एवं गैर वन क्षेत्र में पेड़ कटाई की पूर्व कलेक्टर द्वारा दी गई अनुमति को निरस्त कर दिया गया। प्रपत्रों में सार्वजनिक दिखने वाला यह आदेश इतने गोपनीय तरीके से जारी किया गया कि सिवनी वासियों और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले जनसेवकों को भी इसकी भनक नहीं लग पाई।
 
बताया जाता है कि मोहगांव से खवासा तक के सड़क निर्माण के काम को इसलिए रोका गया है क्योंकि यह सड़क रिजर्व फारेस्ट के साथ ही साथ पेंच और कान्हा के बीच के काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कारीडोर को बाधित कर रही है, जिससे यहां से गुजरने वाले वाहन वन्य जीवों की आजादी में खलल डालेंगे, साथ ही साथ शिकारियों के लिए वन्य जीवों का शिकार बहुत ही आसान होगा।
 
वहीं दूसरी ओर वर्ष 2009 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने मध्य प्रदेश के सतपुड़ा और पेंच नेशनल पार्क के साथ ही साथ महाराष्ट्र के मेलघाट को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर पर काम आरंभ करवा दिया गया है। इसके बन जाने से आने वाले समय में तीनों नेशनल पार्क के वन्य जीव विशेषकर बाघों का दायरा बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
 
इस मामले में सबसे हैरानी वाली बात यह सामने आ रही है कि वन्य जीवों के प्रति एकाएक हमदर्दी जताकर सिवनी के साथ अपना प्रत्यक्ष बैर दर्शाने वाले वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट की नजरें अब तक सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर पर इनायत क्यों नहीं हो सकी हैं। गौरतलब होगा कि छिंदवाड़ा से नागपुर रेलमार्ग के अमान परिवर्तन और नरसिंहपुर छिंदवाड़ा, सौंसर नागपुर मार्ग इस टाईगर कॉरीडोर को दो मर्तबा बाधित कर रहा है। एक साल से अधिक समय से चालू की गई उक्त परियोजना में अब तक उक्त पर्यावरण और वन्य जीव प्रेमी एनजीओ की चुप्पी आश्चर्य का विषय ही मानी जा रही है।
 
\उक्त एनजीओ की चुप्पी से उन अफवाहों को बल मिल रहा है, जिनमे यह कहा जा रहा है कि किसी नेता विशेष द्वारा सिवनी के नागरिकों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर उत्तर दक्षिण चतुष्गामी फोरलेन को छीनने का प्रयास किया जा रहा है। पेंच कान्हा के काल्पनिक कॉरीडोर को आधार बनाकर सिवनी से नागपुर के मार्ग का काम रोका गया है, उससे गंभीर प्रकृति तो छिंदवाड़ा जिले से होकर गुजरने वाले प्रस्तावित नरसिंहपुर छिंदवाड़ा सौंसर, सावनेर नागपुर सड़क मार्ग और छिंदवाड़ा नैनपुर के ब्राडगेज की है।
 
अगर एनजीओ ने सिर्फ सिवनी के मामले में दिलचस्पी दिखाई है तो उससे इस मामले का कुहासा कुछ साफ होने लगा है कि किसी नेता विशेष के निर्देश या इशारों पर सिवनी जिले को एनएचएआई के उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से गायब करने का प्रयास पूरी शिद्दत और गंभीरता के साथ किया जा रहा है, जिस मामले में सिवनी के नेतृत्व कर्ता या तो अनजान हैं या फिर अनजान बनने का स्वांग रच रहे हैं।

उसी फॅूक (वाईल्ड लाईफ करीडोर) से सिवनी से नागपुर के मार्ग को रोकने का जतन किया जाता है, किन्तु उसी फॅूक (सतपुड़ा टाईगर कारीडोर) के मामले में एनजीओ सहित सांसद, विधायक और अन्य नेताओं के खेमे में खामोशी पसर जाती है, तो कहा जा सकता है कि ‘‘उसी से ठंडा, उसी से गरम।‘‘

सोमवार, 30 अगस्त 2010

ममता से वसूले जाएं 11 लाख

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

ममता से वसूले जाएं 11 लाख
केंद्र में रेल मंत्री का दायित्व संभालने वाली पश्चिम बंगाल की क्षत्रप सुश्री ममता बनर्जी ने नैतिकता की सारी हदें पार कर दी हैं। उन्होंने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली को छोड़कर पश्चिम बंगाल में ज्यादा समय बिताया जा रहा है। ममता बनर्जी ने सबसे पहले तो दिल्ली से हटकर कोलकता में पदभार ग्रहण कर सुर्खियां बटोरी थीं। इसके बाद उन्होंने त्रणमूल कांग्रेस के कोटे के मंत्रियों को साफ तौर पर हिदायत दी कि वे पश्चिम बंगाल में अपना ज्यादा समय व्यतीत करें। ममता शायद भूल जातीं हैं कि पश्चिम बंगाल के साथ ही साथ देश के अन्य सूबों को भी उनकी ममता की आवश्यक्ता है, पर ममता हैं कि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के जतन में न जाने कितनी वर्जनाओं को क्षतिग्रस्त करती जा रही हैं। अब भारतीय रेल के अफसरों पर 11 लाख रूपए खर्च किए जाने की खबरें प्रकाश में आईं हैं, यह खर्च ममता के पश्चिम बंगाल में रहने के कारण उनके मातहत अफसरान को उनसे फाईल क्लियर करवाने के लिए पश्चिम बंगाल की यात्राओं पर किया गया व्यय है। सवाल यह उठता है कि आम जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को अगर इस तरह हवा में ही उड़ाया जाएगा और गरीब गुरबों की खैर ख्वाह बनने का ढोंग करने वाली कांग्रेस चुपचाप सब कुछ देखे सुने तो अपराधी किसे माना जाएगा?
अमिताभ हैं झारखण्ड के मुखबिर!
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने रूपहले पर्दे पर अपने लंबे केरियर में न जाने कितने किरदार किए होंगे, फिल्म ‘मजबूर‘ मंे उन्होंने मुखबिर का किरदार जीवंत किया था। उमरदराज हो चुके अमिताभ बच्चन अब झारखण्ड में खुफिया सेवा के ‘मुखबिर‘ की भूमिका में हैं। जी हां, यह सच है, आपको आश्चर्य हो रहा होगा। झारखण्ड के पूर्व पुलिस महानिदेशक और वर्तमान में नगर सेना के महानिदेशक वी.डी.राम ने अमिताभ बच्चन को न केवल पुलिस का मुखबिर ही बना दिया वरन उनके नाम से 21 लाख छः हजार पांच सौ रूपए की राशि का आहरण भी करवा दिया। आश्चर्य तो तब हुआ जब इक्कीस लाख रूपए की रकम को पुलिस ने मुखबिर के लिए 17 मार्च 2006 को एक ही दिन में महज दो ही रसीदें बनवाकर भुगतान करवा दिया। एक रसीद अठ्ठारह लाख रूपए तो दूसरी तीन लाख साढ़े छः हजार की है। अब तो जनता जनार्दन समझ ही सकती है कि लालू प्रसाद यादव चारा, सुखराम दूरसंचार, कामन वेल्थ का सुरेश कलमाड़ी जैसे नेता कर सकते हैं तो भला फिर नौकरशाह पीछे क्यों रहें?
समग्र स्वच्छता अभियान का जमीनी सच
केंद्र सरकार द्वारा जनता से करों के माध्यम से वसूले गए अरबों रूपए समग्र स्वच्छता अभियान में झोंक दिए जाते रहे हैं, बावजूद इसके देश में समग्र स्वच्छता अभियान परवान नहीं चढ़ सका है। यह बात हम नहीं कह रहे हैं, केंद्रीय शहरी विकास राज्यमंत्री सौगत राय ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया है कि संयुक्त राष्ट्र की जलापूर्ति और सफाई के लिए गठित संयुक्त निगरानी समिति का प्रतिवेदन कहता है कि दुनिया भर में खुले में शौच करने वालें की कुल आबादी का साढ़े उननचास फीसदी हिस्सा भारत गणराज्य में है। बिडम्बना है कि 1999 से देश में आरंभ किए गए आवास एवं शहरी गीबी उन्नमूलन मंालय एकीकृत कम लागत सफाई प्रोग्राम का क्रियान्वयन केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। अब तक खरबों रूपए से ज्यादा व्यय करने के बाद भी देश में खुले में दिशा मैदान अर्थात शौच जाने वालों की बढ़ी तादाद निश्चित तौर पर भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के लिए शर्म की बात है, किन्तु मोटी खाल ओढ़े जनसेवकों को इस बात से शर्म शायद ही आए। ग्यारह साल से चलने वाले समग्र स्वच्छता अभियान की कलई खुलने के बाद भी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार मदमस्त हाथी के मानिंद ही चल रही है।
ऑफ द रिकार्ड नेताओं की शामत आई भाजपा में
मीडिया से गलबहियां कर ऑफ द रिकार्ड बात कहकर अपनी भड़ास निकालने और दूसरों के मुसीबत बनने वाले नेताओं पर अब भारतीय जनता पार्टी के नए आलाकमान ने नजर रखना आरंभ कर दिया है। भाजपा की गत बनाने वाले इन बड़बोले नेताओं की मश्कें कसती साफ नजर आ रही हैं। अपने किसी ‘‘खासुल खास‘‘ के मशविरे पर भाजपा के निजाम नितिन गडकरी ने खुफिया विभाग के एक सेवानिवृत वरिष्ठ अधिकारी को इन नेताओं की कारगुजारियों से आवगत कराने का जिम्मा दिया है। उक्त अधिकारी की सालाना पगार बहत्तर लाख रूपए सालाना है। इतनी मोटी पगार से साफ जाहिर है कि भाजपा के सिरमोर चाहते हैं कि उनके नेतृत्व में पार्टी की बेहतर छवि जनता के सामने आए। उक्त सेवानिवृत अधिकारी आजकल भाजपा के नेशनल हेडक्वार्टर 11 अशोक रोड़ में चहलकदमी करते दिख जाते हैं। बताते हैं कि उक्त अधिकारी द्वारा अपने प्रभावों का इस्तेमाल कर बड़बोले घर के भेदी नेताओं और पत्रकारों के बीच हुई फोन या मोबाईल की चर्चा के काल डिटेल आसानी से निकलवा लिए जाते हैं, फिर उन्हें खबरों के साथ जोड़कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी जाती है गडकरी को। भाजपा के नेता भयाक्रांत ही नजर आ रहे हैं इससे। आलम यह है कि भाजपा बीट को कव्हर करने वाले पत्रकारों से इस तरह के नेताओं द्वारा पर्याप्त दूरी बनाकर रखी जा रही है।
कलमाडी ही नहीं शीला, रेड्डी, गिल भी हैं निशाने पर
कामन वेल्थ गेम्स में जनता के गाढ़े पसीने की कमाई का पैसा पानी की तरह उड़ाया जा रहा है। इसके लिए खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है। मीडिया को मैनेज कर अनेक चेहरों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। देखा जाए तो इस मामले में शीला दीक्षित को 16 हजार पांच सौ साठ करोड़ रूपए राजधानी को अपग्रेड करने के लिए दिए गए थे। शीला ने पहले भी कहा था कि समय की कमी को देखकर उनके हाथ पांव फूल रहे हैं। यमुना के साथ अक्षरधाम के करीब बने खेल गांव को खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल ने नेहरू स्टेडियम के पास लोधी रोड़ के पास बनाने का प्रस्ताव दिया था। अगर यह वहां बन जाता तो करदाताओं के पैसों में आग लगने से बच जाती। शीला के गुदड़ी के लाल संदीप दीक्षित के लोकसभा क्षेत्र को संवारने के लिए सारी बातों पर धूल डाल दी गई। इसी तरह शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी की देखरेख में लगभग अठ्ठाईस हजार करोड़ रूपए को पानी में बहा दिया गया। यह सच्चाई जनता के सामने इसलिए नहीं आ सकी क्योंकि इन सभी के मीडिया मेनेजमंेट तारीफे काबिल रहे।
मुखर्जी की मौत का दस्तावेज गायब!
भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के दस्तावेज भारत सरकार के पास हैं ही नहीं। मजे की बात तो यह है कि भारतीय जनसंघ की बैसाखियों पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में तीन बार देश पर राज किया फिर भी किसी को इस बात की सुध नहीं आई कि अपने पितृपुरूष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के बारे में मालुमात कर सकें। गौरतलब है कि मुखर्जी का निधन 55 वर्ष पूर्व काश्मीर की एक जेल में हुआ था। गृह मंत्रालय के अधिकारियों के पास भी इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है, सूचना के अधिकार में चाही गई जानकारी के जवाब में गृह मंत्रालय का कोई स्पष्ट जवाब नहीं आना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। इंडिया लीगल एड फोरम से जुडे आवेदक जयदीप मुखर्जी के सवाल का जवाब उन्हें नहीं मिल सका है। मुखर्जी ने पूछा था कि क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन से संबंधी दस्तावेज गोपनीय थे, इस बारे में भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मौन ही साधा हुआ है।
रिक्शा खीचने पर मजबूर बूढ़ी हड्डियां
पांच पांच पुत्रों के होने के बावजूद भी मुजफ्फरपुर के सकल राम को 85 साल की उमर में रिक्शा खीचना मजबूरी बन गया है, हो क्यों न? उन्हें अपना और अपनी अर्धांग्नी का पेट जो भरना है। पेट की आग बुझाने को सकल राम रोज सुबह रिक्शा लेकर सवारियों का इंतजार करते रहते हैं। कभी कभी तो यह स्थिति भी आती है कि वे अचानक ही चक्कर खाकर गिर जाते हैं। कभी कभी देखने वाले उन पर तरस खाकर वैसे ही उनकी रोजी रोटी का इंतजाम कर देते हैं, पर सकल राम चाहते हैं कि जब तक उनके शरीर में जान है तब तक वे अपनी आजीविका की व्यवस्था खुद ही करेंगे। इस मंहगाई के जमाने में भी सकल राम बस बीस तीस रूपए जमा होते ही अपने घर को लौट जाते हैं। सकल राम जैसे न जाने कितने व्यक्ति होंगे भारत में जो अपनी आजीविका के लिए दर दर भटकने पर मजबूर होंगे। भारत सरकार और सूबाई सरकारों की निराश्रित पेंशन योजना की कलई खोलने के लिए इस तरह के वाक्ये पर्याप्त माने जा सकते हैं।
अंडरवर्ल्ड की नई नामवाली!
कल तक अंडरवर्ल्ड में मुच्छड़ के नाम से पहचाना जाने वाला दाउद इब्राहिम का नया नामकरण हो गया है। पुलिस को छकाने के लिए अंडरवर्ल्ड के लोगों ने नई नामावली को अंजाम दिया है। यह बात मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच द्वारा कुछ संदिग्ध फोन और मोबाईल की टेपिंग के उपरांत सामने आई है। पुलिस के सूत्रों ने बताया कि फोन पर अपनी बात कहने और किसी को समझ न आने के डर से गुर्गांे द्वारा तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। बताया जाता है कि पुलिस वालों को पूर्व में बाबू या पांडू कहा जाता था जो अब उलिस्पा के नाम से जाना जाने लगा है। लंबी दाढ़ी के कारण दाउद को अब हाजी साहेब, बंदूक को मां तो गोलियों को चाकलेट की जगह अब बेटा, छोटा शकील को सीएसबी अर्थात छोटा शकील भाई और उसकी हेयर स्टाईल के कारण उसे पाउ टकला भी कहा जाने लगा है, नाना के नाम से जाना जाने वाला छोटा राजन को सेठ, मुखबिर को जीरो कहा जा रहा है।
दिल्ली में इंदौरी पोहा!
मूलतः मध्य प्रदेश के मालवा और महाराष्ट्र के हल्के नाश्ते चावल के पोहे के स्वाद से अब दिल्ली वासी भी रूबरू हो चले हैं। चटपट बनने वाला कम तेल आहर का पोष्टिक पोहा एमपी के मालवा विशेषकर इंदौर की शान माना जाता है। राजधानी दिल्ली में यमुना पार लक्ष्मी नगर के मंगल मार्केट में स्टेट बैंक के सामने रेहडी लगाने वाले मुरैना निवासी रवि ने दिल्ली में हल्के नाश्ते के शौकीनों को इंदौरी पोहा का स्वाद दिलाया। लक्ष्मी नगर में रहने वाले विद्यार्थियों को इंदौर का पोहा इतना भाया कि आसपास में स्कूल ब्लाक, पड़पड़गंज, प्रीत विहार कड़कड़डूमा आदि क्षेत्र के लोग भी इस पोहे का स्वाद लेने लालायित दिखने लगे हैं। वैसे दिल्ली में सुबह के नाश्ते में मूलतः ब्रेड पकौड़ा, समोचा, कचौड़ी, छोले भटूरे का ही रस्वादन किया जाता है, किन्तु इन सबमें तेल की मात्रा बहुत अधिक रहती है, कम तेल के पोष्टिक आहार पोहे की दीवानगी दिल्ली में शनैः शनैः बढ़ती दिखने लगी है।
बाबा की अदालत का इंसाफ
क्या आप यकीन कर सकते हैं कि किसी गांव का एक भी आपराधिक प्रकरण पुलिस थाने में दर्ज नहीं हो। जी हां, जालंधर जिले का एक ऐसा गांव है जहां एक भी मामला पुलिस के रोजनामचे में दर्ज नहीं है। होशियारपुर मार्ग पर अवस्थित ग्राम लेसड़ी वाल में यह कारनामा हो रहा है। यह क्षेत्र थाना आदमपुर के इलाके में आता है। यहां पीर मियां मिट्ठे शाह की दरगाह है। यह दरगाह सड़क से 20 फिट की उंचाई पर है। कहते हैं कि गांव का एक भी घर इसे अधिक उंचाई का नहीं है। जो भी इससे उंचा मकान बनाने का प्रयास करता है, उसका मकान अपने आप ही ध्वस्त हो जाता है। यह दरगाह मुगल काल में स्थापित हुई थी। यहां सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि गांव में चोरी होती ही नहीं है, अगर किसी ने धोखे से चोरी कर भी ली तो चोर सामान लेकर गांव के बाहर जा ही नहीं पाता है, धारणा है कि अगर वह बाहर गया तो उसे दिखना बंद हो जाएगा। इक्कीसवीं सदी में भी इस तरह के चमत्कार अगर हों तो उन्हें नमस्कार ही करना होगा।
पीएम ने जताई पटेल से नाराजगी
भारत के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने संभवतः पहली बार किसी मंत्री के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार किया है। पीएम ने नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के मंत्रालय के एक नीतिगत निर्णय पर कड़ा रूख अपनाया है। दरअसल नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इस साल मार्च में अपने सभी पूर्व सचिवों को एयर इंडिया की घरेलू और समुद्र पारीय उड़ानों में परिवार सहित मुफ्त टिकिट अपग्रेडेशन सुविधा का नीतिगत निर्णय लिया है। दिल्ली से लंदन की रिटर्न टिकिट का किराया इकानामी क्लास में पचास हजार रूपए तो प्रथम श्रेणी में यह दो लाख रूपए के करीब है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने इस मामले में अपनी नाराजगी जाहिर की है। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री इस बाते से खासे नाराज हैं कि नौकरशाहों को इस तरह जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को उड़ाने के लिए स्वतंत्र कैसे छोड़ा जा सकता है। प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय है कि प्रधानमंत्री के खफा होने का उस पर कोई असर होता दिख नहीं रहा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री के आदेश के बाद भी नागर विमानन मंत्रालय ने इस मामले में खामोशी ही अपनाई हुई है।
अंततः झुकना ही पड़ा साई बाबा के संस्थान को
शिरडी के फकीर साई बाबा के अनन्य भक्तों की कमी इस देश और विदेशों में कहीं भी नहीं है। सत्तर के दशक में मनोज कुमार ने शिरडी के साई बाबा पर वालीवुड में चल चित्र बनाकर साई बाबा की कीर्ति को कोने कोने में पहुंचा दिया था। चालीस सालों में महाराष्ट्र के अहमदपुर जिले के शिरडी कस्बे के हालात बहुत बदल चुके हैं। बाबा के भक्तों की तादाद में अचानक ही बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। बाबा के भक्त मुक्त हस्त से बाबा के लिए सब कुछ अर्पण करने को आमदा प्रतीत होते हैं। बाबा की प्रसिद्धि को देखकर साई बाबा संस्थान शिरडी ने कुछ सदस्य बाबा की चरण पादुकाओं को भारत गणराज्य पर दो सौ साल राज करने वाले ब्रितानियों के देश की राजधानी लंदन में 19 सितम्बर को होने वाले साई भक्त सम्मेलन में ले जाने पर आमदा थे। जब यह बात उजागर हुई तब साई भक्तों के बीच रोष और असंतोष की स्थिति बन गई। साई भक्तों के विरोध के आगे अंततः साई बाबा संस्थान को झुकना पड़ा और साई पादुका को लंदन ले जाने का प्रोग्राम निरस्त ही करना पड़ा।
पुच्छल तारा
भारत के लोग क्या नहीं कर सकते, हर कुछ है भारतीयों के बस में। हिन्दुस्तानियों के नाम और हुनर का डंका आज दुनिया भर में बज रहा है। देश के मीडिया को आज देश के गौरव से ज्यादा प्रियंका की साड़ी या उनकी हेयर स्टाईल को स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के समान बताने में ज्यादा दिलचस्पी है। इसी बात को रेखांकित करते हुए बनारस से समीर शर्मा ने एक ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि वक्त वक्त की बात है। ब्रितानियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश पर दो सौ साल से अधिक राज किया, वह आज एक भारतीय द्वारा खरीद ली गई है। संजीव मेहता ने इस कंपनी को डेढ़ सौ बिलियन डालर में खरीदा है। मीडिया को इस खबर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है कि जिसने देश पर राज किया उसे ही आज एक भारतीय ने खरीद लिया। समीर शर्मा कहते हैं कि मीडिया को भले ही फुर्सत न हो पर हम ही मीडिया बनकर एक दूसरे को ईमेल भेजकर मीडिया का रोल अदा करें।