दो सदियों से सत्ता का केंद्र बना हुआ है व्हाईट हाउस
(लिमटी खरे)
दुनिया जिसे डरकर सलाम करती है वह है अमेरिका। अमेरिका को यूं ही दुनिया का चौधरी नहीं कहा जाता। अमेरिका जब चाहे जिस देश पर जाकर अपनी सेना से वहां दमन फैला सकता है। जी हां यह सच है। जिसने भी अमेरिका की तरफ आंख तरेरी है। अमेरिका ने उसे नेस्तनाबूत कर दिया है। दुनिया में किसी भी देश के अंदर इतना साहस नहीं है कि वह अमेरिका की जायज नाजायज ज्यादतियों का विरोध कर सके। अगर उसके फौजी दस्ते किसी देश में रूककर रसद या तेल आदि चाहते हैं तो वह सब देना उस देश की मजबूरी में शामिल है। देखा जाए तो गुलामों की मेहनत का नतीजा है विश्व के चौधरी का सरकारी आवास। इसे बड़े जतन से बनवाया था वाशिंगटन ने किन्तु वे इसमें रह नहीं पाए। दुनिया के चौधरी के इस आवास में चोरों ने कई मर्तबा सेंध भी लगाई है। तत्कालीन रसिया महामहिम राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कारण यह जमकर चर्चाओं में रहा है। इसकी नींव 1792 में रखी गई थी।
दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम पुरूष का सरकारी आवास व्हाईट हाउस में पहली बार अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कदम रखा। व्हाईट हाउस पिछले 200 सालों से विश्व की सत्ता और असीमित शक्ति का केंद्र बना हुआ है। इन दो शताब्दियों में इस सरकारी आवास ने न जाने कितने उतार चढाव देखे हैं। इसकी दीवारों में चुनी गई ईंटों में न जाने कितने राज दफन हैं। ये सब गवाह हैं डिप्लोमेसी, सियासी अच्छाईयों और बुराईयों के, दयालुता और क्रूरता के।
इसके निर्माण में एक दशक से कम का समय लगा। आठ साल में अस्तित्व में आए इस व्हाईट हाउस का नामकरण अलग अलग रूप से किया जाता रहा है, कभी इसे प्रेजिटेंड पेलेस, तो कभी प्रेजिडेंशियल मेंशन तो कभी प्रेजिटेंड हाउस के नाम से पुकारा जाता रहा है। सन 1811 में इसे पहली बार व्हाईट हाउस के नाम से जाना गया। इसके निर्माण में लगभग 600 कामगारों का उपयोग किया गया था। बताते हैं कि इनमें से दो तिहाई से अधिक कामगार गुलाम हुआ करते थे, जिन्हें साठ डालर प्रति साल के हिसाब से मेहनताना मिलता था।
इस इमारत की नींव 13 अक्टूबर 1792 में रखी गई थी। विडम्बना ही कही जाएगी कि जार्ज वाशिंग्टन की देखरेख में 1800 तक चले इसके निर्माण के उपरांत वे इसमें रहने का सुख नही पा सके थे। इस भवन में रहने वाले प्रथम राष्ट्रपति थे जॉन एडम्स। अमेरिका गणराज्य के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने पोटोमैक नदी के किनारे पेंसिलवेनिया एवेन्यू में एक जगह का चयन कर दिसंबर 1790 में एक कानून पारित करवाकर इसके निर्माण की बुनियाद रखी थी। इस विशाल भवन का आर्किटेक्ट भी कोई और नहीं वरन आयरिश नक्शेकार जेम्स हॉबन थे। कुल नौ प्रस्तावों के चयन के उपरांत हॉबन को बेहतरीन डिजाईन के लिए स्वर्ण पदक से सम्मानित भी किया गया था।
विश्व भर में सबसे ताकतवर मानी जाने वाली शक्सियत के इस सरकारी आवास के स्वरूप में भी समय समय पर परिवर्तन किया जाता रहा है। 1805 में तत्कालीन राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने इसमें कुछ अतिरिक्त कक्षों का निर्माण करवाया था। 1814 में ब्रिटिश सेना ने इसके कुछ हिस्सों को आग के हवाले भी कर दिया था। इसके बाद 1817 में तत्कालीन महामहिम जम्स मुनरो ने इसकी मरम्मत का काम करवाया था। इतना ही नहीं 1929 में भी आग के चलते इसके पश्चिमी भाग को काफी नुकसान उठाना पड़ा था।
व्हाईट हाउस को समय समय पर महामहिमों की इच्छा के अनुरूप जनता के लिए भी खोला जाता रहा है। सबसे पहले थामस जेफरसन ने 1805 में पदभार ग्रहण करते समय यहां रियाया को आमंत्रित किया गया था। यह क्रम 1885 तक बदस्तूर जारी रहा। इसके बाद ग्रोवर क्लीवलैड ने इस प्रथा पर विराम लगा दिया। इसके बाद विवादित महामहिम बिल क्लिंटन ने नए साल के मौके पर जनता के लिए कुछ समय हेतु इसे खोलने की परंपरा का आगाज किया।
व्हाईट हाउस सबसे अधिक चर्चाओं में बिल क्लिंटन के कार्यकाल में ही आया। मोनिका लेविंस्की और क्लिंटन के अवैध संबंधें के चलते दुनिया भर की नजरें व्हाईट हाउस पर आ टिकीं थीं। इन दोनों के प्रेम प्रसंगों पर न जाने कितने लेखकोें ने मनगढंत कहानियां गढ़कर खासी कमाई भी कर ली थी। जिन किताबों में क्लिंटन मोनिका के प्रेम प्रसंग हैं, उनमें व्हाईट हाउस के अंदर का वर्णन भी किया गया है, जो लोगों के मन में कोतुहल बढ़ा देता है।
18 एकड़ क्षेत्र में बने अमेरिका के प्रथम नागरिक का सरकारी आवास कुल 168 फिट लंबा और 137 फिट चौड़ा है। यह दक्षिण दिशा में 70 फिट तथा उत्तर दिशा में साठ फिट उंचा है। इसकी बाहरी दीवारों को सफेद रंग से रंगने के लिए 300 गेलन पेंट का उपयोग किया जाता है। इस भवन में कुल 132 कमरे हैं, जिनमें 16 बेडरूम, एक मुख्य रसोई, एक आहार रसोई, 35 गुसलखानों का शुमार है। भूतल मंे एक प्रमुख गलियारे के अलावा अनेकानेक विश्राम कक्ष, मीटिंग हाल, गुसल आदि मिलाकर इसका कुल कारपेट एरिया 55 हजार वर्ग फुट है।
विश्व के सबसे शक्तिशाली महानायक के इस सरकारी आवास में अनेकानेक बार सेंध भी लग चुकी है। 1974 में अमेरिकन आर्मी का एक चोरी गया हेलीकाप्टर इस परिसर में उतरा गया था, इसके अलावा 20 मई 1994 में उल्का विमान भी इस भवन की सैर कर चुका है। 1995 की आतंकवादी घटना और 11 सितम्बर (9/11) की घटना के बाद इस इमारत की चौकसी बढ़ा दी गई है। अमेरिका के इस भवन में होने वाले घटनाएं अंदर ही दफन कर दी जाती हैं। मोनिका प्रकरण के अलावा और कोई भी राज बाहर नहीं आ सका है। पिछले दिनों बराक ओबामा की ‘बियर डिप्लोमेसी‘ के कुछ फोटो व्हाईट हाउस ने जारी किए थे जिसमें ओबामा अपने मित्रों के साथ लान में बैठकर बियर पी रहे थे, ने लोगों के मन में इस भवन के प्रति उत्सुक्ता और बढ़ा दी थी।
तीन को मिला पुरूस्कारजारी हुई महज एक की खबर और फोटो
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के अत्यंत मंहगे और दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनाट सर्कस में मध्य प्रदेश सरकार के सूचना केंद्र की कार्यप्रणाली गजब ढा रही है। भाजपामय हो चुके इस सरकारी कार्यालय द्वारा अब तो समाचार जारी करने में भी पक्षपात किया जाने लगा है। हाल ही में पुरूस्कृत हुए मध्य प्रदेश के तीन लोगों के बजाए सूचना केंद्र ने महज एक ही प्रतिभागी के पुरूस्कार के बारे में खबर और फोटो जारी की है।
मध्य प्रदेश सूचना केंद्र द्वारा जारी आधिकारिक खबर के अनुसार मध्यप्रदेश, भोपाल की प्रसिद्ध लेखिका डॉ0 स्वाति तिवारी को उनकी कृति ’अकेले होते लोग’ के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार के रूप में डॉ0 तिवारी को प्रशस्ति पत्र, शाल और 40 हजार रूपये की राशि भेंट की गयी। यह पुरस्कार आज यहां नई दिल्ली में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के कार्यालय में आयोजित समारोह में आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री के.जी. बालाकृष्णन द्वारा प्रदान किया गया।
खबर में कहा गया है कि वर्तमान में डॉ0 स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश जनसंपर्क संचालनालय में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं। डॉ0 स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश के धार जिले से हैं। उनके द्वारा अभी तक 16 पुस्तकंे लिखी जा चुकी हैं और विभिन्न मानवीय विषयों पर लगभग 200 कहानियां लिखी हैं जिसका प्रकाशन देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हुआ है।
उल्लेखनीय है कि वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक ’अकेले होते लोग’ वृद्धावस्था के मानवाधिकारों के हनन पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सम्मानजनक वृद्धावस्था का आग्रह करते हुए वृद्धों को जीवन के अकेलेपन से बचाने का प्रयास करती हैं। यह पुस्तक भारतीय समाज को उसकी जड़ों के खोखले होने के खतरों को उकेरती है। वृद्धाश्रमों के बजाय परिवारों में वृद्धों के स्थान को सुनिश्चित किए जाने के लिए आगाह करती है।
बताया जाता है कि इस समारोह में मध्य प्रदेश के एक अधिकारी मनोहर बाथम जो कि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में महानिरीक्षक के पद पर हैं एवं एक शिक्षा विद डॉ.चंचला चंद्रशेखकर को भी सम्मानित किया गया है। वस्तुतः यह पुरूस्कार राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा मानव अधिकारों पर हिन्दी में द्विवार्षिक सृजनात्मक लेखन के लिए वर्ष 2008 - 2009 के लिए प्रदान किया गया है। जनसंपर्क द्वारा जारी समाचार में इसका उल्लेख करने के बजाए विभाग में ही पदस्थ अतिरिक्ति संचालक की अर्धांग्नी का महिमा मण्डन ज्यादा किया गया है। गौरतलब है कि तिवारी दंपत्ति दो वर्ष पूर्व दिल्ली में सूचना केंद्र में ही पदस्थ थे। उस दौरान मध्य प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अरूणा शर्मा आयोग की सदस्य सचिव भी रहीं हैं।
हिन्दी दिवस में आंग्ल संबोधन!
मौका हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए पुरूस्कारों का था। पुरूस्कार भी दिए जा रहे थे उन्हें जिन्होंने हिन्दी में बेहतरीन काम किए हैं। पुरूस्कार पाने वाले लोग अपने आप को गोरवान्वित महसूस कर रहे थे। अचानक ही हिन्दी की चिन्दी तब उड़ती नजर आई जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री के.जी. बालाकृष्णन ने अपना उद्बोधन आरंभ किया। बालाकृष्णन ने अपने उद्बोधन में हिन्दी के विकास का जिकर किया। वक्ता हक्का बक्का थे क्योंकि समूचा उद्बोधन अंग्रेजी भाषा में था। हिन्दी दिवस पर मुख्य वक्ता का अंग्रेजी में उद्बोधन सुनने के बाद लोगों को लगने लगा कि हिन्दी की दुर्दशा का कारण आखिर क्या है?
सिलिकोसिस की जानलेवा बीमारी की जद में हैं अधिकांश मजदूर
मालिकों द्वारा नहीं कराया जाता मजदूरों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। देश भर में गिट्टी बनाने के लिए पत्थर तोड़ने वाले क्रेशर और कोयला एवं पत्थर खदानों व रेत का काम करने वाले मजदूरों का जीवन अब खतरे से खाली नहीं है। नियमित स्वास्थ्य जांच के अभाव में यहां काम करने वाले मजदूर ‘सिलिकोसिस‘ नामक बीमारी की जद में आ चुके हैं। मध्य प्रदेश में मंदसौर, पन्ना, झाबुआ, अलीराजपुर, जबलपुर, कटनी आदि में सिलिकोसिस के मजदूर बहुतायत में मिलने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सूत्रों का कहना है कि देश भर से इस तरह की शिकायतें मिल रहीं है। सूत्रों ने कहा कि पूर्व में आयोग द्वारा 22 नवंबर 2010 में मंदसौर के तीन परिवार जो सिलिकोसिस से पीड़ित थे को तीन तीन लाख रूपए का मुआवजा देने के निर्देश दिए थे। मानव अधिकार आयोग के पास आने वाली शिकायतों के अंबार में मध्य प्रदेश पहले दस राज्यों में अपने आप को रख रहा है।
चिकित्सकों के अनुसार यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि इस बीमारी के होने पर इसका कोई उपचार ही नहीं है। बस इससे बचाव ही इसका एकमात्र रास्ता है। चिकित्सकों ने बताया कि सांस तेज चलना, सीने में जकड़न, वजन में कमी, खांसी का ठीक न होना इसके प्रमुख लक्षण हैं। दरअसल पत्थर तोड़ने के दौरान निकलने वाली धूल के कण जब स्वांस के माध्यम से अंदर जाते हैं, तब ये फैंफड़ों में जाकर जम जाते हैं।
सूत्रों ने बताया कि आयोग जल्द ही देश भर के जिला कलेक्टर्स को निर्देश जारी करने वाला है जिसमें उनके जिलों में चल रहे स्लेट उद्योग, क्रेशर, पत्थर फोड़ने के काम, मार्बल उद्योग यहां तक कि पन्ना की हीरे की खदानों तक में काम करने वाले मजदूरों का बाकायदा स्वास्थ्य परीक्षण समय समय पर करवाया जाए। इसके लिए इन उद्योगों के मालिकों को ही पाबंद किया जाए।
भारत गणराज्य में न्यायपालिका को सर्वोच्च दर्जा है किन्तु देश की सबसे बड़ी पंचायत द्वारा कानून कायदे बनाए जाते हैं। इनका पालन हो रहा है या नहीं इसके लिए न तो बड़ी पंचायत और ना ही उसमें बैठे पंच और सरपंच ही संजीदा हैं। बच्चों को निशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए बनाया गया था शिक्षा का अधिकार कानून। आज शिक्षा का अधिकार कानून है देश भर में बेअसर ही साबित हो रहा है। हालात यह है कि आज भी गरीब गुरबे वंचित हैं स्कूल जाने से। आवश्यक्ता इस बात की है कि कानून बनाने के पहले उसका पालन सुनिश्चित करे सरकार। शिक्षा माफिया सहित हर क्षेत्र का माफिया इतना ताकतवर हो गया है कि कानून की सरेआम उडती धज्जियां और देश के शासक बेबस ही नजर आते हैं।
अशिक्षा आज भारत गणराज्य में नासूर बन चुकी है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं ने अपने आप को आजादी के उपरांत खासा समृद्ध कर लिया है, पर आवाम ए हिन्द (भारत गणराज्य की जनता) का अधिक हिस्सा आज भी भुखमरी के आलम में अशिक्षित ही घूम रहा है। देश में सुरसा की तरह बढती मंहगाई पर से जनता जनार्दन का ध्यान भटकाने के लिए सरकारों द्वारा नए नए छुर्रे छोडे जाते हैं। इसी तारतम्य में कुछ सालों पूर्व देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया।
अप्रेल फूल यानी एक अप्रेल के दिन से भारत गणराज्य में लागू हुए शिक्षा के अधिकार कानून में भारत में छः से 14 साल तक के बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून मे यह प्रावधान किया गया था कि शाला प्रबंधन इस बात को सुनिश्चित करे कि आर्थिक तौर पर कमजोर बच्चों को शाला की क्षमता के 25 फीसदी स्थान इन बच्चों को दिए जाएं। कमोबेश यही कानून चिकित्सा के क्षेत्र में चल रहे फाईव स्टार निजी अस्पतालों के लिए लागू किए गए थे। विडम्बना यह है कि देश में कानून तो बना दिए जाते हैं पर उनके पालन की सुध किसी को भी नहीं रहती है। राजधानी दिल्ली में ही सरकार से तमाम सुविधाएं लेने वाले फोर्टिस अस्पताल द्वारा पिछले पांच सालों में महज पांच गरीबों का ही निशुल्क इलाज किया। यह बात हम नहीं दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य मंत्री किरण वालिया कह रहीं हैं वह भी विधानसभा पटल पर जानकारी रखते हुए। इसके उपरांत आज भी फोर्टिस अस्पताल सीना तानकर अमीरों और धनाड्यों की जेब तराशी कर रहा है, वह भी सरकारी सुविधाओं और सहायता को प्राप्त करने के साथ। कुछ दिनों पूर्व ही माननीय न्यायालय ने कहा था कि रियायती कीमत पर ली गई सरकारी जमीन को वापस करो फिर इलाज के पैसे लो। एक तरफ तो अस्पतालों द्वारा सरकार से रियायती मूल्य पर जमीन ली जाती है। उस वक्त बाण्ड भी भरा जाता है पर जब चिकित्सा की दुकान चल निकलती है तब वे सारे वायदे भुला बैठते हैं। जब देश के नीति निर्धारकों की जमात के स्थल पर ही इस तरह की व्यवस्थाएं फल फूल रही हों तब बाकी की कौन कहे। अभी से शिक्षा के कानून का यह आलम है तो आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून की धज्जियां अगर उडती दिख जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 13 साफ तौर पर इस ओर इशारा करती है कि स्कूलों में अनिवार्य तौर पर 25 फीसदी सीट उन बच्चों के लिए आरक्षित रखी जाएं जो कमजोर वर्ग के हों। कानून की इस धारा का पहली मर्तबा उल्लंघन करने पर 25 हजार रूपए एवं उसके उपरांत हर बार पचास हजार रूपए के जुर्माने का प्रावधान है। शिक्षा के अधिकार का कानून तो लागू हो चुका है देश के गरीब गुरबों को कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक सपना दिखा दिया है कि गरीबों के बच्चे भी अब कुलीन परिवार के लोगों के बच्चों, धनाडयों, नौकरशाहों, जनसेवकों के साहेबजादों, के साथ अच्छी स्तरीय शिक्षा ले सकते हैं।
शिक्षा आदि अनादिकाल से ही एक बुनियादी जरूरत समझी जाती रही है। पहले गुरूकुलों में बच्चों को व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था थी, जो कालांतर में अव्यवहारिक शिक्षा प्रणाली में तब्दील हो गई। आजाद भारत में शासकों ने अपनी मर्जी से शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करना आरंभ कर दिया। अब शिक्षा जरूरत के हिसाब से नहीं वरन् सत्ताधारी पार्टी के एजेंडे के हिसाब से तय की जाती है। कभी शिक्षा का भगवाकरण किया जाता है, तो कभी सामंती मानसिकता की छटा इसमें झलकने लगती है।
वर्तमान में अनिवार्य शिक्षा के कानून में 6 से 14 साल के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा प्रवेश, पहली से आठवीं कक्षा तक अनुर्तीण करने पर प्रतिबंध, शारीरिक और मानसिक दण्ड पर प्रतिबंध, शिक्षकों को जनगणना, आपदा प्रबंधन और चुनाव को छोडकर अन्य बेगार के कामों में न उलझाने की शर्त, निजी शालाओं में केपीटेशन फीस पर प्रतिबंध, गैर अनुदान प्राप्त शालाओं के लिए अपने पडोस के मोहल्लों के न्यूनतम 25 फीसदी बच्चों को अनिवार्य तौर पर निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
जिस तरह लोगों को आज इतने समय बाद भी रोजगार गारंटी कानून के बारे में जानकारी पूरी नहीं हो सकी है, उसी तरह आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून टॉय टॉय फिस्स हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस नए कानून से किसी को राहत मिली हो या न मिली हो कम से कम गुरूजन तो मिठाई बांट ही रहे होंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा से इतर बेगार के कामों में जो उलझाया जाता था, उससे उन्हें निजात मिल ही जाएगी। अब वे धूप में परिवार कल्याण और पल्स पोलियो जैसे अभियानों में चप्पल चटकाने से बच सकते हैं। लगता है अनिवार्य शिक्षा कानून का मसौदा केंद्र में बैठे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली सहित अन्य महानगरों और बडे शहरों को ध्यान में रखकर बनाया है। इसमें शाला की क्षमता के न्यूनतम 25 फीसदी उन छात्रों को निशुल्क शिक्षा देने की बात कही गई है, जो गरीब हैं।
अगर देखा जाए तो मानक आधार पर कमोबेश हर शाला भले ही वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र की उसमें बुनियादी सुविधाएं तो पहले दिन से ही और न्यूनतम अधोसंरचना विकास का काम तीन साल में उलब्ध कराना आवश्यक होता है। इसके अलावा पुरूष और महिला शिक्षक के लिए टीचर्स रूम, अलग अलग शौचालय, साफ पेयजल, खेल का मैदान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, बाउंड्रीवाल और फंेसिंग, किचन शेड, स्वच्छ और हवादार वातावरण होना आवश्यक ही होता है। छात्रों के साथ शिक्षकों के अनुपात में अगर देखा जाए तो सीबीएसई के नियमों के हिसाब से एक कक्षा में चालीस से अधिक विद्याथियों को बिठाना गलत है, फिर भी सीबीएसई से एफीलेटिड शालाओं में सरेआम इन नियमों को तोडा जा रहा है। शिक्षकों के अनुपात मे मामले में अमूमन साठ तक दो, नब्बे तक तीन, 120 तक चार, 200 तक पांच शिक्षकों की आवश्यक्ता होती है।
अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं में जनता के गाढे पसीने की कमाई खर्च कर सरकारी खजाना खाली करने वाले देश के जनसेवकों ने अब देश का भविष्य गढने की नई तकनीक इजाद की है। अब किराए के शिक्षक देश का भविष्य तय कर रहे हैं। कल तक पूर्णकालिक शिक्षकों का स्थान अब अंशकालीन और तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया है। निजी स्कूल तो शिक्षकों का सरेआम शोषण कर रहे हैं। अनेक शालाएं एसी भी हैं, जहां शिक्षकों को महज 500 रूपए की पगार पाकर 2500 रूपए पर दस्तखत कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि केंद्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार द्वारा साठ के दशक के पहले राजकपूर अभिनीत चलचित्र सपनों के सौदागर की तरह सपने ही बचने पर आमदा है। इन सपनों को हकीकत में बदलने का उपक्रम कोई नहीं कर रहा है। दो वक्त की रोटी न मिल पाने के चलते फाका मस्ती में दिन गुजारने वाला आम हिन्दुस्तानी आज नजरें उठाकर अपने शासकों की तरफ देखने को मजबूर है। शासक हैं कि वे भारत गणराज्य की जनता को भुलावे में रखकर रोज नया सपना दिखा रहे हैं। आलम यह है कि भारत में आज किसी के तन पर कपडा नहीं है किसी के सर पर जमीन नहीं तो कोई रोटी के निवाले को तरह रहा है। इस सबसे शासकों और जनसेवकों को क्या लेना देना। जनसेवक तो अपनी मौज मस्ती में व्यस्त हैं, उनके वेतन भत्ते और सुख सुविधाओं में कहीं से कहीं तक कोई कमी नहीं है।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को शिक्षा का अधिकार का मशविरा देने वालों ने उन्हें देश की भयावह जमीनी हकीकत नहीं दिखाई होगी। आज भी देश में वर्ग और वर्णभेद उसी तरह हिलोरे मार रहा है जैसा कि आजादी के पहले था। आज अमीर का मित्र अमीर ही है, अमीर गरीब के बीच का फासला बहुत ही ज्यादा बढ चुका है। अमीर और अधिक अमीर होता जा रहा है तथा गरीब गुरबे की कमर टूटती ही जा रही है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई उद्योगपति, नौकरशाह, सांसद, विधायक, जनसेवक आदि यह बर्दाश्त कर सकता है कि उसके घर झाडू फटका करने या बर्तन मांझने वाले का कुलदीपक बाजू में बैठकर उसी शाला में पढे? जवाब नकारात्मक ही होगा। तब क्या नामी गिरामी दून, मेयो, मार्डन, डीपीएस आदि स्कूल में पढने वाले ‘‘बाबा साहब‘‘ अर्थात साहब बहादुरों के बच्चों को यह गवारा होगा कि उसके बाजू में बैठकर एक गरीब शिक्षा ग्रहण करे? ये सारी बातें फिल्मों में ही शोभा देती हैं जिसमंे अमीरी गरीबी को सगी बहनें जतलाकर इनके बीच के भेद को अंत में मिटा दिया जाता है।
शिक्षा के अधिकार कानून में अमीरी गरीबी के बीच की खाई के कारण होने वाली दिक्कत को अब मानव संसाधन विभाग द्वारा ‘‘व्यवहारिक कठिनाई‘‘ की संज्ञा देने की तैयारी की जा रही है। इस कानून के पालन में शालाओं विशेषकर निजी तौर पर शिक्षा माफियाआंे द्वारा संचालित शालाओं के संचालकों को बहुत ही अधिक ‘‘व्यवहारिक कठिनाई‘‘ का सामना करना पड रहा है। अनेक शिक्षण संस्थाओं के संचालकों ने इस ‘‘व्यवहारिक कठिनाई‘‘ के चलते अपनी शिकायत से मानव संसाधन विकास मंत्रलय को आवगत करा दिया गया है। गौरतलब है कि सरकारी तौर पर संचालित होने वाले नवोदय विद्यालय समिति द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता की दुहाई देते हुए शिक्षा के अधिकार कानून में छूट देने की मांग तक कर डाली है। इस समिति ने इस कानून को धता बताते हुए छटवीं कक्षा में नामांकन के लिए प्रतियोगी परीक्षा आहूत की थी। इस मामले में इस कानून का पालन सुनिश्चित करने वाली राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग संस्था ने इसे नोटिस भी जारी किया था। इस मामले में आगे नतीजा ढाक के तीन पात ही आने वाला है।
आरटीई की धारा 13 (1) में साफ किया गया है कि काई भी शाला या उसका प्रबंधन किसी भी विद्यार्थी से प्रवेश के दौरान या बाद में केपीटेशन फीस या प्रतियोगिता फीस की वसूली नहीं कर सकता है। बावजूद इसके देश भर में सुदूर अंचलों यहां तक कि जिला मुख्यालयों में संचालित होने वाली शालाएं न केवल केपीटेशन फीस ही वसूल कर रही हैं वरन् शिक्षा माफिया तो किसी दुकान विशेष से गणवेश, जूते, किताबें खरीदने के लिए बच्चों को बाध्य करने नहीं चूक रहे हैं। अनेक शालाओं में तो बाकायदा सूचना पटल पर केपीटेशन फीस के विवरण के साथ ही साथ यह भी चस्पा होता है कि किताबें किस दुकान से और गणवेश किस दुकान से खरीदना है। इतना ही नहीं सीबीएसई पाठ्यक्रम वाली शालाओं में एनसीईआरटी के बजाए निजी प्रकाशकों की किताबों को तवज्जो दी जाती है। मतलब साफ है कि एनसीईआरटी की किताबें बेहद सस्ती होती हैं, वहीं निजी प्रकाशक मंहगी किताबों को प्रचलन में लाकर शाला प्रबंधन को मोटा कमीशन जो थमा देते हैं।
शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद भी आज देश में न जाने कितने लाख बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं। मंहगाई के इस दौर मंे पालकों पर फीस, यूनीफार्म, किताबों के बोझ के अलावा फिर केपीटेशन फीस का बोझ डाला जा रहा है। अमीरजादों के लिए यह सब करना आसान है, पर मरण तो गरीब गुरबों की ही है, जिनको ध्यान में रखकर इस कानून की नींव डाली गई थी। हमारा कहना महज इतना ही है कि सवा सौ साल राज कर लिया कांग्रेस ने, भारत गणराज्य के लोगों को जितना नारकीय जीवन भोगने पर मजबूर करना था कर लिया अब तो कम से कम इक्कसीवीं सदी में भारतीयों को आजाद कर दिया जाए। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि इस परोक्ष गुलामी से बेहतर तो ब्रितानियों की गुलामी थी। कम से कम कर देने पर सुविधाएं तो मिल जाती थीं। शिक्षा का अधिकार कानून अस्तित्व में है पर किस काम का जब गरीब का बच्चा शिक्षा ही प्राप्त न कर सके। तो बेहतर होगा सोनिया गांधी जी आप भी जमीनी हकीकत से रूबरू हों और भारत गणराज्य की सवा करोड जनता को सपने न दिखाएं। कम से कम वे सपने जिन्हें देखने के बाद जब वे टूटें तो आम आदमी में जीने की ललक ही समाप्त हो जाए।
बहरहाल सरकार को चाहिए कि इस अनिवार्य शिक्षा कानून में संशोधन करे। इसमें भारतीय रेल, दिल्ली परिवहन निगम और महाराष्ट्र राज्य सडक परिवहन की तर्ज पर पैसेंजर फाल्ट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। जिस तरह इनमें सफर करने पर टिकिट लेने की जवाबदारी यात्री की ही होती है। चेकिंग के दौरान अगर टिकिट नहीं पाया गया तो यात्री पर भारी जुर्माना किया जाता है। उसी तर्ज पर हर बच्चे के अभिभावक की यह जवाबदारी सुनिश्चत की जाए कि उसका बच्चा स्कूल जाए यह उसकी जवाबदारी है। निरीक्षण के दौरान अगर पाया गया कि कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है तो उसके अभिभावक पर भारी पेनाल्टी लगाई जानी चाहिए।
सरकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान, स्कूल चलें हम, मध्यान भोजन आदि योजनाओं पर अरबों खरबों रूपए व्यय किए जा चुके हैं, पर नतीजा सिफर ही है। निजाम अगर वाकई चाहते हैं कि उनकी रियाया पढी लिखी और समझदार हो तो इसके लिए उन्हें वातानुकूलित कमरों से अपने आप को निकालकर गांव की धूल में सनना होगा तभी अतुल्य भारत की असली तस्वीर से वे रूबरू हो सकेंगे। इसके लिए सरकार को कडे और अप्रिय फैसले लेने से भी नहीं हिचकना चाहिए। भव्य अट्टालिकाओं वाले निजी स्कूल में यह अवश्यक कर दिया जाए कि वे अपनी कुल क्षमता का पच्चीस फीसदी हिस्सा अनिवार्य तौर पर गरीब गुरबों के लिए न केवल सुरक्षित रखे वरन ढूंढ ढूंढ कर उन स्थानों को भरने के बाद अपने सूचना पटल पर अलग से इन लोगों की सूची भी चस्पा करे। अप्रिय और कडे कहने का तातपर्य यह है कि अधिकांश बडे स्कूल किसी ने किसी राजनेता के ही हैं या उनमें इनकी भागीदारी है। एसा करने से एक ओर जहां देश की आने वाली पीढी शिक्षित हो सकेगी वहीं दूसरी ओर जनसेवा का ढोंग करने वाले राजनेताओं के चेहरों से नकाब भी उतर सकेगा।
पितर पक्ष में पीसीसी कार्यकारिणी टली पर घोषित हुए जिला अध्यक्ष
टीकमगढ़छतरपुर और छिंदवाड़ा डीसीसी का फैसला लंबित
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान भले ही पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को सौंप दी गई हो, पर अभी भी टीम भूरिया के मामले में नेता एकमत नहीं हो पा रहे हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय परिदृश्य मे छाने वाले मध्य प्रदेश के क्षत्रप सत्यव्रत चतुर्वेदी और कमल नाथ के क्षेत्र में ही जिलों की कांग्रेस ने अपना मुखिया अब तक नहीं पाया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा घोषित किए गए जिलाध्यक्षों में एक बार फिर से कमल नाथ की कर्म भूमि छिंदवाड़ा और सत्यव्रत चतुर्वेदी के कार्यक्षेत्र छतरपुर और टीकमगढ़ का विवाद नहीं सुलझ सका है।
अब तक घोषित चालीस नामों में कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह का पड़ला काफी हद तक भारी दिख रहा है। महाराजा ज्योतिरादित्य ने भी अपनी लाज बचाई तो महाकौशल के क्षत्रप कमल नाथ ने बालाघाट और जबलपुर में अपने समर्थकों को जिलाध्यक्ष बनवा दिया। सुरेश पचौरी इस मामले में कमजोर साबित हो रहे हैं।
राजनैतिक वीथिकाओं में यह प्रश्न जमकर घुमड़ रहा है कि जब कमल नाथ ने अपने समर्थकों को बालाघाट और जबलपुर में कुर्सी पर काबिज करवा दिया तब छिंदवाड़ा जिले के मामले को लंबित क्यों रखा जा रहा है। गौरतलब है कि दो माह पूर्व पीसीसी चीफ कांतिलाल भूरिया ने इस संवाददाता से चर्चा के दौरान कहा था कि उस वक्त कमल नाथ विदेश यात्रा पर हैं, उनके आते ही उनकी इच्छानुसार छिंदवाड़ा में जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर दी जाएगी। विडम्बना है कि इस बात के दो माह और चालीस जिलों की घोषणा के बाद भी छिंदवाडा, टीकमगढ़ और छतरपुर का विवाद सुलट नहीं सका है।
नई दिल्ली। रेल्वे बोर्ड का एक जांच दल जल्द ही मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर जाकर रेल्वे स्टेशन के रेल्वे ट्रेक की जांच करेगा। जांच के उपरांत यह अपना प्रतिवेदन बोर्ड को सौंपेगा इसके उपरांत ही जबलपुर रेल्वे स्टेशन में प्रवेश करने वाली रेलगाडियों की स्पीड प्लेटफार्म तक पहुंचने के दौरान पंद्रह से बढ़ाकर तीस किलोमीटर की जा सकेगी।
रेल भवन के सूत्रों का कहना है कि जबलपुर रेल मण्डल से एक तकनीकि प्रस्ताव रेल्वे सुरक्षा आयुक्त को प्राप्त हुआ है। इस प्रस्ताव में मेन लाईन से रेल्वे प्लेटफार्म तक जाने वाले ट्रेक जिसे लूप लाईन कहा जाता है की स्पीड को दुगना करने की बात कही गई है। जबलपुर रेल मण्डल के तकनीकि अधिकारियों ने टेक्नीकल तौर पर रेल पांतों की हर दृष्टिकोण से जांच कर प्रस्ताव को दिल्ली भेजा है।
नई दिल्ली। आरटीआई एक्टविस्ट शहला मसूद के मामले में सीबीआई जांच के आदेश आनन फानन इसलिए निकल पाए क्योंकि इस जांच में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी ने खासी दिलचस्पी दिखाई थी। पीएमओ में राज्य मंत्री व्ही.नारायणसामी वैसे भी सुरेश पचौरी के खासुलखास बताए जाते हैं।
पीएमओ में चल रही चर्चा के अनुसार जैसे ही यह मामला उछला वैसे ही सुरेश पचौरी ने अपने परिचित नारायणसामी से मिलकर तत्काल ही सीबीआई जांच के आदेश जारी करवा दिए। बतौर सांसद सुरेश पचौरी को कोहेफिजा में ही एक सरकारी आवास आवंटित है जिसमें वे लगभग छब्बीस बरस से निवास कर रहे हैं। बताया जाता है कि कोहेफिजा इलाके से पचौरी को खासा लगाव है।
जांच में भले ही सीबीआई को बोरा भर सबूत मिल गए हों, जिन पर वह काम कर रही हो, किन्तु भोपाल की जनता की ओर से सीबीआई के पास कुछ भी जानकारी नहीं पहुंच सकी है। सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि सीबीआई द्वारा पिछले दिनों दिए गए दो मोबाईल नंबर्स और फेसबुक पर बने एकाउंट में कोई भी जानकारी नहीं डाली गई है।
भारत गणराज्य को गोरे ब्रितानियों की गुलामी से आजाद हुए छः दशक बीत चुके हैं। इन छः दशकों में भारत गणराज्य ने उत्तरोत्तर प्रगति की है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक मामले में आज भी देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस का सर शर्म से झुक जाना चाहिए पर एसा हो नहीं रहा है। यह मामला है मनुष्य की ही विष्ठा को दूसरे मनुष्य द्वारा सर पर उठाकर ले जाने का मसला। यह मामला समझ से परे है कि मैला उठाने की परंपरा आखिर कब समाप्त होगी। मध्य प्रदेश में आज भी जारी है सामंती प्रथा। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि देश का हृदय प्रदेश आज भी दासता में ही सांसे ले रहा है। वैसे दलित अत्याचार के मामले में उत्तर प्रदेश का कोई सानी नहीं है। पिछले दिनों इलेट्रानिक मीडिया में अत्याचार, चोरी, डकैती अराजकता की खबरें छाई रहती थीं किन्तु जब से समाचार चेनल्स पर यूपी केविज्जुअल एड्स दिखने लगे हैं तबसे समाचार चेनल्स पर उत्तर प्रदेश की सकारात्मक खबरें ही दिखने लगी हैं। कांग्रेस शासित राजस्थान के टोंक जिले में महज एक रोटी और दस रूपए माहवार के एवज में परिवार के सदस्य सर पर मैला ढोने को मजबूर हैं। यह आलम है नेहरू गांधी के नाम पर सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस के राज की भयावह तस्वीर।
भारत देश को आजाद हुए छः दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, भारत में गणतंत्र की स्थापना भी साठ पूरे कर चुकी है, बावजूद इसके आज भी देश के हृदय प्रदेश में मध्ययुगीन सामंती प्रथा की जंजरों की खनक सुनाई पड रही है। कहने को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा देश भर में सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के लिए ढेर सारे जतन किए हों, पर कागजी बातों और वास्तविकता में जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड रहा है। पिछले साल मानवाधिकार आयोग के सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश में सर पर मैला ढोने वाले लोगों की तादाद लगभग सात हजार दर्शाया जाना ही अपने आप में सबसे बडा प्रमाण माना जा सकता है। उधर देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में दलितों की हालत बद से बदतर ही है।
मध्य प्रदेश के अलावा देश के और भी सूबे एसे होंगे जहां सर पर मानव मल ढोने वालों की खासी तादाद होगी। मध्य प्रदेश में ही होशंगाबाद, सीहोर, हरदा, शाजापुर, नीमच, मंदसौर, भिण्ड, टीकमगढ, राजगढ, उज्जैन, पन्ना, छतरपुर, नौगांव, निवाडी आदि शहरों और एक दर्जन से भी अधिक जिलों में इस तरह की अमानवीय प्रथा को प्रश्रय दिया जा रहा है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस भले ही दलितों के उत्थान के लिए गगनभेदी नारे लगती रही हो पर सच्चाई यह है कि आज भी इसी कांग्रेस की नीतियों के चलते बडी संख्या में दलित समुदाय के लोग इस तरह की प्रथा के जरिए अपनी आजीविका कमाने पर मजबूर हैं। विडम्बना यह है कि आज भी हिन्दु धर्म में बाल्मिकी समाज तो मुस्लिमों में हैला समाज के लोग देश में सर पर मैला ढोने का काम कर रहे हैं।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज भी परंपरागत तरीके से सिर पर मैला ढोने का काम, शौचालयों की साफ सफाई, मरे पालतू या शहरों में पाए जाने वाले जानवरों को आबादी से दूर करने, नाले नालियों की सफाई, शुष्क शौचालयों के टेंक की सफाई, चिकित्सालय में साफ सफाई, मलमूत्र साफ करने के काम आदि को करने वाले दलित सुमदाय के लोगों का जीवन स्तर और सामाजिक स्थितियां अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही दयनीय है। सरकारों द्वारा इन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल अवश्य ही किया जाता हो, पर इन्हें मुख्य धारा में शामिल होने नहीं दिया जाता है। सरकारों द्वारा दलित उत्थान के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ इस वर्ग के दलित लोगों को ही मिल पाता है, इस बात में कोई संदेह नहीं है।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने अपनी दूसरी पंचवर्षीय योजना मेें सर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने की गरज से राज्यों और नगरीय निकाय संस्थाओं को शुष्क शौचालय बनाने के लिए नागरिकों को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय प्रावधान भी किए थे। आश्चर्य तो तब होता है जब इतिहास पर नजर डाली जाती है। 1971 में भारत सरकार ने दस साल की आलोच्य अवधि में सर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने हेतु चरणबद्ध तरीके से अभियान चलाया था। दस साल तो क्या आज चालीस साल बीतने को हैं, पर यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है।
इसके बाद 1993 में सरकार की तंद्रा टूटी थी, तब सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय संनिर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया गया था, जिसके तहत प्रावधान किया गया था कि जो भी व्यक्ति यह काम करवाएगा उसे एक वर्ष के कारावास और दो हजार रूपए अर्थदण्ड की सजा का भोगमान भुगतना पड सकता है। कानून के जानकार बताते हैं कि देश में कुछ इस तरह के कानून और भी अस्तित्व में हैं, जो सर पर मैला ढोने की प्रथा पर पाबंदी लगाते हैं। रोना तो इसी बात का है कि सब कुछ करने के बाद भी चूंकि जनसेवकों की नीयत साफ नहीं थी इसलिए इसे रोका नहीं जा सका।
सरकार द्वारा इस काम में संलिप्त लोगों के बच्चों को अच्छा सामाजिक वातावरण देने, साक्षर और शिक्षित बनाने के प्रयास भी किए हैं। सरकार ने इसके लिए बच्चों को विशेष छात्रवृति तक देने की योजना चलाई है। इसके तहत बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी गई। मजे की बात यह है कि जिन परिवारों ने इस काम को छोडा और कागजों पर जहां जहां सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त होना दर्शा दी गई वहां इन बच्चों की छात्रवृत्ति भी बंद कर दी गई है।
देश के पिता की उपाधि से अंलकृत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को भुनाने में कांग्रेस द्वारा अब तक कोई कोर कसर नही रख छोडी है। बापू इस अमानवीय प्रथा के घोर विरोधी थे। बापू द्वारा उस समय के अपने शौचालय को स्वयं ही साफ किया जाता था। सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी के नाम को तो खूब कैश कराया है कांग्रेस ने पर जब उनके आचार विचार को अंगीकार करने की बात आती है तब कांग्रेस की मोटी खाल वाले खद्दरधारी नेताओं द्वारा मौन साध लिया जाता है।
दलित परिवारों को प्रश्रय देने में उत्तर प्रदेश काफी हद तक पिछडा माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में 2006 में एससी एसटी के 1759, 2007 में 2410, तो 2008 में 2390 मामले दर्ज किए गए। आईपीसी के मामलों ने तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए। 2206 में 2238, 2007 में 3064 तो 2008 में इनकी संख्या बढकर 3543 हो गई थी। दलित महिलाओं की आबरू बचाने के मामले में 2006 से 2008 तक 255, 339 एवं 333 मामले प्रकाश में आए। ये तो वे आंकडे हैं जिनकी सूचना पुलिस में दर्ज है। गांव के बलशाली लोगों के सामने घुटने टेकने वाले वे मामले जो थाने की चारदीवारी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, उनकी संख्या अगर इससे कई गुना अधिक हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
खबरें तो यहां तक आ रहीं हैं कि दलित बच्चों के साथ शालाओं में भी भेदभाव किया जाता है। अनेक स्थानों पर संचालित शालाओं में दलित बच्चों को मध्यान भोजन के वक्त उनके घरों से लाए बर्तनों में ही खाना परोसा जाता है। इतना ही नहीं शिक्षकों द्वारा इन बच्चों को दूसरे बच्चों से अलग दूर बिठाया जाता है। देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी दासता का सूरज डूबा नहीं है। आलम कुछ इस तरह का है कि दलित लोगों के साथ अन्याय जारी है। गांव के दबंग लोग इनसे बेगार करवाने में भी नहीं चूक रहे हैं। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आजादी के बासठ सालों बाद भी गांवों में बसने वाला भारत स्वतंत्रता के बजाए मध्य युगीन दासता में ही उखडी उखडी सांसे लेने पर मजबूर है।
पिछले साल सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्रीमती सुब्बूलक्ष्मी जगदीसन ने हाल ही में लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उŸार में बताया था कि मैला उठाने की परम्परा को जड़ मूल से समाप्त करने के लिए रणनीति बनाई गई है । उन्होंने बताया कि मैला उठाने वाले व्यक्तियों के पुनर्वास और स्वरोजगार की नई योजना को जनवरी, 2007 में शुरू किया गया था । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस योजना के तहत उस वक्त देश के 1 लाख 23 हजार मैला उठाने वालों और उनके आश्रितों का पुनर्वास किया जाना था। कितने आश्चर्य की बात है कि मनुष्य के मल को मनुष्य द्वारा ही उठाए जाने की परंपरा इक्कीसवीं सदी में भी बदस्तूर जारी है। देश प्रदेश की राजधानियों, महानगरों या बड़े शहरों में रहने वाले लोगों को भले ही इस समस्या से दो चार न होना पड़ता हो पर ग्रामीण अंचलों की हालत आज भी भयावह ही बनी हुई है।
कहने को तो केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा शुष्क शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता रहा है, वस्तुतः यह प्रोत्साहन किन अधिकारियों या गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की जेब में जाता है, यह किसी से छुपा नहीं है। करोड़ों अरबों रूपए खर्च करके सरकारों द्वारा लोगों को शुष्क शौचालयो के प्रति जागरूक किया जाता रहा है, पर दशक दर दशक बीतने के बाद भी नतीजा वह नहीं आया जिसकी अपेक्षा थी। सरकारो को देश के युवाओं के पायोनियर रहे महात्मा गांधी से सबक लेना चाहिए। उस समय बापू द्वारा अपना शौचालय स्वयं ही साफ किया जाता था। आज केंद्रीय मंत्री जगदीसन की सदन में यह स्वीकारोक्ति कि देश के एक लाख 23 हजार मैला उठाने वालों का पुर्नवास किया जाना बाकी है, अपने आप में एक कड़वी हकीकत बयां करने को काफी है।
सरकार खुद मान रही है कि आज भी देश में मैला उठाने की प्रथा बदस्तूर जारी है। यह स्वीकारोक्ति निश्चित रूप से सरकार के लिए कलंक से कम नहीं है। यह कड़वी सच्चाई है कि कस्बों, मजरों टोलों में आज भी एक वर्ग विशेष द्वारा आजीविका चलाने के लिए इस कार्य को रोजगार के रूप में अपनाया जा रहा है। सरकारों द्वारा अब तक व्यय की गई धनराशि में तो समूचे देश में शुष्क शौचालय स्थापित हो चुकने थे। वस्तुतः एसा हुआ नहीं। यही कारण है कि देश प्रदेश के अनेक शहरों में खुले में शौच जाने से रोकने की प्रेरणा लिए होर्डिंग्स और विज्ञापनों की भरमार है। अगर देश में हर जगह शुष्क शौचालय मौजूद हैं तो फिर इन विज्ञापनों की प्रसंगिकता पर सवालिया निशान क्यों नहीं लगाए जा रहे हैं? क्यों सरकारी धन का अपव्यय इन विज्ञापनों के माध्यम से किया जा रहा है?
उत्तर बिल्कुल आईने के मानिंद साफ है, देश के अनेक स्थान आज भी शुष्क शौचालय विहीन चिन्हित हैं। क्या यह आदी सदी से अधिक तक देश प्रदेशों पर राज करने वाली कांग्रेस की सबसे बड़ी असफलता नहीं है? सत्ता के मद में चूर राजनेताओं ने कभी इस गंभीर समस्या की ओर नज़रें इनायत करना उचित नहीं समझा है। यही कारण है कि आज भी यह समस्या कमोबेश खड़ी ही है।श्विडम्बना ही कही जाएगी कि एक ओर हम आईटी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का दावा कर चंद्रयान का सफल प्रक्षेपण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शौच के मामले में आज भी बाबा आदम के जमाने की व्यवस्थाओं को ही अंगीगार किए हुए हैं। इक्कीसवीं सदी के इस युग में आज जरूरत है कि सरकार जागे और देश को इस गंभीर समस्या से निजात दिलाने की दिशा में प्रयास करे।
इस साल जनवरी में केंद्रीय समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ने इस बारे में पहल की थी। उस वक्त मुकुल वासनिक का मानना था कि मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति के लिए 1993 में बने कानून का पालन ठीक ढंग से नहीं किया जा पा रहा है। जनवरी में ही वासनिक को एक संगठन द्वारा इसी पर आधारित एक प्रतिवेदन भी सौंपा था जिसमें 14 राज्यों में कहां कहां, किन किन मोहल्लों और जिलों में सफाई कर्मी इस अमानवीय काम को अंजाम दे रहे हैं। इसमें इन कर्मियों का ब्योरा सचित्र उपलब्ध करवाया गया था। कितने आश्चर्य की बात है कि देश के शासन का रिमोट अपने हाथों में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा पिछले साल दिसंबर में इस संबंध में प्रधानमंत्री को बाकायदा पत्र भी लिखा था। विडम्बना यह है कि वजीरे आजम ने सोनिया की इस गुहार पर कोई ध्यान देना भी मुनासिब नहीं समझा है।
सबसे अधिक दुख तो तब होता है जब पता चलता है कि राजस्थान के टोंक जिले में महज एक रोटी रोज और दस रूपए महीने के एवज में परिवार के सदस्य सर पर मैला ढोने का अमानवीय काम कर रहे हैं। पिछले दिनों टोंक के हीरा चौक से दिल्ली आई रामवती ने अपनी आपबीती कहते हुए कहा था कि वैकल्पिक रोजगार के अभाव में उसके साथ गांव के अनेक लोग आज भी सर पर मैला ढोने का अपना पारंपरिक काम करने पर मजबूर हैं। इस गांव में आज भी एक रोटी रोज और दस रूपए महीने की मजदूरी पर लोग सर पर मैला ढोने को मजबूर हैं।