गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

एनआरएचएम घोटाले में दूसरा आरोप पत्र


एनआरएचएम घोटाले में दूसरा आरोप पत्र

(जाहिद कुरैशी)

नई दिल्ली (साई)। सीबीआई ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में करोड़ों रूपये के घोटाले के सिलसिले में कल चार लोगों के खिलाफ दूसरा आरोप पत्र दाखिल किया। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि राज्य के तत्कालीन स्वास्थ्य महानिदेशक डॉक्टर राम विभिन्न जिलों में एक सौ चौतीस प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद से सम्बन्धित निविदा नियमों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार थे।
सीबीआई ने जेल में बंद कानपुर के दो वरिष्ठ अधिकारियों अभय कुमार वाजपेयी और संजीव कुमार तथा मुरादाबाद के दवाओं के आपूर्तिकर्ता सौरव जैन को दूसरे आरोप पत्र में शामिल किया है।

शुक्रवार को भी मौसम का मिजाज रहेगा खराब


शुक्रवार को भी मौसम का मिजाज रहेगा खराब

(यशवंत श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। देश में गरमी के मौसम में बिगड़ा मौसम का मिजाज शुक्रवार को भी ठीक होने की उम्मीद नहीं दिख रही है। कल सवेरे तक के मौसम के बारे में अनुमान है कि बिहार, झारखंड, उत्तरी छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वाेत्तर राज्यों में एक दो स्थानों पर आंधी चलने की संभावना है।
असम और मेघालय में एक या दो स्थानों पर भारी वर्षा हो सकती है। राजस्थान के कुछ भागों और गुजरात, उत्तरी-मध्य प्रदेश तथा दक्षिण - पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूरदराज के इलाकों में गर्मी पड़ रही है। देश के अन्य भागों में मौसम आमतौर पर खुष्क रहेगा।
मध्य प्रदेश से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो नंद किशोर ने खबर दी है समूचे मध्य प्रदेश में गर्मी का दौर शुरू हो गया है। तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ पिछले २४ घंटों के दौरान सर्वाधिक तापमान प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो में ४३ डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। राजधानी भोपाल में अधिकतम तापमान ४० दशमवल सात डिग्री सेल्सियस और इंदौर का ३९ दशमलव पांच डिग्री सेल्सियस रहा। कल जबलपुर, सागर, ग्वालियर संभागों और कुछ क्षेत्रों में बारिश हुई। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अगले ४८ घंटों में रीवा और सागर संभागों में हल्की बारिश होने की संभावना है।

सरकार झुकी 27 को करेगी रिहा


सरकार झुकी 27 को करेगी रिहा

(प्रीति अग्रवाल)

भुवनेश्वर (साई)। ओड़िशा सरकार ने कहा है कि वह माओवादियों के कब्जे से बीजू जनता दल विधायक झिना हिकाका और इटली के एक नागरिक की सुरक्षित रिहाई के लिए आठ नक्सलियों सहित २७ लोगों को जेल से रिहा कर देगी। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि उनकी सरकार ने झिना हिकाका को मुक्त कराने के लिए यह निर्णय लिया है।
हमारी सरकार ने चासी मुलया आदिवासी संघ के १५ सदस्यों को और आठ वामपंथी उग्रवादियों को रिहा करने का फैसला किया है। ये सब भी इस समय मलकानगिरी जिले की कोरापुट जेल में बंद हैं।
पटनायक ने कहा कि इटली के पाओलो बासुस्को को मुक्त कराने के लिए सीपीआई माओवादियों की राज्य संगठन समिति की मांग के अनुरूप चार अन्य लोगों को छोड़ने की कार्रवाई भी की जाएगी। अपहृत विधायक और इटली के नागरिक के बदले रिहा किये जाने वाले माओवादियों की सूची आज जारी की जा सकती है। राज्य सरकार की इस पेशकश के बारे में अभी माओवादियों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। यह निर्णय बीजू जनता दल विधायक झिना हिकाका को मुक्त कराने के बदले माओवादियों की रिहाई की मांग पर विचार की समय सीमा समाप्त होने से एक दिन पहले लिया गया।

सेना, सरकार, सूत्रधार और पत्रकार


सेना, सरकार, सूत्रधार और पत्रकार

(संजय तिवारी

इसे आप द ग्रेट इंडियन तमाशा भी कह सकते हैं. इस तमाशे का खामियाजा कितना बड़ा हो सकता है इसका अंदाज भले ही किसी को न हो लेकिन सेना, सरकार, सूत्रधार और पत्रकार की चौकड़ी जो खेल कर रही है उससे आपका लोकतंत्र कत्तई सुरक्षित नहीं है. सेना प्रमुख की उम्र विवाद से शुरू हुआ एक सामान्य विवाद पहले सेना और सरकार के बीच की लड़ाई बना दी गई और अब इसे सूत्रधारों और पत्रकारों ने बाकायदा जंग में तब्दील कर दिया है.
सेना प्रमुख और सरकार के बीच जो उम्र विवाद का मसला पैदा हुआ था उसके मूल में कुछ ऐसे सूत्रधार थे जो रक्षा सौदों में दलाली करते हैं. रक्षामंत्री एके एंटनी ईमानदार होते हुए भी हुक्म के गुलाम है. उनकी आका प्रधानमंत्री निवास में भले ही न बैठी हों लेकिन बड़े पैमाने पर होनेवाली रक्षा खरीद में आका के कमीशन की चिंता करना ही असल में रक्षा मंत्री एके एंटनी का असली काम है. आप नहीं जानते तो जान लीजिए, रक्षा सौदों में होनेवाली खरीद में दस जनपथ का आठ से दस प्रतिशत कमीशन पक्का होता है. यह किसी पार्टी फंड का कमीशन नहीं होता बल्कि सीधे सीधे सोनिया गांधी के रिश्तेदारों के खाते में यह रकम ट्रांसफर की जाती है. इसलिए अपने निजी जीवन में चार जोड़ी कपड़े में जीवन व्यतीत करनेवाले रक्षा मंत्री एके एंटनी एक चोर राजा के ईमानदार मंत्री से ज्यादा की हैसियत नहीं रखते हैं.
इसलिए, सेना प्रमुख का उम्र विवाद कहीं न कहीं बड़ी रक्षा खरीदारियों से जुड़ा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी उम्र वही मान ली गई जो सरकार ने सुझाया था, इसलिए अब उन्हें 31 मई को रिटायर हो जाना पड़ेगा. सरकार पहले ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे विक्रम सिंह को सेनाध्यक्ष बनाने की घोषणा कर चुकी है और पूरे विवाद के बीच दो महत्वपूर्ण वाकया हुआ है. एक, वित्त मंत्री ने रक्षा बजट में 17 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी है और दो, प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई सेनाध्यक्ष की चिट्ठी के जवाब में सरकार ने अफसोस जाहिर करने की बजाय खुशी की दीवाली मनाई है और कहा है कि वह आधुनिकीकरण के लिए बड़े पैमाने पर खरीदारी करेगी. अब आपको भी समझ में आ ही जाना चाहिए कि सरकार वर्तमान सेनाध्यक्ष को एक और साल इस पद पर बर्दाश्त नहीं कर सकती थी इसलिेए उम्र विवाद की आड़ में उन्हें जल्दी से जल्दी मुक्ति माना चाहती थी. यह तो जनरल थे, जिन्होंने जंग शुरू कर दी वरना देश की नौकरशाही का जो आलम है उसके आगे अच्छे से अच्छा जनरल भी पानी भरने लगता है.
लेकिन उम्र विवाद खत्म होने से मामला खत्म नहीं हुआ. जनरल ने जब जंग की शुरूआत एक इंटरव्यू से की तो सरकार की ओर से पीएमओ की चिट्ठी लीक कर दी गई जो सीधे सीधे जनरल सिंह को कटघरे में खड़ा करती है. जवाब में जनरल कुछ कहते कि चार अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छाप दी कि 16 जनवरी को सेना की दो टुकड़िया हिसार और आगरा से दिल्ली की ओर कूच कर चुकी थीं. यह वही दिन था जिस दिन सेना प्रमुख की याचिका सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में आ रही थी. सेना और सरकार के बीच जारी जंग में यह खोजी पत्रकारिता का अहम योगदान है जिससे हमें यह पता चल रहा है कि सेना तख्तापलट करने के लिए दिल्ली आ रही थी.
लोकतंत्र के चौथे खंभे की खोजी पत्रकारिता के कारण सेना और सरकार के बीच जारी जंग सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है. अपने देश के मीडिया में मानों यह नियत होता जा रहा है कि जहां हमारी पत्रकार बिरादरी का टिड्डी दल खोजी पत्रकारिता करने लगता है वहां बंटाधार होने से भगवान भी नहीं बचा सकते. सेना और सरकार के बीच भी यही हो रहा है. खोजी पत्रकारिता के नाम पर बहुत सी ऐसी संवेदनशील सूचनाएं सार्वजनिक की जा रही हैं जो न सिर्फ सेना के मन में गुस्सा भरेंगी बल्कि लोकतंत्र का दामन भी दागदार कर रही हैं.
लेकिन सेना, सरकार और पत्रकार के बीच एक तीसरे एलीमेन्ट को अगर हम नजरअंदाज कर दें तो पिक्चर कभी साफ दिखाई नहीं देगी. वह तीसरा एलीमेन्ट है- सूत्रधार. वह तत्व जो सारा केमिकल लोचा कर रहा है. इसे दिल्ली की भाषा में दलाल कहा जाता है. यही वह दलाल समुदाय है जो रक्षा सौदों का सबसे बड़ा सूत्रधार होता है और फायदा कमाता है. अपने मुनाफे के लिए आज वह किसी जनरल की जान ले सकता है तो कल जरूरी हुआ तो सरकार भी गिराने में उसे संकोच नहीं होगा. इन सूत्रधारों के लिए सबसे बड़ा हथियार होता है मीडिया. क्योंकि इन सूत्रधारों के पास सब तरह की सूचनाएं होती हैं इसलिए वे उन सूचनाओं में से अपने फायदे की जरूरी सूचनाएं मीडिया के खोजी पत्रकारों तक पहुंचाते हैं जैसे चाहते हैं वैसे डेमोक्रेसी को डांस करवा देते हैं.
ताजा मामले में भी मीडिया का इस्तेमाल करके यही सूत्रधार सारा नाटक रच रहे हैं. अगर इंडियन एक्सप्रेस ने यह दावा किया कि सेना दिल्ली की ओर कूच कर रही थी तो अब संडे गार्जियन ने खुलासा कर दिया है कि यह खबर एक सूत्रधार ने ही छपवाई थी ताकि जनरल को राजनीतिक वर्ग में मिल रही सद्भावना नफरत में बदल जाए. जिसका मतलब है कि सूत्रधार अपनी सुविधा के अनुसार पत्रकार का इस्तेमाल कर रहा है. मीडिया दावा कर सकता है कि उसकी खोजी पत्रकारिता के बदौलत रक्षा सौदों में होनेवाली गड़बड़िया का अंदाज आम आदमी को लग रहा है लेकिन क्या वही पत्रकार उस सूत्रधार के असली कर्म के बारे में ईमानदारी से हमें बताता है जिसकी दी गई खबरों पर खेल रहा होता है? कभी नहीं, क्योंकि यह उसका धंधा है. सेना और सरकार के बीच जारी जंग के बीच अगर मीडिया हमें यह बताता कि सारा मामला दलालों के नफे नुकसान का है तो हम निश्चित तौर पर आभारी रहते. लेकिन ऐसा है नहीं.
जो भी हो, सेना, सरकार, पत्रकार और सूत्रधारों की यह चौकड़ी जिस तरह के विवाद में जिस तरह से उलझी हुई है उससे किसी और का कोई नुकसान हो न हो लोकतंत्र का बेड़ा गर्क जरूर हो जाएगा.
(लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक हैं)

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

कमल नाथ, सत्यव्रत के आगे बौने हुए भूरिया


कमल नाथ, सत्यव्रत के आगे बौने हुए भूरिया

साल भर में नहीं हुई छिंदवाड़ा, छतरपुर अध्यक्षों की घोषणा


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। भले ही कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के भरोसे देश के हृदय प्रदेश में दस सालों के बाद राज वापस लाने के दिवा स्वप्न देख रहा हो किन्तु जमीनी हकीकत इससे उलट ही है। कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के रबर स्टेंप का ठप्पा लगे भूरिया का साहस इतना भी नहीं है कि वे केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र वाले छिंदवाड़ा और राज्य सभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के प्रभाव वाले टीकम गढ़ और छतरपुर के अध्यक्षों के नामों की घोषणा एक वर्ष के बाद भी कर सकें।
गौरतलब है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री कांति लाल भूरिया को पिछले साल 6 अप्रेल को सुरेश पचौरी के स्थान पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। भूरिया ने अपना कार्यभार 15 अप्रेल को भोपाल में ग्रहण किया था। इसके बाद से भूरिया ने मध्य प्रदेश का सघन दौरा एक साल बीतने के बाद भी नहीं किया है। जिससे प्रदेश में व्याप्त जबर्दस्त गुटबाजी से जोड़कर देखा जा रहा है।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के नेशनल हेडक्वार्टर में चल रही चर्चाओं के अनुसार कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में दस सालों से अधिक समय से जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर गंगा प्रसाद तिवारी काबिज हैं। कहा जाता है कि कमल नाथ के लिए तिवारी भस्मासुर बन चुके हैं। कहा जा रहा है कि अगर कमल नाथ ने गंगा तिवारी को पदच्युत किया तो संगठन में उन्हें जिला स्तर पर काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा।
यही कारण है कि मजबूरी में कमल नाथ द्वारा गंगा प्रसाद तिवारी को तीसरी बार अध्यक्ष बनाने दबाव बनाया जा रहा है। उधर, पार्टी की गाईड लाईन स्पष्ट है कि किसी भी कांग्रेस के नेता को तीसरी बार पार्टी जिलाध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता है। कमल नाथ के कद और प्रभाव के आगे बौने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कांति लाल भूरिया साल भर से छिंदवाड़ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष को लेकर असमंजस में ही हैं। यही कारण है कि उनके कार्यभार ग्रहण करने के लिए लगभग एक साल बाद भी छिंदवाड़ा जिला कंाग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की घोषणा लंबित ही है।
कमल नाथ के प्रभाव वाले सिवनी जिले में भी जिला कांग्रेस कमेटी की घोषणा के साथ ही विद्रोह के बिगुल बज गए हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के द्वारा अनुमोदित सूची में जिला कांग्रेस के अधिकृत प्रवक्ता के बतौर ओम प्रकाश तिवारी का नाम था, जबकि जिला कांग्रेस कमेटी ने ओ.पी.तिवारी के अलावा जे.पी.एस.तिवारी और रामदास ठाकुर के नामों की घोषणा कर दी थी। डीसीसी द्वारा अल्पसंख्यकों की उपेक्षा की बात भी फिजां में तैर रही है।
बताया जाता है कि हाल ही में नगर कांग्रेस कमेटी सिवनी के संगठन मंत्री मुकेश सक्सेना और जिला कांग्रेस कमेटी के संगठन मंत्री रंजीत यादव को प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा महामंत्री बना दिया गया है। इसके अलावा राजा बघेल को विशेष आमंत्रित बनाने की खबर भी है। इस बात की खबर जिला कांग्रेस कमेटी को भी नहीं है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि जिला कांग्रेस कमेटी इस मामले में जानबूझकर अनजान बन रही है।
इसके साथ ही साथ हाल ही में मध्य प्रदेश कोटे से राज्य सभा पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी अपने प्रभाव वाले टीकमगढ़ और छतरपुर में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए एडी चोटी एक कर रहे हैं। छतरपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर चतुर्वेदी अपने पुत्र नितिन की ताजपोशी चाह रहे हैं। वहीं संगठन इसके खिलाफ है और वह वर्तमान अध्यक्ष जगदीश शुक्ला की बिदाई नहीं चाह रहा है। कहा जा रहा है कि शुक्ला का लट्टू पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी की बैटरी से चमचमा रहा है।
सत्यव्रत चतुर्वेदी एक बार फिर राज्य सभा से संसदीय सौध में पहुंच गए हैं जिससे उनके कद में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। यही कारण है कि टीकमगढ़ और छतरपुर के सियासी समीकरण भी बदल चुके हैं। माना जा रहा है कि छतरपुर का फैसला सत्यव्रत चुतुर्वेदी के पक्ष में ही होगा। रही बात शुक्ला की तो उन्हें प्रदेश में कहीं एडजस्ट कर मना लिया जा सकता है।
टीकमगढ़ में सत्यव्रत चतुर्वेदी की सियासी चौपड़ में सबसे बड़ा अडंगा बनकर खड़े हैं विधायक यादवेंद्र सिंह। टीकमगढ़ वैसे तो यादवेंद्र सिंह की कर्मस्थली है किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर यादवेंद्र सिंह ने अपनी पहचान नहीं बना सकी है। यही कारण है कि उन्हें मजबूरी में सत्यव्रत चतुर्वेदी के झंडे तले ही काम करने को मजबूर होना पड़ता है, यह बात शायद सिंह को नागवार गुजरती है। यही कारण है कि चतुर्वेदी के सुझाए नाम पर यादवेंद्र सिंह का वीटो आ जाता है।
एआईसीसी हेडक्वार्टर में एमपी कांग्रेस कमेटी के प्रेजीडेंट और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को कमल नाथ और सत्यव्रत चतुर्वेदी के सामने बच्चा ही माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस ने 2013 का विधानसभा चुनाव कांति लाल भूरिया के नेतृत्व में लड़ा तो एमपी में भी कांग्रेस के हालात गुजरात, बिहार और उत्तर प्रदेश की तरह होने में देर नहीं लगने वाली। लगातार दस साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लगातार एमपी कोटे के केंद्रीय मंत्रियों से उपेक्षा का दंश भोगना पड़ रहा है जिससे उनका मनोबल पूरी तरह से टूट ही चुका है।