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शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कांतिलाल भूरिया: दुश्मन शरणम गच्छामि


कांतिलाल भूरिया: दुश्मन शरणम गच्छामि

(रविन्द्र जैन)

भोपाल (साई)। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने पिछले सवा साल में विपक्ष में कम और अपनी पार्टी में ही ज्यादा दुश्मन बना लिये थे। दिल्ली की फटकार के बाद भूरिया दुश्मन शरणम गच्छामी की मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं। वे कभी अपने सबसे बड़े विरोधी केके मिश्रा को सुस्वादिष्ट भोजन पर बुला रहे हैं तो कभी एक और बड़े विरोधी असलम शेर खान को रोजा अफ्तारी के नाम से बुलाकर गले लगा रहे हैं। भूरिया और कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोस रहे गुफराने आजम की औकात भी पार्टी में अचानक बढ़ गई है। भूरिया सूर्ख गुलाब के फूल लेकर उन्हें देखने अस्पताल पहुंचे और मतभेद भुलाने का आग्रह भी कर आए।
सबसे पहले बात करते हैं कांग्रेस के धारदार प्रवक्ता रहे केके मिश्रा की। मिश्रा ने जब भाजपा समर्थित  खनिज माफिया के खिलाफ मोर्चा खोला तो भूरिया की टीम ने उनका मुंह बंद करने की कोशिश की। मिश्रा नहीं माने तो उनका उन्हें भोपाल से हटाकर रीवा, सतना का चार्ज दे दिया गया। धुन के पक्के केके मिश्रा ने खनिज माफिया को छोड़ भूरिया टीम के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। भोपाल से दिल्ली तक शिकायतों के पुलंदे भेजकर आरोप लगाए कि भूरिया टीम भाजपा नेताओं की गोद में बैठी है। तमतमाए भूरिया ने केके मिश्रा को प्रवक्ता पद से हटाते हुए उनके खिलाफ चार सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी। प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री सत्यदेव कटारे के नेतृत्व में इंदौर पहुंची जांच कमेटी के सामने केके मिश्रा ने एक हजार से अधिक पृष्ठों का पुलंदा पटक दिया जिससे सिद्ध होता है कि भूरिया टीम और भाजपा की गहरी सांठगांठ है।
केके मिश्रा के खिलाफ जांच करने गई कांग्रेस की कमेटी पांच माह बाद भी यह तय नहीं कर पा रही कि असली दोषी केके मिश्रा हैं या भूरिया टीम? इस टीम ने आज तक अपनी रिपोर्ट नहीं दी है। इसी बीच केके मिश्रा ने भूरिया विरोधी दस्तावेज दिल्ली के बड़े नेताओं को भेज दिए। पचौरी से लेकर कमलनाथ और सिंधिया से लेकर दिग्विजय सिंह तक ने भूरिया को समझाया कि केके मिश्रा से दुश्मनी महंगी पड़ेगी तब जाकर भूरिया ने पिछले सप्ताह केके मिश्रा को मनाने अपने इकलौते साले अनिल पवार की मदद ली। केके मिश्रा के गहरे मित्र अनिल पवार के आग्रह पर केके मिश्रा उनके घर भोजन करने गये तो भूरिया पहले से वहां मौजूद थे। सवा घंटे की सीधी बातचीत का लब्बोलुहाब यह है कि भूरिया ने केके मिश्रा से मतभेद भूलकर पार्टी हित में काम करने का प्रस्ताव रखा। बताते हैं कि केके मिश्रा ने सिर्फ इतना कहा कि पार्टी के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं लेकिन स्वार्थी नेताओं के हितों के लिए काम नहीं करेंगे।
अब बात मुंहफट पूर्व सांसद गुफराने आजम की कर लेते हैं। कांग्रेस में आरिफ अकील लंबे समय से अजम के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। अकील ने कई बार विधानसभा में आजम से संबंधित सवाल पूछे जिससे आजम स्वयं को आहत महसूस कर रहे हैं। दूसरी ओर मुुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा की मदद से गुफराने आजम मप्र बक्फ बोर्ड के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच गए हैं। मुुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि अगले विधानसभा चुनाव में वे उत्तर भोपाल से आरिफ अकील को हराकर अपनी पार्टी का प्रत्याशी जितायेंगे। चौहान और झा को उम्मीद है कि आरिफ को हराने में गुफरान उनकी मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि प्रभात झा चाहे जब गुफराने आजम के घर आ धमकते हैं और अखबारों में खबर छपती है कि गुफरान भाजपा में जा रहे हैं।
दूसरी ओर भूरिया द्वारा आरिफ अकील को महत्व दिये जाने से गुफरान नाराज हैं। प्रदेश में कांग्रेस की बदहाली के लिए गुफरान सार्वजनिक रूप से भूरिया को कोस रहे हैं। गुफरान के बयानों से अजीज आकर पिछले दिनों कांतिलाल भूरिया गुफरान को पार्टी से निकालने का प्रस्ताव लेकर दिल्ली पहुंच गये। दिल्ली ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए भूरिया को तकीद दी कि चुनाव से एक साल पहले दिग्गज अल्पसंख्यक नेता के खिलाफ कार्रवाई से प्रदेश में गलत संदेश जाएगा। पार्टी हाईकमान ने भूरिया से साफ कहा कि रूठे हुए नेताओं को मनायें अन्यथा संगठन भूरिया के भविष्य के बारे में भी विचार कर सकता है। पूर्व सांसद और अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी असलम शेर खान भी भूरिया से खासे नाराज चल रहे हैं।
(लेखक सबकी खबर डॉट काम के संपादक और प्रदेश टुडे से जुड़े हुए हैं)

सोमवार, 6 अगस्त 2012

संपत्ति सार्वजनिक करने से कतरा रहे आईएएस


संपत्ति सार्वजनिक करने से कतरा रहे आईएएस

(महेंद्र देशमुख)

नई दिल्ली (साई)। देश के असली नीति निर्धारक माने जाते हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के आला अफसरान। और देश में एक सैकड़ा से अधिक ऐसे आईएएस अफसर हैं जिन्हें अपनी संपत्ति के बारे में ब्यौरा देने में या तो डर है या या फिर उन्हें निर्देशों का अमल करने की फिक्र नहीं है। इन अफसरों में सबसे अधिक तादाद देश के हृदय प्रदेश के अधिकारियों की है।
कार्मिक मंत्रालय के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि अभी, ऐसे 127 आईएएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है। कार्रवाई किस स्तर की होगी इस पर अगले हफ्ते निर्णय हो जाएगा। डीओपीटी के अनुसार इसके तहत उनका इंक्रीमेंट और नियुक्ति तक रोकी जा सकती है। विभाग के अनुसार इस साल अब तक इन अधिकारियों को सात पत्र लिखा जा चुका है लेकिन किसी अधिकारी ने जवाब देने की पहल नहीं की।
सरकार की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार जिन 127 आईएएस अधिकारियांे ने अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है उनमंे 32 मध्य प्रदेश कैडर, 16 उत्तर प्रदेश, 14 पंजाब तथा 12 ओडिशा कैडर के हैं। देश मेंआईएएस के कुल 6154 पद हैं। इनमंे से 4377 अधिकारी कार्यरत हैं।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

नक्सली 28 से मनाएंगे शहीद सप्ताह

नक्सली 28 से मनाएंगे शहीद सप्ताह

(प्रदीप आर्य)

भोपाल (साई)। नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले में नक्सलियों द्वारा अपने शहीद साथियों की स्मृति 28 जुलाई से मनाए जाने वाले शहीद सप्ताह के पर्चे पुलिस ने बरामद किए है। इन पर्चों में नक्सलियों ने पुलिस से बदला लेने की चेतावनी दी है। इसके बाद से क्षेत्र में सर्चिंग तेज कर दी गई है।
नक्सलियों द्वारा हर साल अपने शहीद साथियों की स्मृति में 28 जुलाई से तीन अगस्त तक देशभर में शहीद सप्ताह मनाया जाता है। इस बार नक्सलियों ने शहीद सप्ताह से संबंधित पर्चे और कुछ बैनर बांटे हैं। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि कि नक्सलियों द्वारा ग्राम राशीमेटा, दुल्हापुर, सोन गुट्टा, सोनेवानी, उकवा और पितकोना में बांटे गए पर्चे पुलिस ने बरामद किए हैं।
बताया गया है कि इन पर्चों में गत 26 मई को रूपझर थाना क्षेत्र के पचामा दादर जंगल में पुलिस और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक नहीं दो नक्सलियों सुगमा और तीजू के मारे जाने का जिक्र करते हुए उनकी मौत का बदला लेने की बात कही गई है।
पर्चे में सुगमा और तीजू का गुणगान किया गया है। पर्चे में ग्रामीणों से शहीद सप्ताह मनाने की अपील भी की गई है। नक्सलियों द्वारा शहीद सप्ताह पुलिस से बदला लेने के लिए मनाया जाता है। यह पर्चे मलाजखंड दलम द्वारा बांटे जाने का पता चला है। 26 मई को हुई मुठभेड़ में पुलिस ने एक महिला नक्सली के मारे जाने की पुष्टि करते हुए उसका शव बरामद किया था। तीजू पर पुलिस ने 15 हजार रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। एसपी अतुलकर के अनुसार इन पर्चों के मिलने के बाद विशेष सतर्कता बरतते हुए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सर्चिंग अभियान प्रारंभ कर दिया गया है।

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

28 साल पुराना है कांवर यात्रा का इतिहास


28 साल पुराना है कांवर यात्रा का इतिहास

(आंचल झा)

रायपुर (साई)। छत्तीसगढ़ के बैजनाथ धाम की यात्रा से प्रेरणा लेकर 16 उत्साही कांवरियों ने श्वेत गंगा बम्हनी से सिरपुर के लिए 28 वर्ष पूर्व कांवर यात्रा की शुरूआत की थी। तब से यह सिलसिला अनवरत जारी है। 16 कांवर यात्रियों के रोपे गए पौधे ने अब विशाल वट वृक्ष का रूप ले लिया है। अब तो हजारों कांवरियों का जत्था सिरपुर के लिए निकल पड़ता है। बोल बम के नारों से अपरिचित अंचल श्रावण माह में बोल बम के नारों से ही गुंजित होने लगता है। प्रारंभ करने वाले कांवरियों के मन में एक सपना था कि सिरपुर को मिनी बैद्यनाथ धाम बनाना है, वह अब साकार हो गया है।
अब यहां सोमवार ही नहीं अन्य दिनों में भी कांवरिए जल चढ़ाने पहुंच रहे है। इस वर्ष अब तक 6 हजार से अधिक कांवर यात्री सिरपुर स्थित गंधेश्वर महादेव में जल अर्पण कर चुके है जबकि बोल बम का माहौल गुरूवार से ही शहर में बनने लग गया है। सभी ओर से कांवरिए जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे है। अनुमान है कि सावन माह के तीसरे सोमवार 23 जुलाई को 8 से 10 हजार कांवरिए जलाभिषेक के लिए सिरपुर पहुंचेंगे।
देखते ही बनता है भगवा काफिलाकांवर यात्रा के दौरान कांवरियों को काफी कठोर नियमों का पालन करना होता है। सत्य वचन, ब्रम्हचर्य, धर्य और संयम ऐसे व्रत है जो कांवर यात्रा के दौरान कांवरिए को नर से नारायण का स्वरूप प्रदान करते है। बोल बम का उच्चरण और भगवे वस्त्र में रंगे कांवरियों का काफिला देखते ही बनता है। कांवरियों की सेवा में जगह-जगह सेवाभावी लोग जलपान की व्यवस्था करते है। अलबत्ता बम्हनी से लेकर सिरपुर तक कांवरियों की सेवा में लगे लोग सुख का अनुभव करते है। कांवरिओं को कभी भी अपना धर्य और संयम नहीं खोना चाहिए।
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को मिली जानकारी के अनुसार श्वेतगंगा बम्हनी से जल लेकर कांवरिओं का जत्था सिरपुर के लिए प्रस्थान करता है। इस दौरान उन्हें 42 किमी की दूरी नंगे पांव तय करनी पड़ती है। प्रथम कांवर यात्रा बम्हनी से सिरपुर के लिए २९ जुलाई 1984 को रवाना हुई थी। जिसमें जीवनलाल गांधी, विट्टलदास चांडक, उमेश शर्मा, लालाराम साहू, बोधराज बजाज, जमीर सिंह, चोवासिंह ठाकुर, बाबूलाल पटेल रामाधर ताम्रकार, शारदा तिवारी दोनों धमधा से, गजानंद मिश्रा ने हिस्सा लिया।
बताते हैं कि प्रथम कांवर यात्रा 29 जुलाई 1984 को प्रारंभ हुई थी। उसके पहले बस स्टैंड में जीवन लाल गांधी, उमेश शर्मा, गजानंद मिश्रा, रामाधार ताम्रकार, विट्ठलदास चांडक, हरिशचंद्र माटे बैठे थे। बाबा बैद्यनाथ यात्रा की चर्चा की जा रही थी। उसी वक्त एक विचार उत्पन्न आया कि हमारे पास बम्हनी में श्वेतगंगा है और सिरपुर में गंधेश्वर नाथ विराजमान है। क्यों न बैद्यनाथ धाम यात्रा की तरह यहां भी कांवर यात्रा आयोजित की जाए। फिर क्या था १६ कांवर यात्रियों का जत्था तैयार हो गया और प्रथम टोली रवाना हुई। इस प्रथम टोली के यात्रियों को जितना कष्ट मार्ग में उठाना पड़ा वह यात्रा में शामिल लोगों के लिए एक चिर स्थाई याद है। जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
यात्रियों का जत्था बम्हनी से ही काफी विलंब से रवाना हुआ था। महासमुंद पहुंचने और स्वागत सत्कार में भी काफी विलंब हुआ। सावन माह के बावजूद बारिश नहीं था सूर्य की तेज किरणों में कांवरयात्री काफी व्याकुल हो गए थे। कौंआझर से सिरपुर के लिए जब जत्था रवाना हुआ तो तीन बजे चुके थे। और १७ किमी का सफर तय करना बाकी था। रास्ते में ही अंधेरे ने एक तरह से चक्का जाम की स्थिति पैदा कर दी। सिरपुर से एक किमी पहले सेनकपाट नामक गांव पड़ता है।
वहां पहुंचते-पहुंचते रात के ९ बज चुके थे। उसी वक्त तेज हवाओं के साथ जमकर बारिश होने लगी। शरीर कांप रहे थे कांवर यात्रियों के दल टुकड़ियों में बंट गए थे। कोई आगे चल रहा था कोई, कोई बहुत पीदे। मार्ग न भटके इसलिए कांवरियों ने टार्च भी रखा था और दूर वाले कांवरिकों को बम के संबोधन से बुला रहे थे। तो साथ चलनेवाले कांवरिए बोल बम का उच्चरण कर रहे थे। चूंकि कांवरियों के मध्य फासला काफी बढ़ चला था। इसलिए टोह लेने के अंदाज में बोल बम का उच्चरण जोर-शोर से करते चले जा रहे थे। सेनकपाट गांव आने पर यही प्रकिया जारी थी। इधर गांव में हलचल होनी शुरू हो गई। ग्रामीण समझे कि गांव में डाकूओं के गिरोह ने हमला कर दिया है और सभी बम से लैस होकर आए है। फिर क्या था ग्रामीण भी हथियारों से लैस होकर कांवरिए निहत्थे थे और सिरपुर की यात्रा में थे। जब बात समझ में आई तो ग्रामीण क्षमायाचना करते हुए वापस लौट गए।
भूत भावन आशुतोष की अर्चना और अभ्यर्थना का महापर्व है श्रावण मास। कहते है भगवान भालेनाथ एक लोटा पवित्र जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मुरादें पूर्ण करते है, इसी से जलाभिषेक की पंरपरा जुड़ी हुई है। शिव पर जल अर्पण करने की प्रचलित मान्यताओं के बारे में ऐसा कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। जग कल्याण के लिए देवों के देव महादेव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए। गरल की जलन को शांत करने के लिए ही शिव पर जल अर्पण करने की प्रथा के बारे में कहा जाता है। गले में सर्प धारण करने को भी इन्हीं अर्थाे में लिया जा सकता है क्योंकि सर्प का शरीर ठंडा होता है, स्पर्श करने से ये बातें स्पष्ट हो जाती है। वैसे जल अर्पण करने की और भी मान्यताएं है जिनमें उनके भोले रूवरूप को लेकर कहा जाता है कि वे इतने भोले भाले है कि केवल एक लोटे पवित्र जल भक्ति भाव से अर्पण करने से ही प्रसन्न हो जाते है और इच्छित कामनाएं पूर्ण होती है। इन्हीं कारणों से शिवालयों में जलाभिषेक का आयोजन किया जाता है। श्रावण मास के आते ही भक्तगण कांवर में गंगाजल लेकर गंगाधारी को रिझाने नंगे पाव निकल पड़ते है और अपने वांछित शिवलिंग में जल अर्पण कर अपनी यात्रा समाप्त करते हैं। कांवर में जल लेकर कांवर यात्रा की प्रथा तो अब अनेक स्थानों पर प्रारंभ हो चुकी है किंतु सर्वाधिक कांवर यात्री बाबा बैजनाथ धाम की यात्रा करते है। यहां पूरे श्रावण माह मेला लगा रहता है। अनुमान के मुताबित प्रतिदिन डेढ़ लाख कांवरियों द्वारा राणवेश्वर बैजनाथ का जलाभिषेक किया जाता है। कांवर यात्री सुल्तानगंज के उत्तर वाहिनी गंगा से जल लेकर अपनी यात्रा प्रारंभ करते है और करीब १क्५ किलोमीटर की पदयात्रा नंगे पाव करते हैं

सोमवार, 23 जुलाई 2012

आखिर क्यों लिया रीढ़ विहीन कांग्रेस ने यूटर्न


आखिर क्यों लिया रीढ़ विहीन कांग्रेस ने यूटर्न

महाकौशल के प्रबंधन गुरू की भूमिका संदिग्ध

(नन्द किशोर)

भोपाल (साई)। भ्रष्टाचार के मामले में सदन से सड़कों तक संघर्ष का एलान करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई के यूटर्न से नेता ही नहीं कार्यकर्ता भी असमंजस में हैं कि अखिर क्या वजह है कि कांग्रेस को बैकफुट पर जाने को मजबूर होना पड़ा जबकि इस मामले में भाजपा की चूक का फायदा कांग्रेस के पाले में ही चुका था। इस मामले में कांग्रेस के महाकौशल के एक स्थापित स्वयंभू प्रबंधन गुरू राजनेता की भूमिका संदेह के दायरे में आ रही है।
भाजपा के एक पदाधिकारी ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि कांग्रेस के विधायक कल्पना पारूलेकर और राकेश सिंह की बर्खास्तगी के आनन फानन में लिए गए निर्णय से भाजपा के आला नेता बेहद भयाक्रांत थे। भाजपा के नेताओं को इससे यह भय सता रहा था कि कहीं कांग्रेस के विधायक एक साथ त्यागपत्र देकर नया संकट ना खड़ा कर दें।
उक्त पदाधिकारी ने आगे कहा कि भाजपा इस निर्णय से रक्षात्मक मुद्रा में साफ दिखाई दे रही थी। इसके बाद भाजपा के संकट मोचकों ने इस समस्या को हल करने के लिए कांग्रेस के आला नेताओं से भी संपर्क साधा। कांग्रेस के हाथ में आए इस मौके से कांग्रेस के नेताओं ने भी इस मसले पर हाथ ही उठा दिए थे।
उन्होंने कहा कि इसी बीच भाजपा का संपर्क कांग्रेस के एक प्रबंधन गुरू से हुआ। ये प्रबंधन गुरू महाकौशल अंचल से आते हैं। कहा जा रहा है कि इन्हीं की बिछाई बिसात पर कांग्रेस एक बार औंधे मुंह गिर गई है। चर्चा है कि उक्त दोनों ही विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के फैसले के बाद चुनाव आयोग द्वारा अगर दोनों सीट रिक्त घोषित कर दी जातीं तो उनकी बहाली फिर बेहद मुश्किल होती।
कहा जा रहा है कि उक्त दोनों की विधायकों को यह बात समझाई गई कि अगर एसा हुआ तो उनकी सीटों पर होने वाले उपचुनावों में भाजपा पहले की तरह कब्जा जमाने में देरी नहीं करेगी। इन परिस्थितियों में दोनों ही नेताओं ने पार्टी की लाईन से इतर अपना माफीनामा भिजवा दिया है।
कांग्रेस के कार्यकर्ता इन नई उपजी परिस्थितियों से असमंजस में हैं, क्योंकि जिस मामले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी बी.के.हरिप्रसाद, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह जैसे नेता भाजपा को कड़ी चुनौती दे रहे थे, अब इसमें क्या किया जाए। इस मामले में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की भूमिका भी संदिग्ध ही मानी जा रही है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कल्पना पारूलेकर और चौधरी राकेश सिंह के मामले को लेकर कांग्रेस के तेवर इतने उग्र थे कि विधायकों ने सामूहिक तौर पर आलाकमान से त्यागपत्र देने की पेशकश तक कर डाली थी। इसके बाद अचानक ही दोनों विधायकों ने आसंदी पर चढ़ने पर खेद जता दिया है।
ज्ञातव्य है कि इसके पूर्व विधानसभा स्पीकर ईश्वरदास रोहाणी ने बुधवार को राज्यपाल रामनरेश यादव से मुलाकात कर उन्हें कांग्रेस विधायकों द्वारा आसंदी के साथ किये गये दुर्व्यवहार की सीडी दिखाई। इस सीडी में सबसे पहले चौधरी राकेश सिंह एवं कल्पना पारुलेकर नारे लगाते हुए सभापति की आसंदी तक पहुंचते हैं। सभापति ज्ञानसिंह आसंदी से खड़े होते हैं तो कल्पना पारुलेकर दोनों हाथ उनके कंधे पर रखकर उन्हें जबरन कुर्सी पर बिठाती हैं। इसके बाद वे उनके सामने खड़े होकर नारे लगाने लगती हैं। ज्ञानसिंह को मार्शल कुर्सी से उठाकर आसंदी के पीछे ले जाते हैं। स्पीकर रोहाणी ने इस संबंध में राज्यपाल रामनरेश यादव को विधानसभा के नियमों संबंधी पुस्तक पढ़ाते हुए बताया कि इन दोनों सदस्यों की बर्खास्तगी नियमानुसार है।
उसी समय विधानसभा के डिप्टी स्पीकर हरवंश सिंह की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। मंगलवार को सुबह साढ़े बजे जब कांग्रेस विधायक दल ने स्पीकर रोहाणी को उनके कक्ष में बंधक बना लिया था तब सदन के संचालन के लिए डिप्टी स्पीकर हरवंश सिंह को कमान संभालनी थी लेकिन वे विधानसभा ही नहीं पहुंचे।
मजबूरी में ज्ञानसिंह को सभापति के रूप में आसंदी पर बिठाया गया। मंगलवार के पूरे घटनाक्रम को लेकर हरवंश सिंह ने स्वयं को अलग रखा था लेकिन बुधवार को जब विधानसभा ने बहुमत के आधार पर कांग्रेस के दो विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी तब अचानक हरवंश सिंह सक्रिय हुए। बताते हैं कि उन्होंने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा के बीच संवाद बहाल करने का प्रयास किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। विधानसभा सचिवालय दोनों सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर उनकी सीट को शून्य घोषित करने की सूचना निर्वाचन आयोग को भेज चुका था।

सोमवार, 9 जुलाई 2012

सीरियल के हनुमान को संजीवनी की दरकार


सीरियल के हनुमान को संजीवनी की दरकार

(दीपक अग्रवाल)

मुंबई (साई)। हिंदी फिल्मों के जाने माने अभिनेता और पहलवान दारा सिंह की हालत नाजुक है। दिल का दौरा पड़ने के बाद ८३ वर्षीय दारा सिंह को कल शाम मुम्बई के कोकिलाबेन धीरूभाई अम्बानी अस्पताल के इमरजेन्सी वार्ड में दाखिल कराया गया। बाद में उन्हें आईसीयू में भेज दिया गया, जहां उन्हें वेन्टीलेटर पर रखा गया है। श्री दारा सिंह ने कई फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों में हनुमान और भीम का जोरदार अभिनय से लोकप्रियता हासिल की। वे सांसद भी रह चुके हैं।
टेलीविजन में हनुमान की भूमिका निभाने वाले हनुमान को खुद औझ संजीवनी की जरुरत पड़ गई है। पहलवान और अभिनेता दारा सिंह की हालत अब भी नाजुक है। कोकिलाबेन अस्पताल के एक चिकित्सक ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि दारा सिंह की स्थिति अभी भी काफी गम्भीर है। उन्हें दवाइयां दी जा रही हैं। उनकी स्थिति स्थिर नहीं कही जा सकती। चिकित्सक ने कहा, हम अभी भी उनकी बीमारी का असल कारण जानने का प्रयास कर रहे हैं। शनिवार को उनकी नब्ज नहीं चल रही थी और उनका रक्तचाप काफी कम था। हमने रक्तचाप और ऑक्सीजन की मात्रा स्थिर बनाए रखने के लिए उन्हें वेंटीलेटर पर रखा है।
दारा सिंह ने कुश्ती के क्षेत्र में नाम कमाने के बाद 1960 में फिल्मों में कदम रखा था। वे रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय पौराणिक धारावाहिकों में काम करने के अलावा कई फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। वे सांसद भी रह चुके हैं।