रविवार, 27 दिसंबर 2009

सावधान! कोहरा आ रहा है


सावधान! कोहरा आ रहा है



(लिमटी खरे)


दिसंबर की हाड गलाने वाली ठण्ड के आते ही आवागमन ठहर सा जाता है। वैसे तो समूचे भारत में कोहरे की मार इन दिनों में जबर्दस्त होती है, किन्तु उत्तर भारत विशेषकर आगरा के आगे के इलाकों में कोहरा शनै: शनै: बढता ही जाता है। कोहरे के कारण जन जीवन थम सा जाता है।

आंकडों के अनुसार सडक दुघZटनाओं में साल दर साल मरने वालों की संख्या में बढोत्तरी के लिए कोहरा एक प्रमुख कारक के तौर पर सामने आया है। अमूमन नवंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी के पहले सप्ताह तक उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्र काहरे की चादर लपेटे हुए रहते हैं।

कोहरे के चलते कहीं कहीं तो दृश्यता (विजीबिलटी) शून्य तक हो जाती है। रात हो या दिन वाहनों की तेज लाईट भी बहुत करीब आने पर चिमनी की तरह ही प्रतीत होती है। यही कारण है कि घने कोहरे के कारण सदीZ के मौसम में सडक दुघZटनाओं में तेजी से इजाफा होता है।
कोहरे के बारे में प्रचलित तथ्यों के अनुसार सापेक्षिक आद्रता सौ फीसदी होने पर हवा में जलवाष्प की मात्रा एकदम स्थिर हो जाती है। इसमें अतिरिक्त जलवाष्प के शामिल होने अथवा तापमान में और अधिक कमी होने से संघनन आरंभ हो जाता है। इस तरह जलवाष्प की संघनित सूक्ष्म सूक्ष्म पानी की बूंदें इकट्ठी होकर कोहरे के रूप में फैल जातीं हैं।

पानी की एक छोटी सी बूंद के सौंवे हिस्से को संघनन न्यूिक्लयाई अथवा क्लाउड सीड भी कहा जाता है। धूल मिट्टी के साथ तमाम प्रदूषण फैलाने वाले तत्व क्क्लाउड सीड की सतह पर आकर एकत्र होते हैं, और इस तरह होता है कोहरे का निर्माण। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि वायूमण्डल में इन सूक्ष्म कणों की संख्या बहुत ज्यादा हो तो सापेक्षिक आद्रता शत प्रतिशत से कम होने के बावजूद भी जलवाष्प का संघनन आरंभ हो जाता है।
दरअसल बूंदों के रूप में संघनित जलवाष्प के बादल रूपी झुंड को कोहरे की संज्ञा दी गई है। कोहरा वायूमण्डल में भूमि की सतह से कुछ उपर उठकर फैला होता है। कोहरे में आसपास की चीजें बहुत ही कम दिखाई पडती हैं, कहीं कहीं तो विजिबिलटी शून्य तक हो जाती है।

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में दिसंबर से फरवरी तक आवागमन के साधन निर्धारित समय से देरी से ही या तो आरंभ होते हैं अथवा पहुंचते हैं। इसका प्रमुख कारण कोहरा ही है। कोहरे के चलते सडक और रेल मार्ग से आवागमन बहुत धीमा हो जता है। रही बात हवाई मार्ग की तो एयरस्ट्रिप ही कोहरे के कारण नहीं दिखाई देगी तो भला पायलट अपना विमान कहां उतारेगा। अनेकों बार पुअर विजिबिलटी के चलते या तो हवाई जहाज या चौपर घंटों हवा में लटके रहते हैं या फिर आसपास के किसी अन्य एयरापोर्ट पर उतरने पर मजबूर होते हैं।

दरअसल प्रदूषण भी कोहरे के बढने के लिए उपजाउ माहौल पैदा कर रहा है। आंकडे बताते हैं कि 1980 के दशक में देश में घने कोहरे का औसत समय आधे घंटे था, जो बढकर 1995 में एक घंटा और फिर गुणोत्तर तरीके से बढते हुए 2 से 4 घंटे तक पहुंच गया है। जानकारों का मानना है कि साठ के दशक के उपरांत आज घने कोहरे का समय लगभग बीस गुना बढ चुका है।
पिछले साल के आंकडे काफी भयावह ही लगते हैं। दिसंबर 2008 से जनवरी 2009 के बीच दिल्ली में ही साढे सोलह सौ गाडियां विलंब से चलीं। इतना ही नहीं इन दो माहों में 71 उडाने रद्द करनी पडी, साढे सात सौ का समय और लगभग डेढ सौ उडानों का मार्ग बदलना पडा। अनेक बार तो उडान भरने के लिए धूप निकलने का इंतजार करना होता है। धूप में कोहरा धीरे धीरे छटना आरंभ हो जाता है।
कोहरे के कारण रेलगाडियों का विलंब से चलना कोई नई बात नहीं है। रेल चालक को सिग्नल अस्पष्ट दिखाई देने से दनादन चलने वाली रेल गाडियां भी चीटिंयों की तरह रेंगने को मजबूर हो जाती हैं। उत्तर भारत में कोहरे में रेल चालन के लिए पटरी पर पटाके बांधे जाते हैं, जो रेल के इंजन जितना भार पडने पर ही फटते हैं। इनमें पटाखों की संख्या रेल चालक के लिए संकेत का काम करती है।
उत्तर भारत में विशेषक दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखण्ड, बिहार, आदि में कोहरे का कहर सबसे अधिक होता है। दिल्ली जैसे शहर में एक ओर जहां प्रदूषण कोहरे को बढाने में सहायक होता है, वहीं दूसरी ओर खुले इलाकों में सदीZ के मौसम में खेतों में होने वाली सिचाई कोहरे को पनपने के मार्ग प्रशस्त करती है।
विडम्बना ही कही जाएगी कि इक्कीसवीं सदी में भी भारत ने कोहरे से निपटने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना अब नहीं बना सकी है। माना जाता है कि सरकार इस समस्या को साल भर में एक से डेढ माह की समस्या मानकर ही छोड देती है, जबकि वास्तविकता यह है कि कोहरे के चलते देश में हर साल आवागमन के दौरान होने वाली मौतों में से 4 फीसदी मौतें पुअर विजिबिलटी के कारण होती हैं।

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

जरूरत बांग्लादेशी घुसपैठियों पर नजर रखने की


जरूरत बांग्लादेशी घुसपैठियों पर नजर रखने की


(लिमटी खरे)


आने वाले दिनों में बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ तेज हो सकती है। इस तरह की आशंकाएं देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में फैलने लगीं हैं। इसके पीछी ठोस कारण भी दिए जा रहे हैं। मीडिया के अनुसार बांग्लादेश से कारोडों लोगों के पलायन की आशंका है। बंग्लादेश में तेजी से होते जलवायू परिवर्तन और भविष्य के संभावित कहर ने वहां के लोगों के मन में भय पैदा कर दिया है।
1971 में भारत पाक युद्ध के दरम्यान अस्तित्व में आए बांग्लादेश ने दुनियाभर के देशों से अपील की है कि वह बांग्लादेशी शरणार्थियों को अपने यहां पनाह देने देकर उनके पुनर्वास की दिशा में ठोस कदम उठाए। एक अनुमान के अनुसार बांग्लादेश के कोस्टल एरिया (तटीय क्षेत्र) में रहने वाले करोडों लोगों को वहां से पलायन करना होगा। यद्यपि बांग्लादेश ने भारत से सीधे तौर पर कोई गुजारिश नहीं की है किन्तु इन परिस्थितियों में बांग्लादेशी शरणार्थियों के लिए भारत में पनाह लेना सबसे मुफीद होगा।
वैसे भी कोपेनहेगन में ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता अवश्य जताई गई किन्तु इसका कोई कारगर हल निकलता नहीं प्रतीत हो रहा है। जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वालों का दावा है कि आने वाले समय में एशिया और आफ्रीका का एक बहुत बडा भूभाग मानव जाति के रहने के लिए अयोग्य हो जाएगा। विशेषज्ञों का दावा है कि तब मानव आबादी का इतना बडा पलायन या विस्थापन होगा जो अब तक कभी भी नहीं हुआ है।
कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि आने वाले समय में भारत के तटीय क्षेत्रों में समुद्र जमकर तबाही बरपाएगा। इस तबाही में सुनामी या केटरीना से ज्यादा तेज और भयावह मंजर सामने आ सकता है। सुनामी और केटरीना जैसे तूफान आने के कुछ समय के उपरांत शांत हो गए थे, पर इस तबाही की सुबह होने की उम्मीद न के बराबर ही है। हिन्दुस्तान में मुंबई, मालद्वीव, कोलकता, गुजरात, उडीसा के तटीय इलाके, गोवा आदि के इसकी चपेट में आने की संभावनाएं प्रबल ही बताई जा रही हैं।
दुनिया में सबसे घनी आबादी वाले देश बांग्लादेश में लोगों में भय इसलिए भी व्याप्त है क्योंकि वहां के बसाहट वाले तटीय इलाक समुद्रतल से महज छ: से सात मीटर (तरकीबन 20 फीट) ही उपर हैं। विशेषज्ञों की मानें तो बांग्लादेश के तटीय इलाकों में निवास करने वाले लगभग दस करोड लोगों को अगले सत्तर सालों में अपनी सरजमीं छोडकर अन्यत्र ठिकाना बनाना ही पडेगा। वैसे भी बांग्लादेश में सबसे घनी आबादी बाले ढाका शहर की दूरी समुद्री सीमा से बहुत ज्यादा नहीं है।
जैसे ही भविष्य का रोडमेप बांग्लादेश के लोगों के सामने आता जा रहा है, वहां के लोगो के मानस पटल पर पलायन की बात कौंधना स्वाभाविक ही है। विशेषज्ञ यह भी बता रहे हैं कि आने वाले कुछ वषोZं में बांग्लादेश में अनाज की पैदावार में भी दस से तीस फीसदी की कमी होने की उम्मीद है।
गौरतलब होगा कि पहले से ही भारत अपनी कैंसर की तरह बढती आबादी को लेकर चिंतित है। आज भारत की आबादी ही भारत की प्रगति में सबसे बडी बाधा के तौर पर सामने है। न लोगों को खाने को रोटी है, न तन ढकने को कपडा और न सर छुपाने को जगह।
इसके साथ ही साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश के घुसपैठियों ने हिन्दुस्तान में आकर न केवल अपने आशियाने बनाए हैं, बल्कि देश में भ्रष्टाचार की जंग वाले सरकारी तंत्र में रिश्वत की दवा से अपने अपने राशन कार्ड, वोटर आईडी, चालक अनुज्ञा (ड्राईविंग लाईसेंस) आदि भी बनवा लिए हैं।
भारत को वैसे भी घनी आबादी वाले देशों में गिना जाता है। अगर बांग्लादेश से पलायन का आगाज होता है तो उनके लिए बेरोकटोक सीमा पार कर भारत आने के मार्ग प्रशस्त हो जाएंगे। तब इन अघोषित अनचाहे शरणार्थियों के रहने खाने की व्यवस्था बहुत ही बडा सरदर्द बनकर उभर सकता है।
यहां यह उल्लेखनीय होगा कि हिन्दुस्तान में आतंक बरपाने के लिए जिम्मेदार एक संगठन हूजी की जडें बांग्लादेश में गहरी जमी हुईं हैं। अगर बांग्लादेश से बडी तादाद में विस्थापित भारत आते हैं तो हूजी को भारत में जडें जमाने में देर नहीं लगेगी। उस वक्त भारत सरकार के सामने इस आंतरिक चुनौति से निपटना टेडी खीर ही साबित होगा।
ज्ञातव्य है कि कोपेनहेगन सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचे बांग्लादेश के सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमण्डल के नेता सबेर हुसैन चौधरी ने वहां इस समस्या पर वजनदारी से प्रकाश डाला था। चौधरी ने मीडिया से मुखातिब होते हुए इशारों ही इशारों में कह दिया था कि कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में जलवायू परिवर्तन से होने वाले आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय विस्थापन तथा पलायन पर भी गौर फरमाया जाना चाहिए।
भारत सरकार को चाहिए कि समय रहते अपने घनी बसाहट, अपर्याप्त खान पान के स्त्रोत, पाकिस्तान की नापक हरकतें और हूजी और सिमी जैसे संगठनों के साथ आंतरिक हालातों से समूचे विश्व को आवगत कराते हुए ऐसे तरीके खोजना चाहिए कि बांग्लादेश से विस्थापित होने वाले लोगों को दुनिया के अन्य देशों में बसाया जा सके।

किसकी सुने एचएम की या सीएच की!

किसकी सुने एचएम की या सीएच की!



0 कांग्रेसी सांसदों को रहना होगा आखिरी सप्ताह में दिल्ली


0 नेताओं के बडे दिन की छुट्टी पर फिरा पानी


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली 26 नवंबर। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में सियासी दलों के वरिष्ठ सदस्यों के सर पर साल के आखिरी सप्ताह में एक नई आफत आन खडी हो गई है। नेताओं के सामने मुश्किल यह है कि वे एचएम (गृह मंत्री अर्थात अपनी पित्न) की बात सुनें या सीएच (पार्टी के चेयरमेन) की। स्कूलों की छुट्टी के चलते नेताओं पर घर से दबाव है कि बडे दिनों की सात दिन की छुट्टी में उन्हें घुमाने ले जाया जाए, दूसरी ओर पार्टी के आलाकमान ने उन्हें हलाकान कर रखा है। घरवाली, बाहरवाली के चक्कर में उलझकर नेताओं की रात की नींद और दिन का चैन हराम हो गया है।
दिल्ली में आजकल प्रमुख पाटियां कांग्रेस और भाजपा दोनों ही संगठन चुनाव में व्यस्त हैं। पार्टी आलाकमान ने साफ कर दिया है कि संगठन का सदस्यता अभियान हर हाल में 31 दिसंबर तक ही चलाया जाएगा। आलाकमान किसी भी कीमत पर इसे बढाने के मूड में नहीं दिख रहा है।
नेताओं को डर है कि कहीं सदस्यता अभियान में हेराफेरी कर उनके प्रतिद्वंदी अपनी जमीन मजबूत न कर लें। यही कारण है कि बाल बच्चों को छोडकर नेता जोर शोर से सदस्यता अभियान में जुट गए हैं। जिला अध्यक्ष बनाने की जोडतोड में कांग्रेस के उम्मीदवार हर संभव प्रयास कर रहे हैं, वहीं भाजपा में मण्डल से जिला स्तर तक मची गलाकाट स्पर्धा के चलते वे एक घंटे के लिए भी दिल्ली छोडने की स्थिति में नहीं हैं।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा वजीरे आजम डॉ. मन मोहन सिंह की उपस्थिति में आईटीओ पर कांग्रेस के नए केंद्रीय कार्यालय का शिलान्यस 28 दिसंबर को किया जा रहा है। चूंकि कांग्रेस सुप्रीमो और प्रधानमंत्री दोनों ही इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे सो कांग्रेस के देश भर के सांसद केंद्रीय कार्यालय के इस प्रोग्राम में भाग लेंगे ही।
``हुई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी`` की स्थिति में फंसे नेता न तो बीबी बच्चों को ही तरीके से मना पा रहे हैं और न ही संगठन के स्तर पर अपने मोहरे फिट करने का काम पूरी ईमानदारी से कर पा रहे हैं। हाड गलाने वाली ठंड के बावजूद सियासी हल्कों की फिजां काफी गरम नजर आ रही है। अब नेता अपने मतदाताओं की तरह अपने परिवार को ही आश्वासन देते नजर आ रहे हैं कि जैसे ही तीन दिन की छुट्टी एक साथ पडेगी सबको हवाई जहाज से घुमाने अवश्य ले जाएंगे।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

अनूठे गृहमंत्री हैं पलानिअप्पम चिदम्बरम


अनूठे गृहमंत्री हैं पलानिअप्पम चिदम्बरम


(लिमटी खरे)


भारत के गृह मंत्रियों में सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम बडे ही आदर के साथ लिया जाता है। उसके बाद के गृहमंत्रियों ने कोई खास करिश्मा नहीं किया है। शिवराज पाटिल जैसे गृहमंत्रियों ने देशवासियों का भरोसा तोडने में कोई कोर कसर नही रख छोडी। वर्तमान गृहमंत्री पलानिअप्पम चिदम्बरम ने कुछ नया करने की ठानी है, जिससे भारतवासी उन्हें अनूठे गृहमंत्री के तौर पर सालों तक याद रख सकेंगे।

अमूमन किसी भी सूबे या केंद्र के मंत्री का सपना होता है कि वह अपने मंत्रालय में ज्यादा से ज्यादा अधिकार अपने पास रखे। इसके लिए वह देश की अिस्मता के साथ समझौता करने से भी नहीं चूकता। पी.चिमदम्बरम ने अपने ही गृह मंत्रालय को तोडकर दो भागों में विभाजित करने की वकालत की है। यह निश्चित तौर पर उनकी एक अनूठी पहल मानी जा सकती है।
देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में पिछले साल हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के बाद शिवराज पाटिल से गृहमंत्री का प्रभार लेने वाले पी.चिदम्बरम के सर पर वाकई कांटों भरा ताज रखा गया था। उस दौरान देश के गृह मंत्रालय के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ था। यह चिदम्बरम की सबसे बडी कामयाबी कही जाएगी कि उनके कार्यकाल में बीते एक साल में देश कम से कम आतंकी हमलों से तो महफूज रहा है। इतना ही नहीं उनके कार्यकाल में 12 बडे आतंकी हमलों की साजिश से पर्दा भी उठ सका है।

चिदम्बरम का एक साल का कार्यकाल तारीफेकाबिल इसलिए भी माना जा सकता है, क्योंकि उनके अंदर समन्वय बनाने की बेजोड क्षमता है। देश में गुप्तचर सूचनाएं देने के काम में लगी विभिन्न एजेंसिया प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाकार और स्वयं गृहमंत्री को सीधे रिपोर्ट करतीं हैं। विभिन्न महकमों के मंत्रियों और देश भर के सूबों की सरकारों के बीच तालमेल बनाना कोई आसान बात नहीं है। चिदम्बरम ने अब यह किया है, यही कारण है कि आतंकियों के हर मंसूबों पर पानी फिरा है।

चिदम्बरम की सोच सही है कि 11 सितम्बर 2001 के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका पर कोई आतंकी हमला नहीं हो सका है। अपने आप को चुस्त दुरूस्त बनाने में अमेरिका जैसे विकसित देश को 36 माह का समय लग गया था। इस हमले के तुरंत बाद अमेरिका ने होमलैंड सिक्यूरिटी महकमे का गठन कर लिया था, जिसकी प्रमुख जवाबदारी आतंकी हमलों से निपटना और आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना था।
चिदम्बरम चाहते हैं कि 2010 में भारत राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीएस) का गठन कर ले। दरअसल गृहमंत्री चिदम्बरम चाहते हैं कि गृह मंत्रालय के दो फाड कर दिए जाएं। एक मंत्रालय आंतरिक सुरक्षा से इतर की जवाबदारी का निर्वाहन करे तो दूसरा आंतरिक सुरक्षा की कमान संभाले।

चिदम्बरम के बजान को राजनैतिक चश्मे से देखने की आवश्यक्ता नहीं है। आज से लगभग दस साल पहले कमोबेश यही समय था जबकि पाक प्रशिक्षित आतंकवादी इंडियन एयरलाईंस के विमान को हाईजेक कर बरास्ता अमृतसर उसे कंधार ले गए थे। यात्रियों की रिहाई के बदले भारत सरकार को लश्कर ए तैयबा के प्रमुख सरगना हाफिज मोहम्मद सईद को छोडना पडा था। यह वही सईद है जो पिछले साल मायानगरी मुंबई में हुए आतंकी हमलों का मास्टर माईंड माना जा रहा है।
वैसे पिछले साल गृह मंत्रालय का कामकाज संभालने वाले पी. चिदम्बरम का मानना था कि गुप्तचर सेवाओं को और अधिक चाक चौबंद किया जाए। इन एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के लिए एक नेशनल िग्रड की सिफारिश और 21 सूचना केंद्रों को इससे जोडने की बात भी कह चुके हैं गृहमंत्री। विडम्बना ही कही जाएगी कि अफसरशाही के बेलगाम घोडों ने चिदम्बरम की मंशाओं को अब तक परवान नहीं चढने दिया है।
देशवासियों के लिए सुखद आश्चर्य यह है कि इक्कीसवीं सदी में राजनीति की काली कोठरी में पलियानिअप्पम चिदम्बरम जेसा व्यक्तित्व भी है जो अपने काम काज और उपलब्धियों का िढंढोरा नहीं पीटते हैं। चिदम्बरम की कार्यशैली से साफ हो जाता है कि गृहमंत्री के तौर पर वे आतंकी या दुश्मन की ताकत को कम करके नहीं आंकते। रही बात समाधान की तो वे अपने तरीके से हर समस्या के समाधान को सभी के सामने रखने का माद्दा भी रखते हैं।
आशा की जानी चाहिए कि गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के गृह मंत्रालय को बांटने, एनसीटीएस के गठन और गुप्तचर एजेंसियों के लिए नेशनल िग्रड के सुझावों का सरकार में बैठे समस्त सहयोगी और सभी दलों के संसद सदस्य स्वागत करें। इस पर समय सीमा तय कर जल्द ही राष्ट्रव्यापी बहस कराई जाकर चिदम्बरम की मंशा के अनुसार इसे अगले साल के अंत तक अस्तित्व में ले आया जाए, वरना कहीं देर न हो जाए और सांप निकलने के बाद हम लकीर न पीटते रह जाएं।

बढ सकतीं हैं कांग्रेस और राजमाता के बीच दूरियां


बढ सकतीं हैं कांग्रेस और राजमाता के बीच दूरियां



राजमाता का दरबार अब सजेगा 9,ए कोटला रोड पर!


बदल जाएगा 24 अकबर रोड का पता


(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का केंद्रीय कार्यालय अब सोनिया गांधी के निवास के पीछे वाले मार्ग अकबर रोड से उठकर राम नारायण अग्रवाल चौक (पुराना आईटीओ चौराहा) स्थानांतरित होने वाला है। इस साल के अंत में कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी 9, ए कोटला रोड पर नए भवन का शिलान्यास करेंगीं।
गौरतलब होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के समय में 1978 पार्टी का कार्यालय 24 अकबर रोड में स्थापित किया गया था। लगभग तीन दशक तक सत्ता के उतार चढाव का साक्षी रहा यह दफ्तर भविष्य में किस उपयोग में लाया जाएगा यह बात अभी तय नहीं की गई है।

आईटीओ क्षेत्र में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के ठीक सामने एवं हिन्दी भवन के पीछे कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय का निर्माण लगभग दो एकड क्षेत्र में किया जाएगा। आश्चर्यजनक तथ्य तो यह उभरकर सामने आया है कि अनेक सूबों और जिलों में कांग्रेस ने अपने निजी कार्यालयों का निर्माण करा लिया है किन्तु आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने एक अदद निजी केंद्रीय कार्यालय बनाने की जुगत कभी नहीं लगाई है।

बहरहाल, आईटीओ के इलाके में ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आलवा राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी, के कार्यालय स्थापित हैं। अन्य सियासी दलों को भी इसी इलाके में जमीने आवंटित हैं, अथवा होंगी। आने वाले समय में प्रेस काम्पलेक्स के तौर पर पहचाने जाने वाला आईटीओ क्षेत्र सियासी गतिविधियों का गवाह बन जाएगा।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय के लिए अनेक वास्तुविदों, अिर्कटेक्ट, इंजीनियर्स से रायशुमारी हो चुकी है। इसके निर्माण का ठेका किसे दिया गया है, एवं इसकी लागत कितनी आएगी यह बात अभी गुप्त ही रखी गई है। सूत्रों ने आगे कहा कि बहुमंजिला प्रस्तावित इमारत में लिफ्ट, सेंट्रल एसी सिस्टम के साथ ही साथ पािर्कंग का विशेष ध्यान रखा गया है।
एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने 24 अकबर रोड से कांग्रेस के केंद्रीय मुख्यालय के 9,ए कोटला रोड जाने की बात पर नाम न उजगर करने की शर्त पर चुटकी लेते हुए कहा कि वर्तमान में 24 अकबर रोड और सोनिया गांधी का आवास 10 जनपथ दोनों के दरवाजे अगल बगल में हैं, किन्तु अगर यह 9,ए कोटला रोड चला गया तो कांग्रेस और कांग्रेस अध्यक्ष के बीच दूरियां बढ जाएंगीं।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

सिम्पलिसिटी इज ओवर, नाउ ओरिजनालटी स्टार्टस!

सिम्पलिसिटी इज ओवर, नाउ ओरिजनालटी स्टार्टस!

क्या मंत्री दिल्ली प्रदेश के नागरिक नहीं हैं शीला जी!


सवा दस करोड रूपए के बंगले में रहेंगे दिल्ली के महज छ: मंत्री


इक बंगला बने नयारा . . . .


(लिमटी खरे)


कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और उनके साहेबजादे कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के मितव्ययता का संदेश देने के मामले अभी ठंडे भी नहीं हुए कि उनकी नाक के नीचे ही कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में अपने मंत्रियों के लिए छ: बंगलों के निर्माण के लिए महज दस करोड 17 लाख रूपए की राशि की स्वीकृति प्रदान कर सभी को चौंका दिया है। मंत्रियों के नए सरकारी आवास 23 हजार नौ सौ 42 वर्गफीट पर बनने जा रहे हैं, अर्थात हर एक बंग्ला लगभग चार हजार वर्गमीटर के विशाल क्षेत्र में बनेगा। और तो ओर शीला सरकार इस मसले में कितनी जल्दी में है, इस बात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि इन बंगलों के निर्माण की समयसीमा महज पंद्रह माह ही रखी गई है।
अगले साल दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में धन की कमी का रोना रोने वाली दिल्ली सरकार का यह कदम आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। कहने को तो राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए तीसरी बार सत्तारूढ हुईं शीला दीक्षित ने इस बार अपनी जीत के तोहफे के तौर पर दिल्लीवासियों को मेट्रो या डीटीसी अथवा ब्लू लाईन में सफर करने पर ज्यादा राशि देने, वेट की दरें बढाने, बिजली पानी मंहगा करने जैसे उपक्रम किए हैं।

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के चलते हिन्दुस्तान की कमर भी टूटी हुई है। एसी विषम परिस्थिति में शीला सरकार ने आम नागरिकों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष करों का बोझ लादकर उन्हें अधमरा कर दिया है। वहीं दूसरी ओर शीला दीक्षित ने अपने लाडले मंत्रियों के एशोआराम का पूरा ख्याल रखते हुए छ: मंत्रियों के सरकारी आशियाने के लिए सवा दस करोड रूपए का प्रावधान किया है।
यहां गौरतलब बात यह है कि वर्तमान में शीला दीक्षित सरकार के महज दो मंत्रियों को छोडकर शेष के पास सरकारी आवास उपलब्ध हैं। सरकारी आवास विहीन केवल दो मंत्रियों के लिए बंगला बनाने के बजाए शीला सरकार ने आधा दर्जन मंत्रियों के लिए एक करोड 69 लाख रूपए प्रति बंगले के मान से राशि मुहैया करवाई है। इनमें से चार आवास राजनिवास मार्ग तो दो अतउर रहमान लेन में बनने प्रस्तावित हैं।

आसमान छूती मंहगाई के इस दौर में जहां आम नागरिक के सर पर छत ही मयस्सर नही हैं, वहां अगर शीला दीक्षित चाहतीं तो बडे सरकारी आवासों में रह रहे दिल्ली सरकार के बडे अफसरान को कुछ छोटे आवासों में स्थानांतरित कर दो मंत्रियों के लिए बडे आवास की व्यवस्था कर सकतीं थीं। वस्तुत: उन्होंने एसा किया नहीं। हो सकता है कि ``जन सेवकों`` के चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने की गरज से जनता के गाढे पसीने की कमाई को शीला दीक्षित ने इस तरह पानी में बहाने की बात सोची हो। और तो ओर जिस सूबे में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नई विधानसभा के गठन के एक साल बाद भी अपने अपने बंगलों पर काबिज हों तब तो नई आलीशान सरकारी अट्टालिकाओं के निर्माण की दरकार होगी ही।
वित्त मंत्री के अशोक कुमार वालिया के अनुसार मंत्रियों को पुरानी कोठियों में काम करने में कठिनाई महसूस हो रही है, इसलिए लोक निर्माण विभाग के नए बंगलों के दो प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया गया है। पुराने आवासों में मंत्रियों को किस तरह की परेशानी से दो चार होना पड रहा है, यह बात वित्त मंत्री साफ नहीं कर सके। मजे की बात तो यह है कि जिन बंगलों के निर्माण को पहले दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन के पहले इंकार कर दिया था, उन्हें दुबारा फिर बिना किसी अपत्ति के पास भी कर दिया है।
देखा जाए तो दिल्ली सरकार के स्वामित्व वाले पुराने बदहाल छोटे छोटे आवासों में दिल्ली सरकार के अनेक कर्मचारी किस तरह गुजर बसर कर रहे हैं, यह बात वे ही भली भांति जानते हैं पर उनके उपर सत्तारूढ जनसेवकों ने कभी नजरें इनायत नहीं की। भला इस तरफ सरकार ध्यान दे भी तो क्यों, इन आवासों में उन्हें थोडे ही रहना है।

बात चाहे लोकसभा की हो या विधानसभा की हर जगह फिजूलखर्ची का एक अघोषित मद होता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मंत्री बने एम.एस.कृष्णा, शशि थुरूर और ममता के सहयोगी सुल्तान अहमद ने लाखों रूपए होटलों में रूककर बहा दिए। इतना ही नहीं इस साल सांसदों के बंगलों के रंगरोगन और जरूरी चीजों में केवल एक सौ करोड रूपए ही खर्च हुए हैं। उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती ने अपने सरकारी आवास और बसपा के मुख्यालय को बुलट प्रूफ करवाने में भी साढे चार करोड रूपए का प्रावधान किया है। सवाल यह उठता है कि यह सारा का सारा धन कहां से आएगा, जाहिर सी बात है कि करों के माध्यम से जनता के जेब पर डाका डालकर ही जनसेवकों को विलसिता का जीवन मुहैया करवाया जाएगा।

एक नहीं अनेकों उदहारण हैं, जबकि नए निर्माण के बिना ही पुराने भवनों या कक्षों में जरूरी रद्दोबदल कर उनसे काम चलाया गया हो। मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में जब मंत्रियों की तादाद बढी तो राज्य सचिवालय वल्लभ भवन में प्रमुख सचिवों के कक्षों को खाली करवाकर मंत्रियों को दिया गया था। प्रमुख सचिवों को सचिवों का तो सचिवों को उप सचिवों का कक्ष आवंटित किया गया था। उपसचिव जो अकेले ही एक कक्ष पर अधिकार जमाए रहते थे, उन्हें अन्य उपसचिवों के साथ अपना कमरा शेयर करना पडा था। यह सब तब हुआ जब मुख्यमंत्री के तौर पर दिग्विजय सिंह ने दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दिया था।
हमारे मतानुसार तो जिस तरह विधायकों या सांसदों को आवास उपलब्ध कराए जाते हैं, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यपाल के `ईयर मार्क` आवास होते हैं, ठीक उसी तरह मंत्रियों के लिए भी आवास ईयर मार्क कर देना चाहिए। वैसे भी मंत्री विधायकों या सांसदों को पिन से लेकर प्लेन तक सारी जरूरत की सामग्री सरकार द्वारा मुहैया करवाई जाती है।
जब भी नया मंत्रीमण्डल गठित हो अथवा किसी मंत्री का विभाग बदले उसे महज अपने कपडे, स्मृतिचिन्ह और तोहफे उठाकर ही नए बंगले में जाना होगा। शेष पलंग, गद्दे, तकिए, सोफा, कुर्सी कंप्यूटर, फोन, परदे आदि सभी चीजें तो सरकारी ही होती हैं। अगर सरकार यह व्यवस्था लागू कर देती है तो फिर जनता को विभागीय मंत्री के घर को ढूंढने के लिए दर दर नहीं भटकना पडेगा। वैसे भी मंत्रियों को अपने विभाग के हिसाब से ही निर्धारित कार्यालय में जाना होता है। विभाग बदले जाने पर उनका कार्यालय भी बदल जाता है, और उस समय उन्हें अपना पुराना कार्यालय छोडना ही पडता है, फिर सरकारी घर से लगाव कैसा, आखिर एक न एक दिन तो उन्हें उस बंगले को छोडना ही होगा।
बहरहाल अगर शीला सरकार वर्तमान सरकारी आवासों में ही रद्दोबदल कर उनमें रहने के लिए मंत्रियों को मना लेतीं तो दिल्ली की गरीब जनता के गाढे पसीने की कमाई से सवा दस करोड रूपए बच जाते, और अगर किसी ठेकेदार विशेष को उपकृत करना ही था तो बेहतर होता कि झुग्गी झोपडी में रहने वाले गरीबों के लिए इस राशि से अधिक से अधिक मकान बनाने का ठेका ही उस ठेकेदार को देकर कम से कम ``जनसेवा`` तो कर ही ली जाती।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

संकट में स्वयंभू संत!


संकट में स्वयंभू संत!

(लिमटी खरे)


देश के स्वयंभू प्रवचनकर्ता संत आशाराम बापू के जीवन में विवादों ने उनका पीछा कभी भी नहीं छोडा है। कभी उनके चरित्र पर लांछन लगे तो कभी तांत्रिक होने के, तो कभी जमीन की दलाली कर हडपने के आरोप उन पर लगते रहे हैं। मजे की बात यह है कि बापू पर सारे आरोप किसी ओर ने नहीं वरन् उनके अपने शिष्यों ने ही मढे हैं। इन आरोपों में बापू का उंचा रसूख ढाल की तरह सामने आया है। वैसे भी हिन्दुस्तान की सरजमी पर धार्मिक तौर पर शोषण करने वाले बाबाओं की खासी तादाद है।
कभी अपने गुरूकुल के छात्रों की संदिग्ध परििस्थ्ति फिर मध्य प्रदेश के छिंदवाडा में एक शिक्षिका के संदेहास्पद मौत के बाद चर्चाओं में आए आशाराम बापू पर गुजरात सरकार ने शिकंजा उस वक्त कसा जब उनके पूर्व अनुयायी राजू चांडक की हत्या के प्रयास में पुलिस ने उन पर मामला कायम कर लिया। बापू को न्यायालय तक से राहत नहीं मिल सकी।
गौरतलब होगा कि 5 जुलाई 2007 तो गुजरात में साबरमती के किनारे बापू के गुरूकुल में पढने वाले दो छात्र दीपेश और अभिषेक के शव बरामद किए गए थे, जिनके आसपास तंत्र क्रिया में प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी मिली थी। उस वक्त लोगों का आरोप था कि मोदी सरकार ही बापू को बचाने में लगी हुई है।

लोगों के दवाब में आकर नरेंद्र मोदी ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायमूर्ति त्रिवेदी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग के सामने आधा सैकडा लोगों ने अपने अपने गुबार जमकर निकाले। बताते हैं कि लोगों का आरोप यहां तक था कि बापू और उनका पुत्र सदैव ही तांत्रिक साधनाएं करता है, इसमें मानव शवों का प्रयोग भी किया जाता रहा है।
कभी आशाराम बापू के काकस का प्रमुख अंग रहा राजू चाण्डक कुछ सालों पहले ही उनसे अलग हुआ है। कहा जाता है कि चाण्डक ने राजस्थान में एक अज्ञात महिला के साथ बापू को योन संबंध बनाते देखा था, तभी से उसे बापू से विरक्ती हो गई थी। जबसे वह बापू से अलग हुआ है, तभी से वह बापू के बारे में कुछ न कुछ रहस्योद्घाटन कर ही रहा है। चाण्डक ने बापू को अपने पूजने वालों को धोका देने वाला और चारित्रिक तौर पर उचित व्यक्ति न होने तक का आरोप मढा है।

चाण्डक के आरोपों में कितना दम है यह बात तो समय के साथ ही सामने आ सकती है, किन्तु जब चाण्डक पर ही गोलियों से हमला हुआ तब बात हाथ से निकलती दिखाई दी। इसके पहले आशाराम बापू की एक सीडी भी बाजार में आ गई थी जिसमें आशाराम बापू को यह कहते हुए दिखाया गया था कि गुजरात के मुख्यमंत्री और एक स्थानीय अखबार मेरे (आशाराम के) खिलाफ एक सुनियोजित षणयंत्र का ताना बाना बुन रहे हैं। जो लोग इस काम में मदद कर रहे हैं अगर उन्हें कम से कम तीन चार दिन और अधिक से अधिक एक माह के भीतर सबक न मिले तो वे उनके मातहत बनने को तैयार हैं।
सरकार को चाहिए कि चाण्डक के एक कथन को मानकर कार्यवाही करे, जिसमें चाण्डक ने साफ कहा है कि मामले की सच्चाई जानने के लिए राजू चाण्डक और आशाराम बापू दोनों ही का नारको टेस्ट कराया जाना चाहिए। नारको टेस्ट से बडे से बडे दुर्दांत अपराधी भी सच्चाई को बता ही देते हैं, फिर बापू जैसे संत जिनके अनुयायियों की खासी तादाद है अगर निर्दोष हैं तो उन्हें खुद ही आगे आकर चाण्डक की इस बात पर अपनी सहमति देना चाहिए, क्योंकि उनकी छवि के साथ ही उनके चाहने वालों की आस्थाएं भी जुडी हुई हैं।
यद्यपि यह सीडी कम ही लोगों के पास है, पर इस सीडी के अस्तित्व से लोग इंकार नहीं कर रहे हैं। यह सीडी वास्तविक है या छेडछाड कर बनाई गई है यह बात भी शोध का ही विषय है, किन्तु इसके बाद का घटनाक्रम बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है।

बापू के अनुयायियों ने गुजरात के पुलिस महानिदेशक शब्बीर हुसैन को ही बापू के खिलाफ षणयंत्र का ताना बाना बुनने वाला करार दे दिया। इस तरह इस पुलिस की कार्यवाही को सांप्रदायिक रंग देने की नाकाम कोशिश के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साधे रखी। नतीजतन पुलिस ने अपना शिकंजा और कसना आरंभ कर दिया।
कहा तो यहां तक भी जाता है कि बापू का साम्राज्य पांच हजार करोड से भी ज्यादा मूल्य का है। 1980 में गुजरात में साबरमती के तट पर बापू ने प्रवचन देने की शुरूआत की थी। उस वक्त बापू के पास अकूत धनसंपदा का भण्डार नहीं था। आशाराम बापू के हाथों में इन तीस सालों में कौन सा पारस पत्थर लग गया जिससे आज उनकी मिल्कियत में एक हजार दो सौ सत्संग केंद्र, एक सैकडा से अधिक बडे आश्रमों के अलावा गुरूकुल और आश्रम के लिए सैकडों एकड जमीन का शुमार है। बापू पर आरोप है कि अनेक स्थानों पर तो बापू ने जनसेवकों के माध्यम से प्रशासन पर दबाव डालकर लोगों की जमीनें भी अपने नाम करवा लीं हैं।

राजनैतिक तौर पर भी आशाराम बापू का उपयोग करने से राजनेता नहीं चूकते हैं। आशाराम बापू के वाकचातुर्य के चलते उनके अनुयायियों की तादाद में तेजी से इजाफा हुआ है। यही कारण है कि चुनावों के आसपास बापू के प्रवचनों का आयोजन करा एक तरफ जनसेवक बापू की झोली में आकूत दौलत भरते हैं, वहीं बापू प्रवचनों के दरम्यान अपने शिष्यों के सामने जनसेवक पर लाड प्यार दुलार जताकर उसकी जीत सुनिश्चित करने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडते हैं।
दरअसल भारत देश की जनता धर्मभीरू है। मशहूर तांत्रिक चंद्रास्वामी के उपरांत देश में नब्बे के दशक से कुकुरमुत्ते की तरह पैदा हुए स्वयंभू संत और योग गुरूओं ने इसी जमीन पर अपनी अच्छी खासी दुकान सजा रखी है। कल तक सडकों पर चप्पलें चटकाने वाले लोग आज एयर कंडीशनर गाडियों, सैकडों एकड के आश्रमों, देश विदेश की हवाई यात्राओं का लुत्फ उठा रहे हैं।
आश्चर्य की बात तो यह है कि देश का आयकर विभाग भी इनके सामने नतमस्तक ही नजर आता है। राजनैतिक रसूख के चलते ये संत अपने प्रतिष्ठान में आने वाली आय को आयकर की विभिन्न धाराओं के तहत ``कर मुक्त`` करवा लेते हैं फिर शुरू होता है, भोग और विलासिता का कभी न रूकने वाला खेल। दिल्ली में ही छतरपुर इलाके के भव्य मंदिर या आश्रमों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशवासियों को नीति और अनीति का पाठ पढाने वाले संत आखिर किस तरह की फाईव स्टार लाईफ को अंगीकार किए हुए हैं।

किसी भी धर्म की किताब में संत ने हमेशा से समस्त सुखों को तजा ही है। सालों साल जंगल में तपस्या कर, या टूटी फूटी मिस्जद या झोपडी में अपना जीवन बिताकर संतों ने मानव मात्र की सेवा को ही अपना परम धर्म समझा है। अभी वह पीढी जिन्दा होगी, जिसने महाराष्ट्र प्रदेश के अहमदनगर जिले के शिरडी के फकीर ``साई बाबा`` को आंखों से देखा होगा। शिरडी का फकीर एक अंगरखे में ही द्वारका माई में अपना पूरा जीवन बिता गया, पर आज ``साई`` के नाम पर देश भर में मंदिर बनाकर लोग न जाने कितना मुनाफा कमा रहे हैं।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में संत हिरदाराम जी को कौन नहीं जानता। सारा जीवन उस संत ने सादगी के साथ बिताया। शतायु होने के बाद भी वे अपना भोजन खुद ही बनाया करते थे। संत हिरदाराम ने कभी भी किसी राजनेता के साथ फोटो खिचाकर उसे मीडिया को नहीं दिया। राजनेता खुद ही बडे श्रृद्धाभाव से संत की कुटिया में जाया करते थे। इसी तरह जैन मुनियों का इतिहास भी सादगी और कठोर संयम से बंधा हुआ है।
जनता को अब जागना होगा, और इस तरह के वाकचातुर्य के धनी बाजीगरों से खुद को दूर रखना होगा। जनसेवकों को भी चाहिए कि जनता जनार्दन के इर्दगिर्द फैले इस तरह के फर्जी संत अथवा गुरूओं को बेनकाब कर जनता को इनके पाखण्ड से बचाए, पर यह इसलिए नहीं हो पाएगा क्योंकि अगर जनसेवक एसा करने लगे तो उन्हें ही बेनकाब होते समय नहीं लगेगा।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बढती ही जाएंगी गडकरी की दुश्वारियां

बढती ही जाएंगी गडकरी की दुश्वारियां


(लिमटी खरे)


महाराष्ट्र के नेता नितिन गडकरी को संघ के वरदहस्त के चलते भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान अवश्य ही मिल गई है, किन्तु अब तक राज्य विशेष मेें सिमटे होने के कारण उनके सामने का मार्ग पूरी तरह शूलों से ही भरा नजर आ रहा है। गडकरी के सामने देशव्यापी पहचान बनाने का संकट तो है ही साथ ही उनके नेतृत्व में अनेक वरिष्ठ भाजपाई अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं।
भाजपा के दुलारे समझे जाने वाले गडकरी की जैसे ही भाजपाध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी होने की खबरें फिजां में तैरीं उन्हें उन्ही के महाराष्ट्र सूबे से हार का तोहफा मिला है, जिसकी प्रतिक्रियाएं बहुत अच्छी नहीं आ रहीं हैं। संघ के गढ नागपुर और मुंबई में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन ने गडकरी के सामने अनेक प्रश्नवाचक चिन्ह छोड दिए हैं। मुंबई में भाजपा के मधु चाव्हाण चुनाव हार गए हैं, उधर शिवसेना के रामदास कदम ने भाजपा द्वारा भीतराघात के आरोप गडकरी को इसलिए भी बेचैन कर सकते हैं, क्योंकि इससे भाजपा और शिवसेना के रिश्तों में दरार बढ सकती है। गौरतलब होगा कि नागपुर की सीट पिछले बारह सालों से भाजपा के कब्जे में गडकरी के कारण ही थी, और अब उनके अध्यक्ष बनने के उपरांत भापजा का यह सुरक्षित गढ भी ढह गया।

गडकरी के सामने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश सूबा एक चुनौति के तौर पर ही होगा। निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह इसी राज्य से हैं। सर्वाधिक लोकसभा सीटों को अपने दामन में समेटने वाले इस सूबे के अंदर सरकार बनाने और ढहाने की ताकत रही है। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के साथ अब इस सूबे में मृतप्राय पडी भाजपा में जोश खरोश भरना उनके लिए सबसे बडी चुनौति ही होगी। लोगों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उत्तर प्रदेश में गडकरी के नेतृत्व में भाजपा अपना खोया जनाधार पाने में सफल होगी भी अथवा नहीं।
भाजपा के नए निजाम गडकरी के अध्यक्ष बनने के उपरांत कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य और उमाश्री भारती जैसे नेताओं की घर वापसी की बात को जल्दबाजी में दिया बयान ही माना जा रहा है। मजे की बात तो यह है कि गडकरी द्वारा बयानबाजी में की गई इस तरह की पेशकश पर तीनों नेताओं ने कोई प्रतिक्रिया नहीं देकर संकेत दिया है कि उनके मुकाबले नितिन गडकरी अभी काफी जूनियर हैं।
सूबाई राजनीति की उपज नितिन गडकरी अपने कांधों पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी भारी भरकम जवाबदारी का सफलता पूर्वक निर्वाह कर पाएंगे कि नहीं यह बात तो भविष्य के गर्भ में है, किन्तु गडकरी को राष्ट्रीय राजनीति के दांव पेंच और राष्ट्रीय अध्यक्ष की गरिमा मर्यादा के एक एक शब्द को सीखना बहुत जरूरी है, वरना अपरिपक्व राजनेता की तरह अगर उन्होंने दो चार बार ही बयानबाजी कर दी तो भाजपा की दुर्गत होने में देर नहीं लगेगी।
इन सारी दुश्वारियों के अलावा गडकरी के सामने सबसे बडी चुनौति कुछ और ही है। दरअसल पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को गडकरी की अध्यक्ष पद पर ताजपोाशी पसंद नहीं आ पा रही है। पार्टी का एक धडा गोपीनाथ मुंडे को पार्टी की कमान देने को लामबंद था।
महाराष्ट्र के राजनैतिक परिदृश्य में स्व.प्रमोद महाजन के रिश्तेदार गोपीनाथ मुंडे और वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी के बीच अनबन किसी से छिपी नहीं है। पिछले ही साल मुंबई के भाजपाध्यक्ष के चुनाव के दौरान मुंडे और गडकरी का टकराव सडकों पर आ गया था। गडकरी और मुंडे के बीच टकराव टालने के लिए पार्टी के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी ने मुंडे को लोकसभा में सुषमा के स्थान पर पार्टी का उपनेता बना दिया है।
मुंडे सम्मानजनक पद पाकर खामोशी अिख्तयार कर सकते हैं, किन्तु भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार मुंडे की इस पदोन्नति पर खून का घूंट ही पीकर रह गए हैं। लाल कृष्ण आडवाणी के पद तजने के बाद सुषमा स्वराज को उनके स्थान पर बिठाया जाना तय था। इसके साथ ही साथ उपनेता के पद के लिए प्रबल दावेदार भाजपा के इकलौते मुस्लिम सांसद शहनवाज हुसैन, अनंत कुमार और यशवंत सिन्हा थे। इन तीनों को ही निराशा हाथ लगी है। पार्टी अनुशासन के डंडे के चलते खुलकर तो कोई कुछ नहीं कहेगा, किन्तु गडकरी के मार्ग में शूल बोने से कोई चूके इसकी संभावनाएं कम ही हैं।
राजनाथ की टीम के सदस्यों को गडकरी किस तरह एडजेस्ट कर पाएंगे इस बात पर सभी की निगाहें गडी हुुई हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत, भाजपा उपाध्यक्ष गुख्तार अब्बास नकवी, महासचिव विजय गोयल जैसे धुरंधरोे के अलवा पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह आदि के लिए उनके कद के हिसाब से माकूल पद खोजने में गडकरी की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक सकतीं हैं।
वैसे अगर देखा जाए तो निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह को एक भी दिन उनके विरोधियों ने चैन से बैठने नहीं दिया। 7 रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री के अधिकृत आवास) को आशियाना बनाने का सपना मन में संजोए आडवाणी के सिपाहसलारों ने ही राजनाथ को पूरे समय पार्टी की ओर ध्यान केंद्रित करने के बजाए अपनी कुर्सी किस तरह बचाए रखी जाए इस जुगत कें ज्यादा उलझाए रखा था। सुषमा स्वराज ओर वेंकैया नायडू ने तो कुछ समय के लिए राजनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था।
अब प्रधानमंत्री बनने की लालसा भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं के मन में जरूर हिलोरे मार रही होगी। आने वाले समय में उनका प्रयास होगा कि किस तरह वे अपनी अपनी जमीन को मजबूत करने के साथ ही साथ गडकरी को कुर्सी बचाने की कवायद तक ही सीमित रखें।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

बाबा रामदेव और युवराज के बीच गुफ्त गू


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)


बाबा रामदेव और युवराज के बीच गुफ्त गू
स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव और कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के बीच एक घंटे से भी अधिक समय तक विचार विमर्श की जमकर चर्चा हो रही है। दरअसल अपनी विदेश यात्रा के पूर्व बाबा रामदेव ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से भ्ोंट करने की इच्छा जताई। राहुल के राजनैतिक मैनेजरों ने तत्काल इसकी स्वीकृति दे दी। राहुल और बाबा के बीच चर्चा का दौर आरंभ हुआ। पता नहीं कब साठ मिनिट से ज्यादा समय बीत गया, और दोनों को पता ही नहीं चला। राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल बाबा यह जानना चाह रहे थे कि कहीं बाबा रामदेव के मन में उत्तराखण्ड से कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लडने के बलवती इच्छा तो हिलोरें नहीं मार रही है। बताते हैं कि राहुल ने इशारे ही इशारे में बाबा को यह पेशकश दे भी दी। चतुर सुजान बाबा रामदेव ने राहुल के इशारों को समझकर इस पेशकश को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वे फिलहाल राजनीति से दूर ही रहना चाह हैं। उठते उठते बाबा के एक चेले ने बाबा के मन के मर्म को समझा ही दिया। शायद बाबा रामदेव पीछे के रास्ते अर्थात राज्य सभा के माध्यम से संसदीय सौंध तक पहुंचना चाह रहे हों।

किंगमेकर का कम हुआ क्रेज
कल तक राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतू की तरह चमककर किंगमेकर का ताज पहनने वाले केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की लोकप्रियता दिनों दिन कम ही होती जा रही है। इस बार मध्य प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में उनके द्वारा बांटी गई टिकिट और रोड शो के बावजूद भी वे अपने कोटे के एक भी प्रत्याशी को विजयश्री का वरण नहीं करवा सके। देखा जाए तो इंदौर, जबलपुर, के महापौर तथा छिंदवाडा, बालाघाट और सिवनी की नगर पालिका अध्यक्ष की टिकिट कमल नाथ के कोटे की थीं। जबलपुर और इंदौर में उन्होंने बाकायदा रोड शो किया। रही बात छिंदवाडा की तो कहा जाता है कि कमल नाथ की रग रग में बसता है छिंदवाडा। 1980 से लगातार यह उनका संसदीय क्षेत्र रहा है। इस बार उन्होंने अपने कोटे वाले शहरों को एक बार फिर गोद लेने का एलान किया था। लोग यह कहने से नहीं चूके कि कमल नाथ की गोद है अनाथालय। जब मर्जी की ले लिया गोद और फिर उतार फेंका नीचे। इस मर्तबा उन्होंने सिवनी और बालाघाट की ओर रूख करना मुनासिब नहीं समझा, जबकि वे अनेकों बार इन दोनों ही जिलों को गोद ले चुके थे। छिंदवाडा में इस मर्तबा उन्होंने कहा कि छिंदवाडा के विकास की जवाबदारी उनकी ही है, िंछंदवाडा निवासी कहते पाए गए ``मालिक, तीस सालों से आप यहां के जनसेवक हैं, फिर अब कितने और साल लगेंगे विकास करने में।`` फिर क्या था भाजपा ने कांग्रेस को साढे तेरह से अधिक मतों से पछाड दिया।


गांवों में बसता है हृदय प्रदेश
कहा जाता है कि भारत देश की आत्मा गांवों में बसती है। देश का हृदय प्रदेश कहलाने वाला मध्य प्रदेश की आत्मा सबसे अधिक समृद्ध कही जा सकती है। एक अनुमान के मुताबिक देश में लगभग साढे छ: लाख गांव हैं। इन गांवों में महज एक लाख गांव ही हैं मध्य प्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों में। कहा जाता है कि वर्तमान मध्य प्रदेश में गांव, टोले मजरों की संख्या साढे पांच लाख से अधिक है। यह बात चौंकाने वाली जरूर है पर सत्य ही है। इस लिहाज से भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के साठ सालों का कच्चा चिठ्ठा अगर किसी को जानना हो तो वह मध्य प्रदेश के किसी भी छोर पर बसे गांव में जाकर आजादी के छ: दशकों में देश की सरकारों की विकास यात्रा को साफ तौर पर देखकर शासकों और रियाया के बीच बढे अंतर को बेहतर तरीके से देख सकता है। अमूमन सूबे के हर गांव में अधनंगे, भूखे बच्चे, फटे कपडों में किसानों और महिलाओं की दुर्दशा की कहानी ही कह रहा है।


नजदीक आ सकते हैं गांधी बच्चन परिवार

इंदिरा गांधी और हरिवंश राय बच्चन के बीच गहरी दोस्ती को उसके बाद वाली पीढी, राजीव अमिताभ ने बखूबी निभाया। सोनिया की डोली उठाने में बच्चन परिवार की भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। अपने मित्र राजीव गांधी को राजनैतिक पायदान चढने में मदद करने वाले अमिताभ बच्चन इलहाबाद से संसद सदस्य भी रहे। राजीव गांधी की हत्या के बाद अनेक गलत या सही फहमियों के चलते दोनों परिवार में दरार बढती ही चली गई। इसके बाद परस्पर विरोधी बयानबाजियों ने इस खाई को और अधिक बढाया है। हाल ही के घटना क्रमों ने दोनों परिवार की युवा पीढी के गलबहियां डालने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं। दरअसल रूपहले पर्दे के महारथी अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ की बेटी के पेंटिंग शो में अमिताभ की बेटी श्वेता नंदा और राजीव गांधी की पुत्री प्रियंका वढेरा के एक साथ शिरकत करने से अनेक लोग चौंक गए। अब लोग कयास लगा रहे हैं कि समाजवादी नेता अमर सिंह के चंगुल से अगर अमिताभ बाहर आ गए तो निश्चित तौर पर राजनीति के महारथी गांधी नेहरू परिवार और रूपहले पर्दे के सरताज बच्चन परिवार के बीच नजदीकियां बनने में समय नहीं लगेगा।


सिब्बल की चुप्पी का राज
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को मनमोहन सरकार में जबर्दस्त प्रमोशन मिला है। बहुत महत्वहीन विभाग से उन्हें एचआरडी जैसा भारी भरकम विभाग सौंपा गया है, वह भी अर्जुन सिंह जैसे घाघ नेता से छीनकर। सिब्बल कुछ माह पूर्व काफी सक्रिय नजर आ रहे थे, अब उनकी हवा उडी हुई है। छपास की चाहत में कपिल सिब्बल ने न जाने क्या क्या बयान बाजी कर डाली थी। प्रधानमंत्री और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने उनको नसीहत दे डाली। सिब्बल के इर्द गिर्द के लोग अब खुश हैं कि सिब्बल विवादों से दूर हैं। सिब्बल विरोधी अब इस बात की तह में जाने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर राजमाता ने सिब्बल को क्या घुटी पिलाई कि वे एकदम ही खामोश हो गए। कहा जा रहा है कि प्रधानमत्रंी डॉ.मनमोहन सिंह के माध्यम से कांग्रेस अध्यक्ष ने सिब्बल को साफ साफ कह दिया है कि सिब्बल साहेब आपने अपने विभाग का जो सौ दिनी एजेंडा तय किया था यह समय उसे लागू करने का है, सो मीडिया के सामने अपना चेहरा दिखाने के बजाए अब उसे लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी लें।


राजमाता के संदेश की व्याख्या
कांग्रेस में राजनीति सुप्रीम अर्थारिटी के इर्द गिर्द ही सिमटकर रह जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का इशारा या उनकी मंशा ही कार्यकर्ताओं का लाईन ऑफ एक्शन तय करता है। कांग्रेस के मुखपत्र में इस बार सोनिया गांधी ने हरियाणा में कांग्रेस के मुख्यमंत्री को ठीक से चलने की सलाह दे डाली है वह भी परोक्ष तौर पर। कांग्रेस का मुखपत्र हाथ में आते ही मुख्यमंत्री विरोधी ताकतें सर उठाने लगी हैं। सभी अपने अपने तरह से कांग्र्रेसाध्यक्ष के इशारों को परिभाषित कर रहा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं के मन में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने की लालसा एक बार फिर हिलोरे मारने लगी है। केंद्रीय मंत्री सैलजा के करीबी नेताओं के पैर तो जमीन पर ही नहीं पड रहे हैं, उनका मानना है कि चूंकि सैलजा काफी समय से कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के करीब हैं, सो आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री को कोई अन्य जवाबदारी दी जाकर सैलजा को प्रदेश की बागडोर थमाई जा सकती है।


संघ की मितव्ययता!
मंदी की मार में हर कोई कम खर्ची के राग अलाप रहा है। यह राग सिर्फ दिखावे के लिए ही है, इसे अंगीकार करने कोई राजी नहीं है। सादा जीवन उच्च विचार के आदशोZं पर चलने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भी अब विलासिता ने अपनी जगह बना ही ली है। वैसे तो संघ के आला नेताओं को आडंबर और फिजूलखर्ची से नफरत ही रही है। हाल ही में हुए एक वाक्ये ने संघ की कमखर्ची को उजागर कर दिया है। जमशेदपुर से रांची जाने के लिए एक संगठन मंत्री को हेलीकाप्टर के बजाए हवाई जहाज की दरकार हुई, वह भी इसलिए कि जमशेदपुर से रांची का सफर चौपर से 35 मिनिट तो हवाई जहाज में महज 20 मिनिट में ही तय हो जाता है। सच ही है कि प्रचारकों के ``बहुमूल्य 15 मिनिट`` बचाने के लिए क्या भारतीय जनता पार्टी द्वारा तीन लाख रूपए खर्च नहीं किए जा सकते हैं। संघ में इस तरह के आडम्बर और दिखावे के आने से आने वाले दिनों में संघ अगर अपने मूल पथ से भटक जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


राजनीति के टोटके
राजनेता अपनी कुर्सी बचाने और सर्वशक्तिमान बनने के चक्कर में साधू बाबा या औघड के चक्कर काटते ही रहते हैं। हाल ही में कं्रदीय संचार मंत्री जो कि स्पेक्ट्रम विवाद में बुरी तरह घिर गए हैं, ने एक अंकज्योतिष की सलाह पर अपने आवास का नंबर ही बदल दिया है। राजा को मोतीलाल नेहरू मार्ग पर 2 नंबर की कोटी आवंटित है। इस कोठी का नंबर बदलकर उन्होने 2 ए कर लिया है। यद्यपि आधिकारिक तौर पर अभी यह नहीं किया गया है, पर राजा तो राजा ठहरे उन्होने कोठी पर 2 के आगे ए भी पुतवा दिया है। राजा के करीबी कहते हैं कि अंक ज्योतिषी और वास्तुविदों की सलाह पर राजा ने यह कदम उठाया है। इस परिवर्तन के बाद आने वाले समय में राजा के सर से विवादों का साया उठ ही जाएगा। राजा निर्विवाद रह पाएंगे या नहीं यह तो समय ही बताएगा किन्तु राजा पर छाए इस संकट ने अंक ज्योतिषियों और वास्तुविदों की जेबें जरूर गरम कर दी हैं।


चिदम्बरम की निगाहें 7 रेसकोर्स पर!
अगली बार डॉ.मनमोहन सिंह के बजाए पी.चिदम्बरम पर प्रधानमंत्री बतौर दांव लगाया जा सकता है। इस तरह की चर्चाएं सियासी गलियारों में चल पडी हैं। दरअसल मंत्रिमण्डल पर कमजोर पकड के चलते मन मोहन सिंह से खुश नहीं हैं कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनकी किचिन केबनेट। बताते हैं चिदम्बरम समर्थकों द्वारा यह बात राजनैतिक फिजां में उतारी जा रही है कि अगर सोनिया गांधी की तर्ज पर अगली बार कांग्रेस के युवराज राहुल गाध्ंाी द्वारा प्रधानमंत्री पद का त्याग कर सत्ता की चाबी अपने हाथों में रखी जाती है तो 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) मनमोहन के बजाए पी.चिदम्बरम ही रहेंगे। प्रणव मुखर्जी की ढलती उमर के चलते कांग्रेस के शीर्ष नेता उन पर शायद ही दांव लगाएं यह बात भी जोर शोर से राजनैतिक बियावान में उछाली जा रही है। चूंकि प्रणव के बाद ए.के.अंटोनी ही सोनिया की पसंद हो सकते हैं, अत: चिदम्बरम के अनुयायी अब अंटोनी की काट खोजने में व्यस्त हो गए हैं।


इस तरह लगी गडकरी के नाम पर अंतिम मुहर
भाजपा का नया अध्यक्ष कौन होगा इस पर रायशुमारी लंबी चली। इसी बीच नितिन गडकरी का नाम चर्चाओं में आया। गडकरी में आखिर एसे कौन से सुरखाब के पर लगे हुए थे, कि संघ उनका मुरीद हो गया था। अंत में संघ ने गडकरी के नाम पर ही अंतिम मोहर लगा दी, और गडकरी के हाथों देश में भाजपा की कमान सौंप दी गई। मीडिया भाजपा के अंदरखाने में इस बात को तलाश कर रही है कि आखिर गडकरी को ही क्यों चुना गया अध्यक्ष पद हेतु। बताते हैं कि राजग के पीएम इन वेटिंग की बुरी हालत को देखकर संघ बुरी तरह आहत था। संघ की मंशा थी कि भाजपा की कमान उसे ही सौंपी जाए जो प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब कम से कम अपने मन में न पाले। संघ की इस मंशा को सिर्फ गडकरी ने ही भांपा और संघ के आला नेताओं को कह भिजवाया कि वे देश के प्रधानमंत्री बनने में कतई इच्छुक नहीं हैं। फिर क्या था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लगा दी गडकरी के नाम पर आखिरी मुहर।


शापिंग के शौकीन हैं बनर्जी साहेब
खडगपुर से बीटेक की उपाधि प्राप्त श्रीकुमार बनर्जी ने देश के शीर्ष परमाणु संस्थान परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है। स्कूल में अध्ययन के दौरान फुटबाल के शौकीन रहे बनर्जी की एक किताब फेज ट्रांसफार्मेशन्स : एक्जाम्पल्स फ्राम टाइटेनियम एण्ड जिंकोZनियम अलॉयज नामक चर्चित किताब लंदन में छप चुकी है। उनके तीन सौ से ज्यादा आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुके हैं। वैसे बनर्जी की जडें गहराई तक गांवों में जुडी हुई हैं। उन्हें देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल ही है कि उन्हें अपने काम में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का सम्मान भी मिल चुका होगा। कम ही लोग जानते हैं कि बनर्जी साहेब को शापिंग का जबर्दस्त शौक है।


अहमद का रेलगाडी प्रेम
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में एक दशक से कब्जा जमाए बैठे स्वयंभू चाणक्य अहमद पटेल और भारतीय रेल के बीच क्या रिश्ता है। जी हां जनाब दोनों ही के बीच बडा ही गहरा रिश्ता है। 17 साल पहले जब बाबरी विध्वंस हुआ था उस वक्त अहमद पटेल रेल में यात्रा कर रहे थे, और इस बार 6 दिसंबर को वे हज यात्रा पर थे। विवादस्पद मुद्दों से कन्नी काटना अहमद पटेल का शगल रहा है। वैसे कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह का वजन हल्का कर उन्हें मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाने में अहमद पटेल ने खासी भूमिका निभाई है। लोकसभा चुनावों में सिंह के वर्चस्व वाले विन्ध्य में उनकी पुत्री वीणा निर्दलीय तौर पर मैदान में थीं, उस समय कांग्रेस के प्रचार के लिए अर्जुन सिंह को सीधी जाना था, पर उनके लिए तय किए विमान में महोदय ने गुजरात की खाक छानी, मजबूरी में सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से यात्रा करनी पडी।


पुच्छल तारा
पटना से अमितेश कुमार ने मेल किया है कि दीवार में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की दमदार अदाकारी आज भी लोगों को याद है। पुल के नीचे दोनों के बीच संवाद आज प्रोढ हो रही पीढी के मानस पटल से विस्मृत नहीं हुए होंगे, जिसमें शशि कपूर ने वजनदारी के साथ कहा था -``मेरे पास मां है।`` सदी के महानायक को इसका जवाब ढूंदने में लगभग तीस साल लग गए आज अमिताभ बच्चन गर्व से कह सकते हैं :- रवि (शशि कपूर), तेरे पास मां है, तो मेरे पास ``पा`` है।

रविवार, 20 दिसंबर 2009


धसके किले की कमान गडकरी को
(लिमटी खरे)


भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी महाराष्ट्र प्रदेश के हैं। मराठी में गडकरी का मतलब किले या दुर्ग की रक्षा करने वाला होता है। गडकरी को भाजपा के ढहे दुर्ग की रक्षा का काम सौंपा गया है। आज भाजपा के किले में सर्वाधिक मरम्मत की दरकार है। कई हिस्से इससे टूटकर दूर चले गए हैं। इन परिस्थितियों में गडकरी की जिम्मेदारी और जवाबदारी कहीं ज्याद बढ चुकी है।
27 मई 1957 को नागपुर में जन्मे गडकरी को संघपुत्र माना जाता है। भाजपा शिवसेना गठबंधन में लोक कर्म जैसे विभाग के मंत्री रहे गडकरी का नाम अनेक सफल प्रयोगों के लिए जाना जाता है। इसके पहले वे सूबे में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहे हैं। 2004 से अब तक वे सूबे की भाजपा इकाई के प्रमुख रहे हैं। गौरतलब होगा कि जुम्मे के रोज ही गडकरी ने अपनी शादी की सालगिरह मनाई और शनिवार को पार्टी ने उन्हें देश का अध्यक्ष बनाकर एक तोहफा दिया है।
वैसे गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर संघ ने यह संदेश दे दिया है कि अब भाजपा की सियासत मराठा ही चलाएगा। वैसे भी संघ में मराठा क्षत्रपों का खासा बोलबाला है। संघ का मुख्यालय भी नागपुर में ही है। अब तक के भाजपा के निजामों की प्रधानमंत्री बनने की चाहत के चलते लगातार रसातल की ओर जा रही भाजपा को नए निजाम संघ की मदद से कहां पहुंचाते हैं यह तो समय ही बताएगा, किन्तु अब संघ और भाजपा के बीच तालमेल काफी हद तक होने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।
महाराष्ट्र सूबे में गडकरी का नाम जाना पहचाना हो सकता है किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर यह एक नया नाम ही है। देश के अनेक सूबों में गडकरी के नाम को लोग आसानी से पचा लें एसा संभव प्रतीत नहीं होता है। संघ ने नितिन गडकरी के अपेक्षाकृत युवा कांधों पर कांटो भरा ताज रख दिया है। अनेक धडों में बंटी भाजपा को मझधार से निकालना गडकरी के सामने सबसे बडी चुनौति ही होगा।
एक तरफ गडकरी को राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी को साधना है, तो दूसरी तरफ अरूण जेतली, अरूण शोरी, सुषमा स्वराज जैसी शिख्सयतों के बीच तालमेल बिठाना होगा। कुल मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर अनजान चेहरे के रूप में उभरे गडकरी को बत्तीस दांतों के बीच जीभ के मानिंद ही रहना होगा।
वैसे नितिन गडकरी में खासियतों का अकूत भण्डार है। वे खुले स्वभाव वाले अच्छे किस्म के वक्ता हैं। उनका व्यक्तित्व अब तक पारदशीZ ही माना जा सकता है। सूबे के उनके इतिहास को देखकर कहा जा सकता है कि संगठन चलाने के मामले में वे काफी हद तक सक्षम माने जा सकते हैं।
गडकरी के करीबी बताते हैं कि उनकी डिक्शनरी में असंभव शब्द का शुमार कहीं नहीं मिलता है। उनकी कल्पना शीलता गजब की मानी जा सकती है। वे खुद पर गजब का भरोसा करते हैं साथ ही उंचे ओहदे पर पहुंचने के बावजूद भी वे सदा ही अपने पैर जमीन पर ही रखते हैं। पिछले चुनावों में वे स्कूटर पर बैठकर ही वोट डालने निकल पडे थे।
दूसरी तरफ गडकरी की कमजोरियां उनकी सफलता के मार्ग में शूल बोने का ही काम करेंगी। नितिन गडकरी के सामने सबसे बडा संकट यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता बहुत कम ही है। गडकरी का आक्रमक रवैया और गलत सलत भाषा का इस्तेमाल उनके लिए घातक ही साबित हो सकता है।
उनके भोलेपन और खुले स्वभाव का लोगों के द्वारा जबर्दस्त तरीके से फायदा उठाया गया है। भविष्य में यही बात उनके लिए ऋणात्मक पहलू के तौर पर सामने आ सकती है। वे बहुत ज्यादा प्रयोगवादी माने जाते हैं, एसी स्थिति में संघ और उनके बीच टकराहट होने में समय नहीं लगेगा। इसके साथ ही साथ गडकरी अपने आभामण्डल के कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सम्मान नहीं देते हैं, जिससे उनकी छवि लोगों में नकारात्मक बनने में देर नहीं लगेगी।
आने वाले समय में गडकरी की अग्नि परीक्षा होने वाली है। तीन सालों मेें देश के दस राज्यों में चुनाव होने हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी, ताकि वे सर्वस्वीकार्य हो सकें। भले ही गडकरी संघ की सहमति से आए हों पर उनकी सफलता और विफलता कहीं न कहीं संघ और भाजपा के रिश्तों पर असर डालेगी। उन्हें भाजपा से ज्यादा अभी खुद की पहचान बनाने का काम करना होगा।
चूंकि भाजपा के नए निजाम ने अब तक महज एक सूबे के अंदर ही काम किया है अत: उनके अनुयाईयों की तादाद शेष भारत में कम ही है। अब उनके अध्यक्ष बनने के बाद उनसे जुडने वालों में अच्छे और बुरे की पहचान गडकरी के सामने सबसे बडी चुनौती ही होगी।
अपने महज दस मिनिट के उद्बोधन में गडकरी ने दर्जन भर से ज्यादा बार आडवाणी का नाम लिया है। माना जा रहा है कि गडकरी अब संघ से ज्यादा आडवाणी का आशीZवाद चाह रहे हैं। कहा जाता है कि आदमी के इर्द गिर्द रहने वाले ही उसे महान या असफल बनाते हैं। इस लिहाज से गडकरी का औरा ही तय करेगा कि वे भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष के तौर पर सफल रहते हैं या फिर संघ की आशाओं पर तुषारापात ही करते हैं।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

इतिहास लिखने की तैयारी में गुजरात


इतिहास लिखने की तैयारी में गुजरात
(लिमटी खरे)

मामला चाहे हिन्दुत्व का हो या शराबबंदी का, हर पहलू पर गौर फरमाने के बाद गुजरात के सूबेदार नरेंद्र मोदी ने अलग कदम ही उठाए हैं। जिसके कारण वे सदा ही चर्चाओं में रहे हैं। अब गुजरात में वोट डालना अनिवार्य करने की कवायद की जा रही है, विधानसभा में अगर विधेयक पारित हो गया तो देश के इतिहास में गुजरात देश का पहला राज्य होगा जहां मतदान न करने पर सजा का प्रावधान किया जा रहा हो।
वैसे दुनिया के अनेक देश एसे हैं जहां जनसेवक चुनने के लिए मतदाताओं को जनादेश देना अनिवार्य किया गया है। इसके लिए भले ही वह मतदान न करे पर मतदान केंद्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना होता है। कुछ देशों में नकारात्मक मतदान की व्यवस्था भी है, जिसके मुताबिक मतदाता को किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं देने का विकल्प भी दिया जाता है। मतदान न करने या मतदान केंद्र में उपस्थित न होने के लिए मतदाता को पर्याप्त कारण देना होता है। अगर संतोषजनक कारण न प्रस्तुत किया जाए तो मतदाता को जुर्माना या कम्युनिटी सर्विस (सामुदायिक सेवा) करनी होती है। जुर्माना अथवा कम्युनिटी सर्विस न करने की दशा में मतदाता को सजा का प्रावधान भी है।
दक्षिण आफ्रीका, अर्जेंटीना, स्विटजरलेंड, इटली, यूनान, आस्ट्रिया, ब्राजील, कांगो, फिजी, मेिक्सको, बेिल्जयम, तुकीZ आदि देशों में मतदान को अनिवार्य किया गया है। मिस्त्र में मतदान अनिवार्य है, किन्तु यह अनिवार्यता केवल पुरूषों के लिए ही सीमित है। आस्ट्रिया में मतदान करें या न करें पर मतदान स्थल पर हाजिरी अनिवार्य है। यहां 20 से 50 डालर का जुर्माना देना पडता है अगर मतदाता मतदान केंद्र न पहुंचे तब।

यूनान में मतदान न करने पर चालक अनुज्ञा और पासपोर्ट नहीं बनाया जाता है। इतना ही नहीं बेिल्जयम में चार चुनाव लगातार वोट न देने पर 10 साल के लिए मताधिकार से वंचित रहना पडता है। बोलविया में मतदान करने पर एक कार्ड प्रदान किया जाता है। चुनाव के तीन माह बीतने की अवधि तक अगर मतदाता उक्त कार्ड नहीं दिखाता है तो उसके बैंक से सारे ट्रजेक्शन्स रोक दिए जाते हैं।
गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अगले साल होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का अनुकरणीय फैसला किया है। इसके लिए आहूत विधानसभा सत्र में गुजरात सत्तामण्डल संशोधन विधेयक 2009 लाया जा रहा है। यदि विधेयक पारित हो गया तो सूबे के 3 करोड 64 लाख से अधिक मतदाताअों को स्थानीय निकाय चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग करना ही होगा।
मोदी सरकार ने वोट न देने की स्थिति में मतदाता को डिफाल्टर घोषित कर दिया जाएगा, और इस तरह का मतदाता सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रखा जाएगा। मतदान न करने वाले मतदाता से 30 दिनों के अंदर जवाब मांगा जाएगा। जवाब संतोषजनक न होने की स्थिति में मतदाता को डिफाल्टर घोषित कर दिया जाएगा। इस विधेयक में नेगेटिव वोटिंग अर्थात किसी भी प्रत्याशी को मत नहीं देने का विकल्प भी रख गया है।
गौरतलब होगा कि इसी साल अप्रेल में देश के सर्वोच्च न्यायलय ने महाराष्ट्र सूबे के अतुल सरोदे द्वारा मतदान अनिवार्य करने संबंधी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया गया था। देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि कानून के सहारे मतदाता को मतदान केंद्र तक नहीं ले जाया जा सकता। मतदान मतदाता का स्वविवेक का अधिकार है। सरकार को चाहिए कि मतदान के प्रति जागरूकता पैदा करे। इसे कानून की बंदिश में नहीं बांधा जा सकता है।

वैसे देखा जाए तो देश में अमूमन पचास से साठ फीसदी लोग ही मतदान का प्रयोग करते हैं। आम तौर पर पढे लिखे शहरी मतदाताओं का मतदान के प्रति कम ही रूझान देखने को मिलता है। इसका कारण राजनैतिक तौर पर व्याप्त गंदगी ही है। आम शहरी मतदाता भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के साथ मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों से आजिज आ चुका है। यही कारण है कि वह मतदान के प्रति अरूचि ही दर्शाता है।
वहीं दूसरी ओर शहरों के इर्द गिर्द बसे मजरे टोले और ग्रामीण अंचलों में मतदान के प्रति काफी अधिक रूझान देखा जाता है। एक अनुमान के अनुसार मतदाताओं को प्रलोभित करने के लिए बांटे जाने वाले कंबल, साईकिल, शराब और नकद राशि के बोझ में दबकर इस वर्ग के लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र में संपन्न विधानसभा चुनावों में तो पांच पांच सौ के नकली नोटों की रिश्वत देकर असली वोट लेने का मामला भी प्रकाश में आया है।
यह बात सच है कि मतदान के जरिए ही मतदाता अपनी किस्मत लिखता है और भविष्य की बागडोर ``जनसेवक`` के हाथों में सौंपता है। जनसेवक अगर ठीक नहीं है तो क्षेत्र के विकास पर ग्रहण लगना सुनिश्चित ही है। केंद्र सरकार को चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तर्ज पर अनिवार्य मतदान के लिए देशव्यापी बहस चलाकर लोगों का मत जाने, और अगर इसके सकारात्मक परिणाम सामने दिखाई दें तो मतदान को अनिवार्य बनाने की दिशा में प्रभावी पहल करे।
हमारा मानना है कि अगर मतदान को अनिवार्य कर दिया गया तो मतदाता को प्रलोभन देने के मामलों में गिरावट सुनिश्चित है, क्योंकि तब उम्मीदवार को इस बात का खतरा अधिक रहेगा कि सौ फीसदी लोग तो उसके प्रलोभन में नहीं आ सकते। वर्तमान में साठ फीसदी मतदान होने के अनुमान पर पच्चीस फीसदी लोगों को ही साधकर उम्मीदवार अपने विजय के मार्ग प्रशस्त कर लेता है।
यह बात भी सच है कि मतदान को अनिवार्य करने के मार्ग में व्यवहारिक कठिनाईयां बहुत ज्यादा हैं। इसके लिए जुर्माना वसूलने या सजा देने के काम के लिए एक अलग अमले को तैनात करना होगा। देखा जाए तो भारत देश के नागरिक के लिए मतदान ``कर्तव्य`` के बजाए ``अधिकार`` के रूप में अधिक देखा जाता है।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

जाति प्रथा की मजबूत जंजीरें

जाति प्रथा की मजबूत जंजीरें
किस जाति के हैं हम
जातिवाद की आग में झुलस सकता है देश
(लिमटी खरे)

मुगलों और अंग्रेजों के आक्रमण के बाद आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा समय बीत चुका है किन्तु देश से जाति के नाम पर वेमनस्य कम होता नहीं दिख रहा है। वोटबैंक सहेजे रखने की खातिर जनसेवकों द्वारा अगडी और पिछडी जातियों के बीच की खाई को पाटने के बजाए बढाने का ही काम किया जाता रहा है।
जातिवाद के नाम पर घुलने वाले जहर में उंची और नीची जाति के अलावा और भी अनेक शाखाएं हैं जो ``मानव जाति`` को ही बांटने के मार्ग प्रशस्त करती नजर आती हैं। कहने को तो ``हिन्दु, मुस्लिम, सिख्ख, इसाई, आपस में हैं भाई भाई`` के नारे सियासी दलों द्वारा बुलंद किए जाते हैं पर जब वोट बैंक की बात आती है, तब इस नारे को भुलाकर निहित स्वार्थों की बात ही की जाती है।
जातिवाद के नाम पर संघर्ष के नाम से पहचाने जाने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में तीस साल पहले अगडी जाति के लोगों द्वारा आठ दलितों की हत्या के ममाले में सजा सुनाते हुए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया है कि देश से जाति प्रथा को समाप्त कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट का सुझाव स्वागत योग्य है, किन्तु इस पर अमल जरा मुश्किल प्रतीत होता है। सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव पर अमल कर केंद्र सरकार इस बारे में कानून बनाएगी यह संभव प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि एसा करने से उनके वोट बैंक पर धक्का लग सकता है।

आम शहरी आदमी इस जातिवाद जैसी कुप्रथा से मुक्ति का हिमायती दिखता है। वहीं दूसरी ओर गांव पूरी तरह से इस कुप्रथा के शिकंजे में है। राजनीति की शह पर जातिवाद का यह केंसर अब नासूर बन चुका है। गुजरात में ही 29 गांवों में दलितों को सामाजिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है। सरकार ने भी यहां के 12 गांवों को अत्याचार की आशंका की श्रेणी में रख छोडा है।
मध्य प्रदेश में जाति के आधार पर सियासत करने वालों की कमी नहीं हैं। विन्ध्य में जहां ठाकुरों का बोलबाला है तो चंबल में गूजर, ठाकुर और ब्राम्हण हावी हैं। कहीं भी किसी भी सूबे में दलितों को आगे नहीं लाया गया है, यही कारण है कि दलित समाज में इसी भावना को कुरेदकर नक्सलवादी, अलगाववादी अपने अपने सम्राज्य का विस्तार करते जा रहे हैं।
जातिगत भेदभाव और अत्याचार के लिए मौजूदा कानून का प्रयोग भी बहुत सख्ती के साथ नहीं किया जाता है। वैसे इसके दुरूपयोग की संभावनाएं ज्यादा ही नजर आतीं हैं। सालों से सेठ साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे निम्न वर्ग के लोगों को अपने प्रतिद्वंदी और विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल से नहीं चूकते ये महाजनी करने वाले लोग। रही सही कसर जनसेवकों के प्रश्रय के कारण इन कानूनों के तहत फर्जी प्रकरण दर्ज कर पूरी करवा दी जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस अनुकरणीय सुझाव का तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। साथ ही सरकार को चाहिए कि इस विषय पर जनजागरण की अलख बहुत लंबे समय तक जगाए। सामान्य वर्ग के लोगों को भी चाहिए कि जाति के आधार पर राजनीति करने वाले राजनेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार करें।
विडम्बना ही कही जाएगी कि आजादी के बासठ सालों के बाद भी भारत में जाति सूचक उपनाम (सरनेम) आज भी हावी है। जाति का जहर आज इस कदर देशवासियों की रगों में भर दिया गया है कि अंतरजातीय विवाह होने की दशा में मरने मारने की नौबत आ जाती है। हरियाणा में ही अंतरजातीय विवाह के उपरांत खाप पंचायतों द्वारा युवक युवती को जान से मार देने के उदहारण भी सरकारों की तंद्रा भंग करने के लिए नाकाफी कहे जा सकते हैं।
जातिगत अत्याचार की कहानी पूर्व संसद सदस्य फूलन देवी से बढकर कोई नहीं थी। फूलन के साथ जो कुछ हुआ था वह किसी से छिपा नहीं था। बदला लेने के लिए उसने हिंसा का रास्ता अिख्तयार किया था। आज समाज में न जाने कितने अक्षम लोग होंगे जो इस तरह के अत्याचार को सहने के लिए मजबूर होंगे। मध्य प्रदेश के छिंदवाडा जिले के कोयलांचल में कर्ज में डूबे कर्मचारी यौन यातनाएं तक भोगने को मजबूर हैं।
बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के साथ यह बाध्यता है कि वह हर दिशा निर्देश भारत के संविधान के दायरे में रहकर ही देता है। केंद्र सरकार को चाहिए कि कम से कम इस मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव पर अमल करते हुए देश को जाति विहिन बनाने की दिशा में पहल सुनिश्चित करे, वरना आने वाले समय में अलगाववाद, आतंकवाद, नक्सलवाद की आग में सुलग रहे देश में जातिवाद का नया विस्फोट होते देर नहीं लगेगी, जिसे संभालना देश के निजामों के लिए बहुत दुष्कर ही साबित होगा।

और भी हैं बदनाम खि‍लाड़ी

एडविन
महज़ 21 साल की उम्र में ही गोल्फि की दुनिया में धमाकेदार आगाज़ करने वाले टाइगर वुड्स इन दिनों सुर्खि़यों में है। दरअसल वुड्स इस वक्तक अपने सबसे खराब दौर से गुज़र रहे हैं। कई महिलाओं से जिस्मासनी ताल्लुसक़ रखने की बात सामने आने के बाद से लगता है वुडस पर हर तरफ से मुसीबतों का पहाड़ टूट पडा़ हैं । अपनी पत्नी एलिन से तलाक़ की धमकी से डरे वुड्स ने अब गोल्फ को ही छोड़ने का मन बना लिया है। लेकिन अगर इस तरह के आरोपों में खिलाड़ियों के लिप्त होने की बात की जाए तो इसमें कई नामी-गिरामी चेहरों का नाम सामने आता है। इस लि‍स्टो में सबसे ऊपर नाम आता है ऑस्र् मलियाई ‍क्रि‍केट पूर्व स्पिनर शेन वार्न का । वॉर्न पर एक लेखक ने अपनी किताब में 1000 महिलाओं से नाजायज़ संबंध होने का दावा किया था जिनमें से कई तो सही साबित भी हुए। इसके अलावा भी इस पूर्व करिश्माेई लेग स्पिनर पर कई महिलाओं ने अश्लीसल एसएमएस भेजने का भी आरोप लगाया था। इन्हीं आरोपों से तंग आकर वार्न की पत्नीा उनसे अलग हो गई थी। वैसे जब बात क्रि‍केट के गलियारों से निकली है तो इसमें और भी कई नाम ऐसे शामिल हैं जिनकी ऐसे ही आरोपों में काफी फज़ीहत हुई थी। मसलन सिंगापुर दौरे पर खेलने गई पाकि‍स्तामनी टीम के मौजूदा टी-20 कप्ता न शाहिद अफरीदी और उनके दो साथि‍यों पर एक सेक्स स्कैं्डल में शामिल होने की बात सामने आई थी इस पूरे वाक्येप से पाक बोर्ड खा़सा नाराज़ हुआ था और उसने पूरे मामले की जांच के आदेश तक दे दिये थे। वहीं साउथ अफ्रीका के तेज़ गेंदबाज़ मखाया एंटीनी पर भी बलात्का र का आरोप लग चुका है। इसके अलावा फुटबॉल के नामचीन सितारे डेविड बेक़हम पर भी कई औरतों और वेश्यााओं से नाजायज़ संबंध रखने की बात आ चुकी है। वहीं मुक्के बाजी़ में अपने बिगडै़ल रवैये की वज़ह से खास बदनाम रहने वाले माइक टायसन तो बलात्काीर के ज़ुर्म में हवालात तक का सफ़र तय कर चुके हैं। ये तो कुछ खास लोगों के ही नाम हैं लेकिन इस फ़हरिस्ता में अभी और भी नाम शामिल हैं जिन पर यदाकदा ही सही लेकिन इस तरह के आरोप लगते रहे हैं। बहरहाल, तमाम इल्ज़ातम लगने के बाद भी इन सभी खिलाड़ियों का कैरियर पहले की तरह ही आराम से चलता रहा। लेकिन अपने नाम अब तक 84 ‍ख़िताब दर्ज़ कर चुके इस पहले नंबर के खि‍लाडी़ को अपने खेल से ही दूर जाना पड़ रहा है। गौरतलब है कि वुडस की पत्नी ने गोल्फक से दूर जाने की शर्त पर ही साथ रहने को राजी हुई है। अब जबकि ये मसला जगजाहि‍र हो चुका है और वुडस ने इस पर सबसे माफी भी मांग ली है तो ऐसे नाजु़क वक्तल में उनकी पत्नीड को उनका साथ देना चाहिए और उनके बर्बाद होते कैरियर को सहारा देना चाहिए। अमेरिका के पूर्व राष्र्त पति बिल क्लिंटन पर मोनिका ने बलात्काार का आरोप लगाया था तो क्लिंटन की पत्नीर और मौजूदा अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन अपने पति के साथ खडी़ दिखाई दी थी। फि‍लहाल अब देखना है परिवारि‍क ‍ज़ि‍म्मेददारी निभाने के लिए गोल्फन को अलविदा कहने वाले वूडस कब तक लौटते है और लौटकर भी आते है तो उनका लय बरकरार रहता है या वक्तभ के साथ उसमें भी ज़ंग लग जाता है। ये ऐसे कई सवाल हैं जो खेलप्रेमियों के जे़हन में उमड़ रहें हैं ।