बुधवार, 6 जनवरी 2010

इस पर भी तो कुछ फरमाईए चिदम्बरम जी


इस पर भी तो कुछ फरमाईए चिदम्बरम जी


(लिमटी खरे)


देश के ताकतवर गृह मंत्री होकर उभरे पलनियप्पम चिदम्बरम के माथे पर मेघालय पुलिस ने कालिख पोतने का दुस्साहस किया है। लालकिले में सन 2000 में हुए बम विस्फोट के हमलावरों रज्जाक, रफाकत अली और सादिक के बीते दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से भागने की बात को सहजता से नहीं लिया जा सकता है। भले ही विदेशाी क्षेत्रीया पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) और दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा अपनी अपनी खाल बचाने का प्रयास कर रही हों पर गणतंत्र दिवस के चंद दिन पहले घटी यह घटना सामान्य कतई नहीं मानी जा सकती है। पुलिस अभिरक्षा से फरार होकर आतंकवादियों ने भारत द्वारा आतंकवाद से निपटने के उच्च स्तर के दावों की हवा वैसे भी निकल जाती है।


मामले की नजाकत इसलिए भी बढ जाती है, क्योंकि भागने वाले चोर उचक्के या उठाईगीरे नहीं वरन आतंकवादी थे। इन तीनों को वर्ष 2000 में लालकिले के पास हुए सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में हौजखास से गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से लगभग 15 किलो आरडीएक्स और 50 किलो हेरोईन बरामद की गई थी। अदालत ने इन तीनों आतंकवादियों को इस मामले में पांच साल की सजा सुनाई थी। चूंकि स्पेशल ब्रांच ने इनकी सजा पूरी होने पर एक आदेश जारी कर इनके बाहर घूमने फिरने पर पाबंदी लगा दी थी अत: सजा पूरी होने पर इन्हें एफआरआरओ द्वारा संचालित किए जाने वाले लामपुर स्थित सेवाधाम (डिर्पोटेशन होम) भेज दिया गया था। साथ ही साथ सेवाधाम की चौकसी का जिम्मा डीएपी की पहली वाहिनी (फस्र्ट बटालियन) का है और यहां देश की विभिन्न बटालियनों से जवान और अधिकारी तैनात होते हैं अत: मेघालय के उपनिरीक्षक को भी इसी कारण यहां तैनाती मिली थी।


इन तीनों की सजा पूरी हो चुकी थी। इन आतंकवादियों को चंद औपचारिकताओं के उपरांत पाकिस्तान के लिए रवानगी डालनी थी। जब इनकी सजा पूरी हो ही चुकी थी तब इन्होंने पुलिस को कथित तौर पर चकमा देने का जोखिम क्यों उठाया। जाहिर है कि इन तीनों के मन में किसी न किसी बडे षणयंत्र का तनाबाना बुना जा रहा होगा। ये बेहतर तरीके से जानते होंगे कि अगर ये पकडे गए तो इनकी सजा में इजाफा ही होने वाला है।

पूरा का पूरा घटनाक्रम जिस तरीके से पुलिस ने पेश किया है उससे आम आदमी के जेहन में हजारों सवालों का अनायास घुमडना स्वाभाविक ही है। इन तीनों आतंकवादियों की आंखों में एक साथ कौन सी बीमारी हो गई कि एक ही दिन तीनों को आई टेस्ट के लिए आना पडा। इसके बाद ``केदी`` को चांदनी चौक के साईकिल मार्केट के एक रेस्तरां ``अम्बर रेस्टॉरेन्ट`` में खाना क्यों खिलाया गया। खाने का भोगमान (बिल) किसने भोगा। क्या खाना खिलाने ले जाते वक्त इन आतंकवादियों के हाथों में हथकडी नहीं थी। डिर्पोटेशन होम के पास के एक पीसीओ से इन आतंकवादियों ने पाकिस्तान फोन भी किए बताए जा रहे हैं।


इतना ही नहीं इनकी फरारी के बाद उप निरीक्षक ने तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम को क्यों इत्तला नहीं की। सजा काट रहे कैदियों को जरूरत पडने पर लाने ले जाने के लिए निर्धारित नियमों की अनदेखी क्यों की गई। पुलिस ने आतंकवादियों का दस साल पुराना चित्र आखिर किस कारण से जारी किया। सबसे अहम सवाल तो यह है कि एक उपनिरीक्षक के साथ तीन खूंखार आतंकवादी जेल के बाहर चले जाते हैं, बिना पुलिस बल के, तब पुलिस की स्पेशल सेल किस पर नजर रखकर किसकी निगरानी कर रही थी। इसी बीच एक बुर्के वाली महिला का जिकर भी आया है, जो सेवाधाम में रज्जाक से मिलने आई थी। जब सेवा धाम में रखे लोगों से मिलने की किसी को इजाजत नहीं तो फिर यह महिला किन नियमों को शिथिल कर रज्जाक से बतिया कर गई थी।


पुलिस अभिरक्षा के दर्मयान भागने के दौरान जो परिस्थितियां थीं, उससे लगता है कि कहीं सोचे समझे षणयंत्र के तहत तो इन्हें आजाद नहीं किया गया है। विडम्बना ही कही जाएगी कि इतने खूंखार आतंकवादियों के इलाज के लिए अस्पताल जाने के दरम्यान मेघालय पुलिस की इंडियन रिजर्व बटालियन का महज एक उप निरीक्षक डिनोमोनी सिंह ही तैनात था। क्या भारत की पुलिस में इस तरह के `मिट्टी के माधव`` शोभा की सुपारी बनने के लिए भर्ती किए गए हैं।

अमूमन जिनकी सजा पूरी हो जाती है उनके बारे में सजा पूरी होने के लगभग चार माह पहले ही दिल्ली पुलिस की विशेषा शाखा और एफआरआरओ को दे दी जाती है। इस अवधि में औपचारिकताएं भी लगभग पूरी कर ही ली जाती हैं, ताकि अंतिम समय में कोई समस्या सामने न आए। इस मामले में भी कमोबेश यही हुआ होगा। स्वास्थ्य कारणों को ही अगर आधार बनाया जाए तब भी अगर सुरक्षा तंत्र इस कदर लापरवाही बरतेगा तो देश के आम आदमी का तो जीना ही मुहाल हो जाएगा।


सजा के अंतिम पडाव में अगर इन आतंकवादियों ने भागने का जोखम उठाया है तो इस आशंका को निर्मूल नहीं माना जा सकता है कि इनके मन में देश में फिर कहर बरपाने का कोई प्लान हो। जब सुरक्षा तंत्र इतना लापरवाह है तो जेल में इनके आका आकर इन्हें दिशा निर्देश देते रहे हों तो कोई बडी बात नहीं है। फिल्मों में इस तरह की कहानियां दिखाई जाती हैं जिनमें जेल के अंदर बंद रहने के बाद भी योजना का खाका तैयार किया जाता है फिर निर्धारित दिन उसे मूर्तरूप दिया जाता है।

अब जाकर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल हरकत में आई है और जहां ये आतंकवादी बंद थे, उन जेल और लामपुर के सेवासदन के पिछले दो सालों के रिकार्ड खंगाल रही है। अगर समय रहते हर पखवाडे में देश में जहां जहां भी देशद्रोही आतंकवादी बंद हैं, वहां वहां के रिकार्ड पर नजर रखी जाती तो पुलिस को इस तरह की परिस्थिति से दो चार नहीं होना पडता।


आंकडे बताते हैं कि देश की सबसे बडी तिहाड जेल में कुल 11 हजार तीन सौ कैदियों में से 102 आतंकवादी हैं। इनमें खूंखार करार दिए गए आतंकियों की संख्या 25 तो पाकिस्तान के आतंकियों की संख्या 15 है। वर्तमान में कुल 27 आतंकियों को सजा पूरी होने पर वापस भेजने की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें से 20 पाकिस्तान मूल के निवासी हैं।

भले ही नवंबर 2008 में देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में हुए अब तक के सबसे बडे आतंकवादी हमले के बाद गृहमंत्री बने पी.चिदम्बरम एक साल में देश में आतंकी हमला न होने से राहत महसूस कर रहे हों पर तीन दुर्दांत आतंकवादियों के फरार होने की घटना से उनकी पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकना स्वाभाविक ही है। आतंकवाद की आग में झुलसते भारत ने हर तरफ से अपने आप को चाक चौबंद रखने की कवायद अवश्य ही की है, किन्तु जब अपने इर्दगिर्द ही जयचंदों की फौज हो तो फिर बाहर किसी से क्या शिकायत की जाए।


भारत सरकार ने हाल ही में रूस, मलेशिया और ब्राजील से आतंकी गतिविधियों के लिए धन मिलने व मनी लांिड्रंग रोकने के लिए सहमति पर भी हस्ताक्षर किए हैं। इससे एक ओर हिन्दुस्तान की गर्वंमेंट आतंकवादियों के रसद के रास्ते बंद कर रही है, तो वहीं दूसरी ओर सजा पूरी कर चुके आतंकवादी बडी ही आसानी से पुलिस को कथित तौर पर गच्चा दे जाते हैं।

वैसे बहुचर्चित कंधार विमान अपहरण मामले के प्रमुख वार्ताकार रहे अजीत कुमार डोवाल की इस बात से हम पूरा इत्तेफाक रखते हैं कि कसाब और अजमल जैसे प्रकरणों का निपटारा जल्द से जल्द कर देना चाहिए वरना भारतीय जेलों में बंद आतंकवादियों की रिहाई के लिए भी किसी भारतीय विमान का अपहरण हो सकता है।

हमारी अपनी व्यक्तिगत राय में देश में जहां जहां भी आतंकवादियों को जेलों में बंद किया गया है, वहां आतंकवाद से संबंधित मामलों की सुनवाई जेल परिसर के अंदर ही कोर्ट बनाकर कर देनी चाहिए। इसमें संबंधित वकील और न्यायालयीन कर्मचारियों के अलावा किसी अन्य का प्रवेश पूरी तरह वर्जित ही रखा जाना चाहिए। इन मामलों की वीडियो रिकार्डिंग कर उसका रिकार्ड रखना आवश्यक होगा। साथ ही साथ आतंकवाद के मामलों में निश्चित समयसीमा तय कर प्रकरण का निष्पादन कर दिया जाना ही इससे निजात पाने का सबसे सरल तरीका है।

पी चिदम्बरम ने देश की जनता को आतंकवाद और अंदरूनी सुरक्षा मुहैया कराने कटिबद्ध नजर आ रहे हैं। देश की जनता अपने गृह मंत्री पलनिअप्पन चिदम्बरम से यह जानना चाह रही है कि उनके गृह मंत्री रहते हुए बीते साल के अंत में क्रिसमस के मौके पर छोटा राजन जैसे इस साल में हुए भयानक दुर्दांत आतंकवादियों के फरार होने तथा मुंबई में डान छोटा राजन के गुर्गे डी.के.राव की जेल से दी गई रिहाई पर पार्टी में मुंबई पुलिस के उच्चाधिकरी ठुमके लगाते देखे जाने पर चिदम्बरम कुछ तो प्रतिक्रिया दें।

``महाराष्ट्र सदन`` में तब्दील हो सकता है भाजपा कार्यालय

``महाराष्ट्र सदन`` में तब्दील हो सकता है भाजपा कार्यालय


भाजपा में अब ``मराठी मानुस`` का होगा बोलबाला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे बच्छराज व्यास और भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी के बीच क्या समानता हो सकती है। जी हां दोनों के बीच गहरा नाता है। लगभग आधे दशक पहले 1965 में विजयवाडा में बच्छराज व्यास को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया था और नितिन गडकरी को 2009 में भाजपा नया अध्यक्ष बनाया गया है।

बच्छराज व्यास भी महाराष्ट्र प्रदेश की संस्कारधानी नागपुर के ही मूल निवासी थे। उसके बाद इसी जगह के नितिन जयराम गडकरी की ताजपोशी की गई है। व्यास और गडकरी दोनों ही ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पाठशाला में पल पुसकर संस्कारित हुए हैं। गडकरी और व्यास दोनों ही महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य रहे हैं। इसके अलावा इनके बीच सबसे बडी समानता के तौर पर यह बात सामने आ रही है कि जब व्यास ने पदभार संभाला था, तब देश में कांग्रेस की जडें काफी हद तक कमजोर हो चुकी थीं, यही बात कमोबेश आज कांग्रेस पर लागू हो रही है।


चूंकि संघ का मुख्यालय नागपुर में है अत: संघ में मराठी मानुष का दबदबा सदा से ही रहा है, किन्तु भारतीय जनता पार्टी इससे अभी तक लगभग अछूती ही मानी जा सकती है। नितिन जयराम गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद अब भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में मराठाओं की दखल से इंकार नहीं किया जा सकता है।

गडकरी के करीबी सूत्रों का दावा है कि भाजपा के नए निजाम की इच्छा है कि दो नहीं तो कम से कम एक महासचिव और कोषाध्यक्ष उनके अपने सूबे या मराठा मानुष ही हो। गडकरी की पहल गोवा के पसंद मनोहर पणिकर हैं। पणिकर के सामने सबसे बडी समस्या यह है कि वे कुछ दिनों पहले भाजपा के कथित लौह पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी को सडा हुआ अचार की संज्ञा दे चुके हैं। इसके अलावा रविशंकर प्रसाद, तमिलनाडू के धुरंधर नेता एन.गणेशन और राजस्थान की महारानी वसुंधरा को महासचिव बनाया जाना तय ही है। रामलाल को छोडकर शेष पांचों महासचिव की रवानगी इस बार तय ही मानी जा रही है।

सूत्रों ने जबर्दस्त संकेत दिए हैं कि भाजपा के राजकोष को संभालने और उसमें इजाफा करने के लिए गडकरी कोषाध्यक्ष पद पर पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे वेद प्रकाश गोयल के पुत्र एवं महराष्ट्र के नेता पीयूष गोयल को सौंपने का मानस बना चुके हैं। गडकरी अपनी टीम में महाराष्ट्र के नेता श्याम जाजू को बतौर सचिव अपने पास रखने की बलवती इच्छा भी गडकरी के मानस पटल पर हिलोरे मार रही है।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का

बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का


(लिमटी खरे)

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की चिंता बेमानी नहीं कही जा सकती है, जिसमें उन्होंने कहा है कि विज्ञान के लिए बाधा न बने नौकरशाही। प्रधानमंत्री ने काफी सोच समझकर यह वक्तव्य दिया है। अपने लगभग साढे छ: साल के प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह भली भांति समझ चुके होंगे कि भारत गणराज्य की व्यवस्थाओं में बाबूराज और नौकरशाही की लाल फीताशाही की जडें किस कदर मजबूत हो चुकी हैं। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने यह बात करकर भारतीय मूल के नोबेल पुरूस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन की बात को ही दुहराया है।


सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री की अपील का कोई असर होगा। एक जमाना था जब प्रधानमंत्री या देश के महामहिम राष्ट्रपति के आव्हान का आम जनता पर जबर्दस्त असर होता था। चाहे स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे हों अथवा गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति का देश के नाम संबोधन हो, देशवासी आकाशवाणी या दूरदर्शन पर इसे पूरे ध्यान से सुना करते थे। देश के आला नेताओं के देश निर्माण के सपने को आम जनता अंगीकार कर सुनहरा भविष्य गढने का ताना बाना बुना करती थी। आज समय पूरी तरह बदल चुका है। अब बडे नेताओं की अपील में भी राजनीति की बू आती है।

97वी भारतीय विज्ञान कांग्रेस (आईसीएस) के उद्धाटन पर प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह ने विज्ञान पर नौकरशाहों की बाधा बनने की प्रवृत्ति को दुर्भाग्यपूर्ण ही बताया है। देश में प्रतिभा के विकास के लिए विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने का आव्हान भी किया है वजीरे आजम ने। पीएम ने कहा है कि कंसोलिउेशन ऑफ यूनिवर्सिटी रिसर्च और इनोवेशन एंड एक्सीलेंस को इसलिए आरंभ किया गया है ताकि अधिक से अधिक महिलाएं विज्ञान के क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य बनाने के लिए आकषिZत हो सकें। निश्चित तौर पर वजीरे आला ने एक बहुत ही निहायत सामयिक मुद्दे की ओर ध्यान आकषिZत किया है। विडम्बना यह है कि नौकरशाही के मकडजाल से इसे मुक्त कराने की बात खुद सरकार के मुखिया के श्रीमुख से निकल रही है।


यक्ष प्रश्न आज भी वही खडा हुआ है कि देश विज्ञान की स्थिति क्या है। अस्सी के दशक के आरंभ के साथ ही युवाओं में विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान बढता चला गया। यही कारण है कि देश में विज्ञान पिछड गया है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने अपने रेल मंत्री के कार्यकाल में भारतीय रेल के स्टेशनों को गंदगी से मुक्त कराने के लिए खडी रेल गाडी में शौच न करने की समस्या उठाई थी।

लालू की इस समस्या का निदान चैन्नई की एक बारह साल की बाला माशा नजीम ने चुटकी में खोज दिया था। आठवीं दर्ज में पढने वाली माशा के अनुसार रेल्वे स्टेशन आते ही जलमल निकासी का पाईप एक रेल में जुडे एक संग्रहण टेंक से स्वत: ही जुड जाएंगे। बाद में रेल्वे स्टेशन के गुजरने के बाद खुले स्थान में यह मलबा चालक द्वारा कहीं गिरा दिया जाएगा। तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति कलाम ने भी इस तकनीक को सराहा था।

एसा नहीं कि देश में तेज दिमाग बच्चों की कमी हो। दरअसल हिन्दुस्तान की शिक्षा पद्यति व्यवहारिक ज्ञान की ओर ध्यान देने वाली नहीं है। आमिर खान अभिनीत ``थ्री ईडियट्स`` चलचित्र कमोबेश इसी पर केंद्रित है। एक पुराने वाक्ये का जिकर यहां प्रासंगिक होग। मध्य प्रदेश की सीमा से लगे महाराष्ट्र के कामठी नागपुर मार्ग पर एक ओव्हलोड ट्रक रेल्वे के अंडरपास में फंस गया। इसे निकालने काफी जुगत लगाई गई। मोटी पगार पाने वाले इंजीनियर्स ने भी हाथ डाल दिए।

मामला चूंकि देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का था सो लगातार यातायात बाधित होने पर कोहराम मच गया। अंतत: सभी पहलुओं पर गौर फरमाने के बाद आला इंजीनियर्स ने रेल्वे के पुल को उपर से तोडकर लारी को बाहर निकालने पर सहमति जताई। यह मामला काफी खर्चीला था, एवं इससे नागपुर से बरास्ता रायपुर पूर्वी भारत का संपर्क रेल से लंबे समय के लिए अवरूद्ध होने की आशंका भी थीं


तभी वहां से एक चरवाहा गुजरा जिसने मामले की नजाकत को देखकर एसा तरीका बताया कि विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के स्नातक इंजीनियर्स का सर चकरा गया। उसने फंसे ट्रक के सभी पहियों की हवा निकालने का सुझाव दिया और कहा कि इससे लारी छ: इंच नीचे आ जाएगी फिर आसानी से उसे खींचा जा सकेगा। इसके बाद से रेल्वे अंडरपास के दोनों सिरों पर लोहे के बेरियर का इस्तेमाल किया जाने लगा।

कहने का तातपर्य महज इतना सा है कि पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही देश भारत के दिमाग की दाद देते हैं किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक ही है। युवा पीढी में आज विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान साफ दिखता है। युवाओं के लिए आज भी इंजीनियर की उपाधि का ग्लेमर बरकरार है। कंप्यूटर के युग में इंफरमेशन तकनालाजी (आईटी) इनकी पसंद बन गई है।

तेजी से बदलते युग में सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्रों में विज्ञान से संबंधित विषयों पर रोजगार के अवसर नगण्य हो गए हैं। अससी के दशक में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस कम्युनिकेशन एण्ड इंफरमेशन रिसोZसेज की पत्रिका ``विज्ञान प्रगति`` स्कूलों में खासी लोकप्रिय हुई थी। महज सत्तर पैसे (लगभग बारह आने) में आने वाली इस पत्रिका से विद्यार्थियों को विज्ञान के बारे में रोचक जानकारियां मिला करती थीं।

विडम्बना ही कही जाएगी कि आज इंजीनियरिंग की उपाधि हासिल करने वो पचास फीसदी से अधिक विद्यार्थी अपने मूल काम से इतर अन्य रोजगार ढूंढने पर मजबूर हैं। भारतीय प्रशासिनक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में ही देखा जाए तो इंजीनियर स्नातकों की बाढ सी आई हुई है। इस बारे में 1985 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत का एक वक्तव्य का जिकर लाजिमी होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान में इंजीनियर की डिग्री धारण करने वाले पचास फीसदी छात्रों द्वारा एसे कामों को रोजगार का जरिया बनाया हुआ है, जिसमें शोध और विकास का दूर दूर तक लेना देना नही है।

सत्तर के दशक की समाप्ति तक हिन्दुस्तान के हर सूबे में विज्ञान को काफी प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विज्ञान प्रदर्शनियों की धूम रहा करती थी। विज्ञान विषय पर वाद विवाद के साथ ही साथ विभिन्न माडलों के माध्यम से विद्यार्थियों को विज्ञान के चमत्कारों से रूबरू करवाया जाता था। इसके बाद नौकरशाही और बाबूराज के बेलगाम घोडों ने विज्ञान का रथ रोक ही दिया। अब बमुश्किल ही विज्ञान प्रदर्शनियों के बारे में कहीं सुनने को मिल पाता है।

प्रधानमंत्री अगर वाकई चाहते हैं कि देश में विज्ञान के प्रति युवा आकषिZत हों तो उन्हें लगभग तीस साल पुराना इतिहास खंगालना पडेगा, और देखना होगा कि सत्तर के दशक तक विज्ञान के प्रति विद्यार्थियों की रूचि का कारण क्या था, और आज चाहकर भी शिक्षण संस्थाएं उनमें विज्ञान के प्रति आकर्षण क्यों पैदा नहीं कर पा रही हैं।

जहां तक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों की वतन वापसी का सवाल है, तो इसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। भारत के दिमाग का इस्तेमाल कर विश्व के अनेक समृद्ध देश अपने आप को बहुत आगे ले जाते जा रहे हैं। भारत सरकार को चाहिए कि भारत वर्ष में एसा माहौल तैयार करे ताकि देश की प्रतिभाएं देश में ही रहें विदेश पलायन के बारे में उनके मानस पटल पर कभी विचार तक न आए।

विद्यार्थी परिषद के नेताओं की होने वाली है बल्ले बल्ले

विद्यार्थी परिषद के नेताओं की होने वाली है बल्ले बल्ले


एबीवीपी के संस्कारों को आगे बढाने के हिमायती हैं गडकरी

धूमल को चलना होगा संभल संभल कर

यूपी को लेकर गडकरी की पेशानी पर छलक रहा है पसीना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 जनवरी। महाराष्ट्र प्रदेश के क्षत्रप नितिन गडकरी के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के नेताओं की बांछे खिल गईं हैं। भारतीय जनता पार्टी में एबीवीपी काडर से आए नेताओं की खुशी का अब ठिकाना नहीं है। इसका कारण नितिन गडकरी भले ही आरएसएस के बटवृक्ष के तले पले बढे हों, पर वे आए तो एबीवीपी की शाख से ही हैं।


भाजपा का सिंहासन संभालने के बाद भरी हुंकार में गडकरी ने साफ कह दिया था कि वे एबीवीपी के संस्कारों को आगे बढाएंगे। गडकरी के इस वक्तव्य ने किसी को हिलाया हो या न हिलाया हो, पर हिमाचल के निजाम प्रेम कुमार धूमल के पांव के नीचे से जमीन खिसकती ही दिख रही है।

दरअसल धूमल की राज्य के एबीवीपी के नेताओं से जरा भी नही बनती है। बीते दिनों हिमाचल प्रदेश में मण्डी के डिप्टी कमिश्नर को हटाने के लिए सूबे की एबीवीपी इकाई ने मुहिम चलाई थी। धूमल भी अडे रहे बाद में जब आलाकमान ने हस्ताक्षेप किया तब जाकर कहीं मामला सुलटा। यह गडकरी की ताजपोशी के पहले की कहानी थी। वैसे भी राजनाथ सिंह के रहते धूमल ठाकुरवाद की छांव में चुपचाप सुस्ताते रहे। अब जमाना बदल गया है। गडकरी महराष्ट्रीयन ब्राम्हण हैं, देरसबेर उनका ब्राम्हण प्रेम छलकेगा और तब प्रेम कुमार की राह में शूल ही शूल नजर आने लगेंगे।

गडकरी के करीबी सूत्रों का कहना है कि गडकरी ब्राम्हणों के हिमायती रहे हैं, साथ ही वे विद्यार्थी परिषद में पले पुसे नेताओं को ज्यादा तवज्जो देने के मूड में हैं। सूत्रों का कहना है कि गडकरी ने अब तक का सफर परिषद के बाद संघ के साथ बिताया है, इसलिए वे जानते हैं कि युवा मन में घुमडने वाली उद्दंडता अंत्तोगत्वा समय और उमर के साथ गंभीरता में तब्दील हो ही जाती है, और तब एबीवीपी के पढाए पाठ से राजनैतिक बिसात पर चलना आसान हो जाता है।

उधर उत्तर प्रदेश में भाजपा के रसातल में जाने से गडकरी बहुत परेशान नजर आ रहे हैं। भाजपा के शीर्ष पदों पर एक बार फिर ब्राम्हणों के बिठा दिए जाने से जातिवाद की राजनीति को अंगीकार कर चुका उत्तर प्रदेश पूरी तरह से भाजपा के हाथ से फिसल सकता है। भाजपा में अब पुराने चेहरों के बजाए नया नेतृत्व उभारकर ही उत्तर प्रदेश में वेतरणी पार की जा सकती है।

सूबे में भाजपा के वर्तमान में जनाधार का आलम यह है कि विधान परिषद की 36 सीटों पर होने वाले चुनावों में भाजपा ने महज 25 स्थानों पर ही अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं शेष 11 स्थानों पर भाजपा का नामलेवा भी नहीं बचा है। मजे की बात तो यह है कि बनारस जो मुरली मनोहर जोशी और गाजियाबाद जो निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह का चुनाव क्षेत्र है, से भाजपा को उम्मीदवार ही नहीं मिल सके हैं।


सोमवार, 4 जनवरी 2010

अब सब कुछ होगा बस एक िक्लक पर


अब सब कुछ होगा बस एक िक्लक पर

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली। विजन 2020 को साकार करने की दिशा में भारत सरकार काफी हद तक गंभीर दिखाई दे रही है। देश के हर जिले को ई डिस्ट्रिक्ट बनाने के लिए संचार मंत्रालन द्वारा आरंभ की गई ई डिस्ट्रिक्ट योजना को देश के 35 जिलों से बढाकर ज्यादा करने की पहल की जा रही है। इस योजना के लागू होने से आम नागरिकों को अनेक सुविधाएं कम्पयूटर की बस एक िक्लक पर ही मुहैया हो सकेंगी।

संचार मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय का यह प्रयास है कि 2010 के अंत तक देश के सभी जिलों को ई डिस्ट्रिक्ट योजना से जोड दिया जाए। जिलों के इससे जुडने से 33 सरकारी सेवाओं का लाभ नागरिकों द्वारा तत्काल ही उठाया जा सकेगा। वर्तमान में यह योजना देश के 14 राज्यों में चल रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार यूपी के 6, मध्य प्रदेश और तमिलनाडू के पांच पांच, महाराष्ट्र और बिहार के तीन तीन, असम, पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल के दो दो एवं मिजोरम, उडीसा, उत्तराखण्ड, झारखण्ड एवं हरियाणा के एक एक जिलों को ई डिस्ट्रिक्ट योजना से जोडा गया है।


सूत्रों ने बताया कि ई डिस्ट्रिक्ट योजना के लागू होने के उपरांत जाति, आय, मूलनिवासी प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लोगों को यत्र तत्र भटकना नहीं पडेगा। इसमें आवेदन देने के महज 48 से 72 घंटों के अंदर ही उन्हें प्रमाणपत्र मिल जाएंगे। वर्तमान में इन प्रमाणपत्रों को बनवाने के लिए लोगों को लम्बी एवं उलझाउ प्रक्रिया का सामना करना पडता है, जिससे उनके समय और धन दोनों ही की बबाZदी होती है। इसके अलावा अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के माध्यम से बच्चों के लिए कम्पयूटर आधारिक शिक्षा और बिजली के बिल के भुगतान की सुविधा भी इसमें उपलब्ध होगी।

उधर इस योजना को लागू करने में आने वाली कानूनी पेचीदगियों और व्यवहारिक कठिनाईयों के समाधान के लिए मंत्रालय ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति मैदानी इलाकों में जाकर इसमें आने वाली तकलीफों का अध्ययन करने के बाद इसके समाधान का रास्ता सुझाएगी। इस समिति के प्रतिवेदन के आधार पर ही मंत्रालय अपने कानून में संशोधन के विधेयक का मसौदा तैयार करेगा। अनेक जिलों में कनेक्टिविटी की समस्या इसके मार्ग की सबसे बडी बाधा बनकर उभर रही है।

कहां थे कांग्रेस के युवराज!




ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)


कहां थे कांग्रेस के युवराज!

इस देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी होने का गौरव प्राप्त कांग्रेस अपनी स्थापना की 125वीं वर्षगांठ धूम धाम से मना रही है। 28 दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना के समय इटली मूल की निवासी एवं नेहरू गांधी परिवार की बहू कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने पार्टी के निजी कें्रद्रीय कार्यालय की नींव रखी। आश्चर्य की बात है कि 125 सालों के कांग्रेस के इतिहास में आजादी के बाद आधी सदी से अधिक समय तक कांग्रेस ने देश पर राज किया और अपने लिए एक अदद केंद्रीय कार्यालय तक नहीं बनवा सकी। यह अलहदा बात है कि प्रदेश यहां तक कि जिलों में कांग्रेस के भव्य कार्यालय खडे हो चुके हैं। बहरहाल कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय के शिलान्यास के मौके पर कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष ने अतीत (मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जीवन दर्शन) को समझाया। जब बारी आई भविष्य की तो सबकी निगाहें कांग्रेस के भविष्य (राहुल गांधी) को खोज रहीं थीं। कार्यक्रम में उपस्थित लोग असमंजस में थे कि आखिर कांग्रेस के युवराज गए तो गए कहां। हो सकता है युवराज साल भर की भागदौड के बाद विदेशी धरा पर नया साल मनाने की गरज से बाहर गए हों। रही बात कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय की नींव रखने की तो उसके लिए उनके परिवार का एक सदस्य यानी कांग्रेस की राजमाता जो वहां मौजूद थीं।


फिर ब्राम्हण बनिया पार्टी बन गई भाजपा!

जब से भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ है तब से इसे ब्राम्हण और बनियों की पार्टी ही कहा जाता रहा है। भाजपा पर लगे इस दाग को कुछ ही दिन पहले बमुश्किल धोया गया था, एक बार फिर भाजपा ब्राम्हणों की पार्टी बनकर उभर रही है। भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज के अलावा अब राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेतली भी ब्राम्हण ही हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा में अब ब्राम्हणों का एक छत्र राज्य कायम हो गया है। वैसे भी राजनैतिक बिसात पर जातीयता को बहुत ही अधिक संवेदनशील माना गया है, और भाजपा ने अपने कोटे के तीन शीर्ष पदों पर ब्राम्हणों को विराजमान कर सभी को चौंका दिया है। भाजपा और संघ का एक धडा इसे स्वीकार करने में अपने आप को असहज पा रहा है। भाजपाईयों का कहना है कि जैसे तैसे तो भाजपा के दामन से ब्राम्हण बनियों की पार्टी होने का दाग छूटा था, पर पार्टी के नीतिनिर्धारकों ने एक बार फिर पार्टी पर ब्राम्हण बनियों की पार्टी होने की छाप लगा ही दी।

और बज गए बगावत के बिगुल





मध्य प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस में बगावत का स्वरनाद सुनाई देने लगा है। बाहुबली क्षत्रपों द्वारा अपने चहेतों को टिकिट देने और अनेक प्रभावशाली नेताओं द्वारा भीतराघात करने संबंधी शिकायतों से प्रदेश कांग्रेस कमेटी भोपाल और एआईसीसी दिल्ली गूंज उठी है। इनमें सबसे अधिक बगावत की बू भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के महाकौशल क्षेत्र से आ रही है। जहां उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा के जिला मुख्यालय, सिवनी बालाघाट यहां तक कि संभागीय मुख्यालय जबलपुर में भी कांग्रेस का निराशजनक प्रदर्शन रहा है। दूसरे नंबर पर चंबल के क्षत्रप युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ असंतोष के स्वर फूटने लगे हैं। विन्धय में कांग्रेस के चाणक्य माने जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह के पुत्र अजय िंसंह तथा सूबे के पूर्व विधानसभाध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी को भी भारी गुस्से का सामना करना पड रहा है। चौ तरफा एक ही शिकायत गूंज रही है कि टिकिट वितरण में भाई भतीजावाद हावी रहा तो दूसरी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेताओं ने परोक्ष तौर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय न कर भीतराघात भी किया है।

. . . तो गिल्त हो गई कांग्रेस से

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस 125वीं सालगिरह मना रही है। पार्टी के तरकश में न जाने कितने तीर आज भी पडे हुए हैं, जिन्हें अगर वह चाहे तो चलाकर देश की युवा पीढी को आजादी के दीवानों की अद्भुत कारगुजारियों से आवगत करा सकती है। पार्टी आने वाले दिनों में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढी अर्थात राहुल गांधी के हाथों में सौंपने को आमदा है। आज राहुल गांधी भी शायद आजादी के इतिहास से बहुत अच्छी तरह वाकिफ नहीं होंगे, कि आजादी चाहने वालों ने आखिर किस दीवानगी के साथ ब्रितानियों को खदेडा था। कांग्रेस के पास यह सौभाग्य है कि आजादी के जुनून का नेतृत्व कांग्रेस ने ही किया था। पार्टी अगर चाहती तो उन शहीदों के बारे में बताकर आम जनता की भावनाएं जोड लेते। कांग्रेस चाहती तो उसके पास केंद्र में सरकार है, और गणतंत्र के 50 साल पूरे होने पर केंद्र सरकार के माध्यम से कोई अभियान ही चलवा देती। वस्तुत: एसा हुआ नहीं। हो सकता है कांग्रेस के भविष्य के निजाम राहुल गांधी की नजरों में आजादी के परवानों के बलिदान की कोई कीमत ही न हो।


मध्य प्रदेश पर गिर सकती है ममता की गाज

आजादी के बाद से अब तक पक्षपात का शिकार विकास की बाट जोहता मध्य प्रदेश आने वाले दिनों में रेल्वे के एक कार्यालय से महरूम हो सकता है। प्रदर्शन और निर्माण कार्यों में लापरवाही के आधार पर पिश्मच मध्य रेल्वे जबलपुर जोन, उत्तर मध्य रेल्वे इलाहाबाद, पूर्वी रेल्वे जोन हाजीपुर को समाप्त करने पर रेल्वे गंभीरता से विचार कर रहा है। ममता के करीबी सूत्रों का कहना है कि चूंकि महाकौशल के संभागीय मुख्यालय जबलपुर में एक असेZ से भाजपा का कब्जा है अत: कांग्रेसी क्षत्रप यहां से रेल्वे जोन समाप्त करने पर दबाव डाल रहे हैं। इन परिस्थितियों में जबलपुर के रेल्वे जोन को बिलासपुर, इलाहाबाद को उत्तर रेल्वे दिल्ली तथा हाजीपुर को पूर्वी रेल्वे जोन कोलकता में मर्ज किया जा सकता है। सूत्र यह भी बताते हैं कि जबलपुर से गोंदिया का अमान परिवर्तन का काम संतोषजनक नहीं होने के चलते भी जबलपुर पर गाज गिरने की संभावनाएं हैं।

चाल, चरित्र, चेहरा नहीं पोशाक बदली भाजपा ने!

भाजपा ने अपनी चाल, चरित्र और चेहरा भले ही बदला हो या न बदला हो पर भाजपा ने अपनी पोशाक अवश्य ही बदल ली है। कल तक भाजपा में धोती धारण करने वाले नेताओं की भरमार थी। अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह आदि धोती कुर्ते में बडे ही सभ्रांत और कुलीन दिखते थे। इसके बाद अरूण जेतली ने कुर्ता पायजामा और शर्ट पेंट के साथ जैकेट का चलन आरंभ किया। नरेंद्र मोदी ने आधे बांह का कुर्ता चलन में लाया। अब आरामदेह फुलपेंट, फैशनेबल पश्चिमी सभ्यता का प्रतीक सूट, जैकेट आदि के रंग में रंग चुका है भाजपा का मुख्यालय 11 अशोक रोड। भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी भी धोती कुर्ता या कुर्ता पायजामा को ज्यादा तरजीह नहीं देते हैं। वे सफारी सूट या पश्चिमी सूट, कोट पेंट या शर्ट पेंट में ही नजर आ रहे हैं। कल तक भाजपा के कार्यकर्ता 11 अशोक रोड में कुर्ता पायजामा पहनकर सभ्रांत दिखने का प्रयास करते थे, तो अब शर्ट पेंट या कोट में आकर अपने आप को वर्तमान अध्यक्ष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला जताने का प्रयास कर रहे हैं।

सर चढकर बोला हुड्डा का जादू
हरियाणा में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का जादू लोगों के सिर चढकर बोल रहा है। विधायक दिन रात उठते बैठते हुड्डा के नाम की माला एसे ही नहीं जप रहे हैं। हाल ही में बिजली निगम के कार्यालय में एक विधायक जी के साथ घटा वाक्या उनके लिए अविस्मरणीय बन गया। हुआ यूं कि एक विधायक जी किसी अफसर से मिलने बिजली निगम के दफ्तर पहुंचे। वहां जैसे ही वे मुख्य द्वार पर पहुंचे तो दरवाजा अपने आप खुल गया। भोंचक्क विधायक जी के समर्थक ने चुटकी ली और कहा कि हुड्डा जी ने कहा है कि जैसे ही विधायक जी आएं दरवाजा अपने आप ही खुल जाना चाहिए। फिर क्या था विधायक जी अपने समर्थकों पर रोब गांठते हुए अंदर चल दिए। अब विधायक जी को कौन समझाए कि राज्य में कुछ कार्यालयों में सेंसर युक्त दरवाजे लगाए गए हैं, जिनके सामने अगर कोई आ जाता है तो वे अपने ही आप खुल जाते हैं। पर अंतत: हुई तो हुड्डा जी की ही जय जयकार।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे
इस बार दिल्ली सरकार के मंत्रियों का जायका जरा बिगडा हुआ रहा। कारण था कि नया साल मनाने के लिए उन्हें छुट्टी नहीं मिल सकी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साफ साफ हिदायत दी थी कि कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियां की जाएं। जिस किसी को भी जश्न मनाना हो वह शहर में ही रहकर नए साल का जश्न मनाए। देरी से चल रही परियोजनाओं का काम समय पर पूरा हो इसलिए शीला दीक्षित ने अपने मंत्रियों को पाबंद कर रखा है कि वे खेल की तैयारियों पर विशेष नजर रखें। मन मसोसकर सभी मंत्री दिल्ली में ही रहने पर मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर यह तुगलकी फरमान सुनाकर सूबे की निजाम शीाला दीक्षित नया साल मनाने राजस्थान के सवाई माधोपुर रवाना हो गईं। अपने परिवार के लोगों के साथ शीला राजस्थान में नए साल का स्वागत करने के उपरांत 2 जनवरी का वापस दिल्ली आ जाएंगी। एक वरिष्ठ कांग्रेसी कार्यकर्ता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि पुरानी कहवात है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे। शीला जी को चाहिए था कि इस बार मंत्रियों को निर्देश देने के साथ ही साथ वे भी नए साल का स्वागत देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में ही करतीं तो बेहतर होता।

कहां लापता हैं रघुबीर!
मायानगरी के एक अभिनेता की इन दिनों खोज चल रही है। जाने माने अभिनेता और स्टेज के कलाकार रघुबीर यादव पिछले दो माहों से लापता हैं। हलांकि इनकी गुम इंसान रिपोर्ट (आदमी के गुम हो जाने पर पुलिस में लिखाई जाने वाली रपट) दर्ज नहीं कराई गई है, पर मुंबई की एक कोर्ट के रिकार्ड में वे लापता हैं। डरना मना है, फिराक, दिल्ली 6, लगान आदि फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा दिखा चुके रघुबीर के खिलाफ मुंबई की एक अदालत ने वारंट जारी किया है। दरअसल रघुबीर यादव की पित्न पूिर्णमा ने मुंबई के बांद्रा की परिवार अदालत में परिवाद दाखिल कर रघुबीर यादव से भरण पोषण की मांग की है। बार बार समन जारी होने पर उपस्थित न होने पर अदालत ने 19 सितम्बर को रघुबीर के खिलाफ वारंट जारी किया है। रघुबीर अभी भी कहीं फरारी ही काट रहे हैं।

सुषमा बन सकतीं हैं भाजपा की पीएम इन वेटिंग
एक के बाद एक सफल सियासी सफर तय करने वाली घरेलू लुक वाली भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज भाजपा के लिए नई पीएम इन वेटिंग बन सकतीं हैं। भाजपा में अगली पंक्ति में वैसे भी महिलाओं की कोई ज्यादा लंबी कतार नहीं है। फिर कांग्रेस की श्रीमति सोनिया गांधी और बहुजन समाज पार्टी की सुश्री मायावती के सामने भाजपा को एक न एक महिला नेत्री का चेहरा सामने लाना ही होगा। इस दृष्टिकोण से सुषमा स्वराज का चेहरा सबसे मुफीद ही लगता है। इशारों ही इशारों में भाजपा की मुखर नेत्री ने बीते दिनों हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में संवाददातों से चर्चा के दौरान खुद को पीएम इन वेटिंग की दौड से अलग बता दिया, किन्तु उनकी सधी चाल और भविष्य की रणनीति को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुषमा के नाम पर आने वाले दिनों में राजग के पीएम इन वेटिंग के लिए आम सहमति बना ली जाए। जिस तरह से पार्टी लाईन पर वे चल रहीं हैं उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि संघ की ओर से भी उन्हें इशारा मिल चुका है। गौरतलब होगा कि पार्टी महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर सुषमा को ही वक्तव्य देने के लिए खडा कर रही है।

अब बस भी कीजिए थुरूर साहेब
लगता है कि केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर का दिल है कि सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर के बिना मानता ही नहीं है। हर बात को वे इसके माध्यम से अपने प्रशंसकों से शेयर करते हैं। वीजा नियमों को कठोर बनाने के मामले में थुरूर ने अपने विभाग के मंत्री एम.एस.कृष्णा के खिलाफ ही चले गए। बाद में जब कृष्णा ने थुरूर की खिचाई की तब भी थुरूर का गुरूर कम नहीं हुआ। टि्वटर से अगाध प्रेम करने वाले शशि थुरूर ने फिर टि्वटर पर इस मामले में टिप्पणी कर डाली और कहा कि यात्रा पर होने के कारण वे इस मसले पर मचे बेवजह की हायतौबा क्यों। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह सहित समस्त कांग्रेसियों को अब तो सार्वजनिक तौर पर कह ही देना चाहिए -``अब बस भी कीजिए थुरूर साहेब।``

मंदिर मिस्जद भेद कराते . . .
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पिता एवं मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की अमर कथा ``मधुशाला`` के अनुसार मिस्जद मंदिर आपस में भेद कराते हैं पर मधुशाला आपस में प्रेम कराना सिखाती है। दिल्लीवासी हरिवंश राय बच्चन की इस मधुशाला से बेहद ज्यादा प्रभावित नजर आ रहे हैं। सन 2009 में समूचा विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा था, जाहिर है हिन्दुस्तान भी इसकी चपेट में था। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर मंदी का असर कोई खास नहीं दिखा। दिल्ली सरकार को आबकरी से होने वाले राजस्व में लगभग चार फीसदी इजाफा हुआ है। यही नहीं हुजूर बीते साल के आखिरी महीने अर्थात दिसबर में ही दिल्ली वासी लाख दो लाख नहीं वरन पूरे एक सौ साठ करोड रूपए की शराब गटक चुके हैं, जो अपने आप में एक रिकार्ड ही है। पिछले साल दिसंबर में दिल्लीवासियों ने 128 करोड रूपए की शराब पी थी। है न मजे की बात मंदिर मिस्जद भेद कराते . . . ।

माता रानी में श्रृद्धालुओं ने बनाया रिकार्ड
उत्तर भारत में त्रिकुटा की पहाडियों पर विराजीं माता वेष्णों देवी के भक्तों ने 2009 में एक रिकार्ड बना दिया है। इस साल कुल 82 लाख पांच हजार श्रृद्धालुओं ने माता रानी के भक्तिभाव से दर्शन किए। अर्थात साल भर रोजाना लगभग साढे बाईस हजार श्रृद्धालुओं ने माता रानी के दरबार में हाजिरी दी। नए साल की पूर्व संध्या पर उमडे भक्तों के हुजूम के आगे माता वेष्णो देवी श्राईन बोर्ड के सारे प्रबंध धरे के धरे रह गए। यद्यपि श्राईन बोर्ड को उम्मीद थी कि इस बार भक्तों की संख्या का आंकडा करोड के पार हो जाएगा, पर एसा हुआ नहीं। साल के आखिरी दिन बेस केम्प कटडा में लगभग पचास हजार श्रृद्धालु अपनी बारी का इंतजार करते रहे। गौरतलब होगा कि माता रानी के दरबार भवन में एक समय में तीस हजार लोग ही दर्शन कर सकते हैं।

सक्रिय राजनीति से बलात हटाए जा सकते हैं तिवारी
आंध्र प्रदेश के राजभवन और वहां के राज्यपाल रहे नारायण दत्त तिवारी पर सेक्स स्केंडल के छींटे पडने के बाद अब कांग्रेस का नेत्त्व उन्हें बलात इस बात के लिए तैयार करने पर जुटा हुआ है कि तिवारी सक्रिय राजनीति से स्वेच्छिक सेवानिवृति ले लें। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों ने बताया कि आलकमान चाहतीं हैं कि उत्तराखण्ड में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले वहां सब कुछ साफ सुथरा कर लिया जाए, इसलिए आलाकमान ने सूबे के नेताओं को मशविरा दिया है कि वे तिवारी को इसके लिए तैयार करें। सूत्रों ने बताया कि तिवारी से कांग्रेस की राजमाता इसलिए भी खफा हैं क्योंकि उनका सेक्स स्केंडल तब बाजार में आया जबकि कांग्रेस पार्टी अपने गौरवशाली इतिहास के 125 साल पूरे करने का जश्न मनाने की तैयारी कर रही थी। आलाकमान चाहतीं हैं कि तिवारी देहरादून के बजाए अपने पेत्रक गांव कुमाउं जाकर ही राम नाम जपें।

पुच्छल तारा
चेन्नई से डॉ.टी.विश्वनाथन के मेल के अनुसार सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट के फायदे हैं तो नुकसान भी। एक ओर जहां आप इसके माध्यम से लोगों से जुडे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर शशि थुरूर जैसे भारत के विदेश राज्यमंत्री इसके माध्यम से ही सरकार चलाने का जतन करने लगते हैं। विश्वनाथन ने चीन का जिकर करते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने दो शादियां कीं और दोनों अलग अलग शहरों में एक दूसरे से अनजान रहतीं थीं। दोनों महिलाएं फेसबुक के माध्यम से एक दूसरे की मित्र बनीं और जब उन्होंने एक दूसरे के प्रोफाईल पर शादी के फोटो देखे तो उनके होश उड गए। दोनों के पति एक ही थे। बस फिर क्या था दोनों ने पुलिस को शिकायत की और मियां जी जेल के अंदर।

रविवार, 3 जनवरी 2010

बीते जमाने की बात हुई रेल सुरक्षा जीवन रक्षा

बीते जमाने की बात हुई रेल सुरक्षा जीवन रक्षा

(लिमटी खरे)

भारत का रेल तंत्र विश्व में सबसे बडे रेल तंत्रों में स्थान पाता है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों द्वारा अपनी सहूलियत के लिए बिछाई गई रेल की पांतों को अब भी हम उपयोग में ला रहे हैं। तकनीक के नाम पर हमारे पास बाबा आदम के जमाने के ही संसाधन हैं जिनके भरोसे भारतीय रेल द्वारा यात्रियों की सुरक्षा के इंतजामात चाक चौबंद रखे जाते हैं।


सदी के महात्वपूर्ण दशक 2020 के आगमन के साथ ही रेल मंत्री ममता बनर्जी के रेल सुरक्षा एवं संरक्षा के दावों की हवा अपने आप निकल गई है। उत्तर प्रदेश में हुई तीन रेल दुघZटनाओं ने साफ कर दिया है कि आजादी के साठ सालों बाद भी हिन्दुस्तान का यह परिवहन सिस्टम कराह ही रहा है।

भले ही रेल अधिकारी इन रेल दुघZटनाओं का ठीकरा कोहरे के सर पर फोडने का जतन कर रहे हों, पर वास्तविकता सभी जानते हैं। कोहरा कोई पहली मर्तबा हवा में नहीं तैरा है। साल दर साल दिसंबर से जनवरी तक कुहासे का कुहराम चरम पर होता है। अगर पहली बार कोहरा आया होता तो रेल अधिकारियों की दलीलें मान भी ली जातीं।

सौ टके का प्रश्न तो यह है कि जब इलाहाबाद रेल मण्डल के दोनों रेल्वे ट्रेक पर ऑटोमेटिक ब्लाक सिस्टम लगे हैं तब इन स्वचलित यंत्रों के होने के बाद हादसे के घटने की असली वजह आखिर क्या है। जाहिर सी बात है कि या तो इस सिस्टम ने काम नहीं किया या फिर रेल चालकोें ने इनकी अनदेखी की। प्रत्यक्षदशीZ तो यह भी कह रहे हैं कि जहां दुघZटना हुई वहां लगभग आधे से एक किलोमीटर की दृश्य क्षमता (विजिबिलटी) थी।

जब भी कोई रेल मंत्री नया बनता है वह बजट में अपने संसदीय क्षेत्र और प्रदेश के लिए रेलगाडियों की बौछार कर देता है। अधिकारी उस ट्रेक पर यातायात का दबाव देखे बिना ही इसका प्रस्ताव करने देते हैं। देखा जाए तो बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के रेलमंत्रियों ने अपने अपने सूबों के लिए रेलगाडियों की तादाद में गजब इजाफा किया है। देश के अनेक हिस्से रेल गाडियों के लिए आज भी तरस ही रहे हैं।


भारतीय रेल आज भी बाबा आदम के जमाने के सुरक्षा संसाधनों की पटरी पर दौडने पर मजबूर है। उत्तर प्रदेश के आगरा के बाद उत्तर भारत में प्रवेश के साथ ही शीत ऋतु में भारतीय रेल की गति द्रुत से मंथर हो जाती है। आम दिनों में मथुरा के उपरांत रेल रेंगती ही नजर आती है, क्योंकि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली को आने वाली कमोबेश अस्सी फीसदी रेलगाडियों के लिए मथुरा एक गेट वे का काम करता है। दक्षिण और पश्चिम भारत सहित अन्य सूबों से आने वाली रेल गाडियों की संख्या इस लाईन पर सर्वाधिक ही होती है।

उत्तर भारत में आज भी घने कोहरे में भारतीय रेल पटाखों के सहारे ही चलती है। दरअसल रेलकर्मी कोहरे के समय में सिग्नल आने की कुछ दूरी पहले रेल की पांत पर पटाखा बांध देते हैं। यह पटाखा इंजन के जितने भार से ही फटता है। इसकी तेज आवाज से रेल चालक को पता चल जाता है कि सिग्नल आने वाला है, इस तरह वह सिग्नल आने तक सतर्कता के साथ रेल को चलाता है।

आईआईटी कानपुर के साथ रेल मंत्रालय ने मिलकर एंटी कोलीजन डिवाईस बनाने का काम आरंभ किया था, जिसमें रेल दुघZटना के पहले ही रेल के पहियों को जाम कर दुघZटना के आघात को कम किया जा सकता था। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस डिवाईस के लिए सालों बाद आज भी परीक्षण जारी हैं।


सन 2008 और 2009 में देखा जाए तो 17 रेलगाडियां सीधी आपस में ही भिड गईं, 85 रेल हादसे पटरी पर से उतरने के तो 69 हादसे रेल्वे की क्रासिंग के कारण हुए। इतना ही नहीं आगजनी के चलते 3 हादसों में भारतीय रेल द बनिZंग ट्रेन बनी। 2008, 09 में कुल 180 रेल दुघZटनाओं में 315 लोग असमय ही काल के गाल में समा गए। रेल्वे के संधारण का आलम यह है कि आज भी रेल्वे संरक्षा से जुडे लगभग नब्बे हजार पद भर्ती के इंतजार में रिक्त हैं। देश में साढे सोलह हजार रेल्वे फाटक आज भी बिना चौकीदार के ही चल रहे हैं।

भारतीय रेल में दुघZटनाएं न हो इसके लिए बीते हादसों से सबक लेने की महती जरूरत है। 01 अक्टूंबर 2001 को पंजाब के खन्ना में हुए रेल हादसे के बाद 2006 तक के लिए सत्तरह हजार करोड रूपए का रेल संरक्षा फंड बनाया गया था। इस फंड से भारतीय रेल के सभी पुराने यंत्रों और सिस्टम को बदलने का प्रावधान किया गया था। विडम्बना ही कही जाएगी कि यह फंड तो खत्म हो गया किन्तु भारतीय रेल का सिस्टम नहीं सुधर सका।

स्वयंभू प्रबंधन गुरू और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के लिए यह हादसा तो जैसे सुर्खियों में वापस आने का साधन हो गया है। हादसे के बाद पानी पी पी कर लालू ने ममता को कोसा। वैसे लालू का यह कहना सही है कि अगर घने कोहरे को ही दोष दिया जा रहा है तो विजिबिलटी के अभाव में रेल के परिचालन की अनुमति आखिर कैसे दी गई।

नए साल पर रेल यात्रियों को तोहफे के तौर पर रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इस तरह की भीषण दुघZटनाएं ही दी हैं। रेलमंत्री अगर चाहतीं और भारतीय रेल की व्यवस्था में वांछित सुधार कर दिए जाते तो संभवत: इन हादसों को रोका जा सकता था। ममता अपनी कर्मभूमि बंगाल में हैं और 05 जनवरी को वे अपना जन्मदिन जोर शोर से मनाना चाह रहीं थीं। इस रेल हादसे के बाद उनके जन्मदिन के जश्न में रंग में भंग पड गया है।

रेलमंत्री ममता बनर्जी भारतीय रेल के लिए विजन 2020 का खाका तैयार कर रहीं हैं पर उसका आधार इतना अस्पष्ट है कि यह बनने के पहले ही धराशायी हो जाएगा। ``मुस्कान के साथ`` यात्रा का दावा करने वाली भारतीय रेल के अधिकारी इस बात को बेहतर तरीके से जानते हैं कि चाहे जो भी रेल मंत्री आए, साथ में बुलट ट्रेन के ख्वाब दिखाए पर भारत की रेलों की पांते अभी तेज गति और ज्यादा बोझ सहने के लिए कतई तैयार नहीं है। ``रेल सुरक्षा, जीवन रक्षा`` अब गुजरे जमाने की बात होती ही प्रतीत हो रही है।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

नये साल की खुशी में डूबने से पहले

नये साल की खुशी में डूबने से पहले

एडविन

साल 2010 की पहली भोर हमारे जीवनों में शामिल हो चुकी है और हमारे चेहरे की उमंग ये बताने के लिए काफी है कि हमारे मन में किस कदर खुशी से लवरेज़ हैं। लेकिन नववर्ष की खुशी में डूबने से पहले हमारे लिए इन महत्वपूर्ण बातों पर गौर करना भी बेहद जरूरी है। मसलन बीते साल की मंहगाई ने जिस बेरहमी से गरीबों की थाली से रोटी छीनीए वो अपने आप में तकलीफ देने वाला है। साल के शुरूआत में दाल जहां 40 रूपए किलो मिल रही थी वहीं अब इसकी कीमत 110 रूपए से भी ऊपर पहुंच चुकी है। इसके अलावा ट्रेनए बसए पानीए बिजली के साथ ही दूसरी चीजों पर बढ़े दामों ने आम आदमी का जीना दुश्वार कर दिया। वहीं गरीबी कम होने का झूठा खेल खेलने वाली सरकार का काला चिठ्ठा एक सरकारी रिपोर्ट ने खोल कर रख दी। इस रिपोर्ट के तहत देश का हर तीसरा आदमी दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस रहा है लेकिन सरकार सिर्फ आंकड़े गिनाने में ही जुटी हुई है। वहीं सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि देश के आधे से अधिक हिस्से पर नक्सलियों का कब्जा है। खुद ग़ृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा है कि देश के 20 राज्यों के 223 जिलों पर नक्सलियों अपनी पकड़ काफी मज़बूत कर चुके हैं। राजनीति में भी मधु कोड़ा ने चार हज़ार करोड़ रूपए का घोटाला करके हड़कंप मचा दिया तो आन्ध्रप्रदेश के राज्यपाल एनडी तिवारी के सेक्स स्कैंडल ने भारतीय सियासत को शर्मसार कर दिया। इसके अलावा जनता की हिफाजत करने वाली पुलिस के एक अधिकारी एसपीएस राठौर ने रूचिका को अपने पद के रसूख के चलते खुदकुशी के लिए मजबूर करके पुलिस की वर्दी पर एक और बदनुमा दाग़ लगा दिया है। बहरहाल ये सब ऐसे सवाल हैं जो मुल्क़ की आने वाली रणनीति तय करेंगे। इसलिए अगर हम इस नये साल के जश्न में पूरे देश के लोगों के साथ शामिल हों तो ये इन दागदार और बदनाम जमात के लोगों को सिस्टम से बाहर खदेड़ने के लिए काफी अहम और महत्वपूर्ण कदम होगा।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नए दशक का आगाज


नए दशक का आगाज

आग का दरिया है, तैर कर जाना है. . ..

(लिमटी खरे)

2009 की बिदाई के साथ ही अब नए दशक के स्वागत की तैयारियां आरंभ हो गईं हैं। देश अब विजन 2020 को देख रहा है। आने वाले दस साल भारत के लिए चुनौतियों से भरे होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। देखा जाए तो दस से कहीं ज्यादा बडी चुनौति के रूप में सामने आ रहा है 2020।

वैसे भी मनुष्य योनी में टीन एज (थर्टीनी 13 साल से उन्नीस साल नाईंटीन) की उम्र काफी महत्वपूर्ण होती है। इस आयु में शारीरिक बदलाव के साथ ही साथ मानसिक तौर पर भी बदलाव की बयार बहती है। बीस साल की आयु को पाने के साथ ही मनुष्य में शनै: शनै: परिपक्वता का बोध होने लगता है। दस से बीस साल की उम्र किसी भी व्यक्ति के जीवन की दशा और दिशा तय कर देती है, और कमोबेश यही बात देश पर भी लागू होती है।


इंदिरा, राजीव गांधी के इक्कीसवीं सदी के सपनों का भारत देश आजादी के बाद लगातार ही लहरों में हिचकोले खाता रहा है। इक्कसवीं सदी के पहले दशक में देश की जनता बुरी तरह हलाकान रही। मंहगाई चरम पर थी तो आंतरिक सुरक्षा की चूलें हिल रहीं थीं। देश में गेंहूं दाल सब्जियों के भाव आसमान पर थे, अर्थशास्त्र के ज्ञाता प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह भी हाथ बांधे चुपचाप देखते रहे।

मधु कोडा जैसे मुख्यमंत्री पर चार हजार करोड रूपए के घोटाले के आरोप लगे तो बूटा सिंह के पुत्र रिश्वत लेते दिखे। देश की रक्षा की सौगंध उठाने वाली सेना के शीर्ष अधिकारी भी भ्रष्टाचार के मकडजाल में उलझे दिखे। उमरदराज राजनेता नारायण दत्त तिवारी अपनी पोती की उम्र की कन्याओं के साथ रासलीला करते दिखाई दिए। नए राज्यों के सृजन के लिए कांग्रेस ने तेलंगाना की बिसात बिछाई पर इस होम में कांग्रेस के ही हाथ जल गए। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी एसपीएस राठौर पर रूचिका को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा घटना के उन्नीस साल बाद चलाने का निर्णय लिया जाना भारतीय व्यवस्थाओं की जडों में लगी दीमक की ओर ही इशारा करती है।

2009 में भारत देश की महिलाओं ने बुलंदियों को छुआ है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक तरफ जहां देश की पहली महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सत्तर की उम्र में भी लडाकू विमान सुखोई की यात्रा करने का साहस दिखाया तो मीरा कुमार जैसी सभ्रांत और कुलीन महिला को लोकसभा का प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव मिला। इतना ही नहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सुषमा स्वराज ने भी बाजी मारी।

आने वाले दशक में हिन्दुस्तान के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है। सबसे बडी चुनौति के रूप में देश की बढती आबादी ही दिखाई दे रही है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में देश के वाकई में भविष्यदृष्टा कहे जाने वाली शिख्सयत स्व.संजय गांधी ने नसबंदी को कडाई के साथ लागू किया था। अगर संजय गांधी एसा नहीं करते तो आज देश की आबादी की कल्पनामात्र से ही रूह कांप उठती है।

इसके अलावा पानी और अधारभूत संरचनाओं के मामले में भारत देश की स्थिति बहुत ही खराब है। भ्रष्टाचार के केंसर से देश बुरी तरह कराह रहा है। देश की साठ फीसदी से अधिक जनता किसी न किसी नशे की गिरफ्त में अपना जीवन तबाह किए हुए है। देश में आज भी जातिभेद और लिंगभेद की मजबूत दीवारें खडीं हैं।

समूची दुनिया में भारत जैसा लोकतंत्र शायद ही कहीं हो। भारत को आज भी अपने विधायक या सांसद को वापस बुलाने का और मतपत्र में नकारात्मक वोटिंग अर्थात इनमें से कोई नहीं का विकल्प नहीं दिया गया है। भारत में पुलिस की दखल से आजादी दिलाना सबसे बडा काम होगा साथ ही सालों साल चलते अदालत के फैसलों को निश्चित समयावधि में निपटाना भी चुनौति से कम नहीं है।

सरकार और जंगल माफिया की मिलीभगत से हरे भरे हिन्दुस्तान में जंगलों की तादाद काफी कम ही रह गई है। विजन 2020 में देश को एक बार फिर हरा भरा बनाना होगा। आधारभूत संरचना में भारत की सडकों, रेल मार्ग, अंदरगामी रेल और सडक मार्ग (टनल), पुल पुलिया और फ्लाई ओवर का निर्माण भी बडे पैमाने पर किया जाना बाकी है। भारत में बुलेट रेल गाडी की दरकार काफी अरसे से महसूस की जा रही है। विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत में रेल की पांतें तेज गति से रेल चलाने के लिए नाकाफी ही कही जा सकतीं हैं। भोपाल से दिल्ली के बीच का कुछ हिस्सा भर 150 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार सह सकता है शेष में 130 से ज्यादा गति नहीं बढाई जा सकती है।

देश में विज्ञान और प्रोद्योगिकी को बढावा देने, आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना, काश्मीर समस्या का हल, भ्रष्टाचार का खात्मा, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं मुहैया करवाना, बिजली का उत्पादन बढाना आदि समस्याओं जूझना होगा भारत देश को। विजन 2020 के लिए अभी से ही रोडमेप तैयार करना होगा वरना 2020 आते समय नहीं लगेगा और भारत देश एक बार फिर विकास के मार्ग खोजने के लिए दर दर भटकने पर मजबूर हो जाएगा।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

कब होगा कम थुरूर का गुरूर


कब होगा कम थुरूर का गुरूर

थुरूर के बडबोलेपन को क्यों सह रही है कांग्रेस

भारत सरकार के बजाए सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट है थुरूर की प्राथमिकता

(लिमटी खरे)

नौकरशाह से जनसेवक बने शशि थुरूर पहली मर्तबा केंद्र में मंत्री बने हैं। मंत्री बनने के बाद भी उनके चाल चलन आचार विचार में कोई परिवर्तन परिलक्षित नही हो रहा है। पहले की ही तरह वे सोशल नेटवकिंZग वेव साईट पर ही अपनी टिप्पणी देने का क्रम जारी रखे हुए हैं।


हालात देखकर लगने लगा है मानो भारत सरकार का विदेश राज्यमंत्री का कार्यालय कागजों पर नहीं वरन् इंटरनेट की एक विशेष सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर ही चल रहा हो। लगता है कि शशि थुरूर के विभाग के कार्यालय में अगर किसी को किसी नस्ती (फाईल) को थुरूर से ओके करवाना हो तो उसे भी इस नेटविर्कंग वेव साईट पर ही डालकर उनका अनुमोदन लेना होगा। माना कि इक्कीसवीं सदी में भारत का नया चेहरा इंटरनेट की टेक्नालाजी से लवरेज होगा, किन्तु थुरूर मामले में भारत सरकार की चुप्पी ने साफ जता दिया है कि प्रधानमंत्री भी चाहते हैं कि भारत सरकार के मंत्री टि्वटर, ऑरकुट, फेसबुक या दूसरी सोशल नेटवििर्कंग वेवसाईट के माध्यम से अपना कामकाज निष्पादित करें।

मंत्री पद संभालने के बाद ही शशि थुरूर ने मंत्री जैसे बर्ताव के बजाए वालीवुड की सेलीब्रिटीज की तरह ही इंटरनेट पर अपने प्रशंसकों से सवाल जवाब का कभी न रूकने वाला सिलसिला आरंभ कर दिया। पहले कांग्रेस अध्यक्ष के हवाई जहाज में इकानामी क्लास में यात्रा करने के उपरांत इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) फिर काम के बोझ का हवाला देकर अपनी व्यस्तताएं उजागर करने पर उन्हें कांग्रेस की राजमाता और प्रधानमंत्री ने तगडी नसीहत दी थी। बावजूद इसके थुरूर का इंटरनेट का गुरूर कम होता नहीं दिखता।

अबकी बार थुरूर ने सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट पर भारत सरकार के ही वीजा संबंधी नियम कायदों के निर्णय के खिलाफत में अपने स्वर मुखर कर दिए हैं। अमूमन सरकार द्वारा जो निर्णय लिए जाते हैं उससे मंत्रीमण्डल के हर सदस्य को इत्तेफाक रखना ही होता है। सरकार के निर्णय के खिलाफ किसी भी मंत्री का सार्वजनिक बयान क्षम्य श्रेणी में कतई नहीं आता है।


जब हेडली और राणा जैसे सरगना देश में बेखौफ आ जा रहे हों तब वीजा नियमों का कडाई से पालन सुनिश्चित किया जाना भारत सरकार की पहली प्राथमिकता ही बनती है। विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर इन नियम कायदों में पता नहीं क्यों शिथिलता की हिमायत करते नजर आ रहे हैं। थुरूर का यह कथन भी बचकाना ही कहा जाएगा जिसमें उन्होंने कहा है कि 26 / 11 को अंजाम देने वाले आतंकियों के पास वीजा नहीं था, फिर भी हमला नहीं रोका जा सका।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने थुरूर के बचपने पर मोहर लगाते हुए कह ही दिया कि थुरूर धीरे धीरे राजनीतिक संस्कृति को समझ जाएंगे। थुरूर के बडबोलेपन पर परोक्ष तौर पर कटाक्ष करते हुए चतुर्वेदी कहते हैं कि पुरानी आदतों के बदलने में समय लगता ही है। वैसे थुरूर की दूसरी गल्ती पर प्रधानमंत्री उनसे नाखुश ही प्रतीत हो रहे हैं। पहली मर्तबा थुरूर के बडबोलेपन के बारे में प्रधानमंत्री ने स्वयं आगे आकर प्रकरण को शांत करवा दिया था, पर अब लगता है कि थुरूर को दूसरी गिल्त भारी पड सकती है।


राजनयिक से जनसेवक बने शशि थुरूर के अंदाजे बयां को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि थुरूर के पास राजनैतिक सोच समझ का जबर्दस्त अभाव है। वे इतना भी नहीं जानते हैं कि किस बात को किस मंच पर उठाया जाना चाहिए। सोशल नेटविर्कंग वेव साईट के दीवाने थुरूर हर किसी बात को ट्वीटर पर ही शेयर करते हैं। इससे एक तो वे विवादों में रहते हैं दूसरे टि्वटर की बिना मोल पब्लिसिटी भारत सरकार के माध्यम से ही हो रही है।

शशि थुरूर के टि्वटर के गुरूर ने विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा को भी कडे तेवर अपनाने पर मजबूर ही कर दिया। अंतत: कृष्णा को कहना ही पडा कि मैं हूं विभाग का बास और शशि थुरूर को करना होगा उनका अनुसरण। उनके अनुसार विदेश मंत्री नीतियां तय करते हैं और हर एक को उस नीति पर चलना ही होता है। अगर किसी को इसमें कोई खोट दिखे तो उसे सरकार के अंदर ही उठाया जाना चाहिए। कृष्णा का सीधा इशारा थुरूर के इंटरनेट प्रेम की ओर ही था।


वीजा नियमों के बारे में विदेश मंत्री शशि थुरूर की हायतौबा गलत नही मानी जा सकती है। दरअसल कोई भी विदेशी अगर भारत यात्रा पर आकर अगर 180 दिनों से ज्यादा का वक्त गुजारता है, तो उसे दुबारा भारत आने के लिए साठ दिनों का अंतराल जरूरी होता है। इसके बाद ही उसे वीजा मुहैया हो सकता है।

शशि थुरूर की पित्न कनाडा मूल की नागरिक हैं और दुनिया के चौधरी अमेरिका के न्यूयार्क शहर में कार्यरत हैं। नए नियमों के अनुसार अगर उन्हें भारत आना होगा तो उन्हें दो माह का समय इंतेजार में बिताना होगा। थुरूर की वीजा मामले में हायतौबा वाकई इस मसले पर उनकी चिंता को जाहिर करती है या वे अपनी पित्न को लुभाने का जतन कर रहे हैं, यह तो वे ही जाने पर थुरूर साहेब को पता होना चाहिए कि भारत गणराज्य का गृह मंत्रालय विशेष और वाजिब मामलों में इन नियमों को शिथिल भी कर देता है।

बहरहाल वीजा मामले में थुरूर को सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट पर भारी समर्थन मिला है, जिससे वे गदगद हैं और उन्होंने अपने शुभचिंतकों को धन्यवाद भी दिया है। अगर सत्तर के जमाने में थुरूर को मंत्री बना दिया जाता तो कव्वाली में मिली तालियों के बाद कव्वाल की तरह वे भी कह उठते -``पार्टी आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है।``

भारत ने वीजा के नियम कायदों में कडाई बरतने की मंशा बनाई। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने इस पर स्पष्टीकरण मांग लिया। पहली मर्तबा कठोर हुई भारत सरकार ने साफ लहजे में अपना जवाब दे दिया। फिर बीच में ही बोल उठे थुरूर। थुरूर की इस तरह की बचकानी हरकतों से दुनिया भर में भारत सरकार की एकजुटता में ही कमी का गलत संदेश गया है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि अब इस तरह के प्रयोग बंद कर बडबोले शशि थुरूर को सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट के लिए पूरा समय निकालने के लिए मुक्त करें, क्योंकि थुरूर की प्रथमिकता भारत सरकार के बजाए इंटरनेट जो ठहरी।



बुधवार, 30 दिसंबर 2009

कब तक कराहती रहेगी देश की निरीह जनता

कब तक कराहती रहेगी देश की निरीह जनता

``रोजनामचा`` के बदल गए हैं मायने

(लिमटी खरे)


देश को आजाद हुए छ: दशक से अधिक का समय बीत चुका है। आम आदमी को मिलने वाली सुविधाएं आज भी नगण्य ही हैं। मंहगाई ने देश के आखिरी आदमी की कमर तोड रखी है, वहीं दूसरी ओर धनपति और अधिक संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं। बाहुबली, अपराधी और धनाड्य वर्ग शासक की भूमिका में आ गया है। पिस रही है तो केवल निरीह रियाया। आज देश में पुलिस पर यह संगीन आरोप आम हो गया है कि उसे गरीबों की चीत्कार सुनने की रत्ती भर भी फुर्सत नहीं है। यह है आजादी के दीवाने सच्चे भारतीयों के समनों के भारत की वर्तमान तस्वीर।

यह बात आईने के मानिंद साफ है कि आजादी के उपरांत भारत गणराज्य की पुलिस को जिस तरह की कार्यप्रणाली को अंगीकार करना चाहिए था, वह उसने किया नहीं। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब देश में आपात काल (ईमरजेंसी) लगाई गई थी, तब से अब तक यह बात उभरकर सामने आई है कि भारत देश में प्रजातंत्र नहीं वरन पुलिस के बल पर हिटलरशाही चल रही है।


अमूमन पुलिस थाने में जाकर शिकायत करने पर पुलिस उसे तफ्तीश में ले लेती है। पुलिस जिन मामलों को अदालत की देहरी तक ले जाने की मंशा रखती है, उन्हें छोडकर अन्य मामलात में पुलिस भी प्रथम सूचना प्रतिवेदन (एफआईआर) दर्ज करना मुनासिब नहीं समझती है। जिलों में भी पुलिस कप्तान जब क्राईम मीटिंग लेते हैं तो इन्हीं एफआईआर की संख्या के हिसाब से ही कोतवाली या थानों में अपराधों के घटित होने की संख्या का अनुमान लगाया जाता है।

वर्तमान में फस्र्ट इंफरमेशन रिपोर्ट दर्ज करना या न करना पुलिस के विवेक पर ही माना जाता है। नई व्यवस्था में पुलिस के विवेक पर इसे नहीं छोडा जाएगा। अगर पुलिस ने अपने विवेक का इस्तेमाल भी किया तो उसे इसका पर्याप्त कारण देना होगा कि उसने एफआईआर दर्ज नहीं की तो क्यों और यह काम पुलिस के लिए काफी कठिन होगा।


प्रभावशाली व्यक्ति इन शिकायतों को ठण्डे बस्ते के हवाले करने या ठिकाने लगाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडते हैं। यही कारण है कि रूचिका गिरहोत्रा के मामले में एक पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी एसपीएस राठौर के खिलाफ शिकायत को एफआईआर में बदलने में एक दो माह नहीं वरन् पूरे नौ साल लग जाते हैं। पुलिस तो फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं करती अगर उच्च न्यायालय ने स्वयं संज्ञान न लिया होता तो।

इन परिस्थितियों में देश के अनूठे गृह मंत्री पलनिअप्पन चिदम्बरम की पहल का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए जिसमें उन्होंने हर संगीन अपराध में शिकायत को ही एफआईआर मानने की मंशा जताई है। निश्चित तौर पर इसके लिए सीआरपीसी में आवश्यक संशोधन किया जाना होगा। यक्ष प्रश्न तब भी वहीं खडा होगा कि क्या चिदम्बरम की मंशा को देश की पुलिस ईमानदारी से अमली जामा पहना सकेगी।

देश में जहां अनेक सूबों में थानों से लेकर जिलों की बोली लगाई जाती हो वहां चिदम्बरम की मंशा लागू हो सके इसमें संदेह ही नजर आता है, और अगर धोखे से पुलिस ईमानदारी से अपना काम भी करना चाहे तो हमारे देश के ``जनसेवक`` उन्हें यह करने नहीं देंगे।

वैसे गृहमंत्री चिदम्बरम की सोच को देश की पुलिस अंगीकार करे इसमें संशय ही लगता है। इसका कारण इसके लागू करने में होने वाली व्यवहारिक कठिनाईयां हैं। एक तो देश में पुलिस के पास पर्याप्त पुलिस बल का अभाव है दूसरे इसे अगर लागू किया जाता है तो देश के पुलिस थानों में अपराधों की तादाद में रिकार्ड उछाल आने की आशंका है। फिर इन केसों के निष्पादन के लिए अदालतों की संख्या वैसे भी कम है। वर्तमान में देश में तीन करोड से ज्यादा मुकदमे पहले सही लंबित हैं।


देखा जाए तो पुलिस का दायित्व आम जनता की जान माल की हिफाजत के साथ समाज में भयमुक्त वातावरण निर्मित करना है। एसा नहीं कि देश की पुलिस ही भ्रष्ट, नाकारा, बेईमान है, दरअसल पुलिस के चंद मुलाजिमों के कारण देश में खाकी बदनाम हो रही है। पुलिस की साख गिराने के लिए एक अदद सिपाही (कांस्टेबल) से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरान भी जिम्मेदार हैं।

पुलिस के रोजनामचा के मायने दिनों दिन बदल गए हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कल तक दिन भर की घटनाओं को अपने आप में समाहित करने वाले रोजनामचा में अब तो प्रभावशाली लोगों और पुलिस की मर्जी के प्रकरणों की सूची बनकर रह गया है यह रोजनामचा। कोई गरीब अगर किसी संगीन अपराध की एफआईआर दर्ज कराना भी चाहे तो पुलिस के अनगिनत सवालों के सामने वह टूट जाता है। फिर पुलिस के कारिंदे उसे डरा धमका कर वापस जाने पर मजबूर कर देते हैं। इसके बाद भी अगर वह जिद पर अडा रहा तो पुलिस उसे ही उल्टे मामले में फंसाने से नहीं चूकती है। एसे एक नहीं अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं जिनमें पुलिस ने फरियादी को ही आरोपी बना दिया हो।


गृह मंत्री पी.चिदम्बरम काफी धीर गंभीर और नब्ज पर हाथ रखकर चलने वाले नेताओं में से हैं। इस बार उन्होंने अगर कोई बात सोची है तो इसके दूरगामी परिणाम निश्चित तौर पर राहत देने वाले होंगे। सरकार का आपराधिक दण्ड संहिता में संशोधन का प्रस्ताव स्वागत योग्य है, जिसमें दरोगा से यह स्पष्टीकरण मांगा जा सके कि उसने एफआईआर दर्ज नहीं की तो इसके पीछे क्या कारण थे।

सरकार को चाहिए कि इस तरह के जनता से सीधे जुडे मसले को लागू करने के पूर्व इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रभावों के बारे में भली भांति विचार कर ले। यह सच है कि आज देश में दो तिहाई से ज्यादा लोग किसी न किसी तरह से न्याय के लिए भटकने पर मजबूर हैं।

भारत सरकार का गृह मंत्रालय अगर एक परिपत्र जारी कर दे और रातों रात देश की व्यवस्था सुधर जाए एसा प्रतीत नहीं होता है। सिर्फ आदेश जारी करने की रस्मअदायगी से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसके आदेश की तामीली किस तरह हो रही है, वरना हुक्मरानों के फरमानों को देश के सरकारी मुलाजिम किस कदर हवा में उडाते आए हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है।

अगर इसे लागू कर दिया जाता है तो आवश्यक्ता होगी इसकी समय समय पर समीक्षा की। इसके अलावा इससे जुडे हर पहलू जैसे न्यायालय, अभियोजन आदि के मामलों में भी ध्यान देना आवश्यक होगा। कुल मिलाकर सरकार को इस मसले से जुडे हर पहलू को चाक चौबंद बनाने के लिए त्वरित कार्यवाही की दरकार होगी।

आजादी मिलने के साठ सालों बाद भी देश की रियाया ब्रितानी हुकूमत से बुरी जिंदगी गुजर बसर करने पर मजबूर है। राजनेताओं ने पुलिस को अपने हाथों की लौंडी बनाकर रखा है, जिसका उपयोग वह अपने विरोधियों के शमन के लिए ज्यादा कर रहे हैं। देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की दरकार काफी समय से महसूस भी की जा रही थी।

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Thanks
LIMTY KHARE


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