सोमवार, 11 जनवरी 2010

अपने क्षेत्र में महज पच्चीस फीसदी लोगों को ही जोड पाए युवराज!


ये है दिल्ली मेरी जान



(लिमटी खरे)

अपने क्षेत्र में महज पच्चीस फीसदी लोगों को ही जोड पाए युवराज!

आजाद हिन्दुस्तान पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी अब ``उंची दुकान फीका पकवान`` ही साबित होते जा रहे हैं। कहने को तो वे देश भर में युवाओं को कांग्रेस से जोडने का बीडा अपने युवा से अधेड होते कांधों पर उठाए हुए हैं, पर वे अपने संसदीय क्षेत्र में ही इस मामले मेें बहुत पीछे नजर आने लगे हैं। बीते 12 नवंबर से 15 दिसंबर तक अपने संसदीय क्षेत्र में उन्होंने कांग्रेस से युवाओं को जोडने का लक्ष्य रखा था एक लाख का, किन्तु इसके एवज में वे जोड पाए महज 24 हजार 862 युवाओं को ही। उनके संसदीय क्षेत्र की गोरी गंज विधानसभा में 5200, अमेठी में 5888, तिलोई में 5307 के साथ ही साथ ही साथ जगदीशपुर में महज 4667 युवाओं को ही कांग्रेस की रीतियों और नीतियोें से लुभा सके। गौरतलब है कि अमेठी में 14 लाख 30 हजार 857 मतदाता हैं, जिसमें से पचास फीसदी ही मतदान के प्रति जागरूक हैं। पिछले दिनों अपने चाचा और कांग्रेस के वास्तविक भविष्यदृष्टा स्व.संजय गांधी के नाम पर मुंशीगंज में बने अस्पताल के अतिथिगृह में युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से रूबरू राहुल गांधी की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ जाहिर कर रहीं थीं कि वे अपने ही संसदीय क्षेत्र में अपने इस महात्वाकांक्षी अभियान की हवा निकलने से कितने परेशान हैं। जब राहुल बाबा अपने ही संसदीय क्षेत्र में निर्धारित लक्ष्य से एक चौथाई से भी कम पर आकर रूक गए हों तब देश के अन्य हिस्सों की जमीनी हालात पर चर्चा बेमानी ही होगी।


िढंढोरा 14 का पहुंचे महज 3!
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने खुद को महिमा मण्डित करने के ढेर सारे जतन किए। इनमें अनेक में वे कामयाब भी हुए। कभी हिन्दुस्तान के हर आदमी को निरोग करने के लक्ष्य के उपरांत ही भारत की धरा के बाहर कदम रखने का कौल लेने वाले बाबा रामदेव ने बीच में ही अपनी बात को काटकर विदेशों की सैर कर डाली। धर्मनगरी हरिद्वार में बाबा रामदेव के भव्य और पांच सितारा आश्रम में मेगाफुड और हर्बल पार्क के उद्घाटन के लिए िढंढोरा पीटा गया था कि इसमें देश के 14 सूबों के निजाम शिरकत करेंगे। जब उद्घाटन हुआ तो वहां मौजूद थे महज भाजपा शासित मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री। तीन मुख्यमंत्रियों के बीच केंद्रीय मंत्री सबोध कांत सहाय भी कुछ ज्यादा सहज नजर नहीं आ रहे थे। उन्होंने भी बाबा रामदेव के खुद के महिमा मण्डन पर परोक्ष तौर पर कटाक्ष कर ही दिया। सहाय ने कहा कि अगर बाकी के 11 राज्यों के सीएम भी वहां होते तो वे एक साथ सभी उपस्थित मुख्यमंत्रियों के सूबों में एक साथ हर्बल पार्क की स्थापना की घोषणा भी लगे हाथ कर ही देते। गौरतबल है कि रांची में स्थापित एसे ही फुड पार्क की स्थापना बाबा के सहयोग से की गई है जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा पचास लाख रूपए का अनुदान भी दिया जा रहा है। भाजपाई सूबों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति से कांग्रेस को समझ में आ गया है कि बाबा रामदेव कहीं न कहीं संघ के हिमायती ही हैं, सो कन्नी काट ली कांग्रेसी निजामों ने।


नहीं चाहिए हमें पुरूस्कार!

यदि किसी को सम्मान से नवाजा जाए तो भला कौन बेवकूफ होगा जो इससे इंकार करेगा। आज के युग में खुद को महिमा मण्डित करने का एसा चलन चल पडा है कि लोग प्रायोजित कर पुरूस्कार ग्रहण करते हैं। इन परिस्थितियों में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के समक्ष बीते दिनों बडी ही दुविधा की स्थिति बन गई। पांचवे राष्ट्रीय सडक सुरक्षा पुरूस्कार के लिए चुने गए सामाजिक कार्यकर्ताओं में से महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सडक सुरक्षा के लिए री विमलेश्वरी रोड सेफ्टी नामक एक गैर सरकारी संस्था के विनायक खेलकर ने यह कहते हुए मंच पर ही सम्मान लेने से इंकार कर दिया कि जब तक सउक दुघZटनाओं को रोकने के लिए विभिन्न केंद्रीय और राज्यों के मंत्रालयों तथा विभागों के बीच तालमेल नहीं बनता तब तक वे सम्मान ग्रहण नहीं करेंगे। खेलकर की बात सुनकर सकते में आ गए कमल नाथ। उन्होंने कुछ देर चर्चा के दौरान खेलकर को मनाने की नाकाम कोशिश की। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि केंद्र और राज्य के सडक से जुडे महकमों में तालमेल का अभाव है। चलो खेलकर के माध्यम से ही सही कम से कम केंद्र सरकार के महकमे के हाकिमों की नींद तो टूटी।


मोदी को नहीं जम रहा है गडकरी का अध्यक्ष बनना

भाजपा के कद्दावर नेता और भाजपाध्यक्ष पद के सबसे सशक्त दावेदार रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को महाराष्ट्र की राजनीति से राजनैतिक परिदृश्य में धूमकेतू बनकर उभरे नितिन गडकरी का भाजपाध्यक्ष बनना शायद गले नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि मोदी के पास अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने की फुर्सत भी नहीं है। गौरतलब है कि दिसंबर के मध्य में भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए गडकरी से औपचारिक मुलाकात हेतु राजग और भाजपा शासित सूबों के मुख्यमंत्री और अध्यक्ष के अलावा अन्य पदाधिकरी उनकी देहरी पर दस्तक दे चुके हैं। नरेंद्र मोदी के मामले में पार्टी अब बचाव की मुद्रा में ही दिखाई पड रही है। मोदी और गडकरी के बीच क्या अदावत है यह तो वे ही जानें पर पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने अवश्य इस मामले में सफाई देते हुए कहा कि समय की कमी के चलते मोदी पार्टी अध्यक्ष गडकरी से मिलने नहीं आ सके हैं, पर फोन पर मोदी ने गडकरी को बधाई दे दी है।

चाणक्य पहुंचे बालाजी की शरण में!

कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य रहे कुंवर अर्जुन सिंह की राजनीति का सूरज भले ही अस्ताचल की ओर हो पर वे अगर कहीं आते जाते हैं तो सियासतदारों के कान खडे होना स्वाभाविक ही है। पूजन पाठ, अनुष्ठान के लिए मशहूर अर्जुन सिंह ने दिल्ली की सियासी गर्माहट को छोडकर नए साल में मध्य प्रदेश के बेतूल जिले में एक सप्ताह से अधिक का समय बिताया तो राजनेताओं की नींद में खलल पडना आरंभ हो गया। अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि बैतूल शहर के पास स्थित बालाजीपुरम के मंदिर और ताप्ती के तट पर कुंवर साहेब ने कुछ पूजन और अनुष्ठानों को कराया है। चलने फिरने में असमर्थ हो चुके अर्जुन सिंह अब वहील चेयर के माध्यम से आना जाना करते हैं। जब यह बात राजनेताओं को पता चली कि वे एक हफ्ते से अधिक समय तक एमपी के बैतूल में रहे और उनके समर्थकों से भी सिंह के दौरे को गोपनीय रखा गया तो सभी चौकन्ने हो गए। इसके पहले गुमनामी के अंधेरे में उत्तराखण्ड में सिंह ने लंबा समय पहाडों की वादियों में गुजारा था। राजनैतिक फिजां में कयास लगाए जा रहे हैं कि अर्जुन सिंह की इस खामोशी के पीछे कहीं आने वाले तूफान के संकेत तो नहीं।


अब कौन सी ताकत पकडेगी बापू को!
पिछले दो दशकों में हिन्दुस्तान की धर्मभीरू जनता का जमकर शोषण किया है स्वयंभू आध्याित्मक गुरूओं ने। अपने वाकजाल और तरह तरह के चमत्कारों के माध्यम से बाबाओं ने जनता को अपना मुरीद बना लिया है। गुजरात के स्वयंभू संत आशाराम बापू पर वहां की सरकार का कडा रूख काफी हद तक भारी पड रहा है। कल तक चिंघाडने वाले आशाराम बापू पिछले कुछ दिनों से शांति का जीवन व्यतीत कर रहे थे। मध्य प्रदेश में उन्होंने एक बयान देकर नया बखेडा खडा कर दिया। गुपचुप मध्य प्रदेश की सैर पर गए बापू के सम्मान में राज्य सरकार द्वारा पलक पांवडे बिछा दिए गए। एमपी के हरदा जिले के चारखेडा स्थित अपने आश्रम में बापू ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री अब तक बापू से सात बार माफी मांग चुके हैं। अपने अहं में चूर बापू ने यह तक कह डाला कि दुनिया में कोई ताकत एसी नहीं है, जो उन्हें गिरफ्तार कर सके। अपनी तुलना जगतगुरू शंक्राचार्य जयेंद्र सरस्वती से करते हुए बापू यह तक कह गए कि जिस तरह जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार करने से जयललिता का तख्ता पलट हुआ था, ठीक उसी तरह उनके खिलाफ षणयंत्र करने वालों की सत्ता पलट हो जाएगी।


नशा शराब में होता तो नाचती बोतल . . .
देश के शासक चाहे जितने कानून कायदे बना ले, उसका पालन जितनी भी मुस्तैदी से करवा ले पर मयकशों को तो पीने का बहाना चाहिए। इसके लिए वे कानून को ताक पर रखने से भी पीछे नहीं रहते। 2009 में दिल्ली की यातायात पुलिस की सुस्त चाल के बावजूद शराब पीकर वाहन चलाने वालों ने एक नया रिकार्ड बना दिया है। वर्ष 2008 से साठ फीसदी ज्यादा लोगों के चालान शराब पीकर वाहन चलाने के जुर्म में काटे गए हैं। यातायात पुलिस के लिए सरदर्द बनने वाले शराबी वाहन चालकों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा कोई अच्छा संकेत कतई नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2008 में जहां शराबी वाहनों चालकों के 7579 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं बीते साल 12,109 लोगों के चालान इस मद में काटे गए हैं। यह कमाल तब हुआ जब साल भर यातायात पुलिस का अमला यातायात नियमों की अनदेखी के लिए प्रसिद्धि पा चुका था। सच है नशा शराब में होता तो नाचती बोतल . . .।


नए साल पर डेढ सौ करोड के एसएमएस!
क्या भारत देश अभी पिछडा हुआ है, क्या हिन्दुस्तान आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है, इस तरह के सवाल भले ही आम हों किन्तु जमीनी हालात देखकर किसी भी दृष्टिकोण से यह नहीं लगता कि इन बातों में बहुत ज्यादा दम है। सवा सौ करोड की आबादी वाले इस भारतवर्ष में करीब 50 करोड फोन उपभोक्ता हैं, जिनमें से 43 करोड मोबाईल धारक हैं। अब यह आंकडा साबित करता हैं कि हर दूसरे आदमी के पास फोन है। हैरानी तब बढ जाती है जब पता चलता है कि 31 दिसंबर से 01 जनवरी के बीच महज एक दिन में डेढ सौ करोड रूपए के एसएमएस भेजे गए। यद्यपि यह आंकडा पिछली दीपावली के आंकडे को पार नहीं कर सका है, फिर भी डेढ सौ करोड रूपए मायने रखते हैं। जिस देश में सत्तर फीसदी लोगों को दो टाईम का भोजन नसीब न हो, जहां तन ढांकने लोगों के पास पर्याप्त कपडे न हों, वहां एक दिन में वह भी अंग्रेजी कलेंडर के नए साल में डेढ सौ करोड रूपए फूंकने का ओचित्य समझ से परे ही है।


सादगी की मिसाल बने अरूण यादव!
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र एवं केंद्रीय भारी उद्योग राज्यमंत्री अरूण यादव ने सादगी की गजब मिसाल कायम की है। मध्य प्रदेश के खण्डवा से चुनाव लोकसभा चुनाव जीते अरूण यादव ने नया साल दलितों के बीच मनाया। यद्यपि वे दो जनवरी को खरगोन के सनावद क्षेत्र के लोधी ग्राम पहुंचे पर नए साल में अपने जनसेवक को अपने बीच देखकर गांव के लोग फूले नहीं समाए। गांव में वे एक दलित देवराम के घर पहुंचे और भोजन किया। इस भोज की विशेषता यह रही कि चर्चा के दौरान ही अरूण यादव ने देवराम को कहा कि वे उसी के घर भोजन करेंगे। देवराम अचंभित होकर कभी अपने झोपडे तो कभी केंद्रीय मंत्री को निहारता रहा। भोजन तैयार होने तक लगभग आधे घंटे से भी अधिक समय तक वे देवराम के घर पर ही रूके रहे, और ग्रामीणों से चर्चा की। अरूण यादव की सादगी देखकर देवराम के मुंह से बरबस ही निकल पडा कि जिस तरह भगवान राम शबरी के घर गए थे, उसी तरह अरूण यादव उनके घर पहुचे हैं।


अपरंपार ही है साई की लीला

महाराष्ट्र प्रदेश के अहमद नगर जिले में एक अनजान कस्बा था, शिरडी, जब इस गांव में साई नाम का बालक आया तबसे यह कस्बा भारत के मानचित्र में विशेष स्थान रखने लगा है। शिरडी के फकीर साई बाबा के आज देश विदेश में न जाने कितने भक्त फैले हैं। साई बाबा ने अपना सारा जीवन परमार्थ के लिए बडी ही सादगी से गुजार दिया। बाबा के भक्तों को बाबा की कृपा से अपार सुख और समृद्धि मिलती है इस बात में भी संदेह नही है। हर साल बाबा के भक्त बाबा के लिए कुछ न कुछ नया कर ही जाते हैं। कोई सोने का सिंहासन देता है तो कोई भक्तों को ठहरने के लिए विशाल भक्त निवास की स्थापना करवाता है। बीते साल के अंतिम सप्ताह में बाबा के संस्थान को 10 करोड रूपए का दान मिला है। 23 से 31 दिसंबर के बीच के दान में यह सबसे अधिक दान है। इसके पूर्व 2007 में सात करोड तो 2008 में इसी अवधि में बाबा के मंदिर को 8 करोड का दान मिला था। 2009 के साल में बाबा के शिरडी संस्थान को 240 करोड की राशि दान में मिली है। बाबा के संस्थान को चाहिए कि शिरडी में एक एसा भव्य अस्पताल बनाए जहां हर प्रकार के रोगों का निशुल्क इलाज हो सके। शायद बाबा की मंशा सभी को स्वस्थ्य और संपन्न रखने की ही हो।

ये दिल्ली का जाम है लवली जी

दिल्ली को मयकशों और यातायात दोनों के जाम के लिए पहचाना जाने लगा है। यहां दिन उगते ही पैग (जाम) लगाने वालों और इसी समय से सडकों पर यातायात जाम लगाने वालों की कमी नहीं है। कल तक इस तरह की बातें दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री अरविंद कुमार लवली ने मीडिया के माध्यम से ही सुनी होंगी पर पहली मर्तबा वे इस जाम से रूबरू हो ही गए। वाक्या यमुना बैंक से आनन्द विहार मेट्रो रूट के उदघाटन का है। बुधवार को बारह बजे केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मार्ग पर मेट्रो रेल को हरी झंडी दिखाकर इसका शुभारंभ किया। जब हरी झंडी दिखाई जा रही थी तब लवली दिल्ली के जाम से जूझ रहे थे। फिर क्या था, अतिथि इस रेल में सवार होकर आनन्द विहार पहुंचे। आनन्द विहार में लवली इनके साथ हुए और फिर वहां से मेट्रो से वापस यमुना बैंक पहुंचे। अब शायद दिल्ली सरकार के एक मंत्री को समझ में आ ही गया होगा कि दिल्ली की जनता कितनी सहनशील है कि घंटों जाम में फंसे रहने के बावजूद भी अपना आपा नहीं खोती।

कांग्रेस के बस की बात नहीं महिला आरक्षण
कांग्रेस भले ही देश के सर्वोच्च पद महामहिम राष्ट्रपति पर पहली महिला श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार को बिठाकर अपनी पीठ थपथपा रही हो पर लगता नहीं है कि कांग्रेस के बस की बात रह गई है महिलाओं को आगे लाना। जिस पार्टी की कमान पिछले दस सालों से श्रीमति सोनिया गांधी के हाथ में रही हो, उस पार्टी की राजस्थान इकाई को एक अदद महिला भी नहीं मिल सकी है, पंचायत चुनाव के प्रभारी बनाने के लिए। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता पर काबिज है। कांग्रेस भले ही महिलाओं को बढावा देने और उन्हें आरक्षण देने के छद्म दावे करे किन्तु पार्टी के अंदर उसकी सोच इससे उलट ही है। राजस्थान में आरक्षण के बाद के परिदृश्य में अब 33 जिला परिषदों में से 16 की कमान इस मर्तबा महिलाओं के हाथों में होगी। महिला आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.गिरिजा व्यास, महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभा ठाकुर के राजस्थान मूल के होने के बाद भी कांग्रेस को सूबे में प्रभारी बनाने के लिए एक भी योग्य महिला नेत्री का न मिलना आश्चय जनक ही माना जाएगा।

पुच्छल तारा
दिल्ली भीषण ठंड और कोहरे की जद में है। आवागमन मानों थम सा गया हो। दिल्ली की रफ्तार में बे्रक लग गए हैं। सडकों पर दिन रात गाडियां मानों रेंग रहीं हों। दिल्ली से ही रोशनी भार्गव ने मेल भेजा है कि इन हालातों में सालों बाद दिल्ली में वाहन चालकों में ट्रेफिक सेंस जागा है। पहली बार गाडी चलाने वाले रेड लाईट पर बहुत संभलकर चल रहे हैं, कोई भी रेड लाईट जंप नहीं कर रहा है। यह वाकई सुखद अनुभूति है कि कोहरे में ही सही दिल्ली में यातायात नियमों का अक्षरश: पालन होता दिख रहा है। एसा कुछ भी नहीं है। दरअसल जान सबको प्यारी है। कोई भी कोहरे में रेड लाईट जम्प कर एक्सीडेंट का जोखिम नही उठाना चाहता है। पता नहीं कब कौन सी गाडी सामने से आ जाए और ठोककर चली जाए। सो बेहतरी इसी में है कि चौक चौराहों पर हरी लाईट होने पर ही अपनी गाडी आगे बढाएं।

रविवार, 10 जनवरी 2010

टि्वटर को खरीद क्यों नहीं लेती भारत सरकार!


टि्वटर को खरीद क्यों नहीं लेती भारत सरकार!

थुरूर कांग्रेस की तो टि्वटर थुरूर की कमजोरी

शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा हो रहे हैं थुरूर के

(लिमटी खरे)

भारत के विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर और विवादों का न टूटने वाला नाता गहराता जा रहा है। थुरूर एक के बाद एक हमले कर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को मुश्किलों में डालने से नहीं चूक रहे हैं। कभी वे हवाई जहाज की इकानामी क्लास को मवेशी का बाडा तो कभी काम के बोझ तले दबे होने की पीडा उजागर करते हैं। अपने ही विभाग के कबीना मंत्री के फैसले के खिलाफ भी वे खुलकर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे हैं। थुरूर की इन नादानियों को कमतर आंककर कांग्रेस नेतृत्व हल्की फुल्की झिडकी लगाकर ही संतोष कर लेती है। मोटी चमडी वाले थुरूर पर इन छोटी मोटी डांट का असर होता नहीं दिख रहा है।


हाल ही में एसोसिएशन ऑफ इंडियन डिप्लोमेट और इंडियन कांउसिल ऑफ वल्र्ड अफेयर्स के एक कार्यक्रम में शिरकत के दौरान विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर ने भारत पर डेढ सौ से अधिक साल तक राज करने वाले ब्रिटेन के लेबर एमपी बी.पारेख के द्वारा देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी की विदेश नीति की आलोचना का न केवल समर्थन किया है, वरन् इसमें अपनी और से कशीदे भी गढे हैं।

बकौल थुरूर, सभ्यता की विरासत की अभिव्यक्ति में महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू ने असाधारण योगदान दिया है, साथ ही दोनों ने दुनिया में भारत का स्थान बनाया है, लेकिन विदेश नीति के संचालन के लिए हमें यह नकारात्मक छवि भी दी है कि यह नीति अन्य लोगों के व्यवहार पर नैतिकता भरी टिप्पणी पर ही संचालित होती है। वैसे कांग्रेस ने इसे नेहरू की विदेश नीति की आलोचना के तौर पर लिया है।


थुरूर चूंकि भारत गणराज्य के विदेश राज्य मंत्री जैसे जिम्मेदार ओहदे पर हैं, इस लिहाज से उनके द्वारा कही गई बात भारत सरकार की बात ही मानी जाएगी। वैसे भी शशि थुरूर भारत के राजनयिक रहे हैं, और उनकी जिन्दगी का बहुत बडा हिस्सा उन्होंने भारत के बाहर ही गुजारा है। थुरूर अगर नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेश नीति की आलोचना कर रहे हैं तो इस बात में दम अवश्य होगा। अब भारत सरकार या सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को नैतिकता के आधार पर यह स्पष्ट करना ही होगा कि नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेश नीति सही थी या उसमें थुरूर ने जो गिल्तयां निकालीं हैं वे सही हैं। इस मामले में कांग्रेस या भारत सरकार मौन रहती है तो यह दोनों ही की मौन स्वीकृति के तौर पर लिया जा सकता है।

इतना सब होने पर विपक्ष चुप्पी साधे बैठा है। दरअसल विपक्ष भी नहीं चाहता है कि थुरूर को मंत्री पद से हटाया जाए। एक अकेला विदेश राज्य मंत्री ही विपक्ष की भूमिका का निर्वहन जो कर रहा है। अपनी ही सरकार की नीतियों पर तल्ख टिप्पणियां भले ही थुरूर को सुर्खियों में रखे हुए हो पर इससे नुकसान में तो कांग्रेस ही आ रही है।

गौरतलब है कि पूर्व में थुरूर ने कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के दिल्ली से मुंबई तक के इकानामी क्लास के हवाई सफर के तत्काल बाद इकानामी क्लास को केटल क्लास अर्थात मवेशी का बाडा की संज्ञा दे दी थी। सोशल नेटविर्कंग वेव साईट टि्वटर का मोह बडबोले शशि थुरूर आज तक नहीं छोड पाए हैं। विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा के वीजा नियमों को कडा करने के फैसले के उपरांत थुरूर ने उस पर भी टिप्पणी कर दी थी।

एक के बाद एक गिल्त करने के बाद भी थुरूर का भारत सरकार के जिम्मेदार मंत्री पद पर बने रहना सभी को आश्चर्यचकित किए हुए है। जिस तरह महाभारत काल मेें शिशुपाल के सौ अपराधों को एक के बाद एक कृष्ण ने क्षमा किए थे, लगता है उसी तर्ज पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी थुरूर के बडबोलेपन को नजर अंदाज करती जा रहीं हैं। वैसे भी राजनयिक से जनसेवक बने शशि थुरूर कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की पसंद हैं। संभवत: यही कारण है कि कांग्रेस को एक के बाद एक नुकसान पहुंचाने वाले शशि थुरूर पर लगाम कसने से पुत्रमोह में अंधी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी भी कठोर कदम उठाने से हिचक ही रहीं हैं।

हालात देखकर लगने लगा है कि बडबोले विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर के लिए सरकारी कामकाज से ज्यादा टि्वटर पर अपने लाखों प्रशंसकों के सवालों का जवाब देना और उल जलूल बातें बोलकर मीडिया की सुर्खियों में बने रहना ज्यादा अहम हो गया है। शशि थुरूर की इन हरकतों के बाद भी अगर कांग्रेस उन्हें मंत्री के तौर पर झेल रही है तो यह साबित होता है कि थुरूर कांग्रेस की मजबूरी बन गए हैं, कारण चाहे जो भी हो। इसके अलावा दूसरी बात यह साफ तौर पर उभरकर सामने आ रही है कि थुरूर के लिए अनर्गल बयान बाजी और टि्वटर प्रेम एक अच्छा शगल बनकर रह गया है।

हमारी नजर में थुरूर के इस तरह के कदमों का कांग्रेस के पास कोई ईलाज नहीं है। अब दो ही रास्ते बचते हैं, अव्वल तो यह कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार टि्वटर नाम की सोशल नेटविर्कंग वेव साईट को ही खरीद ले और उसे नेशनल इंफरमेंशन सेंटर (एनआईसी) के हवाले कर दे, ताकि सरकारी नोटशीट और लिखापढी भी अब इसके माध्यम से संचालित हों, ताकि कांग्रेस के लाडले थुरूर का टि्वटर से मन भी बहलता रहेगा और कांग्रेस भी बदनामी से बच जाएगी। दूसरे यह कि भारत में इस वेव साईट को ही प्रतिबंधित कर दिया जाए। इससे थुरूर की मन की बातें भारत छोडकर शेष दुनिया में तो पढा जा सकेगा पर भारत में मीडिया में थुरूर के बडबोलेपन को स्थान नहीं मिल सकेगा। इस तरह थुरूर का टि्वटर प्रेम भी जिंदा रहेगा और कांग्रेस की लाज भी बच जाएगी।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

मकर संक्रति का इंतजार कर रही है कांग्रेस


मकर संक्रति का इंतजार कर रही है कांग्रेस


रूढीवादी मान्यताओं को अभी भी निभा रही है कांग्रेस

(लिमटी खरे)


नई दिल्ली 09 जनवरी। सत्ता और संगठन में फेरबदल के लिए सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस आज भी पुरानी परंपराओं का बाकायदा निर्वहन कर रही है। भारतीय प्राचीन परंपराओं के अनुसार अच्छे काम के लिए पूस माह के बाद मकर संक्राति के बाद का समय शुभ माना जाता है। अत: कांग्रेस भी अपने ढांचे में फेरबदल के लिए इस शुभ घडी का इंतजार कर रही है।


कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राजनैतिक पंडितों ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया है कि कांग्रेस के संगठन और सत्ता के केंद्रों में परिवर्तन के लिए 14 जनवरी के बाद का समय शुभ है।

अपने अंधविश्वासों के लिए प्रसिद्ध कांग्रेस के लिए अभी तीन राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति सबसे अहम मसला है। इसका कारण यह है कि गणतंत्र की स्थापना के पचास साल पूरे होने पर राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के राजभवन में स्थायी नियुक्ति इसलिए किया जाना अनिवार्य होगा, क्योंकि तीनों सूबों की राजधानी में लाट साहेब (महामहिम राज्यपाल) को गणतंत्र दिवस की परेड की सलामी भी लेना है। वर्तमान में इन सूबों के राजभवनों में अन्य प्रदेशों के लाट साहबों को अतिरिक्त प्रभार देकर बिठाया गया है। इसके आलावा महाराष्ट्र और पंजाब में भी राजभवन रिक्त होने वाले हैं।


राज्यपालों के मामले में प्रधानमंत्री की राय अपनी पार्टी की अध्यक्ष से कुछ जुदा समझ में आ रही है। पीएमओ के सूत्रों का दावा है कि वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह राज्यपालों के पदों पर नौकरशाहों की नियुक्ति के हिमायती हैं, ताकि राज्यों पर निगरानी रखी जा सके। नौकरशाहों में सच्चर समिति के अध्यक्ष रहे राजेंद्र सच्चर, पूर्व केबनेट सचिव रहे बी.के.चतुर्वेदी, पद्मनाभैया के अलावा विवादस्पद रहे रोनेन सेन का नाम चर्चाओं में है। गौरतलब है कि सेन ने संसद सदस्यों को ``हेड लेस चिकन`` कहकर सनसनी फैला दी थी।

इससे उलट कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी सूत्रों का कहना है कि राजमाता चाहतीं हैं कि इन पदों पर राजनेताओं को बिठाकर उन्हें ``एडजेस्ट`` किया जाए। सोनिया चाहतीं हैं कि शीशराम ओला, मोहसिना किदवई, पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल जैसे नाम राजनीतिक फिजां में तैर रहे हैं।


कांग्रेस सबसे अधिक पशोपेश में पश्चिम बंगाल को लेकर है। बंगाल में रेलमंत्री अगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजेंद्र सच्चर पर दांव लगाना चाह रहीं हैं। ममता के करीबियों का कहना है कि ममता बनर्जी को सच्चर से कोई खास लगाव नहीं है। वह तो बस मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सच्चर समिति के अध्यक्ष रहे राजेंद्र सच्चर को कोलकता के राजभवन पर काबिज कर अल्पसंख्यकों को रिझाने के फार्मूले पर आगे बढ रहीं हैं।

कांग्रेस बंगाल के राजभवन पर मोहसिना किदवई के नाम पर जोर मार रही है। उधर मोहसिना इसके लिए राजी ही नहीं बताई जा रहीं हैं। सूत्रों ने बताया कि मोहसिना को मनाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल के वयोवृद्ध नेता प्रणव मुखर्जी को जिम्मेदारी सौंपी है। बताया जाता है कि प्रणव और मोहसिना के बीच हुई कई दौर की चर्चाओं में एक तरफ जहां प्रणव दा ने मोहसिना को सोनिया का संदेश दिया तो मोहसिना ने साफ तोर पर कह दिया कि वे अपना राज्यसभा का कार्यकाल बढवाने में ज्यादा इच्छुक हैं।

बंगाल का मसला कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कूटनीतिक चाल चलते हुए मीडिया में यह उछाल दिया कि वे राजेंद्र सच्चर को बंगाल के लाट साहब बनाने के लिए आतुर हैं। अब कांग्रेस अगर सच्चर से मुंह फेरती है तो सूबे में अल्पसंख्यक कांग्रेस से दूर हो सकते हैं, और अगर हामी भरती है तो जीत ममता की ही मानी जाएगी। यही कारण है कि कांग्रेस का नेतृत्व अपना पूरा जोर लगा रहा है कि मोहसिना किदवई को इसके लिए राजी करवा लिया जाए।

इसके अलावा पद्मनाभैया को आंध्र प्रदेश के मौजूदा संकट निपटाने के लिए वहां भेजा जा सकता है। रोनेन सेन को पंजाब भेजा सकता है। इसके अलावा छत्तीसगढ के महामहिम राज्यपाल नरसिम्हन को भी आंध्र भेजने पर विचार विमर्श किया जा रहा है। उन्हें अगर वहां भेजा जाता है तो फिर छत्तीसगढ के लिए शीशराम ओला के नाम पर विचार संभव है।

राज्यपालो की नियुक्ति के बाद सोनिया गांधी केंद्र सरकार में कांग्रेस के मंत्रियों के परफारमेंस के हिसाब से फेरबदल कर सकतीं हैं। इसमें युवाओं को महत्वपूर्ण जवाबदारी से नवाजे जाने की उम्मीद है। केंद्र में होने वाले फेरबदल के उपरांत कांग्रेस की राजमाता संगठनात्मक स्तर पर अपने पत्ते फेंटेंगी पर उम्मीद है कि इस बार वे अपने सलाहकारों के बजाए कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के लिए भविष्य का रोडमेप बनाने की तैयारी में संगठन में अमूल चूल परिवर्तन कर सकतीं हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

चिकित्सा कर क्यो नहीं लगाती सरकार!

चिकित्सा कर क्यो नहीं लगाती सरकार!

एक कर से सभी रोगों का इलाज संभव

(लिमटी खरे)


भारत को आजाद हुए बासठ साल से अधिक बीत चुके हैं। मानव जीवन में अगर कोई बासठ बसंत देख ले तो उसे उमरदराज माना जाता है। सरकार भी बासठ साल की आयु में अपने कर्तव्य से सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। राजनीति में यह नहीं होता है। राजनीति में 45 से 65 की उमर तक जवान ही माना जाता है। इन बासठ सालों देश पर हुकूमत करने वाली सरकारें अपनी ही रियाया को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने में नाकाम रहीं हैं, इससे ज्यादा और शर्म की बात हिन्दुस्तान के लिए क्या हो सकती है।

अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर भारत के हितों को अब तक कुबाZन ही किया गया है, यहां के जनसेवकों ने। देश में सरकारी तौर पर आयुZविज्ञान (मेडिकल), आयुर्वेदिक, दंत, और होम्योपैथिक कालेज का संचालन किया जाता रहा है। अब तो निजी क्षेत्र की इसमें भागीदारी हो चुकी है। भारत में न जाने कितने चिकित्सक हर साल इन संस्थाओं से पढकर बाहर निकलते हैं। इन चिकित्सकों को जब दाखिला दिलाया जाता है तो सबसे पहले दिन इन्हें एक सौगंध खिलाई जाती है, जिसमें हर हाल में बीमार की सेवा का कौल दिलाया जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पढाई पूरी करने के साथ ही इन चिकित्सकों की यह कसम हवा में उड जाती है।


हाल ही में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को सुझाव दिया है कि एमबीबीएस की डिग्री के बाद अगर कोई विद्यार्थी तीन साल तक ग्रामीण अंचलों में सेवा का वायदा करे तो स्नातकोत्तर की परीक्षा में 25 फीसदी आरक्षण लागू किया जाए। सवाल यह उठता है कि इस व्यवसायिक पाठ्यक्रम में प्रलोभन का क्या काम।

भारत को भी अन्य देशों की भांति चिकित्सा की डिग्री के उपरांत पंजीयन के पहले यह शर्त रख देना चाहिए कि सुदूर ग्रामीण अंचलों और पहुंच विहीन क्षेत्रों में कम से कम छ: माह, विकासखण्ड, तहसील और जिला मुख्यालय से निर्धारित दूरी में एक साल तक सेवाएं देने वाले चिकित्सकों का सशर्त पंजीयन किया जाएगा कि वे अपनी सेवाओं का प्रमाणपत्र जब जमा करेंगे तब उनका स्थाई पंजीयन किया जाएगा।

इसके अलावा अगर केंद्र सरकर विदेशों की तरह स्वास्थ्य कर लगा दे तो सारी समस्या का निदान ही हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि न्यूनतम सालाना शुल्क पर साधारण और कुछ अधिक शुल्क पर असाध्य बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त मुहैया करवाए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले इस कर से मुक्त रखे जाएं। अगर एसा हुआ तो चिकित्सकों की जमी जकडी दुकानों पर ताले लगने में देर नहीं लगेगी। मोटी कमाई करने वाले मेडिकल स्टोर और दवा कंपनियों के मेडिकल रिपरजेंटेटिव भी अपना का समेटने लग जाएंगे। जब अस्पताल में ही इलाज और दवाएं मुफत में मिलेंगी तो भला कोई निजी चिकित्सकों के पास क्यों जाएगा। इससे निजी तौर पर चिकित्सा पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगी। डिग्री धारी चिकित्सक सरकारी तौर पर ही इलाज करने को बाध्य होंगे।



एक खबर के अनुसार आने वाले चार सालों में भारत पर डेढ सौ से ज्यादा समय तक राज करने वाले ब्रिटेन से लगभग पच्चीस हजार चिकित्सक भारत लौटने के इच्छुक हैं। इनकी वतन वापसी से अखिल भारतीय आयुZविज्ञान संस्थान की बिहार, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, उडीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खुलने वाली नई शाखाओं में चिकित्सकों के टोटे से निजात मिलने की उम्मीद है।

आज हिन्दुस्तान में चिकित्सा सुविधाओं का आलम यह है कि देश में 45 करोड से भी अधिक लोगों को अने निवास के इर्द गिर्द सवास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। देश में औसतन 10 हजार लोगों के लिए अस्पतालों में सिर्फ सात बिस्तर मौजूद हैं, जिसका औसत विश्व में 40 है। भारत में हर साल तकरीबन 41 हजार चिकित्सकों की आवश्यक्ता है, जबकि देश में उपलब्धता महज 17 हजार ही है।


सौ टके का सवाल यह है कि अस्सी के दशक के उपरांत चिकित्सकों का ग्रामीण अंचलों से मोह क्यों भंग हुआ है। इसका कारण साफ है कि तेज रफ्तार से भागती जिंदगी में भारत के युवाओं को आधुनिकता की हवा लग गई है। कहने को भारत की आत्मा गांव में बसती है मगर कोई भी स्नातक या स्नातकोत्तर चिकित्सक गांव की ओर रूख इसलिए नहीं करना चाहता है, क्योंकि गांव में साफ सुथरा जीवन, बिजली, पेयजल, शौचालय, शिक्षा, खेलकूद, मनोरंजन आदि के साधानों का जबर्दस्त टोटा है। भारत सरकार के गांव के विकास के दावों की हकीकत देश के किसी भी आम गांव में जाकर बेहतर समझी और देखी जा सकती है।

इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर केंद्र में काबिज हुई कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार द्वारा अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ग्रामीण स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की शुरूआत की थी। 2005 में इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को भी आरंभ किया गया था। अपने अंदर वास्तव में ग्रामीणों को स्वस्थ्य रखने की अनेक योजनाओं को अंगीकार किए इस मिशन की असफलता के पीछे यह कारण है कि इसे बिना पूरी तैयारी किए हुए ही आनन फानन में लागू कर दिया गया।


दरअसल इस मिशन की सफलता चिकित्सकों पर ही टिकी थी, जो ग्रामीण अंचलों में सेवाएं देने को तैयार हों। अमूमन देश के युवा चिकित्सक बडे और नामी अस्पतालों में काम करके अनुभव और शोहरत कमाना चाहते हैं, फिर वे अपना निजी काम आरंभ कर नोट छापने की मशीन लगा लेते हैं। अस्पतालों में मिलने वाले मिक्सचर (अस्सी के दशक तक दवाएं अस्पताल से ही मुफ्त मिला करतीं थीं, जिसमें पीने के लिए मिलने वाली दवा को मिक्सचर के आम नाम से ही पुकारा जाता था) में राजनीति के तडके ने जायका इस कदर बिगाडा कि योग्य चिकित्सकों ने सरकारी अस्पतालों को बाय बाय कहना आरंभ कर दिया।

आज देश भर में दवा कंपनियों ने चिकित्सकों के साथ सांठगांठ कर आम जनता की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। लुभावने पैकेज के चलते चिकित्सकों की कलम भी उन्हीं दवाओं की सिफारिश करती नजर आती है, जिसमें उन्हें दवा कंपनी से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लाभ मिल रहा हो। चिकित्सकों को पिन टू प्लेन अर्थात हर जरूरी चीज को मुहैया करवा रहीं हैं, दवा कंपनियां।

इस साल केंद्र सरकार ने एक अनुकरणीय कदम उठाकर चिकित्सकों के पेट पर लात जमा दी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक जनवरी से चिकित्सकों के लिए नई आचार संहिता जारी कर दी है। अब चिकित्सक दवा कंपनियों से न तो कोई उपहार ले सकेंगे और न ही कंपनी के पैसे पर देश विदेश की सैर कर सकेंगे। दरअसल, चिकित्सक और दवा कंपनियों की सांठगांठ से मरीज की जेब ही हल्की होती है। अनेक नर्सिंग होम के संचालकों के परिवार को दवा कंपनियां न केवल विदेश यात्रा करवातीं हैं, बल्कि उनके लिए शापिंग का प्रबंध भी करती हैं। अब अगर एसा पाया गया तो चिकित्सक पर कार्यवाही कर उसकी चिकित्सक की डिग्री भी रद्द किए जाने का प्रावधान है।

केंद्र सरकार की हेल्थ मिनिस्ट्री ने अब एमसीआई के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने पर विचार आरंभ किया है। यहां से पढकर निकले चिकित्सक पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में ही अपनी सेवाएं देने प्रतिबद्ध होंगे। इतना ही नहीं इनके लिए संस्थानों की स्थापना भी ग्रामीण क्षेत्रों में ही की जाएगी। अगले माह फरवरी में होने वाले सम्मेलन में इसको मूर्तरूप दिया जा सकता है। सुई का कांटा फिर वही अटक जाएगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते इसमें छात्र तो प्रवेश ले लेंगे, किन्तु उन्हें पढाने वाले शिक्षक क्या गांव की ओर रूख करना पसंद करेंगे।

इस सबसे उलट छत्तीसगढ में सच्चे चिकित्सकों की तस्वीर भी दिखाई पडती है। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से डिग्री हासिल करने वाले चिकित्सकों ने रायुपर से लगभग 120 किलोमीटर दूर गनियारी गांव में एक अनूठा खपरेल वाला अस्पताल खोला है। दिल्ली निवासी डॉ. योगेंद्र जैन और गुडगांव निवासी डॉ.रमन कटियार ने एम्स से एमबीबीएस किया है। इन दोनों ने पिछले लगभग एक दशक पूर्व इस गांव में जनस्वास्थ्य केंद्र की आधार शिला रखी। आज कारवां इतना आगे बढ गया कि यहां दस चिकित्सक हैं जिनमें से नौ एमडी हैं और पांच ने तो एम्स से एमडी की है। ये आज 1500 के तकरीबन गांव वालों का इलाज कर रहे हैं। लोगों के मुंह से इन्हें देखकर बरबस ही निकल पडता है, इन्हें डालर नहीं दुआ कमानी थी जनाब।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

यर्थाथ के मैदान में चक दे!

यर्थाथ के मैदान में चक दे!


खेलों को बढावा देने भारत सरकार को बनानी होगी व्यवहारिक नीति

(लिमटी खरे)


शहरूख खान अभिनीत ``चक दे`` चलचित्र ने भारत के होनहार किन्तु अवसर न मिलने वाले खिलाडियों के मन में एक आशा की किरण जगाई थी। चलचित्र में कुछ इसी तरह की बातों का शुमार किया गया था। सुदूर ग्रामीण अंचलों में छिपी प्रतिभाओं को लगने लगा था कि इस फिल्म के आने के बाद देश पर राज करने वाले शासकों का ध्यान उनकी ओर जाएगा और वे भी कुछ कर दिखाएंगे।

वस्तुत: एसा कुछ हो नहीं सका। खिलाडियों की आशाओं पर समय के साथ तुषारापात हो गया। गांवों कस्बों में पलने वाले खिलाडी एक बार फिर गुमनामी के अंधेरों में खोने लगे। कभी भारत की आन बान और शान का प्रतीक रही हाकी भी रसातल से अपने आप को उबारने में पूरी तरह नाकाम रही। आज के समय में हाकी का खेल गली मोहल्लों मेें भी दम तोड चुका है।


वहीं दूसरी ओर क्रिकेट का खेल पैसा बनाने का शानदार जरिया बनकर उभरा। देश विदेश में क्रिकेट प्रेमियों की संख्या में दिनों दिन इजाफा होने लगा। टेस्ट क्रिकेट के बाद एक दिवसीय क्रिकेट ने लोगों के दिलो दिमाग पर गहरा प्रभाव डाला। इसके प्रायोजकों की संख्या में जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया। मीडिया ने भी हाकी को उभारने के बजाए क्रिकेट को ही सरताज बनाने का प्रयास किया।


इसके बाद बारी आई फटाफट क्रिकेट की। ट्वंटी ट्वंटी ने लोगों को अपना दीवाना बना लिया। देश में अब तो ट्वंटी ट्वंटी क्रिकेट टीम की बाकायदा बोलियां भी लगने लगीं। देश के धनपतियों ने क्रिकेट के हुनरबाजों की तबियत से बोलियां लगाकर इसे और अधिक हवा दी। जनवेवकों के साथ रूपहले पर्दे के आदाकारों ने भी इस खेल में अपनी जबर्दस्त रूचि दिखाई है। आज क्रिकेट का जादू देशवासियों के सर चढकर बोल रहा है।

चक दे में जब महिला हाकी टीम को चैंपियनशिप में जाने से मना कर दिया जाता है तो उसके बाद ज्यूरी महिला टीम को पुरूष हाकी टीम से खेलने के लिए चुनौति देती है। यद्यपि यह हर प्रकार से अनुचित था कि महिलाओं को पुरूषों के सामने खडा कर उनकी परीक्षा ली जाए। फिर भी महिला हाकी टीम के शानदार प्रदर्शन के आगे कमेटी को झुकना होता है।


कमोबेश इसी तर्ज पर गुजरात में नई परंपरा का आगाज होने जा रहा है। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में यह संभवत: पहला मौका होगा जबकि महिला क्रिकेट टीम द्वारा पुरूष क्रिकेट टीम को चुनौति दी जाएगी। बडोदरा में आयोजित डी.के.गायकवाड क्रिकेट प्रतियोगिता में लोग इस तरह का नजारा पहली बार ही देखेंगे।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का यह पहला आधिकारिक आयोजन है। इसमें अंडर 14 महिला क्रिकेट टीम अपने हमउमर युवाओं के सामने अपना जौहर दिखाएगी। कहने को तो भारतीय महिला क्रिकेट टीम को सडी गली टीम का दर्जा देने में बीसीसीआई द्वारा कोई कोर कसर नहीं रख छोडी है।


भारतीय महिला क्रिकेट टीम 2005 में वूमेंस वल्र्ड कप में रनरअप, 2009 में आइसीसी ट्वंटी ट्वंटी में सेमीफाईनल तक पहुचंी थी। महिलाओं के एशिया कप पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने चार बार अपना नाम लिखा है। फिर क्या कारण है कि जया शर्मा, झूलन गोस्वामी, नीतू डेविड आदि नामी गिरमी महिला खिलाडियों को सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी की तरह लोगो की जुबान पर नहीं चढ सकीं। हमें इसके कारण खोजने ही होंगे।

एक तरफ जहां देश को इंदिरा गांधी जैसी सफल और सुलझी महिला प्रधानमंत्री, 2007 में पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति के तौर पर श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, लोकसभाध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की आसंदी पर सुषमा स्वराज जैसी नेत्रियां मिलीं हैं तब फिर हाकी और क्रिकेट में महिलाएं प्रसिद्धि पाने से क्यों चूक रहीं हैं।

देखा जाए तो टेबिल टेनिस, बेडमिंटन और लॉन टेनिस में महिलाओं को मिक्स डबल्स खेलने की इजाजत है। सिंगल्स में भी महिलाओं ने पुरूष क्रिकेट खिलाडियों को प्रसिद्धि के मामले में काफी पीछे छोड दिया है। रही बात क्रिकेट और शतरंज की तो महिलाओं को कमतर आंककर उन्हें पुरूषों के सामने खडे होने का मौका क्यों नहीं दिया जाता है यह बात आज भी यक्ष प्रश्न की तरह ही खडी हुई है।


पुरूष प्रधान भारतीय संस्कृति में महिलाओं के साथ दोयम दर्ज का ही व्यवहार सदा से होता आया है। महिलाओं को आज भी बच्चे पैदा करने की मशीन और चौका चूल्हा करने के लिए ईश्वर की रचना ही माना जा रहा है। भारतीय पुरूष भूल जाता है कि अंतरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला भी इसी भारत देश में जन्मी एक कन्या थी।

बहरहाल बीसीसीआई द्वारा गुजरात के बडोदरा में आयोजित होने वाले इस विपरीत लिंगी क्रिकेट मैच की सराहना की जानी चाहिए। मीडिया को चाहिए कि इस मैच को पूरा कवरेज दे भले ही बीसीसीआई इस मामले में प्रायोजक उपलब्ध कराए अथवा नहीं। इस मैच में चाहे महिला क्रिकेट टीम हारे या जीते उसका मनोबल बढाने के लिए लोगों को आगे आना होगा।

तरह के मैच से एक तरफ युवतियों के मन से यह बात निकल सकेगी कि वे किसी भी मामले में पुरूषों के पीछे हैं और दूसरी तरफ उन्हें अपने फन को निखारने का मौका भी मिलेगा। कहने को खेल एवं युवक कल्याण विभाग द्वारा जिला स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक क्रीडा प्रतियोगिताओं का आयोजन कराया जाता है, पर इनकी असलियत किसी से छिपी नहीं है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अनेक जिलों में इस तरह के आयोजन सरकारी धन के अपव्यय के अलावा और कुछ भी नहीं हैं। आज वक्त आ गया है कि जब पुरानी धारणाओं और वर्जनाओं को धवस्त कर नई ईबारत लिखी जाए।

ब्रितानियों के समय से चली आ रही नौकरशाही ने भारत में कम से कम खेलों के बढावे के लिए कोई ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की है। विडम्बना यही कही जाएगी कि भारत गणराज्य के शासन तंत्र में खेलों को गंभीर काम का दर्जा नहीं मिल सका है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत में खेल महकमा खिलाडियो को बेहतर सुविधाएं और संसाधन मुहैया करवाने के लिए नही वरन् इससे जुडे जनसेवकों के लिए विदेश यात्राएं, भोग विलास, मीडिया की सुर्खियों में बने रहने का साधन बनकर रह गया है।

कितने आश्चर्य की बात है कि आजाद भारत में पहली बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवान खाशाबा जाधव को देश की महाराष्ट्र की सरकार द्वारा हेलसिंकी के ओलंपिक में भेजने आर्थिक मदद देने से मना कर दिया था। अपने शुभचिंतकों से धन जमा कर वह ओलंपिक में गया। कुल मिलाकर विश्व के सबसे बडे और मजबूत प्रजातंत्र के हर खम्बे को भारत में खेलों को बढावा देने के मार्ग प्रशस्त करना होगा, वरना भारत में गली मोहल्लों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बस एक ही खेल रह जाएगा और वह होगा क्रिकेट।

आदिवासियों को पट्टे न मिलने से खफा है केंद्र

आदिवासियों को पट्टे न मिलने से खफा है केंद्र


छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश काफी पिछडे

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 जनवरी। आदिवासियों को वनभूमि के पट्टे देने की केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना में पलीता लगाने वाले राज्यों पर जल्द ही केंद्र सरकार की नजरें तिरछी हो सकतीं हैं। देश के लगभग डेढ दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग तीस लाख प्रकरण अभी भी अफरशाही और बाबूराज के चलते लंबित पडे हैं।


केद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सबों ने अब तक महज तीस हजार पट्टों के प्रकरणों का ही निष्पादन किया है। सूत्रों ने यह भी बताया कि गैर कांग्रेसी सरकारें जानबूझकर केंद्र सरकार की इस अभिनव योजना में दिलचस्पी नहीं ले रहीं हैं, ताकि कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके।

सूत्रों ने यह भी संकेत दिए हैं कि लगभग दो लाख प्रकरण अभी तैयार पडे हुए हैं किन्तु राज्य सरकारें अनावश्यक अडंगेबाजी कर विलंब करने पर आमदा हैं। राज्यों में अफसरशाही और बाबूराज के बेलगाम घोडे इस कदर दौड रहे हैं कि हर माह राज्य सरकारों को पट्टा बांटने के लिए भेजी जाने वाली सूचना का जवाब देना भी सूबों की सरकारें उचित नहीं समझतीं हैं।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ में चार लाख, मध्य प्रदेश में पौने चार लाख, महाराष्ट्र में ढाई लाख, आंध्र प्रदेश में सवा तीन लाख, उडीसा में तीन लाख तो पश्चिम बंगाल में लगभग डेढ लाख प्रकरण अभी भी सरकारी मुहर की बाट ही जोह रहे हैं। बताया जाता है कि तमिलनाडू, केरल, बिहार, उडीसा, कर्नाटका, अरूणाचल प्रदेश आदि में तो अभी पट्टे बांटने के काम का श्रीगणेश भी नहीं किया जा सका है।

उधर सूबों की सरकारों की ओर से जो खबरें छन छन कर देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पहुंच रहीं हैं, उनके मुताबिक सरकारी रिकार्ड में की गई जबर्दस्त हेरफेर के कारण इसमें विलंब हो रहा है। सूबों में अधिकारियों द्वारा आदिवासियों से आय प्रमाण पत्र के साथ ही साथ अन्य दस्तावेजों की मांग की जा रही है, जिसके चलते इस काम में विलंब हो रहा है।

गौरतलब होगा कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया स्वयं भाजपा शासित मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल से संसद सदस्य चुने गए हैं। उनके अपने सूबे में ही पौने चार लाख प्रकरणों का लंबित होना दर्शा रहा है कि वे केंद्र सरकार में अपनी जवाबदारी के निर्वहन के साथ अपने सूबे के आदिवासी भाईयों को कितना न्याय दिला पा रहे हैं।

बुधवार, 6 जनवरी 2010

इस पर भी तो कुछ फरमाईए चिदम्बरम जी


इस पर भी तो कुछ फरमाईए चिदम्बरम जी


(लिमटी खरे)


देश के ताकतवर गृह मंत्री होकर उभरे पलनियप्पम चिदम्बरम के माथे पर मेघालय पुलिस ने कालिख पोतने का दुस्साहस किया है। लालकिले में सन 2000 में हुए बम विस्फोट के हमलावरों रज्जाक, रफाकत अली और सादिक के बीते दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से भागने की बात को सहजता से नहीं लिया जा सकता है। भले ही विदेशाी क्षेत्रीया पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) और दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा अपनी अपनी खाल बचाने का प्रयास कर रही हों पर गणतंत्र दिवस के चंद दिन पहले घटी यह घटना सामान्य कतई नहीं मानी जा सकती है। पुलिस अभिरक्षा से फरार होकर आतंकवादियों ने भारत द्वारा आतंकवाद से निपटने के उच्च स्तर के दावों की हवा वैसे भी निकल जाती है।


मामले की नजाकत इसलिए भी बढ जाती है, क्योंकि भागने वाले चोर उचक्के या उठाईगीरे नहीं वरन आतंकवादी थे। इन तीनों को वर्ष 2000 में लालकिले के पास हुए सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में हौजखास से गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से लगभग 15 किलो आरडीएक्स और 50 किलो हेरोईन बरामद की गई थी। अदालत ने इन तीनों आतंकवादियों को इस मामले में पांच साल की सजा सुनाई थी। चूंकि स्पेशल ब्रांच ने इनकी सजा पूरी होने पर एक आदेश जारी कर इनके बाहर घूमने फिरने पर पाबंदी लगा दी थी अत: सजा पूरी होने पर इन्हें एफआरआरओ द्वारा संचालित किए जाने वाले लामपुर स्थित सेवाधाम (डिर्पोटेशन होम) भेज दिया गया था। साथ ही साथ सेवाधाम की चौकसी का जिम्मा डीएपी की पहली वाहिनी (फस्र्ट बटालियन) का है और यहां देश की विभिन्न बटालियनों से जवान और अधिकारी तैनात होते हैं अत: मेघालय के उपनिरीक्षक को भी इसी कारण यहां तैनाती मिली थी।


इन तीनों की सजा पूरी हो चुकी थी। इन आतंकवादियों को चंद औपचारिकताओं के उपरांत पाकिस्तान के लिए रवानगी डालनी थी। जब इनकी सजा पूरी हो ही चुकी थी तब इन्होंने पुलिस को कथित तौर पर चकमा देने का जोखिम क्यों उठाया। जाहिर है कि इन तीनों के मन में किसी न किसी बडे षणयंत्र का तनाबाना बुना जा रहा होगा। ये बेहतर तरीके से जानते होंगे कि अगर ये पकडे गए तो इनकी सजा में इजाफा ही होने वाला है।

पूरा का पूरा घटनाक्रम जिस तरीके से पुलिस ने पेश किया है उससे आम आदमी के जेहन में हजारों सवालों का अनायास घुमडना स्वाभाविक ही है। इन तीनों आतंकवादियों की आंखों में एक साथ कौन सी बीमारी हो गई कि एक ही दिन तीनों को आई टेस्ट के लिए आना पडा। इसके बाद ``केदी`` को चांदनी चौक के साईकिल मार्केट के एक रेस्तरां ``अम्बर रेस्टॉरेन्ट`` में खाना क्यों खिलाया गया। खाने का भोगमान (बिल) किसने भोगा। क्या खाना खिलाने ले जाते वक्त इन आतंकवादियों के हाथों में हथकडी नहीं थी। डिर्पोटेशन होम के पास के एक पीसीओ से इन आतंकवादियों ने पाकिस्तान फोन भी किए बताए जा रहे हैं।


इतना ही नहीं इनकी फरारी के बाद उप निरीक्षक ने तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम को क्यों इत्तला नहीं की। सजा काट रहे कैदियों को जरूरत पडने पर लाने ले जाने के लिए निर्धारित नियमों की अनदेखी क्यों की गई। पुलिस ने आतंकवादियों का दस साल पुराना चित्र आखिर किस कारण से जारी किया। सबसे अहम सवाल तो यह है कि एक उपनिरीक्षक के साथ तीन खूंखार आतंकवादी जेल के बाहर चले जाते हैं, बिना पुलिस बल के, तब पुलिस की स्पेशल सेल किस पर नजर रखकर किसकी निगरानी कर रही थी। इसी बीच एक बुर्के वाली महिला का जिकर भी आया है, जो सेवाधाम में रज्जाक से मिलने आई थी। जब सेवा धाम में रखे लोगों से मिलने की किसी को इजाजत नहीं तो फिर यह महिला किन नियमों को शिथिल कर रज्जाक से बतिया कर गई थी।


पुलिस अभिरक्षा के दर्मयान भागने के दौरान जो परिस्थितियां थीं, उससे लगता है कि कहीं सोचे समझे षणयंत्र के तहत तो इन्हें आजाद नहीं किया गया है। विडम्बना ही कही जाएगी कि इतने खूंखार आतंकवादियों के इलाज के लिए अस्पताल जाने के दरम्यान मेघालय पुलिस की इंडियन रिजर्व बटालियन का महज एक उप निरीक्षक डिनोमोनी सिंह ही तैनात था। क्या भारत की पुलिस में इस तरह के `मिट्टी के माधव`` शोभा की सुपारी बनने के लिए भर्ती किए गए हैं।

अमूमन जिनकी सजा पूरी हो जाती है उनके बारे में सजा पूरी होने के लगभग चार माह पहले ही दिल्ली पुलिस की विशेषा शाखा और एफआरआरओ को दे दी जाती है। इस अवधि में औपचारिकताएं भी लगभग पूरी कर ही ली जाती हैं, ताकि अंतिम समय में कोई समस्या सामने न आए। इस मामले में भी कमोबेश यही हुआ होगा। स्वास्थ्य कारणों को ही अगर आधार बनाया जाए तब भी अगर सुरक्षा तंत्र इस कदर लापरवाही बरतेगा तो देश के आम आदमी का तो जीना ही मुहाल हो जाएगा।


सजा के अंतिम पडाव में अगर इन आतंकवादियों ने भागने का जोखम उठाया है तो इस आशंका को निर्मूल नहीं माना जा सकता है कि इनके मन में देश में फिर कहर बरपाने का कोई प्लान हो। जब सुरक्षा तंत्र इतना लापरवाह है तो जेल में इनके आका आकर इन्हें दिशा निर्देश देते रहे हों तो कोई बडी बात नहीं है। फिल्मों में इस तरह की कहानियां दिखाई जाती हैं जिनमें जेल के अंदर बंद रहने के बाद भी योजना का खाका तैयार किया जाता है फिर निर्धारित दिन उसे मूर्तरूप दिया जाता है।

अब जाकर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल हरकत में आई है और जहां ये आतंकवादी बंद थे, उन जेल और लामपुर के सेवासदन के पिछले दो सालों के रिकार्ड खंगाल रही है। अगर समय रहते हर पखवाडे में देश में जहां जहां भी देशद्रोही आतंकवादी बंद हैं, वहां वहां के रिकार्ड पर नजर रखी जाती तो पुलिस को इस तरह की परिस्थिति से दो चार नहीं होना पडता।


आंकडे बताते हैं कि देश की सबसे बडी तिहाड जेल में कुल 11 हजार तीन सौ कैदियों में से 102 आतंकवादी हैं। इनमें खूंखार करार दिए गए आतंकियों की संख्या 25 तो पाकिस्तान के आतंकियों की संख्या 15 है। वर्तमान में कुल 27 आतंकियों को सजा पूरी होने पर वापस भेजने की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें से 20 पाकिस्तान मूल के निवासी हैं।

भले ही नवंबर 2008 में देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में हुए अब तक के सबसे बडे आतंकवादी हमले के बाद गृहमंत्री बने पी.चिदम्बरम एक साल में देश में आतंकी हमला न होने से राहत महसूस कर रहे हों पर तीन दुर्दांत आतंकवादियों के फरार होने की घटना से उनकी पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकना स्वाभाविक ही है। आतंकवाद की आग में झुलसते भारत ने हर तरफ से अपने आप को चाक चौबंद रखने की कवायद अवश्य ही की है, किन्तु जब अपने इर्दगिर्द ही जयचंदों की फौज हो तो फिर बाहर किसी से क्या शिकायत की जाए।


भारत सरकार ने हाल ही में रूस, मलेशिया और ब्राजील से आतंकी गतिविधियों के लिए धन मिलने व मनी लांिड्रंग रोकने के लिए सहमति पर भी हस्ताक्षर किए हैं। इससे एक ओर हिन्दुस्तान की गर्वंमेंट आतंकवादियों के रसद के रास्ते बंद कर रही है, तो वहीं दूसरी ओर सजा पूरी कर चुके आतंकवादी बडी ही आसानी से पुलिस को कथित तौर पर गच्चा दे जाते हैं।

वैसे बहुचर्चित कंधार विमान अपहरण मामले के प्रमुख वार्ताकार रहे अजीत कुमार डोवाल की इस बात से हम पूरा इत्तेफाक रखते हैं कि कसाब और अजमल जैसे प्रकरणों का निपटारा जल्द से जल्द कर देना चाहिए वरना भारतीय जेलों में बंद आतंकवादियों की रिहाई के लिए भी किसी भारतीय विमान का अपहरण हो सकता है।

हमारी अपनी व्यक्तिगत राय में देश में जहां जहां भी आतंकवादियों को जेलों में बंद किया गया है, वहां आतंकवाद से संबंधित मामलों की सुनवाई जेल परिसर के अंदर ही कोर्ट बनाकर कर देनी चाहिए। इसमें संबंधित वकील और न्यायालयीन कर्मचारियों के अलावा किसी अन्य का प्रवेश पूरी तरह वर्जित ही रखा जाना चाहिए। इन मामलों की वीडियो रिकार्डिंग कर उसका रिकार्ड रखना आवश्यक होगा। साथ ही साथ आतंकवाद के मामलों में निश्चित समयसीमा तय कर प्रकरण का निष्पादन कर दिया जाना ही इससे निजात पाने का सबसे सरल तरीका है।

पी चिदम्बरम ने देश की जनता को आतंकवाद और अंदरूनी सुरक्षा मुहैया कराने कटिबद्ध नजर आ रहे हैं। देश की जनता अपने गृह मंत्री पलनिअप्पन चिदम्बरम से यह जानना चाह रही है कि उनके गृह मंत्री रहते हुए बीते साल के अंत में क्रिसमस के मौके पर छोटा राजन जैसे इस साल में हुए भयानक दुर्दांत आतंकवादियों के फरार होने तथा मुंबई में डान छोटा राजन के गुर्गे डी.के.राव की जेल से दी गई रिहाई पर पार्टी में मुंबई पुलिस के उच्चाधिकरी ठुमके लगाते देखे जाने पर चिदम्बरम कुछ तो प्रतिक्रिया दें।

``महाराष्ट्र सदन`` में तब्दील हो सकता है भाजपा कार्यालय

``महाराष्ट्र सदन`` में तब्दील हो सकता है भाजपा कार्यालय


भाजपा में अब ``मराठी मानुस`` का होगा बोलबाला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे बच्छराज व्यास और भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी के बीच क्या समानता हो सकती है। जी हां दोनों के बीच गहरा नाता है। लगभग आधे दशक पहले 1965 में विजयवाडा में बच्छराज व्यास को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया था और नितिन गडकरी को 2009 में भाजपा नया अध्यक्ष बनाया गया है।

बच्छराज व्यास भी महाराष्ट्र प्रदेश की संस्कारधानी नागपुर के ही मूल निवासी थे। उसके बाद इसी जगह के नितिन जयराम गडकरी की ताजपोशी की गई है। व्यास और गडकरी दोनों ही ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पाठशाला में पल पुसकर संस्कारित हुए हैं। गडकरी और व्यास दोनों ही महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य रहे हैं। इसके अलावा इनके बीच सबसे बडी समानता के तौर पर यह बात सामने आ रही है कि जब व्यास ने पदभार संभाला था, तब देश में कांग्रेस की जडें काफी हद तक कमजोर हो चुकी थीं, यही बात कमोबेश आज कांग्रेस पर लागू हो रही है।


चूंकि संघ का मुख्यालय नागपुर में है अत: संघ में मराठी मानुष का दबदबा सदा से ही रहा है, किन्तु भारतीय जनता पार्टी इससे अभी तक लगभग अछूती ही मानी जा सकती है। नितिन जयराम गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद अब भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में मराठाओं की दखल से इंकार नहीं किया जा सकता है।

गडकरी के करीबी सूत्रों का दावा है कि भाजपा के नए निजाम की इच्छा है कि दो नहीं तो कम से कम एक महासचिव और कोषाध्यक्ष उनके अपने सूबे या मराठा मानुष ही हो। गडकरी की पहल गोवा के पसंद मनोहर पणिकर हैं। पणिकर के सामने सबसे बडी समस्या यह है कि वे कुछ दिनों पहले भाजपा के कथित लौह पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी को सडा हुआ अचार की संज्ञा दे चुके हैं। इसके अलावा रविशंकर प्रसाद, तमिलनाडू के धुरंधर नेता एन.गणेशन और राजस्थान की महारानी वसुंधरा को महासचिव बनाया जाना तय ही है। रामलाल को छोडकर शेष पांचों महासचिव की रवानगी इस बार तय ही मानी जा रही है।

सूत्रों ने जबर्दस्त संकेत दिए हैं कि भाजपा के राजकोष को संभालने और उसमें इजाफा करने के लिए गडकरी कोषाध्यक्ष पद पर पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे वेद प्रकाश गोयल के पुत्र एवं महराष्ट्र के नेता पीयूष गोयल को सौंपने का मानस बना चुके हैं। गडकरी अपनी टीम में महाराष्ट्र के नेता श्याम जाजू को बतौर सचिव अपने पास रखने की बलवती इच्छा भी गडकरी के मानस पटल पर हिलोरे मार रही है।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का

बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का


(लिमटी खरे)

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की चिंता बेमानी नहीं कही जा सकती है, जिसमें उन्होंने कहा है कि विज्ञान के लिए बाधा न बने नौकरशाही। प्रधानमंत्री ने काफी सोच समझकर यह वक्तव्य दिया है। अपने लगभग साढे छ: साल के प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह भली भांति समझ चुके होंगे कि भारत गणराज्य की व्यवस्थाओं में बाबूराज और नौकरशाही की लाल फीताशाही की जडें किस कदर मजबूत हो चुकी हैं। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने यह बात करकर भारतीय मूल के नोबेल पुरूस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन की बात को ही दुहराया है।


सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री की अपील का कोई असर होगा। एक जमाना था जब प्रधानमंत्री या देश के महामहिम राष्ट्रपति के आव्हान का आम जनता पर जबर्दस्त असर होता था। चाहे स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे हों अथवा गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति का देश के नाम संबोधन हो, देशवासी आकाशवाणी या दूरदर्शन पर इसे पूरे ध्यान से सुना करते थे। देश के आला नेताओं के देश निर्माण के सपने को आम जनता अंगीकार कर सुनहरा भविष्य गढने का ताना बाना बुना करती थी। आज समय पूरी तरह बदल चुका है। अब बडे नेताओं की अपील में भी राजनीति की बू आती है।

97वी भारतीय विज्ञान कांग्रेस (आईसीएस) के उद्धाटन पर प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह ने विज्ञान पर नौकरशाहों की बाधा बनने की प्रवृत्ति को दुर्भाग्यपूर्ण ही बताया है। देश में प्रतिभा के विकास के लिए विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने का आव्हान भी किया है वजीरे आजम ने। पीएम ने कहा है कि कंसोलिउेशन ऑफ यूनिवर्सिटी रिसर्च और इनोवेशन एंड एक्सीलेंस को इसलिए आरंभ किया गया है ताकि अधिक से अधिक महिलाएं विज्ञान के क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य बनाने के लिए आकषिZत हो सकें। निश्चित तौर पर वजीरे आला ने एक बहुत ही निहायत सामयिक मुद्दे की ओर ध्यान आकषिZत किया है। विडम्बना यह है कि नौकरशाही के मकडजाल से इसे मुक्त कराने की बात खुद सरकार के मुखिया के श्रीमुख से निकल रही है।


यक्ष प्रश्न आज भी वही खडा हुआ है कि देश विज्ञान की स्थिति क्या है। अस्सी के दशक के आरंभ के साथ ही युवाओं में विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान बढता चला गया। यही कारण है कि देश में विज्ञान पिछड गया है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने अपने रेल मंत्री के कार्यकाल में भारतीय रेल के स्टेशनों को गंदगी से मुक्त कराने के लिए खडी रेल गाडी में शौच न करने की समस्या उठाई थी।

लालू की इस समस्या का निदान चैन्नई की एक बारह साल की बाला माशा नजीम ने चुटकी में खोज दिया था। आठवीं दर्ज में पढने वाली माशा के अनुसार रेल्वे स्टेशन आते ही जलमल निकासी का पाईप एक रेल में जुडे एक संग्रहण टेंक से स्वत: ही जुड जाएंगे। बाद में रेल्वे स्टेशन के गुजरने के बाद खुले स्थान में यह मलबा चालक द्वारा कहीं गिरा दिया जाएगा। तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति कलाम ने भी इस तकनीक को सराहा था।

एसा नहीं कि देश में तेज दिमाग बच्चों की कमी हो। दरअसल हिन्दुस्तान की शिक्षा पद्यति व्यवहारिक ज्ञान की ओर ध्यान देने वाली नहीं है। आमिर खान अभिनीत ``थ्री ईडियट्स`` चलचित्र कमोबेश इसी पर केंद्रित है। एक पुराने वाक्ये का जिकर यहां प्रासंगिक होग। मध्य प्रदेश की सीमा से लगे महाराष्ट्र के कामठी नागपुर मार्ग पर एक ओव्हलोड ट्रक रेल्वे के अंडरपास में फंस गया। इसे निकालने काफी जुगत लगाई गई। मोटी पगार पाने वाले इंजीनियर्स ने भी हाथ डाल दिए।

मामला चूंकि देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का था सो लगातार यातायात बाधित होने पर कोहराम मच गया। अंतत: सभी पहलुओं पर गौर फरमाने के बाद आला इंजीनियर्स ने रेल्वे के पुल को उपर से तोडकर लारी को बाहर निकालने पर सहमति जताई। यह मामला काफी खर्चीला था, एवं इससे नागपुर से बरास्ता रायपुर पूर्वी भारत का संपर्क रेल से लंबे समय के लिए अवरूद्ध होने की आशंका भी थीं


तभी वहां से एक चरवाहा गुजरा जिसने मामले की नजाकत को देखकर एसा तरीका बताया कि विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के स्नातक इंजीनियर्स का सर चकरा गया। उसने फंसे ट्रक के सभी पहियों की हवा निकालने का सुझाव दिया और कहा कि इससे लारी छ: इंच नीचे आ जाएगी फिर आसानी से उसे खींचा जा सकेगा। इसके बाद से रेल्वे अंडरपास के दोनों सिरों पर लोहे के बेरियर का इस्तेमाल किया जाने लगा।

कहने का तातपर्य महज इतना सा है कि पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही देश भारत के दिमाग की दाद देते हैं किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक ही है। युवा पीढी में आज विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान साफ दिखता है। युवाओं के लिए आज भी इंजीनियर की उपाधि का ग्लेमर बरकरार है। कंप्यूटर के युग में इंफरमेशन तकनालाजी (आईटी) इनकी पसंद बन गई है।

तेजी से बदलते युग में सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्रों में विज्ञान से संबंधित विषयों पर रोजगार के अवसर नगण्य हो गए हैं। अससी के दशक में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस कम्युनिकेशन एण्ड इंफरमेशन रिसोZसेज की पत्रिका ``विज्ञान प्रगति`` स्कूलों में खासी लोकप्रिय हुई थी। महज सत्तर पैसे (लगभग बारह आने) में आने वाली इस पत्रिका से विद्यार्थियों को विज्ञान के बारे में रोचक जानकारियां मिला करती थीं।

विडम्बना ही कही जाएगी कि आज इंजीनियरिंग की उपाधि हासिल करने वो पचास फीसदी से अधिक विद्यार्थी अपने मूल काम से इतर अन्य रोजगार ढूंढने पर मजबूर हैं। भारतीय प्रशासिनक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में ही देखा जाए तो इंजीनियर स्नातकों की बाढ सी आई हुई है। इस बारे में 1985 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत का एक वक्तव्य का जिकर लाजिमी होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान में इंजीनियर की डिग्री धारण करने वाले पचास फीसदी छात्रों द्वारा एसे कामों को रोजगार का जरिया बनाया हुआ है, जिसमें शोध और विकास का दूर दूर तक लेना देना नही है।

सत्तर के दशक की समाप्ति तक हिन्दुस्तान के हर सूबे में विज्ञान को काफी प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विज्ञान प्रदर्शनियों की धूम रहा करती थी। विज्ञान विषय पर वाद विवाद के साथ ही साथ विभिन्न माडलों के माध्यम से विद्यार्थियों को विज्ञान के चमत्कारों से रूबरू करवाया जाता था। इसके बाद नौकरशाही और बाबूराज के बेलगाम घोडों ने विज्ञान का रथ रोक ही दिया। अब बमुश्किल ही विज्ञान प्रदर्शनियों के बारे में कहीं सुनने को मिल पाता है।

प्रधानमंत्री अगर वाकई चाहते हैं कि देश में विज्ञान के प्रति युवा आकषिZत हों तो उन्हें लगभग तीस साल पुराना इतिहास खंगालना पडेगा, और देखना होगा कि सत्तर के दशक तक विज्ञान के प्रति विद्यार्थियों की रूचि का कारण क्या था, और आज चाहकर भी शिक्षण संस्थाएं उनमें विज्ञान के प्रति आकर्षण क्यों पैदा नहीं कर पा रही हैं।

जहां तक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों की वतन वापसी का सवाल है, तो इसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। भारत के दिमाग का इस्तेमाल कर विश्व के अनेक समृद्ध देश अपने आप को बहुत आगे ले जाते जा रहे हैं। भारत सरकार को चाहिए कि भारत वर्ष में एसा माहौल तैयार करे ताकि देश की प्रतिभाएं देश में ही रहें विदेश पलायन के बारे में उनके मानस पटल पर कभी विचार तक न आए।

विद्यार्थी परिषद के नेताओं की होने वाली है बल्ले बल्ले

विद्यार्थी परिषद के नेताओं की होने वाली है बल्ले बल्ले


एबीवीपी के संस्कारों को आगे बढाने के हिमायती हैं गडकरी

धूमल को चलना होगा संभल संभल कर

यूपी को लेकर गडकरी की पेशानी पर छलक रहा है पसीना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 जनवरी। महाराष्ट्र प्रदेश के क्षत्रप नितिन गडकरी के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के नेताओं की बांछे खिल गईं हैं। भारतीय जनता पार्टी में एबीवीपी काडर से आए नेताओं की खुशी का अब ठिकाना नहीं है। इसका कारण नितिन गडकरी भले ही आरएसएस के बटवृक्ष के तले पले बढे हों, पर वे आए तो एबीवीपी की शाख से ही हैं।


भाजपा का सिंहासन संभालने के बाद भरी हुंकार में गडकरी ने साफ कह दिया था कि वे एबीवीपी के संस्कारों को आगे बढाएंगे। गडकरी के इस वक्तव्य ने किसी को हिलाया हो या न हिलाया हो, पर हिमाचल के निजाम प्रेम कुमार धूमल के पांव के नीचे से जमीन खिसकती ही दिख रही है।

दरअसल धूमल की राज्य के एबीवीपी के नेताओं से जरा भी नही बनती है। बीते दिनों हिमाचल प्रदेश में मण्डी के डिप्टी कमिश्नर को हटाने के लिए सूबे की एबीवीपी इकाई ने मुहिम चलाई थी। धूमल भी अडे रहे बाद में जब आलाकमान ने हस्ताक्षेप किया तब जाकर कहीं मामला सुलटा। यह गडकरी की ताजपोशी के पहले की कहानी थी। वैसे भी राजनाथ सिंह के रहते धूमल ठाकुरवाद की छांव में चुपचाप सुस्ताते रहे। अब जमाना बदल गया है। गडकरी महराष्ट्रीयन ब्राम्हण हैं, देरसबेर उनका ब्राम्हण प्रेम छलकेगा और तब प्रेम कुमार की राह में शूल ही शूल नजर आने लगेंगे।

गडकरी के करीबी सूत्रों का कहना है कि गडकरी ब्राम्हणों के हिमायती रहे हैं, साथ ही वे विद्यार्थी परिषद में पले पुसे नेताओं को ज्यादा तवज्जो देने के मूड में हैं। सूत्रों का कहना है कि गडकरी ने अब तक का सफर परिषद के बाद संघ के साथ बिताया है, इसलिए वे जानते हैं कि युवा मन में घुमडने वाली उद्दंडता अंत्तोगत्वा समय और उमर के साथ गंभीरता में तब्दील हो ही जाती है, और तब एबीवीपी के पढाए पाठ से राजनैतिक बिसात पर चलना आसान हो जाता है।

उधर उत्तर प्रदेश में भाजपा के रसातल में जाने से गडकरी बहुत परेशान नजर आ रहे हैं। भाजपा के शीर्ष पदों पर एक बार फिर ब्राम्हणों के बिठा दिए जाने से जातिवाद की राजनीति को अंगीकार कर चुका उत्तर प्रदेश पूरी तरह से भाजपा के हाथ से फिसल सकता है। भाजपा में अब पुराने चेहरों के बजाए नया नेतृत्व उभारकर ही उत्तर प्रदेश में वेतरणी पार की जा सकती है।

सूबे में भाजपा के वर्तमान में जनाधार का आलम यह है कि विधान परिषद की 36 सीटों पर होने वाले चुनावों में भाजपा ने महज 25 स्थानों पर ही अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं शेष 11 स्थानों पर भाजपा का नामलेवा भी नहीं बचा है। मजे की बात तो यह है कि बनारस जो मुरली मनोहर जोशी और गाजियाबाद जो निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह का चुनाव क्षेत्र है, से भाजपा को उम्मीदवार ही नहीं मिल सके हैं।