रविवार, 14 फ़रवरी 2010

मल्टी मीडिया जागरूकता अभियान का शुभारंभ कल
15 से 19 फरवरी तक सूचना प्रसारण मंत्रालय की प्रदर्शनी का आयोजन
विदिशा 14 फरवरी। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय, डीएवीपी द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत बेहतर स्वास्थ्य के लिए चलाई रही शासकीय कल्याणकारी योजनाओं की विस्तार से जानकारी देने के उद्देश्य से पांच दिवसीय जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जिला मुख्यालय विदिशा के रामलीला मैदान में एनआरएचएम मल्टीमीडिया जनजागरूकता अभियान का आयोजन सोमवार से शुक्रवार तक किया गया है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस प्रदर्शनी षुभारंभ सोमवार 15 फरवरी को दोपहर तीन बजे किया जाएगा। इसमें राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी मल्टी मीडिया फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से आम जनों को दी जाएगी। इस अभियान में मुख्य रूप से जिला प्रशासन, जिला पंचायत, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, नेहरू युवा केंद्र, क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय, गीत एवं नाटक प्रभाग, पत्र सूचना कार्यालय, आकाशवाणी, दूरदर्शन सहित स्व सहायता समूह, गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी होगी।
इन पांच दिनों में जिला पंचायत द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, समग्र स्वच्छता अभियान, सूचना का अधिकार एवं अन्य ग्रामीण योजनाओं की जानकारी, पंच सरपंच सम्मेलन, आंगनवाडी कार्यकर्ता सम्मेलन आदि का आयोजन, महिला बाल विकास द्वारा विभागीय योजनाओं की जानकारी, प्रचार प्रसार, स्वस्थ्य शिशु प्रतियोगिता का आयोजन, नेहरू युवा केंद्र के वालंटियर्स द्वारा व्यवस्था में सहयोग, नुक्कड नाटक, गीत संगीत, एड्स नियंत्रण समिति द्वारा एड्स के प्रति जनजागरूकता बढाना एवं प्रचार प्रसार सामग्री का वितरण किया जाएगा।
इसी तरह क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय द्वारा एनआरएचएम व भारत निर्माण अभियान का प्रचार प्रसार, फिल्म शो, क्विज प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाएगा। डीएवीपी के गीत एवं संगीत प्रभाग द्वारा प्रतिदिन गीत संगीत, नाटक, कठपुतली शो आदि के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं और शासकीय योजनाओं की जानकारी दी जाएगी। डीएवीपी द्वारा स्वस्थ्य ग्राम स्वस्थ्य राष्ट्र ग्राम विषय पर फोटो प्रदर्शनी और मल्टी मीडिया आधारित माडल प्रदर्शित किए जाएंगे।
पीआईबी, दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा पांच दिवसीय अभियान की गतिविधियों का प्रचार प्रसार और स्व सहायता समूह और गैर सरकारी संगठन द्वारा किए जा रहे कार्याें और उत्पादों का प्रदर्शन किया जाएगा। इसके अलावा भोपाल के सेवासदन नेत्र चिकित्सालय द्वारा निशुल्क नेत्र परीक्षण शिविर, नेत्रदान शिविर और हेप्स भोपाल द्वारा होम्योपैथिक चिकित्सा केंद्र का आयोजन इस अभियान में विशेष तौर पर किया जा रहा है।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

प्रत्यक्ष को भी प्रमाण की आवश्यक्ता

प्रत्यक्ष को भी प्रमाण की आवश्यक्ता

टोल और आरटीओ बेरियर पर कब समाप्त होगी लूट

(लिमटी खरे)

देश भर में परिवहन का सबसे बडा साधन सडक मार्ग ही माना जाता है। सडकों पर दौडते वाहनों के सामने सबसे बडी समस्या के रूप में परिवहन, सेलटेक्स के साथ ही साथ टोल नाके बनकर उभरे हैं। इन वसूली वाले नाकों में जब चाहे तब वाहनों से अवैध वसूली की शिकयतें आम हैं। सरकारें इन शिकायतों पर ध्यान नहीं देती हैं, परिणामस्वरूप सडकों पर विवाद की स्थिति बनती रहती है।

अवैध वसूली का सबसे बडा अड्डा अन्तरप्रान्तीय परिवहन जांच चौकियां हैं। इन चौकियों को बाकायदा किन्तु अघोषित तौर पर ठेके पर दिया गया है। मध्य प्रदेश की परिवहन जांच चौकियों में हर दिन करोडों रूपयों की अवैध वसूली की जाती है। प्रदेश में सबसे अधिक आय और बेनामी आय वाली चौकियों में बडवानी की सेंधवा, मुरेना और सिवनी जिले की खवासा परिवहन जांच चौकी सदा से ही चर्चाओं में रही है।

इन परिवहन जांच चौकियों में सारा कारोबार रिमोट कंट्रोल से चलता है। अमूमन हर परिवहन, सेलटेक्स की जांच चौकियों में चौकी के दोनों ओर वाहनों की कतार देखते ही बनती है। जैसे ही इन चौकियों के आस पास कोई लाल पीली बत्ती वाली गाडी दिखाई पडती है, रिमोट से चलने वाली घंटी बजाते ही चौकियों के अन्दर का माजरा ही बदल जाता है। नंबर दो में चलने वाले काम नंबर एक में तब्दील हो जाते हैं।

इन चौकियों में कर्मचारियों की मेस देखने लायक होती है। यहां समिष और निरामिष लजीज भोजन की उम्दा व्यवस्था होती है। मुख्यमन्त्री, मुख्य सचिव, परिवहन सचिव, परिवहन आयुक्त आदि अगर प्रदेश की जांच चौकियों का औचक निरीक्षण कर लें तो वे पाएंगे कि एक समय में किसी भी चौकी में कुल तैनाती का महज चालीस फीसदी अमला ही मौजूद होता है। एक बात है, इन चौकियों में अपने कर्मचारियों के प्रति पूरी ईमानदारी बरती जाती है। माह के अन्त में जब चौथ वसूली का हिसाब किताब होता है, तो सभी को ईमानदारी के साथ उसका हिस्सा दिया जाता है। मजे की बात तो यह है कि पुलिस से प्रतिनियुक्ति पर परिवहन विभाग में जाने की होड सी लगी होती है। इसका कारण यह है कि परिवहन विभाग में अवैध कमाई का सबसे अच्छा और फूलप्रूफ काम है।

मध्य प्रदेश में सेंधवा की परिवहन जांच चौकी को कंप्यूटरीकृत किया गया है। इसके अलावा खवासा सहित अन्य परिवहन जांच चौकियों को भी इसी तरह कंप्यूटरीकृत करने का प्रस्ताव एक दशक से भी अधिक समय से लंबित है। इसका कारण यह है कि अगर इन्हें कंप्यूटरीकृत कर दिया गया तो यहां पदस्थ कर्मचारियों की अवैध कमाई को लकवा मार सकता है। यही कारण है कि शासन के प्रस्ताव के बावजूद भी इनका कंप्यूटरीकृत जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है। गौरतलब होगा कि सिवनी जिले के खवासा में सालों पहले ग्यारह लाख रूपए की लागत से कंप्यूटरीकृत जांच चौकी का प्रस्ताव लाया गया था, जिसे आज तक अमली जामा नहीं पहनाया गया है।

हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के घरेलू उपयोग के सामान के वाहन को उन्ही के सूबे एमपी के मुरैना की परिवहन जांच चौकी में रोककर वाहन चालक के साथ बदसलूकी करने का मामला प्रकाश में आया है। विडम्बना ही कही जाएगी कि एक सूबे के मुखिया के घरेलू उपयोग के सामान को लेकर आने वाले वाहन को परिवहन कर्मियों द्वारा अन्तर्राज्यीय सीमा पर रोककर सरेआम चौथ वसूली और बदतमीजी की जाती है, और सूबे में शासन आंखे मून्दे बैठा रहता है। जब प्रशासनिक मुखिया के साथ इस तरह का हो रहा हो तब फिर आम आदमी के साथ क्या होता होगा इसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खडे हो जाते हैं।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ आदि सूबों की सीमाओं पर सेंधवा, नयागांव, खवासा, दतिया, मुरेना, झाबुआ, हनुमना, पिटोल, बुरहानपुर, खिलचीपुर, रजेगांव, सिकन्दरा, शाहपुर, चिरूला, सतनूर, बोनकट्टा आदि स्थानों पर अन्तराज्यीय परिवहन जांच चौकियां स्थापित हैं। इनमें से डेढ दर्जन से ज्यादा चौकियों में परिवहन और सेल टेक्स विभाग द्वारा कंप्यूटर लगाकर जोडने की कवायद सालों से की जा रही है।

इतना ही नहीं देश भर में सडक मार्ग में पडने वाले टोल नाकों पर भी अवैध वसूली जबर्दस्त तरीके से जारी है। अनेक स्थानों पर समयावधि पूरी होने के बाद भी आपसी सांठगांठ के चलते बाकायदा ``दादागिरी`` के साथ वाहन चालकों की जेब पर डाका डाला जाता है। बनाओ, चलाओ, वसूलो फिर शासन को सौंप दो (बीओटी) के आधार पर बनने वाली सडकों की राशि ठेकेदार द्वारा वसूली जाती है। इन सडकों या पुलों की राशि वसूलने में ठेकेदारों द्वारा मनमानी बरती जाती है।

देश भर में लोक निर्माण विभाग, केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, नेशनल हाईवे अथारिटी आदि द्वारा दिए गए ठेकों पर जब तब विवाद की स्थिति निर्मित होती रहती है। इन नाकों पर ठेकेदार द्वारा मनमानी दरों पर वाहनों से टोल टेक्स वसूला जाता है। हद तो तब हो जाती है जब रसीद मांगने पर ठेकेदार द्वारा अनाधिकृत रसीदें दी जाती हैं। केन्द्र सरकार के भूतल परिवहन विभाग द्वारा रस्म अदायगी के लिए 11 जून 2008 को देश के हर सूबे की सरकार को एक पत्र लिखकर इन अनियमितताओं और शिकायतों की ओर ध्यान आकषिZत कराया था।

केन्द्र और राज्य सरकारों में बैठे जनसेवकों की अर्थलिप्सा और अपने अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए साम, दाम दण्ड भेद की नीति अपनाई जा रही है। सरकार द्वारा सांसद, विधायक, सरकारी वाहनों के साथ ही साथ अधिमान्य पत्रकारों के वाहनों को टोल टेक्स से छूट प्रदान की है, किन्तु टोल नाकों में बैठे ठेकेदार के गुर्गों द्वारा पत्रकारों के साथ भी अभद्र व्यवहार करना एक प्रिय शगल बन गया है। कुल मिलाकर जब एक सूबे के प्रशासनिक मुखिया के घर का सामान ले जा रहे वाहन के साथ हुए हादसे के बाद भी परिवहन विभाग की मनमानी जारी रहने पर यही कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष को भी प्रमाण की आवश्यक्ता है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

ठाकरे के दरबार में पंवार!

ठाकरे के दरबार में पंवार!
खिलाडियों की सुरखा का जिम्मा किसका सरकार का या बाला साहेब का!
सियासतदार भूल जाते हैं अपने ही कहे वक्तव्यों को
(लिमटी खरे)

केन्द्रीय कृषि मन्त्री शरद पंवार ने रविवार को शिवसेना के सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के आवास ``मातोश्री`` की चौखट चूमकर साबित कर दिया है कि देश मेें सरकार नाम की चीज ही नहीं बची है। पंवार ने यह सियासी दांव तब खेला जबकि कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी द्वारा शिवसेना की गीदड भभकियों को दरकिनार कर महाराष्ट्र में मुम्बई का दौरा किया। इसके पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने देशद्रोह जैसे वक्तव्य भी दिए हैं, पर उनका बाल भी बांका करने में असफल दिख रही है केन्द्र और सूबे की सरकार।
देखा जाए तो पंवार ने कहा है कि उनकी बाला साहेब से मुलाकात का सियासी मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए, वे तो महज आईपीएल मैच के आयोजनों के मद्देनज़र ठाकरे से भेंट करने गए थे। गौरतलब है कि ठाकरे ने आईपीएल में आस्ट्रेलिया के खिलाडियों को नहीं खेलने देने की बात कही थी। हो सकता है आस्ट्रेलिया में हो रहे भारतीयों पर हमले से बाला साहेब व्यथित हो गए हों और उन्होंने यह फरमान जारी कर दिया हो।
शरद पंवार यह भूल जाते हैं कि सुरक्षा देने का काम केन्द्र या राज्य सरकार का है, न कि बाला साहेब ठाकरे का। वैसे भी एक सप्ताह पहले देश के गृह मन्त्री पलनिअप्पन चिदंबरम ने साफ कहा था कि केन्द्र सरकार पूरे देश में बाहर से आने वाले क्रिकेटरों को सुरक्षा देने के लिए तैयार है। ठाकरे ब्रदर्स द्वारा मुम्बई और समूचे महाराष्ट्र में लंबे समय से आन्तक बरपाया जा रहा है, और केन्द्र तथा राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे ही बैठी है। केन्द्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी कांग्रेस की सहयोगी है, इधर राज्य में दोनों ही की न केवल साझा सरकार है, वरन् गृह मन्त्रालय जैसा अहम विभाग राकांपा के पास ही है।
पंवार ने जो दिन चुना वह ही गलत कहा जा सकता है। पंवार ने राहुल गांधी की मुम्बई यात्रा के एन दूसरे दिन ही मातोश्री की देहरी चूमी है। ठाकरे परिवार की धमकियों की परवाह न करते हुए राहुल गांधी ने जिस बहादुरी का परिचय दिया है, उसकी तारीफ की जानी चाहिए। राहुल गांधी ने उस मिथक को तोड दिया है, जिसके अनुसार मुम्बई में ठाकरे बंधुओं की अनुमति के बिना पत्ता भी नहीं हिलना बताया जाता है। मुम्बई ठाकरे परिवार की जायदाद नहीं है। पहले भी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री और कांग्रेस महासचिव कह चुके हैं कि बाला साहेब ठाकरे का परिवार मुम्बईकर नहीं वरन् मघ्य प्रदेश के बालाघाट जिले का है।
हो सकता है कि मुम्बई यात्रा के बाद राहुल गांधी को जो प्रसिद्धि मिल रही है, उसे कम करने की गरज से शरद पंवार ने बाला साहेब के चरणों में गिरकर क्रिकेट के सफल आयोजन की भीख मांगने का स्वांग रचा हो। पंवार यह भूल गए कि ठाकरे की इस तरह की चरण वन्दना से राज्य सरकार के मनोबल पर क्या असर पडेगा। राज्य सरकार पहले ही ठाकरे ब्रदर्स की आताताई हरकतों से परेशान है, फिर इस तरह के कृत्यों से रहा सहा मनोबल टूटना स्वाभाविक ही है।
कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि देश में बढती मंहगाई के लिए कांग्रेस द्वारा पंवार को आडे हाथों लिया जाना उन्हें रास नहीं आया है। साम, दाम, दण्ड भेद की राजनीति में माहिर पंवार का राजनैतिक इतिहास बहुत ज्यादा साफ सुथरा नहीं है। कल तक कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को गला फाडकर चिल्लाने वाले राकांपा के सुप्रीमो पंवार ने सत्ता की मलाई खाने के लिए न केवल केन्द्र बल्कि राज्य में भी उन्हीं सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस से हाथ मिला लिया।
वैसे राहुल गांधी के मुम्बई दौरे क बाद एक बात तो साफ हो गई है कि अगर सूबे की सरकार चाहे तो वह महाराष्ट्र से ठाकरे ब्रदर्स की हुडदंग को समाप्त कर सकती है। जब सेना की धमकी के बाद भी राहुल गांधी बेखौफ होकर मुम्बई में घूम सकते हैं तब फिर जब ठाकरे ब्रदर्स के इशारे पर उत्तर भारतीयों पर यहां जुल्म ढाए जाते हैं, तब सरकार सेना के सामने मजबूर क्यों हो जाती है, यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।
पंवार की ठाकरे के दरबार में हाजिरी पर कांग्रेस भी बंटी ही नज़र आ रही है। एक तरफ प्रदेश इकाई द्वारा इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी जाती है, तो दूसरी ओर केन्द्रीय इकाई के प्रवक्ता द्वारा इसे सिर्फ क्रिकेट तक सीमित रखने की बात की जा रही है। उधर शिवसेना और भाजपा के हनीमून समाप्त होने के बाद उपजे शून्य में पंवार कुछ संभावनाएं अवश्य ही तलाश रहे होंगे।
राजनीति की परिभाषा ही यही है कि जिस नीति से राज हासिल हो वही राजनीति है। इस पर अमल करते हुए शरद पंवार द्वारा सोचे समझे कदम उठाए जा रहे हैं, यही कारण है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उछाल कर पंवार ने कांग्रेस का साथ छोडकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी। इसके बाद सोनिया की कांग्रेस से हाथ मिलाने में उन्होंने एक मिनिट की भी देरी नहीं लगाई।
आज महाराष्ट्र में भले ही कांग्रेस की सीटें राकांपा से कहीं ज्यादा हों पर सूबे में दबदबा राकांपा का ही है। इन परिस्थितियों में पंवार द्वारा बाला साहेब ठाकरे की शरण में जाकर नए सियासी समीकरणों का ताना बाना बुनने का प्रयास किया जा रहा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमारा कहना महज इतना ही है कि अगर विदेशों मेें पले बढे और शिक्षित हुए राहुल गांधी उत्तर भारतीय होकर मुम्बई की लोकल रेल में सफर कर सकते हैं तो फिर दूसरे उत्तर भारतीयों पर अत्याचार कैसे हो जाता है। इसके अलावा शरद पंवार सूबे के मुख्यमन्त्री रह चुके हैं, वे सूबे की नब्ज अच्छे से पहचानते हैं, ठाकरे परिवार का उदय भी उन्हीं के सामने हुआ है, पंवार सियासत करें खूब करेें, पर कम से कम मुम्बई और महाराष्ट्र को प्रान्तवाद, भाषा वाद और व्यक्तिवाद की आग में झुलसने तो बचाएं।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

आस्था के साथ खिलवाड ठीक नहीं!

आस्था के साथ खिलवाड ठीक नहीं!

रोकना होगा साई बाबा के नाम का व्यवसायीकण
 
(लिमटी खरे)
 
भारत धर्मभीरू देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। हिन्दुस्तान में हर धर्म, हर भाषा, हर संप्रादाय, हर पन्थ के लोगों को आजादी के साथ रहने का हक है। भारत ही इकलौता देश होगा जहां मिस्जद, मन्दिर, गुरूद्वारे, चर्च सभी की चारदीवारी एक दूसरे से लगी होती है। भारत में अनेक एसे सन्त पुरूष हुए हैं, जिनकी जात पात के बारे में आज भी लोगों को पता नहीं है, और ये सभी धर्मों के लोगों के द्वारा निर्विकार भाव से पूजे जाते हैं।
करोडों रूपए का चढावा आने वाले मन्दिरों में सबसे उपर दक्षिण भारत में तिरूपति के निकट तिरूमला की पहाडियों पर विराजे भगवान बालजी जिन्हें तिरूपति बाला जी के नाम से जाना जाता है, सबसे आगे हैं। इसके बाद नंबर आता है उत्तर भारत में जम्मू के निकट त्रिकुटा पहाडी पर विराजीं मातारानी वेष्णव देवी का। इन दोनों ही के बाद महाराष्ट्र प्रदेश के अहमदनगर जिले के शिरडी गांव के फकीर साई बाबा के धाम का नाम लिया जाता है।
शिरडी की भूमि में अचानक आए साई बाबा ने जो चमत्कार दिखाए वे पौराणिक काल के नहीं थे, आज के युग में लोगों ने बाबा को देखा है, महसूस किया है, और आज भी बाबा के प्रति लोगों की अगाध श्रृद्धा का कारण उनका चमत्कारिक व्यक्तित्व ही कहा जा सकता है। जीवन भर जिस फकीर ने अपने बजाए मानव मात्र की चिन्ता की है, उसके नाम को आज व्यवसायिक चोला पहनाया जाना निस्सन्देह निन्दनीय है।
सत्तर के दशक के बाद मनोज कुमार कृत ``शिरडी वाले साई बाबा`` चलचित्र और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ``अमर अकबर एन्थोनी`` में ऋषि कपूर का गाना ``शिरडी वाले साई बाबा, आया है दर पे तेरे सवाली. . .`` ने धूम मचा दी। जिस तरह गुलशन कुमार के माता रानी के भजनों के बाद समूची देश त्रिकुटा पर्वत पर विराजी माता वेष्णव देवी का दीवाना हो गया था, ठीक उसी तरह बाबा के भक्तों की कतारें बढती ही गईं।
साई भक्तों की आस्था के केन्द्र शिरडी का चर्चा में रहना पुराना शगल है। जब तक बाबा सशरीर थे, तब तक फर्जी नीम हकीम और ओझाओं द्वारा बाबा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर इस स्थान को चर्चाओं का केन्द्र बनाया और अब तो सोने के सिंहासन और करोडों के दान के चलते यह स्थान चर्चाओं का केन्द्र बिन्दु बने बिना नहीं है। अब यह बाबा के व्हीआईपी दर्शन के चलते चर्चाओं में आ गया है।
साई बाबा संस्थान द्वारा लिए गए निर्णय कि काकड आरती के लिए पांच सौ रूपए तो धूप आरती के लिए ढाई सौ रूपए वसूले जाएंगे, साई भक्तों को जम नहीं रहा है। यद्यपि यह व्यवस्था वर्तमान में प्रयोग के तौर पर ही लागू की गई है, किन्तु तीन माह में ही बाबा के भक्तों के बीच इस व्यवस्था को लेकर रोष और असन्तोष गहराने लगे तो बडी बात नहीं। किसी भी अराध्य के दर्शन के लिए अगर उसके अनुयायी को कीमत चुकानी पडे तो यह उसकी आस्था पर सीधा कुठाराघात ही कहा जाएगा।
हो सकता है कि बाहर से आने वाले लोगों की परेशानी को ध्यान में रख संस्थान ने यह व्यवस्था बनाना मुनासिब समझा होगा, किन्तु उत्तर भारत में माता रानी वेष्णव देवी के दर्शन के लिए आरम्भ की गई हेलीकाप्टर सेवा का लाभ आम श्रृद्धालु उठाने की कतई नहीं सोचता है। वैसे भी माना जाता है कि अपने अराध्य के दर्शन जितने कष्ट के बाद होते हैं उतना ही पुण्य प्रताप भक्त को मिलता है।
शुल्क के बदले अराध्य के दर्शन की व्यवस्था माता वेष्णो देवी श्राईन बोर्ड ने आरम्भ की थी, जिसमें दो सौ रूपए से एक हजार रूपए तक का मूल्य चुकाने पर विशेष दर्शन की व्यवस्था की गई थी। बाद में भक्तों के भारी विरोध के बाद इस व्यवस्था को श्राईन बोर्ड ने बन्द कर दिया था। देश की राजधानी दिल्ली में साकेत में विशाल साई प्रज्ञा धाम चलाने वाले स्वामी प्रज्ञानन्द का कहना एकदम तर्कसंगत है कि शिरडी के सन्त साई बाबा गरीबों के मसीहा थे और उनके दर्शन के लिए धन के आधार पर भेदभाव किसी भी सूरत में तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता है।
शिरडी के साई बाबा पर देश के करोडों लोगों की अगाध श्रृद्धा है। बाबा किस जात के थे, यह बात आज भी रहस्य ही है। बाबा जहां बैठते थे, उस स्थान को द्वारका मिस्जद कहा जाता है। सभी धर्माें के लोगों द्वारा साई बाबा के प्रति आदर का भाव है। यही कारण है कि साई बाबा संस्थान शिरडी के कोष में दिन दूगनी रात चौगनी बढोत्तरी होती जा रही है। कोई बाबा को सोने का सिंहासन तो कोई रत्न जडित मुकुट चढाने की बात करता है।
बाबा को समाधि लिए अभी सौ साल भी नहीं बीते हैं और विडम्बना ही कही जाएगी कि बाबा की इस प्रसिद्धि को भुनाने में धर्म के ठेकेदारों ने कोई कोर कसर नहीं रख छोडी है। आज देश भर में बाबा के नाम पर छोटे बडे अस्सी हजार से अधिक मन्दिर अिस्त्त्व में आ चुके हैं। इनसे होने वाली आय किस मद में खर्च की जा रही है, इसका भी कोई लेखा जोखा नहीं है। साई के नाम पर लोगों को ठगने वालों की तादाद आज देश में तेजी से बढी है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
शिरडी का वह फकीर जो माया मोह से दूर था के समाधि लेने के बाद उनके मन्दिर या समाधि स्थल को भव्य बनाना उनके भक्तों की भावनाएं प्रदर्शित करता है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही साथ बाबा के भक्तों को यह भी सोचना चाहिए कि साई बाबा ने सदा ही मानवमात्र के कल्याण की बात सोची थी। बाबा के प्रति सही भक्ति अगर प्रदर्शित करना है तो संस्थान और उनके दानदाता भक्तों को चाहिए कि शिरडी में सोने के सिंहासन या रत्न जडित मुकुट आदि के बजाए एक भव्य सर्वसुविधायुक्त अस्पताल अवश्य बनवा दें जिसमें हर साध्य और असाध्य रोगों का इलाज एकदम निशुल्क हो, इससे बाबा की कीर्ति में चार चान्द लग सकते हैं।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

भाजपा की बैठक बनाम कोर्ट की अवमानना

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
भाजपा की बैठक बनाम कोर्ट की अवमानना
लगता है भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी की ताजपोशी की घोषण महूर्त देखकर नहीं की गई थी। यही कारण है कि उनके अध्यक्ष बनते ही एक के बाद एक आघात प्रतिघात उन्हें सहने पडे। अब जबकि 17 से 19 फरवरी तक इन्दौर में चलने वाली भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में उनके अध्यक्ष बनने की घोषणा पर मुहर लगने वाली है तब बैठक के स्थल को लेकर ही सियासत गर्मा गई है। कांग्रेस ने आयोजन स्थल पर अनेक सवाल खडे कर दिए हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने सीधा सीधा आरोप लगाया है कि एमपी की व्यवसायिक राजधानी इन्दौर के ओमेक्स सिटी में होने वाले इस आयोजन के बहाने भाजपा भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रही है। यहां जमीनों में निवेश का काम नितिन गडकरी के भांजे ही किया करते हैं, और तो और महाराष्ट्र प्रदेश भाजपाध्यक्ष रहते हुए गडकरी ने पिछले साल 25 जनवरी को अधिवेशन स्थल के करीब एक टाउनशिप का उद्घाटन भी किया था। इतना ही नहीं इन्दौर बायपास पर निर्माणाधीन टाउनशिप को लेकर उच्च न्यायालय की इन्दौर खण्डपीठ में दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान ही कोर्ट ने इन कालोनियों के प्रवेश द्वार को अवैध करार दिया था और राजमार्ग के अधिकारियों को इन दरवाजों को बन्द करने के आदेश दिए थे। मजे की बात तो यह है कि कोर्ट की रोक के बावजूद भी इन अवैध निकास द्वारों को तोडकर राज्य सरकार के निर्देश पर यहां पक्की सडक का निर्माण भी किया जा रहा है।
 
थुरूर और विवाद मतलब चोली दामन का साथ
कांग्रेस के नवरत्नों में से एक विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर और विवादों के बीच क्या नाता है, इस बात का जवाब प्रायमरी का बच्चा भी दे सकता है कि दोनों के बीच चोली दामन का साथ है। कभी मंहगे विलासितापूर्ण जीवन तो कभी अपनी ही पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के इकानामी क्लास में यात्रा पर उसे मवेशी का बाडा कहने वाले शशि थुरूर एक बार फिर विवादित हो गए हैं। इस बार वे अपने निहित स्वार्थ के मामले में चर्चा में आए हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों थुरूर द्वारा लिखित तीन पुस्तकों की डेढ सौ प्रतियां विदेश मन्त्रालय ने खरीदीं हैं। थुरूर के विरोधियों का आरोप है कि अपने आप को ही महिमा मण्डित करने के उद्देश्य से विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर ने अपने द्वारा ही रचित किताबों को अपने ही मन्त्रालय में सशुल्क बुलाया है। जाहिर है चोरी पकडी जाने पर शशि थुरूर आहत हैं। उन्होंने एक बार फिर प्रोटोकाल को तोडते हुए अपनी पीडा का इजहार पार्टी या सरकारी मंच पर करने के बजाए सोशल नेटविर्कंग वेव साईट ``टि्वटर`` पर किया है। भारत गणराज्य के मन्त्री ने टि्वटर पर कहा है कि मेरे कर्मचारियों और मेरा विदेश मन्त्रालय द्वारा पुस्तकों की खरीद से कोई लेना देना नहीं है, और मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं है कि खरीदी गई किताबों में मेरी किताब भी है। है न मजे की बात कि एक के बाद एक कर टि्वटर को थुरूर बिना किसी मोल के प्रमोट करते जा रहे हैं और भारत सरकार मूक दर्शक बनी बैठी है, बेहतर है टि्वटर को खरीदकर उस पर ही सारे सरकारी कामकाज संपादित करने आरम्भ कर दिए जाएं।
यहां चुनाव नहीं होते!
चुनाव में चुनाव पंचायत चुनाव और पंचायतों में लडाई झगडे, रूपया पैसा, दारू शारू का शगल कोई नया नहीं है। पंचायत चुनाव में वैसे भी बात बात पर तलवारें खिंचना, लट्ठ भोंगे निकलना आम बात है। इस सबसे उलट एक गांव की पंचायत के चुनावों की चर्चा दिल्ली में आम हो गई है। यह गांव है छत्तीसगढ प्रदेश की उपनी ग्राम पंचायत। चांपा जांजगीर जिले की यह ग्राम पंचायत प्रदेश की राजधानी से 176 किलोमीटर दूर है। तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में लगभग 18 सौ वोटर हैं। इस ग्राम पंचायत का मुखिया चुनने में प्रदेश सरकार को वोटिंग की माथा पच्ची नहीं करनी पडती है। आश्चर्य के साथ मजे की बात यह है कि यहां पिछले 20 सालों से गांव की चौपाल पर ही बैठकर लोग सर्वसम्मति से अपना मुखिया चुन लेते हैं। इक्कीसवीं सदी में प्रतिस्पर्धा और सत्ता सुख की दौड में सरपंच के साथ ही साथ पंचों का चयन भी सर्व सम्मति से होना वाकई आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। पिछले चारों मर्तबा पंचों के पद रोटेशन में विभिन्न तौर पर आरक्षित होने के बाद भी सामंजस्य में कोई अन्तर नहीं आया है।
जयराम उवाच -``देश में बाघों की कमी, आदमियों की नहीं``
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश को लगता है कि बस बाघों की ही चिन्ता दिनरात खाए जा रही है। बाघों को बचाने के लिए उन्होंने टाईगरनेट नाम की एक वेव साईट भी लांच की है। उत्तराखण्ड और हिमाचल में बाघों के हमले से संकट में पडे मानव जीवन के बारे जब जयराम रमेश से पूछा गया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया -``जंगली जानवरों को बचाने की समस्या, मनुष्यों को बचाने से कहीं ज्यादा महात्वपूर्ण है। हम बाघों को बचाने का काम कर रहे हैं, बाघों से लोगों को कैसे बचाया जाए यह हमारा कामन नहीं है। वैसे भी देश में बाघों की कमी है आदमियों की नहीं।`` वन्य जीव अगर इंसानी आबादी में घुस जाए तो वन्य जीव संरक्षण कानून के अनुसार यह वहां के नागरिकों की जवाबदारी है कि उस वन्य जीव को कुछ नुकसान न पहुंचाया जाए। जानवरों से लोगों को सुरक्षा प्रदान करना वन विभाग की जिम्मेदारी में नहीं आता है। एनजीओ के आंकलन के अनुसार हिप्र और उत्तराखण्ड में हर साल लगभग दो सौ मामलों में वन्य जीव इंसानों पर हमला करते हैं। हालात देखकर यही कहा जा सकता है कि जयराम रमेश स्वयं इंसान की योनी में हैं पर उन्हें इंसानों से ज्यादा बाघों की चिन्ता खाए जा रही है।
दारू की बोतल में साहिब पानी भरता है. . .
मध्य प्रदेश सूबे में इन दिनों एक विशेष ब्राण्ड की िव्हस्की पीने वालों की शामत आ गई है। दरअसल नामी गिरामी ब्राण्ड मेक डबल नंबर वन की विस्की के अद्धे (180 मिली लीटर के पैक वाली बोतल) का ढक्कन खोलते ही बोतल का मुंह टूटा ही मिलता है। इसके चलते शराब दुकानों और मयकशों के बीच जमकर वाद विवाद की स्थिति निर्मित होती रहती है। खुली बोतल लेने से ठेकेदार साफ इंकार कर देता है, तो पियक्कड अपनी बात पर अडे रहते हैं। बाद में ठेकेदार के गुर्गे उसे पूरी बोतल खरीदने पर विवश कर ही देते हैं। बताया जाता है कि मेक डबल नंबर वन के हाफ को प्रदेश में कई जगहों पर दुबारा पेक किया जा रहा है। अनाडी कर्मचारियों द्वारा पेकिंग के दौरान मशीन से ज्यादा जोर का झटका लगा देते हैं जिससे बोतल के मुंह की किनारी निकल जाती है। पीने वालों का कलेजा हलक में आ जाता है कि क्योंकि अगर छोटी सी किरची भी उसके पेट में चली गई तो राम नाम सत्य ही समझो। शिकायत दर शिकायत के बाद भी आबकारी महकमा चादर तान पैर पसार कर सो रहा है।
समस्याओं पर बोलीं ममता, मुझे गिटार कब सिखाओगे कबीर
पश्चिम बंगाल सूबे से उठकर राजनीति के राष्ट्रीय परिदृश्य में छाने वाली भारत गणराज्य की रेल मन्त्री ममता बनर्जी के गढ त्रणमूल कांग्रेस में देश पर आजादी के बाद आधी सदी से अधिक राज करने वाली कांग्रेस ने सेंध लगा दी है। ममता बनर्जी के कुनबें में अब उनके संसद सदस्य ही घुटन महसूस करने लगे हैं। बताते हैं कि ममता के कुनबे के सांसदों को कांग्रेस अपनी डोर पर नचा रही है। कांग्रेस की आधुनिक राजनीति के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह के फेंके गए पांसों में फंसकर त्रणमूल सांसदों द्वारा ममता के खिलाफ ही बयानबाजी की जा रही है। हाल ही में यादवपुर संसदीय क्षेत्र के त्रणमूल सांसद कबीर सुमन की व्यथा सार्वजनिक तौर पर सामने आई। उन्होंने कोलकता में संवाददाताओं से चर्चा के दौरान कहा कि माकपा हो या कोई और जो भी सत्ता में आता है, सिर्फ और सिर्फ अपने लिए ही काम करता है। मैं महज एक सांसद के तौर पर काम नहीं कर सकता हूं। में पार्टी का गुलाम बनकर रह गया हूं। मैं घुटन महसूस कर रहा हूं। कबीर ने एक रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि जब भी समस्याओं को लेकर वे ममता बनर्जी से कुछ कहते हैं ममता कहतीं हैं कि मुझे गिटार कब सिखाओगे।
कैसे बनेंगे अन्तर्राष्ट्रीय पखाने!
इस साल के अन्त में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कामन वेल्थ गेम्स होना निर्धारित है। हालात देखकर कोई भी कह सकता है कि दिल्ली अभी इसकी मेजबानी के लिए तैयार कतई नहीं है। जिस गति से काम चल रहा है उस गति से तो हो गए खेल। इसी बीच एक महत्वपूर्ण समस्या की ओर किसी का ध्यान न जाना आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। दिल्ली में विदेश से आने वाले महमानों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के टायलेट की व्यवस्था कैसे होगी। शौचालय वाकई एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है। साफ सुथरा और कीटाणुरहित शौचायल पर्यटक पर अलग प्रभाव डालता है। गौरतलब है कि 2008 में बीजिंग में होने वाले ओलम्पिक के लिए चीन ने 2003 से ही साफ सुथरे टायलेट बनाने का अभियान छेड दिया था, यहां ओलम्पिक के दो साल पहले 2006 में ही यह काम पूरा हो गया था। दिल्ली में महिलाओं के लिए महज डेढ सौ से भी कम वाश रूम हैं, वे भी बहुत गन्दी हालत में। हों भी क्यों न, भारत देश में इस बारे में जागरूकता लाई ही नहीं गई है। आज भी गांव गांव में लोटा परेड और दिशा मैदान जैसे शब्द आम ही हैं।
अनेक महत्व का है इस बार हरिद्वार का कुंभ
हरि के घर आंगन में प्रवेश के द्वार ``हरिद्वार`` में इस बार का महाकुंभ मेला अपने आप में अनेक विशेषताओं को समाहित किए हुए है। अव्वल तो यह तीन ऋतुओं के संगम में आयोजित हो रहा है। मान्यता है कि अमृत मन्थन के दौरान नासिक, उज्जैन, प्रयागराज और हरिद्वार में होने वाले कुंभ में से उज्जैन और नासिक का कुंभ बारिश में आयोजित होता है। प्रयागराज का कुंभ शीतकाल में आयोजित होता है। हरिद्वार के कुंभ में पहला शाही स्नान पंचदाशनाम अखाडे द्वारा ही किया जाता है, जबकि अन्य स्थलों के महाकुंभ में पहले शाही स्नान पर तेरह अखाडों द्वारा एक साथ स्नान की परंपरा है। यहां महाकुंभ का आगाज मकर संक्रान्ति को होता है, यानी शीत ऋतु, इसके उपरान्त बसतं के मौसम में यहां साधु सन्तों का जमावडा देखने लायक होता है। इसके बाद तपती गरमी में स्नान ध्यान के उपरान्त जमावडा धीरे धीरे कम होने लगता है।
राजनैतिक दवाब में बदल न जाए रास्ता
राजनैतिक हस्ताक्षेप और मां लक्ष्मी की माया के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं। दिल्ली में दिल्ली विकास प्राधिकरण की कुण्डाली द्वारका मास्टर प्लान रोड में कुछ फेरबदल होने के आसान नज़र आने लगे हैं। इस योजना के लिए पूठ खुर्द में सैकडों बीघा जमीन को अब तक कब्जे से मुक्त कराया नहीं जा सका है। बताते हैं कि यह अधिगृहण भी महज कागज पर ही हुआ है। 21 मार्च 2003 को डीडीए ने 1074 बीघा जमीन अधिग्रहीत की थी। इस जमीन पर सौ मीटर चौडे एक्सप्रेस वे का निर्माण प्रस्तावित है। सात सालों बाद भी इस जमीन पर कारखाने और सरकारी कार्यालय बैंक चल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि यहां 2003 में अवार्ड होने के बाद भी जमीनों पर मकान बनाए जा रहे हैं। बताते हैं कि डीडीए के अधिकारी अब कब्जे से जमीन लेने के बजाए सडक के मार्ग में ही फेरबदल का मन बना रहे हैं। राजनैतिक दबाव और पैसे के प्रभाव के चलते डीडीए के अधिकारी मास्टर प्लान से छेडछाड से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।
क्या मोदी सुनेंगे गडकरी की गर्जना
भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने मुसलमानों को लुभाने के लिए एक आश्वासन दिया है कि देश में भाजपा शासित सूबों में मुस्लिम युवाओं को कम्पयूटर शिक्षा सरकारी खर्चे पर दी जाएगी। बताते हैं कि नितिन गडकरी द्वारा मुस्लिम युवक युवतियों को कप्यूटर लिट्रेट बनाने का काम गडकरी द्वारा महाराष्ट्र सूबे में किया जा रहा है। एक गैर सरकारी मुस्लिम संगठन से भेंट के दौरान गडकरी ने कहा कि जिन राज्यों में भाजपा सरकारें हैं वहां मुस्लिम युवक युवतियों को सरकारी खर्चे पर कम्पयूटर शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। जैसे ही गडकरी ने उक्त बात कही, वहां उपस्थित एक साहेबान ने दबी जुबान से कह ही दिया कि गुजरात के निजाम नरेन्द्र मोदी ने अब तक गडकरी को कर्टसी विजिट नहीं दी है वे क्या गडकरी के इस फरमान को अमली जामा पहनाएंगे। मोदी द्वारा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की बात को तवज्जो दी जाती है कि नहीं यह बात तो भविष्य के गर्भ में है, पर राजनैतिक फिजां में मोदी द्वारा गडकरी को एक गुलदस्ता भी भेंट न किया जाना चर्चित आज भी है।
यह है पीएमओ की सुरक्षा
देश में आम आदमी कितना सुरक्षित है इसकी परवाह किसी को भी नहीं है, सारे सुरक्षा बल व्हीव्हीआईपी और व्हीआईपी के लिए ही फिकरमन्द प्रतीत होते हैं। देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति प्रधानमन्त्री का आवास अभैद्य ही होता है। प्रधानमन्त्री के आवास के इर्दगिर्द की सुरक्षा कितनी पुख्ता है, इस बात का खुलासा गणतन्त्र दिसव के दो दिन बाद 28 जनवरी को सुबह चार बजे तब हुआ जबकि गणतन्त्र दिवस के चलते देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली रेड अलर्ट पर थी। इस हाई सिक्यूरिटी जोन में प्रधानमन्त्री आवास से महज सौ मीटर दूर स्थित होटल अशोक के बाहर एक व्यक्ति द्वारा सरेआम फायरिंग कर दी। प्रधानमन्त्री का आवास कोई बस स्टेण्ड या बाग बगीचा नहीं है। यह बहुत संवेदनशील और हाई सिक्यूरिटी जोन माना जाता है। अगर इसके इर्दगिर्द कोई फायर करे तो सुरक्षा तन्त्र की पोल खुल ही जाती है। यद्यपि स्विफ्ट में सवार उक्त युवक को चाणक्यपुरी पुलिस ने धर पकडा है, फिर भी इस तरह के मामलों से सुरक्षा तन्त्र को सबक लेना ही चाहिए।
और फंस गए गृह मन्त्री
देश के गृहमन्त्री लगातार दो घंटों तक एक विमान में कैद रहे। यह गासिप नहीं हकीकत है जनाब! भारण गणराज्य के गृहमन्त्री, तमिलनाडू की मन्त्री पी.गीताजीवन सहित 64 यात्री चेन्नई से मदुरई जाने वाले विमान में चैन्नई के एयरपोर्ट पर विमान में आई तकनीकि खराबी के चलते दो घंटे तक विमान के अन्दर फंसे रहे। दरअसल सुबह छ: बजकर 40 मिनिट पर उक्त विमान को उडान भरनी थी, किन्तु तकनीकि खराबी के चलते विमान उडान नहीं भर सका। कुछ समय के बाद जब विमान ठीक हुआ तब वह फिर रनवे पर आया, किन्तु इस बार उसके पहिए ही जाम हो गए। फिर क्या था इसे ठीक किया गया। इस दौरान लगभग एक सौ बीस मिनिट तक देश के गृह मन्त्री पलनिअप्पम चिदम्बरम को विमान के अन्दर ही बिताने पडे।
विधायक असली, मेडिकल बिल फर्जी
देश के जनसेवकों की नीयत पर सवालिया निशान अनेकों मर्तबा लगे हैं, किन्तु हाल ही में महाराष्ट्र सूबे में विधायकों द्वारा मेडीकल देयकों का जो फर्जी वाडा किया है, उससे लोगों द्वारा दिए गए जनादेश का सरासर अपमान ही हुआ है। महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा अपने विधानसभा सदस्यों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की गरज से उनका मेडीक्लेम बीमा करवाया था। महाराष्ट्र के सोलह विधायकों ने फर्जी मेडीकल बिल के जरिए लाखों रूपए का मेडीकल फर्जी वाडा किया है। इनमें से नौ कराडपति तो सात लखपति विधायक हैं। इन विधायकों की जुर्रत तो देखिए जिस दिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर चर्चा में हिस्सा लिया उसी दिन वे अस्पताल में भी भर्ती थे। बीमा करने वाली कंपनी ने जब अपने रिकार्ड को खंगाला तो उसके होश उड गए कि जनसेवक इस तरह से फर्जीवाडा भी कर सकते हैं। एक गैर सरकारी संगठन द्वारा सूचना के अधिकार में यह जानकारी निकालकर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है। इस तरह के जनसेवकों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी जानी चाहिए।
 
पुच्छल तारा
इन्दौर से सचिन कुमार ईमेल करते हैं कि जैसे ही सानिया मिर्जा और सोहराब की सगाई टूटने की खबर जैसे ही आई वैसे ही सानिया मिर्जा के फैन्स उत्साहित और उद्वेलित दोनों ही हो गए। इस पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। सबसे शानदार प्रतिक्रिया यह थी जिसमें कहा गया था कि वाह सानिया मिर्जा, वाह, इस बैक हैण्ड शॉट का तो हमें कब से इन्तेजार था . . .।

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

क्या इसीलिए कहलाते हैं ये जनसेवक!

क्या इसीलिए कहलाते हैं ये जनसेवक!
रियाया को बुनियादी सुविधाएं जुटाने फिसड्डी हैं जनसेवक 
अन्तिम छोर के आदमी को दो सौ साल लगेंगे बुनियादी सुविधाएं मिलने में
(लिमटी खरे)
तीन दशक पहले माल वाहक वाहनों पर ``लोक वाहक`` लिखा होता था, इन अंधी रफ्तार से चलने वाले ट्रक से होने वाली दुघZटनाओं को देखकर कवि सम्मेलनों में इन्हें ``परलोक वाहक`` का नाम दिया गया था। इसी तरह जनता की सेवा करने का प्रण लेने वालों को जनसेवक कहा जाता है। जनसेवक का काम अपने निहित स्वार्थों को हाशिए पर रखकर जनता की सेवा करना होता है, विडम्बना यह है कि नब्बे के दशक से जनसेवकों ने अपने निहित स्वार्थ साधने के चक्कर में रियाया को ही हाशिए पर कर दिया है।
केन्द्र सरकार ने देश के आखिरी आदमी तक के लिए स्चच्छ पेयजल और साफ सुथरे शौचालयों के इन्तजाम के लिए मियाद तय की है, और यह मियाद 2012 अर्थात आने वाले दो साल में समाप्त हो जाएगी। आज की जमीनी हालात को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आने वाले एक दशक के पूरा होने पर अर्थात विजन 2020 के पूरा होने के बाद भी देश में इन दोनों बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकेगा। एक एन जी ओ द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार आने वाले दो सौ सालों के उपरान्त ही इस अभियान को शत प्रतिशत पूरा किया जा सकता है।
कितने आश्चर्य की बात है कि देश पर हुकूमत करने वालों को अपनी रियाया की जरा भी फिकर नहीं है। कम से कम बुनियादी सुविधाएं तो जनता को उपलब्ध होनी ही चाहिए। एक समय था जब शासक भेष बदलकर अपने राज्य की जनता के दुख दर्द को जाना करते थे, पर आज के निजाम तो दुखदर्द को जानते बूझते आंख बन्द किए हुए हैं। रही बात विपक्ष की तो, सरकार निरंकुश न हो पाए इसकी जवाबदारी विपक्ष की हुआ करती है। वर्तमान परिदृश्य में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही मिलकर दोनों हाथों से लड्डू खाने में मशगूल हैं।
भारत का प्रजातन्त्र विश्व का सबसे बडा प्रजातन्त्र माना जाता है, और इसको सही मार्ग दिखाने के लिए इसके चौथे स्तंभ के तौर पर मान्यता दी गई है मीडिया को। वर्तमान समय में मीडिया पूरी तरह से औद्योगिक घरानों की जरखरीद गुलाम बनकर रह गया है। मीडिया के मालिकों से अगर कहा जाए कि वे किसी विषय पर दो शब्द लिखकर या बोलकर बताएं तो उनकी पेशानी पर पसीने की बून्दे छलक जाएंगी। सत्ता और विपक्ष की जुगल बन्दी में मीडिया के तडके ने तो जनता की जान ही निकाल दी है।
बहरहाल, समग्र स्वच्छता अभियान का लक्ष्य पूरा करने में प्रधानमन्त्री डॉ.एम.एम.सिंह, लोकसभा के निर्वतमान नेता प्रतिपक्ष एल.के.आडवाणी, कांग्रेस की नज़रों में भविष्य के प्रधानमन्त्री राहुल गांधी, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्री सी.पी.जोशी, केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री गुलाम नवी आजाद जैसे दिग्गजों के चुनाव क्षेत्रों में इस अभियान के धुरेZ उडते दिखाई दे रहे हैं। गौरतलब है कि समग्र स्वच्छता अभियान केन्द्र सरकार की एक महात्वाकांक्षी योजना है, जिसके तहत 2012 तक देश के सभी ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल और साफ सुथरे शौचालयों की शत प्रतिशत व्यवस्था सुनिश्चित की जानी है।
हाल ही में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा जुटाए गए आंकडे बहुत ही निराशाजनक माने जा सकते हैं। संस्था की मानें तो कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में तो 2012 तक इसे कुछ हद तक पूरा माना जा सकता है, किन्तु कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में काम की गति को देखकर कहा जा सकता है कि 2016 तक भी इसे शत प्रतिशत पूरा नहीं किया जा सकता है।
मजे की बात तो यह है कि प्रधानमन्त्री जो असम से राज्यसभा सदस्य हैं वहां उनके दर्शाए गए स्थायी निवास ``कामरूपा`` जिले में यह अभियान 2030 तक पूरा नहीं किया जा सकता है। समग्र स्वच्छता अभियान की बागडोर केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्रालय के जिम्मे है, और चमत्कार देखिए कि विभाग के मन्त्री सी.पी.जोशी के संसदीय क्षेत्र राजस्थान के भीलवाडा में यह अभियान 2023 तक पूरा होने की उम्मीद दिख रही है। यह आलम तब है जबकि राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार काबिज है।
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग रहे लोकसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष लाल कृष्ण आडवाणी के संसदीय क्षेत्र गांधी नगर जैसे इलाके में यह अभियान 2017 तक परवान चढ सकेगा। सासाराम से जीतकर पहली महिला लोकसभाध्यक्ष बनने का गौरव पाने वालीं मीरा कुमार के संसदीय क्षेत्र में यह योजना 2022 तक ही पूर्ण होने की उम्मीद है। इसी तरह केन्द्रीय मन्त्री शरद पवार, कमल नाथ, एम.एस.गिल, मिल्लकार्जुन खडगे, बी.के.हाण्डिक, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज आदि के संसदीय क्षेत्रों का कमोबेश यही आलम है।
इस तरह की निराशाजनक स्थिति तब सामने आ रही है जबकि मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पिछली बार सरकार ने केन्द्र पोषित केन्द्रीय योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को मद्देनज़र रख देश के हर संसद सदस्य को उनके संसदीय क्षेत्र के जिलों में निगरानी समिति का अध्यक्ष बनाया था। इतना ही नहीं सांसदों से यह उम्मीद की गई थी कि हर तीन माह में केन्द्रीय योजनाओं का आंकलन करेंगे। विडम्बना एक बार फिर वही है कि सांसदों ने इसे सीधा सीधा नज़र अन्दाज कर दिया, जिससे केन्द्र पोषित योजनाअों में आने वाली भारी भरकम राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढने से न बच सकी।
राष्ट्रपिता बापू का भी मानना था कि वास्तविक भारत गांवों में बसता है। आज भारत की आजादी के साठ सालों बाद भी गांव की बदरंग तस्वीर से कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी, वजीरेआजम डॉ.एम.एम.सिंह सहित सत्ता और विपक्ष के हर जनसेवक वाकिफ है, फिर भी वह अपने समर्थकों, अनुयाईयों, परिजनों के लिए केन्द्र और राज्य पोषित योजनाओं में भ्रष्टाचार करने के मार्ग प्रशस्त करने से नहीं चूकता है।
एक जमान में जनता की सेवा को धर्म समझने वाले को जनसेवक कहा जाता था, किन्तु लगता है आज जनसेवक के मायने बदल चुके हैं। आज जनता को दुत्कार कर हाशिए पर रखकर अपने निहित स्वार्थों को पूरा कर अंटी में माल इकट्ठा करने वाले  जनसेवक कहलाते हैं। इस तरह के जनता के गाढे खून पसीने की कमाई के शोषक किस तरह सर उठाकर चलते हैं, यह देखते ही बनता है। पता नहीं इनका जमीर कैसे गवारा कर पाता है कि जिस जनता की जेब पर ये डाका डालते हैं उसी जनता से सीधे आंख मिलाने का दुस्साहस भी कर पाते हैं।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

समझना होगा इंटरनेट के इन्द्रजाल को

समझना होगा इंटरनेट के इन्द्रजाल को

सायबर क्राईम के लिए हो गया है उपजाउ माहौल तैयार

(लिमटी खरे)

अब समय आ गया है कि इस बात पर सर जोडकर बैठा जाए और विश्लेषण किया जाए कि इंटरनेट का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए। इंटरनेट की उमर अब 41 साल हो गई है। सितम्बर 1969 में अमेरिका में इसका जन्म हुआ था। लास एंजेलिस के कैलीफोनिZया विश्वविद्यालय में एक कंप्यूटर ने दूसरे कंप्यूटर को ईमेल सन्देश सफलता पूर्वक प्रेषित किया था। इसके बाद इंटरनेट ने पीछे मुडकर कभी नहीं देखा।

इसके बाद पडाव दर पडाव तय करके इंटरनेट ने नित नई उंचाईंया तय की हैं। अब तो मामला ईमेल से कोसों आगे बढकर चेटिंग और सोशल नेटविर्कंग वेव साईट्स तक पहुंच गया है। इंटरनेट पर अब वचुZअल स्पेस पर एकाधिकार की जंग, विज्ञापनदाताओं को आकषिZत करने की होड के अलावा ऑनलाईन बाजार में अपने आप को बेहतर साबित करने की कवायद भी साफ दिखाई पडने लगी है।

चिन्ताजनक पहलू यह है कि आज इंटरनेट अपने उद्देश्य से भटकता दिखाई देने लगा है। आज लोग इंटरनेट को पोर्न साईट्स (सेक्स से सम्बंधित अश्लील साईट्स) का अड्डा और टाईम पास का जरिया समझने लगे हैं। बच्चों से लेकर युवा, प्रोढ यहां तक कि वृद्ध मन को आकषिZत करने वाले पोनोZग्राफी सबसे अधिक देखी जाने वाली साईट्स में स्थान पा चुकी हैं। आज छोटे छोटे शहरों में भी अगर इंटरनेट पार्लर का सर्वेक्षण किया जाए तो यहां आठ साल से साठ साल तक के आयुवर्ग के लोगों का आना जाना रहता है। छोटे छोटे बच्चों का कंप्यूटर फ्रेण्डली होना अच्छा है, किन्तु उनका रूझान पोर्न साईट्स की ओर होना शुभ संकेत नहीं हैं।

इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि इंटरनेट को सूचना क्रान्ति का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। इस पर एक ओर नित नई जानकारियां, दुर्लभ वीडीयो मिलते हैं। कल तक अखबारों या पत्रिकाओं की कतरनें सहेजकर रखना होता था, आज जमाना बदल गया है। कोई भी जानकारी आपको बस एक िक्लक पर ही उपलब्ध हो जाती है। यह सब इंटरनेट का ही कमाल माना जाएगा। गांधी के विचार हों या माक्र्स की थ्योरी या फिर हिटलर की सोच, आज सर्च इंजन पर सिर्फ टाईप कर दीजिए, पलक झपकते ही इसके हजारों लिंक आपके सामने होंगे, जिनके माध्यम से आप उनके वेब पेज तक पहुंच सकते हैं, वह भी बिल्कुल मुफ्त।

मीडिया ने भी इंटरनेट के साथ कदम ताल मिलाया है। कल तक प्रिंट मीडिया का बोलबाला था। अनेक समाचार पत्र इतने लोकप्रिय हुआ करते थे कि लोग दो दिन बाद भी उसे पढा करते थे। अस्सी के दशक तक प्रिंट को जबर्दस्त सफलता मिली। इसके बाद बाजार में आया इलेक्ट्रानिक मीडिया। समाचार चेनल्स ने लोगों को लाईव कवरेज दिखाया तो इसका जादू सर चढकर बोलने लगा, मगर प्रिंट का अपना एक वजूद था, जो आज भी बना हुआ है। इसके बाद अब वेब पत्रकारिता ने लोगों को अकषिZत किया है। वेव बेस्ड समाचार एजेंसी, समाचार वेब साईट्स को जबर्दस्त सफलता मिल रही है।

अंग्रेजी में तो नेट पर न जाने कितनी समाचार की साईट्स हैं, पर अब हिन्दी में भी इन साईट्स ने धमाल मचाया हुआ है। वेब और प्रिंट मीडिया की खासियत यह है कि आप जब चाहे तब जौन सी चाहे वो खबर देख सकते हैं, पर समाचार चेनल्स में अगर आप उसे देखने से वंचित रह गए तो फिर आपको वह नहीं मिल सकता है।

इसके साथ ही साथ दस साल पहले अस्तित्व में आए ब्लाग का जादू लोगों के सर चढकर बोलने लगा। पहले लोगों को ब्लाग के मायने नहीं पता थे, आज हर विधा के ब्लाग से भरा पडा है इंटरनेट का संसार। ब्लाग एग्रीकेटर्स ने तो ब्लागर्स को नया स्पन्दन दिया है। आलम यह है कि ब्लागर्स के ब्लाग पर जाकर अब तो समाचार पत्र पत्रिकाएं खबरें, आलेख, काव्य संग्रह, कहानी, वृतान्त आदि को लिफ्ट कर उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं।

अखबरों की दुनिया में पितृ पुरूष की छवि वाले ``जनसत्ता`` अखबार ने तो रोजाना ही एक न एक ब्लाग को अपने संपादकीय पेज में स्थान देना आरम्भ किया है। इसके अलावा कुछ ब्लागर्स ने प्रिंट में छपे ब्लाग्स को एक जगह एकत्र कर अनुकरणीय प्रयास आरम्भ किया है, जिससे सभी यह देख सकते हैं कि किस ब्लाग को कहां सराहा गया है।

इंटरनेट के अच्छे के साथ बुरे पहलू भी हैं। सरकारों की अनदेखी के चलते सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट्स पर तंबाखू और धूम्रपान को बढावा देने के विज्ञापनों को खासा स्थान दिया जा रहा है। अनेक विज्ञापन तो इतने लुभावने होते हैं कि युवाओं के कोमल मन में सिगरेट का कश लगाने की कसक पैदा हो जाती है। सोशल नेटविर्कंग साईट पर स्मोकिंग के अनुभव बांटने वाली कम्यूनिटी काफी चर्चित हो हो रही हैं।

तम्बाकू नियन्त्रण के लिए बने कानून ``सिगरेट एण्ड अटर टौबैको प्रॉडक्ट्स (प्रोहिबिशन ऑफ एडवराटाईजमेन्ट एण्ड रेगुलेशन ऑफ ट्रेड एण्ड कामर्स, प्रोडक्शन, सप्लाई एण्ड डिस्टीब्यूशन) एक्ट 2003 के तहत उत्पादनों के विज्ञापन हेतु बनाई गई आचार संहिता के उल्लंघन पर पांच साल के कारावास का भी प्रावधान है। बावजूद इसके नेट पर इन प्रतिबंधित चीजों को परोसा जा रहा है।

इस सबसे उलट इंटरनेट के माध्यम से साईबर अपराध को बढावा मिल रहा है। इंटरनेट का इन्द्रजाल इतना अधिक पसर चुका है कि अब इस पर आसानी से नज़र नहीं रखी जा सकती है, जिसका फायदा अपराधी आसानी से उठा रहे हैं। आज अपराधी कंप्यूटर लिट्रेट और कंप्यूटर फ्रेण्डली हो गए हैं। साईबर अपराध के प्रति भारत क्या किसी भी देश की सरकार संजीदा नहीं है जो कि आश्चर्य और भविष्य में होने वाली घटनाओं के लिए सशंकित होने की बात है। भारत में भी साईबर अपराध को बहुत गभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

आज इंटरनेट को सत्तर फीसदीं लोगों ने सेक्स और पोर्न देखने सुनने का जरिया बना लिया है। दुनिया भर के देशों को चाहिए कि अब इंटरनेट पर परोसी जाने वाली अश्लीलता को रोकने कानून बनाएं। जागरूकता अभियान चलाकर इंटरनेट के सही इस्तेमाल के मार्ग प्रशस्त किए जाएं। वर्तमान समय में महती जरूरत इस बात की है कि भटकाव के मार्ग पर अग्रसर इंटरनेट को सही दिशा में कैसे लाया जाए।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

प्रदर्शनी में दिखी लोकतन्त्र की झलक

प्रदर्शनी में दिखी लोकतन्त्र की झलक

लोस अध्यक्ष मीरा कुमार ने किया उद्घाटन

(लिमटी खरे)

लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बुधवार को भोपाल में देश के संसदीय इतिहास पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस मौके पर राज्यसभा के उपाध्यक्ष के. रहमान, विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी, उपाघ्यक्ष हरवंश सिंह सहित विभिन्न राज्यों से आए पीठासीन अधिकारी उपस्थित थे।

भारत की विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के अवसर पर विधानसभा परिसर में लगी ``भारत में लोकतन्त्र अतीत से वर्तमान तक´´ प्रदर्शनी में भारत में वैदिक काल से चली आ रही लोकतान्त्रिक परंपरा में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम, भारत के संवधिान व भारतीय संसद के कामकाज पर चित्रों, लेखों पर भी प्रकाश डाला गया है।

संसदीय संग्रहालय एवं डीएवीपी द्वारा लगाई गई इस प्रदर्शनी में भारत की संघीय व्यवस्था व देश के विभिन्न राज्यों में संसदीय ढांचे, विशेषकर भोपाल में संसदीय गतिविधियों पर रोशनी डाली गई है। लोकसभा अध्यक्ष व अन्य अतिथियों ने इस प्रदर्शनी का गहराई से अवलोकन किया। श्रीमती मीरा कुमार ने आगन्तुक पुस्तका पर लिखे सन्देश में इस प्रदर्शनी की भव्यता की प्रशंसा की। इस दौरान मध्यप्रदेश के विकास को दर्शाती एक अन्य प्रदर्शनी का उन्होंने अवलोकन किया।

13 भागों में विभक्त यह प्रदर्शनी प्राचीनकाल से आज तक की संसदीय संस्थाओं तक देश में लोकतान्त्रिक परंपराओं पर विशेष बल देती है। जिनमें ऋग्वेद व महात्मा बुद्ध के काल सम्मिलित हैं।

यह प्रदर्शनी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम, भारत के संविधान व भारतीय संसद के कामकाज पर चित्रों, लेखों, चार्ट, समाचार पत्रों की कतरनों इत्यादि द्वारा प्रकाश डालती है। यह प्रदर्शनी भारत की संघीय व्यवस्था व देश के विभिन्न राज्यों में संसदीय ढांचे, विशेषकर भोपाल में संसदीय गतिविधियों पर भी प्रकाश डालती है।

कम्प्यूटर, मल्टीमीडया व एलसीडी पर दृश्य-श्रव्य के माध्यम से इस प्रदर्शनी को और भी आकर्षक बना दिया है। आगन्तुक यहां ऋग्वेद के श्लोकों और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पाली भाषा में गाए गए श्लोकों को सुन सकते हैं।

महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरु, डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर व नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की आवाजें भी सुनी जा सकती हैं। कम्प्यूटर मल्टीमीडिया पर आगन्तुक भारतीय संविधान की स्केन की गई प्रति भी देख सकते हैं। प्रदर्शनी में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महत्वपूर्ण क्षण व भारत में चुनाव प्रक्रिया को भी प्रदर्शनी में दर्शाया गया है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

अचानक उत्तर भारतीयों की याद कैसे आ गई युवराज को!

अचानक उत्तर भारतीयों की याद कैसे आ गई युवराज को!

(लिमटी खरे)

मुम्बई सहित समूचे महाराष्ट्र सूबे में शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे और उनके आतातायी भतीजे एवं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सर्वेसर्वा राज ठाकरे सालों से भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर लोगों को बांटने का कुित्सत प्रयास कर रहे हैं, किन्तु देश की सियासी पार्टियों ने मुंह नहीं खोला। अचानक ही कांग्रेस के युवराज और भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी सहित मुरली मनोहर जोशी जैसे साफ छवि के नेताओं ने इस मामले को पकडना आरम्भ कर दिया है। यह काफी हद तक सोचनीय ही है, कि आखिर और अचानक एसा क्या हो गया है कि इन नेताओं को उत्तर भारतीयों की परवाह होने लगी है।

सालों पहले शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे ने मुम्बई और महाराष्ट्र सूबे में मराठी और गैर मराठी लोगों के बीच भेद कर सियासत गर्माई थी, उसके बाद अब उनके भतीजे राज ठाकरे भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के माध्यम से वही काम कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र भाषावाद और क्षेत्रवाद के नाम पर जिस आग में झुलसा है, वह निश्चित तौर पर सियासी दलों के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है। देश के गृह मन्त्री चुपचाप इस ताण्डव को कैसे देख पा रहे हैं, यह सोचकर आश्चर्य ही होता है, कि किस तरह आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस के सियासतदार आखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं। साल दर साल शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा भाषाई और क्षेत्रीयता की बिसात पर लोगों की भावनाओं का सरेआम शोषण किया जा रहा है और आजाद भारत के सियासतदार आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हुए हैं।

हाल ही में मराठी और गैर मराठी मानुष के बीच के भेद पर सियासत तेज होती दिख रही है। इस मामले में पहले कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने बाला साहेब ठाकरे को मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मूल का होना बताकर सनसनी फैला दी थी। इसके बाद कुछ नरम रूख अपनाकर मुरली मनोहर जोशी ने कह दिया कि मुम्बई सिर्फ मराठियों की है, और जिन्हें वहां रहना हो वे मराठियों की तरह ही रहें। जोशी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि जोशी से उमरदराज सीनियर सियासतदार जो देश की सबसे बडी पंचायत लोकसभा के अध्यक्ष के आसन पर विराजमान रहे हों वे इस तरह के बयान दें। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि मुम्बई सभी की है, और यहां सभी को रहने का अधिकार है। इस पर शिवसेना के उद्व ठाकरे का हत्थे से उखडना आश्चर्यजनक नहीं माना जा सकता है।

भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए चर्चित स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी हुंकार भरी और धोती समेटकर इस मामले में अखाडे में छलांग लगा दी। बाबा ने कहा कि मुम्बई सभी की है, यहां किसी की दादा गिरी नहीं चलने दी जाएगी। संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव ने संघ की लाईन स्पष्ट करते हुए कहा कि भाषा पर भेद करना ठीक है पर विरोध उचित नहीं है। बकौल माधव, ``संघ का मौलिक विचार यही है कि जम्मू काश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा भारत एक है, इसमें रहने वाले नागरिकों में भेदभाव जैसी कोई चीज नहीं है। यदि कोई विभेद पैदा करने का प्रयास करे तो उसका विरोध होना चाहिए।`` माधव को भी लगभग दो दशक के सेना के आतंक को देख रहे हैं, पर अब अचानक उनकी तन्द्रा टूटना स्वाभाविक कतई नहीं माना जा सकता है।

गृह मन्त्री पी.चिदंबरम के अलावा भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने भी शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के इस तरह के मराठी और उत्तर भारतीय के भेद को खारिज किया है। बुन्देलखण्ड की एक कहावत ``सूपा तो सूपा, अब चलनी बोले, जिसमें 172 छेद`` को चरितार्थ करते हुए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने भी इस मामले में पटना से तीर दागा है। बकौल राहुल गांधी,``महाराष्ट्र सभी भारतीयों का है, यह किसी विशेष लोगों की जागीर नहीं है, अगर वहां उत्तर भारतीयों को रोका गया तो वे चुप नहीं बैठेंगे``। कांग्रेस के युवराज को अगर उत्तर भारतीयों की याद आई है तो निश्चित तौर पर इसके गहरे निहितार्थ ही होंगे। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस का यही प्रयास है कि वह किसी भी सूरत में अपने युवराज को प्रधानमन्त्री के तौर पर ताजपोशी करवाएं, अन्यथा आने वाले समय में कांग्रेस की लोकप्रियता के ग्राफ में तेजी से गिरावट दर्ज हो सकती है। राहुल गांधी का इस मामले में दिलचस्पी लेने का साफ मतलब है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों के मन में अब उत्तर भारतियों को लेकर कोई ताना बाना बुना जा रहा है।

शोध का विषय तो यह है कि अचानक और एकसाथ सभी सियासतदारों का उत्तर भारतीयों के प्रति मोह कैसे जागृत हो गया है। इसके पीछे कहीं न कहीं गहरी सोची समझी सियासत छिपी हुई है। लगता है कि बिहार के वासिन्दों की देश भर में पूछ परख कर राजनैतिक दल काई भी मौका हाथ से गंवाना नहीं चाहती है। मौका गंवाया भी क्यों जाए, जब आने वाले समय में बिहार में चुनाव प्रस्तावित हैं। वोटबैंक पक्का करने की जुगत में कौन सा सियासी दल को नहीं होगा। उसूल, सिद्धान्त, उजली राजनैतिक बिसात यह सब बातें सिर्फ भाषणबाजी में ही अच्छी लगतीं हैं, वास्तविकता में तो सभी राजनैतिक दल अवसरवादिता और भटकाव का ही मार्ग अपनाकर सत्ता हासिल करते आए हैं।

दुख का विषय तो यह है कि आजाद भारत में धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर राजनीतिक बिसात बिछाई जाने लगी है। इसकी महज निन्दा करने से काम नहीं चलेगा, हमें जागना होगा, बेनकाब करना होगा इस तरह के षणयन्त्रकारियों को, जो आदमी से आदमी को बांट रहा है, किसी ने सच ही कहा है -

``मन्दिर, मिस्जद, गुरूद्वारे में, बांट दिया भगवानों को!

धरती बांटी, सागर बांटे, मत बांटों इंसानों का!!``

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बन्द होना चाहिए पचौरी का महिमा मण्डन

बन्द होना चाहिए पचौरी का महिमा मण्डन

ग्लोबल वार्मिंग पर अनर्गल बयानबाजी से लोगों को भ्रमित कर रहे हैं पचौरी

(लिमटी खरे)

``ग्लोबल वार्मिंग`` इस शब्द से हिन्दुस्तान के लोग कुछ साल पहले तक भली भान्ति परिचित नहीं थे, पर मीडिया ने इसे जैसे ही हौआ बनाया लोगों की नीन्दें उडने लगीं। दुनिया आग के गोले में तब्दील हो जाएगी। सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा। समाचार चेनल्स ने भी अपनी टीआरपी (टेलीवीजन रेटिंग प्वाईंट) को दुरूस्त रखने की गरज से खूब प्रोग्राम चलाए इस संबन्द्ध में। इससे उलट इस साल समूची दुनिया में हुई भीषण बर्फबारी ने सभी अनुमानों को उलटकर रख दिया। यह बात समझ से परे है कि अगर दुनिया गर्म हो रही है तो इस कदर कहर बरपाने वाली और हाड गलाने वाली सदीZ कैसे और कहां से आई।

जाहिर है, पर्यावरण के नाम पर दुकाने चलाने वाले लोग अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए अनर्गल बयानबाजी का सहारा ले अपनी अपनी टीआरपी में जबर्दस्त इजाफा कर रहे हैं। भारत में जलवायू विशेषज्ञ आर.के.पचौरी को मीडिया ने सर पर बिठा रखा है। पचौरी ने जो कहा वह पत्थर की लकीर हो गया। एक वाक्ये का जिकर यहां लाजिमी होगा। एक अखबार में नौकरी के दौरान आंग्ल भाषा के इंटरनेशनल शब्द के हिन्दी में अनुवाद के दौरान अतरराष्ट्रीय लिखा जाए या अतर्राष्ट्रीय, इस पर बसह चली। हमारे पत्रकार मित्र का कथन था कि संपादक महोदय ने कहा है कि अतरराष्ट्रीय लिखा जाए जबकि हमारा मत था कि अतर्राष्ट्रीय लिखा जाए। अन्त में पत्रकार मित्र नहीं माने हमने उन्हें डिक्शनरी में देखने को कहा, डिक्शनरी में अतर्राष्ट्रीय ही मिला। कहने का तातपर्य यह है कि संपादक भी आदमी ही है कोई मानक नहीं। इसी तरह पचौरी का महिमामण्डन किया जाना हमारी नज़र में अनुचित है।

पचौरी का कहना था कि वातावरण में ब्लैक कार्बन की मौजूदगी चिन्ता का विषय है, पर इससे ग्लेशियर के पिघलने की बात जोडना उचित नहीं है। जलवायू परिवर्तन पर अन्तरसरकारी पेनल (आईपीसीसी) के अध्यक्ष आर.के.पचौरी के अनुसार ब्लैक कार्बन के जलवायू परिवर्तन और ग्लेशियरों पर प्रभाव के सम्बंध में पांचवा आंकलन प्रतिवेदन 2013 में पेश किया जाएगा। कोपनहेगन में भी पचौरी ने सरकार को कटघरे में खडा कर खासी वाहवाही बटोरी थी।

गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन करने वाली आईपीसीसी दुनिया की प्रमुख संस्था है। 2007 में अपने चौथे प्रतिवेदन में आईपीसीसी ने कहा चेतावनी दी थी कि देशों को कार्बन के उत्सर्जन को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने ही होंगे, इस प्रतिवेदन में हिमालय के ग्लेशियरों के घटने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराया गया था।

अब आईए देखें कि आईपीसीसी के चेयरमेन एवं जाने माने पर्यावरण और जलवायू विद श्रीमान आर.के.पचौरी असल जिन्दगी में क्या करते हैं। एक ब्रितानी समाचार पत्र के अनुसार वे देश की राजधानी दिल्ली में अपने घर से महज सोलह सौ मीटर दूर अपने कार्यालय जाने के लिए टोयोटा करोला कार का इस्तेमाल करते हैं। मजे की बात तो यह है कि ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के लिए पचौरी द्वारा लोगों को बसों में चलने और इको फ्रेण्डली कार के इस्तेमाल की सीख देते हैं, पर जब उस पर अमल की बारी आती है तो वे इसे ठेंगा दिखाने से नहीं चूकते हैं।

इतना ही नहीं पचौरी द्वारा लोगों को निरामिष भोजन (नानवेज) खाने से मना किया जाता है, पर वे रोजाना अपने कार्यालय से शोफर िड्रवन कार में दिल्ली के एक उम्दा मांसाहारी रेस्टोरेंट में जाकर अपनी क्षुदा शान्त करते हैं। पचौरी पर केन्द्रित आलेख में उक्त अखबार ने अनेक बातों का खुलासा किया हैै। इसके अनुसार पचौरी के एक एक सूट की कीमत 73 हजार रूपए से ज्यादा है।

वैसे भी हिमालय के ग्लेशियर के 2035 तक पिघलने का दावा कर पचौरी ने अपनी टीआरपी जबर्दस्त तरीके से बढा ली है, पर पिछले कुछ दिनों से विवादों में उलझे पचौरी की पेशानी पर पसीने की बून्दे साफ छलकती दिख रहीं हैं। इसका कारण य है कि कार्बन ट्रेडिंग से जुडी संस्थाओं का प्रकाश में आना। बताते हैं कि इन संस्थाओं के साथ आर.के.पचौरी के व्यवसायिक हित जुडे हुए हैं। क्लीन एनर्जी के उद्देश्य से इन संस्थाओं में अनेक कंपनियां अरबों डालर का निवेश करने जा रहीं हैं। बताते हैं कि पचौरी के स्वामित्व वाली एनजीओ द एनर्जी एण्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट को लगभग उन्नीस करोड रूपए की रकम हाल ही में उस वक्त मिली जब उन्होंने हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने की भविष्यवाणी की थी।

एक अन्य अखबार के अनुसार पचौरी की ग्लेशियर पिघलने की भविष्यवाणी में दम नहीं है। अखबार खुलासा करता है कि ग्लोबल वार्मिंग पर एक विद्यार्थी के शोध को ही आधार बनाकर जाने माने जलवायू और पर्यावरण विद आर.के.पचौरी ने आईपीसीसी के हवाले से भविष्यवाणी कर सभी को चौंका दिया। बताते हैं कि उक्त छात्र द्वारा भारत को छोडकर कुछ देशों के पर्वतारोहियों के संस्मरण और उनके द्वारा प्रदत्त जानकारी को ही आधार बनाकर यह थीसिस बनाई थी। इतना ही नहीं आईपीसीसी पर बर्न विश्वविद्यालय के एक छात्र के डिजर्टेशन को चुराने का भी आरोप है।

पचौरी द्वारा ग्लेशियर के पिघलने का जैसे ही दावा किया गया मीडिया को मानों नए पंख मिल गए। दिन रात चीख चीख कर मीडिया द्वारा बिना परीक्षण के ही पचौरी की बात को हवा दी जाने लगी। टीवी चालू करते ही, डूब जाएगी धरती, डूब जाएगी मुम्बई, डूब जाएगा कोलकता, जैसे सिंहनाद सुनाई पडने लगे। लोग घबराए सरकार घबराई, भेडिया आया भेडिया आया की तर्ज पर सभी की सांसे थमने लगीं।

हमारे मतानुसार देश की सरकार के पास संसाधनों की कमी कतई नहीं है। होना यह चाहिए था कि सरकार को पचौरी के वक्तव्यों की बारीकी से जांच करवाई जानी चाहिए थी और कार्बन ट्रेडिंग से जुडी संस्थाअों से उनके व्यवसायिक हितों को भी जांचना परखना चाहिए था। कहीं एसा न हो कि मीडिया पचौरी का महिमा मण्डन करता रहे एवं सरकार भी उसकी तरफ ध्यान न दे, और जब मामला खुले तो इन दावों के कारण समूची दुनिया भारत पर उपहास करती नज़र आए।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सोनिया, मनमोहन के खिलाफ तलवार पजाई ममता ने

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

सोनिया, मनमोहन के खिलाफ तलवार पजाई ममता ने
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तेजी से छाने वाली ममता बनर्जी को अब कांग्रेस से दोस्ती रास नहीं आ रही है। बंगाल में अपनी पसन्द के राज्यपाल न बिठा पाने से दुखी ममता के तेवर अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह के प्रति तीखे होते जा रहे हैं। रेल्वे के सरकारी विज्ञापनों में अब प्रधानमन्त्री और सोनिया गांधी की तस्वीरें न दिखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ममता बनर्जी ने मन बना लिया है कि वे अब सोनिया और मनमोहन के फोटो वाले विज्ञापनों के माध्यम से उन्हें पब्लिसिटी नहीं दिलाएंगी। कोलकता के पास दमदम में मेट्रो रेल के रेक मरम्मत कारखाने के शिलान्यास के दौरान जारी आधे पेज के विज्ञापन में दोनों ही नेताओं के फोटो न दिखने पर कांग्रेसी हैरान परेशान रहे। सूत्रों के अनुसार मामला दस जनपथ पहुंचा फिर एक दूत को लगाया गया ममता से बातचीत करने। दूत के आग्रह पर ममता ने उसे सविनय अस्वीकार करते हुए यह कह दिया गया कि रेल्वे के विज्ञापनों में पीएम और सोनिया का क्या काम! कहते हैं कि मामला अन्त में इस बात पर सुलट गया कि बंगाल को छोडकर अन्य सूबों में जारी होने वाले विज्ञापनों में प्रधानमन्त्री और सोनिया के फोटो लगाए जाएंगे। चूंकि बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक ही हैं और मुख्यमन्त्री की कुर्सी पाने का सपना पाले ममता बनर्जी द्वारा प्रधानमन्त्री और सोनिया के फोटो लगाकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहतीं।

शिवराज की फटकार के बाद उतरे मसाज के होर्डिंग्स
देश भर में मसाज पार्लर की आड में देह व्यापार का धंधा जमकर फल फूल रहा है। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में तो यह चरम पर है। सरेआम अखबारों में मसाज के विज्ञापन अटे पडे होते हैं। रशियन, चायनीज, गोरी बाला क्या चाहिए आपको, सब कुछ बस एक फोन नंबर पर उपलब्ध हैं। बताते हैं कि हाल ही में दिल्ली यात्रा पर आए मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान को किसी ने इस बारे में जानकारी दी। सीएम जब अपने सूबे की राजधानी भोपाल लौटे तो उन्होंने कई जगहों पर निक्की बावा के चाकलेट मसाज के होर्डिंग देखे। जब सीएम भाजपा के प्रदेश मुख्यालय दीनदयाल परिसर में चिकित्सा प्रकोष्ठ के एक प्रोग्राम में शिरकत करने जा रहे थे, तो उन्होंने नूतन कन्या महाविद्यालय के सामने होर्डिंग लगा देखा। फिर क्या था, शिवराज सिंह चौहान का धैर्य जवाब दे गया, और तत्काल उन्होंने निगम आयुक्त मनीष सिंह को फोन कर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि गल्र्स कालेज के सामने भी इस तरह के होर्डिंग! आयुक्त को मिली फटकार के बाद नगर निगम अमला सक्रिय हुआ और आनन फानन होर्डिंग एजेंसी और निक्की बावा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई।

मोदी से अमिताभ की नजदीकियां खल रहीं हैं मुलायम को
 समाजवादी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कुनबे से एक के बाद एक कर नगीने पलायन करते जा रहे हैं। मुलायम के अमर प्रेम में दरार आने के बाद सपा का कुनबा छोटा होता जा रहा है। इसी बीच गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बीच बढती नजदीकियों ने मुलायम की नीन्द उडा रखी है। बताते हैं कि अपनी फिल्म ``पा`` के प्रमोशन के लिए गुजरात गए अमिताभ ने मोदी से जबर्दस्त नजदीकी कायम कर ली है। अब दोनों के बीच फोन पर संवादों का आदान प्रदान अनवरत जारी है। मुलायम हैरान हैं कि एक ओर दुबई से अमर सिंह अपना त्यागपत्र भेजते हैं तो दूसरी ओर अमिताभ द्वारा नरेन्द्र मोदी के पक्ष में कशीदे गढे जाते हैं। अमिताभ के लगातार मोदी के संपर्क में रहने की खबरें मुलायम को अन्दर तक झझकोरने के लिए पर्याप्त कही जा सकतीं हैं। मुलायम जानते हैं कि अमर सिंह भले ही कुशल राजनेता न हों पर मेनीपुलेटर और मेनेजर में उनका कोई सानी नहीं है।

राजस्थान में थाने ही थाने
देश में राजस्थान ही इकलौता एसा सूबा होगा जिसमें थाने ही थाने हैं। जी हां, चौंकिए मत राज्य में पुलिस के थानों के अलावा, यातायात के थाने सडक दुघZटनाओं को रोकने, आबकारी के थाने अवैध शराब को रोकने, बिजली की चोरी रोकने विद्युत महकमे के थाने, आर्थिक अपराध रोकने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी), जसूसी मामलों की जांच हेतु इंटेलीजेंस ब्यूरो, भ्रष्टाचार रोकने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के थाने हैं। इसके अलावा परिवहन विभाग द्वारा अवैध वाहन चालन के लिए, पर्याटकों की सुरक्षा के लिए पर्यटन विभाग, अवैध निर्माण आदि को रोकने नगर निगम, कर चोरी रोकने वाणििज्यक कर विभाग, वन से सम्बंधित मामलों के लिए वन विभाग बिना ही थानों के थानेदारी कर रहे हैं। राजस्थान में अब मिलावटी मामलों के लिए अलग से थाना बनाया जा रहा है। प्रायोगिक और प्राथमिक तौर पर महानिरीक्षक रेंज स्तर पर विशेष थाने खोलने का प्रावधान किया गया है।

पूर्व मन्त्री का खाता सीज
देश के जनसेवकों का आलम देखिए कि डिफाल्टर होने पर उनके खाते सीज किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में दस हजार रूपए जमा न करने पर प्रदेश की पूर्व मन्त्री का खाता आयकर विभाग द्वारा सीज कर दिया गया। केन्द्रीय आयकर विभाग के सूत्रों का कहना है कि आयकर विभाग द्वारा दो साल पूर्व सूबे के आधा दर्जन मन्त्रियों को आयकर विवरणी जमा करने का नोटिस दिया था, जिसमें कुसुम मेहदेले भी शामिल थीं। इसके उपरान्त उपलब्ध सूचना के अनुसार उन्हें या उनके सलाहकार को धारा 148 के तहत उपस्थित होने का नोटिस दिया गया था। जानकारों की मानें तो धारा 148 के अनुसार विभाग के पास कर चोरी की पुख्ता सूचना है। विभाग ने दस हजार रूपए की पेनाल्टी न जामा करने पर सूबे के राज्य सचिवालय वल्लभ भवन स्थित भारतीय स्टेट बैंक में जाकर मेहदेले का खाता सीज कर दिया। ये है हमारे जनसेवकों का हाल।

बुनियादी सुविधाओं को तरसते दिल्ली के गांव
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के बारे में तरह तरह की अवधारणाएं और भ्रान्तिया विकसित हैं। दिल्ली को देश में सबसे ज्यादा रकम अधोसंरचना विकास के लिए दी जाती है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि दिल्ली के गांवों में न तो बिजली है, न पानी और न ही स्कूल जैसी कोई चीज ही उपलब्ध है। यह हमारा कहना नहीं है, दिल्ली के हाईकोर्ट द्वारा बदरपुर खादर की बदहाली पर चिन्ता व्यक्त की गई है। चीफ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह और जस्टिस एस.मुरलीधर ने यह कहते हुए कि इस गांव में बिजली, पानी और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं अचंभित करने वालीं हैं, दिल्ली सरकार से पूछा है कि इस गांव में पढाई न कर पाने वाले 200 बच्चों के लिए सरकार ने क्या किया है। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि दिल्ली के बदरपुर खादर गांव में छ: सौ परिवार रहते हैं और वहां बुनियादी सुविधाएं हैं ही नहीं।

शिव के गण की मितव्ययता
केन्द्र सरकार और राज्यों की सरकारें मितव्ययता के ठोस सन्देश देने की बात तो कहती है, किन्तु जब अमली जामा पहनाने की बात आती है तो जनसेवक इससे कन्नी ही काटते हैं। केन्द्र में विदेश मन्त्री एम.एस.कृष्णा, शशि थुरूर, त्रणमूल कांग्रेस के सुल्तान अहमद के बाद अब मध्य प्रदेश के वन मन्त्री सरताज सिंह मितव्ययता की मिसाल पेश कर रहे हैं। मन्त्री बनने के बाद उन्हें बंग्ला नहीं मिला सो उन्होंने राजधानी के एक मंहगे होटल को अपना आशियाना बना लिया। तारीफेकाबिल बात यह है कि सरताज सिंह खुद भोपाल में ही एक बेहतरीन होटल के मालिक हैं, पर उन्होंने आशियाना बनाया है किसी और के होटल को। सरताज को आवंटित बंग्ले में पूर्व मन्त्री कुसुम मेहदेले के रिश्तेदारों ने कब्जा जमा रखा है, सो वह रिक्त नहीं है। अब देखना यह है कि विदेश मन्त्रीद्वय और अहमद की तर्ज पर सरताज सिंह भी इसका भुगतान अपनी जेब से करने की घोषणा कर भोगमान किसके कांधों पर डालते हैं।

स्वाईन फ्लू से होटल उद्योग पर काली छाया
भारतीय हॉिस्पटालिटी उद्योग के लिए स्वाईन फ्लू शनि की काली छाया बनकर सामने आया है। एच1एन1 विषाणु के कारण फैलने वाला स्वाईन फ्लू विदेशी पर्यटकों की संख्या में काफी कमी कर रहा है। इसके साथ ही साथ समूचे देश में दिल्ली में तेजी से फैलने वाले डेंगू, चिकन गुनिया और स्वाईन फ्लू का प्रचार प्रसार वास्तविकता से कई गुना अधिक हो चुका है, इसीके चलते लोग दिल्ली जाने से कतराने लगे हैं। लोगों का मानना है कि ठण्ड के मौसम में स्वाईन फ्लू की मारक क्षमता बहुत अधिक होती है, इसलिए दिल्ली की ओर रूख करना ठीक नहीं है। वैसे बडे होटल्स ने इन हाउस डाक्टर्स के निर्देशों का पालन पूरी मुस्तैदी के साथ किया जा रहा है, फिर भी होटल उद्योग को लगे झटके से इंकार नहीं किया जा सकता है।

पत्रकारों की वेदना कैसे सुनें ममता
पिछले बजट में रेल मन्त्री ममता बनर्जी द्वारा पत्रकारों को लुभाने योजनाएं लागू कीं। इनमें यात्रा करने पर आरटीसी के बजाए अब रेल विभाग द्वारा एक कार्ड जारी किया गया है। यह कार्ड इतना बडा और बदरंग है कि मीडिया पर्सन्स इसे किसी को दिखाने में भी अपमान महसूस करते हैं। रेल विभाग चाहता तो स्मार्ट कार्ड की तर्ज पर लेमिनेटेड कार्ड जारी कर सकता था, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। इतना ही नहीं इस कार्ड से टिकिट बनवाने में पत्रकारों को भारी परेशानी का सामना करना पडता है। अनेक रेल्वे स्टेशन्स पर तो बुकिंग क्लर्क को पता ही नहीं होता है कि टिकिट कैसे बनेगी और कोड क्या डलेगा। क्लर्कस सीधे सीधे एक ही सवाल करते हैं कि क्या आपके पास पुरानी बुक कराई टिकिट है। अगर नहीं तो फिर कंसेशन की टिकिट बनना मुश्किल ही समझिए। निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन हो या नई दिल्ली, अगर इस कार्ड के जरिए ओपन टिकिट लेना चाहें तो हजार प्रश्नों के उत्तरों के लिए पत्रकार मित्रों को तैयार रहना चाहिए। होना यह चाहिए था कि देश के हर कंप्यूटराईज्ड बुकिंग विण्डो पर इस कार्ड के बारे में विस्तार से सूचना चस्पा करना चाहिए।

दस लाख में लोकतन्त्र नीलाम!
लूट, डकैती, हत्या, राहजनी आदि के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदेश के दतिया जिले में पंचायत चुनाव में धार्मिक आस्था के नाम पर लोकतन्त्र को ही नीलाम कर दिया गया। भाण्डेर तहसील के ग्राम खिरिया फैजुल्ला गांव में एक मन्दिर के जीणोZद्धार के लिए सरपंच के पद की बोली लगा दी गई। गावं के एक युवा शिवकुमार ने दस लाख रूपए दान दिए और सर्वसम्मति से उसे सरपंच चुन लिया गया। दरअसल इस गांव में पुराने हनुमान मन्दिर के जीणोZद्धार के लिए एक बैठक बुलाई गई और निर्णय लिया गया कि जो भी सबसे ज्यादा दान देगा उसे निर्विरोध सरपंच बना दिया जाएगा। इतना ही नहीं यहां 17 पंच भी निर्विरोध चुने गए हैं। मध्य प्रदेश पर राम के नाम पर राज करने वाली भाजपा का शासन है, और भाजपा शासित सूबे में अगर धर्म के नाम पर लोकतन्त्र को ही नीलाम कर दिया जाए तो फिर क्या कहने। यद्यपि दिल्ली के केन्द्रीय कार्यालय में भाजपाई सफाई दे रहे हैं कि क्षेत्र के 1200 मतदाताओं ने एकता की मिसाल पेश की है और अपसी वेमनस्य तथा फिजूलखर्ची रोककर एक नई मिसाल पेश की है। यह गांव लूट, डकैती, हत्या, राहजनी आदि के लिए कुख्यात है।

कांग्रेस के लिए दुर्जन हुए सज्जन
कांग्रेस के पूर्व संसद सदस्य सज्जन कुमार से अब अपने ही लोगों ने किनारा करना आरम्भ कर दिया है। पिछले 25 सालों से 1984 के दंगों में संलिप्तता का आरोप झेल रहे सज्जन कुमार उमर के इस पडाव में लंबी लडाई लडकर फिर से खुद को स्थापित कर पाएंगे इस बात में संशय ही है। इस बार वे सबसे अधिक आहत इसलिए भी हैं कि अबकी बार वार उनकी अपनी पार्टी से ही हुआ है। संसद में किए अपने वादे को निभाने के लिए केन्द्रीय गृह मन्त्री ने सीबीआई को सज्जन कुमार के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे ही दी है। दंगे में संलिप्त होने के आरोप ललित माकन, अर्जुन दास, धर्मवीर शास्त्री पर भी लगे थे, किन्तु वे अब जिन्दा नहीं है। सज्जन और टाईटलर का नाम बार बार उछलता रहा है। अब सज्जन को सभी मुकदमे नए सिरे से झेलने होंगे साथ ही उनका सरकारी आवास भी जल्द ही उनके हाथों से जा सकता है।

नक्सली चला रहे छग में अपने स्कूल
नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ के बारे में खबरें चाहे जो आ रहीं हों पर अन्दरूनी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। केन्द्रीय गृह मन्त्रालय के सूत्रों के अनुसार छत्तीसगढ के बस्तर संभाग में नक्सल प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों से लगातार आदिवासी विद्यार्थी लापता होते जा रहे हैं। नक्सली गांवों में जाकर हर घर से एक बच्चे की मांग भी करते हैं, और उन्हें जनयुद्ध का स्कूल चलाकर माओवादी विचारधाराओं से आवगत कराते हैं। इस भयावह स्थिति को छिपाने के लिए भले ही राज्य सरकार सब कुछ नियन्त्रण में बता रही हो पर जमीनी हकीकत से वह अनजान नहीं मानी जा सकती है। छत्तीसगढ में नक्सलियों ने अपनी समानान्तर सत्ता कुछ क्षेत्रों में स्थापित कर ली है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कुछ इलाकों में सिर्फ और सिर्फ इन्हीं की मर्जी से पत्ते हिलते हैं।

फरार आतंकियों को हवाला से मिले थे दो लाख!
दिल्ली से फरार हुए तीन आतंकी अब्दुल रजाक, मौहम्मद सादिक और रिफाकत अली को हवाला के जरिए दो लाख रूपए की रकम मुहैया करवाई गई थी। हवाला किस आपरेटर के माध्यम से हुआ था इसकी जानकारी जुटाने में स्पेशल सेल को नाकों चने चबाने पड रहे हैं। भरोसेमन्द सूत्रों का दावा है कि पुलिस को सेवा सदन में ही आतंकियों को रकम पहुंचाने की जानकारी दे दी गई थी। इसके बाद ही उन्होंने वहां से भागने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाया। पुलिस की उडी नीन्द अब कुछ हद तक ठीक इसलिए मानी जा सकती है कि गणतन्त्र दिवस बिना किसी सरगर्मी के शान्तिपूर्ण तरीके से निपट गया। सूत्रों के अनुसार आतंकवादियों के लिए दिल्ली साफ्ट टारगेट बन गया है, इस साल होने वाले कामन वेल्थ गेम्स के दौरान सुरक्षा सबसे बडी चुनौति के तौर पर सामने आएगी।

पुच्छल तारा
हरिद्वार से रचना सिंह द्वारा भेजे गए ई मेल के अनुसार एक साधू दूसरे साधू से बोला -``उफ! यह जीवन . . . समय का टोटा, काम का पहाड, कोई करे तो क्या करे. . . .! दूसरे ने तपाक से जवाब दिया -``सम्मेलन, अधिवेशन, पार्टी, ट्रस्ट, साक्षात्कार, और तो और अब चेनल्स में भी विशेष कार्यक्रम. . .! अरे समय ही कहां है, भगवान को याद करने का हम सन्यासियों के पास. . .।

रविवार, 31 जनवरी 2010

भारतवंशियों का कभी नहीं डूबता है सूरज


भारतवंशियों का कभी नहीं डूबता है सूरज

दुनिया भर में पूजा जाता है इण्डियन स्किल

रहें कहीं, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

(लिमटी खरे)

भारत पर सालों साल राज करने वाले ब्रितानियों के बारे में कहा जाता था कि अंग्रेजों का सूरज कभी नहीं डूबता, अर्थात उनकी सल्तनत इतने सारे देशों मे थी कि कहीं न कहीं सूरज दिखाई ही देता था। आज हम हिन्दुस्तानी गर्व से कह सकते हैं कि भारतवंशियों का सूरज कभी भी नहीं डूबता है। विश्व के कमोबेश हर देश में भारतीय मिल जायेंगे तो अपनी सफलता के परचम लहरा रहे हैं।

अपने ज्ञान और कौशल से दुनिया भर को आलोकित करने वाले भारतवंशियों के दिमाग का लोहा दुनिया का चौधरी माने जाने वाला अमेरिका भी मानता है। हर क्षेत्र हर विधा, हर फन में माहिर होते हैं भारतवंशी। भले ही वे गैर रिहायशी भारतीय (एनआरआई) हों पर कहलाएंगे वे भारतवंशी ही।

अपनी प्रतिभा के बलबूते पर ही दुनिया भर में भारत के नाम का डंका बजाने वाले भारतीयों को भी अपने वतन पर नाज है। भारत सरकार द्वारा प्रवासी भारतीयों के योगदान को रेखांकित करने के लिए 2003 से हर साल नौ जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया जाता है।

दरअसल इस दिन 1915 में भारत के सबसे बडे प्रवासी भारतीय मोहन दास करमचन्द गांधी ने दक्षिण आफ्रीका से भारत लौटकर स्वाधीनता का बिगुल बजाया था। कोट पेंट से आधी धोती पहनने वाले इस महात्मा ने अहिंसा के पथ पर चलकर भारत को आजादी दिलाई और हम भारतीयों का जीवन ही बदल दिया।

देखा जाए तो हिन्दुस्तानियों की तादाद लगभग हर देश में है। कनाडा में दस लाख, अमेरिका में साढे बाईस लाख, त्रिनिदाद में साढे पांच लाख, गुयाना में तीन लाख बीस हजार, सूरीनाम में एक लाख चालीस हजार, ब्रिटेन में 15 लाख, फ्रांस में दो लाख अस्सी हजार, साउदी अरब में 18 लाख, बेहरीन में साढे तीन लाख, कुबेत में पांच लाख अस्सी हजार, कतर में पांच लाख, यूनाईटेड अरब अमीरात में 17 लाख, दक्षिण अफ्रीका में 12 लाख, मरीशस में नौ लाख, यमन में एक लाख 20 हजार, ओमान में पांच लाख साठ हजार, श्रीलंका में 16 लाख, नेपाल में 6 लाख, मलेशिया में 21 लाख, म्यांमार में साढे तीन लाख, सिंगापुर में 6 लाख, फिजी में 3 लाख 22 हजार और आस्ट्रेलिया में साढे चार लाख भारतवंशी निवास कर रहे हैं।

दुनिया के चौधरी अमेरिका जैसे देश में 38 फीसदी चिकित्सक भारतीय हैं। यहां वैज्ञानिकों में 12 फीसदी स्थान भारतवंशियों के कब्जे में है। नासा में 36 फीसदी कर्मचारी भारतवंशी हैं। इतना ही नहीं कम्पयूटर के क्षेत्र में धमाल मचाने वाली माईक्रोसाफ्ट कंपनी में भारत के 34 फीसदी तो आईबीएम में 28 और इंटेल में 17 फीसदी कर्मचारियों ने अपना डंका बजाकर रखा हुआ है। फोटोकापी के क्षेत्र में 13 फीसदी हिन्दुस्तानी अमेरिका में छाए हुए हैं। भारतवंशियों की पहली पसन्द बनकर उभरा है अमेरिका, यहां भारतीय मूल के स्वामित्व वाली 100 शीर्ष कंपनियों का सालाना राजस्व 2.2 अरब डालर है, जो दुनिया भर के 21 हजार लोगों को रोजगार मुहैया करवा रही हैं।

भारतवंशियों के अन्दर कोई तो खूबी होगी जो कि विदेशों की धरा में ये अपने आप को संजोकर रखे हुए हैं। परदेस में परचम फहराने वाले भारतियों में अमेरिका में लुइसियाना के गर्वनर बाबी जिन्दल, न्यूजीलेण्ड के गर्वनर जनरल आनन्द सत्यानन्द, जाने माने ब्रिटिश सांसद कीथ वाज, लिबरल डोमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष लार्ड ढोलकिया, सुरीनाम के उपराष्ट्रपति राम सर्दजोई, सिंगापुर के महामहिम राष्ट्रपति एस.आर.नाथन, तीसरी बार गुयाना के महामहिम राष्ट्रपति बने भरत जगदेव के अलावा मरीशस के महामहिम राष्ट्रपति अनिरूद्ध जगन्नाथ, मरीशस के प्रधानमन्त्री नवीन रामगुलाम, 1999 में फिजी के प्रधानमन्त्री महेन्द्र चौधरी, केन्या के प्रथम उपराष्ट्रपति जोसेफ मुरूम्बी, त्रिनिदाद एवं टौबेगो की पहली महिला अटार्नी जनरल कमला प्रसाद बिसेसर के नाम प्रमुख हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल विजेता डॉ हरगोविन्द खुराना, एस.चन्द्रशेखर, अन्तरिक्ष विज्ञानी कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स के अलावा 2009 में नोबेल विजेता वेंकटरमन रामाकृष्णन तो साहित्य के क्षेत्र में बुकर ऑफ बकर्स पुरूस्कार से नवाजे गए सलमान रशदी, बुकर विजेता किरण देसाई अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता आमत्र्य सेन, पुलित्जर विजेता झुम्पा लाहिडी, नोबेल विजेता सर वी.एस.नागपाल प्रमुख हैं।

कारोबार के क्षेत्र में भारतवंशियों की सफलता इतनी है कि उनकी उंचाईयों को सर उठाकर देखने पर सर की टोपी पीछे गिरना स्वाभाविक ही है। पेिप्सको में मुख्य कार्यकारी अधिकारी इन्दिरा नूरी, ब्रिटेन के धनी परिवारों में से एक हिन्दुजा बंधु, बोस कार्पोरेशन के संस्थापक अमर बोस, इस्पात करोबारी लक्ष्मी नारायण मित्तल, 1978 मेें नून प्रोडक्टस की स्थापना करने वाले सर गुलाम नून, मूलत: चार्टर्ड एकाउंटेंट करन बिलीमोरिया ने 1989 में कोब्रा बीयर का कारोबार आरम्भ किया जो आज सर चढकर बोल रहा है। इसके अलावा साठ के दशक में अपनी बिटिया के इलाज के लिए ब्रिटेन पहुंचे लार्ड स्वराज पाल ने 1978 में कापरो समूह की स्थापना की जो आज बुलन्दियों पर है।

कंप्यूटर की दुनिया में तहलका मचाने वाले एचपी के जनरल मेनेजर राजीव गुप्ता, पेंटियम चिप बनाने वाले विनोद धाम, दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अजीम प्रेमजी, वेब बेस्ड ईमेल प्रोवाईडर हॉटमेल के फाउण्डर और क्रिएटर समीर भाटिया, सी, सी प्लस प्लस, यूनिक्स जैसे कंप्यूटर प्रोग्राम देने वाली कंपनी एटी एण्डटी बेल के प्रजीडेंट अरूण नेत्रावाली, विण्डोस 2000 के माईक्रोसाफ्ट टेस्टिंग डायरेक्टर संजय तेजवरिका, सिटी बैंक के चीफ एग्जीक्यूटिव विक्टर मेंनेंजेस, रजत गुप्ता और राना तलवार, का नाम आते ही भारतवासियों का सर गर्व से उंचा हो जाता है।

दुनिया भर के देशों में सरकार में सर्वोच्च या प्रमुख पद पाने वालों में भारतवंशी आगे ही हैं। फिजी में एक, गुयाना में 14, मलावी में 1 मलेशिया में चार, मारीशस में 17, मोजािम्बक में 1, सिंगापुर में 8, श्रीलंका में 9, सूरीनाम में 5, त्रिनिदाद और टुबैगो में 8, दक्षिण आफ्रीका में चार लोगों ने सरकार में सर्वोच्च या प्रमुख पद पाया है।

इसी तरह कनाडा में 9, जिम्वाब्बे में 1, जांबिया में 1, ब्रिटेन में 24, त्रिनिदाद और टुबैगो में 23, युगाण्डा में 1, तंजानिया में 4, इण्डोनेशिया में 1, आयरलेण्ड में 1, मलेशिया में दस, सूरीनाम में 18, श्रीलंका में 2, दक्षिण अफ्रीका में 16, सिंगापुर में 4, पनामा में एक, मोजािम्बक में 11 और मारीशस में 36 भारतीय मूल के संसद सदस्य या सीनेटर रहे हैं।

इस लिहाज से माना जा सकता है कि भारतवंशी समूचे विश्व में फैले हुए हैं, और हर क्षेत्र, हर विधा हर फन में भारत का तिरंगा उंचा करने के मार्ग प्रशस्त करते जा रहे हैं। भारतीय दिमाग को विश्व के हर देश में पर्याप्त सम्मान दिया जाता है। माना जाता है कि भारतवंशी के दिमाग के बिना कोई भी देश प्रगति के सौपान तय नहीं कर सकता है। तभी तो हम भारतीय गर्व से कहते हैं -``वी लव अवर इण्डिया``।