शनिवार, 7 अगस्त 2010

सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (7)

सीबीएसई की वेव साईट बताती है कि एकलव्य, नवोदय, सेंट्रल और महर्षि  ही हैं सीबीएसई एफीलेटेड स्कूल

सिवनी। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई के प्रलोभन के चलते पालक और विद्यार्थियों पर बन आई है. जिला मुख्यालय में प्रशासन की नाक के नीचे निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं द्वारा अपने आप को सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध या संबद्धता की कतार में होने का दावा कर विद्यार्थियों को जबर्दस्त तरीके से आकर्षित करने का कुत्सित प्रयास जारी है. शहर में चल रही शालाओं कथित तौर पर ली जाने वाली द्वारा केपीटेशन फीस के माध्यम से अपनी विशाल अटटालिकाएं खडी कर ली गईं हैं. इक्कीसवीं सदी में संचार क्रांति के चलते सीबीएसई बोर्ड की वेव साईट पर सब कुछ दिखता है की तर्ज पर पालक या विद्यार्थी चाहें तो सब कुछ अपनी आंख से देख भालकर संतोष कर सकते हैं, यह सब अगर किसी को नहीं दिख रहा है, तो वह है जिला प्रशासन को.
 
सीबीएसई की आधिकारिक वेव साईट द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/ पर जब होम पेज खुलता है तब उसके उपरांत इस वेव साईट पर पब्लिक पर क्लिक करने पर जो विण्डो खुलती है, उसमें उपर एड्रेस बार द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/श्चह्वड्ढद्यद्बष्१.द्धह्लद्वमें दिखने लगेगा. इस विण्डो को खोलने पर जब बाईं और आने वाले केरेक्टर्स में देखा जाए तो दूसरे नंबर पर  ष्ठश्वक्क्रक्रञ्जरूश्वहृञ्जस्/हृढ्ढञ्जस्
(ढ्ढठ्ठद्घशह्म्द्वड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र श्चस्रड्डह्लद्गह्य) दिखाई पडेगा. इसे क्लिक करने पर जो विंडो खुलेगी उसमें एकेडेमिक एडमीशन आदि दिखाई देने लगेगा. इसमें तीसरे नंबर पर एफीलेशन को क्लिक करते ही नई विण्डो खुल जाएगी.
 
इस नई विण्डो में उपर अलग अलग तरह से सर्च के आप्शन आ जाते हैं. इस विण्डो में तीसरे नंबर पर स्टेट वाईज को क्लिक कर सिलेक्ट ए स्टेट में मध्य प्रदेश और एंटर ए की वर्ड में सिवनी भरा जाकर सर्च की जाए तो जो परिणाम सामने आते हैं वे कुछ इस प्रकार हैं. सिवनी के नाम से कुल छरू शालाएं ही सीबीएसई से संबद्ध बताई गई हैं. जिनमें से केंद्रीय विद्यालय सिवनी मालवा अर्थात होशंगाबाद जिले और दूसरा जवाहर नवोदय वारासिवनी अर्थात बालाघाट जिले का है.
 
इसके अलावा इस सूची में पहली पायदान पर एकलव्य माडल रसीडेंशियल स्कूल घंसौर जिला सिवनी है, जिसके प्राचार्य के स्थान पर लोकमन गेंडाम का नाम अंकित है, इसका एफीलेशन नंबर १०२०००६ दर्शाया गया है. १९९२ से संचालित होने वाली इस शाला को प्रोवीजनल एफीलेशन १ अप्रेल २००६ से ३१ मार्च २०११ तक की अवधि के लिए प्रदान किया जाना दर्शाया गया है.
 
इसके उपरांत दूसरी पायदान पर जवाहर नवोदय विद्यालय कान्हीवाडा, जिला सिवनी का नाम दर्ज है. १९८७ से संचालित इस शाला के प्राचार्य के नाम के आगे वी एस सिंह और आर एस राव का नाम दर्ज है. इस शाला को १ अप्रेल २०१० से ३१ मार्च २०१० तक के लिए प्रोवीजनल एफीलेशन प्रदाय किया गया है जिसका नंबर १०४०००६ दर्ज है. इस मान से देखा जाए तो इस साल नए शैक्षणिक सत्र में जवाहर नवोदय विद्यालय की सीबीएसई मान्यता समाप्त हो चुकी है.
 
तीसरेी पायदान पर बालाघाट के वारासिवनी और चौथे नंबर पर होशंगाबाद के सिवनी मालवा का उल्लेख है. पांचवे नंबर पर एक बार फिर सिवनी जिले का उल्लेख किया गया है. पांचवी पायदान पर स्थान पाया है केंद्रीय विद्यालय सिवनी ने. जिले में १९९२ से संचालित इस शाला के विवरण में लिखा गया है कि यह विद्यालय पुराने जेल भवन में संचालित हो रहा है, और इसे प्रोवीजनल एफीलेशन एक अप्रेल २००१ से ३१ मार्च २०११ तक के लिए प्रदान की गई है. इसके प्राचार्य के स्थान पर आर ए मिश्रा का नाम अंकित है, इसका प्रोवीजनल एफलेशन नंबर १०००००५६ दर्शाया गया है.
 
अंतिम अर्थात छटवें नंबर पर बारी आती है महर्षि स्कूल की. महर्षी विद्यालय के विवरण में उल्लेख किया गया है कि यह शाला १९९२ से चल रही है, इसकी प्राचार्य श्रीमति आर तिकाडे हैं, तथा इसे एक अप्रेल २००७ से ३१ मार्च २०१२ तक के लिए प्रोवीजनल मान्यता प्रदान की गई है. इसका एफीलेशन नंबर १०३००७७ है. इसके बाद सूची समाप्त हो जाती है.

सुधि पाठक स्वयं ही अंदाजा लगा सकते हैं कि संचार क्रांति के इस युग में अब और क्या प्रमाण दिया जाए. जब सीबीएसई की वेव साईट खुद चिल्ला चिल्ला कर हकीकत बयां कर रही है, तब जिला मुख्यालय में सांसद, विधायक, कांग्रेस भाजपा और प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह का गोरखधंधा हो रहा हो तब सिवनी के विद्यार्थियों का भगावन ही मालिक माना जा सकता है.
(क्रमशः जारी)

फोरलेन विवाद का सच ------------03

किस षणयंत्र के तहत किसने रूकवाया था काम

जब अक्टूबर माह में उत्तर सिवनी सामान्य वनमण्डलाधिकारी ने मुख्य वन संरक्षक सिवनी को यह सूचित किया कि उसके द्वारा अवैध पेड कटाई के मामले में ठेकेदार के खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है, तब उत्तर दक्षिण गलियारे का काम रूक ही गया था। आखिर क्या वजह थी कि इसके लगभग नौ माह तक जनता को पता क्यों नहीं चल सका सडक काम निर्माण का काम रोक दिया गया है, जबकि निर्माण करा रही कंपनियां सद्भाव और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनियांे के कारिंदे जिले में नेतागिरी का परचम लहराने वाले नुमाईंदो से मेल मुलाकात भी कर रहे थे।

 
(लिमटी खरे)

सिवनी। उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे के नक्शे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने का षणयंत्र लगभग दो साल पूर्व ही आरंभ करवा दिया गया था, और सिवनी जिले को दिशा देने वाले नेताओं को कथित तौर पर इसकी भनक भी नहीं लगी। जून 2009 में जब तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि का एक आदेश हवा में तैरा तब जाकर जिले की जनता के मन में भय और आक्रोश मिश्रित तौर पर सामने आया।
 
वन विभाग के डीएफओ द्वारा 25 अक्टूबर 2008 को सीसीएफ को लिखे पत्र में यह उल्लेख किया गया था कि एनएच ने वन विभाग की भूमि को अपना बताकर इस पर खडे पेड काटने की निविदा जारी कर पेड कटाई का काम आरंभ कर दिया था, जिसे वन विभाग ने अवैध माना, और वन विभाग द्वारा इस कटाई को अवैध मानते हुए पीपरखुंटा वन खण्ड के कक्ष नंबर पी - 266 में राष्ट्रीय राजमार्ग के अनाधिकृत ठेकेदार द्वारा 26 पलाश और 47 सागौन के वृक्ष काटने पर दिनांक 15 अक्टूबर 2008 को वन अपराध नंबर 1897/22 के तहत मामला दर्ज कर लिया था।
 
इसी से साफ हो जाता है कि वन विभाग ने इस सडक पर पेड काटने का काम रोक दिया गया था। जब सडक के चौडीकरण के काम में पेड ही नहीं हटाए जाएंगे तो भला सडक कहां से बन पाएगी? जाहिर है कि अक्टूबर 2008 में ही मीनाक्षी और सद्भाव ने अपना अपना काम रोककर हाथ पर हाथ रखकर बैठ गईं थीं।
 
बताया जाता है कि निर्माण में रत मीनाक्षी और सद्भाव कंपनियांे के कारिंदे रोजाना ही जिला मुख्यालय सिवनी आकर आवश्यक वस्तुएं खरीदा करते थे। चर्चाओं के अनुसार इन कारिंदों द्वारा शहर में अनेक नेताओं से चर्चा कर उन्हें इस बारे में आवगत कराया जाता था कि कंपनियों ने सडक निर्माण का काम रोक दिया है, बावजूद इसके सिवनी का हित साधने का प्रहसन करने वाले इन नेताओं ने कभी भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया कि सडक निर्माण का काम रोके जाने का षणयंत्र बुना जा रहा है।
 
चर्चाएं तो यहां तक भी हैं कि इन सडक निर्माण कंपनियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लंबा आर्थिक लाभ लेने की गरज से जिले की बदहाली पर आंसू बहाने वाले इन नेताओं (सांसद विधायक नहीं) का उपयोग निर्माण कंपनियों ने एक तरह से उपकरणों की तरह ही किया है। इन नेताओं को कंपनियों का इंस्टूमेंट बनने से क्या लाभ हुआ है, यह तो वे ही जाने किन्तु यह सच है कि इससे नुकसान में सिवनी जिले की जनता ही रही है।
 
आज आलम यह है कि इस सडक का निर्माण कार्य अधूरा रह जाने से लोगों को सिवनी से नागपुर और जबलपुर आने जाने में काफी हद तक परेशानी का सामना करना पड रहा है। जबलपुर मार्ग पर बंजारी माता के आगे से गनेशगंज के पास तक और नागपुर रोड पर मोहगांव से खवासा तक के मार्ग पर वाहनों की ‘‘कुत्ता चाल‘‘ से लोगों की परेशानी का सबब बनती जा रही है।
 
वाहन चालकों की मानें तो उन्हें सडक पर हुए भारी भरकम और असंख्य गड्ढों को बचाने के लिए कुत्ते के मानिंद कभी दांय तो कभी बांयी ओर (जिस तरह कुत्ता दांयी बायीं और खम्बों को देखकर टांग उठाता है) जाकर वाहन बचाना पडता है। बस में यात्रा करने वाले एक यात्री ने तो इसे सूपा की संज्ञा भी दे डाली है। उसके अनुसार जिस तरह सूपा में चावल या गेंहूं को फटका जाता है ठीक उसी तरह बसों में बैठे यात्री की स्थिति होती है। यात्री एक बार बांयी तो दूसरी बार दायीं और जाकर उछलता है, फिर बीच में उछाल दिया जाता है।
 
बहरहाल आज भी यक्ष प्रश्न यही बनकर खडा हुआ है कि आखिर वो कौन था जिसके आदेश पर फोरलेन के निर्माण का काम रूकवाया गया था। जिला प्रशासन, वन विभाग, एनएचएआई आदि के उपर आखिर कौन सी एक अज्ञात शक्ति दबाव बनाए हुए है, जो उत्तर दक्षिण गलियारे का काम रोककर पूर्व निर्धारित एलाईंमेंट को बदलने का प्रयास कर रही है?

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

हिटलरशाही पर उतारू हो गई है कांग्रेस

खेल खेल में अरबों का खेल
 
कामन वेल्थ में बह रहा पैसा पानी की तरह
 
शिक्षा और अन्य मदों में है नहीं पैसा पर खेल के नाम पर खुल रही पोटलियां
 
मनमानी के लिए कर रही है जबरिया अत्याचार
 
(लिमटी खरे)

महज तेरह दिनों के लिए आयोजित राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए भारत गणराज्य की सरकार पैसे को पानी की तरह बहाने से नहीं चूक रही है। भारत पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि उसके राज में भारत गणराज्य की जनता किस कदर बेहाल हो चुकी है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के राज में मंहगाई आसमान छू रही है और देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी मंहगाई के बढने के कारणों को गिनाकर अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। इतना ही नहीं देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर तीसरी मर्तबा राज करने वाली शीला दीक्षित के राज में मंहगाई ने सारे रिकार्ड तोड दिए हैं, उनके पुत्र सांसद संदीप दीक्षित संसद में संप्रग और राजग सरकार के कार्यकाल में मंहगाई की तुलना कर कांग्रेस की पीठ थपथपाने से नहीं चूकते कि कांग्रेस ने कम मात्रा में मंहगाई को बढने दिया है।
 
भारत गणराज्य के पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस मामले में अपना मुंह खोला और कामन वेल्थ गेम्स को सफल न बनाने के लिए कमर कस ली। मणिशंकर अय्यर ने यहां तक कह दिया कि इस तरह के खेलों में हो रही पैसों की बर्बादी दुखद है और कामन वेल्थ गेम्स की सफलता की कामना तो शैतान ही कर सकता है। भारत पर राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का ही एक खेल मंत्री अपने ही साथियों को अगर कटघरे में खडा कर रहा हो तो फिर इस बात में कोई शक शुबहा नहीं रह जाता है कि देश की नाक का सवाल बन चुके कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है और पैसों की बरबादी साफ तौर पर हो रही है।
 
भारत ने इसकी मेजबानी 2003 में हासिल कर ली थी। कहा जा रहा है कि कनाडा इस खेल को हासिल करने वाला सबसे शक्तिशाली दावेदार था। कनाडा ने कामन वेल्थ गेम्स के लिए अपने शहर हेमिल्टन में प्रस्तावित तैयारियों का खाका बनाकर ही पेश किया था, किन्तु पैसे की ताकत थी कि इसे हिन्दुस्तान की गोद में डाल दिया गया।
 
खबरों के अनुसार भारत में इस आयोजन को हासिल करने के लिए अपने देश की जनता का पेट काटकर खजाना विदेशी खिलाडियों पर लुटाने में कोई कसर नहीं रखी। कामन वेल्थ गेम्स पाने के लिए दिए गए प्रलोभन में यह बात कही गई थी सभी खिलाडियों को विलासितापूर्ण लग्जरी होटल में ठहराकर उन्हें शानदार शोफर ड्रिवन कार मुहैया करवाई जाएंगी। इसमें भारत की ओर से जो पक्ष रखा गया उसमें कहा गया था कि पांच हजार दो सौ खिलाडियों और अठ्ठारह सौ अधिकारियों इस तरह कुल सात हजार लोगों को यात्रा के लिए 48 करोड रूपए का ग्रांट दिया जाएगा। इस वादे के करने से भारत को बोली के दौरान ही 137 करोड रूपए देने पडे थे।
 
भारत में खेलों की स्थिति क्या है यह बात किसी से छिपी नहीं है, पर पता नहीं क्यों भारत सरकार ने इस आयोजन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। भारत सरकार ने अपने देश में खिलाडियों को प्रोत्साहित करने के बजाए इस आयोजन में प्रतिभागी छः दर्जन देशों में प्रत्येक देश के खिलाडी को 33 करोड 12 लाख रूपए की राशि महज एथलीट ट्रेनिंग की मद में ही मुहैया करवा दी थी। इनमें एसे देशों का भी शुमार है जिनसे महज तीन या चार खिलाडियों के ही आने की उम्मीद है।
 
सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि हजारों करोड रूपयों में इस तरह सरेराह आग लगाई जा रही है और विपक्ष में बैठी भाजपा के साथ ही साथ बात बात पर लाल झंडा उठाने वाले वाम दल बस हल्की सी चिल्लाहट कर ही विरोध जता रहे हैं। विपक्षी दलों का कमजोर विरोध इस ओर इशारा कर रहा है कि वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस भ्रष्टाचार की गंगा में तबियत से डुबकी लगा रहे हैं।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य का खेल मंत्री यह स्वीकार कर रहा है कि कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर बहुत कुछ गडबड हुआ है। भारत गणराज्य में राजनैतिक गतिविधियों के केंद्र के साथ ही साथ केंद्र सरकार का मुख्यालय भी दिल्ली ही है। दिल्ली में ही हो रहे हैं कामन वेल्थ गेम्स। जब सब कुछ दिल्ली में हो रहा है फिर कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में पिछले तीन चार सालों से गफलत चल रही है, और गेम्स के एन दो माह पहले देश के खेल मंत्री अपनी लाचारगी जाहिर करते हुए कहंे कि अब कुछ नहीं हो सकता है, किन्तु इसमें घालमेल तो जमकर हुआ है।
 
भारत के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और पर्दे के पीछे से कठपुतली नचाने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के लिए यह शर्म की ही बात कही जा सकती है कि कामन वेल्थ गेम्स अभी आरंभ नहीं हुए हैं, और जो तैयारियां उनकी नाक के नीचे हो रही थीं, उन तैयारियों की जांच सीबीआई के हवाले है। इतना ही नहीं खेल मंत्री एम.एस.गिल स्वयं इन तैयारियों की जांच के लिए सीएजी से भी गति बढाने का आग्रह कर रहे हैं।
 
क्या इस आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना का त्यागपत्र ही पर्याप्त आधार नहीं है कि विपक्ष इस मामले में संसद में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को कटघरे में खडा कर दे। देश भर में आंदोलन इस बात को लेकर चलाए कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नेतृत्व में देश का तीस हजार करोड रूपए से अधिक का धन फालतू ही जाया करवा दिया गया है। खन्ना पर आरोप था कि उन्होंने अपने पुत्र को सिंथेटिक सरफेस का ठेका दिया था। विपक्ष की खामोशी से मिली जुली नूरा कुश्ती की बू ही आती है।

वैसे एक बात अब तक स्थापित हो चुकी है कि खेल चाहे जो भी हों, इनके आयोजन में देश को हमेशा ही घाटा उठाना पडा है। मामला चाहे एशियाड का हो, ओलंपिक या कानमनवेल्थ का हर बार देश को नुकसान ही झेलना पडा है। भारत की सरकारें वैश्विक छवि बनाने के लिए आवाम ए हिन्द के मुंह से निवाले छीनकर इसे विलासिता भरा भोजन में तब्दील कर सोने की थाली में इसे विदेशियों के सामने परोसने से नहीं चूकती है, पर देश की अधनंगी भूखी जनता के हिस्से में आखिर आता क्या है?
 
अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने जब इस आयोजन को हासिल किया था तब इसके लिए प्रथक से बजट 1899 करोड रूपए का रखा गया था, जो अब सरकारी तौर पर लगभग पांच गुना बढ गया है, किन्तु अगर संपूर्ण आहूति के साथ देखा जाए तो यह बजट तीस हजार करोड रूपए से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। किसे सच माना जाए किसे झूठ यह बात समझ से ही परे है।
 
दिल्ली राज्य के मुख्य सचिव कहते हैं कि अब तक निर्माण पर महज 13 हजार 350 करोड रूपए ही खर्च किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि दिल्ली सरकार के वित्त मंत्री 2006 में घोषणा कर चुके हैं कि कामन वेल्थ गेम्स के निर्माण पर 2006 तक 26 हजार 808 करोड़ रूपए फूंके जा चुके हैं। 2003 में कहा गया था कि स्टेडियम निर्माण में महज डेढ सौ करोड रूपयों का खर्च ही प्रस्तावित है, किन्तु अब तक इस मद में लगभग चार हजार करोड रूपयों में आग लगाई जा चुकी है।
केंद्रीय खेल मंत्रालय चाहे जो कहे पर इन गेम्स के लिए वह भी अपनी पोटलियों के मुंह तबियत से खोल रहा है। खेल मंत्रालय ने 2005 - 2006 के वित्तीय वर्ष मंे इस आयोजन मद में साढे पेंतालीस करोड रूपए की राशि आवंटित की थी। यह रकम पिछले वित्तीय वर्ष में छः हजार दो सौ पेंतीस गुना बढकर 2 हजार 883 करोड रूपए हो गई। रही केंद्र सरकार की बात तो केंद्र सरकार ने इस साल कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों की मद में दो हजार 69 करोड रूपयों का आवंटन दिया है। दिल्ली सरकार ने खेलों के लिए दो हजार एक सौ पांच करोड रूपए का आवंटन दिया है।
 
सरकार और जनता को भटकाने के लिए आयोजन समिति का कहना है कि महज तेरह दिनों के इस आयोजन में आयोजन समिति को सत्रह सौ अस्सी करोड रूपए की आय होना अनुमानित है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आयोजन समिति की इस राय से इत्तेफाक कतई नहीं रख रहा है। सीएजी का कहना है कि यह आंकडा बढा चढा कर बताया गया है। आवंटन और व्यय मे ंसरकारी आंकडों में असमानता ही साफ तौर पर जाहिर करती है कि खेल खेल में पैसों का तबियत से खेल किया गया है।

खेल के नाम पर अंधाधुंध पैसा बहाकर विश्व स्तर पर अपनी छवि बनाने का काम सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है जिसने भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है। इसके साथ ही साथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एक दशक से अधिक समय से विराजमान सोनिया गांधी ही एसा जादू दिखा सकतीं हैं कि भारत गणराज्य में जनता अधनंगी, भूखी, प्यासी तरसे और खेलों के नाम पर कांग्रेस से नेताओं और उनसे जुडे कारिंदे करोडों कमाकर मौज उडाएं और भारत गणराज्य का कानून उन्हें अपनी जद में लेने में असहज महसूस करे। देश की पुलिस इन भ्रष्टाचारी, दुराचारियों को सलाम ठोके और गरीब गुरबों को हवालात और जेल की हवा खिलाए।

रक्षित वन और पेंच के हिस्से से गुजरने वाली सडक कभी भी एनएच को हस्तांतरित ही नहीं हुई

फोरलेन विवाद का सच ------------02

2008 में ही रोक दिया गया था फोरलेन निर्माण का काम
 
वन विभाग की भूमि को अपना बताकर एनएच ने आरंभ करवा दी थी कटाई
 
वन विभाग ने कायम किया था अवैध वन कटाई का मामला
  
(लिमटी खरे)

सिवनी। अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में स्वर्णिम चतुर्भज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी का नामोनिशान मिटाने की कवायद 2008 में विधानसभा चुनावों के पहले ही आरंभ हो चुकी थी। मध्य प्रदेश के वाईल्ड लाईफ विभाग द्वारा इस सडक के निर्माण हेतु अपनी सहमति के साथ प्रस्ताव केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा था। इसी दौरान दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डलाधिकारी द्वारा अक्टूबर 2008 में ही इस मामले में पेंच फसाने आरंभ कर दिए थे।
 
दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल के डीएफओ द्वारा 25 अक्टूबर 2008 को जारी एक पत्र में इस बात का लेख साफ तौर पर किया गया है कि उनके कार्यालय में एसा कोई भी अभिलेख मौजूद ही नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वन विभाग के आधिपत्य वाले भाग से गुजरने वाले राजमार्ग क निर्माण या चौडीकरण के लिए लोक निर्माण विभाग अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग को भूमि कभी हस्तांतरित की गई हो। साथ ही नेशनल हाईवे विभाग द्वारा भी डीएफओ के समक्ष एसे कोई अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए गए हैं जिससे साबित हो सके कि आरक्षित वन भूमि एनएच विभाग या लोक कर्म विभाग को कभी हस्तांतरित की गई हो। इस सडक के सालों साल रखरखाव और नवीनीकरण की जानकारी भी डीएफओ नार्थ टेरीटोरियल सिवनी के पास मौजूद नहीं है।
 
इन परिस्थितियों में यक्ष प्रश्न तो यह है कि अगर यह भूमि वन विभाग के आधिपत्य की है तो अब तक सालों साल लोक निर्माण विभाग के एनएच डिवीजन ने आखिर इस सडक का रखरखाव किस मद से किया है। पत्र में यह बात भी साफ तौर पर उल्लेखित की गई है कि राष्ट्रीय राजमार्ग वन के 03 वनखण्ड के 06 कक्षों से गुजरता है। उक्त संरक्षित वन अधिसूचना (असाधारण राजपत्र) नंबर 3060 - 404 - ग्यारह दिनांक 15 सितम्बर 55 को प्रकाशित होना बताया गया है।
 
सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय राजमार्ग के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने डीएफओ को पत्र लिखकर कहा था कि राईट ऑफ वे के तहत यह भूमि उनके स्वामित्व की है, और इस पर खडे वृक्ष कंट्रोल ऑफ राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम वर्ष 2002 के तहत उनकी सम्पत्ति हैं, एवं सडक के चौडीकरण के दौरान कार्य करने तथा उनकी कटाई करने हेतु वन सरंक्षण अधिनियम के प्रावधान इस पर लागू नहीं होते हैं। इसी तारतम्य में उन्होंने राजमार्ग के राइट ऑफ वे में खडे समस्त वृक्षों की नीलामी कर कटाई का काम भी आरंभ करवा दिया था।
 
सूत्रों के अनुसार वन विभाग द्वारा इस कटाई को अवैध मानते हुए पीपरखुंटा वन खण्ड के कक्ष नंबर पी - 266 में राष्ट्रीय राजमार्ग के अनाधिकृत ठेकेदार द्वारा 26 पलाश और 47 सागौन के वृक्ष काटने पर दिनांक 15 अक्टूबर 2008 को वन अपराध नंबर 1897/22 के तहत मामला दर्ज कर लिया था।
 
माना जा रहा है कि उपर के निर्देशों पर वन विभाग चूंकि इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुका था अतः वह इस मामले को हर तरह से रोकने पर ही आमदा नजर आ रहा था। डीएफओ नार्थ टीटी ने मुख्य वन संरक्षक सिवनी सहित जिला कलेक्टर सिवनी को यह भी सूचित किया था कि राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग द्वारा मार्ग में खडे वृक्षों को राईट ऑफ वे के तहत राष्ट्रीय प्रजाति के वृक्षों को निजी क्रेताओं को सीधे सीधे ही बेच दिया गया है, जिससे मध्य प्रदेश वनोपज व्यापार अधिनियम 1969 की की धारा 5 का उल्लंघन हो रहा है।

वन विभाग द्वारा मामले को प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अग्रिम आदेश और मार्गदर्शन के लिए प्रेषित कर दिया गया था। इस तरह देखा जाए तो नवंबर 2008 में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव और 2009 मई में संपन्न लोकसभा चुनावों के पहले ही सिवनी जिले को एनएचएआई के उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से गायब करने का ताना बाना बुन लिया गया था।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित न हो यह विरोध

तारीफे काबिल है स्वप्रेरणा से किया अहिंसक विरोध
 
फोरलेन बचाने अभी भी सुलग रही है सिवनी वासियों के मन में आग
 
जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलटाने के होना चाहिए प्रयास
 
(लिमटी खरे)

केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे के मानचित्र से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने की साजिश से सिवनी वासियों के मानस पटल पर रोष और असंतोष की ज्वाला अभी शांत नहीं हुई है। सिवनी के निवासी इस कुत्सित प्रयास का विरोध करने का माद्दा आज भी रख रहे हैं। मंगलवार 3 अगस्त को जिला मुख्यालय के निवासियों ने स्वप्रेरणा से आधे दिन का बंद कर जता दिया है कि वे फोरलेन के लिए कितने आतुर हैं।
 
गौरतलब होगा इसके पहले जब परिसीमन और पुर्नारक्षण के चलते सिवनी लोकसभा का विलोपन करने की खबरें आम हुईं थीं तब भी सिवनी वासी सडकों पर उतर आए थे, उस समय भी भगवान शिव की सिवनी के भोले भाले नागरिकों ने शांति, संयम और धैर्य के साथ सिवनी में जिस तरह का जनता कर्फयू लगाया था, उसकी गूंज दिल्ली तक गई थी, जिसे सभी ने सराहा था। यह अलहदा मामला है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी सिवनी लोकसभा के अवसान को बचाया नहीं जा सका था।
 
इस बार जब फोरलेन बचाने वालों ने बंद का आव्हान किया तब तरह तरह के कायस लगाए जा रहे थे। सोमवार को बंद का आव्हान करने वालों ने भले ही बंद के लिए व्यापक स्तर पर अपील न की गई हो, किन्तु शहर के व्यवसाईयों ने स्वप्रेरणा से जिस तरह शांति पूर्वक बंद का आयोजन किया वह तारीफे काबिल ही कहा जा सकता है। किन्तु इस सफलता से अतिउत्साह में आने की आवश्यक्ता कतई नहीं है, क्योंकि अति उत्साह में आंदोलन पथ से भटकने की संभावनाएं बलवती हो जाती हैं।
 
हम आज पुनः अपनी उसी बात पर कायम हैं कि इस फोरलेन के अवसान के प्रयासों के मामले में एक बार फिर हमें सोचना होगा कि मामलें में कांटा कहां फंसा है। मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु नगर पंचायत, लखनादौन के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजकुमार खुराना के सार्वजनिक किए गए वक्तव्यों से साफ हो जाता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न तो नागपुर रोड पर कुरई घाट और जबलपुर रोड पर बंजारी के पास का काम रोका है, और न ही इसे आरंभ करने में उन्हें कोई आपत्ति है।
 
अगर इन नेता द्वय की बात सच है तो फिर मामला तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 को जारी किन्तु 19 दिसंबर को पृष्ठांकित आदेश के तहत अवरूद्ध हुआ है। सवाल यह उठता है कि जब काम को सिवनी के जिला कलेक्टर द्वारा ही रोका गया है, तब फोरलेन बचाने आगे आने वाले संगठनों द्वारा जिला कलेक्टर सिवनी से अब तक इस मामले मंे चर्चा कर इसका निकाल निकालने का जतन क्यों नहीं किया गया है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है, इस मामले के दो विशेष पक्षों के रूप में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के नाम सामने आ रहे हैं जिन पर आरोप है कि उनके चलते इस सडक का निर्माण रूका हुआ है।
 
राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के चलते एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप आम बात है, किन्तु जब मामला सार्वजनिक और विशेषकर सिवनी के हित का हो तो फिर हमारे विचार से इसमें राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को गौड ही करना आवश्यक है, वरना यह पूरा मामला राजनीति की बली ही चढ जाएगा और मूल मुद्दा अंत तक कायम रहेगा। हमारी अपनी राय में इस मामले में चूंकि एक बार प्रथम दृृष्टया उभरकर सामने आ रही है कि मामले को जिला कलेक्टर द्वारा आदेश जारी कर रोका गया है, अतः जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलझाना पहली प्राथमिकता होना चाहिए, वस्तुतः एसा होता अब तक दिखा नहीं है। जब भी फोरलेन की बात सामने आ रही है, ले दे कर सभी इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय पर लाकर टिका दे रहे हैं।
 
इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से भी हम सहमत नहीं हैं। वस्तुतः विधायक और सांसद जिन्हें सिवनी के मतदाताओं ने जनादेश देकर सदन में भेजा है, उन्हें भी इस मामले में स्वप्रेरणा से पहल करना चाहिए। अगर विधायक सांसद अपनी जवाबदारियों का निर्वहन करने में अपने आप को सक्षम नहीं पा रहे हैं तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को चाहिए कि इन जनसेवकों से मिलकर उनको एक निश्चित समय सीमा तक का समय दें, और अगर समय सीमा में वे अपनी जवाबदारियों के निर्वहन में असफल हों तो उनका वह चेहरा भी उनको जनादेश देकर सदन में भेजने वाली जनता के समक्ष रखना चाहिए। वैसे यह काम आंदोलन के आरंभ होने के उपरांत कुछ माहों में हो जाना चाहिए था। हमारी अपनी निजी राय में अभी भी देर नहीं हुई है, विधायक सांसद को कम से कम तीस दिन का अल्टीमेटम दिया जाना आवश्यक है, जरूरी नहीं कि इससे आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सहमत हांे।

इस मामले में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सम्मानीय बंधुवरों से हम विनम्र आग्रह करना चाहते हैं कि चूंकि मामला जिला कलेक्टर सिवनी द्वारा जारी आदेश के तहत रोका गया है, अतः इस मामले में जिले के विधायक सांसद और प्रभारी मंत्री के सहयोग से सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान सहित प्रदेश के मुख्य सचिव आदि को पहल के लिए बाध्य करना होगा, ताकि सिवनी से होकर गुजरने वाली शेरशाह सूरी के जमाने की एतिहासिक महत्व की इस सडक के अस्तित्व को बचाया जा सके। पिछले साल 21 अगस्त और आज जिला मुख्यालय की जनता ने यह जता दिया है कि वह फोरलेन के साथ छेडछाड बर्दाश्त करने की स्थिति में कतई नहीं है। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के सफल आंदोलन अपने आप में एक उर्जा का काम अवश्य करते हैं, किन्तु कहीं इन आंदोलनों की गूंज दिल्ली और भोपाल में बज रहे नगाडों के बीच ‘‘नक्कारखाने में तूती की आवाज‘‘ न साबित हो जाएं।

क्या जहर ही खिलाने पिलाने का जिम्मा है सरकार के पास

बीमार करती हरी सब्जियां और बेबस सरकार
 
आक्सीटोन खा गया गिद्ध को
 
प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती सरकार आक्सीटोन पर
 
शीतल पेय के बाद अब हरी सब्जियां हुईं घातक
 
कहीं बाबा रामदेव का बिजनेस प्रमोशन का अंग तो नहीं है यह प्रोपोगंडा
 
(लिमटी खरे)

बचपन से एक ही बात कानों में गूंजती आई है, चाहे दादा दादी हों, नाना नानी या फिर और कोई बुजुर्ग। हर किसी ने कहा है कि बेटा हरी सब्जियां खाया करो, इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, शरीर स्वस्थ्य रहता है, बीमारियां पास नहीं फटक पाती हैं। इक्कसीवीं सदी में इलेक्ट्रानिक मीडिया के चलते कमोबेश भगवान का दर्जा पाने वाले स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी लौकी को अमृत तुल्य की संज्ञा दे डाली। हरी सब्जियों के वे भी हिमायती रहे हैं। कालांतर में इन्हीं हरी सब्जियों में जहर की बात भी सामने आने लगी है।
 
पिछले कुछ दिनों से इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख चीख कर आगाह कर रहा है कि हरी सब्जियां लेने जाएं या उनका सेवन करे तो पूरी पूरी सावधानी बरतें। इसमें जहर हो सकता है। यह जहर प्राकृतिक तौर पर तो नहीं था अब तक जाहिर है मानव द्वारा ही जल्दी और ज्यादा लाभ कमाने की प्रवृति ने उसे इस ओर धकेला है कि वह तो खुद ज्यादा लाभ कमाए पर बाकी लोगों की थाली में जहर परोसे।
 
मीडिया यह बात समाज के सामने ला रहा है कि हरी सब्जियों जैसे लौकी आदि में जहर है, विषाक्त लौकी खाने से एक व्यक्ति के काल के गाल में समाने तक की बात को कहा है मीडिया ने। मीडिया यह बात भी बता रहा है कि यह जहर एक विशेष प्रकार के ‘‘आक्सीटोन‘‘ नामक इंजेक्शन के सब्जियों में लगाने से पनपता है। यह वही आक्सीटोन का इंजेक्शन है, जिसे मवेशियों में लगाने से मवेशी अधिक मात्रा में दूध देते हैं।
 
यद्यपि यह बात अभी प्रमाणित नहीं हो सकी है कि इस आक्सीटोन का इंजेक्शन लागातार लगाने के उपरांत मरने वाले दुधारू मवेशी का मांस कितना भयानक जहर युक्त हो जाता है, किन्तु पिछले एक डेढ दशक में मरे पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण की सफाई के पुरोधा माने जाने वाले गिद्ध का जिस तरह से अवसान हुआ है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन मवेशियों के मृत शरीर में जहर ही होता होगा जो गिद्ध अचानक ही विलुप्त प्रजाति की श्रेणी में आ गए हैं। वरना और कोई कारण नहीं है कि पर्यावरण के रक्षक इन गिद्धों का अचानक ही गायब हो गए हैं। गिद्ध का मांस भी कोई नहीं खाता है कि समझ लिया जाए कि गिद्ध का शिकार हो रहा हो।
 
दुधारू पशुओं के उपरांत अब आक्सीटोन का कहर हरी विटामिन युक्त सब्जियों पर टूट पडा है। जब यह बात साफ तौर पर साबित होने लगी है कि इन सारी बातों की जड में आक्सीटोन इंजेक्शन ही है, तो भारत गणराज्य की सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महकमा आखिर इस जहर के प्रमुख स्त्रोत आक्सीटोन पर प्रतिबंध लगाने की कार्यवाही क्यों नहीं कर पा रहा है। जिस तरह नशे का इंजेक्शन सस्ता होने के साथ ही सहज सुलभ है, उसी तरह आक्सीटोन भी सहज सुलभ और सस्ता होने के चलते जहर का यह कारोबार बहुत ही तेजी से फल फूल रहा है। कहते हैं कि आक्सीटोन का इंजेक्शन लगाने से रातों रात में ही लौकी का साईज जीरो से फुल हो जाता है। भला कौन सा किसान या व्यवसायी न होगा जो रातों रात माल अंटी न करने की इच्छा रखता होगा।
 
वस्तुतः देश पर शासन करने वालों का प्रमुख दायित्व अपनी रियाया की जान माल की रक्षा करने का होता है, पर पिछले कुछ दशकों से एक बात साफ तौर पर उभरकर सामने आई है कि भारत गणराज्य पर राज करने वाले शासकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि भारत गणराज्य की उस जनता ने जिसने विशाल जनादेश देकर इन शासकों को कुर्सी पर बिठाया है उसकी कोई सुनवाई हो।
 
गौरतलब है कि शीलत पेय के मामले में भी भारत सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने पूरी तरह से घुटने ही टेके हुए है। शीतल पेय में कीटनाशक की मात्रा के अनुपात के मामले में आज भी भारत गणराज्य की सरकार द्वारा मानक तय नहीं किए जाना दुखद और आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। कुल मिलाकर सारी स्थिति परिस्थिति को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत गणराज्य की जनता को जहर खिलाना और पिलाना अब भारत सरकार का पहला दायित्व बनकर रह गया है।
 
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने पहले लोगों को योगा सिखाने के उपरांत लौकी का जूस पीने का मशविरा दिया। इसके बाद बाबा के अनुयायी और योग के दीवानों ने लौकी के कच्चे या पके जूस को पीना आरंभ कर दिया। अब जबकि लौकी में ही आक्सीटोन के चलते जहर की बात प्रचारित कर दी गई है तो अब लोग लौकी का जूस निकालकर पीने के स्थान पर ‘‘बाबा रामदेव‘‘ के पतांजली योग प्रतिष्ठान के ‘‘शुद्ध‘‘ लौकी के जूस का सेवन न करें तो क्या करें। हालात देखकर एसा भी लगता है मानो बाबा रामदेव ने अपने पतांजली के प्रोडक्ट को बाजार में स्थापित करने की गरज से तो मीडिया के माध्यम से इस तरह का प्रोपोगंडा तो नहीं करवाया जा रहा है।

एक बात और यह भी उभरकर सामने आई है कि जबसे मीडिया में कार्पोरेट सेक्टर संस्कृति ने अपने पैर जमाए हैं और ‘‘घराना पत्रकारिता‘‘ का आगाज हुआ है, तबसे मीडिया की बात पर देश के शासकों ने बहुत ज्यादा ध्यान और तवज्जो देना बंद ही कर दिया है। हमंे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज मीडिया चाहे जितना भी चीख चिल्ला ले पर शासकों पर इसका बहुत ज्यादा असर नहीं होता है, इसका कारण भारत गणराज्य में प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में धनकुबेरों की संेध को ही माना जा सकता है। बहरहाल भारत सरकार को चाहिए कि ‘‘आक्सीटोन‘‘ नामक जहर के इंजेक्शन को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित दवा की श्रेणी में शामिल करे ताकि आवाम ए हिन्द मंहगाई और मिलावट के इस जमाने में कम से कम शुद्ध हरी सब्जियों और दूध का सेवन तो कर सके।

फोरलेन पर घडियाली आंसू

सीआरएफ की सडकों का बहिष्कार क्यांे नहीं करते जनसेवक
 
फोरलेन पर घडियाली आंसू पर जब केंद्रीय मदद की आती है बात तो भूल जाते हैं सिवनी के हक का मामला
 
(लिमटी खरे)

सिवनी। उत्तर दक्षिण गलियारे में पेंच नेशनल पार्क का पेंच फंसने के बाद जब भी जनाक्रोश भडकने की आशंका होती है, सिवनी जिले के सांसद विधायक घडियाली आंसू बहाना आरंभ कर देते हैं, किन्तु जब भी केंद्रीय सहायता से बनने वाली सीआरएफ (सेंट्रल रोड फंड) की सडकों की बात आती है, तो ये सारे सांसद विधायक उन्हें लपकने लालायित ही दिखते हैं। वस्तुतः अगर सिवनी के हितों की इतनी ही चिंता में ये जनसेवक दुबले हुए जा रहे हैं तो फोरलेन के अडंगे के हटने तक इन्हें केंद्रीय सहायता से बनने वाली सडकों का बहिष्कार करना चाहिए।
 
गौरतलब है कि मुगल शासक शेरशाह सूरी के जमाने के इस मार्ग जिसे अब उत्तर दक्षिण गलियारे की संज्ञा दे दी गई है, से होकर आदि शंकराचार्य ने भी गमन किया था। इस सडक में पेंच नेशनल पार्क के महज नौ किलोमीटर के हिस्से के कथित तौर पर विवादित होने के उपरांत इसके निर्माण का काम रोक दिया गया है। सडक निर्माण में फंसा पेंच मूलतः भूतल परिवहन मंत्रालय और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के बीच अहं की लडाई का एक हिस्सा बन गया बताया जा रहा है।
 
अप्रेल माह में एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि सिवनी की जनता चाहती है कि यह मार्ग सिवनी से होकर जाए किन्तु उन्हें मौके पर जाकर (संभागीय मुख्यालय जबलपुर जाकर) देखा और पाया कि यह पेंच कारीडोर को काट रही है, इसलिए उन्होंने इस मार्ग को रेड लाईट दिखाकर रोक दिया है। मामला किसने और किसके आदेश से रूका है, यह अनसुलझी पहेली आज भी सिवनी जिले की भोली भाली जनता के मानस पटल में घूम रही है।
 
जितने मुंह उतनी बात की तर्ज पर जिसके मन में जो आ रहा है, वह वैसी कहानी गढकर जनता के समक्ष प्रस्तुत करने से नहीं चूक रहा है। वहीं दूसरी ओर एक और खुलासे से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के दावे की हवा निकल जाती है जिसमें इसी कारीडोर से होकर गुजरने वाले बालाघाट से जबलपुर नेरोगेज के अमान परिवर्तन को वन विभाग द्वारा हरी झंडी दे दी जाती है। मतलब साफ है कि जयराम रमेश की नजरों में सिवनी से होकर गुजरने वाला उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा तो वन्य जीवों पर प्रतिकुल प्रभाव डाल रहा है पर इसी कारीडोर से होकर गुजरने वाली रेल लाईन से इन वन्य प्राणियों को कोई असर होने वाला नहीं। एक ही मामले में दो तरह का रवैया समझ से परे ही कहा जाएगा।
 
सिवनी जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के बालाघाट के सांसद के.डी.देशमुख, मण्डला के कांग्रेसी सांसद बसोरी मसराम द्वारा एक साल पूरा होने पर भी इस मामले में संसद में प्रश्न न लगाने से उनकी भूमिका जिलावासियों की नजरों में तो संदिग्ध हो ही चुकी है, साथ ही साथ भाजपा की सिवनी विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, लखनादौन की शशि ठाकुर, बरघाट के कमल मस्कोले सहित केवलारी के इकलौते कांग्रेसी विधायक ठाकुर हरवंश सिंह ने भी विधानसभा का ध्यान इस ओर आकर्षित नहीं कराया है, जिससे जनमानस में इनका जनादेश के प्रति सम्मान साफ परिलक्षित होने लगा है।
 
उल्लेखनीय होगा कि भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा जब भी इन जनसेवकों के सामने प्रलोभन के तौर पर सीआरएफ मद से सडक निर्माण की बात रखी जाती है, तो ये सभी फोरलेन विवाद को बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय की तर्ज पर फोरलेन को भूलकर अपने अपने क्षेत्र को समृद्ध करने की जुगत लगाने लग जाते हैं। ये सारे जनसेवक यह भूल जाते हैं कि यह मार्ग लखनादौन, केवलारी, सिवनी, बरघाट विधान सभा क्षेत्र के साथ ही साथ मण्डला और बालाघाट संसदीय क्षेत्र से होकर भी गुजर रही है, जिसकी रक्षा करना इन जनसेवकों की पहली प्राथमिकता होना चाहिए।

कहा जा रहा है कि फोरलेन मामले में जनसेवकों का ध्यान फोरलेन प्रकरण से भटकाने हेतु सांसद विधायकों के सामने जलेबी लटकाने के लिए कंेद्र में बैठे नुमाईंदों द्वारा केंद्रीय सडक निधी की सडकों को परोस दिया जाता है। जैसे ही इन सडकों की बात आती है, सांसद विधायकों द्वारा एतिहासिक महत्व के इस उत्तर दक्षिण गलियारे के पेंच नेशनल पार्क के प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल कर केंद्रीय सडक निधि का झुनझुना पकड लिया जाता है।

देश के 61 जिलों की नहीं है अपनी वेवसाईट

इक्कीसवीं सदी में नहीं पहुंच सका है भारत गणराज्य
 
सेट फारमेट के अभाव में विभिन्न तरह की हैं वेव साईट्स
 
वेव साईट तो हैं पर अपडेट नहीं होती
 
(लिमटी खरे)

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भविष्यदृष्टा की अघोषित उपाधि पाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सबसे पहले इक्कीसवीं सदी में जाने की परिकल्पना कर लोगों को अत्याधुनिक उपकरणों आदि के बारे में सपने दिखाए थे। आज वास्तव में उनकी कल्पनाएं साकार होती दिख रही हैं। विडम्बना यह है कि स्व.राजीव गांधी की अर्धांग्नी पिछले एक दशक से अधिक समय से कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं किन्तु कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ही आज इक्कीसवीं सदी में नहीं पहुंच सकी है।
 
आधुनिकता के इस युग में जब कम्पयूटर और तकनालाजी का जादू सर चढकर बोल रहा है, तब भारत गणराज्य भी इससे पीछे नहीं है। भारत में आज कंप्यूटर इंटरनेट का बोलबाला हर जगह दिखाई पड जाता है। जिला मुख्यालयों में भले ही बिजली कम ही घंटों के लिए आती हो पर हर एक जगह इंटरनेट पार्लर की धूम देखते ही बनती है। शनिवार, रविवार और अवकाश के दिनों में इंटरनेट पार्लर्स पर जो भीड उमडती है, वह जाहिर करती है कि देशवासी वास्तव में इंफरमेशन तकनालाजी से कितने रूबरू हो चुके हैं।
 
भारत गणराज्य की सरकार द्वारा जब भी ‘ई गवर्नंस‘ की बात की जाती है तो हमेशा एक ही ख्वाब दिखाया जाता है कि ‘‘अब हर जानकारी महज एक क्लिक पर‘‘, किन्तु इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। देश के कुल 626 जिलों में से 565 जिलों की अपनी वेव साईट है, आज भी 61 जिले एसे हैं जिनके पास उनकी आधिकारिक वेव साईट ही नहीं है। भारत में अगर किसी जिले के बारे में कोई जानकारी निकालना हो तो इंटरनेट पर खंगालते रहिए, जानकारी आपको मिलेगी, पर आधिकारिक तौर पर कतई नहीं, क्योंकि वेव साईट अपडेट ही नहीं होती है।
 
ई गवर्नंस के मामले में सबसे खराब स्थिति बिहार की है। बिहार के 38 जिलों में से महज 6 जिलों की ही आधिकारिक वेव साईट है, जबकि यहां के मुख्यमंत्री नितीश कुमार खुद ही अपने ब्लाग पर लोगो से रूबरू होते हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के 23 में से 19, असम के 27 में से 24, छत्तीसगढ के 18 में से 16, झारखण्ड के 24 में से 20, कर्नाटक के 28 में से 27, मध्य प्रदेश के 50 में से 49, मिजोरम में 8 में पांच, पंजाब में 20 में 18 और तमिलनाडू के 31 में से 30 जिलों की अपनी वेव साईट है।
 
भारत गणराज्य के जिलों में आधिकारिक वेव साईट के मामले में सबसे दुखदायी पहलू यह है कि केंद्र सरकार के डंडे के कारण वेव साईट तो बना दी गई हैं, किन्तु इन्हें अद्यतन अर्थात अपडेट करने की फुर्सत किसी को नहीं है। जिलों में बैठे अप्रशिक्षित कर्मचारियों के हाथों में इन वेव साईट्स को अपडेट करने का काम सौंपा गया है, जिससे सब ओर अपनी ढपली अपना राग का मुहावरा ही चरितार्थ होता नजर आ रहा है।
 
वस्तुतः समूचा मामला ही केंद्रीय मंत्रालयों के बीच अहं की लडाई का है। अदूरदर्शिता के चलते सारा का सारा गडबडझाला सामने आने लगा है। जब नेशनल इंफरमैटिक संेटर (एनआईसी) का गठन ही कंप्यूटर इंटरनेट आधारित प्रशासन को चलाने के लिए किया गया है तब फिर इस तरह का घलमेल क्यों? एनआईसी का कहना है कि उसका काम मूलतः किसी मंत्रालय या जिले की अथारिटी के मशविरे के आधार पर ही वेव साईट डिजाईन करने का है। इसे अद्यतन करने की जवाबदारी एनआईसी की नहीं है।
 
देखा जाए तो एनआईसी के जिम्मे ही वेव साईट को अपडेट किया जाना चाहिए। जब देश के हर जिले में एनआईसी का एक कार्यालय स्थापित है तब जिले की वेव साईट पर ताजा तरीन जानकारियां एनआईसी ही करीने से अपडेट कर सकता है। चूंकि इंटरनेट  और कम्पयूटर के मामले में जिलों में बहुत ज्यादा प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती नहीं है इसलिए या तो ये अपनी अपनी वेव साईट अपडेट नहीं कर पाते हैं, या फिर तकनीक की जानकारी के अभाव के चलते करने से कतराते ही हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में गौतम बुद्ध नगर पूर्व में (नोएडा) में न्यू का एक साईन लिए टेंडर नोटिस लगा हुआ है, जिसमें 2008 का एक टेंडर जो 2009 में जारी कर दिया गया है आज भी विद्यमान है। इसी तरह अनेक जिलों की वेव साईट में भी सालों पुरानी जानकारियां आज भी लगी हुई हैं।
 
इसके अलावा एक और समस्या मुख्य तौर पर लोगों के सामने आ रही है। हर जिले की वेव साईट अलग अलग स्वरूप या फार्मेट में होने से भी लोगों को जानकारियां लेने में नाकों चने चबाने पड जाते हैं। फार्मेट अलग अलग होने से लोगों को जानकारियां जुटा पाना दुष्कर ही प्रतीत होता है। अगर शिक्षा पर ही जानकारियां जुटाना चाहा जाए तो अलग अलग जिलों में प्रदेश के शिक्षा बोर्ड और कंेद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन कितने स्कूल संचालित हो रहे हैं, उनमें कितने शिक्षक हैं, कितने छात्र छात्राएं हैं, यह जानकारी ही पूरी तरीके से उपलब्ध नहीं हो पाती है।
 
दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू काश्मीर, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, उडीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल आदि सूबों में शत प्रति जिलों की अपनी वेव साईट हैं, पर यह कोई नहीं बात सकता है कि ये कब अद्यतन की गई हैं। लचर व्यवस्था के चलते सरकारी ढर्रे पर चलने वाली इन वेव साईट्स से मिलने वाली आधी अधूरी और पुरानी जानकारी के कारण लोगों में भ्रम की स्थिति निर्मित होना आम बात है।

देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से अधिक तक राज किया है को चाहिए कि देश भर के समस्त जिलों, संभागों की आधिकारिक वेव साईट को एक सेट फार्मेट में बनाए, और इसको अपडेट करने की जवाबदारी एनआईसी के कांधों पर डालें क्योंकि इंफरमेशन टेक्नालाजी के मामले में एनआईसी के बंदे ही महारथ हासिल रखते हैं। इसके साथ ही साथ केंद्र सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये वेव साईट समय समय पर अपडेट अवश्य हों, इसके लिए जवाबदेही तय करना अत्यावश्यक ही है, वरना आने वाले समय में लोग कांग्रेस के भविष्य दृष्टा स्व.राजीव गांधी के बाद वाली नेहरू गांधी परिवार की पीढी को बहुत इज्जत, सम्मान और आदर की नजर से देखेंगे इस बात में संदेह ही है।

फोरलेन विवाद का सच ------------01

आखिर क्या है फोरलेन विवाद
 
सडक बचाने के ठेकेदार क्यों बच रहे हैं जनसामन्य को विवाद के बारे में विस्तार से बताने से!
 
आखिर हंगामा क्यों है बरपा, कोई क्यों नहीं जानता?
 
दलगत भावना से उपर उठकर जनसेवकों की भूमिकाओं को किया जाना चाहिए सार्वजनिक
 
(लिमटी खरे)
 
सिवनी। जून 2009 के उपरांत भगवान शिव की सिवनी नगरी में हर किसी की जुबान पर बस एक ही बात है, कि फोरलेन को सिवनी से छिंदवाडा ले जाने के षणयंत्र का ताना बाना बुना जा रहा है। आखिर क्या विवाद है फोरलेन का कि सारा का सारा जिला इससे व्यथित है। बार बार बंद का आव्हान किया जा रहा है। लोग अपनी भावनाएं प्रदर्शित कर रहे हैं, पर फोरलेन विवाद आखिर है क्या? इसको बचाने के बारे में अब तक क्या प्रयास किए गए हैं? इस बारे में सडक को बचाने हेतु आगे आए ठेकेदार बचते ही नजर आ रहे हैं। ले देकर इस मामले में एक ही राजनेता ‘‘भूतल परिहन मंत्री कमल नाथ‘‘ को दोषी ठहराने और बचाने के लिए ही विज्ञप्ति युद्ध लडा जाकर अपनी सारी उर्जा नष्ट की जा रही है।

बताते हैं कि मुगल शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल में व्यापार एवं आवागमन के उद्देश्य से जिस सडक का निर्माण किया गया था, कालांतर में वह सडक देश का सबसे व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात में तब्दील हो गया। इस मार्ग पर यातायात का दवाब सर्वाधिक महसूस किया जाता रहा है।
 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजयेयी के शासनकाल में दो परियोजनाओं का खाका प्रमुख तौर पर तैयार किया गया था। इसमें नदी जोडने और देश के चारों महानगरों को सडक मार्ग से जोडने की कार्ययोजना पर काम आरंभ हुआ था। नदी जोडना तो संभव नहीं हो पाया किन्तु दिल्ली, कोलकता, चेन्नई और मुंबई को आपस में जोडने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज मार्ग की कल्पना को साकार करना आरंभ कर दिया गया था।

समय गुजरने के साथ ही दिल्ली से चेन्नई और मुंबई सेे कोलकता जाने वाले लोगों को लंबे चक्कर से बचाने की बात भी सरकार के ध्यान में लाई गई, जिसके परिणाम स्वरूप उत्तर दक्षिण और पूर्व पश्चिम गलियारे की कल्पना हुई जिसे मूर्त रूप देना आरंभ किया गया। जैसे ही उत्तर दक्षिण गलियारे के मानचित्र पर मध्य प्रदेश उभरा वैसे ही मध्य प्रदेश के अनेक क्षत्रप इस दिशा में प्रयासरत हो गए कि यह गलियारा उनके कार्य क्षेत्र से होकर गुजरे। चूंकि मामला राष्ट्रीय स्तर पर था और इसमें मध्य प्रदेश के क्षत्रपांे की मंशा भी स्पष्ट होती जा रही थी, अतः देश के बाकी क्षत्रपों ने इस उत्तर दक्षिण गलियारे के एलाईनमंेट से छेडछाड करने का पुरजोर विरोध किया। यही कारण था कि मध्य प्रदेश के स्वयंभू क्षत्रपों की मंशा के बावजूद यह सिवनी जिले से होकर गुजरना प्रस्तावित किया गया।

केंद्र में डॉ.मनमोहन सिंह जब दूसरी मर्तबा प्रधानमंत्री बने तब भूतल परिवहन मंत्रालय की महती जवाबदारी सिवनी के पडोसी जिले छिंदवाडा के सांसद कमल नाथ को सौंपी गई। राज्य सभा में कमल नाथ ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी कि वे चाहते थे कि यह गलियारा उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा से होकर जाए, किन्तु जब उन्हें बताया गया कि नरसिंहपुर से बरास्ता ंिछंदवाडा, नागपुर चूंकि नेशनल हाईवे नहीं है, अतः इसे छिंदवाडा से होकर गुजारा नहीं जा सकता है, तब वे शांत हो गए।
 
इसी बीच मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार ने चंद सडकों को राज्य के मार्ग के स्थान पर नेशनल हाईवे में तब्दील करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा। इन प्रस्तावों में नरसिंहपुर से छिंदवाडा होकर नागपुर मार्ग भी शामिल किया गया था। बताते हैं कि इस मार्ग पर वैसे तो इतना यातायात नहीं है कि इस मार्ग का उन्नयन कर इसे नेशनल हाईवे बनाया जाए, किन्तु किसी ‘‘खास रणनीति या जुगलबंदी‘‘ के तहत इसे प्रस्ताव में शामिल करवा दिया गया।

संयोग से यह नेशनल हाईवे भी फोरलेन में बनना प्रस्तावित किया गया। चूंकि उत्तर दक्षिण गलियारे को फोरलेन की संज्ञा दी जा चुकी थी अतः लोगों के मानस पटल पर यह बात घर कर गई कि यही गलियारा अब नेशनल हाईवे जो नरसिंहपुर से नागपुर प्रस्तावित है, में तब्दील हो जाएगा। यही कारण है कि सिवनी वासियों ने भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को पानी पी पी कर कोसना आरंभ कर दिया। विडम्बना तो यह थी कि कमल नाथ के नाम पर देश प्रदेश में राजनीति करने वाले और उनका झंडा उठाकर ‘‘जय जय कमल नाथ‘‘ के नारे बुलंद करने वालों ने भी कमल नाथ की खाल बचाने की जहमत नहीं उठाई, और न ही वास्तविकता ही सामने लाने का प्रयास किया गया कि आखिर फोरलेन विवाद है क्या? और किसके कहने या रोकने अथवा अनुमति न देने के कारण इस गलियारे का काम रूका हुआ है।

वस्तुतः यह काम फोरलेन बचाने का ठेका लेने वाले गैरसरकारी संगठनों जिसे राजनैतिक रंग दिया जाने लगा है, का काम था कि जिले की जनता को यह बताए कि वास्तव में फोरलेन विवाद है क्या? और इसका काम आरंभ न हो पाने में भूतल परिहन मंत्री कमल नाथ, वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जिले के सांसद के.डी.देशमुख, बसोरी सिंह मसराम, पांच में से चार बचीं विधानसभा क्षेत्रों के विधायक ठाकुर हरवंश सिंह, श्रीमति नीता पटेरिया, श्रीमति शशि ठाकुर, कमल मस्कोले की क्या भूमिका है? यह सब होना चाहिए दलगत भावना से उपर उठकर, किन्तु दुख का विषय तो यह है कि इन सारी बातों को जनता जनार्दन के सामने रखने के बजाए हर बार माननीय सर्वोच्च न्यायालय का भय बताकर ही सभी ने अपने अपने कर्तव्यों की इतीश्री कर ली।
(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

रमेश की सडक को न पर रेल को हां

कारीडोर से रेल लाईन की अनुमति कैसे दी वन विभाग ने!
 
पेंच कान्हा कारीडोर से गुजरने वाले ब्राडगेज को अनुमति देना आश्चर्यजनक
 
क्या वन एवं पर्यावरण विभाग का बैर सिर्फ सिवनी से ही है?
 
(लिमटी खरे)

सिवनी। भगवान शिव की नगरी सिवनी से होकर गुजरने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे के फोरलेन मार्ग को पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के बीच के अघोषित काल्पनिक वन्य प्राणी गलियारे के कारण वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने लाल बत्ती दिखाई है, लेकिन इसी गलियारे के बीच से होकर गुजरने वाली बालाघाट जबलपुर नेरोगेज के अमान परिवर्तन कर ब्राडगेज में तब्दील करने के मामले में न केवल वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को ही कोई आपत्ति है, और ना ही सिवनी में पदस्थ मुख्य वन संरक्षक को।
 
फोरलेन के मामले में मुख्य पेंच की ओर किसी का ध्यान शायद नहीं जा रहा है, और अगर जा भी रहा है तो वे जानबूझकर इस मुद्दे को छूना ही नहीं चाह रहे हैं। गौरतलब है कि अनेक नेताओं के वक्तव्य से साफ हो गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न तो इसका काम रोका है और ना ही चालू होने पर उसे कोई आपत्ति है। अगर यह सच है तो निश्चित तौर पर इस सडक का काम तत्कालीन जिलाधिकारी सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 के पत्र क्रमांक 3266 / फोले / 2008 के तहत ही रोका गया है।
 
पिछले साल जून से सिवनी में अस्तित्व में आए इस पत्र के बारे में न तो जनता के अधिकारों के लिए लडने वाले गैर राजनैतिक संगठन ने ही कोई प्रयास किए और न ही राजनैतिक दलों के नुमाईंदों ने। इस बात से साफ जाहिर होता है कि लोगों को सर्वोच्च न्यायालय के इर्द गिर्द ही घुमाकर भटकाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं ये नुमाईंदे। साफ तौर पर जिला कलेक्टर के उक्त आदेश से काम रूका होना प्रतीत होता है, और सर्वोच्च न्यायालय के बारे में नेताओं के वक्तव्यों से साफ हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय में भले ही प्रकरण लंबित हो पर इस मामले में काम रूका है तो सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन जिला कलेक्टर के 18 दिसंबर 2008 कके आदेश से।
 
इस मामले में पडोसी जिले बालाघाट की ब्राडगेज संघर्ष समिति के एक वक्तव्य ने और रोचक मोड ला दिया है। बकौल समिति उनके बालाघाट से जबलपुर के रेल अमान परिवर्तन के काम में मण्डला और सिवनी के मुख्य वन संरक्षकों ने तो वनों की कटाई की अनुमति प्रदान कर दी है, पर बालाघाट के मुख्य वन संरक्षक इस मामले में हीला हवाला कर रहे हैं।
 
यहां गौरतलब है कि बालाघाट से जबलपुर ब्राडगेज का मार्ग इसी पेंच और कान्हा के अघोषित काल्पनिक कारीडोर से होकर गुजर रहा है। 25 अक्टूबर 2008 को वनमण्डलाधिकारी दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल द्वारा मुख्य वन संरक्षक सिवनी को लिखे पत्र क्रमांक मा.चि. / 2008 / 1002 में साफ तौर पर इस बात को रेखांकित किया गया है कि राजस्व विभाग के नक्शों में आरक्षित वन सीमा में राजमार्ग को नहीं दर्शाया गया है। इस पत्र में वनामण्डलाधिकारी लेख करते हैं कि वन विभाग के पास एसे कोई दस्तावेज न तो हैं और न ही उपलब्ध कराए गए हैं जिससे स्पष्ट हो सके कि वन विभाग ने लोकनिर्माण विभाग या महामार्ग विभाग को कोई भूमि हस्तांतरित की गई हो। अगर एसा है तो लोक निर्माण विभाग और महामार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग) विभाग से यह पूछना चाहिए कि सालों साल तक इस सडक का रखरखाव विभाग ने किस मद से किया? इस पत्र में डीएफओ साउथ टेरीटोरियल ने वृक्षों की कटाई करने पर कानूनी कार्यवाही की बाध्यता की बात कही है। पत्र के अंत में डीएफओ ने सीसीएफ से अनुरोध किया है कि वन संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत स्वीकृति के उपरांत ही कर्या करने हेतु राजमार्ग के अधिकारियों को कोई लेख किया जाए।
 
वहीं दूसरी ओर इसी काल्पनिक और अघोषित कारीडोर को संवारने की बात करने वाले वन विभाग को बालाघाट से जबलपुर के रेल लाईन अमान परिवर्तन में कोई आपत्ति न होना आश्चर्य जनक ही माना जाएगा। हालाता देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि केंद्र में बैठी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील सरकार सहित प्रदेश की भाजपा सरकार और विशेषकर वन विभाग ने अपना मानस बना लिया है कि जतन एसे हों कि चाहे कुछ भी हो जाए पर सिवनी के निवासियों को उनका वाजिब हक नहीं मिलने पाए।

आश्चर्य तो तब होता है जब राजनैतिक दलों के साथ जनता के हक के लिए लडने वाले संगठन भी उनके साथ ही तुकबंदी मिलाने लगते हैं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जनता के हक के लिए लडने वाले सर्वोच्च न्यायायल के प्रकरण के साथ ही साथ जिला कलेक्टर के 18 दिसंबर 2008 के आदेश को निरस्त करने की दिशा में संजीदगी से प्रयास करें साथ ही साथ मुख्य वन संरक्षक से यह भी पूछें कि अगर बालाघाट जबलपुर अमान परिवर्तन में झाड काटने की अनुमति दी जा सकती है तो फिर भला कुरई घाटी में क्या आपत्ति है। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक होगा कि यह मामला अक्टूबर 2008 के पहले से ही रोका हुआ है, जब प्रकरण माननीय सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज पर नहीं पहुंचा था।

गांधी गिरी पर उतरे सिवनी वासी

तारीफे काबिल है स्वप्रेरणा से किया अहिंसक विरोध
 
फोरलेन बचाने अभी भी सुलग रही है सिवनी वासियों के मन में आग
 
नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित न हो यह विरोध
 
जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलटाने के होना चाहिए प्रयास
 
(लिमटी खरे)

केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे के मानचित्र से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने की साजिश से सिवनी वासियों के मानस पटल पर रोष और असंतोष की ज्वाला अभी शांत नहीं हुई है। सिवनी के निवासी इस कुत्सित प्रयास का विरोध करने का माद्दा आज भी रख रहे हैं। मंगलवार 3 अगस्त को जिला मुख्यालय के निवासियों ने स्वप्रेरणा से आधे दिन का बंद कर जता दिया है कि वे फोरलेन के लिए कितने आतुर हैं।
 
गौरतलब होगा इसके पहले जब परिसीमन और पुर्नारक्षण के चलते सिवनी लोकसभा का विलोपन करने की खबरें आम हुईं थीं तब भी सिवनी वासी सडकों पर उतर आए थे, उस समय भी भगवान शिव की सिवनी के भोले भाले नागरिकों ने शांति, संयम और धैर्य के साथ सिवनी में जिस तरह का जनता कर्फयू लगाया था, उसकी गूंज दिल्ली तक गई थी, जिसे सभी ने सराहा था। यह अलहदा मामला है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी सिवनी लोकसभा के अवसान को बचाया नहीं जा सका था।
 
इस बार जब फोरलेन बचाने वालों ने बंद का आव्हान किया तब तरह तरह के कायस लगाए जा रहे थे। सोमवार को बंद का आव्हान करने वालों ने भले ही बंद के लिए व्यापक स्तर पर अपील न की गई हो, किन्तु शहर के व्यवसाईयों ने स्वप्रेरणा से जिस तरह शांति पूर्वक बंद का आयोजन किया वह तारीफे काबिल ही कहा जा सकता है। किन्तु इस सफलता से अतिउत्साह में आने की आवश्यक्ता कतई नहीं है, क्योंकि अति उत्साह में आंदोलन पथ से भटकने की संभावनाएं बलवती हो जाती हैं।
 
हम आज पुनः अपनी उसी बात पर कायम हैं कि इस फोरलेन के अवसान के प्रयासों के मामले में एक बार फिर हमें सोचना होगा कि मामलें में कांटा कहां फंसा है। मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु नगर पंचायत, लखनादौन के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजकुमार खुराना के सार्वजनिक किए गए वक्तव्यों से साफ हो जाता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न तो नागपुर रोड पर कुरई घाट और जबलपुर रोड पर बंजारी के पास का काम रोका है, और न ही इसे आरंभ करने में उन्हें कोई आपत्ति है।
 
अगर इन नेता द्वय की बात सच है तो फिर मामला तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 को जारी किन्तु 19 दिसंबर को पृष्ठांकित आदेश के तहत अवरूद्ध हुआ है। सवाल यह उठता है कि जब काम को सिवनी के जिला कलेक्टर द्वारा ही रोका गया है, तब फोरलेन बचाने आगे आने वाले संगठनों द्वारा जिला कलेक्टर सिवनी से अब तक इस मामले मंे चर्चा कर इसका निकाल निकालने का जतन क्यों नहीं किया गया है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है, इस मामले के दो विशेष पक्षों के रूप में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के नाम सामने आ रहे हैं जिन पर आरोप है कि उनके चलते इस सडक का निर्माण रूका हुआ है।
 
राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के चलते एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप आम बात है, किन्तु जब मामला सार्वजनिक और विशेषकर सिवनी के हित का हो तो फिर हमारे विचार से इसमें राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को गौड ही करना आवश्यक है, वरना यह पूरा मामला राजनीति की बली ही चढ जाएगा और मूल मुद्दा अंत तक कायम रहेगा। हमारी अपनी राय में इस मामले में चूंकि एक बार प्रथम दृृष्टया उभरकर सामने आ रही है कि मामले को जिला कलेक्टर द्वारा आदेश जारी कर रोका गया है, अतः जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलझाना पहली प्राथमिकता होना चाहिए, वस्तुतः एसा होता अब तक दिखा नहीं है। जब भी फोरलेन की बात सामने आ रही है, ले दे कर सभी इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय पर लाकर टिका दे रहे हैं।
 
इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से भी हम सहमत नहीं हैं। वस्तुतः विधायक और सांसद जिन्हें सिवनी के मतदाताओं ने जनादेश देकर सदन में भेजा है, उन्हें भी इस मामले में स्वप्रेरणा से पहल करना चाहिए। अगर विधायक सांसद अपनी जवाबदारियों का निर्वहन करने में अपने आप को सक्षम नहीं पा रहे हैं तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को चाहिए कि इन जनसेवकों से मिलकर उनको एक निश्चित समय सीमा तक का समय दें, और अगर समय सीमा में वे अपनी जवाबदारियों के निर्वहन में असफल हों तो उनका वह चेहरा भी उनको जनादेश देकर सदन में भेजने वाली जनता के समक्ष रखना चाहिए। वैसे यह काम आंदोलन के आरंभ होने के उपरांत कुछ माहों में हो जाना चाहिए था। हमारी अपनी निजी राय में अभी भी देर नहीं हुई है, विधायक सांसद को कम से कम तीस दिन का अल्टीमेटम दिया जाना आवश्यक है, जरूरी नहीं कि इससे आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सहमत हांे।

इस मामले में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सम्मानीय बंधुवरों से हम विनम्र आग्रह करना चाहते हैं कि चूंकि मामला जिला कलेक्टर सिवनी द्वारा जारी आदेश के तहत रोका गया है, अतः इस मामले में जिले के विधायक सांसद और प्रभारी मंत्री के सहयोग से सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान सहित प्रदेश के मुख्य सचिव आदि को पहल के लिए बाध्य करना होगा, ताकि सिवनी से होकर गुजरने वाली शेरशाह सूरी के जमाने की एतिहासिक महत्व की इस सडक के अस्तित्व को बचाया जा सके। पिछले साल 21 अगस्त और आज जिला मुख्यालय की जनता ने यह जता दिया है कि वह फोरलेन के साथ छेडछाड बर्दाश्त करने की स्थिति में कतई नहीं है। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के सफल आंदोलन अपने आप में एक उर्जा का काम अवश्य करते हैं, किन्तु कहीं इन आंदोलनों की गूंज दिल्ली और भोपाल में बज रहे नगाडों के बीच ‘‘नक्कारखाने में तूती की आवाज‘‘ न साबित हो जाएं।

मीडिया बन चुकी है धन कुबेर की लौंडी‘

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

मानो या ना मानो मीडिया बन चुकी है धन कुबेर की लौंडी
स्वच्छ, निष्छल, निर्भीक, जनसेवा के लिए की जाने वाली पत्रकारिता के दिन लद चुके हैं। अब जमाना पेड न्यूज का आ चुका है। मीडिया की लगाम वाकई में धनपतियों के हाथों में जा चुकी है। पेड न्यूज पर देशभर में हो रही बहस बेमानी नहीं है। नए चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी का कहना है कि आयोग की पेड न्यूज पर पैनी नजर होगी। सच्चाई तो यह है कि नेता, पार्टी या व्यक्ति विशेष की इमेज बिल्डिंग का काम करने लगा है मीडिया वह भी निहित स्वार्थों के चलते। किसी से उपकृत होकर मीडिया द्वारा उसके उजले पक्ष को बहुत ही करीने से प्रस्तुत किया जाता है, पर उसके काले और भयावह पक्ष के मामले में मौन साध लिया जाता है, जो निंदनीय है। यह उतना ही सच है जितना कि दिन और रात कि राजनेता, नौकरशाह और धनपतियों के पास साधन, संसाधन और धन का अभाव नहीं है, यही कारण है कि मीडिया मुगल कहलाने के शौकीन राजनेताओं आदि द्वारा इनके सामने टुकडे डालकर इन्हें अपने पीछे पूंछ हिलाने पर मजबूर कर दिया जाता है। पैसा लेकर न केवल चुनावों बल्कि हर असवर, हर समय खबरों का प्रसारण प्रकाशन हो रहा है, जिस पर विचार करना ही होगा। यह विचार विमर्श मीडिया से इतर लोग कर रहे हैं, यह दुख का विषय है, वस्तुतः मीडिया को ही इस पर विचार करना होगा, कि धन कुबेरों के दहलीज की लौंडी बन चुकी मीडिया को उसके वास्तविक स्वरूप में कैसे लाया जाए।

अभी कहां जनाब अभी तो महज पांच साल ही हुए हैं
सोहराबुद्दीन मामले में एक बार फिर जिन्न ने अंगडाई ली है, और बोतल के बाहर आने को बेताब दिखाई दे रहा है। गुजरात के पूर्व गृह मंत्री अमित शाह की बलि ले चुके इस जिन्न की क्षुदा अभी शांत नहीं हुई है। इसकी लार नरेंद्र मोदी को देखकर टपक रही है। यह चाह रहा है कि नरेंद्र मोदी की कुर्सी चट कर जाए यह। मामला एक बार फिर गर्माया तो सुसुप्तावस्था में बैठी कांग्रेस को लगा बारिश आ गई और कांग्रेस की टर्राहट बढ गई। सियासी बियावान में एक बार फिर आरोप प्रत्यारोपों का कभी न थमने वाला दौर आरंभ हो गया। भाजपा कमोबेश यही कह रही है कि सीबीआई को कांग्रेस ने अपने घर के दरवाजे पर बांध रखा है, कोई भी कांग्रेस को घेरने की कोशिश करता है तो सीबीआई गुर्राने लगती है। वहीं कांग्रेस का मानना यही है कि भाजपा अपनी करनी से भयाक्रांत है। कुल मिलाकर कांग्रेस और भाजपा को इस मामले में छांेका लगाना तभी सूझा जब यह मामला उछला। भारत गणराज्य की जनता सोच रही है कि जल्द ही इस मामले से निजात मिल जाएगी। पर कहां जनाब, इसे चलते अभी तो महज पांच साल ही हुए हैं, अभी दस पंद्रह साल और जिन्दा रहेगा यह जिन्न।

बुक वारमें सोमदा ने दी आमद
सियासत में बहुत सारी बातें एसी होती हैं जो नेता बयान के जरिए नहीं कह पाते हैं, उन बातों को कहने के लिए किताबों का सहारा लेना नेताओं का प्रिय शगल है। जब नेता सक्रिय राजनीति से किनारा करते हैं या करने का मानस बना ही लेते हैं तब आरंभ होता है बुक वार। अनेक मर्तबा अपने प्रतिद्वंदियों को भ्रमित करने भी बुक वार छेड दिया जाता हैै। कांग्रेस के बीसवीं सदी के चाणक्य समझे जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह की किताबों के बाजार में आने के पहले कांग्रेस के आला नेताओं की सांसे अटक ही जाती हैं। सिद्धांतों पर चलने वाले वामदल के नेता सोमनाथ चटर्जी भी इस रंग में रंग गए दिखते हैं। इस बार सभी को बडा आश्चर्य इस बात का हुआ कि बुक वार में वाम नेता और पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ही कूद गए। अपनी किताब ‘‘कीपिंग द फेथ: मेमरीज ऑफ द पार्लियामेंटेरियनमें सोमदा ने अपनी ही पार्टी को कटघरे में खडा कर दिया है। अपनी इस किताब में चटर्जी ने पार्टी महासचिव प्रकाश करात को जमकर कोसा है। अब देखना यह है कि पार्टी इस मामले में क्या स्टेड लेती है।

सुनंदा का गरूर बनेंगे शशि थरूर
भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में अगर विवाद शब्द आता है तो बरबस ही पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर का नाम ही जेहन में आ जाता है। सोशल नेटवर्किंग वेव साईट ट्विटरपर ट्विट ट्विट करने वाले शशि थरूर का बस चलता तो वे सरकारी काम काज नोटशीट पर करने के स्थान पर ट्विटर पर ही संपादित करते। कभी आलीशान पांच सितारा होटल में रहकर गरीब भारत गणराज्य की सरकार पर लाखों रूपयों का बोझ चढाया तो कभी हवाई जहाज की इकानामी क्लास को मवेशी का बाडा ही कह डाला। अंततः आईपीएल विवाद की बलि चढे। इस मामले में उनकी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर का नाम भी जमकर उछला, तब जाकर देशवासियों को पता चला कि जिस महिला को थरूर महोदय बतौर मंत्री रहते हुए साथ पार्टीज में घुमाते रहे हैं वह और कोई नहीं यही सुनंदा थीं। अब खबर है कि 29 सितंबर को भारतीय ज्योतिष के अनुसार जब देवता सो रहे होंगे तब दुबई में शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर परिणय सूत्र में आबद्ध होने जा रहे हैं।

राहुल नहीं साबित हो सके महाजन
भारतीय जनता पार्टी के धुरंधर नेता स्व.प्रमोद महाजन के सुपुत्र और इलेक्ट्रानिक न्यूज चेनल्स के माध्यम से इक्कीसवीं सदी में स्वयंवर रचाकर मीडिया के माध्यम से चर्चाओं में आए राहुल की दूसरी शादी भी चंद महीने में ही टूटने की कगार पर आ गई है। कहा जाता है कि महाजनी सबसे अच्छी होती है, जिसमें सब कुछ पारदर्शी होता है, किन्तु राहुल खुद को महाजन साबित नहीं कर सके हैं। कहा जाता है कि शक्की राहुल महाजन ने अपनी पत्नि डिम्पी का मोबाईल पर एक मैसेज नहीं पढ पाने के कारण उसकी तबियत से पिटाई कर दी। डिम्पी ने अपने मित्र और परिजनों को बुलाकर वहां से रवानगी डाल दी। लोगों का मानना है कि महज एसएमएस न पढ पाना पिटाई का कारण नहीं हो सकता है, यह हो भी सकता है, पर तब जब कोई होश में न हो। वैसे भी राहुल महाजन को नशीली दवाओं के लेने के लिए अनेक बार समचार चेनल्स ने कटघरे में खडा किया है। यह बात तो राहुल ही बता पाएंगे कि वे नशे में थे या और कोई बात है इस पूरे प्रहसन के पीछे।

सब कुछ जायज है प्यार और जंग में
कहा जाता है कि प्रेम और लडाई में सब कुछ भी नाजायज नहीं होता है। लडाई किसी भी तरह की हो सकती है, चाहे वर्चस्व की हो या सत्ता हासिल करने की। कुछ सालों पहले संघ के प्रचारक संजय जोशी को बदनाम करने की गरज से 26 नवंबर 2005 को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बांटी गई संजय जोशी के साथ बनी हुई कथित सीडी की पृष्ठ भूमि में कोई और था। यह खुलासा गुजरात के एक पुलिस निरीक्षक बी.के.चौबे ने किया है। चौबे का कहना है कि उस सीडी में संजय जोशी के स्थान पर सोहराबुद्दीन था, जिसे कथित तौर पर महिला के साथ दुष्कृत्य करते दिखाया गया था। कहते हैं कि चौबे ने सीबीआई को बताया है कि सोहराबुद्दीन के स्थान पर जोशी का चेहरा लगाकर बनाई गई सीडी को पार्टी के अधिवेशन में एसटीएफ के तत्कालीन प्रमुख बंजारा के कहने पर वे ले गए थे। संघ के सूत्र कहते हैं कि संघ नेतृत्व मोदी से इस बात से खफा है कि संघ के एक अच्छे कार्यकर्ता को गुजरात के नेताओं ने बदनाम किया। चूंकि राजग के पीएम इन वेटिंग आडवाणी उस समय जिन्ना प्रकरण में उलझ गए थे, अतः भाजपा सुप्रीमो की दौड में सबसे शक्तिशाली तौर पर संजय जोशी उभरे थे, जिन्हें नेस्तनाबूत करने गुजरात भाजपा के आला नेताओं ने यह चाल चली थी।

18 साल बाद आई राम की बदहाली की याद
1992 में अयोध्या में बाबरी ढांचे के विध्वंस से अतिउत्साहित भारतीय जनता पार्टी और उससे जुडे संगठनों ने भगवान राम को परिदृश्य से गायब कर दिया था, इसके उपरांत जब तब राम के नाम पर बयान देकर अपनी उपस्थिति दर्ज अवश्य कराते रहे भाजपा और अन्य संगठनों के नेता। अब 18 साल बाद एक बार फिर विश्व हिन्दु परिषद के मानस पटल पर राम की यादें ताजा होने लगी हैं। विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल को 1992 के उपरांत अठ्ठारह साल बाद याद आया है कि अयोध्या में भगवान राम तिरपाल के घेरे में रह रहे हैं, जिससे देश में रह रहे करोडों सनातन पंथियों (हिन्दुओं) की भावनाएं आहत हो रही हैं। बकौल सिंघल, विहिप अब 16 अगस्त से 15 नवंबर तक देश के दो लाख गांवों में जाकर जन जागरूकता अभियान चलाएगा। सिंघल को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के गांव वाले उनसे कहीं उन गांव वालों द्वारा दिए चंदे और एक एक ईंट का हिसाब पूछ बैठे तो सिंघल साहब क्या जवाब देने की स्थिति में रह पाएंगे। जाहिर है सिंघल साहेब के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। यहां उल्लेखनीय होगा कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इसी बीच छः साल देश पर राज भी किया है, तब भगवान राम को तिरपाल से क्यों नहीं निकाला गया?

कम नहीं हो रही पचौरी की दुश्वारियां
सवा सौ साल पुरानी और भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चुनावों में भारत के हृदय प्रदेश में वर्तमान अध्यक्ष सुरेश पचौरी को पसीना आने लगा है। आलम यह है कि मध्य प्रदेश के कांग्रेसी क्षत्रप राजा दिग्विजय ंिसह, कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कुंवर अर्जुन सिंह, सुभाष यादव, कांति लाल भूरिया, श्री निवास तिवारी आदि ने चुनावों के तौर तरीकों पर अपनी असहमति जता दी है। नेताओं के बीच मतभेद और मनभेद इस कदर बढ गए हैं कि एआईसीसी के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो कांग्रेस द्वारा गठित मध्य प्रदेश चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेंद्र बुढ़ानिया से चर्चा तक के लिए इंकार कर दिया है। कांग्रेस में गुटबाजी को अहम स्थान दिया गया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि जब भी मध्य प्रदेश में कोई भी अध्यक्ष पद पर काबिज होता है, वह दूसरे नेताओं की खीची लाईन को मिटाकर अपनी लाईन को ही बढाने का जतन करता है। इस बार के चुनावों की कवायद में भी यही हुआ। अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने बीआरओ और डीआरओ के चयन में अन्य क्षत्रपों की जमकर उपेक्षा की जिससे आला नेताओं में रोष और असंतोष व्याप्त हो गया है।

कौआ कोसे नहीं मरता है ढोर
बुंदेलखण्ड की मशहूर कहावत है ‘‘कौआ कोसे ढोर नहीं मरत‘‘ इसका अर्थ है भूखा काक जब कुछ खाने को नहीं होता है तब ढोर यानी जानवर को कोसने लगता है कि वह मर जाए, पर ईश्वर की लीला अपरंपार है, उसके कोसने बुरा चाहने पर भी जानवर नहीं मरता है। इसी तर्ज पर पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर द्वारा कामन वेल्थ गेम्स को कोसा जा रहा है। मेजबानी प्राप्त होने और खेल के महज तीन माह पहले मणि शंकर ने अपनी जुबान खोलकर कहा है कि यह पैसे की बरबादी है, और कोई शैतान ही इसका समर्थन कर सकता है। अरे मणि भाई आप उस वक्त कहां थे, जब पहली बार सरकार ने इसके लिए राशि आवंटित की थी, इतना ही नहीं बारंबार आवंटन बढता गया और आप भारत गणराज्य के खेल मंत्री रहे हैं, आप फिर भी खामोश रहे। अब जब दरवाजे पर बारात आ गई है तब आप कह रहे हैं कि द्वारचार के पहले हम जरा ‘‘पॉटी‘‘ करके आते हैं। अगर आपको यह पैसे की बरबादी लग रही थी तो आपको पहले ही अपनी चोंच खोलना चाहिए था। लगता है आपका भी कोई हित नहीं सध सका है, जो आप कर्कश स्वर में नया राग अलापने में लगे हैं।

पंेच में यह कैसा पेंच
देश में स्वर्णिम चतुर्भुज सडक परियोजना के उत्तर दक्षिण गलियारे में पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के बीच वन्य जीवों के अघोषित काल्पनिक गलियारे की गुत्थी सुलझने के बजाए उलझती ही जा रही है। दरअसल देश के हृदय प्रदेश के सिवनी और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा जिले में है पेंच नेशनल पार्क यहां से वन्य जीवों के लिए एक अघोषित काल्पनिक गलियारा गुजर रहा है जो मण्डला जिले के कान्हा नेशनल पार्क तक जाता है। क्रेद्रीय वन मंत्री जयराम रमेश कह चुके हैं कि यह मार्ग चूंकि इस गलियारे का रास्ता काट रहा है इसलिए इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है। मुख्य वन संरक्षक सिवनी ने भी इसमें सहमति जता दी है। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ जब यह बात प्रकाश में आई कि एमपी के ही बालाघाट से संसकारधानी जबलपुर तक के नेरोगेज को ब्राड गेज में तब्दील करने के मसले में वन विभाग द्वारा अनुमति प्रदान कर दी गई। वस्तुतः सिवनी, बालाघाट और मण्डला जिले से होकर गुजरने वाली इस रेल लाईन का एक बडा हिस्सा भी इसी काल्पनिक वन्य जीव कारीडोर को काट रही है, इस मामले में केंद्र, प्रदेश सरकार के साथ ही साथ जनता के हक की लडाई लडने वाली संस्थाओं की चुप्पी अनेक संदेह को जन्म देती है।

सवा छः करोड़ रूपए फूंक दिए जनसेवकों ने
आप सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक प्रत्यक्ष या परोक्ष करों से लदे फदे रहते हैं, यह बात भारत गणराज्य का आम आदमी शायद नहीं जानता। यह कर किस काम आता है। यह कर आता है देश के विकास के लिए। वस्तुतः इस कर का उपयोग अब जनसेवकों के एशोआराम और मनमानी के लिए अधिक किया जाने लगा है। हाल में संपन्न हुए संसद सत्र के पहले सप्ताह को देखकर यही कहा जा सकता है। एक मसले पर पूरे सप्ताह लोकसभा की कार्यवाही स्थगित रही। आपको विस्तार से बता दें कि अगर लोकसभा की कार्यवाही प्रतिदिन सुबह दस से शाम पांच बजे तक चले तो एक दिन में सात घंटे और सोमवार से शुक्रवार तक छः दिन में कुल बयालीस घंटे। इस तरह पूरे सप्ताह में कुल 2520 मिनिट और आपको पता है कि लोकसभा की कार्यवाही चलने में मिनिट पच्चीस हजार का खर्च आता है। इस लिहाज से पूरे सप्ताह में देश के इन जनसेवकों ने आपके खून पसीने की कमाई के ज्यादा नहीं बस छः करोड तीस लाख रूपयों में ही आग लगाई है। है न आश्चर्य की बात, गरीब गुरबों के इस भारत गणराज्य मेें जनसेवकों की ही इतनी जुर्रत हो सकती है कि वे इतनी विपुल धनराशि को सरेराह यूं ही बरबाद करें।

आमदानी अठ्न्नी खर्चा रूपैया!
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की महानगर पालिका निगम द्वारा आमदानी अठ्न्नी खर्चा रूपैया की कहवत को चरितार्थ किया जा रहा है। बीते तकरीबन ढाई साल में चार दर्जन मामले सुलझाने के लिए एमसीडी द्वारा गठित प्रापर्टी टेक्स ट्रिब्यूनल के पास आए पर सुलटे महज चार ही। मजे की बात तो यह है कि एमसीडी ने इसके लिए जो अमला गठित किया है उसमें पदस्थ निगम कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन भत्तों पर इस दौरान व्यय किए गए हैं पांच करोड़ रूपए से अधिक। 2007 में एमसीडी ने संपत्ति कर के विवादित मामलों के लिए इसका गठन किया गया था। विभाग में न्यायिक सेवा से सेवानिव्त्त तीन अधिकारियों को अनुबंध पर नियुक्त किया गया था। ढाई साल में निष्पादन के लिए आए 48 मामालों में से पांच करोड़ रूपए से अधिक खर्च कर निपटाए महज चार मामले और वसूली हुई कुल जमा दस लाख रूपए ही। यह है मेरी दिल्ली की एमसीडी का हाल सखे।

पुच्छल तारा
कामन वेल्थ गेम्स सर पर हैं, इसकी तैयारियां युद्ध स्तर पर जारी हैं। लोग इसके पक्ष और विपक्ष में तरह तरह के तर्क देने में लगे हुए हैं। कहा जा रहा है कि इस आयोजन से भारत की वैश्विक छवि पर प्रभाव पडेगा। भारत की छवि विश्व स्तर पर अच्छी बने इसके लिए दिल्ली के चौक चौराहों सहित प्रमख स्थानों को भिखारियों से मुक्त कराने की मुहिम छिडी हुई है। दिल्ली के उपनगरीया इलाके द्वारका में सेक्टर 9 में रहने वाली सोम्या श्रीवास्तव एक ईमेल के माध्यम से इसे बेहतर तरीके से रेखांकित कर रहीं हैं। वे लिखती हैं कि एक खबर छपी है कि दिल्ली को भिखारियों से कब मिलेगा छुटकारा! इसका सीधा सादा सा जवाब है भई! ये तो मांगने वालों की अदा है, सैकडों लोग जनता से भीख में वोट मांगकर दिल्ली पहुंचते हैं, फिर भला वे अपनी बिरादरी वाले भीख मांगने वालों से छुटकारा क्यों भला दिलाएं?

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

जनसेवकों की जय जय

जनसेवकों की पौ बारह

600 वीं पोस्‍ट

सडक किनारे पडे बोल्डर दे रहे दुर्घटना को न्योता

यातायात प्रभारी से कार्यवाही की अपेक्षा
 
सद्भाव के डंपर्स ने उडा दिए सडकों के धुर्रे 
कैसे गुजरें एक डेढ फिट के गड्ढों से

आईएसओ सर्टिफाईड होना चाहिए काम

(लिमटी खरे)

सिवनी। फोरलेन आएगी, फोरलेन बचेगी, फोरलेन जाएगी इसी उहापोह के बीच फोरलेन निर्माण करा रही निर्माण कंपनियों की मनमानियां जारी हैं, पर न तो जिला प्रशासन और न ही फोरलेन बचाने के लिए आगे आईं संस्थाएं ही इस दिशा में कोई पहल ही कर पा रही हैं। सिवनी से नागपुर मार्ग पर जगह जगह सडक पर बिखरी पडी बडी बडी बोल्डरनुमा चट्टाने सरेआम दुघटनाओं को न्याता दे रहीं हैं और सभी खामोशी से दुर्घटना घटने की बाट जोह रहे हैं।

एसा नहीं कि सिवनी जिले में नेतागिरी करने वाले नुमाईदे सिवनी से दक्षिणी दिशा में नागपुर जाने वाले मार्ग से न गुजरते हों। बावजूद इसके सडक पर जगह जगह सडाकों पर काले पत्थरों के ढेर उन्हें दिखाई न पडते हों। इसके साथ ही साथ सडकों पर मिट्टी के ढेर भी जहां तहां देखने को मिल जाते हैं। वस्तुतः ये आवागमन के दौरान दुर्घटनाओं के घटने का कारक बन सकते हैं।

गौरतलब होगा कि स्वर्णिम चतुर्भुज और इससे जुडे उत्तर दक्षिण और पूर्व पश्चिम गलियारे का निर्माण का काम भी गुणवत्ता के हिसाब से आईएसओ से प्रमाणित होना चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि बिना सुरक्षा नोटिस, निर्माण कार्य के दोनों ओर बिना दोरंगी पट्टी बांधे ही इसका काम नब्बे फीसदी करा दिया गया है, पर किसी के कान में जूं तक नहीं रेंगी। इस सारे मामले में नियम कायदों का सरेआम माखौल उडाकर इसका निर्माण करा रही कंपनियों ने अच्छी मलाई काटी है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

बीती ताहि बिसार दे की तर्ज पर भी अगर वर्तमान परिस्थितियों में देखा जाए तो सिवनी से नागपुर मार्ग पर जगह जगह पडे पत्थरों के ढेर से आवागमन प्रभावित हुए बिना नहीं है। पुलिस के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि जिले में यातायात प्रभारी और जिला पुलिस अधीक्षक का कार्यक्षेत्र बराबर ही होता है। इस लिहाज से यातायात प्रभारी की नजरें भी इस पर इनायत न हो पाना आश्चर्य का ही विषय माना जा सकता है। परिवहन विभाग के अधिकारी तो लक्ष्मी के मद में इतने चूर हो चुके हैं कि उन्हें लोगों की सुख सुविधाओं की परवाह कतई ही नहीं है, पर संजीदा यातायात प्रभारी से तो अपेक्षा की जा सकती है कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगे।

यहां एक बात और गौरतलब है कि सडक के जिस भाग का निर्माण कथित तौर पर माननीय न्यायालय द्वारा रोका बताया जा रहा है उस भाग के धुर्रे अगर उडे हैं तो वह सडक निर्माण में लगी इन दोनों ही कंपनियों सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी के ओवर लोडेड डंपर्स ने ही उडाए हैं। कहा जा रहा है कि इन कंपनियों में बडे कद के राजनेताओं की भागीदारी है अतः इन दोनों ही कंपनियों का कोई भी कुछ नहीं बिगाड सकता है।

आश्चर्य का विषय तो यह है कि जिला प्रशासन भले ही राजनेताओं के दबाव में आकर इन कंपननियों के खिलाफ कार्यवाही करने से भले ही कतरा रहा हो पर लोगों के हक की लडाई के लिए आगे आने वाले गैर सरकारी संगठनों की इस मामले में चुप्पी वाकई शोध का विषय ही कही जाएगी।