शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

हजार टन बारूद मचा सकता है तबाही

आसमान निगल गया या धरती लील गई जिंदा बमों को
 
कहां गायब हो गए बारूद से लदे फदे 164 वाहन?
 
प्रशासन और पुलिस बहुत गंभीर नहीं है हादसे के प्रति
 
अनुज्ञा समाप्ति के बाद भी बिक रहा था बारूद!
 
नियमों में कड़े संशोधन है जरूरी
 
(लिमटी खरे)

राजस्थान के गर्भ में पैदा हुआ बारूद जिसमें से लगभग एक हजार टन बारूद 164 ट्रकों में लादकर गन्तव्य की ओर रवाना किया गया था, वह अचानक ही गायब हो गया। ट्रकों की साईज इतनी छोटी भी नहीं होती है कि कोई उसे आसानी से छिपा सके। वैसे भी ज्वलनशील पदार्थ या बारूद ले जाने वाले ट्रकों की बनावट आम ट्रकों से अलग ही होती है। फिर 164 ट्रकों को आखिर कहां और कैसे गायब कर दिया गया है, यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

भारत में आंतरिक और बाहरी तौर पर आज आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के मामले में आग जिस तेजी से सुलग रही है, उसे देखते हुए 872 टन बारूद का हवा में गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है। इस मामले को राजस्थान सहित छः राज्यों की पुलिस जिस हल्के तरीके से ले रही है, उसे देखकर लगता है कि सरकारें ही इस तरह के हिंसक आंदोलनों के लिए उपजाऊ माहौल प्रशस्त करती हैं।

देखा जाए तो सुरक्षा एजेंसियों की नींद इस तरह के संगीन और बड़े मामले में उड़ना चाहिए था। दो माह से अधिक समय पूर्व हुई यह कथित चोरी के बाद पुलिस के हाथों खाली ट्रक के अलावा कुछ नहीं लग सका है। पुलिस और प्रशासन हैं कि एक दूसरे पर जवाबदारी डालने पर तुले हुए हैं। इतनी व्यापक मात्रा में गायब हुआ विस्फोटक बारूद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है।

गौरतलब है कि गत दिनों सूरत में हुए विस्फोट में राजस्थान के ही धौलपुर में मचकुंड के पास 1979 - 80 में स्थापित राजस्थान एक्सप्लोसिव एवं केमिकल लिमटेड (आरईसीएल) बरूद फेक्ट्री में बने विस्फोटक और डेटोनेटर के इस्तेमाल की पुष्टि की गई थी। 164 ट्रक विस्फोटक के गायब होने के बाद धौलपुर पुलिस की तंद्रा टूटी है। धौलपुर के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र कुमार अब यह जांच करवा रहे हैं कि कितना माल वहां से निकला और कहां गया? पुलिस अधीक्षक का यह कहना कि कंपनी द्वारा माल निकासी की सूचना देने के बाद भी विस्फोटकों से लदे फदे वाहनों को सुरक्षा मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है, बहुत ही हास्यास्पद माना जाएगा।

नियमानुसार तो विस्फोटकों से लदी लारी को पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई जाना चाहिए, अथवा अगर कोई कंपनी इसका परिवहन कर रही है तो उसे निजी तौर पर आर्मड सिक्यूरिटी गार्ड की मदद लेना चाहिए। विशेष प्रकार की कमोबेश बख्तरबंद गाडियों को पहचानना किसी के लिए कठिन नहीं है। ये लारी जब सुनसान इलाकों से होकर गुजरती हैं, तब इन्हें लूटना नक्सलवादी, आतंकवादी या डकैतों के लिए बहुत ही आसान होता है।

वैसे भी विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा इस तरह की लूट एवं अन्य घटनाओें की आशंकाओं के मद्देनजर फेक्ट्री से विस्फोटक को गंतव्य तक कड़ी सुरक्षा में पहुंचाने का निर्देश पहले ही जारी किया जा चुका है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर बारूद का निर्माण या भण्डारण होता है, उन स्थलों का निरीक्षण संबंधित जिले के जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को कम से कम छः माह में एक बार करना अत्यावश्यक होता है।

अगर पुलिस की जवाबदारी में इन वाहनों की सुरक्षा का शुमार नहीं है तो फिर किस हक से अब पुलिस द्वारा इसकी तहकीकात की जा रही है कि माल कितना निकला और कहां गया? साथ ही साथ जब पुलिस के कारिंदे सड़कों पर खड़े होकर इन्हीं ट्रक चालकों से ‘चौथ‘ वसूलते हैं तब वे कागज पत्तर देखकर ही उस पर लदे माल की तादाद, अनुज्ञा आदि के बारे में पूछताछ कर ही अपनी ‘चौथ‘ के रेट तय करते हैं।

इतना ही नहीं जब हर बार माल की लदाई के साथ ही इसकी सूचना जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को लिखित तौर पर भेज दी जाती है तो फिर क्या वजह है कि अधिकारियों द्वारा इन वाहनों का भौतिक सत्यापन कराना भी जरूरी नहीं समझा। इस तरह के संवेदनशील मामलों को धौलपुर के जिलाधिकारी और जिला पुलिस अधीक्षक ने बहुत ही हल्के रूप में लिया है, जिसकी निंदा से काम नहीं चलने वाला, इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की आवश्यक्ता है।

यहां उल्लेखनीय होगा कि लगभग सोलह साल पहले 1994 में विस्फोटकों के पड़ोसी देश बंग्लादेश भेजने, दो वर्ष पूर्व हैदराबाद, सायबर सिटी बैंग्लुरू और सूरत में हुए बम विस्फोटों में यह तथ्य कमोबेश स्थापित हो चुका था कि इनमें प्रयुक्त विस्फोटक आरईसीएल के ही थे, फिर प्रशासन ने इस मामले को बहुत ही सतही तौर पर लिया।

इस मामले में अनेक लचीले पेंच उभरकर सामने आ रहे हैं। बारूद निर्माता आरईसीएल के महाप्रबंधक वाई.सी.उपाध्याय का कहना है कि उनका काम विस्फोटक बेचना है, खरीददार उसका क्या करता है इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं है। इसका मतलब यह है कि अगर आतंकवादी आकर उनसे माल खरीदे तो वे देश की कीमत पर उसे भी माल बेचने से गुरेज नहीं करेंगे। उपाध्याय यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि जिन्हें माल बेचा गया उनका लाईसेंस समाप्त हो गया था। सवाल यह उठता है कि लाईसेंस समाप्त होने पर नवीनीकरण न होने या नवीनीकरण होने की प्रत्याशा में क्या बारूद बेचा जाना युक्तिसंगत माना जाएगा?

लाईसेंस नवीनीकरण की पद्धति बहुत ही उलझी हुई है। अनुज्ञा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी कंपनी द्वारा संबंधित उपभोक्ता को तब तक माल बेच सकती है जब तक कि उसकी अनुज्ञा निरस्त होने की सूचना कंपनी को न मिल जाए। देखा जाए तो कंपनी को हर बार कंसाईंमेंट जारी करने के पहले लाईसेंस की मूल प्रति देखने के साथ ही साथ प्रमाणित छाया प्रति भी अपने पास रखना चाहिए। अगर किसी की अनुज्ञा को आगे नहीं बढ़ाया गया है तो उसकी आपूर्ति को तत्काल प्रभाव से रोक ही दिया जाना चाहिए।

किस वाहन में कितना माल कहां के लिए रवाना किया गया, रास्ते में कहां कितना माल उतारा गया, इस मामले से न तो विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय को ही कोई लेना देना है और न ही आरईसीएल कंपनी को। कंपनी का काम विस्फोटक बेचना और नियंत्रक कार्यालय का काम सिर्फ कागज पत्तर दुरूस्त कर रखना ही लगता है। जिस डीलर या उपभोक्ता के पास अनुज्ञा है उसे कितना माल बेचा गया है, इसका भौतिक सत्यापन विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय द्वारा किया ही नहीं जाता है।

यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में विस्फोटक गया कहां? विस्फोटक का उपयोग क्या क्या हो सकता है। इस विस्फोटक के पहले दुरूपयोग के बारे में यही कहा जा सकता है कि इसे देश में अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों के हाथों बेच दिया गया हो, या उनके द्वारा लूट लिया गया हो। इस विस्फोटक का उपयोग नक्सलवादी, अलगाववादी, आतंकवादी, उग्रवादी, माओवादी आदि द्वारा गलत तौर पर किया जा सकता है।

दूसरी आशंका यह भी जताई जा रही है कि विस्फोटक को सड़क, बांध आदि निर्माण में लगी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया हो, जिससे वे कम लागत में ज्यादा लाभ कमाने के लिए अवैध खनन के तौर पर प्रयोग कर सकती हैं। देश भर में सक्रिय खनन माफिया जिससे कि सफेदपोश, जनसेवक, खद्दरधारी और नौकरशाह प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं के द्वारा इसका प्रयोग किया जा सकता है।

कुल मिलाकर 164 ट्रक में 872 टन बारूद गायब हुए दो माह से अधिक समय बीत चुका है पर न तो राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा की सरकारों के माथे पर पसीना छलका है और न ही आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, माओवाद, नक्लवाद आदि के लिए संजीदा होने का प्रहसन करने वाले कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की पेशानी पर ही चिंता की लकीरें उभरी हैं! उभरें भी आखिर क्यों? इससे जनसेवकों को क्या लेना देना, जान पर तो आवाम ए हिन्द की बन आना है, जनसेवक तो सुरक्षा घेरे में महफूज ही रहने वाले हैं।

सीबीएसई बोर्ड की तथा कथा

सीबीएसई मान्यता मिली नहीं, ख्वाब हैं इंजीनियरिंग कालेज के!

सिवनी 03 दिसंबर। भगवान शिव की नगरी में संचालित होने वाले शिक्षण संस्थाओं में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की मान्यता को लेकर भ्रम की स्थिति बनी ही हुई है। किसे सीबीएसई बोर्ड ने अपनी मान्यता दी है, किसे नहीं यह बात आज भी साफ नहीं हो सकी है, और न ही मध्य प्रदेश सरकार के शिक्षा महकमे के जिला स्तर पर सर्वोच्च कमांडिंग आफीसर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा ही इस बारे में स्थिति स्पष्ट करना ही श्रेष्यस्कर समझा है।

जिला शिक्षा अधिकारी के मौन रवैए से नवमी, से लेकर बारहवीं के विद्यार्थियों के पालकों में मानस पटल पर छाए संशय के बादल छटने के बजाए घुमड़ने आरंभ हो गए हैं। जैसे जैसे नवमी कक्षा में सीबीएसई के एनरोलमेंट की तारीख पास आती जा रही है, वैसे वैसे विद्यार्थियों के पालकों के हृदय की धड़कने तेज होना आरंभ हो गई हैं।

पालकों के मन में यह बात अब भी घूम रही है, कि उनके आखों के तारे आखिर सीबीएसई बोर्ड के अधीन शिक्षा दीक्षा ग्रहण कर परीक्षा देंगे अथवा उन्हें मध्य प्रदेश बोर्ड के तहत परीक्षा देने पर मजबूर किया जाएगा? गौरतलब है कि दसवीं बोर्ड कक्षा के लिए नामांकन एक साल पूर्व अर्थात नवमीं कक्षा में ही करवा दिया जाता है। बोर्ड के पास चूंकि विद्यार्थियों की तादाद बहुत ज्यादा होती है अतः बोर्ड द्वारा एक साल की अवधि में इन्हें व्यवस्थित करने की गरज से ही नवमीं में इनका एनरोलमेंट किया जाता है।

नगर में संचालित होने वाली अनेक शालाओं द्वारा अपने यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों को आश्वस्त कराया गया था कि उनके आंखों के तारों को सीबीएसई बोर्ड के तहत ही परीक्षा दिलवाई जाएगी। इस हेतु सीबीएसई मान्यता की कार्यवाही उनकी शाला और सीबीएसई बोर्ड के बीच जारी है। बताया जाता है कि वर्ष 2010 - 2011 के शैक्षणिक सत्र लिए सीबीएसई बोर्ड की मान्यता संबंधी सिवनी की शालाओं के आवेदन में से अनेक शालाओं के आवेदन वांछित अर्हताएं पूरी न किए जाने पर निरस्त कर दिए गए हैं।

सीबीएसई बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों का कहना है कि इन शालाओं द्वारा एक बार फिर से शैक्षणिक सत्र 2011 - 2012 हेतु सीबीएसई बोर्ड की मान्यता के संबंध में आवेदन दिया गया है। इन शालाओं द्वारा अपने अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए मुस्तैद रहने को कहा गया है कि कभी भी सीबीएसई बोर्ड का निरीक्षण दल आ सकता है, जिसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर रखी जाएं।

सूत्रों का आगे कहना है कि अभी तक किसी भी शाला के लिए इंस्पेक्शन कमेटी (आईसी मेम्बर) का गठन नहीं किया गया है, अतः जल्द ही निरीक्षण का प्रश्न ही नहीं उठता है। सूत्रों ने कहा कि जैसे ही आईसी मेम्बरान तय कर दिए जाएंगे वैसे ही इंटरनेट पर सीबीएसई की वेब साईट पर यह प्रदर्शित कर दिया जाएगा कि किस शाला का निरीक्षण किस केंद्रीय, जवाहर नवोदय या निजी शाला के प्राचार्य द्वारा किया जा रहा है। तब उस शाला में अध्ययनरत विद्यार्थियों के पालकों या अन्य संबंधितों द्वारा आई सी मेम्बरान के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है।

बहरहाल, जिले में निजी तौर पर चल रही एक शाला जिसे अभी सीबीएसई बोर्ड की मान्यता नहीं मिली सकी है, के द्वारा सिवनी में इंजीनियरिंग कालेज खोलने की कवायद करने की सुगबुगाहट भी मिल रही है। गौरतलब है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में प्रदेश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुल इंजीनियरिंग कालेज की सफलता के परचम को देखकर लोग इसके दीवाने होते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में उक्त शाला के संचालकों द्वारा सीबीएसई बोर्ड की मान्यता को दरकिनार कर अब सिवनी में ही इंजीनियरिंग कालेेज खोलने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। जो शाला प्रबंधन सीबीएसई बोर्ड की मान्यता लेने में अक्षम रहा हो, वह अगर इंजीनियरिंग कालेज की नींव रखता है, तो उसकी नींव कितनी खोखली होगी इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 22

सिवनी से हो सकता है मोबाईल कंपनियांे का मोहभंग

सिवनी से गुजरने वाले फोरलेन उत्तर दक्षिण गलियारे का काम अगर पूरा नहीं किया गया तो आने वाले समय में सिवनी में बजने वाली विभिन्न सेवा प्रदाता कंपनियों के मोबाईल की घंटियां सुनाई देना बंद हो सकता है। यह एक बहुत बड़े घाटे के तोर पर फोरलेन के सिवनी से न होकर गुजरने के खामियाजे के तौर पर सामने आ सकता है। वैसे भी बीएसएनएल के अलावा अन्य सेवा प्रदाता कंपनियों ने सिवनी में इंटरनेट ब्राड बेण्ड को आरंभ कर इस सुविधा को वापस ले लिया था, जिसका कारण सिवनी से इन कंपनियों को वांछित राजस्व न मिल पाना ही बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सिवनी में मोबाईल के क्षेत्र में भी सेवा प्रदाता कंपनियों को पर्याप्त राजस्व नहीं मिल पा रहा है। चूंकि स्वर्णिम चतुर्भज और उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम गलियारे के मार्ग में पड़ने वाले स्थानों पर मोबाईल नेटवर्क देना इन कंपनियों की मजबूरी बन गई थी अतः सिवनी को इन कमोबेश हर कंपनी ने अपने नक्शे में शामिल कर लिया है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 03 सितम्बर। सिवनी वासी अवश्य ही मुगालते में होंगे कि जो भी नया मोबाईल सेवा प्रदाता बाजार में आमद दे रहा है, उसकी नजरों में सिवनी एक अच्छा बाजार बनकर उभरा है, यही कारण है कि सिवनी में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां अपनी आमद दे चुकी हैं। सिवनी में कुछ मोबाईल सेवा प्रदाताओं को अगर छोड़ दिया जाए तो कमोबेश समस्त मोबाईल सेवा प्रदाताओं के एजेंट और नेटवर्क के लिए मोबाईल टावर स्थापित हो चुके हैं।
 
इन मोबाईल सेवा प्रदाताओं में से कुछ ने बाजार की नब्ज को पहचानते हुए यहां अपना इंटरनेट कनेक्शन का जाल भी बिछाना आरंभ कर दिया था। इस मामले में सेवा प्रदाता कंपनियों ने सामान्य के साथ ही साथ तेज गति की इंटरनेट सेवा के रूप में ब्राड बेण्ड का आगाज भी कर दिया था। ब्राड बेण्ड की सेवाओं में से बीएसएनएल को छोड़कर अन्य सेवाओं ने जल्द ही दम तोड़ दिया था।
 
इसके उपरांत निजी तोर पर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों ने सिवनी से अपने अपने ब्राड बेण्ड इंटरनेट कनेक्शन को समाप्त ही कर दिया था। ब्राड बेण्ड की सेवाएं इसके उपरांत भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही जनता के बीच परोसी जा रही थीं। इंटरनेट के शौकीन लोगों की मजबूरी हो गई थी कि वे तेज गति में इंटरनेट सर्फिंग के लिए बीएसएनएल की सेवाओं को ही लें। आरोपित है कि बीएसएनएल की इंटरनेट सेवाएं हर दम बाधित ही हुआ करती हैं। कभी गति बहुत ही धीमी होती है, तो कभी सिग्नल की ही दिक्कतों से उपभोक्ताओं को दो चार होना पड़ता है।
 
निजी तौर पर सेवा प्रदान करने वाली सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी में अनेक मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने अपनी आमद इसलिए दी हैं, क्योंकि स्वर्णिम चतुष्गामी सड़क और उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम सड़क गलियारे के इर्द गिर्द उन्हें अपनी कंपनी के मोबाईल का नेटवर्क देना जरूरी हो गया है। यही कारण है कि सिवनी से होकर गुजरने वाले चतुष्गामी सड़क गलियारे के इर्दगिर्द भी मोबाईल के नेटवर्क को उपलब्ध कराने की गरज से कंपनियों ने सिवनी में अपना मोबाईल नेटवर्क का जाल बिछाया है।
 
जिस तरह से सिवनी से उत्तर दक्षिण गलियारे को अन्यत्र ले जाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में तस्वीर कुछ धुंघली अस्पष्ट किन्तु बदली बदली सी ही दिख रही है। माना जा रहा है कि अगर उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे पर से सिवनी जिले का नाम अगर मिटा दिया गया तो निजी तौर पर सेवा प्रदान करने वाली मोबाईल कंपनियांे ने जिस तरह अपने ब्राड बेण्ड कनेक्शन सिवनी से गायब कर दिए हैं, उसी तरह वे अपने नेटवर्क को भी सिवनी से उठाकर उस जगह ले जाएंगे जहां से होकर यह फोरलेन गलियारा जाएगा। उन परिस्थितियों में सेवा प्रदाता मोबाईल कंपनियों का सिवनी से मोह भंग होना स्वाभाविक ही माना जा रहा है।

कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि सिवनी में फोरलेन गलियारे के निर्माण में फंसे पेंच की आहट सुनने के उपरांत निजी तौर पर इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों ने अपनी अपनी ब्राडबेण्ड सेवाएं यहां से हटा ली थीं। इस मामले में सच्चाई कितनी है, यह तो सेवा प्रदाता कंपनी जाने किन्तु यह सच है कि सिवनी में ब्राड बेण्ड इंटरनेट कनेक्शन सिर्फ और सिर्फ भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही परोसा जा रहा है।

एनएचएआई के नक्‍शे से सिवनी गायब

उत्तर दक्षिण गलियारे की बाधाएं हटें: राजेंद्र गुप्त

गुजरात के सूरज को पश्चिम बंगाल के कोलकाता से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 6 को चतुष्मार्गी मार्ग के रूप में विस्तारित किया जा रहा हैं । यह मार्ग नागझिरा एवं नवेगांव बाघ प्राणी उद्यान भंडारा जिले में बैनगंगा नदी के पुल से छत्तीसगढ़ की सीमा तक के 80 किलोमीटर के अतिसंवेदनशील क्षेत्र से गुजर रहा हैं । इस मार्ग के कारण बाघ सहित अन्य वन्य जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुये वन्य एवं पर्यावरण प्रेमियों की आपत्ति पर इस मार्ग का काम रोक दिया गया था व इस मार्ग पर संकट के बादल मंडराने लगे थें ।
 
इस विवाद को हल करने के लिये एन0एच0ए0आई0 द्वारा रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक आर0आर0 इंदुरकर को नियुक्त किया गया । उन्होंने एन0एच0ए0आई0 एवं वन अधिकारियों से चर्चा कर अपनी रिपोर्ट में वन्य प्राणियों एवं पर्यावरण की सुरक्षा के लिये कई महत्वपूर्ण सुझाव दियें । 

एन0एच0ए0आई0 द्वारा उनके सुझावों को मानकर मामला वन विभाग को सौंप दिया गया । इन सुझावों के अनुसार 80 किलोमीटर के इस अतिसंवदेनशील क्षेत्र में इस मार्ग पर वन्य प्राणियों के लिये 3 करोड़ 60 लाख रूपयें की लागत से आठ भूमिगत मार्ग बनेंगें ताकि वन्य प्राणी बिना सड़क पर आए इन भूमिगत मार्गो से दूसरी ओर निकल जायें । 1 करोड़ 20 लाख की लागत से चालीस किलोमीटर पर लंबी बाड़ (फैंसिंग) की जायेंगी, साथ ही वन्य प्राणियों के लिये 10 बचाव द्वार, 10 रैम्प, मवेशियों को रोकने के लिये 14 पिंजड़े एवं वाहन चालको की सुविधा के लिये 18 साइन बोर्ड बनाने होंगें । उक्त कार्य एन0एच0ए0आई0 को करना होगा और इस पर लगभग 4 करोड़ 90 लाख रूपयें खर्च होगें । इन सुझावों को मानकर एन0एच0ए0आई0 ने राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 के न केवल विस्तारीकरण का मार्ग प्रशस्त किया हैं वरन् वन्य जीवों एवं प्राणियों के सुरक्षित आवागमन हेतु भूमिगत मार्ग बनाने के साथ ही उनके लिये पानी की पर्याप्त व्यवस्था करने पर भी सहमत हो गया हैं ।
 
ठीक यही स्थिति राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 7 जो कि काश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ता हैं के अंतर्गत बनने वाले चतुष्मार्गी मार्ग को सिवनी से नागपुर के बीच स्थित पेंच टाईगर रिजर्व के कारण रोक दिया गया है । जब एन0एच0ए0आई0 और वनविभाग राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 6 के अंतर्गत रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक आर0आर0 इंदुरकर के सुझावों को मानकर वन्य प्राणियों के सुरक्षित आवागमन के लिये भूमिगत मार्ग बनाने व पर्याप्त पानी की व्यवस्था करने हेतु सहमत होकर राष्ट्रीय राजमार्ग 6 की बाधाओं को दूर कर सकतेे हैं, तो उन्हें म0प्र0 के सिवनी जिले में स्थित पेंच टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणियों एवं जीवों की सुरक्षा व सुरक्षित आवागमन हेतु भूमिगम मार्ग व पर्याप्त पानी की व्यवस्था कर इस मार्ग में आ रही बाधाओं को शीघ्रातीशीघ्र हल कर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र0 7 के विस्तारीकरण का मार्ग भी प्रशस्त करना चाहियें ।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

थ्री जी के पहले प्रस्तावित थी नंबर पोर्टेबिलिटी

तारीख पर तारीख ही मिल रही है एमएनपी में
 
कब स्वतंत्र होगा मोबाईल उपभोक्ता अपने आपरेटर को बदलने
 
ट्राई और सरकार के बीच रस्साकशी का आनंद ले रहे हैं आपरेटर
 
एमएनपी के मामले में अभी दिल्ली दूर है
 
(लिमटी खरे)

खराब सेवा प्रदाता मोबाईल कंपनियों के नंबर दूसरे अच्छे सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ अदला बदली के मामले में केंद्र सरकार और दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) के बीच चल रही तनातनी का नतीजा है कि अब तक मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को हरी झंडी नहीं दिखाई जा सकी है। बार बार तारीख पर तारीख देने के उपरांत भी एमएनपी में विलंब को कांग्रेस नीत केंद्र में बैठी भारत सरकार की सबसे बड़ी विफलता ही माना सकता है। वैसे तो अनेक एसे मोर्चे हैं जिन पर भारत सरकार ने विफलता के नए आयामों को छुआ है किन्तु मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ्य के बाद एमएनपी एक एसा मसला है जो आज देश के कमोबेश हर आदमी से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
 
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा एमएनपी के मसले को अनेकों बार टाला जा चुका है। यह क्यों हो रहा है? किसके दबाव में हो रहा है? इसके पीछे किसको प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ पहुंचाने की जनसेवकों की मंशा है, यह तो केंद्र सरकार ही जाने पर 31 दिसंबर 2009 के पहले दो मर्तबा एमएनपी की तारीख देकर उसे टाला गया था। अंत में 31 दिसंबर 2009 को डेड लाईन बना दिया गया था।
 
इसके उपरांत केंद्र सरकार ने मोबाईल पोर्टेबिलिटी को लागू करने की तारीख बढ़ाकर इस साल मई के पहले सप्ताह तक कर दी गई थी। यह तिथि गुजरने के बाद एक बार फिर 30 जून तक के लिए समयावधि बढ़ा दी गई थी। इस साल अप्रेल के पहले सप्ताह में ट्राई द्वारा कहा गया था कि वह एमएनपी में हो रहे अनावश्यक विलंब को लेकर चिंतित है, और जल्द ही दूरसंचार विभाग को इस संबंध में पत्र लिखने जा रहा है।
 
ट्राई द्वारा एमएनपी सेवाओं में बार बार हो रहे विलंब के कारणों का पता लगाने के लिए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखकर पता करने की बात कही गई थी कि आखिर क्या वजह है कि इस सुविधा को लागू नहीं किया जा पा रहा है। इससे पहले अप्रेल में ही दूरसंचार विभाग द्वारा कहा गया था कि वह इस मसले को निजी सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ होने वाली बैठक में भी उठाने जा रहा है।
 
शुरूआती दौर में सरकारी कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल द्वारा ही इस संबंध में आवश्यक तकनीकी तैयारियां विशेषकर एमएनपी गेटवे की स्थापना ही नहीं किया जा सका था। पिछले माह में जब तीसरी पीढ़ी के मोबाईल यानी 3 जी की सेवाएं आरंभ कराने की बात सामने आई थी, तब सरकार द्वारा दूरसंचार कंपनियों के सामने यह शर्त रख दी थी कि दूरसंचार कंपनियों को किसी भी तरह की नई सेवा आरंभ करने के पहले मोबाईल नंबर पोर्टेबिलिटी को आरंभ करना आवश्यक होगा। सरकार की इस कड़ी शर्त के आगे निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां झुकती नजर आ रही थीं।

सरकार ने इसके साथ ही निजी सेवा प्रदाता कंपनियों से कहा था कि वे एमएनपी को अक्टूबर माह में आरंभ करवा दें। विडम्बना यह है कि बीएसएनएल और एमटीएनएल ने तो 3 जी सेवाओं को आम उपभोक्ताओं के लिए लागू कर दिया है, पर उसे अपनी एमएनपी की शर्त के बारे में शायद याद नहीं रहा। अगर सरकार को अपनी कड़ी शर्त के बारे में याद होता तो निश्चित तौर पर 3 जी सुविधाएं लांच करने के पहले सरकारी कंपनियों द्वारा एमएनपी को अमली जामा अवश्य ही पहनाया होता।
 
सरकारी और निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को संभवतः यह भय सता रहा है कि अगर एमएनपी को लागू कर दिया गया तो खराब नेटवर्क, काल ड्राप, मनमाना बिल, छिपी हुई शर्तों आदि से आजिज आ चुके उपभोक्ता किसी अन्य सेवा प्रदाता की शरण में न चले जाएं। अगर एसा होगा तो उनके राजस्व में जबर्दस्त कमी दर्ज की जा सकती है। अभी वर्तमान नियम कायदों को देखकर यह कहा जा सकता है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी चाहे सरकारी क्षेत्र की हो या निजी क्षेत्र की हर किसी का एकाधिकार मोबाईल सेक्टर पर दिख रहा है। एमएनपी के लागू होने के बाद कंपनियों का एकाधिकार पूरी तरह से समाप्त होने की उम्मीद है। इसके उपरांत बाजार में वही कंपनी टिक पाएगी जिसकी शर्तें साफ हों, और नेटवर्क तथा सुविधाएं जनता को पसंद आएंगी।
 
दरअसल एमएनपी की कल्पना एमएनपी गेटवे तकनीक के बिना किया जाना संभव ही नहीं है। कुछ कंपनियां जहां इस तकनीक के लिए वांछित उपकरणों के लिए आपूर्ति का इंतजार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ कंपनियां इसकी खरीददारी के लिए आदेश देने की गरज से सुरक्षा इजाजत की बाट जोह रही हैं। कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने की स्थिति में कतई नहीं दिख रही हैं। सरकार का यह मानना है कि जो कंपनियां इस सेवा को आरंभ करने में विलंब का दोषी पाई जाएंगी, उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी।

कुल मिलाकर मोबाईल नंबर स्थाई रखकर अपने सेवा प्रदाता की सेवाएं बदलने वाली योजना एमएनपी में बार बार तारीख पर तारीख मिलने से साफ होने लगा है कि निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां इसके लिए क्लीन हेण्ड से आगे आने को तैयार कतई नहीं है। साथ ही साथ सरकार भी यह नहीं चाह रही है कि इन सेवा प्रदाता कंपनियों की इस मामले में मश्कें कसी जाएं। सरकार पर किस बात का दबाव है, यह बात तो सरकार ही बेहतर जान समझ सकती है, किन्तु एमएनपी में तारीख पर तारीख से मरण अंतत्तोगत्वा उपभोक्ता की ही हो रही है।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 21

क्यों बढ़ा मोबाईल कंपनियों का सिवनी के प्रति आकर्षण
मोबाईल के क्षेत्र में सिवनी जिले में रिलायंस, बीएसएनएल दो ही कंपनियों ने मुख्य तौर पर अपना नेटवर्क स्थापित किया था। इनमें से भारत संचार निगम लिमिटेड का नेटवर्क हर जगह मिलने के चलते सिवनी को इसके नक्शे में स्थान मिला था। 2003 के उपरांत सिवनी जिले में अचानक ही निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों की बाढ़ सी आ गई। सिवनी वासी हतप्रभ थे कि मोबाईल कंपनियों को सिवनी में एसा क्या पोटेंशियल दिखा कि उन्होंने अपना नेटवर्क यहां स्थापित कर लिया। दरअसल निजी कंपनियों को उत्तर दक्षिण गलियारे में हर स्थान पर मोबाईल का नेटवर्क अपने उपभोक्ताओं को प्रदान करना था, इसीलिए सिवनी में भी अनेक कंपनियों ने अपने अपने स्टाकिस्ट भी बना दिए।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 02 सितम्बर। आज सिवनी जिले में देश की शायद ही कोई एसी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी हो जिसका नेटवर्क न मिल रहा हो। कल तक बीएसएनएल की सिम लेने के लिए मारामारी के लिए मशहूर सिवनी में अब चाहे जिस कंपनी की सिम आसानी से उपलब्ध हो पा रही है। सिवनीवासी आश्चर्यचकित थे कि देश की नामी गिरामी कंपनियों को आखिर सिवनी जिले में एसा क्या दिखा कि सेवा प्रदाता कंपनियों ने अपना गढ सिवनी को बना लिया। सिवनी में उपभोक्ताओं की तादाद देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि सिवनी में नेटवर्क स्थापित करना इन कंपनियों के लिए कहीं से कहीं तक फायदे का सौदा साबित हो।
 
इक्कीसवीं सदी के आरंभ में जैसे ही बीएसएनएल ने सिवनी में अपना मोबाईल नेटवर्क आरंभ किया तब सिवनी में बीएसएनएल की सिम प्राप्त करना अपने आप में एक स्टेटस सिंबाल बन गया था। इसका कारण यह था कि उस समय मोबाईल फोन को विलासिता की श्रेणी में रखा गया था। उस दौरान मोबाईल के हेण्ड सेट भी आज की तुलना बहुत ही अधिक मंहगे हुआ करते थे। 2003 के उपरांत सिवनी में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने न केवल यहां मजबूत नेटवर्क के लिए अपने मोबाईल टावर ही स्थापित किए, वरन यहां सिम की बिकावली के लिए अपने अपने स्टाकिस्ट या एजेंट भी नियुक्त कर दिए।
 
शुरूआती दौर में तो लोगों को भ्रम रहा कि निजी तौर पर मोबाईल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को लग रहा था कि सिवनी से उन्हें खासा राजस्व मिल पाएगा जिसके चलते सिवनी में अनेक कंपनियों ने अपनी सेवाएं आरंभ कर दी हैं। शनैः शनैः यह बात साफ होने लगी कि सिवनी से होकर गुजरने वाले उत्तर दक्षिण चतुष्गामी सड़क मार्ग के चलते ही यहां अनेक मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियांे ने अपनी आमद दी है।
 
बताया जाता है कि उत्तर दक्षिण चतुष्गामी सड़क मार्ग के सिवनी से होकर गुजरने के कारण ही सिवनी में इन कंपनियों ने अपनी नजरें इनायत की थीं। दरअसल मोबाईल कंपनियां चाह रही थीं कि स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग नार्थ साउथ और ईस्ट वेस्ट कारीडोर पर मोबाईल धारकों को मोबाईल सेवा निर्बाध तौर पर मिलती रहे। यही कारण है कि मार्ग में पड़ने वाले हर जिले, तहसील, विकासखण्ड, या कस्बे में मोबाईल की रिंगटोन बजना आरंभ हो गई थी।
 
सिवनी में भी कमोबेश यही हुआ। निजी तोर पर सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों द्वारा यहां नेटवर्क हेतु अपने मोबाईल टावर्स स्थापित करना आरंभ कर दिया। इन सभी का मुकाबला भारत सरकार के उपक्रम भारत संचार निगम लिमिटेड से था, अतः इन्होंने अपने अपने बीटीएस को अधिक शक्तिशाली बनाना आरंभ किया। वरना सिवनी में मोबाईल के उपभोक्ताओं से अर्जित राजस्व इन कंपनियों के खर्चों की तुलना में उंट के मुंह में जीरे के समान ही था।

बताया जाता है कि कंपनियों को यह भय भी सता रहा था कि अगर उन्होने सड़क मार्ग मेें अपना नेटवर्क कमजोर दिया या नहीं दिया तो आने वाले समय में उसके उपभोक्ता किसी अन्य मोबाईल सेवा प्रदाता की सेवाएं लेना आरंभ न कर दे। इसलिए घाटे का सौदा होने के बावजूद भी कंपनियों ने सिवनी में अपनी सेवाएं व्यापक स्तर पर देना आरंभ कर दिया था, जो अब तक जारी है। सिवनी जिले में भले ही लखनादौन से खवासा तक सड़क मार्ग में सभी कंपनियों की घंटियां घनघना रही हों पर जरूरी नहीं है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों में भी उनकी आवाज सुनाई दे रही हो।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

22-23 अक्टूबर को खजुराहो में ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट में भाग लेने का आग्रह


उद्योगपतियांे से मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिए मंत्री श्री विजयवर्गीय का आमंत्रण

नई दिल्ली, 1 सितम्बर 2010 मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय ने आज यहां नई दिल्ली में पीएचडी हाउस में आयोजित उद्योगपतियों के सम्मेलन में उद्योगपतियों को प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित किया। श्री विजयवर्गीय ने बताया कि उद्योगों को 24 घंटे बिजली और पानी दिया जा रहा है। प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए सड़कों सहित अधोसंरचना का तेजी से विकास किया गया है। अब प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण है। 

श्री विजयवर्गीय ने उद्योगपतियों से कहा कि 6 वर्ष पहले अधोसंरचना के अभाव में उद्योगों को आमंत्रित करने में संकोच होता था।  अब सड़कों सहित सभी सुविधायें उपलब्ध कराने के कारण हमारे पास उद्योग लगाने के लिए सभी मूलभूत सुविधाओं सहित बहुत कुछ है। हर जिले में उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन चिन्हित कर लैंड बैंक बनाये गये हैं। प्रदेश में कुशल एवं अकुशल मानव संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। प्रदेश में उद्योग लगाने की अपार संभावनाओं के लिए प्रचुर मात्रा में खनिज साधन, प्राकृतिक संसाधन और खाद्य प्रसंस्करण के लिए फल एवं सब्जियां उपलब्ध हैं। कानून एवं व्यवस्था बहुत अच्छी होने के कारण पूंजी निवेश के लिए अच्छा वातावरण है। श्रमिक शांति भी पूरे देश में सबसे अच्छी है। राज्य में डाकूओं की फिल्में बनती थीं किन्तु अब प्रदेश में एक भी डाकू नहीं है। प्रदेश की पारदर्शी उद्योग नीति में मेगा प्रोजेक्ट स्थापित करने के लिए विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं। नागपुरी संतरे के नाम से बिकने वाला 80 प्रतिशत संतरा तथा भुसावली केले के नाम से बिकने वाला 80 प्रतिशत केला मध्यप्रदेश में पैदा होता है। धनिया और मिर्ची मध्यप्रदेश की श्रेष्ठ गुणवत्ता की है। सोयाबीन मध्यप्रदेश में सर्वाधिक पैदा होता है। प्रदेश के गेहूं की क्वालिटी भी देश में सर्वश्रेष्ठ है। इन सभी अनुकूल परिस्थितियों में मध्यप्रदेश में पूंजी निवेश में अपार संभावनाएं हैं। श्री विजयवर्गीय ने उद्योगपतियों से खजुराहो में 22 और 23 अक्टूबर को ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट में सम्मिलित होने का आग्रह किया। 

प्रारम्भ में पीएचडी चैम्बर ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के वाइस प्रेसीडेंट श्री सलिल भंडारी और पीएचडी के एम.पी. कमेटी के चेयरमेन श्री अनिल अग्रवाल ने उद्योगपतियों की ओर श्री विजयवर्गीय का स्वागत किया। श्री सलिल भंडारी ने इस अवसर पर उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती जमीन, प्राकृतिक संसाधन और  कुशल मानव संसाधन की उपलब्धता के कारण मध्यप्रदेश उद्योगों की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। मध्यप्रदेश की सरकार उद्योग मित्र होने के कारण हमेशा सहयोग करती है। प्रदेश की औद्योगिक नीति भी उद्योगों के अनुकूल है। श्री भंडारी ने कहा कि अगर अभी प्रदेश में उद्योग लगाने में पीछे रह गये तो आगे आने वाले समय में मध्यप्रदेश में उद्योग लगाने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

प्रारम्भ में प्रमुख सचिव श्री पी.के. दास और मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक श्री अनिल जैन ने उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिए प्रदेश में दी जा रही सुविधाओं की जानकारी दी। इस अवसर पर अनेक उद्योगपतियों ने उद्योग लगाने के संबंध में जानकारी चाही। इस सम्मेलन में जे.के. टायर की ओर से श्री मनोज मुदानी, साइबर मीडिया उद्योग के श्री राज पाठक,उद्योगपति श्री आशीष विज, श्री हरीश चावला, ओमेक्स ग्रुप की ओर से श्री के.सी. चावला, इंटरकान्टीनेन्टल कन्सलटेन्ट की ओर से श्री एम.एस. बालकृष्णनन, आई.सी. आर. ए. उद्योग के श्री राशि ग्रोवर, एसाराम बिजनेस ग्रुप की ओर से श्री एस.के. नेमानी सहित लगभग 50 उद्योगपति उपस्थित थे।

गरीबों के मुंह से निवाला छीनने पर आमदा क्यों है कांग्रेस

मत भूलिए! न्याय पालिका सर्वोच्च है पवार साहेब
 
आईसीसी के साथ गरीब गुरबों की तरफ भी देखें कृषि मंत्री
 
अनाज सडता है सडता रहे पर गरीबों में नहीं बटेगा!
 
संसद को बनना था जनता की आवाज, पर अदालत में उठी हक की आवाज
 
(लिमटी खरे)

हर साल लाखों टन अनाज सड़ता रहता है, और हर साल करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में रहते हैं! ये दो तस्वीरें हैं भारत गणराज्य की जिसे ब्रितानियों की गुलामी से मुक्ति मिले छः दशक से ज्यादा समय हो चुका है। साठ साल की उमर में सरकार भी अपने कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। माना जाता है कि साठ साल की उमर में आदमी अपनी सारी अभिलाषाएं लगभग पूरी कर चुकता है। भारत का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि साठ सालों के बीतने के बाद भी भारत में बुनियादी समस्याएं न केवल जस की तस बनी हुई हैं, वरन बढ़ी ही हैं।
 
देश में लाखों टन अनाज सड़ने की बात पर भारत की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर सरकार अनाज को ठीक तरीके से संरक्षित नहीं कर सकती है तो वह उसे गरीब और भुखमरी के शिकार लोगों के बीच बटवा दे। कृषि प्रधान भारत देश में वैसे भी अनाज सड़ने या खराब होकर फेंके जाने को सबसे बड़ी बुराई के तौर पर देखा जाता है।
 
इधर अनाज के सड़ने की खबर से देश की सबसे बड़ी अदालत का आक्रोश लोगों को दिखा वहीं सियासत के धनी केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने मीडिया को ही इसके लिए दोषी बताकर कह दिया कि खाद्यान्न सड़ने की खबरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। शरद पवार का कथन और राज्य सभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो.के.वी.थामस के दिए वक्तव्य में असमानता ही दिख रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री का कहना था कि भले ही बर्बाद हो जाए अनाज पर गरीबों के मुफ्त में इसे नहीं बांटा जा सकता है। खुद कृषि मंत्री ने पिछले महीने ही लोकसभा में जानकारी दी थी कि 6 करोड़ 86 लाख रूपए मूल्य का 11 हजार 700 टन अनाज बर्बाद हो गया।
 
देश का कृषि मंत्रालय निर्दलीय पी.राजीव और के.एन.बालगोपाल के पूछे प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहता है कि देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। 01 जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया। पिछले साल 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ था। 2008 - 2009 में 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल बरबाद हुआ था। वर्ष 2007 - 2008 में 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह देखा जाए तो तीन सालों में देश के एफसीआई के गोदाम कुल 3881 टन गेंहू और 55 हजार 458 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह इस साल 01 जुलाई तक के खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार सालांे में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज बरबाद हुआ है।
 
शीर्ष अदालत की टिप्पणी के बाद शरद पवार ने उसे कोर्ट की सलाह मानकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इससे नाराज अदालत ने साफ किया है कि उन्होंने अनाज के बारे में सरकार को सलाह नहीं दी है, यह कोर्ट का आदेश है। शरद पवार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत गणराज्य में न्यायपालिका को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हर देशवासी का यह नैतिक दायित्व है कि वह अदालत के हर फैसले का पूरा पूरा सम्मान करे।
 
गत दिवस सदन में इस मामले को लेकर गर्मा गरम बहस भी छेड दी गई थी। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेकर सरकार से स्पष्टीकरण तक मांग डाला। सदन में शरद पवार का यह वक्तव्य बचकाना ही माना जाएगा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति हासिल करने का प्रयास कर रही है, इसके बाद कोर्ट की मंशा के अनुरूप ही सरकार द्वारा कदम उठाए जाएंगे। गौरतलब है कि कोर्ट ने अतिरिक्त सालीसिटर जनरल की उपस्थिति में ही सरकार की मश्कें कसीं थीं। सरकार की ओर से खड़े एडीशनल सालीसिटर जनरल चाहते तो तत्काल ही उन्हें कोर्ट के आदेश की प्रति उपलब्ध हो जाती।
 
देखा जाए तो आजाद भारत में जनता की आवाज, संसद या विधानसभा को बनना चाहिए, किन्तु विडम्बना यह है कि ये दोनों ही अपने दायित्वों के निर्वहन में अक्षम ही प्रतीत हो रही हैं, इसका कारण इनमें बैठे जनता के प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर चुने गए नुमाईंदों की बदलती प्राथमिकताएं हैं। जनता अपना अमूल्य वोट देकर जिन्हें चुनती है, जनता को चुनाव के वक्त लोक लुभावने वायदों से पाट देते हैं, वे ही नुमाईंदे जीतने के बाद जनता के द्वारा दिए जनादेश को सबसे पहले ही भूलकर अपने निहत स्वार्थों को प्राथमिकता बना लेते हैं।
 
सत्तर के दशक तक जनता के दुख दर्द के लिए सदन के किसी कोने में हमदर्दी और संवेदनशीलता दिखाई पड़ती थी, किन्तु अब तो सदन में बैठे जनता के नुमाईंदे पूरी तरह निष्ठुर ही नजर आ रहे हैं। देश की शीर्ष अदालत के फैसले को केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने जिस तरह हवा में उड़ा दिया और बाकी सांसद चुप्पी साधे बैठे रहे उससे इन सभी की जनता के प्रति संवदेनहीनता साफ साफ दिखाई पड़ी। होना यह चाहिए था कि जनता के चुने हुए नुमाईंदों को शरद पवार के केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए सड़े अनाज का ब्योरा मांगना चाहिए था। दरअसल शरद पवार की प्राथमिकता देश की सेवा से ज्यादा क्रिकेट की सेवा की बन चुकी है। पिछले कई सालों से पवार ने अपना पूरा पूरा ध्यान देश की बजाए क्रिकेट में लगाया हुआ है।
 
हाल ही में शरद पवार ने प्रधानमंत्री से कहा भी था कि उनका बोझ कुछ कम किया जाए, इसके पीछे यही कारण नजर आ रहा था कि पवार को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया था। आईसीसी एक मलाईदार संस्था है, इसके अध्यक्ष बनने पर शरद पवार को मान सम्मान, धन और रूतबे की कमी कतई नहीं रहती किन्तु लाल बत्ती का प्रेम उनसे शायद छोड़ा नहीं जा रहा है। यही कारण है कि वे चाहते हैं कि उन्हें एकाध महत्वहीन विभाग की जवाबदारी सौंप दी जाए ताकि वे मंत्री पद की सुविधाएं और सम्मान पृथक से पाते रहें।
 
आजाद भारत में इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि आधी सदी से ज्यादा देश पर शासन करने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को ‘‘विदेशी मूल‘‘ का कहने वाले शरद पवार ने कांग्रेस से हटकर अपनी एक नई पार्टी बनाई और सत्ता की मलाई खाने के लिए उसी कांग्रेस को अपने सामने घुटनों पर बैठने पर विवश किया। अब पवार सरेआम अपना मंत्रालय बदलने और मंत्रालय न बदल पाने की स्थिति में शीर्ष अदालत के फैसले को सलाह का रूप देने पर तुले हुए हैं। क्या यह कांग्रेस की भद्द पिटवाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
 
बहरहाल अब शरद पवार के कांधों पर इंटरनेशलन क्रिकेट की कमान आ गई है। पवार के कांधे वैसे भी अब तक देश के लगभग सवा सौ करोड़ लोगों का बोझ उठाकर थक चुके होंगे अतः उन्हें आराम की दरकार है। कांग्रेस को चाहिए कि पवार जैसे मंझे हुए राजनेता को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाए ताकि वे इंटरनेशनल लेबल पर करिश्मा दिखा सकें। वैसे भी अब तक पवार की प्राथमिकता की सूची में देश के गरीब गुरबे रहे ही कहां हैं।
 
शरद पवार के गृह राज्य में गरीब किसान एक के बाद एक आत्महत्या करते रहे, सूबे में उनकी और कांग्रेस की जुगल बंदी की सरकार रही, केंद्र में वे खुद ही कृषि मंत्री हैं। इसके बावजूद सब कुछ होता रहा। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि अब तक पवार के लिए चिंता का विषय गरीब गुरबे, आत्महत्या करते किसान, भूख से मरते गरीब, आधे पेट सोते आम भारतीय कभी नहीं रहे हैं, पवार के लिए सबसे बड़ी चिंता तो विभिन्न देशों विशेषकर पाकिस्तान के बेईमान खिलाड़ियों की जांच है।

केंद्रीय स्तर पर अनाज के भंडारण के लिए वेयर हाउस बनाने हेतु न जाने कितनी सुविधा, सब्सीडी केंद्र सरकार द्वारा दी गई है। अनेक स्थानों पर वेयर हाउस आज भी कागजों पर ही बने दिखाई दे रहे हैं। नेताओं और पहुंच संपन्न लोगों ने सरकारी इमदाद का बंदरबांट तबियत से किया है। क्या केंद्र सरकार का यह दायित्व नहीं है कि सरकारी मदद से बने वेयर हाउस का मौका मुआयना कर दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराए। हर जिले में तैनात जिला कलेक्टर अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही होते हैं, जो सीधे सीधे कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) के अधीन आते हैं। केंद्र सरकार अगर चाहे तो दो माह की निश्चित समयावधि देकर जिलों के कलेक्टर्स को आदेशित कर वस्तुस्थिति का पता लगवाकर गफलत करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है। यह सब करने के लिए सरकार को अपनी मंशा साफ करके ही ‘क्लीन हेण्ड‘ से आगे आना होगा, वरना बरबादी का जो सिलसिला चल रहा है, वह कालांतर में और भयवह स्परूप में आकर जारी ही रहेगा।

700वीं पोस्ट फोरलेन विवाद का सच ------------------- 20

उसी से ठंडा उसी से गरम!

मिडिल स्कूल में अंग्रेजी की एक कहानी जिसका भावार्थ था कि मुट्ठी बंद कर फूंक मारने से ठंड के समय में गरमी किन्तु उबले आलू को ठंडा करते समय फूंक मारने से वह ठंडा हो जाता है, कमोबेश हर किसी ने पढ़ी होगी। बचपन में कोतुहल अवश्य ही हुआ करता होगा कि उसी काम को करने से चीज ठंडी हो जाती है, पर ठंड के दिनों में फूंक मारने से मुट्ठी गरम कैसे हो जाती है। उसी तर्ज पर वाईल्ड लाईफ के काल्पनिक कारीडोर को आधार बनाकर किसी एनजीओ ने सर्वोच्च न्यायालय में सिवनी खवासा से होकर जाने वाले चतुष्गामी मार्ग को रोकने की अपील दायर की है, जबकि दूसरी ओर प्रस्तावित एनएच छिंदवाड़ा सौंसर सावनेर नागपुर मार्ग को तो अस्तित्व में आने वाला सतपुड़ा टाईगर कारीडोर दो जगह बाधित कर रहा है, फिर भी सब ओर खामोशी ही पसरी नजर आ रही है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 सितम्बर। स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने का षणयंत्र किसका है इस बात से अभी तक कुहासा हट नहीं सका है। लखनादौन से सिवनी होकर नागपुर जाने वाले 1545 में शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित मार्ग का अस्तित्व मिटाने की सजिश की जा रही है। वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट नामक एक गैर सरकारी संगठन इस साजिश में एक इंस्टूमंेट की तरह सामने आया है। इस एनजीओ को सिवनी जिले से क्या बुराई है, यह बात अभी तक साफ नहीं हो सकी है।
 
बताया जाता है कि उक्त एनजीओ द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर सिवनी से खवासा के बीच सड़क मार्ग में पड़ने वाले रक्षित वन एवं पेंच नेशनल पार्क के हिस्से से सड़क न गुजारने का अनुरोध किया है। इसके उपरांत का जो घटनाक्रम प्रकाश में आया उसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की साधिकार समिति (सीईसी) ने गुपचुप तरीके से विवादित स्थलों का निरीक्षण किया। चूंकि उस समय तक चतुष्गामी सड़क के निर्माण का काम मोहगांव तक पहुंच चुका था, अतः सीईसी ने संभवतः आगे के काम को रूकवाने की गरज से तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि से इस मार्ग में पेड़ कटाई की अनुमति न देने का अनुरोध किया।
 
तत्कालीन कलेक्टर नरहरि ने सीईसी के अनुरोध को यह कहकर स्वीकार कर लिया कि इस संबंध में राज्य शासन से निर्देश प्राप्त होना अभी बाकी है, पर मोहगांव से खवासा तक वन एवं गैर वन क्षेत्र में पेड़ कटाई की पूर्व कलेक्टर द्वारा दी गई अनुमति को निरस्त कर दिया गया। प्रपत्रों में सार्वजनिक दिखने वाला यह आदेश इतने गोपनीय तरीके से जारी किया गया कि सिवनी वासियों और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले जनसेवकों को भी इसकी भनक नहीं लग पाई।
 
बताया जाता है कि मोहगांव से खवासा तक के सड़क निर्माण के काम को इसलिए रोका गया है क्योंकि यह सड़क रिजर्व फारेस्ट के साथ ही साथ पेंच और कान्हा के बीच के काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कारीडोर को बाधित कर रही है, जिससे यहां से गुजरने वाले वाहन वन्य जीवों की आजादी में खलल डालेंगे, साथ ही साथ शिकारियों के लिए वन्य जीवों का शिकार बहुत ही आसान होगा।
 
वहीं दूसरी ओर वर्ष 2009 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने मध्य प्रदेश के सतपुड़ा और पेंच नेशनल पार्क के साथ ही साथ महाराष्ट्र के मेलघाट को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर पर काम आरंभ करवा दिया गया है। इसके बन जाने से आने वाले समय में तीनों नेशनल पार्क के वन्य जीव विशेषकर बाघों का दायरा बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
 
इस मामले में सबसे हैरानी वाली बात यह सामने आ रही है कि वन्य जीवों के प्रति एकाएक हमदर्दी जताकर सिवनी के साथ अपना प्रत्यक्ष बैर दर्शाने वाले वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट की नजरें अब तक सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर पर इनायत क्यों नहीं हो सकी हैं। गौरतलब होगा कि छिंदवाड़ा से नागपुर रेलमार्ग के अमान परिवर्तन और नरसिंहपुर छिंदवाड़ा, सौंसर नागपुर मार्ग इस टाईगर कॉरीडोर को दो मर्तबा बाधित कर रहा है। एक साल से अधिक समय से चालू की गई उक्त परियोजना में अब तक उक्त पर्यावरण और वन्य जीव प्रेमी एनजीओ की चुप्पी आश्चर्य का विषय ही मानी जा रही है।
 
\उक्त एनजीओ की चुप्पी से उन अफवाहों को बल मिल रहा है, जिनमे यह कहा जा रहा है कि किसी नेता विशेष द्वारा सिवनी के नागरिकों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर उत्तर दक्षिण चतुष्गामी फोरलेन को छीनने का प्रयास किया जा रहा है। पेंच कान्हा के काल्पनिक कॉरीडोर को आधार बनाकर सिवनी से नागपुर के मार्ग का काम रोका गया है, उससे गंभीर प्रकृति तो छिंदवाड़ा जिले से होकर गुजरने वाले प्रस्तावित नरसिंहपुर छिंदवाड़ा सौंसर, सावनेर नागपुर सड़क मार्ग और छिंदवाड़ा नैनपुर के ब्राडगेज की है।
 
अगर एनजीओ ने सिर्फ सिवनी के मामले में दिलचस्पी दिखाई है तो उससे इस मामले का कुहासा कुछ साफ होने लगा है कि किसी नेता विशेष के निर्देश या इशारों पर सिवनी जिले को एनएचएआई के उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से गायब करने का प्रयास पूरी शिद्दत और गंभीरता के साथ किया जा रहा है, जिस मामले में सिवनी के नेतृत्व कर्ता या तो अनजान हैं या फिर अनजान बनने का स्वांग रच रहे हैं।

उसी फॅूक (वाईल्ड लाईफ करीडोर) से सिवनी से नागपुर के मार्ग को रोकने का जतन किया जाता है, किन्तु उसी फॅूक (सतपुड़ा टाईगर कारीडोर) के मामले में एनजीओ सहित सांसद, विधायक और अन्य नेताओं के खेमे में खामोशी पसर जाती है, तो कहा जा सकता है कि ‘‘उसी से ठंडा, उसी से गरम।‘‘

सोमवार, 30 अगस्त 2010

ममता से वसूले जाएं 11 लाख

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

ममता से वसूले जाएं 11 लाख
केंद्र में रेल मंत्री का दायित्व संभालने वाली पश्चिम बंगाल की क्षत्रप सुश्री ममता बनर्जी ने नैतिकता की सारी हदें पार कर दी हैं। उन्होंने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली को छोड़कर पश्चिम बंगाल में ज्यादा समय बिताया जा रहा है। ममता बनर्जी ने सबसे पहले तो दिल्ली से हटकर कोलकता में पदभार ग्रहण कर सुर्खियां बटोरी थीं। इसके बाद उन्होंने त्रणमूल कांग्रेस के कोटे के मंत्रियों को साफ तौर पर हिदायत दी कि वे पश्चिम बंगाल में अपना ज्यादा समय व्यतीत करें। ममता शायद भूल जातीं हैं कि पश्चिम बंगाल के साथ ही साथ देश के अन्य सूबों को भी उनकी ममता की आवश्यक्ता है, पर ममता हैं कि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के जतन में न जाने कितनी वर्जनाओं को क्षतिग्रस्त करती जा रही हैं। अब भारतीय रेल के अफसरों पर 11 लाख रूपए खर्च किए जाने की खबरें प्रकाश में आईं हैं, यह खर्च ममता के पश्चिम बंगाल में रहने के कारण उनके मातहत अफसरान को उनसे फाईल क्लियर करवाने के लिए पश्चिम बंगाल की यात्राओं पर किया गया व्यय है। सवाल यह उठता है कि आम जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को अगर इस तरह हवा में ही उड़ाया जाएगा और गरीब गुरबों की खैर ख्वाह बनने का ढोंग करने वाली कांग्रेस चुपचाप सब कुछ देखे सुने तो अपराधी किसे माना जाएगा?
अमिताभ हैं झारखण्ड के मुखबिर!
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने रूपहले पर्दे पर अपने लंबे केरियर में न जाने कितने किरदार किए होंगे, फिल्म ‘मजबूर‘ मंे उन्होंने मुखबिर का किरदार जीवंत किया था। उमरदराज हो चुके अमिताभ बच्चन अब झारखण्ड में खुफिया सेवा के ‘मुखबिर‘ की भूमिका में हैं। जी हां, यह सच है, आपको आश्चर्य हो रहा होगा। झारखण्ड के पूर्व पुलिस महानिदेशक और वर्तमान में नगर सेना के महानिदेशक वी.डी.राम ने अमिताभ बच्चन को न केवल पुलिस का मुखबिर ही बना दिया वरन उनके नाम से 21 लाख छः हजार पांच सौ रूपए की राशि का आहरण भी करवा दिया। आश्चर्य तो तब हुआ जब इक्कीस लाख रूपए की रकम को पुलिस ने मुखबिर के लिए 17 मार्च 2006 को एक ही दिन में महज दो ही रसीदें बनवाकर भुगतान करवा दिया। एक रसीद अठ्ठारह लाख रूपए तो दूसरी तीन लाख साढ़े छः हजार की है। अब तो जनता जनार्दन समझ ही सकती है कि लालू प्रसाद यादव चारा, सुखराम दूरसंचार, कामन वेल्थ का सुरेश कलमाड़ी जैसे नेता कर सकते हैं तो भला फिर नौकरशाह पीछे क्यों रहें?
समग्र स्वच्छता अभियान का जमीनी सच
केंद्र सरकार द्वारा जनता से करों के माध्यम से वसूले गए अरबों रूपए समग्र स्वच्छता अभियान में झोंक दिए जाते रहे हैं, बावजूद इसके देश में समग्र स्वच्छता अभियान परवान नहीं चढ़ सका है। यह बात हम नहीं कह रहे हैं, केंद्रीय शहरी विकास राज्यमंत्री सौगत राय ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया है कि संयुक्त राष्ट्र की जलापूर्ति और सफाई के लिए गठित संयुक्त निगरानी समिति का प्रतिवेदन कहता है कि दुनिया भर में खुले में शौच करने वालें की कुल आबादी का साढ़े उननचास फीसदी हिस्सा भारत गणराज्य में है। बिडम्बना है कि 1999 से देश में आरंभ किए गए आवास एवं शहरी गीबी उन्नमूलन मंालय एकीकृत कम लागत सफाई प्रोग्राम का क्रियान्वयन केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। अब तक खरबों रूपए से ज्यादा व्यय करने के बाद भी देश में खुले में दिशा मैदान अर्थात शौच जाने वालों की बढ़ी तादाद निश्चित तौर पर भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के लिए शर्म की बात है, किन्तु मोटी खाल ओढ़े जनसेवकों को इस बात से शर्म शायद ही आए। ग्यारह साल से चलने वाले समग्र स्वच्छता अभियान की कलई खुलने के बाद भी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार मदमस्त हाथी के मानिंद ही चल रही है।
ऑफ द रिकार्ड नेताओं की शामत आई भाजपा में
मीडिया से गलबहियां कर ऑफ द रिकार्ड बात कहकर अपनी भड़ास निकालने और दूसरों के मुसीबत बनने वाले नेताओं पर अब भारतीय जनता पार्टी के नए आलाकमान ने नजर रखना आरंभ कर दिया है। भाजपा की गत बनाने वाले इन बड़बोले नेताओं की मश्कें कसती साफ नजर आ रही हैं। अपने किसी ‘‘खासुल खास‘‘ के मशविरे पर भाजपा के निजाम नितिन गडकरी ने खुफिया विभाग के एक सेवानिवृत वरिष्ठ अधिकारी को इन नेताओं की कारगुजारियों से आवगत कराने का जिम्मा दिया है। उक्त अधिकारी की सालाना पगार बहत्तर लाख रूपए सालाना है। इतनी मोटी पगार से साफ जाहिर है कि भाजपा के सिरमोर चाहते हैं कि उनके नेतृत्व में पार्टी की बेहतर छवि जनता के सामने आए। उक्त सेवानिवृत अधिकारी आजकल भाजपा के नेशनल हेडक्वार्टर 11 अशोक रोड़ में चहलकदमी करते दिख जाते हैं। बताते हैं कि उक्त अधिकारी द्वारा अपने प्रभावों का इस्तेमाल कर बड़बोले घर के भेदी नेताओं और पत्रकारों के बीच हुई फोन या मोबाईल की चर्चा के काल डिटेल आसानी से निकलवा लिए जाते हैं, फिर उन्हें खबरों के साथ जोड़कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी जाती है गडकरी को। भाजपा के नेता भयाक्रांत ही नजर आ रहे हैं इससे। आलम यह है कि भाजपा बीट को कव्हर करने वाले पत्रकारों से इस तरह के नेताओं द्वारा पर्याप्त दूरी बनाकर रखी जा रही है।
कलमाडी ही नहीं शीला, रेड्डी, गिल भी हैं निशाने पर
कामन वेल्थ गेम्स में जनता के गाढ़े पसीने की कमाई का पैसा पानी की तरह उड़ाया जा रहा है। इसके लिए खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है। मीडिया को मैनेज कर अनेक चेहरों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। देखा जाए तो इस मामले में शीला दीक्षित को 16 हजार पांच सौ साठ करोड़ रूपए राजधानी को अपग्रेड करने के लिए दिए गए थे। शीला ने पहले भी कहा था कि समय की कमी को देखकर उनके हाथ पांव फूल रहे हैं। यमुना के साथ अक्षरधाम के करीब बने खेल गांव को खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल ने नेहरू स्टेडियम के पास लोधी रोड़ के पास बनाने का प्रस्ताव दिया था। अगर यह वहां बन जाता तो करदाताओं के पैसों में आग लगने से बच जाती। शीला के गुदड़ी के लाल संदीप दीक्षित के लोकसभा क्षेत्र को संवारने के लिए सारी बातों पर धूल डाल दी गई। इसी तरह शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी की देखरेख में लगभग अठ्ठाईस हजार करोड़ रूपए को पानी में बहा दिया गया। यह सच्चाई जनता के सामने इसलिए नहीं आ सकी क्योंकि इन सभी के मीडिया मेनेजमंेट तारीफे काबिल रहे।
मुखर्जी की मौत का दस्तावेज गायब!
भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के दस्तावेज भारत सरकार के पास हैं ही नहीं। मजे की बात तो यह है कि भारतीय जनसंघ की बैसाखियों पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में तीन बार देश पर राज किया फिर भी किसी को इस बात की सुध नहीं आई कि अपने पितृपुरूष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के बारे में मालुमात कर सकें। गौरतलब है कि मुखर्जी का निधन 55 वर्ष पूर्व काश्मीर की एक जेल में हुआ था। गृह मंत्रालय के अधिकारियों के पास भी इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है, सूचना के अधिकार में चाही गई जानकारी के जवाब में गृह मंत्रालय का कोई स्पष्ट जवाब नहीं आना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। इंडिया लीगल एड फोरम से जुडे आवेदक जयदीप मुखर्जी के सवाल का जवाब उन्हें नहीं मिल सका है। मुखर्जी ने पूछा था कि क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन से संबंधी दस्तावेज गोपनीय थे, इस बारे में भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मौन ही साधा हुआ है।
रिक्शा खीचने पर मजबूर बूढ़ी हड्डियां
पांच पांच पुत्रों के होने के बावजूद भी मुजफ्फरपुर के सकल राम को 85 साल की उमर में रिक्शा खीचना मजबूरी बन गया है, हो क्यों न? उन्हें अपना और अपनी अर्धांग्नी का पेट जो भरना है। पेट की आग बुझाने को सकल राम रोज सुबह रिक्शा लेकर सवारियों का इंतजार करते रहते हैं। कभी कभी तो यह स्थिति भी आती है कि वे अचानक ही चक्कर खाकर गिर जाते हैं। कभी कभी देखने वाले उन पर तरस खाकर वैसे ही उनकी रोजी रोटी का इंतजाम कर देते हैं, पर सकल राम चाहते हैं कि जब तक उनके शरीर में जान है तब तक वे अपनी आजीविका की व्यवस्था खुद ही करेंगे। इस मंहगाई के जमाने में भी सकल राम बस बीस तीस रूपए जमा होते ही अपने घर को लौट जाते हैं। सकल राम जैसे न जाने कितने व्यक्ति होंगे भारत में जो अपनी आजीविका के लिए दर दर भटकने पर मजबूर होंगे। भारत सरकार और सूबाई सरकारों की निराश्रित पेंशन योजना की कलई खोलने के लिए इस तरह के वाक्ये पर्याप्त माने जा सकते हैं।
अंडरवर्ल्ड की नई नामवाली!
कल तक अंडरवर्ल्ड में मुच्छड़ के नाम से पहचाना जाने वाला दाउद इब्राहिम का नया नामकरण हो गया है। पुलिस को छकाने के लिए अंडरवर्ल्ड के लोगों ने नई नामावली को अंजाम दिया है। यह बात मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच द्वारा कुछ संदिग्ध फोन और मोबाईल की टेपिंग के उपरांत सामने आई है। पुलिस के सूत्रों ने बताया कि फोन पर अपनी बात कहने और किसी को समझ न आने के डर से गुर्गांे द्वारा तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। बताया जाता है कि पुलिस वालों को पूर्व में बाबू या पांडू कहा जाता था जो अब उलिस्पा के नाम से जाना जाने लगा है। लंबी दाढ़ी के कारण दाउद को अब हाजी साहेब, बंदूक को मां तो गोलियों को चाकलेट की जगह अब बेटा, छोटा शकील को सीएसबी अर्थात छोटा शकील भाई और उसकी हेयर स्टाईल के कारण उसे पाउ टकला भी कहा जाने लगा है, नाना के नाम से जाना जाने वाला छोटा राजन को सेठ, मुखबिर को जीरो कहा जा रहा है।
दिल्ली में इंदौरी पोहा!
मूलतः मध्य प्रदेश के मालवा और महाराष्ट्र के हल्के नाश्ते चावल के पोहे के स्वाद से अब दिल्ली वासी भी रूबरू हो चले हैं। चटपट बनने वाला कम तेल आहर का पोष्टिक पोहा एमपी के मालवा विशेषकर इंदौर की शान माना जाता है। राजधानी दिल्ली में यमुना पार लक्ष्मी नगर के मंगल मार्केट में स्टेट बैंक के सामने रेहडी लगाने वाले मुरैना निवासी रवि ने दिल्ली में हल्के नाश्ते के शौकीनों को इंदौरी पोहा का स्वाद दिलाया। लक्ष्मी नगर में रहने वाले विद्यार्थियों को इंदौर का पोहा इतना भाया कि आसपास में स्कूल ब्लाक, पड़पड़गंज, प्रीत विहार कड़कड़डूमा आदि क्षेत्र के लोग भी इस पोहे का स्वाद लेने लालायित दिखने लगे हैं। वैसे दिल्ली में सुबह के नाश्ते में मूलतः ब्रेड पकौड़ा, समोचा, कचौड़ी, छोले भटूरे का ही रस्वादन किया जाता है, किन्तु इन सबमें तेल की मात्रा बहुत अधिक रहती है, कम तेल के पोष्टिक आहार पोहे की दीवानगी दिल्ली में शनैः शनैः बढ़ती दिखने लगी है।
बाबा की अदालत का इंसाफ
क्या आप यकीन कर सकते हैं कि किसी गांव का एक भी आपराधिक प्रकरण पुलिस थाने में दर्ज नहीं हो। जी हां, जालंधर जिले का एक ऐसा गांव है जहां एक भी मामला पुलिस के रोजनामचे में दर्ज नहीं है। होशियारपुर मार्ग पर अवस्थित ग्राम लेसड़ी वाल में यह कारनामा हो रहा है। यह क्षेत्र थाना आदमपुर के इलाके में आता है। यहां पीर मियां मिट्ठे शाह की दरगाह है। यह दरगाह सड़क से 20 फिट की उंचाई पर है। कहते हैं कि गांव का एक भी घर इसे अधिक उंचाई का नहीं है। जो भी इससे उंचा मकान बनाने का प्रयास करता है, उसका मकान अपने आप ही ध्वस्त हो जाता है। यह दरगाह मुगल काल में स्थापित हुई थी। यहां सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि गांव में चोरी होती ही नहीं है, अगर किसी ने धोखे से चोरी कर भी ली तो चोर सामान लेकर गांव के बाहर जा ही नहीं पाता है, धारणा है कि अगर वह बाहर गया तो उसे दिखना बंद हो जाएगा। इक्कीसवीं सदी में भी इस तरह के चमत्कार अगर हों तो उन्हें नमस्कार ही करना होगा।
पीएम ने जताई पटेल से नाराजगी
भारत के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने संभवतः पहली बार किसी मंत्री के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार किया है। पीएम ने नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के मंत्रालय के एक नीतिगत निर्णय पर कड़ा रूख अपनाया है। दरअसल नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इस साल मार्च में अपने सभी पूर्व सचिवों को एयर इंडिया की घरेलू और समुद्र पारीय उड़ानों में परिवार सहित मुफ्त टिकिट अपग्रेडेशन सुविधा का नीतिगत निर्णय लिया है। दिल्ली से लंदन की रिटर्न टिकिट का किराया इकानामी क्लास में पचास हजार रूपए तो प्रथम श्रेणी में यह दो लाख रूपए के करीब है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने इस मामले में अपनी नाराजगी जाहिर की है। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री इस बाते से खासे नाराज हैं कि नौकरशाहों को इस तरह जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को उड़ाने के लिए स्वतंत्र कैसे छोड़ा जा सकता है। प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय है कि प्रधानमंत्री के खफा होने का उस पर कोई असर होता दिख नहीं रहा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री के आदेश के बाद भी नागर विमानन मंत्रालय ने इस मामले में खामोशी ही अपनाई हुई है।
अंततः झुकना ही पड़ा साई बाबा के संस्थान को
शिरडी के फकीर साई बाबा के अनन्य भक्तों की कमी इस देश और विदेशों में कहीं भी नहीं है। सत्तर के दशक में मनोज कुमार ने शिरडी के साई बाबा पर वालीवुड में चल चित्र बनाकर साई बाबा की कीर्ति को कोने कोने में पहुंचा दिया था। चालीस सालों में महाराष्ट्र के अहमदपुर जिले के शिरडी कस्बे के हालात बहुत बदल चुके हैं। बाबा के भक्तों की तादाद में अचानक ही बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। बाबा के भक्त मुक्त हस्त से बाबा के लिए सब कुछ अर्पण करने को आमदा प्रतीत होते हैं। बाबा की प्रसिद्धि को देखकर साई बाबा संस्थान शिरडी ने कुछ सदस्य बाबा की चरण पादुकाओं को भारत गणराज्य पर दो सौ साल राज करने वाले ब्रितानियों के देश की राजधानी लंदन में 19 सितम्बर को होने वाले साई भक्त सम्मेलन में ले जाने पर आमदा थे। जब यह बात उजागर हुई तब साई भक्तों के बीच रोष और असंतोष की स्थिति बन गई। साई भक्तों के विरोध के आगे अंततः साई बाबा संस्थान को झुकना पड़ा और साई पादुका को लंदन ले जाने का प्रोग्राम निरस्त ही करना पड़ा।
पुच्छल तारा
भारत के लोग क्या नहीं कर सकते, हर कुछ है भारतीयों के बस में। हिन्दुस्तानियों के नाम और हुनर का डंका आज दुनिया भर में बज रहा है। देश के मीडिया को आज देश के गौरव से ज्यादा प्रियंका की साड़ी या उनकी हेयर स्टाईल को स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के समान बताने में ज्यादा दिलचस्पी है। इसी बात को रेखांकित करते हुए बनारस से समीर शर्मा ने एक ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि वक्त वक्त की बात है। ब्रितानियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश पर दो सौ साल से अधिक राज किया, वह आज एक भारतीय द्वारा खरीद ली गई है। संजीव मेहता ने इस कंपनी को डेढ़ सौ बिलियन डालर में खरीदा है। मीडिया को इस खबर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है कि जिसने देश पर राज किया उसे ही आज एक भारतीय ने खरीद लिया। समीर शर्मा कहते हैं कि मीडिया को भले ही फुर्सत न हो पर हम ही मीडिया बनकर एक दूसरे को ईमेल भेजकर मीडिया का रोल अदा करें।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 19

छिंदवाड़ा होकर जा ही नहीं सकता उत्तर दक्षिण गलियारा

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के निवासी भले ही इस भ्रम में हों कि भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ द्वारा स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण चतुष्गामी सड़क को छिंदवाडा से होकर ले जाने का प्रयास किया जा रहा हो, पर कमल नाथ अपने प्रयासों में इसलिए सफल नहीं हो सकते हैं क्योंकि जिस क्षेत्र से होकर यह सड़क या नरसिंहपुर छिंदवाड़ा नागपुर नेशनल हाईवे का गुजरना प्रस्तावित है, वहां से तो केंद्र सरकार द्वारा सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर का काम एक साल पहले ही आरंभ किया जा चुका है। इतना ही नहीं छिंदवाड़ा से नागपुर अमान परिवर्तन का काम भी इसी कॉरीडोर के मध्य से होकर गुजर रहा है। इस हिसाब से कमल नाथ के प्रयास बेकार ही जाया हो सकते हैं, क्योंकि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एक ही मामले में दो तरह की नीति को अपना नहीं सकता है। भारत गणराज्य में प्रजातंत्र है कोई हिटलरशाही नहीं कि एक मामले में हां और उसी तरह के दूसरे मामले में न।
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 30 अगस्त। ईंधन और समय की बचत को लेेकर केंद्र सरकार की अभिनव परियोजना के अंग स्वर्णिम चतुर्भुज के अंग बने उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी और खवासा मानचित्र पर रहेगा या नहीं इसे लेकर तरह तरह की भ्रांतियां बन चुकी हैं। लोगों को यह बताया गया कि इस मार्ग को भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से होकर गुजारने के लिए प्रयासरत हैं। राज्य सभा में कमल नाथ ने कुछ इस तरह का बयान भी दिया था।
 
पिछले साल जून माह में जब यह बात सिवनी की फिजां में तैरी कि उत्तर दक्षिण गलियारे का काम सिवनी जिले में किसी षणयंत्र के तहत रोक दिया गया है, तो सिवनी के निवासियों के दिलो दिमाग में रोष और असंतोष जबर्दस्त तरीके से उबल पड़ा। इसकी परिणिति जनता के मंच के रूप में अस्तित्व में आए ‘‘जनमंच‘‘ के द्वारा 21 अगस्त 2009 को आहूत सिवनी बंद के रूप मंे सामने आई। उस समय सारे दिन लोगों के हुजूम शहर भर में यत्र तत्र अपना विरोध प्रदर्शित करते नजर आए।
 
21 अगस्त 2009 को रूष्ठ सिवनी के नागरिकों ने अपनी शांति और अमन चैन के स्वभाव से विपरीत अपना रोद्र रूप दिखाया। इस दिन लोगों ने कमल नाथ के अनेक पुतले फूंके और उनकी शव यात्रा तक निकाल दी। मजे की बात तो यह है कि किसी ने भी यह जताने का प्रयास नहीं किया कि एक जनप्रतिनिधि अपने संसदीय क्षेत्र के लिए चाहे जो कर सकता है। इस मामले में जवाबदेह सिवनी के जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही के प्रति किसी का ध्यान न जाना और न ही आकर्षित कराना आश्चर्य का ही विषय माना जा रहा है।
 
मूलतः तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी के आदेश के तहत यह काम रोका गया था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की साधिकार समिति ने मध्य प्रदेश शासन से एसा करने का आग्रह किया था। तत्कालीन जिला कलेक्टर के आदेश से यह स्पष्ट हो जाता है कि उक्त काम को राज्य शासन से निर्देश प्राप्त होने की प्रत्याशा में रोका गया था। राज्य शासन द्वारा इस संबंध में जिला कलेक्टर को कोई निर्देश दिए गए हैं या नहीं यह बात भी अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी है।
 
‘कौआ ले गया कान, चले कौए के पीछे‘ की तर्ज पर कथित तौर पर इस आंदोलन का नेतृत्व करने वालों ने भी यह जताने का प्रयास नहीं किया कि चूंकि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से इस भाग में से वन क्षेत्र की अनुमति नहीं मिली है, अतः यह काम आरंभ नहीं किया जा पा रहा है। मंत्रालय द्वारा वन भूमि पर सड़क निर्माण की अनुमति दी जाना प्रस्तावित थी, किन्तु गैर वन क्षेत्रों के बारे में तो कोई संशय की स्थिति शायद ही बनी हो।
 
इसके बाद शनैः शनैः यह आंदोलन ठंडे बस्ते के हवाले ही होने लगा। कुछ नेता मीडिया की भूमिका पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने लगे कि उनकी खबरों को जानबूझकर सेंसर किया जा रहा है। अगर देखा जाए तो किस खबर को कितनी प्राथमिकता से और किसी कितना स्थान देकर छापना है यह मूल अधिकार संपादक का ही होता है। संपादकों और पत्रकारों के अधिकारों और कर्तव्यों को सरेआम चुनौति दी जाती रही और मीडिया मूकदर्शक बना सब कुछ देखता सुनता रहा।
 
बहरहाल अब इस मामले पर से कुहासा हटता सा दिख रहा है। पिछले साल मध्य प्रदेश के सतपुड़ा नेशनल पार्क, पेंच नेशनल पार्क और महाराष्ट्र के मेलघाट को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर का काम आरंभ किया जा चुका है। जब इस मार्ग का काम आरंभ किया ही जा चुका है तब नरसिंहपुर से बरास्ता छिंदवाड़ा, सौंसर, सावनेर नागपुर मार्ग को नेशनल हाईवे के तौर पर बनाना असंभव ही प्रतीत हो रहा है, क्योंकि संभवतः इसी आधार पर ही सिवनी से खवासा नागपुर मार्ग के बीच का काम रोका गया है, क्योंकि एसा कहा जा रहा है कि यह उत्तर दक्षिण गलियारा वर्तमान में पेंच नेशलन पार्क और कान्हा नेशनल पार्क के बीच के प्रस्तावित किन्तु काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कारीडोर के बीच से गुजर रहा है।

अगर वाईल्ड लाईफ के आवागमन और पर्यावरण असंतुलन के आधार पर सिवनी जिले में काम रोका जा सकता है तो फिर क्या वजह होगी कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा नरसिहपुर छिंदवाड़ा नागपुर के स्टेट हाईवे को नेशनल हाईवे में तब्दील करने में अपनी आनापत्ति प्रदान की जाएगी? जबकि यह मार्ग सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर को दो जगहों पर बाधित कर रहा है। इस कॉरीडोर के अंदर से छिंदवाड़ा नागपुर रेलमार्ग का काम भी युद्ध स्तर पर ही जारी है।

मुख्यमंत्री चौहान राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार 2010 से पुरस्कृत

मध्यप्रदेश खेलों के लिये रोल मॉडल बना
नई दिल्ली, । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा ’’राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार’’ से पुरस्कृत किया गया। ’’राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर गरिमामय समारोह राष्ट्रपति भवन में आयोजित किया गया। पुरस्कार समारोह में मध्यप्रदेश के खेल मंत्री तुकोजीराव पवार एवं विभागीय अधिकारी मौजूद थे। 
 
देश में उत्कृष्ट खेल अकादमियों की स्थापना और खेलों को प्रोत्साहन देने के लिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने पुरस्कृत किया। पुरस्कृत करते हुए जो प्रशस्ति पत्र दिया गया उसमें कहा गया कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा किये गये इस प्रशंसनीय कार्य से मध्यप्रदंेश सरकार अन्य राज्यों द्वारा अनुकरण करने योग्य एक रोल मॉडल बन गया है। उत्कृष्ट खेल अकादमियों की स्थापना और प्रबंधन में मध्यप्रदेश के योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए भारत सरकार ने मध्यप्रदेश को वर्ष 2010 के राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार से पुरस्कृत किया है। 
 
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस अवसर पर बताया कि प्रदेश में 16 खेल अकादमियां स्थापित की गयी हैं। इन अकादमियों के लिये 15 करोड़ रूपये की राशि आवंटित की गयी है। इन 16 अकादमियों में 369 बच्चों को बोर्डिंग एवं डे बोर्डिंग में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन अकादमियों में सभी खेल उपकरण और अन्य सुविधायें उपलब्ध करायी गयी हैं।  गोपीचंद फुलेला और अनेक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को कोच नियुक्त किया गया है। खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सभी खेल सुविधायें उपलब्ध करायी जा रही हैं। इसके कारण प्रदेश के 700 खिलाड़ियों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक मिले हैं। प्रदेश के खेल बजट में भी वृद्धि करके 70 करोड़ रूपये किया गया है। श्री चौहान ने बताया कि मध्यप्रदेश के लिये यह खुशी की बात है कि राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार पहली बार किसी राज्य सरकार को प्राप्त हुआ है।

रविवार, 29 अगस्त 2010

नक्‍सलवाद आया कहां से

स्‍टार न्‍यजू एजेंसी 19 अप्रेल 2010

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 18

पेंच कान्हा तो काल्पनिक पर पेंच सतपुड़ा करीडोर पर चालू है काम

सतपुड़ा के टाईगर्स की सैरगाह बनेगा पेंच और महाराष्ट्र

खटाई में पड़ सकता है नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा नागपुर एनएच

जुड़ जाएंगे सतपुड़ा, पेंच और मेलघाट

बिना रोकटोक आ जा सकेंगे वन्य जीव

करीडोर का दायरा होगा साढ़े तेरह हजार हेक्टेयर

पेंच और सतपुड़ा कारीडोर के बीच से प्रस्तावित है नरसिंहपुर छिंदवाड़ा नागपुर एनएच

प्रस्तावित है सतपुड़ा, पेंच टाईगर रिजर्व कारीडोर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 29 अगस्त। मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा जिले में फैले पेंच टाईगर रिजर्व, होशंगाबाद जिले के सतपुड़ा टाईगर रिजर्व और महाराष्ट्र के मेलघाट टाईगर रिजर्व को मिलाकर ‘सतपुड़ा टाईगर रिजर्व‘ बनाना प्रस्तावित है, जिससे नरसिंहपुर से बरास्ता छिंदवाड़ा, सौंसर नागपुर जाने वाले प्रस्तावित राष्ट्रीय राजमार्ग के बनने के मार्ग प्रशस्त होते नहीं दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस मार्ग को उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे में शामिल कराने के षणयंत्र का ताना बाना बुना जा रहा है।

मध्य प्रदेश वाईल्ड लाईफ बोर्ड के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा देश के तीन बड़े टाईगर रिजर्व सतपुड़ा, पेंच और मेलघाट को आपस में जोड़कर सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर पिछले साल प्रस्तावित किया था, इसका काम अचानक ही कुछ दिनों बाद ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया गया है। सूत्रांे ने आगे कहा कि इस कारीडोर का काम अगर निर्विध्न पूरा कर लिया जाता है तो तीनों टाईगर रिजर्व के बाघ देश के हृदय प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक की आसानी से सैर कर सकेंगे।

सूत्रों ने कहा कि बाघों पर आए संकट और उनकी कम होती संख्या के मद्देनजर इस तरह के कारीडोर बनाने का काम का फैसला राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा लिया गया है। इससे बाघों की सुरक्षा आसान हो जाएगी। पिछले साल के अगस्त माह में सतपुड़ा नेशनल पार्क प्रबंधन ने आरंभ भी कर दिया था।

भौगोलिक दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो इन तीनों ही पेंच, सतपुड़ा और मेलघाट टाईगर रिजर्व की सीमाएं आपस में मिलती हैं। इससे वन्य जीव इन तीनों में ही स्वच्छंद विचरण करते रहते हैं। इन परिस्थितियों में बाघ एवं अन्य दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव सदा ही शिकारियों के निशानों पर रहा करते हैं। माना जा रहा है कि तीनों टाईगर रिजर्व की सीमाओं को जोड़कर कारीडोर बनाने से सुरक्षा के साथ ही साथ अन्य दूसरी समस्याओं का समाधान भी आसानी से ही निकाला जा सकता है।

सूत्रों ने आगे कहा कि इस कारीडोर में होशंगाबाद के अलावा, छिंदवाड़ा, बैतूल के साथ ही साथ महाराष्ट्र प्रदेश के कुछ हिस्सों का समावेश इसमें किया जाना प्रस्तावित है। इस प्रस्तावित सतपुड़ा टाईगर कॉरीडोर में तीनों नेशनल पार्क मिलकर वन्य जीवों की सुरक्षा का दायित्व निभाएंगे। अगर कोई वन्य जीव एक नेशनल पार्क से निकलकर दूसरे नेशनल पार्क में जा पहुंचता है तो वहां के सुरक्षा कर्मी उस पर निगरानी रखेंगे। विभाग का मानना है कि कॉरीडोर बनने से बाघों की सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी।

पिछले साल 05 सितम्बर को एक राष्ट्रीय अखबार को दिए साक्षात्कार में पेंच नेशनल पार्क के पूर्व और सतपुड़ा नेशनल पार्क के क्षेत्र संचालक नयन सिंह डुगरियाल ने इस बात को स्वीकारा था कि सरकार ने सतपुड़ा, पेंच और मेलघाट के टाईगर रिजर्व को मिलाकर कॉरीडोर बनाना तय किया है। योजना पर काम आरंभ किया जा चुका है। कराीडोर बनने के बाद तीनों नेशनल पार्क के बाघों की सुरक्षा बढ़ जाएगी, वे दूसरे नेशनल पार्क में आराम से विचरण कर सकेंगे।

सतपुड़ा कॉरीडोर के अस्तित्व में आने के बाद इसका दायरा 13 हजार 346 हेक्टेयर हो जाएगा। इसकी जद में 63 वन ग्राम और 6781 परिवार आ रहे हैं। इस कारीडोर की कुल मानवीय आबादी बढ़कर 35 हजार 323 हो जाएगी। उल्लेखनीय होगा कि इन लोगों को कारीडोर में संचालित होने वाली समस्त योजनाओं का लाभ विशेष तौर पर मिल सकेगा।

यहां उल्लेखनीय होगा कि पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के बीच के काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कारीडोर को ध्यान में रखकर उत्तर दक्षिण कारीडोर का काम रोकने के लिए एक गैर सरकारी संस्था सर्वोच्च न्यायायल में अपील दायर की है। पेंच और कान्हा का कॉरीडोर काल्पनिक है, पर सतपुड़ा, पेंच और मेलघाट के लिए तो बाकायदा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा प्रस्तावित किया गया है। बावजूद इसके न तो केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग और न ही वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट जैसे गैर सरकारी संगठन को इस बात की कोई परवाह है कि इसके बीच से होकर गुजरने वाले नरसिंहपुर छिंदवाड़ा, सौंसर नागपुर नेशनल हाईवे को न केवल हरी झंडी दिखाई गई है, वरन छिंदवाड़ा से नागपुर ब्राडगेज रेल लाईन का काम भी जोर शोर से किया जा रहा है।

मजे की बात तो यह है कि इस मामले में अब किसी का ध्यान नहीं गया है। हर कोई नरसिंहपुर से लखनादौन सिवनी, खवासा होकर नागपुर जाने वाले उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का काम रूकवाने के लिए भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को दोषी मानकर नरसिंहपुर से छिंदवाड़ा होकर नागपुर जाने वाले प्रस्तावित नेशनल हाईवे में अडंगा लगाने की बात कह और सोचकर इसको रूकवाने की तैयारी रहा है, जबकि उसमें यह पेंच तो अपने आप पहले ही फंस चुका है।

अब माननीय सर्वोच्च न्यायायल भी अगर सिवनी से खवास के मार्ग को पेंच नेशनल पार्क और वन्य जीवों के लिए खतरे की बात को मानकर इसका निर्माण रोकना प्रस्तावित करता भी है तो एक बात तो तय हो चुकी है कि यह मार्ग सिवनी से छिंदवाड़ा सोंसर होकर नागपुर तो किसी भी कीमत पर नहीं जा पाएगा, क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा ही पेंच सतपुड़ा और मेलघाट को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर कारीडोर बनाने का काम पिछले साल आरंभ करवा चुका है।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बढ़ सकते हैं सीमेंट के दाम

सावधान! मानसून के बाद बढ़ सकते हैं सीमेंट के दाम

मानसून के बाद तेज माल होगा सीमेंट का

प्रति व्यक्ति सीमेंट की खपत 136 किलोग्राम

(लिमटी खरे)

देश के महानगरों के अलावा छोटे मंझोले शहरों में भी अब कांक्रीट जंगल खड़े होना आरंभ हो गए हैं। मकान पक्के हों या कच्चे हर जगह सीमेंट का उपयोग अवश्यंभावी ही है। बिना सीमेंट कोई भी दीवार खड़ी नहीं हो सकती है। यही कारण है कि सीमेंट उद्योग में दिन दोगनी रात चौगनी बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से लेकर अस्सी के दशक के आरंभ तक सीमेंट की मांग और उत्पादन में कमी के चलते सीमेंट तक की राशनिंग कर दी गई थी। लोग मकान बनाते वक्त सीमेंट खरीदने के लिए पर्ची बनवाने के लिए रतजगा तक किया करते थे। इस दौर में सीमेंट की कालाबाजारी करने वालों की पौ बारह हो गई थी।

मानसून की बिदाई की बेला आते आते रियल्टी सेक्टर के कदम तालों में तेजी आना आरंभ हो गया है। सितम्बर और अक्टूबर माह में सीमेंट, इंफ्रा और रियल्टी सेक्टर में उफान आने की भविष्यवाणियां होना आरंभ कर दी गई हैं। सीमेंट उत्पादन से जुड़े लोगों का भी मानना है कि अगले माह से सीमेंट के दामों में जबर्दस्त उछाल दर्ज होने की संभावनाएं हैं। त्योहारी मांग को देखकर भी सीमेंट की कीमतों में इजाफे से इंकार नहीं किया जा सकता है।

अमूमन सीमेंट के तीन ही उपभोक्ता होते हैं, इनमें बिल्डर, इंफ्रास्टक्चर संस्थाएं और व्यक्तिगत प्रमुख हैं। एक आंकलन के मुताबिक कुल उत्पादन का चालीस फीसदी हिस्सा व्यक्तिगत तौर पर ही उपयोग में लाया जाता है। वैसे सरकार की इंफ्रास्टक्चर क्षेत्र के प्रति नजदीक और लचीला रवैए के साथ ही साथ त्योहारी आकर्षण में बिल्डर्स द्वारा छूट के साथ मकानों के बेचने की घोषणा के चलते सीमेंट की मांग में तेजी से इजाफा होने का अनुमान है।

वैसे भी मानसून में निर्माण कार्य बाधित ही हुआ करते हैं, यही कारण है कि बारिश के चार माहों में सीमेंट की खपत न्यूनतम ही हुआ करती है। सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में इजाफा किया जा चुका है। पेट्रोल, डीजल, कोयला, लाजिस्टिकल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के चलते सीमेंट की कीमतों में वैसे ही उछाल दर्ज किया जा सकता है। अनुमान तो यह लगाया जा रहा है कि सीमेंट की कीमतों में दस से बीस रूपए प्रति बैग की वृद्धि दर्ज हो सकती है।

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2008 - 2009 में 18.61 करोड़ टन सीमेंट का उत्पादन किया गया था। इसी वित्तीय वर्ष में 1850 करोड़ डालर का कुल टर्न ओवर था सीमेंट उद्योग का। सीमेंट इंडस्ट्री के माध्यम से इस वक्त दुनिया में चौदह खरब लोग अपने परिवार की क्षुदा शांत कर रहे हैं। रही बात भारत की तो भारत में इस वक्त 365 छोटे और सफेद सीमेंट के प्लांट अस्तित्व में हैं। जिनमें से 148 बड़े सीमेंट प्लांटस हैं।

आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि भारत गणराज्य विश्व में सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है। भारत की सीमेंट इंडस्ट्री की उत्पादन क्षमता वित्तीय वर्ष 2009 - 2010 में बढ़कर 21.9 करोड़ टन हो गई है। देश में इस वक्त कुल 46 कंपनियां सीमेंट उत्पादन के कार्य में लगी हुई हैं। चालू माली साल के बाद वर्ष 2011 - 2012 में सीमेंट इंडस्ट्री का उत्पादन लक्ष्य बढ़ाकर 29.8 करोड़ टन होने की उम्मीद है।

सीमेंट के बढ़ते उपयोग और मांग को देखकर अगले तीन सालों में सीमेंट इंडस्ट्री के दस फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। विश्व के मान से अगर देखा जाए तो प्रति व्यक्ति सीमेंट का औसत उत्पादन विश्व में 250 किलोग्राम होता है, जबकि दुनिया के चौधरी बनने की होड़ में शामिल चीन द्वारा 450 किलोग्राम सीमेंट का उत्पादन प्रति व्यक्ति किया जाता है। भारत में यह औसत 115 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है। जबकि खर्च की दर 136 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है।

एक समय था जब लोग घरों को मिट्टी से बनाया करते थे। उसके पहले दीवारों को खड़ा करने और जोड़ने के लिए मिट्टी के साथ ही साथ अनेक प्राकृतिक चीजों का उपयोग भी किया जाता था। आज के सीमेंट के जोड़ से वे प्राकृतिक चीजों का जोड़ कहीं ज्यादा टिकाउ और मजबूत होता था। कालांतर में मिट्टी का प्रयोग दीवारें खड़ी करने के लिए किया जाने लगा। मिट्टी के बने मकान पूरी तरह पर्यावरण और मौसम के अनुकूल ही हुआ करते थे।

जब से सीमेंट इंडस्ट्री ने अपने पैर पसारे हैं तब से समूचा विश्व इसकी जद में आ गया है। सीमेंट के अत्याधिक प्रयोग के चलते पर्यावरण का असंतुलन भी साफ तौर पर दृष्टिगोचर होने लगा है। सीमंट के बने मकानों में स्वच्छ हवा और रोशनी की कमी के कारण तरह तरह की समस्याओं ने पैर पसारने आरंभ कर दिए हैं।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 17

किसी संस्था द्वारा खवासा में कराई जा रही है वाहनों की गिनती

सात सौ वाहनों की आवाजाही है औसत इस मार्ग पर

सड़क आरंभ हो या न हो पर टोल प्लाजा हो सकता है चालू

गुजरने वालेे वाहनों को आधी अधूरी सड़क का ही देना होगा टोल टेक्स

प्रशासन नहीं है इस प्लाजा के आरंभ करने के पक्ष में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 27 अगस्त। मध्य प्रदेश महाराष्ट्र सीमा पर खवासा में किसी एजेंसी द्वारा वाहनों की गिनती कराए जाने की बात प्रकाश में आई है। इस बात को लखनादौन के पास उत्तर दक्षिण गलियारे पर निर्मित टोल प्लाजा के चालू होने के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस साल दीपावली के आसपास ही टोल प्लाजा को सरकारी तौर पर आरंभ करवा दिया जाएगा और यहां से गुजरने वाले वाहनों को आधी अधूरी सडक के लिए ही टोल टेक्स देने पर मजबूर होना पड़ सकता है। उधर प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि जिला प्रशासन इस टोल प्लाजा को आरंभ करवाने के पक्ष में कतई दिखाई नहीं पड़ रहा है।

बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से आए किसी कंपनी के मुलाजिमों द्वारा दिन रात बैठकर छोटे, मझोले और बड़े वाहनों को एक्सल के आधार पर गिना जा रहा है। उक्त कंपनी के दो मुलाजिमों में से एक के द्वारा खवासा से नागपुर की ओर जाने वाले तो दूसरे द्वारा खवासा से जबलपुर की ओर जाने वाले वाहनों की गणना की जा रही है। यह गणना चोबीसों घंटे जारी है। उक्त कार्य इन कारिंदों द्वारा विभिन्न ढाबों में बैठकर गुपचुप तरीके से किया जा रहा है, ताकि जनता की नजरों से यह छिपा रहे।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले लगभग दो माहों से जारी इस गणना में प्रति दिन का औसत सात सौ वाहनों के आसपास आया है। कहा जा रहा है कि इस साल दीपावली के आसपास लखनादौन के पास बने टोल प्लाजा को आरंभ करवा दिया जाएगा, जिसके बाद यहां से गुजरने वाले हर वाहन (सरकारी, सांसद, विधायकों द्वारा प्रयुक्त वाहनों को छोड़कर) को गुजरने के लिए निर्धारित शुक्ल अदा करना आवश्यक हो जाएगा।

माना जा रहा है कि जल्द ही सिवनी जिले में टोल प्लाजा आरंभ होने वाला है, और संभवतः यही कारण है कि किसी एजेंसी द्वारा वाहनों के यातायात दबाव का विभिन्न श्रेणियों में सर्वे कराया जा रहा है ताकि टोल प्लाजा से होने वाली वास्तविक कमाई का आंकलन किया जा सके। संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि किसी एजेंसी को इसका काम देने के लिए उच्चाधिकारियों द्वारा सैद्धांतिक सहमति बना दी गई हो, तभी उक्त कंपनी ने जोर शोर से सारे आंकड़े जुटाए जाकर अनुमान लगाए जाने के काम को अंजाम दिया जा रहा हो।

गौरतलब है कि उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले में नरसिंहपुर से लखनादौन, जिला मुख्यालय सिवनी होकर खवासा तक के मार्ग का निर्माण कराया जाना प्रस्तावित था, जिसमें से लखनादौन और सिवनी के बीच बंजारी के पास तथा सिवनी से खवासा के बीच मोहगांव से खवासा तक का मार्ग का निर्माण रोक दिया गया है। विडम्बना है कि एनएचएआई द्वारा अगर यह टोल प्लाजा आरंभ करवा दिया गया तो आने वाले समय में इस सड़क के एक बहुत बड़े हिस्से में गड्ढ़े युक्त सड़क पर से गुजरने के बावजूद भी वाहन चालकों को टोल टेक्स देने पर मजबूर होना पड़ेगा।

उधर जिला प्रशासन के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि जिला प्रशासन का मन इस टोल प्लाजा को आरंभ कराने के लिए अपनी सैद्धांतिक सहमति देने का नहीं है। अगर टोल प्लाजा आरंभ करने की बात अस्तित्व में आती है तो जिला प्रशासन द्वारा इसके लिए अपनी नकारात्मक टिप्पणी के साथ इसे आरंभ कराने के ओचित्य पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है।