बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

कैसे हो आंतरिक सुरक्षा

विकराल चुनौति बन गई है आंतरिक सुरक्षा 
सरकारों की अनदेखी से समस्या हुई बेकाबू
 
राज्य और केंद्र के बीच बनाना होगा समन्वय
 
दलगत भावना को परे रख, सर्वोपरि रखना होगा राष्ट्रधर्म
 
आंतरिक सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं रहीं सरकारें
 
(लिमटी खरे)

केंद्र और राज्यों की सरकारों के बीच समन्वय के अभाव का परिणाम आज साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। अस्सी के दशक से आंतरिक सुरक्षा में गड़बड़ियां प्रकाश में आने लगी थीं। जम्मू काश्मीर के साथ ही साथ पंजाब, असम बुरी तरह सुलगा। कंेद्र सरकार ने इसके शमन के लिए प्रयास किए। मामला शांत हुआ। इसके बाद देश मंे अलगाववाद, क्षेत्रवाद, माओवाद, भाषावाद, नक्सलवाद ने तेजी से पैर पसारे।
 
नक्सलवाद को खाद पानी कहां से मिलता है, इस बारे में सरकारें बहुत ही अच्छी तरह वाकिफ हैं। आर्थिक विषमता ही किसी भी लड़ाई का प्रमुख कारक हुआ करती है। अस्सी के दशक में संयुक्त मध्य प्रदेश में नक्सलवाद की जड़ें काफी हद तक गहरी हो चली थीं। अलगाववाद, क्षेत्रवाद, माओवाद, भाषावाद, नक्सलवाद आदि के पनपने के पीछे कारण क्या है? क्या शासक इस बात से अंजान हैं? जाहिर है इसका उत्तर होगा सरकारें सब कुछ जानती हैं।
 
नक्सलवाद प्रभावित बालाघाट और मण्डला जिलों के जंगलों, आदिवासियों आदि से चर्चा के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस सबके पीछे सिर्फ और सिर्फ सरकारी तंत्र ही जवाबदार है। नक्सलवादियों के निशाने पर कौन हैं? जाहिर है पुलिस, वन, राजस्व महकमे के लोग। आखिर इन विभागों को नक्सलवादियों ने क्यों चुना है? हालात बताते हैं कि इन तीनों ही महकमों का आम जनता से रोजाना ही वास्ता पड़ता है। यह बात भी जगजाहिर है कि इन तीनों ही महकमों के लोगों को चढ़ोत्री चढ़ाए बिना कोई काम संभव नहीं है।
 
जब आम जनता को यह पता चलता है कि उनका शोषण करने वालों को ‘कोई‘ दण्ड दे रहा है तो उसका इस ‘कोई‘ का साथ देना वाजिब है। उन्हें लगने लगता है कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए कोई तो आगे आया है। वरना कोई अनजान आदमी आकर समूचे गांव को अपने बस में कैसे कर लेता है? गांव के गांव इनका साथ देने कैसे तैयार हो जाते हैं? कैसे इनकी फौज के लिए जुझारू सिपाही मिलते हैं जो मरने मारने को तैयार हो जाते हैं? हमारे नीति निर्धारकों को इस बारे में सोचना होगा?
 
आंतरिक सुरक्षा के संबंध में समाज, आम आदमी और सरकार की भूमिका क्या और कैसी होना चाहिए? इस बारे में अब तक चिंतन नहीं होना दुर्भाग्य का ही विषय माना जाएगा। सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, राजनैतिक दलों आदि की संगोष्ठियों में भी इस गंभीर विषय पर चर्चा नहीं किए जाने से साफ जाहिर हो जाता है कि इन सभी को आम आदमी की कितनी परवाह है।
 
आंतरिक सुरक्षा के लिए सरकारी तंत्र को जवाबदार इसलिए ठहराया जा रहा है क्योंकि विसंगतियां सरकारी तंत्र के कारण ही उपज रही हैं। आजादी के पहले के परिदृश्य में अंग्रेजों की लालफीताशाही के कारण समाज एकजुट हुआ, इतिहास साक्षी है इसी दौरान गांव में धनाड्य वर्ग ने जब भी कहर बरपाया है, इससे डकैतों की उत्पत्ति हुई है। कुल मिलाकर सामाजिक व्यवस्था का ढांचा जब भी गड़बड़ाया है तब तब अनैतिक रास्तों को अपनाकर अपना शासन स्थापित करने के प्रयास हुए हैं।
 
वर्तमान में आंतरिक सुरक्षा एक अत्यंत गंभीर प्रश्न बनकर उभर चुकी है, जिसकी तरफ सरकार का ध्यान गया तो है, पर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपने वोट बैंक की जुगत में सरकारों ने इस मुद्दे के शमन के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किए हैं। यही कारण है कि देश में आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद आदि का जहर तेजी से फैल चुका है। आप अगर महाराष्ट्र का ही उदहारण लें तो वहां शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मराठी वाद के चलते लोगों का जीना मुहाल हुए बिना नहीं है। वोट बैंक के चलते सरकार मौन साधे हुए है।
 
हमारे विचार से इस मामले में काफी हद तक समाज भी दोषी है। समाज को भी इस तरह की व्यवस्था का प्रतिकार करना चाहिए। आम आदमी को भी इसके विरोध में स्वर बुलंद करने की आवश्यक्ता है। आखिर क्या कारण है कि आम आदमी अपना काम बिना रिश्वत के करवाने में अक्षम है। इसका उत्तर आईने की तरह साफ है। आज हमें भी जल्दी और नियम विरूद्ध काम करवाने की आदत सी हो गई है। हम कहीं भी जाते हैं तो चाहते हैं कि हमारा काम औरों से पहले, जल्दी और सुविधा के साथ हो जाए, इसके लिए हम हर कीमत देने को तैयार होते हैं। इसका भोगमान गरीब गुरबों को भुगतना होता है, जिनके पास संसाधनों का अभाव है।
 
देश की संवैधानिक व्यवस्था भी इसके लिए काफी हद तक दोषी करार दी जानी चाहिए। देश में आरक्षण को आजादी के उपरांत दस साल के लिए लागू किया गया था, जिसे आज 62 सालों बाद भी बदस्तूर जारी रखा गया है। 62 वर्षों में एक आदमी वृद्धावस्था को पा लेता है। सरकारी नौकर को भी 62 साल में सेवानिवृत किया जाता है। हमें यह कारण खोजना होगा कि आखिर क्या वजह है कि छः दशकों बाद भी हम आरक्षण पाने वालों को समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा में नहीं ला पाए हैं? हमें इस मसले को गंभीरता के साथ लेकर सोचना होगा, मनन करना होगा और फिर प्रयास करने हांेगे कि हम इस विसंगति को दूर करें।
 
आखिर क्या वजह है कि आज देश में जाति के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा रहा है? आखिर क्या वजह है कि सरकारी नौकरों को सेवानिवृत्ति के उपरांत पेंशन देने से परहेज किया जा रहा है और जनप्रतिनिधियों को आज भी भारी भरकम पेंशन दी जा रही है। सवाल यह है कि आखिर यह पैसा आता कहां से है? जनता के गाढ़े पसीने की कमाई ही है यह जिस पर जनता के नुमाईंदे एश किया करते हैं।
 
बहरहाल लंबे समय के उपरांत केंद्र सरकार ने आंतरिक सुरक्षा की सुध ली है। मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह ने जिन बातों को रेखांकित किया वे संभवतः गैरजरूरी ही थीं। वस्तुतः आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ सुरक्षा बल, खुफिया एजेंसियों का सूचना तंत्र है, जो तहस नहस ही पड़ा हुआ है। जनता और पुलिस के बीच संवादहीनता के चलते जरायमपेशा लोगों के लिए बेहतर उपजाउ माहौल तैयार हो रहा है। छोटे मोटे अपराध से ग्रसित आम जनता थाने की चारदीवारी लांघने से डरती है। अपराधियों में पुलिस का खौफ न के बराबर है, पर जनता के मानस पटल पर पुलिस का कहर आतंक बरपा रहा है। जब तक जनता और पुलिस के बीच दूरी कम नहीं होगी, आंतरिक सुरक्षा के लिए लाख कोशिशें कर ली जाएं बेकार ही होंगी।
 
वैसे प्रधानमंत्री का यह कहना शत प्रतिशत सही है कि आज समाज की सुरक्षा पुराने पड़ गए कानूनों के माध्यम से ही की जा रही है। पुलिस सुधार के लिए न जाने कितनी कमेटियां, न जाने कितने आयोग बैठ चुके हैं, इन सबकी सिफारिशें धूल खा रही हैं। मनमोहन सिंह किस बात से डर रहे हैं। उनके पास पुलिस सुधार की सिफारिशें हैं तो उन्हें लागू किया जाना चाहिए। वजीरे आजम इसके लिए किस महूर्त का इंतजार कर रहे हैं, यह बात समझ से ही परे है।
 
भारत गणराज्य के महाराष्ट्र सूबे में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गुर्गे सरेराह आतंक बरपाते घूम रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के निवासियों को वहां से भाग कर आना पड़ रहा है, उधर कांग्रेस को इसके पीछे भी सियासत की ही पड़ी है। बाला साहेब ठाकरे और राज ठाकरे ने दिखा दिया है कि आजाद भारत में तंत्र का नहीं उनका राज कायम है। किसी में इतनी दम नहीं कि राज या बाला साहेब की लगाम कस सकें।
 
आंतरिक सुरक्षा के मामले में देश में सभी राज्यों को एक ही लाठी से हांका जाता है, जो अनुचित है। पूर्वोत्तर क्षेत्रों की जमीनी हकीकत और भोगोलिक परिस्थियां अलग है, तो दक्षिण, पश्चिम की अलग। आज विदेशी ताकतें सूचना और प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल कर अपने रास्ते आसान करती जा रहीं हैं, और हमारे सुरक्षा बल या पुलिस वही बाबा आदम के जमाने में ही जी रहे हैं। हमें इसे बदलना ही होगा।
 
पुलिस या सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली को इक्कीसवीं सदी के हिसाब से ढाले बिना आंतरिक सुरक्षा की चर्चा बेमानी है। अगर हम एसा नहीं कर पाए तो इस तरह मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को आहूत कर करोड़ों रूपयों को बहाने के अलावा हम कुछ और नहीं करने वाले। इसका नतीजा निश्चित तौर पर सिफर ही होगा।
 
कुल मिलाकर अगर किसी भी राज्य में आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया जाना है तो उसके लिए राज्य को बाकायदा अपनी एक ठोस नीति बनाना सुनिश्चित करना होगा। महज नीति बनाने से कुछ होने वाला नहीं, इसके लिए उस नीति का ईमानदारी से पालन कैसे हो? इस बारे में कठोर कदम उठाने की जरूरत होगी। इस सबके लिए जरूरी है सरकार में बैठे नुमाईंदो, राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि और समाज के पायोनियर (अगुआ) की ईमानदार पहल की, जिसकी गुंजाईश बहुत ज्यादा दिखाई नहीं पड़ती।

उमरदराज नेताओं को सन्यास की नसीहत दी सोनिया ने


जल्द ही हो सकती है युवराज की ताजपोशी 
बुजुर्गवार बांध लें बोरिया बिस्तर
 
युवा नजर आ सकती है सोनिया की कार्यकारिणी
 
खुद सोनिया हैं 64 साल की
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का चेहरा अब युवा हो सकता है। बारह साल के कार्यकाल में पहली मर्तबा सोनिया गांधी ने संगठनात्मक फेरबदल के पहले तीखे तेवर दिखाए हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चौधरी रणबीर सिंह की स्मृति में डाक टिकिट जारी करते समय सोनिया गांधी ने इशारों ही इशारों में उमरदराज हो चुके नेताओं को स्वेच्छिक सेवानिवृति लेने की बात कह डाली। जानकार सोनिया के इस बयान को राहुल की संभावित ताजपोशी से भी जोड़कर देख रहे हैं।
 
कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने रणबीर सिंह का उदहारण देते हुए कहा कि उन्होंने 64 साल में स्वेच्दा से राजनीति से सन्यास ले लिया था। सोनिया ने कहा कि आज समय है हम सभी को सोचना ही होगा कि आखिर आने वाली नई पीढ़ी के सामने हम कौन सा आदर्श छोड़ रहे हैं। सोनिया जब रणबीर सिंह के 64 साल का बखान कर रहीं थीं, तभी पिछली पंक्ति में सोनिया गांधी के 64 बसंत पूरे करने की चर्चाएं चल रहीं थीं। गौरतलब है कि 9 दिसंबर 1946 को जन्मीं सोनिया खुद 64 की हो चुकी हैं, लोगों का कहना था कि नैतिकता बघारने के पहले सोनिया को खुद ही स्वेच्छा से राजनीति त्याग देना चाहिए।
 
वहीं दूसरी ओर सोनिया गांधी की इस बात का आशय यह भी लगाया जा रहा है कि जल्द ही सोनिया गांधी संगठन की जवाबदारी से खुद को पृथक करने का मन बना रही हैं। इसी के साथ ही साथ साठ से अधिक उम्र के नेताओं को रास्ते से हटाकर राहुल गांधी के लिए नए जवान मजबूत कांधों के मार्ग प्रशस्त करती नजर आ रही हैं सोनिया।
 
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र दस जनपथ से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो सोनिया जल्द ही संगठन में फेरबदल कर युवाओं को आगे लाएंगी, इसके उपरांत जैसे ही संसद का बजट सत्र निपटेगा उसके तुरंत बाद ही सत्ता से भी उन मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा जो साठ की उम्र पूरी कर चुके हैं। कांग्रेस के वायोवृद्ध नेताओं में सोनिया के इस तरह के इशारे को लेकर हडकम्प मचा हुआ है।
दिग्गी के एजेंडे पर सोनिया राहुल
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह के एजेंडे पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी चलते नजर आ रहे हैं। गौरतलब होगा कि दिसंबर के दूसरे पखवाड़े में दिल्ली में हुए पार्टी के महाधिवेशन में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा था कि पार्टी की कमान नई पीढ़ी को सौंपी जानी चाहिए, इसके साथ ही उन्होंने अपने सरीखे नेताओं को एक्सपायरी डेट की केटेगरी में रख दिया था।

शिव उमा में मंथन


शिव और उमा के बीच पिघल रही है बर्फ

किसानों के बहाने दोनों ने की बंद कमरे में चर्चा
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के किसानों की बदहाली के चलते मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और वर्तमान निजाम शिवराज सिंह चौहान के बीच दूरियां कम होती नजर आ रही हैं। मंगलवार रात में मध्य प्रदेश भवन में दोनों ही नेताओं के बीच लगभग एक घंटे मंत्रणा हुई। उमा शिव के बीच हुई गुफ्तगंू के बाद भाजपा में सियासत गर्मा गई है।
गौरतलब है कि भाजपा में उमा भारती की वापसी पर सबसे बड़े अडंगे के तौर पर शिवराज सिंह चौहान सहित मध्य प्रदेश भाजपा के अनेक नेता सामने आ रहे थे। इसी बीच राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी और भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी ने उमा भारती की वापसी की संभावनाओं को बल देकर ठहरे हुए पानी में लहरें पैदा कर दी थीं।
जैसे ही फिजां में उमा की घर वापसी की खबरें तैरीं वैसे ही उनके विरोधियों ने लामबंद होकर इसका विरोध करना आरंभ कर दिया था। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि आड़वाणी ने उमा भारती की वापसी का रोड़मेप वहाया उत्तर प्रदेश निकाला, किन्तु यूपी के भाजपाई उमा भारती को झेलने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि उमा भारती अब मध्य प्रदेश में अपने घुर विरोधियों से हाथ मिलाने से नहीं चूक रहीं हैं।
बताया जाता है कि आड़वाणी के निर्देश पर ही शिवराज सिंह चौहान ने अपने सहयोगियों के साथ उमा भारती की मिजाज पुरसी उस वक्त अस्पताल में जाकर की थी जब वे दुर्घटना में घायल हो गईं थीं। गत दिवस एमपी भवन में भाजपा के दो विपरीत धु्रवों के बीच हुई मंत्रणा के बाद उमा भारती के चेहरे पर सकून के भाव इस बात की ओर साफ इशारा कर रहे थे कि वे शिवराज को साधने में काफी हद तक सफल रहीं हैं।

2जी मामले में नप गए राजा


2जी मामले में नप गए राजा
नई दिल्ली (ब्यूरो)। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही सीबीआई ने संचार मंत्री एण्डीमुत्थू राजा को गिरफ्तार कर लिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक हालांकि अभी तक सीबीआई की ओर से आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की गई है, फिर भी सीबीआइ्र के सूत्रों ने कहा है कि राजा सीबीआई हिरासत में हैं।
राजा के पूर्व निजी सचिव आर. के. चंदोलिया और पूर्व टेलिकॉम सचिव सिद्दार्थ बेहुरा को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। राजा के भाई के. पेरूमल पर भी सीबाआई ने शिकंजा कसा है। राजा पर आपराधिक दुर्व्यवहार और टेलिकॉम कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए नीतियों के उल्लंघन का मामला बनाया गया है।
राजा की गिरफ्तारी पर भाजपा ने कहा है कि यह कदम काफी देरी से उठाया गया और इसका श्रेय सरकार को कतई नहीं जाता। भाजपा का कहना है कि यह गिरफ्तारी 2009 में हो जानी चाहिए थी।
इस गिरफ्तारी पर कांग्रेस का कहना है कि इस गिरफ्तारी का डीएमके के साथ गठबंधन में कोई असर नहीं पड़ेगा। वहीं वाम दलों का कहना है कि इस गिरफ्तारी से साफ होता है कि घोटाला हुआ है और इसकी जड़ें अदंर तक हैं। वाम दलों सहित भाजपा ने जेपीसी जांच की मांग की है।

मनरेगा की बढ़ेगी मजदूरी


मनरेगा की बढ़ेगी मजदूरी
नई दिल्ली (ब्यूरो)। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत श्रमिकों को महंगाई के अनुसार अधिक मजदूरी दी जाएगी। प्रधानमंत्री ने इस योजना की पांचवीं वर्षगांठ पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि हमने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में हुई वृद्धि के आधार पर पारिश्रमिक बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
डॉ.सिंह ने कहा कि 2006 में जब यह योजना शुरू हुई थी तो एक श्रमिक की न्यूनतम दैनिक मजदूरी 65 रुपये थी। उन्होंने कहा कि अब न्यूनतम दैनिक मजदूरी 100 रुपये है, जो अपने आप में एक बड़ी वृद्धि है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया ने कहा कि इस योजना में व्याप्त खामियों पर मंथन करने और नई दिशाओं में बढ़ने का समय आ गया है। सोनिया ने कहा कि यह योजना ग्रामीण लोगों के लिए रोजगार पैदा करने में बहुत सफल रही है, खासतौर से कमजोर वर्गाे एवं महिलाओं के लिए। लेकिन इस योजना में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की भी शिकायतें है। उन्होंने कहा कि योजना के क्रियान्वयन में व्याप्त कमियों का विश्लेषण करनेए नई दिशाओं की योजना बनाने और आगे बढ़ने का यह एक अवसर है।
मनमोहन सिंह ने कहा कि मनरेगा के लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं का है। यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में समर्थ साबित हुई है। सिंह ने कहा कि यह योजनाए गरीबी मिटाने के महात्मा गांधी के सपने को पूरा करने के लिए संप्रग सरकार का एक बड़ा कदम है।

एयर शो नौ को

नौ फरवरी से सबसे बड़े एयर शो का आयोजन
नई दिल्ली (ब्यूरो)। भारत नौ फरवरी से बेंगलूर में अपने सबसे बड़े एयर शो का आयोजन करेगा जिसमें 30 देश अपने नवीनतम अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी उत्पादनों का प्रदर्शन करेंगे। शो में लड़ाकू, परिवहन और असैन्य विमान भी शामिल होंगे।

अखिल भारतीय हॉकी 16 से

अखिल भारतीय हॉकी प्रतियोगिता का भव्य आयोजन16 से

धनराज पिल्ले सहित अनेक मंत्री रहेंगे उद्घाटन अवसर पर , एतिहासिक होगा नगर पालिका गोल्ड कप


(मनोज मर्दन त्रिवेदी)

सिवनी यशो-:  अखिल भारतीय गोल्ड कप हॉकी प्रतियोगिता सिवनी नगरपालिका परिषद द्वारा आगामी १६ फरवरी से २६ फरवरी तक सिवनी नगर में आयोजित की जायेगी। इस एतिहासिक निर्णय की जानकारी सिवनी नगरपालिका के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने नगर पालिका कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान प्रदान की। इस अवसर पर जिला कलेक्टर मनोहर दुबे, पुलिस अधीक्षक आर.के. जैन, नगरपालिका उपाध्यक्ष राजिक अकली, अनेक पार्षद जिला हॉकी संघ के पदाधिकारी, और पत्रकार उपस्थित थे। नगरपालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने जानकारी देते हुए बताया कि सिवनी जिले की पहचान हॉकी से है और हॉकी को इस जिले ने राष्ट्रीय स्तर के भी खिलाड़ी उपलब्ध कराये है। हॉकी के क्षेत्र में ऐसी प्रतिभाओं को इस प्रकार के एतिहासिक आयोजन से सम्बल प्रदान होगा आर्थिक आर्थिक परेशानियों के कारण हॉकी के भव्य आयोजन सम्भव नहीं हो पा रहे थे खिलाडिय़ों एवं खेल प्रेमियों की भावनाओं के अनुरूप सिवनी नगरपालिका परिषद ने सर्व सम्मत्ति से यह निर्णय लिया है कि हर वर्ष सिवनी नगर पालिका परिषद अखिल भारतीय गोल्ड कप हॉकी प्रतियोगिता का आयोजन करेगी और इस एतिहासिक निर्णय का आगाज १६ फरवरी से प्रारंभ होगा। उद्घाटन अवसर पर भारतीय हॉकी के सरताज धनराज पिल्ले को आमत्रित किया गया है, उद्घाटन के अवसर पर म.प्र. शासन के कुछ मंत्री और खेल से सम्बन्धित अनेक प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहेंगे नगरपालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने बताया कि ऐसे भव्य आयोजन की सफलता के लिए संरक्षक मंडल भी बनाया गया है, जिसमें सिवनी बालाघाट सांसद के.डी. देशमुख, सिवनी विधायक श्रीमती नीता पटेरिया,  जिला कलेक्टर मनोहर दुबे, पुलिस अधीक्षक आर.के. जैन का समावेश है। जिला हॉकी संघ इस आयोजन का आयोजक रहेगा प्रतियोगिता में सभी टीमों को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी जिला हॉकी संघ को सौंपी गई है। जिला हॉकी संघ के डी.एल. गौर ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए २० टीमों की स्वीकृति प्राप्त हो गई है सभी राष्ट्र स्तर की टीमें हैं। उन्होंने जानकारी दी है कि जिन टीमों की स्वीकृति प्राप्त हुई है उनमें यूनाईटेड लखनऊ, ई.एम.ई. जालंधर, सेल पाम्पोस राऊरकेला, आर.सी.एफ. बाम्बे, डी.एल.डब्ल्यू. बनारस, बी.ई.जी. पूना, टाउन हाल बल्व शाहजहानंपुर, एस.सी.ई. रेल्वे बिलासपुर, सांई हास्टल राजनांदगांव, स्टेअ अकादमी भोपाल, डब्ल्यू.सी.आर. भोपाल, सांई हास्टल भोपाल, सेन्ट्रल रेल्वे नागपुर, जिला हॉकी संघ ब्रम्हपुरी, जिला हॉकी संघ जबलपुर, जिला हॉकी संघ बालाघाट, अमरावती इलेवन स्टार, मऊ ब्लूज, जिन्दल स्टील अकादमी रायगढ़, डब्ल्यू.सी.ओ. हुगली बेंगलोर की टीमों ने प्रतियोगिता में शामिल होने की स्वीकृति प्रदान कर दी है।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

धनकुबेरों के सामने घुटने टेकती सरकार


‘गोरों‘ के पास जमा है भ्रष्टाचारियों का ‘काला‘ धन

आखिर सरकार डर क्यों रही है हमारा ही पैसा वापस लाने से

नाम सार्वजनिक कर राष्ट्रदोहियों की सजा हो मुकर्रर

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य की सरकारों के लिए इससे अधिक शर्म की बात और क्या होगी कि देश के हर एक आदमी के गाढ़े पसीने की कमाई पर सरेआम डाका डालकर धनपति बने लोगांे ने अपनी अकूत दौलत को देश से बाहर के बैंकों में जमा कर रखा है, और सरकार उनके सामने बौनी ही नजर आ रही है। स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने पिछले दो सालों से स्विस बैंक में जमा काला धन वापस स्वदेश लाने की हिमायत की जा रही थी। पहले तो लोगों को लगता था कि बाबा रामदेव की मति फिर गई है, बाद में जब बाबा ने गांव गांव में इस अलख को जगाया तब लगा कि वाकई हमारे कर्णधारों ने कितना काला धन विदेशों जमा कर रखा है।

भ्रष्टाचार, अनाचार, योनाचार, घपले घोटाले अब तो किंवदतीं से बनकर रह गए है। चालीस के पेटे में पहुंच चुके लोगों की स्मृति पटल से पराधीनता और आजादी के किस्से विस्मृत नहीं हुए होंगे। उन्हें यकीनन लगता होगा कि सालों साल देश पर राज करने के बाद भी महमूद गजनवी या ब्रितानियों ने देश को इस कदर नहीं लूटा होगा जिस कदर आजादी के उपरांत हमारे अपने ही लोगों द्वारा सतत लूटा जा रहा है। देखा जाए तो सरकार की जवाबदारी होती है हर नागरिक को हर तरीके से सुरक्षा प्रदाय करने की। विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत सरकार देश के नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में पूरी तरह अक्षम रही है।

यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर इन धनपतियों के पास अकूत दौलत आई कहां से? क्या इनके पास कोई टकसाल है? जी नहीं आम भारत वासी सुबह उठकर जो चाय पीता है वहां से लेकर रात को सोने तक चाय, पानी, बिजली, परिवहन, खान पान आदि पर जो कर देता है, उससे ही देश चलता है, उसी से देश के जनसेवकों के एशो आराम की सुविधाएं जुगाड़ी जाती हैं। उसी से देश के विकास के प्रोग्राम का खाका खीचा जाता है, फिर उसमंे भ्रष्टाचार कर पैसा बनाया जाता है, जो काले धन के तौर पर देश और विदेश के बैंकों में जमा होता है।

कितने आश्चर्य की बात है कि देश की शीर्ष अदालत को इस बारे मेें सरकार से जवाब तलब करना पड़ा। देश के जाने माने अधिवक्ता राम जेठमलानी कहते हैं कि वे जानते हैं कि किसका कितना काला धन विदेशों में जमा है। सवाल फिर वही है कि अगर जेठमलानी जानते हैं तो वे किस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं इन राष्ट्रदोहियों के नाम सार्वजनिक करने में। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि अगर सरकार को पता चलता है कि एक गरीब आदमी ने बेहिसाब पैसा विदेशी बैंकों में जमा करवाया है तो वह उस आदमी का क्या करेगी? क्या सिर्फ उससे टेक्स वसूलकर ही उसे छोड़ दिया जाएग? क्या सरकार इस धन के स्त्रोत को पता करने का प्रयास नहीं करेगी? क्या इस पैसे का उपयोग देश के खिलाफ षणयंत्रों में नहीं हो सकता? और भी न जाने कितने प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही हैं।

दुनिया के चौधरी अमेरिका ने इस मामले में बहुत ही सख्त नियम बनाकर रखे हैं। अमेरिका के यूएसएस पेट्रियाट एक्ट के तहत विदेशों में जमा करने वालों का खुलासा करने का प्रावधान है। इसमें अमरिकी नागरिक की संपत्ति तक जप्त करने का प्रावधान भी है। वहां की सरकार बैंकों से अपने नागरिकों के जमा धन का ब्योरा मांग सकती है। यही कारण है कि अमेरिकी नागरिक विदेशों में जमा काले धन के मामले में काफी हद तक निचली पायदान पर हैं।

एक अनुमान के अनुसार भारत का 1400 अरब डालर, चीन का 96 अरब डाल, यूक्रेन का 100 अरब डालर, इंग्लेण्ड का 390 अरब डालर, रूस का 470 अरब डालर स्विस बैंक में जमा है। आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो भारत गणराज्य का साढ़े बाईस लाख करोड़ रूपया विदेशों में जमा करवाया गया है, जिसका दो तिहाई हिस्सा इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में जमा करवाया गया है।

बाबा रामदेव के काले धन को वापस लाने के एजेंडे पर अब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी चल पड़े हैं। राहुल गांधी ने भी काले धन को विदेशों में छुपाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि हमें सुनिश्चित करना होगा कि देश का पैसा देश में ही रहे विदेश मंे न भेजा जाए। लाख टके का सवाल यही है कि नेहरू गांधी परिवार के इशारे पर ठुमके लगाने वाली केंद्र सरकार को क्या सोनिया और राहुल गांधी कड़े कदम उठाने पर बाध्य कर पाएंगे। हालात देखकर तो यही लगता है कि बाबा रामदेव को विदेश के काले धन एजेंडे में मिलने वाले पालीटिकल माईलेज से घबराकर राहुल गांधी ने भी यही आलाप छेड़ दिया है।

बहरहाल केंद्र सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय संधि का रोना रोकर उच्च न्यायलय में हाथ खड़े कर दिए हैं, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। केंद्र ने बेहिसाब संपत्ति की घोषणा के लिए स्वेच्छा के दरवाजे खोलने के संकेत दिए हैं। लगता है सरकार इस मामले की गंभीरता को समझने के बजाए लोगों का ध्यान इससे भटकाना चाह रही है। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। देश का कोई भी सूबा एसा नहीं है जहां कि राजनेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों की तिजोरियों नोट न उगल रही हों। लगता है कि सरकार ने इनकी सहूलियत के लिए ही पांच सौ और एक हजार के नोट प्रचलन में लाए हैं, ताकि अधिक राशि को कम स्थान पर संग्रहित किया जा सके। सरकार की इच्छा शक्ति अगर तगड़ी है तो उसे पांच सौ और एक हजार के नोटों का चलन तत्काल ही बंद कर देना चाहिए वह भी बिना किसी नोटिस के, क्योंकि पांच सौ और एक हजार तक के नोट आम आदमी के काम के हैं ही नहीं। फिर वही स्थिति बनेगी जो पहले बनी थी, जब दस हजार के नोट बंद कर दिए गए थे। कालाबाजारियों ने बेकार हो चुके दस हजार के नोटों को जलाकर आग तापी थी। आज भी कमोबेश वही स्थिति बनी हुई है। सरकार अगर समय रहते कदम उठा ले तो ठीक वरना हालात के विस्फोटक होने में समय नहीं लगने वाला।

भाजपा का तीन दिनी चिंतन शिवर 8 से नागपुर में


भाजपा का तीन दिनी चिंतन शिवर 8 से नागपुर में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। एक अर्से से सुसुप्तावस्था में पड़ी भारतीय जनता पार्टी में जान फूंकने के लिए तीन दिवसीय चिंतन शिविर का आयोजन आठ फरवरी से महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर में किया जाने वाला है, जिसमें देश भर के भाजपा के सांसद, विधायक, प्रदेशाध्यक्ष हिस्सा लेंगे। शिविर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज, राज्यसभा के अरूण जेतली और भाजपा के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद मार्गदर्शक के बतौर उपस्थित रहेंगे।

भाजपा के आला दर्जे के सूत्रों ने उक्ताशय की जानकारी देते हुए बताया कि चिंतन शिविर का उद्घाटन 8 फरवरी को भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी द्वारा नागपुर के रेशम बाग मैदान में तो 9 और दस फरवरी का शिविर देशपांडे सभागार में होगा, जिसका समापन राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी करेंगे।

सूत्रों ने संकेत दिए कि इस शिविर में मंहगाई, भ्रष्टाचार, घोटालों, काले धन आदि मामलों में भाजपा की धार पैनी करने पर विमर्श किया जाएगा, साथ ही साथ राजग गठबंधन को छोड़कर गए दलों को वापस लाने के लिए भी कोर कमेटी का गठन किया जाएगा। उत्तर प्रदेश चुनावों के मद्देनजर संगठन की मजबूती के मसले पर भी विमर्श होने की उम्मीद है। इसमें सबसे अहम मसला यह होगा कि जिन सूबों में भाजपा के विवादस्पद मंत्री हैं, उनकी मश्कें कैसे कसी जाएं।

नर्मदा कुंभ पर पड़ेगा शिविर का साया

मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छत्रछाया में पुण्य सलिला मां नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में मां नर्मदा सामाजिक कुंभ पर इस चिंतन शिवर की परछाईं पड़ने की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब होगा कि यह कुंभ 10 से 12 फरवरी तक प्रस्तावित है, साथ ही नागपुर का चिंतन शिविर 8 से 10 फरवरी तक संपन्न होगा।

केंद्र पर भेदभाव के आरोप लगाए शिवराज ने


दिग्विजय का नाम आते ही असहज हो जाते हैं शिवराज


नई दिल्ली (ब्यूरो)। आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान केंद्र सरकार पर जमकर बरसे। मध्य प्रदेश भवन में मीडिया से रूबरू शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए मध्य प्रदेश के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप लगाया। जैसे ही कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के आरोपों का जिक्र आया, वैसे ही शिवराज सिंह बिदक गए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि एमपी में 34 लाख किसानों की 35 लाख हेक्टेयर खड़ी फसल पाले ने चौपट कर दी है, जिससे लगभग साढ़े सात हजार करोड़ रूपए का नुकसान होने का अनुमान है। राज्य ने इसके लिए केंद्र से चोबीस सौ करोड़ रूपए की मांग की है। श्री चौहान ने कहा कि राज्य सरकार ने इसके लिए तत्काल 600 करोड़ रूपए स्वीकृत किए हैं।

संवाददाताओं द्वारा जब मुख्यमंत्री से धार्मिक आतंकवाद के बारे में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम के बयान के बारे में पूछा गया तो शिवराज सिंह चौहान सहज नहीं थे। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह केवल राजनीति करते हैं। मध्य प्रदेश धार्मिक आतंकवाद की जद में नहीं है। उन्होंने कहा कि वे दिग्विजय सिंह की बातों पर टिप्पणी करना मुनासिब नहीं समझते हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में किसानों की फसलें जिस तरह से तबाह हुई हैं, उसे देखकर उनकी मदद करना अत्यावश्यक है, वरना आने वाले समय में खाने पीने के लाले के चलते ये किसान ही कानून व्यवस्था बिगाड़ सकते हैं। श्री सिंह ने कहा कि प्रदेश में बंग्लादेशी घुसपेठिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। लूट, डकैती, राहजनी आदि की अनेक वारदातों में बंग्लादेश के नागरिकों को भी पकड़ा गया है।

उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश आतंकवादी एवं उच्छेदक गतिविधि तथा संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक 2010 भी केंद्र के पास भेजा गया है, जिस पर केंद्र अपनी मुहर लगाकर वापस भेज दे ताकि सूबे में इसे कारगर तरीके से लागू किया जा सके। इसके अलावा भोपाल के समीप डीएसपी स्तर के अधिकारियों के प्रशिक्षण स्कूल के लिए सरकारी भूमि उपलब्ध कराई जा चुकी है और सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के लिए बालाघाट जिले में भूमि की खोज जारी है। केंद्र सरकार अन्य सुरक्षा इकाईयों को मध्य प्रदेश में स्थापित करना चाहे तो सूबा उसका स्वागत करेगा।

रेल में मिलेंगे डिस्पोजेबल बिस्तर


अब गंदे बेडरोल को बाय कहिए

यूज एण्ड थ्रो स्कीम का सफल परीक्षण

नई दिल्ली (ब्यूरो)। भारतीय रेल में वातानुकूलिए श्रेणी में यात्रा करने वालों के लिए एक खुशखबरी है, कि आने वाले समय में उन्हें बदबूदार गंदे तौलिए, तकिए, चादर आदि से निजात मिलने वाली है। रेल विभाग ने यात्रियों को डिस्पोजेबल बेड रोल देने की योजना का आगाज किया है।

बताया जाता है कि रेल्वे द्वारा यात्रियों को टिश्यू पेपर से निर्मित तकिया और तोलिया प्रदाय किया जाना प्रस्तावित किया जा रहा है। इस योजना के परीक्षण के परिणाम बेहद ही सफल और उत्साहजनक आने के उपरांत रेल्वे ने इस माह के अंत में इसे गुवहाटी राजधानी में लागू करने का मन बनाया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में यात्रियों को डिस्पोजेबल बेड रोल समस्त राजधानी एक्सप्रेस, गरीब रथ, दुरंतो, सुपर फास्ट और चुनिंदा मेल एक्सप्रेस में भी प्रदाय किए जाएंगे। वर्तमान में यात्रियों को कपड़े की चादर, कंबल, के साथ ही साथ टिश्यू पेपर से निर्मित तकिया का गिलाफ और तौलिया प्रदाय किया जाएगा। भविष्य में इसी का चादर भी यात्रियों को मिल सकेगा।

आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन


किसानों में अशांति से भी देश में आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है

मुख्यमंत्री श्री चौहान की प्रधानमंत्री से किसानों के लिए 2442 करोड़ रूपये के पैकेज की मांग

नई दिल्ली, (ब्यूरो) मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज यहां नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए देश के सभी मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि किसानों को उनकी फसलांे का उचित एवं लाभकारी मूल्य दिलाया जाए। किसानों की फसलों को नुकसान होने पर उन्हें फसल बीमा योजना और अन्य राहत एवं सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं। बीमा योजना को इस प्रकार व्यवहारिक बनाया जाए जिससे किसानों को उनकी फसलों का नुकसान होने पर बीमा का लाभ मिल सके। देश का किसान अगर असंतुष्ट और अशांत रहेगा तो इससे देश में आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। श्री चौहान ने आज मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह और अन्य केन्द्रीय मंत्रियों का ध्यान आकर्षित किया कि प्रदेश में पाला पड़ने के कारण 34 लाख किसानों की 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसल बर्वाद हो गयी है। प्रदेश के 50 में से 46 जिलों में पाला पड़ने से 7500 करोड़ रूपये की फसलों का नुकसान हुआ है। फसलों के खराब होने से किसानों में सदमे की स्थिति है।

श्री चौहान ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि शीघ्र ही केन्द्रीय अध्ययन दल भेजकर फसलों को हुए नुकसान का आंकलन कराया जाए और किसानों को राहत दी जाए। श्री चौहान ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन दिया जिसमें 2442 करोड़ रूपये के पैकेज की मांग की। मध्यप्रदेश सरकार ने अपने बजट से 600 करोड़ रूपये की राशि किसानों को राहत देने के लिए स्वीकृत की है। किसानों के सहकारी ऋण माफ कर दिये गये हैं और सहकारी ऋणों का ब्याज सरकार भरेगी। अगले वित्त वर्ष से किसानों को एक प्रतिशत की ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जायेगा। राष्ट्रीयकृत बैंकों के किसानों के ऋण माफ करने के लिए केन्द्र सरकार आदेश प्रदान करे। किसानों को फसल बीमा योजना का लाभ दिलाया जाए। किसानों को समर्थन मूल्य के बजाय लाभकारी मूल्य दिया जाए क्योंकि फसल की लागत बढ़ गयी है।

श्री चौहान ने भ्रष्टाचार को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए कहा कि इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कानून बनाया जा रहा है जिसमें भ्रष्ट तरीके से एकत्रित की गयी सम्पत्ति को राजसात करने का प्रावधान किया जा रहा है। भ्रष्टाचार के मामलों में एक साल में न्यायालयों द्वारा निर्णय दिया जायेगा। प्रदेश में आम नागरिकों के काम समय सीमा में हो सकें इसके लिए मध्यप्रदेश लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाया गया है। समय सीमा में नागरिकों के काम नहीं होने पर अधिकारियों पर जुर्माना लगाया जायेगा और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जायेगी। श्री चौहान ने काले धन की रोकथाम के लिए हजार और पांच सौ रूपये के नोटों को बंद करने का भी आग्रह किया। इससे जाली नोटों पर भी अंकुश लग सकेगा।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने बैठक में बताया कि प्रदेश में पांच हजार सिपाहियों की भर्ती की जा रही है। भूतपूर्व सैनिकों की भी एक बटालियन बनायी जा रही है। इंडियन रिजर्व बटालियन के गठन की केन्द्र सरकार से अभी तक स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। प्रदेश में राज्य औद्योगिक सुरक्षा बल की एक बटालियन भी शीघ्र गठित की जा रही है। श्री चौहान ने नक्सली प्रभावित प्रदेश के सात जिलों को भी एस.आर.ई. योजना में शामिल करने का आग्रह किया है। अभी केवल बालाघाट जिला इसमें शामिल किया गया है।

श्री चौहान ने कहा कि देश में आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है। विश्व में अन्य प्रजातांत्रिक देशों ने भी अपनी सुरक्षा एवं आतंकवादी घटनाओं से अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए हैं। प्रदेश में संगठित अपराधों की रोकथाम के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने एक विधेयक केन्द्र सरकार के पास स्वीकृति के लिए भेजा है जो काफी समय से लंबित है। इस सम्बन्ध में राज्य विधानसभा द्वारा मध्यप्रदेश आतंकवादी एवं उच्छेदक गतिविधि तथा संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक 2010 पारित कर केन्द्र सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया है। श्री चौहान ने इसको शीघ्र स्वीकृति प्रदान करने की आवश्यकता को दोहराया।

श्री चौहान ने पड़ोसी राज्यों से अनधिकृत बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या के बारे में ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में लोग प्रदेश के अनेक स्थानों पर श्रमिकों के रूप में मजदूरी करने के लिए आते हैं जिससे हमारे श्रम बाजार पर विपरीत असर पड़ता है। घुसपैठियों द्वारा पहचान पत्र बनवाकर भारतीय नागरिकों का हक भी प्राप्त कर लेते हैं। श्री चौहान ने आग्रह किया कि यू.आई.डी. कार्ड सघन जांच के बाद ही बनाये जाएं।

इंटेलीजेंस विंग के सुदृढणीकरण के लिए 331 पदों की स्वीकृति दी जा चुकी है। इस शाखा के कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने के लिए तीन वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा की है- सर्वश्रेष्ठ टीम वर्क के लिए गनीमी कावा पुरस्कार, पूरे वर्ष में सतत इंटेलीजेंस संबंधी अच्छे कार्य के लिए चाणक्य पुरस्कार और तीसरा किसी सर्वोत्कृष्ट विशेष कार्य के लिए छत्रसाल पुरस्कार दिया जायेगा।

बैठक में प्रदेश के गृहमंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता, मुख्य सचिव श्री अवनि वैश्य, पुलिस महानिदेशक श्री एस.के. राउत, अतिरिक्त महानिदेशक श्री ऋषि कुमार शुक्ला, गृह सचिव श्री सर्वजीत सिंह और अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

Chief Ministers Conference on Internal Security

Dissatisfaction among Farmers will threaten Internal Security



Relief Package to the tune of Rs. 2442 crore for Farmers



New Delhi, February 1, 2011. Shri Chouhan called upon the centre to immediately provide relief to the state to the tune of Rs. 2442 crore as relief package for the 34 lakhs farmers whose crops have been damaged by severe cold wave and frost. Almost 46 of the 50 districts of the state has been affected. The effect of recent tragedy of loss of crops coupled with the rising prices has doubled their sufferings and their economic conditions have become very alarming. If adequate and immediate aid to such farmers is not provided, it will breed dissatisfaction in the people and will threaten internal security of the country. Shri Chouhan was speaking at the conference of Chief Minister on Internal Security called by Union Home Minister Shri P. Chidamberam and chaired by the Prime Minister Dr. Manmohan Singh. The conference was attended by Chief Minister of other states. Shri Chouhan was acompanied by State Home Minister Shri Uma Shankar Gupta, Chief Secetary Shri Avani Vaish, DGP Shri S.K. Rout and other senior officials.



Madhya Pradesh Chief Minister Shri Shivraj Singh Chouhan called for making a strict anti-terrorism law for the country like other democracies of the world, who have enacted strict laws to protect their citizens from terrorist activities and to ensure their securities. He said that there is a need to have tough effective laws and political will to deal with.



Pointing at the large and illegal infiltration from bordering states to M.P., Shri Chouhan said that this has adversely affected the labour market and provided fertile grounds for anti national activities. He called for an urgent need to check infiltration as this can pose a grave danger for the future if some how they are able to get UID cards Shri Chouhan called for a strict monitoring before issuing census UID cards. He informed that at state level, strict instructions have been issued to identify and extradite such infiltrations. ...........2



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Shri Chouhan said that control over the activities of various organised crime cartels is essential to ensure internal security. For effective action against terrorist activities and organised crime, Shri Chouhan said that the state Vidhan Sabha has passed the "M.P. Terrorist and Disruptive Activities and Organised Crime Control Act 2010" and is pending with Government of India for its approval. Shri Chouhan urged for its early approval.

Reiterating the State Government's commitment on Internal Security & law and order, he said that an atmosphere of security coupled with an effective delivery system lends impetus to development. Informing about the steps taken by State Government in this direction he said that strict laws are enacted to check corruption in Public Services. The "M.P. Special Court Act" is slated to be placed in the coming Vidhan Sabha Session, increasing the strength of police force, till now about 4500 post have been sanctioned and in next 3 years 6500 additional post will be created as per the ratio of population, formation of ex-service man battalion and State Industrial Security Force (SISF) and formation of a new I.R. Battalion has been sent to the centre for approval, sanctioned 331 posts for strengthening of Intelligence wing. 3 annual award has been announced for best team work Ganimi Kava continuous good works- Chanakya award and special achievement awards for motivating the staff, a subsidiary Multi Agency Centre (SMAC) has been established, the system needs to be improved for better and effective co-ordination between agencies of various states and central agencies formulating as Establishment Board and police complaint Authority in compliance to the Supreme Court directions on Police Reforms, the drafting of a new Police Act is also underway. The Police modernisation plan has been in place for the last 10 years.

विधानसभा उपाध्यक्ष के विधानसभा क्षेत्र और महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में महिलाओं पर ऐसे होते हैं अत्याचार

सिवनी जिले में चल रही ऐसी गुण्डागर्दी

 दबंगों ने विधवा महिला को दौड़ा-दौड़कर बीच बाजार में पीटा

 पुलिस ने रिपोर्ट भी दबंगों से पूछकर लिखी

(मनोज मर्दन त्रिवेदी)

सिवनी कान्हीवाड़ा थाना मुख्यालय के ग्राम में एक महिला को एक साहू परिवार एवं अन्य सहयोगी सदस्यों द्वारा दिन दहाड़े दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। कान्हीवाड़ा का एक भी व्यक्ति उस महिला के बचाव में खड़ा नहीं हुआ महिला को जहां-तहां पूरे शरीर में चोट के निशान हैं और सिर पर गंभीर चोट आयी है १४ टॉके सिर में लगे होने की बताई गई। जिस निर्ममता से उक्त महिला की पिटाई की गई है वैसा यू.पी. बिहार जैसे क्षेत्रों में भले ही आम बात हो परंतुु म.प्र. के अंदर महिलाओं के साथ इस प्रकार का दुव्र्यवहार  नहीं होता  परंतु थाना कान्हीवाड़ा के अंतर्गत इस प्रकार की घटना घटित हुई और पुलिस ने महिला की रिपोर्ट को लिखने में भी  कंजूसी दिखाई महिला का सरे बाजार  अपमान किया गया। सार्वजनिक रूप से जूते, चप्पलों से साहू परिवार के व्यक्तियों द्वारा पीटा गया यहां तक कि पुलिस विभाग के कर्मचारी के घर में वह घूसकर अपने प्राणों की रक्षा की गुहार लगा रही थी उसे लग रहा था कि वह पुलिसवाले के घर में सुरक्षित हो जायेगी परंतु गुण्डागर्दी पर आमदा दबंगों ने उक्त महिला की पुलिस वाले के घर के अंदर घुस कर लात, जूतों से पिटाई की।
महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती नीता पटेरिया के गृह जिले और म.प्र. विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह के विधानसभा क्षेत्र में महिलाओं की इस प्रकार की दुर्दशा क्या स्वर्णिम म.प्र. की कल्पना के अनुरूप कही जा सकती है। मिली जानकारी के अनुसार जब पूरे म.प्र. में गणतंत्र दिवस का जयघोष किया जा रहा था, उसी समय कान्हीवाड़ा थाना मुख्यालय में एक विधवा महिला अनीता सोनी के बच्चों के आपसी विवाद को दबंग साहू परिवार के व्यक्तियों द्वारा इतना तूल दिया गया कि वे उक्त विधवा महिला को कान्हीवाड़ा छोड़कर जाने का दबाव देने लगे, विरोध करने पर अनीता सोनी के साथ साहू परिवार के लड़कों ने जमकर मार-पीट की इसकी पुलिस रिपोर्ट लिखाने जब वह थाने पहुंची तो रिपोर्ट दजर््ा नहीं की गई। अलबत्ता थाने से लौटते वक्त उक्त महिला को बीच बाजार में साहू परिवार के लड़कों द्वारा मारा जाने लगा। वह ऐसी अपमान जनक स्थिति से बचने के लिए भागी और एक पुलिस वाले के  घर में शरण ली वहंा भी साहू परिवार के लड़को  ने उसकी लात जूतो से पिटाई की और उसके सिर में जान लेवा हमला किया, बुरी तरह लहूलुहान महिला बेहोश हो गई, और उसके पश्चात से वह अपने आप को जिला चिकित्सालय में पा रही है। थाना कान्हीवाड़ा से जानकारी लेने पर पहले तो कोई जानकारी नहीं दी गई। बमुश्किल एक आरक्षक द्वारा बताया गया है कि साहू परिवार एवं उक्त महिला के बच्चों का कोई झगड़ा था, जिसको लेकर कोई विवाद हुआ है, दोनो पर कांउटर केस दर्ज किया गया है। महिला ने एक साहू लड़के को बुरी तरह हाथ में काटा है आरक्षक द्वारा यह भी बताया गया है कि उक्त महिला विक्षिप्त प्रकृति की है। जबकि महिला जो जिला चिकित्सालय में ईलाज करा रही है, कहीं से कहीं तक विक्षिप्त नजर नहीं आती। विक्षिप्त महिला के साथ भी इस प्रकार का अत्याचार किया जाये तो यह महिला क्रूरता  के दायरे में आता है और इतने घिनोने कृत्य पर थाना कान्हीवाड़ा द्वारा मात्र धारा ३२४ का अपराध पंजीबद्ध किया गया है। वह भी दोनो के ऊपर। इस प्रकार की कार्यवाही पुलिस की छवि को कैसे निष्पक्ष रख पायेगी यह विचारर्णीय प्रश्र है? म.प्र. विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंशसिंह के विधानसभा क्षेत्र में दबंग व्यक्तियों द्वारा एक विधवा महिला के साथ सार्वजनिक रूप से मार पिटाई की जाये। सिर पर जान लेवा वार किया जाये और आरोपियों पर मात्र धारा ३२४ का अपराध पंजीबद्ध होना, दबंगों को खुला संरक्षण ही समझ आता है। महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष के  गृह जिले में ही महिलाओं की दुर्दशा  पर इस प्रकार की कार्यवाही निंदनीय और दुखद है। जिले के वरिष्ठ अधिकारियों से अपेक्षा है कि सारे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर विधवा महिला को न्याय प्रदान किया जाये।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

900वीं पोस्‍ट

कांग्रेस में वंशवाद पसारेगा पैर

 

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी द्वारा युवाआंे को आगे लाने की हिमायत भले ही जोर शोर से की जा रही हो, किन्तु जाने अनजाने मेें वे अपनी ही तरह महाराष्ट्र प्रदेश में राजपुत्रों को सियासत में आने के मार्ग प्रशस्त करते नजर आ रहे हैं। सूबे में अमित देशमुख,सत्यजीत तांबे, राव साहेब शेखावत, प्रणिती शिंदे, नितेश राणे जैसे नेताआंे के पुत्र जल्द ही सियासत की बिसात पर कदम ताल करते नजर आएंगे। राहुल गांधी चाहते हैं कि गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को राजनीति में उभरने का मौका दिया जाए। इसके लिए निष्पक्ष तरीके से चुनाव करवाकर लोकसभा, विधानसभा, प्रदेशाध्यक्ष जैसे पदों के लिए युवाओं का चयन किया जाना है। 16 फरवरी तक महाराष्ट्र में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है, इसके उपरांत चुनाव कराया जाना सुनिश्चित है। राजनैतिक पंडितों का मानना है कि राज्य में स्थापित इन घाघ नेताओं के वारिसान अपने अपने पिताओं की लोकप्रियता का फायदा उठाकर उनके समर्थकों की फौज कार्यकर्ता के तौर पर खड़ी कर लेंगे, फिर अपने पक्ष में मतदान करवाकर अध्यक्ष के साथ ही साथ लोकसभा, विधानसभा की टिकिट भी हथिया लेंगे। हो सकता है राहुल गांधी को इस तरह का मशविरा देने वालों ने पहले ही अपनी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर लिया गया हो। राहुल गांधी को सियासत भले ही विरासत मे मिली हो, पर वे राजनैतिक ककहरा से अभी अनिभिज्ञ ही लग रहे हैं।

इटली का नाम न लो, अच्छा नहीं होगा



इटली का नाम न लो, अच्छा नहीं होगा
इटली का नाम आते ही कांग्रेस के नेताओं की भवें तन जाती हैं। इसका कारण कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का इटली मूल का होना है। राकापां के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने जब इटली को गठबंधन सरकारों का घर बताया तो कांग्रेसी बिफर गए। दरअसल कांग्रेसी अपनी सुप्रीमो सोनिया को इटली से दूर रखना चाह रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि युद्ध के बाद इटली में चार दर्जन गठबंधन सरकारें अस्तित्व में आई हैं, और सफल भी रही हैं। कांग्रेस के युवराज मंहगाई को गठबंधन सरकार से जोड़कर बयानबाजी कर रहे हैं जो केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की राकांपा को रास नहीं आ रहा है। युवराज भूल जाते हैं कि सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में जब कांग्रेस का एकछत्र राज कायम था तब मंहगाई ने पैर पसारे और जेपी आंदोलन का आगाज हुआ था। देखा जाए तो त्रिपाठी का कथन सही है, उन्होंने एक ही तीर से अनेक निशाने साध लिए हैं, जिनका जवाब कांग्रेस खोजने में लगी हुई है।

प्रणव के लिए ममता को मनाया सोनिया ने
कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को प्रणव मुखर्जी का साथ देना मजबूरी ही माना जाता है, क्योंकि प्रणव दा ने उनके पति राजीव गांधी के मार्ग में अनेक मर्तबा शूल बोए थे। हाल ही में प्रणव मुखर्जी के पुत्र अभिजीत के लिए पश्चिम बंगाल की नोनहाटी या लवपुर सीट को सुरक्षित रखने अर्थात वहां से त्रणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी को खड़ा न करने के मसले को लेकर सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच लंबी गुफ्त गू हुई। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के सूत्रों का कहना है कि सोनिया के आग्रह को ममता ने मान लिया है, पर किस शर्त पर? इसके जवाब में सूत्रों ने कहा कि पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर त्रणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी खासी खफा हैं। उन्होंने अपनी नाराजगी से सोनिया गांधी को आवगत करा दिया है। कोलकता की रायटर बिल्डिंग पर कब्जा जमाने का ख्वाब देख रहीं ममता के सामने पेट्रोल की बढ़ी कीमतें एक अवरोध बनकर उभर रही हैं। सूत्रों ने बताया कि दोनों ही महारानियों के बीच चर्चा का दौर जारी ही था कि अचानक ममता को खबर मिली कि मेदिनीपुर क्षेत्र में मकपा के कार्यकर्ताओं ने त्रणमूल कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया। ममता ने वहीं चर्चा को विराम देते हुए वहां से रूखसती डाल दी। ममता की नाराजगी के उपरांत सोनिया ने तत्काल ही पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को तलब किया। अब देखना है कि ममता के गुस्से के चलते देशवासी पेट्रोल की बढ़ी कीमतें देते हैं या फिर . . .।

तुम्हारा गोल गोल, हमारा गोल हाफ साईड
न्यायधीशों द्वारा ब्लाग्स और सोशल नेटवर्किंग वेव साईट के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करना कंेद्र के गले नहीं उतर रहा है। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने आचार संहिता का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट और समस्त उच्च न्यायलयों को पत्र लिखकर जवाब तलब किया है। गौरतलब होगा कि कर्नाटक के न्यायधीश शैलेंद्र कुमार ने सबसे पहले अगस्त 2009 में एक ब्लाग आरंभ किया था, जिस पर उन्होने सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की आलोचना की थी। कोलेजियम वस्तुतः पांच न्यायधीशों का एक दल होता है, जो न्यायधीशों के स्थानांतरण और नियुक्ति करता है। केंद्र सरकार का मानना है कि अगर माननीय न्यायधीशों ने यह सिलसिला नहीं रोका तो आने वाले समय में इस बारे में केंद्र को कठोर कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा इस तरह के तुगलकी फरमान जारी करने के पहले यह बात जेहन में अवश्य ही लानी चाहिए थी कि केंद्र सरकार के पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने आचार संहिता की चिंदी चिंदी उड़ाते हुए एक सोशल नेटवर्किंग वेब साईट पर अपने प्रशंसकों से न जाने क्या क्या शेयर किया था, यहां तक कि बतौर केंद्रीय मंत्री उन्होंने अपने आप को काम का बोझ तले दबे होने की बात भी कह दी थी। सवाल यह उठता है कि माननीय जनसेवक गोल मारे तो गोल और अगर कोई दूसरा गोल मारने जाए तो इन्हीं जनसेवकों में से एक उठकर सीटी बजा देगा और उसे हाफ साईड बताकर फाउल करार दे देगा।

विलास के सर पर कांटों भरा गिलास
आदर्श घोटाले में नाम आने के बाद भी ग्रामीण विकास सरीखा मलाईदार विभाग पाने वाले विलास राव देशमुख की पेशानी पर पसीनें की बूंदे देखकर लगने लगा है कि उनके सर पर कांटों भरा ताज रख ही दिया गया है। बजट सत्र में विलास राव देशमुख की अग्नि परीक्षा है। भूमि अधिग्रहण के मौजूदा कानून में उन्हें संशोधन करना ही है, वह भी उत्तर प्रदेश चुनावों के मद्देनजर। इसमें सबसे बड़ी अड़चन यह है कि त्रणमूल कांग्रेस इसके लिए किसी भी कीमत पर राजी होती नहीं दिख रही है। भूमि सुधार काननू में जरा भी बदलाव किया गया तो उसका असर पश्चिम बंगाल के चुनावों पर अवश्य ही पड़ेगा। इसके पहले विभाग के मुखिया रहे सी.पी.जोशी ने ममता बनर्जी को हरियाणा और गुजरात माडल भी दिखाया पर ममता इसमें हेरफेर को तैयार नहीं हैं। उधर ममता को बताया गया है कि मध्य प्रदेश में भूमि सुधार कानून में तब्दीली की तैयारी है, जिसमें किसान को उसकी भूमि पर लगने वाले उद्योग में भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। इससे उद्योग धंधे तो फलेंगे फूलेंगे ही साथ ही किसान के हितों का पूरा पूरा संरक्षण भी हो जाएगा। अब देशमुख पशोपेश में हैं कि वे आखिर ममता को मनाएं तो कैसे?
एमसीडी चुनाव: कशमकश जारी
अगले साल दिल्ली में नगर निगम चुनाव होने वाले हैं। देश की राजनैतिक राजधानी के निगम पर कब्जे के लिए सियासत बहुत तेज हो गई है। प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ही लिया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कांग्रेस की कमान संभाल ली है। इसी तारतम्य में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी से भेंट कर भावी रणनीति से उन्हें आवगत कराया। उधर भारतीय जनता पार्टी की वेतरणी को पार करवाने के लिए भाजपा के कद्दावर नेता वेंकैया नायडू ने दूसरा सिरा संभाल लिया है। नायडू ने साफ कह दिया है कि इस बार टिकिट उन्हीं पार्षदों को दी जाएगी, जिनकी कार्यप्रणाली से क्षेत्र की जनता संतुष्ट हो। 272 सीटांे वाली दिल्ली नगर निगम पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा 170 सीटों के साथ है, वहीं कांग्रेस के खाते में महज 76 सीट ही हैं। चुनाव मई 2012 के पहले होना है। उन भाजपाई पार्षदों की रातों की नींद उड़ी हुई है, जिन्होंने इन चार सालों में सिर्फ मलाई ही काटी है। दिल्ली में प्रबुद्ध वर्ग आधिक्य में है, इसलिए कामन वेल्थ घोटाला, टूजी घोटाला और भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार के साथ ही साथ दिल्ली में बढ़ता अपराध का ग्राफ कांग्रेस के लिए नकारात्मक ही साबित होने वाला है।

कहां गायब हो रहे हैं हरियाणावासी
हरियाणा सूबे से हर रोज पांच लोगों की ‘गुमइंसान‘ रिपोर्ट दर्ज हो रही है। हरियाणा पुलिस की आधिकारिक वेब साईट के आंकड़े बताते हैं कि सूबे से गायब होने वाले महिला और पुरूषों में साठ फीसदी से ज्यादा लोग 15 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के हैं। पिछले आधे साल में सूबे से 800 से ज्यादा लोग गायब हैं, जिनमें सबसे ज्यादा फरीदाबाद से 91 हैं। आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो 16 जुलाई से 16 दिसंबर तक हिसार से 60, झज्जर, जींद से 45-45, सिरसा से 44, कुरूक्षेत्र से 39, पानीपत से 39, रोहतक से 29, पंचकुला से 26, कैथल से 24, भिवानी से 23, रेवाड़ी से 20, पलवल से 16 एवं मेवात से 2 लोग गायब हुए हैं। इतने व्यापक पैमाने पर लोगों के गायब होने से लोग हैरान और पुलिस परेशान है। माना जा रहा है कि प्रेम प्रसंग के चलते युवा हरियाणा से भाग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानव तस्करी की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। दिल्ली से सटे हरियाणा राज्य की पुलिस का अन्य सूबों की पुलिस के साथ बेहतर तालमेल न होने के चलते लोगों की पतासाजी का काम मंथर गति से ही चल रहा है।

पश्चिम बंगाल चुनावों का खामियाजा भुगत रही है रेल्वे
ममता बनर्जी भारत गणराज्य की रेल मंत्री हैं। जब से उन्हें रेल मंत्रालय का प्रभार संभाला है तब से वे पश्चिम बंगाल का ही भ्रमण कर रही हैं। ममता की अनदेखी का खामियाजा भारतीय रेल को बुरी तरह भुगतना पड़ रहा है। भारतीय रेल गंभीर अर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है, और कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही है। यह रेल बजट तो यात्रियों और माल ठुलाई के हिसाब से ठीक रहेगा, क्योंकि ममता को चुनावों की चिंता है, किन्तु आने वाले दिनों में रेल की यात्रा और माल ढुलाई इतनी मंहगी होने वाली है, जिसकी कल्पना देशवासियों को नहीं है। रेल मंत्रालय को पिछले बजट में 15 हजार 875 करोड़ रूपए मिले थे, जो फंुक चुके हैं। रेल कर्मियों और ठेकेदारों के अनेक भुगतान रोके जा रहे हैं। रेल महकमे ने वित्त मंत्रालय से तत्काल ही चालीस हजार करोड़ की मांग कर डाली है। छटवें वेतन आयोग के चलते रेल्वे पर 55 करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ा जिसमें से 36 करोड़ रूपए तो महज एरियर का ही था। रेल्वे की आय में 1,142 करोड़ रूपयों की गिरावट आई है जबकि खर्च 1,330 करोड़ रूपए बढ़ गया है।
यूपी में राहुल फेल
कांग्रेस के की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश से हैं, और उनके निर्वाचन क्षेत्र वाले सूबे में ही कांग्रेस औंधे मुंह पड़ी है। देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले इस सूबे में कांग्रेस की सांसें उखड़ने लगी हैं। राज्य में कांग्रेस का आलम यह है कि कांग्रेस के आला नेता ही सूबे में मुकाबले में खड़े होने में ही हिचक रहे हैं। पिछले दिनों राहुल गांधी ने राज्य के नेताओं से रायशुमारी की। रायशुमारी में केंद्र सरकार के घपले घोटाले की ही गूंज रही। थक हार कर राहुल गांधी को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि पुरानी बातों पर धूल डालिए, नए एजेंडे और नए हौसले के साथ जनता के बीच जाया जाए। उधर कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि जनता का भरोसा कांग्रेस पर से उठ चुका है। पिछले आम चुनावों में जनता ने मनमोहन सिंह की साफ सुथरी छवि को ही वोट दिया था, जो अब पूरी तरह दागदार हो चुकी है। आसमान छूती मंहगाई से जनता बुरी तरह त्रस्त दिख रही है। कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं का मत है कि जनता के बीच जाकर उसे बताया जाए कि मंहगाई का असली कारण राज्य सरकार की नीतियां हैं, जिस पर कार्यकर्ता सहमत होते नजर नहीं आ रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर अभी चुनाव हो गए तो कांग्रेस चारों खाने चित्त ही नजर आएगी।
बाबा रामदेव हो गए सियासी
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव को सियासत का पाठ पढ़ाने वाले वाकई कुशल प्रबंधक हैं। राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव दो सालों से देश भर में घूम घूम कर स्विस बैंक में जमा काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार मुक्त सियासत की वकालात कर रहे हैं। पहले तो उनकी बातें लोगों के दिमाग पर असर नहीं डाल पा रही थीं, किन्तु अब कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचारी चेहरे के खिलाफ जमीनी स्तर पर माहौल बनना आरंभ हो चुका है। लगता है बाबा रामदेव के सियासी गुरूओं की पढ़ाई पट्टी पर चलकर बाबा रामदेव ने जमीनी स्तर पर अपना एक प्लेट फार्म तैयार कर ही लिया है। बाबा की सभा में चालीस से पचास हजार की भीड़ जुटना आम बात है, लोग बाबा रामदेव से इसलिए भी जुड़ रहे हैं, क्योंकि बाबा दो सालों से भ्रष्टाचार को केंद्र बनाकर ही बयानबाजी कर रहे हैं। बाबा की बातों को कामनवेल्थ, टूजी, आदर्श सोसायटी, नीरा राडिया, तेल माफिया के घोटालों के कारण खासी हवा मिल रही है। कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकार चुनाव प्रबंधन पर जोर दे रहे हैं तो बाबा रामदेव इनका रायता फैलाने में लगे हैं। अब देखना महज इतना है कि बाबा रामदेव का अस्त्र आम चुनावों में चलता है या फिर चुनाव प्रबंधन के जरिए सरकार का गठन होता है?
सियासी मित्रों की नो एंट्री है सिंधिया दरबार में
यूं तो युवा तुर्क बनकर उभरे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सियासी मित्रों की कमी नहीं है, किन्तु जब उनके दरबार की बारी आती है तो सियासी मित्रों का प्रवेश वहां वर्जित ही है। 1 जनवरी 1971 को जन्मे सिंधिया ने नए साल की पहली किरण के साथ ही अपना चालीसवां जन्मदिन मनाया। यह क्या उनके जन्म दिन के जश्न में एक भी सियासी चेहरा नहीं दिखा। इस पार्टी में सिर्फ उनके मित्र ही शामिल हुए वे भी देश विदेश से आए हुए। सियासी हल्कों में इसकी गहरी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोगोें का कहना है कि राजनैतिक मित्रों को वे अपना मित्र नहीं मानते हैं, यहां तक कि इसके पहले उन्होंने अपने विभाग के कबीना मंत्री आनंद शर्मा तक को अपने जन्म दिन के जश्न में बुलाना मुनासिब नहीं समझा। आखिर ज्योतिरादित्य जनाधार वाले नेता हैं, सो उन्हें राजनैतिक मित्रों की बैसाखी की भला क्या जरूरत!
पुच्छल तारा
देश में मंहगाई आसमान छू रही है। चीजों के भाव कई गुना बढ़ चुके हैं। कहीं भी चाय पान या खाना खाने जाईए तो जेब हल्की होना स्वाभाविक ही है। एसी स्थिति में क्या देश में कोई जगह एसी है, जहां कम कीमत पर खाने को मिल जाए। आपका उत्तर होगा नहीं। नहीं जनाब, एसा नहीं है देश में एक जगह एसी भी है जहां माटी मोल खान पान की सामग्री बिकती है। पूना से अनुपम बहल ने ईमेल भेजकर यह जताया है। अनुपम लिखते हैं कि देश में एक जगह एसी है जहां आपको एक रूपए में चाय, साढ़े पांच रूपए में सूप, डेढ़ रूपए में दाल, एक रूपए की चपाती, साढ़े चोबीस रूपए में चिकन, चार रूपए का दोशा, आठ रूपए की वेज बिरयानी, तेरह रूपए की मछली एक प्लेट मिल सकती है। क्या आप जानना चाहेंगे कहां? यह सब कुछ गरीब लोगों के लिए है। यह है इंडियन पार्लियामेंट की केंटीन का रेट कार्ड, जहां देश के वे गरीब खाते हैं, जिन्हें रहने के लिए आवास, आने जाने के लिए एयर कंडीशन सफर सब कुछ निशुल्क के अलावा अस्सी हजार रूपए मासिक वेतन के साथ अनाप शनाप भत्ते मिलते हैं। यह सब देश के हर नागरिक से वसूले गए कर से ही निकलता है। मतलब साफ है कि मजे उड़ाएं देश के गरीब जनसेवक और भोगमान भोगे उन्हें चुनने वाली जनता।

चुनाव सुधार को लेकर संजीदा है चुनाव आयोग

मतदान की उम्र हो सकती है सोलह साल! 
अपराधियों को भी नहीं मिलेगा चुनाव लड़ने का मौका!
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत गणराज्य में चुनाव आयोग द्वारा पहली मर्तबा चुनाव सुधार की कवायद की जा रही है। चुनाव आयोग की अगर चली तो आने वाले समय में अपराधी चुनाव मैदान से बाहर हो सकते हैं, साथ ही साथ मतदान की आयु सीमा 18 से घटाकर 16 भी की जा सकती है।
चुनाव आयोग के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि चुनाव सुधार की गरज से बनाई गई अनेक समितियों की सिफारिशों पर जल्द ही सरकार कदम उठाने जा रही है। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग के नए दिशानिर्देर्शों के उपरांत भारतीय लोकतंत्र की काली छवि को निर्मल, उजली और स्वच्छ बनाया जा सकता है।
सूत्रों ने आगे बताया कि अपराधियों के प्रवेश रोकने के अलावा अब सोलह साल के युवाओं को भी अपना मनपसंद उम्मीदवार चुनने का मौका मिलने जा रहा है। इसके साथ ही साथ मतदाताओं को लुभावने आकर्षक मतदाता पहचान पत्र भी उपलब्ध कराए जाने की शुरूआत होने वाली है।
चुनाव के दौरान थैलियों के मुंह खोले जाने पर भी सख्ती होने की उम्मीद जताई जा रही है। कहा जा रहा है कि मौजूदा लोकसभा की तय सीमा 25 लाख और विधान सभा की दस लाख को अनेक प्रत्याशी वैसे ही पार कर जाते हैं, प्रस्तावित चुनाव सुधार विधेयक में इस पर कड़ाई से पालन करवाना भी प्रस्तावित बताया जा रहा है।
उधर कानून मंत्रालय के सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि कानून मंत्रालय द्वारा चुनाव सुधार के संबंध मंे लोगों से रायशुमारी की जा रही है। इसके अलावा बजट सत्र के उपरांत राष्ट्रीय स्तर पर विचार विमर्श के उपरांत जो स्वरूप निकलकर आएगा उसका मसौदा तैयार कर इसे इस साल के अंत तक विधेयक की शक्ल में संसद में पेश किए जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

एमपी के कलाकारों ने की रक्षा मंत्री से भेंट

एमपी के कलाकारों ने की रक्षा मंत्री से भेंट
भगौरिया नृत्य का प्रदर्शन
नई दिल्ली, (ब्यूरो)। रक्षामंत्री ए.के. एंटनी के समक्ष आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में मध्यप्रदेश के भगौरिया नृत्य की भी आकर्षक प्रस्तुति की गई। नई दिल्ली के केन्टोनमेंट के राष्ट्रीय रंगशाला शिविर के प्रांगण में आयोजित कार्यक्रम में भगौरिया नृत्य प्रस्तुत किया गया जिसकी श्री एंटनी सहित उपस्थित लोगों ने सराहना की।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के धार जिले के बाघ प्रिंट पर आधारित झांकी गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुई थी। झांकी के साथ धार-झाबुआ जिले का प्रसिद्ध भगौरिया नृत्य प्रस्तुत किया गया। रक्षामंत्री के साथ मध्यप्रदेश के कलाकारों का ग्रुप फोटो भी हुआ। बाघ प्रिंट के दस्तकार मोहम्मद युसुफ ने रक्षामंत्री श्री एंटनी को बाघ प्रिंट का शाल भंेट किया।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

भारत की यह मजबूरी है भ्रष्टाचार जरूरी है

भारत की यह मजबूरी है भ्रष्टाचार जरूरी है
 
(लिमटी खरे)

एक समय में सामाजिक बुराई समझे जाने वाले भ्रष्टाचार ने आजाद हिन्दुस्तान में अब शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है। बिना रिश्वत दिए लिए कोई भी काम संभव नहीं है, यह हमारा नहीं देश की सबसे बड़ी अदालत का मानना है। अस्सी के दशक के मध्य तक भ्रष्टाचार को सामाजिक बुराई समझा जाता था, उस समय भ्रष्टाचार करने वालांे को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। कालान्तर में भ्रष्टाचार की जड़े इस कदर गहरी होती गईं कि हर सरकारी कार्यालय में भ्रष्टाचार अब रग रग में बस चुका है। सरकारी कार्यालयों के बाबू, अफसर और चपरासी बेशर्म होकर ‘कुछ चढ़ावा तो चढ़ाओ‘, ‘बिना वजन के फाईल उड़ जाएगी‘, ‘बिना पहिए के फाईल कैसे चलेगी‘, ‘अरे सुविधा शुल्क तो दे दो‘ आदि जुमले पूरी ईमानदारी के साथ बोलते नजर आते हैं। याद नहीं पड़ता कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के उपरांत किसी जनसेवक ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जाहिर की हो। आज कम ही जनसेवक एसे बचे हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप न हों। यह अलहदा बात है कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने में बरसों बरस लग जाते हैं, तब तक मूल मामला लोगों की स्मृति से विस्मृत ही हो जाता है। लालू प्रसाद यादव और सुरेश कलमाड़ी इस बात के जीते जागते उदहारण कहे जा सकते हैं जिन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बावजूद भी कांग्रेसनीत कंेद्र सरकार ने उन्हंे गले लगाकर ही रखा है। विडम्बना यह है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अक्सर ही खुद को सत्यवादी हरिशचंद के वंशज बताकर भ्रष्टाचार पर लंबे चौंड़े भाषण पेलते रहते हैं, पर जब उसे अमली जामा पहनाने की बारी आती है तब भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बनकर उभर जाता है।

भारत गणराज्य की आने वाली पीढ़ी नब्बे के दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को किसी रूप में जाने या न जाने किन्तु भ्रष्टाचार के गर्त में भारत को ढकेलने के लिए अवश्य ही याद करेगी। नई दिल्ली के एक समाचार पत्र समूह द्वारा इसी साल अगस्त माह के पहले पखवाड़े में कराए गए सर्वे में यह तथ्य उभरकर आया है कि उमर दराज हो चुके दिल्ली के 65 फीसदी लोगों का मानना है कि आजाद भारत में भ्रष्टाचारियों को अधिक ‘आजादी‘ नसीब हुई है। रिश्वत खोरों के लिए सजा का प्रावधान नगण्य ही है। बिना रिश्वत की पायदान चढ़े देश में कोई भी काम परवान नहीं चढ सकता है। लोगों का मानना था कि इस मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाले लोग खुद भी भ्रष्टाचार की जद में हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के पेंशनर्स का मानना हृदय विदारक माना जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन में सरकारी सेवा के दौरान जनता की सेवा पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ की किन्तु अब उन्हंे भी रिश्वत की सीढ़ी पर चढ़ने पर मजबूर होना पड़ता है। यह है गांधी नेहरू के देखे गए आजाद भारत की इक्कीसवीं सदी की भयावह तस्वीर।
 
अस्सी के दशक के मध्य तक कमोबेश हर कार्यालय की दीवार पर ‘‘घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, दोनों ही पाप के भागी हैं‘‘ भावार्थ के जुमले लिखे होते थे। उसके पहले तक रिश्वत लेने वाले को समाज में बेहद बुरी नजर से देखा जाता था। आज चालीस की उमर को पार करने वाले प्रौढ़ भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भ्रष्टाचार का तांडव अगर इसी तरह जारी रहा तो आने वाले भारत की तस्वीर कितनी बदरंग और बदसूरत हो जाएगी।
 
जनसेवक, सरकार, न्यायालय हर जगह भ्रष्टाचार को लेकर तरह तरह की बहस होती है। बावजूद इसके जब भी जमीनी हकीकत को देखा जाता है तो भ्रष्टाचार का बट वृक्ष और विशालकाय होकर उभरता दिखाई पड़ता है। इसकी परछाईं इतनी डरावनी होती है कि आम आदमी ईमानदारी से जीने की कल्पना कर ही सिहर जाता है। आज ईमानदार सरकारी कर्मचारी फील्ड पोस्टिंग के बिना मन मसोसकर रह जाते हैं। अनेक विभागों में न जाने एसे कितने कर्मचारी अधिकारी होंगे जो भ्रष्ट व्यवस्था से समझौता न कर पाने के चलते जिस पद पर भर्ती हुए उसी से सेवानिवृत होने पर मजबूर होंगे।
 
हद तो तब हो गई जब देश की सबसे बड़ी अदालत की एक पीठ ने भ्रष्टाचार पर अपनी तल्ख टिप्पणी कर डाली। सुप्रीम कोर्ट की पीठ का कहना था कि अगर सरकार भ्रष्टाचार को रोक नहीं सकती तो उसे कानूनन वैध क्यों नहीं बना देती है। सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नही लग रही है। अगर यही सही है तो सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी स्वरूप दे दे।
 
सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अपने आप में अत्यंत महात्वपूर्ण और आत्मावलोकन करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है, किन्तु धरातल की हकीकत को अगर देखा जाए तो यह टिप्पणी आम आदमी की लाचारी को ज्यादा परिलक्षित करती है। सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कोर्ट की टिप्पणी भले ही आबकारी, आयकर और बिक्रकर विभाग के बारे में हो पर यह सच है कि संपूर्ण सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार का लकवा मार चुका है। भ्रष्ट सरकारी तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका है। हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि सरकार चलाने वाले जनसेवक नपुंसक हो चुके हैं, उनकी मोटी चमड़ी पर नैतिकता के पाठ की सीख का कोई असर नहीं होने वाला है।
 
देश में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि ‘‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का‘‘ की तर्ज पर जब भ्रष्टाचार पर अकोड़ा और अंकुश कसने वाले ही भ्रष्टाचार के समुंदर में डुबकी लगा रहे हों, तब आम आदमी की बुरी गत होना स्वाभाविक ही है। विजलेंस विभाग आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, पर सरकार में बैठे शीर्ष अधिकारी अपने निहित स्वार्थों के लिए अपने खुद के लिए बस धृतराष्ट की भूमिका को ही उपयुक्त मान रहे हैं।
 
भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही यहां का प्रजातंत्र तीन स्तंभों पर टिका बताया गया था। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका। इसके अलावा इन तीनों पर नजर रखने के लिए ‘‘मीडिया‘‘ को प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर अघोषित मान्यता दी गई थी। विडम्बना यह है कि मीडिया भी इन्हीं भ्रष्टाचारियों की थाप पर मुजरा करते आ रहा है। अपने निहित स्वार्थों के लिए मीडिया ने भी अपनी विश्वसनीयता को खो दिया है। देश भर मंे हर जगह नेता विशेष के चंद टुकड़ों के आगे मीडिया ने अपनी पहचान मिटा दी है। नेताओं द्वारा मीडिया को अपनी इस सांठगांठ में मिलाने के लिए उन्हें राजनैतिक दलों का सदस्य बना लिया जाता है फिर वह मेनेज्ड मीडिया सरकार की वह उजली छवि पेश करता है कि लोगों को लगने लगता है कि फलां नेता भ्रष्टाचारी हो ही नहीं सकता यह उसके खिलाफ विरोधियों का षणयंत्र ही है।
 
इस समय सरकार में शामिल न होकर भी सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पति मरहूम राजीव गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि केंद्र सरकार से भेजा जाने वाले एक रूपए में से पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। यह बात उन्होंने अस्सी के दशक के पूर्वाध में कही थी। अगर उस वक्त यह आलम था तो आज तो सारी योजनाएं ही कागजों पर सिमटकर रह जाती हैं।
 
विचित्र किन्तु सत्य की बात भी सरकारें ही चरितार्थ करती हैं। राज्य या केद्र सरकार ही योजनाएं बनाती है, उन योजनाओं के लिए धन जुटाकर आवंटित करती हैं, योजनाओं को अमली जामा भी सरकारों द्वारा पहनाया जाता है। योजनाएं पूरी होने पर उनकी समीक्षा भी सरकारों द्वारा ही की जाती है। इस समीक्षा में अंत में निश्कर्ष यही आता है कि उस योजना में वह खामी थी या फिर उस योजना का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाया। यक्ष प्रश्न तो यह है कि योजना किसने बनाई और किसने क्रियान्वित की? जाहिर है सरकारी सिस्टम ने, तब इसके लिए जवाबदेही तय होना चाहिए या नहीं और अगर पूरा लाभ नहीं मिल पाया तो इस तरह पानी मंे बहाई गई राशि को सरकारी तन्खवाह पाने वालों के वेतन से उसे वसूल क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
 
भ्रष्टाचार की अनुगूंज के मध्य भ्रष्टाचार रोकने के लिए तैनात लोकायुक्त ने भी एक सुर से संवैधानिक अधिकारों की मांग आरंभ कर दी है। लोकायुक्त चाहते हैं कि केंद्र सरकार संसद में एक विधेयक लाकर लोकायुक्त संगठन को समेचे देश में एकरूपता प्रदान करे। अब तक अमूमन लोकायुक्त के पद पर किसी बड़ी अदालत के ही सेवानिवृत न्यायधीश को लोकायुक्त बनाया गया है। पिछले चार दशकों का इतिहास इस बात का गवाह माना जा सकता है कि लोकायुक्त द्वारा अब तक छोटे मोटे शिकार के अलावा कौन सी बड़ी मछली को पकड़कर सजा दिलाई हो।
 
महज रस्म अदायगी के लिए तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी पर प्रकरण बनाकर लोकायुक्त संगठन द्वारा भी रस्म अदायगी ही की जाती रही है। भारत गणराज्य के हर सूबे में लोकायुक्त संगठन ने मंत्री, बड़े अधिकारियों नौकरशाहों या दिग्गजों को दागी करार दिया है, बावजूद इसके किसी के खिलाफ भी कार्यवाही न किया जाना भारत के ‘‘सिस्टम की गुणवत्ता‘‘ की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।
 
भारत सरकार के कानून मंत्री भले ही भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए वचनबद्ध होने का स्वांग रच रहे हों, लोकायुक्त संगठनों को अधिक ताकतवर बनाने का प्रयास करने का दिखावा कर रहे हों, पर क्या उनमें इतना माद्दा है कि वे स्वयं इस बात की ताकीद लोकायुक्त संगठनों से करें कि उनके पास कितने प्रकरण लंबित हैं, और कितनी शिकायतों पर लोकायुक्त संगठनों ने क्या कार्यवाही की, किन प्रकरणांे को किस आधार पर नस्तीबद्ध किया गया। दरअसल लोकायुक्त के पास जाने का साहस आम आदमी जुटा नहीं पाता है, इसलिए कम ही लोगों को इस बात की जानकारी हो पाती है कि किसके खिलाफ शिकायत हुई और क्या कार्यवाही हुई।
 
रही बात देश के चौथे स्तंभ मीडिया की तो मीडिया के पास जब लोकायुक्त में दर्ज प्रकरणों की जानकारी आती है, तो मीडिया भी उसका इस्तेमाल ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय‘‘ की तर्ज पर ही करता है। हर सूबे में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री, नौकरशाहों, दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त होगी पर कार्यवाही अंजाम तक किसी भी मामले में नहीं पहुंच पाना निश्चित तौर पर मंशा में कमी को ही परिलक्षित करता है।
 
जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सब साहूकार का सिस्टम आज सरकारी तंत्र में पसरा है। जो भी रिश्वत लेते पकड़ा जाए उसे ही चोर माना जाता है बाकी सारे तंत्र में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह अंगीकार कर लिया गया है। इस मामले में एक वाक्ये का जिकर लाजिमी होगा। मध्य प्रदेश में पंचायती राज की स्थापना के उपरांत प्रदेश मंत्रालय के एक उपसचिव स्तर के अधिकारी स्व.आर.के.तिवारी द्वारा पूूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी से भेंट के दौरान त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यख्या की गई थी। उन्होंने स्व. राजीव गांधी से कहा था कि मध्य प्रदेश में तीन स्तर पर पंचायती (भ्रष्टाचार) राज कायम है।
 
पहला है सचिवालय जहां नीति निर्धारक बैठते हैं इसे अंग्रेजी में ‘‘सेकरेटरिएट‘‘ कहते हैं इसका नाम बदलकर ‘सीक्रेट रेट‘ कर देना चाहिए, क्योंकि यहां हर काम का रेट सीक्रेट है। हो सकता है आपका काम एक दारू की बॉटल में हो जाए न काहो कि दस लाख में हो। यहां हर काम का रेट सीक्रेट यानी गुप्त ही है।
 
दूसरा है संचालनालय जिसे आंग्ल भाषा में ‘‘डायरेक्ट रेट‘‘ कहते हैं। संचालनालय में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हर विभाग के आला अधिकारी की तैनाती होती है। अपने आंग्ल नाम को मूर्त रूप देता है यह सरकारी कार्यालय। अर्थात यहां हर बात का डारेक्ट यानी सीधा रेट है। फलां काम में डेढ़ परसेंट लगेगा, फलां काम में आवंटन के लिए तीन परसेंट देना होगा वरना आप अपनी व्यवस्था देख लीजिए।
 
अब दो स्तर के बाद तीसरा स्तर आता है जिलों का। हर जिले में इन सरकारी योजनाओं को मैदानी अफसरान द्वारा अमली जामा पहनाया जाता है। हर जिले में जिलाध्यक्ष का कार्यालय होता है। जिलाध्यक्ष का नियंत्रण समूचे जिले पर होता है। जिलाध्यक्ष का काम ही हर बात पर नजर रखना होता है। अंग्रेजी में जिलाध्यक्ष के कार्यालय को ‘‘कलेक्ट रेट‘‘ कहा जाता है। अर्थात जिलांे में प्रदेश या केंद्र सरकार से आने वाली राशि को कलेक्ट किया जाता है, इधर रेट का सवाल ही पैदा नहीं होता है, यहां तो बस कलेक्ट करने का काम ही होता है।
 
हर सूबे में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो अर्थात ईओडब्लू अपनी अपनी तर्ज और नाम से काम कर रहे हैं। यह पुलिस का ही एक विंग है, जिसका काम आर्थिक तौर पर हो रहे अपराधों पर नजर रखने का है। सरकारी सिस्टम में आर्थिक तौर पर होने वाले अपराधों की जानकारी ईओडब्लू को देने पर उनका फर्ज तत्काल कार्यवाही करने का है। अमूमन देखा गया है कि ईओडब्लू के मातहत सूचना मिलने पर आरोपी से ही भावताव करने जुट जाते हैं। शायद ही कोई सूबा एसा बचा हो जिसमें आर्थिक अपराध रोकने वाली शाखा में दागी अफसर कर्मचारियों की तैनाती न हो। इन परिस्थितियों मंे अगर इन्हें और अधिक साधन संपन्न बना दिया गया तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार का ग्राफ और अधिक बढ़ जाएगा, क्योंकि भ्रष्टाचारी को बचने के लिए इन संगठनों को अधिक राशि रिजर्व स्टाक में रखना पड़ेगा जो उसे अलग से कमानी होगी।
 
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और रसायन मंत्री राम विलास पासवान के बीच भ्रष्टाचार को लेकर हुए कथित संवाद को सियासी गलियारों में चटखारे लेकर सुनाया जाता था। यह वार्तालाप उनके बीच हुआ अथवा नहीं यह तो वे दोनों ही जाने पर चटखारे लेकर किस्से अवश्य सुनाए जाते रहे। कहा जाता है कि जब राम विलास पासवान के मंत्रालय में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा तो डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें बुला भेजा, और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात कही। इस पर पासवान भड़क गए और बोले आप हमें मंत्री मण्डल से बाहर कर दें तो बेहतर होगा, हम इसे रोक नहीं सकते, क्योंकि हमें पार्टी चलाना है। पार्टी का खर्च हम आखिर कहां से निकालेंगे?
 
अस्सी के दशक तक शैक्षणिक संस्थानों में नैतिकता का पाठ सबसे पहले पढ़ाया जाता था। अस्सी के दशक के उपरांत जब से शिक्षा का व्यवसाईकरण हुआ है, तब से आने वाली पौध को नैतिकता का पाठ ही नहीं पढ़ाया जा रहा है। इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक स्तर घटिया हो, देश का भविष्य तैयार करवाने वाले शिक्षक शालाओं के बजाए निजी तौर पर ट्यूशन पर जोर दे रहे हों, निजी स्कूलों ने शिक्षा को व्यवसाय बना लिया हो, तब बच्चों को आदर्श और नेतिकता कौन सिखाएगा।
 
वैसे भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और मीडिया के भ्रष्ट लोगों के गठजोड़ ने देश को भ्रष्टाचार की अंधी सुरंग में ढकेल दिया है। नैतिकता की दुहाई देकर उसे अपने से कोसों दूर रखने वाले लोगांे ने भारत को अंधेरे में बहुत दूर ले जाया गया है। आज आप किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाएं बिना रिश्वत के आपका कोई काम नहीं हो सकता है। और तो और अब तो मंत्रीपद पाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लिया जाने लगा है। देश के अनेक जिलों के कलेक्टर्स के पद भी बिकने लगे हैं। देश में परिवहन, आयकर, विक्रयकर, वाणिज्य आदि जैसे मलाईदार विभागों में तो बिना रिश्वत के एक भी तैनाती नहीं हो सकती है।
 
बहरहाल माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जताकर सरकार को जगाने का प्रयास किया है। न्यायालय का कहना सही है अगर भ्रष्टाचार का खत्मा नहीं किया जा सकता है तो कम से कम इसे कानूनी जामा पहना दिया जाए, ताकि काम कराने वाले को किसी भी काम के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क की तर्ज पर यह बात तो पता हो कि किस काम के लिए कितनी राशि बतौर ‘चढ़ावा‘, ‘सुविधा शुल्क‘, ‘चढोत्री‘, ‘वजन‘ अथवा ‘शिष्टाचार‘ आदि के लिए अदा करनी है।
 
जरूरत इस बात की है कि सरकार एक नई व्यवस्था को बनाए, जिसमें हर एक व्यक्तिक की जवाबदेही तय हो, जो इस व्यवस्था का पालन ईमानदारी से न करे, उससे राशि वसूली जाए और उसे आर्थिक और सामाजिक तौर पर दण्डित भी किया जाए। इसके लिए महती जरूरत सरकारी तंत्र में शीर्ष में बैठे लोगों को ईमानदार होने की है। अगर वे ईमानदारी से प्रयास करेंगे तो देश को भ्रष्टाचार के केंसर की लाईलाज बीमारी से मुक्त कराने में समय नहीं लगने वाला, किन्तु पुरानी कहावत है कि ‘‘जगाया उसे जाता है, जो सो राहा हो, किन्तु जो सोने का स्वांग रचे उसे आप चाहकर भी नहीं जगा सकते हैं।‘‘

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

यह कैसा गणतंत्र

यह कैसा गणतंत्र, तंत्र में गण प्रताडि़त

(मनोज मर्दन त्रिवेदी)


गणतंत्र के ६२ वर्ष हो चुके हैं यदि भारतीय दर्शन की दृष्टि से देखा जाये तो ६२ वर्ष बहुत अधिक समय नहीं माना जाता ऐसे कई ६२ हजार वर्ष निकल जाने की बात हमारे धर्म ग्रंथ बखान करते हैं परंतु जिस भौतिक वादी यथार्त युग में हम जीवित हैं उसके लिए ६२ वर्ष एक पूर्ण आयु मानी गई है भारत भी ६२ वर्ष के परिपक्व गणतंत्र का इतिहास समेटे हुए है। दुनिया में काफी प्रतिष्ठित स्थान भी प्राप्त कर चुका है। परंतु आत्म अवलोकन करने पर हमें सोचने पर मजबूर होना पड़ता है, कि जिस गणतंत्र पर हम गर्व करते हैं और सारी दुनिया हमारी पीठ थप-थपाती है वह वास्तविक धरातल में हमे लज्जा का अनुभव कराता है। जिस गण के लिए तंत्र है बहुसंख्यक गण उस तंत्र से अपने अधिकारों से वंचित हैं उन पर उन्ही के निर्वाचित जनप्रतिनिधि और जो तंत्र की व्यवस्था के अनुरूप उनके सेवक हैं जिन्हेे अधिकारी कर्मचारी माना गया है।
ऐसी नौकर शाही देश के बहुसंख्यक गण पर अपने अधिकारों का सिक्का जमाये हुए है, और उनका शोषण कर रही है। इस देश का वास्तविक मालिक कृषक मजदूर जो बहुसंख्यक है, उन पर सत्ताधारी एवं नौकरशाही हावी है दिन रात खेतों में पसीना बहाकर देश की जनता के उदर-पोषण की व्यवस्था करने वाला किसान हर प्रकार की आपदाओं को झेलने के लिए स्वयं संघर्ष करते हुए दिखाई देता है। बड़ी आपदा पर राजनैतिक दलों के नेता उनकी भावनाओं का शोषण करते हैं, और सहयोगी होते हैं इस देश के नौकरशाह दो तरह का उत्पादन प्रमुख रूप से होता है। आम जनता की क्षुधा मिटाने के लिए जमीन का सीना फाड़कर किसान अन्न का उत्पादन करता है, दूसरा उत्पादन वनों का होता है, जमीन के इस दो प्रकार के उत्पादन में कितना बड़ा अन्तर है यह स्पष्ट समझा जा सकता है। लोगों को जीवन देने वाले अन्न का उत्पादन कर्ता अन्नदाता प्राकृति अप्राकृतिक आपदाओं पर स्वयं संघर्ष करता है, या क्षति पूर्ति के रूप में शासकीय तौर पर उसे राहत प्राप्त होती है। जबकि इसी जमीन पर जो शासकीय स्तर पर वन विभाग का अमला उत्पादन करता है उसे शासन द्वारा  बड़ी भारी फौज उपलब्ध करायी गई है, जिसका छोटे-से छोटा कर्मचारी भी  दस हजार रूपये मासिक वेतन पाता है, किसी भी प्रकार की आपदा पर बड़ी-से-बड़ी नुकसानी होने पर उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती और उसकी कोई व्यक्तिगत क्षति नहीं होती। दोनो इसी जमीन पर उत्पादन कर रहे हैं परन्तु लाभ - हानि के बीच दोनो के कैसे सम्बन्ध हैं यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। क्या ऐसे तंत्र में सुधार की आवश्यकता नहीं है? बिना सुधार के बहुसंख्यक गणों के लिए तंत्र त्रुटिपूर्ण नजर आता है । कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए इतनी महंगी तकनिकी अपनाने के लिए आकर्षक रंगीन पोस्टरों ने प्रेरित कर दिया है कि कृषकों का जीवन बदरंग हो गया है। बेशक उत्पादन बढ़ा है,परंतु लागत जिस हिसाब से खेती में बढ़ी है किसान निरंतर कर्ज में डूबते जा रहा है और सरकारी कानून मुद्दतों के बने हुए हैं। आपदाओं पर किसानों को शासकीय कोष से मिलने वाली मदद पुराने कानूनों के कारण नहीं मिल पाती। राजनैतिक व्यक्तियों की फसल अवश्य इस प्रकार की कानूनी विसंगति से लहलहा जाती है। किसानों की पीड़ा की चीतकार जितनी तेज होती है,राजनैतिक व्यक्ति उस चीतकार को अपनी फसल में इजाफा मानते हैं और ऐंसे ही नपुंसक नेताओं के कारण अन्नदाता किसान मौत को गले लगाने पर मजबूर हो रहा है। 
     वहंीं यही स्थिति देश की छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं को व्यवस्थित करने में जुटा हुआ,मजदूर जो भिन्न क्षेत्रों में कार्य करता है। जिसकी अपनी कोई पहचान भी नहीं होती कार्य करते हुए यदि वह काल के गाल में समा जाये, तो उसका परिवार उसका अंतिम संस्कार भी कर पायेगा या नहीं इसकी इस तंत्र ने ६२ वर्षो में व्यवस्था नहीं की है जो व्यक्ति पूरे देश के निर्माण में अपना खून पसीना लगा रहा है उसके एवं उसके परिवार को आर्थिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।  ऐसे तंत्र को गणों के लिए परिपक्व गणतंत्र मान लेना क्या हमारी समझदारी है जहां देश में अंगुलियों पर गिने जाने वाले ऐसे पूंजीपति हैं जिनका  नाम दुनिया के बड़े पंूंजीपतियों में शामिल हैं। वहीं असंख्य लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दोनो टाईम भरपेट भोजन भी नहीं मिल रहा है ऐसी सफलता पर क्या हम गर्व कर सकते हैं? तंत्र की विसंगति के चलते कुपोषण से निजात नहीं मिल पा रही है। आज भी शिक्षा का प्रकाश अनेक क्षेत्रों में नहीं पहुंचा है। अनेक कठोर कानूनों के बावजूद भी बालश्रम नहीं रूक रहा है। गरीबों के नाम पर बनने वाली योजनाओं  में लूट साधारण बात हो गई है। इस प्रकार की विसंगतियों को जब तक विराम नहीं मिलता,गणतंत्र की सफलता नहीं कही जा सकती। गणतंत्र की सफलता के लिए जब तक बहुसंख्यक गण जागृत नहीं होगा मु_ी भर अवसरवादी लोग गणतंत्र के  नाम पर अपने हितों की पूर्ति के लिए गणतंत्र को कलंकित करते रहेंगे।

किसानों के लिए पचौरी ने मांगा विशेष राहत पैकेज

किसानों के हिमायती बनकर उभरे पचौरी

पीएम और कृषि मंत्री से केंद्रीय दल भेजने का किया आग्रह
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने आज प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार से अनुरोध किया है कि मध्य प्रदेश में पाले एवं तुषार के कारण हुए फसलों के नुकसान का आंकलन करने हेतु एक केंद्रीय दल मध्य प्रदेश भेजा जाए ताकि एमपी के किसानों का हुआ फसलों का नुकसान का सही जायजा लगाया जा सके। उन्होने किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज तत्काल जारी करने की मांग भी केंद्र से की है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में आज कृषि मंत्री शरद पवार से भेंट कर उनसे इस बावत आग्रह किया है। साथ ही साथ श्री पचौरी ने पीएम डॉ.मनमोहन सिंह को इस बावत पत्र भी लिखा है। जनवरी के पहले सप्ताह में पाले और तुषार की अधिकता के कारण हुए फसलों के नुकसान से व्यथित सुरेश पचौरी ने कहा कि प्राकृतिक आपदा के कारण चना, तुअर, मटर, गन्ना, गेंहूं आदि के साथ ही साथ फल एवं सब्जियां पूरी तरह से चौपट हो गई हैं। इन परिस्थितियों में हताश और निराश किसान आत्महत्या पर मजबूर हो रहा है, जिसका सिलसिला अनवरत जारी है।
श्री पचौरी ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री से अनुरोध किया है कि मध्य प्रदेश के किसानों को वित्तीय मदद शीघ्र उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने केंद्र से अनुरोध किया है कि इसके सही आंकलन के लिए एक केंद्रीय दल तत्काल मध्य प्रदेश भेजा जाए ताकि फसलों की तबाही का सही मूल्यांकन किया जा सके। साथ ही साथ सुरेश पचौरी ने प्रभावित किसानों के लिए मुआवजा और अंतरिम राहत सहायता के बतौर विशेष राहत पैकेज अविलंब जारी करने की मांग की है।