बुधवार, 22 जून 2011

कांग्रेस भाजपा का महाकौशल के साथ सौतेला व्यवहार!


कांग्रेस भाजपा का महाकौशल के साथ सौतेला व्यवहार!

रेल परियोजना में फंस रह नित नए पेंच

फोरलेन के झटके से उबर नहीं पाया सिवनी

कमल नाथ सहित कांग्रेस और भाजपा के जनसेवकों का मौन संदिग्ध

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत संप्रग सरकार और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा महाकौशल विशेषकर मण्डला, बालाघाट और सिवनी जिले के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। एक तरफ काल्पनिक बाघ करीडोर की भेंट स्वर्णिम चतुर्भंज का उत्तर दक्षिण गलियारा चढ़ गया तो अब बालाघाट से जबलपुर के अमान परिवर्तन की योजना भी बाघ ही की भेंट चढ़ती दिख रही है।

वर्ष 2000 मंे जबलपुर से बालाघाट की अमान परिवर्तन की योजना आरंभ की गई थी। इस योजना का काम 2006 तक ठीक ठाक गति से चलता रहा। इसके बाद इसके मार्ग में पड़ने वाली सिवनी जिले की जमीन को वन्य प्राणियों के लिए आरक्षित जतला दी जाकर इसे रेल्वे को सौंपने से इंकार कर दिया गया। इस मामले में मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने दो साल तक नस्ती अपने पास रखकर इसे अब केंद्र के पाले में फेंक दिया है। राज्य सरकार की ओर से इस महात्वाकांक्षी योजना के प्रस्ताव को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के पास भेज दिया है। गौरतलब होगा कि इसके पहले स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले में काल्पनिक बाघ करीडोर के कारण निर्माण कार्य तीन सालों से रूका हुआ है।

इस रेल परियोजना के पूरा होने से मण्डला, बालाघाट और सिवनी जिले को लाभ होना था। इसमें सिवनी जिले की 30 हेक्टेयर जमीन का फच्चर फंस गया है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ का वर्चस्व माना जाता है महाकौशल में। कमल नाथ समर्थक छाए हुआ हैं मण्डला, सिवनी, जबलपुर और बालाघाट जिलों में। बावजूद किसी ने भी इस बात को कमल नाथ की जानकारी में लाना अपना कर्तव्य नहीं समझा और न ही कमल नाथ ने इस मामले में स्वतः ही कोई संज्ञान लिया है।

 महाकौशल में जबलपुर से भाजपा के राकेश सिंह, नरसिंहपुर से कांग्र्रेस के उदय प्रताप, मण्डला से कांग्रेस के बसोरी सिंह, छिंदवाड़ा से कांग्रेस के कमल नाथ तो बालाघाट से भाजपा के के.डी.देशमुख सांसद हैं। फोरलेन मामला हो या फिर अमान परिवर्तन का, हर मामले में कांग्रेस और भाजपा के सांसदों का मौन किसी मिलीभगत की ओर ही इशारा करता है।
यहां उल्लेखनीय होगा कि केंद्रीय मंत्री कमल नाथ ने कुछ दिनों पूर्व मण्डला नैनपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा के अमान परिवर्तन का श्रीगणेश भी मण्डला से किया था। इस अमान परिवर्तन में भी रिजर्व फारेस्ट का हिस्सा आएगा इस कारण मण्डला से बरास्ता सिवनी, छिंदवाड़ा अमान परिवर्तन का काम आने वाले दशकों में पूरा होने की उम्मीद बेमानी ही है। साथ ही बालाघाट में कटंगी तिरोड़ी लाईन हेतु भी वे बालाघाट आए थे, किन्तु किसी भी नेता ने उनका ध्यान नैनपुर के आसपास के इस विवादित हिस्से की ओर आकर्षित करना मुनासिब नहीं समझा और न ही भाजपा ने भी इस बारे में कोई मांग करने की जहमत ही उठाई।

मंगलवार, 21 जून 2011

करोड़पति जनसेवक भला क्यों चाहेंगे लोकपाल का दायरा!

करोड़पति जनसेवक भला क्यों चाहेंगे लोकपाल का दायरा!

(लिमटी खरे)

समाजसेवी अण्णा हजारे की जिद है कि देश में लोकपाल विधेयक लाया जाए और उसके दायरे में प्रधानमंत्री और सांसदों को भी लाया जाए। वहीं दूसरी और इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने विदेशों मंे जमा काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार के समूल खात्मे का बीड़ा उठाया। बाबा रामदेव के मन मंदिर में राजनैतिक महात्वाकांक्षाएं हिलोरे मार रही थीं, जिसे ताड़कर भाजपा और कांग्रेस ने उन्हें उखाड़ फंेका। अब अण्णा की बारी है। कहते हैं अण्णा ने जैसे ही पुनः हुंकार भरी वैसे ही आयकर विभाग का दल उनके घर पहुंच गया। सवाल यह उठता है कि जब बाबा रामदेव महीने दर महीने अपनी अकूत दौलत जोड़ रहे थे, तब क्या कांग्रेसनीत केंद्र सरकार या आयकर विभाग की तंद्रा नहीं टूटी। अब जब रामदेव ने सरकार की नींद हराम की तब आयकर का कोड़ा फटकारकर उन्हें डराया जा रहा है। लालू जब सरकार से बारगेनिंग करते हैं तब सीबीआई का शिकंजा कस जाता है, जब समर्थन की बारी आती है तो उन्ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे लालू का आलिंगन कर उन्हें रेल मंत्री बनाने से कांग्रेस को परहेज नहीं होता है।
 
देश का लगभग एक चौथाई आबादी का हिस्सा आज भी भुखमरी की कगार पर है, पर लोकसभा में उनकी आवाज उठाने वाले तथाकथित गरीब जनसेवकोंकी संपत्ति में विस्फोटक बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है। 2004 में लोकसभा में आमद देने वाले करोड़पति जनसेवकों की तादाद 2009 में दोगुनी तो उनकी संपत्ति तीन गुना हो गई। गैर सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 में 543 में से लोकसभा पहुंचने वाले संसद सदस्यों की तादाद 156 थी, जो वर्ष 2009 के चुनावों मंे बढकर 315 हो गई। पांच साल पहले इनकी औसत संपत्ति एक करोड़ 46 लाख रूपए थी जो बढ़कर पांच करोड़ तेंतीस लाख हो गई। यह प्रतिवेदन लोकसभा पहुंचने वाले सांसदों द्वारा चुनाव पूर्व पेश हलफनामे के आधार पर तैयार की गई है।

प्रतिवेदन कहता है कि 2004 की लोकसभा में 304 सांसदांे ने 2009 में भी चुनाव लड़ा था। इसके अनुसार इन सांसदों की औसत संपत्ति में दो करोड़ नौ लाख रूपए का इजाफा हुआ है। वर्तमान में बीस लोकसभा सदस्यों में से बीस फीसदी अर्थात सवा सौ से अधिक सांसदों की संपत्ति पांच करोड़ रूपए से अधिक है। पचास लाख से पांच करोड़ रूपए की संपत्ति वाले सांसदों की संख्या 294 है, जो लोकसभा में कुल सांसदों की संख्या के आधे से अधिक है। दस लाख से कम संपत्ति वाले सांसदों की संख्या महज 17 है।

एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि करोड़पति सांसदों के मामले में सवा सौ साल पुरानी और भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बेहद भाग्यशाली है, क्योंकि इसके 146 सांसद करोड़पति हैं। दूसरे नंबर पर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा है जिसके सांसदों की तादाद 59 है। समाजवादी के 14, तो बीएसपी और डीएमके 13 - 13 सांसद करोड़ति हैं।

सबसे अधिक करोड़पति सांसद उत्तर प्रदेश से हैं जहां इसकी तादाद 52, महाराष्ट्र में 38, आंध्र प्रदेश में 32, तमिल नाडू और कर्नाटक में 25 - 25, बिहार में 17, मध्य प्रदेश में 15, राजस्थान में 14, पंजाब के 13, गुजरात के 12, पश्चिम बंगाल के 11, हरियाणा के 9 तो दिल्ली के महज सात सांसद करोड़ों से अधिक की दौलत के मालिक हैं। आंध्र प्रदेश के खम्मम लोकसभा क्षेत्र से चुने गए तेलगूदेशम के सांसद नागेश्वर राव की संपत्ति सबसे अधिक 173 करोड़ रूपए है, तो दूसरे नंबर पर कांग्रेस के नवीन जिंदल हैं, जिनकी कुल संपत्ति 131 करोड़ रूपए है।

तो यह था देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंचों अर्थात सांसदों की जेब का घोषित हाल। वास्तव में इनकी संपत्ति कितनी होगी इसका अंदाजा सहजता से नहीं लगाया जा सकता है। इनकी बेनामी संपत्तियों के बारे में तो कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। योग गुरू बाबा रामदेव ने दो तीन साल से जनसेवकों की इस दुखती रग पर हाथ रखना आरंभ किया था। बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को काफी हद तक सफलता मिली। तीन साल पूर्व बाबा रामदेव ने काला धन वापस लाने के लिए सड़कों पर उतरने की हुंकार भरी थी। बाबा का यह अभियान जब एक साल तक आरंभ नहीं हुआ तब 2009 में हमने अपने ‘‘देश की सड़कें आपकी राह देख रहीं हैं बाबा‘‘ शीर्षक से एक आलेख लिखा था, जिस पर बाबा समर्थकों ने तबियत से बाबा की हिमायत की थी। बहरहाल बाबा रामदेव ने देश की सड़कों को 2011 में नापना आरंभ किया।

बाबा रामदेव के इस अभियान को देशव्यापी सफलता मिलती देख समाज सेवी अण्णा हजारे के नेतृत्व में कुछ लोगों ने जिन पर खुद कथित तौर पर आरोप लगे हैं ने अनशन आरंभ कर दिया। अण्णा के अनशन को आशातीत सफलता मिली। इस अनशन ने कांग्रेस की बांछे खिला दीं, क्योंकि इससे बाबा रामदेव पार्श्व की ओर जाते दिख रहे थे। उधर बाबा रामदेव के मन में राजनैतिक महात्वाकांक्षाएं जोर मार रही थीं। उन्होंने भारत स्वाभिमान के बेनर तले एक सियासी दल बनाने की घोषणा कर दी थी। बाबा अगर राजनैतिक दल बनाते तो इससे सीधे सीधे भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगती। बाबा के तेवरों से कांग्रेस और भाजपा दोनों ही घबरा गए थे।

बाबा रामदेव के टीवी चेनल्स पर साक्षात्कार देख सियासी महारथियों ने बाबा की तासीर को पहचाना और जैसे ही बाबा उज्जैन से अपनी यात्रा समाप्त कर दिल्ली को उड़े बाबा की अगवानी के लिए केंद्र सरकार के चार मंत्री जा पहुंचे। इस बात को इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रायोजित तरीके हवा दिलवाई गई कि एसा स्वागत तो दुनिया के चौधरी बराक ओबामा का नहीं हुआ। फिर क्या था बाबा रामदेव फूक कर कुप्पा हो गए और उन्होंने सरकार से समझौता कर अनशन प्रारंभ होने के पहले ही अनशन समाप्ति का पत्र सौंप दिया। अमूमन किसी को मंत्री या निगम का अध्यक्ष बनाने के पहले उससे त्यागपत्र लिखवा लिया जाता है, ताकि वक्त बेवक्त काम आ सके। सियासी समीकरणबाजों ने तो अपना सही दांव खेला, पर भोले भाले बाबा रामदेव इसमें उलझ गए। शाम को फिर बाबा को अनशन समाप्त करने कहा गया किन्तु बाबा नहीं माने तो कुटिल राजनेता कपिल सिब्बल ने बाबा के सहयोगी आचार्य बाल किसन की लिखी चिट्ठी सार्वजनिक कर दी। फिर क्या था, बाबा भड़क गए। देर रात बाबा को बलात उठाने का प्रयास हुआ। चेनल्स पर सभी ने देखा कि बाबा रामदेव किस तरह मंच से कूदे और स्त्रियों के भेष में वहां से भागने का प्रयास करते पकड़े गए। कल तक के हीरो बाबा रामदेव का यह कदम उन्हें हीरो से जीरो तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त था। मीडिया ने बाबा को रणछोड़दासकी उपाधि से नवाज दिया।

बाबा अपनी मांद पतांजली योग पीठ पहुंचे और अनशन आरंभ कर दिया। चौथे दिन ही बाबा की तबियत बिगड़ गई। कांग्रेस ने इसे फिर भुनाया और मीडिया में खबर चल गई कि स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव योगी नहीं वरन् योग का मदारीहै। बाबा रामदेव भूल गए कि योग के बल पर उन्होंने न जाने कितने दावे अपने राईट हेण्ड आचार्य बाल किसन के स्वामित्व वाले आस्थाचेनल पर किए थे। बाबा को स्मरण करना होगा कि हमारे ऋषि मुनी योग के बल पर ही निराहार रहकर महीने तप में लगे रहते थे। पब्लिसिटी के भूखे बाबा रामदेव ने मीडिया के सामने से हटना ही नहीं चाहा।

बाबा के अनशन को तोड़ने के बाद कांग्रेस की नजर अब अण्णा हाजरे पर है। अण्णा के साथियों को दागदार बताकर उन्हें भी भरमाने का प्रयास किया गया। अण्णा के हठ के बाद उनके घर पर आयकर अधिकारी भेज दिए गए। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या भारत में प्रजातंत्र बचा है? हालात देखकर लगता है मानो देश में हिटलरशाही हावी हो चुकी है। जिसने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई उसे बलात नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका निभाने वाली भाजपा द्वारा कांग्रेस के साथ नूरा कुश्ती खेली जा रही है। पूंजीपतियों की रखैल बन चुका मीडिया सच्चाई के बजाए कांग्रेस भाजपा के सुर में सुर मिला राग मल्हार गा रहा है। कांग्रेस आरोप लगाती है कि बाबा रामदेव के पीछे संघ और भाजपा है, मीडिया यह पूछने की जुर्रत नहीं कर पाता कि बाबा के पीछे कौन है इससे क्या लेना देना, मुद्दा तो यह है कि बाबा द्वारा उठाया गया मुद्दा सही या नहीं?

आदिमत्थू राजा और सुरेश कलमाड़ी दोनों हाथों से देश को लूटते रहे और प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी युवराज राहुल गांधी सब इसे किसी जादूगर के कारनामा समझकर सम्मोहित बैठे देखते रहे। क्या यह संभव है। जब करूणानिधि सत्ता से बाहर होते हैं तब सरकार उनकी पुत्री को जेल भेजने का साहस जुटा पाती है। लालू यादव जब सरकार को आंख दिखाते हैं तब सीबीआई उन पर शिकंजा कसती है, बाद में सरकार बचाने के लिए उन्हीं भ्रष्टों के शहंशाह लालू यादव को गले लगा लिया जाता है। आखिर हो क्या रहा है इस देश में? विपक्ष भी सत्ता की मलाई चखने के साथ ही साथ आम जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रहा है।

बाबा रामदेव और अण्णा हजारे के मुद्दे संसद में ही पारित होने हैं। जिस संसद के दो तिहाई से ज्यादा सदस्य सड़कपति से करोड़पति हों क्या वे सिविल सोसायटी के लोकपाल बिल का स्वरूप स्वीकार कर पाएंगे? जिनकी अकूत दौलत विदेशों के बैंक में जमा हो क्या वे काला धन वापस लाने वाले विधेयक का समर्थन करेंगे? बाबा रामदेव का आंदोलन तो उनकी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं की बली चढ़ चुका है। अब अण्णा को बेहद संभल कर चलना होगा। अण्णा ने अपने साथ भूषण बंधुओं को लिया है, जिन पर अनेग संगीन आरोप हैं। अण्णा ने फिर से अनशन की बात कही है। अण्णा को चाहिए कि वे दिल्ली के बजाए साबरमती या सेवाग्राम में जाकर अपना अनशन करें। वे इस बात की कतई चिंता न करें कि मीडिया उनके पास वहां नहीं पहुंचेगा तो उनका आंदोलन परवान नहीं चढ़ पाएगा। महात्मा गांधी ने जब आंदोलन किया तब मीडिया कितना ताकतवर था, पर क्या मीडिया के बिना उन्हें अपने पवित्र और पावन उद्देश्य में सफलता नहीं मिली। आंदोलन के लिए मीडिया का सहारा लेना खुद की कमजोरी ही प्रदर्शित करता है। मीडिया में बैठे कुछ दलाल और दुकानदारों द्वारा रसूखदारों के फंेके टुकड़ों के एवज में उनके सामने दुम हिलाने से हालात काफी हद तक चिंताजनक हो चुके हैं। करोड़पति सांसदों द्वारा बाबा रामदेव और अण्णा की राय से इत्तेफाक तो कतई नहीं रखा जाएगा। डर है कि कहीं अण्णा हजारे का हश्र भी बाबा रामदेव सरीखा न हो जाए।

मनमोहन के झुनझुने से अक्सर बहल जाते हैं चौहान

पीएम से मिलकर गदगद हो जाते हैं शिवराज

मनमोहन के झुनझुने से अक्सर बहल जाते हैं चौहान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा हृदय प्रदेश की भाजपा सरकार के साथ किए जाने वाले अन्याय पर चीखने वाले सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान जब भी वजीरे आजम मनमोहन सिंह से मिलकर आते हैं उनके चेहरे के भाव बताते हैं मानों उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया हो। बीते छः माहों में अनेक बार पीएम से मिलन के बाद पत्रकारों से रूबरू शिवराज केंद्र के बारे में उतने आक्रमक नजर नहीं आए जितने मुलाकात के पहले रहे।

दिसंबर जनवरी माह में शीतलहर और पाले के कारण मध्य प्रदेश में हुई फसलों की क्षति के मुआवजे के मसले पर जब शिवराज सिंह चौहान ने 13 फरवरी को अनशन का स्वांग भी रचा था। बाद में राज्यपाल की मध्यस्थता के बाद प्रधानमंत्री से हुई बातचीत के बाद उन्होंने आश्चर्यजनक तौर पर अनशन समाप्त कर दिया था। इसके बाद जब वे दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले तब मनमोहन सिंह ने गु्रप ऑफ मिनिस्टर का गठन कर दिया था। उपवास समाप्ति के चार माह बीतने पर भी केंद्र सरकार ने जीओएम की बैठक नहीं बुलाई है, और न ही किसानों को मुआवजा ही दिया है। शिवराज सिंह का दावा था कि राज्य सरकार ने अपने हिस्से की राशि किसानों को बांट दी है।

किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान फरवरी के बाद आधे दर्जन से ज्यादा बार दिल्ली होकर आ गए हैं और वे प्रधानमंत्री कृषि मंत्री सहित अनेक मंत्रियों से भी बतिया चुके हैं। मध्य प्रदेश के सांसदों के साथ भी वे बैठ चुके हैं किन्तु शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की सुध लेना उचित नहीं समझा। छः माह से अधिक समय बीतने के बाद भी ओला, पाला और शीतलहर के कारण हुई फसलों की तबाही का मुआवजा किसानों को नहीं मिलना आर्श्चजनक ही है।

गौरतलब है कि पाला अभी राष्ट्रीय आपदा की फेहरिस्त में शामिल नहीं है, इसे इसमें शामिल करवाने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था, तभी डॉ.मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में गु्रप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन कर शिवराज ंिसंह को भी उसका सदस्य बना दिया था। इसके गठन के साढ़े तीन माह बाद भी इसकी एक भी बैठक नहीं हो सकी है। शिवराज हर बार प्रधानमंत्री से मिलकर गदगद और संतुष्ट नजर आते हैं, लगता है प्रधानमंत्री के आभामण्डल के आगे वे सारी समस्याएं ही भूल जाते हैं।

सोमवार, 20 जून 2011

2012 की चिंता में प्रतिभा ताई

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

2012 की चिंता में प्रतिभा ताई
देश की पहिला महिला महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकल जुलाई 2012 में प्रतिभा देवी पाटिल में समाप्त होने जा रहा है। वे एक बार फिर रायसीना हिल्स पर स्थित महामहिम भवन में पांच साल और राज करने की इच्छा मन में दबाए बैठी हैं। राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी को शायद इस बात की भनक लग गई है। पिछले दिनों उन्होंने एक बयान में कहा था कि हमारी प्रेजीडैंट ज्यादातर मामलों में उदासीन ही रहा करती हैं। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों का कहना है कि महामहिम को इसकी जानकारी मिलते ही वे सचेत हो गईं हैं। रामलीला मैदान पर पुलिसिया अत्याचार का ज्ञापन सौंपने गए भाजपा के प्रतिनिधिमण्डल से प्रतिभा ताई ने आम परंपराओं को ताक पर रख दिया। आड़वाणी की ओर मुखातिब प्रतिभा ताई बोलीं -‘‘आप लोग जो ज्ञापन मुझे सौंप जाते हैं, उन्हें मैं बहुत ही ध्यानपूर्वक पढ़ती हूं और फिर संबंधित मंत्रालय को भेजती हूं। इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर अनेक बार मैं खुद ही उसका फालोअप लेती हूं।‘‘ प्रतिभा पाटिल के इस अप्रत्याशित कथन से सियासी हल्कों में यह बात तैर गई है कि भाजपा की बैसाखी बिना अगली बार कोई भी राष्ट्रपति नहीं बन सकता है।

सलमान के साथ उछला हरवंश का नाम!
काले हिरण मामले में विवादित हुए वालीवुड अभिनेता सलमान खान के सितारे इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। हाल ही में मुंबई के पनवेल में एक जीमन से लोगों को बेदखल कर उसे खरीदने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। आरोपित है कि इसे सिने अभिनेता सलमान खान से खरीदा है। मुंबई से प्रकाशित एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र के ईपेपर की कापी इन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के दिल्ली स्थित मुख्यालय की सुर्खी बना हुआ है। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से डाक से भेजी गई इस फोटो कापी में सलामन के साथ ही साथ कांग्रेस के एक नेता हरवंश सिंहद्वारा भी इस जमीन को खरीदने की बात कही गई है। इस कापी से स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि हरवंश सिंह कौन हैं, किन्तु मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह मूलतः छिंदवाड़ा जिले के हैं पर उनकी कर्मभूमि सिवनी बन गई है, सो उनके चाहने वाले इसमें उल्लेखित नाम को उनसे जोड़कर ही देख रहे हैं।

ममता से सुरक्षित दूरी बनाकर चल रही कांग्रेस
पश्चिम बंगाल में तीन दशक पुरानी वाम सरकार को भले ही ममता बनर्जी ने उखाड़ फेंका हो, पर कांग्रेस ने इशारों ही इशारों में उसे संकेत दे दिए हैं कि वह कांग्रेस को हल्के में न ले। ममता बनर्जी की ताजपोशी में सोनिया गांधी ने अपनी उपस्थिति दर्ज न करवाकर 2012 में वाम दलों के साथ तालमेल के विकल्प को खुले रखा है जिससे ममता की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकना स्वाभाविक ही है। इसके पहले सोनिया ने मुफ्ती मोहम्मद सईद और उमर उबदुल्ला की ताजपोशी में शिरकत की थी। सियासी जानकारो का कहना है कि अगर सोनिया कोलकता जाकर ममता के शपथ ग्रहण में शामिल होती तों यह कांग्रेस का त्रणमूल के सामने आत्मसमर्पण माना जाता। ममता ने भले ही प्रणव मुखर्जी का पैर छूकर आर्शीवाद लिया हो पर कांग्रेस उन्हें स्थापित होने का मौका नहीं देना चाह रही है।

बाबा को बॉय बॉय कह सोनिया उड़ीं पीहर की ओर
इधर स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में अनशन पर बैठे थे, वहां सरकार की हालत बिगड़ती जा रही थी। वजीरे आजम के निवास 7 रेसकोर्स रोड़ और कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र सोनिया के निवास 10, जनपथ की अघोषित जंग को हवा उस वक्त मिली जब बाबा के अनशन का दंश झेल रही कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बेसहारा छोड़कर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी चुपचाप दुबई के रास्ते अपने पीहर इटली रवाना हो गईं। खबर है कि प्रियंका अपने बच्चों और राहुल के साथ अपनी नानी से मिलने जा रहे हैं। वैसे भी गर्मी में सोनिया का इटली जाना और सर्दियों में उनकी मां क्रिसमस मनाने सोनिया के घर जरूर आती हैं। कहा जा रहा है कि सोनिया को उनकी किचिन कैबनेट ने मशविरा दिया कि बाबा रामदेव के मामले में अगर आप सामने आईं तो भाजपा इसमें मिशनरी वर्सेस हिन्दू का कार्ड खेल सकती है। यही कारण है कि आजादी के उपरांत ताकतवर हुआ कांग्रेस और भाजपा का गांधी परिवारइस मामले में मौन साधे हुए है।

कट सकता है वृंदा का टिकिट
माकपा के अंदर करात दंपत्ति के खिलाफ गुस्सा फटने लगा है। पोलित ब्यूरो के दो महत्वपूर्ण सदस्य सीताराम येचुरी और वृंदा करात की राज्य सभा की सदस्यता इस साल अगस्त में ही समाप्त होने वाली है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे को महज एक सीट से ही संतोष करना पड़ सकता है। वाम मोर्चे के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार 34 साल के वाम दलों के शासन के उपरांत उसका सफाया अगर हुआ है तो इसके पीछे करात दंपत्ति की गलत नीतियां ही हैं। प्रकाश करात और वृंदा करात के खिलाफ उपजे इस रोष का शमन होता नहीं दिख रहा है। सूत्रों की मानें तो सीताराम येचुरी को तो पार्टी ने राज्य सभा से वापसी के लिए हरी झंडी दे दी है पर वृंदा को रेड सिग्नल दिखा दिया है। बंगाल के साथ ही साथ केरल में सफाए का सारा दोष करात दंपत्ति के सर मढ़ दिया गया है।

बंद हो सकता हैं डाक टिकिट चलन!
चवन्नी से कम की भारतीय मुद्रा का प्रचलन समाप्त कर दिया गया है। अब डाक टिकिटों पर संकट के बादल छाते दिखाई दे रहे हैं। डाक टिकिटों के स्थान पर कंप्यूटर से निकलने वाली रसीद का तेजी से बढ़ा चलन इस ओर इशारा कर रहा है कि जल्द ही डाक टिकिट भी इतिहास की वस्तु में शामिल होने की तैयारी में है। डाक विभाग के माध्यम से स्पीड पोस्ट, रजिस्ट्री आदि करने पर अब डाक टिकिट के बदले रसीद दिए जाने का चलन बढ़ गया है। इसी तरह बड़े उपभोक्ताओं ने फ्रेंकिग मशीन के माध्यम से डाक टिकिट लगाने आरंभ कर दिए हैं। देश के लगभग सभी पोस्ट ऑफिस को कंप्यूटरीकृत करने के बाद अब सभी को ऑन लाईन एक दूसरे से जोड़ने की योजना भी जारी है। वैसे भी सरकार की मिली भगत से कोरियर कंपनियों ने भारतीय डाक विभाग की कमर तोड़ रखी है।

सहाराश्री और बाबा की बढ़ती निकटता
अपने बलबूते पर करोड़ों अरबों का कारोबार खड़ा करने वाली दो हस्तियों के बीच इन दिनों काफी नजदीकी देखने को मिल रही है। साहारा समूह के सुब्रत राय सहारा और योग के नाम पर दौतल एकत्र करने वाले बाबा रामदेव के बीच काफी लगाव है। बाबा रामदेव गाहे बेगाहे सहाराश्री का चार्टर्ड विमान इस्तेमाल कर लेते हैं। पहले की बात अलहदा मानी जा सकती है, अब तो हरियाण के रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव देश के घोषित अरबपति हो चुके हैं, इसलिए वे खुलेआम किराए के विमान या हेलीकाप्टर का उपयोग कर सकते हैं। बाबा रामदेव का रूख अगर आक्रमक रहा तो आने वाले समय में केंद्र सरकार का शिकंजा सहारा श्री पर कस जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। साथ ही साथ बाबा के अनन्य भक्त और बिल्डर्स की दुनिया के माफिया सुधाकर शेट्टी द्वारा अनशन में अपने खर्च पर बीस हजार लोगों को भेजना कांग्रेस को नागवार गुजरा है सो उनका नपना तो तय ही है।

बिना नेता प्रतिपक्ष के असम विधानसभा!
असम में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई तो विपक्ष औंधे मुंह गिरा हुआ है। असम में पहली बार एसा हो रहा है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ही नहीं होगा। 126 सदस्यीय विधानसभा में एक भी नेता प्रतिपक्ष नहीं होना अपने आप में अनोखी मिसाल ही होगी। आला अफसरान का मानना है कि मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत पाने के लिए सूबे में किसी भी सियासी दल के पास न्यूनतम विधायक संख्या भी नहीं है। विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी के पास न्यूनतम 21 विधायकों का होना आवश्यक है, पर बोडोलेण्ड पीपुल्स फ्रंट ने 12 असम गण परिषद ने 10 तो असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 18 सीटें जीती हैं। इन परिस्थितियों में प्रमुख विपक्षी पार्टी की आसनी खाली ही रह गई है। विपक्ष के नेता के मामले में विधानसभा और संसद के अपने अपने तय नियम हैं, किन्तु इनमें संशोधन के लिए वे स्वतंत्र हैं।

सड़कों के बाद अब नामकरण में वृक्षों की बारी
इस नश्वर देह को त्याग चुके अनेक अतिमहत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण लोगों की याद में सड़कों के नामकरण का रिवाज बड़ा पुराना है। देश के कमोबेश हर शहर में सड़कों का नाम किसी महान हस्ती से जुड़ा हुआ है। दिल्ली की हर सड़क किसी न किसी के नाम पर ही है। व्हीआईपी और व्हीव्हीआईपीज की फेहरिस्त इतनी लंबी हो चली है कि दिल्ली में अब सड़कें ही नहीं बची हैं, जिनका नामकरण किया जा सके। दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली विकास प्राधिकरण से इस बारे में इजाजत मांगी है कि मिलेनियम पार्क मंे महत्वपूर्ण लोगों के नाम से पेड़ आवंटित कर दिए जाएं। दिल्ली सरकार के पास वैसे भी हर साल दो सैकड़ा से अधिक आवेदन इस बात को लेकर आते हैं कि किसी के नाम पर सड़क का नामकरण कर दिया जाए। दिल्ली सरकार परेशानी बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि मुख्य मार्ग तो छोड़ें बाई लेन तक का नामकरण किया जा चुका है।

मल्टीनेशनल्स के निशाने पर चिकित्सा विभाग
देश में जीवन रक्षक औषधियों पर मूल्य नियंत्रण लागू न हो पाने का कारण मल्टीनेशनल कंपनियों की मुगलई है। दो अलग अलग कंपनियों में एक ही दवा की कीमत में दस गुना का अंतर होना आम बात है। केंद्र सरकार से लेकर दवाओं और योग के माध्यम से अरबपति बने स्वयंभू योग गुरू तक इस बारे में खामोशी अख्तियार किए हुए हैं। असंयमित दिनचर्या और खान पान के चलते मधुमेह का गढ़ बन चुके हिन्दुस्तान में अब महज दो रूपए में शुगर की जांच हो सकेगी। वर्तमान में इसका खर्च औसतन पचास से सौ रूपयों के बीच बैठता है। हाल ही में इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडीकल रिसर्च ने इस बारे में कहा है कि इतने कम खर्च में शुगर की जांच से गरीबों को बेहद फायदा हो सकेगा। चिकित्सकों को जेब में रखने वाली मल्टीनेशनल दवा कंपनियां अब इस फिराक में हैं कि दो रूपए में मधुमेह की जांच की योजना को अमली जामा न पहनाया जा सके। अब देखना यह है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का इस मामले में क्या रूख रहता है।

21 जवानों को लील गया मच्छर
कहने को तो मच्छर बहुत ही छोटा सा उड़ने वाला जीव है, जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है। मच्छर के कारण न जाने कितने लोगों को असमय ही काल के गाल मंे समाना पड़ा था। आजादी के साल अर्थात 1947 में ही आठ लाख लोग मलेरिया के चलते जान गवा चुके हैं। केंद्र सरकार ने इसके बाद राष्ट्रीय मलेरिया उन्नमूलन कार्यक्रम का आगाज किया था। कालांतर में इसका नाम परिवर्तित हो गया। छः दशकों में मच्छरों का सफाया तो नहीं हुआ अलबत्ता मलेरिया विभाग का नामोनिशान मिट गया है। वर्ष 2010 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के 21 जवानों की मलेरिया से मौत होने पर सीआरपीएफ की व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए हैं। सबसे ज्यादा छः जवान छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं। दरअसल जंगली इलाकों में गश्त के दौरान जवानों को मच्छरों का शिकार बनना पड़ता है, फिर वहां समुचित चिकित्सा सुविधा न मिल पाने से उनकी हालत बिगड़ जाती है।

टीवी पर अशलीलता परोसी तौ खैर नहीं!
छोटे पर्दे पर किसी का जोर नहीं चल पर रहा है। यही कारण है कि टीवी पर चेनल्स द्वारा हंसी मजाक के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है। फिल्म सेंसर बोर्ड की तर्ज पर अब केंद्र सरकार द्वारा टेलीवीजन चेनल्स के लिए भी नियामक संस्था का गठन कर दिया गया है। केंद्र सरकार को टीवी पर अश्लीलता और आक्रमता को लेकर लगातार ही शिकायतें मिल रही थीं। इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने 13 सदस्यीय ब्राडकास्ट कंटेंट कम्प्लैंट्स काउंसिल का गठन कर दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश ए.पी.शाह को इसका अध्यक्ष मनोनीत किया गया है, जिन्होंने अपना पदभार ग्रहण कर लिया है। यह संस्था देश भर के साढ़े पांच सौ से अधिक टीवी चेनल्स पर नजर रखने का काम करेगी, अश्लीलता और आक्रमकता पर कठोर कार्यवाही कर जन शिकायतों पर चेनल्स को दिशा निर्देश जारी करने का काम करेगी।

शंकराचार्य की शरण में सोनिया
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर सभी की नजरें गड़ी हैं। सारे सियासी दल मान रहे हैं कि जिसने भी यूपी में परचम लहरा दिया वह अगले आम चुनावों में इसका सबसे ज्यादा लाभ प्राप्त कर सकता है। कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के अल्पसंख्यक प्रेम से कांग्रेस की राजमाता को लगने लगा कि यूपी में मुसलमान कांग्रेस से नाराज हो सकते हैं। सोनिया मण्डली ने उन्हें भरमाया और संगठन के एक जरूरी कार्यक्रम में भाग लेने बनारस आईं सोनिया प्रोग्राम के पहले ही गाजीपुर के सैदपुर के लिए उड़ गईं। उनका चौपर जहां लेण्ड किया वहीं पास में शंकराचार्य का आश्रम था। सोनिया ने आधे घंटे से ज्यादा समय शंकराचार्य के साथ बिताया और सोने का मुकुट उन्हें पहनाया। सियासी हल्कों में सोनिया के एक कृत्य की दबी जुबान से चर्चा होने लगी है कि आखिर किसके पैसों से मंहगे सोने का मुकुट सोनिया ने अर्पित किया। क्या आयकर विभाग इस बारे में सोनिया से कुछ दरयाफ्त करने की जहमत उठाएगा?

पुच्छल तारा
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव के कस बल कांग्रेस ने ढीले कर दिए हैं। बाबा की हुंकार में अब पहले जैसी तल्खी दिखाई नहीं पड़ रही है। उधर अन्ना हजारे के स्वर बुलंद होते दिख रहे हैं। सरकार का दमन का डंडा तेजी से घूम रहा है। अन्ना हजारे के घर पर भी आयकर अधिकारी धमक गए। जो सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत कर रहा है सरकार या तो पुलिस या फिर आयकर के माध्यम से उसे धमका रही है। हालाता ब्रितानी सत्ता जैसे हो गए हैं। उत्तरांचल के रूड़की से दिशा नागर ने ईमेल भेजा है। दिशा लिखती हैं कि जगजाहिर है ‘‘देश की बागडोर सोनिया गांधी के हाथों में है। सोनिया राजनैतिक रूप से अपरिपक्व हैं। वे एक एसी गुडिया हैं जो चाबी से चलती है। उन्हें जितना बोलने की ताकीद दी जाती है वे उतना ही बोलती हैं। उन्होंने कभी प्रेस कांफ्रेंस का सामना नहीं किया। कांग्रेस के मैनेज्ड पत्रकार उनका साक्षात्कार लेते हैं। वे भारतीय समाज के रीति रिवाज, रहन सहन आदि से भली भांति परिचित नहीं हैं। इन परिस्थितियों में देश में सामंतवादी मानसिकता का आगाज होना कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है।‘‘

शनिवार, 18 जून 2011

बिजली से महरूम हैं डेढ़ हजार गांव


बिजली से महरूम हैं डेढ़ हजार गांव

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने किया खुलासा

पिछले साल महज 351 गांव ही हो सके विद्युतीकृत

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत देश को आजाद हुए 64 साल बीत चुके हैं। देश पर ब्रितानी हुकूमत के बाद कांग्रेस और भाजपा ने ही सबसे ज्यादा राज किया है। सियासी दलों के लिए यह शर्म की बात हो सकती है कि लगभग साढ़े छः दशकों बाद भी देश के हृदय प्रदेश के 1535 गांव के लोगों को यह पता नहीं है कि बिजली किस चिड़िया का नाम है। कंेद्रीय विद्युत प्राधिकरण की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।

एक तरफ तो ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए केंद्र सरकार पूरी तरह संजीदा होकर अपना खजाना खोल रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन में ढील डाली जा रही है। वैसे तो मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर भेदभाव के आरोप जब तब मढ़ दिए जाते हैं पर भारी भरकम केंद्रीय इमदाद मिलने के बाद भी जमीनी हालात कुछ और बयां कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में सुसुप्तावस्था में पड़ी कांग्रेस निजाम बदलने के बाद भी नींद से नहीं जाग सकी है।

इस प्रतिवेदन में कहा गया है कि मध्य प्रदेश में कुल 52 हजार 117 गांव हैं एवं वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 में महज 351 गांवों में ही विद्युतीकरण किया जा सका है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने ग्रामीण विद्युतीकरण की धीमी रफ्तार पर गहरी चिंता जताई है। उधर मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय मदद का उपयोग किसी अन्य मद में किए जाने से यह काम पिछड़ रहा है।

कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल का विघटन कर वर्ष 2002 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कंपनियों का गठन कर दिया गया था। इसके बाद कंपनियों ने गावों में प्रकाश पहुंचाने के काम में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार विद्युतीकृत गांवों मंे चोबीसों घंटे बिजली देने के लिए फीडर विभक्तिकरण के काम को अंजाम दे रही है। यह अलहदा बात है कि इसके बाद भी गांवों को आठ घंटे से ज्यादा बिजली नहीं मिल पाएगी। गांवों मंे बिजली पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की राशि को फीडर विभाजन में व्यय किया जा रहा है। यही कारण है कि गावों को विद्युतीकृत करने का काम पूरी तरह उपेक्षित हो गया है।

सोनिया गाँधी की कहानी सुब्रमण्यम स्वामी की जुबानी

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आधुनिक भारत की राबर्ट क्लाइव: सोनिया गांधी


आधुनिक भारत की राबर्ट क्लाइव सोनिया गांधी

(सुब्रमण्यम स्वामी)

सोनिया माइनो गांधी. भारत की सबसे ताकतवर महिला शासक जिसके प्रत्यक्ष हाथ में सत्ता भले ही न हो लेकिन जो एक सत्ताधारी पार्टी की सर्वेसर्वा हैं. जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी लंबे अरसे से सोनिया गांधी के बारे में ऐसे आश्चर्यजनक बयान देते रहे हैं जिसपर सहसा यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन अब जैसे जैसे समय बीत रहा है सोनिया गांधी का सच और सुब्रमण्यम स्वामी के बयान की दूरियां घटती दिखाई दे रही हैं. सोनिया गांधी के बारे में खुद सुब्रमण्यम स्वामी का यह लेख-

0 तीन झूठ:-

कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं, वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है, जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है।
सोनिया से जुड़ा दूसरा झूठ है उनके पिता का नाम। अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे विश्व युद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं, जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था, सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता।
तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं, जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है।

0 सोनिया का भारत में पदार्पण:-

सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में तब मेरे सामने भी गुस्सा जाहिर किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुझे ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं , व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। उन दिनों सोनिया के मित्रों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे बल्कि माधवराव सिंधिया भी थे। सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं , ये रात दो बजे की बात है , उसी समय आईआईटी का एक छात्र बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं, उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा।

0 सोनिया के केजीबी कनेक्शन:-

बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट दृ केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भिङत भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्री और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है

सोनिया और भारत के कानूनों का हननरू

सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया। 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था) । संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था।

सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव:-

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव 197८ में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और 197८ के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं, जैसा मुहम्मद गौरी, नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं।
जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान , बहुमूल्य मूर्तियां , शॉल्स, आभूषण , पेंटिंग्स , सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्री ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा लेकिन उन्हें विश्वास में नहीं ले सका , तब मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी, जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुझे दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।
एकदम ताजा मामला 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ा हुआ है। पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है।

(साभार: विस्फोट डाॅट काम, सुब्रमण्यम स्वामी जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं. उनके लेखों और वक्तव्यों से संग्रह करके इसे लेख का स्वरूप दिया है डॉ संतोष राय ने)

शुक्रवार, 17 जून 2011

शिक्षा के व्यवसायीकरण से सिमट गए मूल्य


शिक्षा के व्यवसायीकरण से सिमट गए मूल्य

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में केंद्र सरकार का मानव संसाधन मंत्रालय देश में शिक्षा की नीति रीति को निर्धारित करने के लिए पाबंद किया गया था। अस्सी के दशक के उपरांत सियासी दलों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए शिक्षा व्यवस्था को गिरवी रख दिया है। अनुशासन की मजबूत नींव पर खड़ा नालंदा विश्वविद्यालय आठ शताब्दियों तक लोगों को शिक्षित करता रहा हैै। एक समय था जब गुरूकुल में जाकर बच्चे अपने भविष्य को संवारते थे, आज जमाना पूरी तरह बदल चुका है। आज गुरूकुलों का स्थान मोटी कमाई वाले विद्यालयों ने ले लिया है, जहां शिक्षा के नाम पर डिग्रीयां बांटी जाकर अभिभावकों की जेबें तराशी जा रही हैं। हुकूमत को यह दिखाई नहीं दे रहा है कि शिक्षा इस कदर मंहगी हो चुकी है कि अब बैंक द्वारा भी ‘एजूकेशन लोन‘ दिया जाने लगा है। क्या इक्कीसवीं सदी के भारत में शिक्षा के व्यवसायीकरण का सपना देखा था देश को गोरे ब्रितानियों के हाथों से मुक्त कराने वाले आजादी के दीवानों ने!


‘गुरू गोबिंद दोउ खड़े, काके लागू पाय!

बलिहारी गुरू आपकी, गोविंद दियो बताए!!‘

यह दोहा आज के समय में बहुत ही प्रासंगिक है। आदि अनादि काल से बच्चे की पहली शिक्षक उसकी मां ही होती है। मां अगर पिता को ‘पापा‘ संबोधन करने कहेगी बच्चा उसे पापा कहेगा, वह अगर ‘पिताजी‘ कहने कहेगी, बच्चा उसका अनुसरण करेगा, वह अगर ‘बाऊजी‘ कहने को कहेगी, बच्चा वही कहेगा। बच्चे को क्या पता कि पिता को किस संबोधन से बुलाना है, पर बच्चा इंसान का हो या गाय का, जब भी बोलता है तो मां को मां ही कहता है। बछड़ा जब रंभाता है तो उसके मुंह से मां की सुमधुर आवाज ही प्रस्फुटित होती है।

आदि अनादि काल से शिक्षा का तात्पर्य आदर, सत्कार, न्याय, सदगुणों का विकास, चिंतन, सहिष्णुता, सहानभूति, सेवा, सद्भाव, चिंतन, सहयर्च, संस्कार आदि का ज्ञान माना जाता रहा है। कालांतर में शिक्षा के मायने ही बदल गए। याद पड़ता है जब हम खुद प्राथमिक या माध्यमिक स्तर में अध्ययनरत थे, तब किसी शिक्षक के सिनेमा थिएटर में दिख जाने मात्र से घिघ्घी बंध जाती थी। सिनेमा में मनोरंजन तो एक तरफ मानस पटल पर तरह तरह के प्रश्न कौंधा करते थे कि अगर मास्साब ने पूछ लिया कि सिनेमा क्यों गए थे, तो क्या जवाब देंगे। आज हालात उल्टे हैं। आज तो मदिरालय में शिक्षक और उनके छात्र अगल बगल की टेबिलों पर बैठकर जाम छलकाते और सिगरेट के छल्ले बनाते नजर आते हैं। नैतिक मूल्यों के अवमूल्यन के लिए हमारी शिक्षा प्रणाली ही पूरी तरह दोषी करार मानी जाएगी।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते इस बात को कि उमरदराज लोगों को बताना पड़े कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है? आजाद भारत में भी शिक्षा का तात्पर्य डिग्री लेने के साथ ही साथ व्यवहारगत, परिवारगत और संस्कारगत मूल्यों का विकास ही शिक्षा का पर्याय समझा जाता था। देश के अनेक विश्वविद्यालय इस बात के पोषक रहे हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। आज के युग में शिक्षा की ‘दुकानें‘ डिग्री तो बांट रही हैं किन्तु नौनिहालों को व्यवहारिक प्रशिक्षण से कोसों दूर रखा जा रहा है।

ऋषि मुनियों के आश्रम में शिक्षा के लिए गए राजकुमार को भी खुद ही खाना पकाने की लकड़ी बीनने जाना होता था। खुद ही आंगन लीपना होता था। चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार को भी जीवन के हर काम से खुद को वाकिफ करवाना होता था। आज शिक्षा का स्वरूप है महज डिग्री लो और नौकरी करो। मीडिया का ही उदहारण लिया जाए, तो देश में ‘पत्रकार‘ बनाने की न जाने कितनी फेक्ट्रियां (माॅस कम्यूनिकेशन कालेज) हैं, जिनमें पढ़कर निकलने वाले नौजवान आज इलेक्ट्रानिक मीडिया की चकाचैंध में अपने आप को झौंके जा रहे हैं। इनमें से अस्सी फीसदी को यह नहीं पता होगा कि किसी राज्य का सबसे बड़ा सरकारी नुमाईंदा और सबसे छोटा सरकारी नुमाईंदा कौन होता है? इन्हें इस बात का भी इल्म नहीं होगा कि पुलिस की वर्दी में कितने सितारे वाला किस स्तर का अधिकारी है?

टीवी के आने से पूर्व छात्र अध्ययन में अपना समय व्यतीत करते थे। अस्सी के दशक के पहले बच्चे को अलह सुब्बह उठाने के लिए मां बच्चे से कहती देखो चिडि़या आ गई, देखो तोता आया, कोयल बोली, आज बच्चे को नींद से जगाने के लिए टीवी आॅन कर मां कहती है देखो डोरेमाॅल आ रहा है। बच्चा आंख मीचते हुए उठ बैठता है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि बच्चों का नैसर्गिक विकास इन परिस्थितियों में कैसे हो सकता है?

प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के शासनकाल से शिक्षा को लेकर प्रयोग करने का सिलसिला आरंभ हुआ। शिक्षा को लेकर भारत गणराज्य में जितने प्रयोग हुए उतने शायद ही किसी अन्य देश में हुए हों। एक जमाना था जब हम खुद भी प्राथमिक कक्षाओं में ज्ञानार्जन किया करते थे, हमारे जैसे अनेक विद्यार्थी इस बात के गवाह होंगे कि उस वक्त निर्धारित पाठ्यक्रम के स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। उस काल की शालाओं को हम ‘आधुनिक गुरूकुल‘ की संज्ञा भी दे सकते हैं।

जमाना बदलता रहा और शिक्षा के तौर तरीकों में भी बदलाव होता रहा। बदलाव सतत प्रक्रिया है, जिसे रोका नहीं जा सकता है। आजाद भारत में सत्तर के दशक तक बदलाव की बयार बेहद ही मंदी थी। इसके उपरांत बदलाव की आंधी सी आ गई। अस्सी के दशक तक महाविद्यालयों में पढ़ाई के लिए विद्यार्थी पूरे साल मेहनत किया करते थे, इसके उपरांत ‘वन डे सीरिज‘, ‘ट्वेंटी क्वेश्चन्स‘, ‘गागर में सागर‘ जैसी बीस से तीस पेज की किताबों ने विद्यार्थियों को आकर्षित किया। इसके बाद विद्यार्थियों को लगा कि साल भर पढ़कर परीक्षा देना बेवकूफी ही है।

जब जब सरकारें बदलीं सियासी दलों का पहला निशाना शिक्षा व्यवस्था ही बनी, जिस पर हमला कर ध्वस्त करने का प्रयास किया गया। भूत, वर्तमान और भविष्य को देखने के बजाए देश के नीति निर्धारकों ने अपने निहित स्वार्थों को तवज्जो देकर शिक्षा व्यवस्था का कचूमर ही निकाल दिया। रही सही कसर शाला प्रबंधनों द्वारा निकाल दी जाती है। निजी तौर पर संचालित होने वाले अनेक शैक्षणिक संस्थानों में प्रबंधन के तुगलकी फरमान बच्चों और उनके पालकों की जान निकालने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं। सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरबारी‘ में इस बात को चिन्हित करते हुए कहा गया है कि ‘हमारी शिक्षा नीति एक एसी कुतिया है, जिसे हर कोई लतियाता चलता है।‘

केंद्र और राज्य सरकारों की कथित अनदेखी के कारण आज देश में शिक्षा इतनी मंहगी हो चुकी है कि आम आदमी की पहुंच से लगभग बाहर ही है शिक्षा का अधिकार। केंद्र सरकार ने भले ही शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया हो पर इसके अमली जामा पहनने में संशय ही लगता है। इसमें कुल क्षमता का पच्चीस फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार के बच्चों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। कल्पना कीजिए कि टाटा या बिडला की संतानें जिस शाला में पढ़ रही हों उनके बाजू में उनके घर काम करने वाली बाई का बच्चा बैठे तो क्या यह इन अमीरजादों को गवारा होगा?

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू करते समय कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने वादे बहुत ही बड़े किए थे किन्तु आज इसकी सरेराह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। किसी भी सियासी दल या सूबे को इस बात की चिंता नहीं है कि वह कानून का उल्लंघन कर रहा है। छः से 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को देश भर में लागू किए जाने के एक साल बाद भी यह समूचे देश में लागू नहीं हो सका है। आज यह देश के महज 18 राज्य जिनमेें आंध्रप्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, बिहार, चंडीगढ़, अरूणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, दादर नगर हवेली, दमन द्वीव, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, लक्ष्यद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम शामिल हैं, में अधिसूचित हो चुका। इसके अलावा केंद्र की नाक के नीचे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, गुजरात, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े सूबों में यह लागू नहीं हो सका है।

आंकड़ों पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो देश में आज भी 49 फीसदी स्कूलों में खेल का मैदान तक नहीं है। कुल आबादी में से महज 48.12 फीसदी बालिकाएं ही उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुंच पाती हैं। कच्ची मट्टी को गढ़ने वाले 21 फीसदी शिक्षकों के पास पेशेवर डिग्री ही नहीं है। 21 फीसदी शालाओं में महज एक ही शिक्षक हैं। 41 फीसदी शालाओं में बालिकाओं के लिए शौचालय की व्यवस्था तक नहीं है। देश के 324 जिलों में निर्धारित मानकों के अनुसार शिक्षक नहीं हैं। आरटीई के लागू होने के बाद भी देश में 81 लाख पचास हजार 619 बच्चों ने शाला का मुंह नहीं देखा है।

सरकारी शालाओं का स्तर पूरी तरह गिर जाने से शिक्षा की दुकानों के लिए उपजाऊ माहौल तैयार हो गया है। राजनैतिक संरक्षण से देश भर में शिक्षा की दुकानें सज चुकी हैं, जहां प्रवेश के समय मोटा डोनेशन लिया जाता है। केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के केपीटेशन फीस न लेने के सख्त आदेश की धज्जियां जहां तहां उड़ती दिख ही जाती हैं। छोटे छोटे शहरों में भी शालाओं द्वारा दस से पचास हजार रूपए तक का डोनेशन लिया जाता है। मजे की बात तो यह है कि शाला में उत्तीर्ण होने वाले छात्र को दोबारा उसी शाला में फ्रेश एडमीशन लेना पड़ता है, जिससे सारी फीस का दुबारा भोगमान उसके पालक को ही भोगना पड़ता है। मनमानी पर उतारू शाला प्रबंधनों द्वारा बोर्ड की कक्षाओं को छोड़कर शेष कक्षाओं में मनमाना सिलेबस और लेखक की किताबें दुकान विशेष से ही खरीदने पर विद्यार्थियों को बाध्य किया जाता है। इतना ही नहीं गणवेश में नित परिवर्तन कर दुकान विशेष से गणवेश खरीदवाकर शाला प्रबंधन मालामाल हुए जा रहे हैं।

आज के समय में शिक्षा को महज डिग्री लेकर नौकरी करने और शादी करने का साधन बना लिया गया है। आज के समय में अगर कोई किसी को भी गलत रास्ते पर चलकर नीचता, बेईमानी, धूर्तता के साथ अमीर बनकर सफल होते देखेगा तो क्या वह नीतिगत सिद्धांतों की शूल भरी राह पर चलने का साहस जुटा पाएगा? उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगा। जब संस्कारों से युक्त सिनेमा, टीवी सीरियल्स का स्थान फूहड़ता ने ले लिया हो तो हमारी युवा पीढ़ी गांधी के मार्ग का अनुसरण करे इसमें संशय ही प्रतीत होता है।

शिक्षकों को अध्यापन कार्य से इतर ‘बेगार‘ के कामों में लगाने से उसका ध्यान अपने मूल काम से भटकना स्वाभाविक ही है। यह स्थापित सत्य है कि शिक्षक देश का भविष्य गढ़ते हैं और कच्ची माटी को सुंदर स्वरूप देने वाले आचार्यों को अगर जनगणना, मतदाता सूची, पल्स पोलियो जैसे कामों में लगा दिया जाए तो उनका ध्यान अध्यापन में भला क्यों लगेगा। मजे की बात तो यह है कि सरकार के पास जनगणना, चुनाव आयोग और स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारियों की खासी फौज होने के बाद भी शिक्षकों से बेगार करवाया जाता है। यही कारण है कि शिक्षकों द्वारा अपने मूल काम को तवज्जो देना बंद कर दिया है। अध्यापन में महारथ रखने वाले शिक्षकों द्वारा सरकारी चिकित्सकों के मानिंद अपने कर्तव्यों को निजी स्तर पर घर या कोचिंग क्लासिस में इसका भरपूर उपयोग कर धर्नाजन किया जा रहा है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग में शिक्षा को व्यवसाय बना लिया गया है, जिसकी रोकथाम के उपाय करने ही होंगे, किन्तु विडम्बना यह है कि सरकार इस दिशा में संजीदा होती दिखाई नहीं पड़ती।

कमल नाथ के प्रयासों पर पानी फेरते जोशी

कमल नाथ के प्रयासों पर पानी फेरते जोशी

धनाभाव में रूका सड़कों का स्वीकृत काम

टेंडर बुलाने के बाद किया काम निरस्त

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ द्वारा मध्य प्रदेश को दी गई सौगात उनके सक्सेसर सी.पी.जोशी ने एक एक कर छीनना आरंभ कर दिया है। अपने गृह प्रदेश के विकास के लिए संकल्पित कमल नाथ ने भले ही वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहते प्रदेश को कुछ न दिया हो, किन्तु भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर उन्होंने मध्य प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाने की कार्ययोजना सुनिश्चित की थी।

सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि बजट की कमी का हवाला देते हुए विभाग के नए निजाम सी.पी.जोशी ने कमल नाथ के कार्यकाल में स्वीकृत सड़क परियोजनाओं को रोक दिया है। गौरतलब होगा कि एमपी के निजाम शिवराज सिंह चैहान ने अनेक मर्तबा दिल्ली में मीडिया से रूबरू होकर कमल नाथ की दरियादिली की सरेआम तारीफ भी की जा चुकी है। शिवराज का मानना था कि कमल नाथ दलगत राजनीति से उपर उठकर मध्य प्रदेश का हित साध रहे हैं।

अपने कार्यकाल मेें कमल नाथ ने वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 में अंतर्राज्यीय सड़कों को जोड़ने की मद (आईएससी) में मध्य प्रदेश के लिए 11 राजमार्गों के लिए 137 करोड़ रूपयों की मंजूरी दी थी। इनमें से अनेक मार्ग अधिसूचित हो चुके हैं जिनके निर्माण के लिए प्रशासकीय और तकनीकि स्वीकृति (एएस और टीएस) भी जारी कर टेंडर प्रक्रिया पूरी की जाने के बाद निविदा को धनाभाव के चलते निरस्त करना पड़ा है। भविष्य में अगर इन कामों को पुनः आरंभ कराने की स्थिति निर्मित होती है तो इन सभी परियोजनाओं को पुर्न प्राक्कलन (रिवाईज्ड स्टीमेट) तैयार करवाना पड़ेगा जिससे परियोजना की लागत मंे दो गुना वृद्धि होने की उम्मीद है।

मध्य प्रदेश का इस तरह स्वीकृत हक मारे जाने पर विपक्ष में बैठे भाजपा के सांसद तो मौन साधे हुए हैं किन्तु कांग्रेस के देवास के संसद सदस्य सज्जन सिंह वर्मा मानसून सत्र में अपने संसदीय क्षेत्र में केंद्रीय सड़क निधि (सीआरएफ) के तहत स्वीकृत सड़कों की दो मर्तबा निविदा स्वीकृति के बाद निर्माण कार्य आरंभ न किए जाने का मामला उठाने की तैयारियां कर रहे हैं।

chvanne gayab!