शनिवार, 25 जून 2011

कमल नाथ बन सकते हैं रेल मंत्री


मदाम तय करेंगी फेरबदल का आकार!

फ्री हेण्ड न मिल पाने से दुखी हैं मनमोहन

सहयोगियों ने मनमोहन की छवि कर दी मटियामेट

अनेक मंत्रियों को बदलना चाह रहे वजीरे आजम

एमपी कोटा भी हो सकता है जबर्दस्त तरीके से प्रभावित

विस्तार तय करेगा राहुल का भविष्य का रोड़ मेप

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के बीच हुई लगभग ढाई घंटे की मुलाकात के बाद अब मंत्रीमण्डल में फेरदबल की सुगबुगाहट एक बार फिर तेज हो गई है। वजीरे आजम चाहते हैं कि वे भ्रष्ट और नाकार मंत्रियों को हटाकर अपनी छवि को पुनः साफ सुथरा बनाएं किन्तु इसके लिए उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष से फ्री हेण्ड की दरकार है। उधर कहा जा रहा है कि यह तो मदाम (श्रीमति सोनिया गांधी) की इच्छा पर ही है कि यह फेरबदल बड़ा होगा या छोटा। इस मंत्रीमण्डल विस्तार से इस बात के संकेत मिल सकेंगे कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की राहुल को पीएम बनाने की बयानबाजी कब आकार ले सकेगी।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि वजीरे आजम चाह रहे हैं कि पवन बंसल, पलनिअप्पम चिदम्बरम, वीरप्पा माईली, आनंद शर्मा, गुलाम नवी आजाद, कांतिलाल भूरिया, सी.पी.जोशी, अश्विनी कुमार आदि को या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए या विभागों में फेरबदल कर कम महत्व के मंत्रालय सौंपे जाएं। इसके अलावा कपिल सिब्बल से भी मानव सांसाधन मंत्रालय वापस ले लिया जाए।

चिदम्बरम पर बाबा रामदेव से निपटने में असफल होने का आरोप है जिससे सरकार की खासी किरकिरी हुई है। इसके साथ ही साथ उन पर टूजी मामले में दाग भी लग रहे हैं। चिदंबरम का स्थान लेने के लिए गुलाम नवी आजाद आतुर दिख रहे हैं। उधर सुशील कुमार शिंदे चाह रहे हैं कि वे गृह मंत्रालय की कमान संभालें। सोनिया मण्डली चाह रही है कि कपिल सिब्बल से मानव संसाधन विभाग वापस लेकर परिवार के वफादार जनार्दन द्विवेदी या अस्कर फर्नाडिस के हाथों सौंप दिया जाए ताकि राहुल के प्रधानमंत्री बनने के मार्ग शनैः शनैः प्रशस्त किए जा सकें।

पीएम को वीरप्पा मोईली फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं, किन्तु वे दस जनपथ के करीबी हैं सो पीएम का उन पर बस नहीं चल पा रहा है। हिमाचल चुनाव तक वीरभद्र को झेलना मनमोहन की मजबूरी है। यूपी मंे बहिराईच से दलित सांसद कमल किशोर को कैबनेट मंत्री बनवाना चाह रहे हैं युवराज राहुल गांधी साथ ही बेनी प्रसाद वर्मा को भी कैबनेट का दर्जा दिलवाना चाह रहे है वे। इसके लिए वर्मा को इस्पात मंत्रालय से रूख सती डालनी होगी।

रिलायंस से करीबी का भोगमान मुरली देवड़ा को भोगना पड़ सकता है। उनके स्थान पर किसी अन्य को उपकृत किया जा सकता है। उधर पीएम चाहते हैं कि गुजरात की सांसद अलका क्षत्री को मंत्री मण्डल में शामिल किया जाए, किन्त अलका का ऋणात्मक पहलू यह है कि वे सोनिया के आंख नाक और कान बने अहमद पटेल के विरोधी खेमे से हैं।

सूत्रों की मानें तो इस फेरबदल में मध्य प्रदेश कोटा काफी हद तक प्रभावित होने की उम्मीद है। वर्तमान में मध्य प्रदेश से लोकसभा के चार सदस्य कमल नाथ, कांति लाल भूरिया, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरूण यादव केंद्र में मंत्री हैं। कहा जा रहा है कि इस फेरबदल में कांतिलाल भूरिया को ड्राप किया जा सकता है तथा कमल नाथ का विभाग एक बार फिर बदला जा सकता है, भूतल परिवहन मंत्रालय के उनके परफारमंेस को देखकर त्रणमूल कांग्रेस से रेल मंत्रालय वापस लेकर कमल नाथ को सौंपा जा सकता है। इसके साथ ही साथ चार बार राज्यसभा के रास्ते संसदीय सौंध पहुंचने वाले सुरेश पचौरी को भी सरकार में शामिल कराकर उन्हें पांचवी बार भी राज्य सभा से संसद में भेजा जा सकता है।

उधर कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की नजरें उत्तर प्रदेश महासमर पर टिकी हुईं हैं इसलिए वे यूपी से आधिक चेहरों को लाल बत्ती से नवाजने में विश्वास रख रहे हैं। कांग्रेस के सियासी गलियारों के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि सलमान खुर्शीद को बेहतर विभाग दिलवाने के लिए जबर्दस्त लाबिंग चल रही है, क्योंकि वे अल्पसंख्यक मामलों से आजिज आ चुके हैं। उधर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व राज्य सभा सांसद सुरेश पचौरी भी पुनर्वास के लिए दिन रात एक किए हुए हैं। उनके लिए भी लाल बत्ती के जुगाड़ में अहमद पटेल संभावनाएं टटोल रहे हैं।
युवाओं (राजनीति में युवा अर्थात 45 से 65) को आगे लाने के राहुल और दिग्विजय सिंह के संयुक्त एजेंडे के तहत राजीव शुक्ला, जगदंबिका पाल, कमल किशोर, मनीष तिवारी आदि के नामों पर चर्चाएं गर्म हैं। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि मनमोहन सिंह ने अपनी समस्याओं से सोनिया गांधी को आवगत कराकर, अपनी और पार्टी की गिरती साख पर चिंता जताते हुए उनसे फ्री हेण्ड मांगा है, जिस पर सोनिया ने मौन रहना ही उचित समझा है।

शुक्रवार, 24 जून 2011

मोबाईल टावर करेंगे शालाओं को रोशन

मोबाईल टावर करेंगे शालाओं को रोशन

रेडिएशन की परवाह किए बिना सिब्बल झोंकेंगे बच्चों को आग में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की शालाओं में विद्यार्थियों को आने वाले दिनों में बिजली की समस्या से दो चार नहीं होना पड़ेगा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिस कार्ययोजना पर काम कर रहा है उससे देश की अधिकांश शालाओं को चौबीसों घंटे निर्बाध तौर पर बिजली मुहैया हो सकेगी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हरियाणा के गुड़गांव में किए गए प्रयोग के उत्साहजनक परिणाम से सिब्बल गदगद हैं।
गौरतलब होगा कि देश के 61 फीसदी प्राथमिक और माध्यमिक शाला इन दिनों बिजली की समस्याओं से जूझ रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों में सरकार बिजली नहीं पहुंचा पा रही है, किन्तु निजी तौर पर संचालित होने वाली कंपनियों में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा अपने नेटवर्क को निर्बाध रखने के लिए वहां मोबाईल टावर लगाकर जनरेटर के माध्यम से बिजली मुहैया करवाई जा रही है।
मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के कुछ आंकड़े दर्शाते हैं कि देश मंे बारह लाख स्कूलों में से सात लाख से अधिक स्कूलों में बिजली नहीं है। सिब्बल के निर्देश पर एचआरडी मिनिस्ट्री के आला अधिकारी इस दिशा में काम कर रहे हैं जिसमंे सरकारी स्कूल की छत या पास के मैदान में मोबाईल टावर लगाकर उससे मिलने वाली बिजली से शाला को रोशन किया जा सके। इससे बिजली के साथ ही साथ शाला को आमदनी भी होगी। देश में वर्तमान में लगभग साढ़े चार लाख मोबाईल टावर हैं।
यह योजना जल्द ही इसलिए भी परवान चढ़ सकेगी क्योंकि संचार मंत्रालय का जिम्मा भी मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के पास ही है। जानकारों का कहना है कि आबादी के आसपास मोबाईल टावर लगाने से मानव को खतरा हो सकता है, इसलिए इन टावर्स को आबादी से दूर रखने की मुहिम छेड़ी हुई है। इन टावर्स के रेडिएशन से गोरैया और मधु मख्खी शहरों से दूर हो गई हैं। बावजूद इसके शालाओं में बच्चों के इर्दगिर्द उठने वाले रेडिएशन का दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़े बिना नहीं रहने वाला।

गुरुवार, 23 जून 2011

कबूतर जा जा जा . . . .


कबूतर जा जा जा . . . .

(लिमटी खरे)

संदेशों के आदान प्रदान के लिए कपोत यानी कबूतर के प्रयोग के दिन लद चुके हैं। उस वक्त प्रशिक्षित कबूतरों के पैरों पर संदेश लिखकर बांध दिया जाता था। फिर वह गंतव्य तक पहुंचकर उसका जवाब लेकर आता था। कालांतर में कबूतरों का काम डाक विभाग ने आरंभ किया। परिवर्तन के दौर में राजनेताओं की निहित स्वार्थों की भूख से डाक विभाग को पटरी पर से उतार दिया कोरियर कंपनी वालों ने। अब लोग डाकिए का इंतजार नहीं किया करते, अब तो जमाना इंटर नेट का है। इसलिए जन्मदिन, शादी विवाह, परीक्षा में सफलता आदि पर ग्रीटिंग कार्डस, तार, पत्र आदि का जमाना लद गया है, अब तो बस एक क्लिक पर ही आपका संदेश मोबाईल से एसएमएस तो नेट पर ईकार्ड या मेल के जरिए पहुंच जाता है। यह सब होता तो है पर पत्र वाकई आनंद की अनुभूति कराया करते थे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।

देश के डाकघरों में जान फूंकने की गरज से परियोजना एरोका आगाज किया है भारत सरकार ने, जो समय के साथ परवान चढ़ती जा रही है। देश के अनेक डाकघर जहां की अवयवस्था, गंदगी, उलझाउ कार्यप्रणाली, कर्मचारियों के आलसी व्यवहार के चलते लोग जाने से कतराते थे, वहां जाकर तो देखिए, डाकघर आपको थ्री स्टार जगहों से कम नजर नहीं आएंगे। पोस्ट ऑफिस का कायाकल्प हो गया है। अब वे देखने में भी सुंदर लगने लगे हैं, कर्मचारियों के व्यवहार में भी खासा अंतर परिलक्षित होने लगा है। बस कमी एक ही रह गई है, डाकियों की भर्ति नहीं होने से चिठ्ठियों का वितरण करीने से नहीं हो पा रहा है। सबसे अधिक दिक्कत परीक्षा में बैठने वालों को हो रही है, क्योंकि नए डाकियों को ठीक से पता न होने के कारण उनके वे प्रवेश पत्र से वंचित रह जाते हैं।

वैसे प्रोजेक्ट एरो में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आधार बनाया जा सकता है, जिसमें डाकघर को ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय और आर्थिक क्रांति का जरिया बनाया जा सकता है। वैसे भी डाकघर में जमा निकासी पर ग्रामीणों का विश्वास आज भी कायम है। बदलते जमाने की रफ्तार के बावजूद भी डाकघर बैंकिग प्रणाली में आम आदमी तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि आयकर में छूट पाने के लिए लोग डाकघर के नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट पर टूट पड़ते थे। बाद में वित्त मंत्रालय की नीतियों ने डाकघरों की सांसें फुला दीं और लोग इससे विमुख होने लगे, अन्यथा मार्च माह में डाकघर में बाबुओं को खाना खाने की फुर्सत नहीं होती थी।

देश में वर्तमान में छोटे, मंझोले, बड़े डाकघर मिलाकर एक लाख पचपन हजार प्रंद्रह केंद्र संचालित हैं, इनमें निजी तौर पर दी गई फ्रेंचाईजी शामिल नहीं है। इनमें से साढ़े बारह से अधिक डाकघरों को कंप्यूटरीकृत कर दिया गया है। केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि सभी डाकघरों को वर्ष 2012 के साथ ही कंप्यूटरीकृत कर दिया जाए। डाक तार विभाग में एक हजार करोड़ रूपयों के बजट के साथ छः कंपनियां डाकघरों के अपग्रेडेशन के काम को अंजाम दे रही हैं।

देश के सबसे पुराने विभागों की फेहरिस्त में शामिल डाक विभाग वर्तमान में सामान्य पोस्ट, मनी आर्डर के अलावा स्पीड पोस्ट, इंटरनेशनल रजिस्टर्ड पोस्ट, लॉजिस्टिक पोस्ट, पार्सल, बिजनेस पोस्ट, मीडिया पोस्ट, डायरेक्ट पोस्ट आदि की सेवाएं दे रहा है। इसके साथ ही साथ ग्रामीण इलाकों में आर्थिक सेवाओं में पीपीएफ, एनएससी, किसान विकास पत्र, सेविंग एकाउंट, सावधिक जमा खाता आदि की सुविधाएं मुहैया करवा रहा है। गैर पोस्टल सेवाओं में पोस्टल लाईफ इंश्योरेंस, ई पेमेंट, इंस्टेंट मनी आर्डर सर्विस और इंटरनेशनल मनी ट्रांसफर की सेवाएं भी दे रहा है।

भारत में डाक सेवा की नींच 19वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा की गई थी। 01 जुलाई 1852 को सिंध प्रांत में सिंध डाकका आगाज डाक सेवा के तौर पर किया गया था, इस दिन पहला वेक्स से बना डाक टिकिट जारी किया गया था। यह हिन्दुस्तान ही नहीं वरन् एशिया का पहला डाक टिकिट था। देश में आधा आना, एक, दो और चार आने का डाक टिकिट सबसे पहले प्रयोग में लाया गया था। दुनिया का सबसे उंचाई वाला डाकघर हिन्दुस्तान में ही है। समुद्रतल से 15,500 फुट (लगभग 4700 मीटर) के साथ सिक्किम में 172114 पिन नंबर के साथ यह दुनिया का सबसे उंचा डाकघर है। 1962 तक डाक टिकिटों पर इंडिया पोस्टेज लिखा होता था, इसके बाद 1962 से ही इसे हटाकर इसके स्थान पर भारत लिखा जाने लगा।

इस साल फरवरी माह में भारत के डाक विभाग द्वारा बापू के प्रिय खादी के कपड़े पर बापू की तस्वीर वाली टिकिटों को बाजार मंे सीमित मात्रा में उतारा था। लोगों ने यादगार के तौर पर खदीकर सहेज कर रख लिया है। इसके अलावा डाक विभाग को पुनः लोकप्रिय बनाने की गरज से विभाग ने लोगों को खास मित्र या रिश्तेदार अथवा स्वयं के चित्रों वाला डाक टिकिट देने की स्कीम भी लांच की, जिसमें निर्धारित शुल्क अदा करने पर कोई भी किसी खास चित्र को बनवाकर उसका डाक टिकिट बनवा सकता है।

कोरियर कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व और सूचना एवं संचार क्रांति ने डाक विभाग के चिट्ठी पत्री बांटने के काम को भी सीमित ही कर दिया। कम ही लोग हैं जो आज पत्रों का उपयोग करते हैं। पत्र अगर भेजना भी है तो लोगों का विश्वास डाक विभाग से उठ चुका है। लोगों का मानना है कि कोरियर सेवा से उनका संदेश चोबीस से अड़तालीस घंटे में पहुंच ही जाएगा। डाक विभाग के एकाधिकार को कोरियर कंपनियों ने तोड़ दिया है। अब डाक विभाग की स्पीड पोस्ट सेवा से पुनः लोगों का विश्वास डाक विभाग की ओर लौटने लगा है किन्तु स्पीड पोस्ट सेवा कुछ हद तक मंहगी होने के कारण वांछित लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर पाई है। अब एसे लोग गिनती के ही बचे होंगे जो नियमित तौर पर पत्रों का आदान प्रदान किया करते हैं। दमोह मूल के शिक्षा विभाग से सेवानिवृत सहायक संचालक एवं रूड़की विश्वविद्यालय में व्याख्याता डॉ.दीपक के लगभग अस्सी वर्षीय पिता डी.डी.खरे रोजाना अपने दो परिचितों को नियमित तौर पर पोस्ट कार्ड भेजते हैं। उनका मानना है कि पत्र के माध्यम से आपकी व्यक्तिगत उपस्थिति का आभास होता है, यही कारण है कि वे सालों साल से निर्बाध तौर पर पोस्ट कार्ड लिखकर प्रेषित करते हैं, उनके परिचित भी उनके पत्रों का जवाब देकर इस उम्र में उन्हें नई उर्जा प्रदान किया करते हैं।

भारतीय डाक विभाग का नेटवर्क देश की अमूल्य धरोहर है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान और कृषि के लिए यह नेटवर्क वरदान साबित हो सकता है। इसके लिए केंद्र और राज्य के बीच जबर्दस्त समन्वय होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि खेती किसानी राज्य का अपना विषय होता है। राज्य सरकारों को डाकघरों से सीधे मुद्रा विनिमय करना होगा। कमोबेश हर गांव डाकघर की जद में है, इस लिहाज से मुद्रा विनिमय के लिए राज्य की सरकारों को बैंकों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

डाकघर किसान और सरकार के बीच बिचौलिए की भूमिका बखूबी निभा सकता है। इसके अलावा वह किसान के लिए गारंटर भी बन सकता है। इसके लिए आवश्यक होगा कि किसान की जमीन की पूरी माहती डाकघर के पास हो। साथ ही साथ वह किसान को जरूरत के हिसाब से कर्ज देकर उसकी अदायगी भी सुनिश्चित कराए। डाकघर केंद्र सरकार के अधीन काम करता है, और गांव गांव में उसकी खासी पकड़ बन चुकी है। डाकघर के पास वर्तमान में जो काम हैं उसके साथ ही साथ वह किसानों की जमीनों का लेखा जोखा और कृषि की स्थिति का आंकलन भी कर सकता है। वह मौसम के मिजाज के साथ ही साथ खेती की उपज का जायजा और पूर्वानुमान भी लगा सकता है। जो किसानों के लिए काफी हद तक हितकर साबित होगा। इसके लिए डाक विभाग को अपने कानूनों में संशोधन कर राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर उनकी अनुमति की दरकार होगी।

केंद्र सरकार अगर वाकई किसानों का हित साधना चाह रही है तो वह डाकघर को किसानों के लिए उपयोगी बनाने की दिशा मंे प्रयास कर सकती है। केंद्र सरकार चाहे तो डाकघरों को सशक्त ग्रामीण विकास बैंक की भूमिका में लाकर खड़ा कर सकती है। डाकघरों को उपभोक्ता समाग्री के अलावा अन्य वस्तुओं विशेषकर कृषि आधारित जरूरत की चीजों का विपणन केंद्र बनाया जा सकता है। डाकघर की भूमिका का विस्तार कर इसको ग्राम पंचायतों से लेकर व्यक्गित तौर पर धन के विनिमय का केंद्र बनाया जा सकता है। डाकघर के पोस्टल आर्डर को देश में कहीं भी भुनाए जाने योग्य बनाकर इससे ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का असरदार अंग बना सकते हैं। मनीआर्डर के स्थान पर इसे मनी ट्रांसफर केंद्र बनाया जा सकता है।

इंटर नेट से जुड़े डाकघर ग्रामीण क्षेत्रों में सायबर कैफे बन सकते हैं, जहां ग्रामीणों को कंप्यूटर प्रशिक्षित किया जाकर आधुनिक संसार से जोड़ा जा सकता है। इन डाकघरों से रेल के ई टिकिट जारी करवाए जा सकते हैं। इसके अलावा जिस तरह मध्य प्रदेश सरकार ने एमपी ऑन लाईनकी फ्रेंचाईजी दी है जिसमें सरकारी योजनाओं के साथ ही साथ अनेक फार्म ऑन लाईन भरे जाते हैं, की तरह से डाकघरों का प्रयोग किया जा सकता है।

प्रोजेक्ट एरो में अनेक तरह से अत्याधुनिक बनाया जा रहा है भारतीय डाक विभाग को। कहा जा रहा है कि आने वाले समय में ई डाक टिकिट का प्रयोग कोई भी उपभोक्ता कर सकेगा। इसके लिए उसे कंप्यूटर और प्रिंटर का प्रयोग करना होगा। ऑन लाईन मिलने वाली ई डाक टिकिट सेवा के लिए जितनी राशि की डाक टिकिट चाहिए उतनी राशि उसे ऑन लाईन अपने डेबिट या क्रेडिट कार्ड से विभाग को जमा करानी होगी, जिसके एवज में उसे एक विशेष नंबर का बार कोड दिया जाएगा। इसका प्रिंट लिफाफे पर चिपका दिया जाएगा। इस बार कोड के लिए साधारण डाक जितनी ही कीमत चुकानी होगी।
डाक विभाग की इस तरह की पहल को देखकर लगने लगा है कि डाक घर अपना पुराना खोया वैभव एक बार फिर पा सकता है। इसके लिए विभाग को कर्मचारियों की भर्ती कर उन्हें प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा। साथ ही साथ निजी तौर पर वैध और अवैध तौर पर चल रही कोरियर कंपनियों की मुश्कें भी कसना आवश्यक होगा, जो डाक विभाग की नींव में सुराख दर सुराख किए जा रहीं हैं। इसके लिए डाक विभाग के आला अधिकारियांे और सरकार में बैठे नुमाईंदों की साफ नीयत की दरकार होगी।

प्रियंका में संभावनाएं तलाशते राहुल से तिरस्कृत


प्रियंका में संभावनाएं तलाशते राहुल से तिरस्कृत

दिग्विजय के किले को भेद नहीं पा रहे कांग्रेस के आलंबरदार

अमरीकि नहीं चाहते राहुल बनें पीएम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के दरबार में स्थान न पाने वाले इंदिरा गांधी के अति विश्वासपात्र रहे नेताओं की नजरें अब उनकी अग्रजा प्रियंका वढ़ेरा पर टिक गईं हैं। राहुल से उपेक्षित कांग्रेसी नेताओं ने प्रियंका में अपना तारणहार खोजना आरंभ कर दिया है। उमर दराज कांग्रेसी नेता वसंत साठे, आर.के.धवन और जाफर शरीफ ने राहुल की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए प्रियंका को राजनीति मंे उतारने के प्रयास आरंभ कर दिए हैं।
इस त्रिफला ने परोक्ष तौर पर सोनिया गांधी के संगठन चलाने की नीति की भी निंदा की है। इशारों ही इशारों में इस तिकड़ी  ने राहुल गांधी पर आरोप भी लगा दिए कि वे करिश्माई नेता नहीं हैं, और इतने बुद्धिमान भी नहीं हैं कि अपने बूते वे कोई पद ले सकें। सियासी गलियारों में इस बात का मतलब लगाया जा रहा है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं। उधर सत्ता के गलियारों में इस बात को भी हवा दी जा रही है कि अमेरिका का मत है कि राहुल गांधी को देश का सर्वोच्च पद नहीं देना चाहिए। अमेरिकीयों की मानें तो राहुल गांधी बेहद भ्रमित है और उन्हें राजनीति का ककहरा ठीक से नहीं आता है।
उधर कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह अब युवराज राहुल गांधी के प्रशिक्षक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। राजा दिग्विजय सिंह का घेरा इतना मजबूत है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता उसे चाहकर भी लांघकर राहुल के करीब नहीं जा पा रहे हैं। यही कारण है कि अनेक वरिष्ठ नेता इन दिनों अपने आप को उपेक्षित ही पा रहे हैं। कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह ने राहुल के पीएम बनने का दांव इसलिए भी फेंका है ताकि पीएम के अन्य दावेदारों की हवा निकल सके और अंत में जब पीएम बनने की बारी आए तब राहुल को अमरीका के दबाव के आगे पीएम न बनाया जाए। उस वक्त प्रधानमंत्री राजा दिग्विजय सिंह प्रधानमंत्री के इकलौते सशक्त दावेदार साबित होंगे।
संभवतः राजा दिग्विजय सिंह की इस रणनीति का आभास होते ही इंदिरा गांधी के अति विश्वस्त रहे जाफर शरीफ, वसंत साठे और आर.के.धवन ने राहुल की मुखालफत आरंभ कर दी है, ताकि उनके बहाने वे दिग्विजय सिंह को बेनकाब कर सकें। तीनों नेता चाह रहे हैं कि प्रियंका वढ़ेरा अपने आप को राजीव गांधी फाउंडेशन तक सीमित रखने के बजाए सक्रिय राजनीत में आकर कांग्रेस की नैया को पार लगाने का काम करें। प्रियंका के करीबी सूत्रों का कहना है कि प्रियंका जानती हैं कि लोग उनमें उनकी दादी प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं, उन्हें अपनी असीमित राजनैतिक संभावनाओं के बारे मंे मालुम है, बस वे इंतजार कर रही हैं तो माकूल वक्त का, और उनकी नजरें जमीं हैं वक्त की करवटों पर।

बुधवार, 22 जून 2011

अर्श से फर्श पर ‘महाराजा‘


अर्श से फर्श पर महाराजा

(लिमटी खरे)

छः दशकों के लंबे सफर के बाद शान से सर उठाने वाला महाराजाकंगाल हो गया है। एयर इंडियाके कंगाल और उसके ही समकक्ष अन्य एयर लाईंस के मालामाल होने पर अनेकों प्रश्न मानस पटल पर घुमड़ना स्वाभाविक ही है। केंद्र सरकार ने अपनी रियाया का मुंह पोंछकर लाखों करोड़ रूपए महाराजा की झोली में डाले पर नतीजा सिफर ही रहा। दिल्ली की सड़कों का सीना रौंदने वाली डीटीसी की यात्री बसों के प्रबंधन में भी कमोबेश यही समस्या आई और ब्लू लाईन ने इनका स्थान ले लिया। लोग डीटीसी की बस में सफर करना पसंद भी नहीं किया करते थे। बाद में जब डीटीसी ने ब्लू लाईन को सड़कों से हटाकर शानदार लो फ्लोर बस सड़कों पर उतारीं तो आज उसकी रोजाना की कमाई करोड़ों रूपयों से अधिक पहुंच चुकी है। किलर ब्लू लाईन को प्रमोट भी शीला सरकार ने ही किया और कोर्ट के निर्देश पर उनको बाहर भी शीला सरकार ने ही किया। जरूरत इच्छा शक्ति की है, चाहे वह बलात ही किसी के उपर लादी जाए।
  
साठ साल का उमर दराज हो चुका है महाराजा। छः दशकों से हवा में कलाबाजियां खाने के बाद भी शान से आसमान का सीना चीरने वाले एयर इंडिया को लाजवाब कहा जाता था। विलासिता के उपभोगियों की पहली पसंद था यह। वैसे तो सरकार अपने कर्मचारी को साठ साल की उमर पूरी करने पर सेवा निवृत कर देती है, पर यही सेवा निवृत सरकारी कर्मचारी किसी निजी कंपनी में जाकर तीन चार गुनी पगार पर अपने जीवन के सारे अनुभवों के माध्यम से उस कंपनी को लाभ पहुंचाने से नहीं चूकता है। महाराजा का साठ साल का होना सरकार के लिए गर्व की बात होना चाहिए किन्तु आर्थिक बदहाली ने एयर इंडिया की कमर तोड़ रखी है।

एयर इंडिया की आर्थिक कंगाली के चलते सरकार तेल कंपनियों ने ही उसकी तेल आपूर्ति को घटा दिया है। एयर इंडिया की अनेक उड़ाने रद्द हो चुकी हैं। एयर इंडिया और मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम की हालत कमोबेश एक सी ही कही जासकती है। महाराजा की आर्थिक हालत आसमान से जमीन पर कैसे आ गई? इस बारे में दिल्ली परिवहन निगम का उदहारण सबसे उपयुक्त होगा। एक समय में डीटीसी की यात्री बस स्टेटस सिंबल बनी हुई थीं। नब्बे के दशक के आने तक दिल्ली की सैर करने वालों के लिए डीटीसी की बस का सफर आज की मेट्रो के सफर से कम नहीं था। लोग वापस जाकर अपने संस्मरणों में डीटीसी की सिटी बस का जिकर करना शान समझते थे।

डीटीसी में अधिकारियों कर्मचारियों के साथ ही साथ मंत्री विधायकों ने डीटीसी को घुन की तरह खाना आरंभ किया और सड़कों पर ब्लू लाईन बस सेवा के परिवहन के मार्ग प्रशस्त कर दिए। ब्लू लाईन बस सेवाओं में अस्सी फीसदी बस इन्हीं बाहुबलियों, धनपतियों के संरक्षण में ही दौड़ रही थीं। डीटीसी की खटारा बस खाली ही इक्का दुक्का सवारियों के साथ सड़कों पर दिखाई दे जाती थीं। ब्लू लाईन संचालकों और डीटीसी के चालकों की आपसी सांठगांठ के चलते सौ दो सौ रूपयों के लालच में डीटीसी की बस धीरे धीरे रंेगा करती थीं। इस तरह डीटीसी का बट्टा पूरी तरह बैठ चुका था।

उधर किलर ब्लू लाईन यात्री बस दिन दूनी रात चौगनी आय ला रही थी। बाद में कोर्ट की फटकार के बाद इन्हें सड़कों से हटाने का काम आरंभ हुआ। चूंकि इसमें उन्हीं नेता मंत्री विधायकों के आर्थिक हितों पर कुठाराघात हो रहा था इसलिए बुझे मन से टालमटोल के जरिए यह काम आरंभ किया गया। बिल्ली के भाग से छींका इस तरह टूटा कि बीच में ही कामन वेल्थ गेम्स का आयोजन हो गया और फिर क्या था। सरकार को न चाहते हुए भी फटाफट इस काम को अंजाम देना पड़ा। आज डीटीसी की रोजना की कमाई तीन करोड़ रूपयों से कहीं अधिक है। अब आप ही अंदाजा लगाईए कि जिसकी कमाई दस लाख पहुंचने में परेशानी हो रही हो वह तीन करोड़ से अधिक की रोजाना आय लेकर आ रहा हो।

कभी मध्य प्रदेश में कामधेनू समझी जाने वाली मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम की यात्री बसें अब ढूंढे से नहंी मिलती। मुख्यमंत्रियों, परिवहन मंत्रियों, सांसद, विधायकों आदि ने मिलकर इसे बंद करवा ही दिया। इनके स्थान पर अब अनुबंधित बस सड़कों पर दौड़ रही हैं। इन अनुबंधित बस में कितने के पास वैध परमिट हैं यह बात कोई नहंी जानता। अनुबंध के नाम पर स्लीपर कोच बस सड़कों पर दौड़ रही हैं, पर जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग को यह दिखाई नहीं दे रहा है, या दिखाई भी दे रहा है तो वह किसी न किसी दबावमें खामोशी अख्तियार किए हुए हैं। इनमें से सत्तर फीसदी बस किसी न किसी नेता के रिश्ते नातेदार के दबाव में ही चल रही हैं।

केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन काम करने वाला एयर इंडिया की टांगे आखिर उखड़ने कैसे लगीं? इसका प्रमुख कारण नागरिक उड्डयन मंत्रियों की नीतियां ही रहीं हैं। निजी एयरलाईंस ने अपने आप को प्रतिस्पर्धा में आगे रखने के लिए जो जतन किए उसमें विभाग के इन निजामों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि कड़ी प्रतिस्पर्धा में भी निजी एयर लाईंस मुनाफा कमा रही हैं, पर एयर इंडिया की कमर बुरी तरह टूटी हुई है। निजी एयर लाईंस बिना किसी की मदद के सरपट दौड़ रही हैं, तो एयर इंडिया सरकारी इमदाद के सहारे किसी तरह अपने आप को खींच रही है।

आलम यह है कि हजारों करोड़ की सरकारी मदद के बाद भी कर्मचारियों अधिकारियों को मनमाफिक वेतन नहीं मिल पाता। आए दिन कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते हैं। पिछले दिनों पायलट्स की दस दिनी हड़ताल से एयर इंडिया को करोड़ों का घाटा हुआ है। आवाज उठने लगी है कि इस तरह की घाटे वाली कंपनी को बेच ही दिया जाना चाहिए, पर यक्ष प्रश्न तो यह है कि इस बीमार लड़खड़ाती कर्ज में डूबी कंपनी को खरीदने का साहस आखिर जुटाएगा कौन? तीन अरब डालर के घाटे में चल रही इस कंपनी को संकट से उबारने के लिए सरकार ने अब तक हजारों करोड़ रूपयों की मदद दी जा चुकी है।

इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार में बैठे जनसेवक और लोकसेवकों ने किस तरह जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को दोनों हाथों से लूटा है। सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि निजी एयर लाईंस कंपनियों को कमाई करवाने के लिए उन्हें लाभ के मार्ग प्रदान किए गए। घरेलू उड्डयन बाजर पर कभी एकाधिकार रखने वाली कंपनी अब महज 16 फीसदी की हिस्सेदारी ही रखती है। कहते हैं कि महाराजा तो काफी पहले ही कंगाल हो चुका था। महाराजा को तो कभी का दिवालिया घोषित कर देना चाहिए था, पर सरकार को न जाने क्या सूझी कि समय समय पर लाखों करोड़ का चढ़वा एयर इंडिया की झोली में डालती रही।

आज एयर इंडिया पर संकट इतना गहरा गया है कि तेल कंपनियां अब महाराजा को तेल देने को तैयार नहीं हैं। प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि तेल कंपनियांे का उधार और नए आर्डर किए गए विमानों की कीमत आखिर कौन चुकाएगा? अब तक एयर इंडिया सरकार के बजाए उसके नुर्माइंदों के लिए कामधेनू बन गया था। नए उड्डयन मंत्री वायलर रवि की प्राथमिकताएं इसे संकट से उबारने की हैं। रवि को यह नहीं भूलना चाहिए कि जितनी राशि एयर इंडिया की झोली में डाली गई है, उससे स्कूल, कालेज, सड़कें बनाई जा सकती थीं। राष्ट्र निर्माण को आज पैसों की दरकार है। एयर इंडिया को लूट खसोट का चौराहा न बनने दिया जाए। अगर कुशल प्रबंधन से इसे नहीं उबारा गया तो राष्ट्र के लोगों का मुंह पोंछकर सरकारो ने इसकी जो मदद की है, वह अकारत ही चली जाएगी, हजारों करोड़ रूपयों का निवेश निरर्थक हो जाएगा।

कांग्रेस भाजपा का महाकौशल के साथ सौतेला व्यवहार!


कांग्रेस भाजपा का महाकौशल के साथ सौतेला व्यवहार!

रेल परियोजना में फंस रह नित नए पेंच

फोरलेन के झटके से उबर नहीं पाया सिवनी

कमल नाथ सहित कांग्रेस और भाजपा के जनसेवकों का मौन संदिग्ध

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत संप्रग सरकार और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा महाकौशल विशेषकर मण्डला, बालाघाट और सिवनी जिले के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। एक तरफ काल्पनिक बाघ करीडोर की भेंट स्वर्णिम चतुर्भंज का उत्तर दक्षिण गलियारा चढ़ गया तो अब बालाघाट से जबलपुर के अमान परिवर्तन की योजना भी बाघ ही की भेंट चढ़ती दिख रही है।

वर्ष 2000 मंे जबलपुर से बालाघाट की अमान परिवर्तन की योजना आरंभ की गई थी। इस योजना का काम 2006 तक ठीक ठाक गति से चलता रहा। इसके बाद इसके मार्ग में पड़ने वाली सिवनी जिले की जमीन को वन्य प्राणियों के लिए आरक्षित जतला दी जाकर इसे रेल्वे को सौंपने से इंकार कर दिया गया। इस मामले में मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने दो साल तक नस्ती अपने पास रखकर इसे अब केंद्र के पाले में फेंक दिया है। राज्य सरकार की ओर से इस महात्वाकांक्षी योजना के प्रस्ताव को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के पास भेज दिया है। गौरतलब होगा कि इसके पहले स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले में काल्पनिक बाघ करीडोर के कारण निर्माण कार्य तीन सालों से रूका हुआ है।

इस रेल परियोजना के पूरा होने से मण्डला, बालाघाट और सिवनी जिले को लाभ होना था। इसमें सिवनी जिले की 30 हेक्टेयर जमीन का फच्चर फंस गया है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ का वर्चस्व माना जाता है महाकौशल में। कमल नाथ समर्थक छाए हुआ हैं मण्डला, सिवनी, जबलपुर और बालाघाट जिलों में। बावजूद किसी ने भी इस बात को कमल नाथ की जानकारी में लाना अपना कर्तव्य नहीं समझा और न ही कमल नाथ ने इस मामले में स्वतः ही कोई संज्ञान लिया है।

 महाकौशल में जबलपुर से भाजपा के राकेश सिंह, नरसिंहपुर से कांग्र्रेस के उदय प्रताप, मण्डला से कांग्रेस के बसोरी सिंह, छिंदवाड़ा से कांग्रेस के कमल नाथ तो बालाघाट से भाजपा के के.डी.देशमुख सांसद हैं। फोरलेन मामला हो या फिर अमान परिवर्तन का, हर मामले में कांग्रेस और भाजपा के सांसदों का मौन किसी मिलीभगत की ओर ही इशारा करता है।
यहां उल्लेखनीय होगा कि केंद्रीय मंत्री कमल नाथ ने कुछ दिनों पूर्व मण्डला नैनपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा के अमान परिवर्तन का श्रीगणेश भी मण्डला से किया था। इस अमान परिवर्तन में भी रिजर्व फारेस्ट का हिस्सा आएगा इस कारण मण्डला से बरास्ता सिवनी, छिंदवाड़ा अमान परिवर्तन का काम आने वाले दशकों में पूरा होने की उम्मीद बेमानी ही है। साथ ही बालाघाट में कटंगी तिरोड़ी लाईन हेतु भी वे बालाघाट आए थे, किन्तु किसी भी नेता ने उनका ध्यान नैनपुर के आसपास के इस विवादित हिस्से की ओर आकर्षित करना मुनासिब नहीं समझा और न ही भाजपा ने भी इस बारे में कोई मांग करने की जहमत ही उठाई।