शनिवार, 20 अगस्त 2011

अण्णा ने जगाई राष्ट्रभक्ति की अलख


अण्णा ने जगाई राष्ट्रभक्ति की अलख

(लिमटी खरे)

इस साल तो गजब ही हो गया। स्वाधीनता दिवस बीत गया और आज भी राष्ट्र भक्ति के गीतों का जादू सर चढ़कर बोल रहा है। वरना गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस और गांधी जयंती पर ही सुनाई देते रहे हैं देशप्रेम के गाने। किशन बाबू राव का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए कम से कम उन्होंने आजादी के मतवालों को भूल चुकी इक्कीसवीं सदी की युवा पीढी को उससे रूबरू करवाने का प्रयास तो किया। आज रामलीला मैदान में देश प्रेम के गाने गूंज रहे हैं, जो पंद्रह दिनों तक लगातार बजने की उम्मीद है। युवाओं को सड़कों पर आते देख राजनैतिक दलों की घिघ्घी सी बंधी दिख रही है। सभी इस वोट बैंक को हथियाने पर आमदा दिख रहा है। देश प्रेम के इंजेक्शन अगर इसी तरह से लगते रहे तो इक्कीसवीं सदी में भारत की तस्वीर कुछ और ही नजर आएगी। गांधीवादी अण्णा के पहनावे को देखकर लगता है मानो इक्कीसवीं सदी में भारत को नई राह दिखाने वाला गांधी मिल गया है। फर्क महज इतना ही है कि उस वक्त महात्मा गांधी ने गोरे ब्रितानी विदेशियों के खिलाफ जेहाद छेड़ी थी, पर आज अण्णा की जेहाद अपनों से है।

लगभग दो दशकों से देश प्रेम और राष्ट्रभक्ति के मायने 15 अगस्त, 26 जनवरी और गांधी जयंती में तब्दील हो गए थे। देशवासी इन तीन दिनों में ही देश प्रेम की बात करते नजर आते। सूरज के सर पर आते ही देश भक्ति के गानों का स्थान पॉप साग्स ले लिया करते। लगभग दो दशकों बाद यह मौका नजर आ रहा है कि पंद्रह अगस्त बीतने के बाद भी लगातार ही देश भक्ति की अलख जगी हुई है। इसका श्रेय जाते है गांधीवादी विचारधारा के सच्चे अनुयायी किशन बाबूराव यानी अण्णा हजारे को। अण्णा ने अपने अंिहसक तरीके से देश को एक सूत्र में पिरो दिया है।

कितने जतन के बाद भारत देश में 15 अगस्त 1947 को आजादी का सूर्योदय हुआ था। देश को आजाद कराने, न जाने कितने मतवालों ने घरों घर जाकर देश प्रेम का जज्बा जगाया था। सब कुछ अब बीते जमाने की बातें होती जा रहीं हैं। आजादी के लिए जिम्मेदार देश देश के हर शहीद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कुर्बानियां अब जिन किताबों में दर्ज हैं, वे कहीं पडी धूल खा रही हैं। विडम्बना तो देखिए आज देशप्रेम के ओतप्रोत गाने भी बलात अप्रसंगिक बना दिए गए हैं। महान विभूतियों के छायाचित्रों का स्थान सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार जैसे आईकान्स ने ले लिया है। देश प्रेम के गाने महज 15 अगस्त, 26 जनवरी और गांधी जयंती पर ही दिन भर और शहीद दिवस पर आधे दिन सुनने को मिला करते हैं।

गौरतलब होगा कि आजादी के पहले देशप्रेम के जज्बे को गानों में लिपिबद्ध कर उन्हें स्वरों में पिरोया गया था। इसके लिए आज की पीढी को हिन्दी सिनेमा का आभारी होना चाहिए, पर वस्तुतः एसा है नहीं। आज की युवा पीढी इस सत्य को नहीं जानती है कि देश प्रेम की भावना को व्यक्त करने वाले फिल्मी गीतों के रचियता एसे दौर से भी गुजरे हैं जब उन्हें ब्रितानी सरकार के कोप का भाजन होना पडा था।

देखा जाए तो देशप्रेम से ओतप्रोत गानों का लेखन 1940 के आसपास ही माना जाता है। उस दौर में बंधन, सिकंदर, किस्मत जैसे दर्जनों चलचित्र बने थे, जिनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने वाले गानों को खासा स्थान दिया गया था। मशहूर निदेशक ज्ञान मुखर्जी द्वारा निर्देशित बंधन फिल्म संभवतः पहली फिल्म थी जिसमें देशप्रेम की भावना को रूपहले पर्दे पर व्यक्त किया गया हो। इस फिल्म में जाने माने गीतकार प्रदीप (रामचंद्र द्विवेदी) के द्वारा लिखे गए सारे गाने लोकप्रिय हुए थे। कवि प्रदीप का देशप्रेम के गानों में जो योगदान था, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।

इसके एक गीत ‘‘चल चल रे नौजवान‘‘ ने तो धूम मचा दी थी। इसके उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जगाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। 1943 में बनी किस्मत फिल्म के प्रदीप के गीत ‘‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है‘‘ ने देशवासियों के मानस पटल पर देशप्रेम जबर्दस्त तरीके से जगाया था। लोगों के पागलपन का यह आलम था कि लोग इस फिल्म में यह गीत बारंबार सुनने की फरमाईश किया करते थे।

आलम यह था कि यह गीत फिल्म में दो बार सुनाया जाता था। उधर प्रदीप के क्रांतिकारी विचारों से भयाक्रांत ब्रितानी सरकार ने प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया, जिससे प्रदीप को कुछ दिनों तक भूमिगत तक होना पडा था। पचास से साठ के दशक में आजादी के उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जमकर बिका। उस वक्त इस तरह के चलचित्र बनाने में किसी को पकडे जाने का डर नहीं था, सो निर्माता निर्देशकों ने इस भावनाओं का जमकर दोहन किया।

दस दौर में फणी मजूमदार, चेतन आनन्द, सोहराब मोदी, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे नामी गिरमी निर्माता निर्देशकों ने आनन्द मठ, लीजर, सिकंदरे आजम, जागृति जैसी फिल्मों का निर्माण किया जिसमें देशप्रेम से भरे गीतों को जबर्दस्त तरीके से उडेला गया था। 1962 में जब भारत और चीन युद्ध अपने चरम पर था, उस समय कवि प्रदीप द्वारा मेजर शैतान सिंह के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान से प्रभावित हो एक गीत की रचना में व्यस्त थे, उस समय उनका लिखा गीत ‘‘ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख मंे भर लो पानी . . .‘‘ जब संगीतकार ए.रामचंद्रन के निर्देशन में एक प्रोग्राम में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने सुनाया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी अपने आंसू नहीं रोक सके थे।

इसी दौर में बनी हकीकत में कैफी आजमी के गानों ने कमाल कर दिया था। इसके गीत कर चले हम फिदा जाने तन साथियो को आज भी प्रोढ हो चुकी पीढी जब तब गुनगुनाती दिखती है। सत्तर से अस्सी के दशक में प्रेम पुजारी, ललकार, पुकार, देशप्रेमी, कर्मा, हिन्दुस्तान की कसम, वतन के रखवाले, फरिश्ते, प्रेम पुजारी, मेरी आवाज सुनो, क्रांति जैसी फिल्में बनीं जो देशप्रेम पर ही केंदित थीं।

वालीवुड में प्रेम धवन का नाम भी देशप्रेम को जगाने वाले गीतकारों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। उनके लिखे गीत काबुली वाला के ए मेरे प्यारे वतन, शहीद का ए वतन, ए वतन तुझको मेरी कसम, मेरा रंग दे बसंती चोला, हम हिन्दुस्तानी का मशहूर गाना छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी,

महान गायक मोहम्मद रफी ने देशप्रेम के अनेक गीतों में अपना स्वर दिया है। नया दौर के ये देश है वीर जवानों का, लीडर के वतन पर जो फिदा होगा, अमर वो नौजवां होगा, अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं . . ., आखें का उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता. . ., ललकार का आज गा लो मुस्करा लो, महफिलें सजा लो, देश प्रेमी का आपस में प्रेम करो मेरे देशप्रेमियों, आदि में रफी साहब ने लोगों के मन में आजादी के सही मायने भरने का प्रयास किया था।

गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता मनोज कुमार का नाम आते ही देशप्रेम अपने आप जेहन में आ जाता है। मनोज कुमार को भारत कुमार के नाम से ही पहचाना जाने लगा था। मनोज कुमार की कमोबेश हर फिल्म में देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गाने हुआ करते थे। शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम, क्रांति जैसी फिल्में मनोज कुमार ने ही दी हैं।

अस्सी के दशक के उपरांत रूपहले पर्दे पर शिक्षा प्रद और देशप्रेम की भावनाओं से बनी फिल्मों का बाजार ठंडा होता गया। आज फूहडता और नग्नता प्रधान फिल्में ही वालीवुड की झोली से निकलकर आ रही हैं। आज की युवा पीढी और देशप्रेम या आजादी के मतवालों की प्रासंगिकता पर गहरा कटाक्ष कर बनी थी, लगे रहो मुन्ना भाई, इस फिल्म में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के बजाए शुष्क दिवस (इस दिन शराब बंदी होती है) के रूप में अधिक पहचाना जाता है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद भी न देश की सरकार चेती और न ही प्रदेशों की।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार और राज्यों की सरकारें भी आजादी के सही मायनों को आम जनता के मानस पटल से विस्मृत करने के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। देशप्रेम के गाने 26 जनवरी, 15 अगस्त के साथ ही 2 अक्टूबर को आधे दिन तक ही बजा करते हैं। कुल मिलाकर आज की युवा पीढी तो यह समझने का प्रयास ही नहीं कर रही है कि आजादी के मायने क्या हैं, दुख का विषय तो यह है कि देश के नीति निर्धारक भी उन्हें याद दिलाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं।
आज अण्णा हजारे को सलाम किया जाना चाहिए कि उन्होंने 74 साल की उम्र में वह कर दिखाया जो कोई भी सियासी दल नहीं कर सका। अण्णा के साथ कांधे से कांधा मिलाकर देशवासी चल रहे हैं, उनके निशाने पर है भ्रष्टाचार। सरकार जिस भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं कर पा रही है उसे समाप्त करने का बीड़ा उठाया है अण्णा हजारे ने। देश के निर्दयी, नपुंसक, निष्प्रभावी शासकों ने देश की जनता को तहे दिल से लूटा है। अपनी सुख सुविधाओं के लिए तबियत से खजाने को खाली किया है। वहीं दूसरी ओर गांधीवादी अण्णा के पहनावे को देखकर लगता है मानो इक्कीसवीं सदी में भारत को नई राह दिखाने वाला गांधी मिल गया है। फर्क महज इतना ही है कि उस वक्त महात्मा गांधी ने गोरे ब्रितानी विदेशियों के खिलाफ जेहाद छेड़ी थी, पर आज अण्णा की जेहाद अपनों से है।

दिग्विजय से नाराज हैं सोनिया!


दिग्विजय से नाराज हैं सोनिया!

चल पड़ा दिग्गी राजा का ग्राफ नीचे की ओर

सोनिया ने अहमद को देना आरंभ किया ज्यादा तवज्जो

पचौरी को तवज्जो देकर दिखाई नाराजगी

विदेश यात्रा पर गए दिग्विजय मिलेंगे सोनिया से!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की हालत इस समय कुछ पतली ही दिख रही है। अपना आपरेशन कराने के पूर्व विदेश यात्रा पर गईं सोनिया गांधी ने पार्टी की एक शीर्ष समिति को सारे अधिकार दे दिए थे, जिसमंे दिग्गी राजा के धुर विरोधियों को तो स्थान मिला किन्तु वे खुद इसमें स्थान नहीं पा सके। अपनी उपेक्षा से आहत दिग्गी राजा ने अघोषित तौर पर बैठकों का बहिष्कार आरंभ कर दिया है।

गौरतलब है कि दिग्गी राजा उत्तर प्रदेश के प्रभारी हैं। इस वक्त यूपी में उम्मीदवार चयन को लेकर बैठकों का दौर जारी है। एसे महत्वपूर्ण मौकों पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी दिल्ली में न होकर विदेश की सैर कर रहे हैं। कांग्रेस की शीर्ष समिति में अपने विरोधी जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल को स्थान दिए जाने से दिग्गी काफी बेचैन हैं। दिग्गी राजा के करीबी सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में जब तक सोनिया वापस नहीं आतीं तब तक राहुल गांधी को अहमद पटेल और द्विवेदी के साथ बैठकर काम करना होगा। दिग्गी को भय है कि दोनों ही नेता कम समय में ही राहुल को दिग्गी के आभा मण्डल से बाहर निकाल सकते हैं। इसके अलावा दोनो ही नेता अभी दिग्गी के बॉस की भूमिका में हैं।

उधर एमपीसीसी के पूर्व अध्यक्ष सुरेश पचौरी जिन्हें हाशिए में ढकेलने में दिग्विजय सिंह ने खासी भूमिका अदा की थी, के राजनैतिक पुनर्वास पर मोहर लगाकर सोनिया गांधी ने दिग्विजय सिंह को एक ओर झटका दिया है। जिस समिति का पचौरी को अध्यक्ष बनाया गया है, उसमें पचौरी के अधीन रहने को दिग्गी राजा को हिदायत भी दी गई है। सोनिया गांधी ने अहमद और द्विवेदी के खासुलखास मोहन प्रकाश को उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए बनाई गई स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया है।

इन सारे समीकरणों से दिग्विजय सिंह का आहत होना स्वाभाविक ही है। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि सब कुछ छोड़कर राजा अब अमेरिका के लिए उड़ गए हैं, जहां वे आपरेशन के उपरांत स्वास्थ्य लाभ ले रही सोनिया गांधी से मिलकर अपनी पीड़ा का इजहार करेंगे।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

लोकपाल एक अण्णा हजारों



लोकपाल एक अण्णा हजारों

(लिमटी खरे)

‘मैं अण्णा हूं‘ इस तरह के गगनभेदी नारे, सर पर गांधी टोपियों पर लिखा यह जुमला इन दिनों तहलका मचाए हुए है। देश में अस्सी साल के बुजुर्ग से लेकर छः साल तक के बच्चे की जुबान पर इन दिनों अण्णा हजारे का ही नाम है। अण्णा चाहते हैं जन लोकपाल। एक लोकपाल और देश में अन्ना अब करोड़ों की तादाद में पैदा हो चुके हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों, आलंबरदारों की सियासी चालों के चलते राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के आंदोलन का बलात दमन कर दिया गया, किन्तु किशन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे के आंदोलन के दबाया नहीं जा सका। कांग्रेस के सियासी प्रबंधकों ने भले ही इस आंदोलन को तूल देकर लोगों का ध्यान घपले, घोटाले, मंहगाई, भ्रष्टाचार और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की कथित तौर पर हुई कैंसर सर्जरी से हटा दिया हो, किन्तु अनजाने ही कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के प्रति देश के युवाओं का मोह भंग हो चुका है। युवा वोट बैंक अब राहुल की खामोशी को भ्रष्ट, घपले, घोटालेबाजों के प्रति उनका मौन समर्थन ही मानकर चल रहा है।

‘जनलोकपाल‘ नाम की छोटी सी चिंगारी अब जबर्दस्त आग में तब्दील हो चुकी है, जिसे बुझाना मुश्किल ही प्रतीत हो रहा है। कांग्रेस के प्रबध्ंाकों को भी उम्मीद नहीं थी कि अण्णा की छोटी सी अपील इस तरह समूचे भारत के लोगों को एक सूत्र में पिरो देगी। 17 अगस्त को इंडिया गेट पर मशाल जलूस ने आजादी के पहले के जुनून की यादें ताजा कर दीं। आज वयोवृद्ध हो रही पीढ़ी को वे यादें ताजा हो गई होंगी जिसमें आजादी के परवानों ने गोरे ब्रितानियों को खदेड़ने इसी तरह के मार्च किए थे। चालीस से पचास के पेटे में पहुंचने वाले लोगों को आजादी का संदेश देने वाली फिल्में याद आ रही होंगी। वैसे इस मामले में राजनैतिक दलों की चुप्पी संदेहास्पद ही है। संसद में अण्णा की गिरफ्तारी का विरोध तो हो रहा है, पर वह दम खम नहीं दिख रहा है जैसा होना चाहिए था। स्वाभाविक है कि मामला अगर परवान चढ़ता है तो इसका श्रेय अण्णा के खाते में ही जाने वाला है। यही कारण है कि बिना किसी लाभ की उम्मीद के राजनेता भला क्यों कुछ करने लगे।

कांग्रेस ने लोकपाल का प्रारूप बनाकर स्टेंडिंग कमेटी को भेजा है। अण्णा ने 16 अगस्त से धरना देने का अल्टी मेटम दिया था। इसी दिन सुबह अण्णा को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का आरोप था कि टीम अण्णा द्वारा शांति भंग की आशंका है। इसके बाद टीम अण्णा को सात दिन की हिरासत में तिहाड़ भेज दिया गया। जैसे ही यह खबर फैली देश में आग लग गई। सरकार का पुरजोर विरोध हुआ। सरकार को अपने सूत्रों से मिली खबरें उत्साहजनक नहीं थीं।

फिर क्या था उसी के चंद घंटों बाद ही टीम अण्णा को अघोषित तौर पर प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया कि उससे शांति भंग का खतरा नहीं है, इसलिए उसे रिहा किया जाता है। अण्णा हजारे को माजरा समझ में आया और उन्होंने तिहाड़ छोड़ने से इंकार कर दिया, और कांग्रेस की सारी चालें धराशायी हो गईं। सच है कि कांग्रेस के हुक्मरान देश के कानून को अपने घर की लौंडी मानते हैं। जिसने विरोध किया उसे डाल दो कारावास में और जब मर्जी आए छोड़ दो। अण्णा के प्रकरण को देखकर लगने लगा है कि मानो कांग्रेस के शासकों के लिए कानून चाबी से चलने वाला खिलौना हो गया है। जब तक चाबी चली तब तक गुड्डा ताली बजाता रहा और चाबी खत्म तो उसके हाथ भी रूक गए। फिर चाबी भरी तो फिर गुड्डा बजाने लगा ताली। अगर अण्णा को गिरफ्तार करने का सरकार का कदम सही, न्याय संगत, तर्क संगत था तो फिर सरकार ने अण्णा के सामने हथियार क्यों डाले? क्यों सारी शर्ताें को किनारे कर अण्णा की बातों को माना? क्यों 16 अगस्त के पहले इस तरह की सहमति तैयार करने के प्रयास नहीं किए गए?

अण्णा हजारे के कस बल ढीले करने के लिए सरकार ने हर संभव प्रयास किए। पहले तो अण्णा की तबियत खराब होने की हवा उड़ाई। फिर जीबी पंत चिकित्सालय की एक टीम भेजी उनके स्वास्थ्य परीक्षण के लिए। अण्णा ने टीम को लौटा दिया कि जब वे फिट हैं तो फिर इस डाक्टर्स की टीम का क्या ओचित्य। अण्णा को अपने चिकित्सक डॉ.नरेश त्रेहान पर पूरा भरोसा है। नरेश त्रेहान उनका समय समय पर परीक्षण करते आए हैं। डॉ.त्रेहान के बारे में कहा जाता है कि वे अमीरों, राजनेताओं और पहुंच संपन्न लोगों के चिकित्सक हैं, या यूं कहें कि वे राजवैद्य हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। बताया जाता है कि एक केंद्रीय मंत्री के परोक्ष तौर पर स्वामित्व वाले मंहगे, आलीशन फाईव स्टार चिकित्सालय में वे लंबे समय तक कार्यरत भी रहे हैं। इसलिए अगर आज के इस परिवेश में वे भी मानवता को तजकर स्वार्थ सिद्धि में लग जाएं और इस अनशन में अण्णा के स्वास्य को लेकर कोई बाधा आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

उधर अण्णा अनिश्चित कालीन अनशन के लिए अड़े हुए थे। पुलिस पहले तो समयसीमा बेहद कम ही करने पर आमदा थी, बाद में सात दिन, पंद्रह दिन, इक्कीस दिन की अफवाहें सामने आईं। अंततः सरकार पंद्रह दिन के अनशन का समय देने पर राजी हो गई। सवाल यह उठता है कि यह सब नाटक किसलिए? क्या अण्णा के आंदोलन को ध्वस्त करने के लिए? आखिर सरकार चाह क्या रही है? अगर 16 अगस्त को ही सरकार इन बातों को मान लेती जो आज मानी है तो कम से कम अनशन के कारण राष्ट्र का नुकसान तो नहीं हुआ होता। जगह जगह हजारों लोगों ने गिरफ्तारी दी। क्या इसके लिए अतिरिक्त पुलिस बल नहीं लगा होगा? उनके आने जाने, खाने पाने, रूकने ठहरने आदि का भोगमान कौन भोगेगा? क्या यह अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी अंटी से देगा? जाहिर है नहीं, इसका भोगमान तो देश के आम आदमी को ही भोगना है वह भी उसके द्वारा दिए गए करों से।

देश के वजीरे आजम का देश के दोनों सर्वोच्च सदनों दिया वक्तव्य भी अजीब है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह कहते हैं कि अण्णा अपना लोकपाल देश पर थोपना चाहते हैं। कानून बनाने का अधिकार संसद को है और कोई उसे चुनौति दे वह उचित नहीं है। इसके साथ ही साथ वे यह भी कहते हैं कि अण्णा एक सशक्त और प्रभावी लोकपाल बनाने की राह पर हैं, पर उनका तरीका या एप्रोच गलत है। विपक्ष प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछ पाया कि अगर अण्णा का लोकपाल का एजेंडा सही है और उनका तरीका गलत है तो सरकार ने जो ड्राफ्ट स्टेंडिग कमेटी के पास भेजा है वह अण्णा के लोकपाल की तर्ज पर प्रभावी और सशक्त लोकपाल की वकालत क्यों नहीं करता है? क्या अण्णा के गलत तरीके के चलते सरकार अपना कमजोर लोकपाल का प्रारूप पास करवाने पर आमदा है? फिर वही बात सामने आ रही है कि इसका श्रेय भी अण्णा ही ले जाने वाले हैं इसलिए सरकार अण्णा के लोकपाल को दरकिनार करने पर आमदा है।

अण्णा को तिहाड़ जेल में रखा जाना भी अपने आप में मजाक से कम प्रतीत नहीं हो रहा है। समाचार चेनल्स चीख चीख कर कह रहे हैं कि अण्णा को तिहाड़ के प्रशासनिक भवन में रखा गया है। आखिर अण्णा को बैरक के बजाए प्रशासनिक भवन में किस हैसियत से रखा गया है? तिहाड़ जेल अब जेल न रहकर दिल्ली का कनाट प्लेस बन गया है, जहां जिसकी मर्जी आ जा रहा है। इसमें सिविल सोसायटी, सरकार के नुमाईंदे बार बार जाकर अण्णा से चर्चा कर रहे हैं। यह कैसी जेल है जहां हर दस मिनिट में बंदी से मिलने कोई न कोई आ जा रहा है? हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपने निहित स्वार्थों के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति उतपन्न होने की बात को ढाल बनाकर सरकार को अपनी मनमर्जी करने की स्वतंत्रता मिल जाती है।

सरकार के लिए सिविल सोसायटी के दो सदस्य सबसे अधिक मुश्किल पैदा कर रहे हैं। एक हैं कानून के कीड़े प्रशांत भूषण और दूसरी पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी। प्रशांत भूषण भारत के कानून का सही इस्तेमाल कर अपने साथियों को बचाने में आमदा हैं तो दूसरी ओर किरण बेदी दिल्ली पुलिस में सालों साल रही हैं। वे उस गोदे (अखाड़े) से भली भांति परिचित हैं जिसमें पहलवान (टीम अण्णा और सरकार) आपस में कुश्ती लड़ रहे हैं। वे इस गोदे के हर दांव को बखूबी जानती हैं सो इसकी काट वे पहले से ही तैयार रखे हुए हैं।

कथित तौर पर बनी सिविल सोसायटी और सरकार के बीच द्वंद जारी है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग अनजाने ही अण्णा के साथ हम कदम हो चुका है। कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के युवा भारत के सपने के आधार स्तंभ युवाओं के स्तंभ अब राहुल से पर्याप्त दूरी बना चुके हैं। टूजी, कामन वेल्थ, एसबेण्ड, आदर्श सोसायटी आदि घोटालों, राष्ट्रधर्म से बड़ा गठबंधन धर्म मानने, बाबा रामदेव और अण्णा हजारे के मसले पर चुप्पी साधने से युवाओं के मन में राहुल के प्रति भी रोष और असंतोष पनपने लगा है।

हो सकता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने घपले घोटालों और भ्रष्टाचार की आरे से ध्यान हटाने के लिए अण्णा के इस अनशन का उपयोग अपनी तरह से किया हो। यह सच है कि आज अण्णा के साथ के सामने बाकी बातंे गौड हो गई हैं। आज लोग सिर्फ और सिर्फ अण्णा की ही बातें कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह प्रसन्नता की बात हो सकती है, पर अनजाने ही कांग्रेस के सियासी प्रबंधकों ने युवाओं को राहुल गांधी से दूर कर दिया है। कुल मिलाकर इस पूरे मामले को देखकर एक ही बात कही जा सकती है कि ‘लोकपाल एक है पर अब अण्णा हजारों से करोड़ों की तादाद में पहुंच चुके हैं।‘

जनाक्रोश ने निकाली सरकार की हेकड़ी


जनाक्रोश ने निकाली सरकार की हेकड़ी

आज अन्ना की रिहाई मुश्किल

अनशन के लिए सज रहा रामलीला मैदान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। 74 वर्षीय अण्णा हजारे की बुलंद आवाज और देशवासियों की हुंकार ने कांग्रेस के हुक्मरानों की सारी हेकड़ी निकालकर रख दी है। पुलिस अंततः अण्णा हजारे के सामने झुक गई है और उन्हें रामलीला मैदान पर एक पखवाड़े तक अनशन की अनुमति दे दी है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अण्णा तिहाड़ जेल के प्रशासनिक भवन में हैं, उधर दिल्ली का रामलीला मैदान सरकार द्वारा सजाया जा रहा है।

अण्णा की गिरफ्तारी के बाद देश भर में उनके समर्थन में जुटे लोगों के तेवर देखकर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक उठीं हैं। देशवासियों विशेषकर युवाओं के तीखे तेवरों ने कांग्रेस के कसबल ढीले कर दिए हैं। युवाओं में अपने आईकाल और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की चुप्पी से बहुत निराशा का वातावरण बना हुआ है।

दिल्ली के स्थानीय प्रशासन के सूत्रों का कहना है कि बारिश के कारण रामलीला मैदान खस्ताहाल में है, जिसे ठीक किया जा रहा है। इसे ठीक करने में आज सारा दिन लगने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके उपरांत इस मैदान को टीम अण्णा को सौंप दिया जाएगा। जब तक सिविल सोसायटी को रामलीला मैदान नहीं मिल जाता तब तक अण्णा हजारे तिहाड़ जेल को ही आशियाना बनाए रखने के मूड में दिख रहे हैं। हालात देखकर लग रहा है कि आज अण्णा की रिहाई मुश्किल ही है।

जेल सूत्रों का कहना है कि अण्णा हजार के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए जीबी पंत अस्पताल की टीम को अण्णा ने ससम्मान वापस लौटा दिया। अण्णा का कहना था कि जब जेल के चिकित्सक उन्हें फिट करार दे रहे हैं तब बाहर से चिकित्सकों की टीम बुलाने का क्या ओचित्य है। अण्णा के चिकित्सक डॉ.नरेश त्रेहान ने भी अण्णा का चिकित्सकीय परीक्षण कर उन्हें फिट बताया है।

टीम अण्णा के अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि 16 अगस्त को सुबह सरकार टीम अण्णा को इसलिए गिरफ्तार करती है क्योंकि उससे शांति भंग होने का खतरा होता है। फिर उसे सात दिन की हिरासत में भेज दिया जाता है। शाम ढलते ही टीम अण्णा से खतरा अचानक ही गायब हो जाता है, और उन्हें रिहा कर दिया जाता है। जेल के सूत्रों ने कहा कि अण्णा का कहना है कि इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के नेतृत्व में गजब का प्रजातंत्र देखने को मिल रहा है, जिसमें सरकार की मुखालफत करने वालों को बलात जेल में डाला और निकाला जा रहा है। सरकार ने लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गुड्डे गृडियों का खेल बना दिया है।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात


टीम अण्णा को अनशन से पहले ही उठाया पुलिस ने

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात

देश भर में विरोध का दौर जारी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। स्वाधीनता दिवस के दूसरे दिन सुबह 10 बजे से अनशन पर बैठने वाली टीम अण्णा को दिल्ली पुलिस ने सुबह ही बलात उठा लिया, जिससे तरह तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती जा रही हैं। सरकार ने राजनैतिक मामलों की मंत्रीमण्डल समिति की बैठक बुलाई है। उधर संसद में भी आज इस मामले में हंगामा होने के आसार हैं। दिल्ली में भारी बारिश के बावजूद अण्णा के समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं, जो पुलिस के लिए सरदर्द बना हुआ है।
आज अलह सुब्बह अण्णा हजारे जो कि भूषण बंधुओं के मयूर विहार स्थित सुप्रीम एनक्लेव स्थित फ्लेट में रूके थे, से बाहर निकलते ही दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसके उपरांत उनके सहयोगी अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी सहित अनेक समर्थकों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। किरण बेदी के अनुसार अण्णा ने जब गिरफ्तार से पहले उनका अपराध पूछा तो गिरफ्तार करने आए अधिकारियों ने कहा कि उन्हें उपर से आदेश हैं।
अण्णा हजारे, केजरीवाल और उनके अनेक गिरफ्तार समर्थकों को पुलिस ने सिविल लाईंस के श्यामनाथ मार्ग पर स्थित सबसे पुराने राजपत्रित अधिकारी पुलिस मैस में रखा है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों का कहना है कि अगर अण्णा ने जमानत से इंकार किया तो इसी मैस को अस्थाई जेल भी घोषित कर दिया जाएगा।
सरकार की ओर से केंद्रीय गृह सचिव ने बयान देते हुए कहा कि टीम अण्णा की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की गई है। पुलिस को आशंका थी कि तय सीमाओं को अण्णा समर्थक तोड़ सकते थे, यही कारण है कि उन्हें हिरासत में लिया गया है। भ्रष्टाचार के मामले में बाबा रामदेव के साथ रामलीला मैदान में हुए तांडव के बाद अण्णा की गिरफ्तारी को लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बता रहे हैं।
अमूमन देश में अपनी बात को रखने के लिए धरना प्रदर्शन आम बात है। इस तरह के धरने प्रदर्शन की आदी हो चुकी सरकार द्वारा बाबा रामदेव और टीम अण्णा के साथ जो भी किया उससे देश वासियों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि टीम अण्णा के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ सरकार का यह दमन अलोकतांत्रिक है। टीम अण्णा के सदस्य इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे भी खटखटाने जा रहे हैं।
दिल्ली में बरसते पानी में अण्णा के समर्थन में जुट रहे जनसेलाब को देखकर लगने लगा है कि आम आदमी भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। नार्थ केंपस के छात्र भी सड़कों पर उतर आए हैं। वहीं दूसरी ओर अपनी गिरफ्तारी का टीम अण्णा को पहले से ही भान था। टीम अण्णा ने यू ट्यूब पर अण्णा का एक रिकार्डेड बयान डाला है जिसमें अण्णा अपने आप को गिरफ्तार जता रहे हैं। यह वीडियो सुपरहिट साबित हो रहा है।

यह रहा घटनाक्रम

06ः43 अण्णा को सुप्रीम एनक्लेव से गिरफ्तार किया गया

06ः47 अरविंद केजरीवाल गिरफ्तार

06ः50 अक्षरधाम मंदिर के पास अण्णा को ले जा रही पुलिस का समर्थकों ने रास्ता रोका

08ः00 किरण बेदी गिरफ्तार

08ः16 किरण बेदी क्वींस मेरी स्कूल ले जाई गईं

08ः52 छत्रसाल से किरण बेदी को अन्यत्र ले जाया गया

09ः05 सरकार ने 10 बजे सीसीपीए की बैठक बुलाने का एलान

09ः06 गृह सचिव ने पहली बार सरकार की तरफ से दिया बयान

10ः00 सीसीपीए की बैठक आरंभ

युवराज की रियाया अण्णा के साथ


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

युवराज की रियाया अण्णा के साथ
कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी कांग्रेस के युवराज माने जाते हैं। युवराज की रियाया अब राहुल गांधी की नीतियों रीतियों से इत्तेफाक नहीं रख रही है। कांग्रेस ने कमजोर लोकपाल को संसद में पेश कर दिया है। राहुल गांधी द्वारा अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर कम ध्यान दिया जा रहा है। यही कारण है कि उनकी रियाया ने उनके साथ कदम ताल मिलाना कम कर दिया है। हाल ही में टीम अण्णा द्वारा अमेठी में एक सर्वे कराया गया, वह भी सरकारी और जनलोकपाल को लेकर। इसके नतीजे आश्चर्यजनक तौर पर अण्णा के समर्थन में आए। अमेठी के नब्बे फीसदी लोगों का कहना है कि वे सरकारी लोकपाल के बजाए अण्णा के जनलोकपाल पर भरोसा करते हैं। अण्णा की इस हुंकार कि ‘‘प्रधानमंत्री जी किस मुंह से लाल किले की प्राचीर पर झंडा फहराओगे?‘‘ को कफन फाड़ कर जनसमर्थन मिल रहा है। लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि 2012 में प्रतिभा ताई के बाद अब कांग्रेस द्वारा अण्णा को देश का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दे दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

भाजपा का हाथ कटा ठाकुर!
देश के हृदय प्रदेश में भाजपा का राज है। शिवराज सिंह चौहान की अगुआई वाली सरकार में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। मध्य प्रदेश में सांसद विधायक अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दबी जुबान से चल रही चर्चा के अनुसार मुख्यमंत्री के पंच प्यारे (शिवराज के पांच करीबी) सरकार चला रहे हैं। जिलों में मंत्री नहीं कलेक्टर सर्वेसर्वा हैं। कलेक्टरी बिक रही है। मंत्री विधायक हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं। ऐसे में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने खुद को शोले का हाथ कटा ठाकुर निरूपित कर दिया, जिससे उबाल आ गया है। दिल्ली में शोले के ठाकुर की धूम मची हुई है। कैलाश महात्वाकांक्षी हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है। इसके पहले वे सीएम के दावेदार थे, तब उन्होने मध्य प्रदेश और विशेषकर दिल्ली में सूचना केंद्र में अपनी पसंद के तिवारी को बिठाया था। अब दिल्ली सूचना केंद्र में प्रभात झा की पसंद के अधिकारी पदस्थ हैं। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो कैलाश को अब राजनैतिक रूप से वाकई शोले का ठाकुर ही बना दिया जाने वाला है।

अण्णा का भूत सता रहा कांग्रेस को
16 अगस्त की तारीख पास आते आते कांग्रेस के होश उड़ने लगे हैं। इस दिन लोकपाल के लिए अण्णा हजारे अनशन पर बैठने वाले हैं। अण्णा के समर्थन में देश के लगभग निन्यानवे फीसदी लोग हैं। सरकार की मंशा को सब समझ रहे हैं। लोगों को अफसोस इस बात का है कि संसद में सरकार द्वारा पेश लोकपाल के स्वरूप को विपक्ष ने भी अपना मौन समर्थन दिया है। लोगों का कहना है कि जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की नैतिकता मर चुकी है। सदन के अंदर सारे दल सरकार के साथ ही खड़े नजर आ रहे हैं। इस परिदृश्य में अण्णा हजारे अकेले ही खड़े नजर आ रहे हैं, किन्तु अगर दूसरी नजर से देखा जाए तो भारत गणराज्य के एक सौ इक्कीस करोड़ लोग अण्णा के साथ खड़े दिख रहे हैं, पर राजनैतिक दल अकेले खड़े दिख रहे हैं। जनता की नजर में अण्णा असली हीरो हैं, पर राजनेताओं की नजरों में वे प्रेम चौपड़ा और प्राणकी तरह विलेन ही हैं।

हम हैं यम!
एक फिल्म का डायलाग बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘हम हैं यम। अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने इसी तर्ज पर कह मारा है कि संसद कब चलेगी कब नहीं यह हम यानी भाजपा पर निर्भर करता है। सुषमा के बयान पर सभी ने आपत्ति दर्ज की है। वाकई सुषमा का बयान घोर आपत्तिजनक है। इस लिहाज से तो जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को सुषमा स्वराज द्वारा हवा में ही उड़ाने की बात कही जा रही है। मतलब साफ है कि सुषमा के रहमोकरम पर देश की सबसे बड़ी पंचायत है। अगर एसी बात है तो सुषमा के खिलाफ सार्वजनिक धन के आपराधिक दुरूपयोग का मामला चलना ही चाहिए। सुषमा स्वराज वरिष्ठ सांसद हैं और जिम्मेदार संवैधानिक पद पर विराजी हैं, उन्हें हर बयान सोच समझ कर देना चाहिए। संसद में देश के गरीब गुरबों पर चर्चा के बजाए अपने निहित स्वार्थों पर ही अधिक चर्चा हो रही है। आज के हालात देखकर सुषमा का यह कहना कि वे तय करेंगी संसद कब चलेगी कब नहीं, किसी भी दृष्टिकोण से गलत नहीं है।

विकास का पैसा उदासीन सांसद
सांसदों के लिए स्थानीय क्षेत्र विकास निधि की राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गई है। सांसद खुश हैं। उनका खुश होना लाजिमी है। कहते हैं कि इस निधि पर सांसदों को पच्चीस टका तक कमीशन मिलता है। इस बात में सच्चाई कितनी है यह बात तो वे ही जाने पर संसद में पैसा लेकर प्रश्न पूछने के मामले के सामने आते ही इन हवाओं में दम मिलता है कि सांसदों को कमीशन मिलता है। सांसदों द्वारा करवाए गए इस निधि के तहत करवाए गए कार्यों की मानीटरिंग की जाती है, दसवीं लोकसभा से पंद्रहवीं लोकसभा तक सांसदों द्वारा करवाए गए कामों के बारे में सांसद खुद भी उदासीन हैं। इस अवधि में 1270 सांसदों ने अपनी निधि का ब्योरा जमा नहीं करवाया है। जब सांसद अपनी ही निधि के प्रति इतने उदासीन हैं तो फिर वे गरीब गुरबों की समस्याओं के प्रति कितने जागरूक होंगे, इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

बीस साल बाद राजीव के हत्यारों को फांसी
कांग्रेस ने आधी सदी से ज्यादा देश पर शासन किया है। अस्सी के दशक के उपरांत कांग्रेस का शासन करने का तरीका ही बदल गया। कांग्रेस ने अपनी कमजोर पड़ती नींव को बचाने के लिए कुछ नहीं किया पर सत्ता की मलाई चखने के लिए उसने वोट बैंक की राजनीति हर कीमत पर करना आरंभ कर दिया। इसके लिए वह अपनों के साथ भी अन्याय करने से बाज नहीं आई। 21 मई 1991 में कांग्रेस के सुपर पावर राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। इसके लिए उनके कातिल के तौर पर लिट्टे के सदस्यों और नलिनी को दोषी पाया गया। नलिनी से मिलने राजीव की पुत्री प्रियंका जेल में मिलने तक गईं। प्रियंका अपनी दरियादिली दिखाना चाह रही थीं, लोगों ने इसे तमिल वोट बैंक को जोड़कर देखा। कांग्रेस ने यह प्रयास नहीं किया कि कातिलों को सजा मिले। लोगों का कहना है कि जब राजीव के हत्यारों को ही कांग्रेसी प्रश्रय दें तो देश का क्या होगा। अब महामहिम राष्ट्रपति ने राजीव के हत्यारों की फांसी पर मुहर लगा दी है, तब आगे कांग्रेस की रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं।

कृष्णा ने कराई फिर किरकिरी
मनमोहन सिंह अपनी वीणा बजाने में लगे हैं, वहीं उनके मातहत मंत्री मनमानी कर उनकी फजीहत करवाने पर तुले हुए हैं। मनमोहन के मंत्रियों ने उनकी नाक में दम कर रखा है। जिसका जो मन आ रहा है, वह वैसा ही करने में अमादा है। किसी को किसी की फिकर नहीं है, कम से कम देश की रियाया की तो किसी को परवाह ही नहीं है। हाल ही में विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा ने एक बार फिर सरकार की नाक को शर्म से झुका दिया है। राज्य सभा में कश्मीर के जेल में बंद पाकिस्तानी कैदी के बारे में सवाल पूछा। सत्ता के मद में चूर कृष्णा ने इसे पाकिस्तान में बंद भारतीय कैदी समझा और दे मारा जवाब। जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने शोर शराबा किया तब वजीरे आजम मनमोहन सिंह को खुद बीच बचाव के लिए आगे आना पड़ा। एसे एक नहीं अनेकों वाक्ये हैं जिनमें मंत्रियों ने प्रधानमंत्री को शर्मसार किया है। पता नहीं क्यों किस वजह से पीएम द्वारा इन नाकारा और निकम्मे मंत्रियों को ढोया जा रहा है?

अण्णा का सुरक्षित अंतर ठेवा!
अण्णा हजारे हर कदम फूंक फूंक कर रख रहे हैं। उन्होंने 16 अगस्त से दुबारा अनशन की बात कही है। इसके पहले इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने अनशन किया था रामलीला मैदान में। कांग्रेस के धूर्त और कुटिल प्रबंधकों ने बाबा रामदेव के अनशन और उनकी हेकड़ी की हवा निकाल दी थी। इसके बाद अण्णा का ग्राफ जस का तस ही बना हुआ है। अण्णा के अंगद के कदमों को देखकर अब बाबा रामदेव और स्वामी अग्निवेश ने अण्णा हजारे की करीबी पाने के प्रयास आरंभ कर दिए हैं। उधर अण्णा हजारे को उनके सलाहकारों ने मशविरा दिया है कि रामदेव बाबा और अग्निवेश जैसे लोगों से दूरी बनाकर रखी जाए जिससे सरकार अण्णा के अनशन पर शिकंजा न कस सके। अण्णा को यह बात भाई और उन्होनंे रामदेव और अग्निवेश से सुरक्षित अंतर ठेवाअर्थात सुरक्षित दूरी बनाएं का सिद्धांत अपना लिया है।

जनता से भारी पार्टी की मर्जी
देश में शासन जनता के लिए जनता का और जनता द्वारा प्रतिपादित है। विडम्बना है कि जनसेवक इसे खुद का, पार्टी के लिए और पैसे कमाने की खातिर स्थापित किया जा रहा है। यही कारण है कि अपनी मर्जी को पूरा करने के लिए जनसेवकों द्वारा इसे पार्टी की मर्जी बताकर पूरा किया जाता है। हाल ही में अनेक उदहारण इस तरह के ही सामने आए हैं। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल, पृथ्वीराज चव्हाण ने महाराष्ट्र की तो अर्जुन मुण्डा ने झारखण्ड की कमान संभाली वह भी सांसद रहते हुए। मजे की बात है कि सभी ने पार्टी की मर्जी को ही सर्वोपरि बताया है। किसी ने यह नहीं कहा कि उनके सांसद पद छोड़ते ही उपचुनाव होगा, जिसमें होने वाले खर्च का भोगमान जनता को ही भोगना है, इन नेताओं को सत्ता सुख ही भोगना है। उपचुनाव मुफ्त में नहीं होते इन पर करोड़ों रूपए खर्च होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में इस हेतु एक याचिका भी विचारणीय है।

शीला को लपेटता कामन वेल्थ का जिन्न
13 दिनों के लिए हुए कामन वेल्थ गेम्स में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि चमकाने के लिए अरबों खरबों रूपए फूंक दिए गए। इसमें तबियत से भ्रष्टाचार किया गया। सबने जनता के पैसों की होली खेली। मनमोहन सिंह चुपचाप सब देखते रहे। कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी और युवराज राहुल ने लूट की छूट दी थी। सुरेश कलमाड़ी को बचाने के लाख जतन हुए किन्तु कांग्रेस को उनकी बली चढ़ानी ही पड़ी। इसके बाद नंबर आया है दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का। अब इस दावानल में शीला दीक्षित झुलसती नजर आ रही हैं। जनता आश्चर्य कर रही है कि आखिर अरबों खरबों रूपयों की खुली लूट की छूट कांग्रेस के आलंबरदारों ने कैसे दे दी? क्या देश के प्रति सोनिया का कोई दायित्व नहीं? क्या सोनिया का इटली प्रेम जोर मार रहा है? क्या मुगलों और ब्रितानियों की तरह सोनिया गांधी भी देश की अर्थ व्यवस्था पर चोट पहुंचाकर देश को खोखला करने का प्रयास कर रही हैं? अब देखना है कि जनता के पैसों की लूट मचाने वाले इन आताताईयों को सजा मिलती है या फिर ये भी मजा भोगते हैं।

अल्पसंख्यकों की राह पर मसीही समाज
देश में इस समय एक बहस ने जन्म ले लिया है। अण्णा हजारे से इतर इस बहस का आधार सामाजिक है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले से सनातन पंथी असमंजस में हैं। न्यायालय ने सनातन पंथी समुदाय के एक जोड़े द्वारा मसीही समाज को अपनाकर भारतीय ईसाई विवाह कानून 1872 की धारा तीन के तहस की गई शादी को वैध ठहराया है। प्रसिद्ध अधिवक्ता ओ.पी.गोगने के न्यायधीश पुत्र द्वारा अपनी मामा की पुत्री के साथ इसाई धर्म अपनाकर विवाह कर लिया है। गोगने ने इस विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की है, जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया है। हिन्दु विवाह की धारा पांच में महिला की तीन और पुरूष की पांच पीढ़ियों तक भाई बहन माने जाते हैं और इनका विवाह वैध नहीं है। कैथोलिक चर्च भोपाल के प्रवक्ता का कथन सराहनीय है कि विवाह के लिए मुस्लिम या इसाई धर्म अपनाना गलत है। भाई बहन की शादी की कैथोलिक चर्च इजाजत नहीं देता है।

दंत विहीन दिल्ली की डेंटल काउंसिल
दिल्ली की डेंटल काउंसिल के पास खुद ही दांत नहीं हैं। दिल्ली में इस काउंसिल के पास झोला झाप दांत के चिकित्सकों के खिलाफ कार्यवाही का अधिकार ही नहीं है। दिल्ली में डेंटल काउंसिल 1948 के कानून के तहत ही संचालित हो रही है। जिसके तहत झोला छाप चिकित्सकों के खिलाफ पांच सौ रूपए और दूसरी बार एक हजार रूपए के जुर्माने का प्रावधान है। दंत विहीन दिल्ली डेंटल काउंसिल के पास डेंचर (नकली बत्तीसी) भी नहीं है। यही कारण है कि दिल्ली के अधिकांश इलाकों में दांत के रोगी नीम हकीम खतरे जान नकली डेंटिस्ट के भरोसे ही हैं। दिल्ली में मेडिकल, आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्यति के कानूनों में वांछित संशोधन कर इन्हें प्रभावी बना दिया गया है, किन्तु कांग्रेस के शासनकाल में दांत की चिकित्सा पद्यति को 1948 के नियमों के हिसाब से ही हांका जा रहा है? पता नहीं कानून में संशोधन कर होेगा?

मिशनरी स्कूल में हिन्दी की अनिवार्यता!
मसीही समाज में कैथोलिक पंथ को मानने वाले आर्क विशप, चर्च के पादरी, शिक्षण संस्थानों के फादर या प्रबंधक और प्राचार्य को अब हिन्दी बोलना और समझना अनिवार्य कर दिया गया है। इलहाबाद में कैथोलिक हिन्दी साहित्य समिति की बैठक में यह महत्वपूण्र निर्णय लिया गया है। इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश सहित सारे राज्यों में चर्च के पादरी, फादर, और आंग्ल भाषी शालाओं के प्राचार्यों को हिन्दी सीखना अनिवार्य कर दिया है। एमपी में यह जवाबदारी आर्क विशप डॉ.लियो कार्नेलियो को सौंपी गई है। कहा जा रहा है कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में गैर हिन्दी भाषी प्राचार्य न तो विद्यार्थी और पालकों की बात समझ पाते हैं और ना ही अपनी बातें समझा पाते हैं, जिसे ध्यान में रखकर यह फैसला लिया गया है। गैर हिन्दी भाषी प्राचार्यों के लिए अब यह नया सरदर्द होगा, क्योंकि इससे पहले सीबीएसई बोर्ड के लिए कंप्यूटर का ज्ञान अनिवार्य किया गया था।

पुच्छल तारा
देश में कांग्रेस भ्रष्टाचार की सच्ची पोषक बनकर उभरी है। भ्रष्ट लोगों को भ्रष्टाचार के मार्ग प्रशस्त करने और उन्हें बचाने में कांग्रेस का कोई सानी नहीं है। देहरादून से सानिया जोशी ने इस संबंध में राजनैतिक जुगलबंदी को रेखांकित करते हुए एक ईमेल भेजा है, जिसमें वर्तमान और भविष्य की तस्वीर दिख रही है। सानिया लिखती हैं करंटी काउंटिंग इन कांग्रेस रिजिम। सौ पेटी बराबर एक खोका, सौ खोका बराबर एक अरब। सौ अरब बराबर एक ललित मोदी। सौ ललित मोदी बराबर एक सुरेश कलमाड़ी। सौ सुरेश कलमाड़ी बराबर एक राडिया। सौ राडिया बराबर एक कोनीमोझी। सौ कोनीमोझी बराबर एक राजा। सौ राजा बराबर एक शरद पवार। सौ शरद पवार बराबर एक मायावती। सौ मायावती बराबर एक सोनिया गांधी। और भविष्य में सौ सोनिया गांधी बराबर एक राहुल गांधी।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

आदिवासियों को गुमराह करना बंद करे भाजपा: राजूखेड़ी


मंत्री के खिलाफ कांग्रेस ने एससी एसटी आयोग मे खटखटाए दरवाजे

आदिवासियों को गुमराह करना बंद करे भाजपा: राजूखेड़ी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन द्वारा आदिवासी समुदाय के खिलाफ की गई अशोभनीय टिप्पणी के बाद कांग्रेस हरकत में आना आरंभ हो गई है। कांग्रेस ने गत दिवस अनुसूचित जाति जनजाति आयोग में मंत्री बिसेन की शिकायत कर कार्यवाही की मांग की है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष कांति लाल भूरिया, एमपी से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, वरिष्ठ सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी सहित एमपी के सांसदों और विधायकों ने इस मामले मं एससी एसटी आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव को ज्ञापन सौंपा।

सांसद राजूखेड़ी ने बताया कि कांग्रेस द्वारा आयोग को बताया गया कि मध्य प्रदेश में सत्ता में मगरूर सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन द्वारा सिवनी जिले में विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह की उपस्थिति में उनके ही विधानसभा क्षेत्र में एक पटवारी को कान पकड़कर सार्वजनिक तौर पर उठक बैठक लगवाई गई। इतना ही नहीं मंत्री ने स्थल पर ही आदिवासी पटवारी से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया।

उन्होंने आगे बताया कि कांग्रेस ने जो ज्ञापन आयोग को सौंपा है, उसके अनुसार मंत्री बिसेन ने केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा में कलेक्टर कार्यालय में कहा था कि उन्होंने (बिसेन ने) केवलारी में एक आदिवासी अधिकारी से कान पकड़कर माफी मंगवाई थी। बिसेन ने कहा था कि आदिवासी समाज थोड़ा पढ़ लिख तो लेते हैं लेकिन उनमें अक्ल नहीं आती। उनसे काम करवाने के लिए उनकी आरती उतारना पड़ता है।

वरिष्ठ सांसद राजूखेड़ी ने बताया कि ज्ञापन में कहा गया है कि इस तरह से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने और अपमान जनक टिप्पणी करने की शिकायत जिला पुलिस अधीक्षक के पास की जाने पर भी रिपोर्ट दर्ज नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। आयोग के अध्यक्ष ने इस घटना पर चिंता जताते हुए कार्यवाही का आश्वासन दिया है।

इस अवसर पर कांग्रेस की ओर से अध्यक्ष कांति लाल भूरिया, मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, सांसद गजेंद्र सिंह राजुखेड़ी, सज्जन सिंह वर्मा, उदय प्रताप सिंह, प्रेम चंद गुड्डू, मीनाक्षी नटराजन, विधायक बाला बच्चन आदि मौजूद थे।

सड़कों पर केंद्र और एमपी में फिर ठनी


सड़कों पर केंद्र और एमपी में फिर ठनी

लंबे समय बाद फिर सड़कों की सुध आई शिवराज को

एनएच को स्टेट हाईवे बनाने की तैयारी

एमपी केंद्र से वापस मांगने जा रहा दस एनएच

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्री रहते हुए सड़कों पर राजनीति करने वाली शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने एक बार फिर सड़कों पर सियासत करना आरंभ कर दियाहै। कमल नाथ के इस मंत्रालय के हटते ही शिवराज सिंह ने सड़कों के मामले को हाशिए में डाल दिया था। अब एक बार फिर शिवराज सरकार ने केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए दस राष्ट्रीय राजमार्गों को केंद्र से वापस मांगा है, जिन्हें वापस स्टेट हाईवे में तब्दील किया जाएगा।

मध्य प्रदेश के आवासीय आयुक्त कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि इस कार्यालय को यद्यपि इस तरह का प्रस्ताव अभी प्राप्त नहीं हुआ है, पर राज्य सरकार द्वारा इस आशय के निर्देश अवश्य ही प्राप्त हुए हैं कि जैसे ही प्रस्ताव पहुंचे तत्काल ही उसे आगे बढ़ाकर उस पर कार्यवाही की जाए।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के चलते अनेक बार राज्य सरकार द्वारा मीडिया के माध्यम से केंद्र पर सौतले व्यवहार का आरोप लगाया जाता रहा है। वहीं दूसरी ओर शिवराज सिंह सरकार द्वारा केंद्र के कुछ मंत्रियों के साथ मिलकर राज्य के कम यातायात दबाव वाले अनेक मार्गों को एनएच बनवाने की कोशिश की गई थी। मध्य प्रदेश की सड़कांें को लेकर शिवराज सिंह द्वारा अनेक बार सूबे में तो सिंह गर्जना की जाती रही है, किन्तु जैसे ही केंद्र में भूतल परिवहन मंत्रियों के सामने वे आए उनकी बोलती ही बंद होती प्रतीत हुई है।

इसका साक्षात उदहारण स्वर्णिम चतुर्भुज के उत्तर दक्षिण गलियारे में लखनादौन से महाराष्ट्र सीमा का हिस्सा ही है, जिसका आधा काम आज भी बंद पड़ा हुआ है। मजे की बात तो यह है कि इस आधे अधूरे बने मार्ग पर पथकर वसूली के लिए भूतल परिवहन मंत्रालय ने बाकायदा निविदा आमंत्रित कर ली है। गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई माह में ही तत्कालीन जिलाधिकारी मनोहर लाल दुबे ने इस आधे अधूरे मार्ग पर पथकर वसूली होने की दशा में इसे स्थगित करने के लिए केंद्र को डीओ लेटर लिखने की बात कही गई थी।

बहरहाल, सूत्रों ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सूबे से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों में से उत्तर प्रदेश सीमा से रीवा, जबलपुर, लखनादौन, ग्वालियर देवास, भोपाल से सागर बरास्ता रायसेन, ग्यारसपुर, जबलपुर भोपाल, व्यावरा से राजस्थान सीमा तक, जबलपुर से मंण्डला, चिल्पी घाटी, इंदौर बैतूल, कटनी शहडोल अनूपपुर, सागर छतरपुर, आदि को केंद्र सरकार से मांगा है, ताकि इन्हें राज्य मार्ग में तब्दील कर इनके संधारण का काम एमपी गर्वमेंट खुद कर सके।

ज्ञातव्य है कि 2003 में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार को सड़कों की बदहाली का खामियाजा सत्ता से उतरकर चुकाना पड़ा था। कहा जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान को मशविरा दिया गया है कि अगर सूबे की सड़कों पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2013 के चुनावों में जनता द्वारा भाजपा को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। यही कारण है कि एमपी गर्वमेंट अब सड़कों की सुध ले रही है।

सड़कों पर केंद्र और एमपी में फिर ठनी


सड़कों पर केंद्र और एमपी में फिर ठनी

लंबे समय बाद फिर सड़कों की सुध आई शिवराज को

एनएच को स्टेट हाईवे बनाने की तैयारी

एमपी केंद्र से वापस मांगने जा रहा दस एनएच

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्री रहते हुए सड़कों पर राजनीति करने वाली शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने एक बार फिर सड़कों पर सियासत करना आरंभ कर दियाहै। कमल नाथ के इस मंत्रालय के हटते ही शिवराज सिंह ने सड़कों के मामले को हाशिए में डाल दिया था। अब एक बार फिर शिवराज सरकार ने केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए दस राष्ट्रीय राजमार्गों को केंद्र से वापस मांगा है, जिन्हें वापस स्टेट हाईवे में तब्दील किया जाएगा।

मध्य प्रदेश के आवासीय आयुक्त कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि इस कार्यालय को यद्यपि इस तरह का प्रस्ताव अभी प्राप्त नहीं हुआ है, पर राज्य सरकार द्वारा इस आशय के निर्देश अवश्य ही प्राप्त हुए हैं कि जैसे ही प्रस्ताव पहुंचे तत्काल ही उसे आगे बढ़ाकर उस पर कार्यवाही की जाए।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के चलते अनेक बार राज्य सरकार द्वारा मीडिया के माध्यम से केंद्र पर सौतले व्यवहार का आरोप लगाया जाता रहा है। वहीं दूसरी ओर शिवराज सिंह सरकार द्वारा केंद्र के कुछ मंत्रियों के साथ मिलकर राज्य के कम यातायात दबाव वाले अनेक मार्गों को एनएच बनवाने की कोशिश की गई थी। मध्य प्रदेश की सड़कांें को लेकर शिवराज सिंह द्वारा अनेक बार सूबे में तो सिंह गर्जना की जाती रही है, किन्तु जैसे ही केंद्र में भूतल परिवहन मंत्रियों के सामने वे आए उनकी बोलती ही बंद होती प्रतीत हुई है।

इसका साक्षात उदहारण स्वर्णिम चतुर्भुज के उत्तर दक्षिण गलियारे में लखनादौन से महाराष्ट्र सीमा का हिस्सा ही है, जिसका आधा काम आज भी बंद पड़ा हुआ है। मजे की बात तो यह है कि इस आधे अधूरे बने मार्ग पर पथकर वसूली के लिए भूतल परिवहन मंत्रालय ने बाकायदा निविदा आमंत्रित कर ली है। गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई माह में ही तत्कालीन जिलाधिकारी मनोहर लाल दुबे ने इस आधे अधूरे मार्ग पर पथकर वसूली होने की दशा में इसे स्थगित करने के लिए केंद्र को डीओ लेटर लिखने की बात कही गई थी।

बहरहाल, सूत्रों ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सूबे से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों में से उत्तर प्रदेश सीमा से रीवा, जबलपुर, लखनादौन, ग्वालियर देवास, भोपाल से सागर बरास्ता रायसेन, ग्यारसपुर, जबलपुर भोपाल, व्यावरा से राजस्थान सीमा तक, जबलपुर से मंण्डला, चिल्पी घाटी, इंदौर बैतूल, कटनी शहडोल अनूपपुर, सागर छतरपुर, आदि को केंद्र सरकार से मांगा है, ताकि इन्हें राज्य मार्ग में तब्दील कर इनके संधारण का काम एमपी गर्वमेंट खुद कर सके।

ज्ञातव्य है कि 2003 में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार को सड़कों की बदहाली का खामियाजा सत्ता से उतरकर चुकाना पड़ा था। कहा जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान को मशविरा दिया गया है कि अगर सूबे की सड़कों पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2013 के चुनावों में जनता द्वारा भाजपा को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। यही कारण है कि एमपी गर्वमेंट अब सड़कों की सुध ले रही है।