शनिवार, 12 नवंबर 2011

झाबुआ पावर कब और कहां करेगा वृक्षा रोपण!


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 13

झाबुआ पावर कब और कहां करेगा वृक्षा रोपण!

एनएचएआई के ठेकेदारों ने भी किया है पर्यावरण का जबर्दस्त नुकसान

काट डाले हजारों पेड़ पर नहीं लगाए पौधे!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से महज सौ किलोमीटर दूर सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील में देश की मशहूर थापर गु्रप ऑफ कंपनीज के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर द्वारा प्रस्तावित बारह सौ मेगावाट में से छः सौ मेगावाट के कोल आधारित पावर प्लांट की संस्थापना के पहले कंपनी को पर्यावरण की दृष्टि से वृक्षारोपण प्रस्तावित है। कंपनी इस मामले में पूरी तरह मौन है कि वह पर्यावरण को देखते हुए कितने, किस प्रजाति के, कहां पर पौधे लगाएगी।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के भरोसेमंद सूत्रों ने कहा कि प्रस्तावित संयन्त्र द्वारा प्रतिदिन 853 टन राख उत्सर्जित की जाएगी, जिसे बायलर के पास से ही एकत्र किया जा सकेगा। समस्या लगभग 1000 फिट उंची चिमनी से उडने वाली राख (फ्लाई एश) की है। इससे रोजना 3416 टन राख उडकर आसपास के इलाकों में फैल जाएगी। 1000 फिट की उंचाई से उडने वाली राख कितने डाईमीटर में फैलेगी इस बात का अन्दाजा लगाने मात्र से सिहरन हो उठती है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी ने अपने प्रतिवेदन में हवा का रूख जिस ओर दर्शाया है, संयन्त्र से उस ओर बरगी बांध है।

जानकारों का कहना है कि 3416 टन राख प्रतिदिन उडेगी जो साल भर में 12 लाख 46 हजार 840 टन हो जाएगी। अब इतनी मात्रा में अगर राख बरगी बांध के जल भराव क्षेत्र में जाएगी तो चन्द सालों में ही बरगी बांध का जल भराव क्षेत्र मुटठी भर ही बचेगा। यह उडने वाली राख आसपास के खेत और जलाशयों पर क्या कहर बरपाएगी इसका अन्दाजा लगाना बहुत ही दुष्कर है। इस बारे में पावर प्लांट की निर्माता कंपनी ने मौन साध रखा है।

इतना ही नहीं प्रतिदिन बायलर के पास एकत्र होने वाली 853 टन राख जो प्रतिमाह में बढकर 26 हजार 443 और साल भर में 3 लाख 11 हजार टन हो जाएगी उसे कंपनी कहां रखेगी, या उसका परिवहन करेगी तो किस साधन से, इस बारे में भी झाबुआ पावर लिमिटेड ने चुप्पी ही साध रखी है। अगर राख को संयंत्र के आसपास ही डम्प कर रखा जाएगा तो वहां के खेतों की उर्वरक क्षमता प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी और अगर परिवहन किया जाता है तो घंसौर क्षेत्र की सड़कों के धुर्रे उड़ना स्वाभाविक ही है।

इन परिस्थितियों में पर्यावरण के नुकसान को आंकने का काम मध्य प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण मण्डल का था। बताया जाता है कि बिना प्रस्तावित वृक्षारोपण के ही कागजों पर वृक्ष लगाकर कंपनी ने पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को साधकर उससे अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया है। अब मामला केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पाले में आ गया है। कहा जा रहा है कि सख्त मिजाज तत्कालीन वन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश अगर अभी रहते तो कंपनी को पर्यावरण को बनाए रखने कड़ा कदम उठवाते।

(क्रमशः जारी)

देश में तीन व्यक्तित्व ही मायने रखते हैं!


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 25

देश में तीन व्यक्तित्व ही मायने रखते हैं!

गांधी परिवार के अलावा सभी का योगदान नगण्य

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी और इस देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस ने देश में नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) ने अपने और अपने वारिसान को महिमा मण्डित करने की गरज से सियासी धुरी तीन लोगों के इर्द गिर्द ही घुमाई हुई है। इस परिवार के तीन सदस्यों ने देश की दिशा और दशा बदल दी। इनके अलावा आजादी के उपरांत भारत गणराज्य की स्थापना के बाद सभी का योगदान नगण्य ही है। यही कारण है कि अब नेहरू गांधी परिवार से इतर सात साल प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले अर्थशास्त्री वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह की रूखसती का ताना बाना बुना जाने लगा है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि कांग्रेस ने नेहरू गांधी परिवार के तीन लोगों को ही महिमा मण्डित करने का जतन पूरे जोर शोर से किया है। आजाद भारत के पहले वजीरे आजम पंडित जवाहर लाल नेहरू, उनकी पुत्री श्रीमति इंदिरा गांधी और फिर नवासे राजीव गांधी। इसके अलावा देश के लिए सभी नेता गौड ही हैं। यही कारण है कि देश क बड़े बड़े संस्थानों को इनके नाम पर ही रखा गया है।

नेहरू गांधी परिवार के नाम पर सत्ता की मलाई चखने वाले उनके सिपाहसलारों द्वारा बहुत चतुराई के साथ इस परिवार के आगे सभी को बौना साबित किया गया है। महात्मा गांधी को यह परिवार और इसके चाटुकार नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं, यही कारण है कि इस परिवार ने उन्हें कभी नहीं छेड़ा। अगर नेहरू गांधी परिवार द्वारा मोहन दास करमचंद गांधी को किसी भी एंगिल से टच कर दिया जाता तो देश की जनता यह कभी बर्दाश्त नहीं करती।

(क्रमशः जारी)

नेट के मामले में गलब बयानी का है आईडिया


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  21

नेट के मामले में गलब बयानी का है आईडिया

कभी भी बंद हो सकता है आपका इंटरनेट

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। इंटर नेट की स्पीड के बारे में आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया सेल्यूलर द्वारा सदा ही गलत बयानी की जाती रही है। जिस स्पीड के इंटरनेट होने का दावा आईडिया द्वारा किया जाता है उस स्पीड को आईडिया के उपभोक्ता कभी पा ही नहीं पा रहे हैं। उपभोक्ताओं को भ्रम जाल में फंसाकर आईडिया द्वारा उनकी जेब हल्की की जा रही हैं। इसी तरह आईटी एक्ट के संशोधन के उपरांत नेट कभी भी बंद किया जा सकता है।

भारत में इस समय सात करोड़ से ज्यादा इंटरनेट कनेक्शन हैं और इसकी रफ्तार 25 प्रतिशत की दर से बढ़ती जा रही है लेकिन एक बात जो बहुत कम लोग जानते हैं वह है कि किसी का भी इंटरनेट कनेक्शन कभी भी बंद हो सकता है। भारत सरकार ने 2008 के आईटी ऐक्ट में एक संशोधन करके यह अधिकार अपने हाथ में ले लिया है कि वह या उसकी कोई भी सुरक्षा एजेंसी किसी भी व्यक्ति यचा संस्थान का इंटरनेट कनेक्शन कभी भी बंद कर सकती है। इंटरनेट कनेक्शन देश की सुरक्षा के नाम पर काटा जा सकता है और इसकी अवहेलना करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है।

इंटरनेट कनेक्शन काटने को किल स्विट कहते हैं इसके समर्थकों का कहना है कि इससे अफवाहें फैलने से रोका जा सकता है साथ ही झूठी सूचना देने पर भी रोक लगाई जा सकती है। दुनिया में कम ही देश हैं जहां यह व्यवस्था मौजूद है लेकिन बहुत से लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि देश की सुरक्षा के नाम पर ऐसे अधिकार लेना उचित नहीं है।

(क्रमशः जारी)

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

परेशानी का सबब बना आधार!


परेशानी का सबब बना आधार!

(लिमटी खरे)

देश के हर नागरिक को विशिष्ट पहचान पत्र उपलब्ध कराने की केंद्र सरकार की अभिनव योजना को जमीनी स्तर पर सफलता नहीं मिल पा रही है। आधार के नाम का यह पहचान पत्र अनेक जिलों में बन ही नहीं पा रहा है, जिन लोगों ने जून जुलाई में आधार का पंजीयन कराया है वे अपनी अपनी रसीद लेकर यहां वहां भटकने पर मजबूर हैं, उनका आधार पहचान पत्र अब तक उन्हें नहीं मिल पाया है। केंद्र सरकार की इस महात्वाकांक्षी योजना के बारे में सरकार को गफलत में रखकर गलत फीडबैक दिया जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति निर्मित होती जा रही है। आधार के बारे में केंद्र सरकार करोड़ों अरबों रूपए के विज्ञापन मीडिया में जारी कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रही है पर आधार बनाने का ठेका लिए लोगों की मशीनें ही इस मामले में जवाब देने लगी हैं।

भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही कई उपाय ऐसे होते चले आ रहे हैं, जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को राष्टीय नागरिकता की पहचान दिलाई जा सके। मूल निवासी प्रमाण-पत्र, राशनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब आधार योजना के अंतर्गत एक बहुउद्देश्य विशिष्ट पहचान पत्र हरेक नागरिक को देने की कवायद देशव्यापी चल रही है। इस पहचान पत्र के जरिए देश के नागरिक की पहचान सरल सहज तरीके से किए जाने की बजाए कंप्यूटरीकृत ऐसी तकनीक से होगी,जिसमें कई जटिलताएं पेश आने के साथ परीक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ की भी जरुरत होगी।

मसलन व्यक्ति को राष्टीय स्तर पर पंजीकृत करके जो संख्या मिलेगी, उसे व्यक्ति की सुविधा और सशक्तीकरण का बड़ा उपाय माना जा रहा है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि इससे नागरिक को एक ऐसी पहचान मिलेगी, जो भेद-रहित होने के साथ, उसे विराट आबादी के बीच अपना वजूद भी कुछ है, यह होने का अहसास कराती रहेगी। लेकिन नागरिकता की इस विशिष्ट पहचान की चूलें पहल चरण में ही हिलने लगी हैं। क्योंकि इस पहचान-पत्र योजना के क्रियान्वयन में विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के उपायों को तो नकारा ही गया, संसद की सर्वाेच्चता को भी दरकिनार कर इसे औद्योगिक पेशेवरों के हाथ सौंप दिया गया। नतीजतन यह योजना अब भ्रष्टाचार का पर्याय तो बन ही रही है, पहचानधारियों को संकट का सबब भी साबित हो रही है।

यह हकीकत अभी भी आम-फहम नहीं है कि बहुउद्देशीय विशिष्ट पहचान-पत्र योजना को देश की सर्वाेच्च संवैधानिक संस्था, संसद की अनुमति नहीं मिली है। इस योजना को अस्तित्व में लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को जाता है। अटल सरकार ने इस योजना को हरी झंडी दी थी, उसके उपरांत मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने भारतीय राष्टीय पहचान प्राधिकरण बनाकर इस योजना के क्रियान्वयन की शुरुआत की। अमेरिका की सही-गलत नीतियों के अंध-अनुकरण के आदी हो चुके मनमोहन सिंह ने इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरु किया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतनिर्हित हैं। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष एक औद्योगिक घराने के सीईओ नंदन नीलकेणी को बनाकर, तत्काल उनके सुपुर्द 6600 करोड़ की धन राशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इस राशि को बढ़ाकर 17900 करोड़ कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब अर्थशास्त्रियों के एक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल खर्च डेढ़ लाख करोड़ रुपए होंगे।

इस प्रसंग में हैरानी की बात यह भी है कि बात-बात पर संसद की सर्वाेच्चता और गरिमा की दुहाई देने वाले मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट के पिछड़े गांव की एक महिला को पहचान-पत्र देकर एक साल पहले इसका शुभारंभ भी कर दिया। देश की सबसे बड़ी पंचायत में किसी भी पंच अर्थात सांसद ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई है कि गरीब की भूख से जुड़े खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक और ज्यादातर गरीबों को मनरेगा से जोड़ने वाली गरीबी रेखा को तय किए बिना अथवा संसद की मंजूरी लिए बिना इन योजनाओं पर अमल क्यों नहीं शुरु किया जाता ?

लोकपाल विधेयक को संसद पहुंचाने से पहले ही क्यों नहीं भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसी जाती ? दरअसल संप्रग सरकार की पहली प्राथमिकता में भूख और कुपोषण जैसी समस्याएं हैं ही नहीं। वह जटिल तकनीकी पहचान पर केंद्रित इस आधार योजना को जल्द से जल्द इसलिए लागू करने में लगी है, जिससे गरीबों की पहचान को नकारा जा सके। क्योंकि राशनकार्ड और मतदाता पहचान-पत्र में पहचान का प्रमुख आधार व्यक्ति का फोटो होता है। जिसे देखाकर आंखों में कम रोशनी वाला व्यक्ति भी कह सकता है कि यह फलां व्यक्ति का फोटो है। उसकी तसदीक के लिए भी कई लोग आगे आ जाते हैं। इस पहचान को एक साथ बहुसंख्यक लोग कर सकते हैं। जबकि आधार में फोटो के अलावा उंगलियों व अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों के डिजीटल कैमरों से लिए गए महीन से महीन पहचान वाले चित्र हैं, जिनकी पहचान तकनीकी विशेषज्ञ भी बड़ी मशक्कत व मुश्किल से कर पाते हैं। ऐसे में सरकारी एवं सहकारी उचित मूल्य की दूकानों पर राशन, गैस व कैरोसिन बेचने वाला मामूली दुकानदार कैसे करेगा ?

पहचान के इस परीक्षण व पुष्टि के लिए तकनीकी ज्ञान की जरुरत तो है कि कंप्युटर उपकरणों के हर वक्त दुरुस्त रहने, इंटरनेट की कनेक्टविटि व बिजली की उपलब्धता भी जरुरी है। गांव तो क्या नगरों और राजधानियों में भी बिजली कटौती का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में एक शनिवार भारत के सबसे बड़े स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का पूरे दिन सायबर नाकाम रहा। नतीजतन लोग मामूली धन-राशि का भी लेने-देन नहीं कर पाए। सुविधा बहाली के लिए विज्ञापन देकर बैंक रविवार को खोलना पड़ा। कमोबेश नगरीकृत व सीमित उपभोक्ता से जुड़े एक बड़े बैंक को इस परिस्थिति से गुजरना पड़ रहा है तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को किस हाल से गुजरना होगा ? जाहिर है, ये हालात गांव-गांव दंगा, मारपीट और लूट का आधार बन जाएंगे।

देखा जाए तो दरअसल आधार के रुप में भारत में अमल में लाई गई इस योजना की शुरुआत अमेरिका में आंतकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुई थी। 2001 में हुए आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों को छूट दी गई थी कि वे इस योजना के माध्यम से संदिग्ध लोगों की निगरानी करें। वह भी केवल ऐसी 20 फीसदी आबादी पर जो प्रवासी हैं और जिनकी गतिविधियों आशंकाओं के केंद्र में हैं। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि हमारे देश में उन लाचार व गरीबों को संदिग्ध व खतरनाक माना जा रहा है, जिन्हें रोटी के लाले पड़े हैं। ऐसे हालात में यह योजना गरीबों के लिए हितकारी साबित होगी अथवा अहितकारी इसकी असलियत सामने आने में थोड़े और वक्त का इंतजार करना होगा।

0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 12

हवा हवाई वायदों से ठगा जा रहा है आदिवासियों को

नौकरी देने के प्रलोभन से ली जा रही है जमीन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कंपनीज के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से संस्कारधानी जबलपुर से महज सौ किलोमीटर दूर स्थापित होने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट में आदिवासियों की जमीनें हवा हवाई वायदों से लेने की शिकायतें आम हो रही हैं। आदिवासी परिवारों को नौकरी आदि का प्रलोभन व्यापक स्तर पर देने की चर्चाएं चल पड़ी हैं।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक कंपनी द्वारा यह प्रलोभन दिया जा रहा है कि जिन परिवारों की भूमि को अधिग्रहित किया जा रहा है उनके परिवार के एक सदस्य को कंपनी द्वारा पात्रतानुसार नौकरी में प्राथमिकता दी जाएगी। इसमें यह साफ नहीं किया गया है कि उस परिवार के सदस्य को स्किल्ड या अनस्किल्ड लेकर की नौकरी दी जाएगी। अगर अनिस्किल्ड लेबर की श्रेणी में परिवार के सदस्य को नौकरी दी जाती है तो उसकी दिहाड़ी बेहद ही कम बैठने की उम्मीद है।

इसी तरह कंपनी ने यह भी प्रलोभन दिया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के पुनर्वास की योजना को भी प्रोजेक्ट में शामिल किया जाएगा। इसका तातपर्य यह है कि जरूरी नहीं है कि उनके स्थायी पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था की जाए।

कंपनी ने यह भी कहा है कि भू अर्जन अधिनियम के अंतर्गत भू अर्जन की जा रही भूमि के मूल्यांकन के आधार पर शत प्रतिशत राशि के साथ ही साथ दस फीसदी राशि जमा कराए जाने के संबंधी कार्य संबंधित कलेक्टर्स के द्वारा भू अर्जन अधिनियम तथा संबंधित विधिक उपबंधों और शासनादेशों के अंतर्गमत दिए गए प्रावधानों तथा शर्तों के आधार पर किया जाएगा।

कंपनी ने यह भी कहा है कि भूमि का भूअर्जन जिस उपयोग के लिए किया जा रहा है कंपनी उसका उपयोग वही करेगी। इसके लिए कंपनी द्वारा उपयोग में परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा। इस भूमि पर निर्माण के दौरान कंपनी इस बात का पूरा ध्यान रखेगी कि सामान्य जनता को निस्तार आदि में असुविधा न हो।

कंपनी ने शासन को यह भी आश्वासन दिया है कि कंपनी को दी गई भूमि या उसके किसी भाग अथवा उस पर निर्मित किसी भी निर्माण अथवा भवन आदि को कंपनी बेचने, बंधक रखने, दान देने, पट्टे पर देने या अन्य प्रकार से अन्तरित करने का काम नहीं करेगी। यक्ष प्रश्न यह है कि इतना बड़ा पावर प्लांट जिसमें करोड़ों रूपए व्यय होंगे वह कंपनी द्वारा नकद राशि खर्च कर बनवाया जा रहा है। कंपनी ने अगर बैंक से कर्ज लिया होगा तो इस भूमि को वह रहन अवश्य ही रखेगी। इस बारे में आयकर विभाग की नजरें इनायत न होना आश्चर्य का ही विषय है।

(क्रमशः जारी)

मनमोहन भ्रष्ट नहीं: राहुल गांधी


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 24

मनमोहन भ्रष्ट नहीं: राहुल गांधी

पच्चीस साल बाद भी भ्रष्टाचार का आंकड़ा वही

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी ने वर्तमान प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को परोक्ष तौर पर ईमानदार करार दे दिया है। राहुल गांधी ने अराजनैतिक सोच को दर्शाते हुए अपने पिता की बात को दोहराया है जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि सरकारी राशि का महज पंद्रह फीसदी हिस्सा ही जनता तक पहुंच पाता है।

अगरतला मेें एक बयान देकर राहुल गांधी ने सियासी पानी में पत्थर मारकर हलचल पैदा कर दी है। राहुल गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के बहुचर्चित बयान का हवाला देकर कहा कि मेरे पिता ने सालों पहले कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा दिए गए एक रूपए में से 15 पैसे ही आम जनता तक पहुंच पाते हैं। उन्होंने कहा कि वे इस बात में आज भी विश्वास करते हैं कि आज भी हालात कमोबेश ऐसे ही हैं कि एक रूपए में से 85 पैसे बिचौलिए खा जाते हैं।

जानकारों का मानना है कि उन्होंने एक तरह से प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह पर लग रहे भ्रष्टाचार के ईमानदार संरक्षक के तगमे को धोने का प्रयास किया है। राहुल के बयान के निहितार्थ राजनैतिक वीथिकाओं में खोजे जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जितने भ्रष्ट राजीव गांधी, नरसिंहराव, अटल बिहारी बाजपेयी, व्ही.पी.सिंह, चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल आदि थे, कमोबेश उतने ही भ्रष्ट मनमोहन सिंह हैं। इसका कारण यह है कि तब भी पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंचते थे और आज भी पंद्रह पैसे ही पहुंच रहे हैं।

(क्रमशः जारी)

आईडिया सहित अन्य कंपनियों पर आपराधिक धोखाधड़ी के आरोप


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  20

आईडिया सहित अन्य कंपनियों पर आपराधिक धोखाधड़ी के आरोप

मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया। याचिका में कहा गया है कि 3जी सेवा में कुछ कम्पनियों ने पिछले दरवाजे से प्रवेश किया है और इससे सरकार को 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह याचिका मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ के समक्ष दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि दूरसंचार सेवा प्रदाता कम्पनी भारती एयरटेल लिमिटेड, आईडिया सेल्युलर लिमिटेड और वोडाफोन एस्सार लिमिटेड ने अपने उपभोक्ताओं को 3जी सेवाएं देने के लिए ऐसी अन्य कम्पनियों की सेवा ली, जिनकी इस सेवा के लिए अर्हता नहीं थी।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि कम्पनियों ने आपराधिक षडयंत्र किया और सरकार को धोखा दिया, जिससे राजस्व को भारी नुकसान हुआ। याचिकाकर्ता ने कहा कि निजी कम्पनियों ने दूरसंचार विभाग के लाइसेंस से सम्बंधित नियमों और शर्ताे तथा दिशा-निर्देशों की अनदेखी की और उन क्षेत्रों में सेवा की आपूर्ति की जिनके लिए उन्हें लाइसेंस नहीं मिला था। याचिकाकर्ता ने कहा, कि निजी कम्पनियों ने आपस में समझौते किए और एक-दूसरे के नेटवर्क और स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया और उन क्षेत्रों में भी 3जी सेवा दी जिनके लिए उनके पास लाइसेंस या 3जी स्पेक्ट्रम नहीं था। इस प्रकार उन्होंने 3जी संचालन क्षेत्र में पिछले दरवाजे से प्रवेश किया।

याचिका को संज्ञान में लेते हुए मुख्य न्यायाधीश ने अतिरिक्त महाधिवक्ता ए.एस. चंडिहोक को निर्देश दिया कि वह सरकार से निर्देश प्राप्त कर 30 नवम्बर तक जवाब सौंपे। याचिका में कहा गया, सरकार और भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) नियमों की अनदेखी करने वाली कम्पनियों पर कार्रवाई करने में विफल रहे और उन्होंने अवैध तौर पर कम्पनियों को उन कम्पनियों के साथ 3जी स्पेक्ट्रम साझा करने की अनुमति दी, जिन्हें लाइसेंस नहीं मिला था। दूरसंचार विभाग के दिशा निर्देश में कम्पनियों द्वारा स्पेक्ट्रम को साझा करने का प्रावधान नहीं है।

याचिकाकर्ता ने कहा, कि कम्पनियों ने आपस में समझौते कर सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उसने यह सुनिश्चित कराने के लिए दूरसंचार विभाग और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के समक्ष एक प्रस्तुति दी थी कि 3जी सेवाएं गैर लाइसेंसी ऑपरेटरों द्वारा न मुहैया कराई जाएं। याचिकाकर्ता ने कहा, कि दूरसंचार विभाग और ट्राई से कोई जवाब नहीं मिला। याचिकाकर्ता ने पीठ को यह भी सूचित किया कि उसने केंद्रीय सतर्कता आयोग को भी एक विस्तृत ब्योरा भेजा है ताकि मामले की जांच हो सके।

(क्रमशः जारी)

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

स्विस बैंक का दस्‍तावेज


लीजिए जनाब देखिए स्विस बैंक के सील सिक्‍के वाला दस्‍तावेज, सही या गलत इस बारे में भारत सरकार ही स्विस बैंक से पूछताछ कर स्थिति स्‍पष्‍ट करे भारतवासियों के सामने, अगर कांग्रेस और सरकार चुप रहती है तो मान लीजिए कि यह दस्‍तावेज सही है

छग लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को इंदौर में सरकारी आवास!


दरियादिल शिवराज मेहरबान हैं जोशी पर

छग लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को इंदौर में सरकारी आवास!

राज्य के अधिकारियों को जिलों की कमान!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय और दिल्ली में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों के बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दरियादिली इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। शिव राज में मध्य प्रदेश में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी तो दिल्ली में प्रतिनियुक्ति की मलाई चाट रहे हैं, वहीं जिलों की कमान राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों के हवाले कर शिवराज ने नई मिसाल कायम की है।

दिल्ली में पदस्थ मध्य प्रदेश काडर के प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि भले ही केंद्रीय कार्मिक विभाग इस बारे में सख्ती अपना रहा हो कि राज्यों के अफसर केंद्र या अन्य जगहों पर पांच साल से ज्यादा प्रतिनियुक्ति पर नहीं रह सकते किन्तु फिर भी आईएएस लाबी इतनी तगड़ी है कि केंद्र चाहकर भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है। कार्मिक विभाग की सख्ती महज दिखावे के लिए ही है। मध्य प्रदेश काडर के ही अनेक अधिकारी आज पांच साल की अवधि पूरी करने के बाद भी दिल्ली में ही जमे हैं।

उधर शिवराज सिंह चौहान ने सूबे में पुलिस अधीक्षक जैसे संवेदनशील पदों की कमान राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को सौंप रखी है। जिलों में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भी राज्य पुलिस सेवा के ही अधिकारी हैं, जो अपने ही काडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के अधीन काम करने में अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं। सूबे में हर जिले में दो से तीन आईएएस अधिकारी भी पदस्थ हैं, जिनमें अक्सर टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है।

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ.प्रदीप जोशी अब छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हैं। जुगाड़ के धनी डॉ.जोशी को एमपी पीएससी इंदौर मुख्यालय में बतौर अध्यक्ष सरकारी आवास मिला हुआ है। जोशी का नया मुख्यालय रायपुर है, वहां भी उन्हें सरकारी आवास की पात्रता है। जोशी ने शिवराज से इस मकान को रखने की अवधि बढ़ाने का आग्रह किया। भोले भाले शिवराज तत्काल मान गए।

अब छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप जोशी रायपुर में काम करते हुए अपना आवास वहां से लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर दूर इंदौर में बनाए रखेंगे। एमपी गर्वमेंट की दरियादिली देखिए कि उसने दूसरे प्रदेश के एक अध्यक्ष को अपने प्रदेश में सरकारी आवास रखने की पात्रता दी है वह भी 15 मई 2012 तक के लिए। डॉ.जोशी का इंदौर प्रेम और शिव का डॉ.जोशी के प्रति अनुराग देखकर लोगों की आंखें भर आई होंगीं।

क्या जमीन अधिग्रहण संशोधन लागू होगा झाबुआ पावर में


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 11

क्या जमीन अधिग्रहण संशोधन लागू होगा झाबुआ पावर में

नए प्रावधान से किसे होगा लाभ!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की मशहूर थापर ग्रुप के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा देश के हृदय प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के करीब भगवान शिव के सिवनी जिले में लगाए जा रहे कोल आधारित छः सो मेगावाट के पावर प्लांट में जमीन अधिग्रहण में नए प्रावधान लागू हो पाएंगे या नहीं इस बारे में कुहासा अभी छट नहीं सका है।

गौरतलब है कि वर्तमान में जमीन अधिग्रहण एक पेचीदा मसला बनकर उभरा है। किसानों द्वारा जमीन के अधिग्रहण का पुरजोर विरोध किया जा रहा है। वर्तमान में जमीन अधिग्रहण कानून 1894 के अनुसार ही सरकारें अधिग्रहण का काम करती हैं। अधिग्रहण प्रक्रिया में जमीन मालिक से चर्चा अवश्य ही होती है पर जमीन मालिक के पास अधिग्रहण रोकने का कोई अधिकार नहीं होता है।

कानून के अनुसार अगर जमीन का अधिग्रहण जनसेवा के उद्देश्य से किया जाता है तो जमीन के मालिक को वर्तमान दरों के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है। किसानों द्वारा जमीन अधिग्रहण का विरोध इसलिए आरंभ हुआ क्योंकि सरकारों द्वारा अपने हितों के बजाए निजी क्षेत्र के लोगों के लिए जमीन का अधिग्रहण करना आरंभ कर दिया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून में कुछ संशोधन किए हैं। इसमें पुराने कानून की विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया गया है। नए प्रावधान में अधिग्रहण में सत्तर फीसदी जमीन को बाजार भाव पर खरीदना अनिवार्य किया जा रहा है। इसके अलावा रीहबिलीटेशन और रीसैटलमेंट एक्ट 2007 के अनुसार विस्थापितों को मुआवजा ओर अन्य फायदे देने का प्रावधान किया गया है। इस जमीन अधिग्रहण कानून संशोधन के बारे में सरकार द्वारा मुनादी न पिटवाया जाना भी आश्चर्य का ही विषय माना जा रहा है। घंसौर में निजी कंपनी झाबुआ पावर प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण में संशोधित कानून लागू होता है या नहीं यह भी शोध का ही विषय माना जा रहा है।

(क्रमशः जारी)

. . . मतलब सोनिया के पीहर से पगार पा रही एसपीजी


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 23

. . . मतलब सोनिया के पीहर से पगार पा रही एसपीजी

सोनिया की सुरक्षा में लगे अफसरान कहां से पा रहे वेतन!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सूचना के अधिकार के तहत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के विदेश दौरों के बारे में जब किसी भी मंत्रालय को जानकारी नहीं है इससे साफ जाहिर हो रहा है कि सोनिया गांधी का सुरक्षा कवच (सोनिया की सुरक्षा में लगी एसपीजी) के जवान और अधिकारी किसी और या सोनिया गांधी के मायके इटली से वेतन और भत्ते पा रहे हैं।

व्हीव्हीआईपी फेहरिस्त में सबसे उपर रहने वालीं सोनिया गांधी के हर दौरे के बारे में केंद्रीय गृह मंत्रालय को सूचना दी जाती है। उनका हर दौरा जनता से इकट्ठे किए गए कर से संचित राजस्व से ही होता है। वे अगर विदेश जाती हैं तो बाकायदा विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय को इत्तला दी जाती है। उनकी सुरक्षा में लगे स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप के जवान और अधिकारी गृह विभाग से विदेश जाने की अनुमति लेते हैं। यात्रा भत्ता अग्रिम प्राप्त करते हैं। वापस आकर वे अपने सारे देयक जमा करते हैं और टीए डीए प्राप्त करते हैं।

अगर विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, संसदीय कार्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय को सोनिया गांधी के विदेश दौरों के बारे में नहीं पता है तो इसका मतलब है कि सोनिया के सरकारी सुरक्षा को वेतन भत्ते भारत सरकार नहीं दे रही है। सोनिया की सेवा टहल में लगी एसपीजी को वेतन या तो सोनिया के मायके इटली की सरकार दे रही है या फिर कोई अन्य धनाड्य उद्योगपति। सियासी गलियारों में अब इस बात का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि सोनिया के सुरक्षा कवच में तैनात सरकारी एसपीजी कर्मचारियों ने कहीं सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर निजी तौर पर किसी की सेवाएं तो नहीं ज्वाईन कर ली हैं।

(क्रमशः जारी)

अभिषेक के शहर में महज दो हजार हैं आईडिया उपभोक्ता


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  19

अभिषेक के शहर में महज दो हजार हैं आईडिया उपभोक्ता

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आईडिया के ब्रांड एम्बेसेडर बिग बी यानी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पुत्र जूनियर बी यानी अभिषेक बच्चन अपने शहर मुंबई में महज दो हजार लोगों को ही आईडिया की मोबाईल सेवाएं लेने के लिए लुभा पाए। आईडिया के सबसे कम उपभोक्ता मुंबई जैसे महानगर में ही हैं।

आईडिया के सूत्रों का कहना है कि आईडिया के उपभोक्ताओं के बारे में जानकारी जुटाई गई है जिसमें जो आंकड़ा सामने आया है उसके मुताबिक महाराष्ट्र और गोवा में 48 लाख 81 हजार 444, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 32 लाख 26 हजार 230, आंध्र प्रदेश में 32 लाख 52 हजार 35, केरला में 27 लाख चार हजार 888, तो गुजरात में 26 लाख 23हजार 72 उपभोक्ता हैं।

इसी तरह उत्तर प्रदेश (पश्चिम) में 25 लाख 68 हजार 279, उत्तर प्रदेश (पूर्व) में 9 लाख 67 हजार 862, दिल्ली में 18 लाख 97 हजार 693, हरियाणा में 9 लाख 80 हजार 760, राजस्थान में 8 लाख 24 हजार 805, हिमाचल प्रदेश में 74 हजार 505 और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में महज दो हजार उपभोक्ताओं ने ही आईडिया पर भरोसा जताया है।

गौरतलब है कि आईडिया के ब्रांड एम्बेसेडर अभिषेक बच्चन पर आईडिया कंपनी ने करोड़ों रूपयों का दांव लगाया था। अब सवाल यह उठता है कि मुंबई में ही जब मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी आईडिया और अभिषेक पर लोगों ने भरोसा ही नहीं जताया तो बाकी देश में क्या हाल हो रहे होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

(क्रमशः जारी)

बुधवार, 9 नवंबर 2011

सरताज हो गए हरवंश!


सरताज हो गए हरवंश!

(लिमटी खरे)

यह समझना बहुत मुश्किल है कि देश के हृदय प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल रही है या फिर कांग्रेस विधायक ठाकुर हरवंश सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार। प्रदेश सरकार जिस तरीके से कांग्रेस को तवज्जो दे रही है उससे तो लगने लगा है कि एमपी में कांग्रेस की छाया सरकार काम कर रही है। मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर कांग्रेस के नेताओं को शिवराज सिंह ने जिस तरह तवज्जो दी उससे लगा मानो शिवराज सिंह चौहान की गलत नीतियों का विरोध न करने पर भाजपानीत सरकार अब कांग्रेस के सामने साष्टांग दण्डवत कर रही हो। हाल ही में भगवान शिव के सिवनी जिले में आदिवासी बहुल्य लखनादौन विधानसभा में हुए तेंदूपत्ता वितरण प्रोग्राम में भाजपा सरकार के वन मंत्री कांग्रेस के झंडे तले काम करते दिखे। मुख्य वनसंरक्षक लल्लन चौधरी ने आदिवासी विधायक शशि ठाकुर की सरेआम उपेक्षा कर कांग्रेस के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर की गजब की चरण वंदना का प्रमाण दिया है।

वर्ष 2003 के दिसंबर माह में राजा दिग्विजय सिंह के कथित सुशासन और वास्तविक कुशासन का समूल नष्ट किया था भाजपा की तेज तर्रार नेत्री उमा भारती ने। उमा के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्ता पर काबिज हुई। उस वक्त कांग्रेस के इशारों पर ठुमके लगाने वाले अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों ने तत्काल ही अपना बोरिया बिस्तर बांधा और प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की शरण ली। केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय के साफ निर्देशों कि प्रतिनियुक्ति पर पांच साल से ज्यादा रहने वाले अफसरान पर कार्यवाही होगी को धता बताते हुए आज दर्जनों अधिकारी प्रतिनियुक्ति की मलाई चख रहे हैं। दरअसल नियम कायदे अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही बनाते हैं अतः वे इसकी काट भी निकाल ही लेते हैं।

शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ न जाने कितने ब्रम्हास्त्र कांग्रेस के हाथ आए पर कांग्रेस ने उनका इस्तेमाल ही नहीं किया। कहा जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान अपनी कुर्सी बचाने के लिए कांग्रेस के लंबरदारों को हर माह निश्चित मात्रा में मदद दे रहे हैं ताकि भाजपा का विरोध तो हो पर छद्म तरीके से। इस तरह की नूरा कुश्ती से कांग्रेस के आलंबरदार अपने हित साध लेते हैं और जनता तथा आलाकमान को जताने के लिए सांकेतिक विरोध भी हो जाता है। डंपर कांड में लोकायुक्त में चल रहे प्रकरण का खात्मा आश्चर्यजनक तरीके से चंद दिनों में ही लगवा दिया गया। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी इस मामले में मूक दर्शक बनी बैठी रही।

गणतंत्र दिवस पर भी शिवराज सिंह चौहान दरियादिली दिखाते हैं। वे कांग्रेस के विधायकों को जिला मुख्यालय में ध्वाजारोहण को पाबंद करते हैं। शिवराज की दरियादिली तारीफेकाबिल है पर अपने विधायकों का तिरस्कार कर विरोधियों को महिमामण्डित करने से पार्टी में उनका विरोध बढ़ता है। मध्य प्रदेश स्थापना दिवस पर भी कमोबेश यही कुछ नजारा देखने को मिला। भगवान शिव के जिले सिवनी में जिला मुख्यालय के कार्यक्रम को केवलारी के कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह ठाकुर से करवाकर जिला मुख्यालय की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया को केवलारी विधानसभा के एक कस्बे छपारा में मुख्य अतिथि बनवा दिया गया। हरवंश सिंह ठाकुर के इशारे पर ठुमके लगाने वाली जिला भाजपा भी इस मामले में मौन ही साधे रही।

हाल ही आदिवासी बाहुल्य लखनादौन विधानसभा के मुख्यालय लखनादौन में हुए तेंदूपत्ता बोनस वितरण कार्यक्रम में गजब का ही नजारा देखने को मिला। इस कार्यक्रम से स्थानीय भाजपा विधायक और संगठन ने पर्याप्त दूरी बनाकर रखी गई। यह कार्यक्रम चूंकि लखनादौन विधानसभा के तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए था इसलिए स्थानीय विधायक को तवज्जो देना प्रशासन का पहला कर्तव्य था। इस कार्यक्रम में मंच पर मुख्य अतिथि थे शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ अनेक मर्तबा परोक्ष तौर पर जहर उगल चुके प्रदेश सरकार के वन मंत्री सरताज सिंह चौहान, अध्यक्षता कर रहे थे कांग्रेस के सिवनी जिले के केवलारी के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर और विशिष्ट अतिथि थीं सिवनी की विधायक श्रीमति नीता पटेरिया।

वस्तुतः प्रोटोकाल के मुताबिक इस कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय विधायक श्रीमति शशि ठाकुर को करना चाहिए थी। समूचा संगठन और विधायक इस कार्यक्रम के दौरान लखनादौन के रेस्ट हाउस में विरोध स्वरूप बैठा रहा। सिवनी की विधायक का लखनादौन के कार्यक्रम में दिलचस्पी लेना समझ से परे ही है। वैसे भी श्रीमति नीता पटेरिया और श्रीमति शशि ठाकुर के बीच अनबन किसी से छिपी नहीं है। श्रीमति नीता पटेरिया के पति डॉ.एच.पी.पटेरिया सिवनी में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के करंट चार्ज में थे। उस समय सिवनी के ईयर मार्क बंग्लों (कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, जिला एवं सत्र न्यायधीश, मुख्य अभियंता सिंचाईं, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) में से सीएमओ के बंग्ले में वे निवास करने चली गईं थीं। जब श्री पटेरिया का करंट चार्ज हटा और उनके स्थान पर श्रीमति शशि ठाकुर के पति श्री ठाकुर सीएमओ बनकर आए तब भी श्री पटेरिया ने सीएमओ का ईयर मार्क बंग्ला डेढ़ साल होने को आया रिक्त नहीं किया। मजबूरी में श्री ठाकुर को किराए के मकान में निवास करना पड़ा। सहृदय और कुशल प्रशासक श्री ठाकुर ने बाद में स्वास्थ्य विभाग के ही एक अन्य आवास को अपना आशियाना बनाया हुआ है। वर्तमान में भी सीएमओ के ईयर मार्क बंग्ले में श्रीमति नीता पटेरिया ने अपना निवास बनाया हुआ है।

बहरहाल, लखनादौन में संपन्न हुए इस कार्यक्रम के पहले वनमंत्री सरताज सिंह बर्रा स्थित कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह ठाकुर के निवास पर जलपान हेतु गए। इसके बाद वे मार्ग में छपारा में नीता पटेरिया के आवास पर कुछ देर रूके। कहा जा रहा है कि सरताज सिंह जब सिवनी से कार्यक्रम के लिए रवाना हुए थे तब उनकी भाषा कुछ और थी। बाद में जब वे हरवंश सिंह के आवास से निकले तब उनके सुर ही बदल गए थे। सरताज सिंह ने अधिकारियों से यह पूछने की जहमत भी नहीं उठाई कि कार्यक्रम में मंच पर आसंदी पर कौन कौन बैठेगा? न ही कार्यक्रम में जब भाजपा की ही विधायक शशि ठाकुर नहीं दिखीं तब भी उन्होंने इस बारे में जानकारी चाही।

सिवनी में पदस्थ मुख्य वन संरक्षक लल्लन सिंह वैसे भी हरवंश सिंह ठाकुर के निकट के बताए जाते हैं। भाजपा में चल रही चर्चाओं को अगर सही माना जाए तो यह कार्यक्रम भी कांग्रेस के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर के इशारों पर ही तय किया गया है। इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक शशि ठाकुर की उपेक्षा सामान्य बात नहीं है। कल तक हरवंश सिंह को पानी पी पी कर कोसने वालीं परिसीमन में विलुप्त हुई सिवनी लोकसभा सीट की अंतिम सांसद और सिवनी विधायक श्रीमति नीता पटेरिया को हरवंश सिंह के साथ एक मंच पर ठहाके लगाते देख लोग अचंभित थे। लोगों में चर्चा होना स्वाभाविक ही है कि अब हरवंश नीता जुगलबंदी क्या रंग दिखाएगी?

कुल मिलाकर भाजपा के वन मंत्री सरताज सिंह के इस तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस वितरण कार्यक्रम से भाजपा के अंदर ही अंदर असंतोष की खिचड़ी खदबदाने लगी है। सरताज सिंह चौहान इस बार पूरी तरह हरवंशमय ही दिखे। भाजपा को आदिवासियों की सरेआम की गई उपेक्षा का भोगमान अवश्य ही भोगना पड़ सकता है। आने वाले समय में सियासी गलियारों में यह चर्चा आम हो जाए कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को कांग्रेस के नेता ही हांकरहे हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

झाबुआ पावर के जमीन अधिग्रहण के साथ ही सख्त हुए नियम


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 10

झाबुआ पावर के जमीन अधिग्रहण के साथ ही सख्त हुए नियम

झाबुआ पावर को लाभ दिलाने नियमों को लागू करने में हो रहा था विलंब

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की नामी गिरामी कंपनी थॉपर ग्रुप के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर को लाभ दिलाने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार भी आतुर दिख रही है। कंपनी के द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील में कोयला आधारित पावर प्लांट लगाने के लिए जमीन अधिग्रहण को युद्ध स्तर पर करवाने के पीछे सरकार की मंशा कुछ और समझ में आ रही है। जमीन अधिग्रहण के उपरांत एमपी गर्वमेंट ने जमीन के डायवर्शन के नियमों को अपेक्षाकृत कठोर कर दिया है।

झाबुआ पावर लिमिटेड पर घंसौर में आदिवासियों की जमीने माटी मोल खरीदने के आरोप लग रहे हैं। वहीं दूसरी और पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा में सरकार के स्तर पर बनने वाली पेंच व्यपवर्तन परियोजना में जमीन के मुआवजे को लेकर सरकार द्वारा कहा जा रहा है कि मुआवजा अधिक होने से यह योजना प्रभावित हो रही है। एक तरफ तो छिंदवाड़ा के किसानों को सरकार द्वारा ज्यादा मुआवजा नहीं दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर सिवनी जिले के केवलारी विधानसभा क्षेत्र की घंसौर तहसील के किसानों को चुटकी भर मुआवजा दिया जाकर उनका माखौल उड़ाया जा रहा है।

गौरतलब है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश में जमीन के उपयोग परिवर्तन अर्थात डायवर्शन के लिए कोई नियम नहीं है। सूबे में अफसरों की मनमर्जी पर डायवर्शन का काम संपादित होता आ रहा है। घंसौर में कृषि की भूमि के औद्योगिक उपयोग के लिए लिए जाने पर भी शासन प्रशासन मौन ही साधे हुए है। कृषि भूमि को अकृषि के प्रयोजन का बनाया जा रहा है। कृषि भूमि वह भी आदिवासी या अनुसूचित जनजाति के लोगों से लेने पर कंपनी को ढेर सारी औपचारिकताओं से होकर गुजरना पड़ता किन्तु बताते हैं कि झाबुआ पावर लिमटेड कंपनी ने लक्ष्मी मैया की कृपा से शार्ट कट ही अपना लिया।

इसके पूर्व घंसौर में हुई जनसुनवाई में जिला प्रशासन की ओर से अतिरिक्त जिला कलेक्टर अलका श्रीवास्तव की देखरेख में संपन्न हुई थी। इस जनसुनवाई के बारे में भी जिला प्रशासन ने उस वक्त मौन साध रखा था। जिला प्रशासन ने किन उद्देश्य या दबाव में मौन साधा था यह तो वह ही जाने किन्तु आनन फानन में जनसुनवाई महज औपचारिकता को पूरा करने के उद्देश्य से ही की गई दिख रही थी। इस जनसुनवाई का निचोड़ क्या निकलकर आया इस मामले में भी जिला प्रशासन ने चुप्पी ही साध ली थी।

देश की मशहूर कंपनी थापर ग्रुप के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा घंसौर में बारह सौ मेगावाट के कोयला आधारित पावर प्लांट के पहले चरण में छः सौ मेगावाट का पावर प्लांट लगाए जाने के मसले में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का अतिसहयोगात्मक रवैया संदेहास्पद इसलिए माना जा रहा है क्योंकि कंपनी के संचालक कांग्रेस की चौखटों को चूमते नजर आते हैं।

(क्रमशः जारी)

एसपीजी ने बनाई सरकार से दूरी


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 22

एसपीजी ने बनाई सरकार से दूरी

सोनिया की यात्राएं गुप्त रख रही हैं सुरक्षा एजेंसी

बिना सुरक्षा कवच करतीं हैं सोनिया विदेश यात्राएं!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अति विशिष्ट का दर्जा पा चुकीं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की सुरक्षा में लगी स्पेशल प्रोटेक्श ग्रुप (एसपीजी) ने भी अब मनमोहन सरकार से आंख मिचौली खेलना आरंभ कर दिया है। सरकार से तनख्वाह पाने वाले एसपीजी के अधिकारियों ने सोनिया गांधी के देश विदेश के भ्रमण के बारे में सरकार को जानकारी देना बंद कर दिया है। मजे की बात तो यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय से यात्रा देयक और दैनिक अग्रिम (टीए, डीए) पाने वाले ये अफसरान आखिर कहां का भ्रमण बताकर सरकार की आंख में धूल झोंक रहे हैं।

हाल ही में यह मामला तब उजागर हुआ जब कांग्रेस की राजमाता और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के बारे में सूचना के अधिकार में जानकारी चाही गई। जानकारी में यह पता लगाने का प्रयास किया गया था कि सोनिया गांधी पर उनके विदेश दौरों में पिछले दो सालों में सरकार ने कितना खर्च किया। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में माहिती संबंधी यह पत्र लंबे समय तक जानकारी के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय, सांख्यिकी तथा कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और अंत में प्रधानमंत्री कार्यालय की सीढ़ियां चढ़ने उतरने के बाद हांफकर वापस आ गया।

किसी के पास भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं के बारे में जानकारी नहीं है। यह बात तभी संभव हो सकती है जब विदेश यात्राओं के दौरान सोनिया गांधी अपने सुरक्षा कवच यानी एसपीजी के घेरे में न रहें। अगर सोनिया गांधी के साथ एसपीजी के अधिकारी जाते हैं तो निश्चित तौर पर वे अधिकारी केंद्रीय ग्रह मंत्रालय से यात्रा और दैनिक भत्ते अवश्य ही लेते होंगे। इन परिस्थिति में एसपीजी के अधिकारियों द्वारा देयक में साफ तौर पर उल्लेखित किया जाता होगा कि वे श्रीमति सोनिया गांधी के सुरक्षा कवच बनकर विदेश गए थे।

(क्रमशः जारी)

आरटीओ को जेब में रखने का ‘आईडिया‘


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  18

आरटीओ को जेब में रखने का आईडिया

नंबर प्लेट पर पंजीयन के बजाए आईडिया के चिपके हैं स्टीकर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मशहूर उद्योगपति आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी आईडिया सेल्यूलर के कारिंदों ने परिवहन और यातायात पुलिस को जेब में रखने का नया आईडिया निकाला है। देश भर में अनेक जिलों में आईडिया के सेल प्रमोशन के चलते दो पहिया वाहनों पर आईडिया के कर्मचारी नंबर प्लेट पर आईडिया के स्टीकर लगाकर यातायात नियमों का सरेआम माखौल उड़ाते नजर आ रहे हैं।

मनमानी और उपभोक्ताओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने के लिए मशहूर आईडिया सेल्युलर के जिलों में पदस्थ टीम मैनेजर्स पर कंपनी ने सिम बेचने का भारी भरकम टारगेट फिक्स किया हुआ है। आरोपित है कि टीम मैनेजर्स द्वारा ग्राहकों को लुभाने के लिए आकर्षक मनगढंत स्कीम के माध्यम से ग्राहकों को लुभाकर अपने जाल में फंसाया जाता है। बाद में जब ग्राहक स्कीम के तहत सेवाएं चाहता है तब आईडिया के कारिंदे उसे इधर उधर झूला ही झुलाते नजर आते हैं।

आईडिया के जिलों में तैनात कर्मचारियों ने परिवहन विभाग और यातायाप पुलिस की आंखों में भी धूल झोंकने का काम किया जा रहा है। आईडिया के अधिकांश कर्मचारियों की निजी दो पहिया वाहनों पर भी नंबर प्लेट पर आईडिया का ही स्टीकर चस्पा मिलता है। एक सुधि पाठक ने मध्य प्रदेश से एक तस्वीर भेजी है जिसमें नंबर प्लेट के स्थान पर आईडिया का स्टीकर साफ दिखाई पड़ रहा है।

(क्रमशः जारी)