रविवार, 12 दिसंबर 2010

महाधिवेशन के उपरांत फेटेंगी सोनिया अपने पत्ते

अपेक्षाकृत जवान दिखेगी सोनिया की टीम

राहुल इफेक्ट साफ झलकेगा कांग्रेस कार्यसमिति में
 
महिला आरक्षण लागू हो सकता है कार्यकारिणी में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अब नए क्लेवर में सजने वाली है। इसकी विशेषता यह होगी कि सोनिया गांधी अपनी टीम में युवाओं को ज्यादा तरजीह देने वाली हैं। कांग्रेस के 83 वें अधिवेशन के उपरांत अखिल भारतीय राष्ट्रीय  कांग्रेस का पुर्नगठन प्रस्तावित है। कांग्रेस की नई कार्यकारिणी में महिलाओं की भागीदारी 33 फीसदी सुनिश्चित होने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं।
 
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने अपनी नई टीम के संभावित नामों पर उन्होंने अपने राजनैतिक सचिव अहदम पटेल, महासचिव दिग्विजय सिंह के साथ ही साथ अपने पुत्र और महासचिव राहुल गांधी से रायशुमारी के अनेक चरण पूरे कर लिए हैं।
 
सूत्रों का कहना है कि बिहार में हाल ही में खराब प्रदर्शन के उपरांत एआईसीसी में परिवर्तन की जरूरत महसूस की जा रही थी। सोनिया नई कार्यकारिणी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत भी कड़ाई से लागू कर सकती हैं। जिससे कांग्रेस के संगठन और सत्ता में हिस्सेदारी रखने वालों को एक पद गंवाना पड़ सकता है।
 
चार साल पहले गठित कर्यकारिणी में राहुल गांधी, मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन के अलावा अलका लांबा और जितेंद्र सिंह अवतार सिंह भड़ाना, सांसद निर्मल खत्री, संजय बाफना, विवेक बंसल जैसे युवाओं को सोनिया ने अपनी कार्यकारिणी में स्थान दिया था।
 
भले ही संसद में सोनिया गांधी द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को परवान न चढ़वाया जा सका हो, किन्तु 24 अकबर रोड़ में महिलाओं की तेंतीस फीसदी भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। सूत्रों ने संकेत दिए कि महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देन के मसले पर सोनिया गांधी बहुत ज्यादा संजीदा हैं। वर्तमान में कार्यसमिति में महिलाओं की भागीदारी महज 15 फीसदी है, साथ ही मारग्रेट अल्वा के उत्तराखण्ड के राज्यपाल बनने के बाद अब सांसद मोहसीना किदवई ही अकेली महिला महासचिव बचीं हैं।
 इन पर हो सकती हैं नजरें इनायत

महाधिवेशन के उपरांत जब सोनिया अपनी नई कार्यकारिणी का गठन करेंगी तब उसमें एमडीएमके अध्यक्ष वाईको को धूल चटाने वाले माणिक टैगोर, विजंेद्र सिंगला, कृष्णा बेरे को सचिव पद से नवाजा जा सकता है। इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सांसद पुत्र संदीप दीक्षित और पश्चिम बंगाल के सांसद मौसम नूर की लाटरी भी खुल सकती है।
इन पर गिर सकती है गाज

सत्ता और संगठन की मलाई चखने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, व्ही.नारायणसामी, वीरप्पा मोईली, ए.के.अंटोनी, जयराम रमेश जैसे दिग्गजों को सरकार या संगठन में से एक पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

महाधिवेशन के बहाने साधेंगे अर्जुन को

अर्जुन को साधने की कोशिश में कांग्रेस
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की राजनीति के गुजरे जमाने के चाणक्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह के तेवरों को भांपते हुए कांग्रेस के रणनीतिकारों ने उन्हें साधने की कवायद आरंभ कर दी है। लगभग डेढ़ बरस से गुमनामी के अंधेरे में जी रहे अर्जुन सिंह को अचानक ही कांग्रेस ने तवज्जो देना आरंभ कर दिया है। प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में बनी 22 सदस्यीय समिति में अर्जुन सिंह को स्थान दिए जाने से कांग्रेस की सियासत तेज हो गई है। गौरतलब होगा कि संप्रग के दूसरे कार्यकाल में बिना किसी ठोस कारण के ही सिंह को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद से अर्जुन सिंह अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। यद्यपि सिंह ने खामोशी अख्तियार कर रखी थी, फिर भी कांग्रेस के आला नेताओं को उनकी खामोशी भी बुरी तरह खल रही थी।
 
घपले घोटालों से चौतरफा घिरी कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की भद्द पिटने के कारणों की खोज भी कांग्रेस के मैनेजरों द्वारा आरंभ कर दी गई है। 18 दिसंबर से दिल्ली के बुराड़ी स्थित संत निरंकारी समागम स्थल पर कांग्रेस के 83वंे अधिवेशन के लिए राजनैतिक, आर्थिक और विशेष नीति के प्रस्तावों के लिए जो समिति बनाई गई है, उसमें कुंवर अर्जुन सिंह के अलावा गृह मंत्री पी.चिदम्बरम, महासचिव राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह आदि को शािमल किया गया है।
 
कांग्रेस के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों अचानक ही अर्जुन सिंह की बढ़ी सक्रियता ने कांग्रेस आलाकमान का ध्यान आकषित किया था। माना जा रहा है कि संप्रग की दूसरी पारी में जिस तरह से एकाएक घोटाले दर घोटाले सामने आ रहे हैं, उसे देखकर आशंका जताई जा रही है कि इसके पीछे कांग्रेस के ही किसी दिग्गज का दिमाग काम कर रहा है।
 
वैसे भी बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस के लिए ट्रबल शूटर की भूमिका ही अदा की है। जब भी कांग्रेस पर कोई संकट आया है, अर्जुन सिंह ने बड़ी ही चतुराई के साथ संकट को टलवा दिया है। उमर दराज हो चुके सिंह आज भी कूटनितिक चालों के लिए विख्यात हैं।

कांग्रेस मुख्यालय में चल रही चर्चाओं के अनुसार इस तीन दिवसीय महाधिवेशन के बहाने ही कांग्रेस द्वारा बलात दरकिनार किए गए वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह को साधने का प्रयास किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अर्जुन सिंह के तेवरों को शांत करने के लिए कांग्रेस के ताकतवर महासचिव एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पाबंद किया गया है? ताकि उनके अनुभवों का लाभ लेकर चौतरफा घिरी कांग्रेस वर्तमान संकटों से निजात पा सके।

स्वास्थ्य मंत्रालय की अनदेखी पर नजरें तरेरीं सीएजी ने

एमपी के पांच मेडीकल कालेज में अनियमितताएं पाईं सीएजी ने

 एमसीआई ने मंत्रालय से की थी मान्यता समाप्ति की अनुशंसा

 आजाद को आड़े हाथों लिया कैग ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारत के नियंत्रक लेखा महापरीक्षक ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की लाल फीताशाही पर तल्खनाराजगी जाहिर की है। आज सीएजी भवन के नरहरि राव कांफ्रेंस हाल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुएसीएजी के अधिकारियों ने हेल्थ मिनिस्ट्री की जमकर खिचाई की। सीएजी द्वारा वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 कीवीं आडिट रिपोर्ट आज जारी की, जिसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, ग्रामीण विकास विभाग, वस्त्र एवंरेशम विभाग तथा ब्रम्हपुत्र परियोजना के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई गई। 22

सीएजी के प्रतिवेदन में मध्य प्रदेश के स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पांच पांच आर्युविज्ञान महाविद्यालयोंमें अनियमितताओं का अंबार पाया गया है। मध्य प्रदेश के रीवा के श्याम शाह आर्युविज्ञान महाविद्यालय, जबलपुर के श्याम शाह आर्युविज्ञान महाविधालय, ग्वालियर के गिरजा राजा आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, इंदौरके एमजीएम मेडीकल कालेज और राजधानी भोपाल के गांधी मेडिकल कालेज के स्नातक और स्नातकोत्तरस्तर पर कैग ने अनियमितताएं पाईं। मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने मध्य प्रदेश के पांच सरकारी मेडीकलकालेज की संबद्धता समाप्त करने की अनुशंसा अनेकों मर्तबा किए जाने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आधेअधूरे कालेज से ही नीम हकीमों को उत्पादित किया जा रहा है।

केग के प्रतिवेदन में स्पष्ट है कि स्नातक स्तर तक इन महाविद्यालयों में रेजीडेंट और टीचिंग फेकल्टीज कीकमी, अस्पताल का घटिया प्रबंधन और खराब स्वास्थ्य सुविधाएं, अपर्याप्त नर्सिंग और पेरामेडीकल स्टाफ केसाथ ही साथ बिस्तरों की संख्या भी निर्धारित से कम पाई गईं हैं। (स्नातकोत्तर स्तर के लिए बाक्स देखें।) इसकेअलावा मध्य प्रदेश के इन सभी सरकारी कालेज में आईएमसी द्वारा स्नातकोत्तर स्तर पर साठ कोर्स आरंभकरवाने हेतु आग्रह किया था, जो अब तक लंबित ही है।

संवाददाताओं से रूबरू सीएजी ने कहा कि कैग के अधिकारियों के बार बार पत्र व्यवहार के बावजूद भी स्वास्थ्यमंत्रालय द्वारा उसके जवाब न दे पाने से सीएजी का प्रतिवेदन विलंब से आया है, अगर हेल्थ मिनिस्ट्री ने समयपर जवाब दे दिया होता तो यह प्रतिवेदन संसद के शीतकालीन सत्र के बजाए मानसून सत्र में ही सदन के पटलपर रख दिया गया होता।

उन्होंने कहा कि सीएजी ने मिनिस्ट्री से इस साल जनवरी में ही कह दिया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफइंडिया (एमसीआई) का गठन कर लें ताकि व्यवस्था को सुचारू तौर पर चलाया जा सके, किन्तु मंत्रालय ने कैगकी एक न सुनी। कैग का कहना था कि मिनिस्ट्री ने एमसीआई को बनाया है, और एमसीआई मंत्रालय से बड़ीनहीं है।

कैग के अधिकारियों का कहना था कि सामान्यतः कैग द्वारा अपने प्रतिवेदन में किसी प्रकार की टिप्पणी नहींकी जाती है, किन्तु यह पहला मौका होगा जब कैग को स्वास्थ्य मंत्रालय के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करनीपड़ रही हो। बार बार पत्र व्यवहार पर मिनिस्ट्री द्वारा कोई रिस्पांस न दिया जाना आश्चर्यजनक ही है।

 63 फीसदी मेडीकल कालेज में अनियमितताएं

कैग द्वारा निरीक्षण किए गए 299 में से 188 मेडिकल कालेज में अनियमितताएं पाई गईं। ये अनियमितताएंआधारभूत संरचनाओं की नहीं थीं, क्योंकि निरीक्षण इस आधार पर नहीं किया गया था। इसके पीछे सबसे बड़ाकारण यह था कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने सीएजी को जरूरी प्रपत्र उपलब्ध ही नहीं कराए गए।

बाक्स
कालेज                                         निरीक्षण की तिथि                अध्यापकों की कमी   रेजीडेंटस कीकमी
एनएससीबएमसी, जबलपुर     नवंबर 2006                                    31.70                      30.10
एसएसएमसी,रीवा                   नवंबर 2006                                    63                           31
जीआरएमसी, ग्वालियर       नवंबर 2006                                    28.80                        25.80
एमजीएमएमसी, इंदौर          नवंबर 2006                                    27.85                       29.56
जीएमसी, भोपाल                नवंबर 2006                                       40                           25.80

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कांग्रेस के चाणक्‍य चला सकते हैं जहर बुझे तीर

अमेरिका के पेटर्न पर क्यों नहीं चलती भारत सरकार

वाराणसी हादसा: आस्था और विश्वास पर हमला
(लिमटी खरे)

आस्था के केंद्र वाराणसी में मंगलवार को हुए बम हादसे ने कुछ दिनों की खामोशी को तोड़ दिया है। बनारस में जो कुछ भी हुआ वह इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है कि रियाया की सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारें कितनी संजीदा हैं। 24 सितम्बर को जब अयोध्या का फैसला आया तब समूचे देश में रेड अलर्ट था और सुरक्षा एजेंसियों की चाक चोबंद कवायद के चलते सब कुछ शांति के साथ ही बीत गया। इसके उपरांत 06 दिसंबर को भी पुलिस ने पूरी मुस्तैदी दिखाई। लगता है कि इस तरह सब कुछ शांति पूर्वक होने के कारण हमारी सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह बेफिक्र हो गई थीं।
 
पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां, खुफिया एजेंसियां सोती रहीं और इंडियन मुजाहिदीन नाम के एक आतंकवादी संगठन ने वाराणसी के शीतला घाट पर अपने कुकृत्य को अंजाम दे दिया गया। पिछले पांच सालों में आस्था की नगरी वाराणसी में यह चौथा हमला है। पांच बरस में तीन बार अगर कोई नराधम आकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे जाए तो समझ लेना चाहिए कि खामी हमारे तंत्र में ही है। सरकार इस बात को लेकर संतोष जता सकती है कि इस बार के हादसे में मरने वालों की तादाद ज्यादा नहीं है, पर सरकार में बैठे जनता के चुने हुए नुमाईंदो को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस परिवार का एक भी सदस्य जाता है, उसकी दुनिया तो तहस नहस ही हो जाती है।
 
यह तो बनारस की गंगा जमुनी तहबीज का असर रहा कि इस सबके बाद भी आपसी वेमनस्यता नहीं फैल सकी, वरना आतंकवादियों का तो यही प्रयास रहा है कि हिन्दु मुस्लिम आपस में रक्त रंजित क्रांति का आगाज कर दें। इस बार भी मंगलवार का दिन चुना गया। सतातनपंथियों में मंगलवार का विशेष महत्व होता है। इसके पहले बनारस में मंगलवार 07 मार्च 2006 और जयपुर में मंगलवार 13 मई 2008 को हनुमान मंदिर में धमाके हुए थे। वैसे भी इस तरह के नापाका कामों को जब भी अंजाम दिया गया है, इतिहास साक्षी है कि मंगलवार को मंदिर, जुम्मे के दिन मस्जिद और शनिवार को बाजारों को अपना निशाना बनाया गया है। इसके पीछे आपसी वेमनस्य को ही बढ़ाना प्रमुख कारण हो सकता है। हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर की दरगाह, दिल्ली की जामा मस्जिद, मालेगांव की नूरानी मस्जिद में आतंकवादियों ने हमले के लिए शुक्रवार का दिन चुना था। इसी प्रकार पुणे की जर्मन बेकरी, दिल्ली के पहाड़गंज, महरोली, सरोजनी नगर मार्केट आदि में हुए धमाकों का दिन शनिवार रहा।
 
इस तरह के हमलों से रियाया और शासकों के बीच के विश्वास की पतली डोर टूटने लगती है। आम जनता को लगने लगता है कि शासक उसके अमन चैन के प्रति बहुत ज्यादा फिकरमंद नहीं हैं। गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम खुद भी घटनास्थल पर गए, जिससे इस मामले में केंद्र की गंभीरता उजागर होती है, किन्तु वहां उनके द्वारा दिए गए बयान गैरजरूरी थे। चिदम्बरम के बयानों से सभी का ध्यान आतंकवाद के बजाए केंद्र और राज्य के बीच चल रही रस्साकशी की ओर चला गया। इस तरह की हरकत करके चिदम्बरम ने बनारस जाने के अपने मूल मंसूबे पर पानी ही फेर दिया।
 
इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र के बीच जिस तरह का जबानी जमाखर्च आरंभ हुआ है, वह निंदनीय ही कहा जाएगा। खुफिया जानकारी को लेकर दोनों ही सरकारें एक दूसरे को कटघरे में खडा करने से नहीं चूक रही हैं। राज्य और केंद्र के बीच समन्वय का अभाव जिस तरह से मीडिया के द्वारा परोसा जा रहा है, उससे तो आतंकवादियों के हौसले और अधिक बुलंदियों पर पहुंच सकते हैं। एक दूसरे पर दोषारोपण से हिन्दुस्तान की जगहसाई ही हो रही है।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि आतंक के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का आव्हान करने वाले जनसेवक जब सत्ता की मलाई चखते हैं तब वे आतंक के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन करने के बजाए एक दूसरे पर ही कीचड़ उछालने में व्यस्त रहते हैं। देश के आखिरी आदमी को सुरक्षा मुहैया कराना, ताकि वह निर्भय होकर आजादी के साथ सांसे ले सके, भारत गणराज्य और सूबों की सरकारों की पहली प्राथमिकता है। वस्तुतः सत्ता या विपक्ष में बैठे जनसेवक अपने और अपने परिजनों के लिए तो चाक चौबंद सुरक्षा तंत्र का आवरण ओढ़ लेते हैं, किन्तु जब आम जनता की बारी आती है तो इन जनसेवकों की प्राथमिकता बदल जाती है।
 
देखा जाए तो भारत गणराज्य में केंद्र हो या राज्य, हर मामले में पुलिस पूरी तरह से अप्रशिक्षित और अपर्याप्त मात्रा में है। पुलिस हो या अर्धसैनिक बल, इन सभी के लिए अलग अलग पैमाने गढ़े गए हैं। यही कारण है चाहे सीमा पर जवान लड़ते हों या फिर देश के अंदर आतंकवादी अलगाववादी आदि से, हर मोर्चे पर इनको विजय पताका फहराने में संदेह ही रहता है। गुप्तचर सेवाओं में भी अहं की लड़ाई साफ परिलक्षित होती है, यही कारण है कि गुप्तचर सेवाओं में तालमेल का अभाव बना रहता है।
 
भारत की न्यायिक व्यवस्था में आतंकवादियों को सजा दिलवाने में भी काफी लंबा अरसा लग ही जाता है। हर मसले मंे आंख बंद करके दुनिया के चौधरी अमेरिका का अनुसरण करने को अपना गौरव समझने वाले देश के जनसेवक आतंकवाद के मामले में अमेरिका का तरीका अपनाने से क्यों बचते हैं, यह बात समझ से परे ही है। हमें सोचना ही होगा कि आखिर क्या कारण है कि 09/11 के उपरांत अमेरिका में किसी ने आतंक बरपाने का दुस्साहस नहीं किया? क्या कारण है कि अमेरिका जाने वाले पर्याटक या अन्य लोगों को कड़ी जांच से गुजरना होता है? वहीं देश में एक के बाद एक आतंकवादी हमलों को इस तरह की नापाक ताकतें अंजाम देती जा रही हैं और देश में अमन चैन बरकरार रखने का वादा करने वाली सरकारें आंख बंद कर चुपचाप एक के बाद एक हादसों के लिए उपजाउ माहौल तैयार ही करवाती जा रहीं हैं।

बिहार के नतीजों ने उड़ाई आलाकमान की नींद

फिसल रहा है कांग्रेस के हाथों से अल्पसंख्यक वोट बैंक 
मोदी कार्ड खेलकर भाजपा ने अपनी झोली में डाले मुस्लिम वोट
 
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। बिहार के नतीजों पर मनन के बाद कांग्रेस के आला नेताओं की नींद बुरी तरह उड़ी हुई है। नेताओं का मानना है कि एक समय से कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा ‘‘अल्पसंख्यक‘‘ अब उससे विमुख होता जा रहा है। अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय के फैसले से भी मुस्लिम कांग्रेस से खासे नाराज ही बताए जा रहे हैं। कांग्रेस को यह बात भली भांति समझ में आ गई है कि बिहार में कांग्रेस के औंधे मुंह गिरने का एक बड़ा कारण मुसलमानों द्वारा कांग्रेस को वोट न देना ही है।
गौरतलब होगा कि बिहार में कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को लुभाने की गरज से 47 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, बिहार में जीते चार में से तीन विधायक मुस्लिम हैं। कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेता भी दबे स्वर से कांग्रेस आलाकमान की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाने लगे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि अयोध्या मामले में फैसला आने पर कांग्रेस का रूख और रवैया अल्पसंख्यकों को कतई नहीं भाया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के रणनीतिकारों को इस बारे में सोचना आवश्यक है कि आखिर क्या वजह है कि मुसलमान कांग्रेस से दूर होकर अन्य क्षेत्रीय दलों की ओर बढ रहे हैं। उन्होने आगे कहा कि आत्म मुग्ध कांग्रेस अध्यक्ष को चाहिए कि इस बारे में चिंतन अवश्य ही करें कि अल्पसंख्यक वर्ग के मेहबूब अली केसर को बिहार का अध्यक्ष बनाने और सबसे अधिक मुसलमानों को टिकिट देने के बावजूद भी कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक क्यों रहा?
 
राहुल को लेकर चिंता

कांग्रेस के राजनैतिक प्रबंधक इस बात को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं कि अगर यही आलम रहा तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में होने वाले चुनावों में कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है। राहुल गांधी को महिमा मण्डित कर यूथ आईकान के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कांग्रेस की योजना पर मध्य प्रदेश और बिहार के नतीजों के बाद पानी फिरता लग रहा है। ज्ञातव्य है कि राहुल गांधी इन दोनों ही सूबों में जहां जहां चुनाव प्रचार को गए अधिकांश स्थानों पर कांग्रेस को पराजय का ही सामना करना पड़ा।
 
अहमद पटेल की पूछ परख बढेगी
 
कांग्रेस की मुट्ठी से मुस्लिम वोट बैंक रेत के मानिंद फिसलने से कांग्रेस के प्रबंधक सकते में हैं। कांग्रेस को भय सता रहा है कि अगर जल्द ही कोई ठोस कार्ययोजना को अंजाम नहीं दिया गया तो आने वाले समय में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचेगा। एसी परिस्थिति में अब कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की पूछ परख बढ़ने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं।

 मोदी कार्ड खेला राजग ने
 
बिहार चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने नरेंद्र मोदी के नाम का बखूबी इस्तेमाल किया है। कट्टर हिन्दूवादी छवि बना चुके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और जनता दल यूनाईटेड ने न केवल बिहार में घुसने से रोका वरन् इसका प्रोपोगंडा भी तबियत से किया। मुख्यमंत्री नितिश कुमार द्वारा नरेंद्र मोदी का घोर विरोध जताकर मीडिया के माध्यम से मोदी को बिहार की घरती में न घुसने की बात सार्वजनिक तौर पर कही गई थी। कांग्रेस का मानना है कि राजग के इस कदम से जदयू को खासा फायदा हुआ और बिहार में पिछली बार से अधिक संख्या में उसके विधायक चुनकर आए हैं।

अर्जुन सिंह कर सकते हैं धमाका

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

पहली बार घुमाया सीबीएसई ने जबर्दस्त डंडा

व्यवसाय बन चुकी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद
 
सीबीएसई की सख्ती से शाला संचालक सक्ते में
 
(लिमटी खरे)

पालकों और विद्यार्थियों को आकर्षित करने की गरज से निजी शालाओं के संचालकों की यही तमन्ना होती है कि वे किसी भी तरह से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की संबद्धता (एफीलेशन) प्राप्त कर लें। ‘साम, दाम, दण्ड और भेद‘ की नीति अपनाकर निजी शालाओं के संचालक अपनी जुगत में कामयाब भी हो जाते हैं किन्तु उसके बाद विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने की दिशा में शाला संचालक कोताही बरतते आए हैं। सीबीएसई का रवैया भी बेहद ढुलमुल ही रहा है। शालाओं के निरीक्षण की औपचारिकताएं कागजों पर ही निभा दी जाती रही हैं।
 
हाल ही में सीबीएसई के अध्यक्ष और भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी विनीत जैन ने सीबीएसई से संबद्ध शालाओं की मश्कें कसना आरंभ किया है। निजी शालाओं में विद्यार्थियों से मनमानी फीस लेने पर सीबीएसई को आपत्ति है, सीबीएसई ने नया सर्कुलर जारी कर कहा है कि फीस के मामले में अब शालाएं मनमाना रवैया नहीं अपना सकती हैं। कोई भी शाला किसी भी तरह की केपीटेशन फीस या पालकों से एच्छिक डोनेशन भी नहीं ले सकती हैं। सीबीएसई का कहना है कि अगर कोई विद्यार्थी बीच सत्र में शाला छोड़कर जाता है तो शाला प्रबंधन को उसकी बाकी फीस को हर हाल में वापस करना ही होगा।
 
राईट टू एजूकेशन में एक कक्षा में बच्चों की संख्या 35 निर्धारित की गई है, फिर भी सीबीएसई ने इस संख्या को चालीस से अधिक होने पर एतराज जताया है। बोर्ड ने शिक्षा के स्तर में सुधार की गरज से कंटिन्यूअस एण्ड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन स्कीम (सीसीई) लागू की गई है। इसमें पढ़ाई में किताबों के अलावा एक्सट्रा केरिकुलर एक्टीविटीज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, किन्तु एक कक्षा में छात्रों की संख्या अधिक होने पर इस योजना को शायद ही अमली जामा पहनाया जा सके। इन गतिविधियों के तहत  आर्ट, डांस, म्यूजिक आदि के मामले में भी शाला को ध्यान देना होगा। इसके लिए प्रथक से क्लास रूम की व्यवस्था भी शाला को ही सुनिश्चित करनी होगी। हर शाला को एक खेल का कालखण्ड रखना भी अनिवार्य होगा, इसके लिए शाला के पास खेल का मैदान होना भी अनिवार्य किया गया है।
 
सीबीएसई का कहना है कि दाखिला प्रक्रिया भी पूरी तरह से पारदर्शी होना चाहिए। फीस बढ़ाने के मामले में सीबीएसई का तर्क है कि कोई भी शाला अगर शैक्षणिक शुल्क में बढ़ोत्तरी करती है, तो वह पालकों को विश्वास में लेकर ही किया जाए, अन्यथा शिकायत होने पर शाला प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही हो सकती है।
 
इसके साथ ही साथ केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा भी निर्देश जारी किए गए हैं कि शालाओं में पूरी पारदर्शिता अपनाई जाए। इसके लिए आयोग का कहना है कि हर शाला की अपनी एक वेव साईट होना आवश्यक है। इस वेव साईट में शाला का सीबीएसई एफीलेशन स्टेटस, आधारभूत अधोसंरचना (इंफ्रास्टक्चर), शिक्षकों के नाम, पद, उनकी शैक्षणिक योग्यताएं, प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, शाला का ईमेल आईडी, शाला प्रबंधन समिति के सदस्यों का विवरण, शाला का दूरभाष नंबर वेव साईट पर होना आवश्यक है। इसके साथ शाला को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह वेव साईट लगातार अद्यतन (अपडेट) की जाए, ताकि अभिभावकों को सारी जानकारियां मिल सकें।
 
सीबीएसई के दिशा निर्देशों में साफ किया गया है कि प्रत्येक शाला को अपना वार्षिक प्रतिवेदन भी वेव साईट पर डालना अनिवार्य होगा। इस प्रतिवेदन के साथ शाला को अपने इंफ्रास्टक्चर के अलावा वार्षिक गतिविधियां, रिजल्ट आदि को भी अद्यतन किया जाना अनिवार्य किया गया है। सीबीएसई के मान्यता प्राप्त स्कूलों के पास प्राणी विज्ञान, रसायन शास्त्र, भौतिकी विज्ञान, गणित एवं कम्पयूटर की प्रयोगशाला को अनिवार्य किया गया है।
 
सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इन नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। इसके लिए सीबीएसई बोर्ड के निरीक्षण दल समय समय पर जाकर शालाओं का निरीक्षण करेंगे और बच्चों की संख्या निर्धारित से अधिक पाए जाने पर या पारदर्शिता का अभाव मिलने पर कठोर कार्यवाही भी करने का प्रावधान किया जा रहा है।
 
सीबीएसई के अध्यक्ष विनीत जैन के कदमों का स्वागत किया जाना चाहिए, कि उन्होंने व्यवसाय का रूप अख्तिायर कर चुकी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद आरंभ की है। वैसे देखा जाए तो यह जिम्मेदारी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की है। कहने को शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया गया है, किन्तु इसे अमली जामा पहनाने की जब बारी आती है तो मानव संसाधन और विकास मंत्रालय अपने हाथ खड़े कर देता है।
 
केंद्रीय विद्यालय संगठन के बोर्ड ऑफ गवर्नर की अनुशंसा के आधार पर 1988 में तत्कालीन सांसद चंदू लाल चंद्राकर की अध्यक्षता में बनी समिति जिसने दाखिला के तौर तरीकों को बदलने के लिए अपनी सिफारिशें दी थीं। विडम्बना देखिए कि चंद्राकर समिति का वह प्रतिवेदन ही गायब हो चुका है। 21 साल बाद रिपोर्ट खोजने की मुहिम में लगा है मानव संसाधन विकास मंत्रालय! यह बात भी तब प्रकाश में आई जब संसद की आश्वासन समिति ने जनवरी 2009 में इसे लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को फटकार लगाई थी। गौरतलब होगा कि 1992 में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह ने सदन में इस समिति की रिपोर्ट को लागू करने का आश्वासन भी दिया था। अर्जुन सिंह ने उस वक्त कहा था कि चंद्राकर कमेटी अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप चुकी है।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि शिक्षकों की व्यवस्था के लिए राज्य सरकारें अतिरिक्त धन की मांग करती हैं। मतलब साफ है कि सूबों की सरकारों को पता है कि उनके राज्यों में अशिक्षा का अंधेरा इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के समाप्त होने के बाद भी पसरा हुआ है। उस अंधेरे को दूर करने की दिशा में राज्य सरकारों द्वारा कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाना भी आश्चर्य का ही विषय माना जाएगा।
 
शिक्षा के अधिकार कानून में गरीब गुरबों के बच्चों को शिक्षा मुहैया करवाने की शर्त अवश्य ही रखी गई है, किन्तु किसी में इतना साहस नहीं है कि वह फाईव स्टार से लेकर विलासिता वाली संस्कृति वाली शालाओं के संचालकों की कालर पकड़कर उन्हें गरीब बच्चों को शाला में दाखिला दिलाने की घुड़की दे सकें। नर्सरी में दाखिले के लिए भी सरकार ने साफ किया है कि निजी स्कूलों को यह बाध्यता है कि वे गरीब बच्चों को 25 फीसदी स्थान अवश्य ही दें। विडम्बना ही कही जाएगी कि कानून बनने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों के सामने शालाओं को दुकान और प्रतिष्ठान की तरह बनाने वाले शाला संचालक इसकी सरेआम धज्जियां ही उड़ा रहे हैं।
 
इस बात की आशंका भी जताई जा रही थी कि अगर दबाव में आकर शाला संचालक इस 25 फीसदी कोटा सिस्टम को लागू भी कर देते हैं तो वे मनमानी फीस बढ़ोत्तरी के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे। सीबीएसई के अध्यक्ष विनीत जैन की कड़ाई से इन दुकानदार शिक्षण संस्थाओं के संचालकों का मुगालता अवश्य ही टूटा होगा।
 
 इस साल के आरंभ में केंद्रीय विद्यालय संगठन ने बच्चों के बस्तों का बोझ कम करने का फैसला लिया था। संगठन ने अपने समस्त केंद्रीय विद्यालयों को ताकीद किया था कि बच्चों के बस्ते के बोझ को किसी भी कीमत पर कम करना होगा। इसके लिए टाईम टेबल इस तरह का तैयार करने पर बल दिया गया था जिससे बच्चे कम किताबें लेकर शाला जाएं। केवीएस का यह फैसला भी पहले के उन फैसलों की तरह ही ढेर हो गया जिनमें कहा गया था कि बच्चों को होमवर्क और बस्ते के बोझ से मुक्त कराया जाएगा। आज भी केंद्रीय विद्यालय में प्राथमिक कक्षा के बच्चे दस से पंद्रह किलो का बस्ता लादे शाला के मुख्य द्वार से आधे किलोमीटर की कसरत करते मिल जाते हैं।
 
यह सच है कि बच्चा अपने पाठ्यक्रम (सिलेबस) को कड़वी कुनैन की गोली की तरह ही निगलता है। वस्तुतः बच्चों को कम उम्र में किताबी ज्ञान देकर हम उन्हें मशीनी बना रहे हैं। इससे बच्चों का स्वाभाविक विकास अवरूद्ध हुए बिना नहीं है। यह पद्यति दरअसल बच्चों के आंतरिक गुणों के विकास करने के स्वाभाविक माहौल को तैयार करने के बजाए उनके उपर सूचनाओं का बड़ा सा पहाड़ लाद देती हैं। पढ़ाई बच्चों के लिए स्वाभाविक और मनोरंजक बनने के बजाए एक लाईबिलटी और मुश्किल कवायद में तब्दील हो जाती है। आज की युवा पीढ़ी देश के स्वतंत्रता संग्राम और अन्य इतिहास को विस्मिृत ही कर चुकी है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि बच्चों के सिलेबस के अध्याय कम करके उन्हें व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा प्रदाय की जाए।

बढ़ने लगी है अर्जुन सिंह के घर की चहल पहल

जल्द ही कोई धमाका कर सकते हैं कुंवर साहेब
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले कुंवर अर्जुन सिंह की चालों को समझ पाना किसी के बस की बात नहीं है। डॉ.मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में दूध में से मख्खी की तरह निकाल बाहर किए जाने के उपरांत पूर्व केंद्रीय मंत्री कंुवर अर्जुन सिंह लंबे अरसे से खामोश हैं। अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि उनकी यह खामोशी जल्द ही टूटने वाली है।
 
गौरतलब होगा कि इशारों ही इशारों में जहर बुझे तीर चलाकर अर्जुन सिंह को अपने विरोधियों का शमन करने में महारथ हासिल है। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्री मण्डल से बाहर कर दिया गया था। उस वक्त उम्मीद जताई जा रही थी कि वे कोई न कोई धमाका अवश्य ही करेंगे।
 
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अर्जुन सिंह को किनारे करने के लिए सारे जतन कर लिए। उनकी पुत्री वीणा सिंह को कांग्रेस की टिकिट नहीं दी गई। यहां तक कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में सीधी संसदीय क्षेत्र के चुनाव प्रचार में जाने के लिए उनके लिए निर्धारित विमान को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के एक करीबी गुजरात की यात्रा पर निकल गए, मजबूरी में अर्जुन सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से सतना पहुंचना पड़ा।
 
इसके उपरांत अर्जुन सिंह की पत्नि ने परोक्ष तौर पर कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी पर परोक्ष तौर पर आरोप लगाकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया था। इसी बीच उनके राज्यपाल बनने की खबरें राजनैतिक फिजां में तैर गईं थीं। अर्जुन सिंह से सोनिया गांधी की नाराजगी का आलम यह था कि सोनिया गांधी ने उन्हें अपने पारिवार अर्थात जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इस सबके बावजूद भी अर्जुन सिंह ने अपनी खामोशी नहीं तोड़ी।
 
अर्जुन सिंह के राजनैतिक तौर पर किनारे होने की आशंका को भांपकर उनके अनुयाईयों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढकर अपने आका बदल लिए। इसके बाद पिछले लगभग डेढ़ साल से अर्जुन सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में सन्नाटा ही पसरा हुआ है। पिछले दिनों वे जब मध्य प्रदेश की यात्रा पर गए तब पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था कि वे राजनैतिक जीवन के अर्जित अवकाश (अर्न लीव) का आनंद उठा रहे हैं।
 
अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद अब ‘दाउ साहेब‘ एक बार फिर सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि जल्द ही अर्जुन सिंह मीडिया से रूबरू होने वाले हैं, जिसमें वे घोटालों के कारण धूमिल होती कांग्रेस की छवि को ध्यान में रखकर समस्त मंत्रियों को यह भी मशविरा देने वाले हैं कि सभी अपने अपने त्यागपत्र सौंप दें, फिर नए सिरे से मंत्रीमण्डल का गठन किया जाए। इन खबरों में सच्चाई कितनी है यह बात तो कुंवर अर्जुन सिंह ही जानें किन्तु उनके आवास की बढ़ती चहल पहल से लगने लगा है कि जल्द ही कांग्रेस के गुजरे जमाने के चाणक्य की खामोशी टूटने वाली है।

ज्ञातव्य है कि डॉ.मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में एक के बाद एक घोटाले जिस तरह से सामने आ रहे हैं, वैसा अब तक किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में नहीं हुआ है। अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि 7, रेसकोर्स रोड़ (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की तमन्ना मन में रखने वाले दूसरी पंक्ति के नेताओं द्वारा एक के बाद एक स्केम को मीडिया के माध्यम से उजागर किया जा रहा है, ताकि मनमोहन सिंह की रूखसती के मार्ग प्रशस्त हो सकें।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इक्कीसवीं सदी का ‘लोकतंत्र‘ मतलब ‘हिटलरशाही‘

हिटलरशाही हो गए हैं भारत गणराज्य में लोकतंत्र के मायने

(लिमटी खरे)

आजादी के लगभग सवा छः दशकों बाद अब चुनिंदा लोग ही बचे होंगे जिन्हें वास्तव में पता होगा कि ब्रितानियों के जुल्मों को सहकर कितनी मशक्कत के उपरांत भारत ने आजादी हासिल की थी। कितने अरमान के साथ भारत गणराज्य की स्थापना की गई थी। क्या क्या सपने देखे थे, उस वक्त जवान होती पीढ़ी ने। उनकी कल्पनाओं को साकार करने के लिए सरकारों ने पूरे जतन से कोशिश की। आज तक की सरकारों की कोशिशें कितनी ईमानदार थीं, इस बारे में हालात देखकर ज्यादा कुछ कहना अतिश्योक्ति ही होगी। इक्कीसवीं सदी की कल्पना कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी ने कुछ और की थी, किन्तु उनके परिजनों की अगुआई में आगे बढ़ने वाली कांग्रेस ने इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी है। वर्तमान में ‘‘लोकतंत्र‘‘ के मायने ‘‘हिटलरशाही‘‘ हो गए हैं।

सवा सौ साल पुरानी और आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की छवि साफ, स्पष्ट, सच्चे और ईमानदार इंसान की है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु पिछले कुछ सालों मंे उनकी आखों के सामने जो भी घटा है, उसे देखकर उनकी छवि धूल धुसारित ही हुई है। घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद भी वे मूकदर्शक बने बैठे हैं। जब भी समाचार चेनल्स पर वजीरे आजम दिखाई देते हैं, आम आदमी के मानस पटल पर उनके निरीह और बेबस होने का भाव आ ही जाता है।

हाल ही में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के संवैधानिक पद पर पी.जे.थामस की नियुक्ति के उपरांत जो बवाल मचा है, वह थमता नहीं दिख रहा है। संसद लगातार ठप्प ही पड़ी हुई है। विपक्ष भी अपनी मांग पर अडिग ही है। 2004 के उपरांत पहला मौका होगा जब विपक्ष ने सशक्त भूमिका निभाई हो, हो भी क्यों न, आखिर किसी दागी के हाथ में खजाने की चाबी जो सौंपी जा रही है।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने मुख्य सतर्कता आयुक्त थामस को उनका पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी कर साफ कर दिया है कि सितम्बर महीने में डॉ.मन मोहन सिंह ने उनक नियुक्ति जिस तरह की थी, उसमें कहीं न कहीं कुछ तो असंवैधानिक हुआ है। वैसे भी सीवीसी का पद कोई राजनैतिक लालीपाप नहीं है, कि कांग्रेस इसमें सारे नियम कायदों को धता बताते हुए मनमानी कर ले।

वस्तुतः सीवीसी का पद संवैधानिक है, जिसकी पहली अहर्ता ही ईमानदारी और विश्वसनीयता है। इस पद के लिए नियुक्ति हेतु तीन सदस्यीय टीम का गठन किया गया है, जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का समावेश किया गया है। इस मामले में वजीरे आजम मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की एक राय तो मानी जा सकती है, कि वे टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले को दबाना चाह रहे हों, किन्तु जब इस मसले में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने आपत्ति दर्ज की तो उनकी आपत्ति को प्रधानमंत्री ने दरकिनार कैसे कर दिया।

यक्ष प्रश्न तो आज भी यही सामने आ रहा है कि क्या भारत गणराज्य का कलश ईमानदार अफसरान से रीत गया है, जो पामोलिन आयात घोटाले के अभियुक्त पी.जे.थामस को इस पद पर बिठाया गया है। वस्तुतः इस पद के लिए एक एसे नौकरशाह की दरकार थी जिसकी कालर स्वच्छ हो। थामस के भ्रष्ट होने के बारे में सुषमा स्वराज की चीख पुकार बेकार ही साबित हुई। भाजपा ने इस मसले मंे महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपा, मगर हमारे निरीह, ईमानदार, सच्चे, अर्थशास्त्री, साफ, स्पष्ट, मौन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मामला बिगड़ता देख आनन फानन ही महामहिम से थामस को पद की शपथ दिलवा दी।

स्पेक्ट्रम मामले में संसद की कार्यवाही बाधित है, यही कारण है कि संसद में थामस की नियुक्ति पर शोर शराबा नहीं हो पा रहा है। इतना सब बवाल होने के बाद भी मोटी चमड़ी वाले कांग्रेस के नेताओं ने इतना साहस भी नहीं जुटाया कि वे थामस की नियुक्ति के बारे में कहीं भी स्पष्टीकरण दे सकें। चहुंओर एक ही बयार बह रही है कि सारे नियम कायदों को धता बताकर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने पी.जे.थामस को केंद्रीय सतकर्ता आयुक्त बना दिया, इससे यही मैसेज जा रहा है कि कांग्रेस और उसकी सरकार को लोकतंत्र की परवाह ही नहीं रही। विपक्ष के विरोध पर भी कांग्रेस का नेतृत्व शर्म हया को त्यागकर अड़ा हुआ है।

बेशर्मी का लबादा ओढने वाली कांग्रेस को इस बात की परवाह तक नहीं है कि देश की सबसे बड़ी अदालत की बार बार फटकार के बाद भी वह मुंह खोलकर यह नहीं कह पा रही है कि आखिर थामस के बारे में सरकार की कार्ययोजना क्या है? देखा जाए तो कांग्रेस द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर ही थामस का बचाव किया जा रहा है, अगर एसा नहीं है तो इन आरोपों को जवाब क्यों नहीं दे पा रही है कांग्रेस? साथ ही अगर कांग्रेस एसा नहीं कर रही है तो कांग्रेस को तत्काल ही थामस को पदच्युत कर देना चाहिए था। हो सकता है कांग्रेस के तेज दिमाग रणनीतिकार चाणक्य इस बात की खोज में लगे हों कि पामोलिन आयात घोटाले के अभियुक्त पी.जे.थामस को इस तरह के जिम्मेदार संवैधानिक पद पर बिठाने की तोड़ क्या हो सकती है! इस विलंब के पीछे इससे ज्यादा तर्कसंगत कारण और हमारी समझ में नहीं है।

गौरतलब होगा कि सीवीसी का गठन देश में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के दरम्यान राजनैतिक दबाव और हस्ताक्षेप को दूर रखने के उद्देश्य को केंद्रित कर किया गया था। इतना ही नहीं भारत गणराज्य की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख का चयन सीवीसी की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा ही किया जाता है। यह समिति देश के योग्य पुलिस अधिकारियों में से एक का चयन सीबीआई चीफ के तौर पर करती है। क्या इस तरह के दागी के हाथों में कमान सौंपे जाने पर ईमानदारी की परंपरा का निर्वहन किया जा सकेगा?

यहां गुजरे जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना, मुमताज अभिनीत चलचित्र ‘‘रोटी‘‘ के एक गाने का जिकर लाजिमी होगा -‘‘यार हमारी बात सुनो, एसा इक इंसान चुनो, जिसने पाप न किया हो, जो पापी न हो . . . .।‘‘ अर्थात कल थामस अगर किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करते हैं तो वह भ्रष्टाचारी यह नहीं कह सकेगा कि थामस जिनका अपना दामन दागदार है, उन्हें क्या नैतिक अधिकार है किसी की जांच करने का। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा थामस को अपना पक्ष रखने का नोटिस मिलने पर वे गदगद हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि थामस की नैतिकता भी कांग्रेस के मानिंद पूरी तरह से मर चुक है। उनके उपर पामोलिन आयात घोटाला करने का आरोप है। यह आरोप आजकल का नहीं बरसों पुराना है। अगर वे इस मामले में बेदाग थे, तो अब तक उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए मामले में क्लीन चिट क्यों नहीं ले ली। आज वे अभियुक्त हैं, और उन्हें सीवीसी जैसे संवैधानिक पद पर बैठने का कोई अधिकार नहीं बचा है।

हंसी तो इस बात पर आती है कि भारत गणराज्य के गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदंबर खुद पेशे से वकील हैं। कोई भी लॉ ग्रेजुएट कानून की बारीकियों से बहुत अच्छे से वाकिफ होता है। इस लिहाज से चिदम्बरम की सोच समझ, ईमानदारी, सच्चाई पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लाजिमी हैं। सीवीसी के पद पर नियुक्ति के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते समय आखिर किस आधार पर चिदम्बरम ने मान लिया कि थामस निर्दोष हैं? क्या प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ.मनमोहन सिंह और गृहमंत्री के तौर पर चिदम्बरम द्वारा ली गई शपथ बेमानी थी? क्या यह राष्ट्र के साथ सरेआम धोखाधड़ी की श्रेणी में नही आएगा?

जब भारत गणराज्य की स्थापना की गई थी, तब लोकतंत्र की परिभाषा थी, जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन। इस व्यवस्था में विपक्ष को अपनी बात कहने का, गलत बात का विरोध करने का पूरा पूरा अधिकार दिया गया था। पर सवा सौ साल पुरानी और आधी सदी से ज्यादा इस देश पर शासन करने वाली कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इक्कसवीं सदी में लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी है, जिसे एक शब्द में अगर कहा जाए तो वर्तमान में ‘‘लोकतंत्र‘‘ का समानार्थी शब्द कांग्रेस की नजर में ‘‘हिटलरशाही‘‘ है। विपक्ष चाहे जो कहते, चीखे चिल्लाए, पर सरकार वही करेगी जो उसके मन को भा रहा हो। अगर यही लोकतंत्र है तो इससे बेहतर तो ब्रितानियों की गुलामी ही थी।

कक्षाओं में 40 से अधिक बच्चे होने पर होगी कार्यवाही

सीबीएसई बोर्ड कसेगा शालाओं की लगाम

सूचना आयोग के निर्देशों का होगा कड़ाई से पालन

सरकारी शालाओं पर भी गिर सकती है गाज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अभिभावकों और विद्यार्थियों को आकर्षित करने की गरज से निजी तौर पर संचालित होने वाले शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से संबद्धता लिए जाने के बाद बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध न कराने के मामले में सीबीएसई बोर्ड का रवैया सख्त होने वाला है। राईट टू एजूकेशन कानून के प्रावधानों के तहत एक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 35 होना चाहिए किन्तु सीबीएसई ने इस नियम को शिथिल करते हुए विद्यार्थियों की संख्या 40 करने की बात कही गई है।

सीबीएसई बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि बोर्ड ने एक परिपत्र जारी कर अपने समस्त स्कूलों को ताकीद किया है कि शाला में एक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 40 से अधिक नहीं होना चाहिए। गौरतलब होगा कि बोर्ड ने शिक्षा के स्तर में सुधार की गरज से कंटिन्यूअस एण्ड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन स्कीम (सीसीई) लागू की गई है। इसमें पढ़ाई में किताबों के अलावा एक्सट्रा केरिकुलर एक्टीविटीज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, किन्तु एक कक्षा में छात्रों की संख्या अधिक होने पर इस योजना के सफल होने पर संदेह ही व्यक्त किया जा रहा है। इसके तहत आर्ट, डांस, म्यूजिक आदि के मामले में भी शाला को ध्यान देना होगा। इसके लिए प्रथक से क्लास रूम की व्यवस्था भी शाला को ही सुनिश्चित करनी होगी। हर शाला को एक खेल का कालखण्ड रखना भी अनिवार्य होगा, इसके लिए शाला के पास खेल का मैदान होना भी अनिवार्य किया गया है।

इसके साथ ही साथ केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा भी निर्देश जारी किए गए हैं कि शालाओं में पूरी पारदर्शिता अपनाई जाए। इसके लिए आयोग का कहना है कि हर शाला की अपनी एक वेव साईट होना आवश्यक है। इस वेव साईट में शाला का सीबीएसई एफीलेशन स्टेटस, आधारभूत अधोसंरचना (इंफ्रास्टक्चर), शिक्षकों के नाम, पद, उनकी शैक्षणिक योग्यताएं, प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, शाला का ईमेल आईडी, शाला प्रबंधन समिति के सदस्यों का विवरण, शाला का दूरभाष नंबर वेव साईट पर होना आवश्यक है। इसके साथ शाला को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह वेव साईट लगातार अद्यतन (अपडेट) की जाए, ताकि अभिभावकों को सारी जानकारियां मिल सकें।

सीबीएसई के दिशा निर्देशों में साफ किया गया है कि प्रत्येक शाला को अपना वार्षिक प्रतिवेदन भी वेव साईट पर डालना अनिवार्य होगा। इस प्रतिवेदन के साथ शाला को अपने इंफ्रास्टक्चर के अलावा वार्षिक गतिविधियां, रिजल्ट आदि को भी अद्यतन किया जाना अनिवार्य किया गया है। सीबीएसई के मान्यता प्राप्त स्कूलों के पास प्राणी विज्ञान, रसायन शास्त्र, भौतिकी विज्ञान, गणित एवं कम्पयूटर की प्रयोगशाला को अनिवार्य किया गया है।

सीबीएसई के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इन नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। इसके लिए सीबीएसई बोर्ड के निरीक्षण दल समय समय पर जाकर शालाओं का निरीक्षण करेंगे और बच्चों की संख्या निर्धारित से अधिक पाए जाने पर या पारदर्शिता का अभाव मिलने पर कठोर कार्यवाही भी करने का प्रावधान किया जा रहा है।

उधर दूसरी ओर सीबीएसई से मान्यता प्राप्त शासकीय शालाओं के हाल बेहाल ही हैं। अनेक शासकीय शालाओं में एक कक्षा में विद्यार्थियों की तादाद सैकड़ा पार कर चुकी है। इन शालाओं में राईट टू एजूकेशन के नियम का पालन सुनिश्चित करवाना टेडी खीर ही साबित होने वाला है। वहीं निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं में जहां एक एक कक्षा में चालीस से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, वहां अतिरिक्त बच्चों के लिए दूसरा सेक्शन बनाना शाला की बाध्यता होगी, किन्तु इसके साथ ही साथ उन शालाओं को सीबीएसई के नार्मस के हिसाब से योग्य शिक्षकों की तैनाती सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर सकती है।

अखिल भारतीय अभिभावक संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का कहना है कि निजी शालाओं में एक कक्षा में 60 से अधिक बच्चे मिलना आम बात है। अनेक निजी शिक्षण संस्थाओं में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। अनेक शालाएं शहरी आबादी से बहुत दूर स्थापित की गई हैं, जिससे बच्चों को आवागमन में तो अभिभावकों को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्री अग्रवाल का कहना है कि सरकार और सीबीएसई दोनों को चाहिए कि शालाओं के इन्फ्रास्टक्चर पर विशेष ध्यान दिया जाए।